नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

पत्रकारों की उम्र 55 साल होने पर सरकारें इन्हें सत्ता में एडजस्ट करें!

वर्तमान में पत्रकारिता की जो दशा है, उस हिसाब से सरकार को एक उम्र के बाद हर पत्रकार को शासन में एडजस्ट करना चाहिए। दरअसल, आज पत्रकारिता की राह में अनेक बाधाएं आ चुकी हैं। काम का बोझ, तनाव, समस्याएं, अपर्याप्त वेतन तो है ही इसके ऊपर हर वक्त सिर पर नौकरी जाने का खतरा मंडराता रहता है। मुख्य धारा का एक पत्रकार अपने जीवन में इतना परिश्रम और तनाव झेल जाता है कि 50-55 की उम्र के बाद वह किसी काम का नहीं रह जाता है। शायद यही कारण है कि इस उम्र के बाद आज अनेक पत्रकार अपनी लाइन बदलने का असफल प्रयास करते हैं।

रवीश के इस प्राइम टाइम शो को हम सभी पत्रकारों को देखना चाहिए

एनडीटीवी इंडिया पर कल रात नौ बजे प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश कुमार ने पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर एक परिचर्चा आयोजित की. इस शो में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी और प्रकाश के रे के साथ रवीश ने मीडिया और पत्रकार पर जमकर चर्चा की.

रवीन्द्र जैन, प्रदीप जोशी, उपमिता वाजपेयी, अनिल माथुर, संगीता प्रणवेन्द्र को श्रीफल पत्रकारिता पुरस्कार

बांसवाडा (राजस्थान)। पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य और समर्पित योगदान के लिए ‘अग्निबाण’ भोपाल के संपादक रवीन्द्र जैन, प्रदीप जोशी, उपमिता वाजपेयी, संगीता प्रणवेन्द्र, अनिल माथुर को प्रतिष्ठित श्रीफल पत्रकारिता पुरस्कार 2015 देने की घोषणा हुई है। यह पुरस्कार पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर महाराज की प्रेरणा से धार्मिक श्रीफल परिवार ट्रस्ट द्वारा प्रति वर्ष प्रदान किया जाता है। 

शिवराज के राज में सरकारी खामियों पर चुप रहने का नजऱाना है ‘पत्रकारिता पुरस्कार’

मध्यप्रदेश में पत्रकारिता की मूर्धन्य हस्तियों के नाम पर स्थापित मध्य प्रदेश आंचलिक पत्रकारिता पुरस्कार प्रदेश के सभी अंचलों में से चुनकर निष्पक्ष पत्रकारिता कार्य की उत्कृष्ठता, पत्रकार द्वारा किये गये कार्य से समाज के मानस पटल पर पड़े प्रभाव और समय-समय पर जनहित में निर्णय लेने के लिए सरकार को मजबूर करने वाली प्रतिभावान हस्तियों को सम्मानित करने के लिए दिया जाने वाला एक प्रतीकात्मक सम्मान है। ऐसे पत्रकार, जिन्होंने धन, बल, सत्तासुख के इतर समाज के बीच में अपनी प्रतिभा के दम पर अपना मान सम्मान हासिल किया हो। लीक से अलग हटकर ऊंचाइयों को छुआ हो, ऐसे पुरस्कार पत्रकारिता की बुनियाद को सुदृढ़ ही नहीं करते अपितु देश की आने वाली पीढ़ी को एक प्रभावशाली सकारात्मक संदेश भी देते हैं। 

विद्यार्थीजी के शहर कानपुर में गिफ्ट और डग्गे की पत्रकारिता

कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऐसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम ऐसे ही पत्रकारों में गिना जाता है। देश के तमाम बुद्धिजीवी विद्यार्थी जी को कानपुर शहर की पहचान का प्रतीक मानते हैं। लेकिन उनकी कर्मस्थली पर अब गिफ्ट और डग्गे की पत्रकारिता हो रही है। डंके चोट पर अखबार मालिक तक जमीनों के सौदे में लिप्त हैं और ज्यादातर पत्रकारों के पास खेमेबाजी के चटखारों के सिवा जैसे पत्रकारिता से रत्तीभर वास्ता नहीं।