नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकारों की उम्र 55 साल होने पर सरकारें इन्हें सत्ता में एडजस्ट करें!

वर्तमान में पत्रकारिता की जो दशा है, उस हिसाब से सरकार को एक उम्र के बाद हर पत्रकार को शासन में एडजस्ट करना चाहिए। दरअसल, आज पत्रकारिता की राह में अनेक बाधाएं आ चुकी हैं। काम का बोझ, तनाव, समस्याएं, अपर्याप्त वेतन तो है ही इसके ऊपर हर वक्त सिर पर नौकरी जाने का खतरा मंडराता रहता है। मुख्य धारा का एक पत्रकार अपने जीवन में इतना परिश्रम और तनाव झेल जाता है कि 50-55 की उम्र के बाद वह किसी काम का नहीं रह जाता है। शायद यही कारण है कि इस उम्र के बाद आज अनेक पत्रकार अपनी लाइन बदलने का असफल प्रयास करते हैं।

हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने एक सराहनीय फैसला लेकर वरिष्ठ पत्रकार दर्शन सिंह रावत को मीडिया को-आर्डिनेटर बनाया है। इस फैसले का विरोध नहीं हुआ। इसका अर्थ है कि श्री रावत इस पद के लिए बिल्कुल योग्य हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी रही है। श्री रावत सीधे-सरल हैं। वे न राजनीति जानते हैं और न ही इसमें रुचि रखते हैं। हां, यह बात दीगर है कि कई बार ऐसा सीधा आदमी राजनीति का मोहरा बन जाता है। जितनी मेरी उम्र है, लगभग उतने वर्ष उन्हें पत्रकारिता में हो चुके होंगे। मैं जब अमर उजाला चंडीगढ़ में ट्रेनी और जूनियर सब एडीटर था, वे तब शिमला में अमर उजाला मंे सीनियर काॅरोस्पोंडेंट थे। अब तक उन्हें कहीं समूह संपादक बन जाना चाहिए था, लेकिन इसलिए नहीं बन पाए कि वे राजनीतिक लल्लो-चप्पोबाजी और चरणवंदना से बहुत दूर रहते हैं। मुझे खुशी है कि उन्हें सरकार ने उनके योग्य पद दिया, लेकिन सुखद आश्चर्य इस बात का भी है कि दर्शन सिंह रावत जैसा सीधा-सरल व्यक्ति इस पद तक कैसे पहुंचा! क्योंकि ऐसे पद प्रायः राजनीतिक सिद्धहस्त लोगों को ही मिलते हैं। अगर श्री रावत जैसे लोगों को यह मिले तो इसे सरकार की ईमानदार नीति का हिस्सा माना जाना चाहिए।

खैर, उत्तराखंड में ही पत्रकारों को सत्ता में एडजस्ट करने की परंपरा नहीं है। मैं यह हरियाणा में भी देख चुका हूं। दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पत्रकार रहे बलवंत तक्षक को 14-15 साल पहले ओमप्रकाश चैटाला सरकार में एडजस्ट किया गया था। लबोलुआब यह कि अगर पत्रकार योग्य, ईमानदार है तो उसके अनुभव का लाभ सरकार द्वारा लिया जाना चाहिए। जो काम सरकार की मोटी तनख्वाह वाले सूचना विभाग के अधिकारी नहीं कर पाते हैं, वह काम एक वरिष्ठ पत्रकार आसानी से कर सकता है। वैसे भी उत्तराखंड का सूचना विभाग पत्रकारों और अखबारों में भेदभाव को लेकर अक्सर चर्चाओं में रहता है। पत्रकारों को मान्यता देने को लेकर यहां क्या खेल चलता है, यह पत्रकारों से छिपा नहीं है। छोटे अखबारों और अखबारों को विज्ञापन देने की तो बात ही छोड़ दीजिए।

मेरा सुझाव यह है कि पत्रकारों की उम्र 55 साल होने के बाद सरकार इन्हें योग्यता और क्षमतानुसार सत्ता में एडजस्ट जरूर करे। शर्त यह कि सरकार पत्रकार को एडजस्ट करते समय गुटीय भावना, पार्टी भावना से ग्रस्त न हो। आज कोई यह कहता है कि फलां पत्रकार फलां मुख्यमंत्री का चहेता रहा तो यह बात सरासर गलत है खासकर बड़े अखबारों के मामले में। क्योंकि बड़े अखबारों में सत्ता से संबंध पत्रकार का नहीं, सीधे प्रबंधन और मालिकों का होता है। आज कोई योग्य पत्रकार सत्ता का अंग बनता है तो पत्रकारों को ईर्ष्या के बजाय खुश होना चाहिए। जब आठवीं फेल कोई आदमी अपनी पार्टी की सत्ता आने पर राज्यमंत्री बन सकता है तो एक पत्रकार क्यों न शासन का अंग बने!  जीवनभर लोकतंत्र के चैथे स्तंभ की भूमिका निभाने के बाद अंततः उसे भी सुविधासंपन्न नागरिक का जीवन जीने का हक होना चाहिए। खासकर उसके परिवार को।

डॉ. वीरेंद्र बर्त्वाल
देहरादून
veerendra.bartwal8@gmail.com

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रवीश के इस प्राइम टाइम शो को हम सभी पत्रकारों को देखना चाहिए

एनडीटीवी इंडिया पर कल रात नौ बजे प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश कुमार ने पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर एक परिचर्चा आयोजित की. इस शो में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी और प्रकाश के रे के साथ रवीश ने मीडिया और पत्रकार पर जमकर चर्चा की.

आजकल भारत में जब सत्ता परस्त रिपोर्टिंग को ही पत्रकारिता माना जाने लगा है और सरकार पर सवाल करने वालों को संदेह की नजर से देखा जाता है, रवीश का यह शो हम सभी को एक बार फिर से पत्रकारिता की मूल भावना, मूल आत्मा की तरफ ले जाने का काम किया है और अपने भीतर झांकने को प्रेरित किया है. यह चर्चित प्राइम टाइम डिबेट देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=eDUADSnA7so

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर क्या कहते हैं, पढ़िए….

Nitin Thakur : रवीश कुमार अकेले हैं जो टीआरपी को ताक पर रख दर्शक और पाठक को भी ऑन एयर और ऑन मंच लताड़ सकते हैं। इसके लिए जो चाहिए उसे ‘ईमान’ कहते हैं। ये सुविधा हर किसी को नहीं मिलती। इसे हासिल करना पड़ता है मेहनत करके।

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रवीन्द्र जैन, प्रदीप जोशी, उपमिता वाजपेयी, अनिल माथुर, संगीता प्रणवेन्द्र को श्रीफल पत्रकारिता पुरस्कार

बांसवाडा (राजस्थान)। पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य और समर्पित योगदान के लिए ‘अग्निबाण’ भोपाल के संपादक रवीन्द्र जैन, प्रदीप जोशी, उपमिता वाजपेयी, संगीता प्रणवेन्द्र, अनिल माथुर को प्रतिष्ठित श्रीफल पत्रकारिता पुरस्कार 2015 देने की घोषणा हुई है। यह पुरस्कार पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर महाराज की प्रेरणा से धार्मिक श्रीफल परिवार ट्रस्ट द्वारा प्रति वर्ष प्रदान किया जाता है। 

धार्मिक श्रीफल परिवार के पुरस्कार संयोजक भरत जैन इन्दौर ने पुरस्कारों की घोषणा करते हुए बताया कि इस बार श्री भट्टारक चारुकीर्ती श्रवणबेलागोला की स्मृति में श्रीफल जैन पत्रकारिता पुरस्कार अग्निबाण भोपाल के संपादक रवीन्द्र जैन को प्रदान किया जाएगा। उनके अलावा कर्पूर चंद्र कुलिश स्मृति पुरस्कार सूरत में राजस्थान पत्रिका के संपादक प्रदीप जोशी को, भगवान बाहुबली स्मृति पुरस्कार दैनिक भास्कर के नेशनल रूम में कार्यरत उपमिता वाजपेयी को, उल्लेखनीय पत्रकारिता पुरस्कार इंडिया न्यूज जयपुर की संवाददाता श्रीमती संगीता प्रणवेन्द्र को, आचार्य अभिनंदन सागर स्मृति पुरस्कार वरिष्ठ पत्रकार अनिल माथुर को दिया जाएगा। सम्मान समारोह 23 अगस्त को बांसवाड़ा राजस्थान में उपाध्याय श्री अनुभव सागर जी महाराज एवं मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित किया जाएगा। पुरस्कार समारोह में सम्मानित होने वाले पत्रकारों को शॉल, स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार राशि प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा। 

उल्लेखनीय है कि उत्कृष्ट और समर्पित पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिष्ठित श्रीफल पत्रकारिता पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 2009 में हुई थी। पूर्व में हिन्दी और अंग्रेजी के अनेक जाने-माने पत्रकार और फोटो पत्रकार यह सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। पुरस्कार का निर्णय पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान के आधार पर श्रीफल परिवार और वरिष्ठ पत्रकारों की टीम करती है।

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शिवराज के राज में सरकारी खामियों पर चुप रहने का नजऱाना है ‘पत्रकारिता पुरस्कार’

मध्यप्रदेश में पत्रकारिता की मूर्धन्य हस्तियों के नाम पर स्थापित मध्य प्रदेश आंचलिक पत्रकारिता पुरस्कार प्रदेश के सभी अंचलों में से चुनकर निष्पक्ष पत्रकारिता कार्य की उत्कृष्ठता, पत्रकार द्वारा किये गये कार्य से समाज के मानस पटल पर पड़े प्रभाव और समय-समय पर जनहित में निर्णय लेने के लिए सरकार को मजबूर करने वाली प्रतिभावान हस्तियों को सम्मानित करने के लिए दिया जाने वाला एक प्रतीकात्मक सम्मान है। ऐसे पत्रकार, जिन्होंने धन, बल, सत्तासुख के इतर समाज के बीच में अपनी प्रतिभा के दम पर अपना मान सम्मान हासिल किया हो। लीक से अलग हटकर ऊंचाइयों को छुआ हो, ऐसे पुरस्कार पत्रकारिता की बुनियाद को सुदृढ़ ही नहीं करते अपितु देश की आने वाली पीढ़ी को एक प्रभावशाली सकारात्मक संदेश भी देते हैं। 

 

परन्तु विगत 8 अप्रैल 2015 को राज्य सरकार के अधीन एक वित्तीय संस्थान की भव्य इमारत में वेतन भोगी श्रोताओं से भरे हॉल में मुख्यमंत्री के हाथो सम्मानित होने वाले महानुभावों की सूची देखकर तो नहीं लगता कि कभी किसी की हिम्मत भी हुई होगी कि जनहित के दृष्टिगत सरकार के किसी निर्णय पर उन्होंने कोई टिप्पणी की होगी। लगता है कि पुरस्कार चयन समिति ने पत्रकारिता प्रतिभा के तय मापदण्डों के विपरीत औद्योगिक और अन्तराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों द्वारा संचालित समाचार पत्रों, टी.वी.चैनलों के वेतन भोगी पत्रकार नाम के कर्मचारी रहे एवं सरकार के अशासकीय सूचना वाहकों को उपकृत करने का कार्यक्रम था। पुरस्कार प्राप्त करने वालों में से कोई ऐसा नहीं, जिसके आलेख अथवा रिपोर्ट पर समाज या जनता जनार्दन का कोई भला हुआ हो। 

आंचलिक पत्रकारिता पुरस्कार के नाम पर महानगरीय चकाचौंध में रचे बसे और सरकार के मुंह लगे लोगों को ही उपकृत किया गया है। मुख्यमंत्री सचिवालय, वरिष्ठ नौकरशाहों की चाटुकारिता करने वाले लोगों को पुरस्कार सूची में डालकर भरी महफिल में नजराना पेश किया गया है। महफिल के सरताज मुख्यमंत्री और उनकी योजनाओं के प्रचार मंत्री के साथ-साथ वो पूरा सरकारी दल बल भी था, जो सशुल्क वैतनिक आधार पर सरकारी तंन्त्रानुसार पत्रकारों को डराने धमकाने और पुचकारने का काम दिन रात करता है। इस भव्य माहौल में स्क्रीन पर्दे पर प्रदेश सरकार के मुखिया ही बार-बार दिखाये जा रहे थे। 

वहीं आयोजन स्थल के बाहर एक दिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री जनरल वी के सिंह की टिप्पणी की चर्चा सुर्खियों में थी। हालांकि ऐसा नहीं है कि अकेले केन्द्रीय मंत्री ने ही मीडिया को वेश्या कहा है। इसके पहले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मीडिया को बाजारू कह कर अपमानित कर चुके हैं। इसी प्रकार सत्तासीन सरकार के मंत्री हो या अन्य दर्जनों  जनप्रतिनिधि ने  अनेक बार अपने शब्दकोश के विश को मीडिया कर्मियों पर उड़ेला है। मगर मजाल है कि कोई भी वेतन भोगी पत्रकार कभी अपनी हिमाकत कर पाया हो कि मैं वेश्या अथवा बाजारू नहीं हूं। और न ही कोई रात दिन टी आर पी के लिए घुड़ दौड़ करने वाला समाचार चैनल और ना ही कोई अपने आपको देश का नं. एक बताने वाला किसी भी भाषा का समाचार पत्र। इससे और अधिक एक मीडिया कर्मी की शर्मिन्दगी क्या हो सकती है कि सरकार उसे वेश्या कह कर पुकारे। यह शब्द तो वेश्या भी सार्वजनिक स्थान पर सुनकर भड़क जायेगी। अर्थात आज भी कोई व्यक्ति वेश्या को मुंह पर वेश्या कहकर नहीं पुकार सकता है। 

और अन्दर भव्यता के साथ अहसास कराया जा रहा था कि ये हमारे अपने बनाये हुए हैं। इतनी जिल्लत तो कोई स्वतंन्त्र आम नागरिक भी नहीं सहन कर सकता । तो यहां सब कुछ प्रायोजित तरीके से किया जा रहा है। स्पष्ट है, आखिर गुलामी कोई चीज है, चाहे अर्थ की हो या सरकार के टुकड़ों पर अय्याशी करने की अथवा और किसी तरह की।

स्वतंन्त्र भय मुक्त विचारक पत्रकार की कलम के तर्क से,

जहां बड़े-बड़े सत्ताधीशों के सिंहासन हिल जाते हैं।

मगर यहां तो लाखों पत्रकारों की भीड़ में बुत मौन स्तम्भ है।

जिनकी कलम कभी स्वाभिमान में न चली,

मगर चलेगी भी, चाटुकारिता, चारणभाटों जैसे गुणगान में,

यहां कोई गर्व की बात नहीं, और भान भी किसी को है नहीं,

यहॉ जिंदगी भी शर्मसार है गुलामी के जंजाल में।

पं. एस के भारद्वाज

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विद्यार्थीजी के शहर कानपुर में गिफ्ट और डग्गे की पत्रकारिता

कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऐसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम ऐसे ही पत्रकारों में गिना जाता है। देश के तमाम बुद्धिजीवी विद्यार्थी जी को कानपुर शहर की पहचान का प्रतीक मानते हैं। लेकिन उनकी कर्मस्थली पर अब गिफ्ट और डग्गे की पत्रकारिता हो रही है। डंके चोट पर अखबार मालिक तक जमीनों के सौदे में लिप्त हैं और ज्यादातर पत्रकारों के पास खेमेबाजी के चटखारों के सिवा जैसे पत्रकारिता से रत्तीभर वास्ता नहीं।

अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण गणेश शंकर विद्यार्थी एंट्रेंस तक ही पढ़ सके किंतु उनका स्वतंत्र अध्ययन अनवरत चलता ही रहा। अपनी मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने पत्रकारिता के गुणों को खुद में भली प्रकार से सहेज लिया था।  

कानपुर में मीडिया से नजदीकी होने के साथ मैंने महसूस किया कि राज-समाज और पत्रकारिता का सरोकार निहायत  बेमेल हो चला है। अधिकतर पत्रकारों को अपनी नासमझी पर कोई अफ़सोस नहीं बल्कि मीडिया ब्रांड का गुरुर सिर चढ़ के बोल रहा। वरिष्ठों का बड़प्पन उनकी मठाधीशी में नज़र आता है तो नवोदित चेहरे चरण चुम्बन को पत्रकारिता की पहली सीढ़ी मान बैठे। ऐसा भी नहीं कह सकते कि उनका अनजान होना ही कुछ खास न कर पाने की वजह है क्योंकि सहज ज्ञान यानि कॉमन सेंस सद्भावना और सहानुभूति किसी तथाकथित विद्वान की बपौती नहीं लेकिन मौका विशेष पर एडिटर के कहने से अगर कैमरा चमके या कलम चले तो इसको कर्मकांड के अलावा और क्या कहा जाएगा।

गणेश  शंकर विद्यार्थी की कर्मभूमि कानपुर में पत्रकारिता का वर्तमान कितना बदहाल है, ये गिफ्ट और डग्गे की पत्रकारिता को देख के नज़र आता है। ये पब्लिक है, सब जानती है। आम लोगों की चर्चा में अक्सर सुनने को मिलता है, आइये जानते हैं कि इस मामले में जागरुक शहरी क्या कहते हैं। 

बहुत सी कड़वी सच्चाइयों को जानते हुए अख़बारों में सिर्फ रूटीन न्यूज भर पढ़ने को मिले तो पत्रकारों को कोसने से ज्यादा और क्या किया जा सकता है। मैंने बेबाकी से अपनी नाराजगी और शिकायतें बयाँ करनी शुरू कीं तो कुछ लोग इसी नाराजगी को मेरी पत्रकारिता मान बैठे। बाद में पत्रकारों की दुर्दशा देखी तो लगा कि अख़बारों के मालिकान भी ठीक नहीं। इस निष्कर्ष पर पहुंचा ही था, तभी पता चला कि कुछ अख़बारों के मालिक अवैध जमीनी सौदों में लिप्त हैं। उन लोगों पर क़ानूनी कार्रवाई न होना उनके मीडिया हाउस के लिए सरकारी नजराने जैसा है। 

जाहिर है कि गणेश शंकर विद्यार्थी के शहर में रह कर सरकार, पत्रकारिता और मीडिया घरानों की गिरोहबंदी भी देखने को मिली, साथ ऐसी पत्रकारिता भी देखने को, जिसके लिए प्रोफेशनलिज्म के नाम पर अर्धसत्य ही अंतिम लक्ष्य लगता है। तमाम साथी इस कर्मकांड के भुक्तभोगी के तौर पर ही मिले। उनमें से कइयों को लोग चंद रुपये में हुनर बेचने को मजबूर पत्रकार के तौर पर जानते हैं। उन्हीं में से एक अशक्त बुजुर्ग इंद्र भूषण रस्तोगी का चेहरा अक्सर याद आता है, जिन्हें जानकार शोषित पत्रकार जमात का प्रतीक मानते हैं। 

मुद्दे, विचार और विमर्श के नाम पर प्रेस क्लब में अगर कुछ था तो कैरम बोर्ड और गर्मियों में चलने वाला वातानुकूलन यन्त्र यानि एसी। पत्रकार हितों के नाम पर किसी को पत्रकार पुरम बसाने की वाहवाही लूटना मजेदार लगता है तो किसी को खेमेबाजी की कहानियां चटखारे लेकर सुनाने में। कुल मिला के कहें तो जनता और जनहित की बात के लिए प्रेस क्लब के भवन से ज्यादा बतकही शिक्षक पार्क के कोने पर भोला की चाय की दुकान में ज्यादा होती नज़र आती है।

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