हर ख़बर को दूसरी ख़बर से जोड़कर बुलेटिन बनाने के आदती हैं पुण्य प्रसून बाजपेयी

टीवी चैनलों में लिंक न्‍यूज़ का प्रयोग Punya Prasun Bajpai ने किया था। उनकी आदत है कि हर ख़बर को दूसरी ख़बर के साथ जोड़कर बुलेटिन बनाते हैं ताकि एक परिप्रेक्ष्‍य निर्मित हो सके। इसीलिए आज सुबह जब वे रामेश्‍वरम और मुंबई को अलग-अलग दिखा रहे थे, तब मैंने उन्‍हें एक एसएमएस किया कि क्‍यों न दो विंडो में रामेश्‍वरम और मुंबई को एक साथ दिखाया जाए और याकूब व कलाम की मौत को लिंक कर के बात की जाए।

उनका जवाब तो नहीं आया, लेकिन ‘डेलीओ’ नाम की वेबसाइट पर नदीम असरार का एक यह बेहतरीन लेकिन छोटा सा लेख ज़रूर दिख गया, जिसमें ऐसी कुछ कोशिश है। मुझे लगता है कि आज देश में मनाई जा रही दो मौतों को एक साथ रखकर देखा जाना चाहिए। जल्‍दबाज़ी में किया गया तर्जुमा है, लेकिन मौका निकाल कर ज़रूर पढ़ें।

एक आततायी भीड़ का शोकगान (नदीम असरार) : आज भारत के सामने नैतिक रूप से दो परस्‍पर विरोधाभासी घटनाएं घट रही हैं : पहली, 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी याकूब मेनन को उसके 54वें जन्‍मदिवस पर दी गई फांसी; और दूसरी, कुछ घंटों बाद मिसाइल मैन व पीपुल्‍स प्रेसिडेंट एपीजे अब्‍दुल कलाम की राजकीय सम्‍मान के साथ अंत्‍येष्टि, जो किसी भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता के मामले में की गई एक दुर्लभ व अभूतपूर्व खुशामद है।  

एक ही दिन सजे मौत के ये दो रंगमंच एक ऐसे देश के लिए संभवत: बड़े सूक्ष्‍म रूपक का काम करते हैं जहां एक विशिष्‍ट ताकत के सत्‍ता में आने में के बाद उभरा एक विशिष्‍ट विमर्श अब पर्याप्‍त ज़मीन नाप चुका है। कलाम और मेमन नाम के इन दो भारतीय मुसलमानों का सफ़र और उनकी मौत एक ऐसा आईना है जिसमें हम भारतीय धर्मनिरपेक्षता की चारखानेदार चाल के कई अक्‍स एक साथ आसानी से देख सकते हैं।

हिंदुत्‍व के निर्मम और अनवरत हमले के बोध से घिरे तमाम भारतीयों को अब दोनों पर सवाल खड़ा करने से रोकना मुश्किल जान पड़ रहा है- एक, कलाम का राजकीय सम्‍मान और दूसरा, मेमन की राजकीय हत्‍या।

मिसाइल वैज्ञानिक कलाम को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने राष्‍ट्रपति पद के लिए चुना था। वे उस राष्‍ट्रवादी सत्‍ता के लिए आदर्श चुनाव थे जिसका लक्ष्‍य आक्रामक तरीके से सैन्‍य एजेंडे को हासिल करना था। चूंकि वे एक ऐसे तमिल मुसलमान थे जिनकी छवि अपनी धार्मिकता को खारिज करने से बनी थी और उस तत्‍व को प्रदर्शित करने पर टिकी थी जिसे उनके चाहने वाले दक्षिणपंथी लोग ”भारतीय” जीवनशैली करार देते हैं, लिहाजा उनको चुना जाना बीजेपी के लिए मददगार ही साबित हुआ।

कलाम को जुलाई 2002 में भारत का राष्‍ट्रपति चुना गया था। यह गुजरात के नरसंहार के महज कुछ महीने बाद की बात है। मौजूदा प्रधानमंत्री के राज में उस वक्‍त तक राज्‍य में नफ़रत की आग फैली हुई थी। अपेक्षया समृद्ध गुजरात के बीचोबीच खड़े तमाम राहत शिविर लगातार आंखों में गड़ रहे थे और नरसंहार के शिकार लोग अब भी गुजरात और बाहर की अदालतों के दरवाजे खटखटा रहे थे।

गुजरात ने वाजपेयी की छवि को भी काफी नुकसान पहुंचाया था क्‍योंकि वे तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ कोई कार्रवाई कर पाने में नाकाम रहे थे। इतना ही नहीं, नरसंहार के कुछ महीने बाद गोवा में एक कुख्‍यात भाषण में उन्‍होंने हिंसा को जायज़ तक ठहरा दिया था। उन्‍हें अपना रेचन करने की जरूरत थी। कलाम इसके काम आए। अगले दो साल तक जब तक वाजपेयी सत्‍ता में रहे, कलाम ने अपना किरदार हॉलीवुड के क्‍लासिक ”ब्‍लैक साइडकिक” की तर्ज़ पर बखूबी निभाया।

बाकी की कहानी इतिहास है। इसके बाद यह शख्‍स अपने व्‍याख्‍यानों, पुस्‍तकों और प्रेरक उद्धरणों के सहारे चौतरफा रॉकस्‍टार बन गया, जिसका निशाना खासकर युवा आबादी थी। इस प्रक्रिया में कलाम ने अधिकांश मौकों पर उन तमाम जातिगत और वर्गीय संघर्षों की ओर से अपनी आंखें मूंदे रखीं जिनका सामना इस देश के युवा कर रहे थे।

चाहे जो भी रहा हो, लेकिन रामेश्‍वरम से लेकर रायसीना तक कलाम का शानदार उभार इसके बावजूद एक समावेशी भारतीय किरदार का उदाहरण बन ही गया, जैसा कि सोशल और मुख्‍यधारा के मीडिया में उनकी मौत पर गाए जा रहे सामूहिक शोकगान से ज़ाहिर होता है।   

बिलकुल इसी बिंदु पर याकूब मेनन की विशिष्‍टता उतनी ही मर्मस्‍पर्शी बन जाती है। एक ऐसी विशिष्‍टता, जो राज्‍य को हत्‍याओं और सामूहिक हत्‍याओं में फर्क बरतने की सहूलियत देती है। एक ऐसी विशिष्‍टता, जो हमारी राष्‍ट्रीय चेतना में अपने और पराये की धारणा को स्‍थापित करती है।

आज के भारत में मौत की सज़ा का विरोध करना उदारवादियों का एक प्रोजेक्‍ट बन चुका है। (और उदारवादियों पर हमेशा ही उनके भारत-विरोधी षडयंत्रों के लिए संदेह किया जाता रहा है।)

इससे भी बुरा हालांकि यह है कि राजकीय हत्‍याएं हमेशा उन विवरणों से प्रेरित होती हैं जिनका उस मुकदमे से कोई लेना-देना नहीं होता जिसके तहत दोषी को लटकाया जाता है। प्रत्‍येक हत्‍या एक संदेश होती है, और हर मामले का विवरण इतना मामूली बना दिया जाता है कि उस पर कोई कान नहीं देता।

यही वजह है कि आततायियों की जो भीड़ नागपुर में मेमन को लटकाए जाने का इंतज़ार भी नहीं कर पा रही थी, वह उस हिंसा और नाइंसाफी को संज्ञान में लेने तक को तैयार नहीं है जिसने मेमन को पहले पहल पैदा किया। उनकी आवाज़ें इतनी दहला देने वाली हैं कि उसमें मुसलमानों (और उदारवादियों) के निहायत ज़रूरी सवाल दब गए हैं: 

”आखिर 1992-93 के मुंबई दंगों का क्‍या हुआ?”

”क्‍या श्रीकृष्‍ण आयोग की रिपोर्ट को लागू किया गया?”

”मुंबई में हुई 900 से ज्‍यादा मौतों के लिए क्‍या राज्‍य ने बाल ठाकरे और उनकी शिव सेना पर मुकदमा चलाया?”

”मुकदमा?” वे मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं, ”हमने तो पूरे राजकीय सम्‍मान के साथ ठाकरे को विदाई दी थी।”  

”अच्‍छा, क्‍या वही सलाम जो अब कलाम को मिलने वाले हैं?”

चुप…।  

अभिषेक श्रीवास्‍तव के एफबी वाल से 

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सत्ता का नया पाठ, राजनीति कीजिये नौकरी पाइए

75 के आंदोलन में छात्रों ने जेपी की पीछे खड़े होकर डिग्री गंवाई। नौकरी गंवाई। 89 के आंदोलन में वीपी के पीछे खड़े होकर छात्रों ने आरक्षण को डिग्री पर भारी पाया। सत्ता के गलियारे में जातिवाद की गूंज शुरु हुई। 2013 में सत्ता ने पहले अन्ना आंदोलन को हड़पा और फिर 2015 में सत्ता ने ही छात्रों को रोजगार का सियासी पाठ पढ़ाया। यानी पहली बार खुले तौर पर छात्रों को यह खुले संकेत दिये जा रहे है कि अगर वह राजनीतिक दलों से जुड़ते है तो सत्ता में आने के बाद छात्रो की डिग्री पर उनकी राजनीतिक सक्रियता भारी पड़ेगी। यानी जो छात्र राजनीति से दूर रहते है या सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देते हुये अच्छे नंबरो के लिये दिन रात एक किये होते है आने वाले वक्त में उसका कोई महत्व बचेगा नहीं।

यह सवाल इसलिये डराने लगा है क्योंकि इससे पहले यूपी में समाजवादी पार्टी की सत्ता तले यादवों के भर्ती के किस्से खूब रहे हैं। संयोग से इतनी बडी तादाद में खुले तौर पर जातीय आधार पर नौकरी बांटी गई कि भर्ती घोटाला शब्द ही यूपी की सत्ता के साथ जुड़ गया। मध्यप्रदेश में शिवराज चौहाण सरकार के दौर में व्यापम ने नौकरी को पूंजी से जोड़ दिया। करोडों के वारे-न्यारे के खेल इतने खुले तौर पर हुये कि जब पोटली खुलनी शुरु हुई तो राजनेता, नौकरशाह, बिजनेसमैन और दलालों की नैक्सस भी सामने आ गया। लेकिन ताजा मिसाल तो उन दो नेताओं की सत्ता से जा टिका है, जिन्होंने सत्ता के लिये भावनात्मक तौर पर वोटरों के दिल-दिमाग को छुआ। अर्से बाद इन दो नेताओं के गुस्से से भरे भाषणों को सुनकर वोटरों में यह एहसास जागा कि बदलाव की घड़ी अब उनके दरवाजे पर दस्तक दे ही देगी। क्योंकि एक तरफ नरेन्द्र मोदी का लुटियन्स की दिल्ली की रईसी पर सीधी चोट करना था तो दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल का सामाजिक ढांचे को ही बदलने का प्रण था।

मोदी के भाषणों ने छात्रो को इस हदतक प्रभावित किया कि 26 मई 2014 के तुरंत बाद ही एडमिशन से लेकर नौकरी पाने के हकदार छात्रों के सामने जैसे ही नंबर होने के बावजूद कही आरक्षण तो कही डोमिसाइल के चक्कर में एडमिशन ना हो पाने का संकट उभरा तो हर किसी ने पीएम मोदी को ही याद किया। कइयों ने पीएमओ के नाम मेल किये तो कईयो ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। कुछ ऐसा ही नौकरी पाने का हकदार होने के बावजूद कही पैरवी तो कही राजनीतिक खेल की वजह से नौकरी ना मिल पाने वाले छात्रों ने भी अपने अपने तरीके से पीएम को ही याद किया। 

क्योंकि राजनीतिक सत्ता के भीतर के मवाद को निकालने की कसम मोदी ने पीएम पद के लिये चुनावी प्रचार के वक्त की थी। छात्रों को ऐसी ही आशा केजरीवाल से भी जागी। खासकर दिल्ली में पढने के लिये आने वाले छात्रो ने महसूस किया कि केजरीवाल पढे लिखे हैं । नौकरी छोड़कर नेता बने हैं। तो सत्ता मिलने के बाद दिल्ली में छात्रों को संकट से निजात मिलेगा। एडमिशन हो या पढाई के बाद नौकरी का सवाल दोनों दिशा में दिल्ली सरकार कदम जरुर उठायेगी। दोनों ही नेताओं को लेकर छात्रों में आस इस हद तक हुई कि प्रधानमंत्री मोदी के पद संभालते ही सारी मुश्किले छूमंतर हो जायेगी कुछ एसा ही 88 फीसदी नंबर पाने के बाद पूना में कहीं दाखिला ना होने पर य़श को लगा और उसने अगस्त-सितबंर 2014 में ही पीएमओ में मेल कर अपना गुस्सा निकाला। तो दिल्ली में जिस तरह राजस्थान छात्र को 92 फीसदी नेबर आने पर भी दिल्ली विश्वविघालय में नामांकन ना मिला उसने केजरीवाल और देश की शिक्षा मंत्री को मेल कर अपना गुस्सा निकला । मुश्किल गुस्सा निकालने भर की नहीं है ।

मुश्किल है कि राजनेताओं और राजनीति से गुस्से में आया युवा तबका ही तो 2011-12 में दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में जुटता था । और देखते देखते देश के शहर दर शहर में रामलीला मैदान ओऔर जंतर मंतर बनने लगे थे । जिससे पारंपरिक राजनीतिक सत्ता की चूले हिलेने लगी थी और उसी के बाद केजरीवाल हो या मोदी दोनों ने ही जनता के आक्रोष की इसी नब्ज को पकडा । पहली बार राजनीतिक भाषणो में बख्शा किसी को नहीं गया। मोदी ने गांधी परिवार से लेकर दामाद राबर्ट वाड्रा और किसान मजदूर से लेकर शिक्षा की खास्ता हालात पर जमकर अपनी जुबां से कोडे चलाये । अच्छा लगा । कोई नेता तो लग दिख रहा है। इसी तर्ज पर केजरीवाल ने भी बख्शा किसी को नहीं । जो भ्रष्ट थे । जो दागी थे। जो मालामाल थे । जो लूट का नैक्सेस बनाये हुये देश को खोखला कर रहे थे।

सभी को निशाने पर लिया । युवा साथ कड़े हुये क्योंकि यह जुबां बदलाव वाले थे । लेकिन सत्ता संभालने के साथ ही सच जिस खौफनाक तरीके से दस्तक देने लगा उसने उन्ही छात्रों-युवाओं के सामने अंधेरा कर दिया जो आस लगाये बैठे थो कि उनकी काबिलियत को तो मौका मिलेगा ही । सत्ता केजरीवाल के हाथ आई तो पहली नजर कैडर को ही नौकरी देने या दिल्ली सरकार में काम पर ल गाने की शिरी हुई। चूंकि केजरीवाल का कैडर पारंपरिक राजनीतिक कैडर से अलग था। आम आदमी पार्टी को संभालने वाले या तो केजरीवाल के एनजीओ के साथी है या फिर प्रोपेशनल्स की कतार जो राजनीति की मार तले बदलाव के लिये केजरीवाल में अपना अक्स देखने लगी। 

और तीसरी कतार दिल्ली हरियाण के उम मुफलिसी में खोये छात्रों की है जो केजरीवाल के विस्तार के साथ अपना विस्तार भी देख रहे थे। तो उनके लिये किसी परिक्षा की तैयारी के सामान ही राजनीतिक संघर्ष करना। तो सीएम बनते ही सबसे पहले उसी कैडर को नौकरी पर लगाना प्राथमिकता बनी। दिल्ली में ही करीब दो से तीन हजार कैडर महीने की तयशुदा रकम पा कर दिल्ली सरकार की राजनीतिक नौकरी कर रहा है। यानी जो काम प्रोफेशनल्स के हाथ में होना चाहिये या जिस काम के लिये सत्ता को पढ़े लिके छात्रों के बीच समानता के साथ नौकरी दी जानी चाहिये उसमें प्राथमिकता या कहे समूचा रोजगार ही अपने कैडर में बांट दिया गया। जबकि दिल्ली का सच बेरोजगारी को लेकर कम डराने वाला नहीं है ।

दिल्ली में दो लाख से ज्यादा बेरोजगार ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट हैं। औप पढ़े लिखे बेरोजगारो की तादाद तो 15 लाख के पार हैं। तो यह सवाल किसी भी जहन में आ सकता है कि सिर्फ अपने कैडर के काम के आसरे तो दिल्ली में राजनीति संघर्ष केजरीवाल ने खड़ा नहीं किया उसमे भ्रष्ट व्यवस्था की मार खाया युवा तबका भी होगा। तो उसका ख्याल कैन करेगा। या फिर सियासी आरक्षण तले अगर कैडर को ही सारी सुविधा मिलेगी तो फिर दूसरे नेता और पार्टी से केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अलग कैसे हुई । यही सवाल नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद के हालात से समझा जा सकता है। देश के अलग अलग विश्वविद्यालयों औररिसर्च इस्टटीयूट में बीजेपी के छात्र संगठन अखिल बारतीय विघार्थी परिषद  में रहे छात्रों को प्रथमिकता मिलने लगी। मसलन हाल में एबीवीपी के तीस छात्रो को अलग अलग जगहो पर एडहोक तरीके से निटुक्त कर दिया गया ।

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी में भी पांच एबीवीपी छात्रो को लेक्चरर की नौकरी मिल गई। इसके अलावे में झटके में केन्द्र में सरकार बीजेपी की बनी तो संघ से जुडे तमाम इंसटीट्यूट को बजट से लेकर बाकी सुविधायें मानव संसाधन मंत्रालय से मिलने लगी। तो वहा भी संघ विचारधारा से जुडे छात्रों को रोजगार मिलने लगा। और नौकरी पाने के पायदान पर सबसे आगे खडा छात्र राजनीतिक कनेक्शन खोजने में भटकने लगा। जयपुर में तो बीजेपी का दफ्तर ही कैडर के रोजगार के लिये खुल गया। जो बीजेपी के साथ खड़ा है उसकी पर्ची पर रोर से लेकर उसके उम्मीदवार की ट्रांसफर पोस्टिग तक होने लगी। यानी छात्र हो या शिक्षक उसका राजनीतिकरण होना कितना जरुरी है यह केन्द्रीय विघालयों में गर्मी छुट्टियों के वक्त होने वाले ट्रांसफर-पोस्टिंग से भी समझा जा सकता है। हर शिक्षक को कम से कम दो या तीन बरस तो एक जगह गुजरना ही पता है। लेकिन बीजेपी के साथ जुड़े हैं। संघ के किसी स्वयंसेवक की चिट्टी है तो दो से तीम नहीने के भीतर ही इस बार मनमाफिक जगह पर ट्रांसफर कर दिया गया। बच्चों के एडमिशन का कोटा मानवसंसाधन मंत्रालय का साढे चार सौ छात्रो का है। लेकिन बीजेपी/संघ की सक्रियता का आलम यह है कि जून तक केन्द्रीय विद्यालयों को साढे चार हजार बच्चों के एडमिशन की पर्ची देश के हर स्कूल में जा चुकी है। 

यानी छात्र सिर्फ पढलिखकर आगे बढना चाहे तो उसका राजनीतिक अज्ञान उसके सामने रोड़ा बनेगा। और अगर इस दिशा में बचे तो सामने कंपटिशन की परिक्षाओं में करोडों के वारे न्यारे करने वाला नैक्सस आकर खड़ा हो जायेगा। और असर इसी का है कि इस बार देशभर के साढे तेरह लाख से ज्यादा छात्रों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि हर परीक्षा पेपर अगर लीक होगा तो फिर वे करेंगे क्या। क्योंकि सीबीएसई की एआईपीएमटी की परीक्षा तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फटाफट अगले हफ्ते कराया जा रहा है जिसमें साढे छह लाख छात्र परीक्षा देगें । लेकिन जरा कल्पना किजिये लेकिन एमयू की मेडिकल परीक्षा , इंजीनियरिंग परीक्षा , बीडीएस परीक्षा , यूपी की पीसीएस परीक्षा और पीएमटी परीक्षा  सभी तो इस बार रद्द होगई । क्योकि इसके पीछे का नैक्सेस बताता है कि जिनके पास पैसा है उनके लिये इन परिक्षाओ को पास करना कितना आसान बना दिया गया है ।

और हर रैकेट के तार उसी राजनीति से जा जुडते है जहा पैसो का लेन-देन नेताओं के कद को बढा करता है और उसके बाद राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिये शिक्षा में सुधार या शिक्षा माफिया पर नकेल कसने के वादे कर पढने लिखने वाले छात्रो की भावनाओ को अपने साथ करने के लिये ईमानदार दिखने काराजनीतिक प्रहसन खुले आम होता है। क्योंकि किसी सत्ता के पास ना तो शिक्षा का और ना ही समाज को आगे ले जाने का कोई ब्लू प्रिंट है। सिवाय पूंजी बनाने और ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता पैदा कर देश को बाजार में बदलने की सोच हर सत्ता के पास के जरुर है । और असर इसी का है कि बढती बेरोजगारी के बीच मलाईदार नौकरी का रास्ता जहा धंधे या कहे येन –केन प्रकारेण से हो जाये ओऔर वरदहस्त सत्ता का ही रहे तो फिर छात्रो का भविष्य ही नहीं बल्कि देश का भविष्य भी माफिया रैकेट में फंस रहा है इससे इंकार कौन कैसे करेगा ।

पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से

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प्रसून शुक्ला ETV में सलाहकार संपादक बने

न्यूज़ एक्सप्रेस के सीईओ और एडिटर इन चीफ प्रसून शुक्ला ने अपनी नई पारी ETV के साथ शुरू की है.

एक जुलाई से प्रसून शुक्ला को ETV के गुड़गांव ऑफिस में बैठाने की तैयारी कर ली गई है. सलाहकार संपादक की भूमिका में प्रसून शुक्ला ETV नेटवर्क हेड जगदीश चंद्रा को सीधे रिपोर्ट करेंगे. न्यूज़ एक्सप्रेस छोड़ने के बाद ही प्रसून की नई पारी को लेकर कयास लगाये जा रहे थे।

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आरएसएस, एल्विन टॉफलर और मोदी

अगर आपने एल्विन टॉफलर को नहीं पढा है तो पढ़ लीजिये। शुरुआत थर्ड वेब से कीजिये। क्योंकि आने वाले दिनो में मोदी सरकार भी उसी तरह टेक्नालाजी को परिवर्तन का सबसे बडा आधार बनायेगी जैसे एल्विन टाफलर की किताबों में पढ़ने पर आपको मिलेगा। डिजिटल भारत की कल्पना मोदी यू ही नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके जहन में भी एल्विन टाफलर है। दरअसल, यह संवाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर स्वयंसेवको का हैं। और पहली बार सरसंघचालक मोहन भागवत को लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी भारत की दिशा को बदल सकते हैं।

इसलिये संघ को भी अब मोदी पाठ ही पढ़ाया जा रहा है और संघ हर स्वयंसेवक को मोदी पाठ पढाने को ही कह रहा है। यानी हर स्वयंसेवक के लिये नेता अब एक ही है। और उसका नाम है नरेन्द्र मोदी। मसलन अब संघ का प्रांत अधयक्ष भी हर जगह अपने नेता के तौर पर जिक्र मोदी का ही करेगा। और किसान संघ से लेकर स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ भी जो मोदी सरकार की नीतियों को लेकर कल तक रुठे नजर आते थे वह अब रुठ तो सकते है लेकिन उनके नेता का नाम भी नरेन्द्र मोदी ही होगा। इस सोच को कैसे विस्तार दिया जाये इस पर आरएसएस की प्रतिनिधी सभा और बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चर्चा जरुर हुई लेकिन इसे अमली जामा कैसे पहनाना है, इसपर माथापच्ची जारी है । आरएसएस के दत्तात्रेय होसबोले और बीजेपी के महासचिव मुरलीधर राव गुरुवार यानी 9 मार्च को नागपुर में इसी पर चर्चा करने जुटे। खास बात यह है नरेन्द्र मोदी को संघ ने अब किस तरह ढील दी है या सर्वमान्य तौर पर मोदी की अगुवाई में ही हर मुद्दे को अमली जामा पहनाने पर मुहर लगा दी है, उसे आगे कैसे बढ़ाना है और बीते दस महीने में राजनीतिक तौर पर भी जो धुंधलापन है, उसे कैसे साफ करना है इसपर भी अब संघ-बीजेपी की मिलीजुली राणनीति काम कर रही है। यानी पहली बार वह दौर खत्म हो चला है कि संघ अपने एजेंडे के तहत प्रधानमंत्री को चेता सकता है। जैसा वाजपेयी के दौर में होता रहा। उल्टे राजनीतिक तौर पर अब मोदी जो कहे और जिस दिशा में चले उसी दिशा में संघ को भी चलना है। यानी फील्ड में काम करने वाले स्वयंसेवकों को भी समझना है कि अब उनका नेता भी नरेन्द्र मोदी है। खास बात यह भी है कि संघ की तर्ज पर ही नरेन्द्र मोदी को भी राजनीतिक तौर पर स्थापित करने की दिशा में बीजेपी ही नहीं स्वयंसेवकों को भी लगना है। 

राजनीति की यह बेहद महीन रेखा है कि संघ जिस तरह अपने विरोधियों को भी हिन्दुत्व के नाम पर अपने साथ खड़ा करने से नहीं कतराता यानी लगातार अपने विस्तार को ही सबसे महत्वपूर्ण मानता है उसी तर्ज पर नरेन्द्र मोदी की छवि को भी राष्ट्रीय नेता के तौर पर कैसे रखा जाये जिससे संघ के प्रचारक या बीजेपी के नेता के आवरण के बाहर मोदी को खड़ा किया जा सके। यानी आने वाले दिनों में स्वयंसेवकों की सक्रियता अब समाजवादी, वामपंथी या कांग्रेसियों के बीच भी महीन राजनीतिक मान्यता बनाने के लिये दिखायी देगी। क्योंकि संघ का मानना है कि अगर नरेन्द्र मोदी को अंतराष्ट्रीय नेता के तौर पर खड़ा करते हुये स्टेट्समैन की मान्यता मिलती है तो फिर सवाल 2019 या 2024 के चुनाव का नहीं रहेगा बल्कि खुद ब खुद संघ के विस्तार की तरह बीजेपी भी चुनावी राजनीति से आगे निकल जायेगी। चूंकि राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर कांग्रेस के अलावे दूसरा कोई दल है नहीं और प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं बल्कि बीजेपी के तमाम नेता भी काग्रेस मुक्त भारत का जिक्र करते रहे हैं। लेकिन नई रणनीति के तहत पहली बार कांग्रेस मुक्त भारत की जगह नेहरु-गांधी परिवार मुक्त भारत की दिशा में सरकार और संघ बढ़ रही है। यानी जवाहरलाल नेहरु से लेकर राहुल गांधी पर हमले ना सिर्फ तेज होंगे बल्कि राजनीतिक तौर पर गांधी परिवार को खारिज करने और अतित के कच्चे-चिठ्ठों के आसरे गांधी परिवार को कटघरे में खडा करने में भी सरकार दस्तावेजों के आसरे जुटेगी तो स्वयंसेवक भारत के मुश्किल हालातो को जिक्र कर मोदी के रास्तों को राष्ट्रीय तौर पर मान्यता दिलाने में जुटेंगे। लेकिन यह रास्ता बनेगा कैसे और जिस एल्वीन टाफलर का जिक्र विज्ञान और तकनीक के आसरे देश की राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन का सपना संजोया जा रहा है उसके नायक क्या वाकई मोदी हो जायेंगे। क्योंकि संघ के भीतर एल्विन टाफलर को लेकर पहली बार चर्चा नहीं हो रही है। 

दरअसल दिसबंर 1998 में नागपुर में संघ की 5 दिन की चिंतन बैठक में एल्विन टाफलर के “वार एंड एंटी वार” और सैम्युल हटिंगटन की “क्लैशेस आफ सिविलाइजेशन” पर मदन दास देवी की अगुवाई में संघ के स्वयंसेवक परमेश्वरन और बालआप्टे ने बकायदा दो दिन बौद्दिक चर्चा की। और संयोग से उस वक्त भी मौजूदा पीएम मोदी की तर्ज पर संघ के प्रचारक रहे वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। लेकिन उस वक्त वाजपेयी को स्टेटसमैन के तौर पर संघ के खड़ा करने की सोच से पहले ही देश ने वाजपेयी को स्टेट्समैन के तौर पर मान्यता दी थी। तो फिर मोदी के दौर में संघ के भीतर यह सवाल कुलांचे क्यों मार रहा है, यह भी सवाल है। और संघ जिस तरह अपनी सारी ताकत प्रधानमंत्री मोदी को दे रहा है या लगा रहा है उससे भी पहली बार यह संकेत तो साफ तौर पर उठ रहे हैं कि संघ अपनी सीमा समझ रहा है। यानी वह सक्रिय ना हो या सरकार की नीतियों का विरोध करे तो वाजपेयी की तर्ज पर मोदी के लिये भी मुश्किलात हो सकते है। लेकिन जब राजनीतिक सत्ता ही नहीं रहेगी तो फिर संघ को कोई भी सत्ता कटघरे में खडा करने में कितना वक्त लगायेगी। जैसा मनमोहन सिंह के दौर हिनदू आतंक के दायरे में संघ को लाया गया । यानी आरएसएस अब 2004 की गलती करने कौ तैयार नहीं है और बीजेपी दिल्ली की गलती दोहराने को तैयार नहीं है। यानी स्वयंसेवको की कदमताल अब बिहार-यूपी चुनाव के वक्त मोदी के नायकत्व में ही होगी । और 2019 तक संघ के भीतर से मोदी सरकार की किसी नीति को लेकर कोई विरोध की आवाज सुनायी देगी नहीं । क्योंकि संघ को भरोसा है कि आधुनिक भारत के विकास के जनक के तौर पर मोदी की पहचान दुनिया में हो सकती है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी

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फसल ऊपरवाला ले गया, नौकरी अखिलेश और जमीन मोदी

सात रुपये का चेक। किसी किसान को मुआवजे के तौर पर अगर सात रुपये का चेक मिले तो वह क्या करेगा। 18 मार्च को परी ने जन्म लिया। अस्पताल से 3 अप्रैल को परी घर आई। हर कोई खुश । शाम में पोती के होने के जश्न का न्योता हर किसी को। लेकिन शाम में फसल देखने गये परी के दादा रणधीर सिंह की मौत की खबर खेत से आ गई। समूचा घर सन्नाटे में। तीन दिन पहले 45 बरस के सत्येन्द्र की मौत बर्बाद फसल के बाद मुआवजा चुकाये कैसे। आगे पूरा साल घर चलायेंगे कैसे। यह सोच कर सत्येन्द्र मर गया तो बेटा अब पुलिस भर्ती की कतार में जा कर बैठ गया।

यह सच बागपत के छपरौली के है। जहां से किसानी करते हुये चौधरी चरण सिंह देश के पीएम बन गये और किसान दिवस के तौर पर देश चरण सिंह के ही जन्मदिन को मनाता है। लेकिन किसान का हितैषी बनने का जो सियासी खेल दिल्ली में शुरु हुआ है और तमाम राज्यों के सीएम अब किसानों के हक में खड़े होने का प्रलाप कर रहे है, उसकी हकीकत किसानों के घर जाकर ही समझा जा सकती है। खासकर बागपत। वही बागपत जो चरण सिंह की राजनीतिक प्रयोगशाला भी रही और किसान के हक में आजादी से पहले खड़े होकर संघर्ष करने की जमीन भी। 1942 में पहली बार छपरौली के दासा दगांव में किसानो के हक के लिये संघर्ष करते चरण सिंह को गिरफ्तार करने अग्रेजों की पुलिस पहुंची थी। तब सवाल लगान और खेती की जमीन ना देने का था। दासा गांव के बडे बुजुर्ग आज भी 1942 को यादकर यह कहने से नहीं चूकते कि तब उन्होंने चौधरी साहब को गिरफ्तार होने नहीं दिया था। और उसके बाद किसी ने उनकी जमीन पर अंगुली नहीं उठायी। क्योंकि छपरौली का मतलब ही चौधरी चरण सिंह था। जहां खेती के लिये सिंचाई का सवाल उठता रहा। जहां खाद के कारखाने को लगाने की बात उठी। जहां मुआवजे को लेकर किसान को हाथ फैलाने की जरुरत न पड़ी। लेकिन हालात कैसे किस तरह बदलते गये कि पहली बार खुशहाल गांव के भीतर मरघट सी खामोशी हर किसी को डराने लगी है। 

खामपुर गांव हो या धनौरा गांव या फिर रहतना गांव या जानी गांव। कही भी चले जाइये किसी के घर का भी सांकल खटखटा दीजिये और नाम ले लिजिये चौधरी चरण सिंह का। और उसके बाद सिर्फ यह सवाल खड़ा कर दीजिये कि चौधरी होते तो अब क्या कर लेते । सारे सवालों के जबाब बच्चो से लेकर बडे बुजुर्ग तक बिना सांस रोके लगातार देने लगेंगे। और यह सवाल छोटा पड़ जायेगा कि किसानों के लिये सरकार करें क्या जिससे किसान को राहत मिल जाये। किसान को अपनी फसल की कीमत तय करने का अधिकार होना चाहिये। खेती की जमीन पर क्रंकीट खड़ा करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करना चाहिये। खेतीहर किसान परिवारो के बच्चों के लिये शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिये। समर्थन मूल्य का आकलन फसल की बाजार की कीमत से तय होना चाहिये। लेकिन सच है क्या । गन्ना किसानों के घर में मिल मालिकों की दी हुई पर्चियों के बंडल हैं। जिसमें लिखा है कि इतना गन्ना दिया गया। इतने पैसों का भुगतान होगा। कब होगा , कोई नहीं जानता। अब चीनी मिल ने गन्ने की एवज में रुपया देने के बदले पचास फीसदी रकम की चीनी बांटनी शुरु कर दी है। ले जाइये तो ठीक नहीं तो चीनी रखने का किराया भी गन्ना किसान की रकम से कट जायेगा। धान कल तक यूपी से हरियाणा जा सकता था। लेकिन हरियाण में सत्ता बदली है तो अब धान भी हरियाणा की मंडी में यूपी का किसान वही ले जा सकता है। 

और धान की मंडी बागपत के इर्द गिर्द कही है नहीं। 1977 में बागपत से चुनाव जीतने के बाद चौधरी चरण सिंह ने धान मंडी लगाने की बात जरुर कही थी। लेकिन उसके बाद तो कोई सोचता भी नहीं। टुकड़े में बटें खेतों की चकबंदी चौधरी चरण सिंहने शुरु कराई लेकिन अब आलम यह है कि बागपत के सोलह गांव में बीते 32 बरस में सिचाई के लिये अलग अलग एलान हुये। दासा गांव की सिचाई योजना पर 62 करोड़ खर्च हो गये लेकिन पानी है ही नहीं।

जमीन के नीचे 123 फीट तक पानी चला जा चुका है। जो दो सौ फीट तक पानी निकाल लेता है वह यह कह कर खुश हो जाता है कि असल मिनरल वाटर तो उसके खेत या घर पर है। दिल्ली जिस भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के जरीये विकास का सपना संजो रही है, उसके उलट बागपत के किसान उसी थ्योरी पर टिका है जिसे चरण सिंह कह गये यानी जमीन पर किसान का मालिकाना हक बढाने पर जोर दिया जाना चाहिये। बागपत के लड़के नये प्रयोग कर डिब्बा बंद गन्ने का जूस की फैक्ट्री लगाने को तैयार हैं। लेकिन उनके पास पैसा है नहीं और सरकार तक वह पहुंच नही सकते। सरकार उनतक पहुंचती नही तो गन्ना जूस की टेकनालाजी घर में पडी बर्बाद फसलों के बीच ही सड़-गल रही है। रहतना गांव के गुलमोहर की मौत के बाद गुलमोहर के परिवारवालों को लग रहा है कि ना काम है। ना दाम । तो आगे वह करें तो क्या करें । लेकिन सरकार ने जगह जगह दीवारों पर नारे लिख दिये गये हैं कि गांव गांव को काम मिलेगा। काम के बदले दाम मिलेगा। लेकिन किसानों का सच है कि सिर्फ दशमलव तीन फीसदी लड़के नौकरी करते हैं। बाकि हर कोई खेती या खेती से जुडे सामानों की आवाजाही के सामानो की दुकान खोल कर धंधे में मशगूल है। रोजगार के लिये सबसे बडी नौकरी पुलिस भर्ती की निकली है। 

लेकिन वह भी जातीय आधार पर सैफई और मैनपुरी में सिमटी है तो बागपत के गांव दर गांव में पुलिस भर्ती का विरोध करते किसानो के बेटे सड़क किनारे नारे लगा रहे हैं। बैंक, कोओपरेटिव और साहूकार। अस्सी फिसदी किसान इन्हीं तीन के आसरे खेती करते है । जिन्हे हार्ट अटैक आया । जो बर्बाद फसल देखकर मर गये। उन परिवारों समेत बागपत के बीस हजार किसान औसतन दो से पांच लाख कैसे लौटेंगे। और ना लौटाने पर जो कर्ज चढ़ेगा वह अगले बरस कैसे तीन से नौ लाख तक हो जायेगा। इसी जोड़ घटाव में सोचते सोचते हर किसान के माथे पर शिकन बडी होती जा रही है।

फिर मुआवजे को लेकर तकनीकी ज्ञान सबको लेकर उलझा है क्योंकि मुआवजा तो पटवरी, तहसीलदार,एसडीएम, डीएम,कमिश्नर, सीएण और फिर दिल्ली। यानी मुआवजे का रास्ता इतना लंबा है कि हर हथेली आखिरी तक खाली ही रहती है इसलिये मुआवजे का एलान लखनउ में हो या दिल्ली में उम्मीद या भरोसा किसी में जागता नहीं है। दासा गांव के रणधीर सिंह की मौत तो यह सोच कर ही हो गई कि कोपरेटिव का पैसा ना लौटाया और बैंक का कर्ज चढ़ता चला गया तो फिर घर का क्या क्या बिकेगा। उन्नीस प्राइवेट स्कूल के प्रिंसिपल ने बच्चों को कहा है कि अपने पिता से लिखवाकर लाये कि फीस दो महीने तक माफ की जा सकती है। उसके बाद माफ की कई महीनो की फीस भी चुकानी पड़ेगी। अभी तक कोई आदेश-निर्देश तो किसानों के घर नहीं पहुंचा लेकिन फसल बर्बाद होने के बाद डर ऐसा है कि हंसता-खिलखिलाता गांव सन्नाटे में नजर आने लगा है। और तमाम सवालों को उठाने पर हर जुबां पर बिखरे बिखरे शब्दो के बीच यह सोच है कि फसल ऊपर वाला ले गया । नौकरी अखिलेश ले जा रहे हैं। जमीन मोदी ले जायेंगे।

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