मोदी और तोगड़िया : ये जंग हिंदू चहरे के लिए है!

देश में इन दिनों एक सवाल सबके पास है कि प्रवीण तोगड़िया और बीजेपी सरकार के बीच आखिर तकरार है क्या? क्या वजह है कि तोगड़िया ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और क्या वजह है कि वो ये कह रहे हैं कि एनकाउंटर की साजिश रची जा रही है। तो जरा लौटिए 2017 दिसंबर के महीने में, क्यों कि संघ से जुड़े सूत्र कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद जो कि संघ की अनुषांगिक शाखा है, इसके इतिहास में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए चुनाव करवाए गए। इसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि संघ के भीतर ही दो खेमे बन गए थे। एक खेमा चंपत राय को अध्यक्ष के रूप में देखना चाहता है तो दूसरा खेमा प्रवीण तोगड़िया को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहता था। लिहाजा तय किया गया कि इसके लिए चुनाव करवाए जाएंगे।

विश्व हिंदू परिषद में ज्यादातर प्रचारक हैं। इनमें 40 फीसदी प्रचारक प्रवीण तोगड़िया के साथ हैं। इसके साथ ही सुब्रमण्यम स्वामी, आचार्य धर्मेंद्र, गोविंदाचार्य, रासबिहारी और महावीर जी भी तोगड़िया के पक्षधर हैं। दरअसल हमेशा नरेंद्र मोदी के साथ रहने वाले तोगड़िया पिछले कुछ समय से सरकार से खफा हैं, क्योंकि पिछले कुछ समय से तोगड़िया राम मंदिर, किसान और बेरोजगारी के मसले पर लगातार सरकार को अपने निशाने पर ले रहे हैं। सूत्र कहते हैं कि सत्ता और संघ के कई नेता नहीं चाहते थे कि प्रवीण तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद की कमान संभालें। इसी विरोधाभास को खत्म करने के लिए चुनाव का रास्ता निकाला गया लेकिन इस चुनाव में कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना भी शायद संघ और मोदी सरकार ने कभी नहीं की थी।

सूत्र कहते हैं कि जब भुवनेश्वर में वोटिंग हुई तो करीब 60 फीसदी वोट प्रवीण तोगड़िया को मिले, जबकि संघ और मोदी सरकार चंपत राय को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहते थे, जो मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय महामंत्री हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद प्रवीण तोगड़िया को सबसे ज्यादा वोट मिले। संघ के भीतर हुई इस घटना ने सबको सकते में डाल दिया था क्योंकि ये कोई छोटी बात नहीं थी, जब सरकार ने अपने ही संगठन में मुंह की खायी थी। इसी के बाद प्रवीण तोगड़िया के बेहोश मिलने वाली घटना होती है, जिस पर प्रवीण तोड़िया कहते हैं- ‘मैं सुबह अपने कार्यालय में पूजा कर रहा था तभी वहां मेरा एक परिचित आता है जो मुझसे कहता है कि आप यहां से तुरंत निकल जाइए क्यों कि कुछ लोग आपके एनकाउंटर के लिए निकले हैं’।

Z+ सिक्यूरिटी वाले प्रवीण तोगड़िया वहां से समय रहते निकल जाते हैं, जिसके बाद वो बेहोशी की हालत में मिलते हैं।

इसी समय राहुल गांधी देश भर के मंदिरों में हिंदू वोटबैंक खंगाल रहे हैं।

11 घंटे बाद बेहोशी की हालत में मिले प्रवीण तोगड़िया से मिलने के लिए हार्दिक पटेल पहुंचते हैं और ये इल्जाम लगाते हैं कि ‘इस पूरी घटना के पीछे मोदी और शाह का हाथ है’।  यहां एक अहम तस्वीर देखने को मिली क्योंकि विरोधी खेमे के हार्दिक पटेल तो अस्पताल में हालचाल जानने पहुंचे लेकिन पुराने साथी नरेंद्र मोदी और बीजेपी का कोई भी नेता प्रवीण तोगड़िया से मिलने अस्पताल नहीं पहुंचा। अलबत्ता तोगड़िया के इतने बड़े आरोपों पर बीजेपी एकदम खामोश है। वैसे ये वही बीजेपी है जिसने राम मंदिर का सपना अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया के कंधे पर बैठकर देखा था और ये वही प्रवीण तोगड़िया हैं जिन्हें 1979 में महज 22 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों का मुख्य मार्गदर्शक बनाया गया था।

इसी घटना के ठीक 24 घंटे पहले सर संघ चालक मोहन भागवत ने ये कहा था कि ‘सत्ता कृत्रम चीज है, वो बदलती रहती है’। आप इस बात का क्या मतलब निकालते हैं। जरा जोर देंगे दिमाग पर तो तस्वीर साफ हो जाएगी कि ये शब्द किसके लिए कहे गए थे और इसका आशय क्या था। अब जरा एक और तस्वीर देख लीजिए। राम मंदिर का संकल्प लेने वाले प्रवीण तोगड़िया पिछले 22 सालों से अपने घर नहीं गए हैं। बेटी की शादी में भी वो इसलिए नहीं पहुंच पाए थे क्योंकि उस दिन वो धर्म जागरण कार्यक्रम में थे। डॉ. प्रवीण तोगड़िया देश के सबसे बड़े कैंसर सर्जन में शुमार होते हैं। उन्होंने अपने पैसे से एक कैंसर इंस्टीट्यूट खोला है, जहां के मुनाफे के रुपयों में से 1 लाख रुपए उनके घर खर्च को जाता है। बाकी पूरा पैसा सेवा के काम में इस्तेमाल होता है। इतना ही नहीं, जब भी पैसे की कमी होती है तो विदेश जाकर सर्जरी करते हैं और उससे कमाए पैसे को संघ और सेवा कार्यों में खर्च करते हैं।

इसी तस्वीर के समानांतर एक और तस्वीर देखिए। देश में स्वर्गीय अशोक सिंघल और स्वर्गीय बालाजी साहब ठाकरे के बाद अगर किसी नेता की छवि हिंदू नेता के तौर पर सबसे प्रभावशाली थी तो वो नाम डॉ. प्रवीण तोगड़िया का है। संघ से जुड़े सूत्र खुद इस बात का दावा करते हैंं कि गुजरात हिंसा के समय सबसे प्रभावशाली हिंदू नेता प्रवीण तोगड़िया ही थे। उस दौर में तोगड़िया ने ही लाल कृष्ण आडवाणी से बात की थी और हालातों की जानकारी दी थी। लेकिन इसके बाद जो कुछ भी हुआ उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। यही वो दौर था जब देश के हिंदू वोटबैंक ने एक चेहरे पर अपनी मुहर लगाई थी। ये चेहरा था गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी जिससे आज भी पर्दा नहीं उठा है। देश जिस हिंदू चेहरे को स्वीकार रहा था उसके पीछे सबसे बड़ा योगदान तो प्रवीण तोगड़िया का था। काम तोगड़िया कर रहे थे और नाम मोदी का हो रहा था।  कई बार ये क्रेडिट था तो कई मायनों में इसे डिसक्रेडिट भी कहा गया, क्यों कि जिस रीयल हिंदू नेता की छवि को देश देख रहा था असल में उसका जमीन पर कुछ भी आधार था ही नहीं। करते तोगड़िया जा रहे थे लेकिन सीएम होने के नाते उसका पूरा श्रेय मोदी लेते जा रहे थे।

मौजूदा समय में जो क्लेश है या जो विवाद है, वो यही है कि असल में हिंदू चेहरा है कौन? प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सामने खुद को हिंदू चेहरे के रूप में पेश किया। लेकिन अगर इसे समझना हो तो उदाहरण के तौर पर क्रिसिटोफर मार्लो और विलियम शेक्सपीयर को देखा जा सकता है। कहा जाता है कि विलियम शेक्सपीयर ने क्रिस्टोफर मार्लो को अपने घर में रख रखा था। वो उनको खाना, कपड़े और पैसे देते थे। इसके एवज में क्रिस्टोफर लिखते थे लेकिन विलियम शेक्सपीयर उसे अपने नाम से प्रकाशित करवाते थे। ठीक इसी तरह से जो कुछ भी होता था वो करते तो प्रवीण तोगड़िया थे लेकिन उसका फल या प्रतिफल नरेंद्र मोदी को मिलता था। बल्कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे बड़ा सपोर्ट भी प्रवीण तोगड़िया का ही था लेकिन पिछले कुछ समय से तोगड़िया ने खिलाफत का रास्ता चुन लिया था। वो चाहते थे कि राम मंदिर पर संसद में कानून लाया जाए। बेरोजगारी और किसानों की समस्या को सिरे से नकारा ना जाए। इनसे निपटने के लिए रणनीति बनाई जाए। असल में जो हिंदू वोटबैंक के मसीहा थे वो प्रवीण तोगड़िया ही थे, इसलिए सत्ता को उनकी खिलाफत नागवार लगने लगी। अंदर ही अंदर ये डर सताने लगा कि कहीं तोगड़िया ही सबसे बड़ा चेहरा ना बन जाएं इसलिए उनको संगठन से बाहर रखे जाने का फैसला किया गया।

यहां सबसे ज्यादा भटकी हुई कांग्रेस थी। अगर कांग्रेस ने 2002 में आरोपों के कटघरे में मोदी की जगह प्रवीण तोगड़िया को रखा होता तो शायद आज ये तस्वीर खड़ी ही नहीं होती लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। उसने हमेशा अपने निशाने पर मोदी को लिया। मोदी खुद भी इस बात को बार बार कहते हैं कि उन्होंने अपनी परेशानियों को अपने मौके में तब्दील किया है। असलियत भी यही है। ये बिल्कुल वैसा ही नजारा है जैसा अगर आप मोदी की तस्वीर को साफ करेंगे तो उसके अंदर से तोगड़िया की तस्वीर को निकलकर सामने आना होगा।

अनुराग सिंह
प्रोड्यूसर
सहारा समय
नोएडा
singh.or.anu@gmail.com

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कांग्रेस के दिग्गी राजा संघ के करीबी शंकराचार्य की शरण में पहुंचे! (देखें वीडियो)

मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम और कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा पहुंचे हरिद्वार. उनके साथ संत प्रमोद कृष्णम भी थे जो कांग्रेस के करीबी माने जाते हैं. ये दोनों कनखल स्थित जगतगुरु आश्रम पहुंचे. इन लोगों ने जगतगुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज से मुलाकात की. जगतगुरु शंकराचार्य को आरएसएस का बेहद करीबी बताया जाता है. आश्रम स्थित भगवान शंकर के मंदिर में दिग्गी ने किया जलाभिषेक. दिग्विजय के पहुंचने से लगाई जा रही हैं कई तरह की अटकलें. संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

-विनीता खुराना की रिपोर्ट.

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संघ के मुताबिक टीवी पर ब्रेन लेश डिसकसन, इसमें शामिल होते हैं अपठित पत्रकार जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं (देखें वीडियो)

मऊ : भारत में चाहें जो बड़ी समस्या चल रही हो, सूखा हो, महंगाई हो, भ्रष्टाचार हो लेकिन आरएसएस वालों का हमेशा एक राग बजता है. वह है राग मुसलमान. घुमा फिरा कर कोई ऐसा मुद्दा ले आते हैं जिससे मुसलमानों को चुनौती दी जा सके और पूरे भारत की बहस इसी मसले पर शिफ्ट किया जा सके. दुर्भाग्य से मीडिया का बड़ा हिस्सा भी इसी उलझावों में बह जाता है और भाजपा-संघ का भोंपू बनते हुए मूल मुद्दों से हटते हुए इन्हीं नान इशूज को इशू बना देता है. हालांकि संघ नेता फिर भी टीवी वालों को बख्शते नहीं और कहते हैं कि चैनलों पर ब्रेनलेस डिसकशन चलती है और इसमें अपठित पत्रकार भाग लेते हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं. मतलब कि अगर संघ का चले तो वो सारे चैनल बंद करा के सिर्फ एक संघ नाम से चैनल चलाएं और उसमें जो कुछ ज्ञान दिया जाएगा, उसे ही प्रसाद के रूप में पाने के लिए देश भर के दर्शक बाध्य होंगे.

नीचे चार वीडियो लिंक हैं. ये आरएसएस के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा से संबंधित हैं. संघ के इस बड़े नेता ने मीडिया, मुसलमान और भारत माता की जय पर क्या क्या बातें की हैं, सुनिए. ये इशारे इशारे में जो जहर हिंदू मुस्लिम दिमागों में घोल रहे हैं, उसका क्या अंजाम होगा, इन्हें भी नहीं पता. आजम खान और औवैशी इस देश की मुख्य धारा नहीं हैं. ज्यादातर मुसलमान भारत के रंग, भारत की संस्कृति, भारत के नारे में रच बस घुल चुके हैं. लेकिन क्या आप इनसे नारे लगवा कर इनकी परीक्षा लेंगे, तभी इनकी देशभक्ति प्रमाणित करेंगे? ऐसे घिनौने कृत्य से देश का नुकसान ज्यादा होगा, फायदा कम.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा ने पत्रकारों से बातचीत और संघ के एक जमावड़े के संबोधन में जो कुछ कहा, उसका लब्बोलुवाब ये है-

”डा. हेडगवार ने कहा था भारत वर्ष ही हिन्दू राष्ट्र है, उस समय भी लोगों ने प्रश्न उठाये थे उसमें हर तबके के लोग थे. आज जो टीवी चैनलों पर ब्रेन लेश डिसकसन चलती है और उसमें शामिल होने वाले अपठित पत्रकार हैं. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं, उनके इलाज की जरूरत है. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं. ऐसे लोगों की हत्या नहीं, इलाज होनी चाहिए. इनके पास दिल है, लेकिन दिल की आवाज दिमाग तक नहीं पहुंची है. इसलिए इलाज जरूरी है. हम अशफाकउल्‍ला खां जैसे लोगों को आदर्श मानते हैं… अशफाकउल्ला भारत माता के लिए फांसी पर चढ़ गए.  हम उन्‍हें आदर्श मानते हैं. इन पागलों को आदर्श नहीं मानते. आवैसी और आजम के नाम पर मैं नहीं जाता हूं, ये एक विचारधारा का प्रतिनिधित्‍व करते हैं. रही बात भारत माता की जय बोलने की तो आप किसी भी भाषा में बोलिए, लेकिन भारत माता की जय बोलिए और बस दिल से बोलिए. मैं ये नहीं कहता हूं भारत माता की जय उर्दू और इंग्‍लिश में नहीं बोलनी चाहिए. आप किसी भी भाषा में बोल सकते हैं. भाषा तो हमारी देश की परंपरा है. महात्‍मा गांधी ने कहा कि था ईश्‍वर अल्‍ला तेरो नाम. भाषा का प्रश्‍न नहीं, भाव का प्रश्‍न है.  दिल से बोलना चाहिए. जो व्‍यक्‍ति भारत माता की जय न बोले उसे प्रेरित करना चाहिए, भारत माता सबकी माता हैं.”

संघ पदाधिकारी राम आशीष मऊ जनपद में आर.एस.एस. द्वारा आयोजित नववर्ष प्रतिप्रदा की पूर्व संध्या पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सोनी धापा बालिका विद्यलय के मैदान में शामिल होने आये थे. इनकी बातों को पूरा सुनने के लिए नीचे दिए गए वीडियो लिंक को एक एक कर क्लिक करते जाएं.

RSS कहिन (1) : आजम खान और ओवैशी जैसे पागलों का इलाज होना चाहिए https://www.youtube.com/watch?v=IGnRK2oJmm0

RSS कहिन (2) : पागलों का इलाज किया जाता है, उनकी हत्या नहीं की जाती https://www.youtube.com/watch?v=rsGZY4pQ8oI

RSS कहिन (3) : उर्दू में बोलिए या अंग्रेजी में, भारत माता की जय तो बोलना पड़ेगा https://www.youtube.com/watch?v=NNj8zTuH6QI

RSS कहिन (4) : टीवी पर ब्रेनलेस डिसकशन, अपठित पत्रकारों को ज्ञान नहीं https://www.youtube.com/watch?v=hu7heuyTwVI

मऊ से DEEPAK GUPTA की रिपोर्ट. संपर्क : 9452068289 या gdeepak899@gmail.com

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बीजेपी महासचिव राम माधव ने मोदी की लाहौर यात्रा पर संघी गोबर डाल दिया

Mahendra Mishra : भारत, पाक और बांग्लादेश एक ही जिगर के टुकड़े हैं। क्रूर हालात ने इन तीनों को एक दूसरे से अलग कर दिया। इनके बीच दोस्ती और मेल-मिलाप हो। एकता और भाईचारा का माहौल बने। अमन और शांति में विश्वास करने वाले किसी शख्स की इससे बड़ी चाहत और क्या हो सकती है । इस दिशा में किसी पहल का स्वागत करने वालों में हम जैसे लाखों लोगों समेत व्यापक जनता सरहद के दोनों तरफ मौजूद है। इसी जज्बे में लोग प्रधानमंत्री मोदी की लाहौर यात्रा का स्वागत भी कर रहे हैं। लेकिन इस यात्रा का क्या यही सच है? शायद नहीं। यह तभी संभव है जब मोदी जी नागपुर को आखिरी प्रणाम कह दें।

अगर कोई आरएसएस को जानता हो। या कि बीजेपी की राजनीति से उसका वास्ता हो। या फिर उसे मोदी की सियासत की परख हो। वह किसी भ्रम में नहीं रह सकता। एक तरफ मंदिर बनाने की तैयारी (सुगबुगाहट ही सही) और दूसरी तरफ पाकिस्तान से दोस्ती की लंबी पारी। दोनों एक साथ नहीं चल सकते। कहते हैं कि विदेश नीति और कुछ नहीं बल्कि घरेलू नीति का ही विस्तार होती है। कम से कम पाकिस्तान के मामले में यह 100 फीसद सच है। दोनों देशों के रिश्ते एक दूसरे की घरेलू राजनीति के साथ मजबूती से जुड़े हैं। विदेश नीति वैसे भी रोज-रोज नहीं बदला करती। यह किसी एक यात्रा या कुछ यात्राओं से तय नहीं होती। यह एक लंबे कूटनीतिक मंथन और रणनीतिक जद्दोजहद का नतीजा होती है। यहां तक कि सरकारें बदल जाती हैं लेकिन विदेश नीति नहीं बदलती। ऐसे में मोदी जी की लाहौर यात्रा का क्या मतलब निकाला जाए। यह एक बड़ा सवाल है। पहली बात तो यह यात्रा भले अचानक हुई है। लेकिन इसके पीछे अपने तरह की एक कूटनीति भी काम कर रही है। जो पूरी सोची और समझी है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस यात्रा का एक तात्कालिक बड़ा कारण लोगों का ध्यान जेटली प्रकरण से हटाना है।

इस यात्रा को एक दूसरे नजरिये से समझा जाए तो शायद समझना ज्यादा आसान होगा। घरेलू मोर्चे पर जिस तरह से मोदी साहब जनता को कुछ नहीं देना चाहते। बल्कि उल्टा पिछले 65 सालों में जो कुछ मिला था उसे छीना जा रहा है। लेकिन सरकार है कि उसे जनता के लिए कुछ करते दिखना भी चाहिए। इस लाज में मोदी जी ने स्वच्छता अभियान और जनधन योजना जैसे कुछ लॉलीपॉप खोज लिए। लेकिन अब लोग भी नहीं समझ पा रहे हैं कि इस झुनझुने को लेकर वो हंसे कि रोएं। ठीक इसी तर्ज पर मोदी का पाकिस्तान के साथ रिश्ता भी है। जिसमें रिश्ते को ठीक करते हुए दिखना मजबूरी है। इसीलिए इसमें अनौपचारिकताएं ज्यादा हैं योजनाबद्ध काम कम। यात्राएं ज्यादा हैं ठहराव कम। मुलाकातें ज्यादा हैं समस्याओं पर बातें कम। इस तरह के रिश्तों के अपने फायदे हैं। गहरी जड़ न पकड़ने के चलते जब चाहे उन्हें तोड़ा जा सकता है। सचिव स्तर की वार्ता को हुर्रियत नेताओं के पाक उच्चायुक्त से मिलने के चलते रद्द कर दिया गया था।

रिश्ते गहरे हों और आपस में विश्वास हो तो उसके लिए मिलना जरूरी नहीं होता। अगर कोई रिश्ते को गहराई की तरफ नहीं ले जाना चाहता तो उसकी मंशा पर सवाल उठना लाजमी है। पिछले डेढ़ सालों के मोदी शासन का विश्लेषण पाकिस्तान के संदर्भ में करने पर निष्कर्ष उसी तरफ ले जाएगा। इस बीच मोदी और नवाज के बीच तीन मुलाकातें हो चुकी हैं। पहली मोदी जी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान। दूसरी पेरिस में जलवायु सम्मेलन के मौके पर। और अब एक महीने के भीतर यह तीसरी मुलाकात हुई है। लेकिन नतीजा सिफर है। न ही कोई जमीनी तैयारी। न ही कोई भविष्य की रणनीति और सोच। बस ऊपर-ऊपर माहौल। विदेश नीति इतनी लचर रस्सी पर नहीं चलती है। किसी भी रिश्ते की अनिश्चितता उसकी कमजोरी की प्रतीत होती है।

दरअसल मोदी साहब को लंबा रास्ता तय भी नहीं करना है। इसलिए उन्हें किसी जमीन और गहराई की जरूरत भी नहीं है। और आसमानी तौर पर कूद-फांद कर रिश्ते की औपचारिकता पूरी भर कर लेनी है। यह और कुछ नहीं बल्कि मोदी की विदेश नीति का टुटपुजियापन है। क्योंकि जिस पार्टी और सरकार की राजनीति मुस्लिम और पाकिस्तान विरोध पर टिकी हो। उससे किसी लंबे समय के लिए पाकिस्तान के साथ दोस्ती की आशा करना महज एक ख्वाब ही हो सकता है। या तो आरएसएस के अस्तित्व को खत्म मान लिया जाए। या फिर बीजेपी की राजनीति बदल गई है। शायद ही कोई राजनीतिक विश्लेषक अभी इस नतीजे पर पहुंचा हो।

रिश्तों का बीज अभी पड़ा भी नहीं कि संघी फावड़ा सक्रिय हो गया। अनायास नहीं बीजेपी महासचिव और संघ के प्रिय राम माधव ने लाहौर यात्रा पर संघी गोबर डाल दिया। उन्होंने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की एकता का पुराना राग अलापा है जिसमें भगवा ध्वज के नीचे अखंड भारत के निर्माण की बात शामिल है। अब अगर नवाज शरीफ चाहें भी तो क्या पाकिस्तान की जनता और विपक्ष उनको आगे बढ़ने देगा? ऊपर से अलजजीरा चैनल के साथ बहस में उन्होंने एंकर को आईएसआईएस का एजेंट तक करार दे दिया। सत्ताधारी पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता से क्या ऐसी उम्मीद की जा सकती है? अगर यह मोदी जी की विदेश यात्राओं के सूत्रधार का पाकिस्तान को लेकर रवैया है। तो ऐसे में यह डगर कितनी आगे बढ़ेगी अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नहीं तो भारत-पाक रिश्ते में विदेश मंत्रालय, सुषमा स्वराज और सरकार के किसी व्यक्ति से ज्यादा राम माधव क्यों रुचि ले रहे हैं। या फिर मोदी साहब उनसे इसके लिए मांफी मांगने के लिए कहेंगे?

खुदा ना खाश्ता रिश्तों की डोर किन्हीं परिस्थितियों में टूटी तो कहने के लिए मोदी साहब और उनके समर्थकों के पास अब बहुत कुछ रहेगा। मसलन उन्होंने रिश्तों को बढ़ाने का बहुत प्रयास किया। लेकिन पाकिस्तान नहीं सुधर सकता। उसे डंडे की ही भाषा समझ में आती है। अब क्या चाहते हैं कि मोदी जी जाकर नवाज शरीफ का तलवा चाटें आदि..आदि। इसके साथ ही पाकिस्तान से दोस्ती की हिमायत करने वालों के भी मुंह बंद कर दिए जाएंगे।

लेखक महेंद्र मिश्रा सोशल एक्टिविस्ट और प्रखर जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. महेंद्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़े लिखे हैं और कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं.

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एबीपी न्यूज़ पर संबित पात्रा के साथ राकेश सिन्हा ने तो मुनव्वर राना और अतुल अंजान को लगभग नोंच डाला था!

Sheetal P Singh : प्रो. राकेश सिन्हा ने आज RSS के ९० साल के होने और उसके राजनीतिक मंच के दिल्ली के तख़्त पर आसीत रहने के दिन गर्वोक्ति ज़ाहिर की है कि अब उनकी विचारधारा ही चलेगी और दिनोंदिन और बढ़ेगी, दुनिया इसे मान रही है, विश्व गुरू, आदि अनादि! टीवी की संध्या बहसों में वे पिछले कुछ वर्षों में संघ के विचारक के तौर पर स्थापित हैं, वामपंथ सेक्युलरिज़्म और भौतिकवाद को गया गुज़रा, इतिहास के “कूरेदान” में पड़ा मान कर ख़ारिज कर दिया करते हैं! हाल ही में एबीपी न्यूज़ पर मुनव्वर राना और अतुल कुमार अंजान को तो संबित पात्रा के साथ उन्होंने लगभग नोंच डाला था, कई बार लगा हाथापाई अब हुई तब हुई।

इनकी विचारधारा है क्या ? देश की करीब ८०% आबादी हिन्दू है और बाकी में सभी क़िस्म के अल्पसंख्यक। इन ८०% को २०% के संभावित ख़तरे और अतीत के कुछ वास्तविक और कुछ कृत्रिम मामलों के बदले के लिये भड़काकर सत्ता हथियाना! इसमें ऐसा विशेष क्या है जिससे कोई गौरवान्वित हो? दुर्योग से हिन्दू समाज की संरचना ने इनको विरासत से जाति के नाम पर इकट्ठा संगठन दे दिया जिसमें इन्होंने समर्थ घोड़ों पर सवारी गाँठ ली और स्वयं को विजयी घोषित कर लिया!

महाशय इस महादेश में कमज़ोर को सामर्थ्य देने का काम एक महती काम रहा है न कि ताक़तवर को और ताक़तवर बनाने के लिये शिलाजीत बेचना, जो कोई भी कर सकता है मसलन शिव सेना जैसे हिंसा और भयभीत करने वाले दल भी क्षेत्र विशेष में राजनैतिक रूप से सफल होते रहते हैं। तमाम अपराधी भी अपने प्रभाव क्षेत्रों में दशकों राजनैतिक मुखिया बने रहते हैं! कठिन काम गांधी जी ने किया आंबेडकर जी ने किया लोहिया जी ने किया कांशीराम जी ने किया वामपंथ ने किया, वे निर्बल की आवाज़ बने और सबल का सामना किया।

आप की सत्ता और कांग्रेस की सत्ता में फ़रक करना मुश्किल है सिवाय इसके कि जितनी मंहगाई वे दस साल में बढाते हैं उतनी आप एक साल में। वे मुसलमानों को लालीपाप दिखाते हैं आप बहुमत हिन्दुओं को। वे मीडिया में ३०% क़ब्ज़ा करते हैं आप १००%। उनके ज़माने में भी ब्राह्मणों के बहुमत नेतृत्व में नौकरशाही दिल्ली की सरकार पर क़ाबिज़ रहती है आपके भी! वे आलोचना होने पर थोड़ा बहुत शर्माते भी हैं आप तो ढीठ हैं आलोचक पर ही सवार हो जाते हैं! बारडर पर वे भी सैनिक मरवाते हैं आप भी, कुछ ज़्यादा ही!

एक काम उनसे ज़्यादा करते हैं कि समाज में अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ज़्यादा बढ़ा देते हैं जो मंहगाई बेकारी लूट पर बढ़ते असंतोष पर परदे के काम आ जाता है, बाकी त जो है सो हइयै है। दलित और पददलित किये जाते हैं पिछरे और पछारे जाते हैं। गाय गंगा गीता का गीत नेपथ्य में बजता रहता है और कभी कभी भाल्यूम बढ़ा दिया जाता है! हाँ आप टीवी पर उनसे कहीं ज़्यादा चिल्लाते हैं! और आपके पीएम उनके पीएम से सौ गुना ज़्यादा बार कपरा बदलते हैं! बाकी आप बोलते ही हैं लिखते तो कुछ हैं नहीं सिवाय प पू गोलवलकर पर किताब के तो आपको पकरा तो जा नहीं सकता?

जियत रहा बाबू रकेस सिन्हा
वन्दे मातरम

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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Dangerous Hindutva portents : Doordarshan as RSS’s publicity agent

By Praful Bidwai

Hindutva crossed another red line in Indian politics on October 3 when the state-owned Doordarshan news channel made a live broadcast, for the first time ever, of the Vijayadashami (Dussehra) address of a Rashtriya Swyamsevak Sangh chief.

The speech, ritually delivered annually from Nagpur, is meant to convey to swayamsevaks the thinking of the Sangh on current issues and define the RSS’s own relationship with the Bharatiya Janata Party. It is thus an internal matter of the Sangh Parivar, patently lacking any value or relevance for the general public.

Yet, DD rationalised Mohan Bhagwat’s broadcast on the ground that it is “newsworthy”. So did information minister Prakash Javadekar-while claiming that his ministry didn’t order the broadcast. This is a red herring. DD and All-India Radio, like the Prasar Bharati Corporation under which they work, are nominally autonomous of the government, but their directors general are appointed by the ministry without consulting Prasar Bharati, and are presumably answerable to the government.

By this criterion of “newsworthiness”, DD should broadcast/display everything from fashion shows, to standup comedies mocking particular religions, to “honour” killings, but rightly doesn’t.

The crucial issue is the Modi government’s culpability in promoting, and giving publicity to, an organisation that pushes a sectarian Right-wing agenda, and routinely deploys hate speech and inflammatory statements. Doordarshan simply has no business to provide a platform to such an organisation. Doing so with the taxpayer’s money through a live broadcast, over the contents of which DD has no control, makes the offence even more unforgivable.

Bhagwat in his address unleashed a vicious attack on Muslims, and used old, shopworn clichés about a “serious upsurge” in “jehadi activities” in Kerala and Tamil Nadu, and a growing “population imbalance” in West Bengal and Assam caused by “the illegal migration of a particular community” from across the border, all leading to a grave threat to “national security”. So much for “newsworthiness”!

This is an instance of naked Hindutva majoritarianism gone berserk. The RSS is not just another organisation, least of all the “cultural” body it claims to be. It is an intensely political organisation, and at the same time a quasi-militia with a secret society-like structure, whose leaders are never elected, but always nominated from the top. It is the ideological parent, political master and organisational gatekeeper of the BJP and the scores of fronts or affiliates that jointly constitute the Sangh Parivar.

The RSS was banned by the Central government in February 1948 following Mahatma Gandhi’s assassination by a Hindutva-inspired activist. The ground for the ban was that the RSS was involved in violence and subversion, including “suborning” the Indian state to its Hindu-supremacist agenda; it was spreading communal “poison” and indulging in other activities which “constituted a clear threat to the existence of the government and state…”, as the “final result” of which “the country had to suffer the sacrifice of the invaluable life of Gandhiji …”

The ban was lifted in July 1949 on condition that the RSS must have a written constitution specifying, among other things, respect for the Indian Tricolour-as distinct from the Bhagwa (saffron) flag the Sangh swears by-and its commitment to function as an open and peaceful organisation, and most important, to stay clear of party politics.

The RSS has flagrantly defied these conditions by repeatedly instigating communal violence and indulging in party politics. It spawned first the Jana Sangh and later the BJP. It has over the past decade nominated all the BJP’s key office-bearers, including Central and state-level organisational secretaries-and most recently, both the party’s Prime Ministerial candidate Narendra Modi and its national president Amit Shah. Indeed, it has tightened its grip on the Sangh Parivar as a whole, and the BJP in particular. It has played politics to the hilt.

The RSS’s defiance must not be condoned or go politically unpunished. All political parties not allied to the BJP must launch a sustained, serious street-level campaign of protest against the RSS and the Modi government-to begin with, by demanding an apology for the Doordarshan broadcast, and extracting a commitment never to repeat it.

So far, there have only been a few token demonstrations by the Congress. This won’t do. So grave is the breach of political decency committed through the broadcast that nothing less than a nation-wide campaign would do.

The RSS and the BJP have carved out a mutually close but unequal relationship, as AG Noorani argues in his The RSS and the BJP: A Division of Labour (Leftword Books). That relationship has reshaped and greatly strengthened the Sangh Parivar. As Noorani says: “Either the Sangh Parivar will have to be contained and defeated”, or else “Indian secularism, already enfeebled, will have to be abandoned and with it, democracy as well.”

What makes the Parivar agenda uniquely pernicious is, first, its insistence that India is and has always been a quintessentially Hindu society, which was invaded and subjugated by “foreigners” belonging to “alien” religions; and second, its demand that secular India must become a Hindu Rashtra or Hindu-denominational state by accepting the political primacy of one community on account of its numerical strength.

The first proposition is comprehensively contradicted by history. Hinduism as we know it today, in its Brahminical casteist form, goes back to the eighth century AD, whereas Christianity in India goes back to the first century and Islam to the seventh century AD. Well before Hinduism became dominant, India had large communities of Jains and Buddhists, many of which were wiped out.

For well over a thousand years before the Modern Age, India was a mosaic of different ethnic-religious groups, including animists, nature- or ancestor-worshippers, and various syncretic traditions including atheism and agnosticism, besides Hindus, Buddhists and Muslims.

True, many non-Hindu ethnic groups invaded and ruled parts of medieval India, but most did so not as Muslims, but as Turks, Tajiks, Persians, Pashtuns or Moghuls, without practising mass-scale religious conversion. India’s Hindu and Buddhist kings and princes also invaded parts of Southeast Asia and neighbouring countries like Sri Lanka: that’s how these religions spread there. Maharaja Ranjit Singh invaded Afghanistan too.

Second, and more important, the Freedom Movement which conceptualised the project of a new society or Modern India, and struggled for it through mass resistance to British rule, developed an altogether different notion of nationhood, not based on ethnicity or religion, but independent of them. Central to this was the universalist idea of citizenship, with equal rights for all.

The Sangh Parivar was not part of this project. It did not participate in the Freedom Movement, choosing instead to collaborate with the British war effort and get arms training so as to build a communal militia directed primarily against Muslims. As the-then RSS chief MS Golwalkar said: “Hindus, don’t waste your energy fighting the British; save your energy to fight our internal enemies that are Muslims, Christians and Communists.”

The same Parivar today speaks for nationalism, but based on a nation of a different pre-modern kind, which glorifies an invented “Hindu” ancient India’s past. Thus Parivar ideologues like Dinanath Batra (of book-banning fame) believe that ancient India was “the fountainhead of everything”. In an interview with Outlook magazine (Oct 6), he says: “So whether it be the first spacecraft, television or car, or plastic surgery, or rockets there’s nothing that wasn’t conceived, designed and executed by Indians aeons ago”, including aircraft, generation of electricity in a cell, wireless communications, even atomic bombs.

These are pure fantasies, not backed by even a shred of evidence. All those historians who contradict these insane accounts have again become the target of the Parivar, whose ideologue Subramaniam Swamy let off a tirade at the National Museum (another compromised institution?) against “Marxist, Muslim and Western historians” and demanded that books written by “Nehruvian historians” such as Bipan Chandra and Romila Thapar “should be set afire”. (The Hindu, Oct 6) It’s a crying shame that the BJP and the RSS not only entertain such elements in their ranks, but actually lionise them. No wonder Batra’s books have become part of Gujarat’s school curriculum.

This represents unprecedented social and intellectual retrogression of a despicable kind, and an attempt to brainwash millions of children and infantilise adults on a mass scale. Yet, nothing will halt the Sangh Parivar-short of a popular mobilisation for secularism and rationality, against obscurantism, superstition and uninformed, blind ultra-nationalist hubris, and for tolerance and a compassionate commitment to building a modern, forward-looking, non-hierarchical society free of caste, gender and communal prejudice.

The Parivar has thrown down the gauntlet. All secular political parties, civil society organisations and public-spirited citizens must pick it up and fight communalism and obscurantism in every conceivable way: by legal means, through mass education, intellectual criticism, public intervention in every forum including the media, and above all, in the streets. That’s the only way to take India back from the Hindutva reactionaries by pushing them behind the red lines they have so audaciously crossed.

(The author can be contacted at : email: bidwai@bol.net.in)

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विकास पाठक ने आरएसएस क्यों छोड़ा और बीबीसी ने इसे अपने यहां क्यों छापा?

विकास पाठक जेएनयू से पढ़े हैं. पत्रकार रहे हैं. इन दिनों शारदा यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं. बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने विकास पाठक से उनके संघ से जुड़ने से और अलग होने को लेकर विस्तार से बात की. फिर उस बातचीत को विकास पाठक की तरफ से बीबीसी की वेबसाइट पर प्रकाशित करा दिया. ऐसे दौर में जब मोदी, भाजपा और संघ को हरओर महिमामंडित करने का दौर चल पड़ा है, बीबीसी ने संघ को लेकर एक शख्स की जुड़ाव व विलगाव यात्रा को प्रकाशित कर यह साबित किया है कि चारण-भाट बनने के इस दौर में कुछ सच्चे मीडिया ग्रुप भी हैं. कम्युनिस्ट हों या संघी हों, दोनों को लेकर क्रिटिकल खबरें सामने आनी चाहिए ताकि जनता को, पाठकों को खुद फैसला करने में सहूलियत हो और उन्हें दोनों अच्छे बुरे पहलू पता रहे. नीचे बीबीसी में छपी खबर है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


मैंने संघ क्यों छोड़ा

-विकास पाठक-

मैं अपने परिवार को ‘राष्ट्रवादी’ इसलिए कहता हूँ कि मेरे पिता अर्धसैनिक बल में थे और मैं उसी परिवेश में पला और बड़ा हुआ. पहले इस बात में यक़ीन करता था कि लोग किसी विचारधारा से सहमत होने के बाद ही उससे जुड़ते हैं. मैं उत्तर भारत के एक उच्च जाति के हिंदू परिवार से हूँ. मेरी किशोरावस्था के दौरान रामजन्मभूमि आंदोलन और मंडल आंदोलन अपने चरम पर था. समाज भारतीय जनता पार्टी की ओर झुक रहा था. ख़ासकर वो समाज, जिससे मैं आता हूँ. ‘राष्ट्रवाद’ मेरे परिवार के अंदर था.

स्नातक की पढ़ाई के दौरान संसद में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों से मैं काफ़ी प्रभावित रहा. लेकिन, जब मैं एमए करने के लिए जेएनयू पहुँचा तो मुझे बड़ा सांस्कृतिक झटका लगा. जेएनयू में कश्मीरी अलगाववादियों को भी बुलाया जाता था, जो मेरे लिए झटके जैसा था. मुझे लगता था कि ऐसा करना राष्ट्रविरोधी है. मुझे यह भी लगने लगा कि साम्यवादी आंदोलन राष्ट्रविरोधी है. इससे मेरा झुकाव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर होता चला गया. 1998 में ऐसा मौक़ा भी आया जब मैं इसमें पूरी तरह सक्रिय हो गया. धीरे-धीरे मेरी अपनी पहचान विद्यार्थी परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में होनी शुरू हो गई. मैं पाँच-छह साल तक विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा. इस दौरान मैं विद्यार्थी परिषद के वैचारिक पर्चे लिखा करता था. मेरी सक्रियता वैचारिक ही थी. परिषद से जुड़े आंदोलनों से मुझे भावनात्मक समर्थन मिल रहा था और मेरी जान-पहचान भी इससे जुड़े लोगों से ही हो रही थी.

एमफिल और पीएचडी के दौरान मैंने बीसवीं सदी की शुरुआत में हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलनों पर अध्ययन करना शुरू किया. इस पर गहन अध्ययन के दौरान बौद्धिक स्तर पर मुझे दो चीज़ें समझ में आईं. पहली ये कि भारतीय राष्ट्रवाद में जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की कोई भूमिका नहीं थी. हक़ीक़त यह है कि भारतीय राष्ट्रवाद में सबसे अहम भूमिका कांग्रेस की ही थी. शोध के दौरान मुझे भारत की आज़ादी के आंदोलन में संघ की सक्रिय भूमिका का कोई प्रमाण नहीं मिल पाया. बौद्धिक स्तर पर मेरी राष्ट्रवाद की शुरुआती समझ को उसी समय बड़ा झटका लगा. शोध के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि संघ राष्ट्रवाद का एकमात्र प्लेटफॉर्म नहीं है. मगर इसका मतलब क़तई यह नहीं है कि ‘राष्ट्रवाद’ में संघ की भूमिका का हवाला देकर आज भाजपा पर सवाल उठाए जाएं.

शोध के बाद संघ की कमजोरियाँ और ताक़त मेरे सामने खुलकर आने लगीं. मूल रूप से यह आंदोलन हिंदुओं को एकजुट करने का था. हालांकि मैंने संघ से दूरी इस ज्ञान के मिलने के बाद नहीं बनाई. मैं 2004 में संघ से दूर हुआ. जेएनयू से निकलने के बाद मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की. जेएनयू से संपर्क टूटने के बाद मेरी विचारधारा का संदर्भ भी बदलना शुरू हो गया. जब मैं जेएनयू में था तब विद्यार्थी परिषद मेरे लिए सब कुछ थी. लेकिन अब मैं एक पत्रकार बन रहा था. इससे विद्यार्थी परिषद के साथ जुड़े रहने की मेरी बौद्धिक, वैचारिक और भावनात्मक ज़रूरतें नहीं रहीं. धीरे-धीरे मैं परिषद से दूर होता गया. हालांकि मैं किसी और विपक्षी विचारधारा से भी नहीं जुड़ा.

मैं गांधी की विचारधारा और सावरकर की विचारधारा के बीच के फ़र्क को समझने लगा था. एक की विचारधारा मतभेदों को नज़रअंदाज़ करके जोड़ने वाले बिंदु खोजने की है. महात्मा गांधी का एजेंडा मतभेदों को दूर करने का था. जबकि दूसरे की विचारधारा अपने समुदाय को मजबूत करने की थी. ये एक समुदाय के विकास का मॉडल है जबकि गांधी की विचारधारा सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की लगती है. मुझे लगता है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में साथ चलना वक़्त की ज़रूरत है. मैं गांधीवादी विचारधारा से पूरी तरह प्रभावित हो गया. वक़्त के साथ मेरी रुचि भी बदली और मैं संघ से अलग हो गया.

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