एवार्ड लेते समय यशवंत ने योगी के कान में क्या कहा, देखें वीडियो

योगी के हाथों पुरस्कार लेने पर वामपंथी खेमे के कुछ पत्रकारों द्वारा विरोध किए जाने का यशवंत ने कुछ यूं दिया विस्तार से जवाब…

Yashwant Singh : लोकमत अखबार के यूपी के संपादक आनंदवर्द्धन जी का एक दिन फोन आया. बोले- ”हर साल की तरह इस बार भी लोकमत सम्मान का आयोजन करने जा रहे हैं हम लोग. हमारी जूरी ने ‘जनक सम्मान’ के लिए आपको चुना है क्योंकि भड़ास4मीडिया एक बिलकुल अनोखा प्रयोग है, मीडिया वालों की खबर लेने-देने के वास्ते जो भड़ास4मीडिया की शुरुआत हुई है, उसके लिए आप सम्मान योग्य हैं.”

ऐसे तारीफ भरे शब्दों को सुनने के दौरान मेरी हालत कैसे रिएक्ट करूं टाइप हो जाती है. आनंद वर्द्धन जी से मैंने वादा किया कि आऊंगा आपके सम्मान समारोह में. उनने आने जाने का जहाज का टिकट मेल करा दिया.

जबसे लखनऊ में नई सरकार आई, एक बार भी मेरा लखनऊ जाना न हुआ. एकाध मेरे निजी-पारिवारिक काम थे, जिसके लिए लखनऊ जाना था, पर टलता जा रहा था. जहाज का टिकट मिलने के बाद लखनऊ का दौरा मेरा पक्का हो गया. एक पंथ दो काज.

लखनऊ से पत्रकारिता और शराबखोरी, दोनों ही क्षेत्रों में करियर की शुरुआत की थी. इसलिए इस जगह से मेरा लगाव कुछ ज्यादा है. बड़ा अपनापा सा लगता है लखनऊ से. प्रेस क्लब में जुए की सजी हुई टेबल, चारबाग में देर रात तक दारू की उपलब्धता, खाने को किसिम किसिम का स्वाद, घूमने भटकने को ढेर सारी जगहें. इसी कारण दस जून के सम्मान समारोह के लिए लखनऊ 7 जून को ही पहुंच गया.

कार्यक्रम के दिन नियत समय पर संगीत नाटक अकादमी में हाजिरी दी. आयोजकों ने मंच पर बैठने के लिए बुलाया तो वहां चला गया, अन्य पुरस्कारार्थियों के साथ. योगी बाबा आए और एक एक कर सबको पुरस्कार थमाने लगे. मैं तय करके आया था कि योगी से रुबरु होने के इन चंद सेकेंड्स में मुझे उनसे क्या कह देना है. मेरी बारी आई तो पहुंचते ही योगी जी से कहने लगा- ”शाहजहांपुर वाले जगेंद्र सिंह हत्याकांड में कुछ नहीं हुआ. हत्यारे आजाद हैं और पीड़ित का परिवार धमकी व प्रलोभन के कारण चुप है. इसे संज्ञान लीजिए. ”

मैं कहता रहा और योगी बाबा पुरस्कार देने वाली मुद्रा में मुस्कराते हुए मुझे देखते सुनते रहे. इस दौरान लोकमत यूपी के संपादक आनंदवर्द्धन जी भी मौजूद थे. योगी तक अपनी बात पहुंचाते हुए पुरस्कार सम्मान लेते फोटो खिंचाने के बाद वापस अपनी सीट पर आ गया. मुझे संतोष था मैंने यूपी के पत्रकारों के माथे पर पुती गहरी कालिख को मिटाने हेतु एक कदम चल सका. मुझे संतोष था एवार्ड समारोह में सीएम के होने का लाभ उठाते हुए उनका ध्यान पत्रकारों के एक बड़े मामले की ओर खींचने का. मुझे संतोष था जिस जगेंद्र हत्याकांड के कारण हम लोगों ने सपा को वोट न देने की अपील की थी, उस मुहिम को नई सरकार में आगे बढ़ा पाने का.

कार्यक्रम खत्म होते ही कई साथियों ने मुझसे मिलकर और कुछ ने फोन करके पूछा कि मैं योगी जी के कान में क्या कह रहा था? मैंने सभी को बताया कि जगेंद्र हत्याकांड में इंसाफ न होने की बात बताई योगी जी को.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.. इस वीडियो में पुरस्कार लेते वक्त यशवंत लगातार योगी से कुछ कह रहे हैं और तब योगी जी सहमति में सिर हिलाते दिख रहे हैं…

https://www.youtube.com/watch?v=y9AS48U_WcY

योगी के हाथों पुरस्कार लेने के बाद कुछ कामरेड लोगों के बिफरने का मुझे अंदाजा था. पर हमने कब परवाह की है जमाने की. जो करना है, वह करके रहता हूं, गलत या सही. इंडियन एक्सप्रेस के कार्यक्रम में मोदी बतौर प्रधानमंत्री जाते हैं. लोकमत के कार्यक्रम में योगी बतौर मुख्यमंत्री जाते हैं. आप हम कुर्सी का सम्मान करते हैं, व्यक्ति का नहीं. वैसे भी मेरे जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए हर नेता एक सरीखा होता है. मैं मोदी और मनमोहन, योगी और मुलायम में बहुत ज्यादा फरक नहीं कर पाता. आप अगर कर पाते हैं तो आप महान हैं और आप का राशि कुंडली में राजनीति सर्वोच्च स्थान पर है. पर जब मैं गौर से देखता हूं तो सत्ता तंत्र का चरित्र हमेशा एक सा दिखता है. बस थोड़ा बहुत हेरफेर होता है. केवल चेहरे और व्यक्ति बदल जाते हैं. पार्टियों के नाम बदल जाते हैं. सत्ता के चलने का अंदाज वही रहता है. हां, हमारी जातीय क्षेत्रीय धार्मिक पृष्ठभूमि की वजह से सत्ता तात्कालिक तौर पर कभी करीब तो कभी दूर लग सकती है.

आपकी रुचि अगर राजनीति में है तो आप जिंदाबाद मुर्दाबाद करते रहिए, इनके उनके या मेरे पक्ष विपक्ष में खड़े रहिए. लेकिन मुझे राजनीति में कतई रुचि नहीं. इसलिए मेरे सामने एवार्ड देने वाला कोई योगी हो या कोई मुलायम या कोई मनमोहन, मुझे कोई फरक नहीं पड़ता.

विचारधाराएं इस दुनिया में दम तोड़ रही हैं, काफी समय से. तकनालजी और बाजार ने बहुत कुछ बदलने को मजबूर किया है. विचारधाराओं के जरिए औसत दिमाग से नीचे के लोगों को बरगलाया भरमाया जाता है या फिर लूट में शामिल होने का प्रलोभन देकर इरादतन मिलाया जाता है. विचारधाराओं के नाम पर अब केवल भीड़ की गोलबंदी की कवायद की जाती है ताकि लोकतंत्र में ज्यादा वोट पाने के नाटक को जस्टीफाई करते हुए सत्ता शीर्ष पर कब्जा जमाया जा सके. मुझे तो कई दफे ये चुनाव ही ढेर सारी समस्याओं की जड़ लगने लगे हैं. भीड़ हमेशा मूर्खतापूर्ण सोच रखती है और ऐसी ही सोच से उपजे नेता कहां से तार्किक और वैज्ञानिक विचार वाले होंगे. भीड़ हमेशा अपने जैसा मूर्ख व्यक्ति नेता के रूप में खोजती है और नेता हमेशा एक भीड़ की तलाश में रहता है, जो किसी एक नारे या एक बोली से सक्रिय हो जाए. भीड़ और भेड़ में ज्यादा फरक नहीं है. भेड़चाल ही है लोकतंत्र.

इन सम्मान समारोहों और वैचारिक विमर्श जैसे कार्यक्रमों में शिरकत करना मेरे लिए भड़ास4मीडिया की ब्रांडिंग का एक मौका होता है, साथ ही उन सभी वेब पत्रकारों के माथे पर जीत व गर्व की एक लकीर दर्ज कराना होता है जो अपने-अपने मीडिया हाउसों से लड़कर अपने दम पर अपनी वेबसाइटों वेब चैनलों ब्लागों सोशल मीडिया जैसे उपक्रमों के माध्यम से साहसपूर्ण पहल करते हुए पत्रकारिता को करप्ट व कारपोरेट महासागर में विलीन होने से बचाए हुए हैं.

भड़ास4मीडिया डाट काम की शुरुआत के वक्त मठाधीश टाइप पत्रकार लोग वेबसाइटों और ब्लागों को हिकारत भरी नजर से देखते थे और इसको संचालित करने वालों को छोटा पत्रकार / हारा हुआ पत्रकार / मुख्यधारा से तड़ीपार पत्रकार मानते बोलते थे. लेकिन बीते नौ साल में तस्वीर पलट गई है. मठाधीश लोग या तो नष्ट हो गए, या कर दिए गए या चुप्पी साधे नौकरी बजा रहे हैं और भड़ास4मीडिया टाइप पोर्टल के संचालक सत्ता शीर्षक की छाती पर अपनी धमक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं.

नौ वर्षों में हर किस्म के अनुभव से रुबरू हुआ. हर किस्म के लोगों से पाला पड़ा. अपने और पराये लोगों को नजदीक से महसूस किया. इस सबसे मेरी मानसिक बुनावट में काफी कुछ बदलाव आया. सैद्धांतिक ज्ञान में बहुत कुछ नए अध्याय जुड़े और कई सारे चैप्टर डिलीट हुए. हम लोग तभी से मानते थे कि सारी मीडिया नष्ट हो जाएगी, ये डिजिटल ही बचा रहेगा. यही कारण है कि हम भड़ास वालों ने एक भी मैग्जीन या अखबार न शुरू किया. क्योंकि तय कर रखा था कि युद्ध डिजिटली ही लड़ेंगे.

इस भड़ास4मीडिया ने मुझे धरती से आसमान तक की यात्रा कराई, अनुभव समझ संवेदना सामाजिकता के लेवल पर. और, इसी ने इन यात्राओं के जरिए एक आंतरिक, आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत कराई. कह सकता हूं कि मैं भड़ास में एक क्लर्क से ज्यादा कुछ नहीं हूं. कह सकता हूं कि प्रकृति ने मुझे जरूर कुछ अदभुत अनुभव करने और जीने के लिए भेजा है, जो कर रहा हूं, जो जी रहा हूं. मैं अब चीजों को अच्छे या बुरे के फ्रेेम में नहीं देखता न ग्रहण करता. इसे संपूर्णता के भाव से देखता, भोगता और महसूस करता हूं. अच्छा मेरा है तो बुरा भी मेरा है. सब मेरा है और कुछ भी मेरा नहीं है.

काफी समय से मैंने महत्वाकाक्षाएं-इच्छाएं पालने और योजनाएं बनाने का काम छोड़ दिया है. तत्क्षण में जीने का आदी हो गया हूं. देर तक और दूर तक का प्लानिंग न के बराबर है. अतीत में बिलकुल नहीं जाता. भविष्य के लिए परेशान नहीं क्योंकि न कोई महत्वाकांक्षा है और न कोई योजना. इसलिए मुझे जो कुछ मिल जाता है, जो कुछ मेरे संग हो जाता है, अच्छा बुरा, उसे सब ईश्वरीय नियोजन / प्रकृति की देन मानकर ग्रहण कर लेता हूं.

ये मजेदार नहीं है कि पिछली सरकार जब यूपी में आई थी, नई नई, अखिलेश यादव के नेतृत्व में तो मुझे शुरुआती तीन महीने के भीतर, शायद मई लास्ट का समय था, अरेस्ट करके जेल भेज दिया गया और कई मीडिया हाउसों ने फिर ताबड़तोड़ मुकदमें लिखवाए, सत्ता सिस्टम से दबाव बनवाकर घरों आफिसों पर छापे डलवाए. मुझे जेल भेजे जाने के बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को अरेस्ट कर जेल में भिजवाया गया क्योंकि सबकी चिंता थी कि आखिर यशवंत के जेल जाने के बाद भड़ास कैसे चल रहा है. जेल के अधिकारियों को फोन कर जेल के अंदर प्रताड़ित करने के लिए उकसाया गया. पर प्रकृति ने मेरे लिए कुछ और प्लान कर रखा था. जेल मेरे लिए जानेमन जगह सिद्ध हुई. वहां से निकला तो ‘जानेमन जेल’ किताब की रचना हुई.

और, अब ये जो नई सरकार आई है, यूपी में, योगी के नेतृत्व में, तो इसके मुखिया योगी ने बतौर सीएम अपने कार्यकाल के तीन महीने के भीतर ही मुझे अपने हाथों सम्मानित किया. माध्यम भले बना लोकमत अखबार. माध्यम भले ही बने आनंदवर्द्धन जी.

न जेल जाने की योजना मैंने बनाई थी और न सम्मान पाने की. दोनों ही चरम विपरीत स्थितियों को खुद आना था, खुद होना था. मेरे को तो बस दोनों ही हालात में आनंद की अनूभित करनी थी जो की. दोनों ही प्रकरणों में मुझे सकारात्मक और सहज रहना था, जो रहा. इन दोनों के लिए ही मुझे नेचर / परम / अदृश्य / सृष्टि को धन्यवाद कहना था, कृतज्ञ होना था, जो मेरे को निमित्त बनाए हुए जाने क्या क्या खेल तमाशा रचे हुए है. .

जो लोग विचारधाराओं के चश्मे से अब भी चलते हैं, और इसी आधार पर अगर हमको आपको कोसते हैं, तो ध्यान से देखिएगा, उनके जीवन में कोई न कोई फांस, द्वंद्व, दुख, गुलामी, वासना, उत्तेजना, घृणा, अवसाद, ब्रेन वाश आदि में से कुछ न कुछ भयंकर है जो उन्हें एक खास स्टाइल में जीने सोचने को मजबूर किए रहता है. बहुत मुश्किल होता है एक खास किस्म की स्कूलिंग और खास किस्म से तैयार किए गए दिमाग से उबरते हुए सहज मौलिक शांत सुंदर दिमाग की तरफ बढ़ पाना.

जो लोग गब्बर के डकैत गिरोह के इमानदार खजांची बन गुलामी का जीवन काट रहे हैं वे अगर दूसरों को इमानदारी का पाठ पढ़ाने लगें तो क्या कहिएगा. उनसे क्या पूछिएगा कि आप अच्छा खासा नक्सल वाला जीवन जी रहे थे, उधरे जंगल में शहीद हो गए होते तो ढेर सारे नौजवान लौंडों को प्रेरणा मिली होती नक्सलाइट बनने के वास्ते. पर आप तो भाग आए जान बचाकर दिल्ली और यहां पाल लिए हैं टाइम्स आफ इंडिया वालों की बिल्ली. सो, सौ सौ चूहे खाने के बाद हज की ओर काहें जा रहे हैं महाराज.

खैर.

अब अपने पास दूसरों की आलोचना के लिए ज्यादा वक्त नहीं रहता, इसीलिए यहीं बात समाप्त कर रहा हूं और उम्मीद करता हूं उन तक बात पहुंच गई होगी. मनुष्य को इस या उस खांचे में देखने वाले लोग ज्यादा बड़े फासिस्ट हैं. इन्हें एक बार फिर ब्रह्मांड विज्ञान जीवन की क्लासेज में दाखिला लेकर सिर्फ इस या उस खांचे की जगह संपूर्ण जीवन जीव सुर लाय ताल को समझना बूझना चाहिए. मने नौकरी करते करते एकदम्मे गड़बड़ा गए हों तो होलटाइमर वाला काम शुरू कर दीजिए क्योंकि कामरेड वाली पार्टियों में अच्छे कामरेडों का बड़ा अकाल है. पर ये न करेंगे क्योंकि आप मूलत: अवसरवादी और बकचोद हैं. जीवन एक पूंजीपति की सेवा करते गुजार दी और गरीब लौंडों से नक्सली बनने की इच्छा पाले रहेंगे. धत तेरी हिप्पोक्रेसी की.

मुझे तो अब किसी हत्यारे में भी कोई अपराधी नहीं दिखता. बस यही सोचता हूं कि नेचर ने इसे इस काम के लिए क्यों प्रोग्राम किया हुआ है? मैं हत्यारे के भीतर रुह बनकर प्रवेश कर जाना चाहता हूं और उसकी तरह सोचते हुए जानना चाहता हूं कि आखिर एक हत्यारे को आनंद कब आता है, दुख कब होता है, डर कब लगता है और वह रोता कब है. मुझे मुश्किल और उलझे हुए लोग ज्यादा संभावना से भरे लगते हैं. जो पीएफ सीएल डीए की गणना करता हुए इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग के बीच आते जाते जीवन के दिन वर्ष खर्च कर रहे हैं, उनमें क्या नया दिखेगा, उनमें क्या मौलिक दिखेगा. वह एक घटिया मास्टर की तरह रटी रटाई पुरानी पर्ची को पढ़ कर सिलेबस पूरा जान मान लिया करेंगे.

सीएम योगी के हाथों एवार्ड लेते हुए पहली फोटो डाली तो उसमें पांच दास के बीच निगेटिव कमेंट्स हैं. मेरे खयाल से इतना जेनुइन है. जो हार्डकोर कामरेड हैं और उसी शब्दावली के बीच जीवन जीते गुजारते हैं, उन्हें कष्ट तो होना ही चाहिए, योगी या मोदी के हाथों एवार्ड लेते देखकर, वह भी किसी पूर्व कामरेड को. और, मुझे लगता है कि ये जरूरी भी था. आप अगर मुझे किसी खांचे सांच में बांधकर देखते हैं, देखते थे, तो गलत थे. आप अपना जीवन और अपना खांचा दुरुस्त रखिए. मेरी चिंता छोड़ दीजिए. मैं एक जीवन में सौ किस्म का जीवन जीता हूं, अराजक, अवसरवादी, वामपंथी, दक्षिणपंथी, साहित्यिक, आध्यात्मिक, अभिनेता, गायक, कुक, ड्राइवर, माली, खिलाड़ी, साधक, घुमक्कड़, प्रेमी, अभिभावक, लीडर, विद्रोही, गरीब, अमीर, अभद्र, अशिष्ट, शराबी, कबाबी, क्रूर…. और, किसी क्षण मैं इनमें से कुछ भी नहीं होता हूं, इस देह से परे होता हूं.

क्या करिएगा, कैसे किसी खोल में हमको भरिएगा. पर असल में जिन लोगों का काम ही सिर्फ खोल में भरना है, वो तो भरेंगे. आप भले न भराएं, लेकिन वो खोल खांचे में जबरन आपको भरेंगे. इसलिए इनकी भराई की परवाह न करिए, उन्हें अपना काम करने दीजिए और हमें अपना. क्या कहेंगे लोग, सबसे बड़ा रोग… वाला नारा यूं ही नहीं दिया गया है. आप जब भी कुछ करेंगे तो उसके सहज स्वाभाविक दस विरोधी और दस प्रशंसक पैदा हो जाएंगे. यह प्रकृति का विभिन्नता का सिद्धांत है. यह जो प्रकृति प्रदत्त बहुलता, विविधता और अनेकता है, यही सबसे खास चीज है जो हमें आपको अलग अलग चश्मे, अलग अलग अनुभव जन्य सिद्धांत थमाए रहती है और सबके जरिए अलग अलग किस्म का तमाशा बनाए रहती है. तो इसका मौज लेना है और मस्त रहना है.

जिन्हें सीएम योगी के हाथों जनक सम्मान से मुझे सम्मानित किया जाना अच्छा लगा, उन्हें नमस्ते प्रणाम. जिन्हें यह अच्छा नहीं लगा, उन्हें प्यार भरा सलाम. मैं उचक कर न सेल्फी लेने गया और न मैंने कोई निजी काम बताया. मैं लपलपाया भी नहीं. मैं एक बड़े मुद्दे, जगेंद्र हत्याकांड का जिक्र कर सीएम का ध्यान खींचने की कोशिश की. मैं सीएम के हाथों सम्मान पाकर न गर्व से भरा हूं और न योगी के सीएम होने और इनके हाथों सम्मानित होने से किसी अवसाद या दुविधा में पड़ा. मैं तब भी मस्त था, आज भी मस्त हूं. मेरे पास इतना सोचने के लिए वक्त नहीं होता क्योंकि मेरे स्वभाव में दुनियादारी, चुगलखोरी, रणनीति, साजिश, प्रोपेगंडा आदि के लिए कोई जगह है ही नहीं. इसी दुनिया में सब कुछ हर क्षण है. आप जिस दृष्टि और सोच से देखेंगे, दुनिया और लोग वैसे ही दिखेंगे. किसी रोज चश्मा हटाकर और दिल दिमाग खोलकर एक एक चीजों को देखिए और उसे चूमिए.

लखनऊ यात्रा के दौरान खूब आनंद आया. बहुत सारे नए पुराने पत्रकारों साथियों से मिलना हुआ. हर दिन हर शाम हर रात जै जै रही… आप सभी चाहने वालों को ढेर सारा प्यार प्यार और प्यार… सभी आलोचक चश्मेधारी दिग्गजों का भी हूं दिल से शुक्रगुजार …. 😀 आलोचक न होते तो ये पोस्ट न लिखता… इसलिए समझ लीजिए… चैलेंज, आलोचना, सवाल ही आपको बड़ा होने, क्रिएट करने, रचने के मौके मुहैया कराते हैं…. इसकी अगली स्टेज ये है कि न तारीफ से प्रसन्न होने वाला हूं और न आलोचना पर भौहें तानने वाला… अब इस अगली अवस्था में पहुंंचने ही वाला हूं… फिर मैं खुद कहूंगा आप सबों के साथ…

मार मार पापी यशवंत को… अरे उसी भड़ास वाले को ही… 🙂

जैजै

भड़ास के संपादक यशवंत के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Shrimaan एक साँस में पढ़ गया, दिल को सुकून आया कि आँच अभी भी बाक़ी है, सब कुछ बर्बाद नहीं हुआ है। आप जैसे और तो अब दिखते नहीं पर आप जुटे रहिएगा। आप ने मेरे जैसे कई लोगों को फिर से उम्मीद दिखाई है। कोशिश कीजिएगा कि आप ऐसे ही रहें।

Dinker Srivastava ग़जब…..धोते पछारते आपकी यूँ ही गुजरती रहे…..लोग जलते रहें आप जलाए रखें उनकी भी और मशाल भी…..बात थोड़ा लंबी सरक गई लेकिन मौक़े और समय के मुताबिक कही गयी…अच्छा बहुत अच्छा…..शुभकामनाएं

Divakar Singh अभी और ऊंचाइयां पानी हैं. आध्यत्मिक और व्यावसायिक दोनों.

Arun Sathi कामरेडों का हाजमा ही ख़राब है….इसीलिए हाशिये पे है…आप बिंदास है

Yogesh Bhatt कुछ लाइन याद हो आई हैं..जिसकी जैसी नजर उसने वैसा समझा मुझे

Vishal Ojha चलो भाई अब आनंद लो सब चीजों का..और हाँ कभी याद भी कर लिया करो

Sushil Dubey उस दिन 1 पैग का क्या हुआ बाबा,,,

Rohit Bisht बधाई, खरी कहने और सुनने का माद्दा बना रहे,बचा रहे यही शुभकामनाएँ

Rajshekhar Vyas Aap sachmuch videh Janak ho rahe hain ! Hardik badhai

Sangam Pandey क्या कहने….
”मुझे तो कई दफे ये चुनाव ही ढेर सारी समस्याओं की जड़ लगने लगे हैं. भीड़ हमेशा मूर्खतापूर्ण सोच रखती है और ऐसी ही सोच से उपजे नेता कहां से तार्किक और वैज्ञानिक विचार वाले होंगे. भीड़ हमेशा अपने जैसा मूर्ख व्यक्ति नेता के रूप में खोजती है और नेता हमेशा एक भीड़ की तलाश में रहता है, जो किसी एक नारे या एक बोली से सक्रिय हो जाए. भीड़ और भेड़ में ज्यादा फरक नहीं है. भेड़चाल ही है लोकतंत्र”

Ganesh Dubey Sahaj पूर्वांचल के खून में है साफगोई।। साधुवाद।।

Sunayan Chaturvedi भड़ास पुरुष की जय।

Sanjeev Kumar Badhai. Aapko janta bahut pahle se tha. Lakin is post ko padhne ke bad aapke vyaktitva ke bare me kuchh aur janne ko mila.

Anand Kumar हर कोई यशवंत नहीं बनता।

Dilip Clerk आप इस सम्मान के योग्य है दादा मैं भी भड़ास एक मुहिम

Sanjaya Kumar Singh बधाई। पुरस्कार के लिए और जोरदार लिखने के लिए भी।

Surendra Trivedi यशवंत जी, आपने तो सब कुछ लिख डाला। खैर, उम्मीद है कि आप बहुत आगे जाओगे।

Ramesh Chandra Rai देखो यशवंत तुम जो भी पोस्ट करो उससे मेरा कोई मतलब नहीं है। पूरे पत्रकारिता के जीवनकाल में मैं बहुत खुश था कि एक पत्रकार अपनी सुख सुविधा छोड़कर लड़ रहा है। तुम इसके लिए जेल यात्रा भी किए। मैं तुम पर गर्व करता था। लोगों को बताता था कि एक होनहार पत्रकार अपने कैरियर को दांव पर लगा दिया। सम्मान मिलने से सबसे अधिक खुश हूं लेकिन योगी के हाथ लेने से मुझे दुख हुआ। तुम मेरी भावना समझ गए होंगे। बाकी बात मिलोगे तो होगी। फिर भी तुम मेरे अनुज हो इसलिए मैं तुम्हें बधाई दे रहा हूँ।

Pradeep Surin कंटेंट पर ध्यान दीजिए। इतना लंबा नहीं चल पाएगा। बाकी बधाई हो आपको। 🙂

डॉ. अजित हार्दिक बधाई सर।आप अपने किस्म के अनूठे और अकेले पत्रकार है

Shrikant Asthana Should I say anything? You’ve risen above these things! Keep it up. Live happily as free as you feel right at any given moment.

Vivek Garg आपको आज तक नहीं पढ़ा और नहीं सुना, बस विकास अग्रवाल जी आपको यहाँ विजिट किये | फेसबुक पर साइड कॉलम में फ्रेंड्स की activity दिख जाती है | हम भी आपके पेज पर आ गए| आपको अवार्ड मिला ख़ुशी हुयी लेकिन में आपको यह बधाई आपकी लेखनी को दे रहा हूँ जो आपने इतना सटीक और स्वच्छ अक्षरों में बात को इतनी सरलता से लिखा ,आप भी मेरी तरह अपनी भावनाऔ का पूरा सम्मान करते हुए पूरी बात लिखते हैं , यह नहीं सोचते की पढने वाला निबंध समझ कर सो तो नहीं जाएगा | Such a confidence is necessary to remain alive within bowl(India) of so many school of thoughts whether needed or not in present time period . आपसे बहुत कुछ सिखने को मिलेगा | आपको अपना डिजिटल गुरु मित्र कह सकता हूँ , हिंदी बचपन से जानता हूँ , कई सालो से लिख रहा हूँ लेकिन वो पैनापन नहीं आया | आपको साधुवाद

Ajay Rai यंशवत हमारे साथ आपने गरीबो के बीच काम भी किया लेकिन दुख हुआ योगी के हाथो पुरस्कार लेने पर इस समय जब छात्र नौजवान योगी जी के कारण दमन का सामना कर रहे हो सफाइ जो दे !

Devendra Verma मोदी की भांड मीडिया तो सबने देखी अब योगी की जातिवादी और चापलूस मीडिया के दिन भी बहुरने लगे,

Arvind Singh सर आपको और आपकी पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई

Govind Badone शानदार, बेबाक।

Rajesh Rai आप ने तो पूरी गीता को आत्मसात कर लिया है ।

A.P. Soni Akash बधाई भड़ासी भाई यशवंत जी

Ram Ashrey Yadav भाई यशवंत जी लेख में आपने गज़ब की भड़ास निकाली है, बधाई!

Bhawna Vardan बधाई बधाई बधाई ….और आपकी इस पोस्ट के लिए तो क्या कहूँ …..नि:शब्द हूँ …हमेशा की तरह

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यशवंत को ‘जनक सम्मान’ दिए जाने का वीडियो देखें

लखनऊ में लोकमत अखबार की तरफ से लोकमत सम्मान का आयोजन किया गया जिसमें सृजन कैटगरी का ‘जनक सम्मान’ भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह को दिया गया. यह सम्मान सीएम योगी ने अपने हाथों से प्रदान किया. इससे संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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भड़ास के यशवंत “जनक सम्मान” से 10 जून को लखनऊ में होंगे सम्मानित

लोकमत सम्मान 2017 : विजेताओं पर ज्यूरी बैठक सम्पन्न

लखनऊ। हिंदी दैनिक लोकमत के स्थापना दिवस पर प्रति वर्ष आयोजित होने वाले लोकमत सम्मान हेतु विजेताओं के नामों का चयन कर लिया गया है। रविवार 4 जून को आयोजित ज्यूरी की बैठक में जनरल आरपी साही (ए.वी.एस.एम.), पद्मश्री डॉ॰ मंसूर हसन, पद्मश्री परवीन तलहा, रैमेन मैग्सेसे पुरस्कृत संदीप पांडेय, पूर्व आईएएस एसपी सिंह,  श्री सीवी सिंह और श्री पवन सिंह चौहान ने देश भर से आए हज़ारों नामों में से चयनित हर श्रेणी में 5-5 नामों में से एक-एक नाम का चयन किया।

इन सभी विजेताओं को आगामी 10 जून को लखनऊ में आयोजित हो रहे लोकमत सम्मान समारोह में सम्मानित किया जाएगा। श्रेणी पुरस्कारों के अलावा ज्यूरी पुरस्कारों की घोषणा भी की गयी गयी है जिसमें भड़ास फ़ॉर मीडिया डॉट कॉम के यशवंत सिंह “जनक सम्मान” से, आरटीआई कार्यकर्ता सिद्धार्थ नारायण “शक्ति सम्मान” से और वरिष्ठ अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी “अभिव्यक्ति सम्मान” से सम्मानित किए जायेंगे।

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‘मीडिया के सरताज’ लिस्ट में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम

फेम इंडिया और एशिया पोस्ट नाम पत्रिकाओं की तरफ से ‘मीडिया के सरताज वर्ष 2017’ के लिए किए गए सर्वे में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम आया है. फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यू मीडिया कैटगरी में एक प्रमुख सरताज के तौर पर यशवंत सिंह को चिन्हित किया गया.

इस संबंध में फेम इंडिया मैग्जीन की वेबसाइट पर एक खबर का प्रकाशन किया गया है, जो नीचे साभार प्रकाशित किया जा रहा है. फिलहाल इस उपलब्धि के लिए सोशल मीडिया पर यशवंत को लोग बधाई दे रहे हैं.

मीडिया को बेबाकी से आइना दिखाते हैं यशवंत सिंह (फेम इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे 2017-मीडिया के सरताज)

Posted by fameindia On April 20, 2017

हिन्दी भाषी राज्यों में जो भी शख्स मीडिया से जुड़ा हो वह कम से कम भड़ास4मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता यशवंत सिंह को जरूर जानता होगा। बेबाक, बेलौस और बेलाग। यशवंत सिंह की ये तीन खूबियां उन्हें औरों से अलग बनाती हैं। उन्हें एक ऐसे निडर पत्रकार के तौर पर जाना जाता है जो किसी युनियन या संगठन के पचड़ों में पड़े बगैर भी देश के हर मीडियाकर्मी के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा है।

मूल रूप से गाजीपुर के यशवंत सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। लखनऊ में दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत की। फिर अमर उजाला से जुड़े। अमर उजाला के लिए बनारस, कानपुर और आगरा में काम किया। इसके बाद दोबारा दैनिक जागरण से जुड़े और मेरठ, कानुपर व दिल्ली में काम किया। जागरण समूह के आई-नेक्स्ट की लॉन्चिंग टीम का भी हिस्सा रहे। उन्होंने देखा कि पत्रकारिता में हर जगह कई बुराइयों ने डेरा जमा लिया है और जिस उद्देशय के लिये पत्रकारिता शुरु की थी वो कहीं है ही नहीं।

जब पत्रकारिता उबाऊ लगने लगी तो कुछ दिन दिल्ली में एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर काम किया। मन में मैली हो रही पत्रकारिता को आइना दिखाने की इच्छा दबी थी, वह नौकरी भी छोड़ दी और मई 2008 में मीडिया की खबरों का पोर्टल भड़ास4मीडिया.कॉम शुरु किया। यह अपनी तरह का पहला पोर्टल था जो हर आम मीडियाकर्मी की समस्या को तरजीह देता था व उनसे जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता था। जल्दी ही यह काफी लोकप्रिय हो गया।

यशवंत सिंह की पहचान उनके बागी तेवरों की वजह से भी है। इसकी वजह से उन्हें कई बार उन मीडिया संस्थानों का निशाना भी बनना पड़ा जो अपने उद्देश्यों से भटके हुए थे। कई बार उनपर मुकदमे भी हुए और उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन बेहद पॉजिटिव सोच रखने वाले यशवंत सिंह ने इस मौके को भी एक अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया और जेल में मौजूद कुव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये एक किताब -‘जानेमन जेल’ लिख डाली। उनकी यह किताब खूब बिकी और प्रशासन ने कई सुधार भी किये।

यशवंत सिंह ने भारतीय पत्रकारों के बीच अपनी पैठ बना रखी है। पत्रकार भले ही दुनिया के लिए लड़ते हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए लड़ने वाला ये अगुवा पत्रकार माने जाते हैं। कई पत्रकार युनियनों और समाजसेवी संगठनों ने इन्हें समय-समय पर सम्मानित भी किया है। इंडियन मीडिया वैल्फेयर एसोसिएशन की ओर से इम्वा अवॉर्ड, ‘इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एण्ड डाक्यूमेटेशन इन सोशल साइन्सेंस’ (आईआरडीएस) अवॉर्ड आदि प्रमुख हैं।

हर मीडियाकर्मी की भलाई और जीवन के हर क्षेत्र में सुधार की सोच रखने वाले यशवंत सिंह फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यु मीडिया के एक प्रमुख सरताज के तौर पर पाये गये हैं।

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भड़ासी आत्महंता आस्था और लखनऊ में राज्यपाल के हाथों सम्मान : आइये गरियाना जारी रखें…

Yashwant Singh : भड़ास आत्महंता आस्था से शुरू किया था. सभी हरामियों को चिन्हित करके गरियाना है. हर दलाल को सरेआम दलाल संबोधित कर उसके बारे में सबको बताना है. एक-एक उत्पीड़कों, शोषकों, धंधेबाजों के खिलाफ आवाज उठाना है, ललकारना, चुनौती देना है. किसी को नहीं छोड़ना है. कुछ ऐसी ही मानसिकता में भड़ास की बीज नींव पड़ी डाली थी. चोट्टों दोगलों उचक्कों हरामियों चापलूसों चिरकुटों बेवकूफों अपढ़ों से भरी मीडिया के संपादकों व मालिकों की असलियत जानकर तो उबकाई आने लगी थी.

भगत सिंह को आदर्श मानकर सोशल पोलिटिकल एक्टिविस्ट बना और उसी आदर्श को दिल में रख पत्रकारिता शुरू की. पर यहां तो दलालों दोगलों की भरपूर भरी-पूरी दुनिया फलते-फूलते देखने लगा. ये लोग कहते कुछ. करते कुछ. दिखते कुछ. रहते कुछ. एक दौर ऐसा आया जब इन अखबारी दलाल मालिकों संपादकों को अपने यहां मेरी जरूरत नहीं थी और मेरे दिल में इन अखबारी दलालों मालिकों संपादकों की असलियत जानने के बाद इनके प्रति कोई साफ्ट कार्नर शेष न था.

खेती वेती कर जीवन गुजारने गांव जाने से पहले दिल्ली में ही कुछ दिन महीने रहकर भड़ास निकाल लेने की ठानी. वक्त काटने के लिए एक मोबाइल कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट कंटेंट एंड आपरेशंस के पद पर ज्वाइन किया. Bhadas4media के लांच होते ही और कुछ तेवरदार तीखी खरी खबरें छपते ही मीडिया घरानों में तरह तरह की कुर्सियों पर छितराए / तरह तरह की कुर्सियों को चिपकाए बैठे लोगों के पेट में मरोड़ उठने का क्रम शुरू होने लगा. पुलिस थाना मुकदमा जेल मर्डर…. ये अंजाम हमें पता था. हमेशा से ऐसा ही होता आया है उनके साथ जो छिपाए दबाए जा रहे सच को उधेड़ कर पूरे जोर से बाहर लाते हुए सरेआम असलियत कहने बताने लगते हैं.

असल में इस देश का लोकतंत्र संविधान न्यायपालिका मीडिया नौकरशाही आदि इत्यादि मिलाकर पूरा सिस्टम जो कुछ है, वह सब कुछ एक बहुत बड़ा नाटक नौटंकी है और इसके शीर्ष पर बैठे लोग सबसे शानदार व दिमागदार अभिनेता. सच्चाई यही है कि ये पूरी व्यवस्था बड़ों के लिए, बड़ों के द्वारा और बड़ों से रचित संरक्षित सृजित संचालित है. आप परत दर परत इस सिस्टम के भीतर घुसते जाएंगे तो सच की असलियत खुद आपको पता लगती चल जाएगी. इस सिस्टम यानि काजल की कोठरी में जितना आप गहरे घुसेंगे तो पाएंगे कि यहां तो वैसा कोई न मिला जैसा किताबों में पढ़ा सीखा सोचा था. पाएंगे कि आपके आदर्श नैतिकता न्यायप्रियता संवेदनशीलता सब कुछ सिर्फ दिखाउ लिखाउ पढ़ाउ चीजें हैं, व्यवहार में इनकी कोई जगह नहीं है. यानि सत्य संवेदना न्याय बराबरी आदि इत्यादि मेनस्ट्रीम नहीं हैं, मुख्य धारा नहीं है.

भड़ास के जरिए जब धमाके शुरू किए तो बड़े बड़ों के परखच्चे उड़े. लांछन आरोप छीटें मेरे पर भी आने थे. लेकिन जैसे पागल को ये क्या पता कि लोग उसे क्या कह रहे, उसी तरह अपन भी अपनी ओर उठती उंगलियों से बेखबर रहे. नोटिस थाना जेल मुकदमे दनादन मेरे पर होने लगे. घर आफिसों पर छापे तक पड़ने लगे. सबने मिलकर भड़ास और मेरे को नक्सली / पागल / अराजक / अनसिस्टमेटिक / अनप्रेडिक्टबल / जाने क्या क्या घोषित कर दिया. ऐसी मन:स्थिति और ऐसे हालात में कभी अपेक्षा नहीं करता कि कोई मुझे सम्मानित करेगा, कोई मुझे रिकागनाइज करेगा. लेकिन आज आम मीडियाकर्मियों के साथ साथ सत्ता शीर्ष पर बैठा कथित बड़ा आदमी भी जब भड़ास और मेरा नाम सम्मान से लेते हैं और इसे पुरस्कार के काबिल मानते हैं तो सोचता हूं कि कहीं ये भड़ास को नष्ट करने की साजिश तो नहीं. ऐसी ही मन:स्थिति में लखनऊ में राज्यपाल रामनाईक के हाथों सम्मानित हो आया. दरअसल लखनऊ यानि अपने गृह प्रदेश की राजधानी में इस सम्मान के बहाने मैंने लखनऊ के ढेर सारे सत्ता शीर्ष के चिरकुटों, चारण-भाटों को दिखा चिढ़ा दिया कि लगातार गालियां देते रहने से भी सम्मान मिल जाया करता है, इसके लिए अनवरत तेल लेपन व झूठ बोलन ही कतई जरूरी नहीं 🙂

तो भाइयों, आइए गरियाना जारी रखें. सत्ता सिस्टम की पोल खोलना बरकरार रखें. लुटेरों, भ्रष्टाचारियों को सरेआम नंगा करना जारी रखें. हमारे काम को कोई समझ पाए और सम्मान वम्मान करा दे तो बहुत अच्छा. न कराए तो उससे भी अच्छा.

हम चले थे ना यह सोचकर कि मंजिल मिल ही जाएगी
अपनी मस्ती में बहते रहे
रस्ते बनते रहे
कहीं कहीं प्रणाम सम्मान दिखते रहे
हम रहे सबसे बेपरवाह
हमें तो अपनी सुर लय गति प्यारी थी
हमें अपनी कलकल आनंद भरी जलधारा प्यारी थी
इसे ले जाना था उस महासमुद्र में
जहां सारी बेचैनियों संघर्षों मुश्किलों भ्रमों का
एकाकार हो जाया करता है अंत
होकर अनंत…

चीयर्स मित्रों 🙂

भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


यशवंत के उपरोक्त फेसबुक स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

डॉ. अजीत : आपको लगभग एक दशक से जानता हूँ सर आपकी साफगोई और फक्कड़पन से वाफिक हूँ। आप इस सम्मान के लिए सर्वथा पात्र व्यक्ति है। भड़ास एक आश्वस्ति का प्रतीक है जो मुश्किल दौर में सबके साथ खड़ा होता है। बधाईयाँ स्वीकारें 🙂

Sanjaya Kumar Singh : “लगातार गालियां देते रहने से भी सम्मान मिल जाया करता है। तो भाइयों, आइए गरियाना जारी रखें। सत्ता सिस्टम की पोल खोलना बरकरार रखें। लुटेरों, भ्रष्टाचारियों को सरेआम नंगा करना जारी रखें। हमारे काम को कोई समझ पाए और सम्मान वम्मान करा दे तो बहुत अच्छा। न कराए तो उससे भी अच्छा।” समझें तो ठीक ना समझें तो भी ठीक।

संतोष उपाध्याय : बधाई …. सच के लिये गरियाना यदि सच लगे त ‘गारी’ अच्छी है।

Shiva Aggarwal : आपने पत्रकारिता के पैनेपन को बरक़रार रखा है। यह तब और ज्यादा प्रशंसनीय है जब पत्रकारिता मूल्यों में लगातार गिरावट आ रही है। भड़ास को पत्रकारो के शोषण के विरुद्ध बेलाग लिखने वाले के रूप में जाना जाता है। आप पर स्वाभाविक रूप से आरोप भी लगे जेल तक जाना पड़ा पर आपके पैनेपन में कहीं कोई कमी नहीं आई।
रोज गिर गिरकर भी खड़े हैं
ए परेशानियां देख हम तुझसे कितने बड़े हैं।

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