”आप ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो फर्जी मुकदमे लादे जाते और जेल काट कर ही बाहर आता”

पिछले दिनों भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के साथ यूपी के गाजीपुर जिले की पुलिस ने बेहद शर्मनाक व्यवहार किया. यशवंत अपने मित्र प्रिंस सिंह के साथ रेलवे स्टेशन पान खाने गए और कुछ लोगों की संदिग्ध हरकत को देखकर एसपी को सूचना दी तो एसपी के आदेश पर आए कोतवाल ने यशवंत व उनके मित्र को ही पकड़ कर कोतवाली में डाल दिया. इस पूरे मामले पर यशवंत ने विस्तार से फेसबुक पर लिखकर सबको अवगत कराया. यशवंत की एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा इस प्रकार हैं… मूल पोस्ट नीचे कमेंट्स खत्म होने के ठीक बाद है… 

Mamta Kalia इस घटना से पुलिस का जनता के प्रति रवैया पता चलता है। मैंने एक बार अपने घर मे हुई चोरी की रपट लिखवाई थी। पुलिस ने मुझे अलग अलग तारीखों में कोर्ट बुला कर इतना परेशान किया कि मैंने लिख कर दे दिया मुझे कोई शिकायत नहीं। केस बन्द किया जाय।

सोनाली मिश्र हम लोग बाइक चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाने पहुंचे तो वो हमें ही यह उपदेश देने लगे, चेन न पहना करें, टॉप्स न पहनें आदि आदि।

Ramji Mishra इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पुलिस से शिकायत करने से पहले खुद को आदरणीय यशवंत जी की तरह मजबूत बना लेना चाहिए, अन्यथा अंजाम उसके हांथ होगा……

Shyam Singh Rawat अपने साथ भी मुरादाबाद में कुछ ऐसा ही हुआ था 1991 में। एक पुलिस इंस्पेक्टर की सार्वजनिक हित में ऐसी ही क्लास लगाई थी। फर्क इतना कि हम अकेले थे। बड़ी मुश्किल से इंस्पेक्टर साहब की जान छूटी थी।

Braj Bhushan Dubey अजीब दास्तान है। अजीबो गरीब घटना। आमजन के साथ तो ऐसे ही होता है जिसे चाहा उठा लिया और बेइज्जत कर दिया। शहर कोतवाल जो है। जोरदार लेखनी कि पढ़ने वाला एक बार शुरू करें तो अंत करके ही रुकेगा।

Pawan Singh यशवंत गुरू एक किस्सा और मिलता है तुम्हारे किस्से से….पुख्ता तौर पर वर्ष का उल्लेख न कर सकूँगा …वाकया होगा तकरीबन सन् 1988-89 का…दैनिक नवजीवन में मैं स्ट्रिंगर हुआ करता था…एक दिन पता लगा कि प्रसिद्ध कवि व पत्रकार राजेश विद्रोही और उस दौरान नवभारत टाइम्स में कार्यरत धीरेंद्र विद्यार्थी काठमांडू में धर लिए गए हैं …घटना यूँ थी कि नेपाल में कम्युनिस्ट दबदबे वाली सरकार थी..भाई लोगों ने दवा लगाई और काठमांडू के कवि सम्मेलन मंच पर ही कम्युनिस्टों के खिलाफ ही आधा दर्जन कविताओं का फाॅयर झोंक दिया….बवाल मचा…भाई लोग धर लिए गए ….अगले दिन हम लोगों ने नेपालगंज जाकर वहां के नेपाली पत्रकारों को साधा तो अगले दिन शाम ढलने के बाद छूटे….आज राजेश भाई तो दुनियां में नहीं हैं लेकिन उनकी कुछ कविताओं की दो-दो पंक्तियां आज भी याद हैं …..

अखबार नवीस भी अजब आदमी है, खुद खबर है दूसरों की लिखता है..

..आज सारा धनी पड़ोस उस निर्धन के साथ है।
लगता है उसकी बेटी जवान है…

..भूखे को चांद भी रोटी नजर आता है….

Vijay Prakash जय हो सर पूरा झकझोर दिए। आखिर तक हार नहीं माने…

Anurag Singh थाने को भी बाद में पता चला कि हम तो असली थानेदार को ले आये, फिर कोतवाल साहब बोले होंगे हईला….मैनें ये क्या कर दिया

Vinod Bhaskar बोला ये क्या कर बैठे घोटाला हाय ये क्या कर बैठे घोटाला, ये तो है थानेदार का साला.

पत्रकार यदु सुरेश यादव सर जी आप तो ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो लूट के दो चार केस दर्ज हो जाते और कुछ दिन जेल की रोटी तोड़ने के बाद ही बाहर आता, जय हो भड़ासानंद बाबा

Kuldeep Singh Gyani योगी का बदला कोतवाल से…अभी “अर्ध कुम्भ” लगने में समय है महराज, लेकिन बढ़िया तबियत दुरुस्त किये विभाग की…सारे भक्तजन एक साथ…बोलिये, स्वामी भड़ासानन्द महराज की जै

Azmi Rizvi दादा यही होता है आम आदमी के साथ, कोई आम आदमी होता तो जेल में होता आज, और दस बीस साल लग जाते उसे बेगुनाह साबित होने में। जै हो बाबा की

Rahul Vishwakarma सही सबक सिखाया… लेकिन कोतवाल की तरह आपको भी रायता थोड़ा और फैलाना चाहिए था. जरा जल्दी मान गए…

Surendra Trivedi यार मित्र, वाकई में बड़े ही रोमांटिक हो।

Anil Gupta पैदल चलने वाला हर आदमी सामान्य नही होता … बहुत खूब सर ..

Ravi S Srivastava लगता है जानेमन जेल पढे नही है कोतवाल साहब

Gaurav Joshi ग़ज़ब दादागिरी दिखायी भाई आपने ।

Riyaz Hashmi मेरठ कांड याद दिला दिया भाई। उस कहानी का एक चरित्र सौरभ भी याद आ गया जो अब इस दुनिया में नहीं है। Take Care.

Amod Kumar Singh कभी हमारी कोतवाली पधारिये, तुलसी रजनीगन्धा के साथ कन्नौज का इत्र विदाई में अलग से दिया जायेगा।

Yashwant Singh आंय । धमका रहे हैं भाया या वाकई प्रेम भरा न्योता है?

Amod Kumar Singh पुलिस में आने से पहले पुलिस की इतनी लाठियां खायी हैं, कि किसी सभ्य व्यक्ति को धमकाने या लठियाने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।आपका स्वागत है।

Yashwant Singh काश आप जैसे सोच समझ के लोग पुलिस विभाग में ज्यादा होते। थैंक्यू आमोद भाई। न्योता कुबूल। जल्द मुलाकात होगीं।

Journalist Yogesh Bharadwaj यशवंत भाई आप मिलिएगा आमोद जी से अच्छे व्यक्तित्व के धनी है और अच्छी सोच समझ के साथ न्याय प्रिय भी

Mishra Aradhendu आप तो बच गए पर आम जनता का क्या , जिसको ये पुलिस वाले बोलने ही नहीं देते….??

Shivam Bhardwaj ज़बरदस्त… लगा जैसे सब कुछ सजीव देख रहा हूँ 🙂

Ashutosh Dwivedi यशवंत जी क्या छापी जा सकती है ये कथा।

Yashwant Singh बिल्कुल ब्रदर।

Nishant Arya रजनीगंधा से मोह नहींऐ जाएगा। उल्टे कोतवाले से घुस लिए।।। बाह

Ajay Kumar Kosi Bihar बच गए भाई.बिहार रहता तो पोलठी भी खाते.सब पत्रकारी निकाल देता.तब फिर से आपको जाने मन जेल का भाग 2 लिखना पड़ता.

Ghanshyam Dubey तो आगे से समझ लेना — SP और CO समझदार थे! अगर न होते तो कहानी में फिर कई ट्विस्ट होते। पुलिस तो फर्जी मुकदमे कायम करने में माहिर होती है! जवान हो, भड़ासी हो तो कहानियाँ तो होती रहेंगी…

चन्द्रहाश कुमार शर्मा …तो आप भी एक नया अफसाना बना दिये?

Sachin Mishra मनमोहक और काफी रुचिकर कहानी थी गुरु। सच में वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।

Kailash Paswan इसलिए पुलिस को आमलोग उप नाम से पुकारते है

Devendra Verma आपने पुलिस का जो सच सुनाया है, वह बिलकुल सच है ….जैसे मैने पढना शुरू किया वैसे वैसे कहानी का रोमांच बढता गया आनन्द आ गया…..

Md Islam बेचारा कोतवाल गलत नंबर डायल कर गया

Amit Srivastava इस पूरी घटना में मुखपात्र कोतवाल का कही नाम नहीं लिखा अगर उसका नाम भी लिख देते तो मामला समझ ने लोगो को आसानी होती।

Pandit Prakash Narayan Pandey बेशर्मी व बेहयाई की हद्द कर दी उस दारोगा ने… वे सब बहुरूपिया तो होते ही हैं… बहरहाल लताड़ना तो कत्तई नहीं छोड़ना है….
Hemant Jaiman Dabang एक वाक्य में ख़त्म करूँगा—अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे… यहां ऊंट कोतवाल (पुलिस) को कहा गया है। और पहाड़ यशवंत सिंह को। राम जी राम

Ashutosh Chaturvedi ऊर्जा का संचार कर दिया सर आपने।

DrMandhata Singh गनीमत है एनकाउंटर नहीं किया। आजकल अपनी प्रगति के लिए अनजान लोगों को बलि का बकरा बनाते हैं पुलिस वाले और बाद में होती है लीपा-पोती। अनुरोध है कि ऐसे खेल न खेलें। हम लोगों के लिए आप बहुमूल्य हैं। यह आपको याद रखना चाहिए। सबक का खेल सावधानी से खेलें।

Sunayan Chaturvedi भड़ासी माहौल के जनक यशवंत सिंह की भड़ासी अदा को प्रणाम।

Purnendu Singh आज तो तुम खुश बहुत होगे ठाकुर कोतवाल सीओ, sp से माफी मंगवा लिए। याद रखना अब तुम्हारे जैसे लोग अनशन की धमकी मत दे कर माफी मंगवा सकते हैं तो यह नेता बलात्कारी और अपराधी हत्यारों को भी छोड़ा लेते हैं फिर दोष मत देना पुलिस को क्यों कोतवाल निकम्मा था जो तुमको ऐसे ही आने दिया… कभी किसी के चक्कर में पड़ोगे तो बताया जाएगा पुलिस क्या होती है…

Yashwant Singh आपकी बात कांट्राडिक्टरी हैं। बेवजह पकड़े जाने पर निर्दोष का प्रतिरोध और रेपिस्ट मर्डरर अपराधी को पुलिस से छुड़वाए जाने की नेता की गुंडई जैसी दो विरोधाभाषी चीजों को एक तराजू में रख कर कैसे तौल सकते हैं। वैसे, धमकाने के लिए धन्यवाद।

Sandeep Chandel भाई साहाब पुलिस कोई मुहनोचवा तो है नहीं कि किसी को उठा ले जाय मामले की सही जाच कर के उठाना चहीये ताकी लोगो का विश्वास बना रहे ये सही है की हम पुलिस की दिल से इज्ज़त करते हैं और करते रहेंगे , लेकीन विश्वास तब डगमगाता हैं जब ग्यात्री प्रजापती जैसे लोगों को पकडने में एक महीने लग जाता है और आम जनता को सरेआम बदनाम किया जाता है, हमे लगता है आप हमारी बातों से सहमत होंगे ,

Syed Shahid Ali पुलिस की कार्यप्रणाली की सच्चाई सहन न कर पाने बाले भाई साहब एक पत्रकार को धमकाने के बजाय जनता में पुलिस की छवि सुधारने पर विचार कीजिए । धन्यवाद

Uvaish Choudhari पुरनेन्दू जी के रिश्तेदार तो नही थे कोतवाल साहिब?

S.K. Misra गलती करने वालों को भी विभाग के यदि लोग ऐसे ही समर्थन देंगे तो उनमें सुधार कैसे होगा, इस पुलिस बाले की कमेंट को देख कर दुःख हो रहा है ।

Manoj Tripathi आप जहाँ काण्ड वहां!!

Ram Murti Rai Jabardast.. Heropanthi

C S Singh Chandu जरा सोचिए भाई साहब अगर आपके जगह कोई आमजनता होती तो अब तो उसका उसके पूरे परिवार के साथ बड़ी ही दर्दनाक कहानी हो जाती और वर्षों पढ़ी जाती… सोचकर ही रुह काँप जा रही है… पता नहीं और क्या क्या बीतती उस आम आदमी के साथ…

Rahul Gupta Badaun भैया जी, यह कोतवाल अब सपने में भी सौ सौ बार सोचेगा, इस भड़ासी बाबा से आइंदा पाला न पड़े। वरना अभी तो बच गया आगे भगवन मालिक होंगे। अब यह जहाँ भी आपको देखेगा खुद चल कर मिलने आएगा।

Ajay Mishra खेत खाए गदहा मारा जाए जुलाहा उत्तर प्रदेश पुलिस की यही दिनचर्या है यह सुधर जाएं तो पूरा प्रदेश सुधर जाए

ChandraShekhar Hada सर, ऐसा लग रहा है जैसे आप रजनीगंधा-तुलसी की विज्ञापन फिल्म कर रहे हैं।

Nirupma Pandey ये आप ही कर सकते थे ।

Maneesh Malik Thanks for police valo ko sabak sekhane k laya Maja aa gya. Jay hind.

Syed Mazhar Husain क्या बात है भाई… ऐसी तैसी हो गयी कप्तान से लेकर कोतवाल तक… एक सेल्फी तो बनती थी कोतवाल के साथ…

Narendra M Chaturvedi जेल तो….जानेमन जेल…नाम से प्रख्यात हुई…और अब कोतवाली….यशवंत भईया वैसे आज आपके मुताबिक जेल दिवस भी है…?

S.K. Misra इस पोस्ट में डीजीपी को टैग करना चाहिये था… उन्हें भी पता चलता उनके रणबांकुरे कैसे जनता की सेवा में तत्पर हैं।

Surya Prakash कुल मिला के रजनीगन्धा तुलसी की व्यवस्था हो गई गुरु …

Rajendra Joshi घटना तो जो भी रही हो कहानी में ऐसे-ऐसे मोड़ आपने डाल दिए कि लगा न जाने अगले मोड़ पर क्या नया होगा।

Sarvesh Singh बेचारे पुलिस वालों ने इस दिन की कल्पना तक ना की होगी।

Anshuman Shukla अब सोचिये, लल्लन टाप कानून व्यवस्था है कि नहीं है उत्तर प्रदेश में।

Ashok Kumar Singh आपका रिश्वत रजनीगन्धा तुलसी ,फिर भी सस्ता ही पड़ा कोतवाल को

Vinay Shrikar बतौर समझौते की शर्त तुलसी और रजनीगंधा के साथ ही संजीवनी सुरा की डिमांड कर देना था।

Rajesh Mishra बहुत गलत किये थे कोतवाल महोदय

A.k. Roy कोतवाल के लिऐ, सेर को सवासेर मिला….

Sant Sameer क्रान्तिवीरों की जै हो।

Shrinarayan Tiwari गजब की कहानी है यशवंत जी

Anuj Sharma गुरु एक नई जानकारी मिल गई। आप ”रजनीगंधा तुलसी” मंत्र से वश में होते हो।

Umesh Srivastava Socialist संत किसी के बस में नहीं होता और सब के बस में होता है

Anuj Sharma गुरु तो क्रांतिवीर हैं।।। पत्रकारों की रीढ़ हैं।।

Anuj Sharma अब भक्त ये मंत्र याद कर लेंगे।।।

Kaushal Sharma उत्तर प्रदेश पुलिस संघटित अपराधियों का सरकारी गिरोह है।

Abhay Prakash Yashwant G Mai to aapko ni janta par itna jarur kahunga ki pulice wale itna sidhe sadhe kab se ho gai

Anand Agnihotri फोन करके कोतवाल साहब का हालचाल तो पूछ लेते। बेचारा बड़ा मायूस बैठा होगा। अब कई दिन कहीं से रंगदारी नहीं मिलेगी उसे।

प्रयाग पाण्डे आपकी जै हो। माना आपकी जगह कोई दूसरा निरपराध इंसान होता ? बना दिया गया होता न अपराधी। खैर…… .

Dinesh Dard यही जुझारूपन तो चाहिए ज़ुल्म के ख़िलाफ़। मगर हर शख़्स में इतनी ताब कहाँ होती है। बहरहाल, ज़िंदाबाद।

Vinod Bhardwaj स्वामी भड़ासानन्द जी महाराज, अब उस इंस्पेक्टर को दिल से धन्यवाद कर दो जिसने अपनी करतूत से ये रोमांचकारी भडासी मसाला लिखने – पढ़ने का मौका दे दिया ।

Madan Tiwary यह हुई मेरे मन मुताबिक़ बात। अब आंदोलन शुरू करो गुरु।

Amar Chaubey ध्यान रखा करिये आप योगी सरकार में है

Madhusudan JI अपने ही घर के दरवाजे पर अपना ही कुत्ता न पहचान पाया और गुर्रा कर अपनी औकात भी जल्दी से पहचान लिया.. बधाई हो.. धूल चटा ही दिया उसे

Manish Jaiswal सर, इन कोतवाल महापुरुष का नाम तो बता दीजिए ताकि हम लोग भी उन्हें दुआ दे सकें…

Fareed Shamsi जलवा है जलवा, मैं तो सोच रहा था, कि अब एक और नई किताब पढ़ने के लिये मिलेगी ‘जानेमन हवालात’

Amit Tiwari आज फिर से अपराध जीत गया। एक तुलसी और रजनीगंधा की रिश्वत से बड़ी गलती को माफ़ कर दिया गया । क्या गारंटी है कि इस रिश्वत से पुलिस यह ग़लती किसी भले आदमी के साथ दोबारा नही करेगी।

Dheeraj Rai Sri Amit ji / Dobara Aysa karen na karen .. Ab Yah Police Parivar ke mukhiya (SP-Gazipur) ka daitva huva. Sri Yashvant Ji ne SP KoAaina dikha Apne Daitva ka Nirvahan kar diya. Ab Ek Journalist Es se jada kuchh nhi De Sakta Police ko. Ins. Ko Nilambit athva Anya koi bhi gambhir karywahi ka Vaydhanik Adhikar to Aaina Dekhte SP ke Pas hay !! Ab SP Avm Sarkar Samjhe.
Dhanyawad Sri Yashvan Ji.

Ashwani Sharma अरे भाई कोई आम आदमी होता तो अब तक जेल में सड़ रहा होता

Dheeraj Rai Haaaaaaaa…. To kisi Patrakar se Pala para tha Police ka. hona hi tha.

Lokesh Raj Singh Aapki patrakarita ka power bhi paan masale tak mein simat aaya jai ho patrakar maharaj. Koi shaq nahi ki angreji daru par imaan bik jata hoga.

Manoj Singh Chauhan आप के साथ कहानी हुई, उस कोतवाल के साथ तो कांड हो गया…

Yatish Pant आम आदमी पर क्या गुजरती होगी क्योंकि ऐसा तो रोज होता है।

Chandra Shekhar Kargeti कोतवाल को माफ़ भी किया तो एक रजनीगन्धा और डबल जीरो में …आपकी जगह कोई दुसरे वाले पत्रकार रहे होते तो ?

Mannu Kumar Mani Yashwant भाई, कोई आम आदमी होता। तो उसकी लग गई होती।

Arvind Saxena आपने तुलसी रजनीगंधा की मांग कर अपराध को बढावा दिया

Care Naman सच में कहानी कहानी हो गई इस नई जवानी

Syed Tariq Hasan पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य नहीं होता ! शानदार।

Devendra Kumar Nauhwar आप असाधारण हैं, आपकी समाज को जरूरत है!

Ankit Kumar Singh यशवंत भैया कोतवाल सच में पैर छूने लगा ??

Vishal Ojha ले रहे मजा मजबूर बन के जानेमन

Ashish Mishra E sare fasad ki jadd mujhe tusli aur rajnigandha lg rha h.

Gopal Ji Rai Janeman 2 likhane SE bach gaye

Sandeep Kher वाह बहुत अच्छा सबक़ दिया आपने सर पर उस ग़रीब आदमी का क्या जो ऐसे ही उठा लिए जाते है जिनका कोई सोर्स नहीं होता है अगर आप भी आम आदमी होते तो शायद अंदर होते हमारी पूलिस संवेदनहीन हो गए है जो सिर्फ़ आदेश बजाना जानती है फिर चाहे निर्दोष इंसान को ही ना उठना पड़े पूलिस को ध्यान देना चाहिए की कोई बेगुनाह आदमी क़ानून के चुंगल में ना आए

Sanjay Kumar Patrakaar पता नहीं भारत में ऐसी घटनाएं रोज कितनी होती होगी. परंतु बहुत सा मामला उजागर ही नहीं होती है . यशवंत जी आपने उजागर कर पुलिस की कार्यशैली को जनता के सामने लाने का प्रयास किया है .

Sunil Kumar Singh जय हो… पर आप जरा अंदाजा लगाए कि यह पुलिस महकमा कैसे पेश आता होगा आमजन से?

Vivek Gupta बहुत खूब भैय्या. लेकीन ये प्रशासन कब सुधरेगा.

Gandhi Mishra ‘Gagan’ काम तो कोतवाल कोई बुरा नहीं किया था भाई क्योंकि आप दोनों मित्र भी तो पहुंचने के बाद उसे जिसकी संदिग्धता की जानकारी आपने कप्तान को दी थी कोतवाल को भी देना था औऱ रजनीगंधा तुलसी पर नहीं बिकना था ।

Dharmendra Pratap Singh बाबा कहीं रहें और बवाल न हो, असंभव… जय हो !

Rinku Singh हर पैदल चलने वाला आम आदमी नहीं होता….

Amit Kumar Bajpai पूरी कहानी का सार……. रजनीगंधा की पुड़िया और पानी की बोतल में संसार बंधा है….. तर्क- वितर्क- कुतर्क धरे रह जाते हैं, गलती करने वाले पछताते हैं और गुरु गजब कर जाते हैं.. Haha

Neeraj Sharma बड़े काण्डी हो यशवंत भाई

Trilochan Prasad हाहा, डार्लिंग जेल वाले को पकड़ लिया

Anil Kumar Singh उसे मालूम नहीं था जिसे बकरा समझ रहा है वह तो शेरों का शेर है।


मूल पोस्ट ये है…

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रेलवे स्टेशन पर पान खाने गए यशवंत पहुंचा दिए गए कोतवाली!

Yashwant Singh : रात मेरे साथ कहानी हो गयी। ग़ाज़ीपुर रेलवे स्टेशन पर पान खाने गया लेकिन पहुंचा दिया गया कोतवाली। हुआ ये कि स्टेशन पर मंदिर के इर्द गिर्द कुछ संदिग्ध / आपराधिक किस्म के लोगों की हरकत दिखी तो एसपी को फोन कर डिटेल दिया। उनने कोतवाल को कहा होगा। थोड़ी ही देर में मय लाव लश्कर आए कोतवाल ने मंदिर के पास वाले संदिग्ध लोगों की तरफ तो देखा नहीं, हम दोनों (मेरे मित्र प्रिंस भाई) को तत्काल ज़रूर संदिग्ध मानकर गाड़ी में जबरन बिठा कोतवाली ले गए। मुझे तो जैसे आनंद आ गया। लाइफ में कुछ रोमांच की वापसी हुई। कोतवाल को बताते रहे कि भाया हम लोगों ने तो संदिग्ध हरकत की सूचना दी और आप मैसेंजर को ही ‘शूट’ कर रहे हो।

कोतवाली में नीम के पेड़ के नीचे चबूतरे पर मेरा आसन लगा और गायन शुरू हो गया- ना सोना साथ जाएगा, ना चांदी जाएगी…। पुलिस वालों ने मेडिकल कराया जिसमें कुछ न निकला। अंततः एक स्थानीय मित्र आए तो उनके फोन से फिर एसपी को फोन कर इस नए डेवलपमेन्ट की जानकारी दी। एसपी भौचक थे सुनकर। उन्होंने फौरन कोतवाल को हड़काया। सीओ को कोतवाली भेजा। आधे घंटे में खुद भी प्रकट हो गए।

तब तक दृश्य बदल चुका था।

शहर कोतवाल सुरेंद्र नाथ पांडेय हम लोगों के चरण छूकर माफी मांग रहा था। उनका अधीनस्थ दरोगा जनार्दन मिश्रा जो बदतमीजी पर आमादा था, कोतवाली लाए जाते वक्त, गायब हो चुका था। हम लोगों ने नीम के पेड़ के नीचे पुलिस जुल्म के खिलाफ ऐतिहासिक अनशन शुरू कर देने की घोषणा की। माफी दर माफी मांगते रुवांसे कोतवाल को हम अनशनकारियों ने आदेश दिया कि फौरन तुलसी रजनीगंधा की व्यवस्था कराओ, तब अनशन खत्म करने पर विचार किया जाएगा। कोतवाल ने अल्फा बीटा गामा चीता कुक्कुर सियार जाने किसको किसको आदेश देकर फौरन से पेशतर उच्च कोटि का पान ताम्बूल लेकर हाजिर होने का हुक्म सुनाया।

सीओ को हम लोग कम भाव दिए क्योंकि निपटना कोतवाल से था।

कप्तान आए तो मेरा पुलिस, जनता, पत्रकरिता और सरोकार पर भाषण शुरू हुआ जो अनवरत आधे घंटे तक चला। मैं रुका तो मेर साथ अनशनकारी मित्र प्रिंस का उग्र भाषण शुरू हुआ। कप्तान सोमेन वर्मा माफी मांगने लगे और कोतवाल को जमकर लताड़ने लगे। अगले घण्टे भर तक सुलहनामे की कोशिश चलती रही। मेरी एक ही शर्त थी कि अगर मेरे दोस्त प्रिंस ने माफ कर दिया तो समझो मैंने भी माफ कर दिया वरना ये कोतवाली का धरना सीएम आवास तक पहुंचेगा। एसपी ने प्रिंस भाई के सामने हाथ जोड़ा और पुलिस विभाग की तरफ से मांफी मांग कर उन्हें गले लगाया। साथ ही साथ वहां हाथ बांधे खड़े कोतवाल की जमकर क्लास लगाई- ‘तुम नहीं सुधर सकते… चीजों को ठीक नहीं कर सकते हो तो कम से कम रायता तो न फैलाया करो…’।

मैंने कहा- ‘इसके पास वसूली उगाही से फुरसत हो तब न सकारात्मक काम करे… ऐसे ही लोग विभाग के लिए धब्बा होते हैं जो राह चलते किसी शख्स से बदतमीजी से बात करते हुए उसे थाने-कोतवाली तक उठा लाते हैं, जैसा आज हुआ’।

कोतवाल बेचारे की तो घिग्घी बंधी थी। एसपी और सीओ माफी पर माफी मांग अनशन से उठने का अनुरोध करते जा रहे थे। हम लोग जेल भेजे जाने की मांग पर यह कहते हुए अड़े थे कि अरेस्टिंग और मेडिकल जैसे शुरुआती दो फेज के कार्यक्रम हो चुके हैं, तीसरे फेज यानि जेल भेजे जाने की तरफ प्रोसीड किया जाए।

इसी बीच बाइक से आए एक पुलिस मैन ने कोतवाल के हाथों में चुपके से कुछ थमाया तो कोतवाल ने हाथ जोड़ते हुए मुझे तुलसी रजनीगंधा का पैकेट दिखाया। मैं मुस्कराया, चॉकलेट को मुंह से कट मारने के बाद सारे दुख भूल जाने वाले विज्ञापन के पात्र की तरह। उधर प्रिंस भाई का भी भाषण पूरा हो चुका था और पूरा पुलिस महकमा सन्नाटे में था। अनुनय विनय की चौतरफा आवाजें तेज हो चुकी थीं। अंततः आईपीएस सोमेन वर्मा के बार बार निजी तौर पर मांफी मांगने और आइंदा से ऐसी गलती न होने की बात कही गयी तो मैंने उनसे बोतल का पानी पहले प्रिंस भाई फिर मुझे पिला कर अनशन खत्म कराने का सुझाव दिया जिसे उन्होंने फौरन लपक लिया।

आंदोलन खत्म करने का एलान करते हुए नीम के पेड़ के चबूतरे से उठ कर मैं सीधे कोतवाल की तरफ मुड़ा और उसके हाथ से तुलसी रजनीगंधा झपटते हुए कहा- ”तुम यहां आंख के सामने से निकल लो गुरु, वर्दी न पहने होते तो दो कंटाप देता, लेकिन ये तुलसी रजनीगंधा मंगा कर तुमने थोड़ा अच्छा काम किया है इसलिए जाओ माफ कर रहा हूं। बस ध्यान रखना आगे से कि पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य ही नहीं होता इसलिए किसी आम आदमी से बदतमीजी करने से पहले सौ बार जरूर सोचना।”

कोतवाल सिर झुकाए रहा।

कप्तान ने हम लोगों का जब्त मोबाइल और लाइसेंसी रिवाल्वर वापस कराया। एक दोस्त रिंकू भाई की कार पर सवार होने से पहले कोतवाली के गेट पर बंदूक लिए खड़े संतरी से जोरदार तरीके से हाथ मिलाते हुए उन्हें इस कोतवाली का सबसे बढ़िया आदमी होने का खिताब दिया और उन्हें ‘जय हिंद’ कह कर सैल्यूट ठोंकते हुए घर वापस लौट आया।

अभी सो कर उठा तो सबसे पहले रात का पूरा वृत्तांत यहां लिखा ताकि भड़ास निकल जाए। आज रोज से ज्यादा एनर्जेटिक फील कर रहा हूं क्योंकि वो मेरा प्रिय गाना है न – ‘वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो’। दिक्कत ये है कि मैं पूरी जिंदगी में एक नहीं बल्कि हर रोज एक कहानी चाहता हूं और जिन-जिन दिनों रातों में कोई कहानी हो जाया करती है उन उन दिनों रातों में ज्यादा ऊर्जा से भरा जीवंत महसूस करता हूँ।

कह सकते हैं मेरे साथ हर वक्त कहानी हो जाया करती है, कभी इस बाहरी दुनिया में घटित तो कभी आंतरिक ब्रम्हांड में प्रस्फुटित।

फिर मिलते हैं एक कहानी के बाद।

जै जै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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‘टाइम मशीन’ पर सवार यशवंत ने ये जो देखा-महसूसा!

Yashwant Singh : कल शाम कामधाम निपटा कर टहलने निकला तो मन में आने वाले खयाल में क्वालिटेटिव चेंज / ग्रोथ देख पा रहा था. लगा जैसे अपन तो इस दुनिया के आदमी ही नहीं. जैसे किसी ‘टाइम मशीन’ पर सवार हो गया था. अगल-बगल दिख रही चुपचाप खड़ी कारों, मकानों, पेड़ों, सूनी सड़कों, गलियों से रूबरू होते गुजरते सोचने लगा कि मान लो यह सब जलमग्न हो जाए, किसी महा प्रलय के चलते तो मछलियां इन्हीं कारों में अपना घर बसाएंगी और ये बहुत गहरे दबे पेड़ नई सभ्यताओं के लिए कोयला तेल आदि का भंडार बनेंगे… मतलब, कुछ भी बेकार नहीं जाना है.. सब रीसाइकिल होना है…

इस धरती का तेजी से नए की ओर उन्मुख होना, वो नया भले ही हमारे आपके लिए विकास वाला या विनाश वाला हो, बताता है कि हमारे चाहने न चाहने के बावजूद चीजें अपनी स्पीड में चलती हैं और इससे जो कुछ नया रचता बनता बिगड़ता नष्ट होता है वह दरअसल बहुत आगे के जीवन, सभ्यताओं, समय के लिए पूंजी / थाती / आधार / नींव का काम करता है.. जो हमारे लिए विकास है, संभव है वह धरती की सेहत के लिए विनाश हो लेकिन यही विनाश संभव है आगामी सभ्यताओं के लिए अकूत उर्जा और जीवन का केंद्र बन जाए…

पहाड़ पिघल रहे हैं… समुद्र लपलपा कर फैलना चाह रहे हैं, जंगल कट कर ठूंठ मैदान में पसरते जा रहे हैं और मैदान धीरे-धीर नमी विहीन होकर रेगिस्तान में तब्दील होता जा रहा है… यह बदलाव अपनी नियति को प्राप्त होगा..

ये तो सब जान रहे हैं कि धरती का उर्जा भंडार, जल स्रोत समेत कई किस्म के वो स्रोत जो जीवन के लिए जरूरी हैं, तेजी से क्षरण की ओर उन्मुख हैं.. अचानक घड़ी की सुइयां बहुत तेज गति से टिक टिक करने लगी हैं… कैलेंडर में जो बारह महीने खत्म होकर एक साल गुजरने का एहसास कराते हैं, वैसा अब सब स्थूल / गणितीय भर नहीं है. अब जो साल बीतता है, वह अपने आप में दशक भर समेटे होता है. दशक भर में पहले जो उर्जा हम नष्ट करते थे, जो उर्जा हम उपभोग करते थे, अब वह साल भर में करने लगे हैं… अचानक जैसे कोई शरीर फुल स्पीड में दौड़ने लगे और हांफते हुए धड़ाधड़ उर्जा बर्न करने लगे…

जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं उसमें सोचने समझने नीति बनाने का काम बस चंद मुट्ठी भर लोगों के हाथ है और बकिया जनता बस दौड़ने-हांफने, अपने पेट के वास्ते जीने और और निहित स्वार्थ के इर्द गिर्द सोचने-समझने के लिए बाध्य है. यह एक किस्म की गुलामी ही है लेकिन मजेदार यह कि इस गुलामी के शिकार खुद को गुलाम मानने को तैयार नहीं होते.

ये जो दिन-रात गुजर रहे हैं, बड़े कीमती हैं. एक दिन-रात कोई चौबीस घंटे की चीज भर नहीं.. थोड़ा स्लो मोशन में महसूस करिए तो इसमें पूरा महीने छह महीने निहित हैं… कुछ वैसे ही जैसे स्पेस में पहुंचे आदमी के दिन रात महीने अलग होते हैं और हम धरती वालों के अलग… लेकिन हम धरती वालों ने अपनी स्पीड जो तय कर दी है, खुद को टाप गीयर में जो डाल दिया है, इसका नतीजा है कि समय तेजी से गुजर रहा है लेकिन असल में वह तेजी अपने पीछे कई कई सालों की शांति-उर्जा को फूंक रहा है.

जैजै

@स्वामी भड़ासानंद

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Praveen Jha  आपने जो बात लिखी है, उसके लिए साधुवाद। यह जनचेतना से ही संभव है। नॉर्वे ने ठान लिया है कि २०२५ से कारें बंद कर देंगी। ओस्लो में २०१९ से ही। २ साल ही बचे हैं, पर जनता में कोई विद्रोह नहीं। कई लोगों ने कार डंप भी कर दिए। बस से जाते हैं। मेरा छोटा शहर है, वहाँ कंपनियों ने गाड़ी की पार्किंग खत्म करनी शुरू कर दी। बस साइकल पार्किंग रहेगी। कोपेनहेगन में साइकल के ‘सुपर हाइ-वे’ बन रहे हैं। फ्लाईओवर जिस पर बस साइकल जाएँगीं। गाड़ी पर टैक्स हर साल बढ़ रहा है। पर यह तभी संभव हुआ जब हर व्यक्ति साइकल चालक है, पहाड़ पर साइकल दौड़ा देते हैं। महिला-पुरूष सब। यह सरकार के बस का नहीं, यह जनचेतना से ही संभव है।

Ashok Anurag यशवंत जी, 60, 70, 80 के दशक तक तरक़्क़ी की रफ़्तार तो थी लेकिन एक सामान्य गति में 90 के दशक में जो तेज़ी आई है, वो तरक़्क़ी और विनाश साथ लाई है, आपके विचारों से सहमत हूँ

Arvind Kumar Singh जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं। वाह!

Harish Pant बन्धु ! अब सिर्फ पृथ्वी को बचाने की सोच को विस्तृत आयाम देने की बात कही जाए?

Ghanshyam Dubey आज सही और यथार्थ के फुलफार्म मे विचारों की गाड़ी दौड़ी है । खैर – विचार हैं तो विचार ही ! निर्विचार मन की स्थिति चाहिए आगे कुछ और देखने के लिए …!

Rajesh Somani First time realised that yaswant Singh sir name have different different meaning

Kashi Prasad Yadav Jaswant bhai..sach likh diya hai aapne..jara shaant man se sochne bhar se hi cheezein saaf saaf nazar aane lagtu hain…badhai..

Yogesh Bhatt स्वामी जी.. दिशा व दशा भी बदलिए उन सबकी जिनके लिए लिखते हैं …

राजीव चन्देल Very perfect analysis about life and nature.

Yashwant Singh Bhandari कल लगता है अकेलेपन और गहरी सोच लिए निकले थे रोड में,

Aryan Kothiyal प्रकृति स्वयं सब ठीक करेगी।

Braj Bhushan Dubey यथार्थ से आच्छादित पक्ष।

Puneet Sahai सच को निकट दृष्टि से देख ही लिया आपने

लोकेश सलारपुरी खबरनवीस अगर फिलॉस्फर भी हो तो ये ही हाल होता है

Naresh Sadhak क्या क्या न सहे हम विकास के नाम पर , जाने कहाँ आ गये हम ,चलते चलते ! घडी भर तू कर ले आराम जाना है कहाँ , यहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जाना है कहाँ!

Shwetank Ratnamber JAI BHOKAL …. JAI BADHAS …. AAJ SE YAHI JAIKARA…. BHADAS BHADAS YAR TUMHARA….. NIKALIYE NISHULK BHADAS PAIYE ACHHI SEHAT BINDAS

Ashok Thapliyal Shaandaar future study aapki… Shayad cheekh bhi shoony, Maun bhi shoony hota Jaa Raha hai…… Sampoorn Jagat mein sabsay taakatwar….. prakriti aur shabd…Lekin, abki baar pralay Kay Baad Manu & shradhha sambhav hai Aisa kuch kahain sabhyataoon Kay malbay Kay beech say nikalkar…… +++kuchh to bachana thaa, Laava ugal Kay kya Kiya hamnay…!!!!!

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भड़ास संपादक की ताजा पोस्ट : रिपब्लिक टीवी वाले कटहे कुक्कुर की तरह गैर-भाजपाई नेताओं के पीछे भों-भों करते भाग रहे

Yashwant Singh : भाजपा वित्त पोषित रिपब्लिक टीवी वाले कटहे कुक्कुर की तरह गैर-भाजपाई नेताओं के पीछे भों भों करते टहल रहे हैं. मेरा उपरोक्त वाक्य यह बताने के लिए काफी है कि मीडिया यानि चौथा खंभा आजकल सियासी आधार पर बंट गया है. भाजपाई मीडिया, कांग्रेसी मीडिया, मुस्लिम परस्त मीडिया, हिंदूवादी मीडिया. इन सभी का एक ही मकसद, सबसे बड़ा बाजारू यानि कारपोरेट मीडिया बनना.

अरनब गोस्वामी ने लगता है अपने राजनीतिक साहब लोगों के हितों का ध्यान रखते गैर-भाजपाई नेताओं को नंगा करने का अभियान चला दिया है. लालू यादव दूध के धुले नहीं हैं और न चिदंबरम के पाप कम हैं. लेकन आपका कैमरा और R लिखा डंडा पकड़े आपका रिपोर्टर कभी अमित शाह के पीछे पीछे क्यों नहीं कठिन कठोर सवालों को लेकर भागता है.

उसे नरेंद्र मोदी के पीछे क्यों नहीं देखा जाता जब वह किसी प्रोग्राम या मीटिंग से निकल कर बाहर आते हैं.

क्यों नहीं तब अरनब का आदमी तमंचा की तरह माईक आईडी थामे और तोप की तरह कैमरा उठाए मोदी के पीछे चिल्लाते सवाल पूछते भागता है कि हे हे मोदी जी, जरा बताइए कि आपकी डिग्री का सच कब सामने आएगा, क्या वाकई इतना पढ़े हैं, जितना दावा किए हैं या सब जुमला ही था.

मोदी सर सर, प्लीज वन क्वेश्चन, आपका स्टेटस क्या है जशोदा बेन से रिश्ते को लेकर. क्या तलाक हो गया है, क्या अलग अलग हैं, क्या उन्हें आप अपनी पत्नी मानते हैं, क्या जशोदा बेन के जो सवाल हैं, उनके जवाब उन्हें देंगे आप….

माननीय मोदी जी प्लीज एक सवाल… आपने विकास और रोजगार का वादा किया था यहां तो भयंकर रूप से उद्योग धंधे चौपट हो गए और बेरोजगारी चरम पर है… किसान का दुख कम करने का जो वादा था, वह यह उलटा रूप ले चुका है कि किसान सुसाइड अब महाराष्ट्र या विदर्भ का मसला नहीं रह गया है बल्कि यह पूरे देश में आग की तरह फैल गया है, कब आखिर अडानी अंबानी की तरह किसानों के अच्छे दिन आएंगे… कब किसान खुद को लाश में तब्दील होने से रोक सकेंगे…

मोदी जी क्या बताएंगे कि देश के जेनुइन सवालों को टालने के लिए ही कहीं आप लोग बार बार हिंदू गाय गोबर राष्ट्र सेना पाकिस्तान मुसलमान ट्रपिल तलाक आदि के मुद्दे तो नहीं उठाते ताकि जनता इसी में उलझी रहे और चैनल वाले इन्हीं हवाई मामलों पर दिन रात बहस चलाकर जनता के दिमाग में जहर भरते रहें… आखिर आपने अभी तक धारा 370 खत्म क्यों नहीं किया, राम मंदिर क्यों नहीं बनवा दिया और पाकिस्तान पर हमला बोलकर उसका नामोनिशान क्यों नहीं खत्म कर दिया…

यकीन मानिए, ये सवाल रिपब्लिक टीवी वाले नहीं पूछेंगे… क्योंकि रिपब्लिक टीवी में पैसा जो भाजपा पोषित लोगों का लगा है… साहब के हित को साधने के लिए इन दिनों रिपब्लिक टीवी और अरनब गोस्वामी के लोग किसी गली छाप गुंडे की तरह मोदी विरोधी नेताओं से मुश्किल से मुश्किल सवाल पूछ कर उन्हें उकसा रहे हैं ताकि वे गाली दें, मारें और वो फिर दिखाएं कि ये देखो, मीडिया पर हमला हो गया है जी… आप लालू और चिदंबरम के कुकर्म खूब दिखाओ, लेकिन मोदी और शाह को क्यों बख्शे हैं जी… इसी को कहते हैं सुपारी पत्रकारिता, इसी को कहते हैं पेड पत्रकारिता, इसी को कहते हैं मीडिया का माफियावाद… इसी को कहते हैं सत्ता के चरणों में पोषित पत्रकारिता…

शेम शेम अरनब गोस्वामी…

शेम शेम रिपब्लिक टीवी….

मोदी, शाह और भाजपा का लठैत बनकर सुपारी पत्रकारिता करना बंद करो…

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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भड़ास के यशवंत “जनक सम्मान” से 10 जून को लखनऊ में होंगे सम्मानित

लोकमत सम्मान 2017 : विजेताओं पर ज्यूरी बैठक सम्पन्न

लखनऊ। हिंदी दैनिक लोकमत के स्थापना दिवस पर प्रति वर्ष आयोजित होने वाले लोकमत सम्मान हेतु विजेताओं के नामों का चयन कर लिया गया है। रविवार 4 जून को आयोजित ज्यूरी की बैठक में जनरल आरपी साही (ए.वी.एस.एम.), पद्मश्री डॉ॰ मंसूर हसन, पद्मश्री परवीन तलहा, रैमेन मैग्सेसे पुरस्कृत संदीप पांडेय, पूर्व आईएएस एसपी सिंह,  श्री सीवी सिंह और श्री पवन सिंह चौहान ने देश भर से आए हज़ारों नामों में से चयनित हर श्रेणी में 5-5 नामों में से एक-एक नाम का चयन किया।

इन सभी विजेताओं को आगामी 10 जून को लखनऊ में आयोजित हो रहे लोकमत सम्मान समारोह में सम्मानित किया जाएगा। श्रेणी पुरस्कारों के अलावा ज्यूरी पुरस्कारों की घोषणा भी की गयी गयी है जिसमें भड़ास फ़ॉर मीडिया डॉट कॉम के यशवंत सिंह “जनक सम्मान” से, आरटीआई कार्यकर्ता सिद्धार्थ नारायण “शक्ति सम्मान” से और वरिष्ठ अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी “अभिव्यक्ति सम्मान” से सम्मानित किए जायेंगे।

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यशवंत की कुछ एफबी पोस्ट्स : चींटी-केंचुआ युद्ध, दक्षिण का पंथ, मार्क्स का बर्थडे और उदय प्रकाश से पहली मुलाकात

Yashwant Singh : आज मैं और Pratyush Pushkar जी दिल्ली के हौज खास विलेज इलाके में स्थित डिअर पार्क में यूं ही दोपहर के वक्त टहल रहे थे. बाद में एक बेंच पर बैठकर सुस्ताते हुए आपस में प्रकृति अध्यात्म ब्रह्मांड आदि की बातें कर रहे थे. तभी नीचे अपने पैर के पास देखा तो एक बिल में से निकल रहे केंचुए को चींटियों ने दौड़ा दौड़ा कर काटना शुरू किया और केंचुआ दर्द के मारे बिलबिलाता हुआ लगा.

मैंने फौरन मोबाइल कैमरा आन किया और पूरे युद्ध को रिकार्ड करना शुरू किया. क्या ऐसा लगता नहीं कि ये जो नेचर है, प्रकृति है इसने हर तरफ हर वक्त प्रेम के साथ साथ युद्ध भी थोप रखा है, या यूं कहिए प्रेम के साथ-साथ युद्ध को भी सृजित कर रखा है. हर कोई एक दूसरे का शिकार है, भोजन है. डिअर पार्क की झील के बारे में प्रत्यूष पुष्कर बता रहे थे कि जो पंछी मर झील में गिरते हैं उन्हें मछलियां खाती हैं और जब मछलियां मर कर सतह पर आती हैं तो ये पंछी खा जाते हैं. ये अजीब है न दुनिया. जितना समझना शुरू कीजिए, उतना ही अज्ञान बढ़ता जाएगा. इस नेचर के नेचर में क्या डामिनेट करता है, प्रेम या युद्ध? मेरे खयाल से दोनों अलग नहीं है. इनमें अदभुत एकता है. केंचुआ-चींटी युद्ध का वीडियो देखें :

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क्या यशवंत दक्षिणपंथी हो गया है? ये सवाल करते हुए एक मेरे प्यारे मित्र मेरे पास आए. उनने सवाल करने से पहले ही बोल दिया कि पूरा रिकार्ड करूंगा. मैंने कहा- ”मेरे पास और क्या है जनपक्षधर जीवन के सिवा.” उनकी पूरी बातचीत इस इंटरव्यू में देख सकते हैं. देखें वीडियो :

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महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा. हालांकि यह जानता हूं कि आजकल विचारधाराएं नहीं बल्कि तकनालजी दुनिया को बदलने का काम कर रही है, फिर भी मार्क्स ने जो हाशिए पर पड़े आदमी की तरफ खड़ा होकर संपूर्ण चिंतन, उपक्रम संचालित करने की जो दृष्टि दी वह अदभुत है.

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You might be surprised to know that a spot on the surface of the Earth is moving at 1675 km/h or 465 meters/second. That’s 1,040 miles/hour. Just think, for every second, you’re moving almost half a kilometer through space, and you don’t even feel it.

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भड़ास4मीडिया इसी 17 मई को 9 साल का हो जाएगा. 17 मई 2008 को यह डोमेन नेम बुक हुआ था. जिस तरह पशु प्राणियों वनस्पतियों मनुष्यों आदि की एक एवरेज उम्र होती है, उसी तरह की उम्र वेबसाइटों-ब्लागों अचेतन चीजों की भी होती है, खासतौर पर उन उपक्रमों का जो वनमैन आर्मी के बतौर संचालित होते हैं, किसी मिशन-जुनून से संचालित किए जाते हैं. भड़ास के इस नौवें जन्मदिन पर कब और कैसा प्रोग्राम किया जाएगा, यह तय तो अभी नहीं किया है लेकिन कार्यक्रम होगा, ये तय है. मीडिया के कुछ उन साथियों को भी सम्मानित करना है जो लीक से हटकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने साहस का परिचय देते हुए प्रबंधन को चुनौती दी, कंटेंट के लिए काम किया, सरोकार को जिंदा रखा. आप लोग भी इस काम के लिए उचित नाम सजेस्ट करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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आजकल उन कुछ लोगों से मिल रहा हूँ जिनसे रूबरू बैठने बतियाने की हसरत ज़माने से थी। जिनको पढ़ पढ़ के बड़ा हुआ, जिनको हीरो की तरह प्रेम किया, उनसे आज दोपहर से मुखातिब होने का मौका मिला है।

इन्हें शानदार कवि कहूं या अदभुत कथाकार-उपन्यासकार या ग़ज़ब इंसान। इन्हें भारत का नाम विदेशों में रोशन करने वाला अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व कहूं। वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ तब पढ़ा था मैंने जब फुल कामरेड हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुवेशन करने के बाद जब बीएचयू बतौर होलटाइमर कामरेड के रूप में पहुंचा तो Uday Prakash जी की लिखी पहली कहानी पढ़ने के बाद उनकी कई कहानियां-रचनाएं पढ़ गया, फिर खोजता पढ़ता ही गया। ये लिविंग लीजेंड हैं, भारतीय साहित्य जगत के। इनसे मिलवाने के माध्यम बने पत्रकार भाई Satyendra PS जी। चीयर्स 🙂 (photo credit : भाभी कुमकुम सिंह जी)

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आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे का गाजीपुर में जो सम्मान समारोह आयोजित किया गया, उसमें सबसे मजेदार पार्ट था ट्वंटी ट्वंटी के अंदाज में फटाफट सवाल जवाब. कई सवालों पर उन्हें नो कमेंट कहना पड़ा. उस आयोजन की पूरी रिपोर्ट कई वेबसाइटों, अखबारों, चैनलों पर आई लेकिन अभी तक भड़ास पर कुछ भी अपलोड नहीं किया गया. जल्द ही पूरी रिपोर्ट भड़ास पर आएगी और यह भी बताया जाएगा कि आखिर भड़ास ने इस आईपीएस को सम्मानित करने का फैसला क्यों किया. फिलहाल यह वीडियो देखें. शायद कुछ जवाब आपको मिल जाए. वीडियो में खास बात यह है कि आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे पूरी ईमानदारी से बेलौस सब कुछ बता गए. इस दौरान कुछ यूं लगे जैसे यह शख्स हमारे आपके बीच का ही है. उनकी खासियत भी यही है. वह सबसे पहले आम जन के अधिकारी हैं. इसी कारण उन्हें खुद के लिए उर्जा आम जन के लिए काम करने से मिलती है. आगे और भी वीडियो अपलोड किए जाएंगे. फिलहाल इसे देखें…

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ट्रेवल ब्लॉगर Yashwant Singh Bhandari पर दिल्ली पुलिस के जवानों ने बोला धावा। लाल किले की बाहर से तस्वीर ले रहे थे। एक डॉक्यूमेंट्री के लिए दूर से खड़े होकर लाल किले के आउटर साइड को शूट कर रहे थे। जवानों ने धावा बोलकर न सिर्फ पीटा बल्कि पैसे भी छीन लिए। जब उन्होंने मुझे कॉल किया मदद के लिए तो मैंने 100 नंबर डायल करने की सलाह दी। इस बीच पुलिस वाले भड़क गए और भंडारी की पिटाई करने लगे। किसी तरह वो जान बचाकर भागे। पर्यटन को ऐसे ही बढ़ावा देगी राजनाथ की दिल्ली पुलिस! हम सभी को इस घटना की निंदा करनी चाहिए और दोषी पुलिसवालों को बर्खास्त करने की मांग रखनी चाहिए।

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मोदी जी लग रहा है नाक कटवा देंगे. भक्त बेहद निराश हैं. मोदी जी में अचानक मनमोहन सिंह नजर आने लगे हैं जो न कुछ करता है न बोलता है. इतना कुछ देश विरोधी हो रहा है. कैंची की तरह चलने वाली जुबानें खामोश हैं. पाकिस्तान से लेकर नक्सलवाद तक, कश्मीर से लेकर महंगाई तक, सब कुछ भयंकर उठान पर है. लोग तो कहने लगे हैं कि जब देश चाय वाले के हवाले कर देंगे तो यही सब होगा. कुछ कर डालिए मोदी जी, आपसे भक्तों की पुकार आह्वान सुन सुन कर मेरी भुजाएं फड़कने लगी हैं. अब ऐसे में कैसे चुप रह सकते हैं. जरूर आप कोई नई योजना बना रहे होंगे. न भी बना रहे होंगे तो चैनल वाले अपने तीसरे आंख से योजना की भनक लगा लेंगे और आपके इंप्लीमेंट करने से पहले ही ‘दुश्मनों’ को मारे काटे गिराते जाते हुए दिखा देंगे और भक्त समेत पूरा देश एक बार फिर मोदीजीकीजैजै करने लगेगा… आंय.. मुझे कुछ आवाजें धांय धूंय धड़ाम की सुनाई पड़ने लगी हैं, वाया रजत शर्मा के इंडिया टीवी… कई अन्य चैनलों के एंकर भी तोप और राइफल तानने लगे हैं अपने अपने स्टूडियो में… आप आनंद से सोइए, मीडिया वाले आपका काम कर ही डालेंगे… आइए हम सब बोलें भामाकीजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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रवीश कुमार की भड़ास से क्यों फटती है?

रवीश कुमार की भड़ास से क्यों फटती है? इसलिए फटती है क्योंकि उसके मालिक प्रणय राय की काली करतूत को भड़ास गाहे बगाहे खोलता रहता है. उसके मालिक के प्रगतिशील खोल में छिपे भ्रष्टाचारी चेहरे को नंगा करता रहता है. जाहिर है, रवीश कुमार भी नौकर है. सो, वह खुद के मीडिया हाउस की पोल खोलने वाली वेबसाइट का जिक्र भला कैसे कर सकता है. दूसरे मीडिया हाउसों पर उंगली उठाने वाले और उन्हें पानी पी-पी कर गरियाने  वाले रवीश कुमार की हिप्पोक्रेसी की हकीकत यही है कि वह करप्शन में आकंठ डूबे अपने मीडिया समूह एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी पर कुछ नहीं बोल सकता.

यही नहीं, एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी का पर्दाफाश करने वालों तक का आन स्क्रीन नाम भी नहीं ले सकता. वह अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की बेबाकी का खूब वर्णन करेगा लेकिन भारत के वे पत्रकार कतई नहीं दिखेंगे जो एनडीटीवी की नंगई व करप्शन की कहानी का पर्दाफाश करते रहते हैं. रवीश कुमार चाहे जितना आजाद खयाल और बेबाक पत्रकार बने लेकिन सच यही है कि वह एक अव्वल दर्जे का हिप्पोक्रेट है और उसे एड़ा बनकर पेड़ा खाने की रणनीति इंप्लीमेंट करने की शैली अच्छी तरह से आती है. वह खुद को भाजपाइयों से पीड़ित बता बताकर गैर-भाजपाइयों की निगाह में खुदा बनने की लंबे समय से कोशिश करने लगा है, और बनने भी लगा है.

अंधों के बीच काना राजा बना रवीश कुमार यह कभी नहीं बताएगा कि किस तरह प्रणय राय और चिदंबरम ने मिलकर एक साहसी आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को इसलिए जबरन पागल घोषित कराकर पागलखाने में डलवाया क्योंकि उसने प्रणय राय-चिदंबरम की ब्लैकमनी की लंबी कहानी पर काम किया और ढेर सारे तथ्य इकट्ठा कर एनडीटीवी को नोटिस भेजने की जुर्रत की. इस पूरे घटनाक्रम को भड़ास ने प्रमुखता से और लगातार छापा. यही वजह है कि कल

प्रेस फ्रीडम डे पर प्राइम टाइम के दौरान रवीश कुमार ने मीडिया को एक बीट मानकर इससे संबंधित खबरें छापने बताने वाली कई वेबसाइटों का जिक्र किया और उनके संचालकों का बयान दिखाया लेकिन वह भड़ास का नाम जान बूझकर गटक गया क्योंकि अगर वह भड़ास का नाम ले लेता तो प्रणय राय उसकी नौकरी ले लेता. यह सबको पता हो गया है कि किस तरह खांग्रेसी सरकार के कार्यकाल में प्रगतिशील माने जाने वाले मीडिया मालिक प्रणय राय ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर 2जी स्कैम के धन को ठिकाने लगाने के लिए दुनिया भर में चैनल खोल डाले और इस तरह काले धन को ह्वाइट करके भारत लाने में कामयाब हो पाए. 

कल प्राइम टाइम में रवीश कुमार मीडिया की आजादी पर लेक्चर पेल रहा था, ढेर सारे पत्रकारों का वक्तव्य सुना रहा था,  कई दोयम किस्म की छायावादी मीडिया वेबसाइटों का उल्लेख करते हुए उनके संचालकों का बयान दिखा रहा था तो बिलकुल साफ साफ भड़ास4मीडिया डॉट कॉम का उल्लेख छुपा गया. हां, उसने अपने खास चिंटू विनीत कुमार का बार-बार बयान-भाषण-लेक्चर सुनवाया जो दूसरे मीडिया हाउसों को गरियाने के बहाने जनता को भी उपदेश दे रहा था. ये वही चिंटू विनीत कुमार है जो हर वक्त रवीश कुमार की जय जय करते हुए लेख फोटो सोशल मीडिया पर लिखता छापता रहता है. तू मुझे पंत कह, मैं तुझे निराला के अंदाज में रवीश कुमार अपने उन खास लोगों को ही प्राइम टाइम में आने को एलाउ करता है जिसके बारे में उसे पता है कि वह उनके चेले हैं और चेले बने रहेंगे, साथ ही गाहे बगाहे रवीशकुमारकीजैजै करते हुए लेख आदि लिखा करेंगे.

हां, खुद को निष्कच्छ दिखाने को एक किसी भाजपाई या संघी का बयान भी दिखा देता है ताकि उस पर उंगली न उठ सके. रवीश कुमार असल में हमारे दौर के न्यूज चैलनों की पत्रकारिता का एक ऐसा आदर्श तलछट है जिसे नौकरी और सरोकार के बीच झूलते रहते हुए खुद को महान दिखाने बताने में महारत हासिल है. अगर सच में रवीश कुमार के भीतर एक सच्चा और सरोकारी पत्रकार है तो वह जरूर एनडीटीवी ग्रुप की ब्लैकमनी की कहानी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम के दौरान दिखाएगा और अगर प्रणय राय राधिका राय आदि मना करता है तो इस्तीफा उनके मुंह पर मार कर आजाद पत्रकारिता करते हुए बाकी पत्रकारों के लिए राह प्रशस्त करेगा. मगर पता है ऐसा वह नहीं करेगा क्योंकि उसे लाखों रुपये महीने चाहिए जो फिलहाल तो सिर्फ एनडीटीवी दे सकता है इसलिए उसे एनडीटीवी और इसके मालिकों के तलवे चाटते हुए, इन्हें बचाते हुए ही शेष क्रांतिकारी पत्रकारिता करनी है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Ghanshyam Dubey यशवन्त आप गलत है। इस समय लगता है की आप पर कोई “सवारी” आ गयी है। अकेले रवीश ही बचे हैं, पत्रकारिता के घुप अंधेरे मे टिमटिमाती रोशनी बन कर। यदि यह भी या इस जैसी कुछ ही और तो सब खत। हो जायेगा! पूरी ईमानदारी से किसी एक मीडिया (इलेक्ट्रानिक) समूह वह भी हिन्दी का नाम बता दीजिये, जिसे आप के आदर्शों के रूप मे माँन लिया जाये। एक नौकरी करने वाले पूरे देश के चैनलों मे सिर्फ 6 नाम बता दीजिए, जिसे आदरह मानक मान लिया जाये। सार राष्ट्रीय चैनलों को तो देख ही रहे है की किस गिरावट और तलवाचाटू भंगिमा के हो गए हैं! उन्हें देख कर नया गधा हुआ शब्द ” प्रेस्टीटूट ” बहुत छोटा पड़ेगा। राजनैतिक खबरों मे भी और देश के सामान्य से सामान्य आदमी की रोज रोज की जिंदगी मे उतरने वाली पीड़ा, उसकी मार, कहां जाएं, किस्से कहैं की अंधे गलियारों मे एक बची खुची संकरी गली अब भी बची है रबीश और NDTV के जरिये। स्वीकार न करिये तो “गाली” तो कम से कम मत ही दीजिये। जरूर आप कि या आपके तथाकथित किसी अपने की कोई नस कहीं दे दब गयी सी लगती है! या आपके अहं को कहीं से किसी भी तरह का धक्का सा लगा है! किसी को भी किसी भी तरह के कदाचार पर पथर फेकने का अधिकार नहीं है, जो खुद नैतिक रूप से भी किसी भी तरह का कदाचारी न रहा हो या हो! आप पत्रिकारिता ही नहीं, जिंदगी की किताब के ही पढ़े लिखे आदमी हैं। फक्कड़ भी हैं और मुँहफट भी। लेकिन यह मुहफटई जरा कुछ जँची नहीं! चिंतन कीजियेगा। यह गुजारिश है, क्योंकि न मैं रबीश हूँ और न ही भड़ासी यशवन्त!!
Yashwant Singh जो भी बड़े न्यूज चैनल और बड़े अखबार हैं, उसमें से ज्यादातार, इनक्लूडिंग एनडीटीवी, सब के सब पैसे उगाहने, काला धन को ह्वाइट करने के अड्डे बन गए हैं. ये राजनीति की तरह ही हम लोगों को वैचारिक आधार पर बांट कर अपनी दर्शक संख्या बनाए बचाए हुए हैं. सारी बड़ी व सच्ची खबरें अब मोबाइल पर मिल जाया करती हैं. इन ब्लैकमेलरों के अड्डों पर बुलडोजर चलवा देना चाहिए जो न कानून मानते हैं न संविधान न कोर्ट. मजीठिया वेज बोर्ड का मामला आपके सामने है. एनडीटीवी पर रवीश का जो एक घंटा का प्रलाप चलता है, उससे बहुत अच्छा लोग सोशल मीडिया पर लिखते हैं और आप भी पढ़ते हैं. सवाल उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का होता है. एनडीटीवी समेत ज्यादातर चैलन वही दिन भर की रुटीन खबर दिखाते रहते हैं. आपको कोई एनडीटीवी का ऐसा स्टिंग साल दो साल का याद है जिसमें सत्ता प्रतिष्ठान का कई बड़ा करप्शन सामने लाया गया हो? केवल बकचोदी करते रहना ही अगर न्यूज चैनल होना है तो इन न्यूज चैनलों की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है.. एनडीटीवी ने किस तरह 2जी स्कैम में चिदंबरम से गठजोड़ किया, इस करप्शन को ढंकने के लिए एक आईआरएस अधिकारी को पागलखाने भिजवा दिया… इन कड़ियों को जब आप जोड़ेंगे और पढ़ेंगे तो आपको एनडीटीवी व रवीश कुमार से घृणा हो जाएगी भाई.

Kumar Narendra Singh Lekin jail men to aap gaye the, Raveesh nahin.

Yashwant Singh जो आजाद होकर सच लिखेगा, किसी का भी सच, तो उसे सब मिल कर मार डालने की कोशिश तो करते ही हैं. मेरी जेल यात्रा ने असल में भारतीय मीडिया की असहिष्णुता को ही प्रदर्शित करता है कि कैसे ये मीडिया हाउसेज लोकतंत्र की दिन रात बात करते रहते हैं लेकिन खुद अपने सेटअप में बेहद अलोकतांत्रिक और असहिष्णु होते हैं. इसी कारण ये अपनी आलोचना पर बेहद कटखौने हो जाते हैं और आलोचना करने वाले को निपटाने के लिए हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल करने लगते हैं.

Kumar Narendra Singh Aapki mansikta bhi koi alag nahin hai. Aap kya hain, mujhe mat bstaiye. Sabko pata hai ki aap kitne nishpakh hain.

Yashwant Singh आजकल आप किसके नौकर हैं कुमार नरेंद्र साहब? नौकर टाइप पत्रकार कब भला आजाद पत्रकारों को महान माने? और,कब भला उनकी आजादी-निष्पक्षता उन्हें रास आई? आप सही जा रहे हो गुरु… निकालो भड़ास… आप तो जानते ही हैं कि भड़ास पर हम लोग अपने खिलाफ भी छापते हैं. आप पूरी भड़ास निकालिए, मुझे भी गरियाए और मेल कर दीजिए bhadas4media@gmail.com पर. आपकी भड़ास को भड़ास पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा. हम लोगों को ये कतई मुगलता नहीं कि हम कोई महान पत्रकार हैं. हम लोग बस कथित महान पत्रकारों की महानता की सच्चाई की पड़ताल कर लेते हैं बस, और तब वैसे ही मिर्ची लगती है उनके चिंटूओं को जैसे आपको लगी. आपकी सोच समझ की सीमा बस इसी से सामने आ जाती है कि आप पत्रकार के जेल जाने को घटिया बात मानते हो. 🙂 लगे रहिए बंधु…

Vishnu Gupt प्रणव रॉय टूटपूंजियां पत्रकार से कैसे बना एनडीटीवी मीडिया उद्योग का मालिक? ये लिंक पढ़िए.. https://www.bhadas4media.com/tv/11178-pranav-roy-katha

Singhasan Chauhan Yashwant Singh बिल्कुल यही होता है यसवंत जी जो सच्चाई को सामने लाना चाहता है उसके किसी गलत इल्जाम में फंसा दिया जाता है जैसे की मेरे साथ हुआ मैंने SDM की शिकायत की तो मेरे पिताजी के नाम से जुरमाना का नोटिस भेज दिया जिसे bhadas4media पर आपने छापा भी था|

Kumar Narendra Singh Aap koi patrakarita ki raksha ke liye jail nahin gaye the. Waise abhi kisi ka naukar nahinn hun…..jaroorat ho to bataiyega. Aapka kaise chalta hai. Aap apne ko mahan hi kahalwana chahte hain, varna mujhe naukar type kahne ka kya arth hai. Lagta hai, aap mere baare men kuchh nahin jante, tabhi to aap kah rahe hain humen aapki aazadi raas nahin aayee. Aapke post par yah meri pahli aur ekmatra tippani hai, jabki aap kafi varshon se aazad hain. Yadi aapki aazadi khalti, to bahut pahle tippani ki hoti. Bhasha bhi maryadit ho to behtar hai. Main bhi aapki tarah bhasha likh sakta hun. Main aapse yada rang men rahta hun….han, aapki tarah main apani prashashti gaan karne ka sadi nahin. Koi naukari ho to bataiye, gyan mat deejiye.

Yashwant Singh जिस दिन नौकरी ढूंढने का धंधा बंद कर देंगे, मनुष्य बन जाएंगे. बाकी आप वरिष्ठ हैं. मैं न नौकरी काफी बरसों से ढूंढता हूं न इस काम में मदद देता हूं. कोशिश करिए नई तकनीक को समझने की, वेब ब्लाग यूट्यूब से अच्छा पैसा कमाया जा सकता है. सीखना चाहें तो आपको फ्री में सिखा सकता हूं ताकि आप भी आजाद पत्रकार के रूप में जीने का लुत्फ उठा सकें.

Sanjaya Kumar Singh आपकी बात सही है। सहमत भी हो सकता हूं। पर मुद्दा यह है कि ऐसा करके एनडीटीवी से अलग होना या प्राइमटाइम की धार या स्वतंत्रता कम करना कोई अक्लमंदी नहीं होगी। कार्यक्रम चलता रहे और चलाने का मौका मिलता रहे तो बहुत कुछ किया जा सकता है। आप जो कह रहे हैं वह करके वीरता पुरस्कार के अलावा कुछ मिलने वाला नहीं है (हालांकि उसपर भी शक है)। और कितने ही वीरता पुरस्कार प्राप्त लोग कुछ कर नहीं पा रहे हैं। रवीश जो कर रहे हैं वह बेमिसाल है। रही बात एनडीटीवी के भ्रष्टाचार की तो – पूरी भाजपा उसे क्यों बख्श दे रही है? याद है बाबा रामदेव सलवार कमीज पहनकर भागे थे कि बचे रहेंगे तभी कुछ काम कर पाएंगे और अब हम लोगों के प्रधानसेवक को राष्टऋषि बना दे रहे हैं।

Yashwant Singh आप तो भड़ास के प्रोग्राम में आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को सुने थे. वहां मौजूद लोगों के रोंगटे खड़े हो गए थे. बाकी, मैंने कहा न कि अंधों में काना राजा. ऐसे मीडिया हाउसेज को बंद हो जाना चाहिए जो प्रगतिशीलता-सरोकार की आड़ में ब्लैकमनी को ह्वाइट करते कराते हैं. अगर एक घंटे का लेक्चर पेलना ही पत्रकारिता है तो रवीश कुमार को इस्तीफा देकर अपना यूट्यूब चैनल खोल लेना चाहिए ताकि वह वहां एनडीटीवी की भी असलियत बता सकें, ताकि उनकी निष्कच्छ आत्मा और सरोकारी समझ उन्हें अपराधग्रोस्त न कर सके. फिलहाल तो ऐड़ा बनकर पेड़ा खाने का एनडीटीवी – रवीश कुमार का अंदाज बढ़िया है जी 🙂

Divakar Singh एक मुद्दे पर गलती की है तो आलोचना होनी चाहिए। बाकी जगह अच्छा काम किया है तो ताली बजनी चाहिए। व्यक्ति या संस्थान विशेष के प्रति आसक्ति ठीक नही है।

Sandeep Verma भाजपा कहाँ बख्श रही है. उसकी विश्वनीयता खत्म करने के लिए भड़ास जैसे साधनों का उपयोग कर तो रही है.

Yashwant Singh सही पकड़े हैं 🙂 वैसे, जिनका चश्मा सिर्फ वाम या दक्षिण का या दलित या सवर्ण का बना हो वो इससे परे कोई विश्लेषण कर भी नहीं सकते…

Swami Nandan सौ आने सही यह रंगा सियार है अपने आप को ऐसा शो करता है जैसे इससे बड़ा ज्ञानी और साफ सुथरा कोई हइए नही है । साबधान यह देश मे एक ऐसी विचाधारा का बीज बो रहा है जो आई एस आई एस से भी ज्यादा खतरनाक है

सुभाष सिंह सुमन ये वही विनीत कुमार हैं क्या भैया जो रवीश की तर्ज पर लप्रेक जैसा कोई किताब लिखे हैं। गजब की गिरोहबाजी है भैया।

Yashwant Singh बिलकुल वही है वही है वही है 🙂 यह पूरा वाला चिंटू है रवीश का.

Prafulla Nayak शब्द शब्द नंगा करते।

Divakar Singh सबसे लोकप्रिय मीडिया न्यूज़ पोर्टल के बारे में न दिखाकर रवीश ने एक बार फिर अपने आप को हिप्पोक्रेट साबित कर दिया।

Prakash Govind क्या उलजलूल चण्डूखाने की उड़ा रहे हैं? लगता है भक्तों से अब फटने लगी है, इसीलिए उन्हें खुश करने को कचरा फैला दिया। सूरज पे मत थूकिए, खुद पे ही गिरेगा..

Yashwant Singh सूरज बाबा, सॉरी रवीश कुमार की जय 🙂 बस खुश

Prakash Govind पत्रकारिता जगत में एक मात्र बन्दा कुछ कायदे की बात करता है,,, वो भी आपको सहन नहीं हो रहा

Yashwant Singh रवीश के पक्ष में भड़ास पर जितना छपा है, उतना कहीं नहीं छपा होगा, पिछले आठ साल में. तो क्या, उनकी बुराई न छपी जाए, अगर बुराई है तो? मुझे भक्त टाइप आत्माएं अच्छी नहीं लगतीं जो या तो अंध समर्थन करती हैं या अंध विरोध. डेमोक्रेटिक होकर जीना चाहिए. उनकी अच्छाई को सलाम है, बुराई को शेम शेम है.

Pawas Sinha #SurajBaba kitne journalist ko jante ho jo Ravish ko certificate de rahe ho thora apne kholi se bahar niklo tb pata chalega duniya mein kyaa chal raha hain..

S.K. Misra जलन की दुर्गंध आ रही है,

Yashwant Singh जलन बहुत ही मानवीय स्वभाव है. अगर है तो इसको प्रकट कर देना चाहिए ताकि इसकी दुर्गंध दूर दूर तक जावे…:)

Pawas Sinha Ravish kumar ke chelo kabhi ravish se ye bataya ki uska bhai bihar se Congress ke ticket se election ladd chuka hain ek aam aadmi ko kaise mila congress se ticket na hiee wo chota sa neta thaa direct MLA ka ticket aurr usii ke bhai red light area ka owner bhii nikal aurr rahi baat NDTV kr owner ki baat to google bata dega wo kitne jada scams mein raha hain aurr kis political family se hain.. Chalo Baccho ab class khatam jaoo NDTV dekho..

Vinay Oswal यशवंत भाई, मैं भी जब से मेरी जानकारी में एनडीटीवी के प्रणव राय और चिदंबरम के बेटे का मामला आया है, रवीश के बारे में बहुत कुछ सोचता रहा हूँ। फिर सोंचता हूँ कि कुछ तो आधार चाहिए जीवनयापन का। पर ये संगती गले नहीं उतरती।

Dhirendra Giri एक समय मै भी उनको बहुत मानता था। यथार्त यही है वामपंथी और संघ विरोधी लोगो ने उसे फेसबुक पर प्रमोट किया है और ज्यादा, like ,कमेंट और अटेंशन चाहने वाले फेसबुकिया लेखकों और विचारकों ने इस हवा में बहकर उसको सर पर बिठा दिया। गांव गलियों और मुहल्लों में वह आज भी कोई कद नही रखता। यह फेसबुक के नशेड़ियों के बिच ही क्रन्तिकारी है।

Sandeep Verma टू जी घोटाले का लाखो करोड़ वापस लाने वाले अपनी बोलती बंद किये है . कम से कम नोटबंदी पर कितना नोट वापस आया यह तो बता देते . मगर यह प्रश्न तो पत्रकारिता से सम्बन्ध रखता ही नहीं है

Yashwant Singh कुछ काम आप भी कर लीजिए क्योंकि पत्रकार हर शख्स होता है. क्या आपको एनडीटीवी का माइक आईडी चाहिए पत्रकार बनने के लिए? संदीप भाई, सवालात्मक आत्मा लिए आप भटकिए, आपका अंदाज मुझे अच्छा लगता है. 🙂

Sandeep Verma मुझे जीटीवी का माईक बनने में ज्यादा रूचि है . उधर की पोल खोलने का ईरादा है

Yashwant Singh यही तो बात है. जी टीवी और एनडीटीवी जैसे चिरकुट संस्थानों से मुक्त रहिए, जो विचारधारा यानि वाम दक्षिण के जरिए खुद तो दबा कर पैसे कमा रहे हैं और हम आप इधर या उधर खड़े होकर लड़ रहे हैं. ये बड़े बड़े घराने असल में अब उगाही और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं. पत्रकारिता बस इसलिए की जा रही है ताकि मीडिया का आवरण बना बचा रहे और वो इसका आनंद मजा लेते रहें.

Deepak Pandey भड़ास जैसा बेबाक कोई मीडिया हाउस नहीं।

Dhruv Rautela दमदार… बेदाग… आपको जरूरत क्या उसके प्राइम टाइम में जिक्र की दादा

Tarun Kumar Tarun खंड-खंड पाखंड का नाम है रवीश… नासमझों और पाखंडियों ने मान रखा है जिसे ईश! प्रणव, बरखा की दलाली जिसे दिखती नहीं है… राडिया का टेप जिसे क्राति गान लगता हो.. अपने भाई की दलाली यौनलीला पर जिसकी कलम खामोश हॊ… लालू जैसे लुटेरे परिवारवादी को जो सामाजिक न्याय का चेहरा मानता है… वगैरह वगैरह.. वह आज क्रांतिकारी पत्रकारिता का चेहरा है! वह विधवा विलापी व मनोरोगी पत्रकारिता के शिखर पुरूष बनने की जुगाड़ू राह पर हैं। एनजीओधर्मी और अभिव्यक्ति ब्रांड फर्जी प्रगतिशीलता उन्हे खूब पसंद कर रही है।

Manish Kumar यशवंत भाई प्राइम टाइम में रवीश जी ने आपका नाम नहीं लिया। भाईसाहब मीडिया की निष्पक्षता आप भी बता दो क्या है, कम से कम रवीश कुमार एक कौने में बैठे कुछ तो काम कर रहे हैं अब आप भी मोदी भक्तों को तरह उन्हें गरियाने लग गए। भाई इस मीडिया में कौन कितना दूध का धुला है ये लगभग सभी जानते हैं। कम से कम आप जैसे लोगों से ऐसी उम्मीद नहीं होती। आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव जी के साथ हम लोगों को संवेदनाएं हैं। अब अडानी अम्बानी की कंपनियों में लाखो लोग काम कर रहे हैं उनमें बहुत से ईमानदार भी होंगे तो क्या वो अडानी अम्बानी के दाग अपने ऊपर ले रहे हैं?

Yashwant Singh गरियाने का राइट केवल भक्तों के पास थोड़ी है है 🙂 रवीश के बारे में दर्जनों या सैकड़ों अच्छे लेख कमेंट भड़ास पर पिछले आठ सालों से हैं. लेकिन एक बार गरियाया तो रवीश भक्तों की सुलग गई? 🙂 थोड़ा डेमोक्रेटिक आप लोग भी हो जाइए और हर चीज को दिल पर मत लगाइए. मजा भी लिया करिए. 😀

Manish Kumar आपकी हर पोस्ट पढता आया हूँ भाई और व्हाट्सएप पर भी आपके मैसेज आते हैं आज तभी तो शॉक्ड हुआ कि आ आप इतने रॉक क्यों हुए जा रहे हैं, और रही बात मज़े की तो मेरा थोड़ा वॉल देख लीजिए वहां सारे मज़े लिखे हैं। 🙂 आपके हर कदम के लिए शुभकामनाएं

Gireesh Pandey ये रविश कुमार वही है ना जिसका भाई बिहार congress का ब्लात्कारी नेता है

Yashwant Singh वही है वही है वही है 🙂

Madan Tiwary वह जलनखोर भी है, नहीं चाहता है मीडिया के क्षेत्र में कोई निष्पक्ष, बेबाक बोलने वाले का नाम हो।

Ashok Anurag प्रणय रॉय ने एक डॉक्यूमेंट्री का मुझसे काम करवा कर मेरी मज़दूरी 25000/₹ नही दी, चोर है और इसकी रेड डॉट कंपनी के सभी स्टाफ जिसने काम लिया लेकिन मेरा पैसा नही दिया सभी कमीने कुत्ते हैं..

Manmohan Shrivastava पत्रकारिता की काली छाया है रविश। दोगला और गद्दार।

इन्हें भी पढ़ें और एनडीटीवी की हकीकत जानें….

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Goibibo Car Service Fail : दो घंटे तक नहीं आई कार, अब दे रहे रिफंड का लॉलीपाप

Yashwant Singh : पिछले कुछ समय में तकनीक ने लोगों का जीवन काफी आसान किया है. ब्ला ब्ला के जरिए कार शेयरिंग, ओयो के जरिए होटल, ओला-उबेर के जरिए रेंट पर कार आदि के विकल्प शुरू हुए. इनके एप्प इंस्टाल करिए स्मार्टफोन में और हो जाइए शुरू. गोइबिबो नामक कंपनी ने जो होटल दिलाने के लिए काम करती है, पिछले दिनों रेंट पर कार की सर्विस शुरू की. मैंने पिछले दिनों कार बुक किया. तय समय से करीब दो घंटे तक कार नहीं आई.

कार के ड्राइवर का पहले तो फोन स्विच आफ / नॉट रीचेबल बताता रहा. बाद में जब उसके मालिक से और फिर ड्राइवर से बात हुई तो पता चला कि कार तो अभी करीब चालीस किलोमीटर दूर है. यानि उसके आने में अभी दो घंटे की देर है. ऐसे में तुरंत दूसरी टैक्सी किया. फिलहाल गोइबिबो वाले रिफंड आदि के लालीपाप दे रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आप जब किसी के कीमती वक्त को इस तरह नष्ट करते हैं तो उसकी भरपाई सिर्फ रिफंड से नहीं हो सकती.

मुझे तो पहली ही कार बुकिंग के बाद समझ में आ गया कि गोइबिबो ने कार सर्विस में गलत पांव डाल दिया है, उनकी यह सेवा तो पूरी तरह फेल है. उन्हें सिर्फ होटल किराए पर उठाकर उससे मिलने वाली दलाली से काम चलाना चाहिए. पढ़िए वो चिट्ठी जो गोइबिबो वालों ने मुझे भेजी है….

Dear Yashwant,

Greetings from GoIbibo.com! This is in reference to your query related to a bad experience with the Car owner. Please accept our sincere apology for your experience with this Car owner, we strongly discourage this sort of a behavior. We feel sad for the inconvenience you had with the car owner today, we have advised the Car owner to not to conduct themselves in the same manner again. We take users feedback very seriously and the points that you had mentioned on your discussion with us have been passed to the department that will act on it.

Being a Car sharing platform that focuses on connecting Car owners with users this is the best we can do. As discussed on the phone call, we have initiated full refund against this booking, which will reflect in your paid account within 5-14 working days. Further, we also request you to rate the car owner on GoCars app and mention your experience, this will enable other users to judge the quality of service offered by car owner.

Please feel free to reply in case of any query. We are grateful for the pleasure of serving you and meeting your travel needs.

Regards,
Sujeet Kumar rai
GoCare Support
24×7 Customer Service Number: 09213025552 / 1-860-2-585858

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : ह्वाट्सएप 9999330099

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बाबा रामदेव द्वारा सेना को घटिया आंवला जूस सप्लाई करने की खबर को न्यूज चैनलों ने दबा दिया

पतंजलि और बाबा रामदेव के अरबों-खरबों के विज्ञापन तले दबे मीडिया हाउसेज ने एक बड़ी खबर को दबा दिया. भारतीय सेना ने बाबा रामदेव द्वारा सप्लाई किए जा रहे आंवला को घटिया पाया है और इसकी बिक्री पर फौरन रोक लगा दी है. यह खबर दो दिन पुरानी है लेकिन इस मुद्दे पर किसी न्यूज चैनल में कोई चीखमचिल्ली नहीं है. सब बड़े आराम से चूं चूं के मुरब्बा की तरह इस बड़ी खबर को पी गए और देश को बांटने वाले विषयों पर हो-हल्ला जारी रखे हुए हैं.

असल में बाबा रामदेव का पतंजलि ग्रुप आंवला जूस भारतीय सेना को सप्लाई करता है. भारतीय सेना कोई भी प्रोडक्ट अपने यहां आने पर उसका अपने लैब में परीक्षण करती है. इस परीक्षण में बाबा रामदेव का आंवला घटिया पाया गया. यानि जो पैरामीटर भारतीय सेना ने बनाए हैं, उस पर यह प्रोडक्ट खरा नहीं उतरा. इसके फौरन बाद सेना ने इस प्रोडेक्ट को न सिर्फ कैंटीन से हटवा दिया बल्कि आगे से ऐसे प्रोडक्ट्स को लाने पर पाबंदी लगा दी है.

ये तो रही मूल खबर. अब यहां से शुरू होती है मीडिया वालों के हरामीपने की खबर. दिन रात न्यूज चैनलों पर बाबा रामदेव और उनके प्रोडेक्टस का हरिकीर्तन चलता रहता है. जाहिर है सबकी जेबें इस विज्ञापन की रकम से भरी जा रही है. अरुण पुरी हो या रजत शर्मा, सुभाष चंद्रा हो या अवीक सरकार, मुकेश अंबानी के न्यूज चैनल हों या विनोद शर्मा का मीडिया हाउस, सब के सब रामदेव के नोटों के तले दबे हैं. सो इन्हें तो इस खबर को दबा ही देना था. लेकिन क्या इस खबर को एनडीटीवी पर भी नहीं दिखाया गया? बताया जा रहा है कि एनडीटीवी भी बाबाजी के रुपयों रुपी आशीर्वाद तले दबा है, सो प्रणय राय ने भी खबर पर आंख मूंद लेने का फरमान अपने यहां जारी कर दिया.

मतलब कि बाबा रामदेव के एक घटिया प्रोडक्ट ने भारतीय मीडिया के घटिया और घृणित चेहरे का भी पर्दाफाश कर दिया. अखबार हों या न्यूज चैनल, जबसे इनका कारपोरेटीकरण हुआ है, तबसे इनने शीर्ष लेवल के घपले घोटाले दिखाने छापने बंद कर दिए हैं क्योंकि इन घोटालों में या तो इनका कोई करीबी शामिल होता है या फिर इनके मीडिया हाउसों का बड़ा विज्ञापनदाता. हुआ यह भी है कि ये मीडिया हाउसेज सत्ता से लंबी चौड़ी डील कर पैसे उगाह लेते हैं और फिर सत्ता के खिलाफ भी खबरें नहीं दिखाते, जैसा कि आजकल मोदी राज में हो रहा है. दिन रात मोदी और योगी कीर्तन चल रहा है. इसके पहले यूपी की अखिलेश सरकार ने अरबों रुपये लुटाकर को मीडिया को मैनेज कर रखा था.

बंगाल की पब्लिक हेल्थ लैब में आंवला जूस के फेल हो जाने के बाद आर्मी कैंटीन द्वारा इसकी बिक्री पर रोक लगा देने की खबर पर किसी न्यूज चैनल में प्राइम टाइम पर डिबेट न होना शर्मनाक है. नैतिकता का दिन-रात पाठ पढ़ाने वाले मीडिया हाउसों के संपादकों और एंकरों को एक दिन के लिए अपने मुंह पर कालिख पोत कर स्क्रीन के सामने बैठना चाहिए ताकि जनता जान सके कि इनने एक बड़ी खबर विज्ञापनदाता के दबाव में न सिर्फ दबा लिया बल्कि राष्ट्रहित और भारतीय सेना से जुड़े इस मसले पर जनहित में खबर न दिखाकर राष्ट्रद्रोह किया है.

पतंजलि के प्रोडक्ट आंवला जूस पर सेना की कैंटीन में बिक्री पर रोक लगाने की खबर को अपने चैनल पर न दिखाए जाने को लेकर न तो अजीत अंजुम ने कोई ट्वीट या एफबी पोस्ट जारी किया होगा और न ही सुधीर चौधरी इस बड़े विषय पर अपने दर्शकों का ज्ञान सोशल मीडिया पर बढ़ाते पाए गए होंगे.

रक्षा मंत्रालय ने आयुर्वेद पतंजलि को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है. इस मामले में रक्षा मंत्रालय ने बाबा रामदेव की कंपनी से जल्द से जल्द जवाब भी मांगा है. लेकिन हमारे महान एंकर और संपादक लोग सो रहे हैं. हमारे महान मीडिया मालिक इस मामले में सेना और राष्ट्र का हवाला देकर छाती बिलकुल नहीं कूट रहे हैं.

खबरों के मुताबिक पतंजलि के इस आंवाल जूस की जांच कोलकाता की सेंट्रल फूड लैबरेटरी में भी जांच कराई गई और वहां भी इसे खाने के लिए ठीक नहीं पाया गया. इसके बाद ही पतंजलि को आर्मी की सभी कैंटीनों से आंवला जूस वापस लेने का निर्देश दिया गया और पतंजलि ने चुपचाप अपना प्रोडक्ट वापस मंगा भी लिया है.

इस पूरे मामले में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह का कहना है- ”देशभक्ति यही है क्या? फौज को नकली आंवला जूस बेचने के अपराधी रामदेव पर किसी भक्त को अब कुछ नहीं कहना है, क्यों? अब कहां गया राष्ट्र और कहां गया सेना का अभिमान? तीन दिन हो गये किसी चैनल पर सांस तक नहीं आई. गूगल करें. दस स्रोत हैं इस खबर के. तीन दिन से प्रिंट मीडिया में ख़बर है. लेकिन चैनल वाले अभी हिंदू मुस्लिम और केजरीवाल में उलझे हैं.”

वरिष्ठ पत्रकार Jaishankar Gupta का साफ कहना है कि सब के सब मीडिया हाउस पतंजलि के विज्ञापनों के बोझ तले दबे हैं. पत्रकार Kumar Narendra Singh कहते हैं- ”यदि आपके पैसा और पॉवर हो, तो आपका हर कुकर्म देशभक्ति है। लेकिन यदि आप गांठ के पूरे नहीं हैं, तो आप देशभक्त नहीं हो सकते।”

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. यशवंत से संपर्क ह्वाट्सअप नंबर 9999330099 के जरिए किया जा सकता है.

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‘मीडिया के सरताज’ लिस्ट में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम

फेम इंडिया और एशिया पोस्ट नाम पत्रिकाओं की तरफ से ‘मीडिया के सरताज वर्ष 2017’ के लिए किए गए सर्वे में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम आया है. फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यू मीडिया कैटगरी में एक प्रमुख सरताज के तौर पर यशवंत सिंह को चिन्हित किया गया.

इस संबंध में फेम इंडिया मैग्जीन की वेबसाइट पर एक खबर का प्रकाशन किया गया है, जो नीचे साभार प्रकाशित किया जा रहा है. फिलहाल इस उपलब्धि के लिए सोशल मीडिया पर यशवंत को लोग बधाई दे रहे हैं.

मीडिया को बेबाकी से आइना दिखाते हैं यशवंत सिंह (फेम इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे 2017-मीडिया के सरताज)

Posted by fameindia On April 20, 2017

हिन्दी भाषी राज्यों में जो भी शख्स मीडिया से जुड़ा हो वह कम से कम भड़ास4मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता यशवंत सिंह को जरूर जानता होगा। बेबाक, बेलौस और बेलाग। यशवंत सिंह की ये तीन खूबियां उन्हें औरों से अलग बनाती हैं। उन्हें एक ऐसे निडर पत्रकार के तौर पर जाना जाता है जो किसी युनियन या संगठन के पचड़ों में पड़े बगैर भी देश के हर मीडियाकर्मी के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा है।

मूल रूप से गाजीपुर के यशवंत सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। लखनऊ में दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत की। फिर अमर उजाला से जुड़े। अमर उजाला के लिए बनारस, कानपुर और आगरा में काम किया। इसके बाद दोबारा दैनिक जागरण से जुड़े और मेरठ, कानुपर व दिल्ली में काम किया। जागरण समूह के आई-नेक्स्ट की लॉन्चिंग टीम का भी हिस्सा रहे। उन्होंने देखा कि पत्रकारिता में हर जगह कई बुराइयों ने डेरा जमा लिया है और जिस उद्देशय के लिये पत्रकारिता शुरु की थी वो कहीं है ही नहीं।

जब पत्रकारिता उबाऊ लगने लगी तो कुछ दिन दिल्ली में एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर काम किया। मन में मैली हो रही पत्रकारिता को आइना दिखाने की इच्छा दबी थी, वह नौकरी भी छोड़ दी और मई 2008 में मीडिया की खबरों का पोर्टल भड़ास4मीडिया.कॉम शुरु किया। यह अपनी तरह का पहला पोर्टल था जो हर आम मीडियाकर्मी की समस्या को तरजीह देता था व उनसे जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता था। जल्दी ही यह काफी लोकप्रिय हो गया।

यशवंत सिंह की पहचान उनके बागी तेवरों की वजह से भी है। इसकी वजह से उन्हें कई बार उन मीडिया संस्थानों का निशाना भी बनना पड़ा जो अपने उद्देश्यों से भटके हुए थे। कई बार उनपर मुकदमे भी हुए और उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन बेहद पॉजिटिव सोच रखने वाले यशवंत सिंह ने इस मौके को भी एक अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया और जेल में मौजूद कुव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये एक किताब -‘जानेमन जेल’ लिख डाली। उनकी यह किताब खूब बिकी और प्रशासन ने कई सुधार भी किये।

यशवंत सिंह ने भारतीय पत्रकारों के बीच अपनी पैठ बना रखी है। पत्रकार भले ही दुनिया के लिए लड़ते हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए लड़ने वाला ये अगुवा पत्रकार माने जाते हैं। कई पत्रकार युनियनों और समाजसेवी संगठनों ने इन्हें समय-समय पर सम्मानित भी किया है। इंडियन मीडिया वैल्फेयर एसोसिएशन की ओर से इम्वा अवॉर्ड, ‘इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एण्ड डाक्यूमेटेशन इन सोशल साइन्सेंस’ (आईआरडीएस) अवॉर्ड आदि प्रमुख हैं।

हर मीडियाकर्मी की भलाई और जीवन के हर क्षेत्र में सुधार की सोच रखने वाले यशवंत सिंह फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यु मीडिया के एक प्रमुख सरताज के तौर पर पाये गये हैं।

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आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे, ये दो अफसर क्यों हैं तारीफ के काबिल, बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : इधर बीच 2 अफसरों से मिलना हुआ। एक आईएएस और दूसरे आईपीएस। क्या कमाल के लोग हैं दोनों। इनसे मिल कर ये तो संतोष हुआ कि ईमानदारी और दबंगई की जुगलबन्दी के जो कुछ स्पार्क शेष हैं इस महाभ्रष्ट सिस्टम में, वे ही जनाकांक्षाओं में उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं। इन दोनों अफसरों के बारे में थोड़ा-सा बताना चाहूंगा। इनके नाम हैं- आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे। एक नोएडा के डीएम, दूजे गाजीपुर के पुलिस कप्तान।

NP Singh

SC Dubey

वैसे बता दूं, अफसरों से मिलना मुझे पसंद निजी तौर पर पसंद नहीं, मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं। चाहे दैनिक जागरण में रहा या अमर उजाला में या आई नेक्स्ट में… चाहे सिटी चीफ रहा या संपादक रहा… अफसरों के यहां खुद चल के एक्का दुक्का बार ही गया हूंगा… दिमाग में ज्यादातर अफसरों के रीढ़ विहीन और बेईमान होने की छवि गुंथे होने से शायद उनसे मिलने जुलने से परहेज रखता रहा हूं। पिछले 8 वर्षों में, भड़ास संचालित करने के दौरान, जिन कुछ ईमानदार और कलेजे में दम रखने वाले लोगों के बारे में सुना जाना उनमें से एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे भी हैं।

एनपी का पंगा आज़म खान से हुआ था, अखिलेश के सीएम बनने के ठीक बाद। ये अफसर डटा रहा। आज़म खान कोपभवन में जाकर ही अखिलेश को मजबूर कर पाए एनपी को उनके मंत्रालय से हटाने के लिए। लेकिन तब तक अखिलेश इस अफसर की ईमानदारी, लोकप्रियता और साहस के बारे में जान चुके थे। दंगा रोकने के लिए शामली भेजे गए एनपी। अभी डीएम नोएडा हैं, काजल की कोठरी में दामन दागदार होने से बचाए हुए हैं। इन्होंने गरीब बच्चों के लिए दो रोजगार परक तकनीकी स्कूल संचालित करके कमाल का काम किया है। एक चंदौली के नक्सल एरिया में। दूसरा बनारस के अपने पिंडरा इलाके वाले गांव में। इन स्कूलों के संचालन में अपने परिवार की संपत्ति होम की और भला किया उन बच्चों का जिनका समाज में कोई नहीं। दर्जनों इनके ऐसे सामाजिक काम हैं जिनको देख सुन के कहने का मन करता है कि क्या लूटतंत्र में ऐसे भी जन सरोकारी, ईमानदार और सोशल एक्टिविस्ट टाइप अफसर हैं, जो आम जन के प्रति अपनी पक्षधरता का चुपचाप निर्वहन किए जा रहे हैं!

आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे की ईमानदारी, जन पक्षधरता और सिस्टम से भिड़ जाने का माद्दा रखने के बारे में ज्यादातर लोगों को समय समय पर मीडिया से पता चलता ही रहता है। यही कारण है कि वो या तो सस्पेंड रखे जाते हैं या फिर प्रतीक्षारत। उन्हें अक्सर चुनाव आयोग याद करता है और चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण जिममेदारी देता है। इस दफे गाज़ीपुर भेजे गए। इनने फर्जी वोटिंग के खेल का ऐसा रैकेट पकड़ा कि सात बार चुनाव जीत चुके ओमप्रकाश सिंह इस बार तीसरे पोजीशन पर अटक गए। अपने करियर में हजार से ज्यादा निर्दोषों को जेल जाने से बचाया, निष्पक्ष पुलिसिंग के मिशन को मिशनरी भाव से जीते हुए। सुभाष चंद्र दुबे की हिम्मत और ईमानदारी के दर्जनों वाकये हैं। अदभुत जीवट का पुलिस अफसर है ये। न आका टाइप अफसरों के यहां सिर नवाया न मठाधीश टाइप मंत्रियों को सलाम ठोंका। हल्लाबोल अंदाज़ में, बिना भेदभाव किए, जो गुनाहगार मिला, उसे धर दबोचा। अजगरों को उनके बिलों में घुसकर पकड़ने वाले सुभाष को सत्ता जनित बदमाशी कमीनगी और धूर्तता के जाल में फांसकर साजिशन जो उत्पीडन उपेक्षा मुहैया कराए गए उसे उनने ईश्वर की नेमत / करियर का मेडल मान कर तहेदिल से कुबूला और भरपूर एन्जॉय किया।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Golesh Swami Both are nice officers. Np singh is my good friend and subhash chandra dubey as younger brother. Np ki khasiyat yeh hai ki Lucknow mai DM koi bhee raha, jila NP singh ne hi chalya. Subhash bhai ke baare mai kya kahu heera officers mai se hai. NP aur subhash jaise officer u.p. mai unglio par ginne layak hai. Aise officer ho to u.p. sudhar jaye.

अशोक कुमार शर्मा सही बात की यशवंत आपने! मुझे मालूम है कि आप ताकत से प्रभावित नहीं होते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय के ओएसडी के रूप में मैंने दो मामलों में आपसे संपर्क किया. आपने सरकार का पक्ष तो दिया मगर कोई समझौता या मांग नहीं मानी. सूत्र भी नहीं बताया अपना. लालच में आप आये नहीं. मैंने भी अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के कार्यकाल में यही पाया कि इन दोनों अफसरों में अनेक ख़ास बातें है: एनपी साहब ओजस्वी और कड़क अफसर होकर भी आम आदमी के हक़ में सेवाभाव से खड़े रहते हैं. आसान नहीं उनको डिगाना. प्रेस क्लब के एक समारोह में मैंने उनको पहली बार बोलते सूना था. उन्होंने पत्रकारों को भी समझाया कि ईमानदारी और शासन के इकबाल का पुराना दौर वापस लाना है तो खबरों में ‘लिहाज’ ना करें किसी का. सुभाष जी क्रांतिकारी अफसर हैं. सीधे एक्शन लेते हैं. लपझप बिलकुल नहीं करते. उत्तर प्रदेश में इन जैसे अच्छे अफसरों की कमी नहीं है. लेकिन सत्ता को कदर कहाँ है? मैंने सूचना विभाग में ही देखाकभी वहां कमीशन और दलाली तंत्र शैशव और वामाना अवस्था में था. और अब? करप्शन का कारपोरेट..

Vinod Bhardwaj एन पी सिंह के बारे में खबरिया जानकारियां हैं , पर सुभाष चंद्र दुबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ । आज के सड़ांध मारते सिस्टम में भी दोनों ने अपनी महक और चमक को बरकरार रखा है । ये दोनों ही एक शानदार नजीर हैं , इनको दिल से सलाम !  … और जिसकी निष्पक्षता और काविलियत को लिखने के लिए यशवंत सिंह जैसे पत्रकार की कलम मचलने लगे , उसे किसी और के सर्टीफिकेट की जरूरत ही नहीं ! यशवंत भाई कभी मौका मिले तो डी जी सुलेखान सिंह से लखनऊ जाकर जरूर मिलना । उनसे मिलकर और उनका अतीत जानकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाओगे । ये मोस्ट सीनियर आई पी एस भी अब रिटायरमेंट के करीब ही हैं ।

S.p. Singh Satyarthi अगर यशवंत जी किसी का मूल्य लगा रहे हैं तो निश्चित ही वह हीरा होगा।

Care Naman अगर भड़ासी किसी अधिकारी की तारीफ़ कर रहा है तो सच में बंदे में है दम इस बात पर आँख बंद कर के यकीन किया जा सकता हैं

Shambhunath Shukla एनपी सिंह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर हैं। सुभाषचंद्र दुबे से कभी मिला तो नहीं पर उनके बारे में सुना अवश्य है।

Ramji Mishra हमारे महोली में एक उपजिलाधिकारी के एन उपाध्याय जी आये थे बहुत ईमानदार रहे लेकिन उनसे अतिरिक्त कमाई सपने में भी नहीं की जाती थी नतीजा यह हुआ प्रमोशन में लोहे लगते रहे हक़ मारा जाता रहा। बनारस भेज कर आबकारिविभाग में कर दिए गए लेकिन उपजिलाधिकारी का पद छीन लिया गया। और तो और अब उनकी जगह महोली की कमान उपजिलाधिकारी अतुल को दी गई है जो कई सालों से राज कर रहे हैं। अतुल इससे पहले गोरखपुर में तहसीलदार रहे हैं और वहाँ पर भी लोग दबी जुबान न जाने क्या क्या बातें इनके बारे में कहते थे। अब महोली में तो इनके संरक्षण में ही खुले आम खनन , घूसखोरी और दबंगई फलफूल रही है। यहीं नहीं अगर अतुल को जरा सा गुस्सा आता है तो सामने वाले को मारने और पीटने से भी उन्हें दनिक भी गुरेज नहीं है। फिलहाल जिन दो अधिकारियो के बारे में सर आपने लिखा उनको जय हिंद और आपकी पोस्ट सराहनीय है।

Poonam Scholar ऐसे समाज सुधारकों और अफसरों से अन्य समाजसेवियों और भावी अफसरों को अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए। आभार साझा करने के लिए।

Siddhartha Malviya ई सही पकडे हैं… दुबे जी बड़े रॉयल आदमी हैं। अच्छो के अच्छा और बुरो के लिए बहुत बुरा।

Kumar Anup Jha सर मैंने तो अभी इन दोनों सर को नहीं देखा हूँ.. नोएडा में ही रहता हूँ. जब बिहार में था तो वहां शिवदीप लांडे सर को देखा था.. वो मुझे अब तक काफी अच्छे अफसर लगे. हालांकि मैने कुछ अफसर को ही देखा है.

Varun Panwar एनपी सिंह शामली में जिलाधिकारी रहे, बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता, कुशल अधिकारी और एक अच्छे दोस्त… वैसे तो उनमें अनेको ऐसी प्रतिभा है जो शब्दों में व्यक्त करेगे तो काफी लंबा चौड़ा लिखना पड़ेगा… शामली में वो लगभग डेढ़ वर्ष रहे.. यहां के लिये उन्होंने बहुत कुछ किया… सुभाष जी मुज़फ्फरनगर में कुछ ही दिनों के लिये एसएसपी बनकर आये थे, दंगो के दौरान, एक बार मुलाकात हुई, अपने कार्य के प्रति सजग थे, जो कि वहाँ के सत्ता धारी नेताओ को रास नहीं आये.. दोनों की जोड़ी बहुत कुछ करने का माद्दा रखती है

Shahnawaz Qadri श्री एन पी सिंह के बारे मे जो आपने लिखा है वह कम है… उत्तर प्रदेश मे इस तरह के अधिकारी देखने को कम ही मिलते हैं..

Chandan Srivastava मान लीजिए मैं दिलीप मंडल हूं। तो मेरा फीड बैक यह है कि आप अव्वल दर्जे के जातिवादी, सवर्णवादी हैं। आपको दो अफसर ईमानदार मिले, एक ब्राह्मण दूसरा ठाकुर।  क्या आप यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों दलितों में कोई ईमानदार अफसर ही नहीं। 🙂

Shyam Singh उप्र. के डाकू छविराम और पातीराम गैंग को ध्वस्त करने वाले तथा दो-दो बार राष्ट्रपति पदक हासिल करने वाले तेज-तर्रार आइपीएस. विक्रम सिंह जी जब नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था। बाद में उन्हें कुमाऊं का डीआइजी. भी बनाया गया। मैंने उन्हें कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार पाया। अन्य पुलिस अधिकारियों की तरह उन्होंने किसी नेता को दंडवत् नहीं किया होगा। अध्यात्म में रुचि के कारण वे यहां स्थित अरविन्द आश्रम में जाकर उसके साधना व अन्य दैनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। उन्होंने मेरे से भी अध्याम विद्या सम्बंधी कुछ पुस्तकें लेकर पढीं। पुलिस में ऐसे अधिकारी मैंने कम ही देखे हैं।

Hero Dubey एनपी सिंह से तो परिचित नहीं हूँ सर! लेकिन सुभाष चंद्र दुबे कन्नौज के एसपी रहे हैं। वह बहुत ही शानदार अफसर हैं। जय हिन्द

Pranay Batheja सर आपको पहली बार देखा ऊपर की चंद लाईने पढा कि जिससे इतना पता चला आप पत्रकार हैं अफसरों से मिलना आपको पसंद नहीं फिर भी आप मिले शायद उनकी ईमानदारी आपको उनके ओर आकर्षित करके ले गई। इनके बारे में आप आगे विस्तार से लिखेंगे। लेकिन कोई पत्रकार के वर्तमान स्थिति को क्यों नहीं लिखता उन्हें क्यों नहीं परिभाषित करता जिसे सरकार, सरकारी तंत्र और जनता के बीच सेतु व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जो पत्रकारिता हमारे वीर क्रांतिकारी करते थे और जो पत्रकारिता वर्तमान में हो रही है इसकी वास्तविकता क्या है?

A.k. Roy वैसे मुझे भी अफसरों से मिलना अच्छा नहीं लगता मैं राजनीति एवं पत्रकारिता में रहते हुए कम से कम इन लोगों से मिलना चाहता हूं अब आपने बताया है तो कभी किसी एक कार्य हेतु मिलना हुआ अभी इनके बारे में कोई अपनी राय दी जा सकती है अगर इमानदार है तो इन्हें उसकी सजा भी आज के भ्रष्ट सिस्टम से मिलेगी चाहे वह सरकार किसी भी पार्टी की है..

Singhasan Chauhan सलाम है ऐसे ऑफिसर्स को , ऐसे ही एक IPS श्री प्रभाकर चौधरी आये थे हमारे बलिया में | काम करने का तरीका वाकई काबिले तारीफ , कच्ची दारू, सड़कों पर अतिक्रमण, थाने में दलाली वगैरह सब बंद करवा दिए थे मगर भ्रष्ट नेताओ ने 2 महीने में ही उनका ट्रांसफर करा दिया …..इमानदारी अभी भी जिन्दा है .

Ramhet Sharma आपने जो लिखा है, उससे उनका का मऩोबल बढता है.. अच्छे अधिकारियों के अच्छे कार्य की सराहना की जानी चाहिए…

Ashwani Tripathi एनपी सिंह जी, शामली के डीएम रहे। बेहद गजब की नेतृत्व क्षमता है उनमे। एक अफसर और नेता दोनों की कुशल प्ररिभाओं का समावेश है, उनके अंदर। जब तक शामली में रहे, सभी नेताओं के घरों में बने चौपाल खाली रहे। वहां तो यह कहा जाने लगा था कि इस जिले में एक ही नेता है वो है एन पी सिंह। एन पी सिंह के दरवाजे हर समय जनता के लिए खुले रहते थे। पत्रकारों के लिए भी एन पी सिंह से अच्छा कोई अफसर नहीं हो सकता। पत्रकारों के मान सम्मान को हमेशा उन्होंने बढ़ाया। रास्ते में भी कोई पत्रकार मिलता तो गाड़ी रोक कर पत्रकारों से हाल लेते। भाषण देने की उनकी क्षमता तो गजब है।

Ghanshyam Dubey N. P से सिर्फ पाला ही नहीं पड़ा , निजी तौर पर उन्हें जानता हूँ । वह एक रीढ़ की हड्डी रखने वाले कर्मठ अफसर हैं। सुभाष से कभी मिला नहीं हूँ , स्टेट लॉ एंड आर्डर देखने वाले कुछ कनिष्ठ पर काम मे तेज पत्रकारों से उनके बारे मे सुना है । सबने उनके काम – स्वभाव की तारीफ ही की है।


भड़ासानंद कहिन…

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एयर इंडिया वाले लतखोर होते ही हैं!

Yashwant Singh : उपराष्ट्रपति के साथ वेनेजुएला जा रहा था तो एक मेरे पत्रकार मित्र एआई वन के मेल फीमेल एयरहोस्टेस की विनम्रता देख दंग थे. कहते थे यशवंत जी पहली बार इन्हें इतना विनम्र देखा हूं. जरूर इन्हें प्रायश्चित पोस्टिंग मिली है ये. वे कहते रहे कि ये ऐसे बात-बिहैव करते हैं जैसे ये खुदा हों. पत्रकार मित्र आने-जाने के दौरान एयर होस्टेस और एयर इंडिया स्टाफ की विनम्रता देख-देख आंखे फाड़ रहे थे.

तब मुझे लगा कि ये सरकारी जहाज कंपनी के लोग यात्रियों को रुला के रखते हैं. ऐसी हालत में जूता मारना तो ठीक लगता है भाया. 😀

वैसे भी, टिकट बिजनेस क्लास का है और बैठाते इकानामी क्लास में हो तो जूता मार काम तो है ही. ये अलग बात है जूता वही मार पाया जो प्रभावशाली है वरना कोई यात्री मारता तो न सिर्फ एअर इंडिया वालों से हिक भर लात खाया होता बल्कि सूजे मुंह के साथ जेल में होता. एयर इंडिया वाले अगर एक लाख बार बदतमीजी करें तो कम से कम एक बार तो जूता मारना बनता है भाऊ :) नो हाय हाय.. बी प्रैक्टिकल…

वैसे जूता मारने का यह काम कोई कामरेड किया होता तो बाकी कामरेड कहते कि जनता कितना बर्दाश्त करेगी, इन्हीं हालात में नक्सलवादी पैदा होता है… शिवसेना वाले ने जूता मार काम कर दिया तो गलत कैसे… जहां पानी रुक जाए, सड़ जाए, गंधला हो जाए… वहां कोई पत्थर मार दे ताकि यथास्थितिवाद खत्म हो, प्रवाह के नए रास्ते खुलें… माफ कीजिएगा… मैं भाजपाई बिलकुल नहीं हूं लेकिन चीजों को एक चश्मे से देखने की जगह मौलिक तरीके से देखने की कोशिश कर रहा हूं ताकि मूल समस्या, मूल बात सामने आ सके, न कि कौवा कान ले गया के आधार पर कौवे के पीछे पड़ जाएं, बगैर अपना कान देखे….

(अपने राइट विंग के फक्कड़ मित्र Kamal Kumar Singh की इस बारे में एफबी पोस्ट देखा तो वहीं कमेंट किया, उसी को यहां अलग से पोस्ट कर रहा हूं)

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

Chandan Srivastava : किसी की गुंडागर्दी के बारे में सुनकर गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन एक सांसद द्वारा एयर इंडिया के किसी कर्मचारी की चप्पल या सेंडिल से पिटाई की खबर पर मुझे गुस्सा आ नहीं रहा। अगर मैं कहूं कि यह कुछ और नहीं शेर को सवा शेर मिलने जैसी बात है और एयर इंडिया वाले कई बार यह या इससे थोड़ा कम तो डिजर्व करते ही हैं। (मतलब 25 नहीं चार-पांच चप्पल) तो अतिश्योक्ति या असहिष्णुता नहीं होगा।

तीन साल पहले एक दोस्त अमौसी एयरपोर्ट से अपने शहर जा रही थी। एक एयर इंडिया के कर्मचारी से चेक-इन के दौरान कुछ कहा-सुनी हुई। कर्मचारी ने उसके साथ अभद्रता की। हमने अमौसी एयरपोर्ट में ही बने एयर इंडिया के ऑफिस में जाकर घटना की लिखित शिकायत की। तीन साल बीत गए, अब तक उस शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई सिवाय कुछ दिनों बाद शिकायत प्राप्त होने का एक लेटर मिलने के। अब तो शिकायत की कॉपी पता नहीं मेरे पास भी सुरक्षित है भी कि नहीं। लेकिन इस बार एयर इंडिया वालों ने किसी ऐसे शख्स को उंगली कर दी जो उनसे भी बड़ा बद्तमीज था। That’s it. मामला बस इतना ही है।

लखनऊ के पत्रकार और वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर न लिखें, यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप मुद्दा है : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर मत लिखिए. यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप का ही मुद्दा है. जमीन पर लोग इसे बहुत जरूरी बता रहे हैं. कई लोगों की बात सुन कर और कई लोगों से बात करने के बाद लिख रहा हूं. आप आजादी, स्वतंत्रता, प्रेम आदि का राग अलापते रहिए लेकिन जमीन पर लोग शोहदों के आतंक से त्रस्त थे. मैं भी आप की ही तरह सोच रहा था कि रोमियो स्क्वाड के जरिए यूपी पुलिस बच्चों को परेशान कर रही है.

पर लोग कह रहे हैं कि परेशान वे बच्चे हो रहे हैं जो सुबह शाम लड़कियों के कालेज स्कूल और उनके निकलने के रास्ते पर तैनात रहते थे और पीछा किया करते थे. रही बात पार्कों बागों आदि में बैठने वाले जोड़ों की तो किसी भी अभियान में दस पंद्रह परसेंट जेनुइन लोग तो चपेट में आते ही हैं.. वो कहते हैं न गेहूं के साथ घुन का पिस जाना. सो, हे साथियों दोस्तों, अब थोड़ा प्रैक्टिकल होकर जमीनी हालात को समझ बूझ के लिखा करिए. सिर्फ घर से आफिस और आफिस से घर, इस दरम्यान पूरे वक्त फेसबुक पर वैचारिक लेखन से रियल्टी / अंडर करंट को नहीं पकड़ पाएंगे.

ठीक यही मामला बूचड़खाने का भी है. शहरी / रियाइशी इलाके में बहते खून, भयंकर बदबू से त्रस्त लोगों को लग रहा है कि बहुत सही हो रहा है… ध्यान रखिए, मुसलमान कतई भाजपा के वोट बैंक नहीं हैं. सपा राज में मुसलमान पूरी तरह सत्ता संरक्षण में पल बढ़ रहे थे और ढेर सारे वैध अवैध काम कर रहे थे, जिसमें छेड़खानी से लेकर अवैध बूचड़खाना संचालन तक है. अब इन पर गाज गिर रही तो हिंदू खुश हैं.

मुझे मुस्लिम हिंदू की भाषा में इसलिए बात करनी पड़ रही है क्योंकि ग्राउंड लेवल का सच यह हो चुका है और इसे सच बनाने में बड़ा रोल सपा बसपा कांग्रेस जैसी पार्टियों का है. मेरा बस इतना कहना है कि योगी के आने के बाद तुरंत हाय हाय करने की जगह तीन महीने तक का वेट करिए… देखिए, भांपिए.. घूमिए, फीडबैक लीजिए… फिर लिखिए… वरना एक बार फिर झटका खाएंगे… जितना बिना वजह भाजपा और योगी का विरोध करेंगे, उतना ही आप उन्हें मजबूत करेंगे…

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Kumar Rahman यशवंत जी, बरेली में शोहदों के डर से एक बच्ची के माता-पिता ने गांव छो़ड़ दिया है… इसकी वजह से उस नवीं कक्षा का छात्रा की पढ़ाई भी छूट गई है…. शाम छह बजे LIVE TODAY न्यूज चैनल पर बरेली से यह रिपोर्ट देखी जा सकती है…

Shivmangal Singh भाई साहब यूपी में ये समस्या कैंसर की तरह है हज़ारों बच्चियां स्कूल छोड़ रहीं हैं up में ऐसा लगने लगा था की बेटी का बाप होना अपराध है मुजफ्फरनगर के दंगों के पीछे छेड़खानी ही थी वहां लफंगों में दहशत होना जरुरी है

Deepak Thakur सटीक विश्लेषण। कुछ यही हालत पटना जैसे शहरों का भी है। पढने वाली बेटियों को काफी परेशानी हो रही है।

Kamta Prasad लगता है मैं भी कायदे से सोचने लगा हूँ तभी आपकी बातें पल्ले पड़ने लगी हैं, कल की भड़ास की रिपोर्ट भी ठीक ही थी कि कानून का दुरुपयोग भी होता है।

Vivek Singh बिलकुल सही बात। इलाहाबाद याद ही होगा किस तरह शाम को महिला छात्रावास के बाहर लल्ला चुंगी पर भीड़ लगती थी। वहां जो होता था वो यही सब था।

Anil Maheshwari Efforts to contain eve teasing (sexual harassment) are being viewed with suspicion but it intriguing that Anti Romeo Squad in UP is “moral policing” & Pink Squad in Kerala is progressive. She squads are also in Hyderabad for the same job. When Rajnath Singh, as UP Minister for Education tried to check copying in examination by making copying cognizable offence, the left/liberal forces in Delhi too opposed the move of Raj Nath Singh saying that a girl of 14 years, caught copying will also be put behind the bars. The result was under the pressure of the party leaders, having entrenched interest in copying and making copying as a source of livelihood compelled the Kalyan Singh government to withdraw the order. The result is before us. No value of UP degrees and certificates in the Job market.

Singhasan Chauhan बिलकुल सही और इसमें सज्जन लोगों को तो कोई परेशानी ही नहीं है परेशानी तो उनके लिए है जो आवारागर्दी करते हैं और रह चलती लड़कियों, औरतों के ऊपर फब्तियां कसते हैं इनका इलाज तो होना ही चाहिए| मैं किसी परती विशेष का समर्थक नहीं हूँ मगर सही काम की हमेशा तारीफ होनी चाहिए चाहे वो किसी भी परती या धर्म से हो.

Ravindra Singh Basera Dev पिछले साल दिसंबर में दिल्ली से देहरादून जा रहा था। रास्ते में बस की खिड़की से बाहर झांक रहा था तो क्या देखता हूं कि मेरठ के किसी स्कूल की छुट्टी हो रही थी। लड़कियों का स्कूल था, कतार बना कर लड़कियां घर को लौट रहीं थी। कुछ लड़कों को सड़क किनारे लड़कियों की कतार में से किसी को खोजते देखा, सोचा कि शायद किसी खास लड़की का इंतजार हो, और मैं अपने लड़कपन के दिन याद करते हुए मन ही मन मुस्कुरा दिया। लेकिन बस के जरा आगे बढने पर दृश्य बड़ा विचलित करने वाला था, लड़के बाइक लेकर एक्सेलेटर दबा, बार बार लडकियों की कतार के चक्कर काट रहे थे, लडकियों की कतार के ठीक बगल में, बीच-बीच में किनारे खड़े दोस्तों का झुंड बनाकर लड़के, छेड़ाखानी करते, हाथ खींचते और लड़कियों को झुंड में घेरने की कोशिश करते दिख रहे थे। चूंकि यह छुट्टी का समय था तो बस के थोड़ा और आगे बढने पर देखा कि, और भी कई स्कूलों की छुट्टी उसी समय हो रही थी। और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था यह देख कर कि सभी जगह वही पहले स्कूल के जैसे हालात थे। यह सब शहर के बीचों बीच चल रहा था, लोग आ जा रहे थे, सब सामान्य कामकाज की भांति चल रहा था। और लड़कों के गिरोह किसी संगठित गैंग की तरह जहां तहां लड़कियों से यूँ ही पेश आते दिखे। इसे पश्चिमी उप्र के शहरों और कस्बों की Teen Age संस्कृति के रूप में आप समझ सकते हैं। लेकिन आज जब योगी सरकार के Anti Romeo Squad के गठन का समाचार सुना तो एक-बारगी लगा कि बड़ा प्रतिगामी कदम है, प्यार पे पहरा बिठाने का Frustrated बजरंगी Lumpens का संघी Vigilante Justice वाला Agenda जैसी कि छवि, लिबरल- लेफ्टिस्ट मीडिया वाले इस कदम की आम जनता विशेषकर मध्यम वर्ग के युवाओं के मन में बना रहे हैं। मुझे फिर अचानक, मेरठ शहर का वह स्कूल से लौटती लड़कियों से Road Romeos के दुर्व्यवहार का दृश्य याद आ गया और मुझे Anti Romeo Squad का मतलब समझ में आ गया, और यह भी कि क्यों इस कदम को इतनी तत्परता से योगी सरकार ने उठाया है।

Suresh Gandhi बिलकुल सही कहा आपने विरोध सिर्फ सपाई व काग्रेसी बलात्कारी कर रहे है सच तो यह है इनके खिलाफ ही रपट दर्ज करनी चाहिए क्योंकि वोट खातिर बलात्कारियों चोर उचक्को भ्रष्टाचारियों चापलूसो व डकैतों को सपोर्ट करना इनका सगल बन गया है

Ravi Prakash Singh यशवंत जी किसी गर्ल होस्टल के बहार जब लडकिया सब्जी फल खरीदती है तो उस फल की साइज सोहदे(रोमियो) पूछते है कल से नजर नहीं आये ।

Nitin Thakur किसी को मैंने जवाब दिया था.. उसका अंश है- मैं आपसे ये कहूंगा कि मैं नहीं जानता कि आप योगी से कितने परिचित हैं और कितने नहीं। कम से कम मैं उनसे और उनके विचार से ठीक ठीक परिचित हूं। कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि उसे शासन में कॉलेज की लड़कियों के साथ शोहदे बद्तमीज़ी करें। शोहदे किसी के सगे नहीं होते और कोई उन्हें नहीं पालता। ये हिंदू और मुसलमान दोनों होते हैं और जाति भी हर तरह की होती है। शासन के पास पहले से पुलिस है। पुलिस ने पहले से ही महिलाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर दिए हैं। मेरे अपने शहर में लड़कियों के कॉलेज के बाहर बसपा और सपा दोनों सरकारों के दौरान मैंने पुलिस जीप को खड़े पाया है। दूसरे कॉलेजों के आसपास भी हमेशा इस तरह के अभियान चलते ही रहे हैं। ये अलग से जो एंटी रोमियो वाला ड्रामा है वो किस एक समुदाय विशेष के खिलाफ चलाया जा रहा है वो मैं तो जानता ही हूं और जिन्होंने योगी को सुना है उन्हें भी मालूम ही है। ये स्क्वैड दरअसल लव जिहादी खोज रही है। चूंकि चुनावी प्रचार में ये बात ज़ोर से कहकर वोट आए तो योगी ने कही भी जिसकी मैं तारीफ करता हूं… लेकिन अब यही बात शासन में बैठकर योगी बोल नहीं पाएंगे। वैसे भी घर बैठकर आपने कैसे तय कर लिया कि ये स्क्वैड अपराधी को ही धरेगा? इसमें वही पुलिसवाले काम करेंगे जो आम तौर पर किसी को भी उठाकर टॉर्चर करने के लिए बदनाम हैं। अब क्योंकि ये स्क्वैड अधेड़ उम्र के लोगों और लड़कियों के परिवार को ठीक लग रहा है तो वो असल बात मिस कर रहे हैं पर जो लोग योगी एंड टीम की बातें लगातार सुनते और समझते आ रहे हैं वो जानते हैं कि महिला सुरक्षा के नाम पर दरअसल क्या रोकने की कोशिश हो रही है? और रोकने की क्या.. वो खतरा तो खुद हिंदूवादियों ने चिल्ला-चिल्लाकर खड़ा किया और अब उस आभासी खतरे के खिलाफ एक स्क्वैड भी खड़ा किया है। तालियां बजाइए कि घर में तालिबान हुआ है। जो काम बजरंग दल और शिवसेना के ज़िम्मे था वो अब यूपी पुलिस से कराइए। छेड़छाड़ या किसी और तरह के अपराध की रोकथाम से भला किसको इनकार होगा मगर उसके नाम पर शुरू हुई मोरल पुलिसिंग को आप एक हद के आगे बढ़ने से रोक नहीं सकेंगें। जिस दिन वो आपके घर पहुंचेगी तो आप वैसे ही पोस्ट लिखेंगे जैसे नोटबंदी में घाटा होने पर सरकार के खिलाफ लिखने लगे थे। तब तक आप सरकार के साथ हैं क्योंकि आप नोटबंदी से पहले बहुत मसलों पर भी थे और अब ज़रा सा उबरते ही फिर किसी भी तरह से कदमताल करने लगे हैं। शुभकामनाएं।

Arun Yadav तब राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर द गाल फ्रांस का राष्ट्रपति बना था। छात्र, मजदूर और लेखकों का आंदोलन उफान पर था तथा प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यॉ-पाल सार्त्र ने इनका नेतृत्व संभाला। द गाल को सलाह दी गई कि सार्त्र को गिरफ्तार किया जाए। समझदार राष्ट्रपति द गाल ने कहा कि सार्त्र की गिरफ्तारी पूरे फ्रांस की गिरफ्तारी होगी, ऐसा नहीं होगा। सत्ता द्वारा साहित्य को दिया गया यह बहुत बड़ा सम्मान था। राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर सत्ता पर काबिज होनेवाले सत्तासीनों को द गाल से सबक लेना चाहिए और देश में दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्याएँ बंद होनी चाहिए।

Bijendra K Singh दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पीता है… लेकिन यशवंत जी ने जमीन की बात की है… सच्चाई भी है… ईव टीसिंग भी सच्चाई है… लव जिहाद भी… BBC की तो पूरी डॉक्युमेंट्री है… जै जै, अब सिटियाबाज लौंडो की खैर नहीं है, वाकई लोग योगी के इस कदम को उपयोगी बताते हुए सराह रहे हैं।

Shrikant Asthana आपसे सहमत हूं। मुद्दे से भी बहुत असहमत नहीं हूं कि शोहदे-लफंगे समस्या हैं पर सारे लड़के-लड़कियां तो लफंगे नहीं हैं! जिस तरह से इस मसले का इम्प्लीमेंटेशन हो रहा है वह बहुत खतरनाक है। भाई-बहन भी एक साथ निकलते हुए डर रहे हों तो उस स्थिति को सहज या अच्छा तो कतई नहीं माना जा सकता।

Arvind Kumar ये वो लडके है जिनके लिए मुलायम सिंह यादव जी ने कहा था कि लडके हैं गलती हो जाती है

Nagendra Singh हर बात का विरोध ठीक नही सही को सही और गलत को गलत कहने दम होनाचाहिए।

Shanu Shrivastava आप हमेशा बेबाक और सच ही क्यों लिखते हैं सर। सैलूट। वैसे लिखते रहिये। कुछ लोग ही तो हैं जो आज भी भीड़ का हिस्सा नही बने।

Shambhunath Nath सोलह आना ग्राउंड रिपोर्ट।

पंकज कुमार झा सुंदर … अब तक का सबसे बेसी समझदार पोस्ट.

Nakul Chaturvedi ये हुई न बात..

Anshuman Shukl एक दम सही लिखे हो। हद दर्जे की बदतमीजी हो रही थी और किसी का डर भी नहीं था। अब डर तो होगा।

अवधेश पाण्डेय 🙂 Sir… aapke charan kahan hain….

Shivmangal Singh साहब बच्चियों के उत्पीड़न की पराकाष्ठा हो गयी थी

Michal Chandan बेहतरीन आंकलन है आपका।

Arun Khare सौ टका सही

Purushottam Asnora सोलह आने सच.

Ranjeet Chaudhary Sahi tarkaaa

Vibhuti Narain Chaturvedi सत्य वचन । # Yashwant Singh

Sneha Mishra true sir

Abhay Ashish Jain Aap ki baat mai dum hai

Awadhesh K. Yadav सही पकड़े है।

Prakash Singh Yahi sach hai …

Harsh Kumar आप तो ऐसे ना थे?

Taukir Alam Sahi bat

Vishal Ojha ये सही ठोके आप

Raghab Jha बिल्कुल सही।

Mayank Pandey Pahlee bar samajhdaari ki baat… Jai jai

प्रयाग पाण्डे सौ आना सच।

Ashok Aggarwal दमदार

Anupam Srivastava first time your bhadas on right dirction

Amit Singh सत्य वचन।

Kamlesh Kumar O Positive ज बात खरी खरी जानेमन कहीन

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