मध्य प्रदेश में अभिव्यक्ति की आजादी पर सत्ता के अहंकार का निर्लज्ज हमला

नईदुनिया समूह के भोपाल दैनिक नवदुनिया पर भाजपा पार्षद और उनके गुर्गों का हमला कहीं अभिव्यक्ति की स्वाधीनता पर पार्टी की अभिव्यक्ति तो नहीं है..! अपना मानना है की ऐसा नहीं है। यह दरअसल यह सत्ता के अहंकार का निर्लज्ज प्रदर्शन है जिसमे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के जिम्मेदार लोग भी आकंठ डूबे हुए हैं। जरा याद करें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का यह दंभी डायलाग –पत्रकार-वत्रकार क्या होता है ,हमसे बड़ा कोई है क्या..! चिंता की बात यह है की सरकार ने मीडिया मालिकों को तो खूब मैनेज कर रखा है जिससे इस भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ खबरें कभी-कभार ही छपती हैं। इसे भी सत्ताधीश और उनसे जुड़े लोग पचा नहीं पाते और उनके कोप का शिकार पत्रकारों को होना पड़ता है।

मेरा अनुरोध है की कम से कम ऐसे अवसरों पर तो मीडिया हाउसों को व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता बिसरा कर साथ खड़े होना चाहिए। दैनिक भास्कर ने इस हमले की खबर तो छापी है पर आधी-अधूरी, जिसे पढ़ने पर पता ही नहीं चलता की किस अखबार पर हमला हुआ है। जो पाठक केवल एक अखबार ही खरीदता है वह इस जानकारी से वंचित रह गया। बताते चलें की जिस शीर्ष पर आज दैनिक भास्कर बिराजमान है वहाँ कभी नईदुनिया का कब्जा था। बहरहाल अभिव्यक्ति की आजादी पर अहंकार के आत्मघाती आक्रमण का सिर्फ मीडिया नहीं बल्कि सभी  एक्टिविस्टों और एनजीओ को एकजुट होकर जवाब देना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार नरेन्द्रकुमार सिंह ने सही कहा है की पार्टी को भी इस पर कार्रवाई करनी चाहिए।

भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार श्रीप्रकाश दीक्षित की रिपोर्ट.

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भिंड में खिसियानी पुलिस ने पत्रकारों पर भड़ास निकाली, कैमरा तोड़ने का प्रयास

भिंड पुलिस का शर्मनाक और बेरहम चेहरा एक बार फिर सामने आया है… गोहद थाना क्षेत्र के विजसेन के पूरा में चोर पकड़ने गई पुलिस पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया और दो इंसास रायफल लूटने के बाद फरार हो गए… इस घटना के बाद पुलिस पूरी तरह से बौखला गई….  बौखलाहट में पुलिस पूरी तरह दबंगई पर उतर आई…. पुलिस को जब आरोपी नहीं मिले तो पुलिस आरोपियों के छोटे-छोटे बच्चे और उनकी पत्नी व माँ सहित पांच लोगों को उठाकर मालनपुर थाने ले आई….

इन परिजनों को अवैध रूप से हिरासत में रखा. वह भी बिना महिला पुलिस के. मीडिया के लोग खबर के लिये मालनपुर थाने पहुंचे. बंदूक लूटे जाने के सम्बध में वरिष्ठ अधिकारीयों के बयान देने का इंतजार कर ही रहे थे तभी पुलिस ने महिलाओं को निकाल कर एक कमरे से दूसरे कमरे में ले जाने का प्रयास किया. तब कुछ मीडिया कर्मियों ने फोटो लेना चाहा. इस पर थाने में तैनात एसआई विजेंद्र सिंह भड़क गए और मीडिया के साथ बदसलूकी की. एक चैनल के पत्रकार का कैमरा तोड़ने का प्रयास भी किया और मीडिया पर मुकदमा दर्ज करने की धमकी दे डाली. इसके साथ ही मीडिया के लोगों को थाने के बाहर कर दिया.

कुछ देर तक तो थाने में आपातकाल जैसी स्थिती हो गई. पुलिस की सारी दबंगई पत्रकारों ने कैमरे में कैद कर ली. साथ ही कैद हुआ पुलिस का बेरहम चेहरा. जब इस बात की शिकायत पुलिस अधीक्षक से की गई तो उल्टा उन्होंने भी मीडिया को दोषी ठहराया. हालांकि पुलिस चौबीस घंटे से अधिक बीत जाने के उपरांत भी बदूंके तो बरामद नहीं कर सकी लेकिन मीडिया पर पुलिस की भड़ास जम कर निकाली. इस घटना के उपरांत राजधानी भोपाल में IFWJK पत्रकार संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के.एम. झा ने मध्य प्रदेश सरकार के गृह मंत्री बाबूलाल गौर और डीजीपी से मिलकर इस घटना के विरोध में उनको ज्ञापन सौंपा और मालनपुर थाना इंचार्ज बिजेन्द्र सिंह पर कार्यवाही की मांग की.

भिंड से प्रदीप शर्मा की रिपोर्ट.

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The DUJ denounces these attacks on the freedom of the press

The Delhi Union of Journalists (DUJ) condemns the increasing curbs and restrictions being imposed on journalists in various parts of the country. In the latest instance, the West Bengal government has banned the movement of journalists within the state secretariat ‘Nabana’. Journalists holding Press Accreditation cards issued by the state government have been barred from moving beyond the designated Press Corner in the building. Violators, have been threatened with dire consequences, including arrest and slapping of cases charging them of violating the official secrets Act.

The 14 storied Nabanna houses important departments such as home, finance, minority affairs, public works department, personnel and administration, office of the chief minister, apart from a host of others. Restraining journalists to a corner will restrict their information collection to only what is doled out by the authorities.

In the last three and half years of TMC rule in West Bengal, several journalists have had to face the ire of the ruling party and were beaten up by its goons. Earlier this year journalists were beaten up inside the secretariat premises. The government has failed to take action against the culprits despite being provided with clinching evidence. The DUJ denounces these attacks on the freedom of the press.

Press Statement

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बाड़मेर के भाजपा जिलाध्यक्ष ने लगातार दो दिन मीडियावालों को पिटवाया, थार प्रेस क्लब ने दिया धरना

बाड़मेर : नगर निकाय चुनावों की कवरेज में लगे मीडियाकर्मियों पर बीजेपी कार्यकर्ताओ द्वारा लगातार हमले हो रहे है. शनिवार और रविवार को मीडिया पर हमले सत्ता के नशे में चूर भाजपा जिलाध्यक्ष के इशारे पर हुए. शनिवार को मतदान के दौरान वार्ड संख्या 33 में कवरेज करने गए एक समाचार पत्र के पत्रकार पर बीजेपी कार्यकर्ताओ ने हमला किया और निर्वाचन विभाग द्वारा जारी मीडिया पास को फाड़ दिया. अखबार के संवाददाता को जान से मारने की धमकी दी.

रविवार को बीजेपी प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी की कवरेज करने गयी मीडिया टीम पर एक बार फिर बीजेपी कार्यकर्ताओ ने जिलाध्यक्ष जालम सिंह रावलोत के इशारे पर हमला किया और मीडियाकर्मियों के जबरदस्ती कैमरे बन्द करवा दिए. मीडियकर्मियो से मारपीट की इन दोनों घटनाओं से बाड़मेर मीडिया के साथी भडक़ गये और इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए सोमवार को थार प्रेस क्लब के बैनर तले कलेक्ट्रेट के आगे सांकेतिक धरना दिया धरने पर बैठे गए.

धरने पर बैठे पत्रकारों को वरिष्ठ पत्रकार भूरचन्द जैन, धर्म सिंह भाटी, दुर्ग सिंह राजपुरोहित, चंदन सिंह भाटी, पवन जोशी, मुकेश मथरानी सहित कई पत्रकारों ने संबोधित किया. दोनों घटनाओं के विरोध में थार प्रेस क्लब से जुड़े बाड़मेर के पत्रकारों ने जिलाधीश बाड़मेर को ज्ञापन सौंप कर बीजेपी जिलाध्यक्ष जालम सिंह रावलोत और बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की मांग की. मीडियाकर्मियों पर हुए लगातार हमलों के विरोध में बाड़मेर के सभी पत्रकारों ने एक सुर में सार्वजनिक रूप से जालम सिंह रावलोत के बहिष्कार का निर्णय लिया है. थार प्रेस क्लब के अध्यक्ष धर्मसिंह भाटी ने बताया कि बाड़मेर में चुनावों के दौरान लगातार मीडियाकर्मियों पर हमले हुए हैं. बाड़मेर के सभी मीडियाकर्मी जालम सिंह रावलोत के हर कार्यक्रम का बहिष्कार करेंगे. रावलोत के किसी भी कार्यक्रम की कवरेज मीडियाकर्मियों द्वारा नहीं की जाएगी.

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दिल्ली की मर्दानी पुलिस पर सरेआम हमला, मीडिया वालों को भी गालियां दी गई (देखें वीडियो)

Kumar Sauvir : गैंग्स ऑफ़ वासेपुर का एक मशहूर डॉयलाग है:- यह तुम से नहीं हो पायेगा बेटा। दिल्ली के कनाट प्लेस में कुछ ऐसा ही मामला हुआ जहाँ शराब में धुत्त दिल्ली के बड़े रसूखदार रईसजादों ने हंगामा किया। दिल्ली की मर्दानी पुलिस पर सरेआम हमला बोला, भद्दी गालियाँ दीं, जान से मारने और वर्दी उतार लेने की धमकी दीं। एक चैनेल के रिपोर्टर और विडियो कर्मी को भी गालियां दी गई।

आजकल यह मामला व्हाट्सअप पर धूम मच रहा है। जिसमें 4-5 नशेडी दंगा कर रहे हैं और करीब पौन दर्जन पुलिसकर्मी चूहे की तरह बचने की फिराक में हैं। हैरत की बात है कि मीडियाकर्मी पूरी तरह मुस्तैद हैं। ख़ैर, वहां अगर अभी कोई आम आदमी होता तो पुलिसवाले एकसाथ मिलकर उसका पिछवाड़ा लाल करके हवालात में भेज चुके होते। शर्म आती है कि अरविन्द केजरीवाल ने ऐसे ही पुलिसवालों को एक करोड़ रूपया देने का एलान कर रखा है। यकीन मानिए कि अगर एक करोड़ का वादा मेरे साथ हुआ होता तो :-कसम से, मैं तो इनमें से हर एक को हर कीमत पर हवालात तक पहुंचा देता। ना कर पाटा तो कम से कम इतना तो ईत्मिनान कर ही लेता कि मेरे परिवारीजनों को एक करोड़ का मुआवजा मिल जाए। वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=Yav9VegCYCY

वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के उपरोक्त फेसबुक स्टेटस पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shalabh Mani Tripathi : दिल्ली पुलिस शर्म करो, तुमसे ज़्यादा दिलेरी तो मीडिया ने दिखाई !!

Amit Sahgal : शर्मशार कर रहे है ऐसे लोगो के संस्कार । जो इनके माँ बाप द्वारा दिए गए फिर चाहे पुलिस हो या नशेड़ी । इनको तो चौराहे पर जूते मारने चाहिए।

Abhi Nov : फर्जिये चिल्लाते है सब कि यूपी मे बडे बडे रंगबाज़ है , लेकिन दिल्ली के रंगबाज़ो को तो देखिये कैसे पुलिस की साकी नाका कर रहे है , हमने तो भई ना देखी ये रंगबाज़ी यहाँ …… हमारे यहा तो पुलिस बानर की सी लाल कर देती है इत्ते मे तो …

Yogesh Yadav : आपने लिख तो दिया कि शर्म आती है केजरीवाल ने इन्हीं पुलिस वालों को एक करोड़ रुपया देने का एलान कर रखा है लेकिन सर इन्हीं पुलिस वालों के खिलाफ भीषण ठण्ड में केजरीवाल ने धरना दिया तो मीडिया को नौटंकी नज़र आई थी। खैर, ये तो अब मीडिया के साथ होना ही है। साहेब ने जो किया है उसका परिणाम तो सभी को भुगतना ही पड़ेगा। इसके बाद क्या हुआ, ये भी पता चल जाता तो मेहरबानी होती।।

Sandeep Verma : अब केजरीवाल नही, आपके भगवान् ही इस पुलिस के खेवनहार है ….. फस गये गुरु ..

Madan Tripathi : It is a old video, before BJP govt. came to power.

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पत्रकार अमित आर्य का मीडिया सलाहकार और पत्रकारिता छात्र शैलेश तिवारी का धर्मगुरु बनना….

अभिषेक श्रीवास्तव


Abhishek Srivastava : मुझे याद है कि एक गोरे-चिट्टे, सम्‍भ्रान्‍त से मृदुभाषी सज्‍जन थे जो आज से करीब 12 साल पहले बीएजी फिल्‍म्‍स के असाइनमेंट डेस्‍क पर काम करते थे। तब इसका दफ्तर मालवीय नगर में हुआ करता था और Naqvi जी उसके हेड थे। मैं तब प्रशिक्षु के बतौर असाइनमेंट पर रखा गया था। मैं तो ख़ैर 21वें दिन ही असाइनमेंट हेड इक़बाल रिज़वी से झगड़ कर निकल लिया था, लेकिन वे सम्‍भ्रान्‍त सज्‍जन इंडस्‍ट्री में बुलेट ट्रेन की तरह आगे बढ़ते गए। बाद में वे इंडिया टीवी गए, इंडिया न्‍यूज़ हरियाणा के हेड हुए और लाइव इंडिया हरियाणा के हेड बने।

आज पता चला कि वे अचानक हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के ”मीडिया सलाहकार” बन गए हैं। उनका नाम अमित आर्य है। जागरण की साइट पर आज इस आशय की एक ख़बर है जिसमें उन्‍होंने हिमाचल की छात्र राजनीति में एबीवीपी के अपने अतीत को इस फल का श्रेय दिया है और जेपी नड्डा को ससम्‍मान याद किया है। संयोग से आज ही हरियाणा पुलिस ने मीडिया को भर हिक पीटा है। सोच रहा हूं कि ”सिर मुंड़ाते ओले पड़ना” का उदाहरण क्‍या इससे बेहतर कुछ होगा?

अच्‍छे दिनों की ऐसी कहानियां चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। मसलन, आज शाम एनडीटीवी इंडिया के पैनल पर जो लोग बाबा प्रकरण पर जिरह करने बैठे थे, उनमें एक के नाम के नीचे परिचय लिखा था ”धर्म गुरु”। इस शख्‍स का नाम है आचार्य शैलेश तिवारी, जो भारतीय जनसंचार संस्‍थान यानी IIMC का कुछ साल पुराना हिंदी पत्रकारिता का छात्र है। पत्रकारिता पढ़ कर पांच साल में धर्म गुरु बन जाना हमारे देश में ही संभव है। ज़ाहिर है, अच्‍छे दिनों का असर रवीश कुमार जैसे ठीकठाक आदमी पर भी पड़ ही जाता है, जिन्‍होंने प्राइम टाइम पर अपनी रनिंग कमेंट्री के दौरान आज मार खाने वाले पत्रकारों के नाम गिनवाते हुए ”एबीपी” चैनल को ‘एबीवीपी” कह डाला। बहरहाल, जितने पत्रकारों को आज मार पड़ी है, उनमें मुझे इंडिया टीवी, ज़ी न्‍यूज़ और इंडिया न्‍यूज़ का कोई व्‍यक्ति नहीं दिखा। किसी को पता हो तो नाम ज़रूर गिनवाएं।

Abhishek Srivastava : ‘पाखी’ पत्रिका के दफ्तर में साढ़े तीन घंटे तक चले अपने सामूहिक साक्षात्‍कार के दौरान कुमार विश्‍वास ने दिल्‍ली के खिड़की एक्‍सटेंशन और सोमनाथ भारती वाली कुख्‍यात घटना का जि़क्र करते हुए अफ्रीकी नागरिकों को ‘नीग्रो’ कहकर संबोधित किया। जब मैंने इस पर प्रतिवाद किया, तो उन्‍हें अव्‍वल यह बात ही समझ में नहीं आई कि आपत्ति क्‍यों की जा रही है। तब मैंने उन्‍हें एक और उदाहरण दिया कि कैसे कमरे में प्रवेश करते वक्‍त उन्‍होंने अपूर्व जोशी को ‘पंडीजी’ कह कर पुकारा था। इस पर वे कुछ बैकफुट पर तो आए, लेकिन अपने इन जातिसूचक और नस्‍लभेदी संबोधनों पर उन्‍होंने कोई खेद नहीं जताया। यह प्रकरण प्रकाशित साक्षात्‍कार में गायब है। ऐसे कई और सवाल हैं, प्रतिवाद हैं जिन्‍हें संपादित कर के हटा दिया गया। ज़ाहिर है, इतने लंबे संवाद से कुछ बातें हटनी ही थीं लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हटा दी गईं जिनसे कुमार विश्‍वास के एक रचनाकार, राजनेता और सार्वजनिक दायरे की शख्सियत होने के कारणों पर शक़ पैदा होता हो।

अपने देश-काल की औसत और स्‍वीकृत सभ्‍यता के पैमानों पर कोई व्‍यक्ति अगर खरा नहीं उतरता, तो यह बात सबको पता चलनी ही चाहिए। ऐसा इसलिए क्‍योंकि जो लोग लिखे में ‘पॉपुलर’ का समर्थन कुमार विश्‍वास की पूंछ के सहारे कर रहे हैं, उन्‍हें शायद समझ में आए कि दरअसल वे अंधेरे में अजगर को ही रस्‍सी समझ बैठे हैं। ‘पॉपुलर’ से परहेज़ क्‍यों हो, लेकिन कुमार विश्‍वास उसका पैमाना कतई नहीं हो सकते। मेरा ख़याल है कि अगर साढ़े तीन घंटे चले संवाद की रिकॉर्डिंग जस का तस सार्वजनिक की जाए, तो शायद कुछ धुंध छंटने में मदद मिले। जो प्रश्‍न औचक किए गए लग रहे हैं, जो बातें संदर्भहीन दिख रही हैं और कुमार को जो ”घेर कर मारने” वाला भाव संप्रेषित हो रहा है, वह सब कुछ पूरे साक्षात्‍कार के सामने आने के बाद परिप्रेक्ष्‍य में समझा जा सकेगा। उसके बाद पॉपुलर बनाम क्‍लासिकी पर कोई भी बहस विश्‍वास के समूचे व्‍यक्तित्‍व को ध्‍यान में रखकर और उन्‍हें इससे अनिवार्यत: बाहर रखकर की जा सकेगी।

युवा मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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मैनेज आपके मालिक होते हैं और आपको सैलरी उनके हिसाब से मैनेज होने के लिए मिलती है, जर्नलिज्म करने के लिए नहीं

Vineet Kumar : तमाम न्यूज चैनल और मीडिया संस्थान प्रधानसेवक के आगे बिछे हैं..उन्हें देश का प्रधानमंत्री कम, अवतारी पुरुष बताने में ज्यादा रमे हुए हैं लेकिन उनकी ही पार्टी की सरकार की शह पर मीडियाकर्मियों की जमकर पिटाई की जाती है. पुलिस उन पर डंडे बरसाती है..हमने तो जनतंत्र की उम्मीद कभी की ही नहीं लेकिन आपने जो चारण करके जनतंत्र के स्पेस को खत्म किया है, अब आपके लिए भी ऑक्सीजन नहीं बची है..

अफसोस कि आपके लाख घाव दिखाए जाने के बावजूद वो संवेदना पैदा नहीं हो पा रही, जो मानवीय स्तर पर पनपनी चाहिए..पता नहीं क्यों, लग रहा है इसके लिए आप ज्यादा जिम्मेदार हैं जिसका सबसे शर्मनाक पहलू है कि मैनेज आपके मालिक होते हैं और आपको सैलरी उनके हिसाब से मैनेज होने के लिए मिलती है, जर्नलिज्म करने के लिए नहीं.

हमारा मीडिया जबकि राजनीतिक पार्टियों, तथाकथित बाबाओं और कॉर्पोरेट से इतना अधिक मैनेज है तो भी मीडियाकर्मी पर सरकार की शह पर पुलिस लाठियां बरसाती है..मीडिया का चरित्र इन तीनों की की ही तरह है..जितना भ्रष्टाचार और लोकतंत्र की जड़ें राजनीतिक पार्टियां कर रही है, उतना ही मीडिया भी, जितना पाखंड़ और अंधविश्वास ये बाबा-महंत फैला रहे हैं, उतनी मीडिया भी और जितना कॉर्पोरेट इस देश को लूट रहा है, लोगों की जुबान बंद कर रहा है, उतना ही मीडिया भी..फिर भी मीडियाकर्मी इनके हाथों पिट जाता है…अब सोचिए कि जिस दिन मीडिया इन सबसे मुक्त अपने चरित्र के हिसाब से जीने की कोशिश करे तब क्या होगा ? मीडियाकर्मियों की देश में लाश बिछ जाएगी.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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हरियाणा का एक भी जिला ऐसा नहीं जहां पत्रकारों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज न हुए हों

Kumar Sanjay Tyagi : हरियाणा में पुलिस बर्बरता की सही मायनों में शुरुआत ओपी चौटाला के शासन काल में हुई थी। जो भी पत्रकार चौटाला की निगाह में तिरछा चला, पुलिस के माध्‍यम से उसकी चाल सीधी करा दी गई। इससे पुलिस के भी समझ में पत्रकारों की औकात आ गई। सरकार और नेताओं के पुलिस के दुरूपयोग के सिलसिले के बाद हर‍ियाणा की पुलिस बेकाबू और बर्बर होती चली गई। हरियाणा का एक भी जिला ऐसा नहीं है जहां पत्रकारों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज न हुए हों।

इससे हुआ ये कि हरियाणा में पुलिस की करतूतों को लिखने या दिखाने की जुर्रत कोई बिरला पत्रकार ही करता है। इसका एक बड़ा कारण हरियाणा के पत्रकारों की खुद की कमियां भी हैं। अगर एक पत्रकार पुलिसिया जुल्‍म का शिकार होता है तो दूसरे साथी इसमें मजे लेते हैं। जो पत्रकार सरकार पर दबाव बना सकते हैं वह सरकार का मजा लेने में मशगूल रहते हैं। यही है हरियाणा। दिल्‍ली में बैठे महान पत्रकारों का हरियाणा की पुलिस की महानता का अहसास पहली बार हुआ है इसलिए उन्‍हें यह लोकतंत्र के चौथे स्‍तम्‍भ पर हमला दिखाई दे रहा है। हरियाणा के लिए यह रूटीन है और यही यहां के पत्रकारों की नियति है।

अमर उजाला, कानपुर से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार संजय त्यागी के फेसबुक वॉल से.

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बेचारे हिसार वाले ‘मीडिया मीठू’… वे अब भी सहला सेंक रहे हैं अपना-अपना अगवाड़ा-पिछवाड़ा…

Yashwant Singh : पहले वो पुलिस के पक्ष में बोलते दिखाते रहे क्योंकि पुलिस ने उन्हें पुचकारा था, अपने घेरे में रखते हुए आगे बढ़ाकर बबवा को बुरा बुरा कहलवाया दिखाया था… जब पुलिस को लगा कि भक्तों-समर्थकों को लतिया धकिया मार पीट तोड़ कर अंदर घुसने और बबवा को पकड़ कर आपरेशन अंजाम तक पहुंचाने का वक्त आ गया है तो सबसे पहले पुचकार के मारे तोते की तरह पुचुर पुचुर बोल दिखा रहे ‘मीडिया मीठूओं’ को लतियाना लठियाना भगाना शुरू किया ताकि उनके आगे के लतियाने लठियाने भगाने के सघन कार्यक्रम के दृश्य-सीन कैमरे में कैद न किए जा सकें… ये सब प्री-प्लान स्ट्रेटजी थी. सत्ताधारी राजनीतिज्ञों से एप्रूव्ड.

मोदी और भाजपा के बारे में दिखाते बताते जयगान करते कराते बेचारे इतने तल्लीन-लीन थे कि इन्हें तनिक अंदाजा भी न था कि मोदी-बीजेपी की कोई सरकार उन पर इस तरह जुलूम ढहवा सकती है… जब पिट पिटा कर बहुत दूर खदेड़ दिए गए तो एकाध घंटे अपने-अपने चैनलों पर अपना अपना जख्मी थोबड़ा टूटा-पिटा कैमरा आदि इत्यादि दिखाते गरियाते रहे और चौथा खंभा का नाम ले लेकर खंभे नोचने सा माहौल बनाते रहे लेकिन यह सब देर तक चल न सका… चुनावी मालपुआ से अभी तक घर उदर तर रखे हुए मालिकों ने कैमरों का मुंह ‘मीडिया मीठूओं’ के चीत्कार से हटवा कर आस्ट्रेलिया की तरफ करा दिया और इस प्रकार एक बार फिर से नमो-नमो जय-जय मोदी गान चालू हो गया… क्रिकेट, स्टेडियम और मोदी के मिक्सचर को मिलाकर सब फिर लाइव परोसने लगे… बेचारे हिसार वाले मीडिया मीठू.. वे अब भी सहला सेंक रहे हैं अपना-अपना अगवाड़ा-पिछवाड़ा… http://goo.gl/tzNxVl

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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हिसार में पुलिस ने दो दर्जन मीडियाकर्मियों को बर्बर तरीके से पीटा और कैमरा तोड़ा

संत रामपाल प्रकरण कवर करने हरियाणा के हिसार पहुंचे दर्जनों मीडियाकर्मियों को हरियाणा पुलिस ने बुरी तरह पीटा. कई चैनलों के रिपोर्टरों और कैमरामैनों को गंभीर चोटें आई हैं. पुलिस द्वारा आजतक के रिपोर्टर और कैमरामैन को पीटते हुए दृश्य न्यूज चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) ने मीडिया पर जान-बूझकर किए गए अटैक की कड़ी निंदा की है और दोषियों तो दंडित करने की मांग की है. बीईए महासचिव और वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह ने कहा है कि पुलिस ने राजनीतिक आकाओं के इशारे के बाद मीडिया पर हमला किया है ताकि पुलिस कार्रवाई को मीडिया कवर न कर सके और मौकै से मीडिया के लोगों को भगाया जा सके. ओबी वैन से लेकर मोबाइल, कैमरा तक तोड़े क्षतिग्रस्त किए गए हैं. करीब दो दर्जन पत्रकारों और कैमरामैनों को चुन चुन कर पुलिस ने निशाना बनाया है.

हरियाणा के हिसार में पुलिस प्रशासन संत रामपाल की जिद के आगे बुरी तरह पस्त हुआ है. कोर्ट की फटकार के बाद आज दोपहर जब संत रामपाल को पकड़ने के लिए आश्रम में घुसने की पुलिस कार्रवाई  शुरू हुई तो पुलिस अफसरों ने पहले से तय शर्तों के मुताबिक चुनिंदा करीब 60 पत्रकारों व कैमरामैनों को कवरेज के लिए अंदर जाने दिया. इन सभी साठ मीडियाकर्मियों की इंट्री लिस्ट के आधार पर की गई जिसे पुलिस व मीडिया के लोगों ने एक रोज पहले तैयार किया था. लेकिन जब पुलिस कार्रवाई को मीडिया वाले कवर करने लगे तो पुलिस ने अचानक न जाने किसके इशारे पर संत रामपाल के समर्थकों को छोड़कर मीडिया के लोगों को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया. इसके बाद मीडिया के लोगों में कोहराम मच गया. किसी के गर्दन पर लाठियां पड़ीं तो किसी के पैर पर. किसी के पेट में डंडे मारे गए तो किसी के हाथ पर. कई लोगों के कैमरे पूरी तरह तोड़ डाले गए. सारे मीडियावालों को आपरेशन स्थल से बहुत दूर पीटते हुए खदेड़ दिया गया.

इसके बाद सभी न्यूज चैनलों पर मीडिया की पिटाई सबसे बड़ी खबर हो गई. हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी है. ये टीवी वाले मोदी और भाजपा के गुणगान करते थकते अघाते नहीं थे. अब जब उनके उपर भाजपा सरकार की तरफ से डंडे बरसाए गए हैं तो सभी जुल्म सितम न्याय की बातें करने लगे हैं. एकतरफा रिपोर्टिंग और पेड रिपोर्टिंग के जरिए किसी पार्टी व नेता को प्रमोट करने का हश्र संभवतः ऐसा ही होता है. दुखद ये है कि लाठी खाने वाले आम पत्रकार हैं. चैनलों के मालिकों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. चैनल के मालिक तो चुनावी माल मलाई खा खा कर फिलहाल मदहोश स्थिति में हैं. उन्हें कोई फरक नहीं पड़ने वाला कि उनका पत्रकार और कैमरामैन पीटा गया है या नहीं. चैनलों पर खबरें कुछ रोज चलेंगी और फिर सब भूलकर मोदी-भाजपा गुणगान में जुट जाएंगे क्योंकि इसके लिए कार्पोरेट की तरफ से बड़ा हिस्सा-पैसा बड़े मीडिया हाउसों को मिला हुआ है.

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सत्तर सेकेंड का सीन

यह एक्शन सीन कुल सत्तर सेकेंड का रहा. इसमें सब कुछ था. सवाल पूछती हुई एक रिपोर्टर थी. उसका कैमरा था. सामने रॉबर्ट वाड्रा खड़े थे. उनके साथ उनके सुरक्षा गार्ड खडे थे. यह एक होटल का गलियारा था जहां पूरा सीन एक ही टेक में शूट हुआ. कहते हैं कि रिपोर्टर कई घंटे से उनका इंतजार करती रही और ज्यों ही राबर्ट वाड्रा जिम से कसरत करके निकले त्यों ही रिपोर्टर ने माइक लेकर पूछना शुरू कर दिया कि हरियाणा वाली जमीन के प्रकरण के बारे में उन्हें क्या कहना है? वाड्रा पहले रिपोर्टर को देखते रहे, फिर तीन बार क्रोध में भरकर कहा: ‘आर यू सीरियस?’ फिर एएनआई की उस रिपोर्टर के हाथ में ठहरे गनमाइक को जोर का मुक्का मारा. गनीमत रही कि रिपोर्टर का गनमाइक उसके हाथ छूट कर नीचे नहीं गिरा. उसके बाद वाड्रा आगे बढ गए और एक आवाज आती रही कि डिलीट कर दो…

इस घटना पर मीडिया बेहद नाराज हुआ. मीडिया बिरादरी ने, चैनल बिरादरी ने और बाकी सब मीडिया ने इस हरकत को अशोभनीय माना और मीडिया की आजादी पर हमला माना. यह हमला था भी. यह बात कई लोगों ने कही  कि वाड्रा का ऐसा गुस्सा एकदम नाजायज था. वे विनम्रता पूर्वक कह सकते थे कि ‘नो कमेंट’; या वे यह भी कह सकते थे कि ‘अभी नहीं, जब अवसर आएगा वे बात करेंगे’; या वे कह सकते थे कि मेरे वकील से बात कर लीजिए या ऐसा ही कुछ कह देते ताकि ऐसा अभद्र सीन न बनता. अगर गलती से ऐसा हो गया तो बाद में वे गलती मानकर मीडिया से सॉरी भी बोल सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा भी नहीं किया.

वाड्रा की गलती यह थी कि वे बहुत जल्द बौखला गए और गुस्से में भरकर बोल उठे. यही नहीं, उन्होंने माइक को एक झापड़ तक रसीद कर दिया. ऐसा फुटेज मीडिया के मनमाफिक था. बड़े परिवार से संबद्ध बड़े आदमी की बदतमीजी को दिखाने वाली बाइट सबसे आकषर्क बाइट थी. उसे हर चैनल ने जमकर बजाया और कुछ ने इस पर बहस भी उठाई कि यह बदतमीजी है, मीडिया की आजादी पर हमला है, वाड्रा को माफी मांगनी चाहिए.

वाड्रा ने अशिष्ट व्यवहार किया था और इस पर उनकी धुलाई होनी थी, हुई. वाड्रा जिस ताकत के प्रतीक हैं, जिस तरह के संदभरे में उनका नाम आता रहा है, उनके कारण वे सबसे बड़ी खबर बनते हैं. वाड्रा की हिफाजत करने के लिए मीडिया में कांग्रेसी टाइप के लोग आए जबकि एक नागरिक के रूप में उनका निजी सचिव कुछ बोल सकता था और मीडिया की जबर्दस्ती की आलोचना करते हुए वाड्रा  की बदसलूकी के लिए माफी मांग सकता था. कह सकता था कि एक प्राइवेट बंदा जिम से कसरत करके निकल रहा है.

उसे लेकर जमीन की खरीद-फरोख्त से संबधी कई आरोप मीडिया बार-बार प्रसारित कर चुका है. अचानक एक रिपोर्टर आगे आती है और दनाक से सवाल पूछने लगती है तो वाड्रा संभल नहीं पाते और नाराज हो उठते हैं. एक नागरिक को आप इस तरह नहीं घेर सकते. हां, वाड्रा को क्रोध नहीं करना था! यह कहा तो गया लेकिन कांग्रेसी संदीप दीक्षित द्वारा कहा गया कि जो हुआ उसके लिए अफसोस है. लेकिन वाड्रा के निजता के केस में पार्टी प्रवक्ता का बोलना कहां तक संगत था?

हम सब जानते हैं कि अब इस प्रसंग में वाड्रा साहब से सवाल करना बेकार है. यह वाड्रा को ही तय करना है कि वे मीडिया के साथ कैसा सलूक करें- जैसा सलूक करेंगे वैसा फल पाएंगे. उनके साथ किसी की हमदर्दी नहीं हो सकती. लेकिन मीडिया की उस धंधई किस्म की जिद पर गौर करें जो मीडिया को हर हाल में किसी न किसी बड़े आदमी को ‘बाइट देने’ या ‘बुलवाने’ के लिए ‘मजबूर’ करता है. वो बोलेगा तो बाइट मिलेगी, बाइट मिलेगी तो धंधा चलेगा, नौकरी चलेगी.

वाड्रा की नजर से न देखकर अगर हम किसी नागरिक के साथ मीडिया के मान्य व्यवहार की नजर से देखें तो पहला सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या रिपोर्टर ने वाड्रा से मिलने-बात करने का टाइम पहले से लिया हुआ था? अगर समय नहीं लिया गया था और अचानक गनमाइक सामने किया गया तो वाड्रा का नाजायज गुस्सा भी जायज लग सकता है. सत्तर सेकेंड की बाइट का एक कमजोर पहलू यह भी है.

मीडिया का बाइट बनाने का आग्रह किस कदर बढ़ा हुआ है वह इसी से स्पष्ट है कि मीडिया के रिपोर्टर /कैमरामेन किसी प्रेस कांफ्रेंस में जब सवाल करने या एक बाइट लेने के लिए इकट्ठे होते हैं तो अपने-अपने कैमरों को सही जगह लगाने के लिए आपस में हाथापाई तक करने पर उतर आते हैं क्योंकि अगर एंगिल बढ़िया न मिला, अगर बाइट बढ़िया न मिली तो मालिक या बड़े संपादक की डांट पडनी तय है. अंदर की यह बात रिपोर्टर/कैमरामेन की रौबदार छवि को काफी दयनीय बनाती है. वह जो कुछ करता है अपनी रोजी-रोटी, अपने नाम के लिए करता है, इसलिए अपना गनमाइक लेकर किसी न किसी के पीछे लगा रहता है- कोई शिकार मिले और उसकी पौ बारह हो जाएं!

इस प्रकरण में हमें रिपोर्टर और बाइट वाले व्यक्ति के बीच के संबंध को समझने की कोशिश करनी चाहिए. यह संबंध ‘शिकारी और शिकार’ जैसा नजर आता है. रिपोर्टर /कैमरामेन ‘शिकारी’ हैं और जिससे बाइट चाही गई है वह  है ‘शिकार’! आप अपने शिकार के पीछे दौड़ते-भागते हैं और ज्यों ही वह सामने नजर आता है आप गनमाइक बढ़ा देते हैं. वह बचना चाहता है तो आप उसके पीछे दौड़ते हैं और पूछते जाते हैं कि आपका क्या कहना चाहते हैं.

जिसके पीछे भागा जा रहा है उसके पास खबर है यानी वह खबर का स्वामी है. ऐसे में वह अगर पूछने पर जवाब नहीं देता है तो अपने आप लगने लगता है कि दाल में कुछ काला हेागा. अगर कोई मीडिया की इस जबर्दस्ती से नाराज होकर कोई कटूक्ति कर देता है तो मीडिया की आजादी पर हमला मान लिया जाता है. आखेटित बंदा बोला तो मरा, न बोला तो मरा! यह कहां का न्याय है? अपनी रोजी-रोटी की खातिर किसी को बोलने के लिए मजबूर करना कहां का डेमोक्रेटिक राइट हुआ?

लेखक सुधीश पचौरी जाने-माने मीडिया विश्लेषक हैं.

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