संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो?

Vishnu Rajgadia : संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो? किसी राज्य में भूख से किसी एक इंसान की मौत होने पर राज्य के मुख्य सचिव को जवाबदेह माना गया है। जबकि मुख्य सचिव का इसमें कोई प्रत्यक्ष दोष नहीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे मुख्य सचिव पर दायित्व सौंपा है ताकि राज्य की मशीनरी दुरुस्त रहे।

इसी तरह, अख़बार में विज्ञापन छपवाकर कोई ठगी की जा रही हो, तो इसकी जाँच करके इसे रोकने का पहला दायित्व उस अख़बार के संपादक पर है। ध्यान रहे कि उसी ठगी के पैसे से विज्ञापन की राशि का भुगतान होता है। यानी ठगी से अर्जित लाभ का शेयर अख़बार को भी मिलता है। ठगी के शिकार बेरोजगार अगर अख़बार से विज्ञापन की राशि की वसूली की मांग करें, तो क्या इज्जत रह जायेगी अख़बार की?

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार विष्णु राजगढ़िया की एफबी वॉल से. कुछ प्रमुख कमेंट्स यूं हैं :

Krishna Mohan आज का संपादक बेबस और लाचार होता है। वह किसी भी विज्ञापन पर रोक नहीं लगा सकता। यदि विज्ञापन पर रोक लगाने की कोशिश करेगा तो उसी समय उसकी छुट्टी हो जायगी। पहले संपादक ने नाम पर अखबार बिकता था। संपादक अखबार का स्टैंडर्ड बनाए रखता था ।विज्ञापन के लिए वह अपने हिसाब से जगह दिया करता था। अब वैसी बात नहीं है। अब यदि संपादक की वजह से विज्ञापन छूट जाएगा तो उस पर कार्रवाई हो जायगी। संपादक हमेशा अपनी नौकरी बचाने के ही चक्कर में लगा रहता है। यही कारण है कि जैकेट टाइप का विज्ञापन प्रचलन में आया है। ऐसी स्थिति में विज्ञापन के लिए सीधे तौर पर प्रबंधक को दोषी माना जाए किसी संपादक को नहीं।

Vishnu Rajgadia : Krishna Mohan jee, संपादक अगर किसी विज्ञापन को रोक नहीं सकता, तब भी वह उस ठगी के विज्ञापन की असलियत बताने वाली खबर तो छाप सकता है न! आखिर उसकी भी कोई सामाजिक जिम्मेवारी है।

शैलेंद्र शांत : प्रबंधक या प्रकाशक पर

Vishnu Rajgadia शैलेन्द्र शांत जी, प्रबंधक और प्रकाशक तो धंधे के लिये ही बैठे हैं। लेकिन संपादक तो नैतिकता और देश हित की बात करता है न!

शैलेंद्र शांत : अब आप तो ऐसा न कहें, सम्पादक खबरों-सम्पादकीय सामग्री के लिये जिम्मेदार होता है। अगर सम्पादक मालिक भी हो तो वह तय कर सकता है।

Vishnu Rajgadia अख़बार में छपे हर शब्द की जिम्मेवारी संपादक पर है। विज्ञापन की भी। यह तो कानूनी बात है। कोई केस कर दे समझ जाएंगे संपादक जी।

शैलेंद्र शांत : इसी से बचने के लिये डिस्कलेमर छापा जाने लगा है !

Vishnu Rajgadia जैसे होटल में खाना में जहर डालकर दे दे और बिल में लिखा हो कि पानी की जाँच आप खुद कर लें?

Anami Sharan Babal एड में क्या छप रहा है इससे मेरे ख्याल से संपादक का कोई लेना देना नहीं होना जरूरी है क्या छप रहा हैयह सरकार का अधिकार है। यहीं पर से तो पत्रकारिता चालू होती है यदि सरकार कोई भी झूठ छपवाने के लिए आजाद है तो संपादक भी अपने रिपोर्टरों को एक निर्देश दे कि हमें इस एड की असलीयत पर खबर चाहिए । यह काम कोई रिपोर्टर स्वत विवेत से या संपादक क्यों नहीं करते । संपादक अपना धर्म अदा करे सब काम सरकार और कोर्ट पर नहीं एक पत्रकार का काम यही तो है कि झूठ को बेपर्दा करे तो करे कौन रोक रहा है। पर यहां पर तो सरकार के खिलाफ लिखते पेशाब आने लगती है कि कहीं एड ना बंद हो जाए तो क्या खाक खाकर लिखएंगे

Bips Ranchi अखबार सिर्फ विज्ञापन पेज पर यह लिखना छोड़ दे कि ”छापे गये विज्ञापन की जाँच कर लें, अखबार की किसी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं” तब देखिये

Vishnu Rajgadia इस लिखने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर किसी विज्ञापन के कारण ठगी का शिकार व्यक्ति चाहे तो ठग गिरोह के खिलाफ केस करते हुए विज्ञापन की राशि में से अपनी राशि की वसूली की मांग कर सकता है।

Bips Ranchi गुरु जी मेरा कहना है की “जाँच” रीडर क्यू करे? वो तो अखबार के भरोसे उस विज्ञापन पर भरोसा कर बैठता है. अगर जिमेदार सम्पादक / अखबार नही तो सर्वेयर से सर्ये क्यू करवाते है की कौन अखबार पढ़ते या बूकिँग करवाना चाहते है. स्तर गिर रहा है गुरु जी सभी अखबार है. जैसे की वो बोला जाता है ना… दारोगा का मतलब क्या होता है ? दा रो गा : रो के दा या गा के दा. देना तो होगा. वोही हाल सभी अखबार का है. विज्ञापन चाहे कोई भी हो सिर्फ पैसा आना चाहिये.

Suraj Khanna आपने बिलकुल सही पकड़ा है मेरे ख्याल से अख़बार हम खरीद कर पढ़ते है यानि अखबार एक वस्तु है जिसे मूल्य देकर ख़रीदा गया यानी खरीददार एक उपभोक्ता है अतः उसके द्वारा ख़रीदे गए अखबार के भ्रामक विज्ञापन से कोई ठगा जाता है तो उसे अखबार के विरुद्ध उपभोक्ता फोरम में शिकायत करनी चाहिए साथ ही अख़बार के विरुद्ध मुकद्दमा दर्ज करानी चाहिए।

Vishnu Rajgadia यह भी सही है।

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मनोरंजन टीवी के फर्जीवाड़ा ‘चेहरा पहचानो इनाम जीतो’ का एक शिकार मैं भी हूं

विषय : Fraud of Manoranjan TV

निदेशक
मनोरंजन टीवी
आदरणीय सर

आपके चैनल Manoranjan TV पर आने वाले ‘चेहरा पहचानो इनाम जीतो’ विज्ञापन के जरिए लोगों को पागल बनाने का काम किया जाता है. इसका एक शिकार मैं भी हुआ हूं. मेरे पास आज दिनांक 09 दिसंबर को फोन आया कि आपको 12 लाख 50 हजार रुपए इनाम में मिलने वाला है. इसे पाने के लिए मेरे से अभी तक इनाम देने वालों ने 86 हजार रुपए तक वसूल लिए हैं.

जब मैंने पैसे वापस करने के लिए कहा तो भी इन्होंने कहा कि इसके लिए 14 हजार रुपए और एकाउंट में डाल दो. आपसे निवेदन है कि आप इस संदर्भ में मदद करने की कृपया करें ताकि मुझ गरीब को न्याय मिल सके. मैं आपको वह मोबाइल नंबर दे रहा हूं जिसके जरिए मुझे लगातार फोन किया गया और पैसे मांगे गए. वह नंबर 08969362566 है.

सतीश चन्द शर्मा
कोटपूतली जयपुर राजस्थान
M. 09314090617
satishsharma.pa@gmail.com

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गोरा रंग, कमर-घुटनों का दर्द, सेक्स पावर, नशा छुड़ाने और अभिमंत्रित ताबीज जैसे भ्रामक विज्ञापनों का प्रसारण न करें चैनल : मंत्रालय

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी चैनलों को भ्रामक और झूठे विज्ञापनों का प्रसारण नहीं करने की सलाह दी है. गोरा रंग बनाने की गारंटी, कमर -घुटनों का दर्द छूमंतर करने, सेक्स पावर बढ़ाने, नशा छुड़ाने और अभिमंत्रित ताबीज से मन की मुरादें पूरी करने वाले विज्ञापन देकर आम जनता को भ्रमित करने वाले विज्ञापन सच्चाई से कोसों दूर हैं. इन विज्ञापनों की सच्चाई के लिए उपभोक्ता शिकायत परिषद और विज्ञापन स्टैंर्डड परिषद ने अध्ययन किया तो ये विज्ञापन सच्चाई से बहुत दूर नजर आए और इन्हें कानून का उल्लंघन माना गया.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी चैनलों को झूठे प्रचार करने वाले विज्ञापनों की एक सूची थमाई है और सलाह दी है कि इनका प्रसारण न करें, नहीं तो सरकार केबल टीवी अधिनियम-1994 और औषधि एवं जादू कुप्रभाव (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 के तहत कार्रवाई करेगी. किसी न किसी टीवी चैनल पर युवाओं, महिलाओं व बुजुर्गों को आकर्षित करने वाले विज्ञापन दिखाई देते हैं.

इन विज्ञापनों को प्रभावी तरीके से बनाया जाता है ताकि लोग उनके झांसे में आएं और उनके सामान खरीद लें, लेकिन खरीदने के बाद पता चलता है कि कंपनी के दावे झूठे हैं. झांसे में आए लोगों ने भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) को बड़ी संख्या में शिकायत की. परिषद ने इन शिकायतों को उपभोक्ता शिकायत परिषद को भेजा जिसने इनकी जांच की और इनके दावों को झूठा पाया. परिषद ने ऐसे विज्ञापनों को तुरंत रोकने की सिफारिश की.

इन विज्ञापनों में बड़ी-बड़ी कंपनियों के नाम शामिल हैं. मुसली पावर एक्स्ट्रा नाम की ताकत और सेक्स पावर बढ़ाने की दवा के लिए कंपनी ने बड़े-बड़े वायदे किए, लेकिन जब उसके गुणों की जांच की गई तो वे गलत निकले. परिषद ने पाया कि न तो वह ताकत बढ़ा रही है और न सेक्स पावर. इस उत्पाद को 1954 के औषधि एवं जादू कुप्रभाव अधिनियम का उल्लंघन भी माना गया. ऐसे ही एक उत्पाद वाया गोल्ड एनर्जी पावडर, पावर मैग्नेटिक ब्रासेल्ट व शक्तिवर्धक वैक्यूम थैरेपी के दावे को भी गलत माना गया. नामी कंपनी डिटोल के विषाणुओं के कारण होने वाली 100 बीमारियों से लड़ने के दावे को भी झूठा बताया गया.

लंबाई बढ़ाने की फुलग्रोथ दवा, नशामुक्ति के लिए फुल स्टाप एडिक्शन पावडर, शूगर की बीमारी का इलाज करनेवाली मधुनाक्शणी व लाइलाज रोगों से मुक्ति के लिए वैदिक अमृत के दावों को भी गलत पाया गया. युवा लड़के एवं लड़कियों में गोरा होने व स्किन ग्लो करने की क्रीमों के विज्ञापनों को भी पूरी तरह से गलत पाया गया.

फेयरलुक क्रीम, फेयरप्रो, चोले वाले हनुमानजी, राशि रत्न टोपाज व महाधन लक्ष्मी आदि विज्ञापनों को भी नियमों के खिलाफ माना गया है. इन सभी कंपनियों को विज्ञापन रोकने और टीवी चैनलों को ऐसे विज्ञापनों को प्रसारित न करने का आग्रह किया गया है.

आपको भी कुछ कहना-बताना है तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

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