तो ओपी सिंह को डीजीपी बनाने में योगी सरकार को ये दिक्कत महसूस हो रही है….

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनहित के तमाम फैसले तो धड़ाधड़ ले रहे हैं, लेकिन जमीन पर यह फैसले उम्मीद के अनुसार फलीभूत होते नहीं दिख रहे हैं, जिसका गलत मैसेज जनता के बीच जा रहा है, तो विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका मिल रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि चूक कहां हो रही है?  क्या सरकारी मशीनरी योगी सरकार के मंसूबों पर पानी नहीं फेर रही है ? योगी की बार-बार की डांट-डपट के बाद भी नौकरशाही के कानों पर जूं क्यों नहीं रेंग रही है ? चर्चा यह भी है कि ब्यूरोक्रेसी के दिलो-दिमाग में यह बात घर कर गई है कि यूपी की सरकार पीएमओ से चल रही है ? सरकार के गठन के समय प्रमुख और मुख्य सचिव से लेकर अब पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति तक में जिस तरह की फजीहत योगी सरकार की हो रही है, उससे ब्यूरोक्रेसी के बीच यही मैसेज गया है कि यूपी में सभी प्रमुख पदों पर नौकरशाही की नियुक्ति में योगी नहीं, केन्द्र की मोदी सरकार की चल रही है. वह महत्वपूर्ण पदों पर अपने हिसाब से अपने पसंद के अधिकारियों का बैठा रहा है, ताकि केन्द्रीय योजनाओं को पीएम की इच्छा के अनुरूप लागू किया जा सके. 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए ऐसा आवश्यक भी बताया जा रहा है.

सीएम योगी ने कुर्सी संभालते ही अपनी पसंद का प्रमुख सचिव बनाने के लिये आईएएस अधिकारी अवनीश अवस्थी को दिल्ली से बुलाया था, लेकिन उनकी चली नहीं और एस0पी गोयल को दिल्ली ने प्रमुख सचिव के रूप में नामित कर दिया, आज भी गोयल प्रमुख सचिव हैं, जबकि अवनीश को प्रमुख सचिव सूचना के पद पर संतोष करना पड़ा। इसी तरह से मुख्य सचिव के रूप में भी यूपी के वरिष्ठ स्वच्छ छवि वाले आईएएस प्रवीण कुमार जैसे तमाम काबिल अफसरों को अनदेखा करके सीएम योगी को केन्द्र की इच्छा का सम्मान करते हुए दिल्ली से भेजे गये आईएएस राजीव कुमार को मुख्य सचिव बनाना पड़ा था.बात यही नहीं रूकी है. देर-सबेर  ब्यूरोक्रेसी में एक और बड़ा फेरबदल देखने को मिले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस चर्चा को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दलजीत सिंह के दिल्ली से लखनऊ आने के बाद ज्यादा बल मिला है। दलजीत सिंह हैं तो ब्यूरोक्रेट्स, लेकिन दलित परिवार से आने के कारण इनके माध्यम से बीजेपी दलित वोटरों के बीच पैठ बढ़ाना चाहती है। हो सकता है अभी इन्हें कृषि उत्पादन आयुक्त जैसा कोई महत्वपूर्ण पद दे दिया जाये और चुनावी बेला में यह मुख्य सचिव की कुर्सी तक पहुंच जायें।

अब 1983 बैच के आईपीएस अधिकारी ओ0पी0सिंह की डीजीपी पद पर नियुक्ति और उनके कार्यभार नहीं ग्रहण करने के कारण योगी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। कहा यह जा रहा है कि पीएमओ ने ओ0पी0 को रिलीव ही नहीं किया जिससे उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़े हो गये. विपक्ष ने भी इससे मुद्दा बना दिया. असल में ओ0पी0 सिंह का बैक ग्रांउड उनके लिये परेशानी का सबब बन गया है। बात जून 1995 की है. तब प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की संयुक्त सरकार थी. मुलायम सिंह सीएम थे. मुलायम सरकार को सत्ता संभाले डेढ़ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका था. इस दौरान सपा-बसपा के बीच तमाम मुद्दों पर दूरियां काफी बढ़ गई थीं. बसपा बार-बार समर्थन वापसी की धमकी दे रही थी. इसी बीच जब बसपा सुप्रीमों मायावती ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया तो सपा के दबंगों ने बसपा सुप्रीमों मायावती को लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में बंधक बना लिया. कहा यह गया कि सपा नेताओं ने मायावती के साथ काफी अभद्रता की.वह उन्हें जान तक से मार देना चाहते थे.तब केन्द्र में अटल सरकार थी.उसके हस्तक्षेप से मामला ठंडा पड़ा। बीजेपी ने मायावती को पूरा समर्थन दिया. वह सीएम बन गईं. उस समय ओ0पी0 सिंह लखनऊ के एसएसपी थे. माया के सीएम बनने के बाद ओपी सिंह को  निलंबन का समाना करना पड़ा. यह घटना तो छोटी सी थी, लेकिन 22 वर्ष बाद भी बीजेपी को डर सता रहा है कि अगर ओपी सिंह को सूबे का हाकिम बना दिया गया तो मायावती इसे दलित स्वाभिमान से जोड़ कर सियासी रोटियां सेंकने का मौका छोड़ेंगी नहीं. दलित वोटों के लिये चिंतित बीजेपी कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है. वैसे भी सहारनपुर में दलितों के साथ घटी घटना के बाद बीजेपी दलितों के मामले में बैकफुट पर है।

वैसे, कुछ सूत्रों का यह भी दावा है कि ओ0पी0 सिंह डीजीपी के लिये सीएम योगी की पहली पसंद नहीं थे, मगर पार्टी के एक कद्दावर नेता और केन्द्र में मंत्री के चलते योगी ने ओ0पी0 सिंह के नाम पर सहमति तो दे दी, परंतु जब उन्हें लगा कि ओ0पी0सिंह की छवि निर्विवाद नहीं रही है.उन्हें डीजीपी बनाने से दलितों में गलत संदेश जायेगा, तो योगी ने पीएम मोदी से मुलाकात करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया. इसके बाद ही ओ0पी0 को पीएमओ से रिलीव नहीं किया गया. हो सकता है भावेश कुमार को डीजीपी के पद की जिम्मेदारी सौंप दी जाये। वह योगी की पहली पंसद तो हैं ही अभी उनका रिटायर्डमेंट भी करीब नहीं है।    

खैर, बात इससे आगे बढ़ाई जाये तो सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि सीएम योगी स्वयं नौकरशाही का कैसे बखूबी इस्तेमाल किया जाये इसको लेकर भी तमाम मौकों पर दुविधा में नजर आते हैं। यह दुविधा सरकार के गठन के समय से शुरू हुई थी और अब तक जारी है। बात पिछले वर्ष हुए विधान सभा चुनाव प्रचार के समय की है। तब तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर और डीजीपी रिजवान अहमद के खिलाफ बीजेपी नेताओं-कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग तक से शिकायत की थी कि दोनों अधिकारी सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के एजेंट के रूप में काम कर कर रहे हैं। बीजेपी के पक्ष में नतीजे आते ही इस संभावना को बल मिलना शुरू हो गया कि सीएम योगी सबसे पहले मुख्य सचिव राहुल भटनागर और डीजीपी रिजवान अहमद की छुट्टी करेेगी, लेकिन ऐसा करने की बजाये योगी ने घोषणा कर दी कि नौकरशाही गलत नहीं होती है.इसको चलाने वाले गलत होते हैं. हम  इसी नौकरशाही से काम लेकर दिखायेंगे. इसके साथ ही योगी ने यह फरमान भी सुना दिया कि अधिकारी बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के दबाव में न आयें। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी वालों की इन सहित तमाम अधिकारियों ने सुनना बंद कर दिया। योगी के इस एक फरमान से बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया। यह मामला बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के समाने भी पहुंचा था। इस पर शाह ने  सभी मंत्रियों को आदेश दिया था कि वह पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलने का समय निकाले, ताकि जनता की समस्याओं का निराकरण हो सके।

मुद्दे पर आते हुए बात सीएम योगी के ब्यूरोक्रेसी में बदलाव नहीं करने वाले फैसले की कि जाये तो इससे संगठन में यह संदेश गया कि सरकार को कार्यकार्ताओं की भावनाओं की कद्र नहीं है। भ्रष्टाचार को लेकर योगी सरकार सख्त नहीं है। दरअसल, यह धारणा मुख्य सचिव राहुल भटनागर को नहीं हटाये जाने के कारण बनी थी। तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर कभी अपनों के बीच ‘शूगर डैडी’ के नाम से मशहूर हुआ करते थे, उनके चीनी मिल मालिकों से बहुत अच्छे संबंध थे,इस लिये उनकी छवि पर भी उंगली उठती थीं. राहुल भटनागर को करीब तीन माह के बाद काफी फजीहत उठाने के बाद योगी ने चलता किया गया और  भटनागर की जगह पीएमओ की पंसद के राजीव कुमार को मुख्य सचिव की कुर्सी सौंपी गई।

योगी सरकार के दस माह के शासनकाल में नौकशाहों की लापरवाही के कारण उनकी सरकार की किरकिरी की लम्बी चौड़ी लिस्ट तैयार की जा सकती हैं। विधान सभा में मिले सफेद पाउडर को खतरनाक पीटीईएन पाउडर बताना, किसानों का लोन माफ करने में की गई लापरवाही का प्रकरण अथवा सरकारी अस्पतालों में बच्चों की मौत के मामलों, गोरखपुर महोत्सव सहित अन्य कुछ घटनाओं के कारण योगी सरकार की फजीहत को भुलाया नहीं जा सकता है। बात विधान सभा में मिले सफेद पाउडर की कि जाये तो यह एक ऐसा मौका था, जब सीएम योगी ब्यूरोक्रेसी को कड़ा संदेश दे सकते थे। ब्यूरोक्रेसी की लापरवाही के कारण ही सीएम योगी ने सदन में बयान दे दिया था कि यह एक आतंकी घटना हो सकती है. जितना पीटीईएन पाउडर मिला है,उससे पूरी विधान सभा उड़ाई जा सकती थी। इसके बाद आनन-फानन में पूर्व विधान सभा सदस्यों सहित तमाम लोगों के प्रवेश पत्र निरस्त कर दिये गये.बाद में पता चला कि विधान सभा हाल में मिला पाउडर पीटीईएन नहीं, लकड़ी के फर्नीचर और खिड़की-दरवाजों पर पॉलिश करने के काम आने वाला साधारण पाउडर था. इतनी बड़ी चूक हो गई, मगर किसी बड़े अधिकारी के ऊपर आंच नहीं आई,जबकि इसमें कई अधिकारियों के निलंबन की प्रबल संभावना जताई जा रही थी. इसके बजाये एक छोटे से अधिकारी को ‘शूली’ पर लटका कर सरकार ने अपने कृतव्यों की इतिरी कर दी.

नौकरशाही मनमानी ही नहीं करती है, मुख्यमंत्री को गुमराह करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। इसका एक उदाहरण कुछ माह पूर्व वाणिज्य विभाग बना था। मुख्यमंत्री योगी के अधीन आने वाले वाणिज्य कर विभाग में एक हजार वैट अधिकारियों के स्थानान्तरण व तैनाती को लेकर खींचतान चल रही थी, लम्बे मंथन के बाद विभाग के 84 ज्वाइंट कमिश्नरों की सूची गोपनीय ढंग से जारी की गयी, कई अधिकारियों के लिए पद भी खाली छोड़े गए, लेकिन शासन में बैठे अधिकारियों ने सीएम को जो जानकारी दी वह हकीकत से कोसों दूर थी। सीएम को बताया गया कि अगर विभाग में अधिकारियों की तैनाती में फेरबदल किये गए तो इसका प्रभाव जीएसटी के अनुपालन पर पड़ेगा और ये फेल हो सकती है।

योगी सरकार में पंचम तल और जिलों में तैनात नौकरशाह/अधिकारियों की लापरवाही के चलते सरकारीं फाइलों की रफ्तार सुस्त है तो मोदी की महत्वाकांक्षी किसानों का ऋण माफी योजना में भी नौकरशाही के कारण सरकार को फजीहत उठानी पड़ी. योगी का गौ-माता प्रेम जगजाहिर है।योगी जी जानते हैं कि पॉलिथीन के बैग्स सबसे अधिक गौ-माता को नुकसान पहुंचाते हैं, इसको लेकर निचली से ऊपरी कोर्ट तक के तमाम आदेश आ चुके हैं, मगर पॉलिथीन आज तक बंद नहीं हो पाई है। इससे बाजार पटा पड़ा है तो नालियां और नाले चोक हो रहे हैं। योगी ने पदभार ग्रहण करते ही प्रदेश की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का बीड़ा उठाया था। अधिकारियों के समाने समय सीमा रखी गई थी, परंतु यूपी तो दूर आज तक राजधानी लखनऊ तक गड्ढा मुक्त नहीं हो पाई है। इसी प्रकार अतिक्रमण और जाम से भी जनता को छुटकारा नहीं मिल पाया है। अवैध निर्माण और नजूल की जमीन पर कब्जा दिन पर दिन पैर पसारता जा रहा है.

शेयर बाजार की तरह ‘चढ़ते-उतरते’ नौकरशाह

कहा जाता है कि शेयर, बाजार की चाल और नौकरशाही राजनीति की नब्ज बहुत जल्दी पकड लेते हैं. लम्बे अंतराल के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में भगवा का परचम फहराते ही नौकरशाही ने अपने आप को इसी रंग में रंगने में देर नहीं की. कोई ब्यूरोक्रेटस भगवा साड़ी में नजर आती तो किसी की कमीज का रंग बदल गया है। सीएम सचिवालय का रंग बदल कर भगवा किया गया तो अस्पतालों में हरे रंग की जगह भगवा ने ले ली. इसमें से काफी कुछ सरकारी आदेश पर किया गया तो नौकरशाही द्वारा सीएम योगी को खुश करने को लखनऊ के विधान भवन के सामने स्थित हज हाउस तक को भगवा रंग में रंग देने का कारनामा भी कर दिखाया गया,यह और बात थी कि हो-हल्ला होने के नौकरशाही ने ठेकेदार की गलती बता कर पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया. काफी किरकिरी के बाद प्रदेश सरकार ने हज समिति के कार्यालय को भगवा रंग से रंगवाने वाले सचिव आर0पी0 सिंह को हटाया तो जरूर लेकिन तब तक इस एक अधिकारी की हरकत से योगी सरकार को ‘नुकसान’ हो चुका था.

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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इस पुलिस कप्तान ने गरीब मां को वापस दिला दी खोई ‘ज़िदगी’! (देखें तस्वीरें)

फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाली एक अनाथ और फटेहाल महिला के लिए भगवान बन प्रकट हुए अलीगढ़ के एसएसपी राजेश पांडेय

नाम- मीना देवी, उम्र लगभग 34 वर्ष, आस-पास के लोगों के सहयोग से परिवार का भरण-पोषण। पति- कन्हैया, काम- मजदूरी, स्टेटस- कई महीने से गायब| मूल निवास-छोटी कशेर थाना डिवाई, जनपद बुलंदशहर। वर्तमान निवास- फुटपाथ, शमशाद मार्केट जनपद अलीगढ़| लड़का- विकास, उम्र- 4 माह, कोई चोरी कर ले गया| लड़की- काजल, उम्र- 8 वर्ष, कोई चोरी कर ले गया| लड़का- राहुल, उम्र 10 वर्ष, बिरियानी के ठेले पर मजदूरी|

मीना देवी पति के गायब होने के बाद से मुफलिसी में जीवनयापन करती हैं। मजदूरी मिल गयी तो ठीक, नहीं तो लोगों से सहयोग माँग कर बच्चों का पेट भर रही थीं। लगभग 4 माह पहले जब अपने बच्चों के साथ फुटपाथ पर सो रही थी, रात्रि में कोई उसके 4 माह के बच्चे को चोरी कर ले गया।  फुटपाथ पर खोखे, रेहड़ी लगाने वाले लोगों से गुहार की, सभी लोगों ने सलाह बहुत दी, पर मदद किसी ने नहीं की।

10 दिन पहले रात्रि जब वह बड़े बेटे व बेटी के साथ फुटपाथ पर सो रही थी, कोई उसकी बेटी को भी चोरी कर ले गया। फिर उसने मदद की गुहार की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। न कोई नेता आया, न कोई संस्था, न तमाशबीन आये, न पुलिस, न पत्रकार, न कोई चैनल ,न कोई हल्ला मचा। वह पागलों की तरह लोगों के पास भटकती रही।

कल मेरे सरकारी ड्राइवर मौ. हनीफ ने मुझे बताया कि शमशाद मार्केट में फुटपाथ पर रहने वाली एक महिला के दो बच्चे चोरी कर लिए गये, उसकी कोई मदद नहीं कर रहा है। दो प्रयास के बाद आखिरकार महिला शाम को 8:00 बजे फुटपाथ पर सोती मिली। फुटपाथ पर अशोक के पेड़ की डाल पर धागे में लटकाई हुई अपनी बेटी काजल की पासपोर्ट साइज की फोटो दिखा कर रोने लगी और कहने लगी “मैंने फोटो भी टांग दी” फिर भी कोई नहीं बता रहा है।

उसकी यह व्यथा, पीड़ा, गुस्सा और बेबसी देखकर थोड़ी देर के लिए मैं भी संज्ञाशून्य हो गया। आस-पास लगी लोगों की भीड़ मे सभी शान्त थे।थाना सिविल लाइन के प्रभारी निरीक्षक को बुलाकर तुरन्त मुकदमा कायम कराया गया। टीम बनवायी और बच्चों के बरामदगी का प्रयास किया जा रहा है। उसकी किसी ने नहीं सुनी क्योंकि वह गरीबी रेखा के अन्तिम पायदान पर है। मेरे समाज ने उसे सामाजिक संरचना में कोई स्थान नहीं दिया ।

26 अक्टूबर 2017 को फुटपाथ पर सोने वाली मीनादेवी जिसके दो बच्चे चोरी हुए थे, जिसका दुख, पीडा, गुस्सा ,समाज के प्रति मन में उपजी भावना और बच्चो से विछड़ने की वेदना मैंने देखी थी। आज उसी मीना देवी की खुशी, ममता, दुलार, विजयीभव मुद्रा भी मैंने देखी। आज उसकी लडकी काजल (उम्र 08 वर्ष) उसे मिल गयी।

जैसे ही सूचना मिली कि काजल वापस आ गयी है तो मैं किसी घटना व दुर्घटना की आशंका से मीना देवी के पास पहुंचा और मीना देवी अर्द्धविक्षिप्त सी मुझसे लिपट गयी और रोने लगीं। चिल्लाने लगीं और काजल का हाथ पकड़कर जोर-जोर से उसने बताया कि मेरी काजल आ गयी। काजल को उसने सीने से लगा लिया। मैंने जब काजल से बात करने की कोशिश की कि कौन लोग थे, कहां ले गये थे, कहां से आयी है, खाना मिला था या नहीं, मारते- पीटते तो नही थे, तो मीना देवी को इन सवालों में कोई रूचि नहीं थी। वह सिर्फ एक रट लगाये थी कि उसकी काजल मिल गयी।

थोडी देर में श्री तसुब्बर अली, चौकी प्रभारी भमोला तथा बहुत से पुलिस कर्मचारी आ गये। हर आते हुए पुलिस कर्मी से वह यही कह रही थी कि मेरी काजल मिल गयी, किसी को अंकल कह रही थी, किसी को बाबूजी, किसी को भइया कहा, हर पुलिस वाले से लिपट रही थी।  वहां काफी भीड एकत्रित हो गयी। सबने यह दृश्य देखा।

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मीनादेवी की आँखो में ममता का समुन्दर बह रहा था और आज मां की ममता गरीबी से जीत गयी, मां की ममता अमीरों से भी अमीर हो गयी, जिसके गवाह वहां मौजूद तमाम लोग थे। काजल को मेडिकल परीक्षण हेतु भेज दिया गया है। ऐसा लगता है कि जो लोग उसे ले गये थे वो सोशल मीडिया, समाचार पत्र, न्यूज चैनल और पुलिस टीमों की सक्रियता को नजदीक से देख रहे थे। शायद इसी वजह से काजल को रेलवे स्टेशन के पास छोड़ कर चले गये, जहां से वह पैदल अपनी मां के पास आ गयी। गहनता से विवेचना कर काजल को ले जाने वालों को चिन्हित करने का प्रयास किया जा रहा है, हो सकता है कि मीना देवी का 04 माह का बेटा भी उसकी मां तक पहुंच जाये ।

(अलीगढ़ के एसएसपी राजेश पांडेय से हुई बातचीत पर आधारित.)

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आईपीएस अफसरों पर मुकदमों की सूचना गृह मंत्रालय में नहीं है!

गृह मंत्रालय के पास आईपीएस अफसरों पर आपराधिक मुकदमों की सूचना नहीं है. यह तथ्य आईपीएस अफसरों के मामलों को देखने वाली गृह मंत्रालय की पुलिस डिवीज़न-एक द्वारा आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को आईपीएस अफसरों पर दर्ज आपराधिक मुकदमों की सूचना मांगे जाने पर बताया गया है. जहाँ गृह मंत्रालय ने यह प्रार्थनापत्र नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो को अपने स्तर से उचित उत्तर देने हेतु भेजा है, वहीँ उसने यह भी स्वीकार किया है कि आईपीएस अफसरों पर दर्ज होने वाले आपराधिक मुकदमों की सूचना की पत्रावली उसके द्वारा नहीं रखी जाती है. नूतन ने अनुसार आईपीएस अफसरों के कैडर नियंत्रण संस्था होने के बाद भी गृह मंत्रालय के पास यह बुनियादी सूचना उपलब्ध नहीं होना उनकी लापरवाही को दर्शाता है.

MHA has no record of FIRs on IPS

The Ministry of Home Affairs (MHA) has no records of criminal cases against IPS officers. This fact has been revealed by the response given by Police-I Division of MHA dealing with IPS officers,  to RTI Activist Dr Nutan Thakur as regards the various criminal cases registered against IPS officers in India.  While the MHA has forwarded the RTI application to National Crime Record Bureau to provide a suitable reply to Nutan, it has made it clear that the files in connection with registration of criminal cases against IPS officers is not maintained by it. As per Nutan, the lack of this important information by MHA which is Cadre controlling authority of IPS officers, shows the casualness of the Ministry.

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अलीगढ़ के एसएसपी राजेश पांडेय की इस संवेदनशीलता को आप भी सलाम कहेंगे

आमतौर पर पुलिस महकमे से जुड़े लोगों को रुखा-सूखा और कठोर भाव-भंगिमाओं वाला आदमी माना जाता है. लेकिन इन्हीं के बीच बहुतेरे ऐसे शख्स पाए जाते हैं जिनके भीतर न सिर्फ भरपूर संवेदनशीलता होती है बल्कि वे अपने समय के साहित्य से लेकर कला और जनसरोकारों से बेहद नजदीक से जुड़े होते हैं. किसी जिले का पुलिस कप्तान वैसे तो अपने आप में दिन भर लूट हत्या मर्डर घेराव आग आदि तरह-तरह के नए पुराने अपराधों-केसों में उलझ कर रह जाने के लिए मजबूर होता है लेकिन वह इस सबके बीच अपने जिले की साहित्य की किसी बड़ी शख्सियत से इसलिए मिलने के लिए समय निकाल ले कि उनकी सेहत नासाज़ है तो यह प्रशंसनीय बात है.

गोपाल दास नीरज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. ”कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे….” रचने वाले गोपाल दास नीरज ने राजकपूर की ढेर सारी फिल्मों के गीत लिखे. मंच पर नीरज जी की सबसे ज्यादा डिमांड रही है. पद्म भूषण नीरज जी अलीगढ़ में निवास करते हैं. अलीगढ़ में एसएसपी के पद पर राजेश पांडेय हैं जो लखनऊ के भी एसएसपी रह चुके हैं. राजेश पांडेय को जब सूचना मिली कि नीरज जी की सेहत इन दिनों ठीक नहीं है तो वह फौरन वर्दी में ही उनसे मिलने उनके आवास की ओर चल पड़े.

परसों शाम करीब आठ बजे राजेश पांडे जब नीरज जी के आवास पर पहुंचते हैं तो उनकी सादगी देखकर दंग रह जाते हैं. नीरज जी के कमरे में कूलर चल रहा था. एसी नहीं है घर में. अलीगढ़ के एक डिग्री कालेज में प्रोफेसर रह चुके महाकवि पदमभूषण नीरज जी बेहद सरल सहज इंसान हैं. वे स्वास्थ्य कारणों से अब ह्वील चेयर पर चलते हैं. आठ बजे शाम पहुंचे एसएसपी राजेश पांडेय रात साढ़े दस बजे लौटे.

यह पहली बार नहीं जब राजेश पांडेय महाकवि नीरज जी के घर पहुंचे हों. करीब दो महीने पहले जब उन्हें पता चला कि नीरज जी की तबियत काफी बिगड़ गई है तो वो खुद एक नामचीन डाक्टर को साथ लेकर उनके यहां पहुंचे और इलाज में मदद की. राजेश पांडेय महीने में एक बार नीरज जी के यहां जाकर उनका हालचाल पूछ आते हैं. इस संवेदनशीलता को लेकर अलीगढ़ के लोग एसएसपी राजेश पांडेय की काफी सराहना करते हैं.

अलीगढ़ के युवा छात्रनेता जियाउर्ररहमान का कहना है कि हम सभी लोग पुलिस विभाग से लॉ एंड आर्डर बेहतर करने की तो उम्मीद करते हैं लेकिन कोई शख्स इससे आगे जाकर जब हमारे सुख-दुख में शरीक होने लगता है तो यकीनन अच्छा लगता है. पुलिस कप्तान राजेश पांडेय जी का यह बड़प्पन है जो अपने जिले अलीगढ़ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर शख्सियत गोपाल दास नीरज जी के इलाज में सक्रिय हिस्सेदारी लेते हैं और उन्हें स्वस्थ-प्रसन्न रखने की कोशिश करते हैं. उनके इस कदम से पुलिस विभाग के बाकी लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए और जो जिस इलाके में है, वहां की साहित्य, शिक्षा, कला आदि क्षेत्रों की चर्चित हस्तियों को उचित मान-सम्मान और मदद करनी चाहिए.

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भ्रष्ट और चापलूस अफसरों ने सीएम योगी के हाथों आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के करियर का कत्ल करा दिया!

सुभाष चंद्र दुबे तो लगता है जैसे अपनी किस्मत में लिखाकर आए हैं कि वे सस्पेंड ज्यादा रहेंगे, पोस्टेड कम. सुल्तानपुर के एक साधारण किसान परिवार के तेजस्वीय युवक सुभाष चंद्र दुबे जब आईपीएस अफसर बने तो उनने समाज और जनता के हित में काम करने की कसम ली. समझदार किस्म के आईपीएस तो कसमें वादे प्यार वफा को हवा में उड़ाकर बस सत्ता संरक्षण का पाठ पढ़ लेते हैं और दनादन तरक्की प्रमोशन पोस्टिंग पाते रहते हैं. पर सुभाष दुबे ने कसम दिल से खाई थी और इसे निभाने के लिए अड़े रहे तो नतीजा उनके सामने है. वह अखिलेश राज में बेईमान अफसरों और भ्रष्ट सत्ताधारी नेताओं की साजिशों के शिकार होते रहे, बिना गल्ती सस्पेंड होते रहे.

चुनाव के वक्त चुनाव आयोग ने सुभाष चंद्र दुबे को गाजीपुर का एसएसपी बनाकर भेजा और वहां से वह सहारनपुर सीएम योगी के कार्यकाल के शुरुआती दिनों में तब भेजे गए जब जातीय हिंसा चरम पर थी. भाजपा के लोगों ने सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी लव कुमार के घर पर धावा बोल दिया था. लव कुमार की पत्नी बच्चों को जान बचाने के लिए छिपना पड़ा था. ऐसी किरकिरी से ध्यान हटाने और लव कुमार को खुश करने के लिए राज्य सरकार ने उनको नोएडा जैसे प्राइम जिले की पोस्टिंग दे डाली और सहारनपुर का जिम्मा तेजतर्रार अधिकारी सुभाष चंद्र दुबे को सौंप दिया.

उधर, नोएडा के डीएम एनपी सिंह को सहारनपुर का जिलाधिकारी बना दिया गया. एनपी सिंह की पूरे सूबे में एक अलग छवि है. वह अपनी ईमानदारी, कठिन मेहनत, जन सरोकार के लिए जाने जाते हैं. माना गया कि एनपी और सुभाष दुबे की जोड़ी सहारनपुर में सब कुछ सामान्य कर देगी. ऐसा हुआ भी. लेकिन सीएम योगी और इन दो अफसरों के बीच संवादहीनता ने बीच के दलाल अफसरों को मौका दे दिया. इन दलाल अफसरों ने सीएम योगी के कान में अपने हिसाब से फीडबैक दे दिया.

एनपी और सुभाष दुबे ने अठारह अठारह घंटे तक साथ रहकर सहारनपुर में शांति लाने की कोशिश की लेकिन इन दोनों को यह आरोप लगाकर सस्पेंड कर दिया गया कि इनमें तालमेल नहीं था और इन लोगों ने मायावती को सहारनपुर में घुसने की अनुमति दे दी थी. खासकर मायावती वाले प्वाइंट को योगी ने गंभीरता से ले लिया. जबकि हकीकत यह है कि एसपीजी कवर प्राप्त मायावती दिल्ली से जब गाजियाबाद में घुसीं और मेरठ समेत कई जिलों को पार करती हुईं सहारनपुर पहुंचीं तो इसके लिए कोई एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

एसपीजी के लोग अपने वीवीआईपी के रूट पर कई दिन पहले से काम करने लगते हैं. मतलब यह कि यह सारा कुछ बड़े अफसरों के इशारे और सहमति से हुआ था लेकिन दोष मढ़ दिया गया सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे और डीएम एनपी सिंह पर. कहा जाता है कि सहारनपुर की सीमा पर अगर मायावती को उस समय रोक दिया जाता तो सहारनपुर में उग्र हुए दलित समुदाय के लोग अपनी नेता को रोके जाने से नाराज होकर लंबा और बड़ा बवाल कर सकते थे जिसे फिर रोक पाना मुश्किल होता.

अपने छोटे से कार्यकाल में एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे ने सहारनपुर में ग्राउंड लेवल पर जो जो काम किए (कुछ दस्तावेज संलग्न हैं यहां), उसी का नतीजा है कि जो नए लोग वहां डीएम एसएसपी बनाकर भेजे गए, उन्हें बहुत खास कुछ नहीं करना पड़ा और नियंत्रित हालात का श्रेय खुद लेने का मौका मिल गया. वो कहते हैं न जो नींव के पत्थर होते हैं, उनका जिक्र कम होता है, उस मजबूत नींव पर खड़े महल को सब देखते सराहते हैं.

ये हैं सहारनपुर बवाल के असल कारण.. पर दोषियों पर कार्रवाई की जगह ईमानदार और मेहनती अफसरों को ही सस्पेंड कर दिया गया…

ये वह दस्तावेज है जिससे जाहिर होता है कि सहारनपुर के तत्कालीन डीएम एनपी सिंह और एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने ग्राउंड लेवल पर खूब सारा होमवर्क काम करने और डाक्यूमेंटेशन के बाद पब्लिक-प्रशासन-पुलिस के बीच तालमेल का एक फुलप्रूफ और जनपक्षधर तानाबाना बुना. आज इसी का नतीजा है कि सहारनपुर में सब कुछ पुलिस प्रशासन के नियंत्रण में है लेकिन इसका श्रेय एनपी-सुभाष को मिलने की जगह इन्हें निलंबन झेलना पड़ा और वाहवाही उनको मिल रही जिनका काम सिर्फ लगाना बुझाना और गाल बजाना है और अपने सियासी आकाओं का चरण चापन करना है.

आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के खिलाफ जिस कदर जहर सीएम योगी के दिमाग में बोया गया है, उसका नतीजा यह है कि इन दोनों अफसरों को आजतक अपना पक्ष रखने के वास्ते सीएम से मिलने तक का समय नहीं दिया गया. जो बिचौलिए अफसर हैं, इस स्थिति का फायदा उठाकर अपने खास चंपू अफसरों को प्राइम तैनाती दिलाने में सफल हो जा रहे हैं और जो ईमानदार हैं, वह खुद को सपा राज जैसा ही प्रताड़ित पीड़ित महसूस कर रहे हैं. चाल चेहरा चरित्र को लेकर खुद को अलग होने का दावा करने वाली भाजपा के नेताओं को यह देखना चाहिए कि भले सौ बेईमान माफ कर दिए जाएं, लेकिन किसी एक ईमानदार के खिलाफ गलत कार्रवाई न हो जाए.

चर्चा तो यहां तक होने लगी है कि पूरा सिस्टम अब इस कदर चापलूसों और चोरों से भरा हुआ हो गया है कि अब ईमानदार, तेवरदार और जन सरोकार वाला होना अपराध हो गया है. ऐसे लोगों को न तो काम करने दिया जाता है और न ही कोई ठीकठाक पोस्टिंग देर तक दी जाती है. इनके पीछे सारे बेईमान एकजुट होकर हाथ धोकर पड़ जाते हैं. सबको उम्मीद थी कि यूपी में भाजपा शासन आ जाने से लंबे समय से चल रहे सपा और बसपा के जंगलराज से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन हुआ ठीक उलटा. लग रहा है जैसे जंगलराज कांटीन्यू कर रहा है. वही भ्रष्ट और दागी अफसर मजबूत बड़े पदों पर जमे हैं जिन्होंने पिछले शासनकालों में जमकर मलाई खाई और अपनों को खिलाया. जिन्हें जेलों में होना चाहिए, वह योगी सरकार के गुड बुक में हैं और जिन्हें बड़ा पद कद मिलना चाहिए वे सस्पेंड बड़े हैं या कहीं कोने में फेंक दिए गए हैं.

सीएम योगी को अफसरों द्वारा दिए जाने वाले फीडबैक को परखने जांचने के लिए भी एक सिस्टम खड़ा करना चाहिए अन्यथा बेईमान और चापलूस अफसरों की झूठी बातों में आकर उनके हाथों बहुत सारा अनर्थ होता रहेगा, जैसे एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के मामले में हुआ है. इन दो अफसरों का निलंबन लगातार जारी रहने और इनकी बात तक न सुने जाने से ईमानदार किस्म के अफसरों में बेचैनी है. यूपी में कानून व्यवस्था से लेकर ढेर सारे क्षेत्रों में हालात न सुधरने का बड़ा कारण यही है कि अब भी प्रदेश का दो तिहाई हिस्सा भ्रष्ट अफसरों के शिकंजे में है जो भाजपा नेताओं को पर्दे के पीछे से ओबलाइज कर अपनी मनमानी कर रहे हैं.

उम्मीद करना चाहिए कि सीएम योगी के जो खास लोग हैं, वह आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे और आईएएस एनपी सिंह मामले में योगी को सच्चाई बताएंगे और इनका निलंबन खत्म कराने की दिशा में काम करेंगे. अभी अगर कोई भ्रष्ट अफसर सस्पेंड हुआ होता तो वह तगड़ी लाबिंग करके हफ्ते-दो हफ्ते में ही बहाल हो गया होता. लेकिन एनपी और सुभाष लाबिंग जैसे खेल तमाशों से दूर रहने वाले लोग हैं और अपने लिए राजनीतिक आका नहीं बनाए इसलिए अलग-थलग पड़कर भोगने के लिए मजबूर हैं. उनके पक्ष में कोई भी अफसर सीएम के सामने एक शब्द बोलने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि टाप लेवल पर बैठे अफसरों को अपनी नौकरी बचाने और कुर्सी हथियाए रहने की कला खूब आती है.

आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन भी लगभग रीढ़ विहीन मुद्रा में ही रहते हैं. इनके पदाधिकारी भी कानों में तेल डाले चुप्पी साधे पड़े हुए हैं. यहां तक कि डीजीपी सुलखान सिंह से लेकर मुख्य सचिव राहुल भटनागर तक में अपने ईमानदार अफसरों को प्रोटेक्ट करने, उनका पक्ष रख उन्हें बिना वजह दंडित किए जाने से बचाने का दम नहीं दिख रहा अन्यथा आज एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे यूं निलंबित होकर बनवास नहीं काट रहे होते. ये उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहां बदलाव के पक्ष में वोट तो पड़ते हैं लेकिन भारी भरकम नोटों के तले जनभावना कुचली जाती है, सत्ता सिस्टम का करप्टर चरित्र पहले जैसा ही बना रहता है. जो ईमानदारी से ग्राउंड लेवल पर जनसरोकार के साथ काम करता है, उसकी नियति एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे बन जाना होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के व्यक्तित्व को लेकर यशवंत द्वारा लिखी गई इस पुरानी पोस्ट को भी पढ़ें…

ये भी पढ़ें, योगी राज में अफसरशाही का हाल….

एक नज़र इधर भी….

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आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे, ये दो अफसर क्यों हैं तारीफ के काबिल, बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : इधर बीच 2 अफसरों से मिलना हुआ। एक आईएएस और दूसरे आईपीएस। क्या कमाल के लोग हैं दोनों। इनसे मिल कर ये तो संतोष हुआ कि ईमानदारी और दबंगई की जुगलबन्दी के जो कुछ स्पार्क शेष हैं इस महाभ्रष्ट सिस्टम में, वे ही जनाकांक्षाओं में उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं। इन दोनों अफसरों के बारे में थोड़ा-सा बताना चाहूंगा। इनके नाम हैं- आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे। एक नोएडा के डीएम, दूजे गाजीपुर के पुलिस कप्तान।

NP Singh

SC Dubey

वैसे बता दूं, अफसरों से मिलना मुझे पसंद निजी तौर पर पसंद नहीं, मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं। चाहे दैनिक जागरण में रहा या अमर उजाला में या आई नेक्स्ट में… चाहे सिटी चीफ रहा या संपादक रहा… अफसरों के यहां खुद चल के एक्का दुक्का बार ही गया हूंगा… दिमाग में ज्यादातर अफसरों के रीढ़ विहीन और बेईमान होने की छवि गुंथे होने से शायद उनसे मिलने जुलने से परहेज रखता रहा हूं। पिछले 8 वर्षों में, भड़ास संचालित करने के दौरान, जिन कुछ ईमानदार और कलेजे में दम रखने वाले लोगों के बारे में सुना जाना उनमें से एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे भी हैं।

एनपी का पंगा आज़म खान से हुआ था, अखिलेश के सीएम बनने के ठीक बाद। ये अफसर डटा रहा। आज़म खान कोपभवन में जाकर ही अखिलेश को मजबूर कर पाए एनपी को उनके मंत्रालय से हटाने के लिए। लेकिन तब तक अखिलेश इस अफसर की ईमानदारी, लोकप्रियता और साहस के बारे में जान चुके थे। दंगा रोकने के लिए शामली भेजे गए एनपी। अभी डीएम नोएडा हैं, काजल की कोठरी में दामन दागदार होने से बचाए हुए हैं। इन्होंने गरीब बच्चों के लिए दो रोजगार परक तकनीकी स्कूल संचालित करके कमाल का काम किया है। एक चंदौली के नक्सल एरिया में। दूसरा बनारस के अपने पिंडरा इलाके वाले गांव में। इन स्कूलों के संचालन में अपने परिवार की संपत्ति होम की और भला किया उन बच्चों का जिनका समाज में कोई नहीं। दर्जनों इनके ऐसे सामाजिक काम हैं जिनको देख सुन के कहने का मन करता है कि क्या लूटतंत्र में ऐसे भी जन सरोकारी, ईमानदार और सोशल एक्टिविस्ट टाइप अफसर हैं, जो आम जन के प्रति अपनी पक्षधरता का चुपचाप निर्वहन किए जा रहे हैं!

आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे की ईमानदारी, जन पक्षधरता और सिस्टम से भिड़ जाने का माद्दा रखने के बारे में ज्यादातर लोगों को समय समय पर मीडिया से पता चलता ही रहता है। यही कारण है कि वो या तो सस्पेंड रखे जाते हैं या फिर प्रतीक्षारत। उन्हें अक्सर चुनाव आयोग याद करता है और चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण जिममेदारी देता है। इस दफे गाज़ीपुर भेजे गए। इनने फर्जी वोटिंग के खेल का ऐसा रैकेट पकड़ा कि सात बार चुनाव जीत चुके ओमप्रकाश सिंह इस बार तीसरे पोजीशन पर अटक गए। अपने करियर में हजार से ज्यादा निर्दोषों को जेल जाने से बचाया, निष्पक्ष पुलिसिंग के मिशन को मिशनरी भाव से जीते हुए। सुभाष चंद्र दुबे की हिम्मत और ईमानदारी के दर्जनों वाकये हैं। अदभुत जीवट का पुलिस अफसर है ये। न आका टाइप अफसरों के यहां सिर नवाया न मठाधीश टाइप मंत्रियों को सलाम ठोंका। हल्लाबोल अंदाज़ में, बिना भेदभाव किए, जो गुनाहगार मिला, उसे धर दबोचा। अजगरों को उनके बिलों में घुसकर पकड़ने वाले सुभाष को सत्ता जनित बदमाशी कमीनगी और धूर्तता के जाल में फांसकर साजिशन जो उत्पीडन उपेक्षा मुहैया कराए गए उसे उनने ईश्वर की नेमत / करियर का मेडल मान कर तहेदिल से कुबूला और भरपूर एन्जॉय किया।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Golesh Swami Both are nice officers. Np singh is my good friend and subhash chandra dubey as younger brother. Np ki khasiyat yeh hai ki Lucknow mai DM koi bhee raha, jila NP singh ne hi chalya. Subhash bhai ke baare mai kya kahu heera officers mai se hai. NP aur subhash jaise officer u.p. mai unglio par ginne layak hai. Aise officer ho to u.p. sudhar jaye.

अशोक कुमार शर्मा सही बात की यशवंत आपने! मुझे मालूम है कि आप ताकत से प्रभावित नहीं होते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय के ओएसडी के रूप में मैंने दो मामलों में आपसे संपर्क किया. आपने सरकार का पक्ष तो दिया मगर कोई समझौता या मांग नहीं मानी. सूत्र भी नहीं बताया अपना. लालच में आप आये नहीं. मैंने भी अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के कार्यकाल में यही पाया कि इन दोनों अफसरों में अनेक ख़ास बातें है: एनपी साहब ओजस्वी और कड़क अफसर होकर भी आम आदमी के हक़ में सेवाभाव से खड़े रहते हैं. आसान नहीं उनको डिगाना. प्रेस क्लब के एक समारोह में मैंने उनको पहली बार बोलते सूना था. उन्होंने पत्रकारों को भी समझाया कि ईमानदारी और शासन के इकबाल का पुराना दौर वापस लाना है तो खबरों में ‘लिहाज’ ना करें किसी का. सुभाष जी क्रांतिकारी अफसर हैं. सीधे एक्शन लेते हैं. लपझप बिलकुल नहीं करते. उत्तर प्रदेश में इन जैसे अच्छे अफसरों की कमी नहीं है. लेकिन सत्ता को कदर कहाँ है? मैंने सूचना विभाग में ही देखाकभी वहां कमीशन और दलाली तंत्र शैशव और वामाना अवस्था में था. और अब? करप्शन का कारपोरेट..

Vinod Bhardwaj एन पी सिंह के बारे में खबरिया जानकारियां हैं , पर सुभाष चंद्र दुबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ । आज के सड़ांध मारते सिस्टम में भी दोनों ने अपनी महक और चमक को बरकरार रखा है । ये दोनों ही एक शानदार नजीर हैं , इनको दिल से सलाम !  … और जिसकी निष्पक्षता और काविलियत को लिखने के लिए यशवंत सिंह जैसे पत्रकार की कलम मचलने लगे , उसे किसी और के सर्टीफिकेट की जरूरत ही नहीं ! यशवंत भाई कभी मौका मिले तो डी जी सुलेखान सिंह से लखनऊ जाकर जरूर मिलना । उनसे मिलकर और उनका अतीत जानकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाओगे । ये मोस्ट सीनियर आई पी एस भी अब रिटायरमेंट के करीब ही हैं ।

S.p. Singh Satyarthi अगर यशवंत जी किसी का मूल्य लगा रहे हैं तो निश्चित ही वह हीरा होगा।

Care Naman अगर भड़ासी किसी अधिकारी की तारीफ़ कर रहा है तो सच में बंदे में है दम इस बात पर आँख बंद कर के यकीन किया जा सकता हैं

Shambhunath Shukla एनपी सिंह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर हैं। सुभाषचंद्र दुबे से कभी मिला तो नहीं पर उनके बारे में सुना अवश्य है।

Ramji Mishra हमारे महोली में एक उपजिलाधिकारी के एन उपाध्याय जी आये थे बहुत ईमानदार रहे लेकिन उनसे अतिरिक्त कमाई सपने में भी नहीं की जाती थी नतीजा यह हुआ प्रमोशन में लोहे लगते रहे हक़ मारा जाता रहा। बनारस भेज कर आबकारिविभाग में कर दिए गए लेकिन उपजिलाधिकारी का पद छीन लिया गया। और तो और अब उनकी जगह महोली की कमान उपजिलाधिकारी अतुल को दी गई है जो कई सालों से राज कर रहे हैं। अतुल इससे पहले गोरखपुर में तहसीलदार रहे हैं और वहाँ पर भी लोग दबी जुबान न जाने क्या क्या बातें इनके बारे में कहते थे। अब महोली में तो इनके संरक्षण में ही खुले आम खनन , घूसखोरी और दबंगई फलफूल रही है। यहीं नहीं अगर अतुल को जरा सा गुस्सा आता है तो सामने वाले को मारने और पीटने से भी उन्हें दनिक भी गुरेज नहीं है। फिलहाल जिन दो अधिकारियो के बारे में सर आपने लिखा उनको जय हिंद और आपकी पोस्ट सराहनीय है।

Poonam Scholar ऐसे समाज सुधारकों और अफसरों से अन्य समाजसेवियों और भावी अफसरों को अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए। आभार साझा करने के लिए।

Siddhartha Malviya ई सही पकडे हैं… दुबे जी बड़े रॉयल आदमी हैं। अच्छो के अच्छा और बुरो के लिए बहुत बुरा।

Kumar Anup Jha सर मैंने तो अभी इन दोनों सर को नहीं देखा हूँ.. नोएडा में ही रहता हूँ. जब बिहार में था तो वहां शिवदीप लांडे सर को देखा था.. वो मुझे अब तक काफी अच्छे अफसर लगे. हालांकि मैने कुछ अफसर को ही देखा है.

Varun Panwar एनपी सिंह शामली में जिलाधिकारी रहे, बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता, कुशल अधिकारी और एक अच्छे दोस्त… वैसे तो उनमें अनेको ऐसी प्रतिभा है जो शब्दों में व्यक्त करेगे तो काफी लंबा चौड़ा लिखना पड़ेगा… शामली में वो लगभग डेढ़ वर्ष रहे.. यहां के लिये उन्होंने बहुत कुछ किया… सुभाष जी मुज़फ्फरनगर में कुछ ही दिनों के लिये एसएसपी बनकर आये थे, दंगो के दौरान, एक बार मुलाकात हुई, अपने कार्य के प्रति सजग थे, जो कि वहाँ के सत्ता धारी नेताओ को रास नहीं आये.. दोनों की जोड़ी बहुत कुछ करने का माद्दा रखती है

Shahnawaz Qadri श्री एन पी सिंह के बारे मे जो आपने लिखा है वह कम है… उत्तर प्रदेश मे इस तरह के अधिकारी देखने को कम ही मिलते हैं..

Chandan Srivastava मान लीजिए मैं दिलीप मंडल हूं। तो मेरा फीड बैक यह है कि आप अव्वल दर्जे के जातिवादी, सवर्णवादी हैं। आपको दो अफसर ईमानदार मिले, एक ब्राह्मण दूसरा ठाकुर।  क्या आप यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों दलितों में कोई ईमानदार अफसर ही नहीं। 🙂

Shyam Singh उप्र. के डाकू छविराम और पातीराम गैंग को ध्वस्त करने वाले तथा दो-दो बार राष्ट्रपति पदक हासिल करने वाले तेज-तर्रार आइपीएस. विक्रम सिंह जी जब नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था। बाद में उन्हें कुमाऊं का डीआइजी. भी बनाया गया। मैंने उन्हें कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार पाया। अन्य पुलिस अधिकारियों की तरह उन्होंने किसी नेता को दंडवत् नहीं किया होगा। अध्यात्म में रुचि के कारण वे यहां स्थित अरविन्द आश्रम में जाकर उसके साधना व अन्य दैनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। उन्होंने मेरे से भी अध्याम विद्या सम्बंधी कुछ पुस्तकें लेकर पढीं। पुलिस में ऐसे अधिकारी मैंने कम ही देखे हैं।

Hero Dubey एनपी सिंह से तो परिचित नहीं हूँ सर! लेकिन सुभाष चंद्र दुबे कन्नौज के एसपी रहे हैं। वह बहुत ही शानदार अफसर हैं। जय हिन्द

Pranay Batheja सर आपको पहली बार देखा ऊपर की चंद लाईने पढा कि जिससे इतना पता चला आप पत्रकार हैं अफसरों से मिलना आपको पसंद नहीं फिर भी आप मिले शायद उनकी ईमानदारी आपको उनके ओर आकर्षित करके ले गई। इनके बारे में आप आगे विस्तार से लिखेंगे। लेकिन कोई पत्रकार के वर्तमान स्थिति को क्यों नहीं लिखता उन्हें क्यों नहीं परिभाषित करता जिसे सरकार, सरकारी तंत्र और जनता के बीच सेतु व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जो पत्रकारिता हमारे वीर क्रांतिकारी करते थे और जो पत्रकारिता वर्तमान में हो रही है इसकी वास्तविकता क्या है?

A.k. Roy वैसे मुझे भी अफसरों से मिलना अच्छा नहीं लगता मैं राजनीति एवं पत्रकारिता में रहते हुए कम से कम इन लोगों से मिलना चाहता हूं अब आपने बताया है तो कभी किसी एक कार्य हेतु मिलना हुआ अभी इनके बारे में कोई अपनी राय दी जा सकती है अगर इमानदार है तो इन्हें उसकी सजा भी आज के भ्रष्ट सिस्टम से मिलेगी चाहे वह सरकार किसी भी पार्टी की है..

Singhasan Chauhan सलाम है ऐसे ऑफिसर्स को , ऐसे ही एक IPS श्री प्रभाकर चौधरी आये थे हमारे बलिया में | काम करने का तरीका वाकई काबिले तारीफ , कच्ची दारू, सड़कों पर अतिक्रमण, थाने में दलाली वगैरह सब बंद करवा दिए थे मगर भ्रष्ट नेताओ ने 2 महीने में ही उनका ट्रांसफर करा दिया …..इमानदारी अभी भी जिन्दा है .

Ramhet Sharma आपने जो लिखा है, उससे उनका का मऩोबल बढता है.. अच्छे अधिकारियों के अच्छे कार्य की सराहना की जानी चाहिए…

Ashwani Tripathi एनपी सिंह जी, शामली के डीएम रहे। बेहद गजब की नेतृत्व क्षमता है उनमे। एक अफसर और नेता दोनों की कुशल प्ररिभाओं का समावेश है, उनके अंदर। जब तक शामली में रहे, सभी नेताओं के घरों में बने चौपाल खाली रहे। वहां तो यह कहा जाने लगा था कि इस जिले में एक ही नेता है वो है एन पी सिंह। एन पी सिंह के दरवाजे हर समय जनता के लिए खुले रहते थे। पत्रकारों के लिए भी एन पी सिंह से अच्छा कोई अफसर नहीं हो सकता। पत्रकारों के मान सम्मान को हमेशा उन्होंने बढ़ाया। रास्ते में भी कोई पत्रकार मिलता तो गाड़ी रोक कर पत्रकारों से हाल लेते। भाषण देने की उनकी क्षमता तो गजब है।

Ghanshyam Dubey N. P से सिर्फ पाला ही नहीं पड़ा , निजी तौर पर उन्हें जानता हूँ । वह एक रीढ़ की हड्डी रखने वाले कर्मठ अफसर हैं। सुभाष से कभी मिला नहीं हूँ , स्टेट लॉ एंड आर्डर देखने वाले कुछ कनिष्ठ पर काम मे तेज पत्रकारों से उनके बारे मे सुना है । सबने उनके काम – स्वभाव की तारीफ ही की है।


भड़ासानंद कहिन…

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एबीपी न्यूज की जर्नलिस्ट विनीता यादव से बदतमीजी करने वाले एसपी का हुआ तबादला

Vineeta Yadav : कल रात ख़बर मिली की हरियाणा के नारनोल के एस पी का तबादला हो गया. ये सुनकर मुझे एहसास हुआ की हरियाणा सरकार ने महिला की रक्षा की बात को गम्भीरता से लिया है. दरअसल मैं हरियाणा सरकार के शुरू किए ऑपरेशन दुर्गा की सच्चाई जानने गयी थी नारनोल जहाँ एक गाँव में महिलाओं का बुरा हाल है. इस सच पर जब मैं वहाँ के एसपी हमीद अख़्तर से पक्ष लेने गयी तो वो न सिर्फ़ भड़के बल्कि बहुत ही बेहूदा तरीक़े से चिल्लाने लगे.

मैं हैरान थी कि अचानक इतना बुरा व्यवहार क्यूँ? लेकिन हमीद अख़्तर ने अपने ओहदे का पूरा रोब दिखाया जिससे मुझे बहुत बेइज़्ज़ती महसूस हुई कि मैं वहाँ गयी क्यूँ. मैंने इस पूरे वाक्या की जानकारी हरियाणा police के आईजी अनिल राव को दी. यहाँ व्यवहार में रात दिन का फ़र्क़ था.

अनिल जी को इस बात पर काफ़ी दुःख हुआ और मुझे पता चला कि हमीद अक्सर यही व्यवहार करता है. अनिल जी ने मेरी लिखित शिकायत को गम्भीरता से लिया. इसका शुक्रिया. ऑपरेशन दुर्गा भी अनिल राव की सोच है और ये क़दम उठाकर उन्होंने इस ऑपरेशन को सत्य साबित किया वरना मुझे लगता कि ये महज़ दिखावा है क्यूँकि एक बड़ा अधिकारी अगर तहज़ीब से बात न करे तो कोई police वाला मुहिम पर क्या काम करता.

एबीपी न्यूज की तेजतर्रार पत्रकार विनीता यादव की उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Satish Yadav हामिद अख्तर खुद को मसीहा समझता था। उनके रहते क्षेत्र में अपराध के मामलों में बढ़ोतरी ही हुई। बस खुद को मीडिया की सुर्खियों में देखना उसकी एकमात्र इच्छा थी।

Rajesh Yadav हमीद अख्तर, एक IPS है और वो किसी का अपमान नहीं कर सकते। कई बार इंसान परेशान होता है और उसी समय कोई मीडिया कर्मी सवाल जबाब करता है तो हो सकता है कि उसका जबाब सही न हो मीडिया के लिए। ये आधार बना कर किसी को सर्टिफिकेट देना उचित नहीं है।

Vineeta Yadav राजेश जी आप मुझे नहीं जानते हो. अगर जानते तो ये समझ लेते कि मैं सोलह साल से पत्रकारिता में हूँ और अपना काम तरीक़े से करना जानती हूँ. इसलिए मैं एसपी का बर्ताव देख कर हैरान हुई.

Vikas Mishra चलो दुर्व्यवहार करने वाले अफसर पर गाज तो गिरी।

Vineeta Yadav बिलकुल विकास जी अब तो ट्रेंड हो गया है मीडिया के नाम पर हर पत्रकार पर हावी होने का ! बिना ये जाने की उस पत्रकार की शकसियत क्या है और कैसे बनी ! कुछ की सज़ा सबको देने चल पड़ते है

Mangesh Yadav आपकी शिकायत को गम्भीरता से लेते हुए कम से कम सरकार ने एसपी पर एक्शन तो लिया। एमपी में तो एडीएम स्तर के अधिकारी ने अपनी भड़ास ,एक लीडिंग अख़बार के संवाददाता पर निकाली और उसे जेल पंहुचा दिया।

Prabhakar Pandey लोक तंत्र में सुचिता होना एक आवश्यक तंत्र होता है और ज़हा सुचिता नहीं वहाँ आवाज उठानी ही चाहीये, चाहें वो कोई भी तंत्र हो. सत्यमेव जयते.

Mahendra Mishra हरियाणा में रामपाल के मामले में मीडिया वालों की हड्डी पसली तोड़ चुकी पुलिस को सुधारना मुशकिल ही नहीं नामुमकिन है.

Vineeta Yadav Anil ji ne woh kiya jo generally officer nhi karte hain! He did amazing work.

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केंद्र सरकार ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर के कैडर परिवर्तन से मना किया

यूपी कैडर आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा मुलयम सिंह धमकी मामले के बाद से उन्हें नौकरी में कई प्रकार से प्रताड़ित किये जाने और कई अत्यंत ताकतवर लोगों द्वारा उन्हें जान को वास्तविक खतरा होने की बात कहते हुए 16 जून 2016 को गृह मंत्रालय, भारत सरकार को अपने कैडर परिवर्तन हेतु प्रेषित अनुरोध को केंद्र सरकार से अस्वीकृत कर दिया है.

मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को भेजे अपने आदेश दिनांक 03 जनवरी 2017 में गृह मंत्रालय ने कहा है कि अमिताभ ने अपने और अपने परिवार वालों की सुरक्षा का खतरा बताते हुए किसी अन्य कैडर में भेजे जाने का आवेदन किया. गृह मंत्रालय द्वारा इसका परीक्षण किया गया और उस पर सहमति नहीं व्यक्त की गयी. अमिताभ ने कहा था कि उन्हें और उनकी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर को ताकतवर लोगों से जान को खतरा है, इस कैडर में उनके लिए स्थिति लगातार बदतर हो रही है और उनके साथ शत्रुओं की तरह बर्ताव हो रहा है. हाल में उन्हें गृह मंत्रालय के आदेशों पर राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान की गयी थी.

Central Govt rejects IPS officer’s Cadre change request

The Central Government has rejected the prayer made by UP Cadre IPS officer Amitabh Thakur to the Home Ministry on 16 June 2016 for changing his Cadre from Uttar Pradesh to any other State, alleging serious harassment in his service and threat to life, after the Mulayam Singh phone threat made on 13 July 2015.

The order dated 03 January 2017 sent by the Home Ministry to the Chief Secretary, UP says that Amitabh had requested change of Care from UP to another cadre on grounds of threat to his life or his family members. It says that the representation has been examined by the Ministry and it has not been agreed to.

Amitabh had said that he and his wife activist Dr Nutan Thakur have real threat from powerful people. The situation is deteriorating every day and the State government officials are treating him as a sworn enemy. Only recently Amitabh has been provided security by the UP Government on directions of the Home Ministry.

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