द वायर के खिलाफ स्टे लेने में जय शाह कामयाब, अब कोई कुछ न लिखे-बोले!

Om Thanvi : वायर, दायर और कायर… जय अमित शाह ने अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के अनेक अतिरिक्त सिविल जजों में एक चौथे जज की अदालत में द वायर के ख़िलाफ़ दायर सिविल मुक़दमे में स्टे प्राप्त कर लिया है। कि वे रोहिणी सिंह वाली ख़बर के आधार पर आगे और कुछ किसी भी रूप में (प्रिंट, डिज़िटल, इलेक्ट्रोनिक, ब्रॉडकास्ट, टेलिकास्ट या किसी अन्य मीडिया में ख़बर, इंटरव्यू, बहस, टीवी परिचर्चा की शक्ल में, किसी भी भाषा में, न प्रत्यक्ष न अप्रत्यक्ष) मुक़दमे के अंतिम निपटारे तक कुछ भी नहीं लिखेंगे-बताएँगे।

बताइए, लोकतंत्र का कैसा दौर है। न्यायपालिका ही अन्याय कर रही है? बग़ैर मीडिया (लेखक, प्रकाशक/प्रसारक) को नोटिस पहुँचाए, बग़ैर मीडिया का पक्ष सुने स्टे का इकतरफ़ा (एक्स-पार्टी) फ़ैसला दे दिया। यह आदेश भी अदालत ने बचाव पक्ष को नहीं भेजा। जय शाह के वकीलों ने भेजा है। न्याय तब मुकम्मल होता है जब दूसरे पक्ष को सुने बग़ैर उसके ख़िलाफ़ कोई स्टे आदि न दिया जाय। यहाँ तो अभिव्यक्ति की आज़ादी का मौलिक अधिकार ताक पर था।

मेरे वक़ील मित्रों का कहना है कि उन्हें इसमें ज़रा शक़ नहीं कि उच्च अदालत में यह इकतरफ़ा स्टे ख़ारिज हो जाएगा। मुझे भी न्यायपालिका से उच्च स्तर पर बड़ी उम्मीदें हैं। हालाँकि निचले स्तर पर भी न्यायप्रिय जज हैं। मगर ऊपरी अदालतों में अपीलों की तादाद बढ़ती ही है, घटती नहीं।

मज़ा देखिए छोटे शाह ने वायर पर फ़ौजदारी मुक़दमा मेट्रो कोर्ट में दायर किया है और सिविल मुक़दमा डिस्ट्रिक्ट (रूरल) कोर्ट में। जबकि जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ दावा किया है, उन सबका पता दिल्ली का है। बहरहाल, द वायर को (सिर्फ़ वायर को!) आगे कुछ न लिखने-दिखाने से रोकने की इस दूरस्थ कोशिश को मीडिया का, दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का गला मसोसने के सिवा और क्या कहा जा सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित संपादक रहे ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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बीजेपी ही क्यों नैतिकता की दुहाई दे?

Narendra Nath : इस हफ्ते तीन चुनाव हुए। महाराष्ट्र नगरपालिका। और आज गुरुदासपुर लोकसभा और केरल में विधानसभा उपचुनाव। महाराष्ट्र में कांग्रेस पहले से थी और इस बार और बड़े मार्जिन से जीती। गुरुदासपुर लोकसभा बीजेपी के पास थी और विनोद खन्ना यहां से 20 साल से एमपी थे। उनके मरने के बाद चुनाव हुआ। लेकिन सहानुभूति फैक्टर काम नहीं आया और रिकार्ड मतों से कांग्रेस जीत रही। केरल में जिस विधानसभा सीट पर उपचुनाव था वहां मुस्लिम वोट काफी थी। लेकिन बीजेपी ने लव जेहाद का बहुत बड़ा मुद्दा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की। लेकिन 2016 में वहां तीसरा स्थाान पाले वाली बीजेपी आज चौथे स्थान पर आ गयी। हाल में केरल में किस हाई वोल्टेज बीजेपी ने कैंपेन किया वह सब देख सकते हैं। वहीं इलाहबाद यूनिवर्सिसटी में भी कर देर रात एसपी ने चुनाव जीता।

अब इन परिणाम को समझें। कायदे से इसका बहुत खास महत्व नहीं है। यह निहायत लोकल टाइम चुनाव हैं जिसका कोई एक समग्र निहितार्थ नहीं निकाला जा सकता है। अगले महीने हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव होंगे और फिर बीजेपी चुनाव जीत लेगी तो यह विपक्ष के लिएचार दिन की चांदनी वाली बात साबित हो जाएगी।

तो क्यों जीत रही है बीजेपी?

इसका भी उत्तर आज ही मिला। इधर जब बीजेपी गुरुदारसपुर लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार रही थी तभी पार्टी हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस नेता सुखराम के पूरे परिवार को अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए रेड कारपेट वेलकम दे रही थी। वही सुखराम, टेलीकॉम घोटाले वाले, जो मार्डन करप्शन के प्रतीक है। वही सुखराम जिनके घर करोड़ों का कैश मिलने के बाद बीजेपी ने कभी संसद का पूरा सत्र नहीं चलने नहीं दिया था। मतलब नैतिकता और किसी भी कीमत पर जीत के सवाल पर मोदी-शाह की टीम किसी भी कीमत पर जीत को तरजीह देते हैं। यही कारण है कि 2019 से पहले पश्चिम बंगाल में नारदा घोटाले वाले मुकुल राय, महाराष्ट्र में करप्शन के प्रतीक नारायण राणे भी बीजेपी की दहजीज पर खड़े हैं और उन्हें रेड कार्पेट वेलकम दिया जा रहा है।

फिर पूछेंगे कि इसमें गलत क्या है? राजनीतिक दल चुनाव नैतिकता नहीं जीत-हार के लिए लड़ते हैं। बीजेपी क्यों इससे पीछे हटे। दुरुस्त है। कांग्रेस और विपक्ष भी तो यही कर इतने दिनों सत्ता में रही।

यही सही जवाब है। बीजेपी ही क्यों नैतिकता की दुहाई दे? मेरे हिसाब से कुछ भी गलत नहीं है। पब्लिक के सामने सबकुछ है। बीजेपी भी छुपकर नहीं कर रही। और बीजेपी नेता मुगालते में भी नहीं है। कल जाकर उन्हें लालू,सुरेश कालमाड़ी या ए राजा से राजनीतिक मदद लेनी पड़े तो भी वह खुशी-खुशी लेंगे। राष्ट्रवाद के नाम पर लड़ने वाली पार्टी ने बुरहान बानी को शहीद बताने वाली पार्टी से सरकार बना रखी है ना? गोवा और नार्थ-ईस्ट में बीफ का सपोर्ट करती है ना? जीत के लिए साम-दाम-दंड-नीति की बदौलत पिछले कुछ सालों से अजेय है, इस पर कोई संदेह या विवाद नहीं है और छोटी-मोटी हार के बाद पार्टी खुद को करेक्ट करती रही है।

इन सबके बीच मेरी आपत्ति बस इन्हें अंधे सपोर्टरों से हैं जो राजनीति की असलियत पर आंख मूंदते हुए holier-than-thou की दुहाई देते हैं। हर विरोध करने वालों को करप्ट,एंटी नेशनल टाइप बोलते रहते हैं। मैं पुण्य और दूसरे पापी, मैं साधु दूसरे शैतान, का चोला ओढ़ा नायाब-नायाब तर्क देते हैं। बाबू मोशाय, यह राजनीति एक हमाम है और हम सब इसमें नंगे हैं। जॉनी, जिनके घर शीशे बने के होते हैं, दूसरों पर शीशा नहीं फेंका करते हैं।

टाइम्स आफ इंडिया में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र नाथ की एफबी वॉल से.

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दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिए और नज़र रखिए, वजह बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : भाजपा ने सबको सेट कर रखा है। अब कांग्रेस वाले कुछेक पोर्टलों से काम चला रहे हैं तो इतनी बेचैनी क्यों। मुकदमा ठोंक के भाजपा ने रणनीतिक गलती की है। मुद्दे को देशव्यापी और जन-जन तक पहुंचा दिया। एक वेबसाइट को करोङों की ब्रांडिंग दे दी। तहलका वालों ने कांग्रेस परस्ती में बहुत-सी भाजपा विरोधी ‘महान’ पत्रकारिता की। मौका मिलते ही भाजपा शासित गोआ में तरुण तेजपाल ठांस दिए गए। उनके साथ हवालात में क्या क्या हुआ था, उन दिनों गोआ में तैनात रहे बड़े पुलिस अधिकारी ऑफ दी रिकार्ड बता सकते हैं।

तहलका अब लगभग नष्ट हो चुका है। केंद्र में सरकार भी बदल गयी तो सारे बनिया मानसिकता वाले मीडिया मालिक भाजपाई हो गए। ऐसे में मीडिया फील्ड में एक एन्टी बीजेपी मोर्चा, जो कांग्रेस परस्त भी हो, तैयार करना बड़ा मुश्किल टास्क था। पर धीरे धीरे सिद्धार्थ वरदराजन एंड कंपनी के माध्यम से कर दिया गया। एन गुजरात चुनाव के पहले जय शाह की स्टोरी का आना, कपिल सिब्बल का इसको लपक कर प्रेस कांफ्रेंस करना, हड़बड़ाई भाजपा का बैकफुट पर आकर अपने एक केंद्रीय मंत्री के जरिए प्रेस कांफ्रेंस करवा के सफाई दिलवाना, सौ करोड़ का मुकदमा जय शाह द्वारा ठोंका जाना… मैदान में राहुल गांधी का आ जाना और सीधा हमला मोदी पर कर देना… यह सब कुछ बहुत कुछ इशारा करता है।

बड़ा मुश्किल होता है निष्पक्ष पत्रकारिता करना। बहुत आसान होता है पार्टी परस्ती में ब्रांड को ‘हीरो’ बना देना। भड़ास4मीडिया डॉट कॉम चलाते मुझे दस साल हो गए, आज तक मुझे कोई निष्पक्ष फंडर नहीं मिला। जो आए, उनके अपने निहित स्वार्थ थे, सो मना कर दिया। न भाजपाई बना न कांग्रेसी न वामी। एक डेमोक्रेटिक और जनपक्षधर पत्रकार की तरह काम किया। जेल, मुकदमे, हमले सब झेले। पर आर्थिक मोर्चे पर सड़कछाप ही रहे। जैसे एक बड़े नेता का बेटा फटाफट तरक्की कर काफी ‘विकास’ कर जाता है, वैसे ही कई बड़े नामधारी पत्रकारों से सजा एक छोटा-मोटा पोर्टल एक बड़ी पार्टी के संरक्षण में न सिर्फ दौड़ने लगता है बल्कि ‘सही वक्त’ पर ‘सही पत्रकारिता’ कर खून का कर्ज चुका देता है।

इसे मेरी निजी भड़ास कह कर खारिज कर सकते हैं लेकिन मीडिया को दशक भर से बेहद करीब से देखने के बाद मैं सचमुच सन्यासी भाव से भर गया हूं। यानि वैसा ज्ञान प्राप्त कर लिया हूं जिसके बाद शायद कुछ जानना बाकी नही रह जाता। आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं। कारपोरेट और पॉलिटिशियन्स ही मीडिया के नायक गढ़ते हैं। दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिएगा, नज़र रखिएगा। ये जन सरोकार से नहीं फल फूल रहे, ये बड़े ‘हाथों’ के संरक्षण में आबाद हो रहे।

चार्टर्ड फ्लाइट से वकील कपिल सिब्बल / प्रशांत भूषण और संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ये वाला ‘क्रांतिकारी’ मुकदमा लड़ने अहमदाबाद जाएंगे, बाइट देंगे, फोटो खिचाएँगे, केस गुजरात से बाहर दिल्ली में लाने पर जिरह कराएंगे। इस सबके बीच इनकी उनकी ऑनलाइन जनता हुँआ हुँआ करके सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग वाली तगड़ी खेमेबंदी करा देगी। इस दौरान हर दल के आईटी सेल वाले सच को अपनी-अपनी वाली वैचारिक कड़ाही में तल-रंग, दनादन अपलोड ट्रांसफर सेंड शेयर ब्रॉडकास्ट पब्लिश करने-कराने में भिड़े-लड़े रहेंगे, ताकि पब्लिक परसेप्शन उनके हिसाब से बने।

आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं। अगर आपको पार्टियों से अघोषित या घोषित रोजगार मिला हुआ है तो आप अपने एजेंडे को अपने तरीके का सच बताकर परोसेंगे, वैसा ही कंटेंट शेयर-पब्लिश करेंगे। जो सच को जान समझ लेता है वो बोलने बकबकाने हुहियाने में थोड़ा संकोची हो जाता है। ऐसे समय जब दी वायर हीरो है, कांग्रेसी आक्रामक हैं, भक्त डिफेंसिव हैं, भाजपाई रणनीतिक चूक कर गए हैं, शेष जनता जात धर्म के नाम पर जल कट मर रही है और इन्हीं आधार पर पोजिशन लिए ‘युद्ध’ मे इस या उस ओर बंटी-डटी है, मुझे फिलहाल समझ नहीं आ रहा कि अपने स्टैंड / अपनी पोजीशन में क्या कहूँ, क्या लिखूं। इस कांव कांव में जाने क्यूं मुझे सब बेगाना-वीराना लग रहा है।

भड़ास4मीडिया डाट काम के फाउंडर और एडिटर यशवंत सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shamshad Elahee Shams ज़बरदस्त. सभी नाप दिऐ आपने..कलम हो तो ऐसी हो.

Pranav Shekher Shahi Hats off… दादा… वाकई जानदार लेखनीः।

अभिषेक मिश्रा बस यही आपको सबसे अलग बनाती हैl

Muzaffar Zia Naqvi भैय्या दिल निकाल कर रख दिया आपने। उम्मीद रखिए दिन बदलेंगे।

Ashok Anurag जय जय जय जय हो सत्य वचन, गर्दा लिखे हैं

Ashok Aggarwal आपने तो बहुत जानदार बात लिख दी है आप कह रहे हैं क्या लिखूं ।

Vijay Srivastava ये विश्लेषण पत्रकारिता की नयी पौध को सलीके से सींच सकता है. मैं इसे अपने वाल पर शेयर कर रहा हूं.

Vijayshankar Chaturvedi मैं निष्पक्ष हूँ। भारतीय वामधारा का समर्थक होने के बावजूद आप जान लीजिए, कार्यकर्ता बनने को पत्रकारिता नहीं समझता। और, संन्यास आप ग़लत लिखते आए हैं। कृपया सुधार लीजिए।

Yashwant Singh प्रभो, तुम ज्ञानी, हम मूरख। जानि रहै ई बात 🙂

Sushil Dubey नहीं बाबा पहली बार लगा की आप थक रहे हो सिस्टम से… वीर तुम बढ़े चलो

Yashwant Singh बाबा, थकना बहुत ही प्यारी सी मानवीय और प्राकृतिक (अ)क्रिया/ अवस्था है। हमका कंपूटर जाने रहौ का? 🙂

Ajai Dubey have u same view about Robert Vadra case.

Yashwant Singh हम सबके घरों में दामाद / बेटे होते हैं जिन्हें बढ़ाने का दायित्व ससुरों / बापों का होता है। ये काम पार्टी वाले बाप / सास भी करती / करते हैं। संपूर्णता में चीजों को देखेंगे तब समझेंगे। किसी उस वाड्रा दामाद या इस शाह बेटा पर अटके रहेंगे तो कांव कांव वाली जमात में ही रह जाएंगे। 🙂

Ajai Dubey sahi baat, agree Yashwant ji.

Badal Kumar Yashwant sir your analysis is best on contemporary media.

Sandeep K. Agrawal Bahut achchhi aur sachchi bat kahi aapne… Nishpakash ko trishanku banakar uski durgat karne ka koi mouka nahi chhoda ja raha hai..

Shorit Saxena आलेख सटीक तो है ही, बहुत कुछ सिखाता है। बड़ी बात आइना दिखाता है कि आदरणीय विनोद दुआ जी की बातोंसे भावुक ना हुआ जाये। यहाँ सब प्री प्लांड ही है। गजब, जय जय।

योगेंद्र शर्मा दर्द छुपा है। इस दर्द में आप अकेले है। आपने पत्रकारिता का मूल धर्म कितना निभाया। वायर कितना दोषी है, हम नहीं जानते लेकिन कुछ सच्चाई इसके माध्य्म से आ तो रही है।

Bhagwan Prasad Ghildiyal यशवंत सिंह सही लिख रहे है। चाटुकार, दलाल, भ्रष्ट रातों रात फर्श से अर्श पर होते हैं और दो ..तीन दशक से यह चलन हर क्षेत्र में बढ़ा है । कर्तव्य, मर्यादा और चरित्र तो केवल कहने, सुनने भर को रह गया है।

Avinash Pandey दी वायर की रिपोर्टिंग ने राजनैतिक भूचाल ला दिया है। सबसे अच्छा यह हुआ कि जय शाह ने 100 करोड़ रुपयों का मानहानि का मुकदमा कर दिया है। यह भारत की जनता के लिए सुखद है। इसके पहले भी एक और राजनैतिक मानहानि का मुकदमा जनता देख रही है। श्री केजरीवाल द्वारा दिल्ली क्रिकेट एशेसियेशन में श्री अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार करने सम्बन्धी सार्वजनिक आरोप सोशल मीडिया पर लगाये गये थे।यह मुकदमा बहुत रोचक स्थिति में पहुंच गया है। आजतक श्री केजरीवाल भ्रष्टाचार सम्बन्धी एक भी साक्ष्य अदालत में जमा नहीं कर पायें हैं। श्री केजरीवाल के बडे वकील श्री राम जेठमलानी भी भ्रष्टाचार सिद्ध करने के स्थान पर कुछ और ही बहस कर रहे हैं। इसके पहले भी तहलका के तरुण तेजपाल द्वारा गोवा में किये गये यौन शोषण प्रकरण पर श्री कपिल सिब्बल तरुण की ओर से बयान-बाजी कर चुके हैं। गुजरात चुनाव के पूर्व दी वायर वेव पोर्टल की ओर से शानदार खलबली पैदा की गयी।इसी के साथ वेव पोर्टल के प्रमोटर और उनका भविष्य तय हो जायेगा।

Aflatoon Afloo वायर का पृष्ठपोषक कांग्रेस नही है। कुछ उद्योगपति हैं। स्तरीय पत्रकारिता अनुकरणीय है। सीखने की उम्र सीमा नहीं होती। भड़ास अन्याय के खिलाफ हो, बाकी सुलगाने से क्या होगा!

Harsh Vardhan Tripathi स्तरीय नहीं एजेंडा पत्रकारिता कहिए।

Surendra Grover सरोकारी एजेंडा भी कुछ होता है त्रिपाठी भाई.. यदि कोई मीडिया हाउस सरोकारी पत्रकारिता करता है तो उसे हर उस सक्षम से फंडिंग हो जाती है जो सही तथ्यों को गम्भीरता से लेता है.. विरोधी राजनैतिक दल भी इसमें शामिल होते हैं और अपने अपने हिसाब से उन तथ्यों का इस्तेमाल भी करते हैं..

Aflatoon Afloo रजत शर्मा और हर्षवर्धन में कुछ समान

Harsh Vardhan Tripathi बहुत कुछ समान हो सकता है Aflatoon Afloo । लेकिन, कब तक यह चलाइएगा कि पत्रकार, लेखक होने के लिए तय खाँचे में फ़िट होना जरूरी

Aflatoon Afloo बिना खांचे वाले आप होना चाहते हैं?

Harsh Vardhan Tripathi बिना खाँचे का तो कोई नहीं होता Aflatoon Afloo । लेकिन, मुझे यह लगता है कि हर खाँचे से पत्रकार निकल सकते हैं। वामपन्थी होना पत्रकार, लेखक, सरोकारी होने की असली योग्यता भला कैसे हो सकती है।

Surendra Grover सरोकारी होने पर लोग खुद वामपंथी का तमगा क्यों थमाने लगते हैं.?

Harsh Vardhan Tripathi भाई Surendra Grover जी, वामपन्थियों ने लम्बे समय तक कांग्रेस पोषित व्यवस्था में यह साबित किया कि सिर्फ वामपन्थी ही सरोकारी हो सकता है। यह कितना बड़ा भ्रमजाल है, वामपन्थियों की ताज़ा गति से आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन, यही वजह रहती होगी।

Surendra Grover निर्लिप्तता भी बड़ी चीज है, खुद Yashwant Singh गवाह है.. हमारे अज़ीज़ नचिकेता भाई मेरी इस बात पर मुझे दलाल का तमगा थमा बैठे थे और उसके परिणामस्वरूप जो हुआ उससे हमारे अभिन्न रिश्ते ही तोड़ बैठे सम्मानीय.. ब्लॉक किया सो अलग..

Akhilesh Pratap Singh संघी सरोकार वाले भाई साहब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ने पर चेक गणराज्य में भी दाम ज्यादा होने की दलील दे चुके हैं…..इनकी बातों को दिल पर न लें…

Harsh Vardhan Tripathi दिल ठीक रहे, कहाँ की ईंट उठाए घूम रहे हो Akhilesh Pratap Singh भाई

Devpriya Awasthi आप कमोबेश सच लिख रहे हैं. लेकिन फंडिग के फंडे के बारे में आपके नजरिए से सहमत नहीं हूं. द वायर ने कुछ तथ्य ही तो उजागर किए हैं . भक्त बेवकूफी भरी प्रतिक्रिया नहीं करते तो द वायर द्वारा उजागर किए गए तथ्यों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता. और जहां तक फंडिंग का मामला है, उसकी जड़ें कहां कहां तलाशोगे? हरेक फंडिंग में कुछ न कुछ स्वार्थ छिपे ही होंगे. आप तो यह देखो कि शांत तालाब में एक छोटे से पत्थर ने कितनी बड़ी हलचल पैदा कर दी है.

Pankaj Chaturvedi आप सटीक बात कर रहे हैं. इसमें भाजपा के कुछ लोग शामिल हैं जिन्होंने इसे हवा दी, आनंदी बेन गुट

Surendra Grover भाई Yashwant Singh जी, Afloo दुरुस्त ही फरमा रहे हैं.. वैसे निर्लिप्त भाव से की गई पत्रकारिता ही असल होती है.. बाकी तो जो है,, वो है ही बल्कि सिरमौर बने बैठे हैं.. सबकुछ बिकता है.. धंधा जो बन गया..

Sandeep Verma जब आप मान ही रहे है कि भाजपा ने रणनीतिक गलती कर दी है तो बाकी पोस्ट की बाते फालतू हो जाती है . और जो हो रहा है वह सोशल मीडिया का दबाव है . भाजपा अगर गलतियाँ कर रही है तो उसकी वजह वह सोशल मिडिया से प्रभावित हो रही है

Manoj Dublish I don’t think that this issue will conclude any result because fast moving media channels will bring a solution of compromise very soon .

Sandip Naik सब सही पर जिस भड़ास पर किसी का साया पड़ा अपुन पढ़ना ही बंद नहीं करेगा एक एंटी भड़ास खोल देगा। यार भाई जनता से जुड़े हो काहे इन अंबानियों की बाट जोह रहे हो

Dev Nath जबर्दश्त। अनुभव इसे कहते हैं, लेखन इसे कहते हैं, समालोचना इसे कहते है, पत्रकारिता इसे कहते हैं, विश्लेषण इसे कहते हैं।शब्द शब्द जबरदस्त

Sanjay Bengani कोई आपके सम्मान से खिलवाड़ करे लेकिन चूँकि वे पत्रकार है चाहे बीके हुए ही क्यों न हो आपको अदालत जाने का अधिकार नहीं है.

Roy Tapan Bharati यशवंत जी, एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते ,आपकी चिंता जायज है। पर आपका उदासीन हो जाना खलता है। हम जैसे शुभचिंतक अपने बच्चों के बल पर भड़ास को कुछ आर्थिक सहयोग करना चाहें तो कैसे करें?

Kamta Prasad झाल बजाना शुरू कर दीजए, जहाँ से नर्क में आए थे। बदलाव की शुरुआत उसी से और वहीँ से होगी। आपने अपने वैचारिक आग्रहों को छोड़कर मानवतावाद का दामन पकड़ा, कहीं से भी ठीक नहीं था।

Manoj Kumar Mishra अमित शाह के पूरे भारत मे भाजपा के विस्तार के आक्रमक नीति से ऐसे फ़र्ज़ी सर्जी हमले होने ही थे तब जब कि सभी विपक्षियों पार्टियों विशेषकर लेफ्ट और कांग्रेस के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगे। 2019 आते आते ऐसे ही आरोप और गढ़े जाएंगे ।करोड़ों रुपये की कीमत वाले प्रशांत किशोर के फेल होने के बाद कांग्रेस डोनॉल्ड ट्रम्प की चुनावी रणनीति तैयार करने वाली एजेंसी को करोड़ों डॉलर के अनुबंध के साथ हायर कर रही है । जो उच्च तकनीक से लैस है और जिसके पास हज़ारों आईटी एक्सपर्ट और हैकर्स की सेवा उपलब्ध है जो भारतीय मतदाताओं के गूगल सर्च, ईमेल, सोशल मीडिया और उनके संपर्कों का इतिहास भूगोल खंगाल डालेगी और उनकी रुचियों और उसी के अनुसार वो कांग्रेस की चुनावी रणनीति तय करेगी, राहुल बाबा के भाषणों के जुमले गढ़े जाएंगे ।अगर भारतीयों की प्राइवेसी और देश और देश की साइबर सुरक्षा इतनी गौण है तो कम से कम ये तो विचारणीय है कांग्रेस के पास इतना भारीभरकम फण्ड कहां से आ रहा है ?

Brijesh Singh कांग्रेस के पास व उसके नेताओं के पास अभी भी इतना पैसा है कि वह भाजपा तो क्या भारत की सभी पार्टियों को खरीद सकती हैं । अभी सत्ता ही तो नहीं है उनके पास। अभी तक कमाये धन को व्यवस्थित कर रहे हैं ।

Rehan Ashraf Warsi भाई हम जैसे नादान को लगता है कि अपने जो दुख झेलें हैं वह मीडिया के अंदर के सच , संघर्ष और गंदगी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल कर लिए हैं। वरना आज आप भी मज़े कर रहे होते। हाँ आपकी इज़्ज़त बहुत है मगर ज़्यादातर दिल मे ही करते हैं । बल

Jai Prakash Sharma निष्पक्ष, निडर और सच्चाई की बात करने वाले अधिकतम भाई Lisening ही करते नजर आते हैं, दलाली कहना थोड़ा ज्यादा हो जाता है

Vinay Oswal कुछ ऐसे ही कारणों से मैं भी बहुत मानसिक उलझन में हूँ। आप साझा करके हल्का हो लिए मैं नही हो पा रहा हूँ

Arvind Pathik यशवंत जी एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते… आप के निष्कर्ष उचित हैं… पर आपका उदासीन हो जाना खलता है.

Trivedi Vishal Confuse kyo hain ap? Hey arjun.. shastra uthao aur waar karo.

Kuldeep Singh Gyani अपने-अपने झंडे तले “सबकी” मौज बहार, मारी गई “पत्रकारिता” अब तू अपनी राह सवार… भाई साहब लिखा तो बहुत अच्छा है लेकिन बात बात पर सन्यास लेने की बात उचित नहीं…हम तालाब के किनारे बैठ कर भी क्या कर लेंगे उछलेगा तो कीचड़ ही तो क्यों न तालाब में ही खड़े रहा जाए जहां “मगर” भी हैं और “कमल” भी… हे ज्येष्ठ अडिग रहें और अपने हाथों को निरंतर मजबूत करने के लिए “फौज” तैयार करें…

Nirupma Pandey बात तो सही है अब आम जनता में न्यूज के प्रति उदासीन भाव आ गया है परदे के पीछे का सच आम जनता भी जानने लगी है

Harshit Harsh Shukla जी Yashwant singh भाई, पत्रकारिता के वेतन से घर नहीं चलता तो ईमान कहाँ से चलेगा… शायद यही वजह है की पत्रकार पार्टी के हो लेते हैं..

Manoj Upadhyay भाई साहब.. सच तो यही है कि आप जैसे लोग और आपकी जैसी पत्रकारिता ही सही और सार्वकालिक है. यह भी सच है कि यदि आप की पत्रकारिता और पत्रकार भावना संपन्न है तो आर्थिक मोर्चे पर तो सड़क छाप होना ही है. क्योंकि आपकी पत्रकारिता और आपकी पत्रकार भावना आज के तथाकथित लोकतांत्रिक दौर में पनपने वाले कारपोरेट नेताओं के लिए आप किसी काम के नहीं..

Yogesh Garg भड़ास का पिछले 5 साल से नियमित पाठक हूँ । पिछले कुछ समय से लगता है खबरों की आंच कम हो गई है । निष्पक्ष रहने के चक्कर में सत्ता पक्ष के लोकतंत्र विरोधी कुकर्मो का सख्त विरोध नही कर पा रहे आप । ऐसे बहुत से मुद्दे थे जिन पर लगा था कि भैया यशवंत की कलम चलेगी । पर वो मौन रह गए ।

Harsh Vardhan Tripathi असली बात बस यही है हमको १० साल में एक भी निष्पक्ष फ़ंडर न मिला। बाक़ी सब मिथ्या है।

Aflatoon Afloo और वायर को मिले।

Harsh Vardhan Tripathi भाई Aflatoon Afloo सही बात तो यही है ना कि वायर मोदी/संघ/बीजेपी के ख़िलाफ़ एजेंडे पर लगी वेबसाइट है। ऐसे ही कई होंगी, जो मोदी/संघ/बीजेपी के साथ लगी होंगी। जो जैसा है, उसको वही बताइए। मोदी के निरन्तर ख़िलाफ़ है, तो पत्रकार है। मोदी के साथ मुद्दों पर भी है, तो संघी है, इससे बाहर को आना ही पड़ेगा। और तो पब्लिक है, ये सब जानती है।

Aflatoon Afloo बिल्कुल, पब्लिक सब जानती है

Akhilesh Pratap Singh संघ के साथ पत्रकार नहीं, नारद होते हैं

Satyendra PS बात तो ठीक ही कह रहे हैं।

Vishnu Rajgadia अच्छा विश्लेषण है

Jayram Shukla वाजिब भडास।

सौरभ मिश्रा सूर्यांश कोई बचा क्या ? शायद कोई भी नहीं ! अच्छा समालोचनात्मक विश्लेषण

Garima Singh बेहतरीन ….कमाल ….खरा सच

Arvind Mishra बघेलखण्ड में कहा जाता है फुलई पनही से मारना वही किया है। आपने किसी को नहीं छोड़ा। दौड़ा दौड़ा कर

Sushil Rana सोलह आने सच – आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं।

आदित्य वशिष्ठ निजी भड़ास भी भड़ास के माध्यम से निकलने लगे तो भड़ास भी भड़ास न रहेगा भाई

SK Mukherjee आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं।

Jitesh Singh मीडिया सच नहीं दिखाता, सच छानना पड़ता है। बड़ा मुश्किल हो गया है मीडिया का सच जानना।

Someshwar Singh Good write-up and very correct-analysis.

Madhav Tripathi आपकी बात तो सही है लेकिन जिसके अमित शाहक़ के लड़के को फ़साने की फालतू कोशिश की गई है कुछ वास्तविक मुद्दा होना चाहिए था।

Sanjay Mertiya मुकदमे की जरुरत नहीं थी, वायर की स्टोरी में दम नहीं था, चौबीस घण्टे भी मुश्किल से चलती।

अतुल कुमार श्रीवास्तव अगर वो मुकदमा न करता तो जांच नहीं होती। और सिर्फ इल्जाम लगते। सच और झूठ सामने तो आये।

Kohinoor Chandravancee Right sir I beleif in your thoughts

Baladutt Dhyani तुम्हारी तो दुकान बंद चल रही है इसीलिए परेशान दिखते हो… दलाली की और कमीशन का काम बंद पड़ा है…

Yashwant Singh आपने सच में मेरे दिल के दर्द को समझ लिया ध्यानी भाई.. इसीलिए आप ध्यानी हैं.. वैसे, अपन की दुकान चली कब थी.. जीने खाने भर की कभी कमी नहीं हुई… कोई काम रुका नहीं.. आदमी को और क्या चाहिए… खैर, पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोग ये सब न समझेंगे.. वे तो वही बोलेंगे जो बोलना है… सो, बोलते रहियो 🙂

पंकज कुमार झा सुंदर. शब्दशः सहमत.

Rai Sanjay सहमत हूँ आप से

Vimal Verma बहुत बढ़िया।

राजीव राय बहुत सही

Anurag Dwary Sehmat

A P Bharati Ashant yashwant jindabad ! salam !

Arvind Kumar Singh बिल्कुल ठीक बात है

Aradhya Mishra Behatreen

Ashutosh Dwivedi यही सच है

Arun Srivastava सही कहा।

Lal Singh वीर तुम बढ़े चलो।

Nurul Islam सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद

Shadab Rizvi बात 100 फीसदी सही

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पढ़िए, जय शाह की भयंकर आर्थिक ‘तरक्की’ की स्टोरी ब्रेक करने वाली रोहिणी ने फेसबुक पर क्या लिख दिया…

Rohini Singh : I don’t want to write a sanctimonious status note on what other journalists should do. I can only speak for myself. My primary job is to speak truth to power. To question the government of the day. In 2011 when I wrote the story on Robert Vadra’s dealings with DLF, I don’t remember the sort of backlash that I see now.

There were no ‘only whatsapp or FaceTime audio from now’ sort of messages from sources. No seeking to shift the location of meetings to cafes resembling dungeons! A person close to a senior BJP leader brags our call record details are with the party bosses. (Good for them, I say!;)) And of course the low level slander campaign online.

Intimidation and harassment are tools often used by powerful people to get journalists to toe the line. As someone famously once said and I paraphrase, news is something someone wants to suppress, everything else is advertising. I don’t know about others but I don’t wish to lose focus of that.

I would rather quit journalism than do the sort of reportage that I see often around me.  Many of you have been extremely kind to me and are investing me with qualities I probably don’t have. I don’t do the sort of stories I do because I am ‘brave’. I do them because that’s journalism and not bravery.

द वायर में कार्यरत और राबर्ट वाड्रा के बाद अब जय शाह की आर्थिक ‘तरक्की’ वाली स्टोरी ब्रेक करने वाली पत्रकार रोहिणी सिंह की एफबी वॉल से.


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जय शाह मामले में अख़बारों का हाल देखें, भ्रष्टाचार का संगीन आरोप पीछे हो गया, मुकदमे की धमकी आगे!

Om Thanvi : अख़बारों का हाल देखिए… ”छोटे शाह 100 करोड़ का मुक़दमा दायर कर देंगे” यह है सुर्खी। भ्रष्टाचार का संगीन आरोप पीछे हो गया, धमकी आगे! कल्पना कीजिए यही आरोप केजरीवाल, चिदम्बरम, वीरभद्र सिंह या किसी अन्य दुश्मन पार्टी के साहबजादे पर लगा होता?  तब मुक़दमे की धमकी की बात ख़बर की पूँछ में दुबकी होती। टीवी चैनल सिर्फ़ एक वर्ष में 16000 गुणा बढ़ोतरी को शून्य के अंक जगमगाते हुए दुहराते। दिनभर रिपोर्टर आरोपी का पीछा करते, घर-दफ़्तर पर ओबी वैन तैनात रहतीं, शाम को सरकार, संघ, वीएचपी के आदि के साथ बैठकर सरकार समर्थक पत्रकार या बुद्धिजीवी नैतिक पतन की धज्जियाँ उड़ा रहे होते।

सुना है प्रधानमंत्री से कांग्रेस और आप पार्टी की जाँच की माँग को उचित तवज्जो सिर्फ़ एनडीटीवी और एबीपी न्यूज़ ने दी। इतने चैनल, इतने पत्रकार – सब चुप? सबको तो अंबानियों-अडानियों ने नहीं ख़रीदा होगा! हमारे मीडिया को क्या हो गया है? क्या कहें कि लकवा मार गया है या ज़मीर मर चुका है? इमरजेंसी में भी अख़बार वाले इतने कायर नहीं थे, गो कि उस वक़्त तो क़ानून लागू कर उनके हाथ और मुँह बाँध दिए गए थे।

अमित शाह के बेटे ने सही तरीक़े से धन कमाया या ग़लत तरीक़े से, इसकी जाँच की ज़रूरत ख़ुद अमित शाह को ही नहीं, समूची भाजपा को महसूस करनी चाहिए। आख़िर पार्टी के अध्यक्ष की नैतिक शक्ति (जैसी भी हो) के टिके रहने का सवाल है। इस मामले में कांग्रेस की आड़ लेना हास्यास्पद है। आप “माँ-बेटे-दामाद” की सरकार कब से हो गए? आप तो कांग्रेस के भ्रष्टाचार, परिवारवाद, नारी पर वार आदि से अलग सरकार देने का भरोसा देकर सत्ता में आए थे न?

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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गॉडफादर वेणु ने रोहिणी को दोबारा ‘नॉर्मल’ पत्रकारिता करने के लिए वायर में भर्ती किया!

Abhishek Srivastava : एमके वेणु जब इकनॉमिक टाइम्‍स में थे तब रोहिणी सिंह को वहां लेकर गए थे। राडिया टेप आने के बाद वेणु तो निकल लिए, उधर रोहिणी ने यूपी चुनाव में भयंकर पक्षपातपूर्ण कवरेज कर के कम से कम राजनीतिक रिपोर्टिंग के मामले में इकनॉमिक टाइम्‍स की विश्‍वसनीयता को ऐसा बदनाम किया कि न केवल उन्‍हें अगस्‍त 2016 के बाद की अपनी सारे ट्वीट डिलीट करने पड़े बल्कि इकनॉमिक टाइम्‍स के कॉन्‍क्‍लेव में न्‍योते के बावजूद केंद्र सरकार के किसी भी बड़े नेता ने आने से इनकार कर दिया।

मेरे पास स्‍क्रीन शॉट नहीं है ज्‍यादा। रोहिणी को यूपी चुनाव कवर करने वाला तकरीबन हर पत्रकार फॉलो कर रहा था। मैंने खुद उसके चार दर्जन ट्वीट रीट्वीट किए होंगे। उसने खुलकर एकतरफ़ा रिपोर्टिंग की थी। रोहिणी के ट्वीट बहुत स्‍पष्‍ट रूप से सपा के पक्ष में थे। चुनाव से लकर छह महीने पीछे तक की रिपोर्ट भी देखेंगे तो सपा केंद्रित रिपोर्टें ही हैं। रोहिणी सिंह की यूपी चुनाव पर ईटी की रिपोर्ट गुगल करें। सब क्‍लीयर हो जाएगा।

बाद में रोहिणी की नौकरी जाने की वजह भी यही बना। इस मामले में कहीं कोई प्रोपगंडा नहीं है। दिल्‍ली के अधिकतर पत्रकार इस अध्‍याय से वाकिफ़ हैं। इसके बाद ही पीयूष गोयल के मुताबिक अर्थव्‍यवस्‍था के लिए इकनॉमिक टाइम्‍स से एक अच्‍छा संकेत निकला। रोहिणी बाहर हो गईं। तब गॉडफादर वेणु ने उन्‍हें दोबारा ‘नॉर्मल’ पत्रकारिता करने के लिए वायर में भर्ती किया। अगर 100 करोड़ की मानहानि को न्‍योता देने वाली रिपोर्ट ‘नॉर्मल’ पत्रकारिता है, तो मुझे मानने में कोई शक़ नहीं कि हम सब ऐबनॉर्मल हैं।

द वायर की स्‍टोरी की मेरिट अपनी जगह है। मुझे वित्‍तीय दस्‍तवेज़ों की व्‍याख्‍या करनी नहीं आती, इसलिए कुछ नहीं कहूंगा लेकिन रिपोर्टर के अतीत में काम को लेकर यहां एक टिप्‍पणी की है। यह एक अलग बात है। मैंने रोहिणी की ताजा रिपोर्ट को कठघरे में नहीं रखा है। मेरा कमेंट एमके वेणु की ”नॉर्मल जर्नलिज्‍म” वाली टिप्‍पणी पर तंज है।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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पंकज सिंह मामले में चुप्पी साधे रहने वाली भाजपा जय शाह मामले में पहले ही दिन मैदान में उतर आई!

Dilip Khan : तुम्हें याद हो कि न याद हो… 2014 में एक ख़बर ख़ूब उड़ी थी कि राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह घूस लेकर पुलिस पोस्टिंग करवाते हैं और लोकसभा का टिकट बेचते हैं. ख़बर जब चौतरफ़ा फैल गई तो फॉलोअप ख़बर आई कि राजनाथ सिंह की मौजूदगी में नरेन्द्र मोदी ने पंकज सिंह को फटकार लगाई। बदनामी इससे भी हुई। लोगों का शक और गहरा हुआ।

फिर तीसरी ख़बर आई जिसमें राजनाथ सिंह ने अपनी पार्टी के ही किसी ‘राइवल’ पर आरोप लगाया कि वो उनकी छवि ख़राब करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनाथ सिंह ने RSS से भी राइवल की शिकायत की।

बात बनने की बजाए जब बिगड़ने लगी तो फिर चौथी ख़बर आई जिसमें PMO ने इस बात से ही इनकार कर दिया कि नरेन्द्र मोदी ने पंकज सिंह को डांटा है।  फिर आई पांचवीं और आख़िरी ख़बर जिसमें बीजेपी ने पहली से लेकर चौथी ख़बर तक सबको फेक बता दिया। और इस तरह राजनाथ सिंह की इज़्ज़त बची, राइवल बचे, पार्टी में तोड़-फोड़ बची और ऑफ कोर्स पंकज सिंह बचे।

जय शाह में तो पहले ही दिन बीजेपी मैदान में उतर आई है। सीधे पांचवीं ख़बर से शुरू किया है खेल। आजकल, राजनाथ सिंह और अमित शाह में बड़ा फर्क है भई!!  राजनाथ-गडकरी खेमे की चले तो गुज्जू खेमा को दो दिन में साइड कर दे, लेकिन मोदी-शाह के आगे किसी की नहीं चल रही।

अब ताजा मामले पर आते हैं. द वायर ने ये तो नहीं कहा कि जय शाह ने भ्रष्टाचार किया. वायर ने तो सिर्फ़ बिजनेस का ब्यौरा दिया है. इससे रॉबर्ट वाड्रा को गरियाने वाला भक्त खेमा क्यों डिफेंसिव हो गया है? बीजेपी को नींद क्यों नहीं आ रही? इससे हम जैसे मासूमों के मन में भ्रष्टाचार का शक पैदा हुआ है.

राज्यसभा टीवी में कार्यरत युवा पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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मनीष सिसोदिया ने पूछा- जय शाह मामले में महान पत्रकारों की ‘बहादुर पत्रकारिता’ मर गई या बिक गई?

Sheetal P Singh : मनीष का यह पूछना जायज क्यों नहीं है? वे शिक्षा व्यवस्था संबंधी अध्ययन के सिलसिले में स्कैंडनेवियाई देशों में दौरे पर थे । टाइम्स नाऊ के लिये अरनब गोस्वामी ने एक कैमरामैन किराये पर रक्खा था कि कुछ मसालेदार मिल जाय, आख़िर में आइसक्रीम खाते हुए एक वीडियो दिखाकर मनीष की निंदा स्टोरी चलाई गई थी! आज जय शाह के मामले में ये सारे चैनल सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के प्रवक्ता के रोल में हैं!

इस बीच, जय शाह राबर्ट वडेरा की तरह मैदान में आ गये हैं. उन्होंने अपने दसतखत से बयान जारी किया है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया. उन्होंने करजा लिया करजा चुकाया. सब कानूनी काम है.  बस यह नहीं बताया कि 2004 से 2014 तक कुल पचास हजार रुपये की कंपनी 2015 से 2016 में एकाएक अस्सी करोड़ तक किस जादू से पहुंच गई? वे क्या बेचते हैं जो देश का कोईदूसरा नौजवान न सोच सकता है न बेच सकता है? और उनके बाप के बीजेपी सुप्रीमो बनते ही उनकी दिव्य व्यावसायिक प्रतिभा में अचानक विस्फोट कैसे हुआ ?

वहीं, जय शाह मामले में पीयूष गोयल एक अपराधी की भूमिका में मिल रहे हैं। कल उनके छटपटाने की वजह मिल गई। जय शाह की कंपनी शेयर दलाल का काम कर रही थी और बुरे हाल में थी। कहीं अनंत में भी पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उसका कोई लेना देना नहीं था। पीयूष गोयल ने ऊर्जा मंत्री की हैसियत से इसे पवन ऊर्जा का काम दिया और एक सरकारी ऋणदाता कंपनी और एक नान बैंकिंग फाइनेन्स कंपनी से औकात से कई गुना ज्यादा ऋण दिया / दिलवाया!  पचास हज़ार रुपये का बिज़नेस रातों रात फूलकर अस्सी करोड़ इन्हीं के करकमल से हुआ था इसीलिये कल प्रेसकान्फ्रेन्स में जय शाह के बचाव का ज़िम्मा पीयूष गोयल ने संभाला! आप महाराष्ट्र की नेता प्रीति मेनन ने यह ख़ुलासा करता एक वीडियो बयान जारी किया है।

वरिष्ठ पत्रकार और ‘आप’ नेता शीतल पी सिंह की एफबी वॉल से.

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रोहिणी सिंह वही रिपोर्टर हैं जिन्होंने डीएलएफ के साथ राबर्ट वाड्रा के लेन-देन की खबर ब्रेक की थी

Sanjaya Kumar Singh : अमित शाह के बेटे से संबंधित दि वायर की स्टोरी पढ़ने लायक और दिलचस्प है। इससे पता चलता है कि सत्ता हाथ में आ जाए तो पैसा कमाना कैसे आसान हो जाता है और कैसे-कैसे तर्क बनाए जा सकते हैं। मानहानि के मुकदमे का विकल्प तो है ही। इस मामले में वायर ने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज से उपलब्ध आंकड़े पेश किए हैं और उनकी संपत्ति में भारी वृद्धि से संबंधित जानकारी मांगने पर पहले तो जय शाह ने कहा कि वे व्यस्त हैं और फिर उनके वकील का जवाब आया और उसमें धमकी भी थी।

रोहिणी सिंह

जवाब में मोटे तौर पर कमोडिटी बिजनेस में 80 करोड़ का कारोबार ज्यादा नहीं है, जैसी दलीलें हैं। वायर ने वकील का जवाब तो छापा ही है और धमकी भी छाप दी है। वकील ने कहा है कि जय शाह सार्वजनिक जीवन में नहीं हैं। वायर ने लिखा है कि उसे शाह (जय) से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है और जब मिलेगी तो वह प्रकाशित करके खुशी महसूस करेगा। खास बात यह है कि दि वायर की यह खबर रोहिनी सिंह ने की है और ये वही रिपोर्टर हैं जिसने डीएलएफ के साथ रॉबर्ट वाड्रा के कारोबारी लेन-देन की स्टोरी ब्रेक की थी।

रोहिनी अभी हाल तक इकनोमिक टाइम्स में थीं। रॉबर्ट वाड्रा का मामला आपको याद ही होगा। और यह भी कि उसे जेल जाना था पर तीन साल से लोग इंतजार कर रहे हैं। हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष का बेटा भले ही अलग मामले में जेल चला गया पर रॉबर्ट का कुछ नहीं हुआ। अब वैसा ही मामला जय शाह का आया है तो भाजपा वाले मानहानि के दावे से मामले को दबाने की कोशिश में लग गए हैं – जो रॉबर्ट ने नहीं किया था। भाजपाई भक्तों की दलील मानें तो रॉबर्ट इसीलिए दोषी हैं और जय शाह इसी लिए निर्दोष हैं। जय हो। पर इससे बात बनती होती तो क्या बात थी।

राबर्ट वाड्रा और जय शाह

खबर में लिखा है कि दुनिया भर में राजनीतिकों के रिश्तेदारों के कारोबारी मामलों की जांच जनता करती है और उस पर उंगली उठाती है खासकर तब जब सत्ता के साथ किस्मत भी बदलती दिखे। इस खबर के मुताबिक रॉबर्ट वाड्रा का मामला ऐसा ही था। उन्हें डीएलएफ ने अनसिक्योरड एडवांस दिया था और इससे वे अपना कारोबार बढ़ा पाए थे। जय शाह को 15.78 करोड़ रुपए केआईएफएस फाइनेंशियल सर्विसेज से मिले हैं। और उसकी वार्षिक रिपोर्ट में टेम्पल एंटरप्राइजेज (शाह की कंपनी) को दिए गए कर्ज का विवरण नहीं है। केआईएफएस फाइनेंशियल सर्विसेज के प्रोमोटर राजेश खंडवाला हैं। वे पहले वायर के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गए थे पर बाद में फोन और संदेश का जवाब देना बंद कर दिया।

वकील के पत्र के मुताबिक, खंडवाला कई साल से जय शाह के परिवार के शेयर ब्रोकर हैं। जय शाह की कंपनी को नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के तहत आने वाली आईआरईडीए से भी 10.35 करोड़ रुपए का कर्ज मिला है। उस समय पीयूष गोयल इस विभाग के मंत्री थे। शाह के वकील ने इस कर्ज को जायज बताया है पर यह नहीं बताया है कि कमोडिटी बिजनेस करने वाली किसी कंपनी को यह कर्ज किस आधार औऱ योग्यता पर दिया गया। वायर ने लिखा है कि इस संबंध में आईआरईडीए का जवाब बाद में देगा। पर लगता है कि वह रह गया है।

Sheetal P Singh : क्या संयोग है. इन दोनों बांकों (राबर्ट वाड्रा और जय शाह) के कारनामे उजागर करने वाली पत्रकार एक ही हैं. रोहिणी सिंह. UPA के समय वाड्रा और NDA के समय जय शाह.

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह और शीतल पी सिंह की एफबी वॉल से.

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‘द वायर’ की रिपोर्टर रोहिणी सिंह ने पक्ष जानना चाहा तो जय शाह के वकील माणिक डोगरा ने ये भेजा जवाब….

Anil Singh : भयावह है सच को दबाने की धमकी.. ‘द वायर’ की रिपोर्टर रोहिणी सिंह ने अपनी खबर पर जय शाह का पक्ष जानना चाहा तो उनके वकील माणिक डोगरा ने लिखा…

If you or anyone in the print, electronic or digital media carries and/or broadcasts any defamatory and/or false imputations including those which breach his fundamental right of privacy and/or defame him, Mr. Jay Shah reserves the right to prosecute and sue such person/entity including anyone who carries or broadcasts a repetition of such libelous / defamatory statement.

क्या अब एबीपी न्यूज़ और एनडीटीवी पर भी मानहानि का मुकदमा ठोंका जाएगा?

Anurag Dwary : टेम्पल इन्टरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड का टर्नओवर साल 2015-16 में 16 हजार गुना बढ़ा है। यह बढ़ोत्तरी तब हुई जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और उनके पिता अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। इससे पहले टेम्पल इन्टरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड का टर्नओवर न के बराबर था। ‘द वायर’ के मुताबिक जय की कंपनी के टर्नओवर में उछाल की वजह 15.78 करोड़ रुपये का अनसेक्योर्ड लोन है जिसे राजेश खंडवाल की KIFS फिनांशियल सर्विसेज फर्म ने उपलब्ध कराया है लेकिन हैरत की बात ये है कि लोन देनेवाली KIFS फिनांशियल सर्विसेज ने जिस साल जय की कंपनी को लोन दिया उस साल उसकी कुल आय ही 7 करोड़ रुपये थी।

दूसरी बड़ी बात आरओसी के दस्तावेज से यह सामने आई है कि KIFS फिनांशियल सर्विसेज की एनुअल रिपोर्ट में टेम्पल इन्टरप्राइजेज को दिए गए 15.78 रुपये के अनसेक्योर्ड लोन का कोई जिक्र नहीं है। बता दें कि राजेश खंडवाल भाजपा के राज्यसभा सांसद और रिलायंस इंडस्ट्रीज के टॉप एग्जिक्यूटिव परिमल नथवानी के समधी हैं।

जय की कंपनी की बैलेंस शीट में बताया गया है कि मार्च 2013 और मार्च 2014 तक उनकी कंपनी में कुछ खास कामकाज नहीं हुए और इस दौरान कंपनी को क्रमश: कुल 6,230 रुपये और 1,724 रुपये का घाटा हुआ लेकिन जैसे ही केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और उनके पिता भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने जय शाह की कंपनी के टर्नओवर में आश्चर्यजनक रूप से इजाफा हुआ है। साल 2014-15 के दौरान उनकी कंपनी को कुल 50,000 रुपये की इनकम पर कुल 18,728 रुपये का लाभ हुआ। मगर 2015-16 के वित्त वर्ष के दौरान जय की कंपनी का टर्नओवर लंबी छलांग लगाते हुए 80.5 करोड़ रुपये का हो गया। यह 2014-15 के मुकाबले 16 हजार गुना ज्यादा है।

मुंबई के वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार अनिल सिंह और एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी की एफबी वॉल से.

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अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने ‘द वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही

‘द वायर’ की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है

Nitin Thakur : अमित शाह के बेटे की कमाई का हिसाब किताब जान लीजिए। जब आपकी नौकरियां जा रही थीं, तब कोई घाटे से 16 हज़ार गुना मुनाफे में जा रहा था। द वायर की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है।

Nitesh Tripathi : जब लगभग अधिकांश मीडिया हाउस सरकार के चरणों में लोट रही हैं ऐसे में ‘द वायर’ की एक स्टोरी ने सरकार के नाक में दम कर दिया. हालांकि इस खबर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार इतना तो जाने ले कि सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कोई तो ऐसा है जो अब भी धारा के विपरीत चलने का माद्दा रखता है. अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने प्रेस कांफ्रेंस कर ‘वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही है.

Abhishek Parashar : भक्तों ने मोटा भाई के बेटे की कंपनी में रातों रात हुई बेतहाशा बढ़ोतरी की खबर सामने लाने वाली रोहिणी सिंह के खिलाफ अपना काम शुरू कर दिया है. अभी कुछ लंपट यह कह रहे हैं कि उन्होंने ईटी से निकाल दिया गया, हो सकता है कल को यह बात कहीं और पहुंच जाए. लेकिन इन मूर्खों को यह समझ में नहीं आएगा, यह वही रोहिणी सिंह हैं, जिन्होंने वाड्रा के खिलाफ भी स्टोरी की थी. वही स्टोरी, जिसकी दम पर सवार होकर बीजेपी सत्ता में आई. भक्त भूलते बहुत तेजी से हैं, उन्हें याद नहीं रहता कुछ भी.

Manish Shandilya : न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की ख़बर में दावा किया गया कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की कंपनी का टर्न-ओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके पिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बेतहाशा बढ़ा है. ये ख़बर सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से फैली और ट्विटर और फ़ेसबुक पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गई. @ishar_adv नाम के हैंडल ने लिखा, ”बीजेपी ने अपना स्लोगन बदल लिया है. विकास की जय के बजाय जय का विकास. कोई ज्यादा अंतर नहीं है. अब हमें समझ आया कि आख़िर विकास कहां छिपा बैठा है.”

पत्रकार नितिन ठाकुर, नीतेश त्रिपाठी, अभिषेक पराशर और मनीष शांडिल्य की एफबी वॉल से.

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