मोदी के कश्मीर कांड पर यशवंत की ताजी भड़ास

Yashwant Singh : पत्रकार मित्र सत्येंद्र पी सिंह की इस बात से सहमत हूँ- “कश्मीर पर ओवर रिएक्ट न करें। न अभी इसे मुद्दा बनाएं। मुझे नहीं लगता कि अलगाववादियों को बहुत ज्यादा समर्थन मिलने जा रहा है और घाटी अशांत हो जाएगी। सब कुछ बेहतर होगा, यही कामना है।” Share on:कृपया हमें अनुसरण करें …

‘कश्मीर टाइम्स’ की संपादक अनुराधा भसीन पहुंचीं सुप्रीम कोर्ट, संचार सेवा बंदी के खिलाफ याचिका

अघोषित कर्फ्यू जैसा माहौल, इंटरनेट सेवाओं के ठप हो जाने से मीडियाकर्मी परेशान… ‘कश्मीर टाइम्स’ की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने जम्मू-कश्मीर में मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दाखिल की है। याचिका में मोबाइल, इंटरनेट सहित लैंडलाइन जैसी तमाम संचार व्यवस्था को तत्काल बहाल करने की मांग की …

हमें कश्मीर का बॉयकाट करने की नहीं, कश्मीर में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की जरूरत है

आओ, जन्नत को संभालें… शक्ति और सत्ता के लालच में न केवल केंद्र सरकारों ने बल्कि स्थानीय राजनीतिक दलों, नेताओं और अलगाववादियों ने कश्मीर घाटी में आग लगाई है, बल्कि कश्मीर समस्या की गांठों को कुछ और उलझा दिया है। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जब सत्ता में नहीं होते तो उनकी ज़ुबान अक्सर अलगाववादियों की …

हम कश्मीर क्यों दें कश्मीरियों को?

बुद्धिजीवी होने का मतलब शुतुरमुर्ग होना नहीं है। हमेशा अपनी थ्योरी से ही चीजों का विश्लेषण मत कीजिये। क्या होता और क्या होना चाहिये से ज्यादा महत्वपूर्ण है..क्या हो रहा है। सैकड़ो वर्षों से वास्तव में क्या हो रहा है, पूरे विश्व मे क्या हो रहा है? उसको आंखों से देखा जा सकता है। उसके …

जैसा मैंने कश्मीर को देखा… : हमारे हिस्से में केवल भूभाग है, जनता नहीं!

मेरी और मेरे तीन मित्रों की मध्य अप्रैल 2018 में कश्मीर की यात्रा ऐसे समय हुयी जब कश्मीर अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। वहां हिंसा है, अविश्वास, नफरत, भय और डर है। जो कश्मीर अपनी सुन्दरता के लिये विख्यात था, सैलानियों से गुलजार रहता था, वहाँ आज उदासी और सूनापन है। सैलानियों …

कश्मीर समस्या का एकमात्र हल

पी.के. खुराना

2014 के लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने कई नारे उछाले थे, उनमें से एक नारा था — “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सीमम गवर्नेंस”। मोदी ने तब यह नारा देकर लोगों का दिल जीता था क्योंकि इस नारे के माध्यम से उन्होंने आश्वासन दिया था कि आम नागरिकों के जीवन में सरकार का दखल कम से कम होगा। लेकिन आज हम जब सच्चाई का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि यह भी एक जुमला ही था। अमित शाह ही नहीं खुद मोदी भी गुजरात के विधानसभा चुनाव के लिए गुजरात में प्रचार कर रहे हैं। अमित शाह के साथ बहुत से विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी राज्य में दिन-रात एक किये दे रहे हैं। लगता है मानो देश की सारी सरकारें गुजरात में सिमट आई हैं। गुजरात विधानसभा चुनावों के कारण संसद का सत्र नहीं बुलाया जा रहा है ताकि संसद में असहज सवालों से बचा जा सके, वे सवाल मतदाताओं की निगाह में न आ जाएं। इसी प्रकार चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को प्रभावित करने के सफल-असफल प्रयास न तो गवर्नेंस हैं और न ही “मिनिमम गवर्नमेंट” के उदाहरण हैं।