जिनकी प्रभाषजी ने खाट खड़ी कर दी थी, वे प्रभाष स्मृति में भाषण देंगे!

Om Thanvi : प्रभाष परंपरा न्यास के आयोजन का कार्ड डरते-डरते खोला, कि फिर कोई भाजपाई ज्ञान देने को बुलाया होग। लीजिए, एक नहीं दो-दो निकले – भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा मार्गदर्शक-मंडल सदस्य मुरलीमनोहर जोशी और पूर्व भाजपा सांसद त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी। Continue reading

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मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था- सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए

Devpriya Awasthi : अपने देश और समाज को समझना है तो एनडीटीवी पर रवीश कुमार और फेसबुक पर हिमांशु कुमार को फालो कीजिए. आपको रवीश के बारे में अपनी राय बनाने और रखने का पूरा अधिकार है लेकिन, सत्ता और व्यवस्था प्रतिष्ठान के विरोध में उनका नजरिया मुझे और मुझ सरीखे बहुत से लोगों को पसंद आता है. मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था कि सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए.

सत्ता और व्यवस्था का समर्थन करना जितना आसान है, सतत विरोध करना उतना ही मुश्किल. जहां तक रवीश द्वारा २.२० करोड़ रुपए के सालाना पैकेज की बात है, मोदी और उनकी सरकार के समर्थन में चाटुकारिता की हद तक जुटे दर्जनों पत्रकार इससे भी ज्यादा पैकेज पा रहे हैं. रही बात अपने मालिक के हित में बात करने की, क्या कोई भी कर्मचारी अपने मालिक के हितों को नुकसान पहुंचाकर उसके संस्थान में टिका रह सकता है.

मैं ३६ साल के कैरियर में आठ संस्थानों और १० राज्यों में काम करने के अनुभव के साथ कह सकता हूं कि किसी भी संस्थान में मालिक या अपने वरिष्ठ अधिकारियों का विरोध करना है तो हर समय इस्तीफा जेब में रखना चाहिए. मैं तो भाग्यशाली था कि मेरे दौर में वैकल्पिक रोजगार के लिए ज्यादा भटकना नहीं पड़ता था. आज तो वैकल्पिक रोजगार मिलना बहुत मुश्किल हो गया है.

वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी की एफबी वॉल से.

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आज लगा कि प्रभाष जी की यादों को संघ ने गोद ले लिया है!

प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम पर जनसत्ता के कुछ पुराने लोगों की चर्चा…. प्रभाष प्रसंग में नहीं जा सका। अफ़सोस था। फिर फेसबुक पर किसी का लिखा ये पढ़ा और अफ़सोस कम हुआ: “अभी वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् डॉ. क्लॉड अल्वारेस का ‘गणेश और आधुनिक बुद्धिजीवी’ विषय पर प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान चल रहा है। वे महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं, “वैसे तो मेरे परिचय में कहा जाता है कि मैं ‘रोमन कैथोलिक’ हूं लेकिन रोम से हमारा क्या लेना-देना, वास्तव में मैं ‘हिंदू क्रिश्चियन’ हूं, क्योंकि मेरे पूर्वज हिंदू थे और मैं मानता हूं कि जो भारत में रहता है वह सब हिंदू है।”

सबको हिंदू घोषित करने की ये बीमारी भारत को कहीं पाकिस्तान न बना दे!

उन्होंने और भी दिलचस्प बातें कहीं। चूक गए। अफसोस करो। कहीं हिंदू राष्ट्र तो घोषित नहीं कर दिया?

उन्होंने बताया कि बैगन की 3500 प्रजातियां हैं और चावल की 350000। लग रहा था हम पूसा इंस्टीट्यूट में बैठे हैं।

अच्छा। और ये कि ये सब प्रजातियाँ आर्यावर्त ने ही विश्व को दीं। जिन्हें अब मोन्सान्टो बेच रहा है जैसे बोईंग ने पुष्पक विमान का ब्लूप्रिंट चुरा लिया था और अब मज़े कर रहा है।

बिल्कुल। अगर तुम वहां नहीं थे। फिर भी पता है तो ये पार्टी लाइन का ही मामला लगता है।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने ठीक कहा था कि गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी हुई थी। लोगों ने उनका मजाक उड़ाया पर कोई उनके बचाव में नहीं आया। फिर बताया कि प्लास्टिक सर्जरी सबसे पहले भारत में ही शुरू हुई थी। बहुत ही ज्ञानवर्धक भाषण था।

अब अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं रहा। लेकिन वो तो एक हिस्सा भर था। बाकायदा – लैपटॉप प्रेजेंटेशन के जरिए (यह सब बताया गया)। प्रधानमंत्री जो कहते हैं ठीक ही कहते होंगे। (आज के आयोजन में) प्रभाष परंपरा न्यास की विविधता दिखी। प्रधानमंत्री के @#$%^^& का भरपूर, तर्कसंगत बचाव किया गया।

आज प्रभाष जोशी होते तो कल सुबह के जनसत्ता में ये सब सुनकर क्या लिखते? अब बस कल्पना ही कर सकते हैं। जीवित नहीं रह पाते। वो तो बहुत पहले की स्थितियां नहीं झेल पाए। पेड न्यूज ने ही उनकी बलि ले ली। ये सब उनके वश का नहीं था। राय साब का लिखा छपता। (जो छपा है पढ़ सकते हैं)।

 

(उपरोक्त न्यूज कटिंग पर क्लिक करें ताकि साफ-साफ पढ़ सकें)

वे एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) में हैं ये भी तो है। शायद इसीलिए वहां वंदना शिवा भी थीं। इतना ही नहीं, वहां एक और सज्जन जिन्हें गैलिलियो प्राइज भी मिला और वे बच्चों को एक हफ्ते में maths समझा देने में समर्थ भी हैं (भी मौजूद थे)। दिग्गज आलोचक नामवर सिंह ने कहा हिन्दुस्तान में भुलाने का एक दौर रहा है। महत्वपूर्ण ये है कि तीसरा press commission जल्दी ही घोषित हो जाएगा।

अब उन्हीं की याद में पुनरुत्थानवादी डंका बजा रहे हैं। इससे भयानक और क्या हो सकता है। “संघ कबीले” पर प्रभाष जी के लिखे को न्यूट्रलाइज ऐसे ही किया जा सकता है। आज तो लगा कि प्रभाष जी (उनकी यादों को) संघ ने गोद ले लिया है। हालांकि एक ही व्यक्ति का भाषण खतरनाक था। बाकी झेलने लायक थे। कौन थे वो सज्जन? (यह सवाल गैलिलियो प्राइज विजेता के लिए है)। गणित के उस्ताद बताया। तीन दिन में कैलकुलस पढ़ा देने का दावा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हैं। नाम याद नहीं रहा। श्रोताओं में थे। (एक नाम, को संबोधित) उनकी योग्यता और तर्क शक्ति पर संदेश नहीं है। पर मौका और तथ्य …. प्रभाष जोशी को भी संघ ने एप्रोप्रिएट किया!!

प्रभाष जी ऐसे पोंगों के खिलाफ थे….अफ़सोस ये है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके लिखे पर बात ही नहीं की जा रही है। और ये एक साज़िश के तहत हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे भगत सिंह की तस्वीर पर फूल चढ़ाने वाले नहीं चाहते कि भगत सिंह का लिखा पढ़ा जाए। बिलकुल यही बात है। हुआ तो लगभग वही। हालांकि, संदेह का लाभ देते हुए कहा जा सकता है कि आयोजकों की जिम्मेदारी वक्ता के चयन तक ही थी। और मंच पर जिस तरह राय साब उनके पास गए, और उन्होंने कई पन्ने (एक साथ) पलट दिए और अचनाक समय कम होने की बात कर उपसंहार करने लगे उससे लगता है कि आयोजकों की सहमति नहीं भी हो सकती है। और उनसे बाकायदा जल्दी समाप्त करने के लिए कहा गया हो। क्या प्रभाष जी के लेखन पर एक कार्यशाला आयोजित नहीं करनी चाहिए ताकि उनको सिर्फ़ एक परंपरा-प्रेमी संपादक के तौर पर प्रोजेक्ट करने के षड्यंत्र को कुछ तो रोका जा सके।

मेरा सवाल है: आज प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व पर बात करना ज़्यादा प्रासंगिक है या उनके लेखन पर? अगर कोई उनके लेखन पर चुप्पी साधे है और सिर्फ़ उनके व्यक्तित्व पर पुष्पांजलि देना चाहता है तो मुझे इसमें षड्यंत्र साफ़ नज़र आता है। आयोजकों की नीयत पर मुझे शक नहीं है। प्रभाष जी के लेखन पर जरूर बातचीत होनी चाहिए। उनके लेखन में जो बदलाव आया उस पर भी सोचा जाना चाहिए। ये शोध की बात है। आयोजक-प्रायोजक तो अपना नफा-नुकसान देखेगा ही। किसी फेसबुकिया की सन्दर्भ से काट कर की गई आधी-अधूरी रिपोर्टिंग से पूरे आयोजन के बाबत निष्कर्ष निकाल कर फ़तवा देने की हड़बड़ी क्यों? विद्वतजनों से सादर फतवा यहां कौन किसको देगा। कौन नवसिखुआ है। पर ब्रेकिंग न्यूज का अलग मजा है। इसे झेलना सीखना ही होगा। टन टना टन्न लगता है कानों में … सोच समझ कर बैलेंस करके लिखा पढ़ने में कहां मजा आएगा।

……. भाई ने मुद्दे की बात उठाई है ………

प्रभाष जी के जमाने में ही संघमार्का हिंदू वादियों की भरमार थी। अब उस इतिहास में क्या कोई संशोधन मुमकिन है? मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रभाष जी के लेखन को इस दौर में फिर से याद करने की गुज़ारिश कर रहा हूँ। हम प्रभाष जी को ज़रूर याद रखें पर उनके लेखन को पशेपर्दा करना एक साज़िश से कम नहीं है। ज़िम्मेदार कोई भी हो। एक गोष्ठी सिर्फ़ उनके लिखे पर होनी चाहिए। इस पर नहीं कि वो कितने महान संपादक थे। प्रभाष जी को महान उनके लेखन और विचार ने बनाया। इसका ध्यान रखा जाए। प्रभाष जी के लेखन पर चर्चा उत्तम आइडिया है …….. ।

(बगैर अनुमति उद्धृत किया जा रहा है इसलिए नाम जानबूझ कर हटा दिए गए हैं। हालांकि, चर्चा सार्वजनिक और सबकी जानकारी में रिकार्डेड है।)

लेखक संजय कुमार सिंह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन / टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं.

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आज के जनसत्ता को लेकर एक समीक्षात्मक टिप्पणी : अलिवदा जनसत्ता!

प्रिय बंधु
नमस्कार
जनसत्ता को लेकर एक टिप्पणी भेज रहा हूं। सुना है कि आपका ब्लाग काफी पढ़ा जाता है। मेरी चिंता को स्थान देंगे तो बहुत आभारी रहूंगा। मैं एक शिक्षक हूं और आज का जनसत्ता देखकर दुखी हूं। सोच रहा हूं कि संपादक को भी लिखूं। टिप्पणी थोड़ी आक्रोश में लिखी है, आप देख लीजिए।

देवेंद्र नागमणि
आरके पुरम
दिल्ली

जनसत्ता में कूढ़मगज संपादक और फटफटिया लेखक का विष्ठा वमन

1 मई (मजदूर दिवस) का ”जनसत्ता” अखबार मेरे सामने पड़ा है। इसका ”रविवारी जनसत्ता” का पहला पन्ना- देहलीला से देहगान तक -( पोर्न स्टार सनी को लियोनी पर आधारित) की स्टोरी देख कर मैं हैरान हूं। यही लेख हो सकता है  कहीं और छपा होता तो मुझे हैरानी नहीं होती। लेख में सनी को आज की वुमेन आइकन की तरह पेश किया गया है। यानी इरोम शर्मिला, मेरा कॉम, सोनी सोरी,  मेधा पाटकर आदि की जगह गई बट्टेखाते में। जनसत्ता ने नई औरत की नई परिभाषा दे दी है। मेरे हिसाब से यह इस अखबार का विष्ठा-वमन है। जनसत्ता का ऐसा पतन, इतना पतन। मेरी कल्पना से परे है। इसे सुधीश पचौरी महाशय ने लिखा है। वे वैसे भी फटफटिया लेखक हैं और उसे हिंदी में गंभीरता से कोई नहीं लेता। उसे राइटिंग-डायरिया है। बाएं हाथ से मार्क्स पर लिख देता है और दाएं हाथ से गुरु गोलवलकर पर। बीच वाली डंडी से सनी पर लेखनी चलाई है।

कहते हैं कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वह गांव की तरफ भागता है, लेकिन जब एक अखबार की मौत आती है तो वह पोर्न-आइकन की तरफ भागता है। जनसत्ता अगर कल नहीं, परसों,  या कुछ बरसों-बाद बंद हुआ या बंद न भी हुआ और किसी लकवाग्रस्त रोगी की तरह घिसटता रहा तो, मई दिवस की यह कवर (कब्र)-कथा का उसमें बड़ा योगदान होगा। मेरे विचार से जनसत्ता की अपनी जो पहचान थी, उसे उसी रास्ते पर चलना चाहिए था। लेकिन, यह मौजूदा संपादक का मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा कि उसे कुछ ”मसालेदार” चीजों में बढ़ता सर्कुलेशन नजर आ रहा है। मैं नहीं जानता कि संपादक कौन है, लेकिन मेरे खयाल से यह व्यक्ति प्रभाष-परंपरा का बिल्कुल नहीं है। मुझे तो लगता है कि यह प्रभाष जोशी का गू-मूत्र उठाने लायक भी नहीं है। यह वही अखबार है, जिसने रवींद्रनाथ टैगोर, फैज अहमद, मजाज, नागार्जुन से लेकर न जाने कितने महान लोगों पर स्टोरियां की हैं। कभी मंगलेश डबराल इसके संपादक होते थे। जनसत्ता को बचाना है तो उसे अपने को इस मौजूदा संपादक से मुक्त करना होगा।

”जनसत्ता ” न सिर्फ मेरा, बल्कि हिंदी पट्टी के एक बहुत बड़े बौद्धिक वर्ग की मानसिक-बौद्धिक भूख लंबे अरसे से शांत करता रहा है। प्रभाष जोशी के लंबे कार्यकाल में इसका समाचार और विचार पक्ष दोनों काफी सशक्त थे । इसका सर्कुलेशन भी ठीकठाक था। जोशीजी के जाने के बाद ओम थानवी ने इसकी सत्ता संभाली तो इसका समाचार पक्ष क्षीण हो गया। सर्कुलेशन भी कुछ खास नहीं रहा। लेकिन, इसके बावजूद थानवी की कुव्वत यह रही कि उन्होंने इसके संपादकीय पृष्ठ और रविवारी के स्तर को न सिर्फ कायम रखा, बल्कि उसे बौद्धिक ऊंचाई और गरिमा प्रदान की। अखबार को सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सरोकार से जोड़े रखा। बाजारी मानसिकता से अलग हटकर उन्होंने इसे अपनी प्रतिभा के दम पर चर्चा में बनाए रखा। अखबार का सर्कुलेशन कम होने के बावजूद जनसत्ता की आवाज की अनसुनी नहीं की जा सकती थी। सत्ता से टकराने का मामला रहा हो या सांप्रदायिक ताकतों से लोहा लेने का, थानवी के बौद्धिक कौशल और हिम्मत को दाद देनी चाहिए।

मैं देख रहा हूं कि कई महीनों से वैसे भी अखबार में कुछ दम नहीं रह गया है। इसका संपादकीय पेज चलताऊ लेखों की मगजमारी से बजबचा रहा है। लगता है कायदे के लेखक या विदा कर दिए गए हैं या उन्होंने खुद ही इससे अपना हाथ खींच लिया है। नएपन के नाम पर एक सनीचरी पन्ना निकलता है, जो  कायर्कारी संपादक मुकेश भारद्वाज लिखते हैं, हास्यास्पदता और निरर्थकता का फूहड़ नमूना है।

मेरे कुछ परिचित साथी और मित्र महीनों पहले जनसत्ता बंद करा चुके थे, एक मैं  ही इसे पढ़े जा रहा था। आज से मेरे लिए भी इसका दरवाजा बंद ।

जनसत्ता जो सालों से मेरी सुबह का पहला मुलाकाती रहा था।

अलिवदा जनसत्ता!

देवेंद्र नागमणि
आरके पुरम
दिल्ली
ddanav6@gmail.com

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