जानिए प्रभाष जोशी की नज़र में ‘चौकीदार का चोर होना’ के मायने क्या थे

पैकेज के तहत विज्ञापनों को खबर बनाने का काला धंधा… इसे चौकीदार का चोर होना घोषित कर गए प्रभाष जोशी… प्रधानमंत्री मोदी ने साल-14 में चुनाव जीतने के लिए नाहक ही भ्रष्टाचार के खिलाफ चौकीदार की भूमिका का ऐलान कर डाला जो अब उनके गले की हड्डी बन चुका है.काले धन की नीव पर टिके …

जिनकी प्रभाषजी ने खाट खड़ी कर दी थी, वे प्रभाष स्मृति में भाषण देंगे!

Om Thanvi : प्रभाष परंपरा न्यास के आयोजन का कार्ड डरते-डरते खोला, कि फिर कोई भाजपाई ज्ञान देने को बुलाया होग। लीजिए, एक नहीं दो-दो निकले – भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा मार्गदर्शक-मंडल सदस्य मुरलीमनोहर जोशी और पूर्व भाजपा सांसद त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी। कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था- सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए

Devpriya Awasthi : अपने देश और समाज को समझना है तो एनडीटीवी पर रवीश कुमार और फेसबुक पर हिमांशु कुमार को फालो कीजिए. आपको रवीश के बारे में अपनी राय बनाने और रखने का पूरा अधिकार है लेकिन, सत्ता और व्यवस्था प्रतिष्ठान के विरोध में उनका नजरिया मुझे और मुझ सरीखे बहुत से लोगों को पसंद आता है. मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था कि सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए.

आज लगा कि प्रभाष जी की यादों को संघ ने गोद ले लिया है!

प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम पर जनसत्ता के कुछ पुराने लोगों की चर्चा…. प्रभाष प्रसंग में नहीं जा सका। अफ़सोस था। फिर फेसबुक पर किसी का लिखा ये पढ़ा और अफ़सोस कम हुआ: “अभी वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् डॉ. क्लॉड अल्वारेस का ‘गणेश और आधुनिक बुद्धिजीवी’ विषय पर प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान चल रहा है। वे महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं, “वैसे तो मेरे परिचय में कहा जाता है कि मैं ‘रोमन कैथोलिक’ हूं लेकिन रोम से हमारा क्या लेना-देना, वास्तव में मैं ‘हिंदू क्रिश्चियन’ हूं, क्योंकि मेरे पूर्वज हिंदू थे और मैं मानता हूं कि जो भारत में रहता है वह सब हिंदू है।”

आज के जनसत्ता को लेकर एक समीक्षात्मक टिप्पणी : अलिवदा जनसत्ता!

प्रिय बंधु
नमस्कार
जनसत्ता को लेकर एक टिप्पणी भेज रहा हूं। सुना है कि आपका ब्लाग काफी पढ़ा जाता है। मेरी चिंता को स्थान देंगे तो बहुत आभारी रहूंगा। मैं एक शिक्षक हूं और आज का जनसत्ता देखकर दुखी हूं। सोच रहा हूं कि संपादक को भी लिखूं। टिप्पणी थोड़ी आक्रोश में लिखी है, आप देख लीजिए।

देवेंद्र नागमणि
आरके पुरम
दिल्ली