राम बहादुर राय को वोटिंग का अधिकार देना पड़ा, प्रेस क्लब प्रबंधन झुका, देखें वीडियो

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में राम बहादुर राय को वोट देने का अधिकार क्लब प्रबंधन को देने के लिए मजबूर होना पड़ा. ड्यूज न जमा करने का हवाला देकर राय साहब की सदस्यता रद्द कर दी गई थी. इसके खिलाफ राय साहब ने प्रेस क्लब चुनाव के दौरान विरोध का ऐलान कर दिया था. वे चुनाव के दिन मौके पर पहुंचे और वोट देने का अधिकार मांगा. इससे हड़बड़ाए क्लब प्रबंधन ने तुरंत उनका ड्यूज जमा कराने के बाद उन्हें वोटिंग का राइट दे दिया.

देखें मौके से तैयार किया गया वीडियो….

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प्रेस क्लब आफ इंडिया प्रबंधन ने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की सदस्यता सस्पेंड की

प्रेस क्लब आफ इंडिया का चुनाव बस दो दिन बाद है यानि पच्चीस नवंबर को. उसके ठीक पहले एक बड़ी खबर आ रही है. प्रेस क्लब आफ इंडिया के पदाधिकारियों ने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की सदस्यता सस्पेंड कर दी है. साथ ही उन्हें वोट न डालने देने का भी फैसला ले लिया है. इससे आहत जाने-माने पत्रकार और अपनी बेबाक बयानी के लिए मशहूर राम बहादुर राय ने घोषणा की है कि वह चुनाव के दिन प्रेस क्लब आफ इंडिया जाएंगे और अपना ड्यूज क्लीयर करने के बाद वोट देने की कोशिश करेंगे. अगर वोट देने से रोका गया तो वो विरोध स्वरूप वहीं पर खड़े रहेंगे.

मालूम हो कि प्रेस क्लब आफ इंडिया के उन्हीं सदस्यों को वोट डालने दिया जाता है तो अपना सालाना फीस जमा कर देते हैं. पिछले तीन वर्षों से ऐसा संयोग रहा कि राम बहादुर राय को चुनाव के दिन दिल्ली से बाहर रहना पड़ा. इस बार वह चुनाव के दिन दिल्ली में हैं. उन्होंने अपने एक करीबी को प्रेस क्लब आफ इंडिया भेजकर ड्यूज वगैरह के बारे में पता करवाया ताकि वोट डालने के दिन कोई दिक्कत न आए. तब पता चला कि राम बहादुर राय समेत सैकड़ों पत्रकारों की सदस्यता निलंबित कर दी गई है.

अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का आरोप है कि प्रेस क्लब प्रबंधन की तरफ से उनसे कहा जा रहा है कि वो वोट डालने न आएं क्योंकि उनका ड्यूज तीन साल तक जमा न होने और उस पर पेनाल्टी लगे होने के कारण सदस्यता निलंबित कर वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है. राम बहादुर राय का कहना है कि प्रेस क्लब प्रबंधन तीन साल का सदस्यता शुल्क ले ले और पेनाल्टी माफ कर दे. इसके बाद स्वत: वोट देने का रास्ता खुल जाएगा लेकिन प्रेस क्लब प्रबंधन इस पर राजी नहीं है. ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने दुखी और आहत मन से विरोध करने का फैसला कर लिया है. श्री राय चुनाव के दिन वोट देने जाएंगे और ड्यूज चुकाने के बाद भी वोट न डालने देने पर विरोध स्वरूप वहीं खड़े रहकर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे.

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह, जो प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में सेन-फरीदी-गांधी पैनल की तरफ से मैनेजिंग कमेटी मेंबर के लिए प्रत्याशी हैं, इस प्रकरण पर कहते हैं :

अगर हमारा प्रेस क्लब आफ इंडिया का प्रबंधन अपने बुजुर्ग पत्रकारों, अपने अग्रजों, अपने वरिष्ठों, अपने माननीयों का सम्मान नहीं कर सकता, इनके प्रति संवेदनशील नहीं हो सकता तो इस प्रेस क्लब के क्या मायने हैं. राम बहादुर राय जैसे जाने-माने और वरिष्ठ पत्रकार को हर हाल में वोट का अधिकार न सिर्फ दिया जाना चाहिए बल्कि सदस्यता निलंबन जैसी हरकत के लिए प्रेस क्लब आफ इंडिया के वर्तमान प्रबंधकों को माफी मांगनी चाहिए. वरिष्ठों से जुड़े मामलों में प्रेस क्लब को संवेदनशील होना चाहिए और स्वयं पहल करके किसी भी तकनीकी दिक्कत को दूर कर चीजों को आसान बनाए रखना चाहिए. नौकरशाही और तानाशाही वाली मानसिकता से काम करने वाला प्रबंधन अक्सर अहंकार से भरा होता है और वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता. यही अहंकार एक दिन विनाश का कारण बनता है. राय साहब जैसे बड़े पत्रकार के साथ प्रेस क्लब प्रबंधन के इस अपमान जनक हरकत को कोई भी पत्रकार उचित नहीं मानेगा और इसका बदला जरूर वोटिंग के दिन बैलट पेपर के जरिए वर्तमान प्रबंधकों / पदाधिकारियों को सबक सिखा कर लेगा.

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पद्मश्री राम बहादुर राय बने हिन्दुस्थान समाचार समूह के प्रधान संपादक

दिल्ली । पाक्षिक पत्र ‘यथावत’ के संपादक पद्मश्री राम बहादुर राय को हिन्दुस्थान समाचार समूह का प्रधान संपादक बनाया गया है जबकि मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह प्रधान संपादक राकेश मंजुल को सभी संपादकीय कार्यों से निवृत कर दिया गया है। अब वे संस्थान में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (रेडियो एवं दूरदर्शन सेवा) का स्वतंत्र प्रभार संभालेंगे। उनके कार्य में सहायक उपाध्यक्ष (विपणन) विशाल सिन्हा सहयोग करेंगे।

पद्मश्री राम बहादुर राय तात्कालिक प्रभाव से हिन्दुस्थान समाचार वायर सेवा, यथावत पाक्षिक, युगवार्ता साप्ताहिक, नवोत्थान मासिक, नवोत्थान बांग्ला और हिंदुस्थान समाचार वार्षिकी के संपादन कार्य की देखरेख और नियंत्रण करेंगे। उक्त निर्णय हिन्दुस्थान समाचार के निदेशक मंडल की मंगलवार को दिल्ली में हुई बैठक के दौरान लिया गया है। इस बैठक में महाप्रबंधक मानव संसाधन अशोक प्रसाद के दायित्व में वृद्धि करते हुए उन्हें हिंदुस्थान समाचार मल्टी स्टेट को आॅपरेटिव सोसायटी लिमिटेड का पदेन सचिव नियुक्त किया गया है। महा प्रबंधक (वित्त) सीबी प्रसाद को हिंदुस्थान समाचार मल्टी स्टेट को आॅपरेटिव सोसायटी लिमिटेड का कोषाध्यक्ष और महाप्रबंधक, प्रशासन एवं कर्मचारी कल्याण श्रीमती रत्ना सिन्हा को महाप्रबंधक समन्वय का दायित्व सौंपा गया है। हिंदुस्थान समाचार के चेयरमैन रवींद्र किशोर सिन्हा ने इस आशय के आदेश जारी कर दिए हैं। 

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रामबहादुर राय ने मोदी पर जो कटाक्ष किया है वह विपक्ष आलोचना के 10 संस्करण लिख कर भी नहीं कर सकता!

मैंने राम बहादुर राय के साथ काफी लंबा वक्त बिताया है। वे जनसत्ता में हमारे वरिष्ठ थे और ब्यूरो चीफ भी थे। कुछ लोग कहते थे कि उनके तार संघ के साथ जुड़े हुए हैं। वे आपातकाल की घोषणा होने के बाद मीसा के तहत गिरफ्तार होने वाले पहले व्यक्ति बताए जाते हैं। संघ के लिए उन्होंने उत्तर पूर्व में काफी काम किया और पत्रकारिता में काफी देर से संभवतः 1980 के दशक में आए। इसके बावजूद उनका समाजवादियों के साथ घनिष्ठ संबंध रहा।

वे अनेक समाजवादी नेताओं के करीबी रहे। इनमें चंद्रशेखर भी शामिल थे। सच कहे तो दिवंगत प्रभाष जोशी व चंद्रशेखर के संबंधों में आई कटुता को दूर करने में राय साहब का काफी योगदान रहा। वैसे वे गांधीवादियों के भी काफी करीब थे व गांधी शांति प्रतिष्ठान में उनकी काफी पैठ थी। जब प्रभाष जी नहीं रहे तो उनके अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर गांधी शांति प्रतिष्ठान में ही रखा गया था। राय साहब की सबसे बड़ी विशेषता उनकी स्पष्टवाहिता रही है। वे किसी के सामने कुछ भी कह सकते हैं। जैसे कि अगर कोई व्यक्ति दिल्ली के बाहर से उनसे मिलने आता और जनसत्ता के दफ्तर में घंटों बैठ कर उनका इंतजार करता तो राय साहब दफ्तर पहुंचने पर उसकी नमस्ते का जवाब देने के बाद सीधे पूछते कहिए कैसे आना हुआ है? वह जवाब देता कि दर्शन करने आया था। इस पर अगर राय साहब का मूड ठीक नहीं होता अथवा उन्हें काम करना होता तो उससे कहते ‘दर्शन कर लिए क्या’अब चलिए मुझे काम करना है।

एक बार जब इंडियन एक्सप्रेस के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर जाने की बात सोच रहे थे तो जनरल मैनेजर के साथ हम लोगों की बैठक हुई जिसमें राय साहब भी मौजूद थे। उन्होंने चर्चा के बीच में कह दिया कि हड़ताल जरूर करनी चाहिए इससे लोकतंत्र मजबूत होता है। सशक्त लोकतंत्र के लिए हड़ताल जरूरी होती है। वे अपने मन से काम करते थे। उनकी व प्रभाष जोशी की जोड़ी गजब की थी। दोनों ही काफी मस्त मौला थे।

अक्सर वे दोनों कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए एक साथ जाते थे व आपसी बातचीत में इतने मशगूल हो जाते कि ट्रेन या हवाई जहाज छूट जाता। प्रभाषजी कट्टर गांधीवादी व संघ भाजपा विरोधी थे जबकि रायसाहब संघी थे उसके बावजूद दोनों के बीच का लगाव काबिले तारीफ था। फक्कड़बाजी ही दोनों के व्यक्तित्व का ऐसा हिस्सा रही जो कि उन्हें आपस में जोड़ती थी। राय साहब की फक्कड़बाजी देखने काबिल थी।

जब अपने कैबिन में आते तो पहले कागज से अपना चश्मा साफ करते और फिर अपनी मेज खुद साफ करते। उसके बाद उनका दरबार लगता। हम लोग उन्हें घेर कर बैठ जाते और वो अपनी अलमारी से डब्बा निकालते जिसमें लइचा-चना, मूंगफली का मिश्रण भरा होता। हम सब उसे खाते। दुनिया भर की चर्चा होती व ब्यूरो की मीटिंग समाप्त हो जाती।
उनकी दो खूबियां रही। पहली यह कि उन्होंने कभी किसी संवाददाता पर दबाव डाल कर उससे कुछ करने को नहीं कहा। दूसरी यह कि कभी किसी को यह जताने की कोशिश नहीं कि वे बॉस है। जैसे कि जब जनसत्ता ब्यूरो बना तो उसकी पहली बैठक उनके घर पर हुई। मैं तो सोच रहा कि उसमें रिपोर्टिंग पर चर्चा होगी। मगर आनंद ने मुझे सुबह अपनी वैन ले कर आने का हुक्म दिया ताकि हम लोग दरियागंज स्थित सब्जी मंडी जाकर सब्जियां खरीद लाए। हम सभी साथी राय साहब के घर पर एकत्र हुए वहां खाना व नाश्ता बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। आनंदजी ने राजेश जोशी को कुछ मसाले आदि लाने की जिम्मेदारी सौंपी। उसमें कुछ इस प्रकार लिखा था कि गाय छाप पोला रंग- केसर दो रत्ती, हींग-पांच माशा।

बाद में राजेश जोशी ने हमें बताया कि जब वह पंसारी की दुकान पर पहुंचा और उसने यह सामान मांगा तो दुकानदार ने पूछा कि यह सामान किसने मंगवाया है? उसने कहा कि हमारे ब्यूरो चीफ है। जवाब में आंखें फैलाते हुए आश्चर्य के साथ कहा कि यह ब्यूरो चीफ है या पंसारी? राय साहब के भतीजे का अगले दिन इम्तहान था इसके बावजूद उसे भी पढ़ाई छोड़ कर आलू छीलने के काम में लगना पड़ा। दोपहर चार बजे हम लोगों ने खाना खाया और ब्यूरो की पहली बैठक अचार, चटनी, भरवा टमाटर पर चर्चा करने के साथ समाप्त हो गई। पत्रकारिता की कमी में एक भी शब्द नहीं बोला गया।

राहुल देव संपादक बने। वे काफी अनुशासनप्रिय थे व रोज ब्यूरो की बैठक करने में विश्वास रखते थे। उनकी तुलना में राय साहब तो समाजवादी थे। वे अपने पीए मनोहर को अपनी कुर्सी पर बैठा देते और खूद स्टूल या उसकी कुर्सी पर बैठकर उससे अपना लेख टाइप करवाते। एक बार हम लोग रायसाहब के कमरे में बैठे हुए, राहुलदेव की मीटिंग में जाने का इंतजार कर रहे थे। उनका चपरासी दो बार याद दिला चुका था कि वे हमारा इंतजार कर रहे हैं। मगर रायसाहब ने दोनों ही बार कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई। करीब 10 मिनट बाद राहुल देव उनके कैबिन में आए। हम लोग उन्हें देखकर उठ खड़े हुए व रायसाहब ने मनोहर को बैठे रहने का इशारा करते हुए अपना डिक्टेशन जारी रखा। राहुलदेव का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था। उन्होंने कहा कि रायसाहब मैं मीटिंग के लिए आप लोगों का इंतजार कर रहा था।

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और पीछे मुड़कर अपनी अलमारी खोली। नमकीन का डिब्बा बाहर निकाला और उसे खोलकर उनकी ओर आगे बढ़ाते हुए बोले आप इसे चखिए। लाल मुनि चौबे कहा करते थे कि इसमें कच्ची मूंगगफली के दाने मिलाकर खाने से दिमाग तेज होता है। फिर मनोहर की और मुड़कर बोले, मनोहरजी मैं क्या लिखवा रहा था। राहुलजी के लिए तो यह इंतहा थी वे दमदमाते हुए कमरे से बाहर निकले और हम सब लोग चना चबेने का आनंद लेने लगे।

मुझे यह सब लिखने की जरूरत इसलिए महसूस हुई कि जब मोदी सरकार ने रायसाहब को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला का अध्यक्ष बनाया तो मुझे लगा कि बेहतर होता कि उन्हंे मास कम्यूनिकेशन संस्थान का प्रभारी बनाया जाता। क्योंकि किसी को आदेश देना या प्रशासन चलाना तो राय साहब की आदत में शुमार ही नहीं है। इसलिए जब नीलम गुप्ता ने बताया कि इला भट्ट की पुस्तक का उन्होंने जो अनुवाद किया है उसका विमोचन इसी संस्था में हो रहा है तो मैंने सोचा कि क्यों न वहां जाकर देखूं कि क्या रायसाहब में कोई बदलाव आया है। वे कैसे प्रशासन चला रहे हैं। जब अध्यक्ष मंच पर मौजूद हो व यह भवन एनडीएमसी इलाके में स्थित हो फिर भी कार्यक्रम के दौरान एयर कंडीशनर बंद हो जाए व पसीने में भीगते हुए भाषण सुनने पड़े तो हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर ओम थानवी इसके अध्यक्ष होते तो ऐसी गलती होने पर दो-चार की नौकरी ले लेते। मगर यहां सब चलता रहा।

पहले नीलम गुप्ता ने अपने भाषण में मोदी सरकार को निशाना बनाते हुए कहा कि स्मार्ट सिटी नहीं बल्कि लोग स्मार्ट होते हैं। और फिर रायसाहब ने तो अपनी आदत के मुताबिक उस सरकार को ही धो डाला जिसने उन्हें इस पद पर बैठाया था। उन्होंने कहा कि मैं एक किस्सा सुनाता हूं। चाहे इंदिरा गांधी सरीखी सम्राज्ञी रही हो या आज के सम्राट, इला भट्ट जब एक बार लंबी यात्रा के बाद इंदिरा गांधी से मिलने गई तो उन्होंने उनसे कहा कि मैं आपके लिए एक छोटी से भेंट लेकर आई हूं। इंदिराजी ने पूछा क्या है तो उन्होंने कहा कि यह एक आईना है। इसमें आप खुद को देखती रहिएगा। मौजूदा सम्राट को भी खुद के आइने में देखते रहना चाहिए। इन शब्दों में उन्होंने जो कटाक्ष किया वह कटाक्ष तो विपक्ष आलोचना के 10 संस्करण लिख करके भी नहीं कर सकता।

सच रायसाहब आपका जवाब नहीं।

लेखक विवेक सक्सेना दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा नया इंडिया से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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गलती आउटलुक ने की है, बदनाम मुझे कर रहा है : अनिल पांडेय

Anil Pandey : पिछले दिनों आउटलुक पत्रिका में छपे एक इंटरव्यू पर विवाद गहराया है। आउटलुक ने दावा किया कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय का यह पहला इंटरव्यू है। रामबहादुर राय ने इस मसले पर यथावत पत्रिका के अपने अनायास स्तंभ में विस्तार से पूरे घटनाक्रम की चर्चा की है। अब जो सवाल उठ रहे हैं, उससे आउटलुक पीछे हट रहा है। चुप है। आखिर क्यों?

‘जो इंटरव्यू हुआ नहीं’

अंग्रेजी पत्रिका ‘आउटलुक’ में मेरा कथित और कल्पित इंटरव्यू छपा है। अंक है, 13 जून का। दावा किया गया है कि ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र’ के अध्यक्ष का यह पहला इंटरव्यू है। इस बारे में सबसे पहले मुझे तीन जून को जानकारी मिली। रोज की भांति दोपहर बाद चार बजे ‘यथावत’ पत्रिका के प्रवासी भवन स्थित कार्यालय पहुंचा। बेवसाइट से वह कथित इंटरव्यू निकलवाया। देखा। मन में आया, यह बड़ा मजाक है। उसे रख दिया। इंतजार कर रहा था कि पत्रिका छप कर आए, फिर उसे देखें और अपना पक्ष रखें। पत्रिका का अंक मंगवाया। उसे देखा। सरसरी तौर पर पढ़ा। चकित हुआ। कहिए होना पड़ा।

मैं सोच ही नहीं सकता कि एक बातचीत को इंटरव्यू बनाया जा सकता है। जिस बातचीत में मेरे अलावा दूसरे भी शामिल थे। इसलिए मैंने तत्क्षण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डा. सच्चिदानंद जोशी को फोन कर कहा कि एक पत्र मेरी ओर से आउटलुक संपादक को जाना चाहिए। जिसमें उन्हें सूचित करें कि जिसे उन्होंने इंटरव्यू के रूप में छापा है, वह हुआ ही नहीं। डा. सच्चिदानंद जोशी ने मेरी सलाह मानी। उन्होंने पत्र अपनी ओर से भेजा। उनसे बातचीत के बाद मैंने दूसरा फोन अतुल सिंह को किया। उन्हें बताया कि आउटलुक पढ़िए। जो कुछ हुआ है, उसे लिखकर मुझे दे सकें तो बहुत भला होगा। वे शाम को चट्टो बाबा के साथ प्रवासी भवन आए। उन्होंने बिंदुवार एक विवरण ‘फैक्ट-शीट’ बनाकर दिया।

उनके ‘फैक्ट शीट’ और अपनी याददास्त के आधार पर यहां जो घटनाक्रम रहा, उसे बता रहा हूं। उससे पहले यह कह दूं कि मेरी याददास्त बहुत अच्छी है। इसे मेरे मित्र और परिचित जानते हैं। वे कहते भी हैं। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का बारहवां स्थापना दिवस था। 14 मई को कांस्टीट्यूशन क्लब में समारोह हुआ। वहां जो बोला, वह अतुल सिंह और चट्टो बाबा को पसंद आया। आखिरी भाषण वहां गोविंदाचार्य का था। उनके और मेरे बोलने से इन दोनों में एक मिशन का भाव पैदा हुआ, जिसे उन लोगों ने मुझे बताया और कहा कि इसे बढ़ाने की जरूरत है।

बारह दिन बाद अतुल सिंह का फोन आया। मिलने के लिए समय मांगा। मेरे हां कहने पर वे और चट्टो बाबा प्रवासी भवन आए। उनके साथ एक कुलीन महिला भी थी। उस दिन देर शाम तक उनसे बात करने के लिए समय नहीं निकाल सका। हाथ जोड़ा। कहा कि फिर कभी बात होगी। अतुल सिंह के फैक्ट शीट में है कि ‘प्रवासी भवन पहुंचने पर मैंने प्रज्ञा सिंह का परिचय अपने मित्र के रूप में कराया।’

अगले दिन वे तीनों आए। इंतजार करते रहे। उनके पास मैं गया। अतुल सिंह ने कहा कि कास्टीट्यूशन क्लब के भाषण पर हम बात करना चाहते हैं। इसमें प्रज्ञा भी शामिल है। यहा बता दूं कि 14 मई को पंचायत प्रणाली और उससे संबंधित संवैधानिक इतिहास पर मैंने जो कुछ अब तक समझा है, उसे ही थोड़े समय में बोला। उस पर विस्तार से बात करने के लिए वे लोग आए थे।

अतुल सिंह ने ही बातचीत शुरू की। प्रवासी भवन का वह बैठका था। वहां उपस्थित तो कई व्यक्ति थे, लेकिन चार के बीच में बात होती रही। सच यही है। उस बातचीत को कुछ का कुछ बनाकर आउटलुक ने इंटरव्यू के रूप में छापा है। बातचीत और इंटरव्यू में फर्क होता है। इसे हर पत्रकार जानता है। एक नागरिक भी जानता है। मेरा सवाल है, क्या यह फरेब नहीं है? अतुल सिंह, चट्टो बाबा और प्रज्ञा सिंह ने जो-जो कहा वह कहां है?

आउटलुक के इंट्रो की आखिरी लाईन अपने पाठकों को बता रही है कि यह बातचीत का सार है। इसी से स्पष्ट है कि वह इंटरव्यू नहीं था। आउटलुक अपने पाठकों को भी गुमराह कर रहा है। न प्रज्ञा सिंह ने मुझसे इंटरव्यू के लिए समय मांगा था और न ही मैंने उन्हें इंटरव्यू दिया। डा. सच्चिदानंद जोशी ने इसलिए अपने पत्र में संपादक को लिखा कि पत्रिका झूठा दावा कर रही है। आउटलुक के प्रधान संपादक ने अपनी भूल मानने की बजाए जवाब में लिखा कि ‘प्रज्ञा सिंह का रामबहादुर राय से व्यक्तिगत रूप में परिचय कराया गया।’ अतुल सिंह भी यही बता रहे हैं। स्पष्ट है कि प्रज्ञा सिंह ने इंटरव्यू के लिए सीधे समय नहीं मांगा। वे अतुल सिंह की योजना में आई। योजना इंटरव्यू की तो थी ही नहीं। जैसा कि अतुल सिंह के फैक्ट शीट में है।

आउटलुक पत्रिका देखने के बाद अतुल सिंह ने उनसे अपनी तीन आपत्तियां दर्ज कराई। एक- स्टोरी को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष का इंटरव्यू बना दिया गया है। उसे एक खास इरादे से पेश किया गया है। दो- उस दिन की बातचीत संविधान के गुण-दोष पर थी, डॉ. भीम राव आंबेडकर के योगदान पर नहीं थी, जबकि कथित इंटरव्यू में उसे ही केंद्रीय विषय वस्तु बना दिया गया है। तीन- इंटरव्यू और उसके इंट्रो में छत्तीस का संबंध है। जो पाठकों के मन पर जहरीला प्रभाव छोड़ने के इरादे से भरा हुआ है।

एक कहावत है- ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाटे।’ इसे आउटलुक चरितार्थ कर रहा है। गलती आउटलुक ने की है। बदनाम मुझे कर रहा है। जिसे इंटरव्यू बनाकर छापा गया है, वह पत्रकारिता के चोले में लठैती है। आउटलुक में किसने क्या किया? यह पत्रकारों के लिए खोज-खबर का विषय है। मैं अपने लिए इतना ही कहूंगा- हवन करते हाथ जला लिया है। अक्सर पत्रकार मेरे पास आते हैं। बात करते हैं। उन्हें आउटलुक के इस फरेब से निराश होने की जरूरत नहीं है। भले ही हाथ जल गया हो, फिर भी हवन होता रहेगा। इस घटना के बावजूद मेरा मन निर्मल है। उसके बरतन को रोज धोता और चमकाता हूं। यह आदत इमरजेंसी के दिनों में जेल में जो लगी, वह बनी हुई है। आउटलुक अपना मन टटोले और सच का सामना करे।

जनसत्ता, न्यूज बेंच, संडे इंडियन समेत कई अखबारों मैग्जीनों में वरिष्ठ पद पर कार्य कर चुके पत्रकार नेता अनिल पांडेय के एफबी वॉल से.

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बिना सहमति इंटरव्यू छापे जाने से नाराज रामबहादुर राय ने आउटलुक को लिखा लेटर, एडिटर्स गिल्ड में मुद्दा उठाएंगे

केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) के अध्‍यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का इंटरव्यू एक साप्ताहिक पत्रिका ‘आउटलुक’ ने छापा है जिसमें राम बहादुर राय को यह कहते हुए दिखाया गया है कि संविधान निर्माण में डॉ बीआर आंबेडकर की कोई भूमिका नहीं थी. आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व महासचिव राय के ‘आउटलुक’ को दिए साक्षात्कार के अनुसार राय ने कहा कि आंबेडकर ने संविधान नहीं लिखा था. आंबेडकर की भूमिका सीमित थी और तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी बीएन राऊ जो सामग्री आंबेडकर को देते थे, वे उसकी भाषा सुधार देते थे. इसलिए संविधान आंबेडकर ने नहीं लिखा था. अगर संविधान को कभी जलाना पड़ा तो मैं ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति होऊंगा. 

जब पूछा गया कि क्या तब अंबेडकर की भूमिका मिथक थी तो उन्होंने कहा, हां, मिथक है, मिथक है, मिथक है…। यह पहचान की राजनीति का हिस्सा है। देश में कुछ मिथक गढ़े गए हैं और इनमें से एक है कि संविधान ‘मंदिर की प्रतिमा’ की तरह है जिसे कोई नहीं छू सकता। उन्होंने कहा, कुछ लोगों को लगता है कि अगर संविधान से छेड़छाड़ हुई तो बाबा साहब आंबेडकर के सपनों का क्या होगा। लेकिन बाबा साहब के सपनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोग इस संसद में हैं, इसलिए यह खतरा नहीं है।

राय के बयान के बाद तत्काल उनकी आलोचना शुरू हो गई और भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष दुष्यंत कुमार गौतम ने विवादास्पद टिप्पणी की निंदा करते हुए कहा कि यए बयान आंबेडकर के अपमान के समान हैं और दलितों से संपर्क साधने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों में बाधक है। गौतम ने राय पर निशाना साधते हुए कहा, जो ऐसा कह रहे हैं, वे बिना सोच के ऐसा कह रहे हैं और ऐसा लगता है कि वे अनुसूचित जातियों और सामाजिक न्याय की अवधारणा के खिलाफ दुर्भावना और शत्रुता रखते हैं। उन्होंने कहा, अगर आंबेडकर ऊंची जाति से होते तो वे ऐसे बयान नहीं देते।

इस बारे में रामबहादुर राय का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई साक्षात्कार दिया ही नहीं। उन्होंने कहा कि यह ‘पत्रकारीय नैतिकताओं का उल्लंघन’ है। राम बहादुर राय जी ने बताया कि उनके पास कुछ शख्स मिलने के लिए आए थे। उन्होंने न तो आने का इस तरह का कोई मकसद बताया, न ही ये बताया कि वो किसी पत्रिका या अखबार से हैं। राय के मुताबिक उन्होंने ये भी नहीं कहा कि वो इंटरव्यू लेने के लिए आए हैं। न ही इस बात का जिक्र किया कि वो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्‍यक्ष के तौर पर उनका इंटरव्यू छापने वाले हैं। राम बहादुर राय ने साफ कहा कि भोलेपन से ये लोग उनसे बातचीत करते रहे। तस्वीरें खींची और फिर उसे शरारत करते हुए गलत तरीके से इंटरव्यू बनाकर छाप दिया। राम बहादुर राय जी ने ये भी बताया कि उन्होंने आउटलुक पत्रिका को एक लंबी चिट्ठी लिखी है, साथ ही वो एडिटर्स गिल्ड में भी इस मुद्दे को उठाएंगे।

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क्या कला केंद्र वाला ‘ईनाम’ लेकर राम बहादुर राय ने खुद को छोटा कर लिया है?

Akhilesh Pratap Singh : ‎कला केंद्र को राम बहादुर राय‬ के हवाले किए जाने के बात सुन रहा हूं कि वह बहुत भले आदमी हैं…. पत्रकारिता में तो हीरा कह लीजिए उन्हें…. उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता…. आप तो यह समझ लीजिए कि आरएसएस में वह सोशलिस्ट हैं… मने कह लीजिए कि संघ में होकर भी वह… मने समझिए कि वहां होकर भी… मने….. पहले भी सुनता था, पर अब समूह गान के रूप में सुन रहा हूं…….चंपू ब्रिगेड से सिर्फ एक सवाल है मेरा… अगर आपकी बताई हर बात के बावजूद किसी को संघ के विचारों का ही समर्थन करना है तो ऐसी कथित विद्वत्ता, ऐसी कथित ईमानदारी अंतत: समाज के लिए फायदेमंद है या आपके निजी हितों के लिए?

Sanjaya Kumar Singh : अगर आप यह कहना चाहते हैं कि संघ को उनकी योग्यता और ईमानदारी का लाभ क्यों नहीं मिलना चाहिए तो इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता है। पर मेरा अब भी मानना है कि आज की स्थिति में उनका इस पद को स्वीकार करना अपना कद घटाना है। यह उनका निजी निर्णय है पर मैं उनसे सहमत नहीं हूं।

Deepu Naseer : वे कैसे पत्रकार हैं, इसे परे रखिये लेकिन रजत शर्मा से बहुत वरिष्ठ हैं। पिछले साल साहेब ने जूनियर शर्मा जी को पदम भूषण से नवाजा था लेकिन वरिष्ठ राय साहब को सिर्फ पदमश्री से निपटा दिया गया।

Sanjaya Kumar Singh : इसीलिए मैंने कहा कि उन्हें यह पद स्वीकार नहीं करना चाहिए था। रजत शर्मा को जो ईनाम मिला वह उनसे हो सकने वाले लाभ की तुलना में है और इस लिहाज से देखें तो यह “ईनाम” भी, जो राय साब को छोटा करता है।

Akhilesh Pratap Singh : यह तो संघी खेमे के अंदर की खींचतान है…. रजत शर्मा भारी पड़ गए तब..

Sanjaya Kumar Singh : पद्म पुरस्कार तो इन्हें भी मिला था। मुद्दा वो नहीं है।

Akhilesh Pratap Singh : कद का ही सवाल है तो सर चाहे जितना बड़ा कद हो, अगर संघ के हितों का पोषक है तो उस कद की जय जय का क्या मतलब निकाला जाए…. उनकी योग्यता और ईमानदारी संघियों और संघियों को ढोने वाले कुछ सोशलिस्टों के ही काम की है सर…. वरिष्ठ पत्रकार हैं… बड़ी जिम्मेदारियां संभाली हैं… लेकिन हैं तो संघी हितों के पोषक ही…. मैं पत्रकार बिरादरी में उनके समर्थकों के वृंदगान पर सवाल उठा रहा हूं जो खुद को समाजवादी और प्रगतिशील भी बताते हैं…

Sanjaya Kumar Singh :  मैं इसे ऐसे देखता हूं कि एक अखबार में, जहां धुर वामपंथी से लेकर धुरदक्षिणपंथी और किसिम किसिम के मध्यमार्गी थे वहां उनका दक्षिणपंथी (या संघी होना) कोई नुकसानदेह नहीं रहा। बाद में उनके संपादन में निकलने वाली पत्रिकाओं को मैंने फॉलो नहीं किया क्योंकि मेरा मानना है कि हिन्दी पत्रकार की जरूरत है कि वह रिटायरमेंट की उम्र निकलने के बाद भी नौकरी करे और ऐसी नौकरी मजबूरी ही है। इन सबके बावजूद, अभी तक जो सम्मान उन्होंने पाया था, उसके मुकाबले यह पद बहुत छोटा है। लाभ छोटे बड़े वो पहले भी बहुत ले सकते थे। निजी तौर पर मैं जो कुछ जानता हूं, उसके आधार पर कह रहा हूं।

Indra Mani Upadhyay : यह उसी तरह घटिया काम है जैसे तमाम संस्थानों के पद वामपंथी लोगों को दिए गए थे। राम बहादुर राय को पद देना उतना ही गलत है जितना अनंत मूर्ती को ftti के प्रमुख का पद देना। या तो दोनों सही हैं या दोनों गलत। यह सारे पद सिर्फ तुष्टिकरण हेतु होते हैं। बाकी महान ‘कलाविद्’ इंदिरा जी के नाम पर यह संसथान बना है। उनकी कला क्षेत्र में उपलब्धियों को तो जानते होंगे न?

Akhilesh Pratap Singh : मुझे पता है…अनंतमूर्ति होने और राम बहादुर राय होने का मतलब….. सामान्यीकरण की कला से यह फर्क नहीं दिखेगा… और राम बहादुर राय को यह पद दिए जाने पर मुझे कोई शिकायत नहीं है…. राय साहब की सामूहिक वंदना पर मेरे कुछ सवाल हैं….

Satyendra Ps राय साहब को यूजीसी का चेयरमैन या डी यू का वीसी बनाया जाना चाहिए था। संघी बहुत नीच हैं। घटिया लोगों को प्रश्रय देते हैं काबिल लोगों के साथ मुगलसराय कर देते हैं।

सौजन्य : फेसबुक

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मोदी सरकार ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भंग कर वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को इसका चीफ बनाया

नई दिल्ली। मोदी सरकार ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के बोर्ड को भंग कर दिया है। केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्री महेश शर्मा ने गुरुवार को एक 20 सदस्यों के नए बोर्ड का गठन किया। इसके प्रुमख के तौर पर पद्मश्री और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को नियुक्त किया गया है। राम बहादुर राय बोर्ड के पुराने प्रमुख चिनमय खान की जगह लेंगे।

राम बहादुर राय उस 20 सदस्यीय टीम की अगुवाई करेंगे जिसमें डॉ सोनल मानसिंह, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, नितिन देसाई, के अरविंद राव, वासुदेव कामथ, डॉ महेश चंद्र शर्मा, डॉ भरत गुप्ता, डॉ एम. सेशन, रति विनय झा, प्रोफेसर निर्मला शर्मा, हर्ष न्योतिया, डॉ पद्म सुब्रमण्यम, डॉ सरयू दोषी, प्रसून जोशी, डी पी सिन्हा और विराज याज्ञनिक शामिल हैं।

केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि, ‘बदलाव एक प्रक्रिया है, नए लोग आईजीएनसीए को नई ऊंचाई पर ले जाएंगे। नए सदस्य अपने अपने क्षेत्र में माहिर हैं। नए प्रमुख समाज सेवी हैं, वरिष्ठ पत्रकार हैं और गांधीवादी हैं। यह पहली बार नहीं हुआ है पहले भी ऐसा होता रहा है।’ संस्कृति मंत्री ने आगे कहा कि ‘लोग बदलाव की उम्मीद करते हैं और हम इसे पारदर्शिता और नवीनता के जरिए लेकर आ रहे हैं।’

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 19 नवंबर 1985 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की याद में स्थापित किए गए इस कला केंद्र को सरकार द्वारा फंड किया जाता है। सेवामुक्त हुए चेयरमैन चिनमय खान का कहना है की उन्हें इसका अंदाजा था, हर सरकार ऐसा करती है।

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रामबहादुर राय ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के चुनौतीपूर्ण दौर में वहां जाकर हिम्मत के साथ रिपोर्टिंग की : रमन सिंह

: सप्रे जयंती समारोह में मुख्यमंत्री ने रामबहादुर राय को माधव राव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान से किया सम्मानित : जॉन राजेश पॉल को चन्दूलाल चन्द्राकर पत्रकारिता पुरस्कार : रायपुर : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि पंडित माधव राव सप्रे ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर में छत्तीसगढ़ अंचल में पत्रकारिता की मशाल प्रज्जवलित की जब राष्ट्रीय चेतना अपने उफान पर थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि उस युग में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बोलना, लिखना या आवाज उठाना देशद्रोह माना जाता था। पंडित माधव राव सप्रे ने ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में सन 1900 में पेण्ड्रा जैसे दूरस्थ अंचल से मासिक पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का सम्पादन और प्रकाशन शुरू करके हिम्मत और हौसले के साथ छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की बुनियाद रखी। पंडित माधव राव सप्रे ने अपनी साहित्य साधना और पत्रकारिता के जरिए छत्तीसगढ़ सहित सम्पूर्ण मध्य भारत में राष्ट्रीय चेतना का विस्तार किया।

 

मुख्यमंत्री कल यहां पंडित माधव राव सप्रे की जयंती के अवसर पर राज्य सरकार के जनसम्पर्क विभाग द्वारा आयोजित पत्रकारिता पुरस्कार वितरण समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।  उन्होंने समारोह में देश के प्रसिद्ध लेखक, चिन्तक और पत्रकार, पदमश्री सम्मानित श्री रामबहादुर राय को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्थापित ‘माधव राव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान 2014’ से नवाजा। मुख्यमंत्री ने उन्हें सम्मान के रूप में ढाई लाख रूपए के चेक सहित शॉल, श्रीफल और प्रशस्ति पत्र भेंट किया। उल्लेखनीय है कि पंडित माधव राव सप्रे के नाम पर राज्य शासन के जनसम्पर्क विभाग द्वारा स्थापित पुरस्कार के लिए यह पहला समारोह था। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर जनसम्पर्क विभाग की ओर से राजधानी रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री जॉन राजेश पॉल को ‘चन्दूलाल चन्द्राकर स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार 2014’ से सम्मानित किया। उन्हें पचास हजार रूपए की सम्मान राशि के साथ शॉल, श्रीफल और प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया।

समारोह को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में पंडित माधव राव सप्रे और स्वर्गीय श्री चन्दूलाल चन्द्राकर के योगदान को विशेष रूप से याद किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि पंडित माधव राव सप्रे की लिखी कहानी ‘टोकरी भर मिटटी’ को हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी माना जाता है। डॉ. सिंह ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2008 में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर में सप्रे जी की स्मृति में ‘पंडित माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोधपीठ’ की स्थापना की गयी। डॉ. रमन सिंह ने जनसम्पर्क विभाग द्वारा सप्रे जी के नाम प्रदत्त राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान के लिए चयनित श्री रामबहादुर राय को बधाई और शुभकामनाएं दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि सप्रे जी ने हिन्दी जगत में पत्रकारिता की जो मशाल प्रज्जवलित की थी, उसे आगे ले जाने का कार्य श्री राय जैसे मनीषी और चिन्तक कर रहे हैं। श्री राय ने आपातकाल की पीड़ा झेली है। इसके बावजूद उन्होंने एक जुझारू पत्रकार के रूप में अभिव्यक्ति की मशाल थाम रखी है।

डॉ. रमन सिंह ने कहा कि श्री रामबहादुर राय ने बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम के चुनौतीपूर्ण दौर में वहां जाकर हिम्मत के साथ रिपोर्टिंग की है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आज उन्हें सप्रे जी के नाम स्थापित सम्मान दिया जा रहा है। उन्हें सम्मानित करके यह सम्मान स्वयं सम्मानित हुआ है और हम सब स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। डॉ. रमन सिंह ने स्वर्गीय श्री चन्दूलाल चन्द्राकर को याद करते हुए कहा कि चन्द्राकर की छत्तीसगढ़ के माटी के सपूत थे। पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीति और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे वर्ष 1964 से 1980 तक हिन्दुस्तान टाइम्स से मुख्य सम्पादक रहे।

डॉ. रमन सिंह ने स्वर्गीय श्री चन्द्राकर के नाम पर स्थापित पुरस्कार से श्री जॉन राजेश पॉल को सम्मानित कर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रदेश के संस्कृति और पर्यटन मंत्री श्री दयालदास बघेल ने कहा कि साहित्य कला-संस्कृति और पत्रकारिता के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की धरती काफी समृद्ध है। इन क्षेत्रों में कई महान विभूतियों ने अपने रचनात्मक कार्यों के जरिए देश और समाज की सेवा की है। उन्हीं महान विभूतियों में पंडित माधव राव सप्रे और श्री चन्दूलाल चन्द्राकर भी थे। श्री बघेल ने कहा कि पंडित माधव राव सप्रे ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का सम्पादन किया। स्वर्गीय श्री चन्द्रलाल चन्द्राकर वरिष्ठ पत्रकार और राजनेता होने के बावजूद बेहद सहज-सरल स्वभाव के थे। उन्होंने  हमेशा समाज की अंतिम पंक्ति के लोगों की चिन्ता करते हुए उनकी बेहतरी के लिए प्रयास किया।

श्री दयाल दास बघेल ने कहा कि स्वर्गीय चन्दूलाल चन्द्राकर ने जिस छत्तीसगढ़ राज्य का सपना देखा था, उनके उस सपने को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पूरा किया। संस्कृति मंत्री श्री बघेल ने समारोह में पुरस्कृत और सम्मानित पत्रकारों सर्वश्री रामबहादुर राय और जॉन राजेश पॉल को बधाई देते हुए उनके प्रति अपनी शुभेच्छा प्रकट की। इस मौके पर श्री रामबहादुर राय ने पंडित माधव राव सप्रे की पत्रकारिता पर अपने विचार व्यक्त किए। श्री राय ने कहा कि सप्रे जी वास्तव में युग पुरूष थे और उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से देश के स्वतंत्रता आंदोलन को और देश की राजनीति को राह दिखाई। श्री राय ने कहा कि सप्रे जी की पत्रकारिता सम्पूर्ण पत्रकारिता थी। उनकी पत्रकारिता में स्वाधीनता की भावना के साथ-साथ राजनीति, अर्थनीति संस्कृति भी थी और समाज भी था। श्री जॉन राजेश पॉल ने भी समारोह में अपने विचार व्यक्त किए। श्री पॉल ने चंदूलाल चंद्राकर पुरस्कार से सम्मानित किए जाने पर मुख्यमंत्री के प्रति आभार व्यक्त किया। श्री जॉन राजेश पॉल इस मौके पर काफी भावुक हो गए। उन्होंने रूंधे गले से अपने पिता को याद किया और कहा कि वे मुझे ’पादरी’ बनाना चाहते थे, लेकिन मैं पत्रकार बन गया।

प्रारंभ में जनसम्पर्क विभाग के सचिव एवं आयुक्त जनसम्पर्क श्री गणेश शंकर मिश्रा ने स्वागत भाषण दिया। श्री मिश्रा ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के मार्गदर्शन में राज्य शासन द्वारा वर्ष 2014 में पंडित माधव राव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान की स्थापना की गयी है। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने विशिष्ट रचनात्मक लेखन और हिन्दी भाषा के प्रति सम्पर्ण भाव से रचनात्मक कार्य करके राष्ट्र का गौरव बढ़ाने वाले मनीषियों का चयन करने का प्रावधान इसमें किया गया है। इसी तरह छत्तीसगढ़ की संस्कृति, समृद्धि और विकास के संबंध में रचनात्मक लेखन के लिए वर्ष 2010 में हिन्दी/छत्तीसगढ़ी प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए चन्दूलाल चन्द्राकर स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार तथा अंग्रेेजी प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए मधुकरखेर स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार की स्थापना की गयी है।

समारोह में छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी के निदेशक श्री रमेश नैय्यर, पदमश्री सम्मानित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. महादेव प्रसाद पाण्डेय, वरिष्ठ कवि श्री विनोद कुमार शुक्ल, वरिष्ठ समीक्षक डॉ. राजेन्द्र मिश्र, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र, पूर्व मंत्री श्री चन्द्रशेखर साहू, पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुशील त्रिवेदी, नई दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार और माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय कैम्पस नोएडा के निदेशक श्री जगदीश उपासने, दूरदर्शन केन्द्र रायपुर के पूर्व उप महानिदेशक श्री तेजिन्दर सिंह गगन, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के संसदीय सलाहकार श्री अशोक चतुर्वेदी, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि श्री लक्ष्मण मस्तुरिया, श्री गिरीश पंकज, वरिष्ठ पत्रकार सर्वश्री गोविंदलाल वोरा सहित अन्य अनेक पत्रकार, साहित्यकार तथा प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

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स्वप्न दासगुप्ता, रजत शर्मा और रामबहादुर राय को पद्म पत्रकारिता के नाम पर मिलता तो खुशी होती

Shambhunath Shukla : जिन तीन पत्रकारों को पद्म पुरस्कार मिला है उनका योगदान साहित्य व शिक्षा क्षेत्र में बताया गया है। मगर तीनों में से किसी ने भी जवानी से बुढ़ापे तक कोई चार लाइन की कविता तक नहीं लिखी। यहां तक कि नारे भी नहीं। ये तीन पत्रकार हैं स्वप्न दासगुप्ता, रजत शर्मा (दोनों को पद्म भूषण) और रामबहादुर राय को पद्म श्री। पत्रकारों को पद्म पत्रकारिता के नाम पर मिलता तो खुशी होती।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

Umesh Chaturvedi : जयप्रकाश आंदोलन के अगुआ… शुचिता की पत्रकारिता के पैरोकार… ईमानदार कलम… जयप्रकाश नारायण के शिष्य… गांधी विचार के प्रबल अनुयायी…. चंद्रशेखर, वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रधानमंत्रियों के नजदीकी होने के बावजूद राजनीति के आंगन में सहज निर्विकार शख्सियत… यथावत पाक्षिक के संपादक… रामबहादुर राय के लिए कई और विशेषण हो सकते हैं. उन्हें पद्मश्री मिलने पर हार्दिक बधाई. यह बात और है कि वे इससे भी कहीं ज्यादा के हकदार हैं.

पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

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वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय को मिलेगा जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार

वाराणसी : श्रीमठ, काशी की ओर से प्रतिवर्ष दिया जाने वाला एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार इस वर्ष देश के जाने-माने पत्रकार औऱ राजनीतिक विश्लेषक रामबहादुर राय को दिया जाएगा। स्वामी रामानंद जयंती के अवसर पर वाराणसी के नागरी नाटक मंडली सभागार में 12 जनवरी को संध्या समय राय साहब को एक लाख रुपये नकद, अंग वस्त्रम्, प्रशस्ति पत्र आदि प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा।

रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य और श्रीमठ पीठाधीश्वर स्वामी रामनरेशाचार्य के जगदगुरु रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के 25 साल पूरे होने पर रजत जयंती वर्ष मनाया जा रहा है, इसी कड़ी में वर्षपर्यन्त आयोजित कार्यक्रमों का समापन समारोह 10 जनवरी से 14 जनवरी तक काशी में आयोजित है। राय साहब के अलावे चार अन्य विभूतियों को भी इस साल एक-एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।

इस वर्ष जिन पांच महान विभूतियों को रामानंदाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है उनमें काशी के वेदमूर्ति विनायक मंगलेश्वर, काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष और आधुनिक पाणिनी कहे जाने वाले आचार्य रामयत्न शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार और यथावत पाक्षिक पत्रिका के संपादक रामबहादुर राय, मूर्धन्य साहित्यकार प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल (दिल्ली) और संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. उदय प्रताप सिंह शामिल हैं। सभी को एक-एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और अंग वस्त्रम् से सम्मानित किया जाएगा।

श्रीमठ की ओर से हर साल हिन्दी और संस्कृत साहित्य के एक महामनीषी को एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाता है। इसी कड़ी को आगे बढा़ते हुए रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में एक साथ पांच मनीषियों को इस बार रामानंदाचार्य पुरस्कार से नवाजा जा रहा है। समारोह में देश के जाने-माने विद्वान, राजनीतिज्ञ, संत-महात्मा और साहित्य-संस्कृति के मूर्धन्य लोग शामिल हो रहे हैं। पूरे कार्यक्रमों का समायोजन श्रीमठ महोत्सव न्यास, काशी ने किया है।

काशी के पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ ऐतिहासिक मठ है जिसका गौरवशाली इतिहास रहा है। करीब सात सौ साल पहले इसी मठ को स्वामी रामानंद ने अपनी साधना स्थली बनाई थी। यही रहते हुए उन्होंने संत कबीरदास, रविदास, धन्ना जाठ और पीपा नरेश जैसे शिष्यों को दीक्षा दी थी। इस रुप में श्रीमठ को रामानंद संप्रदाय और रामभक्ति परंपरा का मूल आचार्यपीठ होने का गौरव हासिल है। यह एक साथ सगुण और निर्गुण रामभक्ति परंपरा का संवाहक केन्द्र रहा है। मध्यकालिन भक्ति आंदोलन में स्वामी रामानंद का अतुलनीय योगदान रहा है। उन्होंने ‘जाति-पांत पूछे ना कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’ का नारा देकर उस समय समाज में व्याप्त जातीय विद्वेष और पाखंड के खिलाफ अलख जगाई थी।

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का भड़ास को दिए एक पुराने इंटरव्यू को पढ़ें…

समीर जैन ने जो तनाव दिए उससे राजेंद्र माथुर उबर न सके : रामबहादुर राय

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नहीं पहुंचे प्रमुख अतिथि, ‘जिया इंडिया’ मैग्जीन की लांचिंग फ्लॉप

रोहन जगदाले को अब समझ में आ रहा होगा कि मीडिया का क्षेत्र बाकी धंधों-बिजनेसों से अलग है और जो इसे धूर्तता, चालाकी, कपट, क्रूरता के साथ चलाना चाहता है उसे अंततः निराशा हाथ लगती है और करोड़ों गंवाकर हाथ जलाकर एक न एक दिन इस मीडिया क्षेत्र से बाहर निकलने को मजबूर हो जाना पड़ता है. यकीन न हो तो पर्ल ग्रुप के न्यूज चैनलों और मैग्जीनों का हाल देख लीजिए. पी7न्यूज, बिंदिया, मनी मंत्रा.. सबके सब इतिहास का हिस्सा बन गए. खरबों रुपये गंवाकर इसके मालिक को मीडिया से कुछ नहीं मिला. इसलिए क्योंकि मीडिया हाउस के शीर्ष पदों पर गलत लोगों को बिठाया गया और मीडिया हाउस खोलने का मकसद मूल कंपनी के छल-कपट को छिपाना-दबाना घोषित किया गया.

रोहन जगदाले का जिया ब्रांड भी इसी तरह आजकल मझधार में लटका अटका हुआ है. न्यूज चैनल जिया न्यूज के सैकड़ों कर्मचारियों की सेलरी हड़प कर और अचानक से इन्हें सड़क पर लाकर रोहन जगदाले ने सोचा था कि वह एसएन विनोद के बड़बोलेपन के जरिए न्यूज चैनल की नैया छोड़कर मैग्जीन की डोंगी पकड़ेंगे तो पार लग जाएंगे लेकिन ऐसा हो न सका. मैग्जीन लांचिंग बेहद फ्लाप रही. बुजुर्ग एसएन विनोद ने अपने लंबे करियर और संबंधों की लाख दुहाई दे ली लेकिन लांचिंग समारोह में शिरकत करने कुलदीप नैय्यर, राम बहादुर राय, एनके सिंह, पुण्य प्रसून बाजपेयी आदि नहीं पहुंचे. सिर्फ राहुल देव गए लेकिन उन्होंने मंच से जो कुछ कहा, उसे सुनकर एसएन विनोद को पत्रकारिता और दिल्ली छोड़कर एक बार फिर नागपुर लौट जाना चाहिए. बताया गया कि राहुल देव ने मंच से कहा कि आप लोगों की नीयत साफ नहीं है. न्यूज चैनल चला नहीं पाए. अब मैग्जीन चलाने जा रहे हैं. कुछ ऐसी ही बातें राहुल देव ने कहीं. नितिन गडकरी जैसे विवादित और कार्पोरेट परस्त व्यक्ति के हाथों मैग्जीन की लांचिंग से क्या संदेश गया है, ये सबको पता है. 

फिलहाल इतना तो कहा जा सकता है कि जिया न्यूज चैनल के मीडियाकर्मियों की एकता की जीत हुई है. इन कर्मियों के अनुरोध पर आधा दर्जन से अधिक वरिष्ठ पत्रकारों ने जिया इंडिया के लांचिंग समारोह का बहिष्कार किया. यह अपने आप में एसएन विनोद के लिए सबक है. वे एक साथ मालिक के करीबी, धंधा फ्रेंडली, सरोकारी, पत्रकारों के करीबी नहीं हो सकते. उन्हें तय करना चाहिए कि उन्हें करना क्या है. सिर्फ लंबी लंबी लगातार छोड़ते रहने से मीडिया की इस छोटी दुनिया में पर्सनालिटी के एक्सपोज होने में वक्त नहीं लगता है.

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मुझे बुलाते तो ‘जिया इंडिया’ के प्रोग्राम में हरगिज न जाता : ओम थानवी

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कुलदीप नैयर, रामबहादुर राय, राहुल देव, एनके सिंह, पुण्य प्रसून किसके साथ खड़े हैं? हड़ताली मीडियाकर्मियों के संग या भ्रष्ट जिया प्रबंधन के साथ?

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”मैंने एसएन विनोद की गलत नीतियों से नाराज होकर ‘जिया इंडिया’ से खुद इस्तीफा दिया”

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जिया प्रबंधन जीता, बेचारे बन मीडियाकर्मी मन मसोस कर घर लौट गए

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कृपलानी ने सिद्धांतों की खातिर 57वें कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था

हमारे देश में राज्य श्रेष्ठ मान लिया जाता है, समाज दोयम। शायद यही कारण है कि राजपुरुष प्रधान हो जाते हैं और समाज का पहरुआ गौण। जी हाँ, इस देश में अगर ‘राज्य-समाज समभाव’ दृष्टिकोण अपनाया गया होता तो आज आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी उतने ही लोकप्रिय और प्रासंगिक होते जितने कि सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग। वह व्यक्ति खरा था, जिसने गांधीजी के ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ के सिद्धांत को जीवन पद्धति मानकर उसे अंगीकार कर लिया। उक्त विचार मशहूर स्वतंत्रता सेनानी आचार्य जे बी कृपलानी की 126वीं जयंती पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए गए।

यह आयोजन संयुक्त रूप से आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट तथा गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की ओर से किया गया था।  मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए कृपलानी जी के निकट सहयोगी रहे दीनानाथ तिवारी ने उनसे जुड़े अनेक प्रसंगों का जीवंत वर्णन किया। उनका कहना था कि कृपलानी कभी भी हाशिये पर नहीं गए, सिर्फ चिंतन-प्रक्रिया में आये बदलाव के कारण वे थोड़ा ओझल हो गए हैं। उन जैसे व्यक्तित्व समय, देश और काल की मर्यादा से ऊपर उठकर सदैव आदरणीय और पूजनीय रहेंगे। समाजवादी सोच रखने वाले दिल्ली वि.वि. के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. रामचन्द्र प्रधान ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कृपलानी (दादा) को उद्धृत करते हुए कहा – ‘जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, वही सरकार चलाएगा’। कृपलानी एक मिशन के रूप में युद्ध-स्तर पर कार्य करने में विश्वास रखते थे। गांधी के सच्चे अनुयायी की तरह कुशलता में विश्वास रखते थे। उनके लिए बीच का कोई रास्ता नहीं होता था।

वरिष्ठ पत्रकार एवं कृपलानी के जीवनी लेखक रामबहादुर राय ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल (1946 -47) का जिक्र  करते हुए कहा कि उस समय देश विभाजन के दौर से गुजर रहा था लेकिन लगभग सारे नीतिगत  निर्णय सरकार के लोगों द्वारा लिए जा रहे थे। ऐसे में कृपलानी ने यक्ष-प्रश्न उठाया कि ‘पार्टी सरकार के अनुसार चलेगी या सरकार पार्टी के अनुसार?’ देश में अस्थायी सरकार का गठन 2 सितम्बर, 1946 को हो चुका था और पंडित जवाहर लाल नेहरू उपाध्यक्ष की हैसियत से शासन संचालित कर रहे थे। इसी मुद्दे पर आ. कृपलानी ने सिद्धांतों की खातिर कांग्रेस अध्यक्ष (57 वें) पद से त्यागपत्र दे दिया। पार्टी और सरकार के बीच शक्ति-पृथक्करण का यह प्रश्न आज भी जीवंत है और आचार्य कृपलानी इसके उत्तर। अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने काम तलाश रहे एक युवा पत्रकार देवदत्त से कहा था कि ‘आजकल तो मैं खुद ही बेरोजगार हूँ’। रामबहादुर राय ने कृपलानी के जीवन वृतांत को पांच खण्डों में विश्लेषित कर उपस्थित श्रोताओं का ज्ञानवर्धन किया। प्रख्यात गांधीवादी रामचन्द्र राही ने बिहार के भागलपुर जिला अंतर्गत बेराई ग्रामदान का सजीव वर्णन किया। उन्होंने यह विमर्श भी छोड़ा कि आखिर क्यों सत्ता शिखर पर मौजूद व्यक्ति सर्वगुणसंपन्न मान लिया जाता है?

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी अभय प्रताप ने कहा कि आज की पीढ़ी आचार्य कृपलानी के अवदान से ठीक से परिचित नहीं है। जबकि कृपलानी दंपत्ति आज ज्यादा प्रासंगिक और सारगर्भित हैं। देश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री (उत्तर-प्रदेश) श्रीमती सुचेता कृपलानी एवं आचार्य जे बी कृपलानी ने सात्विक और सैद्धांतिक राजनीति को अपना आदर्श माना। अभय प्रताप ने ने ट्रस्ट द्वारा हर पखवाड़े एक गोष्ठी करने की बात कही। इस अवसर पर अभय प्रताप द्वारा संपादित पुस्तिका ‘शहादत का रास्ता’ का लोकार्पण भी किया गया। यह आ. कृपलानी के पांच महत्वपूर्ण लेखों/भाषणों का संकलन है।  कार्यक्रम की शुरुआत मणिकुंतला जी (गन्धर्व महाविद्यालय) के भजनों से हुई। अंत में, गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति की निदेशक मणिमाला ने सभी के प्रति आभार प्रकट करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का संचालन संत समीर ने किया।

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