राज्य सभा टीवी- श्रम कानूनों की ऐसी तैसी

बंद दरवाजे के पीछे बहुत परदा है

करीब एक साल बहुत लंबे इंतजार के बाद 7 मई 2018 को राज्यसभा टीवी में बंपर वैकेंसी आयी तो 43 पोस्टों के लिए 2500 से अधिक पत्रकारों ने अर्जी दे डाली। बड़ी संख्या में पत्रकार आखिरी तारीख यानि 21 मई को तालकटोरा स्टेडियम और गुरुद्वारा रकाबगंज रोड पर राज्य सभा टीवी के दफ्तर पहुंचे। अर्जियां और उनके साथ नत्थी योग्यताओं के दस्तावेजों की फोटो कापी के साथ इतनी भीड़ उमड़ी कि पहले तय पांच बजे का समय बढ़ा कर रात आठ बजे करना पड़ा। कुरियर से आवेदन उसके बाद भी दो तीन दिन तक आते रहे। Continue reading

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झूठ के कारोबार में अब ‘राज्यसभा टीवी’ भी शामिल

बीते 24 मार्च, 2018 को राज्य सभा टीवी की मुख्य ख़बर रही कि भाजपा अब राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गयी है। सच ये है कि भाजपा पिछले साल से ही सदन में सबसे बड़ी पार्टी है। उसके अब तक 58 सदस्य हैं और कांग्रिस के 54 हैं।

राज्यसभा के अधिकारिक चैनल द्वारा ये ग़लत जानकारी देना बहुत ही आपत्तिजनक है। लोग इसको लेकर तरह-तरह के सवाल उठा रहे हैं। मीडिया के कुछ लोगों का कहना है कि क्या ये ख़बर बाक़ी मीडिया को भ्रमित करने के लिए चलायी गयी है, जो राज्यसभा टीवी की जानकारी को सत्य मान कर चलते हैं…

वहीं कुछ का कहना है कि मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सरकारी षड्यंत्र में राज्यसभा टीवी भी शामिल हो गया है… वहीं, कुछ लोग व्यंग्य करते हुए कह रहे हैं- तो माना जाए कि नए उप राष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू और उनकी मीडिया प्रबंधन टीम की ये ‘ज़बरदस्त उपलब्धि’ है…

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राहुल महाजन बने राज्यसभा टीवी के प्रधान संपादक

गुरदीप सिंह सप्पल के इस्तीफा देने के काफी समय बाद राज्यसभा टीवी को नया प्रधान संपादक मिला है. प्रसार भारती में सलाहकार संपादक के रूप में कार्यरत राहुल महाजन की तैनाती आरएसटीवी के नए एडिटर इन चीफ के रूप में हुई है.

इस बाबत राज्यसभा टीवी चैनल की तरफ से ट्विटर पर एक ट्वीट किया गया है, जो इस प्रकार है- ‘प्रसार भारती के चेयरमैन ए. सूर्य प्रकाश की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय चयन समिति ने राहुल महाजन की नियुक्ति की सिफारिश की और राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने इसकी मंजूरी दी.’

शिमला के रहने वाले राहुल महाजन 26 वर्षों से मीडिया में हैं जिसमें से करीब 23 वर्ष वह विभिन्न न्यूज चैनलों में कार्यरत रहे. उन्होंने 1995 में इंडियन एक्सप्रेस से करियर की शुरुआत की. उसके बाद जी न्यूज, आजतक, स्टार न्यूज, न्यूज24 जैसे बड़े चैनलों में रहे. न्यूज24 में रहते हुए उन्होंने ‘ई24’ और ‘दर्शन24’ चैनलों को लांचिंग कराई. उन्होंने ‘भास्कर टीवी’ भी लांच कराया था. इन दिनों वह प्रसार भारती में सलाहकार संपादक के रूप में कार्यरत थे.

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राजेश बादल ने राज्यसभा टीवी को नमस्ते करते हुए कहा- ”सौ फ़ीसदी निष्पक्षता नाम की कोई चीज़ नहीं होती”

Rajesh Badal : नमस्ते! राज्यसभा टीवी… एक न एक दिन तो जाना ही था। हाँ थोड़ा जल्दी जा रहा हूँ। सोचा था जून जुलाई तक और उस चैनल की सेवा कर लूँ, जिसे जन्म दिया है। लेकिन ज़िंदगी में सब कुछ हमारे चाहने से नहीं होता। कोई न कोई तीसरी शक्ति भी इसे नियंत्रित करती है। आप इसे नियति, क़िस्मत, भाग्य या भगवान-कुछ भी कह सकते हैं। सो यह अवसर फ़रवरी में ही आ गया।

अजीब सा अहसास है। सात साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। लगता है कल की ही बात है। कुछ भी तो नहीं था। शून्य से शुरुआत। कितनी चुनौतियाँ, कितने झंझावात। कभी लगता- चैनल प्रारंभ नहीं हो पाएगा। लोग हँसते थे- संसद के चैनल में क्या दिखाओगे? सदन की कार्रवाई? कौन देखेगा? राज्यसभा टीवी में नया क्या होगा? कितनी आज़ादी मिलेगी? वग़ैरह वग़ैरह।

मैं और मेरे साथी निजी क्षेत्र के चैनलों या अख़बारों से आए थे, इसलिए संसद की कार्रवाई के कवरेज का अनुभव तो था, लेकिन संसद के नियमों के मुताबिक़ अन्दरूनी कामकाज में अनाड़ी ही थे। फिर भी क़ायदे-क़ानून की मर्यादा और सीमित संसाधनों से आग़ाज़ तो कर ही दिया। यह पहले दिन से ही साफ़ था कि हम संसद के चैनल हैं। सदन में जिस तरह सभी दलों को अपनी आवाज़ रखने का अधिकार और अवसर मिलता है, उसी तरह हमने राज्यसभा टीवी को भी सच्चे अर्थों में संसद का चैनल बनाने का प्रयास किया। हर राजनीतिक दल को समुचित प्रतिनिधित्व दिया और बिना किसी पूर्वाग्रह के हर लोकतांत्रिक आवाज़ को मुखरित किया।

अनेक साथी पत्रकारिता में सौ फ़ीसदी निष्पक्षता की बात करते हैं। पर मेरा मानना है कि सौ फ़ीसदी निष्पक्षता नाम की कोई चीज़ नहीं होती। निजी चैनलों में भी नहीं। ऐसा कौन सा चैनल या अख़बार है, जिसका कोई मैनेजमेंट न हो। अगर मैनेजमेंट है तो उसके अपने हित होंगे ही। कोई भी समूह अख़बार या चैनल धर्मखाते में अपनी कमाई डालने के लिए शुरू नहीं करता। राज्यसभा टीवी के मामले मे भी ऐसा ही है। हाँ सबको आप कभी संतुष्ट नहीं कर सकते। जिस दल की सरकार होती है, उसके सदनों मे नेता होते हैं, प्रधानमंत्री होते हैं… उन्हें आपको अतिरिक्त स्थान देना ही होता है। चाहे यूपीए की सरकार रही हो या फिर एनडीए की। यही लोकतंत्र का तक़ाज़ा है। हाँ अगर आप सिर्फ़ बहुमत की बात करें और अल्पमत को स्थान न दें तो यह भी लोकतांत्रिक सेहत के लिए ठीक नहीं है। हमने भी यही किया और लोगों के दिलों में धड़के। आप सब लोगों ने इस चैनल पर अपनी चाहत की बेशुमार दौलत लुटा दी।

अब जब मुझे इस चैनल से विदा होने का फ़ैसला भारी मन से लेना पड़ रहा है तो दुख के साथ एक संतोष भी है। इस चैनल को जिस ऊँचाई तक पहुँचा सका वह भारत के टेलिविज़न संसार का एक बेजोड़ नमूना है। हमने अच्छे कार्यक्रम बनाए, अच्छी ख़बरें दिखाईं और सार्थक तथा गुणवत्ता पूर्ण बहसें कीं। न चीख़ पुकार दिखाई और न स्क्रीन पर गलाकाट स्पर्धा में शामिल हुए। चुनावों को हमने हर बार एक नए ढंग से कवरेज किया। कभी मुझे कट्टर कांग्रेसी कहा गया तो कभी अनुदार राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी। मुझे ख़ुशी है कि मैंने अपने को सिर्फ़ एक प्रोफ़ेशनल बने रहने दिया।

अभी भविष्य के बारे में कुछ नहीं सोचा है। आपको मेरी नई पारी के लिए शायद कुछ दिन प्रतीक्षा करनी पड़े। इसलिए अपना प्यार बनाए रखिए। मैं अभी कुछ दिन ख़ामोश रहना चाहता था, मगर मीडिया में लगातार आ रही ख़बरों के कारण आपसे दिल की बात कहना ज़रूरी समझा। आपके दिल और दिमाग़ में जगह मिलती रहेगी तो मुझे ख़ुशी होगी। राज्यसभा टीवी के बारे में कुछ और अच्छी बातें आगे भी करता रहूँगा।

आप सभी के प्रति अत्यंत सम्मान के साथ!

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की एफबी वॉल से.

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राज्यसभा टीवी के बाद गुरदीप सिंह सप्पल ने लांच किया नया वेंचर- ‘हिंद किसान’

गुरदीप सिंह सप्पल

आज के दौर में जब मुख्यधारा की मीडिया नान-इशूज पर फोकस कर जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटाने के सत्ता-तंत्र के खेल में पूरी तरह लिप्त हो गया है, कुछ साहसी किस्म के लोग आम जन के प्रति मीडिया की प्रतिबद्धता को जीने में लगे हुए हैं. गुरदीप सिंह सप्पल के नेतृत्व में राज्यसभा टीवी लांच हुआ और देखते ही देखते यह चैनल पत्रकारिता के असल मानकों का प्रतीक बन गया. इंटरव्यूज हों या ग्राउंड रिपोर्टिंग… आदिवासियों का मसला हो या किसानों का जीवन हो… सब कुछ को बेहद संजीदगी और सरोकार के साथ चैनल पर प्रसारित किया गया. कई आईएएस सेलेक्ट हुए छात्रों ने कुबूल किया कि वे सिविल सर्विस की तैयारी के दिनों में न्यूज चैनलों में केवल राज्यसभा टीवी देखते थे.

कई पत्रकार तो राज्यसभा के अपने शोज के जरिए मीडिया के चर्चित चेहरे बन गए.  सीईओ और एडिटर इन चीफ के रूप में गुरदीप सिंह सप्पल ने राज्यसभा टीवी में जो संपादकीय आजादी दी और बहस-विमर्श का जो लोकतांत्रिक माहौल कायम किया, उसकी आज भी मिसाल दी जाती है. फिलहाल नए उप राष्ट्रपति के शपथ लेने के साथ ही गुरदीप सिंह सप्पल ने राज्यसभा टीवी को गुडबॉय बोल दिया और चुपचाप अपने नए वेंचर की तैयारी में लग गए.

गुरदीप सिंह सप्पल कहते हैं-

”ये भारत देश गांवों का देश है. किसानों का देश है. यह डायलाग बोलता तो हर कोई है लेकिन ज्यादातर लोग / संस्थाएं / मीडिया हाउसेज इमानदारी से गांव-किसान की बात नहीं करते. किसान की असल समस्या क्या है. उनकी जमीनी पीड़ा-मुश्किलें-दिक्कतें क्या हैं. इन सब पर आज कोई मीडिया हाउस फोकस नहीं करता. यही कारण है कि हम लोगों ने ‘हिंद किसान’ वेब टीवी शुरू किया है. यह वेब टीवी भविष्य में सैटेलाइट चैनल के रूप में भी लांच हो सकने की संभावना से भरा है. लेकिन अभी हम लोगों का ध्यान सोशल मीडिया पर है. फेसबुक, ट्विटर से लेकर ह्वाट्सअप, यूट्यूब आदि माध्यमों के जरिए हम गांव-गांव तक ‘हिंद किसान’ को पहुंचाएंगे. इस ‘हिंद किसान’ वेब चैनल को सभी का प्यार चाहिए. ये किसी एक व्यक्ति का चैनल नहीं है. यह हर उस शख्स का चैनल है जो दिल से चाहता है कि मीडिया अब बुनियादी मुद्दों पर बात करे, ग्रामीण भारत की बात करे, देश के किसानों-मजदूरों की बात करे. ऐसे में हम सभी का कर्तव्य है कि ‘हिंद किसान’ चैनल के प्रचार-प्रसार में जुट जाएं. इसके फेसबुक पेज, इसके वीडियोज को लाइक शेयर करें. अगले कुछ महीने में हम लोग चैनल को एक ठोस रूप दे पाएंगे, यह विश्वास है.”


‘हिंद किसान’ वेब चैनल को छब्बीस जनवरी यानि गणतंत्र दिवस के दिन लांच करते हुए इसके एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल ने सोशल मीडिया पर हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जो प्रेस रिलीज जारी की है, वह इस प्रकार है…

दोस्तों,

आज हमारा 69वां गणतंत्र दिवस हैं और इस शुभ दिन हम अपना नया मीडिया मंच शुरू कर रहे हैं। राज्य सभा टीवी के बाद आज हम खबरों की दुनिया में एक नया सफर शुरू कर रहे हैं। महानगर केंद्रित खबरों तक खुद को सीमित रखने वाले मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग… हमारा इरादा ग्रामीण और कस्बाई भारत के धूल-धक्कड़ भरे रास्तों पर चलने और देश के दूर-दराज की खबरों को आप तक पहुंचाने का है। हमारा उद्देश्य है ग्रामीण भारत की खूबसूरती और चुनौतियों को समझना और उसके संकट, सम्भावनाओँ, पीड़ा एवं आकांक्षाओं को सामने लाना है। हमारी योजना मीडिया के बुनियादी सिद्धांतों का पालन करते हुए खबर देने, मुद्दों पर चर्चा एवं बहस करने और सरकारों को जवाबदेह बनाने की है। हम उस लोकतांत्रिक मान्यता का अनुकरण करना चाहते हैं, जिसके तहत मीडिया को लोकतंत्र का एक मज़बूत स्तम्भ माना जाता है। हमारा सपना तटस्थ, जिम्मेदार और निडर पत्रकारिता करने का है।

यह हमारे प्रयास का पहला चरण है। इसमें हम सोशल मीडिया की शक्ति और संभावनाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। आज हम फेसबुक पेज और यू-ट्यूब चैनल शुरू कर रहे हैं। हमारी वेबसाइट का बीटा वर्जन एक फरवरी 2018 को आपके सामने आएगा। अगले कुछ महीनों में हम एक पूर्ण न्यूज वेब टीवी के रूपमें आपके सामने होंगे।
खबरों के इच्छुक सभी भारतवासियों से संवाद करने की आकांक्षा रखते हुए हमने अपनी पहल का नाम – ‘हिंद किसान’ रखा है। यह ग्रामीण भारत से हमारे लगाव और उससे जुड़ी हमारी चिंताओं का संकेत है। आप हमें निम्नलिखित लिंक्स पर फॉलो कर सकते हैं…

Facebook: https://Facebook.com/HindKisan

Twitter: https://twitter.com/hindkisan_in

Dear Friends,

As we celebrate the 69th Republic Day, I want to share the news of our new media venture. After RSTV, we embark upon a new journey in world of news. Unlike the mainstream media, which is largely confined to metro centric issues and narratives, our journey would progress on the dusty pathways and landscapes of rural India and mufassil towns. Our aim is to capture the beauty and the challenges; the distress and the resilience; the pains and the aspirations of rural India.

Abiding by the classical tenets of media, we plan to look for news, discuss & debate issues and work to hold governments accountable. We wish to follow the democratic scheme that defines media as one of the pillars. Neutral, responsible, fearless journalism is our cherished dream.

In phase one of our venture, we will try to harness the power and potential of social media to reach out to people. Today we launch our Facebook page and YouTube Channel. The beta version of website will be up on February 1, 2018 and in another few months, we plan to become fully functional News WebTV. Aspiring to communicate with all news lovers in India, we have named our initiative as ‘Hind Kisan’, symbolising our affinity and our concern for rural India. I would like to welcome you all to follow us on:

Facebook: https://Facebook.com/HindKisan

Twitter: https://twitter.com/hindkisan_in

Gurdeep Singh Sappal

एडिटर-इन-चीफ

हिंद किसान


ट्विटर पर ‘हिंद किसान’ वेब टीवी को इंट्रोड्यूस कुछ यूं किया गया है :

Hind Kisan @hindkisan_in : Former Rajya Sabha TV CEO and Editor-in-Chief @gurdeepsappal introduces his new venture. Read his message.


हिंद किसान वेब चैनल के शुरुआती दो वीडियोज देखें….

गणतंत्र के धूमधड़ाके में कहां खड़ा किसान..देखिए हिंद किसान की पहली डिबेट…. नीचे क्लिक करें

https://www.facebook.com/hindkisan/videos/895228003992420/

भारी पड़ा भावान्तर… क्यों फिर से ठगा महसूस कर रहा है मध्य प्रदेश का किसान? क्यों खेती बन चुकी है घाटे का सौदा? क्यों पड़ गया भवान्तर भारी? देखिये इस रिपोर्ट मैं, सीधे प्रदेश के खेतों और मंडियों से ज़मीनी हक़ीक़त…

https://www.facebook.com/hindkisan/videos/895177620664125/

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Know How a Senior Editor is being FORCED to Leave RSTV

Rajya Sabha TV- Deceit, Deception, Dishonesty, Anything but Parliamentary

Rajya Sabha: How to SET Editor-in-Chief selection

The story of war for control at Rajya Sabha TV (RSTV) could make the most intriguing episode of Game of Thrones a run for TRPs. The channel has been in controversy for years now. There have been incessant allegations of misuse of public money, nepotism, corrupt practices in RSTV. There have been reports of CAG objections. Leading media organizations like DNA, Tehelka wrote articles alleging splurging of Rs 1700 crores. It another matter that both the organizations tendered apology for factually incorrect reporting to the Privileges Committee of Rajya Sabha, when nearly all political parties in the House, except BJP, collectively moved privilege motion against wrong reporting.

But after a change of guard at helm in Centre and Rajya Sabha, one would have expected to see some change. But that was perhaps too much to expect. Even months after taking charge as Chairperson Rajya Sabha Venkaiah Naidu has not really shown any inclination towards stemming the extravagance at RSTV or initiating clean and fair processes in hiring.

It is true that Vice President Naidu himself directed a fresh audit of RSTV, after he came to know that all the previous CAG audits had not found anything wrong with RSTV. But his own sources also released to media that the channel’s budget was only Rs 62.5 crore per annum. The news was shamelessly picked by the former CEO Gurdeep Sappal on his own facebook page, who in tongue-in-cheek style thanked the Vice President and wrote ‘Now that it has been officially made clear that RSTV’s expenditure is just ₹62.5 crore a year, out of which ₹25 crore goes to NDMC, the fake news campaign of ₹1700 crore or ₹3000 crore spent stands exposed.’

AS per the newspaper reports, Vice President had also directed to reduce the manpower in the channel and vacate the costly NDMC building at Talkatora Stadium. But unfortunately, his writ stops at RSTV. It is learnt that a scheme has now been approved to allow RSTV to increase its staff by recruiting hundred more employees. Also, surprisingly, instead of Talkatora Stadium building, it’s the Gurudwara Rakabganj Road office which was for free, has been vacated! Talkatora rent continues!

But the real game of intrigue and deceit in the channel is now coming out in open after RSTV initiated the process of appointing new Editor-in-Chief. The channel, falling under direct control of the Chairman Rajya Sabha Venkaiah Naidu, who also happens to be the Vice President of India has been showing utter disregard to established laws, rules and practices.

Sources in the organisation say that the entire process of appointing Editor-in-Chief was done in a way that would benefit certain people. A close look at events prima facie indicate attempts to include some and eliminate some in the selection process by subterfuge.

On 21 October 2017, Vice President Venkaiah Nadu formed a Search & Select Committee for “Appointing” the Editor-in-Chief of RSTV. The committee was headed by A Suryaprakash, Chairman Prasar Bharati Board of India. The committee also has Shashi Shekhar Vempatti, CEO, Prasar Bharati and Swapna Das Gupta, Member Parliament (Rajya Sabha) and Rahul Srivastava, senior journalist.

The “Search & Select” committee was made to search directly a suitable candidate, contact him/her, interview him/her and submit the decision to the Chairman Rajya Sabha for approval. It was done to immediately bring in a new Editor-in-Chief so that the old decision-making set-up, which is still loyal to Hamid Ansari and is full of Left-Congress activists, can be replaced.

But its been three months after the committee was formed and no one has been selected as Editor-in-Chief. The delay seems to be deliberate and mischievous.

To derail the selection process, first an advertisement was issued on 30 November 2017 inviting applications for the post of Editor-in-Chief. It was baffling because the “Search & Select” committee was formed to avoid the lengthy process of calling applications. It was not supposed to issue an advertisement.

It is being said that the Committee, which has nominees of the PMO and Vice President of India, could not agree on a common name due to different directions coming from two most powerful offices in India. So, it decided to call for application. A carefully tweaked advertisement describing “Required” and “Desired” qualities of the ideal candidate was issued.

Professionals from within RSTV and outside applied for the post of Editor-in-Chief. After an “Exhaustive Scrutiny” of the extended list of applicants a shortlist was narrowed down for the final interview.

The shortlist is also an interesting exercise. It had two criteria, ‘experience’ and ‘controversy’. Some candidates were not shortlisted for the final interview, because of their controversial past, even though they had extensive requisite experience. Obviously, it was a clever design to rule out some names.

Among the shortlisted were names like Rahul Mahajan, Sandeep Bamzai, Vibhakar, M K Jha from outside and Rajesh Badal, Arvind Singh, Akhilesh Suman among fairly senior members from RSTV. But even names like Om Prakash, Neelu Vyas Thomas, Amritanshu Rai, Vishal Dahiya etc. from within RSTV were found suitable for appearing in the final interview. And this, sources point, is the actual ‘management’.

One line of powerful RSTV management got in juniors like Vishal Dahiya, who is only a Senior Producer, shortlisted along with seniors like Bamzai, Rahul Mahajan and Vibhkar! The other line got in Rajesh Badal after waiving off age limit, as he was already over-age!

The final interviews were done in two lots. Those appearing from within RSTV were called first and the outsiders were called the next day. Insiders claim that the carefully constructed interviews were also designed to bring out the so called “Taint” in the professional history of the certain candidates and “Lack of Suitability” in others so that their names could be eliminated.

It is learnt that at the end of this exercise the top contender from “Outsiders” were Vibhaker and Rahul Mahajan and from insider was Vishal Dahiya. Another insider lobby was in favour of Rajesh Badal.

But its more than one and a half month now. The ‘Search and Select’ committee has failed to come to any conclusion. The entire matter is stuck between PMO and VP office, while the commies rule the roost.

The PMO is against Vishal Dahiya, because he was a close accomplice of Pankaj Shankar in DD. Pankaj Shankar was close associate of Rahul Gandhi and used to run pressbrief.in, which was the approved website for Rahul for years. Pankaj now seems to be out of favour, but it was he who had brought Dahiya to RSTV through Raibareli -Amethi connection with another congressman Gurdeep Sappal.

But even more curious is the case of “insider” Rajesh Badal, who is currently the Executive Director at RSTV. Normally, it would have been difficult to ignore his candidature because of his experience in the media and also being one of the two senior most Editors in the channel.

So to eliminate his case, a dubious tool of sexual harassment was used. Mysteriously, a new twitter handle, which has only one follower came up! On 8 January 2018, a post appeared on this handle, alleging that a complaint has been filed against Rajesh Badal for ‘women harassment’ in RSTV. The entire Dahiya clique in RSTV signed a petition to the Vice President, accusing Badal of sexual harassment. It was signed by women and men professionals, both!

One must appreciate the courage shown by these women and men to come forward in bringing out the state of affairs in a channel that is expected to maintain the highest levels of morality and ethics. But this has also brought some very serious concerns.

Normally, there should have been an instant response from Chairman, Rajya Sabha’s Office and the person in concern should have been suspended pending enquiry or at least sent on compulsory leave till further action. But so far no one has been suspended or sent on compulsory leave in RSTV despite passage several weeks. Also the complaint was leaked into public domain through twitter.

No one thought of situations that emerged in the channel. The complainants are forced to continue to take orders from the same person against whom they have made complaints. Also, by remaining in position of power, the accused gets direct access to the complainant and can intimidate them in to backing down from their complaints.

On the other hand, the person facing allegations of sexual misconduct is not allowed any platform to put across his version and is being forced to face public humiliation in office, without proper recourse to any instigative process.

It is shameful situation for a division of Rajya Sabha. The sidelining of an authentic harassment complaint or the conspiracy of a fake complaint, both are criminal offences. Society at large must show extreme concern that the highest law-making body is itself failing its women and men employees. One shudders to think the message it is sending to the society.

The insider grapevine is that the RSTV administration has not taken any disciplinary action against Rajesh Badal, because it is working out a deal with him. He is being asked to quietly put in his resignation, so that he can be eliminated from the race of Editor-in-Chief. It would make the way clear for Vishal Dahiya, who has already been elevated to the position of ‘Input Head’, without any due procedure or approval of the Vice President and is now ruling with the help of his clique.

But will the matter end with the resignation of Rajesh Badal? What will happen to the rights of women working in RSTV? Imagine the message that will go down the system through the country if a department of Rajya Sabha, the Upper House of The Parliament, the maker and custodian of laws, were to strike a deal over Right and Honour of Women at RSTV.

On the other hand, if the allegations are false and motivated just to capture a post of Editor-in-Chief, is it not a matter of worry that even the top officials working in Parliament of India can be threatening and pressurised so easily? Certainly, such intrigue is not good for the institution. Sources have told that neither Rajya Sabha Secretariat nor Chairman, Rajya Sabha himself have not given any direction on this matter.

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अफवाहों-दुष्प्रचारों के बीच राज्यसभा टीवी पर हुए खर्च की हक़ीक़त जानिए

भड़ास तहक़ीक़ात : राज्यसभा टीवी ने पिछले छः साल में एक धारदार और पेशेवर टीवी चैनल की पहचान बनायी है। लेकिन चैनल पर लगातार ख़र्च को ले कर आरोप लगते रहे हैं। WhatsApp पर लगातार मैसेज मिलते रहे हैं कि चैनल ने 1700 करोड़ रुपए ख़र्च कर दिए। लेकिन पिछले हफ़्ते स्वयं वेंकैय्या नायडू के ऑफ़िस के हवाले से ख़बर आयी कि राज्यसभा टीवी पर सात साल में 1700 करोड़ रुपए नहीं मात्र 375 करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं।

इसी ख़बर ने भड़ास को जाँच के लिए प्रेरित किया और बहुत हैरान कर देने वाली जनकरियाँ मिलीं। भड़ास ने जाँच में पाया कि सात साल में जिन मद में ख़र्च हुआ, वो इस प्रकार है :

25 मई, 2010 से 31 जुलाई, 2017

  1. वेतन पर हुआ ख़र्च : 92.4 करोड़ रुपए
  2. किराए पर हुआ ख़र्च: 111.74 करोड़ रुपए (राज्यसभा टीवी ने NDMC से तालकटोरा स्टेडीयम प्रांगण में बिल्डिंग किराए पर ली हुई है)
  3. चैनल बनाने का कैपिटल ख़र्च: 67.2 करोड़ रुपए (जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संस्था BECIL को दिए गए। इसमें स्टूडियो, न्यूज़ रूम, संसद भवन में राज्यसभा में सीधे प्रसारण का सेटअप और चैनल का तमाम मशीनें, सिविल वर्क शामिल हैं)
  4. OB Van, Optical Fibre, ANI, PTI का ख़र्च : 22.8 करोड़ रुपए
  5. सिक्यरिटी, सफ़ाई, बिजली, जेनरेटर, कम्प्यूटर, फ़ोन, ऑफ़िस, रख रखाव का ख़र्च: 6.67 करोड़ रुपए
  6. प्रोग्रैमिंग का ख़र्च: 75.3 करोड़ रुपए ( जिसमें चैनल के सभी प्रोग्राम, समाचार बुलेटिन, संविधान का निर्माण, रागदेश का निर्माण शामिल है)
  7. कुल ख़र्च (2010-2017): 376.11 करोड़ रुपए

राज्य सभा टीवी जिस तालकटोरा स्टेडियम प्रांगण में स्थित है, उसकी तीन मंज़िल में ‘भारतीय नेवी’ का ऑफ़िस है। नेवी भी NDMC को उसी रेट पर किराया देती है, जिस रेट पर राज्यसभा टीवी को जगह दी गयी है। यही नहीं, Lutyens ज़ोन में NDMC के कई भवन विभिन्न सरकारी ऑफ़िसों को किराए पर दिए गए है, जिसका किराए का रेट स्वयं प्रधानमंत्री ऑफ़िस ने तय किया था। प्रमुख किराएदारों में रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, कस्टम विभाग, इनकम टैक्स विभाग इत्यादि हैं।

राज्यसभा टीवी के ख़र्च को देख कर प्राइवेट चैनलों में काम कर रहे पत्रकार हैरान हैं। ये आम बात है कि किसी भी प्राइवेट चैनल का सालाना ख़र्च कई-कई सौ करोड़ रुपए है। साथ ही बनाने में ही तीन चार सौ करोड़ रुपए की लागत बताई जाती है। राज्यसभा टीवी की क्वालिटी, प्रोग्राम और इन्फ़्रस्ट्रक्चर किसी प्राइवट चैनल से काम नहीं है, लेकिन ख़र्च का हिसाब देख कर पत्रकार हैरान हैं कि क्या इतने काम ख़र्च में भी बेहतरीन चैनल बनाया और चलाया जा सकता है।

चैनल के ख़िलाफ़ लगातार दुष्प्रचार अभी भी जारी है। दो साल पहले DNA अख़बार और तहलका मैगज़ीन ने 1700 करोड़ रुपए ख़र्चे जाने की ख़बर छापी थी। तब राज्य सभा की दस से ज़्यादा राजनीतिक दलों के क़रीब पचास सांसदों ने DNA और तहलका को लोगों को गुमराह करने के ख़िलाफ़ सदन में विशेषाधिकार प्रस्ताव दिया था। बाद में दोनों ने ही ग़लत रिपोर्टिंग के लिए माफ़ी माँग ली और मामला समाप्त मान लिया गया। राज्यसभा की वेबसाइट पर पूरे मामले की रिपोर्ट मौजूद है।

लेकिन इस सब के बावजूद लगातार झूठे मैसेज प्रचारित किए जा रहे हैं। पूरे मामले को एक स्कैम की तरह पेश कर, चैनल को बदनाम करने की कोई बड़ी किवायद चलायी जा रही है।  भड़ास की जाँच में ये भी सामने आया है कि राज्यसभा टीवी में कभी किसी भी पत्रकार या ऑफ़िसर को सरकारी ख़र्च पर विदेश पढ़ने नहीं भेजा गया, जैसा कि प्रचार किया जा रहा है।

यही नहीं, पिछले सात सालों के वजूद के दौरान राज्यसभा टीवी के ख़िलाफ़ कभी भी CAG की कोई रिपोर्ट नहीं आयी है। यही नहीं, जुलाई 2017 तक CAG का कोई भी सवाल राज्य सभा टीवी के पास अनुत्तरित नहीं था। सभी सवालों के जवाब संतोषजनक दिए गए थे और CAG ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार किया।

भड़ास ने सोशल मीडिया में लगाए जा रहे झूठे आरोपों पर राज्यसभा टीवी के नए सीईओ शशि शेखर वेमपति से आधिकारिक जवाब के लिए सम्पर्क किया, लेकिन उनका फोन ‘नाट रीचेबल’ बोलता रहा। राज्यसभा टीवी का नया प्रबंधन अगर इस मामले पर चाहे तो अपना पक्ष भड़ास4मीडिया तक Bhadas4Media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकता है।

भड़ास4मीडिया के लिए राहुल सिंह की रिपोर्ट.

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RSTV का वार्षिक बजट 62.50 करोड़ था, इसमें से 25 करोड़ रुपये एनडीएमसी को किराया जाता था

Gurdeep Singh Sappal : अब जब ये साफ़ कर दिया गया है कि RSTV का वार्षिक बजट केवल ₹62.50 करोड़ था और उसमें भी ₹25 करोड़ केवल NDMC को जाता था, मुझे उम्मीद है कि ₹1700 करोड़ -₹ 3000 करोड़ ख़र्च का झूठा प्रचार अब थम जाएगा। राज्य सभा टीवी ईमानदार नीयत और निष्ठा से एक असरकारक पब्लिक broadcaster के रूप में स्थापित किया गया था। मैं आशा करता हूँ कि इसकी दूसरी पारी भी शानदार रहेगी।

Now that it has been officially made clear that RSTV’s expenditure is just ₹62.5 crore a year, out of which ₹25 crore goes to NDMC, the fake news campaign of ₹1700 crore or ₹3000 crore spent stands exposed. RSTV was created as robust public broadcaster and with good intentions. I wish it great second innings now.

राज्यसभा टीवी के संस्थापक, सीईओ और एडिटर इन चीफ रहे गुरदीप सप्पल की एफबी वॉल से.

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इतिहास रचने के बाद राज्यसभा के सीईओ और एडिटर इन चीफ पद से गुरदीप सिंह सप्पल ने दिया इस्तीफा

गुरदीप सिंह सप्पल भारतीय मीडिया में एक इतिहास रच चुके हैं. राज्यसभा टीवी के माध्यम से वे सरकारी और निजी, दोनों ब्राडकास्टर्स के लिए एक रोल माडल पेश कर गए हैं कि देखो, ऐसा होता है कोई चैनल. एडिटर इन चीफ और सीईओ के रूप में राज्यसभा टीवी की नींव रखकर उसे प्रतिष्ठा की बुलंदियों तक गुरदीप सिंह सप्पल ने पहुंचाया. उप राष्ट्रपति पद से हामिद अंसारी के इस्तीफा के बाद राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ पद से जीएस सप्पल को जाना ही था.

नए उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू एडिटर इन चीफ और सीईओ के लिए नई नियुक्ति करेंगे. लेकिन जीएस सप्पल ने जो लकीर खींच दी है, उसके पार जा पाना किसी भी दूसरे एडिटर इन चीफ और सीईओ के लिए संभव न होगा. आईएएस में चयनित होने वाले प्रतिभागी जब कहते हैं कि वे राज्यसभा टीवी का ‘बिग पिक्चर’ डिबेट शो देखकर सम-सामयिक मामलों में अपनी सोच-समझ को निर्मित करते हैं, तो समझा जा सकता है कि इस चैनल पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम कितनी गहराई और प्रामाणिकता लिए हुए होते हैं.

गुरदीप सिंह सप्पल की सबसे बड़ी बात, जो उनके साथ काम करने वाले बताते हैं, कि ये आदमी बेहद डेमोक्रेटिक है. वे क्रिएटविटी और एडिटोरियल फ्रीडम को पूरी तरह जीने देते हैं. यही कारण है कि उन्होंने राज्यसभा टीवी के लिए ऐेसे मीडियाकर्मियों का चयन किया जिनके लिए पत्रकारिता जनसरोकार और एक मिशन रही है. गुरदीप सिंह सप्पल का अंदाज और तेवर उनके इस्तीफानामा में भी देखा जा सकता है, जो उन्होंने अपने एफबी वॉल पर पोस्ट किया है. उनका इस्तीफानामा नीचे पढ़ा जा सकता है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Gurdeep Singh Sappal : राज्यसभा टीवी से मेरा इस्तीफ़ा….

‘चलो कि इक उम्र तमाम हुई
उठो कि महफ़िल की शाम हुई
जुड़ेंगे नए रिंद, अब नए साज़ सजेंगे
मिलेंगे उस पार, कि नए ख़्वाब बुनेंगे।’

राज्यसभा टीवी के साथ मेरा रिश्ता आज ख़त्म होता है। लेकिन संतोष है कि जो चैनल हमने सजाया है, उसकी चमक दूर से भी दिखायी देती रहेगी। आज मुड़ कर देखूँ तो एक सुखद अहसास ज़रूर है कि जो ज़िम्मेदारी मजबूरी में स्वीकार की थी, वो कुछ हद तक पूरी हुई। सच कहूँ तो ये काम मुश्किल ज़रूर था, लेकिन विश्वास था कि ‘अगर अतीत ब्लैकमेल योग्य न हो, आज कोई भय न हो और भविष्य से कोई आरज़ू न हो’, तो जीवंत संस्थाएँ बनाना सम्भव है।

जब हमने ये चैनल डिज़ाइन किया तो दो टैग लाइन चुनी: Knowledge Channel of India और Democracy at Work. आज छः साल बाद ये एक निर्विवाद सच है कि देशभर में छात्र, प्रशासक, बुद्धिजीवी RSTV देखते हैं। तथ्य तो गूगल सभी दे देता है, लेकिन विश्लेषण, अंत:दृष्टि और हाशिए पर रहे विषयों के लिए राज्य सभा टीवी ने अपनी अलग जगह बनायी है।इसकी डिबेट में सभी राजनैतिक रंग, सभी विचारधाराएँ बराबर खिली हैं। शायद, कुछ हद तक ही सही, हम अपनी दोनों टैग लाइन पर खरे ज़रूर उतरे हैं।

मैं जानता हूँ कि हमारे कुछ आलोचक, या कहूँ कि निंदक भी रहे हैं। लेकिन शायद उनमें से ज़्यादातर हमारा चैनल देखते नहीं थे, क्योंकि उनकी आलोचना के बारे सोचते ही एक शेर बेसाख़्ता याद हो आता था :

‘वो बात जिसका सारे फ़साने में ज़िक्र न था,
वो बात उनको बहुत ही नागवार गुज़री।’

हाँ, इन्फ़ॉर्म्ड आलोचना को हमने हमेशा स्वीकारा और उस पर अमल किया।

ख़ैर, ये दास्ताँ बस इतनी ही। मैं शुक्रगुज़ार हूँ माननीय उपराष्ट्रपति श्री वेंकैय्या नायडू जी का, जिन्होंने मेरा आग्रह मान कर मेरा इस्तीफ़ा स्वीकार किया।

लोग संस्था को गढ़ते हैं और संस्था लोगों को गढ़ती है। मैं चैनल के अपने सभी साथियों का धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने मेरे साथ मिल कर ये चैनल गढ़ा और उसे ऊँचाइयों तक पहुँचाया। और अंत में, धन्यवाद उस शख़्सियत का, जिसकी निस्वार्थ मौजूदगी, बौद्धिक विश्वास और स्वायत्ता में नैसर्गिक यक़ीन RSTV की बुनियाद रहा। शुक्रिया श्री हामिद अंसारी, भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति का। सम्पादक के पद को वे हमेशा एक महत्वपूर्ण संस्था मानते आए हैं और मुझे ख़ुशी है कि मैं उनके विश्वास पर खरा उतर सका। मेरी कामना है कि आने वाले दिनों में RSTV यूँ ही उत्तरोत्तर तरक़्क़ी के पथ पर आगे बढ़ता रहे।

Resignation from RSTV

Today, as I stand relieved from the posts of CEO and Editor-in-Chief of Rajya Sabha Television, I thank Hon’ble Sh. Venkaiah Naidu, the Vice President of India for accepting my request relieving me from the responsibility. I have always held a principled view that if one has been nominated, rather than having been elected in polls or selected through exams, one must move out with the principal.

As I move ahead in life, I look back in satisfaction at the success we had in creating a vibrant public broadcaster. RSTV, indeed, has made its mark. Having nurtured it since its conception, developing a free and fair public broadcaster was indeed a difficult task. But there was a certain belief that ‘if the past cannot be blackmailed, the present doesn’t scare and there are no expectations from the future’, then it is possible to build robust institutions.

We conceptualised RSTV with two tag lines, viz. ‘Knowledge Channel of India’ and ‘Democracy at Work’. Today, it’s an undisputed fact that students preparing for competitive exams, intellectuals, administrators and thinking population watch the channel. In today’s day and age, facts can all be googled, but RSTV carved a special place for itself by featuring comprehensive analysis & insights and giving space to marginalised, yet significant, subjects. It’s debates gave equal place to views and ideologies of all hues. I believe that we have been able to justify our both tag lines.

I know that we have our share of critics and castigators. But after going through their objections for so many years, I can surely say that most of them don’t watch RSTV regularly. I can only say to them: ‘वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था, वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है।’

Whenever we received constructive criticism, we always took its cognizance and strived to accommodate it. Friends, institutions are crafted by people and then institutions craft them back. I was backed by a wonderful set of professionals, who made RSTV what it is today. I thank them all for being my co-passengers on this roller-coaster ride. I thank my Editorial Team for believing in an idea and delivering it.

I also thank my team in administration, who minimized the lethargy and constraints of our public funded systems and delivered a vibrant institution. And above all, I would like to thank one person whose selfless presence, intellectually driven sense of security and innate faith in autonomy was the foundation of Rajya Sabha Television. I profusely thank Sh. Hamid Ansari, the former Vice President of India. He believed in the institution of the Editor and allowed me to live up to it. I wish the channel a bright future, always 🙂

गुरदीप सिंह सप्पल की एफबी वॉल से.

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…


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वीपीआई हामिद अंसारी का विदाई समारोह : संजय राउत ने चुटकी ली- ‘राज्यसभा टीवी चलता रहे!’

Shambhu Nath Shukla : हामिद अंसारी साहब बहुत याद आएंगे। पूरे दस साल वे भारत के वाइस प्रेसीडेंट रहे और राज्य सभा में कड़क प्रिंसिपल की तरह। सबको डांटते रहे, लड़ियाते भी रहे। मगर आज विदाई के दिन उन्हें प्रिंसिपल का चोला उतार देना था। आज भी अपने सम्मान में वक्ताओं का समय भी उन्होंने ही तय किया और बीच-बीच में हड़काते भी रहे।

सबसे बढ़िया विदाई भाषण जदयू के अली अनवर अंसारी ने दिया। उन्होंने उप सभापति कूरियन को पवनपुत्र हनुमान बताया और अंसारी साहब को भगवान राम। तुलना मार्मिक थी और भावप्रवण भी। अन्ना द्रमुक के मैत्रेयन ने तो नरेश अग्रवाल को भरे बाजार खींच दिया, यह बता कर कि सुबह नरेश तय कर देता था कि सदन चलने नहीं देना। पर नरेश पाला बदल कर सपा में चला गया और अहलूवालिया भाजपा में। बाद में नरेश जी ने सफाई भी दी पर जमी नहीं।

एनसीपी के मजीद मेमन का भाषण भी अत्यंत भावुक था और सीताराम येचुरी का भी। डेरेक पूर्ववत बंगालियों की तरह उछलते रहे। प्रधानमंत्री का भाषण बेहद संतुलित था। संजय राउत ने चुटकी भी ली और कह गए कि राज्यसभा टीवी चलता रहे। राज्यसभा टीवी वाकई है तो लाजवाब! आज के विदाई भाषण में अटलबिहारी बाजपेई और चंद्रशेखर जैसी गम्भीरता कोई वक्ता नही ला सका। न चचा मुलायम की तरह कोई चुटकी ले सका। जाइए महामहिम आप याद बहुत आएंगे। हामिद अंसारी साहब के भविष्य के प्रति मेरी भी शुभकामनाएं और उनको प्रणाम। उप सभापति कूरियन साहब की तरह मैं भी यही कहूँगा कि कल अच्छा ही होगा।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से.

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी उर्फ आईएनए और इसके जांबाजों पर आधारित है फिल्म ‘रागदेश’

The much awaited Tigmanshu Dhulia film ‘Raagdesh’ is all set to release on July 28th, 2017. Expected to be a crossover film, the film marries the historical authenticity with entertaining cinema, a genre much missed in Bollywood. Set in the backdrop of the famous ‘Red Fort Trials’, the film recreates the era of last days of freedom struggle in India, where the battles were being fought on borders, on streets, in media and curiously enough, in the court room.

The film captures the courtroom drama of the trials conducted by the British government in 1945 against the top brass of the Indian National Army, established by Netaji Subhash Chandra Bose. The trials that were observed with great curiosity by the world forces who had won the World War II, as also by the nation who now witnessed another streak of patriotism which was valiant, violent, vociferous and quite different from non-violence practiced by the Congress.

The trials made India aware of the heroic deeds and struggles of the INA, which was till then suppressed by the British authorities through strong armed press censorship. As the trial progressed, the entire nation was galvanized into the final call for independence, leading to Mumbai Naval Mutiny and crumbling of British Empire. The film poignantly portrays the battle travails, border sacrifices and trial of three heroes of INA who changed the course of freedom struggle.

The film is produced by Rajya Sabha Television, who has joined hands with UFO Moviez as its strategic partner for a pan-India release. The film marks the debut of RSTV, which has started an ambitious programme of bringing the exciting events of contemporary history on to the cinema screens.

“India today is a leading nation of the world. There have been people, events and processes that have led to the success of India. RSTV feels that people must know their history in order to preserve their growth. It is the duty of the state and the governments to promote it. Being a public broadcaster, RSTV felt its duty to take history to the people in an entertaining format. We always felt that history has so many fascinating stories to tell and films have been the most powerful and entertaining medium to tell stories”, said Gurdeep Sappal, CEO and Editor-in-Chief of Rajya Sabha Television.

Commenting on the association director Tigmanshu Dhulia said, “This was a great opportunity to showcase a very important chapter of independence struggle. It’s a film about real life heroes, who fought armed war against the mighty British government. It captures the valour, the camaraderie and the heroic struggles of young men who fought and lost the battle, but won the war of independence for India.  It is a one of the most passionate films I have done because I really feel that the nation and the young generation must know about sacrifices of people achieve India’s independence. It’s a film which will certainly make every Indian proud of their legacy.”

Starring Kunal Kapoor, Amit Sadh and Mohit Marwah in the lead roles, Raag Desh is the story of three leading officers of the INA namely Colonel Prem Sehgal, Colonel Gurbaksh Singh Dhillon, and Major General Shah Nawaz Khan, who were captured and imprisoned in the Lal Quila (Red Fort). British wanted to sentence them and hang them in the Red Fort, precisely where Netaji Subhash Chandra Bose wanted to unfurl the Tricolour flag. A trial that the world watched and the nation prayed, eventually turned up as the last message to the British that they would now have to Quit India. The Tricolour flies on the Red Fort since then!

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राज्यसभा टीवी के सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल निर्मित फिल्म ‘रागदेश’ का पोस्टर जारी, रिलीज 28 जुलाई को

राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल के नाम एक और उपलब्धि जुड़ गई है. उन्होंने फिल्म निर्माण जैसा बड़ा काम कर दिखाया है. बतौर प्रोड्यूसर सप्पल ने जो फिल्म ‘रागदेश’ बनाई है, उसका निर्देशन जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने किया. फिल्म का पोस्टर जारी कर दिया गया है. फिल्म सिनेमाघरों में 28 जुलाई को पहुंचेगी.

The film is on Lal Quila Trial of officers of INA.

फिल्म के पोस्टर को जीएस सप्पल ने अपने एफबी वॉल पर जारी करते हुए जो लिखा है, वह इस प्रकार है :

Gurdeep Singh Sappal : First look of the poster of our film RaagDesh, releasing all over India in cinema halls near you on July 28, 2017. Presented by: Rajya Sabha Television , Director: Tigmanshu Dhulia , Producer : Gurdeep Sappal, Cinematography: Rishi Punjabi, Featuring: Kunal Kapoor, Amit Sadh, Mohit Marwah, Kenneth Desai, Mridula Murali #raagdeshthefilm

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