जीएसटी के खिलाफ लगातार लिखने वाले पत्रकार संजय कुमार सिंह की फर्म का चालू खाता बैंक ने ब्लॉक किया

जीएसटी की प्रयोगशाला की अपनी अंतिम किस्त लिख चुका हैं. यह 100 वीं किस्त है. इसी दरम्यान पता चला कि एचडीएफसी बैंक ने केवाईसी के चक्कर में (मतलब, जीएसटी जैसा कोई पंजीकरण हो) मेरी फर्म का चालू खाता ब्लॉक कर दिया है जबकि नियमतः मुझे किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब आयकर रिटर्न व टीडीएस चालू खाता चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। फिर भी हमें डिजिटल लेन-देन करना है। अभी उससे निपटना है।

जीएसटी पर लिखना मैंने 50 किस्त के बाद ही बंद करना सोचा था पर इतना मसाला था कि 100 किस्तें हो गईं। कुछ और व्यस्तताओं के कारण मैंने जीएसटी की प्रयोगशाला बंद कर दी पर जीएसटी की ही सख्ती में मेरा अकाउंट ब्लॉक हो गया है। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि जीएसटी में छूट का अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा उल्टे इसका दुरुपयोग हो सकता है और छूट देने के अधिकारों का चुनावी लाभ के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। असल में अंतिम लाभार्थी तक कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है।

जीएसटी से मेरी शिकायत यही है कि पहले 10 और अब 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष तक के कारोबार को जब जीएसटी से मुक्त रखा गया है तो कंप्यूटर पर काम करने के कारण या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली के गाजियाबाद में रह कर दिल्ली और गुड़गांव के काम कंप्यूटर से करके ई-मेल से भेजने के कारण मुझपर जीएसटी की बाध्यता क्यों हो। यह तकनीक का उपयोग नहीं करने देना है। तकनीकी रूप से इसका कोई मतलब नहीं है। व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है और पहले भी ऐसी कई कोशिशें नाकाम होती रही हैं पर अभी उस विस्तार में नहीं जाउंगा। फिलहाल राहत की बात यही है कि सरकार ने इन पर छूट दे दी है और अब मेरे जैसे मामलों में जीएसटी पंजीकरण की कोई तकनीकी बाध्यता नहीं है। लेकिन बैंक वालों को यह कौन समझाएगा? लकीर के फकीरों ने मेरा (असल में मेरी पत्नी की फर्म का) खाता ब्लॉक कर दिया है।

कारण यह है कि हमलोग घर से काम करते हैं और घर हमारा अपना है। अगर किराए का होता तो हम मकान मालिक से किराए का करार अपनी फर्म के नाम से करते और बैंक उस करार के आधार पर मान लेता कि मैं अपने किराए के घर से ही अपना कारोबार करता हूं। पर चूंकि घर मेरा अपना है इसलिए ऐसा कोई करार नहीं कर सकता और जरूरत नहीं है तो किराए पर ऑफिस के लिए जगह क्यों लूं? इसी तरह, अगर मैं घर से दुकान चला रहा होता (जो गलत है पर देश भर में खुलेआम चल ही रहे हैं) तो नगर निगम से दुकान और प्रतिष्ठान प्रमाणपत्र या व्यापार लाइसेंस ले लेता – अभी भी ले सकता हूं पर नहीं है इसलिए खाता ब्लॉक है क्योंकि उस पर पैसे (रिश्वत कहिए) खर्च नहीं किए हैं।

बैंक ने ऐसे तमाम दस्तावेजों की सूची दी है जो तीन समूहों में है और मौखिक रूप से कहा गया है कि हरेक समूह का एक दस्तावेज चाहिए। समस्या हमारी इकाई की पहचान और पते को लेकर है क्योंकि हमारे मामले में ऐसे किसी दस्तावेज (दरअसल पंजीकरण) की आवश्यकता नहीं है और हम पर दबाव डाला जा रहा है कि हम कोई पंजीकरण कराएं और उसके नियमों में बंधें। लालफीताशाही के नियंत्रण में आएं। ऊपर मैंने कुछ उदाहरण दिए हैं और जो बाकी विकल्प हैं उनकी चर्चा करें तो आप पाएंगे कि देश में (दरअसल बैंक में) छोटा-मोटा प्रोपराइटरशिप कंसर्न चलाने से आसान है एचयूएफ चलाना। एचयूएफ यानी हिन्दू अविभाजित परिवार। कुछ लोग कहते हैं कि यह सुविधा हिन्दुओं के तुष्टिकरण के लिए है। यहां मैं उस विस्तार में नहीं जाउंगा पर इसकी तुलना प्रोपराइटरशिप कंसर्न से करके बताउंगा कि बाप-दादा के धन पर ऐश करना तो वैसे ही आसान है एचयूएफ की सुविधाएं उसे भोगने की पूरी व्यवस्था करता है और बैंकों ने प्रोपराइटरशिप कंसर्न को उसी के मुकाबले रखकर काम करके पैसा कमाना मुश्किल बना दिया है या बना रहे हैं।

एंटाइटी यानी इकाई के सबूत के रूप में सोल प्रोपराइटरशिप कंसर्न या एचयूएफ से एक ही दस्तावेज मांगे जाते हैं जैसे बिजली, पानी, लैंडलाइन फोन का बिल जो इकाई के नाम पर हो। एचयूएफ के मामले में यह कर्ता यानी परिवार के मुखिया के नाम पर ही होगा और यही पर्याप्त है पर प्रोपराइटरशिप कंसर्न के मामले में यह कंसर्न के नाम से चाहिए। कंसर्न के मुखिया के नाम से नहीं चलेगा। इसी तरह जो भी दस्तावेज बताए गए हैं वे मेरे मामले में आवश्यक नहीं हैं इसलिए नहीं हैं और खाता ब्लॉक है (हालांकि उसमें बहुत पैसा नहीं है)। खास बात यह है कि बैंक इस बात की जांच खुद नहीं करेगा और उसकी चिट्ठियां इस पते पर डिलीवर हो रही हैं पर वह पर्याप्त नहीं है। बैंक वाले आकर भी जांच नहीं करेंगे और ना यह कहने या लिखकर देने से मानेगें कि हम जहां रहेते हैं वहीं से अपना काम भी कर लेते हैं। इसलिए जय जय।

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है

Sanjaya Kumar Singh : प्रेस की स्वतंत्रता का भाजपाई अर्थ… अमित शाह के बेटे के खिलाफ खबर छपने पर 100 करोड़ का दावा और स्टे। हालांकि बहाल नहीं रह पाया। भाजपा के सबसे पैसे वाले सदस्यों में एक माने जाने वाले राजस्यसभा सदस्य का नाम पैराडाइज पेपर में आने पर एक सप्ताह का मौनव्रत और अगले ही दिन अखबारों के लिए विज्ञापन तैयार हो जाना – बताता है कि भाजपा के नेताओं के लिए प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का अलग मतलब है। और इसे रोकने के लिए 40 साल पुराना मामला भी अचानक निकल सकता है। आइए, फिलहाल आरके सिन्हा का मामला देखें।

मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है। हालांकि, यह विज्ञापन इंडियन एक्सप्रेस में नहीं है। पता नहीं एक्सप्रेस ने छापा नहीं या उसे दिया ही नहीं गया। भाजपा राज में विज्ञापनों का अपना खेल चल रहा है और वह अलग मुद्दा है। विज्ञापन के रूप में छपा आरके सिन्हा का स्पष्टीकरण उनके सांसद के लेटरहेड पर है और राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को संबोधित है। इसमें उन्होंने विदेशी कंपनी में शेयर होने के आरोप तो स्वीकार कर लिए हैं पर बताया है कि वह क्यों है और कैसे हुआ तथा कैसे गलत नहीं है। चुनाव के समय की जाने वाली घोषणा में इसका विवरण न होने के बारे में सफाई दी है और कारण बताया है कि नियमतः यह जरूरी नहीं है। श्री सिन्हा का यह स्पष्टीकरण अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ है।

विज्ञापन के रूप में छपे लेडर हेड पर उन्हें कानून व न्याय मंत्रालय और दूरसंचार मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य भी बताया गया है। विकीपीडिया के मुताबिक वे एक भारतीय पत्रकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक उद्यमी हैं और सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज के संस्थापक हैं। अपने पत्र में श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस पर अनैतिक पत्रकारिता का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस अखबार ने दशकों से बरकरार उनकी छवि को निहित स्वार्थों से धूमिल करने की कोशिश की है। श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस के अध्यक्ष विवेक गोयनका, मुख्य संपादक राजकमल झा और संपादकीय कर्मी रितु सरीन और श्याम लाल यादव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई शुरू करने का आग्रह किया है।

एक्सप्रेस ने यह खुलासा 6 नवंबर को छापा था और उसी दिन उन्होंने लिखकर बताया था कि वे मौनव्रत पर हैं पर आज (09 नवंबर) छपा जवाब अगले ही दिन यानी 7 नवंबर की तारीख का है। इसमें उन्होंने लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले पत्र में दिए गए तथ्य “पारदर्शितापूर्ण तरीके से” इंडियन एक्सप्रेस टीम के साथ साझा किए गए थे। इसके बावजूद एक्सप्रेस ने बगैर तथ्यों के भ्रम पैदा करने वाली खबर फैलाई है और निहित स्वार्थों के लिए छवि खराब करने का काम किया है। खास बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर के साथ बॉक्स में इनका पक्ष भी छापा था और यह सूचना भी लगाई थी कि पूरी प्रतिक्रिया के लिए एक्सप्रेस की साइट देखें। मैंने उनकी प्रतिक्रिया एक्सप्रेस की साइट पर नहीं देखी (मुझे देखने की जरूरत नहीं लगी)।

सिन्हा साब पत्रकार हैं, मुझसे भी पुराने और सीनियर पर मुझे लगता है कि एक्सप्रेस ने जो खबर छापी है वह तथ्यों पर आधारित है और जो छापा है उससे संबंधित उनके पारदर्शी जवाब का अंश भी छाप दिया है। बाकी वेबसाइट पर है। और यह तथ्य वे मान रहे हैं कि विदेशी कंपनी में शेयर है और उसकी जानकारी राज्य सभा चुनाव में नहीं दी गई थी। यही एक्सप्रेस की खबर है फिर भी वे एक्सप्रेस पर प्रेस की आजादी के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही कांग्रेस के नेताओं के नाम लेकर कहा है कि दूसरे लोगों को लक्ष्य क्यों नहीं किया जा रहा है। जबकि एक्सप्रेस ने पहले ही दिन लिखा था कि करोड़ों पेज के ये मामले 10 महीने की पड़ताल के बाद छापे जा रहे हैं औऱ अगले 40 दिनों तक छपेंगे। भाजपा की प्रेस की स्वतंत्रता के मायने बिल्कुल अलग लगते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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पैराडाइज पेपर्स ने फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ की अनैतिकता और लालच का किया खुलासा

सिंगापुर की स्टेंट बनाने वाली कंपनी ने डा. अशोक सेठ को अपने शेयर दिए और डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की.. इस तरह प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया.. कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है… यह मामला चिकित्सा पेशे में शीर्ष स्तर की अनैतिकता और लालच को दर्शाता है जहां मरीज का हित प्रमुख नहीं बल्कि डाक्टर और अस्पताल का लाभ सर्वोच्च हो गया है…

-संजय कुमार सिंह-

इंडियन एक्सप्रेस ने विदेशी कंपनियों में धन जमा करने के मामलों का अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है। खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संघटन की इस खोज में 714 भारतीय लिंक मिले हैं और ऐसी फर्में भी हैं जिनकी जांच सीबीआई कर रही है। अखबार इससे पहले पनामा पेपर छाप चुका है। इसे पैराडाइज पेपर नाम दिया गया है। अखबार का दावा है कि इस जांच में उसने 10 महीने लगाए हैं और 13.4 मिलियन (एक करोड़ 34 लाख) दस्तावेजों की जांच की है। इसके लिए 195 समाचार संगठनों के साथ मिलकर काम किया है। इनमें दि गार्जियन, बीबीसी (यूके), दि न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका), ओसीसीआरपी (रूस), ली मोन्डे (फ्रांस) , ईआई कांफिडेंशियल (स्पेन), एबीसी फोर कॉर्नर्स (ऑस्ट्रेलिया), सीबीसी/रेडियो (कनाडा), ला नैसियॉन (अर्जेन्टीना) शामिल हैं।

अखबार ने पहले पन्ने पर अपनी इस खबर को पूरे आठ कॉलम में बैनर बनाया है और उन्नी का कार्टून, “बिजनेस ऐड यूजुअल” भी लीड के साथ आ गया है. सिंगल कालम का यह छोटा सा कार्टून आज मारक है। इसमें 8 नवंबर को नोटबंदी दिवस के रूप में याद किया गया है और कहा गया है, “गुड मॉर्निंग! प्रकाश ध्वनि से थोड़ा पहले पहुंच गया है”। इसका मतलब बहुत गहरा है और समझने की जरूरत है, इसे समझाया नहीं जा सकता है। खासकर तब जब नोटबंदी का कोई फायदा दिखा नहीं सिर्फ बताया जाता रहा है और उसमें यह भी कि करोड़ों लोगों की जांच चल रही है। दो सौ लोगों को मारकर साल भर से जांच चल रही है और जैसा कि एक्सप्रेस के कार्टून में कहा गया है प्रकाश की किरण वहां से आ रही है, आवाज कहीं और से बाद में आएगी – यह विज्ञान है। लेकिन इसी को काबिलयत बना कर पेश करने का भी एक अंदाज है। संयोग से, आज इंडियन एक्सप्रेस के शुरू के पन्नों में विज्ञापनों का जैकेट नहीं है। इसलिए पढ़ना भी सुविधाजनक है और देखने में भी आज इंडियन एक्सप्रेस अपने पुराने तेवर में लग रहा है। एक्सप्रेस का यह खुलासा अभी जारी है। अखबार के कई पन्ने रंगने के बाद अभी आगे भी मसाला आएगा।    

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने खुलासे में पहले पेज पर फोर्टिस के डॉक्टर अशोक सेठ का मामला भी छापा है। शीर्षक में ही कहा गया है कि डॉ. सेठ अपने मरीजों के लिए जिस कंपनी के स्टेंट का उपयोग करते थे उन्हें उसके शेयर मिले थे। इस खबर के साथ डॉ अशोक सेठ की फोटो है और कैप्शन लगा है नो रांग डुइंग, क्लेम्स कार्डियोलॉजिस्ट अशोक सेठ। यानी कोई गलत काम नहीं, हृदय रोग विशेषज्ञ अशोक सेठ ने दावा किया। ऋतु सरीन की इस खबर के मुताबिक जांचे गए दस्तावेजों के एक सेट में यह हितों के संभावित टकराव के रूप में सामने आता है। इंडियन एक्सप्रेस ने रिकार्ड की जांच के बाद लिखा है कि पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित, फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ को 2004 में सिंगापुर आधार वाली एक कंपनी जो स्टेंट बनाती है, ने पूंजी बाजार में जाने से पहले अपने शेयर दिए थे। बाद में डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की और प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया। कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है। यह इंटरवेंशन कार्डियोलॉजी और क्रिटिकल केयर प्रक्रियाओं के लिए चिकित्सा उपकरणों का निर्माण और उनका विपणन करती है। कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक,  बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप लिमिटेड का निगमन बरमुडा में 28 मई 1998 को हुआ था और यह सिंगापुर में पंजीकृत है।

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि संपर्क करने पर डॉ.सेठ ने बताया कि उन्होंने तीन साल तक बायोसेंसर्स के शेयर अपने पास रखे और 54 लाख रुपए का मुनाफा कमाकर बेच दिया। डॉ. सेठ का दावा है कि जब तक कंपनी के शेयर उनके पास रहे उन्होंने इसका उपयोग उनका दावा है कि अपने टैक्स रिटर्न में उन्होंने इसकी घोषणा की है। अखबार की खबर में हितों के टकराव आदि का विस्तार से विवरण है। जब मेरे पास कंपनी के शेयर थे (कंपनी ने आवंटित 2004 में किए थे पर इन्होंने लिया अप्रैल 2013 में पर उसी कीमत में, ठीक से समझने के लिए एक्सप्रेस की पूरी खबर देखें) तब मैंने सिर्फ सिर्फ सात बायोमेट्रिक्स स्टेंट लगाए। डॉ. सेठ का कहना है कि उनके पास कंपनी के शेयरों की संख्या बहुत मामूली थी पर इसे हितों का टकराव माना जा सकता है इसलिए जब मेरे पास शेयर थे तब मैंने बायोसेंसर्स के उत्पादों का उपयोग नहीं किया।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी मूल खबर में लिखा है, तेजी से अंतरराष्ट्रीय हो रही दुनिया में कॉरपोरेट पुनर्गठन या विस्तार के लिए विदेशी इकाई की स्थापना भले ही अवैध न हो पर एक अहम मुद्दा तो है ही कि कैसे कुछ विदेशी फर्में (यहां ऐप्पलबाई का जिक्र है) बहुराष्ट्रीय निगमों को कानून में गड़बड़ियों या चूक का लाभ उठाने का मौका देती हैं जिससे वे अपने देश में जायज टैक्स देने से बच जाती हैं। इसलिए पैराडाइज पेपर्स नियामक एजेंसियों के लिए जांच के दरवाजे खोलती हैं ताकि वे तय करें कि ये सौदे अथवा लेन-देन संबंधित देश के कायदे कानूनों के मुताबिक वैधानिक और विधिवत हैं कि नहीं। यहां सवाल उठता है कि एक्सप्रेस ने जब पनामा पेपर्स की रिपोर्ट छापी थी उसकी ही कौन सी जांच हुई और क्या फर्क पड़ा।

उल्टे, नोटबंदी की बरसी पर सरकार बता रही है कि एक साल से (नोटबंदी से मिले) कितने लोगों की जांच चल रही है और नोटो की गिनती की तरह जारी है। कार्रवाई करने में कितना समय लगेगा या कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है समझा जा सकता है। अखबार की खबर के मुताबक, लीक हुए डाटा में 180 देशों का प्रतिनिधित्व है उसमें भारत का स्थान, नामों की संख्या के लिहाज से 19वां हैं (इसका ईज ऑफ बिजनेस से संबंध है कि नहीं, राम जाने)। कुल मिलाकर 714 भारतीयों के नाम हैं। यह दिलचस्प है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐप्पलबाई के दूसरे सबसे बड़े क्लाइंट होने का श्रेय एक भारतीय कंपनी सन ग्रुप को है जिसकी स्थापना नंद लाल खेमका ने की है। इस कंपनी की 118 इकाइयां अलग-अलग देशों में हैं।

ऐप्पलबाई के भारतीय ग्राहकों में कई प्रमुख कॉरपोरेट और कंपनियां हैं जिनकी बाद में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसी जांच भी कर रही है। और इस जांच का आलम यह है कि सीबीआई का भेजा एक लेटर रोगेटरी ऐप्पलबाई के पास पहुंच चुका है। कॉरपोरेट के अलावा जो नाम हैं उनमें अमिताभ बच्चन, नीरा राडिया और फिल्म स्टार संजय दत्त की पत्नी शामिल हैं। एक नया नाम जो मुझे चौंकाने वाला लगा वह सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज (एसआईएस) के संस्थापक और भाजपा के राज्य सभा सदस्य आरके सिन्हा से जुड़ी है। नाम तो जयंत सिन्हा, सचिन पायलट और कार्ति चिदंबरम के भी हैं पर मेरे लिए ताज्जुब वाला नाम आरके सिन्हा का ही है।  

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.


ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद, संजय कुमार सिंह के सौजन्य से, पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें : 

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जयंत सिन्हा, ईबे, पियरे ओमिडयार, नरेंद्र मोदी और बाहरी पूंजी का भारतीय चुनाव में खुला खेल!

ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह के सौजन्य से पढ़ें…

केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद pando.com पर Mark Ames ने 26 मई 2014 को लिखा था- “भारत में चुनाव के बाद एक कट्टरपंथी हिन्दू सुपरमैसिस्ट (हिन्दुत्व की सर्वोच्चता चाहने वाले) जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है, को सत्ता मिल गई है। इसके साथ ही व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जय कारने (यहां भी जय) ने कहा है कि ओबामा प्रशासन एक ऐसे व्यक्ति के साथ “मिलकर काम करने का इंतजार कर रहा है” जो अल्पसंख्यक मुसलमानों (और अल्पसंख्यक ईसाइयों) के घिनौने जनसंहार में भूमिका के लिए 2005 से अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) के वीजा ब्लैकलिस्ट में है।

इस शुरुआती पैरा ग्राफ से आपको लेखक, पांडो डॉट कॉम के तेवर और लेख का अंदाजा हो जाएगा। इसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा के बारे में लिखा था, पांडो के पाठक जानते हैं कि ओमिडयार (Omidyar Network) नेटवर्क ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार की लोकोपकारी शाखा है। 2009 से ओमिडयार नेटवर्क ने भारत में अपने पोर्टफोलियो के किसी अन्य देश की तुलना में ज्यादा निवेश किया है। ये निवेश मुख्य रूप से जयंत सिन्हा की बदौलत हैं जो मैकिन्जी के पूर्व साझेदार और हावर्ड के एमबीए हैं जिसे अक्तूबर 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स को चलाने के लिए नौकरी पर रखा गया था।

सिन्हा के कार्यकाल में ओमिडयार नेटवर्क ने अपने निवेश का बड़ा हिस्सा भारत की ओर घुमा दिया। इस तरह 2013 तक भारत में निवेश ओमिडयार नेटवर्क के प्रतिबद्ध कोष का 18 प्रतिशत जो 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा था हो चुका था। इसमें इसके पोर्टफोलियो की कुल कंपनियों का 36 प्रतिशत शामिल था। इस साल श्री सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की नौकरी छोड़ दी ताकि मोदी के चुनाव अभियान में सलाह दे सकें और भाजपा के टिकट पर एक संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ सकें। सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने 1998 से 2002 तक पिछली भाजपा सरकार में वित्त मंत्री के रूप में काम किया था जब उनकी सरकार ने परमाणु बम का परीक्षण किया था। इस साल सिन्हा के पिता ने अपनी संसदीय सीट छोड़ दी और बेटे जयंत सिन्हा को अपनी जगह लेने दी।

चुनाव प्रचार के दौरान जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने गुजरात दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी द्वारा माफी मांगने से मना किए जाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। तब उन्होंने कहा था, “मोदी सही हैं … वे माफी क्यों मांगें?”  ओमिडयार के पूर्व कर्मचारी उनके बेटे जयंत सिन्हा ने (जब लेख लिखा गया था उससे कुछ सप्ताह पहले) दावा किया कि उनके पिता की भाजपा सरकार ने 1998 में अंतरराष्ट्रीय नाराजगी को नजरअंदाज कर परमाणु बम का परीक्षण किया जिसे पोखरण के नाम से जाना जाता है। मोदी को चुनाव जीतने में सहायता करने के लिए जयंत सिन्हा के ओमिडयार नेटवर्क छोड़ने के कुछ ही समय बाद मोदी ने एक भाषण दिया जिसमें भारत के ई कामर्स बाजार को ई-बे जैसी विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की मांग की। ईबे के सबसे बड़े शेयरधारक पियरे ओमिडयार हैं।

संदेश स्पष्ट था- मोदी हाईटेक इंडिया के उम्मीदवार हैं, हिंसक अतिराष्ट्रवाद के बावजूद। इसी समय सिन्हा ने मोदी और बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों जैसे जेपी मोरगन, मोरगन स्टैनली और नोमुरा बैंक के बीच एक समिट मीटिंग का आयोजन करने में सहायता की। संभवत: इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है कि मोदी के अति राष्ट्रवादी प्रयासों की सवारी करके पिछले सप्ताहांत (लेख पुराना है, उसके हिसाब से) जब जयंत सिन्हा चुनाव जीत गए तो ओमिडयार नेटवर्क ने उन्हें बधाई दी।  इसके कुछ ही समय बाद ओमिडयार के पूर्व कर्मी (पुराने आदमी भी कह सकते हैं) ने जोर देकर कहा कि, “श्री मोदी एक महान लोकतांत्रिक (हस्ती) हैं।”

इसके बाद pando.com पर Mark Ames ने ही 9 नवंबर  2014 को (नोटबंदी के बाद) एक और दिलचस्प पीस लिखा था। इसका शीर्षक था, भारत में पियरे ओमिडयार का आदमी मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दूसरा शीर्षक था, ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार के ग्लोबल इंपैक्ट फंड में लंबे समय तक सीनियर एक्जीक्यूटिव रहे जयंत सिन्हा को भारतीय अतिराष्ट्रवादी नेता नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।  बोल्ड अक्षर में अपडेट के साथ शुरू होने वाली कहानी इस प्रकार थी – सिन्हा (जयंत) का नया पद स्पष्ट बता दिया गया है – वो अब भारत के जूनियर वित्त मंत्री हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के तहत काम कर रहे हैं। लंबे समय तक ओमिडयार का आदमी रहा व्यक्ति अब इस स्थिति में है कि 2015 का बजट तैयार करने में सहायता करेगा जिसके बारे में (प्रधानमंत्री) नरेन्द्र मोदी ने (हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक) संकेत दिया है कि “बदलाव लाने वाला” होगा। 

जयंत सिन्हा ने 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स की स्थापना की थी और फर्स्ट लुक मीडिया पब्लिशर्स इंपैक्ट फंड में साझेदार और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की पांच सदस्यों वाली ग्लोबल एक्जीक्यूटिव कमेटी में भी काम किया था तथा ओमिडयार नेटवर्क के 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा के फंड को भारत की ओर मोड़ दिया था। इस तरह इसे दुनिया के सबसे बड़े, 700 मिलिय़न डॉलर के इंपैक्ट फंड के लिए सबसे सक्रिय अकेले देश का निवेश बनाया था।  इस साल के शुरू में ओमिडयार नेटवर्क के साझेदार और प्रबंध निदेशक का पद छोड़ दिया था ताकि धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपने पिता की संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकें।

अब मोदी मंत्रिमंडल में सिन्हा की नियुक्ति ने उन्हें पिछले दो सप्ताह में किसी दक्षिण पंथी, कारोबार समर्थक सरकार में सत्ता तक पहुंचने वाली दूसरी ओमिडयार हस्ती बना दिया है।  
पांडो डॉट कॉम ने आगे लिखा है, जैसा पांडो डेली पूरे साल सूचित करता रहा है, जयंत सिन्हा और उनके बॉस, ओमिडयार भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक अस्वाभाविक दोहरी भूमिका निभाते रहे हैं और लोकोपकारी दिखने वाले काम सोच-समझ कर राजनीतिक निवेश के रूप में किए गए हैं जो सिन्हा के राजनैतिक अभियान का हिस्सा रहा है।

ओमिडयार के ऐसे ग्रांट में से कुछ लाभ के लिए किए गए निवेश थे। जैसे एसकेएस माइक्रोफाइनेंस जैसी माइक्रोफाइनेंस फर्म में ओमिडयार निवेश जिसका समापन बहुत ही घातक ढंग से हुआ जब एसकेएस के कर्ज वसूलने वालों ने जोर लगाया और उनपर सैकड़ों गरीब ग्रामीणों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप लगा। इन लोगों ने कीटनाशक पीकर, डूबकर और अन्य तरीकों से आत्महत्या कर ली थी। ओमिडयार सिन्हा का एक और निवेश गैर सरकारी संगठनों में गया जिसने धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर अच्छी तरह काम किया जब वह विपक्ष में थी और यह काम खासतौर से पिछली (सेंटर-लेफ्ट) सरकार के भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करने का था  जो 2007 से इस साल तक लगातार सत्ता में बनी रही।

भाजपा ने इस साल का चुनाव भ्रष्टाचार के विरोध के दम पर जीता और ओमिडयार सरकार ने भारत के सबसे प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी गैर सरकारी संगठनों के अभियान, “आई पेड अ ब्राइब” के लिए धन मुहैया कराया।  2010 में सिन्हा और ओंमिडयार नेटवर्क ने एक भारतीय गैरसरकारी संगठन, जनाग्रह को तीन मिलियन डॉलर दिए ताकि वह  “आई पेड अ ब्राइब” अभियान चला सके। इस खबर में भी जयंत सिन्हा ओमिडयार नेटवर्क की मिलीभगत का जिक्र है तथा गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक सहायता तथा उसकी शैली का विवरण है। इसमें अजीत डोभाल के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाना शामिल है। 

इसी खबर में आगे बताया गया है कि सिन्हा और ओमिडयार से धन पाने वाला एक और गैर सरकारी संगठन 2012 में सांसदों को देश के सख्त ई कामर्स कानून के संबंध में अवैध रूप से प्रभावित करता पकड़ा गया था। उस समय भारत की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी ने इस एनजीओ की निन्दा की थी और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक कहा था तथा विदेशी खुफिया एजेंसी को छिपकर काम करने और भारत सरकार में घुसपैठ करने में सहायता करने का आरोप लगाया था और इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था (इस एनजीओ का नाम नहीं है)।

इस मामले के पकड़े जाने के बाद संबंधित एनजीओ के सह-संस्थापक सीवी मधुकर को ओमिडयार ने नौकरी पर रख लिया। अब वे “सरकारी पारदर्शिता” में  ओमिडयार नेटवर्क इंडिया के डायरेक्टर ऑफ इनवेस्टमेंट हैं। इस बीच सिन्हा अपना काम करते रहे हैं … जिससे ओमिडयार को प्रत्यक्ष लाभ होता है जो अभी भी ईबे के चेयरमैन हैं। … जून (2014 में) के शुरू में मोदी और सिन्हा के चुनाव जीतने के बाद, मोदी की नई सरकार ने ईबे साथ-साथ अमैजन और गूगल के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था ताकि भारत के ई कामर्स कानून लिखने में सहायता की जा सके।

अनुवादक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय लंबे समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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