ठाकुर की तरह मैंने भी मुलायम से तंग आकर नौकरी छोड़ी थी : आईपीएस शैलेंद्र सिंह

वाराणसी : एसटीएफ के पूर्व डिप्‍टी एसपी रहे शैलेन्‍द्र सिंह ने कहा है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह की वजह से ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। मुलायम की सरकार गुंडों से बनी है और यही कारण है कि सबसे पहले पुलिस को कंट्रोल में लिया जाता है। वर्ष 2004 में बाहुबली मुख्तार अंसारी पर पोटा की कार्रवाई के कारण उन्हें मुलायम सिंह सरकार ने परेशान किया था। उसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

उन्होंने कहा कि सपा सरकार में जंगलराज कायम है और इस सरकार में पुलिसकर्मी काफी दबाव में काम करते हैं। इस सरकार में सिर्फ एक ही बिरादरी को उठाने का काम किया जाता है और हर ऊंचे पदों पर उन्हें ही बैठाया जाता है ताकि सरकार अपनी मनमर्जी चला सके। अमिताभ ठाकुर के साथ वही हो रहा है, जैसाकि उनके साथ हुआ था। मुलायम सिंह यादव की कार्यप्रणाली शुरू से ही ईमानदार अधिकारियों को तंग करने की रही है। समाजवादी सरकार की कार्यशैली शुरू से ऐसी रही है। सीएम मुलायम सिंह और सीएम अखिलेश यादव की कार्यशैली एक जैसी है। उसी का नतीजा अमिताभ ठाकुर का उत्पीड़न।

शैलेन्‍द्र सिंह ने कहा कि जिस जसराना का उल्लेख मुलायम सिंह ने अपने विवादित टेप में किया है, उस घटना के बाद से ही अमिताभ ठाकुर काफी दु:खी थे और उन्होंने मुझे कॉल कर कहा भी था कि मैं अब इस्तीफा देकर नौकरी से बाहर आना चाहता हूं। हालांकि मैंने उनसे कहा भी कि अगर गवर्मेंट से लड़ना है तो उसमें काफी समस्या आएगी और अब वही उनके साथ हो भी रहा है। 

ईनाडु इंडिया से साभार

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शैलेंद्र शर्मा आत्महत्या कांड : ‘दबंग दुनिया’ के सीईओ समेत चार पर लटकी कार्रवाई की तलवार

खंडवा (म.प्र.) : दबंग दुनिया अखबार के मार्केटिंग विभाग से जुड़े रहे शैलेंद्र शर्मा ने काम के दबाव के चलते तीन माह पहले खंडवा के एक होटल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अब उस मामले में खंडवा पुलिस ने दबंग दुनिया के सीईओ सहित चार लोगों के खिलाफ धारा 304 के तहत प्रकरण दर्ज करने की तैयारी कर ली है। 

गौरतलब है कि दबंग दुनिया के सीईओ द्वारा शैलेंद्र शर्मा को कार्यरत रहने के दौरान मानसिक रूप से काफी प्रताड़ित किया गया था। वह खंडवा में दबंग दुनिया के मार्केटिंग एवं सर्क्यूलेशन इंचार्ज थे।

इधर, दबंग दुनिया मैनेजमेंट ने शैलेंद्र के परिवार को अभी तक कोई सहायता राशि नहीं दी है और शैलेंद्र पर लाखों रुपए के गबन का आरोप लगा रहे हैं, जबकि कर्मचारियों ने शैलेंद्र के परिवार के लिए मार्च माह में ही एक दिन का वेतन भी कटवा दिया था। 

इस पूरे प्रकरण को ठिकाने लगवाने के लिए दबंग दुनिया के चैयरमैन किशोर वाधवानी ने अपने खास गुर्गे राजू पाठक और डाक प्रभारी विजय पाठक को लगा रखा है। शैलेंद्र के परिजन भी इस मामले में सीएम शिवराज सिंह से गुहार लगाने वाले रहे हैं।

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गुजराती होकर गुजरात में शराब पीने की अनुमित क्यों नहीं ?

गुजरात में शराब पर प्रतिबंध के बावजूद शराब तस्करों का मजबूत तंत्र कार्य कर रहा है। तीन बार सत्ता में आने और मुख्यमंत्री रहने के बावजूद मोदी जी शराब के अवैध धंधे को रोक नहीं सके। गौरतलब है कि गुजरात में शराब की बिक्री पर पूरी तरह से रोक है लेकिन फिर भी लोग शराब का अवैध धंधा चल रहा है।

महात्मा गांधी की जन्मस्‍थली रहे गुजरात में उनके सम्मान के लिए 1960 से शराब की बिक्री पर कानूनी रूप से रोक लगा दी गई थी। बहुत से लोगों को अब ये लगता है कि कि ड्राई स्टेट की नीति बदलने का समय आ गया है। लोग पूछते हैं कि उन्हें गुजराती होकर भी गुजरात में शराब पीने की अनुमित नहीं है जबकि अगर कोई विदेशी आता है तो उसे परमिट दिया जाता है और वो शराब पी सकता है। गुजरात में मदिरापान करने के लिए सरकार से परमिट लेना पड़ता है। यह हेल्थ परमिट के नाम से जाना जाता रहा है। इससे पहले हेल्थ ग्राउंड पर यह परमिट मिलता था। इसके तहत सिविल सर्जन लिखकर देते थे कि अमुक व्यक्ति को मदिरापान से कोई समस्या नहीं होगी।

एक समाचार के अनुसार गुजरात में अब मदिरापान करना है तो कार्यालय के बॉस की एनओसी अनिवार्य है। बॉस यदि लिख कर देगा कि मेरा मुलाजिम मदिरापान करे, मुझे कोई आपत्ति नहीं है तब ही परमिट लेने की राह खुल सकेगी। इसके साथ ही यह भी अनिवार्य कर दिया गया है कि सैलरी कम से कम 25 हजार रुपए प्रतिमाह होना जरूरी है। पिछले कुछ सालों से परमिट संबंधी मानदंड सख्त हो गए हैं। नए प्रावधानों से परमिट लेना और मुश्किल हो जाएगा। नशाबंदी विभाग के कार्यकारी अधीक्षक जी बी चौधरी ने बताया कि नए नियमों में सुधार के बाद आवेदनों में गिरावट आई है। सरकारी कर्मचारी एनओसी नहीं देते हैं तो परमिट रद्द कर दिया जाता है। स्वास्थ्य कारणों के आधार पर सशर्त मद्यपान का प्रावधान किया है। इसका लाभ गुजरात के बाहर के पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस होल्डर्स को आसानी से मिल जाता है। यानी वे शराब खरीद सकते हैं।

जहाँ ड्राई स्टेट को विरोध करने वाले लोग हैं वहीं इसका समर्थन करने वाले भी लोग हैं। ड्राई स्टेट के पक्षधरों का कहना है कि शराब की बिक्री नहीं होने की वजह से गुजरात महिलाओं के लिए सुरक्षित जगह है। ड्राई स्टेट का विरोध करने वालों का तर्क है कि शराब बेचने की अनुमति न होने के कारण अवैध शराब धड़ल्ले से बिकती है और इसे पीना सुरक्षित नहीं होता। प्रतिबंध के पक्ष में अच्छे इरादों का होना इसका केवल एक पक्ष है। इसका दूसरा पहलू यह है कि प्रतिबंध कारगर नहीं है। इस प्रतिबंध की जिस हद तक अवहेलना की जाती है, वह हास्यास्पद है। अवैध शराब गुजरात में आसानी से उपलब्ध है। मैं खुद गुजरात में कई ऐसे कार्यक्रमों में शामिल हुआ हूं, जहां शराब  परोसने की व्यवस्था होती है।

शहरों के हाई-प्रोफाइल लोग शाम की चुस्कियों के साथ जिंदगी और काम से जुड़ी बातें करते हैं। इसके साथ ये प्रतिष्ठित लोग कानून तोड़ने वाले अपराधियों में तब्दील होकर रह जाते हैं। यह एक पुराने कानून का परिणाम है, जो भारत की 90 फीसदी से ज्यादा आबादी पर लागू नहीं होता। यदि हम नागरिकों को एक काूनन तोड़ने को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो फिर वे बाकी कानूनों का सम्मान कैसे करेंगे? क्या इसका आखिरी नतीजा समाज में ‘सब कुछ चलता है’ की सोच को और मजबूत नहीं करेगा, जो देश की मौजूदा समस्याओं का एक बड़ा कारण है? 1920 से 1933 के बीच अमेरिका में भी शराबबंदी को आजमाया गया था, लेकिन यह बुरी तरह असफल रही। इसके लिए भी वही तर्क दिए गए थे, जो आज गुजरात में दिए जाते हैं। इसके दुष्प्रभाव भी एक जैसे थे। नतीजतन इस कानून को ही खत्म कर दिया गया। जॉन रॉकफेलर शराबबंदी के धुर समर्थकों में शामिल थे, लेकिन प्रतिबंध समाप्त किए जाने के बाद उनकी राय कुछ ऐसी थी: ‘‘जब शराबबंदी लागू की गई थी, तब मुझे यह उम्मीद थी कि आम लोग इसका समर्थन करेंगे और शराब के दुष्प्रभावों को समझेंगे। लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि इसके नतीजे अपेक्षित नहीं मिल रहे। इसके बाद शराब की खपत बढ़ गई, कानून तोड़ने वालों की नई जमात पैदा हो गई, कानून के प्रति सम्मान की भावना काफी कम हो गई है और अपराध का स्तर पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।’’

ये बातें मौजूदा गुजरात पर भी लागू होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब का धंधा कुटीर उद्योग का रूप ले रहा है। रोजाना अपने बयानों में पुलिस भी शराब के अवैध धंधे पर कार्रवाई की बड़ी-बड़ी बातें जरूर करती है लेकिन हकीकत में ग्रामीण इलाकों में शराब तस्करों का ही सिक्का चलता है। उन्हीं के इशारों पर पुलिस भी कार्रवाई करती है। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने कहा है कि गुजरात में बढ़ रही शराब की कालाबाजारी रोकने के लिए विमेन पावर का इस्तेमाल होगा। मगर अब तक बड़ौदा में डेढ़ करोड़ की शराब पकड़े जाने के अतिरिक्त और कोई सफलता इस मुहिम में हाथ नहीं लग पाई है। ऐसे आरोप हैं कि शराब की बिक्री का कारोबार स्‍थानीय पुलिस के सहयोग से बराबर फल फूल रहा है। प्रति वर्ष जहरीली शराब पीने से यहां बहुत लोगों की मौत हो जाती है। अवैध शराब का कारोबार चलने और लोगों के मरने से सरकार को काफी विरोध का भी सामना करना पड़ता है। राज्य में अवैध शराब की वजह से हर साल 3 हजार करोड़ रुपए के उत्पाद शुल्क का नुकसान हो रहा है। अगर आप 10 प्रतिशत की दर से उत्पाद कर को जोड़ें तो गुजरात में अवैध शराब का व्यापार 30 हजार करोड़ रुपए का है। कहा जाता है कि भारत में कालाधन पैदा करने के तीन प्रमुख स्रोत हैं- भूमि, खनिज और शराब। गुजरात में खनिज नहीं है लेकिन वहां शराब का कमाल का धंधा चल रहा है। राजस्थान के रास्ते होकर गुजरात को करोड़ों रूपए की शराब की तस्करी प्र्रतिदिन हो रही है।

राजस्थान में महीने में पांच-दस ट्रक शराब-कार्टन से भरे हुए पकड़े जाते रहे हैं। जिनके बारे में यह खुलासा हुआ है कि शराब गुजरात ले जाई जाती है। वहीँ हरियाणा के गुड़गांव से सड़क के रास्ते राजस्थान होते हुए गुजरात शराब पहुंचाने के गोरखधंधे में मोटा मुनाफा देखते हुए तस्कर सक्रिय हैं। हरियाणा से अवैध शराब की खरीद कर उसे मोटे मुनाफे पर गुजरात में बेचा जाता है, जिसमें 700 रुपये प्रति पेटी के एवज में गुजरात में 2,000 रुपये प्रति पेटी मिलता है। पंजाब के प्रमुख शराब कारोबारियों के ग्रुप ने जो खुलासे किए वह काफी हैरान कर देने वाले हैं। उनका दावा है कि देश में ड्राई कहे जाने वाले राज्य गुजरात में न सिर्फ बड़े स्तर पर शराब बिक रही है बल्कि वहां बिकने वाली 80 प्रतिशत शराब पंजाब से जा रही है, यह सारा धंधा बहुत बड़े स्तर पर राज्य में सरगर्म प्रभावशाली शराब माफिया द्वारा चलाया जा रहा है, सरकार द्वारा प्रतिवर्ष ठेकेदारों का कोटा बढ़ा देने से अधिकतर व्यापारी अपने परमिट कम दाम पर इस माफिया को बेचने के लिए विवश हैं, कोटा क्लीयर हो जाने के बावजूद अधिकतर ग्रुपों को चालू वित्त वर्ष दौरान भारी घाटा उठाना पड़ा है, ऊपर से विभाग ने इस वर्ष देसी शराब की कीमतों में कमी कर एक तरह से ठेकेदारों को जमीन पर ला खड़ा किया है, यही वजह है कि ज्यादातर ग्रुप राज्य से बाहर भाग्य अजमाने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। इन ठेकेदारों ने बताया कि गुजरात में पंजाब से हो रही करोड़ों रुपए की शराब तस्करी करने वाला माफिया इतना प्रभावशाली है कि कई राज्यों की सीमाएं लांघने के बावजूद उनकी गाड़ियों को चैक तक नहीं किया जाता। कुछ तस्कर पकड़े जाते हैं लेकिन जो पकड़ में नहीं आ पाते उनकी संख्या काफी मानी जाती है। यानि कि करोडों रूपयों की शराब गुजरात हर रोज पहुंचने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह शराब पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से राजस्थान के रास्ते से गुजरात पहुंचती है। वहीं महाराष्ट्र के रास्तो से भी यह काला कारोबार चलता है।

दमन और सिलवासा इसके मुख्य गढ हैं। छुट्टियो के दिनो में तो गुजरातियो की भारी भीड वहां देखी जा सकती है। गुजरात में यह सुविधा भी है कि आपके घर शराब आसानी से पहुंच जाती है। आप बस जेब ढीली कीजिये शराब आपके दरवाजे पर हाज़िर। शराब पहुंचाने वाले ये लोग बूट्लेगर कहलाते हैं। यह सब पुलिस की मिलीभगत से चलता है। कितने ही लोग इस तस्करी की अवैध कमाई से मालामाल हो रहे हैं और गांधी के गुजरात में नशे के व्यापार में वे सरकारी तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं। क्या गुजरात सरकार को शराब तस्करी और तस्करों के तंत्र का पता नहीं है? या फिर उनका सरकारी तंत्र इस अवैध कारोबार में शामिल है? उसकी शह के बिना तो अवैध कार्य हो नहीं सकता। अब शराब बंदी के कारण गुजरात सरकार को एक पैसे की आमदनी नहीं हो रही है लेकिन शराब तस्कर मालामाल हो रहे हैं? क्या गुजरात सरकार के पास इस बात के सही आँकड़े हैं कि कितनी शराब पकड़ी गई और कितने शराब तस्करों को पकड़ा गया व कितनों को कितनी कितनी सजा हुई? बिना राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के इतना बडा काला कारोबार संभव ही नहीं है। क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? गुजरात भ्रष्टाचार में किसी भी अन्य राज्य से कम नहीं है लेकिन वहां के लोग और शासन इसको भ्रष्टाचार मानते ही नहीं हैं। आर्थिक अपराध वहाँ सर्वस्वीकार्य हैं। रिश्वत वहाँ सुविधाशुल्क है जिसे लोग सौजन्यता मानते हैं। ।

शैलेन्द्र चौहान

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मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के पास किया जाए

सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर, 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, जिला नानी बेदवान (बंगाल) में हुआ था; परंतु पिता ‘गोष्ठ बिहारी दत्त’ कानपुर में नौकरी करते थे। बटुकेश्वर ने 1925 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। उन्हीं दिनों उनके माता एवं पिता दोनों का देहांत हो गया। इसी समय वे सरदार भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’ के सदस्य बन गए। सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर काम किया । इसी क्रम में बम बनाना भी सीखा। 

8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली स्थित केंद्रीय असेंबली में (वर्तमान का संसद भवन) भगत सिंह के साथ बम विस्फोट कर ब्रिटिश राज्य के आधिपत्य का विरोध किया। बम विस्फोट, बिना किसी को हानि पहुंचाए असेंबली में पर्चे फेंककर उनके माध्यम से अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने के लिए किया गया था। उस दिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए ब्रिटिश शासन की ओर से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया था, जो इन लोगों के विरोध के कारण एक वोट से पारित नहीं हो पाया। इस घटना के पश्चात् बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को बंदी बनाया गया । 12 जून, 1929 को इन दोनों को आजीवन कारावास का दंड सुनाया गया । दंड सुनाने के उपरांत इनको लाहौर फोर्ट कारागृह में भेजा गया ।

यहां पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षडयंत्र अभियोग चलाया गया। उल्लेखनीय है कि साइमन कमीशनका विरोध- प्रदर्शन करते हुए लाहौरमें लाला लाजपत रायको अंग्रेजोंके आदेशपर अंग्रेजी राजके सिपाहियों द्वारा इतना पीटा गया कि उनकी मृत्यु हो गई । अंग्रेजी राज के उत्तरदायी पुलिस अधिकारी को मारकर इस मृत्यु का प्रतिशोध चुकाने का निर्णय क्रांतिकारियों द्वारा लिया गया था। इस कार्यवाही के परिणामस्वरूप लाहौर षडयंत्र अभियोग चला, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी भेज दिया गया। कारागृह में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हडताल की। सेल्यूलर कारागृह से 1937 में बांकीपुर केंद्रीय कारागृह, पटना में लाए गए और 1938 में मुक्त कर दिए गए । काला पानीसे गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त पुनः बंदी बनाए गए और चार वर्षोंके पश्चात् 1945 में मुक्त किए गए। देशकी स्वतंत्रताके लिए अनंत दुःख झेलने वाले क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त का जीवन भारत की स्वतंत्रताके उपरांत भी दंश, यातनाओं, और संघर्षों की गाथा बना रहा और उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वह अधिकारी थे। उन्होंने बिस्कुट और डबलरोटी का एक छोटा सा कारखाना खोला; परंतु उसमें बहुत हानि उठानी पडी और वह बंद करना पडा।

कुछ समय तक यात्री (टूरिस्ट) प्रतिनिधि एवं बस परिवहन का काम भी किया; परंतु एक के पश्चात् एक कामों में असफलता ही उनके हाथ लगी। बटुकेश्वर दत्त के 1964 में अचानक व्याधिग्रस्त होने के पश्चात् उन्हें गंभीर स्थिति में पटना के शासकीय चिकित्सालय में भर्ती कराया गया । इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, ‘क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की चिंता नहीं की और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में चिकित्सालय में पडा एडियां रगड रहा है और उसे कोई पूछनेवाला तक नहीं है।’ इसके पश्चात सत्ता के गलियारों में हडकंप मच गया और चमनलाल आजाद, तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाबके मंत्री भीमलाल सच्चर से मिले ।

पंजाब शासन ने एक हजार रुपए का धनादेश बिहार शासन को भेजकर वहां के मुख्यमंत्री के. बी. सहाय को लिखा कि यदि वे उनका वैद्यकीय उपचार कराने में सक्षम नहीं हैं तो वह उनका दिल्ली अथवा चंडीगढ में वैद्यकीय उपचारका व्यय वहन करने को तत्पर हैं। बिहार शासन की उदासीनता और उपेक्षा के कारण क्रांतिकारी बैकुंठनाथ शुक्ला पटना के शासकीय चिकित्सालय में असमय ही प्राण छोड चुके थे । अत: बिहार शासन सक्रिय हो गया और पटना मेडिकल कॉलेज में  डॉ. मुखोपाध्याय ने दत्त का उपचार चालू किया; परंतु उनकी स्थिति बिगडती गयी; क्योंकि उन्हें सही उपचार नहीं मिल पाया था। 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया। दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था, मैने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि, मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज बनकर स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा। उन्हें सफदरजंग चिकित्सालय में भर्ती  किया गया।

पीठ में असहनीय पीडा के उपचार के लिए किए जाने वाले कोबाल्ट ट्रीटमेंट की व्यवस्था केवल एम्स में थी; परंतु वहां भी कमरा मिलने में विलंब हुआ। 23 नवंबर को पहली बार उन्हें कोबाल्ट ट्रीटमेंट दिया गया और 11 दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती किया गया। तदनंतर पता चला कि, दत्त बाबू को कैंसर है और उनके जीवन के चंद दिन ही शेष बचे हैं। भीषण पीड़ा झेल रहे दत्त अपने मुखपर वह पीड़ा कभी भी न आने देते थे। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए। छलछलाए नेत्र और मंदस्मित के साथ उन्होंने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए। बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि, मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के पास में किया जाए। लाहौर षडयंत्र अभियोग के किशोरीलाल अंतिम व्यक्ति थे, जिन्हें उन्होंने पहचाना था। उनकी बिगड़ती स्थिति देखकर भगत सिंह की मां विद्यावती को पंजाब से कार से बुलाया गया। 17 जुलाई को वह कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर बटुकेश्वर दत्त इस संसार से विदा हो गये। उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार, भारत-पाक सीमा के पास हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के निकट किया गया।

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काम की जगह बीजेपी कर रही है टोटके

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने का सपना संजोए भाजपा अपने सदस्यता अभियान को लेकर नए सिरे से सक्रिय हो गई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने निर्देश दिया है कि गत लोकसभा चुनावों में पार्टी के पक्ष में मतदान करने वाले 17.3 करोड़ मतदाताओं में से ज्यादातर लोगों से संपर्क साधा जाए। मिस्ड कॉल के जरिये सदस्यता अभियान चला रही भाजपा अपनी  साख बचाने के लिए जूझ रही है।

सदस्यता के लिए उपलब्ध कराए गए टोल फ्री नंबर पर करीब 6.5 करोड़ लोगों ने मिस कॉल तो दिए, मगर सदस्यता लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसे देखते हुए भाजपा ने 31 मार्च को खत्म हो रहे सदस्यता अभियान को एक महीने के लिए आगे बढ़ा दिया है। बीजेपी सदस्यता अभियान को मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में मिल रहे पब्लिक के ठंडे रिस्पांस ने दिग्गजों की चिंता बढ़ा दी है। सवा दो करोड़ के लक्ष्य को देखते हुए प्रदेश संगठन फिसड्डी साबित हो रहा है, नवंबर से अब तक 67 लाख सदस्यों का रजिस्ट्रेशन हो सका है। यूं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी सदस्य संख्या बढाकर इतिहास रचने की मुहिम में जुटी है, मगर मध्य प्रदेश में कई ब़डी गडबडियां सामने आ रही हैं। यहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की प्रदेश इकाई के सचिव बादल सरोज को भी भाजपा का सदस्य बना दिया गया है। खास बात यह कि उन्हें एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार सदस्य बनाया गया है।  

माकपा के बादल सरोज ने भाजपा के सदस्यता अभियान पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि भाजपा फर्जी सदस्य बनाए जा रही है। उनका कहना है कि भाजपा ने उन्हें भी अपना सदस्य बना लिया है। उन्होंने बताया कि उनके दो मोबाइल नंबर हैं, दोनों ही मोबाइल पर उनके पास संदेश आया है कि आपने भाजपा की सदस्यता ली है, इसके लिए आपको धन्यवाद। बीजेपी के अनुसार इस समय पार्टी के सदस्यों की संख्या नौ करोड़ के आसपास पहुंच गई है। जबकि सदस्यता के लिए आए मिस्ड कॉल की संख्या 15 करोड़ से ज्यादा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक दिल्ली स्थित देश के एक नामी स्कूल रेयान इंटरनेशनल स्कूल में बीजेपी का सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। टीचर और छात्रों को बीजेपी ज्वाइन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्कूल की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटो ने इस बात की पुष्टि की कि स्कूल में सदस्यता अभियान चलाया गया लेकिन यह पूरी तरह स्वैच्छिक है। किसी पर ‌इसके लिए कोई दबाव नहीं है। यद्दपि स्कूल प्रशासन कह रहा है कि यह अभियान स्वैच्छिक है लेकिन शिक्षकों और बच्चों का कहना है कि ये सच नहीं है। कुछ शिक्षकों ने तो दावा किया है कि उनकी सैलरी भी रोक ली गई, जब तक वो बीजेपी में सदस्यता न ले लें। शिक्षकों, बच्चों और उनके अभिभावकों ने भी ये बात कही है कि उन्हें वॉट्सऐप मैसेज मिले हैं जिनमें बीजेपी की सदस्यता लेने के लिए एक टोल फ्री नंबर 18002662020 दिया गया है। इस नंबर पर कॉल करने पर उसके रिप्लाई में एक मैसेज आता है, जिसमें बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता का नंबर आता है।

इसका मतलब कि आप बीजेपी के सदस्य हो गए। बीजेपी का मानना है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है लेकिन कांग्रेस की गोवा इकाई ने भारतीय जनता पार्टी के सदस्यता अभियान के विश्व रिकार्ड बनाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा राज्य में अपने चार लाख पंजीकृत सदस्य होने का दावा करती है, इसके बावजूद इसे जिला पंचायत चुनाव में इससे भी कम वोट मिले हैं। कांग्रेस सचिव दुर्गादास कामत ने सोमवार को जारी एक बयान में कहा कि भाजपा ने इस साल जनवरी में चार लाख लोगों के पार्टी से जुड़ने का दावा किया है, जबकि मार्च में हुए जिला पंचायत चुनाव में इसे जो वोट मिले हैं, वह इसकी तुलना में बहुत कम है। कामत ने कहा, “गोवा में जिला पंचायत चुनाव ने भाजपा के राष्ट्रव्यापी सदस्यता अभियान के दावों की पोल खोल दी है। भाजपा को सिर्फ 1,50,674 वोट ही मिले हैं, जबकि जनवरी में इसने अपने सदस्यों की संख्या चार लाख पहुंच जाने की बात कही थी। तो क्या इसका मतलब यह है कि भाजपा के दो लाख से अधिक सदस्यों ने अपनी ही पार्टी के लिए मतदान नहीं किया, जिसकी सदस्यता के लिए उन्होंने हस्ताक्षर किए।” हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने इसके सदस्यों की संख्या 8.8 करोड़ हो जाने और इसके विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन जाने का दावा किया था।

जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के 8.6 करोड़ सदस्यों को पार कर गई है। कामत ने कहा कि गोवा में इसके सदस्यता अभियान की धोखाधड़ी ने देशव्यापी स्तर पर बनाए जा रहे सदस्यों की संख्या को लेकर इसके झूठ का छोटा सा नमूना पेश किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर ने यह जरूर स्वीकारा की चुनाव में कम वोट मिले, लेकिन यह दावा भी किया कि राज्य में भाजपा के सदस्यों की संख्या चार लाख हो गई है। पारसेकर ने कहा, “जिला पंचायत चुनाव के अंतर्गत सभी नगरनिगम नहीं आते। इसका मतलब है कि सभी सदस्यों ने वोट नहीं किया।” वहीँ दूसरी और गुजरात बीजेपी का दावा है कि गुजरात में बीजेपी की सदस्यों की संख्या एक करोड़ हो गई है। पार्टी की गुजरात इकाई के अनुसार राज्य में उनकी सदस्यता मुहिम सफल हुई और गुजरात में सदस्यों की संख्या एक करोड़ हो गई। चुनाव में जनता से पार्टियाँ वादा करती है कि ग़रीबी ख़त्म होगी, भ्रष्टाचारियों को जेल में डाला जायेगा,मंहगाई ख़त्म होगी, सुशासन का राज होगा, बेघरों को घरों को घर मिलेगा, लेकिन गद्दी पर बैठते ही वह अमीरों की सेवा में लग जाती हैं। बीजेपी ने अपना रंग दिखा दिया है। चुनाव में फ़ायदा पहुँचाने वाले अडानी को उसने 390 एकड़ ज़मीन दे दी।

एसबीआई की एक विदेशी शाखा से एक प्रतिशत ब्याज पर छह हजार करोड़ का लोन दिला दिया गया। कच्चे तेल का दाम बढ़ाकर अंबानी को उसने करोड़ों करोड़ का लाभ पहुँचाया। कैग समिति की रिपोर्ट है कि गुजरात सरकार ने 15,000 हज़ार करोड़ का लाभ अडानी, रिलांयस और एस्सार ग्रुप को पहुँचाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने चुनावी वादे से पीछे हट चुके हैं। उन्होंने 15-15 लाख काला धन नागरिकों को देने का वादा किया था, अब वे कह रहे हैं कि मुझे मालूम ही नहीं है कि विदेशी बैंकों में काला धन कितना है? मंहगाई बढ़ती जा रही है, भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा पर नीतियां हो विफल हो रही हैं। प्रभु जी के लम्बे चौड़े दावों  बावजूद रेलों के एक्सीडेंट हो रहे हैं, सांसद तक लुट रहे हैं। स्मार्ट सिटीज बयानों तक सीमित हो गयी हैं। बहुचर्चित स्वच्छता अभियान विद्या बालन के शौचालय विज्ञापन पर अटका हुआ है। कानून व्यवस्था में कोई सुधार न होकर अपराधों में बढ़ोत्तरी हो रही है। भ्रष्टाचार पर किसी क्षेत्र में काबू नहीं पाया जा सका है। मोदी जी चौड़ा सीना कर दावा कर रहे हैं कि उनके शासन में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। श्रम क़ानून को पूँजीपतियों के हित में बदल दिया गया है। मोदी सरकार दावा कर रही है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के तहत किसानों को चार गुना मुआवजा मिलेगा, लेकिन बीजेपी शासित राज्यों में हकीकत कुछ और ही है। हरियाणा, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों को बाजार भाव का सिर्फ दो गुना मुआवजा ही मिलेगा। किसानों पर मौसम की मार पड़ी है उसपर मोदी जी सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं। मन की बात कर अपने बिल को जायज ठहरा रहे हैं। कुल मिलाकर भाजपा पिछले दस महीनों में सिर्फ कुछ टोटके भर करती रही है। जमीन पर कोई ठोस काम वह नहीं कर सकी है। इसलिए जनता का ध्यान भावनात्मक मुद्दों पर डाइवर्ट करना भाजपा की मज़बूरी है। 

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