मजीठिया मामला : सुप्रीम कोर्ट ने दैनिक भास्कर प्रबंधन को राहत देने से किया इनकार

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण और आलिया शेख के मामले में भास्कर प्रबंधन को लगा झटका

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मुंबई उच्च न्यायालय के एक आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गए दैनिक भास्कर (डी बी कॉर्प लि.) अखबार के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट ने राहत देने से इनकार करते हुए उसे वापस मुंबई उच्च न्यायालय की शरण में जाने के लिए मजबूर कर दिया है। यह पूरा मामला मुंबई में कार्यरत दैनिक भास्कर के प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह संग मुंबई के उसी कार्यालय की रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज़ शेख की मजीठिया वेज बोर्ड मामले में जारी रिकवरी सर्टीफिकेट (आरसी) से जुड़ा हुआ है… पत्रकार सिंह और रिसेप्शनिस्ट चव्हाण व शेख ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा के मार्गदर्शन एवं उन्हीं के दिशा-निर्देश में कामगार आयुक्त के समक्ष 17 (1) के तहत क्लेम लगाया था।

कामगार आयुक्त कार्यालय में यह सुनवाई पूरे एक साल तक चली.. कंपनी की एचआर टीम ने अपने वकील के जरिए वहां तरह-तरह के दांव-पेंचों का इस्तेमाल किया… यहां तक कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का सीकर (राजस्थान) और लतिका चव्हाण का मुंबई से काफी दूर सोलापुर (महाराष्ट्र) ट्रांसफर भी कर दिया गया था! इसके विरुद्ध सिंह को इंडस्ट्रियल कोर्ट से स्टे मिल गया, तब भी कंपनी ने उन्हें दफ्तर में लेने में आनाकानी की तो उन्होंने लेबर कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दायर कर दिया… दैनिक भास्कर ने अब उन्हें पुन: दफ्तर में एंट्री दे दी है। बहरहाल, लेबर ऑफिस में बकाए के मामले की चली लंबी सुनवाई के बाद सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले ने 6 जून को ऑर्डर और 1 जुलाई, 2017 को डी बी कॉर्प लि. के खिलाफ आरसी जारी करते हुए वसूली का आदेश मुंबई के जिलाधिकारी को निर्गत कर दिया था।

इस आदेश के बाद डी बी कॉर्प ने मुंबई उच्च न्यायालय में फरियाद लगाई तो उच्च न्यायालय ने 7 सितंबर, 2017 को आदेश जारी किया कि डी बी कॉर्प प्रबंधन सर्वप्रथम वसूली आदेश की 50-50 फीसदी रकम कोर्ट में जमा करे। मुंबई उच्च न्यायालय के इसी आदेश के खिलाफ डी बी कॉर्प प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट गया था, जहां उसे मुंह की खानी पड़ी है… सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी प्रबंधन को राहत देने से इनकार करते हुए वापस मुंबई हाई कोर्ट जाने को विवश कर दिया। इसके बाद कंपनी की ओर से 25 अक्टूबर को मुंबई उच्च न्यायालय को सूचित कर प्रार्थना की गई है कि वह धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण और आलिया शेख के बकाए की 50-50 फीसदी राशि आगामी 6 सप्ताह के अंदर जमा कर देगी…

यह राशि क्रमश: 9 लाख, 7 लाख और 5 लाख है। ज्ञात रहे कि आरसी मामले में जिलाधिकारी द्वारा वसूली की प्रक्रिया बिल्कुल उसी तरह की जाती है, जैसे जमीन के बकाए की वसूली की जाती है… इसमें कुर्की तक की कार्यवाही शामिल है! मुंबई उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई जस्टिस एस जे काथावाला के समक्ष चल रही है, जबकि उनके समक्ष इन तीनों का पक्ष वरिष्ठ वकील एस पी पांडे रख रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया मांगने पर भाजपा विधायक ने रिपोर्टर को अखबार के दफ्तर में घुसने से रोका, मामला पहुंचा पुलिस स्टेशन

मुंबई : खुद को उत्तर भारतीयों का रहनुमा समझने वाले भाजपा विधायक और हमारा महानगर अखबार के मालिक आरएन सिंह के अखबार में उत्तर भारतीय कर्मचारियों का सबसे ज्यादा शोषण किया जा रहा है। इस अखबार के सीनियर रिपोर्टर (क्राइम) केके मिश्रा को विधायक के पालतू गार्ड हमारा महानगर के दफ्तर में पिछले कुछ दिनों से नहीं घुसने दे रहे हैं।

कृष्णकांत सभापति मिश्रा उर्फ केके मिश्रा की गलती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने विधायक जी से माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपने वेतन वृद्धि की मांग कर ली। हमारा महानगर अखबार के मालिक और भाजपा विधायक आर एन सिंह को ये बात नागवार गुजरी। उन्होंने अपनी निजी सुरक्षा कंपनी के गार्डों को हिदायत दे दिया कि केके मिश्रा को किसी भी तरह ऑफिस में घुसने मत दो।

उल्लेखनीय है कि केके मिश्रा पहले भी इस अखबार में काम कर चुके हैं और उसके बाद इस्तीफा देकर दूसरे अखबार में चले गए थे। मगर 2015  में अखबार मालिक आरएन सिंह ने फोन कर केके मिश्रा को वापस बुलाया और भरोसा दिया था कि अच्छा भुगतान किया जाएगा। मगर हुआ उल्टा। फिलहाल केके मिश्रा को विधायक जी के आदेश पर ऑफिस में नहीं आने दिया जा रहा है। के के मिश्रा ने  9 नवंबर 2017 को पुलिस स्टेशन और कामगार विभाग में विधायक जी के खिलाफ शिकायत दी है। केके मिश्रा के इस कदम से हमारा महानगर प्रबंधन में हड़कम्प का माहौल है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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म्हाडा लॉटरी : मुंबई के २२ पत्रकारों को मिले फ्लैट… पर इनमें कितने हैं रीयल जर्नलिस्ट

मुंबई में अपना घर होने का सपना पालने वाले लोगों में पत्रकारों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। म्हाडा के ९१९ घरों की लॉटरी शुक्रवार को बांद्रा स्थित रंग शारदा में घोषित की गई। इसमें २२ फ्लैट पत्रकारों के लिये आरक्षित रखे गये थे। ८१९ घरों के लिए ६५००० लोगों ने अपनी किस्मत आजमाई थे, लेकिन सबका सपना पूरा नहीं हो सका। उन्हें अगली लॉटरी तक इंतजार करना पड़ेगा।

जिन २२ पत्रकारों के नाम म्हाडा ने घोषित किया है, उनमें कई नाम ऐसे भी हैं जो संभवत: पहली बार सुनाई दिए हैं। फिलहाल कुछ लोगों ने ये भी संदेह जताया है कि पत्रकार कोटा के नाम पर कुछ ना कुछ झोल हुआ है जिसकी जांच की जानी चाहिये। फिलहाल आरटीआई डालकर पत्रकारों को आवंटित फ्लैट का पूरा डिटेल मंगाया जा रहा है  ताकि दूध का दूध पानी का पानी हो सके। आश्चर्य की बात यह है कि  म्हाडा  ये भी जानकारी नहीं देती कि जिन पत्रकारों को फ्लैट दिये जा रहे हैं वे किस समाचार पत्र या चैनल में काम करते हैं। अगर ये जानकारी दे तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाया जा सकता है।  आप भी जानिये किस किस पत्रकारों को म्हाडा की लाटरी में मिले हैं फ्लैट और कहां-कहां मिलेंगे उनको ये फ्लैट….

Mhada Lottery – M17 – MUMBAI BOARD LOTTERY 2017 – Winner List

Scheme: 334 {PRATIKSHA NAGAR – SION} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170046530 MR KAPIL RAMKRISHNA KELKAR M-11, E, 3, 301

Scheme: 267-C {SHIMPOLI, KANDIWALI (WEST)} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170047337 MRS VIDYA RAJESH KUMAR 1, B, 6, 604

Scheme: 337 {KANNAMWAR NAGAR, VIKROLI} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170067892 MR NITYANAND SHARMA 10, C, 2, 204
2 1170014334 MR MAHESH VISHWANATH VICHARE 10, C, 6, 601
3 1170034691 MR PRAMOD DEVRAM GARUD 9, B, 4, 402
4. 1170026763 MRS PRANALI CHANDRAKANT TALAVANEKAR 4 9, A, 6, 604

Scheme: 338 {TUNGWA, POWAI} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170067137 MR ASHUTOSH SURESH JOSHI 1, A, 5, 502
2 1170059013 MR MANAV MANOHAR MANGLANI 1, A, 11, 1103
3 1170068122 MR RAJEEV TUKARAM KULKARNI 1, A, 17, 1704
4 1170015885 MR SACHIDANAND SHIVRAJ BELURE 1, A, 20, 2004

Scheme: 339 {SIDDHARTHA NAGAR – 4, GOREGAON (WEST)} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170008779 MRS SNEHAL SADASHIV KERKAR 1, -, 5, 503
2 1170064335 MR RITVICK ARUN BHALEKAR 1, -, 17, 1704

Scheme: 340 {GUEST HOUSE PLOT, UNNATNAGAR, GOREGAON (WEST)} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170053004 MS RESHMA RAMCHANDRA AMBEKAR GHP-1, -, 10, 1001

Scheme: 342 {GUEST HOUSE PLOT, UNNATNAGAR, GOREGAON (WEST)} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170064762 MR RITVICK ARUN BHALEKAR GHP-1, -, 3, 306

Scheme: 344 {CHARKOP KANDIVALI ( WEST) SECTOR – VIII} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170066155 MR BHAGWAN NANA GHOLAP PLOT NO. 3, B, 3, 301
2 1170041033 MR NAGESH SAWALARAM PATIL PLOT NO. 3, C, 10, 1001

Scheme: 345 {CHARKOP KANDIVALI ( WEST) SECTOR – VIII,} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170054501 MR PRAVIN NAMDEO MARGALE PLOT NO. 3, B, 3, 303

Scheme: 346 {CHARKOP KANDIVALI ( WEST) SECTOR – VIII,} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170041052 MR NAGESH SAWALARAM PATIL PLOT NO. 3, B, 3, 302

Scheme: 348 {CHARKOP KANDIVALI ( WEST) SECTOR – VIII,} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170022501 MR RAMESH DAULATRAO JAIBHAYE PLOT NO. 3, A, 5, 501

Scheme: 349 {CHARKOP KANDIVALI ( WEST) SECTOR – VIII,} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170075410 MRS SARASWATI SHRIKANT PLOT NO. 3, A, 3, 303

Scheme: 302-A {MANKHURD} Category: JR {JOURNALIST}
Priority No. Application No. Name Flat No
1 1170001936 MRS HAJRA MUKHTARAHMED ANSARI 3, C, 6, 602

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अब जो क्लेम करेगा, वह हार हाल में जीतेगा : एडवोकेट उमेश शर्मा

सुप्रीम कोर्ट के टाइम बाउण्ड के निर्णय का स्वागत… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में देश भर के मीडियाकर्मियों का केस लड़ रहे जाने-माने एडवोकेट उमेश शर्मा ने 13 अक्टूबर को सुप्रीमकोर्ट द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड मामले को श्रम न्यायालय और कामगार विभाग द्वारा टाइम बाउंड करने के निर्णय का स्वागत किया है और कहा है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने वाले मीडियाकर्मियों की हर हाल में जीत तय है, वह एक निश्चित समय के भीतर। इससे एक बार फिर साबित हो गया है कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनको ही मिलेगा जो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(1) के तहत क्लेम लगाएंगे।

एडवोकेट उमेश शर्मा ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट का आदेश साफ संकेत देता है कि मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने का दो रास्ता है। एक तो ये कि मालिक अपने आप वेज बोर्ड की सिफारिशों को ईमानदारी से लागू कर दें जो कि असंभव है। ऐसे में दूसरा और आखिरी रास्ता बचता है 17 (1) का क्लेम लगाना। उमेश शर्मा ने साफ कहा है कि जो भी मीडियाकर्मी क्लेम लगाएंगे, उनकी जीत तय है।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उमेश शर्मा ने कहा कि मैं शुरू से ही इस मामले को टाइम बाउंड कराने और इस बाबत एक कमेटी बनाने पर जोर दे दे रहा था। आपको बता दें कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जस्टिस माजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता/दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए। गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। एडवोकेट उमेश शर्मा ने सभी मीडियाकर्मियों से मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने का निवेदन किया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर ये है :

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निष्ठुर एचटी प्रबंधन ने नहीं दिया मृतक मीडियाकर्मी के परिजनों का पता, अब कौन देगा कंधा!

नई दिल्ली। अपने धरनारत कर्मी की मौत के बाद भी निष्ठुर हिन्दुस्तान प्रबंधन का दिल नहीं पिघला और उसने दिल्ली पुलिस को मृतक रविन्द्र ठाकुर के परिजनों के गांव का पता नहीं दिया। इससे रविन्द्र को अपनों का कंधा मिलने की उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है।

न्याय के लिए संघर्षरत रविन्द्र के साथियों का आरोप है कि संस्थान के गेट के बाहर ही आंदोलनरत अपने एक कर्मी की मौत से भी प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और उसने प्रेस परिसर में शुक्रवार को आई दिल्ली पुलिस को रविन्द्र के गांव का पता मुहैया नहीं कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन के पास रविन्द्र का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, उसने जानबूझकर बाराखंभा पुलिस को एड्रेस नहीं दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए भर्ती होने वाले कर्मी का HR पूरा रिकॉर्ड रखता है। उस रिकॉर्ड में कर्मी का स्थायी पता यानि गांव का पता भी सौ प्रतिशत दर्ज किया जाता है। रविन्द्र के पिता रंगीला सिंह भी हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे। ऐसे में उनके गांव का पता न होने का तर्क बेमानी है। रंगीला सिंह भी इसी संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत थे, जबकि रविन्द्र डिस्पैच में।

रविन्द्र के साथियों ने बताया कि रविन्द्र अपने बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। बस इतना ही पता है कि वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का रहनेवाला है और उसका घर पंजाब सीमा पर पड़ता है। वह दिल्ली में अपने पिता, भाई-भाभी आदि के साथ 118/1, सराय रोहिल्ला, कच्चा मोतीबाग में रहता था। कई साल पहले उसका परिवार उस मकान को बेचकर कहीं और शिफ्ट हो गया था। रविन्द्र की मौत के बाद जब उनके पड़ोसियों से संपर्क किया तो वे उनके परिजनों के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए। उनका कहना था कि वे कहां शिफ्ट हुए, उसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है। रविन्द्र के परिजनों ने शिफ्ट होने के बाद से आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। रविन्द्र के संघर्षरत साथियों का कहना है प्रबंधन के असहयोग के चलते कहीं हमारा साथी अंतिम समय में अपने परिजनों के कंधों से महरूम ना हो जाए।

उन्होंने देश के सभी न्यायप्रिय और जागरूक नागरिको से रविन्द्र के परिजनों का पता लगाने के लिए इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर और फारवर्ड करने की अपील की। उनका कहना है कि अखबार कर्मी के दुःखदर्द को कोई भी मीडिया हाउस जगह नहीँ देता, ऐसे में देश की जनता ही उनकी उम्मीद और सहारा है। यदि किसी को भी रविन्द्र के परिजनों के बारे कुछ भी जानकारी मिले तो उनके इन साथियों को सूचना देने का कष्ट करें…
अखिलेश राय – 9873892581
महेश राय – 9213760508
आरएस नेगी – 9990886337

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश- ‘मजीठिया वेज बोर्ड के सभी प्रकरण 6 महीने के भीतर निपटाएं’

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता / दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए।

गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। हालांकि स्पष्टीकरण की याचिका जुलाई में ही दायर कर दी गई थी मगर इस पर फैसला आज आया जिससे मीडियाकर्मियों में एक बार फिर खुशी की लहर है।

आप सभी मीडियाकर्मियों से अपील है कि अपना बकाया हासिल करने के लिेए श्रम विभाग में क्लेम जरूर डालें अन्यथा आप इससे वंचित रह सकते हैं। अब अखबार मालिक किसी भी तरह से आनाकानी नहीं कर सकेंगे और मामले को लंबा नहीं खींच सकेंगे। अगर वे ऐसा करते हैं तो इस बार निश्चित रूप से विलफुल डिफेमेशन के दोषी करार दिए जाएंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
संपर्क : 9322411335 , shashikantsingh2@gmail.com

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‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ अखबार ने अपने कर्मचारियों में मजीठिया वेज बोर्ड का का बकाया एरियर वितरित किया

देश के प्रमुख बिजनेस समाचार पत्र ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से खबर आ रही है कि इस अखबार ने अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया लाखों रुपये का एरियर दे दिया है। कर्मचारियों को पांच से आठ लाख रुपये तक उनका बकाया एरियर देकर वेतन वृद्धि का भी काम प्रबंधन ने किया है। हालांकि ये लाखों रुपये का एरियर सिर्फ उन्हीं मीडिया कर्मियों को दिया गया है जिनका वेतन कम था।

जिनका वेतन ज्यादा था, उनको इसका लाभ नहीं मिला है। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए इस अखबार के 12 संस्करणों में कम वेतन पाने वाले मीडियाकर्मियों को पांच से आठ लाख रुपये का उनका बकाया दिया गया है। हालांकि मजीठिया के जानकार इस दिए गए एरियर को ऊंट के मुंह में जीरा बता रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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देश के 745 अखबारों ने नहीं लागू किया मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश

सबसे ज्यादा पंजाब और झारखण्ड में ठुकराया गया सुप्रीम कोर्ट का आदेश, महाराष्ट्र चौथे, उड़ीसा पांचवे स्थान पर फिसड्डी, मध्य प्रदेश के एक भी अख़बार ने नहीं लागू किया वेज बोर्ड

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश को देश भर के 745 अखबार मालिकों ने खुलेआम हवा में उड़ा दिया और दम्भ के साथ सुप्रीमकोर्ट की ओर मुंह करके अट्टाहास कर रहे हैं। ये जता रहे हैं, देख लो सुप्रीमकोर्ट, तुम नहीं, हम सबसे बड़े हैं। माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना करने के मामले में नंबर वन पर है पंजाब।

यहाँ 531 अखबारों में सिर्फ 4 अखबारों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह लागू किया जबकि 93 अखबारों ने इस वेज बोर्ड की सिफारिश को नहीं लागू किया और इस तरह माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना किया। यहाँ 434 ऐसे अखबार हैं जो एक आदमी द्वारा संचालित हैं। ये विस्फोटक जानकारी भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय नयी दिल्ली के सूत्रों ने मजीठिया क्रांतिकारी और पत्रकार तथा आर टी आई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह को उपलब्ध कराई है।

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू न करने के मामले में दूसरे नंबर पर है झारखंड। यहाँ 154 अखबारों में सिर्फ 2 अखबार संस्थानों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया जबकि 91 ऐसे अखबार हैं जिन्होंने इस सिफारिश को नहीं लागू किया। यहाँ 61 ऐसे अखबारों को मजीठिया के दायरे से बाहर रखा गया है जो एक आदमी द्वारा संचालित होता है। माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना के मामले में मध्य प्रदेश तीसरे नम्बर पर है। यहाँ 140 अखबारों का प्रकाशन होता है। यहाँ एक भी अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया। सिर्फ 3 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया वो भी सिर्फ आंशिक रूप से जबकि 72 अखबारों ने इस सिफारिश को नहीं लागू किया। यहाँ 65 अखबार एक आदमी द्वारा संचालित है।

माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना करने के मामले में महाराष्ट्र चौथे नंबर पर है। यहाँ सबसे ज्यादा 2762 अखबार प्रकाशित होते हैं जिनमे 43 अखबार मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह लागू कर दिया। सूत्र बताते हैं कि इन 43 अखबार मालिकों ने भी फर्जीवाड़ा किया है। यहाँ 21 अखबार ऐसे हैं जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश आंशिक रूप से लागू किया है जबकि 65 अखबार मालिकों ने वेज बोर्ड की सिफारिश नहीं लागू किया। महाराष्ट्र में 2633 अखबार एक आदमी द्वारा संचालित है।

इस सूची में पांचवे नंबर पर आता है उड़ीसा यहाँ 179 अख़बारों का प्रकाशन होता है जिसमे सिर्फ 14 अखबारों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया जबकि 62 अखबारों ने इसे पूरी तरह ठुकरा दिया। इस सूची पर नजर डाले तो आंध्र प्रदेश ऐसा एकमात्र स्थान है जहाँ सभी 27 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दिया है। देश की राजधानी दिल्ली से 81 अखबार निकलते हैं जिसमे 10 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह, 15 ने आंशिक रूप से लागू किया जबकि 29 अखबार मालिकों ने इस वेज बोर्ड की सिफारिश को नहीं माना।

बिहार से 44 अखबार निकलते हैं। यहाँ 12 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दिया जबकि 32 अख़बारों ने इस वेज बोर्ड को नहीं माना। उत्तर प्रदेश से 70 अखबारों का प्रकाशन होता है। यहाँ 24 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह लागू कर दिया जबकि 4 ने आंशिक रूप से लागू किया। यहाँ 39 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश नहीं माना। राजस्थान से सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा आया है। यहाँ 893 अखबारों में से 28 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दिया है। उत्तराखंड में सिर्फ एक अखबार ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया है। गुजरात में 60 अख़बारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322412335

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भास्कर ब्यूरो चीफ अनिल राही बाहर हुए, सुनील कुकरेती और उमेश कुमार उपाध्याय का ट्रांसफर

देश के सबसे चर्चित समाचार पत्रों में से एक माने जाने वाले दैनिक भास्कर अखबार में कर्मचारियों का खूब शोषण होता है। अगर साफ़-साफ़ कहें तो दैनिक भास्कर में किसी की भी नौकरी सुरक्षित नहीं है, भले ही वह कितना भी बड़ा तुर्रम खां क्यों ना हो, तो गलत न होगा! दैनिक भास्कर के मुम्बई के एंटरटेनमेंट ब्यूरो से खबर आ रही है कि यहाँ करीब 22 साल तक इस अखबार में नौकरी करने वाले ब्यूरो चीफ अनिल राही को कंपनी ने एक ही झटके में बिना ठोस नोटिस दिए बाहर का रास्ता दिखा दिया।

ज़रा सोचिए, इस अखबार के लिए अपने जीवन का अमूल्य समय (22 साल) देने वाले अनिल राही को उम्र (करीब 57 वर्ष) के इस पड़ाव में डी बी कॉर्प ने बाहर का रास्ता दिखा दिया तो दूसरों का ये कंपनी क्या कर सकती है। आपको बता दें कि अनिल राही ने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस को चेंज कर एक फोटो अपनी कुर्सी की डाली है, जिस पर वे 22 साल तक बैठते रहे। साथ ही उन्होंने अपनी केबिन तथा ऑफिस के अंदर गलियारे की तस्वीरें डालकर साफ़ लिखा है- ‘मेरा आश्रय, मेरा स्वर्ग और मेरा नर्क भी’। अनिल राही को बाहर का रास्ता दिखाने पर मुम्बई के फिल्म पत्रकार भी सकते में हैं और वे भास्कर प्रबंधन की जम कर निंदा कर रहे हैं !

मुम्बई के एंटरटेनमेंट ब्यूरो से ही खबर आ रही है कि यहाँ सीनियर रिपोर्टर सुनील कुकरेती का कंपनी ने ट्रांसफर कर दिया है। हालांकि सुनील को मुंबई के ही दूसरे कार्यालय (बांद्रा-कुर्ला कॅाम्प्लेक्स) में ट्रांसफर किया गया है, जहां अभी तक मार्केटिंग और फाइनेंस डिपार्टमेंट का ही स्टाफ बैठता आया है, संपादकीय विभाग का कोई भी नहीं। वैसे एंटरटेनमेंट ब्यूरो के ही रिपोर्टर-कम-सब एडिटर उमेश कुमार उपाध्याय का भी कंपनी ने ट्रांसफर कर दिया है।

उमेश को मुम्बई से रांची भेजा गया है। खबर तो यहाँ तक है कि उमेश जब एच आर मैनेजर अक्षता करंगुटकर से अपने ट्रांसफर की वजह पूछने गए थे, तब उन्हें फ़िल्मी स्टाइल में जवाब दे दिया गया कि मेरी मर्जी। यहां बताना जरूरी है कि इन तीनों ही महानुभावों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपने बकाये वेतन के लिए क्लेम नहीं लगाया था। अब इन पर कंपनी ने गाज गिरा दी है।

यही नहीं, खबर तो ये भी है कि दैनिक भास्कर की पोलिटिकल यूनिट में भी छंटनी और ट्रांसफर की गाज जल्द गिरने वाली है। मराठी अखबार दिव्य मराठी से प्रमोद चुंचुवार सरीखे सीनियर और सुलझे पत्रकार को जिस तरह जलील करके बाहर का रास्ता दिखाया गया, उससे स्पष्ट है कि यहां किसी को भी अपनी अगले दिन की नौकरी का भरोसा नहीं है। बेशक, आप खुद को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस का लाडला बताएं या समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का चहेता, आप अपनी तस्वीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हाथ मिलाते दिखाएं, लेकिन आप बचने वाले नहीं हैं।

गौरतलब है कि देश भर में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के तहत बकाये का क्लेम सबसे ज्यादा दैनिक भास्कर और डी बी कॉर्प के ही खिलाफ लगाए गए हैं। मुंबई में प्रिंसिपल करेस्पॅान्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, रिसेप्शनिस्ट लतिका चव्हाण और आलिया इम्तियाज़ शेख के अलावा आईटी विभाग के वरिष्ठ अॅस्बर्ट गोंजाल्विस ने भी डी बी कॉर्प प्रबंधन के खिलाफ जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में विभिन्न अदालतों सहित सुप्रीम कोर्ट में भी शिकायत कर रखी है।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट

9322411335

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश ठेंगे पर रखते हैं अखबार मालिक, विशाखा समिति कहीं पर गठित नहीं

मुंबई : देश भर के अखबार मालिक माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठेंगे पर रखते हैं. ये खुद को न्याय, संविधान और कानून से उपर मानते हैं. इसीलिे ये जिद कर के बैठे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं मानेंगे तो नहीं मानेंगे। पहले जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का आदेश अखबार मालिकों ने नहीं माना और अब माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा निजी और सरकारी संस्थानों में काम करने वाली महिला कर्मचारियों के सम्मान से जुड़ी विशाखा समिति की स्थापना के लिये दिये गये आदेश को भी मानने से मुंबई के अखबार मालिकों ने मना कर दिया है.

साफ कहें तो सुप्रीमकोर्ट के आदेश को एक बार फिर से ठेंगा दिखा दिया है. ये खुलासा हुआ है आरटीआई के जरिये. मुंबई की जानी महिला पत्रकार और एनयूजे की महाराष्ट्र की महासचिव शीतल करंदेकर ने जिलाधिकारी कार्यालय (मुंबई शहर) की जनमाहिती अधिकारी से आरटीआई के जरिये १८ जनवरी २०१७ को जानकारी मांगी थी कि माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार मुंबई शहर के कितने अखबार मालिकों ने अपने यहां विशाखा समिति की सिफारिश लागू की है, इसकी पूरी जानकारी उपलब्ध कराईये। अगर इन अखबार मालिकों ने अपने यहां ये सिफारिश नहीं लागू की है तो उनके खिलाफ क्या क्या कार्रवाई की गयी, उसका पूरा विवरण दीजिये।

शीतल करंदेकर की इस आरटीआई को जिलाधिकारी और जिलादंडाधिकारी कार्यालय मुंबई शहर ने ९ फरवरी २०१७ को जिला महिला व बाल विकास अधिकारी कार्यालय को भेज दिया। जिला महिला व बाल विकास अधिकारी कार्यालय मुंबई की जनमाहिती अधिकारी तथा जिला महिला व बाल विकास अधिकारी एन.एम. मस्के ने २९ मार्च २०१७ को भेजे गये जबाव में शीतल करंदेकर को जानकारी दी है कि उनके कार्यालय में इससे संबंधित कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

यानि साफ तौर पर कहें तो जिला महिला व बाल विकास अधिकारी कार्यालय में भी ये जानकारी नहीं होना कि कितने अखबारों ने विशाखा समिति की सिफारिश लागू किया है, साबित करता है कि असल में अखबार मालिकों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कतई गंभीरता से नहीं लिया है. इसी कारण विशाखा समिति का गठन नहीं किया, न ही इससे संबंधित जानकारी संबंधित विभाग को दी. आपको बता दें कि यह रोजगार प्रदाता का दायित्व है कि वह यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निवारण के लिए कंपनी की आचार संहिता में विशाखा समिति के गठन को जोड़े. मीडिया हाउसों को अनिवार्य रूप से विशाखा समिति के हिसाब से शिकायत समितियों की स्थापना करनी चाहिए, जिसकी प्रमुख महिलाओं को बनाया जाना चाहिए.

शशिकांत सिह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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हिंदी दैनिक नवभारत के नयी मुंबई आफिस में मीडियाकर्मियों को हगना-मूतना मना है…

मामला पहुंचा पुलिस आयुक्त तक… महाराष्ट्र सहित मध्य प्रदेश के प्रमुख हिंदी दैनिक नवभारत से खबर आ रही है कि नवभारत के नयी मुम्बई स्थित कार्यालय में कर्मचारियों का जमकर शोषण किया जा रहा है। हालात ये हो गए हैं कि इस अखबार में पहली मंजिल पर बने एक मात्र शौचालय का इस्तेमाल करने से भी कर्मचारियों को रोक दिया गया है। उस शौचालय को नवभारत के डायरेक्टर के लिए रिजर्व कर कर्मचारियों को इसकी सूचना दे दी गयी है।

सूत्र बताते हैं कि वर्ष 2005 में नवभारत का संपादकीय विभाग मुम्बई से नयी मुम्बई आया और तब से लगभग 12 साल हो गए, नवभारत के कर्मी इस शौचालय का इस्तेमाल कर रहे थे। मगर अब उसे डायरेक्टर के लिए रिजर्व कर दिया गया है। नवभारत प्रबन्धन पर ये भी आरोप है कि वह अपने कर्मचारियों को समय से वेतन नहीं दे रहा है। वेतन मांगने पर बाहर निकालने की धमकी दी जा रही है। साथ ही यहां, कैंटीन सुविधा और चाय सुविधा तक नहीं है। कर्मचारियों के बाहर जाने पर भी रोक है।

नरक से बदतर जिंदगी जी रहे इन कर्मचारियों ने इस मामले की लिखित शिकायत पुलिस और तमाम सरकारी महकमों से की है। आपको बता दें कि यहाँ कई कर्मचारियों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की मांग सरकारी महकमों को पत्र लिखकर की है। आरोप तो यहाँ तक है कि नवभारत में छींकने पर भी रोक है। अगर किसी ने डायरेक्टर के सामने छींक दिया तो उसे जमकर डांट सुननी पड़ती है।

पेश है नवभारत कर्मचारियों द्वारा पुलिस विभाग को लिखे गए पत्र का विवरण

दिनांक-14 अप्रैल, 2017
नवभारत भवन,
प्लाट नम्बर; 13,
सेक्टर-8, सानपाड़ा ((पूर्व),
नवी मुंबई, महाराष्ट्र

सेवा में,
मा. पुलिस आयुक्त,
पुलिस आयुक्तालय,
नवी मुंबई

विषय-‘नवभारत’ के निदेशक (संचालन) श्री डी. बी. शर्मा द्वारा कर्मचारियों की मानसिक प्रताड़ना के सन्दर्भ में

आदरणीय महोदय,
हम ‘नवभारत प्रेस लिमिटेड’ के कर्मचारी विगत कई वर्षों से श्री डी. बी. शर्मा (निदेशक-संचालन) से मानसिक रूप से लगातार प्रताड़ित किये जा रहे हैं। श्री शर्मा जी द्वारा कैंटीन, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित किये जाने के साथ-साथ कर्मचारियों को लगातार नौकरी से निकालने की धमकी भी दी जा रही है। इससे कई कर्मचारी गहरे अवसाद की स्थिति में पहुँच गए हैं।

महोदय, हालात अब बेहद संवेदनशील हो गए हैं। निदेशक महोदय अब तो अपने प्रबन्ध सहयोगियों के मार्फत कर्मचारियों को शारीरिक रूप से ‘ठीक’ करने की धमकी भी देने लगे हैं। अखबारी कार्यालय में कंपनी के सर्वोच्च पदस्थ अधिकारी का यह व्यवहार चौंकाता है। विगत कुछ दिनों से निदेशक महोदय द्वारा कंपनी के भीतर हिंसक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसका बेहद अफ़सोस है और किसी अनहोनी की आशंका भी है। अतः आज हम यह शिकायत करने मजबूर हुए हैं।

हम आपका ध्यान निम्न मुद्दों की ओर आकृष्ट कराना चाहते हैं-

1. प्रथम मजले पर स्थित एकमात्र शौचालय को निदेशक महोदय ने एक दिन अचानक ‘ओनली फॉर डायरेक्टर’ की तख्ती लगवा कर ताला लगवा दिया।

2. कर्मचारियों के लिए कोई कैंटीन की व्यवस्था नहीं है और चाय/नाश्ते के लिए बाहर जाने पर भी पाबंदी लगा दी गयी है।

3. इतना ही नहीं, दवाई जैसी आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी के लिए बाहर जाने की इजाज़त तक नहीं दी जाती।

4. कर्मचारियों के बुनियादी अधिकारों का हनन करते हुए न उनके नाश्ते का समय तय किया गया है और न ही भोजन का।

5. अर्थात, एक बार कंपनी में प्रवेश किया तो आप आवश्यक कार्य के लिए 10-15 मिनट भी बाहर नहीं जा सकते। दफ्तर को एक किस्म के क़ैदख़ाने में ही तब्दील कर दिया गया है।

6. इसके अलावा छुट्टियाँ मांगने पर धमकाना और लाख अनुनय-विनय के बाद बमुश्किल कुछेक दिनों की अपर्याप्त छुट्टी देना।

7. समय पर तनख्वाह न देना और इस बाबत पूछने पर नौकरी से निकालने की धमकी देना।

8. कर्मचारियों को प्रताड़ित करने के लिए उनके विभाग बदल देना।

9. कर्मचारियों पर निजी काम के लिए दवाब डालना।

हद्द तो यह है कि-

10. ग़र कभी किसी कर्मचारी ने छींक भी दिया, तो उसे निदेशक महोदय सरेआम बेइज़्ज़त करते हैं कि क्यों छींका।

इस तरह की कई घटनाएं हैं, जिसके चलते कर्मचारी मानसिक रूप से बुरी तरह प्रताड़ित हैं और अब निदेशक महोदय द्वारा बनाये जा रहे हिंसक माहौल से स्थिति तनावपूर्ण भी हो गयी है। ऐसी स्थिति में किसी अनहोनी की आशंका है। अगर इस तरह के हिंसक माहौल में कोई वारदात होती है, तो उसके लिए निदेशक (संचालन) श्री डी. बी. शर्मा जी एवं प्रबंधन ज़िम्मेदार होगा।

महोदय, प्रताड़नाओं को लंबे समय से झेलते कर्मचारी अब आपकी शरण में हैं आपसे न्याय की गुहार लगा रहे हैं।

धन्यवाद!

प्रतिलिपि-

1. मा. मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र सरकार
2. मा. श्रम मंत्री , महाराष्ट्र सरकार
3. मा. कामगार आयुक्त, वागले इस्टेट, ठाणे
4. मा. आयुक्त, मानवाधिकार आयोग, महाराष्ट्र राज्य
5. मा. उपायुक्त, वाशी पुलिस स्टेशन, नवी मुंबई
6. मा. अध्यक्ष, बृहन्मुंबई यूनियन ऑफ़ जॉर्नलिस्ट, डी. एन. रोड, मुम्बई
7. मा. अध्यक्ष, महाराष्ट्र मीडिया एम्प्लॉयस यूनियन, डी. एन. रोड, मुम्बई

(कर्मचारी नाम व हस्ताक्षर संलग्न)

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त ने दिए ‘प्रात:काल’ के फर्जीवाड़े की जांच के आदेश

महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त ने मुंबई सहित देश के पांच अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक प्रात:काल द्वारा अपने यहाँ कार्यरत पत्रकारों, गैर-पत्रकारों और अन्य विभागों के कर्मचारियों से सम्बंधित गलत एफिडेविट देने की शिकायत पर जाँच करने के आदेश दिए हैं। जांच का दायित्व कामगार उपायुक्त श्री बागल को सौंपा गया है। हिंदी दैनिक प्रात:काल द्वारा श्रम आयुक्त को दिए एफिडेविट में फर्जीवाड़े के पुख्ता सबूत मिले हैं। इस जांच के आदेश के बाद ‘प्रात:काल’ प्रबंधन को फर्जी एफिडेविट देने के मामले में जेल भी हो सकती है।

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे ‘मजीठिया संघर्ष मंच’ के पदाधिकारियों ने 13 अप्रैल 2017 को आरटीआई एक्सपर्ट पत्रकार शशिकांत सिंह के नेतृत्व में महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त यशवंत केरूरे से उनके कार्यालय में जाकर मुलाकात की और प्रात:काल हिन्दी दैनिक द्वारा दिए गए फर्जी एफिडेविट मामले को उनके संज्ञान में लाया। साथ ही इसी समाचार पत्र के मुख्य उपसंपादक द्वारा दिए गए शिकायती पत्र की प्रति सौंपी। इस शिकायती पत्र के साथ एफिडेविट फर्जी होने के पूरे पुख्ता सबूत दिए गए। जिसके बाद कामगार आयुक्त ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल जांच करने का आदेश उपायुक्त श्री बागल को दिया। आपको बता दें कि प्रात:काल द्वारा दिए गए एफिडेविट में निम्नलिखित फजीर्वाड़े के पुख्ता सबूत मिले हैं-

1- प्रात:काल ने अपने एफिडेविट में बताया है कि उसके पास कुल आठ कर्मचारी हैं, जिसमें दो श्रमिक पत्रकार एक प्रधान संपादक सुरेश गोयल और एक स्थानीय संपादक महीप गोयल हैं। एक डीटीपी हेड और 5 प्रबंधन के सदस्य हैं। जबकि प्रात:काल समाचार पत्र के कार्यरत पत्रकार के रूप में शिरीष गजानन चिटनिस प्रतिनिधि (मुंबई/१४१६), महीप गोयल-स्थानीय संपादक (मुंबई/१४१७), विष्णु नारायण देशमुख छायाचित्रकार (मुंबई/१६७४), हरिसिंह राजपुरोहित चीफ कोरेस्पोंडेंट  (मुंबई/१८१९) को महाराष्ट्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अनुभवी पत्रकारों को दिया जाने वाला अधिस्वीकृति पत्र (एक्रिडेशन कार्ड) प्रदान किया गया है। यह पत्र संबंधित संस्थान द्वारा प्रदत्त दस्तावेजों (जैसे- नियुक्ति पत्र, अनुभव प्रमाण, सेलरी स्लीप, पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, संकलित / लिखित समाचारों एवं फोटो आदि कटिंग, शैक्षणिक डाक्यूमेंट्स आदि) की पुष्टि तथा पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही जारी किए जाते हैं।

2- मुम्बई श्रम आयुक्त को दिए एफिडेविट में प्रात:काल अखबार ने शिरीष गजानन चिटनीस और हरिसिंह राजपुरोहित को अपना कर्मचारी ही नहीं बताया है जबकि इन्हें अपना प्रतिनिधि दिखाकर सरकार से इन दोनों को एक्रिडेशन दिलवाया है। 12 पृष्ठों के इस अखबार में न तो कोई रिपोर्टर, न कोई समाचार संपादक, मुख्य उप संपादक, उपसंपादक, प्रूफ रीडर और न ही कोई दूसरा डीटीपी आॅपरेटर बताया गया है। एफिडेविट के अनुसार ‘प्रात:काल’ में आउट सोर्सिंग और ठेके से काम भी नहीं कराया जाता है।

3- ‘प्रात:काल’ द्वारा श्रम आयुक्त कार्यालय में दिए गए एफिडेविट में विष्णु नारायण देशमुख को मैनेजर बताया गया है तथा उनकी नियुक्ति तिथि १२.११.२०१४ को बताई गई है। जबकि ‘प्रात:काल’ ने ही इनको अपने यहां छाया चित्रकार बताकर 2013 से पहले ही अधिस्वीकृत पत्र (एक्रिडेशन कार्ड नं.- मुंबई/१६७४) दिलवाया है।

4- प्रात:काल ने श्रम आयुक्त कार्यालय में एफिडेविट देकर बताया है कि उस समाचार पत्र के मालिक 72 वर्षीय सुरेश गोयल हैं। आश्चर्य की बात है कि इसी एफिडेविट में उन्हें इसी संस्थान में वेतनभोगी संपादक भी बताया गया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
09322411335

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अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न देने वाले रमेशचंद्र अग्रवाल अपने साथ कुछ न ले जा सके!

देश के प्रसिद्ध समाचार पत्र दैनिक भास्कर को संचालित करने वाली कंपनी डीबी कार्प के चेयरमैन रमेशचंद अग्रवाल कल अहमदाबाद में ईश्वर को प्यारे हुए और खाली हाथ ही दुनिया से चले गए. अपने इतने बड़े साम्राज्य में से कुछ भी अपने साथ न ले जा सके. रमेश चंद्र अग्रवाल ने जीते जी अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर और वेतन न देने की जिद कर रखी थी और दिया भी नहीं. मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. मजीठिया वेज बोर्ड न दिए जाने की सबसे ज्यादा शिकायत दैनिक भास्कर समूह से ही आई है.

हृदयाघात से मरे रमेश चंद्र अग्रवाल को महान बताने और बनाने के लिए दलाल पत्रकारों में होड़ मची हुई है. किसी ने यह लिखने की हिम्मत नहीं जुटाई कि इस शख्स ने अपने समूह के कर्मियों को जबरदस्त शोषण किया और कानून व न्याय की अनदेखी कर आपराधिक कृत्य किया. दैनिक भास्कर समाचार पत्र समूह के खिलाफ सबसे ज्यादा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ ना देने की शिकायत विभिन्न अदालतों में की गयी है जिसकी सुनवाई चल रही है.

बुधवार को अहमदाबाद विमानतल पर रमेश चंद्र अग्रवाल को हृदयाघात हुआ जिसके बाद वहीं एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. बाद में उनका निधन हो गया. रमेश अग्रवाल के निधन पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, रेल मंत्री सुरेश प्रभु आदि ने ट्वीट कर शोक प्रकट किया.

रमेश चंद्र अग्रवाल ने भोपाल विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एम ए किया था. रमेश चंद्र अग्रवाल को अखबार की दुनिया से जुड़े हुए़ 42 साल हो चुके थे. उन्हें 2003, 2006 में इंडिया टुडे मैगजीन द्वारा 50 सबसे शक्तिशाली व्यापारिक घरानों में से एक के मुखिया के बतौर सम्मानित किया गया. 2012 में भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में 95वें स्थान पर रहे.

इसके बावजूद वह अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न देने पर अड़े रहे और इसके लिए कुख्यात हुए. रमेश चंद्र अग्रवाल के इस शोषणकारी रवैये के कारण भास्कर समूह की कई यूनिटों में कर्मियों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया और हड़ताल तक कर दिया था. रमेश चंद्र अग्रवाल के बेटे गिरीश अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल और पवन अग्रवाल उनका बिजनेस पूरी तरह संभाल चुके हैं.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
9322411335

मूल खबर….

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