शहाबुद्दीन ने तरुण तेजपाल और अनिरुद्ध बहल की हत्या के जरिए तत्कालीन भाजपा सरकार को अस्थिर करने की साजिश रची थी!

कई पत्रकारों का हत्यारा बिहार का बाहुबली शहाबुद्दीन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली के तिहाड़ जेल शिफ्ट किया जाना है तो इस मौके पर उसकी करतूतों की फिर चर्चा चहुंओर शुरू हो गई है. खासकर मीडियाकर्मियों में इस बात को लेकर गुस्सा है कि दो-दो पत्रकारों की हत्या कराने वाले शहाबुद्दीन को आखिर क्यों राजनीतिक संरक्षण दिया जाता है और अभी तक उसके गुनाहों की सजा उसको क्यों नहीं दी गई. क्यों उसके सामने नेता, अफसर, जज समेत पूरा सिस्टम भय के मारे नतमस्तक हो जाता है.

इस बीच एक पुराना मामला पता चला है जिसमें शहाबुद्दीन के कुछ गुर्गे दिल्ली में हथियारों के साथ अरेस्ट किए गए थे. उनमें से एक ने पुलिस के सामने अपने दिए बयान में कुछ कुछ सनसनीखेज खुलासे किए थे. उसने बताया था कि नेपाल में आईएसआई, शहाबुद्दीन और अन्य के बीच मीटिंग में तहलका के तत्कालीन एडिटर इन चीफ तरुण तेजपाल और तहलका के ही खोजी पत्रकार अनिरुद्ध बहल को मारने की साजिश रची गई. इनकी हत्या करके तत्कालीन भाजपा सरकार को गिरवाना था क्योंकि तहलका ने भाजपा के लोगों का स्टिंग किया था और स्टिंग करने वालों की हत्या के बाद पूरा दोष भाजपा सरकार पर ही जाता.

ये मामला वैसे है पुराना लेकिन चार पन्नों का यह कुबूलनामा पहली बार भड़ास4मीडिया के जरिए पब्लिक डोमेन में लाया जा रहा है. इसे पढ़ने या डाउनलोड करने के लिए नीचे दिए लिंक पर एक-एक कर क्लिक करें…

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इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन को बिहार की जेल से दिल्ली की जेल शिफ्ट करने का आदेश दिया, जिसकी खबर इस प्रकार है…

पत्रकार राजीव रंजन की हत्या का आरोपी बाहुबली शहाबुद्दीन तिहाड़ जेल में होगा शिफ्ट, सुप्रीमकोर्ट ने दिया आदेश

देश के पत्रकारिता को झकझोर देने वाली घटना बिहार के पत्रकार राजीव रंजन की हत्या के आरोपी और बिहार के सीवान के बाहुबली सहाबुद्दीन को अब बिहार से नयी दिल्ली के तिहाड़ जेल में भेजा जाएगा। माननीय सुप्रीमकोर्ट ने शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल में शिफ्ट करने का आदेश सुनाया है।माननीय सुप्रीमकोर्ट ने पत्रकार राजीव रंजन की विधवा आशा रंजन सहित कई पीड़ितों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पूर्व सांसद और बिहार का यह बाहुबली इस समय सीवान की जेल में बंद है।

तेजाब कांड समेत कई मामलों के आरोपी राजद नेता और पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को बुधवार की सुबह सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के तिहाड़ जेल में शिफ्ट कराने का फैसला सुनाया है। शहाबुद्दीन को सीवान जेल से तिहाड़ जेल भेजने की मांग करने वाली कई याचिकाओं पर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 17 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। पत्रकार राजदेव रंजन की विधवा आशा रंजन ने शहाबुद्दीन से अपनी जान पर खतरा बताते हुए उनको तिहाड़ जेल (दिल्ली) भेजने का आग्रह सुप्रीम कोर्ट से किया हुआ है। सीबीआई, शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल भेजने पर अपनी सहमति जता चुकी है। सरकार भी कह चुकी है कि शहाबुद्दीन को कहीं के भी जेल में रखने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है। पूर्व सांसद शहाबुद्दीन फिलहाल सीवान जेल में हैं।मगर जल्द ही उसे तिहाड़ जेल में शिफ्ट किया जाएगा।

प्रिंस सुजीत और शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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तहलका हिंदी से संपादक बृजेश समेत कई पत्रकारों का सामूहिक इस्तीफा, अब अमित प्रकाश देखेंगे काम

बुरे दौर से गुजर रही तहलका हिंदी पत्रिका से सूचना है कि कई लोगों ने इस्तीफा दे दिया है. तरुण तेजपाल सेक्स स्कैंडल के बाद से ही तहलका समूह के बुरे दिन शुरू हो गए थे और अब तक जारी है. पता चला है कि तहलका हिंदी से कार्यकारी संपादक बृजेश सिंह, प्रशांत वर्मा, मीनाक्षी तिवारी, अमित सिंह, कृष्णकांत, दीपक गोस्वामी आदि ने इस्तीफा दे दिया है. इस्तीफे का कारण सेलरी संकट बताया जा रहा है.

बृजेश सिंह और अन्य सभी पत्रकारों ने अपना सामूहिक इस्तीफा प्रबंधन को सौंपते हुए एक मेल भी भेजा है जिसमें सेलरी संकट समेत कई मामलों का जिक्र किया गया है. तहलका हिंदी के संपादक संजय दुबे के जाने के बाद अतुल चौरसिया को तहलका हिंदी का कार्यकारी सम्पादक बनाया गया था. अतुल चौरसिया ने इस्तीफा दिया तो बृजेश सिंह तहलका हिंदी के कार्यकारी संपादक बनाए गए. अब बृजेश सिंह ने भी इस्तीफा दे दिया है. जानकारी के मुताबिक तहलका मैनेजमेन्ट ने पत्रकार अमित प्रकाश सिंह को तहलका हिंदी पत्रिका का डिप्टी एडिटर बनाया है.

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तहलका समूह जल्द लांच करेगा तहलका बांग्ला न्यूज चैनल

तहलका समूह ने एक प्रेस रिलीज जारी कर सूचित किया है कि वह जल्द बांग्ला भाषा में न्यूज चैनल लांच करेगा जिसका नाम तहलका बांग्ला न्यूज चैनल होगा. नीचे वो प्रेस रिलीज है जिसे तहलका की तरफ से जारी किया गया है….

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तहलका अंग्रेजी के पत्रकारों ने मैनेजमेंट के खिलाफ मोर्चा खोला, एक कर्मी ने खोली मैथ्यू सेमुवल की पोल

तहलका अंग्रेजी मैग्जीन के पत्रकारों को सेलरी नहीं मिल रही है. यहां कार्यरत कर्मियों ने एक खुला पत्र लिखकर प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. पत्र में कहा गया है कि तीन दिन में सारा हिसाब किताब कर दो वरना न सिर्फ धरने पर बैठेंगे बल्कि कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी. साथ ही श्रम विभाग से संपर्क साधकर तहलका प्रबंधन को कठघरे में खड़ा किया जाएगा. ओपन लेटर में कर्मियों ने प्रबंधन से कहा है कि अगर उनका मन कंपनी बंद करने की है तो ऐसे में जो भी उचित देय होता है, उसे मिल बैठकर तय कर लिया जाए और सभी लोग अपने अपने रस्ते निकल लें. पत्र ये है :

Hi
We demand that our dues be paid in three days failing which we would be forced to sit on an indefinite strike and involve the Labour Commission. And if the management is planning to shut us down, we demand we be let off with a severance package which we believe is only the least that we need given the way we have been treated so far.

TEHELKA (English) employees
15.03.2016

इस बीच तहलका में काम कर चुके अंकुश वत्स ने ममता बनर्जी के पार्टी के सांसदों के स्टिंग पर एक आर्टकिल लिखकर कई नए तथ्यों की तरफ इशारा किया. आर्टकिल यूं है…

Real truth behind ‘journalist’ who stung Mamata Banerjee’s trusted lieutenants

Ankush Vats

I have been wanting to write this since a long time but didn’t have the courage to do it. I think the time was ripe long ago to expose the man who took the ‘risk and pain’ to expose all the corrupt people in our country.

Yesterday, a sting came out in the media exposing the corrupt leaders of Trinamool Congress. If what is shown in the sting is true, the guilty should be punished. But I, personally, have serious doubts over the credibility of the man, Mathew Samuels, behind the sting. Of all the parties and states in India, why did he zero in on West Bengal ruled by TMC. Interestingly, Tehelka is owned by KD Singh, who is also a TMC MP in Rajya Sabha. Did he help Mathew in fixing his meeting with top leaders of the TMC? The sting was conducted during Mathew’s tenure at Tehelka. Did he use Tehelka’s resources to conduct this sting? I believe yes, he did.

I have worked with Mathew Samuel in Tehelka. During my last one year at Tehelka, there have been various instances where he has compromised the ‘editorial freedom’ that he so openly boasts off. Around a month before the Bihar assembly polls, he announced in the editorial meeting that they had done a sting on some big leaders of the state. Later, in every successive meetings he would say that they had got the footage and release it soon. However, till date those ‘big leaders’ have not been exposed. He stopped talking about that sting during the editorial meetings as well. Why did he not release it even after claiming before everyone so publicly  to have got the footage? I leave it to the judgement of the readers.

In another instance, a colleague of mine had gone to Jharkhand to do a story on land scam worth thousands of crores in which a senior political leader was involved. The colleague filed the story and it was discussed to be a potential cover for the next edition. But Mathew stalled it for one month saying he was collecting some more documents on it. Later, he scrapped the story altogether without giving any reasons for it. When our bureau chief questioned it, he was asked to leave Tehelka. Why was the story not published when it had all the contents of being a cover story?

In a similar case with me, he asked me to do a story on rubber plantation happening illegally around Maharashtra-Goa border. I asked him for some contacts for the story, but he said he had none. Even then, I went to Maharashtra-Goa border areas, talked to locals and filed the story. He stalled the story for two weeks, again on the pretext of collecting some ‘documents’. The story was later carried because I had not targeted any particular individual or a company which was involved in rubber plantation there. There were many companies which were doing it, so I couldn’t pin point a particular company. I wonder what documents did he collect when he didn’t even have a single contact to give me to go ahead with the story. There have been many instances like this in Tehelka.

The manner in which he left Tehelka was also very suspicious. He announced that he was going to leave the magazine and start a new website (Narada News) with KD Singh. He said that Tehelka was struggling to pay salaries to its employees. The only link we had with the management was Mathew. So when he announced his decision to leave, everyone was wondering what would happen to their pay.

But, he fooled everyone in the office by saying that the new venture will be a sister concern of Tehelka and its profits will be diverted to the magazine to convert the ailing magazine into a profitable one. Sadly, some people in the office believed him. I told my colleagues that why would KD Singh invest in a new news venture when a established brand like Tehelka was not profitable for him. Now, on his website he claims that the project was shelved three years back. Mathew also exploited Tehelka resources for Narada. People in the web team of Tehelka were asked to write stories for Narada. They would do it thinking that it was a joint venture between him and KD Singh.

There were two or three ‘trusted lieutenants’ of Mathew in the office. They would come to office with him and leave with him. Everyone in the office would ask about their job responsibilities but no one had any answer. They were drawing salary from Tehelka, and much more than some journalist there. The only job they did honestly was to arrange for food and alcohol during the office parties.

In his introductory note for Narada, Mathew has written that he left Tehelka when he was convinced that it was in the hands of ‘young and vibrant’ leadership. Little does he know that the magazine was turned from weekly to fortnightly and then recently to monthly. He systematically weakened Tehelka by firing three of the best journalists I know, who would work for countless hours at stretch, even when we were not paid. Currently, Tehelka is on the verge of shutting down. I feel sad to say this but this is the harsh reality.

We have not been paid salaries for January and February. The salary for December we got in mid January. When the employees repeatedly asked about their salaries, the management threatened to fire half of them saying the magazine was over staffed. When we told them that we were willing to leave soon after our salaries were cleared, the management played one of its cheapest tricks. It is now harassing employees by saying that they owe money to the company for the professional trips made by them in the past. Some of us had gone for outstation trips for work purpose, for which we would get some advance. After the trip we would file our expense with one of the trusted lieutenants of Mathew and get our reimbursements (if it exceeded) after two three months. However, now the management denies ever receiving  any bills and is threatening to deduct the amount from our salaries, which have been pending for two months.

I, in particular, was told that I owed Tehelka Rs 17,000, another colleague of mine was told he owed over Rs 40,000. There are times when there is no money with Tehelka employees to even travel to office. Because most of us are young and don’t have enough savings to survive on. Some of us have resigned and left Delhi because it was very difficult to make ends meet there. While there are some who are still struggling at Tehelka, hoping their dues will be cleared and they will be paid.

Mathew also offered jobs to most of us, including me, in his new venture, that too at a higher salary. We are all looking for a job, desperately. But not even a single person has accepted Mathew’s offer even during this desperate time. Such is the trust and respect he has earned with his colleagues at Tehelka. We are all struggling to make ends meet but don’t want to be cheated again, that’s what we all feel. On a lighter note: How Narada News Facebook page got over 3 lakh likes within hours of its launch?

Narada news was launched just yesterday. But it’s Facebook page has over 3 lakh followers. I was surprised to see it. I thought the sting has worked for Narada. While it is very likely for a Facebook page to get 3 lakh likes in hours. However it is close to impossible to get around 2400 people to review the page. When I went through the reviews of the page I found that the page already existed with some other name. They have changed the name of an existing group which had 3 lakh followers to Narada News. All previous posts of the page has been deleted.

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हिन्दी तहलका विशेषांक समीक्षा : एक बेहतरीन अंक

किसी भी समाप्त होते साल के आखिरी हफ्ते से नए साल के पहले हफ्ते तक टीवी चैनलों में एक जैसे उबाऊ इयरएंडर देखते हुए और पत्र पत्रिकाओं में बासी खबर कलैंडर पढते हुए इस बार भी “तहलका हिन्दी” किसी वज़नदार दस्तावेज की तरह हाथ में आई। इस बार भी इसलिए लिखा क्योंकि 2013 की समाप्ति पर भी हिन्दी तहलका ने अपने पांच साल पूरे होने के अवसर को भी साथ जोड़ते हुए एक बेहतरीन अंक प्रकाशित किया था। वह अंक साहित्य और साहित्यकारों के इर्द गिर्द रचा गया था जबकि इस बार का विशेषांक बीते साल 2014 को वर्षगांठ के नजरिए से देखते हुए तैयार किया गया है।

किसी भी गुजरे वर्ष को याद करने का आसान सा तरीका है उसमें घटित हुई महत्वपूर्ण घटनाओं का जिक्र कर लेना, यह सभी करते हैं। तहलका ने अपने वर्षगांठ विशेषांक में महत्वपूर्ण घटनाओं, व्यक्तियों और संस्थाओं को 2014 से जोड़कर इस वर्ष को अलग अलग अर्थों में अहम बना दिया।  किसी भी प्रयोगधर्मी पाठक, दर्शक या श्रोता को पुराने तमाम सांचों को तोड़कर रची गई रचना में ही पूर्ण आनंद की अनुभूति होती है। तहलका का यह अंक भी इसी प्रकार का अहसास कराता है।

जवाहर लाल नेहरू की 125 वी जयंती तो मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि, ना अंकों में कोई साम्य और ना ही अवसर में लेकिन फिर भी पढ़ने में मज़ा आता है। सवालों के घेरे से निकलकर नेहरू नियति से मुलाकात करते हैं और सीधे सादे मुक्तिबोध व्यंग्य की उलटबांसी रचने वाले हरिशंकर परसाई जी के लिए जटिल हो जाते हैं । कहीं दम तोड़ती भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की कहानी तो फिर भोपाल त्रासदी का पीड़ादायी किस्सा, कहीं कोई सिलसिला नहीं,कहीं कोई साम्य नहीं सब कुछ अनायास लेकिन भी निरंतरता टूटने का आभास कही नहीं।

पहले विश्वयुद्ध में हिन्दुस्तान की भूमिका की बात बर्लिन की दीवार के ढहने तक जाती है और फिर भागलपुर के ज़ख्मों पर कब लौट आती है पता ही नहीं चलता । शायद शब्दों और समय से ज्यादा संवेदनाओं को पिरोया गया है इसीलिए पाठक को एक तल पर समभाव यात्रा का अनुभव होता है । इरोम शर्मिला का संघर्ष और बेगम अख्तर के सुर इस यात्रा में एक ही जैसा नम लेकिन मजबूत स्वर पैदा करते हैं । जिस दौर में बीते साल को करोड़ों की कमाई के कारण बेहतरीन मानी गई फिल्मों के लिए याद किया जाता है उसी वक्त में 50 वीं वर्षगांठ के बहाने दोस्ती जैसी फिल्म का जिक्र और खान युग में फिल्मों से ख्वाजा अहमद अब्बास जैसा नाम निकालना साहस का काम है । एक बार फिर तहलका हिन्दी का सहेजकर रखने वाला अंक । इस दस्तावेज को पाठकों तक पहुंचाने के लिए संपादक का शुक्रिया…शुभकामनाएं..!   

आदित्य झा
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि
नोएडा    

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Tehelka scribe refuses to reveal source in sensational fake encounter case

IMPHAL : The star witness of the sensational July 23 Kwairamband Keithel fake encounter case, Teresa Rehman of the `Tahelka Magazine`, refused to reveal the identity of her sources citing security problem besides terming it unethical. Teresa Rehman, who filed the news reports of the July 23 incident along with a number of pictures as evidence, gave her statement before the court Chief Judicial Magistrate, Kamrup (Metro) Guwahati, D Thakuriaa on January 6 as prosecution witness number 66.

In her statement, she confirm to have filed the article `Murder in plain sight` appeared at the Tehelka Magazine (dated 8.08.09) about the murder of Sanjit by Manipur police commandos on July 23. She said that the article was written on the basis of the reports and photographs received on her e-mail ID adding that she did not know the person who took the photographs.

Rehman revealed that she collected the information to write the articles from various sources including Rakesh Meihoubam, the legal advisor of the mother of deceased Sanjit. According to her it was from Rakesh she came to know that the deceased Sanjit was a former member of the outlawed group. She further revealed that she was told that Sanjit was earlier arrested by the Police and got bail and was living as free man before he was killed in the sensational fake encounter case.

`I did not visit Imphal for the preparation of my article and I had not received any video footage of the incident,` claimed Rehman.

Soon after the receipt of the photographs through her e-mail ID she reportedly forwarded the same to her then editor in chief, Tarun Tejpal. Subsequently, she received instruction from Delhi office to go ahead and prepare the article. However, she clarified that she did not tamper with the photographs. She further maintained that she no longer has the photographs with her after forwarding the same to the Tehelka weekly magazine office, the photographs became the property of Tehelka Weekly Magazine.

`I am not ready to reveal the names of my source for fear their lives will be at risk and further it will be unethical on my part on revealed my sources`, said Rehman.

It may be recalled that Teresa Rehman was summoned to physically appear before the district and session Judge Manipur East. However, she was later granted permission on December 6 last to give her statement at a designated special court of CBI Guwahati by the concerned court following her plea to make the appearance in Guwahati citing security reason.

Meanwhile, the cross examination of witness of the case was also held today before the district and session Judge Manipur East. Advocate Rakesh Singh Meihoubam, the legal advisor of Sanjit`™s mother appeared before the court as prosecution (no.67). In his statement, the advocate revealed that he did not know Teresa Rehman before the BT road incident.

He came to know with Rehman through Babloo Loitongbam, a fellow activist, who told him that Rehman wanted to talk to her over phone. Meihoubam further revealed that he talked to Rehman twice after the death of Sanjit wherein she inquired about the status of Sanjit before his death. Accordingly, he mentioned that Sanjit was earlier arrested by Manipur police and was later released on bail but clarified that he was not the counsel in the criminal case involving the deceased.

He was approached by the deceased mother for filing a writ petition before the then Guwahati high court only after her son was killed. Subsequently, Meihoubam claimed that he filed the petition after receiving the copy of the magazine from Rehman who sent him a copy following his request.

साभार- Imphal Free Press

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पठनीय है ‘तहलका’ का वार्षिक अंक, जरूर खरीदें और पढ़ें

Abhishek Srivastava : कल ‘तहलका’ का वार्षिक अंक एक सुखद आश्‍चर्य की तरह हाथ में आया। एक ज़माने में इंडिया टुडे जो साहित्‍य वार्षिकी निकालता था, उसकी याद ताज़ा हो आई। बड़ी बात यह है कि ‘तहलका’ का यह अंक सिर्फ सहित्‍य नहीं बल्कि समाज, राजनीति, आंदोलन और संस्‍कृति सब कुछ को समेटे हुए है। आवरण पर एक साथ मुक्तिबोध और इरोम शर्मिला की तस्‍वीर को आखिर कौन नहीं देखना चाहेगा।

भीतर के पन्‍नों में विशेष ध्‍यान खींचने वालों में Anil Kumar Yadav का सीपीएम पर लिखा एक पीस है और ख्‍वाज़ा अहमद अब्‍बास पर Atal Tewari का बढि़या आलेख है। हिमांशु वाजपेयी ने बेग़म अख्‍़तर पर सुंदर पीस लिखा है, लेकिन सबसे ज़रूरी लेख इस अंक का पहला ही लेख है जो नेहरू पर कुमार प्रशांत ने लिखा है। मौजूदा राजनीतिक विमर्शों के संदर्भ में इस लेख को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। एक ओर भोपाल गैस त्रासदी और पहले विश्‍व युद्ध की यादें इस अंक में हैं, तो दूसरी तरफ़ मुक्तिबोध पर हरिशंकर परसाई और इरोम शर्मिला पर Mahtab Alam को आप पढ़ सकते हैं।

इस अंक की खूबी यह है कि इतने विविध मुद्दों के बीच से उन विषयों/लोगों को छांटा गया है जिन पर अन्‍यत्र कहीं भी वर्षान्‍त पर बात नहीं हुई है। इस लिहाज से पत्रिका के नए कार्यकारी संपादक Atul Chaurasia और उनकी टीम अपने संपादकीय विवेक के लिए बधाई की पात्र है। इस सराहना की मेरे लिए निजी वजह यह है कि जिस दौर में तमाम पत्र-पत्रिकाओं के वार्षिकांकों में सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी व बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों पर आवरण कथाएं आई हैं, ‘तहलका’ के इस अंक से आश्‍चर्यजनक रूप से नरेंद्र मोदी बिलकुल नदारद हैं। एक पत्रिका को इतने आंतरिक उथल-पुथल और विवादों के बावजूद फर्श से अर्श पर कैसे इतने कम समय में लाया जा सकता है, ‘तहलका’ इसका जीवंत उदाहरण है। धारा के विपरीत तैरने के इस साहस के लिए तहलका हिंदी की समूची टीम को एक बार फिर से बधाई। हम पाठकों की अपेक्षाओं को आप बनाए रखेंगे, ऐसी उम्‍मीद है।

जनपक्षधर पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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तरुण तेजपाल को टीओआई ने अपने समारोह में वक्ता के रूप में बुलाया, विवाद के बाद कदम पीछे हटाया

तरुण तेजपाल को टीओआई (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) द्वारा आयोजित एक साहित्यिक समारोह में निमंत्रण देने पर विवाद खड़ा हो गया है. कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि यौन शोषण के एक हाई प्रोफाइल अभियुक्त को इस तरह का प्लेटफार्म देना महिलाओं को ग़लत पैग़ाम देने जैसा होगा. लगभग एक साल पहले तेजपाल यौन शोषण के आरोप में गिरफ़्तार हुए थे और उन्हें इस साल जुलाई में ज़मानत मिली थी. हालाँकि उन्होंने लगातार ख़ुद पर लगों आरोपों को बेबुनियाद कहते हुए ख़ारिज किया है.

आयोजकों की तरफ से अब संपादक बच्ची करकरिया ने तरुण तेजपाल से कहा है कि वो समारोह में शामिल न हों. तरुण ‘सत्ता के अत्याचार’ विषय पर बोलने वाले थे. कुछ प्रसिद्ध हस्तियां तेजपाल को दिए गए न्योता के कारण इस समारोह में भाग नहीं ले रही हैं. प्रधानमंत्री के क़रीबी समझे जाने वाले पत्रकार स्वपन दास गुप्ता इनमें शामिल हैं. ब्लॉगर स्मिता बरूआ ने कहा तरुण तेजपाल को न्योता देने से महिलाओं को ग़लत पैग़ाम जाएगा. पैनल में तरुण तेजपाल के अलावा कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर, लेखक बशारत पीर और पत्रकार मनु जोसेफ थे.

क़ानूनी तौर पर तरुण तेजपाल का समारोह में भाग लेना अवैध नहीं था. उन्हें फ़िलहाल दोषी क़रार नहीं दिया गया है लेकिन आरोपो के कारण वे विवावदास्पद व्यक्ति ज़रूर हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ओर से उन्हें न्योता देना भी ग़लत नहीं था. लेकिन मार्केटिंग और पब्लिसिटी क्षेत्र के कुछ लोगों को लगता है इस कदम से समारोह को पब्लिसिटी ज़रूर मिलती. अब तक टाइम्स लिट्रेरी फेस्टिवल के बारे में ज़्यादा लोगों को जानकारी नहीं थी लेकिन अब तरुण तेजपाल के सुर्ख़ियों में लौटने के बाद साहित्यिक समारोह भी सुर्ख़ियों में है.

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तहलका डाट काम के पत्रकार मैथ्यू सैमुअल जेल भेजे गए

दिल्ली की एक अदालत ने समाचार पोर्टल तहलका डॉटकॉम के पत्रकार मैथ्यू सैमुअल की जमानत रद्द कर उन्हें जेल भेज दिया. मैथ्यू पर सरकारी गोपनीयता कानून का उल्लंघन कर दस्तावेज जुटाने और उन्हें पोर्टल पर जारी करने के आरोप में केस चल रहा है.  सीबीआई कोर्ट के जज जेपीएस मलिक ने मैथ्यू को 21 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया है. कोर्ट ने यह भी कहा कि वह जानबूझकर मुकदमे में देरी कर रहे हैं, इसलिए उनकी जमानत अवधि बढ़ाने की जरूरत नहीं है.

पूर्व में जमानत प्राप्त मैथ्यू 13 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश नहीं हुए थे, इस पर कोर्ट ने गिरफ्तारी वारंट जारी किया था. पुलिस ने मंगलवार को उन्हें कोर्ट में पेश किया था.  इस मामले में सीबीआई ने मैथ्यू, तहलका के संपादक अनिरुद्घ बहल, गृहमंत्रालय के तत्कालीन अधिकारी थॉमस मैथ्यू व नीरज कुमार तथा पोर्टल मालिक बफेलो नेटवर्क के खिलाफ विभागीय गोपनीयता कानून के उल्लंघन के आरोप में आरोप पत्र दायर कर दिया है. दिल्ली हाई कोर्ट मई माह में बहल, थॉमस और कुमार के खिलाफ आरोप खारिज कर चुकी है. मैथ्यू की अर्जी भी हाई कोर्ट में लंबित है.

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अगर मैं सम्पादक होता तो इस स्टोरी को ब्लॉक कर देता

Nadim S. Akhter : मुस्लिम समाज पर तहलका की जिस स्टोरी पर माननीय Dilip C Mandal जी बलिहारी जा रहे हैं, उन्हें ‘मलाल’ है कि ऐसी स्टोरी वो क्यों नहीं सोच पाए-कर पाए, जो उनके हिसाब से अद्भुत है. उस स्टोरी में कई झोल और छेद हैं. पता नहीं, किस सम्पादक की नजर से गुजरकर ये स्टोरी छपी है. अगर मैं सम्पादक होता तो इस स्टोरी को ब्लॉक कर देता. कहता- पहले जाकर संबंधित पक्षों का वर्जन लेकर आओ, मुस्लिम समाज और उनके धर्मगुरुओं की राय लेकर आओ कि वे इस मामले पर क्या बोलते और सोचते हैं. मुस्लिम समाज के माइंडसेट पर पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने जो आपत्तिजनक टिप्पणी की है, उसे यूं ही नहीं छापेंगे. दूसरे पक्ष (मुस्लिम समाज) की बात भी उसी शिद्दत से और उतनी ही प्रमुखता से स्टोरी में जानी चाहिए, वरना स्टोरी एकतरफा हो जाएगी.

लेकिन तहलका के संपादक-रिपोर्टर ने मिलकर ये एकतरफा स्टोरी छापी है. पत्रकारिता का पहला और मूलभूत सिद्धांत है कि किसी विषय पर दोनों पक्षों की राय ली जानी चाहिए. लेकिन ये पूरी स्टोरी सिर्फ भूतपूर्व नौकरशाहों के निजी विचारों पर केंद्रित है. मुस्लिम समाज के आम लोगों, उनके प्रतिनिधियों और मुस्लिम धर्मगुरुओं से बात की ही नहीं गई है. यानी जिस मुस्लिम समाज की -दुर्दशा- पर ये स्टोरी की गई है, पूरी स्टोरी में उस समाज का पक्ष रखा ही नहीं गया है. ये पूरी तरह से अपूर्ण और एकतरफा स्टोरी है. पूर्व नौकरशाहों ने अपने आग्रहों-पूर्वाग्रहों के वशीभूत होकर जो जहर फैलाने वाली बातें कही हैं, जो झूठी जानकारियां दी हैं, उसे जस का तस लिखकर छाप दिया गया है. रिपोर्टर-संपादक ने ये जानना समझना जरूरी नहीं समझा कि ये अल्पज्ञानी नौकरशाह इस्लाम धर्म के बारे में जो बातें इतने आत्मविश्वास के साथ कह रहा है, वह प्रामाणिक हैं भी या नहीं. क्या वाकई में इस्लाम में ऐसा कहा गया है या ये सिर्फ संबंधित नौकरशाह का अधकचरा ज्ञान और पूर्वाग्रह है, जो ये ऐसी बातें बोल रहा है.

मैं एक बार फिर कह रहा हूं कि अगर मैं सम्पादक होता तो इस स्टोरी को होल्ड पर डाल देता. रिपोर्टर को पूरे तथ्य के साथ, सभी पक्षों की बात लेकर एक Complete story फाइल करने को कहता, तभी आवश्यक एडिटिंग के साथ ये स्टोरी छापी जाती. ऐसी स्टोरी लिख और छापकर तहलका वालों ने मेरे हिसाब से अपराध किया है. स्टोरी पढ़कर तो पाठक के जेहन में यही बात आएगी कि मुस्लिम समुदाय ही ऐसा है, उसी में खोट है, सो उसकी संवेदनशील जगहों पर पोस्टिंग नहीं होती, नियुक्ति नहीं होती. ये लोग देश के लिए नहीं, अपने मजहब के लिए जीते हैं. ये बात highly objectionable है. फिर इस्लाम धर्म के बारे में भी गलत जानकारी दी गई है और तुर्रा ये कि ये सब ऐसे लिखा गया है, मानो एकदम प्रामाणिक हो. स्टोरी में कहा गया है कि इस्लाम धर्म में ये छूट है कि अगर कोई इस्लाम छोड़कर दूसरे मजहब को अपना लेता है तो कोई भी मुसलमान उस व्यक्ति को जान से मारने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन इस्लाम में है ठीक इसके उलट. कुरान में कहा गया है कि -लाकुम दीनाकुम वालैयादीन. यानी तुम्हारा दीन-मजहब तुम्हें मुबारक, मेरा दीन-मजहब मुझे मुबारक. तुम शौक से अपने मजहब का पालन करो और मैं अपने मजहब का. हम साथ रहेंगे, इसमें कोई झगड़ा नहीं.

इस एकतरफा और विषैली स्टोरी ने पाठकों के दिमाग में मुस्लिम समुदाय के प्रति और ज्यादा negative feeling बनाने का काम किया है. आम पाठक तो इसे पढ़कर यही कहेगा कि मियां-कटुआ होते ही हैं ऐसे. देखों तभी उनको पुलिस-सेना-खुफिया एजेंसी में नौकरी नहीं मिलती. सारे रिटायर्ड अफसर यही बात तो बोल रहे हैं. शर्मनाक. नीचे मैं स्टोरी में लिखे उन वक्तव्यों को उद्धत कर रहा हूं, जो आपत्तिजनक हैं, मिथ्या फैलाने वाली हैं लेकिन इसकी काट में स्टोरी में संबंधित पक्ष की कोई भी राय नहीं दी गई.

1. “मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर यूपी के पूर्व पुलिस प्रमुख प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘सवाल ये है कि जब आप आधुनिक शिक्षा नहीं लेंगे तो जाहिर सी बात है सरकारी नौकरी या अन्य कई प्रतियोगी परीक्षाओं में नहीं आ पाएंगे. मान लीजिए थोड़ी बहुत आपने शिक्षा ले भी ली तो इस समुदाय के मनोविज्ञान में ये है कि हम सरकारी नौकरी और खासकर की पुलिस या फौज की नौकरी नहीं करेंगे. क्योंकि पुलिस या फौज की नौकरी करने के लिए आपको देश के प्रति अटूट देशभक्ति चाहिए. और आपको मर मिटना पड़े तो मर मिटने के लिए तैयार रहिए. ये कहते हैं कि ठीक है, हम बहादुर हैं. हम मर मिटने को तैयार हैं लेकिन हम इस्लाम के लिए मर मिटने को तैयार हैं. ये खुलकर कोई नहीं कहेगा लेकिन ये बातें इनके भीतर गहरी मानसिकता में है. तो ये पुलिस में आते नहीं, फौज में जाते नहीं. और उसके बाद कहते हैं कि हमारा प्रतिनिधित्व कम है. इनके रिप्रजेंटेशन को बढ़ाने की बार-बार चर्चा होती है लेकिन सवाल ये है कि वो पढ़ें तो. वो तो खाली कुरान पढ़ना चाहते हैं. तो हम क्या करें.’”

2. “हां ये एक तथ्य तो है ही कि मुस्लिम समुदाय के जो लोग हैं अगर उनसे पूछा जाए कि आपकी लॉयलिटी किसकी तरफ है – धर्म के प्रति या देश के प्रति तो मेरा अनुमान है कि वो हमेशा कहेंगे कि उनकी पहली वफादारी तो धर्म की तरफ है. सवाल फिर यहीं से उठता है.’

3. “बहुत से लोग आसिफ इब्राहिम को आईबी प्रमुख बनाने पर भी सवाल उठाते हैं. प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘आसिफ इब्राहिम आईबी के डायरेक्टर बनने के योग्य नहीं हैं. उन्होंने तीन आदमियों को सुपरसीड किया है जो उनसे योग्य थे. ये डायरेक्टर सिर्फ इसलिए बने क्योंकि वो मुस्लिम हैं.’

4. “प्रकाश सिंह मुस्लिम समुदाय की खुफिया और सुरक्षा संस्थाओं में अनुपस्थिति के लिए व्यवस्था के मुस्लिम विरोधी होने से ज्यादा खुद समुदाय को ही जिम्मेदार मानते हैं, ‘सवाल मुसलमानों के आईबी और रॉ में जाने का नहीं है. सवाल मुसलमानों के सरकारी नौकरियों में आने का है. मैं तो अपने व्यक्तिगत अनुभव से बता सकता हूं कि कई बार हम लोगों ने बहुत प्रयास किया कि मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए यूपी पुलिस और पीएसी में. हालत ये थी कि इनकी सिफारिश करनी पड़ रही थी. अधिकारियों को मुस्लिम इलाकों में जा कर कहना पड़ता था कि भइया अपने लड़कों को भेजो तो सही. हम तो भर्ती करने को तैयार हैं.’”

(तो प्रकाश सिंह से ये पूछा जाना चाहिए कि कब-कब और कहां-कहां उनके अधिकारी मुस्लिम समाज में जाकर मनुहार करते थे, गुहार लगाते थे कि आओ, हमारी पुलिस में भर्ती हो जाओ और मुस्लिम लड़के नहीं जाते थे. हकीकत तो ये है कि आप पुलिस की एक पोस्ट भरने के लिए मुस्लिम इलाके में जाकर कह दीजिए, हजारों युवा लड़के उस नौकरी को पाने के लिए अगले ही पल लाइन में खड़े नजर आएंगे. प्रकाश सिंह की वाहियात बातों को तहलका ने कितनी बेशर्मी से छापा है)

5. “प्रकाश सिंह कहते हैं-मैं यूपीएससी बोर्ड में था तब जब भी कोई मुसलमान लड़का आता था तो हम कहते थे कि चलो एक तो मिला अरे इसे किसी तरह से धक्का देकर ऊपर चढ़ा दो. मैं आपको अपने अनुभव से बता सकता हूं कि उसको इंटरव्यू लेवल पर हमेशा बोर्ड की तरफ से मदद मिलती है. सवाल है कि अगर आप पढ़ेंगे नहीं तो कहां से हम आपको आईपीएस और आईएएस बना दें. आप सिपाही में भर्ती नहीं होंगे क्योंकि हमें देश की सेवा करनी पड़ेगी. हमको नक्सलियों से लड़ना पड़ेगा, हम क्यों लड़ें. हमें नॉर्थ इस्ट में लड़ना पड़ेगा हम क्यों लड़ें. हमें कश्मीर में पृथकतावादियों से लड़ना होगा, हम उनसे नहीं लड़ेंगे. जब ये चीजें आपके जहन में बैठी हुई हैं और फिर आप दोष देते हैं भारत सरकार को.’”

(अब कोई प्रकाश सिंह से पूछे कि उन्होंने कितने मुस्लिम लड़कों को यूपीएससी में एहसान जताकर और रहम खाकर ऊपर ठेल दिया और आईएएस-आईपीएस बना दिया)

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. इस स्टेटस पर आए कुछ महत्वपूर्ण कमेंट्स इस प्रकार हैं…

    Qamar Waheed Naqvi आपकी बात से सहमत हूँ. मुसलिम समाज का पक्ष ज़रूर लिया और रखा जाना चाहिए था. इन तमाम मुद्दों पर मुसलिम बुद्धिजीवियों, पूर्व पुलिस अफ़सरों और युवाओं का पक्ष लिया जाना चाहिए था. क़ुरान में क्या लिखा है, इस पर मुसलिम उलेमा ही अपनी राय दे सकते हैं. वैसे अकसर मैं उनकी राय से सहमत नहीं होता. जहाँ तक मैं समझता हूँ, भारत के मुसलमानों की युवा पीढ़ी आधुनिक और प्रगतिशील मूल्यों में विश्वास रखती है. यह स्टोरी बहुत बढ़िया हो सकती थी यदि इसमें मुसलमानों के बारे में कही गयी बातों पर मुसलिम समाज से बात करने के बाद निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश की गयी होती. हो सकता है कि प्रकाश सिंह जी जो कह रहे हों, वह उनके अनुभव हों. यह भी सही है कि इसमें दारापुरी जी जैसे कुछ लोगों के द्वारा कुछ बिन्दुओं पर जवाबी पक्ष भी रखने की कोशिश की गयी है, लेकिन फिर भी रिपोर्टर यदि मुसलिम समाज के कुछ प्रतिनिधियों से बात कर लेता, इसकी पड़ताल कर लेता कि आइपीएस की परीक्षा में कितने मुसलिम युवा बैठते हैं, उनका कुल प्रतिशत कितना है और उनमें से सफल होनेवालों का प्रतिशत कितना है, तो भी कुछ तथ्यों पर प्रकाश पड़ता. इसी तरह, कुछ मुसलिम युवाओं से बात कर यह जानने की कोशिश की जानी चाहिए थी कि क्या वास्तव में वह पुलिस या फ़ौज में नहीं जाना चाहते और अगर ऐसा है तो इसका कारण क्या है. कुल मिला कर यह कि यह स्टोरी कहीं ज़्यादा तथ्यपरक और वस्तुनिष्ठ हो सकती थी, अगर थोड़ी और मेहनत की जाती. हो सकता है कि सारे लोगों का पक्ष लेने के बाद भी प्रकाश सिंह की बात ही सही साबित हो गयी होती, लेकिन कम से कम यह तो होता कि दूसरे पक्ष से बात तो की गयी. पत्रकारिता का मूल सिद्धान्त है कि स्टोरी से सम्बन्धित हर पक्ष से बात की जानी चाहिए, समुचित तौर पर उन सबका पक्ष रखा जाना चाहिए, उसके बाद स्टोरी भले ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचे.

    Shambhu Nath Shukla मैं कोई इस्लाम का जानकार तो नहीं पर Nadim S. Akhter की यह आपत्ति काबिले गौर है। रिपोर्टर संपादक को कोई भी स्टोरी, खासकर जब वह एक संवेदनशील मुद्दे पर हो, सारे पक्षों की बात तो सुननी ही चाहिए और इसके बाद ही स्टोरी छपने के लिए क्लीयर करनी चाहिए। एक बात और, Qamar Waheed Naqvi साहब और नदीम साहब ने जिस नई पीढ़ी के नए विचारों की बात की है वह अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा नए नजरिए को भी दर्शाता है। हमारे दिमाग में इस्लाम की छवि एक कट्टरपंथी मजहब की बना दी गई है पर इन दोनों ही राय से लगता है कि शायद हम इस्लाम को बेहतर तरीके से नहीं समझते और न ही समझने की कोशिश करना चाहते हैं।

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‘तहलका’ में पेशेवर आंदोलनकारियों पर निशाना, पढ़िए कविता कृष्णन की दास्तान

‘तहलका’ मैग्जीन के नए अंक में पेशेवर आंदोलनकारियों के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली गई है. अपने सहकर्मी के यौन उत्पीड़न में जेल गए तरुण तेजपाल की इस मैग्जीन ‘तहलका’ का ध्यान अचानक आंदोलनकारियों के खिलाफ क्यों चला गया, इसे समझने के लिए बहुत ज्यादा समझ लगाने की जरूरत नहीं है. पर इस आवरण कथा में कुछ ऐसे पेशेवर आंदोलनकारियों के बारे में भी खुलासा किया गया है जो सिर्फ टीवी पर दिखने और लोगों का ध्यान खींचने के लिए बिना जाने समझे मुद्दों को उठाते और उस पर बोलते रहते हैं. ऐसे में लोगों में एक महिला आंदोलनकारी कविता कृष्णन भी हैं. इनकी पूरी दास्तान ‘तहलका’ मैग्जीन में प्रकाशित हुई है. ‘तहलका’ में प्रकाशित और अतुल चौरसिया और विकास कुमार द्वारा लिखित आवरणकथा ‘पेशेवर आंदोलनकारी’ में सब हेडिंग है- ”ऐसे लोग जिनका काम ही आंदोलन के मौके तलाशते रहना है.” लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या आंदोलन के मौके खोजना गुनाह है? ये तो एक अच्छे और सजग समाज का संकेत है जहां लोग किसी भी बुराई के खिलाफ उठ खड़े होने को तत्पर हैं. पर तहलका के लोगों का कहना है कि इस कवर स्टोरी में उन अवसरवादी आंदोलनकारियों का खुलासा किया गया है जो समाज के फायदे के लिए नहीं बल्कि निजी टीआरपी के लिए आधा-अधूरा आंदोलन चलाने पर आमादा रहते हैं. ‘तहलका’ आवरणकथा नीचे है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

पेशेवर आंदोलनकारी

ऐसे लोग जिनका काम ही आंदोलन के मौके तलाशते रहना है

अतुल चौरसिया

लबों पर नारे की जगह ‘ओ री चिरैय्या’ टाइप गाने और हाथों में मशाल की जगह मोमबत्ती और गिटार, दिल्ली की सड़कों पर दिखनेवाली यह आंदोलनकारियों की नई जमात है. बीते एक दशक में दिल्ली की सड़कों पर कार, भीड़, पिज्जा हट, मारपीट और बलात्कार के साथ ही नए तेवर वाले आंदोलन भी बहुत तेजी से बढ़े है. आंदोलनों की संख्या तो बढ़ी है लेकिन इनमें स्वत:स्फूर्तता कम होती गई है. इनमें पेशेवर चेहरे बढ़ गए हैं. नून-तेल से लेकर गाजा-इजराइल तक पर प्रदर्शन करनेवाले कुछ गिने-चुने चेहरे हर आंदोलन में आसानी से पहचाने जा सकते हैं. आंदोलन पेशेवर तरीके से आयोजित होने लगे हैं लेकिन इनका किसी नतीजे तक पहुंचना जरूरी नहीं है.

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है- दिल्ली शहर के एक मशहूर वकील की एक गैर सरकारी संस्था में बाकायदा एक ऐसा पद है जिसका काम होता है दिनभर की घटनाओं को सूचीबद्ध करना और उनमें से ऐसे मुद्दों को छांटना जिन पर जंतर-मंतर या चाणक्यपुरी के किसी भवन अथवा दूतावास पर प्रदर्शन किया जा सके. इसके बाद संस्था का पूरा अमला फेसबुक से लेकर तमाम सोशल मीडिया और आंदोलनकारी संप्रदाय के बीच सक्रिय हो जाता है. जेएनयू, डीयू और जामिया मिलिया इस्लामिया इनके लिए कच्चे माल यानी भीड़ की आपूर्ति के सबसे बड़े हब हैं. नियत दिन-तारीख-स्थान पर आंदोलनकारीमय गाजा-बाजा-गिटार-गायक पहुंचते हैं. गाने-बजाने के साथ ही नारेबाजी और देश बदलने की ललकारें उठती हैं. कभी-कभार पुलिस बैरीकेडों पर चढ़ने की घटनाएं और पानी का हमला भी होता है. इन समस्त प्रक्रियाओं से होते हुए आंदोलन संपन्न हो जाता है. इस बात की ज्यादा परवाह किए बिना कि मुद्दे पर कोई प्रगति हुई है या नहीं. जाहिर है इनके पास हर दिन के हिसाब से दर्जनों ऐसे मामले आते हैं जिनमें प्रदर्शन का पोटेंशियल होता है. नतीजा, पिछले मुद्दे अपनी मौत मरने को पीछे छूट जाते हैं.

संख्या बढ़ने और उनके निरर्थक होते जाने तक आंदोलनों ने एक लंबी दूरी तय की है. थोड़ा गहराई में घुसने पर आंदोलनों के भीतर जबर्दस्त अवसरवाद, वास्तविक संगठनों और आंदोलनकारियों की कमी और लेफ्ट-राइट व सेंटर के बीच के अंतरविरोध सामने आते हैं. कहीं-कहीं पर ये आपस में इतना उलझे हुए हैं कि इनसे कोई साफ तस्वीर बना पाना बेहद मुश्किल है. वामपंथी आंदोलनों से जुड़े रहे अभिषेक श्रीवास्तव एक ऐसी घटना का जिक्र करते हैं जिससे आंदोलनों के अजीबोगरीब चरित्र और इनके बेमायने होते जाने का एक सूत्र पकड़ा जा सकता, है, ‘जैसे इन दिनों गाजा पर हमलों के खिलाफ इजराइल का विरोध हो रहा है ऐसा ही एक विरोध सालभर पहले इजराइली दूतावास पर आयोजित हुआ था. इस प्रदर्शन की आयोजक आंदोलनों की ‘ग्रैंड ओल्ड लेडी’ कही जानेवाली एक मशहूर नारीवादी समाजसेवी थीं. अचानक भीड़ से एक युवक खड़ा हुआ और उसने ललकारा, ‘इजराइल मुर्दाबाद’. यह सुनते ही उन महिला समाजसेवी की भृकुटियां तन गईं. उन्होंने तुरंत उस लड़के को चुप करा दिया.’ इसके बाद उन्होंने इजराइल विरोधी प्रदर्शन स्थगित कर सारे झंडा-बैनर समेट लिए. हालांकि उस लड़के के व्यवहार में कुछ भी गलत नहीं था. प्रदर्शन में जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगना आम बात है.’

यही स्थिति इन दिनों होनेवाले लगभग सभी आंदोलनों की बन रही है. क्यों आंदोलन शुरू हो रहे हैं या खत्म हो रहे हैं, साफ-साफ अंदाजा लगा पाना बेहद मुश्किल है. नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े रहे वरिष्ठ आंदोलनकारी असित दास इसकी बड़ी वजह पर रोशनी डालते हैं, ‘आंदोलनों का एनजीओकरण हो गया है. एनजीओ किसी भी आंदोलन को प्रोजेक्ट की तरह लेते हैं. इसका परिणाम यह होता है कि आंदोलनों का राजनैतिक और जनवादी पक्ष पूरी तरह से नजरअंदाज हो जाता है. इसके अलावा इधर बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों ने सत्ता वर्ग के साथ दबे-छुपे हाथ मिला लिया है.’ दास का इशारा बीते एक दशक के दौरान संगठनों और सरकारों के बीच पनपे प्रेम प्रसंग की तरफ है.

सरकार के साथ गलबहियां और आंदोलनों का एनजीओकरण दोनों आपस में जुड़ी हुई चीजें हैं. वर्तमान में जो स्वरूप हम आंदोलनों का देख रहे हैं उसके पीछे इन दोनों चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका है. इसे समझने के लिए लगभग एक दशक पीछे लौटना होगा. जून 2004 में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की स्थापना के साथ पहली बार देश के सामने एक विचित्र स्थिति पैदा हुई. जो लोग किसी न किसी आंदोलन या सरकार विरोधी खेमे का हिस्सा हुआ करते थे उनका एक बड़ा हिस्सा एकाएक सरकार के पाले में जा खड़ा हुआ. इस सूची में अरुणा रॉय, हर्ष मंदर, योगेंद्र यादव, दीप जोशी, फराह नकवी जैसे तमाम नाम शामिल थे. इसका असर दो रूपों में हुआ. आंदोलनों के क्षेत्र में एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया और सरकार के हाथ एक तर्क यह लग गया कि जब सारे फैसले आंदोलनकारी ही कर रहे है तब बाहर से किसी तरह के आंदोलन की गुंजाइश ही कहां बचती है. इससे उन आंदोलनकारियों को भारी झटका लगा जो स्वतंत्र रूप से आंदोलनों के हामी थे. स्थितियां और भी खराब इसलिए हो गईं क्योंकि जनवादी आंदोलनों का बड़ा हिस्सा रहा वामपंथ भी तब की केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन देकर एक प्रकार से उससे जुड़ा हुआ ही था, दूसरा राजनैतिक रूप से वह लगातार सिमटता भी जा रहा था. अगर पिछले दस सालों का इतिहास उठाकर देखें तो वामपंथी दलों ने दिल्ली में एक भी बड़े आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया है. इनकी भूमिका पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई के खिलाफ खानापूर्ती करनेवाले ‘भारत बंद’ जैसे आंदोलनों तक सिमट कर रह गई है.

इस खालीपन को बला की तेजी से एनजीओ वालों ने भरा. एक बार जब आंदोलनों के ज्यादातर स्पेस पर एनजीओ का कब्जा हो गया तो उनका चेहरा बड़ी तेजी से संघर्ष और राजनैतिक चेतना का चोला छोड़कर ‘प्रोजेक्ट’ केंद्रित हो गया. इस हालत की तुलना आप उस दृश्य से कीजिए जब साठ के दशक के उत्तरार्ध में लेफ्ट के एक बुलावे पर वियतनाम युद्ध के विरोध में छह लाख लोग कोलकाता की सड़कों पर उमड़ पड़े थे, वह भी बिना किसी पूर्वयोजना या पेशेवर संगठन के. दास के शब्दों में, ‘एनजीओ के रहते इस तरह के व्यापक जन आंदोलन संभव नहीं हंै क्योंकि उनके हाथ पैर तमाम जगहों पर फंसे होते हैं.’ आंदोलनों में एनजीओ का प्रभाव बढ़ने का एक असर यह भी हुआ कि जो लोग पहले सिर्फ सकारात्मक बदलावों और मांगों के लिए अच्छी नीयत से आंदोलनों का हिस्सा हुआ करते थे उनमें से भी कइयों ने अपने-अपने एनजीओ खड़े कर लिए. जानकारों की मानें तो बचे हुए जाने-पहचाने आंदोलनकारियों में कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने आज विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के साथ हाथ मिला लिए हैं. एनजीओ इनको एक नियत मासिक शुल्क देते हैं, बदले में ये आंदोलनकारी इन संस्थाओं के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने और उनके अभियानों को विश्वसनीयता प्रदान करने का काम करते हैं.

लगभग चार महीने पहले हरियाणा के भगाणा से आई कुछ बलात्कार पीड़िताओं के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित  किया गया था. यह आंदोलन गैर सरकारी संस्थाओं और आंदोलनकारियों की आपसी खींचतान और अवसरवादिता का बेजोड़ नमूना है. भगाणा का मसला दलितों की जमीनों पर कब्जे से जुड़ा था. हरियाणा में  लगातार हो रहे उनके उत्पीड़न से जुड़ा था. इस वजह से भगाणा के सौ से ज्यादा दलित एक साल से बेघरबार हैं. लेकिन दिल्ली में ज्यादा हल्ला तब ही हुआ जब सवर्णों ने कथित तौर पर गांव की चार दलित लड़कियों को अगवा करके उनके साथ बलात्कार किया और बलात्कार की पीड़िताएं दिल्ली आ गईं. इसके बाद भी विरोध प्रदर्शन के केंद्र में महिलाओं की आजादी, उनके अधिकार, उनका सम्मान, मर्दवादी मानसिकता का विरोध जैसी फैशनेबुल क्रांतिकारिता ही रही. ऐसा नहीं है कि महिला अधिकार से जुड़े ये मुद्दे जरूरी नहीं है लेकिन दूसरे जरूरी मुद्दों को एनजीओ वालों ने कभी नहीं छुआ. आज की स्थिति यह है कि भगाणा की पीड़िताएं और ग्रामीण अभी न्याय के इंतजार में जंतर-मंतर पर ही बैठे हुए हैं लेकिन उनके साथ जुड़े सारे आंदोलनकारी लापता हो चुके हैं. इनमें जेएनयू के तमाम छात्र संगठन भी शामिल हैं(देखें बॉक्स).

कई मुद्दों को न छूनेवाली गैर सरकारी संगठनों की मजबूर भूमिका के पीछे विदेशी सहायता नियंत्रण अधिनयम (एफसीआरए-2010) को भी ध्यान में रखना होगा. 1976 के कानून को बदलते हुए इस कानून में दो चीजें की गईं, एक तो एनजीओ के लिए विदेशी सहायता प्राप्त करना आसान हो गया दूसरा, इनकी गतिविधियों के आधार पर कभी भी इनकी सहायता रोकने से लेकर मान्यता निरस्त करने तक के अधिकार सरकार के हाथ में और मजबूत कर दिए गए. आज ज्यादातर एनजीओ इस चंगुल में फंस चुके हैं. गैर सरकारी संगठनों के सबसे बड़े समूह एनएपीएम यानी नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट के अधिकतर सदस्य आज एफसीआरए के तहत सहायता प्राप्त हैं.

आज के आंदोलनकारियों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. एक हिस्सा उन आंदोलनकारियों का है जो मूलत: वर्चुअल दुनिया में सैर करता है, दूसरा हिस्सा उनका है जो सड़कों पर उतरकर हल्ला बोलते हैं. पहले वाले समूह को मजाक में फेसबुकिया क्रांतिकारी कहने का चलन भी है. ये वे लोग हैं जो एक्चुअल स्पॉट यानी जंतर-मंतर या भवन-एंबेसियों पर कम ही जाते हैं. ये आरामप्रिय आंदोलनकारियों का समूह है जो अपने घरों के ड्राइंग रूम में बैठकर क्रांति की अलख जगाने का दम भरता है. हालांकि इसकी अपनी उपयोगिता है. ये टेक-सेवी लोग हैं जो सोशल मीडिया पर इवेंट पेज बनाने से लेकर प्रेस रिलीज तैयार करने, फेसबुक और ट्विटर पर बहस बढ़ाने और फिर उसे ट्रेंड कराने का काम करते हैं. इनमें सुयश सुप्रभ, मोहम्मद अनस, महताब आलम जैसे अनगिनत नाम लिए जा सकते हैं. मौजूदा दौर के आंदोलनों में इन उपायों की भूमिका काफी बढ़ गई है. हालांकि इनके दुष्प्रभाव भी कई बार देखने को मिले हैं. हमारे देश में सोशल मीडिया इतना अपरिपक्व और फैसला-प्रेमी है कि कई बार हालात उस मुहाने पर जा खड़े होते हैं जहां हालात बेकाबू हो जाते हैं.

12 सितंबर को अमन एकता मंच के तले चाणक्यपुरी स्थित उत्तर प्रदेश भवन के सामने मुजफ्फरनगर के दंगों का विरोध करने के लिए कुछ लोग इकट्ठा हुए थे. अमन एकता मंच में खुर्शीद अनवर, अपूर्वानंद, महताब आलम समेत तमाम सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे. इनके साथ ही विरोध में एक गैर पंजीकृत समाजसेवी संस्था ‘बूंद’ के कुछ सदस्यों ने भी हिस्सा लिया था. इला जोशी और मयंक सक्सेना इस संस्था के प्रमुख चेहरे हैं. इस संस्था पर बाद में उत्तराखंड में राहत कार्यों में आर्थिक घपले का भी आरोप लगा. इसी टीम की एक महिला सदस्य ने खुर्शीद अनवर के ऊपर बलात्कार का आरोप लगाया. लेकिन वे अपने इन आरोपों को लेकर कभी पुलिस के पास नहीं गए. बल्कि इस मामले को लेकर वे दो मशहूर नारीवादियों के पास पहुंच गए. इनमें से एक थीं मधु किश्वर और दूसरी कविता कृष्णन. इस मामले में इन दोनों नारीवादियों की भूमिका बहुत ही विचित्र रही. टीवी पर हर किस्म का ज्ञान देनेवाली इन दोनों नारीवादियों ने भी मामले को पुलिस के संज्ञान में ले जाने की जरूरत नहीं समझी. इसके स्थान पर मधु किश्वर ने पीड़िता लड़की का एक वीडियो तैयार करवाया – जिसमें वह अपने कथित बलात्कार के बारे में बता रही थी – और उसे लड़की के कुछ अनुभवहीन युवा साथियों के हवाले कर दिया. इसके सहारे लड़की के साथियों ने फेसबुक पर खुर्शीद के खिलाफ हल्ला बोल दिया. इसमें ‘फेसबुकिया क्रांतिकारियों’ ने जमकर उनका साथ दिया. इसके बाद खुर्शीद स्वयं इस मामले में अपने खिलाफ चल रहे अभियान के खिलाफ पुलिस के पास गए लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी.

उधर कविता कृष्णन ने खुर्शीद की संस्था आईएसडी को पत्र लिखकर इस मामले में कार्रवाई करने की मांग की और टीवी पर भी इस मुद्दे पर खुर्शीद अनवर के खिलाफ बयानबाजी की. इसका नतीजा यह हुआ कि दबाव में घिरे खुर्शीद अनवर ने अपने घर की चौथी मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली. इस घटना के बाद कविता का कहना था कि चूंकि लड़की ने सीधे उनसे शिकायत नहीं की थी इसलिए उन्होंने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की. लेकिन दुनिया ने देखा कि वे इंडिया टीवी पर बड़े मजबूत तरीके से खुर्शीद अनवर के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थीं. जेएनयू के एक पूर्व आइसा कार्यकर्ता, कविता की मीडिया में दिखने की भूख को इसकी वजह बताते हैं.

कविता कृष्णन का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है. 16 दिसंबर 2012 को हुए निर्भया कांड के साथ ही उन्होंने अपना फोकल प्वाइंट छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के मुद्दों से हटाकर दिल्ली की महिलाओं पर शिफ्ट कर दिया. देखते ही देखते वे महिला अधिकारों की बड़ी पैरोकार के रूप में स्थापित हो गईं. बाद में तरुण तेजपाल के मामले में भी कविता कृष्णन ने काफी आक्रामक आंदोलन चलाया. आजकल महिलाओं पर अत्याचार के हर मुद्दे पर बोलते हुए उन्हें टीवी पर देखा जा सकता है.  उन्हीं कविता कृष्णन का एक और चेहरा भी है. जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष अकबर चौधरी और ज्वाइंट सेक्रेटरी सरफराज हामिद के ऊपर जेएनयू की एक छात्रा के यौन उत्पीड़न का आरोप है. ये दोनों लोग भी कविता के ही वामपंथी कुनबे के सदस्य हैं. लेकिन इसपर नारीवादी कविता कृष्णन का बयान था कि चूंकि आरोप लगानेवाली लड़की दूसरे ग्रुप की है इसलिए उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है.

कविता यहीं नहीं रुकी, ट्वीट दर ट्वीट आरोपी छात्रनेताओं के बचाव में वे तरह-तरह की दलीलें देती रहीं और पीड़िता लड़की की पहचान तक सार्वजनिक करने से नहीं चूकीं.  वे शायद नए दौर की नारीवादी हैं जो महिलाओं की लड़ाई लड़ती हैं और एक पीड़िता की पहचान सिर्फ इस आधार पर सार्वजनिक करने से नहीं चूकतीं क्योंकि इस बार आरोपित उनके अपने वामपंथी कुनबे के सदस्य थे. यहां तक कि दोनों आरोपितों ने 28 जुलाई को जेएनयू कैंपस में एक पैम्फलेट अभियान तक चलाया जिसमें लिखा था कि यदि जीएसकैश (जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्शुअल हरेसमेंट) ने जांच शुरू की तो दोनों नेता अपने पदों से इस्तीफा दे देंगे. शिकायत को सार्वजनिक करने के आरोप में जीएसकैश ने दोनों पदाधिकारियों को नोटिस जारी किया. जीएसकैश के नियम कहते हैं कि एक बार मामला दर्ज हो जाने के बाद शिकायतकर्ता और आरोपित इसके बारे में सार्वजनिक बात नहीं कर सकते. लेकिन दोनों ने ऐसा ही किया. इस पूरे मसले पर उनकी पार्टी जिसका प्रमुख चेहरा कविता कृष्णन हैं, ने पहले तो चुप्पी साध ली बाद में पीड़िता के प्रति वही सारे अनर्गल तर्क दोहराती दिखी जो आम तौर पर इस तरह के मामले में दूसरे आरोपी देते हैं.

आंदोलनकारियों की नीयत और उनके विरोधाभासों का एक और नमूना हाल ही के दिनों में देखने को मिला. आजकल दिल्ली के जंतर-मंतर और इजराइल के दूतावास पर गाजा में हो रहे हमलों का आए दिन विरोध हो रहा है. आंदोलनों के लिए मानव संसाधन की आपूर्ति करने वाले जेएनयू के तमाम छात्र संगठनों का इस दौरान बेहद विद्रूप चेहरा सामने आया. आयोजकों ने प्रदर्शन को किसी पार्टी, संगठन या समूह की पहचान से दूर रखने के लिए इसमें किसी को भी झंडा-बैनर लाने से मना कर दिया था. इस एक रुकावट की बुनियाद पर आइसा, एसएफआई समेत जेएनयू के तमाम आंदोलनकारी संगठनों का इंसानियत के पक्ष में खड़ा होने का दावा डोल गया. सबने एक सुर में इसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया. आइसा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता जो फिलहाल मोहभंग की स्थिति में हैं कहते हैं, ‘इनका सारा लक्ष्य मीडिया कवरेज बटोरने और बाइट देने पर केंद्रित होता है. भाकपा (माले) की शाखा (आइसा) झंडा-बैनर के साथ अपनी उपस्थिति के लिए कुख्यात हैं.’

कविता या आइसा ही इस बीमारी से ग्रसित नहीं है बल्कि पूरे वामपंथी समुदाय का रुख कुछ-कुछ ऐसा ही है. एक ही तरह के मामलों में दो अलग-अलग तर्क ढूंढ़ लेने की कला राजनीतिज्ञों से फिसल कर मानवाधिकारियों और आंदोलकारियों के हाथों में भी आ गई है. कुछ दिन पहले ही वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर कृष्णमोहन और उनकी पत्नी किरण सिंह के बीच हुई मारपीट का मामला बेहद मौजूं है. दोनों ही पूर्व आइसा कार्यकर्ता रहे हैं. किसी विवाद पर कृष्णमोहन अपनी पत्नी की पिटाई करने की हद तक उतर गए. यह बीएचयू कैंपस की घटना है. पंद्रह मिनट के वीडियो में कृष्णमोहन और उनका बेटा बेरहमी से किरण सिंह को पीटते हुए दिखाई देते हैं. इतने स्पष्ट प्रमाण होने के बावजूद तथाकथित उदारपंथी-वामपंथी-नारीवादी तबका या तो चुप रहा या फिर इस हिंसा को उचित ठहराने के यत्न करता रहा. यह वही समुदाय है जो हर वक्त-बेवक्त महिला अधिकारों की बात करता है, पितृसत्ता का विरोध करता है और मर्दवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ने का दम भरता है. इसका बचाव करने वालों में उदीयमान साहित्यकार चंदन पांडेय भी हैं जिन्होंने अपने ब्लॉग पर बाकायदा इस पिटाई प्रकरण की आवश्यकता पर अपना ज्ञान रखा है. कृष्णमोहन के बचाव के तर्क में चंदन पांडेय पतित मीडिया, मंदबुद्धिजीवी मीडिया, लोमड़ी मीडिया जैसे विशेषण तो गढ़ते हैं लेकिन एक महिला के साथ हुई हिंसा के औचित्य पर एक भी तर्क नहीं दे पाते. बीएचयू के पुराने जानकारों की मानें तो चंदन पांडेय ऐसा करके अपना गुरु-ऋण उतार रहे थे.

ऐसा भी नहीं है कि इस मुद्दे पर आवाज उठाने की कोशिश नहीं हुई. युवा लेखकों और फेसबुक संप्रदाय ने कई बार इस पर बहस छेड़ने की कोशिश की लेकिन जिन हिस्सों से इस पर ठोस आवाजें और समर्थन की लहर उठनी चाहिए थी वहां कोई हलचल ही नहीं हुई. इस चुप्पी की एक बड़ी वजह यह उभरकर आती है कि बुद्धिजीवी तबके के एक बड़े हिस्से की निजी जिंदगी भी इसी किस्म की उठापटक और विरोधाभासों से ठसाठस है. लिहाजा कीचड़ में पत्थर उछालने पर खुद के ऊपर आने वाली छींटों के भय से भी चारों तरफ शांति पसरी हुई है.

इन घटनाओं से यही साबित होता है कि ज्यादातर आंदोलनकारियों का सारा विरोध बेहद चुनिंदा और निजी हित-लाभ के इर्द गिर्द बुना जाता है. आंदोलन के चयन की प्रक्रिया कई मानकों से तय होती है. मसलन मुद्दा क्या है, आंदोलन का सेलेब्रिटी स्तर क्या है, दिल्ली बेस है या दिल्ली से बाहर है, मीडिया कवरेज की क्या संभावना है, इंटरनेट, यूट्यूब लाइव, गूगल हैंगआउट होना है या नहीं आदि आदि. मीडिया कवरेज से जुड़ा एक वाकया देना यहां लाजिमी होगा. भगाणा की पीड़िताओं को लेकर दिल्ली आने में पूर्व बसपा नेता वेदपाल तंवर की भूमिका महत्वपूर्ण थी. जंतर-मंतर पर पहुंचकर भगाणा के सारे लोग आपस में जिम्मेदारियों का बंटवारा कर रहे थे. इस दौरान मीडिया से जुड़ी जिम्मेदारियों के बंटवारे की बात आई तो लोगों ने अपने बीच की ही एक महिला का नाम इसके लिए तय कर दिया. इस बात पर वहां तंवर और अन्य आंदोलनकारियों में जबर्दस्त कहा-सुनी हो गई. वे स्वयं मीडिया से रूबरू होना चाहते थे.

अपनी पड़ताल के दौरान तहलका ऐसे तमाम लोगों से भी मिला जो अमूमन हर आंदोलन में ईमानदारी से शिरकत करते हैं और अंत में खुद को छला हुआ महसूस करते हैं. ये कोई पेशेवर या राजनैतिक रूप से तीक्ष्णबुद्धिवाला तबका नहीं है न ही इनकी कोई लंबी-चौड़ी महत्वाकांक्षाएं होती हैं. चीजों को बाहर-बाहर से देख कर ये लोग उसके बारे में अपनी राय बना लेते हैं और अपनी भलमनसाहत की वजह से आंदोलनों का हिस्सा बन जाते हैं.

इस संदर्भ में यहां दो घटनाओं का जिक्र करना बहुत जरूरी है. पहला मामला जामिया से पीएचडी कर रहे छात्र प्रदीप कुमार का है. दिल्ली में हो रहे भगाणा की पीड़िताओं के समर्थन में जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन आहूत था. प्रदीप जामिया से लगभग 100 लोगों का दल लेकर आंदोलन में शिरकत करने पहुंचे. उन्हें इस बात की जानकारी फेसबुक से मिली थी. वहां पहुंचकर उन्हें पता चला कि ज्यादातर आयोजनकर्ता-आंदोलनकारी मीडिया को बाइट देने और सेल्फी खींचने-खिंचाने के बाद निकल लिए हैं. सिर्फ पीड़िताएं और गांववाले वहां रह गए थे. प्रदीप अपने सौ लोगों की भीड़ के साथ काफी देर वहां भटकते रहे और अंतत: वापस चले आए.

दूसरा मामला दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए कर रहे अविनाश पांडेय का है. अविनाश की कहानी और भी ज्यादा दिलचस्प है. अविनाश नई दिल्ली के आस-पास आंदोलन सर्किल का जाना-पहचाना चेहरा हैं. वे युवाओं की उस टोली का प्रतिनिधि चेहरा हंै जिनके जोश का फायदा उठाते हुए एनजीओ और दूसरे संगठन अपना धरना-प्रदर्शन सफल बनाते हैं. समय बीतने के साथ ही इनको महसूस होने लगता है कि उनका इस्तेमाल किया जा रहा है. पहले ये निराश होते हैं फिर आयोजकों से कुछ सवाल करते हैं. इन सवालों के जवाब देने की बजाय पेशेवर आयोजक और नेता – जिन्होंने चिरौरी कर-करके इन्हें अपने आंदोलनों से जोड़ा था- इनसे किनारा करने लगते हैं. अविनाश की कहानी के जरिए पेशेवर क्रांतिकारिता की कई परतें खुद-ब-खुद उधड़ जाती हैं.

अविनाश 2011 में दिल्ली आए. बकौल अविनाश अब तक वे सौ से ज्यादा विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा ले चुके हैं. इस दौरान उन्होंने पुलिस की लाठियां भी खाईं, एकाध बार वे घायल भी हुए. उन्हें असल चोट तब लगी जब दिल्ली में होनेवाले इन कथित आंदोलनों की सच्चाई से उनका सामना हुआ. अविनाश के मुताबिक सबसे पहले वे अन्ना आंदोलन में गए. वहां कुछ लोग उनके साथी बने और फिर आए दिन वे किसी न किसी मुद्दे पर प्रदर्शन के लिए जाने लगे. अविनाश बताते हैं, ‘अन्ना के आंदोलन में हिस्सा लेने के दौरान ही मैं असीम त्रिवेदी, आलोक दीक्षित, इला जोशी, मयंक सक्सेना आदि के संपर्क में आया. हमारा एक गुट बन गया. इसी दौरान 2012 की दिसंबर में निर्भया कांड हो गया. इस दौरान मैं कई-कई बार इंडिया गेट, जंतर-मंतर और राष्ट्रपति भवन गया.’ ये वही इला और मयंक हैं जिनकी संस्था बूंद की सदस्या ने खुर्शीद अनवर के ऊपर बलात्कार का आरोप लगाया था.

‘मुझे पहला झटका निर्भया आंदोलन के दौरान ही लगा था लेकिन तब मैंने इसे नजरअंदाज कर दिया था. हुआ यह कि 31 दिसंबर के आसपास मयंक ने फेसबुक पर एक पेज बनाया और लोगों से अपील की कि वे जंतर-मंतर पहुंचें. मैं अपने कुछ साथियों के साथ जंतर-मंतर पहुंचा. वहां हमारे साथ संतोष कोली भी थी. उसी रात अलोक दीक्षित और असीम त्रिवेदी पार्लियामेंट थाने के सामने धरना दे रहे थे क्योंकि पुलिस ने एक लड़की को चौबीस घंटे से थाने में रोक रखा था. मुझे इस बाबत बताया गया. मैं भी संसद मार्ग पुलिस थाने पर पहुंच गया. रात बारह बजते बजते मयंक-इला, असीम और आलोक एक-एक कर वहां से निकल गए. हमें बताया गया था कि सारे लोग रात भर थाने के आगे ही बैठेंगे. मैं अपने साथियों के साथ वहां अकेले फंस गया. काफी देर हो गई थी. हमें भूख भी लग गई थी. थोड़ी देर तक तो हमने जंतर-मंतर पर कुछ-कुछ जलाया और उसके सहारे बैठे रहे. फिर थोड़ी देर बाद लगा कि अब खुले में नहीं रहा जाएगा. वो रात मैंने अपने दो दोस्तों के साथ गुरुद्वारा बंगला साहेब  में बिताई थी’ अविनाश आगे बताते है, ‘अपने सौ से ज्यादा प्रदर्शनों के अनुभव के आधार पर मैं जितना समझ पाया हूं उसके हिसाब से हम जिन लोगों के साथ जुड़े या जिनके बुलावे पर हर जगह पहुंच जाते हैं उनके लिए इन प्रदर्शनों का यही उपयोग है कि वे वहां पहुंचकर फोटो खिंचवा लें, मीडिया से बतिया लें, सेल्फी ले लें, यू-ट्यूब पर लाइव करवा लें और फिर जल्दी से घर पहुंच कर फेसबुक पर लंबे-लंबे स्टेटस लिख दें. क्योंकि इसी के आधार पर उनकी संस्था का प्रोफाइल आगे के लिए मजबूत होता है.’

अविनाश को दूसरी बार तब निराशा हुई जब वे एक छात्र संगठन के बुलावे पर संसद का घेराव करने संसद मार्ग पहुंचे थे. वहां पुलिस लाठी चार्ज में वे घायल भी हुए. अविनाश कहते हैं, ‘मैंने मुद्दे की तरफ ध्यान दिया तो समझ आया कि यह घेराव पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए था. मेरे मन में एक सवाल उठा कि ये छात्र संगठन अपने विश्वविद्यालयों के भीतर मौजूद समस्याओं को कभी मुद्दा नहीं बनाते. लड़ाई तो वहां से भी शुरू की जा सकती है? देश की शिक्षा को ठीक करने के लिए आप लाठियां खिलवाते हैं, लेकिन दिल्ली के ही छात्रों के मुद्दों पर कान तक नहीं देते. मैंने यह सवाल संगठन के लोगों के सामने उठाया. तो उनका तर्क था कि तुम समझते नहीं हो. यह मुद्दा बहुत लोकल है.’ अविनाश के मुताबिक कुछ लोग जोशीले युवाओं के बलबूते अपनी जमीन तैयार करते हैं, आगे चलकर कुछेक प्रदर्शन आदि के जरिए अपना एनजीओ बना लेते हैं. दिल्ली के ज्यादातर छात्र संगठनों का एक खुला ट्रेंड है. ये संगठन छात्रों के हित के लिए कम, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय और अक्सर बेमतलब के मुद्दों पर ज्यादा प्रदर्शन करते हैं. इनके अपने हॉस्टल का नाला बह रहा होता है लेकिन इनकी चिंता में अमेरिका द्वारा सहारा के मरुस्थल में किए गए मिसाइल परीक्षण से पैदा हुई पर्यावरणीय विपत्तियां सर्वोपरि होती हैं.

आए दिन जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक इकट्ठा होनेवाली आंदोलनकारियों की भीड़ के कुछ और भी चेहरे हैं. मसलन लगभग हर आंदोलन में एक तबका ऐसा भी पहुंचता है जो इस अवसर का इस्तेमाल सिर्फ नेटवर्किंग और अपने संपर्क बनाने के लिए करता है. इन आंदोलनों में अक्सर मेधा पाटकर, आमिर खान से लेकर तमाम नामी गिरामी नेता-अभिनेता भी शिरकत करते रहते हैं. चूंकि यहां ऐसे लोगों से मिलना-जुलना थोड़ा आसान होता है. इसलिए जाहिर है लोग इन आंदोलनों का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत रिश्तों को फैलाने-बढ़ाने के लिए भी करते हैं.

यहां सवाल फिर वही खड़ा हो जाता है कि आंदोलन तो हर दिन होते हैं और उनमें लोग भी खूब दिखते हैं पर इन आंदोलनों की नियति क्या है. साफ है कि जिस तरह के लोग आजकल ज्यादातर आंदोलनों का हिस्सा होते हैं उसके चलते ये आंदोलन सिर्फ एक दिन का शो बनकर दम तोड़ देते हैं.

हाल के दिनों में जंतर-मंतर के आस-पास आंदोलनकारियों का एक नया समूह उभरा है. यह दक्षिणपंथी आंदोलनकारियों का समूह है. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद ये लोग अचानक से सक्रिय हुए हैं. इनके आंदोलनों का दायरा फिलहाल गोरक्षा दल, निर्मल गंगा-अविरल गंगा, कश्मीर बचाओ-देश बचाओ टाइप आंदोलनों तक सीमित है. इनमें से गोरक्षा आंदोलन वाले सबसे ज्यादा सक्रिय हैं लिहाजा पूरा जंतर-मंतर का इलाका गो-मूत्र और गोबर की सुवासित गंध से सराबोर रहता है. यहां गोरक्षा दल ने 20-25 गायों के साथ डेरा डाल रखा है. दूर से देखने पर जंतर-मंतर किसी तबेले का सा दृश्य प्रस्तुत करता है. दक्षिणपंथी आंदोलनकारियों के चेहरे भी काफी कुछ जाने-पहचाने से हैं. इनमें तेजिंदर बग्गा और उनके सहयोगियों का चेहरा और जिक्र बार-बार आता है. ये वही तेजिंदर बग्गा हैं जिन्होंने महान क्रांतिकारी भगत सिंह के नाम पर क्रांति सेना बनाकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को पीट दिया था. इसी संगठन के लोग एक नए संगठन भारत रक्षा दल के बैनर तले आम आदमी पार्टी के कौशांबी स्थित दफ्तर पर हमला करने पहुंचे गए थे. बाद में मीडिया के कैमरों और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर इनके बारे में पता चल गया. दस सालों तक सत्ता से बाहर रहने के कारण फिलहाल आंदोलनों में दक्षिणपंथी कुनबे का हस्तक्षेप काफी सीमित हो गया है. लेकिन जानकारों के मुताबिक आनेवाले दिनों में हर आंदोलन में इनका असर बढ़ेगा, और हो सकता है वामपंथी समूह हाशिए की तरफ चले जाएं.

लेकिन यह भी सच है कि जो पेशेवर क्रांतिकारी हैं वे यहां स्थायी रूप से टिके रहेंगे. इस चोगे में नहीं तो उस चोगे में. क्योंकि हर मौसम के साथ जीने की कला उन्हें बखूबी आती है.

(विकास कुमार के सहयोग से)

atul@tehelka.com

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‘तहलका’ की हालत दयनीय, पांच महीने से नहीं मिली सेलरी, मैनेजमेंट चुप

जब से नया निजाम (केडी सिंह) आया है तब से मैनेजमेंट और संपादकीय के बीच संवादहीनता बढ़ी है. तहलका की अंग्रेजी और हिंदी दोनों मैग्जीन के बंद होने संबंधी खबर न्यूज रूम के भीतर तैर रही है. फील्ड रिपोर्टिंग के लिए फंड ठीक से नहीं मिल रहा है. पहले हर महीने की सात तारीख को सेलरी मिलती थी. लेकिन इस महीने की सेलरी अभी तक नहीं मिली है. सेलरी देरी से मिले फिर भी कोई बात नहीं, लेकिन आश्चर्यजनक है मैनेंजमेंट की चुप्पी.

संपादक तक को नहीं पता कि इस महीने की सेलरी कब तक मिलेगी. दोनों पत्रिकाओं के संपादकीय टीम में लोगों की भारी कमी है. लेकिन कोई नई नियुक्ति नहीं हो रही है. पिछले दिनों तीन बड़ी नियुक्तियां हुई थीं. उम्मीद बंधी थी कि शायद अब कोई बदलाव दिखेगा लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा. सब कुछ जस का तस है. पांच महीने का सेलरी प्रबंधन दबाए हुए है. कुल मिलाकर तहलका की हालत दयनीय हो चली है और सबसे ज्यादा खराब हाल में हैं यहां काम कर रहे बचे हुए मीडियाकर्मी.

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