हे टीवी मीडिया के महंतों, अब बताओ साहित्य कौन देख रहा है जो प्राइम टाइम में ताने हुए हो

Vineet Kumar : मुझे फिलहाल मीडिया के उन सारे महंतों का चेहरा याद आ रहा है जो उपहास उड़ाते हुए पूछते थे- अब कौन पढ़ता है साहित्य, कौन देखेगा साहित्य की खबर? अभी कौन देख रहा है जनाब जो प्राइम टाइम में ताने हुए हो..सीधे पैनल डिस्कशन पर उतरने से पहले दो मिनट की पैकेज तो लगा दो..पता तो चले काशीनाथ सिंह कौन हैं, मुन्नवर राणा कौन है, उदय प्रकाश किस पेशे से आते हैं?

टीवी के दर्शक वेवकूफ नहीं थे..तुमने स्ट्रैटजी के तहत साहित्य से, कला से, देश की संस्कृति से काटकर उसे डफर बनाने की कोशिश की..तब भी नाकाम ही रहे. जो कभी न्यूजरूम में पूछा करते थे- अमृता प्रीतम गायिका है, वो साहित्यकारों पर तनातनी कर रहे हैं. साहित्य अकादमी में सरकार के दावे और छवि का तो जो हो रहा है, वो है ही..पोर-पोर कलई खुल रही है कि चैनलों के महंत कितने पढ़े-लिखे हैं?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भारत का मीडिया TRP के लिए दंगा, फसाद, हत्या, बलात्कार, धरना-प्रदर्शन, आगजनी और लूट के कार्यक्रम प्रायोजित करेगा!

Ajit Singh : पकिस्तान जब भारत से हारा तो पाकिस्तानियों ने अपने TV फोड़ दिए। ऐसा हमको मीडिया ने बताया। हम लोगों ने भी खूब चटखारे लिए। पाकिस्तानियों को इसी बहाने certified चूतिया घोषित कर दिया। बड़ा मज़ा आया। अब मीडिया ने दिखाया कि हिन्दुस्तान में भी लोगों ने TV फोड़ दिए। मैंने इस खबर को बड़े गौर से देखा। मीडिया ने ये भी बताया कि लोग आंसू बहा रहे हैं। उनके आंसू भी देखे । लोग tv सड़कों पे पटक रहे हैं। प्रश्न ये है कि लोग news channel के कैमरा को दिखाने के लिए टीवी फोड़ रहे हैं क्या ? लोगों ने tv खुद फोड़े या मीडिया ने स्टोरी बनाने के लिए फुड़वाये? पुराने टंडीरा TV हैं। साफ़ दिखाई दे रहा है। क्या ये नहीं खोजा जाना चाहिए कि ये नाटक किसने कराया? क्यों कराया? टीवी फोड़ने की घटना किसने शूट की? टीवी कहाँ से आये? कौन लोग थे जिनने अपना TV फोड़ा। जिन लोगों ने TV फोड़ा उन ने अपने घर से कभी संडास का mug भी फेंका है? रोने वालों में कुछ लोग तो स्टेडियम में बैठे हैं। बाकी जो बाहरी लोग दिल्ली मुम्बई में दिखाए जा रहे है वो बहुत घटिया acting कर रहे हैं। मीडिया वाले अपनी दुकानदारी चमकाने के चक्कर में सारी दुनिया को ये बताना चाहते है की सिर्फ पाकिस्तानी ही नहीं हम हिन्दुस्तानी भी certified चूतिया हैं ……ISO मार्का ….. हम भी किरकिट जैसे फर्जीवाड़े पे अपना TV फोड़ सकते हैं।

 

xxx

खुशवंत सिंह ने एक बार लिखा था। किसी शहर के लोगों का बौद्धिक स्तर आंकना हो तो उसकी bookshops देखो। बड़ा सटीक आकलन है। इसी प्रकार किसी कौम, किसी मुल्क का बौद्धिक स्तर नापना हो तो उसका tv देखो, उसके entertainment चैनल देखो, उसके news channels देखो। सुविख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार Arthur Hailey ने News, पत्रकारिता और पत्रकारों की दुनिया पे एक बेहतरीन उपन्यास लिखा है- The evening news. ये उन दिनों की कहानी है जब रोज़ाना शाम को tv पे या रेडियो पे 15 मिनट के समाचार आया करते थे। उपन्यास में ये जद्दोजहद दिखाई है की किस प्रकार मात्र 15 मिनट में दिन भर की और देस और दुनिया जहान की खबरें दिखानी होती थी। उसमे कितनी ही महत्वपूर्ण खबरें छूट जाती थीं। कितनी काट छाँट दी जाती। इसके लिए Arthur Hailey ने एक टिप्पणी की थी- its like putting 10 pounds of shit in an 8 pound carry bag . It keeps coming out. अब ज़माना बदल गया है। भारत देश में तो न्यूज़ का स्तर इस कदर गिर चुका है की जिस खबर को डेढ़ मिनट में दिखा के खत्म करना चाहिए उसे आधे घंटे में दिखाया जाता है। एक ही clipping बार बार हर बार रिपीट होती रहती है. । एक ही वाक्य को 3 -3 बार बोलते हैं anchor. Indian media carries a spoon ful of shit in a 10 pound carry bag.

xxx

70 के दशक में मशहूर उपन्यासकार Irving Wallace ने एक उपन्यास लिखा था। The Almighty. Almighty का अर्थ होता है सर्वशक्तिमान। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा जाता है। उपन्यास का कथानक कुछ यूँ है कि एक मीडिया tycoon अपने अखबार और न्यूज़ channel की TRP बढ़ाने के लिए पहले जघन्य हत्याएं और अपराध करवाता है और फिर अन्य अखबारों और news channels से पहले प्रसारित कर के TRP अर्जित करता है। पिछले दिनों देश में बेमौसमी बरसात हुई। ओले पड़े। फसलों को भी नुक्सान हुआ। मीडिया ने खूब घड़ियाली आंसू बहाये। अपने खेत की मेढ़ पे सिर पकडे बैठे किसान दिखाए। मेरी समझ में ये नहीं आया कि किसान और मीडिया का कैमरा एक साथ खेत पे पहुंचे कैसे? भारत मैच हार गया ऑस्ट्रेलिया से। मीडिया ने कबाड़ी की दूकान से कबाड़ के TV फोड़ने का प्रायोजित कार्यक्रम करवा के प्रसारित किया। लोग आंसू बहा रहे हैं। किरकिट के खेल में हार के देस शोक मगन है। इससे पहले हमारा मीडिया फ़र्ज़ी sting operation दिखाता आया है। एक चैनल ने इसी प्रकार दिल्ली की एक स्कूल टीचर पे human traffiking और prostitution में लिप्त होने का फ़र्ज़ी आरोप एक फ़र्ज़ी स्टूडेंट द्वारा लगवाया था। इसका नतीजा ये हुआ कि उस girls school के अभिभावक वो फ़र्ज़ी खबर देख के उस स्कूल के गेट पे एकत्र हो गए और उन्होंने उस बेचारी निर्दोष स्कूल टीचर से मारपीट की। और उस चैनल ने ये पूरा तमाशा लाइव दिखाया। इस फ़र्ज़ी sting और इस प्रायोजित आक्रोश और मारपीट का नतीजा ये निकला कि उस महिला और उनके परिवार भर का दिल्ली में रहना दूभर हो गया। कल्पना कीजिये कि एक मीडिया चैनल की बदमाशी के कारण आपके घर की माँ बहन बेटी बहू देश भर में वेश्या और वेश्याओं की दलाल घोषित हो जाए। बाद में जब जांच हुई तो पाया गया कि एक भांड चैनल ने एक free lancer सड़क छाप पत्रकार द्वारा एक फ़र्ज़ी प्रशिक्षु पत्रकार को उस स्कूल की फ़र्ज़ी छात्रा बना कर फ़र्ज़ी झूठे आरोप लगाए थे। बाद में दोनों पत्रकारों की गिरफ्तारी भी हुई और चैनल सिर्फ माफ़ी मांग के बच निकला। वो दिन दूर नहीं जब भारत का मीडिया TRP के लिए दंगा, फसाद, हत्या, बलात्कार, धरना, प्रदर्शन, आगजनी और लूट के कार्यक्रम (घटना) भी आयोजित प्रायोजित करेगा।

सोशल एक्टिविस्ट अजीत सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक न्यूज चैनल जहां महिला पत्रकारों को प्रमोशन के लिए मालिक के साथ अकेले में ‘गोल्डन काफी’ पीनी पड़ती है!

चौथा स्तंभ आज खुद को अपने बल पर खड़ा रख पाने में नाक़ाम साबित हो रहा है…. आज ये स्तंभ अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रहा है… खासकर छोटे न्यूज चैनलों ने जो दलाली, उगाही, धंधे को ही असली पत्रकारिता मानते हैं, गंध मचा रखा है. ये चैनल राजनेताओं का सहारा लेने पर, ख़बरों को ब्रांड घोषित कर उसके जरिये पत्रकारिता की खुले बाज़ार में नीलामी करने को रोजाना का काम मानते हैं… इन चैनलों में हर चीज का दाम तय है… किस खबर को कितना समय देना है… किस अंदाज और किस एंगल से ख़बर उठानी है… सब कुछ तय है… मैंने अपने एक साल के पत्रकारिता के अनुभव में जो देखा, जो सुना और जो सीखा वो किताबी बातों से कही ज्यादा अलग था…. दिक्कत होती थी अंतर आंकने में…. जो पढ़ा वो सही था या जो इन आँखों से देखा वो सही है…

कहते हैं किताबी जानकारी से बेहतर प्रायोगिक जानकारी होती है तो उसी सिद्धांत को सही मानते हुए मैंने भी उसी को सही माना जो मैंने अपनी आखों से देखा…  बहुत सुंदर लगती थी ये मीडिया नगरी बाहर से…. पर यहां केवल खबर नहीं बिकती… कुछ और भी बिकता है… यहाँ सिर्फ अंदाज़ नीलाम नहीं होते, यहां बिकता है स्वाभिमान… यहां क्रोमा के साथ और भी बहुत कुछ कट जाता है… यहां कटते हैं महिला पत्रकार के अरमान… यहां बलि चढ़ती है उसकी अस्मिता…. कामयाबी दूर होती है, लेकिन उसे पास लाने के यहां शॉर्टकट भी बहुत हैं… और उसे नाम दिया जाता है समझौता…

जब पहली बार एक नेशनल न्यूज़ चैनल के दफ्तर में कदम रखा तो सोचा था की अपनी काबलियत और हुनर के बलबूते बहुत आगे जाउंगी… आडिशन दिया… पीसीआर में खड़े लोगों ने अपनी आखों से ऐसे एक्सरे किया जैसे मेट्रो स्टेशन पर लगी एक्सरे मशीन आपके सामान का एक्सरे करती है… सिलेक्शन हुआ और शुरू हुआ मेरा भी करियर….. कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अपनी काबिलियत के बलबूते शायद मैं कुछ लोगों की आँखों की किरकिरी बनने लगी…

जब एक नन्हा परिंदा खुले आसमान में उड़ने की कोशिश करता है तब उसी आसमान में उड़ती हुई चील उस पर झपट्टा मारकर उसे अपना शिकार बनाने की कोशिश करती है… कुछ वैसा ही मेरे साथ भी होने लगा… मैं परेशान होकर सबसे पूछती फिरती कि आखिर बात क्या है… लेकिन किसी से जवाब नहीं मिलता… हार कर सीधे चैनल के मालिक से मिलने पहुंच गई… सोचा था कि यहाँ से तो हल जरूर मिलेगा.. लेकिन दिलो-दिमाग़ को तब 440 वोल्ट का झटका लगा जब ये पता चला कि मालिक से मिलने के बाद उनके साथ अंतरंग में एक कप काफ़ी पीनी पड़ेगी जो मेरे काम भी करा देगी, साथ ही साथ प्रमोशन और सैलरी में अच्छी खासी बढ़ोतरी करा देगी… ऑफिस की कई लड़कियां वो काफ़ी पी चुकी हैं… तब समझ आया कि जिनको JOURNALISM का J नहीं आता वो कैसे इतनी ऊंची पोस्ट पर पहुंच गये… जाहिर है सारा कमाल उस गोल्डन काफ़ी का था…

अब दो आप्शन थे मेरे सामने… या तो नौकरी छोड़ दूं या उस काफ़ी का एक सिप ले लूं… लेकिन मैं बेचारी, अपने काबिलियत को एक कप काफ़ी की कीमत से नहीं तौल पाई… और नौकरी छोड़ दी मैंने…. अब दूसरे संस्थान में हूं… ये कैसा सच है, जिसे सब जानते हैं लेकिन सब झूठ मानकर अपनी नौकरी बचाने के लिए चुपचाप बस देखते हैं… आंखें बंद कर लेते हैं… बात होती भी है तो बड़ी गोपनीयता से अपने विश्वसनीय सहयोगी के साथ.. प्राइम टाइम में गला फाड़-फाड़ कर दुनिया भर को बात-बात पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ये बातें करते समय शायद अपने चरित्र के बारे में भूल जाते हैं….  मैंने कहा था ना….. यहाँ सब बिकता है….. नैतिकता भी…..चरित्र भी….

एक युवा महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. महिला पत्रकार ने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. उन्होंने जिस न्यूज चैनल के बारे में उपरोक्त बातें लिख कर भेजा है, वह चैनल कई वजहों से कुख्यात और विवादित रहा है. चैनल के बारे में कहा जाता है कि नाम बड़ा और दर्शन छोटे. चैनल हिंदुत्व के नाम पर चलाया जाता है और जमकर मीडियाकर्मियों का शोषण किया जाता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘आजतक’ और ‘हेडलाइंस टुडे’ में क्या दलित विरोधी मानसिकता वाले सवर्ण भरे पड़े हैं?

Ajitesh Mridul : This is how Headlines Today depicted Bihar’s CM Jiten Manjhi. I just want to tell them that sucking up to Bhajappa and all is OK, but at least hire people who understand the social construct. Mushars, don’t eat rats just for the heck of it. Read and learn about their sufferings.

Mayank Saxena : ‘आज तक’ चैनल ने अपनी एनीमेशन श्रृंखला में जिस तरह बिहार के मुख्यमंत्री की जाति का उपहास किया है, उसे आजतक व हेडलाइंस टुडे पर चलाए गए विडियो में देखा जा सकता है. इसे देखकर समझिये की समाचार चैनल में काम करने वालों की मानसिकता और समझ क्या है! मैं बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू का समर्थक नहीं लेकिन किसी की भी जाति का इस प्रकार उपहास करना संविधान और समरसता पूर्ण राज्य के सिद्धांत के खिलाफ़ है… ‘आज तक’ क्या आप को पता है कि मुसहर चूहा शौक में नहीं खाते…थूकता हूं आप पर और खुद पर भी कि मैं कभी इस मीडिया का हिस्सा था! आप को क्या लगता है कि इस एनीमेशन को लेकर आज तक और टीवी टुडे पर एससी-एसटी एक्ट समेत अन्य धाराओं में कार्रवाई होनी चाहिए कि नहीं? कृपया आज तक की इस शर्मनाक हरक़त के खिलाफ व्यापक अभियान को गति दें!

अजीतेश मृदुल और मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन चेतावनी भरा रहा, आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे

: मीडिया को पुनर्जीवित करने का अभियान : मीडिया में अब मामला पेड न्यूज भर का नहीं रहा है। कई अखबार तो खबरें भी उन्हीं की छापते हैं, जो पैसा देते हैं। पूरे के पूरे अख़बार, सप्लीमेंट्स ही पेड हो गए हैं। छोटे- बड़े , कई – कई यही काम कर रहे हैं। चैनलों के ब्यूरो के ब्यूरो खुले आम नीलाम हो रहे हैं। पैसा लाओ , जो छापना है छापो; जो दिखाना है दिखाओ। राजनीतिक दल और सरकारें भी मीडिया को गुलाम बनाने पर तुली हैं। नाहक नहीं है कि प्रेस कौंसिल के चेयरमैन कह रहे हैं कि मीडिया आम अवाम की आवाज दबाने की साज़िश का हिस्सा हो गया है। इस सन्दर्भ में एक रपट…

आवाज न उठी तो फिर फिरौती, डकैती, लूट और पक्षधरता ही पत्रकारिता के मूल्य और मानक होंगे

बुधवार को श्री एन.के सिंह ने देश के सारे संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों को एक बहुत नाराजगी भरा एसएमएस भेजा। उन्होंने कहा कि हमारी पत्रकारिता को क्या हो गया है कि श्री बी.जी. वर्गीज जैसे बड़े संपादक का निधन होता है, और सारी खबर बहुत सरसरे ढंग से चंद लाइनों में निबटा दी जाती है। वे इतने गुस्से में थे कि उन्होंने कहा कि ऐसे ही हालात रहे तो शायद आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे। पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन बहुत चेतावनी भरा रहा।

श्री एन.के. सिंह मेरी और मुझसे बड़ी पीढ़ी के देश के सबसे सशक्त पत्रकार हैं। उन्होंने नई दुनिया से पत्रिकारिता शुरू की। इंडियन एक्सप्रेस में रहे, इंडिया टुडे में रहे, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान टाइम्स में संपादक रहे और ऐसे पत्रकार हैं, जिनके चरित्र, जिनके स्वभाव और जिनकी मानवीय संवेदना को मानक माना जाता है। वे ओल्ड स्कूल के पत्रकार हैं, लेकिन आधुनिक जरूरतों और तकाजों से भी खूब वाकिफ हैं। उनकी गुरुता और गंभीरता अद्भुत है। मुझे भी 2000 से 2003 तक दैनिक भास्कर, भोपाल में उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। ऐसी सादगी, ऐसा संयम, ऐसी जानकारी और पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति उनके जैसी निष्ठा, सजगता और तत्परता बहुत कम देखने को मिलती है। पत्रकारिता का बहुत संयमित और मर्यादित ढांचा बनाने और उसे चलाने में उनका जवाब नहीं।

परसों सुबह उनसे बात हुई। गुस्सा थोड़ा कम हुआ था, उसकी जगह चिंता ने ले ली थी। श्री वर्गीज के निधन की खबर को समुचित महत्व न मिला तो उसका एक बड़ा कारण तो डेस्क पर बैठे पत्रकारों की ना जानकारी भी हो सकता है। ध्यान बदल गया है, पत्रकार छोटे-बड़े नेताओं और सतही विषयों की चर्चा में मशगूल हैं, और इसी को पत्रकारिता मान बैठे हैं; तो उन महामना लोगों पर उनका ध्यान कैसे जाये, जिन्होंने पत्रकारिता को सींचा है, और सींचते चले जा रहे हैं। उन पर ध्यान जाने की भी बात तो तब होती जब पत्रकारिता के मूल्यों और मानकों पर चलना होता। इसलिए अंगे्रजी में न सही, हिंदी में बहुतों को पता भी न हो कि श्री बी.जी वर्गीज कौन, तो यह भी कोई अचरज की बात नहीं। और यह प्रवृत्ति और आगे बढ़ती जाये, इसमें भी कोई अनहोनी नहीं होगी। एक संकट और है। मराठी के एक पत्रकार से बात की तो उन्होंने कहा, श्री बर्गीज तो अंग्रेजी के पत्रकार थे, मराठी के होते तो हम महत्व देते।

मीडिया जिस शेप में है, और होता जा रहा है, उसके बुनियादी कारण हैं। पे्रस काउंसिल पूरी तरह डिफंक्ट हो गयी है,और सरकारों के सूचना विभाग पत्रकारिता को संजोने के बदले, पत्रकारिता को बिगाड़ने का काम ज्यादा कर रहे हैं। कौन निकाल रहा है अखबार, उसकी बुनियादी योग्यता क्या है,किस कारण निकाल रहा है, उस बारे में न तो रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स के यहां कोई सोच है और न ही सूचना विभागों के पास। सरकारी विज्ञापनों को हासिल करने का एक खेल हो गया है। इसी तरह अनेक चैनल और अखबार वसूली के लिए निकाले जा रहे हैं, उनमें से कई शुद्ध-शुद्ध अपराध कर रहे हैं; और इन पर निगरानी रखने की कोई संस्था नहीं। फिरौती, डकैती, वसूली सब पत्रकारिता के धंधे हो गये हैं; और पत्रकारों की जो पौध आ रही है, उसे भी नौकरी के नाम पर इस काम में उतार दिया जा रहा है। नौकरी चाहिए, तो यह सब करने के सिवा उनके पास और कोई चारा नहीं है। और ऐसे ही ह्यसिद्धह्ण लोग बड़े पैसेवाले और प्रभाव वाले बनकर घूम रहे हैं; तो, तो मानक का असल संकट तो खड़ा है। और सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो वसूली और बेईमानी, लूट और डकैती ही मानक बनने जा रहे हैं। श्री एन.के. सिंह जी ने बहुत सही वक्त पर आवाज उठायी है। लेकिन करना क्या चाहिए, इस पर बाद में। पहले श्री बी.जी. वर्गीज की बात –

श्री बीजी वर्गीज हमारे समय के प्रखरतम पत्रकारों में से एक रहे हैं। बहुत ही निष्ठावान, और बहुत ही चरित्रवान। बहुत ही सजग और तत्पर। बहुत ही विनम्र। पूरे तौर पर सिद्धांतवादी। वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़कर आये थे, और टाइम्स ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की शुरुआत की। 1966-69 तक वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार रहे। 1969 में वे हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक बने, और आपातकाल लगने तक उसके संपादक रहे। आपातकाल का बहुत सारे पत्रकारों ने विरोध किया था। नई दुनिया जैसे अखबारों ने संपादकीय खाली छोड़ दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी से रिश्तों के बावजूद श्री वर्गीज ने आपातकाल का खुलकर विरोध किया। नौकरी भी छोड़नी पड़ी। लेकिन वे झुके नहीं। विरोध को आगे बढ़ाते हुए 1977 में उन्होंने लोकसभा चुनाव तक लड़ा। नागरिक अधिकारों के वे प्रखर प्रवक्ता थे, और विकास की पत्रकारिता करने में उनकी लगन थी। ऐसे ही उत्कृष्ट लेखन और सिद्धांतप्रियता के लिए उन्हें 1975 में रमन मैगसेसे सम्मान मिला। 1982-86 तक वे इंडियन एक्सप्रेस में भी संपादक रहे। बाद के दिनों में वे सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़े रहे। एडिटर्स गिल्ड के सदस्य के रूप में उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों की भी जांच की।

डेवलपमेंट ईशूज पर उन्होंने खूब लिखा। वॉटर्स ऑफ होप (1990), विनिंग द फ्यूचर (1994) में उन्होंने हिमालय क्षेत्र में पानी की व्यवस्था के बारे में लिखा। नार्थ ईस्ट को लेकर भी उनकी किताब ह्यइंडियाज नॉर्थ इस्ट रिसर्जेंटह्ण खूब चर्चित रही। 2010 में उनकी जीवनी भी आयी – ह्यफर्स्ट ड्रॉफ्ट : विटनेस टू मेकिंग ऑफ मार्डन इंडियाह्ण। उनकी यह जीवनी अद्भुत है। इसमें उन्होंने इंदिरा जी के और राजीव गांधी के जमाने में लोकतांत्रिक संस्थाओं को जो नुकसान पहुंचा उसके बारे में बहुत विस्तार से लिखा है। नागरिक अधिकारों के वे इतने प्रबल समर्थक थे, कि उनकी जरा भी अवमानना बर्दाश्त नहीं कर पाते थे।

श्री बीजी वर्गीज से मेरा परिचय श्री प्रभाष जोशी के कारण हुआ। प्रभाष जी जनसत्ता के संपादक। और पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति निरंतर सजग रहने वाले। अभियान चलाने और कुर्बानी देने दोनों के लिए तैयार रहने वाले। उनकी श्री वर्गीज से खूब निकटता थी। बरसों से पत्रकारिता में दो भारी खलल चलते रहे हैं। एक तो, सरकारों की मंशा मीडिया पर कब्जा करने की रहती है। इसके लिए तरह-तरह के हथकंडे भी अपनाये जाते हैं। पीवी नरसिम्हाराव सरकार के आखिरी दिनों में कुछ मंत्री यत्र-तत्र मीडिया पर दबाव बनाने में लगे थे। तब तक संपादकों के बदले विज्ञापनकर्मियों को महत्व देने के परिणाम भी उभर आये थे। संपादकीय संस्थान जगह-जगह दरकिनार हो रहे थे।

दूसरे, मीडिया पर कब्जा करने की भाजपा की मंशा बहुत पुरानी रही है। जनता सरकार में श्री लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री बने तब पार्टी कार्यकर्ताओं को जगह-जगह घुसाने की कोशिशें हुईं। इसके बाद यह काम पूरे योजनाबद्ध ढंग से होने लगा। जहां भी जैसे भी मौका मिले, कार्यकर्ता घुसाओ। ये कार्यकर्ता आम तौर पर तो पत्रकार बने रहते, लेकिन जरूरत के वक्त पार्टी कार्यकर्ता हो जाते। 94-95 तक उन्होंने पूरी मीडिया को घेर लिया। तब अखबार निकालने की ताकत उनके लोगों में नहीं थी। बाद में ताकत आयी तो अब तो प्रतिष्ठान के प्रतिष्ठान उनके लोगों के मालिकाने के हैं। सेंध लगाने से लेकर पत्रकारिता हथियाने तक की यह कहानी बहुत विस्तार से लिखने की मांग करती है। उसका विवरण फिर कभी।

1995-96 में जनसत्ता के कई लोगों को लगा कि इन मुद्दों पर बोलना जरूरी है। प्रभाष जोशी की प्रेरणा बनी हुई थी। हमने कांस्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर सभागार में इस विषय पर विचार करने के लिए सभा बुलायी। हाल खचाखच भरा। प्रभाष जी थे ही, मृणाल पांडे, कुलदीप नैय्यर, बीजी वर्गीज, जसवंत सिंह यादव, न्यायमूर्ति सावंत – दिल्ली का कोई सुधी पत्रकार ऐसा नहीं था, जो नहीं आया, और जिसने साथ चलने का संकल्प नहीं लिया। संयोजन का जिम्मा मेरे ऊपर आया। अभियान का नाम बना – पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का अभियान। अभियान लोगों से अपील करता कि मीडिया पर आंख मूंदकर भरोसा मत कीजिए। सूचनाएं प्रदूषित हो गयी हैं। उन्हें जान-समझ कर ग्रहण कीजिए। मुंबई में कार्यक्रम हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालयों के छात्र संघ ने अभियान में शिरकत की। बीएचयू में तो सात घंटे तक बैठक चलती रही। कुलपति महोदय ने कहा कि 17 साल बाद मालवीय सभागार में ऐसी कोई सभा हुई है। यही हाल इलाहाबाद के छात्र संघ भवन का था। भोपाल, जयपुर, लखनऊ – हर जगह अभियान को समर्थन मिला। अनेक जगहों पर चर्चा हुई कि देश में अपने किस्म का यह अलग आंदोलन खड़ा हो रहा है।

बाद में हम लोग ही कुछ अनमने हुए और आंदोलन रुका। लेकिन उस वक्त उसने अनेक कारगुजारियों को रोका,और इस संभावना को ख़ड़ा किया कि मीडिया के लोग संगठित होकर मूल्यों और मानकों के मुद्दे पर आम जनता को भी सहभागी बना सकते हैं। श्री बीजी वर्गीज को उस दौर में ही थोड़ा जाना। एक-एक समस्या को ठीक से समझने वाले। एक-एक घटना के परिणाम को ठीक से समझने वाले। हमारे समय के एक अच्छे ऋषि। वे नहीं रहे, उन्हें बहुत-बहुत नमन।

आगे की बात के पहले एक बार फिर श्री प्रभाष जोशी की बात। सूचना का अधिकार दिलाने में उनकी और जनसत्ता की बड़ी भूमिका रही है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद वे अकेले पत्रकार रहे, जिन्होंने बिना रुके लगातार संघ और उसकी मंशा का विरोध किया। इसी तरह विदेशी निवेश और विदेशी मालिकाने के सवाल पर भी वे कभी नहीं झुके। डंकल ड्राफ्ट के खिलाफ श्री रामबहादुर राय के साथ मैंने, इरा झा और अनंत मित्तल ने राष्ट्रपति तक जाकर जो प्रतिरोध दर्ज करवाया, उसमें दिल्ली से 900 से ज्यादा पत्रकारों की आवाज थी। सुबह गिरफ्तारी के समय हम 25-30 लोग ही इकट्ठा हुए। राय साहब कहते रहे- हम और आप हैं न । आंदोलन पूरा मानिए। वहीं शाम को सैकड़ों लोग जुटे। पेड न्यूज के खिलाफ श्री प्रभाष जोशी अंत तक लड़ते रहे। यह अफसोस है कि उनकी बात जनसत्ता के हम लोगों ने ही जल्द बिसार दिया। उनकी पुण्यतिथि पर या उनके जन्मदिन पर इन बातों की हम लोग भले चर्चा करते हों, लेकिन हकीकत यह है कि व्यवहार में कुछ नहीं करते।

जानने की बात है कि श्री एन.के. सिंह श्री प्रभाष जोशी के सबसे प्रिय लोगों में से एक हैं। वे पत्रकारों के अधिकारों के लिए भी निरंतर लड़ते रहे हैं। उन्होंने, श्री शलभ भदौरिया ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के हित की कई जानी-मानी लड़ाइयां लड़ी हैं। उनके चलते कई संस्थानों में पत्रकारों और पत्रकारिता के हित की बातें हुई हैं। श्री शलभ भदौरिया का संगठन मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ मध्यभारत में सर्वत्र फैला हुआ है। वह एक बड़ी ताकत है। उसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री एन.के. सिंह की साख और विश्ववसनीयता बड़ी और मानी हुई है।

पत्रकारिता में आज जो जंगल राज हो गया है, एक बहुत विश्वसनीय आवाज ही वॉर्निंग सिग्नल का काम कर सकती है। श्री एन के सिंह बहुत सहज रूप से वैसी ही एक धुरी बन सकते हैं, जैसे कि श्री प्रभाष जोशी थे। मेरे जैसे अनेक पत्रकार उनके पीछे चलने में गौरव महसूस करेंगे। और पत्रकारिता की भी यह सच्ची सेवा होगी। जैसे पत्रकारिता श्री प्रभाष जोशी से अपेक्षा करती थी,वैसे ही पत्रकारिता श्री एन.के. सिंह जी से भी अपने मूल्यों और मानकों को सुरक्षित रखने के काम को आगे बढ़ाने की अपेक्षा करती है।

कृपया इस निमंत्रण को स्वीकार करें। देश में एक मंच तो हो, जहां से पत्रकारिता की यथास्थिति पर बात तो हो। जो कुछ हो रहा है, अवाम भी उसे जानता चले। ऐसा न हुआ तो होगा खबरों को बेचने का धंधा; लेकिन फिरौती, छिनैती,लूट और डकैती ही मानक न बन जाएं, इसकी जद्दोजहद तो हमें करनी होगी। अंकुश लगानेवाली संस्थाओं को भी निगहबानी पर लगाया जा सके तो प्राथमिक काम हो जायेगा। होगा उसी तरीके से, श्री राम बहादुर राय के हवाले से जिसका मैंने उल्लेख किया –

हम दो हैं, तीन हैं, पांच हैं, सात हैं, दस हैं – हम हैं, यही दुनिया को दस्तूर पर लाने के लिए काफी होगा। वाणी मिथ्या नहीं जाती। यदि विश्वास से बोली गई हो तो। डंकल ड्रॉफ्ट के मौके पर तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा ने प्रधानमंत्री को लिखा – दिल्ली के एक हजार पत्रकार बोल रहे हैं। इनकी चिंताएं हैं। सरकार सारे मामले पर फिर एक बार विचार करे। – इसके पहले राय साहब और मैंने बात रखी। राष्ट्रपति महोदय ने केवल एक शब्द पूछा – आप दोनों लोग कहां के हैं। बताया, राय साहब गाजीपुर के। मैं आजमगढ़ का। जाने के लिए उठ खड़े हुए राष्ट्रपति बैठ गए। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा- ओह, आपके इलाके ने आजादी की लड़ाई के लिए बहुत संघर्ष किया है। उस इलाके के लोगों का दर्द मैं समझता हूं। उनकी चिंताएं कभी वृथा नहीं हो सकतीं।

और मावलंकर सभागार में श्री कुलदीप नैयर बोल कर आए थे कि केवल पांच मिनट रुकेंगे। फिर आए तो पूरे समय बैठे। बोले, भरोसा नहीं था कि सारी बिरादरी यहां बैठी होगी, इसलिए जल्दी जाने को बोला था।

मान्यवरो! निवेदन सुनें, अभ्यर्थना सुनें।

मीडिया को पुनर्जीवित करने के अभियान की खासियतें थीं –

-जनसता, इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंसियल एक्सप्रेस के साथियों के 100-100 रुपये के चंदे से ही कार्यक्रमों की शुरुआती व्यवस्था हो जाती थी।

-कार्यक्रम के सभागार के बाहर चद्दर बिछा दी जाती थी, और हर कोई कुछ न कुछ आर्थिक योगदान देता ही था।

-विश्वविद्यालय छात्र संगठन और समाजसेवी संस्थाएं खुद आगे बढ़कर साथ खड़ी होती थीं।

-कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं हुआ, जिसमें उस शहर के तमाम बुद्धिजीवियों, समासेवियों, साहित्यकारों और सुधी लोगों ने शिरकत न की हो।

-कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं हुआ, जिसमें उस शहर के सारे के सारे सुधी पत्रकार न आएं हों और उन्होंने मंच की बात लोगों तक न पहुंचायी हो।

लेखक ओम प्रकाश सिंह एब्सल्यूट इंडिया अखबार, मुंबई के संपादक हैं. उनसे संपर्क omprakash@absoluteindianews.com के जरिए किया जा सकता है.


इसे भी पढ़ सकते हैं….

मीडिया में एक बड़े आंदोलन की जरूरत : अब न्यूज ही पेड नहीं हैं, अखबार और चैनल भी पेड हैं

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: