भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन… जागरण कोई अख़बार है! : विमल कुमार

Vimal Kumar : दो साल की सज़ा या जुर्माना या दोनों एक साथ का प्रावधान है। ये लोग अदालत को मैनेज कर केवल जुर्माना देकर बच जाएंगे। जिसने विज्ञापन दिया उसे भी जेल की सजा हो। जागरण कोई अख़बार है, भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन!

Maheruddin Khan : नेता तो किसी न किसी मामले में गिरफ्तार होते ही रहते हैं… एकाध सम्पादक को भी गिरफ्तार होने दो भाई। और एक पाले खड़े हो जाओ। यह नहीं चलेगा कि सम्पादक ने जो किया उसका समर्थन नहीं करते और गिरफ्तारी का विरोध करते हैं।

Dilip Khan : रत्ती भर भी असहमत नहीं हूं चुनाव आयोग के रुख से। क्राइम किया है। सज़ा मिलनी चाहिए। इसमें भागीदार बिग प्लेयर्स को भी सज़ा होनी चाहिए। क़ानून तोड़ने का ये हल्का मामला नहीं है बल्कि डेमोक्रेटिक तरीके से हो रहे चुनाव को प्रभावित करने का मामला है। उमलेश यादव केस में भी ये अख़बार बच गया था। अगर 2011 में ही इस पर कार्रवाई हो जाती तो फिर से ग़लती रिपीट नहीं करता। लेकिन प्रेस काउंसिल के पास नोटिस देने के अलावा और कोई पावर ही नहीं है। इस बार आचार संहिता के दौरान क्राइम किया है इसलिए सज़ा होनी चाहिए। पत्रकारिता के वृहत्तर लाभ के लिए मैं इस कार्रवाई के साथ हूं।

वरिष्ठ पत्रकार विमल कुमार, मेहरुद्दीन खान और दिलीप खान ने उपरोक्त टिप्पणियां एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार प्रिय दर्शन की जिस पोस्ट पर की है, वह इस प्रकार है :

Priya Darshan : मीडिया संपादक पवित्र गाय या कानून से ऊपर नहीं हो सकते। जो जुर्म जैसा है, उसकी वैसी ही सज़ा होनी चाहिए। एक साथी ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि जागरण ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को मजीठिया के लाभ नहीं दिए और उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक अन्य साथी ने बाबरी मस्जिद के दिनों में अखबार की तथ्यहीन रिपोर्टिंग की याद दिलाई। बेशक, इन सबकी लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। इसलिए यह कहना जरूरी है कि यह पोस्ट जागरण के पक्ष में नहीं है। चुनाव आयोग के निर्देश के विरुद्ध एग्जिट पोल छापना अनुचित था- इस लिहाज से और ज़्यादा कि वह संस्थान के मुताबिक विज्ञापन यानी ‘पेड न्यूज’ था। लेकिन यह पूरा मामला मीडिया के और भी संकटों को उजागर करता है। १५ एफआइआर कराने और संपादक को गिरफ्तार करने का फ़ैसला कुछ ज़्यादा सख्त है- याद दिलाता हुआ कि व्यवस्थाएं जब चाहती हैं, मीडिया को उसकी हैसियत बता देती हैं। जो लोग शिकायत या गुमान करते हैं कि मीडिया बहुत ताकतवर है, वे देख सकते हैं कि एक गलती पर किस तरह उसकी बांहें मरोड़ी जा सकती हैं। जो लोग मीडिया पर नियंत्रण के लिए और कानूनों की ज़रूरत बताते हैं, उनको समझना चाहिए कि इस देश में मीडिया के खिलाफ कई कानून हैं, मगर मीडिया के लिए अलग से एक भी नहीं। जिस आजादी का मीडिया इस्तेमाल करता है, वह उसे कानूनों से नहीं, इस देश की उदार परंपरा से और विभिन्न मोर्चों पर अपने विश्वसनीय संघर्षों से मिली है। चिंता की बात बस यह है कि आज इस परंपरा पर भी चोट की जा रही है और मीडिया की विश्वसनीयता पर भी खरोंच पड़ी है।

प्रिय दर्शन की उपरोक्त पोस्ट पर आईं कुछ अन्य टिप्पणियां इस प्रकार हैं :

Mangalesh Dabral यह फैसला कोई सख्त नहीं है. अखबार और हिंदी का तथाकथित सबसे बड़ा अखबार होने के नाते उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी का बोध अनिवार्य होना होता है. क्या वे नादान, अनपढ़ गरीब थे जिन्हें नियमों के बारे में नहीं भी मालूम हो सकता है. या जानबूझकर नियमों को धता बताने वाले राजनीतिक माफिया? आपको याद होगा, अयोध्या में बाबरी विध्वंस से कुछ दिन पहले हुई परिक्रमा और कार सेवा के दौरान गोली चली जिसमें चार-पाच लोगों के मारे जाने की अपुष्ट खबर आयी. हिंदी के एक अखबार के डाक संस्करण में यह संख्या छपी, फिर दूसरा ‘कारसेवक’ प्रभारी आया तो उसका यह संख्या देखकर मन नहीं भरा और उसने एक शून्य बढ़ा कर पचास मृतक बता दिए, फिर जब नगर संस्करण आया तो उसमें प्रभारी महोदय ने इसमें एक शून्य और जोड़कर मृतकों की संख्या पांच सौ कर दी.मकसद था तनाव, वैमनस्य और अंततः दंगा भड़काना. क्या यह पत्रकारिता है? यह विवरण महान कवी रघुवीर सही की उस रपट में दर्ज है जो उन्होंने प्रेस कौंसिल के निवेदन पर फैक्ट फाइंडिंग ईम के रूप- में लिखी थी.

Abhiranjan Kumar सर, बात आपकी भी सही है। लेकिन समस्या यह है कि चुनाव में हर रोज़ बड़े नेता जाति और धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले के मुताबिक भी अनुचित है, लेकिन चुनाव आयोग उन नेताओं को जेल में नहीं डाल रहा। आचार संहिता उल्लंघन में फंस गया एक संपादक, जिससे ग़लती तो ज़रूर हुई, लेकिन मेरी राय में उसका सिर्फ़ कंधा रहा होगा, बंदूक किसी और की रही होगी, जिसे दुनिया “मालिक” कहती है।

एक लक्ष्मण-रेखा तो सबके लिए होनी ही चाहिए। नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रैट, बिजनेसमैन… इन सबसे ज़रा-सी चूक हुई नहीं कि हम लोग उन्हें फ़ौरन कानून के चंगुल में देखना चाहते हैं, लेकिन अपनी ग़लतियों पर हम आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। इस मामले में संबंधित संपादक पर अधिक सख्ती हो गई, यह मानने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन फिर यह सवाल भी उठेगा कि क्या एक टीवी चैनल के संपादक पर भी अधिक सख्ती हो गई थी, जिन्हें शायद महीना भर या उससे भी अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा था? अनजाने में या अनभिज्ञता में किसी से भी ग़लती हो सकती है… हमसे भी और आपसे भी… पर जो ग़लतियां मीडिया के द्वारा इन दिनों जान-बूझकर की जाती हैं, क्या उनके प्रति भी हमें उतना ही सहिष्णु रहना चाहिए? ये कुछ सवाल उठाते हुए भी मोटे तौर पर मैं आपकी मूल भावना के साथ हूं। अगर पेड न्यूज़ का मामला है तो संपादक को नहीं, मालिक को जेल होनी चाहिए। कोई संपादक अपनी मर्ज़ी से पेड न्यूज़ छाप ही नहीं सकता। उस पर मालिकों का दबाव रहता है, इसलिए उसे ऐसे अनैतिक काम करने पड़ते हैं। अक्सर हमारी व्यवस्था गोली चलाने वालों को फांसी दे देती है, लेकिन गोली चलवाने वाले को सबूतों के अभाव में बरी कर देते हैं। कई बार बरी कर देना तो दूर, उनके गिरेबान तक हाथ तक नहीं पहुंच पाते और आप जो “पवित्र गाय” शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह वही “पवित्र गाय” बने रहते हैं।

Ajeet Singh जहां कहीं भी सांप्रदायिक तनाव या विवाद होता है, वहां दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग देखिए। ये एग्जिट पोल वाली ग़लती छोटी लगने लगेगी। केस स्टडी के तौर पर मुज़फ्फरनगर दंगों को ले सकते हैं। बहरहाल, इस मामले में अकेले संपादक को दोषी मानना सही नहीं है। किसी पार्टी या विचारधारा का मुखपत्र होना अपराध नहीं है। लेकिन जागरण या कई अन्य मीडिया समूह विश्वास और उदारता की परंपरा के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है।

Aflatoon Afloo CrPC की धारा 144 का उल्लंघन करने पर IPC की धारा 188 के अन्तर्गत सजा होती है। अधिकतर उसी दिन कोर्ट उठने तक की और अधिकतम हफ्ता भर की।मेरी स्पष्ट मान्यता है कि उन्हें झूठ बोलने की भी आजादी है।उसके साथ यदि उससे देश का कोई कानून टूटता हो तो उसे कबूलना भी चाहिए। अधिकतम दो साल की सजा के प्रावधान की पूरी सजा कितनो को मिली है यह जानने लायक है।

Mahesh Punetha मेरा मानना है कि संपादक से पहले अखबार पर कार्यवाही होनी चाहिए. संपादक तो बेचारा है, मालिक जैसा कहे उसे वैसा करना है.

Ramesh Parashar ये व्यापारियों और चाटुकारों का दौर है! मीडिया इस गंदगी मे निर्लज्जता की हद तक लोट लगा रहा है! सामाजिक ज़िम्मेदारी या राष्ट्रीय हित जैसी बातें उसके लिये बेमानी हैं? चारण भांड की भूमिका से भी उसे परहेज़ नहीं? सियासत ने अपनी गंदगी से उसे भी नहला दिया! लोगों का भरोसा भी अब उस पर नहीं! वैसे ‘ जागरण ‘ पर पार्टी विशेष का ठप्पा तो वर्षों से है, निष्पक्ष तो रह नहीं गया?

Jeevesh Prabhakar चुनाव संपन्न होने यानि 11 मार्च तक अखबार के प्रकाशन पर रोक लगा दो…चूलें हिल जायेंगी ….विज्ञापन विभाग तो बहाना है….. बिना मालिक की अनुमति के ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है…. मालिक को भी जेल होनी चाहिए…

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें :

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देश के 80 प्रतिशत पत्रकारों के पास दृष्टि नहीं, संपादक भी दृष्टिहीन : विमल कुमार

कविताओं के जरिए मोदी को लगातार एक्सपोज करने में जुटे हैं कवि और पत्रकार विमल कुमार : हिन्दी के वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार विमल कुमार पिछले दो सालों से लगातार सोशल मीडिया पर मोदी शासन के खिलाफ कवितायें लिखते रहे हैं. उनकी यह रचनाशीलता भवानी प्रसाद मिश्र की याद दिलाती है जब वे रोज तीन कवितायें आपातकाल के विरुद्ध लिखते रहे और बाद में उनकी पुस्तक ‘त्रिकाल संध्या’ भी आयी. 56 वर्षीय विमल कुमार की गत दो सालों में लिखी गयी कविताओं की पुस्तक ‘हत्या से आत्महत्या’ छपकर आयी है. उनकी इन कविताओं ने फेसबुक पर सबका ध्यान खींचा है. आखिर विमल कुमार को किन परिस्थितियों ने इन कविताओं को लिखने के लिए मजबूर किया, इस भेंटवार्ता में जानिए यह खुलासा –

-साहित्य की दुनिया में कहा जा रहा है कि आपने मोदी जी के खिलाफ इतनी कवितायें लिखी कि वह अब एक किताब के रूप में आ गयी है?
-सवाल मोदी का नहीं है. देखिये जब कोई लेखक कोई रचना करता है तो वह व्यक्ति विशेष पर नहीं बल्कि प्रवृतियों पर लिखता है. मोदी जी भी एक प्रवृति के प्रतीक हैं. उनकी कुछ प्रवृतियां इंदिरा गांधी में भी दिखाई दी थी और आज केजरीवाल में भी यह प्रवृति है. यह प्रवृति शक्ति संचयन की है, अधिनायक वाद की है. हम लोगों ने इन्दिरा जी का भी विरोध किया था, जेपी के छात्र आन्दोलन में. मेरी एक कविता कादम्बिनी में आपातकाल में सेंसर हो गयी थी. जब आपातकाल समाप्त हुआ तो वह कविता ‘सेंसर से रुकी कविता’ के रूप में छपी थी. हिन्दी में निराला ने नेहरूजी पर आलोचनात्मक कविता लिखी. बाबा नागार्जुन ने भी इंदिरा जी के खिलाफ कविता लिखी. बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर हिन्दी के अनेक लेखकों ने कवितायें लिखी. सिख दंगे पर लोगों ने कहानियां लिखी. हिन्दी की एक कहानीकार प्रत्यक्षा सिन्हा तो आज भी ८४ के दंगे पर कहानी लिख रही हैं. इस तरह गुजरात दंगे पर भी हिन्दी के कई लेखकों ने कवितायें लिखीं. देवी प्रसाद मिश्र मंगलेश डबराल राजेश जोशी आदि ने शानदार कवितायें लिखीं. मैंने भी एक कविता लिखी जो मेरे पिछले संग्रह में है. इसलिए मोदी जी के खिलाफ ये कवितायें दरअसल उन प्रवृतियों के खिलाफ कवितायें हैं. इन प्रवृतियों का विरोध करना उन्हें उजागर करना बेहद जरुरी है और इसलिए एक लेखाकिये धर्म निभाते हुए ये कवितायें लिखी हैं.

-लेकिन कुछ लोग तो मोदी जी को नायक बता रहे हैं?
-इंदिरा जी को तो लोग देवी और चंडी भी बताते थे. देवकांत बरुआ ने तो ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ का नारा दिया था. उनकी भी खूब जयकार होती थी. जब वह आती थीं तो मैदान में भीड़ जमा हो जाती थी और वह भाड़े की भीड़ नहीं होती थी. मैंने खुद 72-73 में पटना के गांधी मैदान में देखा था, उनका भाषण सुना था. लेकिन तब लेखक गण विरोध कर रहे थे. आज भी कर रहे हैं. मैं कोई अकेला व्यक्ति या लेखक नहीं हूँ जो विरोध कर रहा हूं. फेसबुक पर बहुत सारे कवि लिख रहे हैं. विष्णु नगर, मंगलेश डबराल, देवीप्रसाद मिश्र, प्रियदर्शन, रंजित वर्मा, दिनकर कुमार, स्वप्निल श्रीवास्तव जैसे अनेक लोग मोदी जी की नीतियों के खिलाफ कवितायें लिख रहे हैं.

-आखिर आप लोग क्यों लिख रहे हैं?
-देखिये लेखक का काम सच बताना है. वह अपना काम कर रहा है. वह बता रहा है कि मोदी जी ने लोगों को झूठे सपने दिखाए. उन्होंने जनता के साथ छल किया है. लोगों को बेवकूफ बनाया है. उनकी सरकार लगातार झूठ बोल रही है. सातवें वेतन आयोग को अरुण जेटली ने एतिहासिक बताया. क्या यह सरासर झूठ नहीं है. भ्रष्टाचार दूर करने की बात करते हैं और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित   संजीव चतुर्वेदी जैसे इमानदार अधिकारी को लगातार दो साल से परेशान कर रहे हैं. अडानी का दो सौ करोड़ माफ़ कर दिया. अमीरों को टैक्स छूट के नाम पर सब्सिडी और रेल यात्रा करनेवाले बूढों से रियायत को छोड़ने की बात कर रहे. पहले खुद अपनी पार्टी के सांसदों से यात्रा रियायत, टेलीफ़ोन सब्सिडी छोड़ने की बात कहते. पहले कहा गया कि अभी नयी सरकार है, अभी मोहलत दो. अब उनको समय दिया जाय. जनता ने दो साल का समय दिया लेकिन कोई नतीजा नहीं. महंगाई बेरोजगारी के मोर्चे पर विफल. केवल प्रचार से लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे.

-लेकिन क्या आपने कांग्रेस की नीतियों के विरोध में कवितायें लिखीं?
-लिखीं. बिलकुल लिखी. आपातकाल में और उसके बाद भी. मनमोहन सिंह ने जब विदेशी पूंजी निवेश शुरू किया तो मैंने एक कविता लिखी– ”मैं इस देश को बेच कर चला जाऊंगा”. दूसरी कविता लिखी ”Miss FDI मेरी जान”. इसलिए यह कहना गलत है कि लेखक कांग्रेस का विरोध नहीं करते थे. सच्चा लेखक हमेशा विपक्ष में, शाश्वत विपक्ष में रहता है. यह सच है कि कुछ लेखक कांग्रेस के साथ थे वहीं निर्मल वर्मा जैसे लोगों ने भजपा का समर्थन किया था. विद्यानिवास मिश्र भी भाजपा के साथ थे. आज भी कमल किशोरे गोयनका, नरेंद्र कोहली सरकार के साथ हैं लेकिन हिन्दी के लेखकों का बड़ा तबका सत्ता के साथ कभी नहीं रहा. जब श्रीकांत वर्मा कांग्रेस के साथ थे तब रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर अलग थे. रघुवीर सहाय तो दिनमान के संपादक के रूप में हटाये गए क्योंकि इंदिरा जी नहीं चाहती थीं उन्हें. उनकी जगह नंदन जी को संपादक बनाया गया जिन्होंने आते ही इंदिरा जी पर कवर स्टोरी निकाली लेकिन सहाय जी ने यह काम नहीं किया. धर्मवीर भारती ने भी जयप्रकाश नारायण का साथ दिया था. इसलिए भाजपा का यह तर्क गलत है कि लेखकों ने हमेशा कांग्रेस का साथ दिया. सच तो यह है हिन्दी का कोई बड़ा लेखक संघ परिवार भाजपा का समर्थक नहीं रहा. प्रेमचंद, निराला पन्त, महादेवी, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्ता, नवीन जी, आचार्य शिवपूजन सहाय, राहुल जी, बेनीपुरी, दिनकर भी समर्थक नहीं थे. 

-अपने संग्रह के बारे में बताएं? कविताओं के विषय क्या हैं?
-मैंने करीब सौ कवितायेँ फेसबुक पर सीधे लिखीं. मुझे इतनी घुटन हो रही देश की हालत से कि मैं खुद को लिखने से रोक नहीं पाया. दो साल पहले 16 मई के बाद देश वह नहीं रहा जो उसके पहले था. देश की हालत पहले भी ख़राब थी लेकिन आज तो सरेआम झूठ बोला जा रहा है कि अच्छे दिन आ गए, महंगाई ख़त्म हो गयी, लोगों को रोजगार मिल रहा है, देश में बिजली की कमी नहीं है आदि आदि. इसलिए मैंने इस झूठ को बेनकाब किया है कविताओं में. प्रधानमंत्री सेल्समैन और इवेंट मैनेजर सेल्फी युग के नायक हैं. वह नेहरु की तरह राजनेता नहीं, लोहिया की तरह नायक नहीं. हमारे प्रधानमंत्री का कद, उनका ज्ञान, व्यक्तित्व, उनकी भाषा शैली में भी कोई गरिमा नहीं है. वे उन लोगों के नायक हैं जो धीर गंभीर लोग नहीं. जो छिछले लोग हैं. उनमे उर्जा और दमखम तो है पर उसकी दिशा और नीयत क्या है. चुनाव जीतने से लेकर बाँसुरी और ड्रम बजने पर भी कवितायें हैं. लव जिहाद पर भी. ‘स्मार्ट सिटी में हत्या’, ‘गुजरात के शिलालेख’ जैसी कवितायें है. रोहित वेमुला पर भी. यह संग्रह पंसारे कलबुर्गी धभोलकर और वेमुला को समर्पित है. ‘हत्या से आत्महत्या’ तक इन चारों की शहादत का प्रतीक है.

-आप एक पत्रकार हैं. सालों से संसद कवर करते हैं. एक तरफ आप इस तरह की कवितायें लिखते हैं. दूसरी तरफ मोदी जी की खबरें भी लिखते हैं. आप संतुलन कैसे कायम करते हैं?
-देखिये मैं मोदी जी की नहीं बल्कि एक प्रधानमंत्री की खबर लिखता हूं. ख़बरों में हमें तटस्थ होना चाहिए. लेकिन जैसी भक्ति विशेषकर न्यूज चैनलों में दिखाई दे रही है, वह स्तब्धकारी है. मीडिया मनमोहन सिंह की खबरें उस तरह नहीं दिखाता था जिस तरह आज के पीएम मोदी की दिखा रहा है. किसी भी मुल्क में मीडिया ने इतना पक्षपात नहीं किया जितना भारतीय मीडिया कर रहा है. दरअसल 80 प्रतिशत पत्रकारों के पास दृष्टि नहीं है. संपादक भी दृष्टिहीन हैं. इसलिए मैं पत्रकारिता को शब्दों की क्लर्की कहता हूँ. मैंने खुद को कभी पत्रकार होने का दावा नहीं किया. लेकिन हमें निष्पक्षता बरक़रार रखनी चाहिए. मैं हर दल की ख़बरें लिखता हूँ. विरोध अपनी जगह पर है. प्रोफेशन अलग. लेकिन हमें जनता के साथ रहना चाहिए. सत्ता के साथ नहीं. चाहे वह लालू नीतीश या येचुरी की सत्ता क्यों न हो.

कवि और पत्रकार विमल कुमार से संपर्क vimalchorpuran@gmail.com या +91 9968400416 के जरिए कर सकते हैं.

विमल के कविता संग्रह ‘हत्या से आत्महत्या’ तक की कुछ कविताएं पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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राज्यसभा टीवी पर कब्जा करने के लिए केंद्र सरकार प्लांट करा रही निगेटिव न्यूज?

वरिष्ठ पत्रकार और कवि विमल कुमार का मानना है कि राज्यसभा टीवी के खिलाफ निगेटिव खबरें एक बड़ी साजिश का हिस्सा है. उन्होंने फेसबुक पर इस बारे में लिखा है कि केंद्र सरकार अपने लोगों को इस चैनल पर काबिज कराने के लिए चैनल को लेकर नकारात्मक खबरें छपवा रही है. विमल कुमार ने जो कुछ लिखा है, उसे पढ़िए…

Vimal Kumar : राज्यसभा टीवी कई मायने में अच्छा चैनल है लेकिन केंद्र सरकार उसे अपने कब्जे में लेने के लिए और अपने खास लोगों को नियुक्त करने के लिए उसके खिलाफ स्टोरी प्लांट करवा रही है, मुझे ऐसा लगता है. राज्यसभा में मोदी का बहुमत नहीं है. डीएनए और टाइम्स कितने अच्छे हैं, ये हम भी जानते हैं. क्या राज्यसभा चैनल को इंडिया टीवी या जी टीवी बनाना चाहते हो.

मूल खबर…

राज्यसभा टीवी ने कैग के आरोपों को गलत करार दिया, अब तक 1700 करोड़ ठिकाने लगाने का था आरोप

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मुक्तिबोध के बाद गुम हुई ऊर्जा की तलाश है विमल कुमार की कविता

”मुक्तिबोध के बाद की हिन्दी कविता में जो ओज, जो ऊर्जा, जो संभावना दिखाई देती है, वह आठवें दशक के बाद की हिंदी कविता में मुझे दिखाई नहीं देती। परंतु आठवें दशक के बाद जिन कवियों ने हिंदी कविता की चमक को बचाए रखा है उन कवियों में कवि विमल कुमार भी हैं.” यह वक्तव्य वरिष्ठ आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ‘बिहार प्रगतिशील लेखक संघ’  द्वारा आयोजित दिल्ली से पधारे कवि विमल कुमार की प्रतिरोधी कविताओं के पाठ के समय दिया।

यह काव्य-पाठ कवि रैदास जी के जन्म-दिवस को समर्पित था। पटना के जनशक्ति भवन में इस एकल काव्य-पाठ की अध्यक्षता डॉ.  खगेन्द्र ठाकुर ने की तथा संचालन कवि शहंशाह आलम ने किया।

इस अवसर पर कवि विमल कुमार ने अपनी बीसियों कविता का पाठ किया। उन्होंने सत्ता की खामियों और सरकार की नाकामियों पर जम कर प्रहार किया। उन्होंने अपनी कविता में कहा – ऐसा वक्त आ गया है कि अब तुम हत्यारे को हत्यारा नहीं कह सकते… होनी ही चाहिए बहस/ लोकतंत्र में रवि बाबू / होनी ही चाहिए / नहीं किया जा सकता इससे इंकार।

उन्होंने एक जलाते हुए शहर की यात्रा, बूढ़ी स्त्री के लिए अपील, पानी का दुखड़ा, मुक्ति का इंतजार, सबसे ताकतवर आदमी शीर्षक द्वारा बाज़ारवाद और एक ध्रुवीय विश्व को आड़े हाथ लिया। काव्य-पाठ में ‘डिजिटल इंडिया’ से जुडी उनकी कविता –

न मैं गांधी के मुल्क में रहता हूँ / न मैं बुद्ध के देश में रहता हूँ / मेरे घर का पता बदल गया है यारों/ मैं अब डिजिटल इंडिया में रहता हूँ ..।

इस कविता को श्रोताओं ने खूब सराहा

समापन वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि विमल कुमार की कविताओं में सत्ता का विरोध भाव बना हुआ है। इन्होंने सत्ता से कभी समझौता नहीं किया है। संचालन करते हुए कवि शहंशाह आलम ने कहा कि विमल कुमार का संग्रह  ‘अंधेरे में एक औरत से बातचीत’ आज भी मेरी प्रिय कविता पुस्तक में शामिल है। इस कविता पर उन्हें प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल सम्मान भी मिला है। कवि की ‘पानी का टुकड़ा’ भी पठनीय है..

इस अवसर पर वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, वरिष्ठ कथाकार अवधेश प्रीत, प्रेम कुमार मणि, संतोष दीक्षित, कवि अरविन्द श्रीवास्तव, संजय कुमार कुंदन, राकेश प्रियदर्शी, गणेश जी बागी रंगकर्मी अनीश अंकुर एवं बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव राजेन्द्र राजन आदि उपस्थित थे। धन्यवाद-ज्ञापन सुमंत ने किया।  काव्य पाठ का समापन पटना के वरिष्ठ फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन के निधन पर शोक – संवेदना व्यक्त करने के बाद किया गया। 

प्रगतिशील लेखक संघ (बिहार) के मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता अरविन्द श्रीवास्तव की रिपोर्ट. संपर्क:  09431080862.

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रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है, अब आप आसानी से गिन सकते हैं

Abhishek Srivastava : मुझे इस बात की खुशी है कि रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरोध से शुरू हुई फेसबुकिया बहस, बनारस के ‘संस्‍कृति’ नामक आयोजन के विरोध से होते हुए आज Vineet Kumar के सौजन्‍य से Samvadi- A Festival of Expressions in Lucknow तक पहुंच गई, जो दैनिक जागरण का आयोजन था। आज ‘जनसत्‍ता’ में ‘खूब परदा है’ शीर्षक से विनीत ने Virendra Yadav के 21 दिसंबर को यहीं छपे लेख को काउंटर किया है जो सवाल के जवाब में दरअसल खुद एक सवाल है। विनीत दैनिक जागरण के बारे में ठीक कहते हैं, ”… यह दरअसल उसी फासीवादी सरकार का मुखपत्र है जिससे हमारा विरोध रहा है और जिसके कार्यक्रम में वीरेंद्र यादव जैसे पवित्र पूंजी से संचालित मंच की तलाश में निकले लोगों ने शिरकत की।”

अच्‍छा होता यदि विनीत अपनी बात को वीरेंद्र यादव (और कहानीकार अखिलेश भी) तक सीमित न रखकर उन सब ”लोगों” के नाम गिनवाते जो ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन में होकर आए हैं। हो सकता है विनीत को सारे नाम न पता हों या वे भूल गए हों, लेकिन इस छोटी सी भूल के चलते उनके लेख का मंतव्‍य बहुत ”निजी” हो जा रहा है और ऐसा आभास दे रहा है मानो वे बाकी लोगों को बचा ले जाना चाह रहे हों। बहरहाल, उनकी बात बिलकुल दुरुस्‍त है और आज का उनका लेख ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन के क्रिएटिव कंसल्‍टेंट Satyanand Nirupam को तो सीधे कठघरे में खड़ा करता ही है। उसके अलावा Piyush Mishra, Swara Bhaskar, Prakash K Ray, Rahat Indori, Waseem Bareillvy, Munawwar Rana, malini awasthi, बजरंग बिहारी तिवारी, शिवमूर्ति समेत ढेर सारे लोगों को विनीत कुमार फासीवाद का साझीदार करार देते हैं जो लखनऊ के ‘संवादी’ में गए थे या जिन्‍होंने जाने की सहमति दी थी।

अब आप आसानी से गिन सकते हैं कि रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है। सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि इस आपसदारी में कहीं कोई खेद नहीं है, क्षमा नहीं है, अपराधबोध नहीं है और छटांक भर शर्म भी नहीं है। ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर जवाब दिए जा रहे हैं। अपनी-अपनी सुविधा से खुद को और अपने-अपने लोगों को बख्‍श दिया जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि कौन किसके हाथ में खेल रहा है। सच कहूं, मुझे तो कांग्रेस फॉर कल्‍चरल फ्रीडम के पढ़े-सुने किस्‍से अब याद आने शुरू हो गए हैं। इस नाम को गूगल पर खोजिएगा, मज़ा आएगा।

मीडिया विश्लेषक और सरोकारी पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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बनारस जाने से कुछ दाग मुझ पर जाने-अनजाने लग ही गए तो कुछ बातें यहां कहना चाहूंगा : विमल कुमार

: लडाई के और भी तरीके होते हैं… असहमति का सम्मान भी करना सीखो :  मैं यहाँ अपनी बात बनारस में साहित्य अकेडमी के समारोह में काव्यपाठ को उचित ठहराने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि जिस युग में हम जी रहे हैं उसकी विडम्बनाओं को रेखांकित करने और चुनौतियों को रखने के लिए कह रहा हूँ. पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि साहित्य अकेडमी से जो पत्र आया उसमे मोदी का कहीं नाम नहीं था, जो कार्ड छापा उसमे भी नाम नहीं था, यहाँ तक कि मालवीय जी और वाजपेयी की जयंती का जिक्र तक नहीं था. टेलीफ़ोन पर भी साहित्य अकेडमी के उपसचिव ने भी ऐसी कोई जानकारी नहीं दी.

दिल्ली एअरपोर्ट पर विमान में चढ़ने के दौरान संगीत नाटक अकेडमी की प्रमुख ने बताया कि वो भी वनारस जा रही हैं और उन्होंने अपना कार्ड दिखाया जिसे संस्कृति मंत्रालय ने छापा था, तो पता चला कि मोदी जी आने वाले हैं और तीनो अकादमियां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, इन्दिरा गांधी कला केंद्र और क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र आदि का यह संयुक्त समारोह है जिसका मुख्या समारोह मानव संसाधन  मंत्रालय ने आयोजित किया है, जिसमें स्मृति इरानी भी आ रही हैं, रेल मंत्री और संस्कृति मंत्री भी आ रहे हैं, इस तरह यह केंद्र सरकार का समारोह है.

विमान में ही मनोज दास से हमने चर्चा कि साहित्य अकेडमी को ये बताना चाहिए था, फिर बनारस एअरपोर्ट पर साहित्य अकेडमी के अजय शर्मा मिले उनसे पूछा तो वे बोले कि तीन दिन पहले नया कार्ड संस्कृति मंत्रालय का छपा जिसमे मोदी जी का नाम है, हमें भी ये जानकारी नहीं दी गयी थी, साहित्य अकेडमी का कार्यक्रम पहले से तय था. बनारस पहुंचा तो अख़बारों में मोदी का विज्ञापन था जिसमें साहित्य अकेडमी के समारोह का जिक्र था. हमने फिर उप सचिव से पूछा. उन्होंने बताया कि हमारा समारोह अलग भवन में होगा, मोदी का समारोह स्वंत्रता भवन में एक बजे होगा. उससे पहले 12 बजे हमारा समारोह अलग भवन में होगा. साहित्य अकेडमी के लोग मोदी के समारोह में नहीं गए. मोदी के समारोह में जाने के लिए कार्ड भी अलग था. वो लेखकों को भी नहीं दिया गया था. २५ तारीख को मैं किसी समारोह में गया ही नहीं.

मुझे बताया गया कि २५ को काशी नाथ सिंह साहित्य अकेडमी के समारोह में गए थे. अगले दिन ज्ञानेन्द्र पति मिले. हमने उनसे पूछा तो उन्होंने भी कहा कि साहित्य अकेडमी स्वयत्त संस्था है, समारोह अलग है. अब मोदी भी दिल्ली लौट चुके हैं. हमे काव्यपाठ कर अपनी बात कहनी चाहिए. यही राय हरिश्चंद्र पाण्डेय की थी. फिर हम तीनों ने यही फैसला किया. मैं चाहकर भी दिल्ली लौट नहीं सकता था क्योंकि मुझे रेल आरक्षण नहीं मिलता अगले दिन और इतने पैसे नहीं कि विमान से लौटूं. मुझे हर हालत में २८ को दिल्ली आना था, इसलिए काव्यपाठ का फैसला किया और मोदी के खिलाफ कविताएँ सुनाने का मन बनाया. अगर साहित्य अकेडमी के समारोह में नहीं जाता तो मुझे विमान किराये और होटल खर्च के १५ हज़ार लौटाने भी पड़ते और पैसे मेरे पास नहीं थे कि लौट सकूँ. इसलिए लड़ाई की रणनीति बदलनी पड़ी. मैंने हरिश्चंद्र पाण्डेय और ज्ञानेंद्र पति से कहा भी कि फेसबुक के युवा क्रांतिकारी लेखक विवाद करेंगे और वही हुआ जिसकी आशंका थी.

अब चूँकि बनारस के कार्यक्रम में भाग ले चुका हूँ और कुछ दाग मुझ पर जाने अनजाने लग ही गए तो कुछ बातें कहना चाहूँगा. पहले तो ये कहना चाहूँगा कि दाग लगने के बाद मैं अब किसी पर कोई सवाल नहीं उठाऊंगा क्योंकि मैं नैतिक रूप से अपना अधिकार खो चुका हूँ, पहले ये सवाल जरूर उठता रहा लेखों में. दूसरी बात ये कि आप लोग भी सोचें कि विरोध का अतिवाद कहाँ तक उचित है? मोदी की नीतियों का विरोधी मैं हूँ, और विरोध भी करता रहा हूँ, और भविष्य में भी जारी रहेगा. पर मैं इस देश के पतन के लिए कांग्रेस को भी दोषी मानता हूँ लेकिन मोदी देश का प्रधानमंत्री भी है. यह एक कड़वी सच्चाई है. ऐसे में, क्या अब हम जनादेश को न मानें? अगर वो जिस सड़क का उद्घाटन करें तो हम उस पर न चलें? जिस अस्पताल की आधार शिला रखें उसमे इलाज न कराएँ? जिस अख़बार में विज्ञापन हो उसे न पढ़ें? जिस हॉस्टल का उद्घाटन करें उसमे न रहें? जिस स्कूल कॉलेज में भाषण दें उसमे न पढ़ें? ये विरोध का कौन सा तरीका है… क्या विरोध का तरीका सिर्फ बहिष्कार ही है? क्या विरोध जताने के और तरीके नहीं हैं?

क्या विरोध करते हुए उसका प्रदर्शन किया जाये… ढिंढोरा पीटा जाये? क्या आज़ादी की लडाई में गरम दल और नरम दल की भूमिका अलग अलग नहीं थी? क्या किसी व्यवस्था के भीतर रहकर आदमी विरोध नहीं करता? हम जितना मोदी का विरोध करते हैं वो उतना मजबूत होकर उभर रहा और मोदी को हम चुनाव में हरा नहीं पा रहे. आखिर क्या बात है? मैं जनादेश को सत्य नहीं मानता पर लोकतंत्र में उसका सम्मान करता हूँ… क्या यू आर अनंतमूर्ति की तरह घोषणा कर दूँ कि ये देश छोड़कर चला जाऊं और बाद में न जाऊं? दरअसल विरोध करते समय दूसरों की इमानदारी पर सवाल नहीं उठाना चाहिए. इतना सरलीकरण और निष्कर्ष निकल कर सीधे अवसरवादी और दलाल नहीं कहना चाहिए, खासकर तब जब आप सामने वाले को जानते हैं. विनोद कुमार शुक्ल की रचना से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ पर उन्हें दलाल नहीं कहूँगा भले वे रायपुर गए. इसी तरह नरेश सक्सेना रायपुर गए और उन्होंने अपनी बात कही तो मैं उन्हें फांसी नहीं दे दूंगा… उनके खिलाफ फैसले नहीं सुनाऊंगा…

ये सही है कि रायपुर प्रसंग पर मैंने दो कवितायेँ लिखी थीं लेकिन किसी पर निजी हमले नहीं किये नाम लेकर. उनके खिलाफ अभियान नहीं चलाया. उनमें से तीन ने मुझे ब्लोक भी किया लेकिन मैंने किसी को ब्लोक नहीं किया और न ही किसी की वाल पर जवाब दिया. कविता केवल किसी एक घटना पर नहीं होती, वो प्रवृतियों पर होती है, होरी पात्र किसी एक व्यक्ति विशेष का अब नहीं, उसे किसी एक आदमी में reduce न करें… अगर मेरी कविता से रायपुर जानेवाला आदमी आहत हुआ तो उससे माफी मांगने को राजी हूँ.

सोलह मई के बाद कविता पाठ के लिए दफ्तर से छुट्टी लेकर कविता सुनाने गया… बीस से अधिक कवितायेँ लिख कर फेसबुक पर डाल चूका हूँ. मैं खुद देश के हालत से अधिक चिंतित हूँ लेकिन मुझे किसी का प्रमाणपत्र नहीं चाहिए. दरअसल, किसी तरह की कट्टरता खतरनाक है… ये वाम कट्टरता है कि अगर तुमने वहिष्कार नहीं किया और दूसरे तरीके से विरोध किया तो तुम अवसरवादी हो…  मोदी व्यक्ति नहीं वो एक प्रवृति का नाम है… रचनाकार प्रवृतियों के खिलाफ लिखता है, व्यक्ति पर नहीं… यही सामान्यीकरण है रचना का.

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? इसका जवाब एक घटना और एक लडाई से नहीं दिया जा सकता. रचनाकार का मूल्यांकन उसकी रचना से होना चाहिए. न किसी एक घटना से. हर आदमी की सीमा होती है… उसमे कमजोरियां होती हैं… परिस्थितिजन्य मजबूरियां भी होती हैं… कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी होती हैं… सवाल इरादे और नीयत का है. अगर आपने ये तय कर लिया है कि जिसने विरोध में कविता सुनकर अवसरवाद का परिचय दिया तो हम उसकी सफाई नहीं दे सकते इसलिए मैंने शुरू में कहा कि कोई सफाई नहीं दे रहा हूँ क्योंकि मैं खुद अपना नैतिक अधिकार खो चुका हूँ लेकिन मेरे साथी अभियान चलाकर चरित्रहनन कर रहे… वे भी इस लडाई को कमजोर कर रहें हैं.

रायपुर या बनारस का विरोध कर लेखकों में फूट पड़ी, ये मेरे लिये दुखदायी है. इसलिए विरोध का अतिवाद ठीक नहीं. अपने साथी लेखको का, विरोध सार्वजानिक रूप से नहीं किया जाना चाहिए. अंदरूनी बहसों को भीतर चलाया जाये तो बेहतर होगा. विरोध के नाम पर खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं और फेसबुकिया क्रांति से भी बचना होगा.

लेखक विमल कुमार वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं. उनसे संपर्क vimalchorpuran@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

मूल पोस्ट….

रायपुर बीस दिनों में ही बनारस चला आया… कोई जवाब है ज्ञानेंद्रपति, विमल कुमार और हरिश्‍चंद्र पांडे के पास?

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मरने के बाद कोई किसी को नहीं पूछता, सब ताकत के पुजारी हैं, यही जग की रीत है

Vimal Kumar : जब अर्जुन सिंह जिन्दा थे तो लेखक और पत्रकार उनके आगे पीछे घूमा करते थे लेकिन उनके मरने के बाद उनके नाम पर शुरू पुरस्कार समारोह में अब कोई नहीं झांकता. पिछले साल भी इस समारोह में कम लोग थे. इस बार तो और कम लोग. अज्ञेय जी के निधन के बाद में यही हुआ. अज्ञेय जी जब जीवित थे तो उनका जलवा था. लेकिन मरने के बाद सब भूल गए.

जन्मशती वर्ष में ओम थानवी और अशोक वाजपेयी ने उन्हें जरूर याद किया पर डॉ कर्ण सिंह जैसे लोगों ने क्या किया. मरने के बाद कोई किसी को नहीं पूछता. सब ताक़त के पुजारी हैं. यही जग की रीत है. मीडिया में भी कोई नहीं पूछता. कहां गए वो पत्रकार और लेखक जिनको अर्जुन सिंह ने उपकृत किया था. अर्जुन सिंह नहीं होते तो अशोक वाजपेयी भी कला संस्कृति के लिए उतना नहीं कर पाते. वैसे मैं अर्जुन सिंह की नेहरु गांधी परिवार के प्रति अंधभक्ति का विरोधी रहा हूं.

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार विमल कुमार के फेसबुक वॉल से.

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मैंने कृष्णा सोबती जैसी बड़ी लेखिका को भी पुरस्कार लेने के लिए रिहर्सल करते देखा है : विमल कुमार

#VimalKumar

Vimal Kumar : करीब 15 साल पहले मैं राष्ट्रपति भवन में भारतीय भाषा परिषद् के पुरस्कार समारोह को कवर करने गया था तो मैंने कृष्णा सोबती जैसी बड़ी लेखिका को भी पुरस्कार लेने के लिए रिहर्सल करते देखा तब मुझे झटका लगा था. तब प्रभाकर श्रोत्रिय परिषद् के निदेशक थे. मैंने जनसत्ता में पुरस्कारों का रिहर्सल शीर्षक से एक लेख लिखा था. गिरिराज किशोर ने रिहर्सल को जायज़ ठहराते हुए मेरे लेख के जवाब में एक लेख लिखा. उस दिन मैं समझ गया कि हमारे देश के लेखकों में आत्मस्वाभिमान नाम की कोई चीज़ नहीं है. वे किसी के हाथों कोई पुरस्कार ले सकते हैं उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसमें हमारे कुछ वामपंथी दोस्त भी शामिल हैं.

आज भी जब किसी को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के हाथों किसी को पुरस्कार लेते देखता हूँ तो हंसी आ जाती है. फिर सोचता हूं ये लेखक दया के पात्र हैं, सम्मान के भूखे. इन्हें समाज से इज्ज़त नहीं मिली शायद इसलिए वे ऐसा करते हैं. आखिर हमारे लेखक कब इस बात को समझेंगे. बड़ा लेखक प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से बड़ा आदमी होता है, वो कारपोरेट का एजेंट नहीं होता. वो सोनिया गांधी की दया पर नहीं जीता. वो ज्योति बासु का गुणगान नहीं करता. वो मोदी या अडवानी या नितीश या लालू के पीछे नहीं घूमता. वो अखिलेश यादव या मुलायम मायावती से बड़ा है. केवल रामविलास शर्मा ने लेखकीय आत्मस्वाभिमान की रक्षा की है. निराला ने भी यही काम किया था. लेकिन मैं देखता हूँ कि हमारे लेखक एक सांसद भी का सम्मान करने पहुँच जाते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार विमल कुमार के फेसबुक वॉल से.

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