कंटेप्ट आफ कोर्ट में आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को जेल व जुर्माना

खबर है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को पंद्रह दिन की जेल और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है. एसके श्रीवास्तव के खिलाफ एक अन्य महिला आईआरएस अधिकारी ने अपशब्दों के प्रयोग समेत कोर्ट के आदेश न मानने के आरोप लगाए थे. ज्ञात हो कि कोर्ट ने पहले एक आदेश में एसके श्रीवास्तव पर अनाप-शनाप न बोलने-लिखने का आदेश सुनाया था. इसका उल्लंघन करने पर अब कल उन्हें जेल व जुर्माने की सजा हुई है.

एसके श्रीवास्तव ने काले धन को लेकर कई तरह के आरोप कुछ नेताओं, एक चैनल और कुछ विभागीय अफसरों पर लगाए थे. इसको लेकर चली अदालती लड़ाई में पहले सीबीआई कोर्ट से एसके श्रीवास्तव के दावे आरोप खारिज हो चुके हैं. एसके श्रीवास्तव को लेकर दो तरह की राय लोग रख रहे हैं. कुछ का कहना है कि इनका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है और ये अपने आरोपों के समर्थन में कभी कोई प्रमाण नहीं पेश कर पाए. वहीं, कुछ अन्य कहते हैं कि एसके श्रीवास्तव काले धन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं जिसके तहत सत्ता-सिस्टम इन्हें प्रताड़ित पीड़िता कर रहा है. एस. गुरुमूर्ति ने श्रीवास्तव को सजा को लेकर एक ट्वीट किया है, जो इस प्रकार है..

S Gurumurthy on Twitter @sgurumurthy

SK Srivastava held liable for civil contempt because he violated his undertaking not to use foul language against assessing officers of NDTV. That does not detract from his exposure of NDTVs tax evasion. In any other country Srivastava would have been rewarded for his work. I have rarely come across such honest and courageous official after the likes of Pandey and Bhurelal His case will expose many wrong doers.


हाईकोर्ट के ताजे फैसले की प्रति यहां हैं, क्लिक करें… HC Final Order


पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इसे भी पढ़ें….

एनडीटीवी, ब्लैकमनी, एसके श्रीवास्तव, जांच और जेठमलानी-चिदंबरम पत्राचार

इंडिया न्यूज और टाइम्स नाऊ पर अखिलेश यादव ने गिराई गाज

खबर है कि इंडिया न्यूज नेशनल और इंडिया न्यूज रीजनल को उत्तर प्रदेश में सरकार ने ब्लैक आउट करा दिया है, यानि इसका केबल पर दिखना बंद हो गया है. बताया जाता है कि ऐसा यूपी सरकार से इंडिया न्यूज के लोगों के किसी विवाद के बाद हुआ है. कुछ कह रहे हैं कि पैसे का मामला है तो कुछ का कहना है कि कोई अन्य मसला. बताया जाता है कि सेटलमेंट के लिए एक राउंड बैठक भी हुई पर विवाद नहीं सुलझा. इसके बाद इंडिया न्यूज ने फिर से निगेटिव खबरों का प्रसारण शुरू किया तो सरकार ने इसे ब्लैकआउट करा दिया.

उधर, इंडिया न्यूज से जुड़े लोगों का कहना है कि उनके चैनल पर मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर बहुत सारी खबरें चलाई गई उससे संभवतः प्रदेश सरकार नाखुश है. साथ ही मनोरंजन कर मंत्री पवन पांडेय के खिलाफ कई तथ्यात्मक स्टोरीज प्रसारित की गईं. हो सकता है कि पवन पांडेय ने ही डेन को बोलकर इंडिया न्यूज को बंद कराया हो. इंडिया न्यूज के लोगों ने इस कार्रवाई को मीडिया विरोधी करार दिया है.

उधर, टाइम्स नाऊ से खफा यूपी सरकार ने चैनल का प्रसारण नोएडा, गाजियाबाद और लखनऊ में बंद करा दिया है. इस चैनल के यूपी के रिपोर्टर प्रांशु मिश्रा पर आरोप है कि वे अपनी पत्नी के साथ अखिलेश यादव के साथ हेलीकाप्टर में घूमे और सैफई महोत्सव का आनंद लिया लेकिन उनके चैनल ने काफी नकारात्मक लैंग्वेज का इस्तेमाल यूपी सरकार के प्रति किया. इससे नाराज अखिलेश ने टाइम्स नाऊ और इससे स्थानीय पत्रकार की आलोचना प्रेस कांफ्रेंस में भी की थी.

महिला पत्रकार सौम्या शर्मा को पुरस्कार मिलने पर रमन सिंह ने बधाई दी

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने राजधानी रायपुर की महिला पत्रकार सुश्री सोमा शर्मा को राष्ट्रीय लाडली मीडिया पुरस्कार मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दी है. ज्ञातव्य है कि सुश्री शर्मा को महिला उत्थान के क्षेत्र में विशेष रिर्पोटिंग के लिए राष्ट्रीय जनसंख्या कोष और समाजसेवी संस्था पापुलेशन फर्स्ट द्वारा पिछले माह की बीस तारीख को नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किया गया.

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से विधानसभा में सुश्री शर्मा ने सौजन्य मुलाकात कर उन्हें पुरस्कार में मिले प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह दिखाए. विधानसभा अध्यक्ष श्री गौरीशंकर अग्रवाल, कृषि और जल संसाधन मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री टी.एस.बाबा ने भी इस विशेष उपलब्धि के लिए सुश्री शर्मा को बधाई दी है.  
 

आशुतोष के शिकार एक आम पत्रकार की कहानी

साथी, मैं बहुत दिन से यह लिख रहा था। लेकिन अब समाचार मिला कि आशुतोष ने आप का दामन थाम लिया है। लगता है कि कुछ देर हो गई है। लेकिन जितना लिखा है, वह भेज रहा हूं। हो सके तो छापिएगा। मेरा दर्द कुछ कम होगा। और आम आदमी पार्टी को ऐसे बहरुपिए के बारे में थोड़ी जानकारी मिलेगी। जो व्यक्ति रिलायंस के इशारे पर अपने साथियों को नौकरी से निकाल देता है और अपनी नौकरी बचा लेता है, वह व्यक्ति राष्ट्र के लिए क्या लड़ेगा?

मैं आपसे झूठ नहीं कहूंगा। यह मेरा फर्जी नाम है। असली नाम मैंने छिपा लिया है। कहीं काम कर रहा हूं। बच्चे पालने है। मां-बाप की देखभाल करनी है। बहुत थोड़े पैसे मिलते हैं। किसी तरह काम चलाता हूं। अभी नौकरी बहुत जरूरी है।

आपका

राज


कुछ दिनों पहले जब मुझे आईबीएन 7 की नौकरी से निकाला गया तो भीतर बहुत गुस्सा था। मैंने पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया था, बार-बार यही सवाल उठता कि आखिर मुझे क्यों चुना गया? क्या ईमानदारी और मेहनत की यही कीमत होती है? कई ऐसे लोग बचाए गए हैं जो हफ्तों दफ्तर नहीं आते। जिनकी तनख्वाह में मेरे जैसे कई लोग बचाए जा सकते थे, लेकिन हमें नहीं बचाया गया। हमारी मेहनत और ईमानदारी की जगह उन लोगों की चाटुकारिता चुनी गई। तभी मन किया कि लिखूंगा। लिखने बैठा भी। लेकिन गुस्सा, आक्रोश और बेइज्जती का अहसास इतना हावी था कि भावनाओं को तार्किक आधार नहीं दे सका। शब्द बहक जाते थे। लेकिन आज थोड़ा ठीक महसूस कर रहा हूं। संतुलित तो अब भी नहीं हूं। उस "भावनात्मक चोट" से तो अब भी नहीं उबरा हूं। लेकिन उस दिन की तुलना में थोड़ा संभला हुआ जरूर हूं। शायद इसलिए शब्द ढूंढ पा रहा हूं। लहराता हुआ ही सही कुछ लिख पा रहा हूं।

आप सोच रहे होंगे कि नौकरी जाने को मैंने आर्थिक चोट की जगह भावनात्मक चोट क्यों कहा है। दरअसल पत्रकारिता में आने का फैसला ही भावनात्मक था। चाहता तो कुछ और कर सकता था। सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई कर सकता था। नहीं मिलने पर दुकान चला सकता था। और कुछ नहीं तो दलाली तो कर ही सकता था जो आईबीएन 7 में रहते हुए कुछ लोग कर रहे हैं। आपके और हमारे आस-पास कई ऐसे लोग होंगे जो पत्रकारिता की खाल में दलाली करते होंगे। वह काम तो मैं कर ही सकता था। लेकिन मेरी नियति तो पत्रकार बनना लिखा था, इसलिए पत्रकार बना। और मैंने अपना कर्म ईमानदारी से किया। इसलिए जब संपादक… ओह! माफ करें… मैनेजिंग एडिटर (आशुतोष गुप्ता को मैनेजिंग एडिटर कहलाने का बड़ा शौक है… एक बार उन्होंने संजय पुगलिया की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि वह सिर्फ एडिटर है और मैं मैनेजिंग एडिटर हूं) की तरफ से कहलवाया गया कि मुझे दूसरी नौकरी ढूंढ लेनी चाहिए तो मैं सदमे में चला गया। कमजोर दिल होता तो हार्टअटैक ही आ गया होता। मेरा एक दोस्त अक्सर कहा करता है कि काम करने वाले को इनाम में और अधिक काम ही मिलता है। यह बात मुझ पर भी लागू होती रही। सभी कहते थे कि मैं काम अच्छा करता हूं, लेकिन कभी पैसा उस अनुपात में बढ़ाया नहीं गया। काम बढ़ता रहा तब भी इस बात का संतोष था कि चलो काम लायक तो समझा जाता है। लेकिन इस बार तो हद ही हो गई। साजिश करके काम नहीं करने की चिट्ठी थमा दी गई।

मैं यह सब अपना दुखड़ा रोने के लिए नहीं लिख रहा हूं। मैं यह इसलिए लिख रहा हूं कि मीडिया जगत के इस "आपराधिक षणयंत्र" पर बहुत कुछ लिखा जाना चाहिए था, लेकिन किसी ने गंभीरता से नहीं लिखा। इस "नरसंहार" का लाभ उठा कर उन कारणों की विवेचना होनी चाहिए थी जिसकी वजह से बार बार छंटनी की नौबत आ जाती है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उन गुनहगारों की शिनाख्त होनी चाहिए थी जिनके कारण एक साथ इतने लोगों की बलि चढ़ाई गई, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। मगर आज मैं अपने पुराने संस्थान से जुड़े इन तमाम सवालों पर चर्चा करूंगा। इस नरसंहार के कारणों पर चर्चा करूंगा और उन गुनहगारों के बारे में बताऊंगा जिनकी वजह से सैकड़ों पत्रकारों और तकनीकी लोगों को अपनी रोजीरोटी से हाथ धोना पड़ा। उनमें से मेरे जैसे कुछ तो थोड़ा संभल गए हैं लेकिन बहुतेरे ऐसे हैं जिनकी जिंदगी का संघर्ष बढ़ गया है। कुछ उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां संघर्ष के नतीजे अच्छे नहीं होते। मगर वो संघर्ष करने को मजबूर हैं। सुनते हैं कुछ दोस्त अपने गांव-कस्बों की ओर लौट गए हैं। दशकों इस महानगर में जीने के बाद गांव-कस्बे उन्हें अपनाएंगे इस पर मुझे संदेह है। इन सब मुद्दों पर सोचता हूं तो आंख भर आती है। दिल फफक-फफक कर रोने का करता है। यह सलीका आता तो शायद दुख कुछ कम हो जाते। दर्द आंसुओं की शब्द में थोड़ा बाहर निकल जाता।

हम मुद्दों पर आते हैं। आखिर आईबीएन7 या नेटवर्क 18 में छंटनी की नौबत क्यों आई? और छंटनी किन लोगों की हुई? सवाल यह भी है कि क्या छंटनी में हुई साजिश के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा? या फिर साजिशों को दौर जारी रहेगा? अगर साजिशें जारी रहेंगी तो फिर निशाने पर कौन-कौन लोग हैं? छंटनी से यह साफ है कि आईबीएन 7 का  रेवेन्यु मॉडल फेल हो गया है? आखिर यह रेवेन्यु मॉडल फेल क्या है और यह फेल क्यों हुआ? किसी मीडिया संस्थान के रेवेन्यु का आधार क्या हो सकता है? क्या कोई मीडिया संस्थान छोले-भटूरे, कपड़े-जूते या फिर मोटरसाइकिल-कार बेच कर पैसा कमा सकता है? या उसे कंटेंट पर आधारित प्रोडक्ट ही बेचना होगा? तो फिर वह कंटेंट कैसा होना चाहिए? और जब किसी मीडिया संस्थान का कंटेंट बेचने लायक नहीं हो तो उसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराना चाहिए? संपादकों को या सीईओ को? क्या आप जानते हैं कि सबसे पहले सीएनएन-आईबीएन के सीईओ की छुट्टी की गई?

इन सभी सवालों पर एक के बाद एक विस्तार से चर्चा होगी। इस चर्चा की शुरुआत चैनल के रेवेन्यु मॉडल और आईबीएन 7 के कंटेंट से करते हैं। मैं दावे से इतना तो कह ही सकता हूं कि आईबीएन 7 का कंटेंट और उस कंटेंट को परोसने का तरीका दोनों का स्तर मीडिया बाजार के दूसरे ब्रांड्स से काफी छिछला है। यही वजह है कि यह चैनल टीआरपी रेस में काफी चोटी के चैनलों में आ ही नहीं सका। दरअसल, इस चैनल का नाम आईबीएन की जगह पर चीख चैनल होता तो ज्यादा अच्छा रहता। यहां पर सब चीखते हैं। मैनेजिंग एडिटर चीखता है। उसका नंबर वन सुपारी किलर कार्यकारी संपादक संजीव पालीवाल चीखता है। उसके चेले चीखते हैं। चैनल देखने पर लगता है कि इसकी हर खबर में चीख है। स्टोरी दर्द की हो, खुशी की हो, धर्म की हो, अधर्म की हो, राजनीति की हो, कारोबार की हो, खेल की हो, खिलाड़ी की हो, सिनेमा की हो या फिर सितारों की हो… खबर चाहे किसी भी प्रकृति की हो, किसी भी चेहरे की हो… वह चीखती है। क्योंकि इसका मैनेजिंग एिडटर चीखता है। शायद उसकी निजी जिंदगी में खुशी की जगह चीख भरी हुई है इसलिए वह दर्शकों को चीख सुना कर सेडिस्टिक प्लेजर लेता है। अब आप बताइये कि चीख को बाजार में कितना बेचा जा सकता है? कोई दर्शक कितनी देर चीख सुन सकता है?

यह सच है। सौ फीसदी सच। आज आईबीएन 7 चीख चैनल है और इस चैनल को चीख में तब्दील करने वाले दो सबसे बड़े गुनहगार हैं इसके मैनेजिंग एडिटर आशुतोष गुप्ता और इनके नंबर वन सुपारी किलर संजीव पालीवाल। यह दोनों अपनी महत्वाकांक्षा में चैनल का हर रोज बलात्कार कर रहे हैं और बलात्कार के बाद विभत्स तरीके से हंसते हैं। चैनल के ग्रुप मैनेजिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई इनकी नंगई पर खामोश रहते हैं।

ब्रेक के बाद: टॉप 10 सवाल

1. आईबीएन 7 चीख चैनल में तब्दील कैसे हुआ?
2. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल चैनल का बलात्कार कैसे करते हैं?
3. राजदीप सरदेसाई इस पर खामोश क्यों है?  
4. कहीं राजदीप मजबूर तो नहीं?   
5. अगर राजदीप मजबूर हैं तो वह मजबूरी क्या है?
6. आशुतोष गुप्ता की जाति क्या है? और इस जाति का चैनल के कामकाज में क्या लेना-देना है?
7. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल किस बात से सबसे अधिक डरते हैं?
8. आईबीएन 7 की संपादकीय बैठक में एक डॉयरेक्टर यानी किसी कंपनी का एक मालिक भी बैठता है। वह कंपनी कौन सी है और उसके मालिक का नाम क्या है?
9. जब चैनल का कोई व्यक्ति अपनी कंपनी नहीं चला सकता है तो फिर संपादकीय बैठक में हर रोज शामिल होने वाले इस शख्स को यह खुसी छूट किसने दी है और क्यों दी है?
10. एक सच जिसके सामने आते ही आशुतोष गुप्ता, संजीव पालीवाल और राजदीप सरदेसाई के पैरोंतले की जमीन खिसक जाएगी। आखिर वह सच्चाई कौन सी है? उस सच्चाई का खुलासा।
 
पार्ट टू –

आज हम चार सवालों पर एक साथ चर्चा करेंगे और बाकी सवालों पर उसके बाद। यह चारों प्रश्न हैं:

1. आईबीएन 7 चीख चैनल में तब्दील कैसे हुआ?
2. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल चैनल का बलात्कार कैसे करते हैं?
6. आशुतोष गुप्ता की जाति क्या है? और इस जाति का चैनल के कामकाज में क्या लेना-देना है?
7. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल किस बात से सबसे अधिक डरते हैं?

पुरानी कहावत है। किसी को उसकी औकात से अधिक दे दो तो वह बौरा जाता है। उसका दीमाग फिर जाता है। इसी को थोड़ा उलट कर कहें तो कुएं का मेंढक जब बाहर निकलता है तो अकबका जाता है। कुछ ऐसा ही आशुतोष और संजीव पालीवाल के साथ हुआ। इन दोनों ने पत्रकारिता का प भी नहीं सीखा था कि इन्हें चैनल चैलाने की जिम्मेदारी मिल गई। यह कुछ भी अच्छे नहीं थे। न इन्हें अच्छी स्टोरी लिखने आती है। ना अच्छा लेख। ना ही यह अच्छे एंकर थे। ना ही प्रोडक्शन में अच्छे थे। औसत समझ और औसत से भी कमतर सोच, संकीर्ण मानसिकता और दिल वाले इन दोनों व्यक्तियों को आईबीएन 7 चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मगर इन दोनों में ही दो क्षमताएं प्रचूर मात्रा में थीं। एक यह दोनों झूठ बोलने में उस्ताद हैं और इनमें मक्कारी कूट-कूट कर भरी है। इसलिए इन दोनों ने एक दूसरे को डैमेज करने की जगह एक दूसरे का पूरक बनने में भलाई समझी और एक अघोषित समझौता किया कि वह एक दूसरे के कम्फर्ट जोन में सेंध नहीं लगाएंगे। एक दूसरे की अय्याशियों पर अंगुली नहीं उठाएंगे और राज करेंगे।

इसे समझाने के लिए आपके समक्ष कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना जरूरी है। किसी भी समाचार चैनल का एजेंडा उसके संपादकों से तय होता है। इसके लिए संपादकों में खबर की समझ होनी बहुत जरूरी है। अब इन दोनों में खबर की समझ कितनी और यह दोनों कितने बेहतर इंसान हैं इसका अंदाजा आपको इस उदाहरण से लग जाएगा। कुछ समय पूर्व चलती गाड़ी में एक महिला के बलात्कार की खबर अखबार में छपी। उसी दिन मॉर्निंग मीटिंग यानी सुबह दस बजे की बैठक में खबरों पर चर्चा होने लगी। इस अपराध का जिक्र होने लगा। आईबीएन 7 की प्लानिंग टीम रणनीति तैयार करने के लिए बैठी थी। आशुतोष गुप्ता, संजीव पालीवाल, मृत्युंजय कुमार झा समेत सभी दिग्गज बैठे थे। सुश्री किरणदीप भाटिया जी भी मौजूद थीं। उस मीटिंग में 35-40 मिनट तक बात इस पर होती रही कि आखिर चलती गाड़ी में बलात्कार कैसे किया जा सकता है? कुछ तो चटखारे लेते हुए ब्योरा दे रहे थे कि ऐसे किया जा सकता है, वैसे किया जा सकता है। उस मीटिंग में मौजूद कुछ संवेदनशील किस्म के लोगों ने बाहर आने पर यह जानकारी दूसरे लोगों को दी और छन-छन कर इस बैठक का ब्योरा हम जैसे निचले स्तर के लोगों को भी मिल गया। सोच कर घिन आती है, लेकिन क्या कीजिएगा पूरे कुएं में ही भांग घुली है।

सच्चाई यही है कि आशुतोष गुप्ता किसी लिहाज से संपादक बनने लायक नहीं है। मेरा यह निजी मत है कि बेहतरीन संपादक वही हो सकता है जो बेहतरीन इंसान हो। यह कहने का मतलब कतई यह नहीं कि हर बेहतरीन इंसान बेहतरीन संपादक बन सकता है। बल्कि सिर्फ इतना है कि बेहतरीन संपादक होने के लिए बेहतरीन इंसान होना एक अनिवार्य शर्त है। इसे आप उदाहरण से समझिए…। प्रभाष जोशी बेहतरीन संपादक थे, क्योंकि वह बेहतरीन इंसान भी थे। कमर वहीद नकवी बेहतरीन संपादक रहे, क्योंकि वह बेहतरीन इंसान भी हैं। एस पी सिंह बेहतरीन संपादक थे और एक बेहतरीन इंसान भी। सुनते हैं कि पराड़कर लाजवाब व्यक्तित्व थे और उतने ही बड़े संपादक भी। कुलदीप नैयर बेहतरीन संपादक रहे और बेहतरीन इंसान भी। लेकिन आशुतोष गुप्ता एक औसत से कमतर इंसान हैं। इसलिए यह अपने जीवन में कभी भी बेहतरीन संपादक नहीं हो सकते।

अब बात उठती है कि क्या यह कामयाब संपादक बन सकते हैं? कामयाब संपादक होने के लिए बेहतरीन इंसान होना जरूरी नहीं है। आपको ऐसे कई संपादक मिल जाएंगे जो इंसान के तौर पर अच्छे नहीं हैं लेकिन पेशेवर तौर पर कामयाब रहे हैं। उन कामयाब संपादकों और आशुतोष में क्या अंतर है? पहला अंतर तो यह है कि एक दो अपवादों को छोड़ कर कामयाब संपादक एंकर नहीं होंगे और आशुतोष गुप्ता एंकर हैं। इसलिए कामयाब संपादकों की सोच का दायरा थोड़ा बड़ा रहता है। मतलब वह चैनल के बारे में सोचते हैं। वह ऐसी स्टोरी के बारे में सोचते हैं, जिस पर खेला जा सकता है। वह ऐसे तरीके के बारे में सोचते हैं जिसके जरिए खेला जा सकता है। आत्मकेंद्रित सभी हैं लेकिन उनके आत्मकेंद्रित होने के दायरे में चैनल आ जाता है। उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि चैनल अच्छा करेगा तो वह अच्छा करेंगे। वह अच्छा करेंगे तो चैनल अच्छा करेगा। इसलिए उदय शंकर, सुप्रिय प्रसाद, विनोद कापड़ी और साजी जमा जैसे लोग चैनल को दांव पर लगा कर खुद को आगे बढ़ाने के बारे में नहीं सोचते हैं। यहां आशुतोष इन सबसे अलग हैं।
 
आशुतोष गुप्ता एक ऐसा सेल्फ ऑब्सेस्ड क्रिचर (आत्मकेंद्रित जीव) है जो खुद को महान विद्वान मान बैठा है। और जब औसत से भी कमतर बुद्धि, समझ और विवेक वाले इंसान में महान विद्धान होने का भ्रम बैठ जाए तो वह भस्मासुर हो जाता है। वह जिस वस्तु, प्राणी और संस्थान पर हाथ रखेगा… उसे भस्म होना ही है। आईबीएन 7 की भी यही स्थिति है। इसे विस्तार देने के लिए मीडिया जगत का एक पुराना किस्सा आप लोगों को सुनाता हूं। देश के एक बड़े और ताकतवर अखबार समूह का संपादक होने के नाते एक दिग्गज पत्रकार को सभी जगह बड़ा सम्मान मिलता था। वह जिस मंत्री के यहां जाएं, वह उन्हें छोड़ने दरवाजे तक आता। वह जिसे फोन करें, वह तुरंत उनसे बात करता। धीरे-धीरे उस संपादक को लगने लगा कि वह प्रधानमंत्री के बाद देश का दूसरा सबसे ताकतवर इंसान है। और यह बात उसने कुछ-एक जगह कहनी शुरू कर दी। बातें फैलती हैं। बातें उड़ती हैं और यह बात भी फैलते-फैलते, उड़ते-उड़ते उस अखबार के मालिक तक जा पहुंचीं। उसने तुरंत संपादक को पैदल कर दिया। अब संपादक को अहसास हुआ कि दरअसल ताकतवर वह नहीं, वह ओहदा था जिस पर वह बैठा था। आज भी वह संपादक कभी-कभार टीवी चैनलों पर ज्ञान देते नजर आते हैं। लेकिन अब उनका अंहकार टूट गया है।

आशुतोष अभी इसी अहंकार और इसी भ्रम में जी रहे हैं। वह अक्सर कहते हैं कि मैं किसी का भविष्य बना सकता हूं और किसी का बिगाड़ सकता हूं। उन्होंने कुछ लोगों का भविष्य बिगाड़ा भी है। लेकिन बनाने और बिगाड़ने का यह भ्रम … एक तुच्छ सोच का नतीजा होता है। सच तो यही है कि तात्कालिक खेल में कोई किसी शख्स का नुकसान जरूर कर दे, वह उस शख्स की नियति तय नहीं कर सकता। इसलिए आशुतोष ने जिन लोगों का भविष्य बिगाड़ा है (अपनी तुच्छ सोच के तहत), कुछ समय बाद उनमें से कुछ यकीनन तौर पर आशुतोष गुप्ता से अधिक ताकतवर स्थिति में होंगे। वैसे क्या होगा और क्या नहीं होगा, यह दर्शन का दायरा है और इसे हम यहीं छोड़ देते हैं। अभी बात आशुतोष की हो रही है तो इसी पर हम ध्यान केंद्रित रखते हैं। तो आशुतोष गुप्ता ने आईबीएन 7 को एक उत्कृष्ट बनाने की जगह अपनी निजी ब्रांडिंग का जरिया मात्र बना दिया। इससे तीन नुकसान हुए। प्रथम कि यह चैनल चोटी के चैनलों की लिस्ट से बाहर हो गया। इसकी हैसियत और ताकत घट गई। द्वितीय, चैनल आर्थिक स्तर पर कमजोर हो गया। और तृतीय, ब्रांड आशुतोष तो बना, लेकिन जब चैनल कमजोर हो तो उससे जुड़े ब्रांड की भी अहमियत ज्यादा नहीं रहती। इसे आप टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी के उदाहरण से समझ सकते हैं। अर्णव ने भी अपना ब्रांड बनाया है, लेकिन चूंकि उनकी रणनीति अच्छी रही है और चैनल को आगे रखा इसलिए उनके ब्रांड की बाजार में एक कीमत है। वहां टाइम्स नाउ और अर्णव एक दूसरे को मजबूत करते हैं। एक दूसरे को आधार देते हैं। यहां आईबीएन7 आशुतोष गुप्ता की संकीर्ण सोच का खामियाजा उठा रहा है और नतीजतन खुद ब्रांड आशुतोष की कोई खास वैल्यू नहीं है। यह बाजार का नियम है और इसे वही समझ सकता है जिसकी सोच बड़ी है और समझ साफ हो। एक कुंठित व्यक्ति यह कभी नहीं समझ सकता।

आशुतोष गुप्ता की खबरों की समझ कितनी है उसे जानने के लिए आपको दिमाग पर जोर डालने की जरूरत नहीं है। आप कभी भी चैनल ऑन कर लीजिए आपको अंदाजा हो जाएगा। मसलन अगर मौसम आम का है बाकी चैनल आम की बोली लगा रहे होंगे तो यह अमरूद बेचते दिखेंगे। अगर किसी मजबूरी में आम बेचना पड़े तो यह दशहरी को लंगड़ा बता कर बेचने लगेंगे। इनकी समझ इतनी ही है कि कुछ समय पहले हिंदुस्तान में इनका एक लेख छपा था। लेख कर्नाटक के चुनावी नतीजों पर था। लेकिन उसकी शुरुआत फेदरीको फेलिनी की फिल्म से हुई। तीन पैरा आंय-बांय लिखने के बाद चौथे पैराग्राफ में कर्नाटक का जिक्र आया। उस लेख में फिल्म के जिक्र का कोई मतलब नहीं था और फेदरीको फेलिनी कौन है यह हिंदी का आम पाठक शायद ही जानता हो। लेकिन इनके जैसे सेल्फ ऑब्सेस्ड लेखक और पत्रकार की यह बीमारी है कि वह खुद को महान-विद्वान साबित करने के लिए दो-चार महान लोगों के नाम गिराएंगे ही। उन ऐतिसाहिक लोगों की महानता के साथ ही इनकी छद्म और स्वघोषित महानता बढ़ती है। यह सियासत पर बात करेंगे तो वर्ल्ड सिनेमा बीच में ले जाएंगे और वर्ल्ड सिनेमा पर बात करेंगे तो सियासत बीच में पेल देंगे। यह अंदाज है। यह खुद को बेचने का हुनर है। इसलिए आप देखेंगे कि इन तमाम स्वघोषित और सेल्फ ऑब्सेस्ड संपादकों, पत्रकारों की अगुवाई वाला चैनल डूब जाता है लेकिन यह फल-फूल जाते हैं।

अब आप यहां पर पूछ सकते हैं कि मौजूदा दौर में ऐसा कौन सा संपादक है जो अच्छा है? मेरा यह निजी मत है कि कुछ समय पहले तक नकवी एक ऐसे संपादक थे जिनके प्रति सम्मान पैदा होता था और आजतक से उनकी विदाई के बाद संजय पुगलिया ही इकलौते संपादक बचे हैं जिनको देख कर सिर सम्मान में झुकता है। वरना तो इन दिनों संघर्ष अच्छे संपादकों के बीच है ही नहीं। अभी हिंदी चैनलों पर लुच्चे और उठाइगिरे किस्म के लोगों का कब्जा है। आईबीएन 7 में भी ऐसे लोगों की भरमार है। इसे और बेहतर तरीके से समझने के लिए अभी का ही उदाहरण लीजिए। अभी चैनल पर निर्भया बलात्कार कांड के आरोपियों के छिछोरे और घृणित वकील के बयान पर आईबीएन7 पर चर्चा चल रही है। वैसे तो इस घृणित बयान पर चर्चा का कोई मतलब नहीं बनता। एक ओछे आदमी के बयान को घंटों राष्ट्रीय चैनल पर चलाने का कोई तुक नहीं था। लेकिन कुछ चैनलों के औसत दर्जे के संपादकों ने इसे मुद्दा बना दिया। और आशुतोष गुप्ता जैसे महान विद्वान को भी दो दिन बाद लगने लगा कि इस पर खेला जा सकता है। मतलब आशुतोष गुप्ता की इतनी ही औकात है। यह जूठन परोस सकते हैं और वह भी दूसरे चैनलों से खराब तौर तरीके से।

आईबीएन 7 अच्छा नहीं कर सका और अच्छा नहीं कर रहा तो इसकी पहली जिम्मेदारी इसके मैनेजिंग एडिटर आशुतोष गुप्ता पर आती है। हालांकि आशुतोष अपने नाम के आगे गुप्ता नहीं लगाते हैं और आपमें से कुछ लोग यकीनन यह सोच रहे होंगे कि मैं बार-बार उनके नाम के आगे उनका सरनेम क्यों लिख दे रहा हूं। दरअसल, सरनेल छिपाना भी प्रगतिशीलता का एक पाखंड है। अगर सरनेम/लास्टनेम/उपनाम/जातिनाम नहीं लगाने से आदमी गैरजातिवादी हो जाता तो सरकार को इसे अनिवार्य कर देना चाहिए। लेकिन सच्चाई यही है कि आदमी जातिनाम लगा कर भी गैरजातिवादी हो सकता है और जातिनाम हटा कर भी घोर जातिवादी हो सकता है। आशुतोष गुप्ता भी घोर जातिवादी हैं। इसलिए इस छंटनी में ज्यादातर वैश्य-बनिया समुदाय के लोग बचा लिए गए हैं। इन लोगों की फेहरिस्त देना मेरा मकसद नहीं है, क्योंकि इनमें से कुछ प्यांदे हैं तो कुछ की औकात प्यादों से हल्की सी ज्यादा है। इसलिए जब बात सिपहसालारों की हो रही हो तो प्यांदों का जिक्र क्या करना?

पार्ट तीन

मतलब आईबीएन 7 में छंटनी के खेल में मुख्यपात्र दो ही हैं। आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल। यह दोनों बड़े खिलाड़ी हैं, लेकिन इन दोनों में ज्यादा तेज संजीव पालीवाल हैं। वह कार्यकारी संपादक हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि किसी चैनल का कार्यकारी संपादक किसी दूसरी कंपनी डायरेक्टर हो? यानी वह निजी व्यवसाय भी करता हो। सुनते हैं कि संजीव पालीवाल का अपना रिसॉर्ट है और अपनी कंपनी है। यह भी सुनते हैं कि वह न्यूजरूम में कभी-कभार यह कहते भी रहे हैं। लेकिन वह आईबीएन 7 का कार्यकारी संपादक भी है। यह कंपनी के गाइडलाइन्स के खिलाफ है और इसकी जानकारी राजदीप सरदेसाई को भी होगी। लेकिन शायद यह बात राघव बहल से छुपा कर रखी गई होगी। यह कार्यकारी संपादक शाम होते ही अपना झोला उठा कर दफ्तर से बाहर चला जाता है। यानी शाम के प्राइम टाइम में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। लेकिन चैनल की वास्तविक कमान इन्हीं के हाथ में है। जैसे इसी छंटनी में संजीव पालीवाल ने अपने हर बंदे को बचा लिया।

बरेलवी गिरोह का हर सदस्य बच गया। तस्लीम खान, इकबाल रिजवी, सरदार साजिद (इसका पूरा नाम आज तक मैं नहीं जान पाया… यह रोज आते, न्यूज़रूम में बैठते, बात होती तो पता चलता) सब बच गए। पंकज श्रीवास्तव, आलोक वर्मा, पंकज भार्गव जैसे लोग भी बच गए। यह सब मोटी तनख्वाह वाले लोग हैं, लेकिन चैनल चलाने में इनकी कोई अहम भूमिका नहीं। इनमें से एक-दो आपको प्राइम टाइम पर फिल्म सिटी में वॉक करते दिखेंगे। फिटनेस जरूरी है। कुछ बैडमिंटन खेलते नजर आएंगे। सेहतमंद रहने के लिए खेलना जरूरी है। फेसबुक-फेसबुक करते दिखेंगे। नेटवर्किंग जरूरी है। मतलब वह हर काम करते नजर आएंगे, जिसका पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं। लेकिन इन पर आंच नहीं आई। मारा कौन गया? निचले और मध्यम ओहदों पर काम करने वाला मेरे जैसा वह पत्रकार/कर्मचारी जो मेहनत करता था और जो ना तो आशुतोष गुप्ता के गुट में था और ना ही संजीव पालीवाल के गुट में था। मतलब जिन दो लोगों की नाकामी और गुटबाजी की वजह से छंटनी की नौबत आई, उन दोनों की सेहत पर कोई आंच नहीं आई है। यह इंसाफ का कौन सा तरीका है, यह हम लोगों की समझ से परे है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अपराध फैक्ट्री बनीं यूपी की जेलें, मंत्री जी करेंगे सुधार

यूपी के एक मंत्री हैं राजेंद्र चौधरी। वे इस समय राज्य के कारागार मंत्री भी हैं और साथ ही प्रदेश समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता भी हैं, जनाब बिना नागा प्रेस विज्ञप्ति भेजते रहते हैं, इन विज्ञप्तियों में राज्य से लेकर दुनिया भर के मुद्दों पर उनकी राय होती है| चौधरी जी को जेल मंत्री बने एक अरसा हो चुका है| जिस दिन पद संभाला उस दिन तो जेल के वातावरण को सही करने का दावा किया लेकिन अभी तक मंत्री जी की ओर से कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया गया| इस समय आलम ये है कि आये दिन कैदियों कि मारपीट, पेशी के समय हत्या जानलेवा हमले की घटनाएं आम बात हो चुकी हैं। आइये नजर डालते हैं राजेंद्र चौधरी के वादों और जमीनी हकीकत पर।

हाल में ही जब राजेंद्र चौधरी से पूछा गया कि ''जेल मंत्री के रूप में विभाग में आपके द्वारा क्या सुधार किया जा रहा है?'' तो इसके जवाब में उन्होंने कहा अधिकारियों की बैठकें ली गयी है जिसमें जेलर व सुपरिटेन्डेन्ट शामिल रहे। मेरा साफ कहना है कि जेल यातना गृह नहीं है, यहां सुधार होना चाहिए और बंदियों में सुधार कर उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए तैयार किया जायेगा। सरकार की अपराध व भ्रष्टाचार से दूरी रहेगी। जेलों में जगह की कमी है। हमारे पास 48 हजार बंदियों को रखने की क्षमता है लेकिन 84 हजार बंदियों को रखा गया है। इसलिए हम 10-12 नई जेले बना रहे है। साथ ही साथ वीडियो कान्फेसिंग की व्यवस्था सीसी टीवी कैमरा लगाया जाना एवं आधुनिक व्यवस्थाऐं दिया जाना सुनिश्चित किया जा रहा है। नोएडा व कौशाम्बी में नई जेले तैयार की जायेगी। उन्होंने कहा धांधली को रोका जायेगा तथा आधुनिकीकरण किया जायेगा। घटिया सामग्रियों की जांच करायी जा रही है उस पर कार्यवाही की जायेगी। बंदी रक्षकों की भी कमी है 2500 की संख्या में भर्ती जल्दी ही करेंगे। उन्होनें बताया कि वे खुद कई बार जेल जा चुके हैं। सबसे पहले 45 वर्ष पूर्व और फिर कई राजनैतिक आन्दोलनों में इमरजेंसी में 6 माह मेरठ जेल में रहा।

अब हम आपको बताते हैं आखिर प्रदेश में इस समय क्या चल रहा है| पिछले कुछ दिनों पर नज़र डालें तो साफ़ नज़र आता है कि राज्य में जो भी बड़ी घटनाएँ हुई उनकी जाँच के बाद यूपी एसटीएफ को पता चला कि जेलों से माफि‍याओं द्वारा गैंग चलाया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक अधिकतर बड़े माफिया जेल को अपना सुरक्षित ठिकाना बना चुके हैं यहाँ उनको सभी सुविधा मिलती हैं और दुश्मनों का खतरा भी नहीं होता| आलम ये हैं कि बड़े माफिया सरगना जैसे मुख्‍तार अंसारी, बृजेश सिंह, बबलू श्रीवास्‍तव और मुन्‍ना बजरंगी जेल के अन्दर तो हैं लेकिन उनके कोई भी काम रुक नहीं रहे हैं| पुलिस दावे तो कर रही है लेकिन जेलों पर कड़ी निगाहें रखने के लिए उनके पास न तो साजो सामना हैं और न हीं इक्छा शक्ति। ऐसे में स्थिति बदतर होती जा रही है।

यूपी की जेलों से चल रहे माफियाओं के गैंग

राजधानी लखनऊ का माज हत्याकांड तो याद ही होगा आपको जिसमें इंस्पेक्टर संजय राय का नाम आया था। जाँच में सामने आया कि संजय राय ने आजमगढ़ जिला जेल में बंद अपराधी संदीप से मदद मांगी थी और संदीप ने ही हत्‍या के लिए शूटर मोहैया कराए। नोएडा के बिल्‍डर को जेल में बंद माफिया सरगना मुन्‍ना बजरंगी से फोन पर धमकी दी। यहाँ भी जाँच में सामने आया कि 6 मई को नोएडा के एक बिल्‍डर को मुन्‍ना बजरंगी ने फोन कर एक विवादित जमीन को छोड़ देने की धमकी दी और कहा कि उससे सुलतानपुर जेल में आकर मिले। इसी तरह गोरखपुर जेल में बंद श्‍याम बाबू ने जहानागंज के अजय सिंह से 25 लाख रुपए की रंगदारी मांगी थी। आजमगढ़ के पूर्व बसपा एमएलए सर्वेश कुमार सिंह सीपू की हत्‍या मामले में खुलासा हुआ है कि जेल में बंद कुंटू सिंह ने ही जेल के अन्दर हत्या कि साजिश रची। कहा जाता है कि माफिया ब्रजेश सिंह के भाई सतीश सिंह की हत्या के पीछे जेल में बंद मुख्तार अंसारी का हाथ था। सूत्रों के मुताबिक ये वो मामले हैं जिनका खुलासा हो गया है जबकि जेल में रसूख वाले कैदियों को सभी प्रकार की सुविधा मिलती है| फिर चाहे वो मोबाईल फ़ोन हो या बाकी के ऐशो आराम|

जेलों में कैदियों की सत्ता

उत्तर प्रदेश की जेलों में जहां संख्या से लगभग दोगुना कैदी बंद हैं, वहीं इन जेलों को संभालने के लिए जेलरों की संख्या उतनी भी नहीं है जितनी होनी चाहिए। लोग तो यह भी कहते हैं कि जेलों में 'कैदियों की सत्ता' है। कर्मचारियों की कमी ने प्रदेश की जेलों में कैदियों व जेल के कर्मचारियों की संख्या के अनुपात को बिगाड़ दिया है, जिसके चलते अब जेलों में अब कैदी ज्यादा और उन पर नजर रखने वाले कम हो गए हैं। सूत्रों का कहना है कि कैदी इसका बड़ा फायदा उठा रहे हैं। जेलों में कैदियों की संख्या निर्धारित संख्या से दोगुना है। यही वजह है कि जेलों में अब अराजकता और निरंकुशता बढ़ गई है। दबी जबान पर लोग यह कहने से गुरेज नहीं कर रहे कि जेल में 'कैदियों की सत्ता' है।

बताया जाता है कि प्रदेश में केवल उन्हीं जेलों में कर्मचारियों की कमी नहीं है जिनकी गिनती खास जेलों में की जाती है। वैसे तो प्रदेश में 65 जेल हैं जिनमें जेलरों के 87 पद हैं। लेकिन इनमें से 30 पद आजकल खाली पड़े हैं। यही कारण है कि ऐटा उरई, हरदोई, प्रतापगढ़, मिजार्पुर फतेहपुर और गाजीपुर जैसी जेलों में जेलर नहीं हैं। जहां जेलों में जेलरों की कमी है वहीं इन जेलों में कैदी ठूंस-ठूंस कर भरे हुए हैं। यही नहीं, जेलरों की कमी से जूझ रहे विभाग के दो जेलरों आलोक सिंह और शशिकांत को प्रदेश के कारागार मंत्री राजेंद्र चौधरी और राज्य मंत्री अभिषेक मिश्र के घर तैनात किया गया है। इस कमी को पूरा करने के लिए हालांकि, काफी समय से 3000 लोगों की भर्ती की बात कही जा रही है। अगर देखा जाए तो पुलिस विभाग ऊपर से लेकर नीचे तक अपने बड़े अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है।

प्रदेश में एडीजी का एक पद रिक्त पड़ा है। वहीं डीआईजी के चार पदों पर किसी अधिकारी को नहीं बैठाया गया है। इसी तरह जेल अधीक्षक के 64 पदों में से 28 पद रिक्त चल रहे हैं और एक निलंबित है। डिप्टी जेलरों के वैसे तो 448 पद हैं, लेकिन लगभग आधे 268 पद खाली हैं और सात निलंबित हैं। बंदी रक्षक व प्रधान बंदी रक्षकों के 2029 पद रिक्त है। कैदियों की सेहत की बात की जाए तो जेलों में चिकित्सकों के वैसे तो 134 पद हैं जिनमें से 46 पद खाली हैं। इसी प्रकार 134 फार्मेसिस्ट पदों में से 52 रिक्त हैं।

कारागार मंत्री राजेंद्र चौधरी भी मानते हैं कि प्रदेश की जेलों में बंदी रक्षकों और डिप्टी जेलरों की कमी है। उन्होंने बताया कि जेलों में बंदी रक्षकों व डिप्टी जेलरों की कमी है। इस कमी को पूरा करने व नई भर्ती के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जेलों में 48 हजार कैदियों के लिए स्थान है, जहां लगभग 84,000 कैदी बंद हैं। जेलों में कैदियों की निर्धारित संख्या से दोगुना कैदियों के होने की समस्या नए जिले बनने के कारण खड़ी हुई है, जिसे दूर करने के लिए सरकार एक दर्जन नई जेले बनवा रही है। उन्होंने कहा कि 2014 तक जेलों से जुड़ी हर समस्या हल कर ली जाएगी।

यूपी की जेल, जेल नहीं यातना शिविर हैं

वैसे तो आम धारणा है कि जेल जाने के बाद अपराधी सुधर जाते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश कि किसी भी जेल में ऐसा नहीं होता| क्योंकि यहाँ की जेल, जेल नहीं यातना शिविर हैं| यूपी में जेल जाने के बाद अपराधी सुधरते नहीं बल्कि वहां की अमानवी यंत्रणा झेल कर जब बाहर है, तब बन जाते हैं खूंखार अपराधी| प्रदेश की सभी जेलों को मिलकर 48 हजार कैदियों को रखने का स्थान है लेकिन इनमें लगभग 84 हजार कैदी बंद हैं। आपको जानकार हैरत होगी कि 51379 कैदी ऐसे हैं जिनका अभी अंडरट्रायल चल रहा है।

देश भर में हर वर्ष ऐसे कैदी निकलने हैं जिन्होंने किसी न किसी पेशे को कैद के दौरान दिल लगा कर सिखा है। वहीँ उत्तर प्रदेश के जेल से निकले किसी भी कैदी को यदि जीवन यापन के लिए कहा जाये तो वो कुछ भी नहीं कर सकता| यहाँ के अधिकतर कैदी अपनी सजा समाप्त करने के बाद जल्द ही वापस जेल आते हैं किसी और गुनाह की सजा काटने| ऐसा क्यों होता है वो हम आपको बताते हैं, उत्तर प्रदेश की जेलों में चल रही है जेलरों और उसके प्यादों की सल्तनत| आज आप को पता चलेगा कि इन में एक बार गया एक छोटा अपराधी कैसे जल्द ही अपराध की दुनिया का बड़ा नाम बन जाता है |यही नहीं कैसे इन ऊँची दीवारों के पीछे डॉ. सचान जैसे राह के काँटों को बड़ी सफाई से निकाल फेंका जाता है|

सूबे की कोई भी जेल हो जब वहां अपने गुनाह में सजा पाए अपराधी प्रवेश करते हैं उस समय सभी को पहले एक बड़े कमरे में रखा जाता है| इस कमरे में खूंखार, शातिर अपराध के दोषियों के साथ छोटे मोटे अपराधी भी रखे जाते हैं| यहाँ सबसे पहले इनका सामना होता है पट्टेदार से, इसी पट्टेदार से उसे सोने की जगह मिलती है, और यहीं से आरंभ होता है पैसे का न खत्म होने वाला खेल, ये पट्टेदार उसे सोने की 5 फुट जमीन के लिए पैसे वसूलता है| सोने की जगह का रेट अलग अलग होता है जो जगह की और कैदी की हैसियत देख कर कम ज्यादा होता है|

इस प्रक्रिया को पट्टे लेना कहा जाता है| इन कैदियों से इनकी माली हैसियत देख कर जेल के अन्दर सुविधाओ का मोलभाव होता है| मसलन बीडी, सिगरेट, चाय, दारू. मोबाईल और खाना सब कुछ यहाँ मनमाफिक मिलता है। इनके रेट तय है उनका भुगतान करने के बाद कैदी होता तो जेल में लेकिन मजे सारे उठाता है| पीली वर्दी वाले लम्बरदार तो पैसे मिलने पर जेल के बाहर से भी कुछ भी लाकर दे सकते हैं| यदि लम्बरदार को जेल के हर ताले की चाभी कहा जाये तो ज्यादा सही होगा|

ये तो हुई रेट की बात अब बताते हैं कि वसूली कैसे होती है| जिन अपराधियों का यहाँ अक्सर आना जाना होता है वो अपनी ज़रूरत के हिसाब से पैसे देकर पहले से ही बता देते हैं कि उनको क्या और कब चाहिए| वही दूसरी और जो छोटे मोटे अपराध में इन जेलों में आते हैं उनको पट्टेदार और लम्बरदार मिल कर बता देते हैं कि उनको कितने पैसे कब-कब और कहाँ पर देने है| जेलों में बंद कैदियों को इनके साथ दबंग अपराधियों को भी पैसे देने होते हैं|

नए और छोटे अपराध में जेल आये कैदियों से उनके कामकाज के बारे में जानकारी ली जाती है| इसके बाद उनपर पैसे देने का दबाव डाला जाता है जो घर से माँगा कर पैसे दे देते है उनसे अच्छे से पेश आया जाता है वहीँ जो पैसे नहीं दे पाते उनको दूसरों के कच्छे बनियान और जेल के शौचालय धोने को मजबूर होना पड़ता है कोई प्रतिकार करता है तब उसकी पिटाई कर दिमाग सही किया जाता है| वसूली का सारा पैसा पट्टेदार से होते हुए जेलर तक जाते हैं| जेलर ही जेल कि सल्तनत का सुल्तान होता है उसके सामने ही ये सब होता है और वो देख कर भी कुछ नहीं देखता|

वहीँ जब कोई सफेदपोश दबंग, बाहुबली या प्रभावशाली अपराधी जेल में आता है तब पूरा जेल प्रशासन उसके पीछे कुत्ते की तरह दम हिलाता नज़र आता है| यही जेलकर्मी इनको ये बताते हैं कि कैसे वो कानून का सहारा ले कर फ्रिज कूलर का मजा ले सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे रोचक बात ये है कि इस काम में जेलर से लेकर जेल डॉक्टर तक मददगार होते हैं| ऐसा नहीं कि शासन-प्रशासन में ऊचे पदों पर बैठे अधिकारीयों को ये सब पता नहीं सभी को पता है लेकिन कोई कुछ करता नहीं सभी चुप्पी मारे बैठे हैं| समझ में नहीं आता की आखिर क्यों इनके मुंह सिले हुए हैं|

अब हम आप को जो बताने जा रहे हैं वो उत्तर प्रदेश की जेलों का सबसे काला पहलू है। यहाँ किसी भी जेल में डॉ. सचान जैसा कांड करवाना सबसे आसान काम है। चंद चाँदी के सिक्को की खनखनाहट में पूरा का पूरा स्टाफ बिक जाता है। फिर वो सफाई से अपना काम अंजाम देता है, सबूत मिटाता है और बाहर बैठे अपने आका को सफलता का सन्देश देता है| इसके बाद सीबीआई जाँच करे या फिर जेम्स बांड कोई कुछ नहीं कर सकता|

तो आप ने देखा यहाँ वो सब कुछ होता है जो नहीं होना चाहिए लेकिन कैदियों को प्रेरित करने के लिए कुछ भी नहीं होता| किसी कैदी को कभी रोजगार से जुड़ा प्रशिक्षण नहीं दिया जाता| वर्तमान सपा सरकार के गठन के बाद निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह ''राजा भैया'' जब कारागार मंत्री बने तो उन्होंने कैदियों से जुड़े कई वादे तो किये लेकिन उनको रोजगार आरंभ करने का कोई प्रशिक्षण मिलेगा या मिलता है इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा| फिलहाल हम यही कहेंगे की प्रदेश में पहले कुछ नयी जेलों का निर्माण हो और यहाँ सजा काट रहे कैदियों को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाये की वो जब सजा काट कर बाहर निकलें तो सम्मान से दो वक्त की रोटी जुटा सकें|

लेखक ऋषि शर्मा से संपर्क rishimantra@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

युद्धस्व विगतज्वर: … निश्चिंत होकर युद्ध करो..

Yashwant Singh : काफी दिनों बाद कल वरिष्ठ पत्रकार कुमार संजॉय सिंह के यहां पहुंचा. काफी देर तक बैठा बतियाता रहा. गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित जनसत्ता अपार्टमेंट वाले उनके घर में. यहां घर के दरवाजे और भीतर दीवारों पर कई पठनीय चीजें टंगी मिलीं, यह बैनर भी. इसे देख-पढ़ कर काफी देर तक हैरान परेशान सोचता रहा, ये क्या लिखा है, क्यों लिखा है. खुद से बातें करता रहा. फिर लगा, सही कहा है आदरणीय श्रीकृष्ण जी ने.

ज़िंदगी को संपूर्णता में तो वही जीता है जो भरपूर युद्ध करता है या भरपूर प्रेम करता है या भरपूर त्याग करता है या भरपूर शांति जीता है.. और, जो भी करो पूरी निश्चिंतता, तल्लीनता, संपूर्णता के साथ.. जब तक आप भरपूर युद्ध नहीं कर लेते, तब तक आप भरपूर शांति के सुख को समझ ही नहीं सखते. संभव है, युद्ध करते आप मारे जाएं. कोई फर्क नहीं. इस ब्रह्मांड में खासकर धरती पर स्थित चेतन तन मन वालों के नष्ट होने का कोई समय नहीं है. कहो बम गिरे, गैस लीक हो और लाखों हजारों मारे जाएं. कहो भूकंप आए, सुनामी आए, बाढ़ आए और लाखों मारे जाएं. तो, अगर खुद चुने गए युद्ध में निश्चिंत होकर लड़ते हुए मारे जाते हैं तो यह सुखद और शानदार मौत होगी. जी गए या जीत गए तो फिर भरपूर शांति जीने का गिफ्ट बाउचर लौटानी में मिलेगा. जीवन को वो क्या जानें जिनने पूरी जिंदगी जीने की कोशिश करने में गुजार दी और आज भी डर रहे हैं कि कहीं जीवन जाया न हो जाए… गीता पढ़ते हुए अर्जुन और श्रीकृष्ण संवाद को जितनी बार पढ़िए, उतनी बार नया अर्थ दे जाता है.

बचपन में गांव पर बाबा जब रोजाना नहाकर दोपहर का खाना खाने से पहले एक-एक घंटे गीता और रामायाण का स्वांतसुखाय पाठ किया करते थे तब हम बच्चे अगल-बगल बैठकर उनके बोले पढ़े गए का अर्थ धार्मिक भाव से ज्यादा लेते थे, सीखने-समझने या जीवन दर्शन मानने के रूप में कम. पर अब जब इन्हें पढ़ो तो लगता है कि ये जीवन दर्शन ज्यादा हैं, धार्मिक ग्रंथ कम. वो कहा भी गया है कि न कि जाकी रही भावना जैसी..

खैर… बात यहां कर रहा था वरिष्ठ पत्रकार कुमार संजॉय सिंह का जो इंडिया टुडे, एनडीटीवी आदि जगहों पर रह चुके हैं और फोकस व हमार टीवी के लांचिंग एडिटर इन चीफ रहे हैं. उनके हाथों किसिम किसिम के पराठे खाकर और उनकी ढेर सारी बातें सुनकर कल दिन बन गया.

कुमार संजॉय सिंह
कुमार संजॉय सिंह

काफी दिनों से संजॉय सर मेनस्ट्रीम मीडिया से बाहर अपनी घर-गृहस्थी के दुख-सुख में उलझे-तल्लीन हैं. उनका आह्वान भी मैंने किया कि.. का चुप साधि रहा बलवाना… पर वो आजकल की मीडिया के हालात से काफी दुखी और परेशान दिखे. कहने लगे, अब न पत्रकार हैं और न पत्रकारिता. सब मार्केटिंग वाले हो गए लगते हैं. मीडिया के मालिकान भी अब किसी सरोकार के कारण अखबार या चैनल नहीं ला रहे बल्कि उनके अपने निहित स्वार्थ हैं जिसे वो अपने एडिटर इन चीफ को मोहरा बनाकर पूरा करना चाहते हैं. ऐसे हालात में कुछ अपना ही शुरू करना ज्यादा उचित सही है.

उनके घर से जब लौटा तो मेरे मन-मस्तिष्क में जाने क्यों यही गूंजता रहा… युद्धस्व विगतज्वर: … निश्चिंत होकर युद्ध करो… युद्धस्व विगतज्वर: … निश्चिंत होकर युद्ध करो..

रात जब घर लौटकर सोने को हुआ तो यूं ही मन में कुछ लाइनें कुलबुलाने लगीं… सो, लिख लिया….

हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…
हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…

अक्सर यह जब खयाल आता है…
दिल-दिमाग में शोर बढ़ जाता है…

तब बार-बार खटकने लगता है… मन कहता… कोई गंभीर गड़बड़ जरूर है…
इसी कारण निहित स्वार्थी मनुष्य, और मनुष्य केंद्रित बड़बड़ चहुंओर है…
इससे आगे जब सोचने को जाता हूं तो जाने क्यों आध्यात्मिक हो जाता हूं…
जाने कितना कुछ है ब्रह्मांड में.. जाने कितना कुछ अनदेखा अबूझ है…
जितना सुलझाया है हमने सब कुछ, उतना ज्यादा उलझा यहां सब कुछ…
इतना बड़ा विशाल वृहत्तर महासमुद्र महाआकाश महान सृष्टि में चुपचाप…
घटता बढ़ता मथता हंसता गाता रोता जाता आता जाने कैसे कैसे पदचाप…
कोई ले जाए पकड़ कर आदम जात से दूर… अनजानों के पास बहुत दूर
जहां न हो कोई बात न हो कोई दिन रात ना ही कोई सुख-दुख और साथ…

अक्सर यह जब खयाल आता है…
दिल-दिमाग में शोर बढ़ जाता है…

हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…
हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

Makhanlal University lost all its image, credibility, work culture, standard and growth

: UGC inspection on 9/10 January 2014 and anomalies in Makhanlal University Bhopal : It clearly shows that Makhanlal Chaturvedi Patrakarita University at Bhopal is not running well and at the time of Mr. Kuthiala as VC (2010-14) it has lost all its image, credibility, work culture, standard and growth . The shortage of faculty (1 professor, 2 readers/ associate professor, 4 assistant professors) is  there as not a single department is filled with these positions.

During the UGC visit, Mr. Amitabh Bhatnagar was shown in Management department as Professor ( who was in deputation from an institute not related with academics) and his appointment/ deputation is challenged by me in Jabalpur high Court. I came to know that he was continued till yesterday (on the second day of UGC team's visit) so that they may show him as Professor of management and today he has been sent back to his parent institute.

99% students of this University (including all its study center) belong to Computer and management discipline where as only 1% from Journalism and Mass Communication for which this University was established.

After the new guidelines no University can run its courses in another state where as Makhanlal Chaturvedi University, Bhopal (MP) is running its center at Noida (UP) and Mr. Kuthiala was desperately making efforts to invest Rs. 10 Crore plus money in buying a campus/ infrastructure there but was not successful.

Prior to UGC team's visit i wrote to some of the authorities in UGC, expert members to apprise them situation of the said University. I have opposed many appointments made in the time of Mr. Kuthiala and there are many persons who are not eligible but were selected by him including Director (Production) Mr. Ashish Joshi.

I have also information that one Associate and one Assistant Professor have been wrongly selected (in recent interviews) and they are waiting for  University General Body's  next meeting so that the envelops be opened and may join instantly.

Apart from these appointments, three more Associate Professors are wrongly appointed and it will be challenged at appropriate level/ time. I request UGC authorities to kindly take note before giving any assistance/ recognition/ affiliation/ status.

Dr.  Ashutosh Mishra

706, Dashmesh Enclave

Patiala Road, Zirakpur (Punjab)

Contact No. 09815622226

मकर संक्रांति की यादें, उड़ने से पहले कटी काका की पतंग

मकर संक्रांति मेरे पसंदीदा त्यौहारों में से एक है। इस दिन मैं नहाने की छुट्टी करता हूं और पूरा दिन छत पर बिताता हूं। मैं पूरे परिवार का पहला व्यक्ति होता हूं जो सबसे पहले दिन की शुरुआत करता है। वह दिन ढेर सारे पतंगों और ‘वो काटा, वो मारा’ के शोर में बीतता है। इसके अलावा मैं मकर संक्रांति से जुड़े रहस्यों के बारे में बहुत कम जानता हूं। यह एक संयोग ही है कि मेरे जीवन में मकर संक्रांति से जुड़ी कई घटनाएं हैं जो इस दिन को और मजेदार बनाती हैं। साल 1997 की मकर संक्रांति इस मामले में अपवाद है, क्योंकि उस दिन मां ने मेरी पिटाई की थी। इसके अलावा ज्यादातर संक्रांतियां बहुत अच्छी बीतीं। यहां मैं आपको इस दिन से जुड़ी कुछ खास घटनाएं बताने जा रहा हूं। जरा गौर से सुनिए…

लौटके … घर को आए

मेरे एक काका हैं जिन्हें पतंगबाजी का बेहद शौक है। हर साल रामलीला, रावण दहन और फाग गाने में भी उनकी भूमिका सराहनीय होती है। एक बार काका ने प्रतिज्ञा की कि इस बार वे गांव में सबसे ज्यादा पतंग काटेंगे। इसके लिए उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से रणनीति बनाई। शहर से महंगा धागा मंगवाया गया। रात को पुराने घर की ट्यूबलाइट फोड़ी गई। कई जगहों से बल्ब और बोतलें जमा की गर्इं। कांच की पिसाई में मैं काका का भागीदार बना। उनके हुक्म देने भर की देर थी कि आटा, ग्वारपाठा, धागा, चरखी, कांच और दूसरे सभी सामान तत्काल हाजिर किए गए। तभी एक समस्या आ गई। मौहल्ले में इतनी जगह नहीं थी कि पूरा धागा यहां तैयार कर लिया जाए। ऊपर से बड़े-बुजुर्गों की डांट का भी अंदेशा था। लिहाजा हमने खेत में जाने का फैसला किया। पूरी टीम जयघोष के साथ खेत की ओर रवाना हुई। काका हमारी मंडली के सर्वमान्य मुखिया थे। खेत पहुंचने के बाद आग जलाई गई और मसाला तैयार किया गया। अगले दिन की कल्पना कर हम खासे उत्साहित थे। हम मान चुके थे कि इतने खतरनाक मांझे का सामना करना कोई हंसी-दिल्लगी न होगी। जो भी हमसे टकराने की भूल करेगा, वह खुद मिट्टी में मिल जाएगा।

धागा पूरे खेत में फैलाया गया। एक छोर खेजड़ी के तने से तो दूसरा काफी दूर बबूल की शाखा पर टांगा गया। पूरे खेत में धागे का जाल बिछाया गया। इधर मसाला तैयार था। काका ने मिश्रण से धागे को पोतना शुरू किया। ऊपर से कांच की परत चढ़ाई गई। घंटे भर बाद कड़क मांझा तैयार था। अब तक हमारा जोश सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। अब किसी भी मांझे से डरने की जरूरत नहीं थी। हमारी विजय सुनिश्चित थी। मैंने काका को मांझा चरखी से लपेटने का सुझाव दिया, तो वे बोले- अभी इसमें थोड़ी नमी है। कुछ देर और सूखने दो। आग जल रही है, इसलिए चाय का बर्तन चढ़ाओ। आज मौसम काफी ठंडा है। काका के हुक्म का पालन किया गया और चाय तैयार की गई। सब गर्मागर्म चाय की चुस्कियां ले रहे थे और अगले दिन की रणनीति बना रहे थे। तभी हमें कुछ दूर कुत्तों के भोंकने की आवाज सुनाई दी। मालूम हुआ कि वहां नीलगाय आ गई थीं। खेत के मालिक के वफादार कुत्ते उन्हें वहां से खदेड़ रहे थे। कोई और उपाय न देख नीलगायों ने हमारे खेत की ओर रुख किया और सरपट दौड़ लगाई। नीलगाय आगे और कुत्ते उनके पीछे। इस बीच वह सब हुआ जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। नीलगाय और कुत्तों ने हमारे खेत में प्रवेश किया और जो मांझा सूख रहा था उसे अपने पैरों से लपेट कर ले गए। घटना स्थल पर जब हम पहुंचे तो वहां धागों के टुकड़े पड़े थे। सर्वनाश हो चुका था। कोई और उपाय न देख हम खाल चरखी लेकर घर लौटे। 

उनकी शहादत को सलाम

अगर मानवता का इतिहास कभी ईमानदारी से लिखा गया तो इस घटना पर एक अध्याय लिखा जा सकता है, क्योंकि इसी दिन 15 कुत्ते शहीद हुए थे। उनकी शहादत के लिए एक अंकल जिम्मेदार थे जिन्हें शिकार और घुड़सवारी का शौक था। उनके दादा फौजी थे, इसलिए वे भी फौज में भर्ती होने का सपना देखा करते थे। वे कई बार भर्तियों में गए लेकिन हर बार असफलता ही हाथ लगी। असल में उनका कद बहुत छोटा था। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। एक दिन उन्होंने किसान बनने फैसला किया। उन्हें इस बात का बहुत अफसोस था कि उन्होंने कभी शिकार नहीं किया। मकर संक्रांति से एक दिन पहले उन्हें खबर मिली कि गांव के तालाब का पानी पीकर एक कुत्ता पागल हो गया है, तो वे अपनी बंदूक लेकर उस कुत्ते को खोजने लगे। आखिरकार वह उन्हें दिखाई दिया और अंकल के अचूक निशाने का शिकार बन गया। उस रात उनके मन में खयाल आया कि तालाब का पानी पीकर गांव के दूसरे कुत्ते भी पागल हो सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। दूसरे दिन वे अपनी बंदूक लेकर निकले और जहां कहीं कोई कुत्ता मिला उसे गोली मार दी। शाम तक वे इसी मिशन में लगे रहे। रात को चौपाल पर उन्होंने गिनती कर बताया कि अब तक 15 कुत्तों को उड़ा दिया गया है। उन्हें इस बात का दुख था लेकिन वे गांव की सुरक्षा को भी जरूरी मानते थे। अब वे गर्व से खुद का परिचय शिकारी के तौर पर दे सकते थे।

तब पतंगों का मौसम जा चुका था

यह घटना साल 2009 की मकर संक्रांति की है। उस रात जब मैं लाइब्रेरी में भारत का नक्शा देख रहा था, तो किसी ने दरवाजा खटखटाया। वे हमारे गांव के एक गणमान्य व्यक्ति थे। उन्होंने मुझे उसी वक्त अपने घर चलने को कहा, क्योंकि वे संक्रांति के अवसर पर पूरे गांव में मिठाई बांटना चाहते थे। मिठाई का सामान, हलवाई और सब इंतजाम हो चुके थे। बस उन लोगों की कसर बाकी थी जो काम में हाथ बंटा सकें। उन्होंने मेरे अलावा कुछ और दोस्तों को भी साथ चलने के लिए मना लिया। घर पहुंचते ही उत्साह के साथ तैयारियां शुरू की गर्इं। वह रात बहुत ठंडी थी। वहीं गांव से बिजली भी गायब थी।
 
हलवाई अंकल पतंगबाजी के बड़े शौकीन थे। उन्होंने एक से बढ़कर मांझे और पतंग का जखीरा जमा कर रखा था। कुछ देर बाद उन्होंने मुझे घी का पैकेट और एक ब्लेड लाने के लिए कहा। दोनों चीजें मैंने उन्हें लाकर दे दीं। बिजली का नामोनिशान नहीं था, तो उन्होंने लालटेन की धुंधली रोशनी में पैकेट को ब्लेड से काटना शुरू किया। ब्लेड की धार तेज थी। ऊपर से घना अंधेरा। कड़क सर्दी में उन्हें कुछ मालूम न हुआ और उन्होंने पैकेट के साथ ही अपनी हथेली भी काट दी। बाद में दर्द का एहसास होने पर उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी हुई। लिहाजा कड़ाह-भट्ठी छोड़कर वे वैद्यजी के पास भागे और पूरे हाथ में पट्टी बंधाकर लौटे। बाद में उन्होंने काम करने से असमर्थता जताई और घर लौट गए। उस रात कोई मिठाई नहीं बनी। ठीक होने में उन्हें पूरा एक हफ्ता लगा। तब तक पतंगों का मौसम जा चुका था। 

लेखक को उनके ब्लॉग ganvkagurukul.blogspot.com पर भी पढ़ा जा सकता है।

खोजी पत्रकारिता के लिए द संडे इंडियन के अनिल पांडेय पुरस्कृत

द संडे इंडियन हिंदी के कार्यकारी संपादक अनिल पांडेय को उनकी खोजी रिपोर्टस् के लिए पुरस्कृत किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें सेन्टर फॉर सिविल सोसायटी की ओर से 8 जनवरी, 2014 की शाम दिल्ली के ललित होटल में दिया गया। इस दौरान कुल तीन पत्रकारों को पुरस्कृत किया गया और पुरस्कार के तहत बीस-बीस हजार रूपये नकद और शील्ड प्रदान की गई। अनिल पांडेय के अलावा यह पुरस्कार तहलका के अतुल चौरसिया और दिल्ली प्रेस के जगदीश पंवार को भी दिया गया।

                                                पुरस्कार प्राप्त करते अनिल पांडेय

अनिल पांडेय को यह पुरस्कार उनकी दो खोजी रिपोर्टस् के लिए दिया गया है, जो कि खोये हुए बच्चों और बालू के अवैध खनन से जुड़ी हुई हैं। पिछले साल प्रसिद्ध मीडिया संस्थान एक्सचेंज फॉर मीडिया ने भी हिंदी पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनिल पांडेय को सम्मानित किया था। जनसत्ता और स्टार न्यूज में काम कर चुके अनिल पांडेय अपनी खोजी रिपोर्टस् के लिए जाने जाते हैँ। उनकी कई रिपोर्टस् पर डाकूमेंट्री भी बनाई जा चुकी है। अनिल की स्टोरी, हरियाणा में बीटी काटन की खेती से मनुष्य और जानवारों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव पर ग्रीन पीस द्वारा बनाई गई डाकूमेंट्री काफी चर्चित हुई थी। दिल्ली के खेलगांव में सुविधाओं के अभाव में मरने वाले मजदूरों की अनिल की रिपोर्ट पर येल विश्वविद्यालय ने एक शोध प्रोजेक्ट तैयार किया था। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे अनिल पांडेय को सीएसडीएस की मीडिया फेलोशिप भी मिल चुकी है।

सेन्टर फॉर सिविल सोसायटी अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध एडवोकेसी ग्रुप एटलस नेटवर्क का हिस्सा है जो भारत में जीविका और शिक्षा से जुड़े मुद्दे के लिए एडवोकेसी का काम करती है। अमेरिका का एटलस इकोनॉमिक रिसर्च फाऊंडेशन 80 देशों के 400 से अधिक मुक्त बाजार संगठनों के वैश्विक नेटवर्क को बढ़ावा देने व विचारों और संसाधनों की आवश्यकता के आधार पर जोड़ने का कार्य कर रहा है।
 

चिटफंड कम्पनियों पर सेबी की नकेल, नकद निवेश पर रोक

प्रतिभूति बाज़ार की नियामक संस्था, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड(सेबी) के प्रयास चिटफंड कम्पनियों की फर्जी योजनाओं से राहत नहीं दिला पा रहे हैं। सेबी हालांकि लगातार प्रयास कर रही है कि जनता की मेहनत की कमाई को फर्जी योजनाओं के सब्जबाग दिखा कर लूटने वाली कम्पनियों पर लगाम कस सके। ऐसा होना अभी भी मुमकिन नहीं दिख रहा है क्योंकि सरकारी नुमायंदों, सेलिब्रटीज और नेताओं का गठबंधन बार-बार आड़े आ जाता है। यहाँ तक कि खिलाड़ी और अभिनेता भी इसमें लिप्त पाये जाते है।

बहरहाल, एक बार फिर सेबी ने तथाकथित रियल स्टेट कही जाने वाली चिटफंड या सामूहिक निवेश वाली कम्पनियों पर लगाम कसते हुए उनके नकद निवेश पर रोक लगा दी है। अब केवल चेक, बैंक-ड्राफ्ट जैसे बैंकिंग चैनलों के जरिये ही इन योजनाओं में निवेश किया जा सकेगा। सेबी के इस कदम का फायदा आम निवेशकों तो मिलेगा ही, साथ ही इससे फर्जी स्कीमों के जरिये मनीलांड्रिंग की गतिविधियों पर भी रोक लगेगी। नियामक की ओर से जारी नए नियम गुरुवार से ही लागू हो गए हैं।

सेबी के नए नियम निवेशकों को सारधा जैसे घोटालों का शिकार होने से बचाएंगे। इनसे सीआइएस के जरिये फंड जुटाने की गतिविधियों में पारदर्शिता आएगी। इसके साथ ही धन के स्त्रोत और ऐसी स्कीमों में पैसा लगाने वाले असल निवेशकों की भी आसानी से पहचान की जा सकेगी। हाल के वर्षो में बड़ी तादाद में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें भोले-भाले निवेशकों को गैरकानूनी सामूहिक निवेश योजनाओं के जरिये ठगा गया है। कई मामलों में तो ऐसी स्कीमों के संचालक नियामकों और कानून लागू कराने वाली एजेंसियों द्वारा पकड़े जाने पर निवेशकों को रकम लौटा देने का दावा कर बच निकलने की कोशिश करते हैं।

लेखक से vishwakarmaharimohan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.

सैफई महोत्सव पर सलमान-माधुरी की बेढ़ंगी सफाई

सैफई महोत्सव में हुई आलोचना के बाद सलमान-माधुरी नें सफाई दी है के, हम तो चैरिटी के लिए नाचते है। उन्होनें चैरिटी के लिए २५ लाख रु भी दिए। पर, हे सलमान! जिस सैफई के रहनुमा खुद मुलायम हैं उसे आप चैरिटी करें, ये कुछ हजम नहीं होता। फिर माधुरी सब्सिडी के नाम पर डेढ़ इश्कियां के लिए पूरे डेढ़ करोड़ रुपए ले उड़ीं, ये कैसी चैरिटी? क्या उत्तर प्रदेश में डेढ़ इश्कियां, बुलेट राजा के पहले या बाद में कोई फ़िल्म रिलीज नहीं हुई.

भाई लोग अगर चैरिटी ही करनी है तो उसके लिए सैफई आकर नाच-गाना करने की क्या जरुरत है। मुम्बई में तमाम स्लम इलाकों में, महाराष्ट्र के पिछड़े क्षेत्रों में भी तो चैरिटी की जा सकती थी। उन लोगों के परिजनों को भी चैरिटी दी जा सकती थी जिन्हें आपने गाडी कुचल डाला। आप उन जंगलों के प्राणियों के लिए भी चैरिटी कर सकते थे जहां आप शिकार कर रहे थे.

वैसे तो आप लोगों को सफाई देने की क्या जरुरत थी, आपका तो काम ही पैसे लेकर नाच-नौटंकी करने का है चाहे वो मुलायम कराएं, चाहे काला कौआ सो आपने किया। शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए जो सपने देख रहे है भारत का प्रधानमंत्री बनने के और काम कर रहे इतने बचकाने। एक भाई मीडिया वालों को जेल भेजने की धमकी देता है। मुख्यमन्त्री बेटा निरंकुश तानाशाह की तरह बलात्कारी मंत्री का बचाव करता है, उस पर  केस वापस लेने की पहल करता है। काका-ताऊ घर में अपहरित और बलात्कृत लड़की रखने वाले विधायक को क्लीनचिट देता है। हे भगवान! ये अपने आपको आपका वंशज कहलाने वालों का ही शासन है या आपने ही उन्हें शिशुपाल और जरासंध बनने का लाइसेंस दे डाला है.

इतिहास गवाह है कि सत्ता को अपनी बपौती मानने वालों का हश्र कैसा हुआ है। फिर भी सपाई उसी रास्ते पर चल रहे है। आप ही आओ गिरधारी, गारंटी नहीं है कि आप से भी समझेंगे लेकिन प्रयास तो आप भी कर ही लीजिये।

लेखक से vishwakarmaharimohan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है।
 

राम बचन को रुपया नहीं पर खंडूड़ी का इलाज खर्च आठ लाख से ज्यादा

सभी की तरह मैं भी माननीय भुवन चन्द्र खंडूड़ी जी को सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री मानता हूँ। उनकी कड़क मिज़ाजी के सभी कायल है। मुझे याद है कि मेरे पड़ोस के गाँव में बचन सिंह नामक एक व्यक्ति गम्भीर रूप से बीमार था।  उसकी घर की माली हालत बेहद खराब थी। भाजपा के स्थानीय नेताओं सहित कई समाज सेवियों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री खंडूड़ी जी से उसके इलाज के लिए सी मुख्यमंत्री राहत कोष से इलाज के लिए कुछ मदद की अपील की। खंडूड़ी जी ने नियम बना लिया था कि वे डीएम की सिफारिश पर ही किसी को मेडिकल ऐड देंगे। तो लोगों ने पहले डीएम से अपील करने का निर्णय लिया। जिस प्रदेश में पटवारी तक से काम कराना "आम आदमी" के लिए टेड़ी खीर हो वहाँ डीएम से काम कराना कितना कठिन होगा आप सोच सकते हैं?

बचन सिंह के आवेदन ने जब तक डीएम से होते हुए सीएम तक का सफ़र तय का लम्बा सफर तय किया, तब तक यमराज ने इन्तजार नहीं किया और वे बचन सिंह के प्राण ले गए। खंडूड़ी जी का एक मामूली रकम का राहत चैक बचन सिंह के घर तब पहुंचा जब उनकी तेहरवीं की रस्म भी पूरी हो चुकी थी। लिहाजा घरवालों ने वो चैक वापस कर दिया।

मैंने सूचना के अधिकार के तहत एक जानकारी माँगी कि ईमानदार मुख्यमंत्री खंडूड़ी जी के स्वास्थ्य पर उनके दो साल के कार्यकाल में जनता का कितना पैसा खर्च हुआ। जो जानकारी मिली उसको देखकर मुझे उस बचन सिंह पर तरस आया जो ईमानदार मुख्यमंत्री के राहत के इन्तजार करते -करते इस दुनिया से कूच कर गया . क्योंकि खंडूड़ी जी के स्वास्थ्य पर 2009 -10 में   356077. 00 रू. तथा  2011-12 में मात्र 505500.00 रू. खर्च आया!  मैंनें सुना है, संविधान में सभी नागरिकों के मूल अधिकार एक समान हैं।

                                                सूचना के अधिकार द्वारा प्राप्त आंकड़े

उत्तराखंड की आधा से ज्यादा महिलायें व बच्चियां खून की कमी से ग्रसित है। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी से यह भी पता चला है कि आज तक महिलाओं के स्वास्थ्य परिक्षण का सरकार ने कोई अभियान नहीं चलाया जबकि केंद्र सरकार से आये ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बजट में  खंडूड़ी जी के राज में करोड़ों रुपये का घपला सामने आया है। खैर, घपला घोटाला उत्तराखंड राज्य के लिए कोई नई बात नहीं है इसमें खण्डूड़ी जैसे आदमी भी "बेचारे" बन जाते हैं.

विजेंद्र रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं उनसे संपर्क vijendrarawat49@gmail.com पर किया जा सकता है।
 

आरएसए के खिलाफ खबरें इसलिए कि मिल सके मनमाफिक मकान

लखनऊ। सीएम ने कई मीडिया संस्‍थानों और पत्रकारों की पोल तो अपने पीसी में खोल के रख दी है. इसके बाद से कई पत्रकार सहमे हुए हैं. ऐसा ही हाल कुछ महीने पहले लांच हुए एक अखबार के पत्रकार का भी है. वे भी सीएम के तेवर देखने के बाद तनिक सहमे हुए हैं. वैसे भी लखनऊ में पत्रकारों में लालबत्‍ती पाने की गलाकाट स्‍पर्धा रही है. एक दूसरे को निपटाने में भी ये लोग पीछे नहीं रहते हैं. सरकार से लाभ भी लेते हैं और आंखें भी तरेरते हैं, तभी तो सीएम की घुड़की के बावजूद किसी के चोंच नहीं खुले.

पचास रुपए में पांच महीने अखबार पढ़वाने वाले अखबार के एक मनीषी पत्रकार को सरकार ने आवास दे दिया है, लेकिन यह मनीषी पत्रकार इतने से संतुष्‍ट नहीं है. अब यह पत्रकार मनमाफिक आवास पाने के लिए पहले पन्‍ने पर आरएसए से जुड़ी खबरें छापकर दबाव बनाने का कोशिश कर रहा है. इसके पहले कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों का चिंटू बनकर आएसए के यहां एडि़या भी घिस चुका है. पर वीवीआईपी कालोनी में मकान पाने में सफलता नहीं मिली. हां, अब मीडिया के खिलाफ सीएम के तेवर देखने के बाद यह पत्रकार भी अब थोड़ी चिंतित दिखने लगा है. वैसे पता नहीं किस समझदार ने इस पत्रकार महोदय को सलाह दे दी थी कि राज्‍य सम्‍पत्ति विभाग के खिलाफ खबरें लिखो तो तुम्‍हें किसी वीवीआईपी कालोनी में मकान मिल जाएगा. तब से यह मनीषी पत्रकार इसी एक सूत्रीय कार्यक्रम में जुटा हुआ था.

फ्री की आदतें जाती नहीं इसलिए फ्री में मिली किसी की टिप्‍स के बाद यह पत्रकार अब वीवीआईपी कालोनी में मकान लेने को उत्‍सुक है. इनके कुछ आराध्य पत्रकार शहर की वीवीआईपी कालोनियों में रहते हैं, इसलिए इनकी भी कोशिश है कि उन्‍हें भी किसी ऐसी जगह मकान मिले, जिससे अपनी लेखनी से न सही लेकिन वीवीआईपी कालोनी में रहकर अपना रूतबा बता औन बना सके. मकान मान्यता मिलने के बाद भी वे अभी संतुष्ट नहीं है. स्वास्थ्य महकमे की लोकल रिपोर्टिंग के जरिए इस पत्रकार ने स्थानीय अस्पतालों में भले अपनी पहचान बना ली हो लेकिन नए बैनर में आने के बाद इस पत्रकार के सामने पहचान का संकट खड़ा हो चुका है.  

पहचान की इस संकट से निकलने के लिए ही यह अक्‍सर इलेक्टानिक और प्रिंट मीडिया के कुछ वरिष्‍ठों के पीछे जबरन पिछलग्गू बनकर घूमा करते हैं. पीछे घूमने का लाभ भी मान्‍यता और मकान के रूप में मिला, लेकिन संतुष्टि अब तक नहीं मिली. वैसे भी राज्य संपत्ति की अपनी मजबूरी है कि वे मंत्रियों विधायकों और दर्जा पाए राज्यमंत्रियों का मकान और गाड़ी बांटे या फिर मनीषी पत्रकार को ढूंढकर बढिय़ा मकान दे. बात मकान मिलने तक सीमित होती तो बेहतर होता उसके बाद उसमें सरकारी खर्चे पर मरम्‍मत और बेहतर से बेहतर रंगरोगन के लिए भी इस मनीषी पत्रकार को संघर्ष करना है इसलिए वह अपने कुछेक ऐसे लोगों का चिंटू बना हुआ है जिनकी पहुंच पंचम तल तक बताई जाती है. पर मीडिया के खिलाफ सीएम के तेवर देखने के बाद इनके तेवर भी बदले नजर आने लगे हैं. (कानाफूसी)

समस्या जो आम आदमी पार्टी में जाकर भी खत्म नहीं कर पाएंगे आईबीएन के आशुतोष

टीवी पत्रकार आशुतोष का इस्तीफा और आम आदमी पार्टी में ज्वाइन करने की खबरें देश में चर्चा का विषय बन गया। ट्व‍िटर पर उनके पक्ष और विरोध में तमाम ट्वीट्स गिरने लगे। राजनेता चुप रहे। 'आप' की ओर से कोई रिएक्शन नहीं आया। तमाम लोगों की आशाएं बंध गईं कि आम आदमी पार्टी ज्वाइन करने के बाद आशुतोष कुछ न कुछ बड़ा करके जरूर दिखायेंगे।

लेकिन सच पूछिए तो आशुतोष देश में चाहे जितने बड़े परिवर्तन ले आयें, लेकिन उस गंदगी को नहीं साफ कर पायेंगे जिसे उन्होंने सबसे करीब से देखा है। और वो है मीडिया की गंदगी। यह देश की ऐसी बड़ी समस्या है, जो आशुतोष आम आदमी क्या खास आदमी पार्टी ज्वाइन करके भी हल नहीं कर पायेंगे। चलिये शुरू करते हैं देश में उन जाने माने पत्रकारों से, जो मी‍डिया की लाइन छोड़कर राजनी‍ति में आये-

एमजे अकबर- जिन्होंने 1989 में बिहार के किशनगंज से चुनाव लड़ा और सांसद बने। बाद में 1991 में लोकसभा चुनाव हार गये, लेकिन राजीव गांधी के सलाहकार व प्रवक्ता बने।
अहम बात: यह कि वो देश के सबसे शक्त‍िशाली यानी प्रधानमंत्री के सबसे करीब रहे।

राजीव शुक्ल- एक पत्रकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और फिर वर्ष 2000 से लेकर यानी पिछले 14 सालों से वो सांसद हैं।
अहम बात: पिछले 10 सालों से इनकी सरकार केंद्र में कई बड़े फैसले ले रही है।

अरुण शौरी- एक पत्रकार जो भारतीय जनता पार्टी की सरकार में सांसद रहे।
अहम बात: आपके कार्यकाल में संचार एवं सूचना तकनीक मंत्रालय इन्हीं के पास रहा।

मनीष सिसोधिया- आम आदमी के बीच से निकला एक पत्रकार जो अब दिल्ली विधानसभा में काबिज हैं।
अहम बात: दुनिया की समस्याएं लेकर तमाम मंचों पर गये, लेकिन जिस समस्या की हम बात करने जा रहे हैं, उस पर नजर तक नहीं डाली।

चंदन मित्रा- एक पत्रकार से राज्य सभा के सांसद तक का सफर तय किया।
अहम बात: वर्तमान में एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।

क्या है वो समस्या जिससे मुंह मोड़ते आये हैं ऐसे सभी पत्रकार

वो समस्या है देश भर में खुले आम हो रहा युवा पत्रकारों का शोषण। दुनिया की प्रतिष्ठ‍ि‍त फोर्ब्स पत्रिका के एक सर्वेक्षण के अनुसार एक रिपोर्टर की नौकरी से अच्छा काम वेटर का होता है। फोर्ब्स की रिपोर्ट तो पूरी दुनिया में हुए सर्वे पर आधारित है। वास्तव में देखा जाये तो भारत में ता स्थिति और भी ज्यादा खराब है। यहां तमाम अखबार ऐसे हैं, जहां के रिपोर्टर वेटर तो दूर, उनका वेतन मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी से भी कम है। यह वो समस्या है, जिससे तमाम पत्रकार जो राजनीति में आये, सांसद बने, महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे लेकिन हल करने की कोशिश कभी नहीं की। और इस समस्या से भारत के मीडिया को उबरना बेहद जरूरी है।

हर साल 63000 नये पत्रकार

90 के दशक में देश भर में जब कुकुरमुत्ते की तरह इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खुलने शुरू हुए थे, तब भारतीय मीडिया ने क्वालिटी पर सवाल उठाया था अब जब यही हाल मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म संस्थानों का है, तो मीडिया में एक भी खबर ऐसी नहीं दिखाई देती है, जिसमें किसी जर्नलिज्म कॉलेज की क्वालिटी की चर्चा की गई हो या फिर किसी मास कॉम संस्थान पर उंगली उठाई गई हो।

अगर श‍िक्षा डॉट कॉम की मानें तो देश भर में 450 से ज्यादा पत्रकारिता के संस्थान हैं। इनमें विश्वविद्यालयों में चलने वाले पत्रकारिता विभाग भी शामिल हैं। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो जर्नलिज्म, टीवी जर्नलिज्म, एडवर्टीजमेंट, क्रिएटिव राइटिंग, पीजी ड‍िप्लोमा, अंडर ग्रेजुएट डिग्री, पोस्टग्रेजुएट कोर्स आदि में से औसतन 4 कोर्स एक संस्थान में चलते हैं। प्रत्येक कोर्स में औसतन 35 सीटें होती हैं। यानी कुल मिलाकर सभी पाठयक्रमों से देश भर में 63 हजार से ज्यादा छात्र पत्रकार बनकर निकलते हैं।

अगर फीस की बात करें तो सरकारी संस्थानों में 20 से 30 हजार रुपए प्रति सेमेस्टर और निजी संस्थानों में 50 हजार से 1 लाख रुपए प्रति सेमेस्टर फीस होती है, जिसे देने में तमाम माता-पिता शायद कर्जे में डूब जाते होंगे। लेकिन इन बच्चों के करियर की शुरुआत इतनी खराब होती है, शायद उतनी किसी भी क्षेत्र में नहीं होती होगी। सैलरी की शुरुआत 1 हजार से ढाई हजार तक होती है। अगर दिल्ली, नोएडा जैसे शहर में हैं, तो 4 से 5 हजार से शुरुआत हो सकती है। ऐसा सिर्फ छोटे अखबारों में नहीं बल्कि कई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस इसी स्ट्रक्चर पर रिपोर्टर रखते हैं। यही नहीं चाहे वो नरेंद्र मोदी का गुजरात हो या अखिलेश यादव का उत्तर प्रदेश या फिर पृथ्वीराज चव्हाण का महाराष्ट्र हर जगह ऐसे तमाम चैनल व अन्य मीडिया हाउस हैं, जहां पर चार-चार महीने तक वेतन नहीं मिलता।

सालों साल हो जाता है अखबारों व इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में सैलरी बढ़ती नहीं, और नौकरी से कब निकाल दिया जाये, किसी को पता नहीं होता है। तमाम मीडिया हाउस में तो पत्रकार सुबह ड्यूटी पर निकलते हैं, तो उन्हें यह भी विश्वास नहीं होता है, कि शाम तक उनकी नौकरी रहेगी या नहीं। अगर श्रम कानून की धज्जियां किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा उड़ाई जाती हैं, तो वो मीडिया है। एक दर्जन से भी कम मीड‍िया हाउस हैं, जो वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करते हैं। जबकि देश में चैनलों को अलग कर दिया जाये तो सिर्फ प्रिंट में ही 94,067 समाचार पत्र, पत्रिकाएं शामिल हैं। रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज पेपर्स इन इंडिया से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रिंट मीडिया 8.43 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। जबकि भारत की जीडीपी 4.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। बीते 2013 में 21,897 नई एप्लीकेशन आयीं।

क्यों पकड़ते हैं गलत राह

पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत हजारों लोग कम सैलरी और दिन भर खुद को आग की भठ्ठी में झोंकने के बाद भी खुश रहते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण समाज के लिये कुछ करने की इच्छा होती है, जो उसके मनोबल को टूटने नहीं देती। लोगों के बीच सम्मान होता है, जो उसके मनोबल को हमेशा ऊंचा रखता है और दिल में औरों से कम सैलरी का दर्द होता है, जो वो किसी से नहीं बांटते हैं। इस दर्द को तमाम मीडिया हाउस न तो समझते हैं और न ही समझना चाहते हैं। यही कारण है कि तमाम पत्रकार, जिनके परिवार का पेट वेतन से नहीं भर पाता है, तो वो गलत राह पकड़ लेते हैं, और देखते ही देखते दलाली के दलदल में ऐसे फंसते हैं, कि जीवन भर नहीं निकल पाते हैं।

देश की जीडीपी की दुगनी रफ्तार से बढ़ रहे मीडिया में किस कदर मानव संसाधन का दोहन हो रहा है, इसका अंदाजा आपको लग गया होगा। लेकिन अफसोस इस बात का है कि देश में प्रहरी के रूप में काम करने वाला यह क्षेत्र अपने ही घर की बदहाली के खिलाफ आवाज नहीं उठा पा रहा है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जनता के हक की बात करती है। इसी जनता के बीच खड़े पत्रकारों को उनका हक दिलाने की बात कभी नहीं करती।

हैं तो तमाम एसोसिएशन लेकिन सशक्त कोई नहीं

पत्रकारों के संगठनों की बात करें तो देश भर में 500 से ज्यादा जर्नलिस्ट एसोसिएशन हैं। अगर राष्ट्रीय स्तर की बात करें तो श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया प्रेस एसोसिएशन, ऑल इंडिया मीडिया एसोसिएशन, ऑल इंडिया वर्किंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन समेत तमाम संगठन हैं, लेकिन कोई भी मीडिया जगत में इस अव्यवस्था के खिलाफ आवाज़ को बुलंद नहीं कर पाया।

पत्रकारों का हक कभी नहीं दिला पायेंगे राजनीतिक दल

इसे खराब चलन कहें या अच्छा, लेकिन भारत पर यह बात बिलकुल फिट बैठती है, "जो दिखता है वही बिकता है"। इसका जीता जागता उदाहरण आम आदमी पार्टी है। कहीं न कहीं पार्टी को दिल्ली की सल्तनत दिलाने में मीडिया की अहम भूमिका रही है। जाहिर सी बात है, जिस मीडिया ने सत्ता तक पहुंचाया है, उस मीडिया के ख‍िलाफ आम आदमी पार्टी क्यों आवाज उठायेगी। यही बात भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, बसपा, सपा, सभी पर लागू होती है। सभी जानते हैं कि उन्होंने पत्रकारों को हक दिलाने की बात की नहीं, कि मीडिया हाउस चिढ़ जायेंगे और उन्हें कवरेज मिलना बंद हो जायेगा।

यानी सुई जहां से चली थी वहीं आकर ठहर गई और इस जहां ठहरी है, वहां वरिष्ठ पत्रकार व एक चैनल के पूर्व मैनेजिंग एडिटर आशुतोष खड़े हैं। इनसे पहले न जाने कितने पत्रकार देश का कानून बनाने वाली संसद तक पहुंचे, लेकिन किसी ने अपने पुराने साथियों की बदहाली की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा। इस बदहाली को आशुतोष ने भी बेहद करीब से देखा है। लिहाजा मैं उनसे सिर्फ एक सवाल पूछना चाहूंगा- अगर वो वाकई में देश की गंदगी साफ करना चाहते थे, तो शुरुआत अपने घर (मीडिया) से ही क्यों नहीं करते, उसके लिये राजनीति में आने की क्या जरूरत आन पड़ी? चूंकि अब आशुतोष एक राजनीतिक दल ज्वाइन करने जा रहे हैं, लिहाजा आम क्या खास आदमी पार्टी में जाकर भी वो उसे खत्म नहीं कर पायेंगे।

लेखक अजय मोहन प्रतिभाशाली पत्रकार हैं और 'वनइंडिया हिंदी' के संपादक हैं. अजय से संपर्क ajymohan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अनुसूचित जाति आयोग जैसा न हो लोकपाल का हाल

संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद आखिरकार देश को पांच दशक बाद भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बहुप्रतीक्षित लोकपाल मिल गया। आज का सवर्णपरस्त समाज अन्ना को दूसरे महात्मा की उपाधि दे दी है। प्रश्न ये है कि यह किसका लोकपाल है? सरकार का या फिर  अन्ना का? पता नहीं! फिर भी चालीस साल से इसकी मांग हो रही थी क्यों? अन्ना को अनशन क्यों करने पड़े? सांसदों को आधी-आधी रात तक माथापच्ची क्यों करनी पड़ी? अब जब यह बन गया है, अन्ना कह रहे हैं कि यह लोकपाल जिसका भी है, अच्छा है। कम से कम चालीस-पचास फीसदी भ्रष्टाचार तो इससे कम हो ही जाएगा। बताते हैं कि राहुल गांधी ने इस मामले में अगुवाई की। अब अन्ना कम से कम लोकपाल को लेकर तो अनशन नहीं करेंगे। बाकी देखा जाएगा। अन्ना अब राहुल गांधी की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।

    
वैसे
लोकपाल का जो भी स्वरूप सामने आया है उससे पता चल रहा है, कि यह तो कोई जेल भेजने वाला कानून भर है। मगर इसमें गलत शिकायत पाये जाने पर सजा और जुर्माने का जो प्राविधान किया गया है, उसे लेकर आम आदमी की चिंता वाजिब लगती है। अगर लोकपाल जेल भेजने के लिए ही बनना था, तो उसके लिए तो पहले ही बहुत से कानून थे। बेचारे लालू तो बिना लोकपाल के ही कई बार जेल हो आये हैं। राजा, कनिमोझी, कलमाड़ी भी बिना लोकपाल के जेल हो आये हैं। अरविंद केजरीवाल ने साफ हाथ झाड़ लिये हैं कि जी, हमारा वाला तो है नहीं और अन्ना जी वाला तो बिल्कुल भी नहीं है। वह तो जनलोकपाल था। पर यह तो जोकपाल है। इससे नेता तो क्या चूहा भी जेल नहीं जा पायेगा। यह जानकर चूहे मस्त हैं। अब वे सरकारी गोदामों का अनाज एकदम तनावमुक्त होकर चट कर सकते हैं। लेकिन अन्ना कह रहे हैं कि चूहा तो क्या, इससे तो शेर भी जेल जायेगा। इससे शेर बेचारे और डर गये हैं। शिकारियों-तस्करों के चलते जिंदगी तो उनकी पहले ही खतरे में थी, पर अब तो देर-सबेर जेल भी जाना पड़ेगा। नेताओं ने समझा था कि लोकपाल उनके खिलाफ है, लेकिन उन्हें लोकपाल मिल गया। इस चक्कर में राजनीति थोड़ी-बहुत उनके हाथ से खिसक गई हो। यानी जो जिसको नहीं चाहिए था, वही उन सबको मिला।
    
लोकपाल पर अन्ना और केजरीवाल के बयानों और सोच में जमीन-आसमान का अन्तर है। इस अन्तर की समीक्षा में जब हम अन्य संवैधानिक संस्थाओं के गठन के पूर्व के संघर्षों, घोषणाओं, नियमों और उसके अमल करने के तरीके पर आते हैं तो केजरीवाल की बातों में कुछ दम नजर आने लगता है । उल्लेखनीय है कि समाज के सबसे पीडि़त तबके अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के कल्याण के लिए संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत गठित एक सदस्यीय आयोग सन् 1951 से कार्य कर रहा था जिसे अनुसूचित जातियों एवं जन जातियों के आयुक्त के नाम से जाना जाता था। उसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता था। उसके स्तर को ऊंचा उठाने तथा विस्तृत अधिकार देने के लिए जनता पार्टी के शासनकाल में सन् 1978 में कार्यकारी आदेश के तहत श्री भोला पासवान शास्त्री की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय आयोग बनाया गया। उसे संवैधानिक दर्जा देने एवं शक्तिशाली बनाने के लिए सत्तारूढ़ दल के साथ विपक्षी दलों एवं दलितों के उदीयमान नेता राम विलास पासवान ने लगातार ऐड़ी-चोटी का जोर लगाए रखा। बहुसदस्यीय आयोग को 65वें संविधान संशोधन द्वारा सन् 1992 में संवैधानिक दर्जा मिला और आयुक्त का पद समाप्त कर दिया गया।
    
तत्कालीन केन्द्र की सरकार ने संविधान के विरूद्ध चुपके से नियमावली बनाते समय आयोग के कार्यकाल को 5 वर्ष से घटाकर 3 वर्ष और उसमें राजनीतिक व्यक्ति को भी आयोग में पदस्थापित करने का प्राविधान कर दिया। जबकि संविधान के अनुच्छेद 338 का अवलोकन करने पर पता चलता है कि इसमें कहीं भी राजनीतिक नियुक्ति का प्राविधान नहीं है। जब कुछ लोगों और संगठनों द्वारा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के दलीय राजनीति में भाग लेने का मामला उठाया गया तो सरकार ने मंत्रिमंडल से राजनीतिक नियुक्ति के समर्थन में नियमावली बनवा ली। यह आयोग व्यवहार में अपनी प्रभावशीलता, निष्पक्षता, पारदर्शिता और उपयोगिता को खो चुका है। राम विलास पासवान, उदित राज और दलितों के बड़े प्रतिनिधियों ने सरकार से मिली भगत कर ली और इसके विरूद्ध कोई आवाज नहीं उठायी।

आज सैद्धान्तिक तौर पर अनुसूचित जातियों और जन जातियों के लिए बनाए गए शक्तिशाली आयोग व्यवहार में किसि भी सत्तारूढ़ दल का अनुसूचित जाति/जनजाति प्रकोष्ठ(सेल) के रूप में बंधुआ मजदूर आयोग बन कर रह गया है। नियमतः आयोग को स्वायत्त, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया गया है। इसे सिविल कोर्ट के अधिकार दिये गये हैं। इसे प्रतिवर्ष अपनी वार्षिक रिपोर्ट तथा बीच में भी आवश्यकतानुसार रिपोर्ट देने का अधिकार है। राष्ट्रपति को ऐसे सभी प्रतिवेदनों को संसद और संबंधित विधान सभाओं में एक्शन टेकेन रिपोर्ट के साथ रखवाने और चर्चा करने का संवैधानिक अधिकार है। पर यह वार्षिक रिपोर्ट भी चार-पांच साल के अन्तराल पर ही दी जाती है और उसे भी सरकार चार-पांच साल तक अपने पास रखे रहती है। आज पी. एल. पूनिया, बाराबंकी से कांग्रेस सांसद, को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर सरकार द्वारा संवैधानिक प्राविधानों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पूनिया राष्ट्रीय आयोग का कांग्रेस पार्टी के सेल के रूप में बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं।
        
आज तक किसी भी राजनीतिक पार्टी और दलितों के किसी भी सामाजिक राजनीतिक संगठन ने इसका सक्रिय रूप से विरोध नहीं किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी नेता देर-सबेर इस कुर्सी को पाने की आशा लगाये बैठे हैं। राष्ट्रीय आयोग के बारे में ‘‘पिंजरे का शेर है राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जन जाति आयोग’’ संबंधी एक महत्वपूर्ण शोधपरक आलेख ‘‘सम्यक भारत’’ नई दिल्ली मासिक पत्रिका के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित हुआ था। यह आलेख सरकार की दुर्भावना और राजनीतिक दलों की चुप्पी को बड़े ही सिलसिलेवार ढ़ंग से उजागर करता है।
        
आज हमें राष्ट्र को सार्थक दिशा मे ले जाने के लिए नेक-नीयत, इच्छाशक्ति और आत्मबल की ज़रूरत है। जहां तक लोकपाल कानून की बात है यह लोकपाल को जांच, अभियोजन और दंड के अधिकार देता है। कुछ लोग इसे लोकतंत्र और देश की सम्प्रभुता के लिए खतरा कह रहे हैं। यह अनुच्छेद 245 के तहत भारत के संविधान के खिलाफ है। अन्तर्राष्ट्रीय फंडिंग से ताकतवर बने कुछ एनजीओ वालों ने मीडिया और ग्लोबलाईजेशन की अर्थनीति से जिस तरह भ्रष्टाचार के खात्मे की आड़ में लोगों को भ्रमित कर बहुजन राजनीति को हाशिये पर पहुंचाने का काम किया है वह विचारणीय है। लोकपाल के पीछे छिपा एजेंडा राजनीतिक प्रणाली के रूप में लोकतंत्र का निजीकरण है। देश इस समय दोराहे पर खड़ा है। राजनीतिक लोग अपना स्वार्थ तलाश रहे हैं। इसके अलावा लोकपाल के सामने आने वाले मामलों को यदि समयबद्ध तरीके से नहीं निपटाया जा सका, तब इसकी स्थिति हमारी अदालतों जैसी ही हो जायेगी, जहां आज तीन करोड़ से अधिक मामले वर्षों से लंबित हैं। मगर यह छद्म आभास क्या लोगों की सोच को बदल सकता है, या वे अपनी समझ और अनुभव पर यकीन करेंगे? उपर्युक्त पर नजर डालने पर अतीत का अनुभव बताता है कि लोकपाल के साथ भी ऐसा हो सकता है। क्या केजरीवाल की बात सच होने जा रही है ?

लेखक अमित सिंह से संपर्क उनके मोबाइल-9457357300 पर किया जा सकता है।

‘आप’ के महिमामंडन में क्यों लगा है ‘आजतक’?

नई दिल्ली। यह बात मेरी समझ से परे है कि आजतक न्यूज चैनल आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के चीफ मिनिस्टर केजरीवाल के महिमामंडन में क्यों जुटा हुआ है। आजकल आजतक पर पूरी तरह से मिस्टर केजरीवाल का रंग चढ़ गया है। इसके पीछे का राज क्या है, यह तो आजतक वाले अरूण पुरी बता सकते हैं या फिर मिस्टर केजरीवाल।

दिल्ली में जबसे 'आप' की सरकार बनी है तबसे वैसे हर कोई उनके गुणगान में जुटा है। चैनल वाले भी उन्हीं का राग अलाप रहे हैं लेकिन सबसे ज्यादा गीत आजतक गा रहा है। ऐसा लगता है कि फोर्ड फाउंडेशन का कुछ चंदा आजतक के हाथ भी लगा है। वैसे भाजपा वाले तो यही कह रहे हैं। ऐसा चर्चाएं चल पड़ी हैं कि अमेरिका के फोर्ड फाउंडेशन ने आजतक चैनल में निवेश किया है। इसी फाउंडेशन ने केजरीवाल के एनजीओ को करोड़ों की मदद की थी और इसी मदद पर सारा आंदोलन चला था।

सिर्फ भाजपा वाले यही बात कहते तो शायद विश्वास नहीं होता लेकिन आजतक चैनल को कोई दिन में एक बार देख ले तो आसानी से बदलाव का पता चल सकता है। मिस्टर केजरीवाल के गुणगान करती गाथा आपको सुनाई देगी। ऐसा लगता है कि जैसे कि केजरीवाल जैसा मिस्टर क्लीन पोलटिशियन इस देश में कोई न हो। पता नहीं एक माह में ही कितनी सीरिज बना डाली मिस्टर केजरीवाल पर।

आजतक चैनल ने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के बारे में कभी इसका एक फीसदी भी आज तक नहीं दिखाया। माणिक सरकार वाकई में गाथा के लायक है। चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं। जो तनखा मिलती है बतौर मुख्यमंत्री, वह पार्टी को दे देते हैं और इसके बदले पार्टी उन्हें पांच हजार रूपए मासिक देती है, घर के खर्चे के लिए। बिना ताम झाम के रहते हैं। पैदल ही सचिवालय जाते हैं। साधारण से घर में रहते हैं। पर आजतक की दृष्टि शायद इतनी सुदूर तक नहीं जाती।

हरियाणा के युवा पत्रकार दीपक खोखर का विश्लेषण. संपर्क: 09991680040

सहारा छोड़ ‘रोज़नामा खबरें’ पहुंचे ज़ैन शम्सी

दिल्ली से आए दिन उर्दू अख़बारों का निकलना कोई नयी बात नहीं है मगर एक नए अख़बार 'रोज़नामा खबरें' ने कई बड़े अख़बारों के स्टाफ को अपने साथ शामिल कर कुछ अलग ही हंगामा मचाया हुआ है। फ़िलहाल दिल्ली के सबसे बड़े अख़बार 'इंक़लाब' से कई लोग इस अख़बार में शामिल हुए हैं। सहारा जैसे बड़े उर्दू अख़बार को छोड़ कर पत्रकार ज़ैन शम्सी ने भी सह संपादक के तौर पर इस अख़बार को ज्वाइन कर लिया है।

ख़बरों के अनुसार शम्सी को सहारा में उनकी योग्यता से अनुसार तनख्वाह नहीं मिल रही थी। उन्होंने सहारा से लगभग दुगुनी तनख्वाह पर 'रोज़नामा खबरें' ज्वाइन कर लिया है। सहारा के संपादक फैसल अली के लिए शम्सी का जाना झटका है। नए अख़बार के संपादक क़ासिम सैयद हैं जिन्हें किसी विवाद के बाद हाल ही में सहारा को छोड़ना पड़ा।

वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा ने माखनलाल पत्रकारिता विवि को भेंट की अपनी पुस्तकें

भोपाल। प्रख्यात साहित्कार डा. विजयबहादुर सिंह का कहना है कि किताबें जिंदगी को रौशन करती हैं और उनका अर्पण सबसे बड़ा दान है। क्योंकि किताबें ही हमें हमारे समय के आर-पार देखना सिखाती हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में विश्वविद्यालय के पूर्व महानिदेशक और वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा द्वारा अपनी पुस्तकों को विश्वविद्यालय के पुस्तकालय हेतु भेंट किए जाने के अवसर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

साहित्यकार कैलाश चंद्र पंत ने कहा कि श्री शर्मा ने अपने जीवन की पूरी कमाई विश्वविद्यालय को सौंप दी है क्योंकि किसी लेखक-पत्रकार के लिए किताबें ही उसकी पूंजी होती हैं। वरिष्ठ पत्रकार मदनमोहन जोशी ने श्री शर्मा के मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में किए गए योगदान को याद करते हुए कहा कि वे सही मायने में मूल्यआधारित पत्रकारिता के जीवंत प्रतीक हैं। जो अपनी खास विचारधारा के बावजूद एक लोकतांत्रिक चरित्र रखते हैं। रिश्तों को जीना और निभाना उनकी विशेषता है।

स्वदेश के संपादक राजेंद्र शर्मा ने कहा कि राधेश्याम जी ने जो पौधा एक विश्वविद्यालय के रूप में लगाया अब वह एक विशाल वृक्ष बन गया है और देश में इससे निकली प्रतिभाएं पत्रकारिता को गौरवान्वित कर रही हैं। कुलपति प्रो.बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि यह एक सार्थक परंपरा है, जिससे ज्ञान अनेक लोगों तक विस्तार लेता है।

इस अवसर पर राधेश्याम शर्मा ने विवि की स्थापना और उसके विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए अपने अनुभव सुनाए। उनका कहना था पत्रकारिता संघर्ष का पथ है और यहां से निकले विद्यार्थी इस मार्ग पर चल रहे हैं। इस अवसर पर पुस्तकों की सेल्फ का अनावरण भी अतिथियों ने किया तथा श्री शर्मा को शाल- श्रीफल देकर सम्मानित किया। आयोजन में वरिष्ठ पत्रकार शिवअनुराग पटैरया, सुरेंद्र द्विवेदी, डा.रामदेव भारद्वाज, डा. चंदर सोनाने, दीपक शर्मा, डा. आरती सारंग सहित विश्वविद्यालय परिवार से जुड़े लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

‘समाचार प्लस’ चैनल का यूपी, उत्तराखंड और राजस्थान में जोरदार प्रदर्शन जारी

नए साल के पहले हफ्ते की टीआरपी के आंकड़े बताते हैं कि 'समाचार प्लस' न्यूज चैनल का उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान में शानदार प्रदर्शन जारी है. जीआरपी, टीवीआर, शेयर और टीएसयू के मामलों में चैनल यूपी और उत्तराखंड में नंबर दो की पोजीशन पर बना हुआ है और उछाल पा रहा है. यूपी-यूके में जी न्यूज के बाद समाचार प्लस का स्थान है. इटीवी और इंडिया न्यूज में नंबर तीन की पोजीशन के लिए जद्दोजहद है.

राजस्थान की बात करें तो यहां 'समाचार प्लस' चैनल की शुरुआत हाल में ही हुई है. बावजूद इसके नंबर वन न्यूज चैनल ईटीवी का पीछा करते हुए समाचार प्लस दूसरे स्थान की कुर्सी पर पहुंच चुका है. जी ग्रुप के राजस्थान बेस्ड न्यूज चैनल जी राजस्थान प्लस मरुधरा नंबर तीन की पोजीशन पर है. इंडिया न्यूज और समय के बीच चौथे स्थान के लिए जद्दोजहद है.

इस बारे में समाचार प्लस चैनल के मुखिया उमेश कुमार का कहना है कि कंटेंट और आम जन से जुड़ाव की बदौलत चैनल लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहा है. इसका पूरा श्रेय चैनल से जुड़ी टीम को जाता है जिनके अथक मेहनत के बल पर समाचार प्लस शीर्ष पर पहुंचा है.

ईटीवी ने लांच किए पांच नए रीजनल चैनल

ईटीवी समूह ने पांच भाषाओं में नए रीजनल चैनल लांच किया है. ये न्‍यूज चैनल 24 घंटे खबरों का प्रसारण करेंगे. समूह ने बांग्‍ला, कन्‍नड, गुजराती भाषा के अलावा हरियाणा और हिमाचल के लिए हिंदी भाषा में चैनल की लांचिंग की है.

ईटीवी बांग्‍ला का प्रसारण कोलकाता से होगा. कन्‍नड चैनल बंगलुरू से तथा गुजराती चैनल अहमदाबाद से प्रसारित होगा. हरिणाया एवं हिमाचल चैनल का प्रसारण क्रमश: चंडीगढ़ और शिमला से किया जाएगा. ये चैनल शुक्रवार से आन एयर कर दिए गए हैं. इन चैनलों की लांचिंग लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किया जा रहा है. ईटीवी समूह के हिंदी और उर्दू चैनल कई प्रदेशों में सफलता पूर्वक संचालित हो रहे हैं. नए चैनलों के हेड जगदीश चंद्रा बनाए गए हैं. ईटीवी समूह के सभी चैनलों की जिम्‍मेदारी इन्‍हीं के पास रहेगी.

राज्‍यसभा टिकट नहीं दिया तो छाप रहे हैं गलत खबर : अखिलेश

यूपी के मुख्‍यमंत्री का सरकारी आवास 5 कालीदास मार्ग आज ऐसे खुलासे का गवाह बना, जो बस बातों बेबात में सुना जा रहा था. सीएम ने आज अपने प्रेस कांफ्रेंस में मुहर लगा दी कि देश का एक बड़ा और खुद को देश का बड़ा अखबार बताने वाला मीडिया घराना सीएम से केवल इसलिए नाराज है कि उन्‍होंने उसके मालिकों में एक को राज्‍यसभा का टिकट नहीं दिया. सीएम अखिलेश यादव ने दर्जनों पत्रकारों के सामने नाराजगी भरे लहजे में कहा कि एक अखबार के लोग जुआ खेलते पकड़े गए थे. इन जुआडियों को पिछले शासन में लठियाया गया था, तब सपा ही साथ खड़ी थी.

सीएम इतने पर ही नहीं रूके उन्‍होंने अखबार और उसके मालिक का नाम लिए बगैर आगे जोड़ा कि इस अखबार के संपादक अपने लिए राज्‍यसभा टिकट चाहते थे. पार्टी ने जब टिकट नहीं दिया तो अखबार सरकार के खिलाफ गलत खबरें प्रकाशित कर रहा है. उन्‍होंने यहां तक कह दिया कि इस अखबार के पत्रकारों को लालबत्‍ती से नवाजा गया, इसके बाद भी ये गलत खबरें प्रकाशित कर रहे हैं. वे इस दौरान दो अंग्रेजी चैनलों पर भी बिफरे. कहा कि हेलीकाप्‍टर में घूमने के बाद भी कवरेज नहीं दिखाया गया. मुझे एसएमएस कर दिया गया कि सेल्‍स वाले इसकी अनुमति नहीं दे रहे हैं.

प्रेस कांफ्रेंस के दौरान काफी नाराजगी में थे. खासकर अखबार में छपी खबर को लेकर. वैसे चर्चा है कि ये अखबार वाले सीएम से केवल राज्‍य सभा टिकट को लेकर ही नहीं बल्कि उनके घर आयोजित एक कार्यक्रम में ना जाने को लेकर भी नाराज हैं. बताया जा रहा है कि अखबार के तमाम पत्रकारों को सरकार के खिलाफ खबरें लिखने को निर्देशित किया गया था. सीएम ने बहुत सख्‍त लहजे में कहा कि समाजवादियों को संघर्ष करने को मजबूर न किया जाए. गलत खबर छापने वाले सबूत दें या माफी मांगें. 

अखिलेश ने कहा- पत्रकारों ने खबर दिखाने के नाम पर दांव दिया

लखनऊ। सैफई महोत्सव पर मीडिया में उठे बवाल पर आज खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पत्रकारों के सामने सफाई देने आये। 26 दिसंबर से 8 जनवरी तक चले सैफई महोत्सव में हो रहे नाच गाने और सांस्कृतिक कार्यकर्मों पर उठ रहे सवाल, वहीँ मुजफ्फरनगर दंगे के बाद राहत शिविरों में रह रहे पीड़ितों का इस ठण्ड में बुरे हालात के ऊपर मीडिया ने लगातार खबरे दिखाई, समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों पर दिखाये गए कार्यकर्मों को लेकर मुख्यमंत्री इतने खफा दिखे की उन्होंने कुछ मीडिया हाउसेज की रिपोर्टिंग पर सवाल खड़े करते हुये उनसे माफ़ी मांगने की बात भी कह डाली।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक अखबार द्वारा सैफई महोत्सव में खर्च हुये 300 करोड़ रुपयों की खबर पर नाराजगी जाहिर करते हुये कहा कि उक्त अखबार को उन तीन सौ करोड़ रुपयों का पूरा हिसाब सरकार को देना चाहिये, उन्होंने ये भी कहा की सरकार ऐसी रिपोर्ट को खारिज करती है और रिपोर्ट छापने वालों को आगाह करती है की वो या तो उन 300 करोड़ का लेखा-जोखा दे या सरकार से माफ़ी मांगे नहीं तो सरकार उस अखबार और उस रिपोर्टर पर कारर्वाई करने पर मजबूर हो जायेगी।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव काफी नाराज दिखे उन्होंने मुजफ्फरनगर काण्ड में टीवी चैनल पर दिखाई जा रही रिपोर्ट को गलत बताते हुये यहाँ तक कह डाला कि कुछ मीडिया हाउस सरकार की छवि खराब करना चाहते है, इसलिए उन्होंने ऐसी रिपोर्ट टीवी न्यूज़ में प्रसारित की। यहाँ सवाल ये उठता है कि अखिलेश यादव मुजफ्फरनगर की ख़बरों को लेकर परेशान है, मुजफ्फरनगर में सरकार की नाकामियों को लेकर परेशान है, की सैफई महोत्सव में हुये खर्चे और उसपर उठ रही उँगलियों को लेकर चिंतित है।

जवाब तो उन्हें ही देना पड़ेगा आखिर प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते जवाबदेही भी उन्ही की बनती है। मुजफ्फरनगर काण्ड और राहत शिविरों में इस ठण्ड के मौसम में हुये बुरे हालात पर उनके पिता मुलायम सिंह यादव से सवाल पूछना भी उन्हें बुरा लग रहा है। उन्होंने कहा सपा की सरकार है जवाब मै दूंगा एक काबिल और पिता की बात मानने वाले बेटे की झलक दिखाते हुए उन्होंने अपने सरकार का बचाव तो कर लिया लेकिन शायद ये भूल गए की उनके पिता समाजवादी पार्टी के मुखिया है और इस प्रदेश कि सरकार के मुखिया के पिता है, तो कहीं न कहीं उनकी जवाबदेही तो बनती ही है।

अखिलेश यादव एक बात से और खफा है उनका कहना है कि मै खुद जब मुजफ्फरनगर दौरे पर गया था तो मेरे साथ हवाई जहाज में कुछ बड़े पत्रकार भी गए थे उन्होंने कहा था कि ये रिपोर्ट आधे घंटे के पॅकेज में चलेगी लेकिन चैनल वालों ने यहाँ भी मुख्यमंत्री को दांव दे दिया और खबर प्रसारित नहीं कराई जबकि खुद मुख्यमंत्री ने अपने जानने वालों से कहा था आज मुजफ्फरनगर में मेरे दौरे की अच्छी खबर आने वाली है। लेकिन खबर प्रसारित नहीं हुई बल्कि उस पत्रकार का एसएमएस आया कि खबर प्रसारित नहीं हो सकती। मुख्यमंत्री अंग्रेजी चैनलों से भी खफा है कि वो मुजफ्फरनगर दंगो को लेकर अपनी रिपोर्ट में प्रदेश की छवि विश्व में खराब कर रहे है।

मुख्यमंत्री ने सैफई महोत्सव पर उठ रह सवालों पर सवाल खड़े करते हुए कहा मीडिया नाहक कलाकारों पर वार कर रही है। मीडिया को जो भी सवाल करने है, मुझसे करें कलकारों से नहीं। बहरहाल आज की पत्रकारवार्ता में मुख्यमंत्री काफी नाराज दिखे, वो क्यों नाराज दिखे ये वही जाने लेकिन उन्हें एक बात का हिसाब देना होगा कि बीते 14 दिनों तक जो सैफई महोत्सव की धूम पूरे देश में रही करीब 24 चार्टर्ड विमान सैफई से मुम्बई का चक्कर लगाते रहे, सलमान खान से लेकर माधुरी दीक्षित ने इस महोत्सव में अपने जलवे बिखेरे उस सैफई महोत्सव में महज 6 से 8 करोड़ रुपये खर्च हुये होंगे।

मुख्यमंत्री ने आखिर सैफई में हुये तमाशे पर सफाई क्यों देनी पड़ी, आखिर क्या वजह हुई की खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुजफ्फरनगर काण्ड को लेकर मुलायम सिंह यादव पर हो रहे हमलों का जवाब देने की कमान खुद संभल ली। सैफई महोत्सव हर साल होता है लेकिन ये पहली बार हो रहा है जब इस महोत्सव के समापन पर प्रदेश सरकार के मुखिया खुद सामने आये और सफाई देते दिखाई दिये ये क्यों हुआ ये तो खुद अखिलेश जाने और उनके रणनीतिकार लेकिन इतना तो तय है की इस महोत्सव को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की किरकिरी शायद अखिलेश को रास नहीं आई।

लखनऊ से शीतांशु पति त्रिपाठी की रिपोर्ट.

प्रेम शंकर झा, जमशेद, सुशांत, रोहित, निखिल, जैकब के बारे में सूचनाएं

खबर है कि वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा तहलका के कंसल्टिंग एडिटर बन गए हैं. वे पहले भी तहलका में कालम लिखते थे. वे तहलका समूह के फाइनेंशियल वर्ल्ड के मैनेजिंग एडिटर भी हैं. उधर, न्यूज एक्सप्रेस से सूचना है कि सुशांत पाठक ने स्पेशल करेस्पांडेंट, जमशेद खान ने इनवेस्टिगेशन एडिटर, रोहित बिष्ट ने डिप्टी एक्जीक्यूटिव एडिटर, निखिल दुबे ने डिप्टी एक्जीक्यूटिव एडिटर और जैकब मैथ्यू ने एक्जीक्यूटिव एडिटर के रूप में ज्वाइन कर लिया है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल कर पहुंचा सकते हैं.
 

कुमार आनंद का नाम गायब, बल्देव भाई शर्मा बने नेशनल दुनिया के वरिष्ठ स्थानीय संपादक

नेशनल दुनिया अखबार से खबर है कि प्रिंट लाइन से कुमार आनंद का नाम गायब हो गया है. वे समूह संपादक के बतौर अखबार से जुड़े थे और अखबार में उनका नाम भी इसी रूप में छपता था. उनकी जगह अब बल्देव भाई शर्मा का नाम वरिष्ठ स्थानीय संपादक के रूप में प्रिंटलाइन में जाने लगा है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल कर पहुंचा सकते हैं.

अखिलेश सही हों या गलत, लेकिन मीडिया को धोया बहुत सही है

Nikhil Srivastava : जिस तरह आज अखिलेश यादव ने दैनिक जागरण को बदनाम (सच के आधार पर) किया है, उससे मीडिया को सबक लेने की जरूरत है? या इसका भी कोई तर्क निकाल लिया जायेगा? कुछ भी हो… अखिलेश सही हों या गलत, धोया बहुत सही है। अर्नब गोस्वामी को भी कुछ बोले हैं। अब भी किसी को हैलीकॉप्टर में घूमना है? सीधे मुख्यमंत्री के मोबाइल पर मैसेज भेजना है?

Dinesh Shakya : सैफई महोत्सव मे बेहिसाब खर्च की खबर को लेकर मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद माफी कौन और कैसे मांगेगा, यह सवाल बड़ा ही दिलचस्प बन पड़ा है क्योंकि अखबार वाले आये दिन इस तरह की खबरें छापते हैं और जब मामला पेचीदा हो जाता है तो छोटे से शब्द में खेद प्रकट प्रकाशित कर देते हैं जो ना तो किसी को दिखलाई देते हैं और ना ही उसे पढा जा पाता है… वैसे माफी मांगने के तरीके यह भी होते हैं कि कमरे में जा कर अकेले में…

निखिल और दिनेश के फेसबुक वॉल से.

आशुतोष का नौकरी छोड़ कर ‘आप’ के जरिए राजनीति में सक्रिय होना साहसिक फैसला

Jitendra Dixit : आशुतोष ने नौकरी छोड़ कर आप के जरिए राजनीति में सक्रिय होने का फैसला कर साहस दिखाया है। हम उनके साहस की कद्र करते हैं। आजादी आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता की धारा साथ-साथ बही है। आशुतोष जी इस कारण बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने सुविधा के बजाय संघर्ष की राह चुनी है।

मोटी सैलरी ठुकरा कर अब सड़क पर संघर्ष करेंगे। वैसे तो बड़े पत्रकारों और अखबार मालिकों के लिए राजनीति में सुविधाजनक दरवाजा राज्यसभा का है। पर उन्होंने जोड़तोड़ के बजाय सीधी और संघर्ष की राह चुनी है।

अमर उजाला, मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

तीन सौ करोड़ रुपये खर्च बताने वाला अखबार माफी मांगे : अखिलेश यादव

लखनऊ : सैफई महोत्सव को लेकर यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मीडिया पर निशाना साधते हुए कहा कि पूरे महोत्सव का खर्चा 7 से 8 करोड़ रुपये था लेकिन प्रकाशित किया गया 300 करोड़ रुपये. तीन सौ करोड़ रुपये खर्चे की रिपोर्ट छापने वाले माफी मांगें.

अखिलेश ने कहा, 'पत्रकारों ने पास मांगे थे और पास नहीं मिलने से नाराज होकर इस तरह की रिपोर्ट दिखाई गई. पत्रकार तो खुद वहां ऑटोग्राफ लेने के मूड में थे. एक हिंदी अखबार ने तो ये रिपोर्ट छाप दी कि 300 करोड़ रुपये का खर्चा हुआ. या तो वो उस खर्चे का ब्यौरा दे या फिर जिस पत्रकार ने ऐसी रिपोर्ट लिखी उसके खिलाफ एक्शन ले. हमें संघर्ष करने पर मजबूर न करें.'

अखिलेश यादव ने मीडिया पर एक और वार करते हुए कहा, 'सलमान खान के डांस की खबरें सबने दिखाई. लेकिन सलमान खान अस्पताल में गए ये किसी ने नहीं दिखाया. बच्चों से मिले और एक मां से कहा कि उसके बच्चे के इलाज का पूरा खर्चा वो उठाएंगे.'
 

अखिलेश ने मीडिया से संबंधित जो सवाल उठाए हैं उस पर आत्ममंथन करना ही होगा

Arvind K Singh : अखिलेश यादव के सवाल गैर वाजिब नहीं… उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आलोचनाओं से बेचैन हैं तो स्वाभाविक ही है…सबको पता है कि सैफई में जो भी हुआ है, वो सब उनका किया धरा नहीं है…एक बड़े राजनीतिक कुनबे में कुछ उनसे उम्र में बड़े हैं, कुछ पद में बड़े हैं, कुछ कद में बड़े हैं, कुछ रिश्तों में बड़े हैं…कुछ मिनी सीएम हैं तो कुछ सुपर सीएम…ऐसी बेबसी के बीच में मीडिया भी आलोचना करे, दंगों की बात उठाए तो नाराजगी स्वाभाविक है…

लेकिन अखिलेश ने मीडिया से संबंधित कुछ सवाल खड़े किए हैं जिस पर मीडिया के मित्रों को आत्ममंथन करना ही होगा..अखिलेश ने पेड न्यूज का मसला उठाया है…खबर छापने के लिए वो कौन लोग हैं जो मुख्यमंत्री तक से पैसा मांगते हैं..खबर बनाना फिर नहीं चलाना और आटोग्राफ से लेकर फोटो की लाइन में लग जाना इन सवालों का जवाब देना चाहिए और साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को भी ऐसे पत्रकारों का खुलासा करना चाहिए…

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

आशुतोष को शुभकामना देना कठिन है, क्योंकि मैं ‘आप’ को एनजीओवादी राजनीति का स्वरूप मानता हूं

Awadhesh Kumar :  पत्रकार Ashutosh का 'आप' में जाना…  मेरे से अनेक मित्रों ने पूछा है कि मैं Ashutosh जी के प्रसंग पर खामोश क्यों हूं? हर प्रसंग पर राय देना मैं आवश्यक नहीं समझता। बावजूद अचानक मन आया कि क्यों न सोच उभर रही है उसका कुछ अंश आप सबसे बांटूं। आशुतोष जी हमारे पुराने मित्र हैं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के दौर से मैं उन्हें जानता हूं। हिन्दुस्तान के फीचर पृष्ठ पर उनके लिए मैंने काफी लिखा। एकाध प्रसंग में बातचीत में तनाव भी हुआ, पर उससे संबंधों पर कोई अंतर नहीं आया।

प्रिंट पत्रकारिता के उस दौर में मेरे जैसे लोग चाहते थे कि आशुतोष प्रिंट क्षेत्र में रहें, लेकिन वे टीवी की ओर चले गए। यह बात अलग है कि पिछले 10 वर्षों में दस बार से ज्यादा आमना-सामना नहीं हुआ। उनके नेतृत्व में चलने वाले आईबीएन7 ने कभी मुझे बहस में नहीं बुलाया। बावजूद इसके मैं कह सकता हूं कि वर्तमान टीवी मीडिया में जिन कुछ लोगों ने ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ीं होंगी उनमें आशुतोष जी का नाम शीर्ष पर होगा। मेरे मित्र और इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक Rana Yashwant भी उनकी विद्वता के कायल हैं। कल सुबह ही बातचीत में Yashwant जी ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

अपने पद और काम को लेकर कभी अहं का शिकार होते उन्हें नहीं देखा। वे वही लिखते और बोलते हैं जो उनकी नजर में सही होता है। हां, उनकी सोच वर्तमान व्यवस्था, उनके अध्ययन की धारा तथा संगति से अवश्य प्रभावित रही है। इस कारण उनके लेखन और वाचन से अनेक बार अपनी घोर असहमति रही है। कई बार उनकी सोच भारत में प्रचलित और पाखंड का अभिप्राय हो चुकी सामाजिक न्याय वाली राजनीतिक सोच का परिष्कृत संस्करण नजर आता था। पर उनमें इतनी लोकतांत्रिकता है कि अपने मत के विपरीत मत सुन सकें और उससे कुंठाग्रस्त न हों। कभी अशालीन होकर किसी पर बरस पड़ना या भला बुरा कहना उनके स्वभाव का अंग नहीं रहा।

लेकिन उनका इस्तीफा और आप में जाने का निर्णय इन सबसे अलग है। इस समय कॉरपोरेट दबाव में जिस तरह कई मीडिया कंपनियां हैं उन्हीं में से एक आईबीएन भी है। इसलिए उनका इस्तीफा क्यों हुआ होगा यह मेरे लिए रहस्य है। कुछ समय पहले आईबीएन से भारी पैमाने पर लोग निकाले जाने को मजबूर हुए यदि उस समय उन्होंने इस्तीफा दिया होता तो इसका रंग कुछ दूसरा होता। असली कारण तो वे ही बता सकते हैं। लेकिन यह साफ है कि उनके लिए इस पर भारी दबाव रहा होगा।

हां, वे आम आदमी पार्टी में जाने के लिए आईबीएन से बाहर आए होंगे मेरे लिए ऐसा मानने का कोई कारण नहीं। उनके जीवन में सामाजिकता, सार्वजनिक सरोकार की उत्कटता तथा समाज के लिए अपने निजी जीवन को दांव पर लगाने या पत्रकारिता छोड़कर कूद पड़ने का जज्बा भी मैंने नहीं देखा। अन्ना अनशन अभियान एवं आप के प्रति उनका अति उत्साह…हमेशा दिखता था। अपने पत्रकारीय पेशे की सीमाओं से परे जाकर अन्ना अनशन एवं आप को महिमामंडित करते हुए उन्हें आसानी से देखा जा सकता था।

हर पत्रकार एक नागरिक है और उसके नाते उसे आंदोलन, अभियान, चुनाव, पार्टी आदि में अपनी भूमिका तय करने और निभाने का अधिकार है। पर यह सक्रियतावादी पत्रकारिता का ऐसा नमूना था, जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता है, भले उसके पीछे इराद जो भी हो। आशुतोष अन्ना अभियान एवं आप की राजनीति को भारत में बेहतर राजनीतिक बदलाव का अंग मानते हैं, लेकिन एक चैनल के प्रमुख रहते हुए उनकी भूमिका अन्ना अभियान और आप के सक्रिय भागीदार जैसी हो जाती थी। मेरे मत में इससे वे बचते हुए भी इनका समर्थन कर सकते थे।

बहरहाल, जब वे 'आप' में जा रहे हैं तो अब 'आप' के नेता के रूप में जाने जाएंगे। लेकिन मेरे लिए शुभकामना देना इसलिए कठिन है, क्योंकि मैं आप को एनजीओवादी राजनीति का स्वरूप मानता हूं जिसका समर्थन नहीं कर सकता। फिर भी मेरी सहानुभूति उनके साथ है।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

मुलायम अपने चहेते पत्रकारों से पूछें कि भैया तुम लोग बदल क्यों गए?

शंभूनाथ शुक्ल : मुलायम चचा को सलाह! माफ कीजिएगा, अपने सूबे के चहेते मुलायम चचा को एक सलाह दे रहा हूं… समाजवादी पार्टी और मीडिया में तीन और छह का आंकड़ा है। कुछ लोग इसे जातीय द्वेष बताते हैं तो कुछ की नजर में यह मुलायम सिंह के हिंदी भाषा और देसी तथा गांव के लोगों के प्रति असीम प्रेम के कारण उपजा शहरी रोष है। कुछ-कुछ दोनों बातें सही हो सकती हैं।

पर चचा मुलायम यह बताएं कि पत्रकारों को अपने विवेकाधीन कोष के जरिए खरीदने का पत्ता भी उन्होंने ही फेंका था। वे अपने उन चहेते पत्रकारों से पूछें कि भैया तुम लोग बदल क्यों गए? सपा-बसपा सरकार के वक्त उन्होंने स्वयं यह दांव चला था। पर बसपा ने मीडिया को न तो भाव दिया और न ही उसे दुत्कारा। लेकिन बसपा ने कभी भी सैफई जैसे आयोजन भी नहीं किए। पत्रकारों का जातीय द्वेष वहां तो नहीं दीखता। जबकि मुलायम चचा के जातीय भाई बंधु अब पत्रकारिता में खूब हैं और वे भी उन्हें नहीं बख्श रहे।

मायावती भी हिंदी प्रेमी हैं तथा वंचित तबकों के भले और शहरी भद्र लोक को चिढ़ाने के लिए उन्होंने तमाम काम किए पर मायावती के खिलाफ इस मीडिया ने कोई अभियान नहीं चलाया। अगर मीडिया को मुलायम चचा नहीं समझ पाए तो मुंशी प्रेमचंद के गोदान में अखबार मालिक ओंकारनाथ और राय साहब के बीच के द्वंद को समझने की कोशिश करें।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

अबे जागरण के जुआड़ी संपादक, हिसाब बता, कैसे खर्च हुए?

Madan Tiwary :  बैक अप अखिलेश, हम तुम्हारे साथ हैं। सैफ़ई महोत्सव में 300 करोड़ खर्च हुये? अबे जागरण के जुआड़ी संपादक, हिसाब बता, कैसे खर्च हुए? सवर्णवादी मीडिया के मठाधीशों, होश मे आ जाओ, अन्यथा हाशिये पर फ़ेंक दिये जाओगे, लतियाये जाओगे, गरियाये जाओगे और अंत में रोड पर मूंगफ़ली बेचते नजर आओगे।

मुजफ़्फ़रनगर मे दंगा हुआ, राहत शिविर में कपड़े नहीं हैं और ऐसे हालात में सैफ़ई महोत्सव का क्या अर्थ है, यह बात उठा रहा था स्टार न्यूज (अब एबीपी) का पत्रकार लखनउ का पंकज झा। अगर मुजफ़्फ़रनगर दंगा सहायता शिविर के लिये महोत्सव या कोई अन्य प्रोग्राम की आलोचना करनी है तो फ़िर सैफ़ई महोत्सव की आलोचना ही क्यों? क्या इसलिये कि यूपी में एक यादव का शासन है? अन्य राज्य जहां सवर्ण नेता सत्ता में हैं उनके यहां कोई उत्सव मन रहा है कि नहीं? कभी पता लगाया? होश में आ जाओ सवर्णवादी पत्रकारों… तुम लोगों का ईलाज तेल पिआवन लाठी है लेकिन दिक्कत है कि तुम जमूरों के कारण उस लाठी की चोट हमारे उपर भी पड़ जाती है। गब्बर सिंह की तरह चुन चुनकर मारे तब तो कोई बात ही नहीं।

वकील मदन तिवारी के फेसबुक वॉल से.


Dhananjay Singh : अखिलेश यादव जी कह रहे हैं की राज्यसभा के टिकट के लिए पीछे घूमने वाले,जुआ खेलते पकडे जाने पर पुलिस से पिट चुके लोगों के घर वाले,सरकारी हेलीकाप्टर में घूमने वाले पत्रकार अब सरकार के खिलाफ लिख रहे हैं.सरकार की दया के पात्र पत्रकारों के SMS भी सबको दिखा देने की धमकी दी है मुख्यमंत्री जी ने…..बढ़िया से धो दिया लखनौवा पत्रकारों को …. कहीं सफाई के बाद सारे पत्रकार 'आप' न हो जाएँ.

पत्रकार धनंजय सिंह के फेसबुक वॉल से.

मौज-मस्ती का दूसरा नाम मुलायम का समाजवाद

उत्तर प्रदेश की आम जनता समाजवादियों की गुंडागर्दी से त्रस्त है। पूरे प्रदेश में चल रही भीषड़ शीत लहर से गरीबों की जिन्दगी मुहाल है। मुजफ्फरनगर में दंगा पीड़ित बच्चे, बूढ़े और महिलाये खुले आसमान के नीचे रातें बितानें को मजबूर हैं। ऐसे में सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह सैफई महोत्सव में बालीबुड की नर्तकियों की थिरकन और तबले की थाप का आनंद ले रहे हैं। ये समाजवाद का नया चेहरा है। इस मौज-मस्ती के समाजवाद की चमचमाती चकाचौंध में कभी-कभी लगता है जैसे असली समाजवाद की मौत हो गयी है, और समाजवाद के ये नकली पहरुए उसका जश्न मना  रहे है। क्या, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह सब जायज है। 

समाजवाद का दूसरा चेहरा यूपी सरकार के वो मंत्री हैं जो स्टडी टूर के नाम पर जनता के खून-पसीने की कमाई से विदेशो में मौज मस्ती करने गए हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे नेताओ को अपने आपको समाजवादी कहते हुए। जनता के पैसों पर मौज मस्ती और रंगीनियों का ये कौन सा समाजवाद है। उत्तर प्रदेश के माननीय समाजवादियों के इस चकाचौध भरे समाजवाद में असली समाजवाद तो कही दम तोड़ रहा है । जो पैसा सैफई महोत्सव में सलमान और माधुरी दीक्षित के ठुमको और मंत्रियों के विदेशी शैर सपाटे पर खर्च किया जा रहा है उससे ठण्ड से बेहाल मासूमो और दंगा पीड़तों की मदद में खर्च किया जा सकता था। लगता है समाजवादियो को उस आम आदमी के दुःख-दर्द से कोई सरोकार नहीं है जो अपने वोट की ताकत से उन्हें ख़ास बनाता है। समाजवाद के पैरो तले रौंदी जा रही उत्तर प्रदेश की गरीब, शोषित और पीड़ित जनता आखिर अपना दर्द बताए तो किसको।

लेखक राकेश भदौरिया एटा, उत्तर प्रदेश में रहते हैं. संपर्क: 09456037346

श्रीकांत शंकर जोशी की प्रथम पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा

नई दिल्ली। हिन्दुस्थान समाचार संवाद समिति के पूर्व मार्गदर्शक स्व. श्रीकांत शंकर जोशी की प्रथम पुण्यतिथि पर बुधवार को हिन्दुस्थान समाचार के केन्द्रीय कार्यालय द्वारा श्रद्धांजलि सभा तथा हवन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर स्व. जोशी के चित्र पर माल्यार्पण किया गया तथा पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गई।

                                                    स्व. श्रीकांत शंकर जोशी
 

कार्यक्रम में हिन्दुस्थान समाचार के निर्देशक मंडल के सदस्य व समाज सेवी दीनदयाल अग्रवाल, अनिरुद्ध शर्मा (कार्यकारी अधिकारी, हिन्दुस्थान समाचार), चन्द्रमोहन भारद्वाज, महेश चढ्ढा, राकेश बहल, राम दास, राजेश मिश्रा, मनोज जी, शोभनाथ, दिलीप पांडेय, अभिनव श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, ज्ञानशंकर त्रिपाठी, दिल्ली कार्यालय के वरिष्ठ कर्मचारी किशोरी लाल, रामराज आदि उपस्थित रहे।
 
श्रीकान्त शंकर जोशी का संक्षिप्त परिचय
 
श्रीकान्त शंकर जोशी जी का जन्म 21 दिसम्बर 1936 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के देवरुख गांव में हुआ था। श्रीकांत जोशी अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिये मुम्बई में आये। मुम्बई विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र से स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने जीवन बीमा निगम में कार्य करना शुरु किया।
 
संघ परिचय

जीवन बीमा में कार्य करने के दौरान वह मुम्बई में ही संघ के प्रचारक शिवराज तेलंग के संपर्क में आये। उन्हीं की प्रेरणा से नौकरी से त्यागपत्र देकर 1960 में पूरा समय संघ कार्य को समर्पित कर प्रचारक बन गये। प्रारम्भ में प्रचारक के नाते नान्देड गये, कुछ समय महाराष्ट्र में काम करने के बाद श्री जोशी को 1963 में संघ कार्य हेतु असम भेजा गया। विषम परिस्थियों में वह निरन्तर पच्चीस साल तक वहां संगठन को गति प्रदान किया। प्रारम्भ में तेजपुर के विभाग प्रचारक फिर शिलांग के विभाग प्रचारक बने। इस दौरान श्रीजोशी 1971 से 1987 तक असम के प्रान्त प्रचारक रहे। 1987 में उन्हें तत्कालीन सरसंघचालक माननीय बाला साहेब देवरस जी के सहायक का उत्तरदायित्व दिया गया। 1997 से 2004 तक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख का दायित्व संभालने के बाद उन्हें 2004 में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य बनाया गया।
 
हिन्दुस्थान समाचार की पुनरसंरचना
 
श्रीकांत जोशी के प्रयासों से 2002 में मूर्च्छित हो चुकी भारतीय भाषाओं की एक मात्र संवाद समिति हिन्दुस्थान समाचार को पुनः सक्रिय करने का उपक्रम प्रारम्भ किया गया। यह संवाद समिति 1975 के आस-पास सरकारी हस्तक्षेप के कारण बंद हो गई थी। जब जोशी जी ने इस समिति को पुनर्जीवित करने के प्रयास प्रारम्भ किये तो पत्रकारिता जगत में बहुत लोग कहते सुनें गये कि यह कार्य असम्भव है। लेकिन जोशी जी ने अपने संगठन कौशल और कार्य कुशलता से कुछ ही वर्षों में ही इस असम्भव कार्य को ही सम्भव कर दिखाया। उनके अथक परिश्रम से गत् एक दशक में इस संवाद समिति ने न केवल अपना विस्तार किया अपितु भारत सहित विदेशों में भी अपनी धाक जमाने में सफल रही। उनकी प्रेरणा से आज भारत सहित मारिशस, नेपाल, त्रिनिनाड, थाईलैण्ड सहित कई देशों में इस संवाद समिति के ब्यूरो कार्यालय सफलता पूर्वक चल रहे हैं।

हिन्दुस्थान समाचार

खबरगलीः हिंदी का नया न्यूज पोर्टल

मुम्बई के वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव के सम्पादन में हिंदी का एक नया न्यूज पोर्टल 'खबरगली ' शुरू किया गया है। इस पोर्टल में समाचारों के अलावा राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर आलेखों के साथ सिनेमा, खेल व साहित्य विषयों का भी समावेश है। अमिताभ श्रीवास्तव के साथ दिल्ली के सुशील कुमार छौक्कर हैं जो अपने क्षेत्र को संभालेंगे। 

'खबर गली' उन तमाम लेखकों को लिखने के लिए आमंत्रित करता है जो रचनात्मकता के पथ पर सदैव अग्रसर हैं।  पोर्टल का वेब पता हैः www.khabargali.com

बड़े अधिकारी के प्रभाव में बहुगुणा, राहुल के दरबार में शिकायत

देहरादून। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में जहां उत्तराखण्ड शासन सारंगी के इशारों पर नाचा करता था, वहीं मुख्यमंत्री बहुगुणा की सरकार में सारंगी का पर्याय बन चुके राका की धुन पर। लेकिन इसकी धुन पर थिरकने वाले लोगों की कतार लम्बी नहीं है। कुछ लोगों ने राका के अब तक के काले कारनामों की फाईल राहुल दरबार की ओर सरका दी है। राजनीति के गलियारों में चर्चा गरम है कि राहुल भी इसकी धुन पर नाचंते हैं या नहीं। भाजपा सरकार के शासनकाल में सारंगी की धुन पर प्रदेश के आला नेता तक नाचा करते थे। सारंगी के बिना शासन के अंदर कोई भी काम नही हो पाता था। खंडूरी के शासनकाल में सारंगी द्वारा किए गए कारनामे भाजपा कार्यकर्ताओ को सरकार से दूर करते चले गए। परिणामस्वरूप भाजपा हाईकमान द्वारा खंडूरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया गया। खंडूरी के बाद मुख्यमंत्री बने निषंक के शासनकाल में सारंगी का नाम बदलकर राका हो गया। निषंक शासनकाल में राका के इशारे पर कई कारनामों को अंजाम दिया गया। जब तक निषंक कुछ समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। भाजपा हाईकमान राका के कारनामों से इतना आजिज आ चुका था कि उसने भाजपा कार्यकर्ताओं को ही सरकार से दूर कर दिया।

2012 के विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने के बाद उत्तराखण्ड में विजय बहुगुणा कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री बने। बहुगुणा के शासनकाल में एक चर्चित अधिकारी, जिसे शासन से लेकर प्रशासन तक राका के नाम से जानता है, के इशारे पर उत्तराखण्ड की सरकार चलनी शुरू हो गई। राका के कारनामों की लिस्ट इतनी लम्बी होती चली गई कि वर्तमान मुख्यमंत्री आम जनता के साथ-साथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से भी दूरी बनाते चले गए। उत्तराखण्ड की सरकार में इस विवादित अधिकारी का नाम कई घोटालो में सामने आया है। मुख्यमंत्री यह समझने में नाकाम रहे हैं कि अब तक लिए गए सभी फैसले इसी अधिकारी के इशारो पर, परदे के पीछे लिए गए हैं। राका का खौफ उन ईमानदार अधिकारियो पर भी लगातार बना हुआ है जो प्रदेश हित में विकास की योजनाओं को आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इस विवादित अधिकारी पर सरकार की कृपा के चलते कोई भी ईमानदार अधिकारी अपना विरोध दर्ज नहीं कराना चाहता। यदि कोई विरोध दर्ज कराने की कोशिश करता है, तो उसे षडयंत्र करके किनारे कर दिया जाता है।
    
उत्तराखण्ड में आगामी पंचायत चुनाव सरकार की परफॉरमेंस साबित करेंगे। वहीं यह चुनाव आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव के सेमीफाईनल के रूप में भी माना जा रहा है। इन चुनावों से यह पता चलेगा कि सरकार की जनता में कितनी पैठ है। विवादित अधिकारी राका की भूमिका को प्रदेश के मुख्यमंत्री समझ पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं और जनता से दूर होते जा रहे हैं। यही कारण है कि देहरादून से लेकर दिल्ली तक, जनता के बीच सरकार की नाकारात्मक की छवि बनती जा रही है। जनता का मुख्यमंत्री होने के बाद भी बहुगुणा राका तक सीमित होकर रह गए हैं। उत्तराखण्ड को सैरगाह बनाने वाले आधा दर्जन से अधिक अधिकारी डेप्यूटेशन पर अपना कार्यकाल पूरा चुके हैं लेकिन इसके बाद भी उन्हें उत्तराखण्ड से उनके मूल राज्यो में नहीं भेजा जा सका हैं इसके पीछे भी विवादित अधिकारी राका की कृपा बनी हुई है।

माना जा रहा है उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने यदि इस विवादित अधिकारी से दूरी बनानी शुरू नहीं की तो आने वाले दिनो में कांग्रेस, कोई भी चुनाव जीतती हुई नजर नहीं आ रही है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जो हाल भाजपा के शासनकाल में खंडूरी व निषंक का हुआ, वही बहुगुणा का हो सकता है। वहीं राका की कई विवादित फाइलें राहुल के दरबार में दस्तक दे चुकी हैं और कांग्रेस हाईकमान उत्तराखण्ड में राका रूपी इस अधिकारी को ठिकाने लगाने की रणनीति में जुट गया हैं।

लेखक राजेंद्र जोशी उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

खुलकर मोदी के समर्थन में आईं अन्ना की शिष्या… अब किरण बेदी को पाप नहीं लगेगा?

किरण बेदी ने अपना वोट नरेंद्र मोदी के समर्थन में देने की बात कहकर आज फिर पूरे देश को निराश किया. मुझे लगता है कि इससे उनकी टॉप कॉप और संवेदनशील नागरिक की जो छवि इतने सालों में बनी थी, उसे बहुत बड़ा धक्का लगा है. किरण बेदी अब राजनीति के चक्रव्यूह में हैं और आगे से उनकी बात में वह वजन नहीं रहेगा, जैसा अब तक था क्योंकि उनकी हर बात को उनके मोदी समर्थन से जोड़कर देखा जाएगा.

किरण बेदी शानदार पुलिस अधिकारी रही हैं लेकिन मुझे उस वक्त तब निराशा हुई थी, जब दिल्ली पुलिस कमिश्नर ना बनाए जाने वाले विवाद के बाद उन्होंने वक्त से पहले इस्तीफा दे दिया था (रिटायरमेंट ले लिया था). इस तरह देश-पब्लिक की सेवा से वह वक्त से पहले ही फारिग हो गईं. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि सिस्टम में रहकर ही आप कुछ कर सकते हैं, सिस्टम से बाहर होकर नहीं. हमेशा चीजें आपके अनुकूल-मनमाफिक नहीं होतीं लेकिन उन सीमाओं के बावजूद आप यथासंभव अच्छा काम कर सकते हैं.

फिर किरण बेदी अन्ना के आंदोलन से जुड़ी. अरविंद केजरीवाल भी अन्ना के साथ थे. दोनों ने साथ मिलकर जनलोकपाल की लड़ाई लड़ी और फिर दोनों के रास्ते अलग हो गए. अरविंद का मानना था कि सिस्टम में घुसे बगैर इसे साफ करना संभव नहीं है (मैं खुद इस सोच का बहुत बड़ा हिमायती हूं) और अन्ना की तरह किरण बेदी का मनना था कि राजनीति कीचड़ है, इसमें उतरे तो दाग लग जाएंगे. वह अन्ना की -आज्ञाकारी- शिष्या बनी रहीं. बाद में पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह भी अन्ना-किरण के साथ हो गए और आंदोलन के रास्ते लोकपाल की लड़ाई का दम भरा.

इधर अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी बना ली. किरण बेदी को भी ऑफर किया (ऐसी खबरें आई थीं) कि वह उनके साथ इस लड़ाई में शामिल हो जाएं. अरविंद, किरण को शीला दीक्षित के बरक्स मुख्यमंत्री पद का कैंडिडेट घोषित कर दिल्ली चुनाव में जाना चाहते थे. लेकिन किरण ने मना कर दिया. अरविंद ने मनीष सिसोदिया और अन्य साथियों के साथ यह लड़ाई लड़ी और राजनीति में धमाका करते हुए दिल्ली में सरकार बनाने की स्थिति में आ गए.

यही वो वक्त था जब किरण बेदी अरविंद केजरीवाल की सबसे बड़ी आलोचक बनकर उभरीं. बिन मांगी सलाह दे दी कि अरविंद को फलां पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए. फिर एक टीवी चैनल पर कहा कि अगर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के मैनडेट का आदर करते हुए सरकार नहीं बनाई तो केजरीवाल को पाप लगेगा. मुझे आश्चर्य हुआ कि सबसे ज्यादा सीटें दिल्ली में बीजेपी को आई थी, संविधान-नियम-कानून (जिसकी दुहाई किरण बेदी सबसे ज्यादा देती हैं) के मुताबिक बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए थी, लेकिन बीजेपी पर किरण खामोश थीं. उसे सेफ पैसेज देते हुए वह केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को -पाप लगा- रही थीं. किरण अगर objective थीं, तो वह ये क्यों नहीं कह पाईं कि बीजेपी जनता के मैनडेट को ना मानकर और सरकार ना बनाकर गलती कर रही है और इससे बीजेपी को पाप लगेगा???!!!

फिर एक और ड्रामा हुआ. दिल्ली चुनाव के नतीजों को देखकर सरकार ने दबाव में जनलोकपाल बिल पास कर दिया. लेकिन अरविंद केजरीवाल इससे सहमत नहीं थे क्योंकि सीबीआई को स्वतंत्र करने और बहुत सी बातों की सरकार ने नहीं माना था. अरविंद ने इसे जोकपाल कहा लेकिन किरण बेदी फिर अड़ गईं. कहा कि जो जोकपाल बता रहे हैं, उन्होंने बिल को पढ़ा ही नहीं है. हैरत तो तब हुई जब अन्ना हजारे ने भी उस -सरकारी बिल- को अपना समर्थन देकर फटाफट अनशन खत्म कर दिया. अरविंद ने कहा कि अन्ना को बिल की बारीकियां कोई नहीं बता रहा और उन्हें मिसगाइड किया जा रहा है. अरविंद का इशारा साधे तौर पर किरण बेदी-जनरल सिंह और पत्रकार संतोष भारतीय की तरफ था.

उस वक्त मीडिया में इस बात की भी खबर आई कि किरण बेदी और जनरल सिंह बीजेपी के हाथों में खेल रहे हैं. बीजेपी से इनकी sympathy है और देर-सबेर ये बीजेपी में शामिल होंगे. किरण बेदी और जनरल सिंह ने मिलकर अन्ना हजारे के मंच की पवित्रता खराब की है (अन्ना हजारे किसी भी पार्टी-पक्ष के लोगों को अपना मंच साझा नहीं करने देते). लेकिन किरण बेदी ने इन सब बातों का खंडन किया और कहा कि उनका किसी राजनीतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं हैं.

पर आज सुबह-सुबह जब ये खबर आई कि किरण बेदी ने सार्वजनिक घोषणा कर दी है कि उनका वोट नरेंद्र मोदी को जाएगा, तो उनके चेहरे पर पड़ा नकाब हट गया. ये खबर सच निकली कि वह बीजेपी से sympathy रखती हैं. जनरल वीके सिंह के बारे में भी कल Times Now के News Hour डिबेट में अर्णव गोस्वामी ने कहा कि उन्हें पक्की खबर है (unofficially) कि जनरल वीके सिंह बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं और बस ये तय होना है कि वह कहां से चुनाव लड़ेंगे, हालांकि अभी इस खबर को वह अपने चैनल पर नहीं दिखा रहे हैं. अर्णव ने ये बात एक बीजेपी प्रवक्त को बातचीत के लहजे में कही.

तो किरण बेदी के बयान (टि्वटर पर) और जनरल सिंह के बारे में अर्णव के खुलासे से सबकुछ पानी की तरह साफ-साफ दिख रहा है. इस आशंका से अब एकदम इनकार नहीं किया जा सकता कि रालेगन सिद्धि में अन्ना के पिछले अनशन के दौरान किरण-जनरल सिंह ने अन्ना के मंच का -अपने हित- में इस्तेमाल किया. वे बार-बार ये बात कहते रहे कि वो ना किसी पार्टी में शामिल होंगे और ना ही उनकी किसी राजनीतिक पार्टी से sympathy है. वे बस अन्ना के साथ गैर-राजनीतिक आंदोलन कर रहे हैं. लेकिन वे झूठ बोलते रहे. किरण ने तो ऐलान कर दिया. अब इंतजार है कि जनरल वीके सिंह आगे क्या करते हैं, बीजेपी में शामिल होते हैं या नहीं. और इस पूरे प्रकरण में पूरी तरह से ठगे गए अन्ना हजारे. उन्हें क्या पता नहीं था कि किरण बेदी और जनरल सिंह आगे क्या करने वाले हैं, एक राजनीतिक पार्टी से उनकी sympathy है. अब अन्ना क्या कहेंगे, क्या करेंगे?? क्या नरेंद्र मोदी के पाले में जाने पर किरण बेदी पर कोई सार्वजनिक बयान देंगे. देखते हैं.

मुझे तो लगता है कि इस पूरे प्रकरण में अन्ना के असली चेले अरविंद केजरीवाल ही निकले. जमी-जमाई राजनीतिक पार्टियों में जाने की बजाय -अलग राजनीति- की शुरुआत के लिए उन्होंन नई पार्टी भी बनाई और जनता में उसकी पैठ स्थापित करके ईमानदारी से राजनीति करने-चुनाव लड़ने की परंपरा भी शुरु की. लेकिन किरण बेदी ने उस पार्टी, बीजेपी, से अपनी हमदर्दी दिखाई जिसके खिलाफ कभी वह रामलीला मैदान में अन्ना के साथ खड़ी थीं. आज किरण उस बीजेपी के साथ खड़ी हैं, जिस पर देश में साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगता है.

मैं ये नहीं समझ पाया कि बीजेपी और नरेंद्र मोदी को वोट देने की बात करने से पहले क्या किरण बेदी को जाकिया जाफरी और दंगों में मारे गए हजारों मासूमों (हिंदू और मुसलमान दोनों) की याद नहीं आई??!! किरण तो खुद आला पुलिस अफसर रही हैं तो क्या वे नहीं जानतीं कि किसी राज्य सरकार के मुखिया के संरक्षण के बिना उनके राज्य में इतने बड़े दंगो इतने समय तक हो सकते हैं, चल सकते हैं???!! फिर वो गुजरात के दंगे हों, दिल्ली के सिख विरोधी दंगे या फिर मुजफ्फरनगर के दंगे. क्या वो ये नहीं जानतीं कि अगर पुलिस और राज्य सरकार चाह ले तो किसी भी तरह की साम्प्रदायिक हिंसा पर महज चंद घंटों में काबू पाया जा सकता है???!!! मुझे घोर निराशा और दुख है कि किरण बेदी जैसी साहसी, निर्भीक और बेदाग पूर्व पुलिस अफसर ने अपना वोट नरेंद्र मोदी को दिया है. आज फिर एक तस्वीर उसी तरह टूटी है, जैसी उस दिन टूटी थी, जिस दिन लता मंगेश्कर ने नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने की बात कही थी. लता ताई को तो फिर भी benefit of doubt दिया जा सकता है क्योंकि वह कलाकार हैं, शायद राजनीति-तिकड़मबाजी-प्रशासन को ज्यादा ना समझती हों. लेकिन किरण जी, आप तो सब जानती है, पूरे कैरियर में इन सब चीजों को फेस करती आई हैं. इन चीजों को करीब से देखा है. फिर कैसे आपने ये फैसला लिया??!!!

ये ठीक है कि नरेंद्र मोदी के हजारों समर्थकों की तरह और भारत का नागरिक होने के नाते आपको किसी भी पार्टी को वोट देने और उनके पक्ष में खड़े होने की आजादी है. सबको है. लेकिन यहां बात नैतिकता की हो रही है. हमें नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की उस बात का मर्म समझना होगा, जब उन्होंने ये कहा था कि बात नरेंद्र मोदी के समर्थन या उनके विरोध की नहीं है. बात इंसाफ की है. एक majority community का होने के नाते ये मेरा दायित्व और कर्तव्य है कि मैं minority community के हक-हुकूक और उन्हें दिए जाने वाले इंसाफ की बात करें. किरण बेदी महाभारत के धृतराष्ट्र की तरह नेत्रहीन भी नहीं हैं और ना ही किसी भीष्म प्रतिज्ञा से बंधी हैं. फिर भी ये नहीं समझ पाया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया??!! अब वह बेशक नरेंद्र मोदी के गुण गाएं लेकिन मेरी राय में इस घटना से उनकी सार्वजनिक छवि और क्रेडिबिलिटी को जबरदस्त धक्का लगा है और कोई भी संवेदनशील नागरिक अब उनकी बात को सीरियसली नहीं लेगा. आइरन लेडी पिघल चुकी हैं. वैसी भी नरेंद्र मोदी को सरदार पटेल की मूर्ति बनाने के लिए बहुत बड़ी तादाद में लोहा चाहिए होगा. इतिहास में ये वाकया भी दर्ज हुआ. फैसला हमारी भावी पीढ़ी करेगी. जय हो.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

अखिलेश यादव ने जागरण वालों को उनकी औकात दिखा दी

यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दैनिक जागरण वालों को उनकी असली औकात दिखा दी. अखिलेश ने कहा कि दैनिक जागरण के मालिक राज्यसभा के लिए दुबारा टिकट मांग रहे थे. नहीं दिया तो अब सरकार के खिलाफ खबरें छाप रहे हैं और नकारात्मक अभियान चला रहे हैं. इन दैनिक जागरण वालों के घर के लोग जुआ खेलते हुए पकड़े गए थे और पुलिस के हाथों पिटे भी. यही कारण है कि ये लोग खुन्नस में कुछ भी छाप रहे हैं. लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा ने इस प्रकरण पर अपने फेसबुक वॉल पर यूं लिखा है…

Sanjay Sharma : शाबाश अखिलेश भाई ..आज आपने वो काम कर दिया जिसकी हिम्मत आज तक कोई नेता नहीं कर पाया ..आज मुख्यमंत्री ने कहा कि एक अखबार जिसके मालिक को राज्यसभा में भेजा था, इस बार भी टिकट मांग रहे थे… वो जुए में पकड़े गए… उनके घर वालों को पुलिस वालों ने पीटा… इस बार टिकट नहीं दिया तो गलत छाप रहे हैं… यही नहीं रुके मुख्यमंत्री… कहा कि एक पत्रकार को दिन भर हेलिकॉप्टर में घुमाया मगर खबर नहीं दिखाई क्योंकि उनकी मार्केटिंग टीम ने मना कर दिया… बोले कहो तो उन पत्रकारों के एसएमएस भी दिखा दूँ… फिर कहा- जुए में पकड़े लोग भी… उफ़ इतनी धुलाई तो कभी नहीं हुई मीडिया की.. सही कहा जब हमारे लोग ही ऐसे कर्म करेंगे तो यह तो होना ही था… अब शुरुआत हो गई है… आने वाले दिनों में कई लोगो के चेहरे बेनकाब होंगे… और जाकर चरण वन्दना करो…

मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित किया

: Orders reserved on Wage Board notifications : The Supreme Court on Thursday reserved orders on a batch of writ petitions challenging the constitutional validity of the notifications the government issued to set up the Justice Majithia Wage Board for journalists and non-journalists on a new pay structure and to direct the newspaper managements to implement its recommendations.

A Bench of Chief Justice P. Sathasivam and Justices Ranjan Gogoi and Shivakirti Singh reserved orders on petitions filed by ABP Ltd., Bennett Coleman and Co. Ltd., which publishes The Times of India and other newspapers and the Indian Newspaper Society after a marathon hearing from September last. The petitions challenged the Wage Board’s report submitted in December 2010 and the notification issued by the government in November 2011. (साभार- द हिंदू)

भाजपा की एक भी वेबसाइट हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध नहीं है

दिनांक: 10 जनवरी 2014
 
प्रति
श्री राजनाथसिंह जी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनता पार्टी

महोदय,

आप अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी में  व्यस्त हैं लेकिन इस देश के अधिकांश मतदाताओं की भाषा, जनजन की भाषा, भारतीय भाषाओं की घोर अनदेखी कर रहे हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यह युवा मतदाता अधिकांशत: ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है जो जीवन के हर कदम पर अंग्रेजी से पीडि़त है। जो आपसे जुड़ सकता है, शायद समर्थन भी दे सकता है लेकिन आपकी ओर से इसे जोड़ने का कोई गंभीर प्रयास ही नहीं है। इस बार आप प्रचार के लिए अधिकांशतः इलेक्ट्रॉनिक माध्यमो पर ही निर्भर होंगे लेकिन आपकी पार्टी की एक भी वेबसाइट हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध नहीं है।

आपको सर्वाधिक समर्थन हिंदीभाषी क्षेत्रों से ही मिलता है लेकिन आजादी के सड़सठ वर्षों में भी आप हिंदी को न तो राष्‍ट्रभाषा का दर्जा  दिला पाए न हीं राजभाषा के रूप में हो रही उसकी दुर्गति को ही रोक पाए। इस बार के आपके चुनावी घोषणा पत्र में भी राष्‍ट्रभाषा के मुद्‍दे को कोई स्थान मिलेगा ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है। भारतीय भाषाओं की  ऐसी घोर उपेक्षा करके आप जीतने की आशा मत रखिए क्योंकि हम अंग्रेजी की अतिशयता से प्रतिकूल रूप से प्रभावित सभी  भारतीय भाषाओं के संरक्षण की दिशा में  भाषा अभियान के नाम से मतदाताओं को इस विषय में जागरुक करने का सघन अभियान चला रहे हैं जो चुनाव तक निश्चित ही असर करेगा।
 
अत: यह आपके हित में है कि आप शीघ्रातिशीघ्र अपनी सभी वेबसाइट्‍स हिन्‍दी एवं अन्य भारतीय भाषाओ में भी बनाएं। अपनी पार्टी के हर सदस्य को  निर्देश दें कि वह अपने हस्ताक्षर एवं लोकव्यवहार हिन्दी या किसी भारतीय भाषा में ही करें। इससे आपको चुनाव में लाभ ही होगा। अंग्रजी न जानने वाले मतदाताओं को आपसे जुड़ने में आसानी होगी।
 
देश में २२ समृद्ध भाषाओं के होते हुए भी हम विदेशी भाषा का उपयोग करें, यह भारत की बागडोर सम्हालने का सपना देखने वाले दल को शोभा नहीं देता। किसी भी भारतीय को शोभा नहीं देता। आप अपने मतदाता की अपेक्षा को समझें, यह वक्त का तकाजा है।
 
भवदीय
तुषार कोठारी
201-बी, गोपाल कृष्ण भवन, प्लाट -98,
श्रीमद राजचंद्र मार्ग, तिलक रोड, घाटकोपर पूर्व, मुंबई -४०००७७.

मुजफ्फरनगर दंगों की लपटों की रौशनी में मनाया गया है सैफई महोत्सव

हमने रोम के शासक नीरो के बारे में सुना था कि रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था. कहानी कुछ इस तरह है कि राजमहल में पार्टी का आयोजन था, जिसमे रौशनी करने के लिए जेलों से कैदियों को निकाल कर उन्हें खंबों पर लटकाकर उनमें आग लगा दी गयी थी. लोग आग की लपटों में जल रहे थे, चीख रहे थे और राजमहल के लोग उसी आग की रौशनी में जश्न मना रहे थे. अखिलेश यादव का ‘सैफई महोत्सव’ भी ऐसा ही जश्न है, जो मुजफ्फरनगर दंगों की लपटों की रौशनी में मनाया गया है.

जी-भर कर नाच-गाना हुआ, सरकारी खजाने से करोड़ों रूपये इस नाच-गाने पर उड़ाये गये, और करोड़ों रूपये बख्शीस में दिए गये. जैसे कोई बदचलन औलाद अपने बाप की दौलत को बरबाद करती है, वैसे ही नाच-गाने के शौक़ीन अखिलेश यादव और उनके मंत्री जनता के पैसे को अपने बाप का माल समझकर उड़ा रहे हैं. अफ़सोस कि जनता विरोध नहीं करती, और इसका कारण यही है कि तमाम सामाजिक आन्दोलन भी जनता को जागरूक नहीं कर पा रहे हैं. जनता सिर्फ वोट के समय जागती है और अगले चुनाव तक फिर सो जाती है. इस दौरान भी वह या तो जाति के नाम पर जागती है या धर्म के नाम पर; और यहाँ भी वह ऐसा जागती है कि एक-दूसरे के खून की प्यासी हो जाती है और इस जागरण में शासकों पर जरा भी आंच नहीं आती. लेकिन यह जाग भी उसकी अपनी नहीं है, शासक वर्ग की है. इसलिए शासक वर्ग वह अच्छी तरह जानता है कि जनता को कब जगाना है और कब सुलाना है. और उसे जगाने और सुलाने के लिए उसके पास जाति और धर्म ही सबसे बड़े अस्त्र हैं.

पूरे उत्तर प्रदेश में कहीं भी विकास नहीं हो रहा है. मैं इस एक साल में बीसियो जिलों में गया हूँ, लखनऊ, इलाहबाद, गोरखपुर और बनारस जैसे नगरों में मैं पैदल और रिक्शों से घूमा हूँ, कहीं भी विकास दिखायी नहीं दिया. सड़कें इतनी खराब कि पैदल चलने में भी दिक्कत हो रही थी. जब बड़े शहरों का यह हाल है, तो छोटे शहरों का हाल कितना खस्ता होगा? मेरे अपने शहर में सड़कों में इतने गड्ढे हैं कि रिक्शे तक पलट जाते हैं. पर अखिलेश और उनके मंत्रियों को तो उन सड़कों पर चलना नहीं है, फिर क्यों बनवाएं वो सड़कें? उन्हें तो हवा में चलना है. आम आदमी पार्टी ने भले ही राजनीति को आम आदमी की सेवा का नाम दिया हो, पर अपने आप को आम आदमी से ऊपर मानने वाले उत्तर प्रदेश के मदमाते मंत्रियों पर इसका कुछ भी असर पड़ने वाला नहीं है. वे मोटी चमड़ी वाले इतने विशिष्ट श्रेणी के लोग हैं कि सरकारी खजाने से उनकी सुख-सुविधाओं और निजी यात्राओं पर एक वर्ष में लगभग एक हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का खर्च होता है. क्या इसे विशिष्ट लोगों से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे राजनीति को बदलेंगे?

क्या सैफई महोत्सव मनाने वाले अखिलेश यादव और जनता के पैसे से पांच देशों में सैर-सपाटा करने के लिए विदेश जाने वाले मंत्रियों और विधायकों के चेहरों पर मुजफ्फरनगर दंगों में मारे गये बेकसूरों, टेंटों में ठंड से मरने वाले मासूम बच्चों और विस्थापितों का कोई रंजोगम दिखायी देता है? क्या दर्द की हल्की सी भी कोई शिकन है आज़म खां के माथे पर? अगर होती तो पूरे साल मातम मनाते और सारे महोत्सव और सैर-सपाटे स्थगित कर देते. पर ये तो नीरो हैं, मौतों पर जश्न मनाने का हक बनता ही है. विदेश यात्रा का औचित्य साबित करने वाला तर्क तो देखिये, कहा जा रहा है कि इस यात्रा का उद्देश्य, (जिस पर कम से कम 50 लाख रुपया रोजाना खर्च आयेगा,) दूसरे देशों में यह जाकर देखना है कि वहां लोकतान्त्रिक संस्थाएं किस तरह काम करती हैं? कुछ तो शर्म करो अखिलेश यादव ! जो आपके मंत्री अपने जिलों में लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, जो अपनी तानाशाही के आगे किसी नियम-कानून को नहीं मानते, जिनके लिए उनका हुक्म ही लोकतंत्र है, वे दूसरे देशों में जाकर लोकतंत्र सीखेंगे? किसे बेवकूफ बना रहे हैं आप? इस विदेश-यात्रा में वे क्या करने गये हैं यह अखिलेश जी आप अच्छी तरह जानते हैं. पर इस सैर-सपाटे को स्टडीज-टूर का नाम तो मत दीजिये.

कबीर ने ऐसे ही लोगों के लिए कहा है—‘सब मदमाते कोई न जाग. ताथे संग ही चोर घर मुंसन लाग,’

लेखक कंवल भारती जाने माने दलित चिंतक और साहित्यकार हैं.

मुजफ्फरनगर-मातम, सैफई-डांस… हमें तो जाना है, उत्सव मनाना है…

मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में रह रहे लोग जब सर्दियों में ठिठुर रहे थे तो समाजवादी पार्टी के पुरोधा मुलायम सिंह यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व सत्ताधारी दल के तमाम नेता सैफई में डांस क्यों देख रहे थे? यह सवाल चारों तरफ गूंज रहा है। मीडिया के लोग इसे और तूल दे रहे हैं। साफ लग रहा है कि किसी लेन-देन में कोई बात रह गई है, इसीलिए अखिलेश के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं।

मीडिया के यही संवेदनशील लोग किश्तवाड़ की हिंसा पर चुप रहते हैं, जहां हाल ही में हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया था। चलिए हम बांग्लादेश में हिंदुओं के मारे जाने की ताजा घटनाओं की बात छोड़ भी दें और पाकिस्तान में लगातार हिंदुओं के मारे जाने की बात पर मौन रह लें, लेकिन किश्तवाड़ की घटना तो भारतवर्ष की है, अभी हाल ही की घटना है। वहां के हिंदुओं को इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने मारा, घर फूंके, सम्पत्तियां लूटीं और यहां तक कि सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें दौड़ा दौड़ा कर मारा गया। जिन्हें मारा गया उनके लिए या जिन्हें बर्बाद किया गया उनके लिए वो मीडिया वाले कहां थे जो आज सैफई पर गाना गा रहे हैं?

देश के सारे नेता और सारा मीडिया एक ही दुश्चरित्रता का शिकार है। मारे जाने वाले लोग किसी भी समुदाय के हों, उनके साथ संवेदनशीलता के साथ पेश आना चाहिए। लेकिन यह कौन सी मानवीयता है कि मुसलमान मारा जाए तो समवेत रुदालियां हों और हिंदू या सिख या अन्य समुदाय के लोग मारे जाएं तो मीडिया भी और नेता भी मिल कर चुप रहने का उत्सव मनाएं! मुजफ्फरनगर और गुजरात पर बोलियों के गुच्छे और किश्तवाड़ और गोधरा पर मौन साध लेते हैं लुच्चे! ऐसी भ्रष्ट और दो कौड़ी की मानवीय समझ और संवेदना वाले मीडिया के खिलाफ सड़कछाप पिटाई आंदोलन चलाए जाने की अनिवार्यता है। वह समय अब आ गया है।

खैर, मीडिया द्वारा देश-समाज में बनाए जा रहे बेजा माहौल के कारण शब्द-भाव तीखे होते जाएं उससे फिलहाल बचने के लिए कविता की शैली में शब्दों का सहारा लेते हैं… किसी भी दिन सब देखेंगे तुम्हारा चेहरा, जिस पर उत्सव के दिन वाली उदासी का विवरण लिखा मिलेगा / उत्सव के आतंक में गांव का गांव पतझड़ के पेड़ जैसा दरिद्र और निस्पृह हो गया है / दिल्ली कहां है, वहां है जहां उत्सव है / वहीं राष्ट्रपति है पर राष्ट्र कहां है? वहीं संसद है पर संविधान कहां है? लखनऊ कहां है? सैफई जहां है, उत्सव वहीं है, सत्ता वहीं हैं / खेतों पर पड़ी है दुख की लम्बी छाया, अमानुषिक सत्ता व्यवस्था के कुत्सित आकार में सिमटा जा रहा है राष्ट्र / अब बस बची-खुची इच्छाओं-आकांक्षाओं का उत्सव है / कौन से उत्सव की बातें करते हो तुम सब? कौन सा उत्सव है इन दिनों? इस स्याह अंधेरे देश और प्रदेश की राजधानी में? खुली आंखों और खुले हृदय से देखो मित्र! तभी नजर आएगा हिंसा के बरक्स उत्सव का वीरान दृश्य और मुजफ्फरनगर और किश्तवाड़ की चीखों पर किश्तों में मनाए जा रहे मनोरंजन का हृदयहीन समय / तभी महसूस करोगे हास विलास और उत्सव उल्लास के चकाचौंधी मंच के ठीक पीछे बिखरा हुआ जन-विश्वास…

धूमिल ने भी क्या खूब लिखा है। जैसे आज के लिए ही लिखा हो। पर उस आत्मा से क्षमायाचना के साथ कुछ पंक्तियां जोड़ देता हूं… हर तरफ धुआं है, हर तरफ कुहासा है, जो दांतों और दलदलों का दलाल है, वही देशभक्त बचा है / अंधकार में सुरक्षित दुबकने का नाम तटस्थता और धर्मनिरपेक्षता है / यहां इस नाम पर जो भोला चेहरा दिखता है उसका चेहरा सबसे ज्यादा लहू से सना है / जिसके पास थाली है वह भी खाली है, हर भूखा आदमी उस तटस्थता के लिए सबसे भद्दी गाली है / हर तरफ कुआं है, हर तरफ खाई है / यहां सिर्फ वही आदमी देश के करीब है जो या तो मूर्ख है या फिर गरीब है…

तो दोस्तो! सवाल बहुत ज्यादा हैं। जवाब बहुत कम हैं। हम उडऩा तो चाहते हैं लेकिन हमारे पंख नुचे हुए हैं। …और जो उड़ रहे हैं उनके पंख खून के कीचड़ में सने हुए हैं। वे अभी अभी हुए खून-खच्चर के बाद पड़े सुनसान में भी मंच से भाषण दे रहे हैं। जैसा कि उनका काम ही है परम्परा से भाषण देना। लेकिन फिर भी उन्हें अपनी ही आवाज अजनबी नहीं लगती। आंखें हों तो चेहरा दिखाई दे। कान हो तो चीखें सुनाई दे। सवाल बहुत ज्यादा हैं। जवाब बहुत कम हैं। जिंदा सवालों पर बात करने वाला कोई नहीं मिलता जिंदा। मिलता भी है तो कोई-कोई ही आखिरी सांसें लेता हुआ। इम्तहान बड़ा है मनुष्य होने का। लेकिन हमें इससे क्या लेना-देना। हमें तो जाना है, उत्सव मनाना है…

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार हैं.

केजरीवाल कूटकर टीआरपी दे रहे चैनलों को

Vikas Mishra : जय हो अरविंद केजरीवाल की…। ये संपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ से जाना चाहिए। क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने कूटकर टीआरपी दी है। जिसने जब जब केजरीवाल दिखाया, उसके चैनल में टीआरपी की बारिश हो गई। मन से बनाया तो भी दिया, बेमन से बनाया तो भी दिया। प्रभावित होकर बनाया तो भी दिया, गरियाते हुए बनाया तो भी दिया। न्यूज रूम में भी अलग अलग माहौल है।

मोदी समर्थक जी भर भरकर गालियां दे रहे हैं केजरीवाल को। कांग्रेस का दलाल बता रहे हैं। कुछ लोगों पर केजरीवाल का रंग चढ़ा है, वो केजरीवाल को क्रांतिदूत मानने लगे हैं। हर न्यूजरूम में खेमा है। एडिटोरियल के लोगों का खेमा है, वीडियो एडिटर्स का खेमा है। कोई मोदी समर्थक तो कोई केजरीवाल समर्थक..।

ऑफिस में अब गॉसिप्स कम हो गई है, 2014 में मोदी का क्या होगा, केजरीवाल कितना असर दिखा पाएंगे, राहुल बाबा का क्या होगा… इसी पर बातें होती हैं। न्यूजरूम से लेकर नंदू चाय वाले की दुकान तक फिल्मसिटी में माहौल जरा पॉलिटिकल हो चला है। मोदी और केजरीवाल की रेस में ये बता दूं कि दोनों जमकर टीआरपी देते हैं। इस रेस में राहुल गांधी दूर दूर तक कहीं नहीं हैं।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से. भड़ास4मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इस मेल आईडी पर मेल करें: bhadas4media@gmail.com

जब कोई पत्रकार राजनीति में जाता है तो उसका संतोष भारतीयकरण हो जाता है

Arvind K Singh :  आशुतोष की राजनीतिक पारी पर कुछ बात… राजनीतिक गर्द-गुबार में बहुत मौकों पर पत्रकार भी राजनेता बनने को उतावले हो जाते हैं… चंदूलाल चंद्राकर से लेकर एमजे अकबर तक तमाम लोग इसके उदाहरण रहे हैं… लेकिन राजनीति में उनका क्या हश्र हुआ है शायद उनको करीब से देखने वाले जानते हैं…

शायद पत्रकारिता में अपनी बातें कहने की जितनी गुंजाइश है वैसी राजनीति में नहीं है…. फिर भी राजनीति का भूत जब सिर पर सवार होता है तो हो ही जाता है…. लेकिन पत्रकारों के भीतर का इगो कभी उनको बेहतर राजनेता नहीं बना पाता….उसके लिए तो जोंक सा चरित्र होना चाहिए.. आशुतोषजी नयी पारी शुरू कर रहे हैं राजनीति की.. ऐसी पार्टी से जिसे अभी पार्टी बनना है.. फिर भी मेरी शुभकामनाएं कि वे पत्रकारिता के अपने अतीत को भुला कर एक अच्छे राजनेता बनें…

Sanjay Tiwari :  आंदोलन से उभरी राजनीति के आकर्षण में जब कोई पत्रकार राजनीति में जाता है तो उसका संतोष भारतीयकरण हो जाता है। न राजनीतिज्ञ बन पाता है और न ही पत्रकार रह जाता है।

Zafar Irshad : गरीब पत्रकारो की पूछ सिर्फ "आप पार्टी " में ही हो रही है…मनीष सिसोदिआ–शज़िआ इल्मी–राखी बिड़ला के बाद अब सीनियर पत्रकार आशुतोष…आखिर दूसरी पार्टियां क्यों नहीं सोच रही है, पत्रकारों के बारे में.?.क्या मैं भी इस जमात में शामिल हो जांऊ, 20 साल से पत्रकार हूँ, पढ़ा लिखा हूँ, 4 प्रोफेशनल डिग्री है, नेता जैसा दिखता भी हूँ, और सबसे बढ़ी खासियत दबे कुचले मुस्लिम समाज से हूँ, जिसके 10 नंबर अलग से मिलेंगे हमें…फिर एक ज्योतिषी ने भी कहा था कि तुम्हारे हाथ में राज योग लिखा है ज़फर…बस पास में पैसा नहीं हैं, क्या राय है आपकी सुबह से मन कुलबुला रहा है…

अरविंद कुमार सिंह, संजय तिवारी और जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से. भड़ास4मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इस मेल आईडी पर मेल करें: bhadas4media@gmail.com

टीआरपी के लिए चैनलों ने गढ़े फर्जी किस्से और दर्शकों को महीनों तक बनाया बेवकूफ बनाया

Sanjay Kumar : चलिए अपने दोस्तों को टीआरपी की एक कहानी सुनाता हूं….खली को लेकर कोहराम मचा था….हर चैनल में खली को लेकर रोज आधे घंटे का प्रोग्राम बनाने की चुनौती थी…क्योंकि महाबली खली की टीआरपी छप्पर फाड़कर आ रही थी…कोई चैनल ये बता रहा था कि खली एकबार में 24 अंडे खा जाता है…कोई चैनल ये बता रहा था…कि वो एक बार में चार मुर्गा चबा जाता है…किसी ने तो यहां तक चला दिया कि वो एकबार में पूरा बकरा खा जाता है…दूध-दही, पनीर आदि की बात तो छोड़ ही दें…

अब चूंकि खली विदेश में रहता था…तो किसी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया…और वो दिन भी आ गया…जब खली मुंबई एयरपोर्ट पहुंचे…एक तेज-तर्रार रिपोर्टर ने लगभग खली के मुंह में अपने चैनल का माइक घुसेड़ते हुए पूछा…महाबली खली…आप एकबार में कितने अंडे खाते हैं…बेचारे खली…थोड़ी देर इधर-उधर झांकते रहे…फिर मीडिया की फौज देखकर बोले…भाई मैं तो बचपन से ही शाकाहारी हूं…

खली की खबरें कुछ दिनों तक यूं ही चलती रही…और धीरे-धीरे खली टीवी के पर्दे से गायब हो गए…किसी चैनल की हिम्मत नहीं थी कि वो दर्शकों के सामने ये कबूल करे कि उन्होंने टीआरपी के लिए कैसे-कैसे किस्से गढ़े और उन्हें कई महीने तक बेवकूफ बनाया…!!!! (मुझे उम्मीद है कि मेरे कुछ संपादक इस रहस्योदघाटन के लिए हमें माफ करेंगे)

पत्रकार संजय कुमार के फेसबुक वॉल से. भड़ास4मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इस मेल आईडी पर मेल करें: bhadas4media@gmail.com

मोदी ने पटेल की मूर्ति लगाने का ठेका अमेरिकी कंपनी को दिया

Anil Singh : स्वदेशी मुखौटे में विदेशी जीभ! हमारे प्रातः स्मरणीय नरेंद्र मोदी जी गुजरात में सरदार पटेल की जो 'एकता की मूर्ति' लगा रहे हैं उसका ठेका अमेरिकी कंपनी टर्नर कंस्ट्रक्शन को दिया गया है। टर्नर को ही इस प्रोजेक्ट की एक-एक चीज़ – डिजाइन से लेकर टेंडर तक, पूरी करनी है जिसके लिए वह 61 करोड़ रुपए की कंसलटेंसी फीस अलग से ले रही है।

यह जानकारी Statue of Unity की आधिकारिक साइट पर दी गई है। सवाल उठता है कि क्या मोदी जी को ऐसा साधारण काम कर सकनेवाला समूचे भारत में कोई नहीं मिला? कहीं यह ऊपर से ओढे गए भारतीयता के चोंगे के असली सच की झलक तो नहीं!!! टर्नर कंस्ट्रक्शन पूरी तरह अमेरिकियों द्वारा चलाई जा रही शुद्ध अमेरिकी कंपनी है। इसमें कोई एनआरआई नहीं है।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से. भड़ास4मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इस मेल आईडी पर मेल करें: bhadas4media@gmail.com

नाच-गाने में व्यस्त रही यूपी सरकार, ठंड में कांपते रहे मुज़फ्फरनगर दंगा पीड़ित

सैफई। प्रदेश की समाजवादी सरकार के पसंदीदा कार्यक्रम सैफई महोत्सव का समापन रंगारंग तरीके से हुआ। बॉलीवुड के दबंग सलमान और डेढ़ इश्किया की बेगम पारा यानि माधुरी के ठुमकों ने सैफई का पारा चढ़ा दिया | इन दोनों का साथ दिया गलियों की रास-लीला वाले राम ने| इन फ़िल्मी कलाकारों के ठुमकों का मज़ा लेने के लिये सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ, प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनका पूरा कुनबा मौजूद था। महोत्सव में चमकती लाईटों और तेज़ संगीत के शोर में माधुरी अपने घाघरे को आगरे पहुंचा रही थीं। सलमान खान बीइंग ह्यूमन की टी शर्ट में अपनी दबंगई दिखा रहे थे। वहीं इस तड़क-भड़क से करीब 200 किलोमीटर की दूर मुजफ्फरनगर और शामली के राहत शिविरों के टेंट में कुछ ज़िंदगियाँ अपने जीवन को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही थी।

8 दिसंबर को महोत्सव का आखरी दिन था वहीं मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों के लिये इस जाड़े की सबसे ठंडी रात। पारा माइनस में जाने को बेक़रार था लेकिन जेठ की गर्मी सैफई में उतरने को तैयार बैठी थी| आज बॉलीवुड के चमकते सितारे मुलायम सिंह यादव की जन्म स्थली में उतरने वाले थे। मुम्बई से इन सितारों को लेकर उड़े 7 चार्टर्ड विमान सैफई की हवाई पट्टी पर जब उतरे तो नेताओं और सपाइयों के गले से मफलर और दुशाले अपने आप उतर गए। अब इसे मुम्बइया सितारों के जलवों की गर्मी कहा जाये या पांडाल को गर्म रखने को किये गए के विश्व स्तरीय इंतज़ाम को जिनमें जनता के वोटो से चुने गये प्रतिनिधि विराजमान थे। सलमान आये और हुड़ दबंग दबंग पर ऐसे नाचे कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज की सांसद अपने भावनाओं पर काबू न रख सकी और हलके-हलके सुरूर में झूमने लगी।

27 अगस्त को मुजफ्फरनगर के कवाल कसबे से उठी दंगो की आग अभी भी सियासत और राहत शिविरों के साथ मीडिया में तैर रही है। कुछ दिनों पहले तक राहत शिविरों से बच्चो के मरने की खबरें आती रहती थी। सरकार और अधिकारी इन ख़बरों के खंडन में जुटे रहते थे। बीते कुछ दिनों से सर्दी के सितम और सरकार के सैफई महोत्सव में व्यस्त हो जाने से इन ख़बरों में आग में घी का काम किया। समय के साथ मुजफ्फरनगर दंगो की चिंगारी जो कहीं दब गई थी फिर से धीरे-धीरे सुलगने लगी। आग भभकी सैफई महोत्सव में हो रहे रंगारंग कार्यक्रमों और उन कार्यकर्मो में शिरकत कर रहे नेताओं की मौजूदगी को लेकर। सपा के बड़े से छोटे नेता की गाड़ियों का रुख सैफई की तरफ घूम गया| सैफई की तरफ जाती गाड़ियों के रोकने का दुस्साहस कुछ टोल प्लाज़ा वालों ने किया तो उनको उनकी औकात बताने में भी सपाई पीछे नहीं रहे। मुजफ्फरनगर काण्ड को करीब 5 महीने बीत गये हैं, इस दौरान प्रदेश सरकार के मुखिया सिर्फ एक बार मुजफ्फरनगर के आधिकारिक दौरे पर गये| वहीँ, समाजवाद की नई परिभाषा गढ़ने वाले सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने तो दंगा पीड़ितों की तरफ नज़रें भी नहीं डालीं।

सैफई महोत्सव की तैयारियों के लिए प्रदेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव वहां 51 बार गये, तो उनके चाचा और सरकार में नंबर तीन की हैसियत वाले शिवपाल यादव ने 46 बार सैफई में अपनी आमद दर्ज कराई। लेकिन इन नेताओं के पास मुजफ्फरनगर पीड़ितों का हाल जानने का समय नहीं था। मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों को प्रदेश सरकार के मुखिया और जिम्मेदार मंत्रियों ने उनको अपने हाल पर छोड़ दिया। आज देश और प्रदेश की सियासत में मुजफ्फरनगर दंगो को लेकर तरह तरह की बातें चल रही है, लेकिन प्रदेश की सपा सरकार के मुखिया अपने गांव में बॉलीवुड सितारों को नचाने में मस्त है। सैफई महोत्सव के आयोजन पर करीब 250 करोड़ रुपयें खर्च का अनुमान लगाया जा रहा है जो जनता से वसूले टैक्स के पैसे से ही खर्च हुआ होगा। सैफई महोत्सव उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग में दर्ज न होने के बावजूद प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा महोत्सव माना जाता है। इस महोत्सव की छठा प्रदेश में सपा सरकार के काबिज रहने के दौरान ही दिखती है।

प्रदेश में लगने वाले आयुर्वेद झाँसी महोत्सव, वाराणसी में लगने वाले गंगा महोत्सव, लखनऊ में लगने वाले लखनऊ महोत्सव, सारनाथ और कुशीनगर में लगने वाले बुद्ध महोत्सव, वाराणसी और इलाहाबाद में लगने वाले वाटर स्पोर्ट्स फेस्टिवल के साथ आगरा में लगने वाले ताज़ महोत्सव की जानकारी कितने प्रदेशवासियों को होती है। लेकिन सैफई महोत्सव की धूम और प्रशासनिक धमक के साथ बड़े पुलिस अधिकारियों के बूटों की आवाज भी सुनाई पड़ती है। कहते हैं जहां सरकार बैठती है वहीँ प्रशासनिक अमला भी बैठता है| यही हुआ इस बार के सैफई महोत्सव में| सरकार बीते 14 दिनों से सैफई में गिरी रही| कलाकार और स्टार आते रहे ठुमके लगाते रहे| अधिकारी नेताओं के पैर में पड़े रहे और पूरा प्रदेश अपने हाल पर आंसू बहाता रहा।

हमने संवेदनहीन हो चुके नेताओं के कानों तक मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों की कराह पहुंचाने से अच्छा उस सलमान खान तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशीश की जो नर्म दिल हैं और अपने स्वयं सहायता समूह बीइंग ह्यूमन के माध्यम से गरीबो की मदद में आगे रहते है। सलमान खान शायद उन गरीबों की आवाज उन नेताओं के कानों तक पहुंचा दें जिन्होंने इस कड़कती ठण्ड में अपने कान मफलर और काबुली टोपियों से बंद कर लिए है।

लेखक से संपर्क shandilya9@gmail.com पर किया जा सकता है।

पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने आशुतोष की पत्रकारिता पर उठाए गंभीर सवाल

To Ashutosh ji, Boss, if it is really true and you are really going to join Aap after resigning from IBN7, then my well wishes. But there is a genuine question, you have been propogating aap and Arvind kejriwal from the very beginning on your channel, often going out of way, so will it not be considered as quid pro quo? Means blessings of aap in return of your open support to the party and kejriwal on your ex channel.

Any journalist can be supporters or sympathiser of any party, I do acknowledge, but in his or her personal capacity only. He or she is not expected to impose his or her personal leanings on channel, especially when he or she holds a top position in the channel, top enough to directly influence content of the channel. Is this a message to budding journalists of the country to do the same, while serving in their respective organizations?

To actively align with congress, bjp, sp, bsp or aap, so as to ensure their retirement benefits? I know you as a very very democratic and cheerful person, I know you as a person who is always ready to patiently listen to unpleasant questions about himself. Hope you would still be the genius of same characteristics and not mind these very genuine questions:) Again, my heartiest well wishes to you. Go and try to improve the muddy water of politics. God bless you always. But be ready for the burning questions, your desciples have been safely carrying to serve before you:)

उपरोक्त स्टेटस Abhishek Upadhyay ने फेसबुक पर अपने मित्रों के साथ साझा किया है. अभिषेक इन दिनों इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर हैं और कभी आशुतोष के अधीन आईबीएन7 में कार्यरत रहे.

चैनल न दिखाने पर तीन डीटीएच संचालकों को नोटिस

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उपभोक्ताओं को 24 अनिवार्य चैनल मुहैया नहीं कराने को लेकर तीन निजी डायरेक्ट टू होम संचालकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. मंत्रालय की ओर से तय नियमों के अनुसार सभी डीटीएच संचालकों के लिए यह जरूरी है कि वे अपने उपभोक्ताओं को 24 अनिवार्य चैनल मुहैया कराएं.

सूत्रों ने कहा कि मंत्रालय के संज्ञान में आया है कि कुछ डीटीएच संचालक सभी अनिवार्य चैनल नहीं दिखा रहे हैं. सूत्रों के अनुसार जिन संचालकों को नोटिस भेजा गया है उनमें से एक सिर्फ आठ निवार्य चैनल और दूसरा 17 चैनल मुहैया करा रहा है. तीसरी डीटीएच संचालक कंपनी 18 चैनल अपने उपभोक्ताओं को मुहैया करा रही है. मंत्रालय ने सभी डीटीएच संचालकों के लिए जिन 24 चैनलों को दिखाना अनिवार्य कर रखा है उनमें डीडी न्यूज, डीडी भारती, डीडी उर्दू तथा दूरदर्शन के कई दूसरे चैनल शामिल हैं.

टीआरपी सिस्टम को ट्रांसपैरेंट बनाने की दिशा में ऐतिहासिक फैसला

नई दिल्ली। सरकार ने टेलीविजन चैनलों की लोकप्रियता का सूचकांक मानी जाने वाली टीआरपी रेटिंग पर नकेल कसते हुए गुरुवार को इसके लिए व्यापक दिशा निर्देशों को मंजूरी दे दी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में टीआरपी दिशा निर्देशों को मंजूरी दी गई। सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने संवाददाताओं को बताया कि इस प्रस्ताव का मकसद टीआरपी प्रक्रिया को अधिक से अधिक पारदर्शी बनाना है।

उन्होंने बताया कि सीधे विदेशी निवेश वाली कंपनियों को आज की तारीख तक टीआरपी प्रक्रिया से अलग रखा गया है और मौजूद टीआरपी एजेंसियों को नए दिशा निर्देशों के पालन के लिए 30 दिन का समय दिया गया है। तिवारी ने बताया कि टीआरपी दिशा-निर्देशों में टीआरपी एजेंसी के पंजीकरण से लेकर उनकी सेवा शर्तो और क्रॉस होल्डिंग तक के मामले शामिल किए गए हैं। उन्होंने बताया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस मुद्दे पर दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की राय मांगी थी और सितंबर 2013 में प्राधिकरण ने अपनी सिफारिशें दीं। बाद में अंतर मंत्रालयी समिति में विचार-विमर्श के बाद दिशा निर्देशों को अंतिम रूप दिया गया।
 

सहारा समूह बाइस हजार करोड़ रुपये का स्रोत बताए अन्यथा सीबीआई जांच के लिए तैयार रहे : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को चेतावनी दी कि निवेशकों को लौटाये गये 22,885 करोड़ रुपए का स्रोत बताये या फिर सीबीआई और कंपनी रजिस्ट्रार से जांच के लिये तैयार रहे। सहारा समूह ने दावा किया है कि उसने निवेशकों को 22,885 करोड़ रुपये लौटा दिये हैं।

न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की खंडपीठ ने सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय और समूह द्वारा लौटाई गयी राशि का स्रोत बताने से इंकार करने पर उन्हें स्पष्ट संदेश देते हुये कहा कि उसके निर्देशों का उल्लंघन करने के मामले में कार्रवाई के लिये न्यायालय ‘असहाय’ नहीं है। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि सुब्रत राय के विदेश जाने पर लगा प्रतिबंध बरकरार रहेगा।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘यह मत सोचिए कि न्यायालय असहाय है। हम सीबीआई और कंपनी रजिस्ट्रार से आपके खिलाफ जांच के लिये कह सकते हैं। हम असहाय नहीं हैं। यदि आप नहीं बतायेंगे तो हम धन के स्रोत का पता लगा लेंगे। हम जांच एजेन्सियों से इसका पता लगाने के लिये कहेंगे।’ न्यायालय को जब पता चला कि सहारा ने सेबी को पत्र लिख कर कहा है कि धन के स्रोत ‘महत्वपूर्ण नहीं’ है तो उन्होंने इससे असहमति व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि कंपनी और राय का आचरण ‘निन्दनीय’ है।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘आपकी कंपनी में किसी का यह कहने का साहस हो गया कि स्रोत महत्वपूर्ण नहीं है। यदि आपने धन लौटा दिया है तो आपके पास इस स्रोत का रिकार्ड होगा जहां से आपने धन प्राप्त किया। हम आपसे यह नहीं कह सकते कि जवाब कितना निन्दनीय था।’ न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘हम आपके प्रति नरमी बरत रहे थे लेकिन आपने इतना बेरूखी भरा जवाब दिया तो क्या किया जाये।’

न्यायालय ने कहा कि यह हजारों करोड़ रुपए से जुड़ा मामला है लेकिन समझ में नहीं आता कि पंजीकृत कंपनियां इसका लेखा जोखा क्यों नहीं रखती हैं। न्यायाधीशों ने कहा, ‘यदि आपने लेखा जोखा रखा है तो आप दस मिनट में ही धन के स्रोत का पता लगा सकते हैं। हमने आपके प्रति अत्यधिक नरमी बरती है लेकिन पिछले दो साल में आपने कभी भी सच्चाई पेश नहीं की। आपको धन के बारे में बताना ही होगा। यदि आपने बड़ी भूल की है तो हम आपकी मदद नहीं कर सकते।’ इस मामले की सुनवाई शुरू होते ही राय के वकील ने कहा कि 20 हजार करोड़ रूपए की संपत्ति के मालिकाना हक से संबंधित दस्तावेज सेबी को सौंपे जा चुके हैं और अब उन्हें देश से बाहर जाने की इजाजत दी जानी चाहिए।

लेकिन बाजार नियामक सेबी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविन्द दातार ने इन दस्तावेज और कुछ संपत्यिों की कीमतों पर सवाल उठाते हुये कहा कि पिछले दस साल में इनकी कीमत में 8500 फीसदी का इजाफा दिखाया गया है। इस पर राय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी ए सुन्दरम ने कहा, ‘मैं इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता हूं और मै इससे ज्यादा कुछ नहीं दे सकता।’ इस पर न्यायाधीशों ने सहारा समूह और राय के आचरण पर अप्रसन्नता व्यक्त करते हुये उन्हें आड़े हाथ लिया। न्यायालय ने कपंनी को धन के स्रोत सहित सेबी द्वारा मांगी गयी सारी सूचना 23 जनवरी तक मुहैया कराने का निर्देश देते हुये इस मामले की सुनवाई 28 जनवरी के लिये स्थगित कर दी।

सुब्रत राय ने न्यायालय से उनकी अर्जी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार का अनुरोध करते हुये कहा है कि उन्हें ब्रिटेन और अमेरिका जाने की अनुमति दी जाये। सेबी ने राय, उनकी दो फर्म सहारा इंडिया रियल इस्टेट कार्प लि. और सहारा इंडिया हाउसिंग इंवेस्टमेन्ट कार्प लि तथा उनके निदेशकों के खिलाफ तीन अवमानना याचिकायें दायर कर रखी हैं।

मुलायम के समधी समेत छः पत्रकार बने सूचना आयुक्त

आखिरकार, लम्बी जद्दोजहद के बाद यूपी को नये सूचना आयुक्त मिल ही गये। राज्य सूचना आयुक्तों के सात पद पिछले दो वर्षो से भी अधिक समय से और एक पद करीब डेढ़ वर्ष से रिक्त था। इसका ख़ामियाज़ा जनसूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत जानकारी मांगने वाले भुगत रहे थे। उनकी अपील नहीं सुनी जा रहीं थीं। यह देरी क्यों हो रही थी, इसके कई कारण गिनाये जा सकते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने कोई पेंच नहीं चला और उसके सख्त रवैये के बाद उत्तर प्रदेश की नये सूचना आयुक्तों की मुराद पूरी हो गई। नव वर्ष के पहले हफ्ते में ही राज्य की जनता को आठों सूचना आयुक्त मिल गये।

    
यह खबर राज्य के आम नागरिकों के साथ-साथ पत्रकारिता जगत के लोगों के लिये भी खास है। बसपा सरकार के उलट सपा सरकार ने राज्य सूचना आयुक्त के अधिकांश पदों पर पत्रकारिता से जुड़े लोगों को नियुक्त किया है। जिन पत्रकारों को यह सम्मान मिला उसमें दैनिक जागरण लखनऊ के मुख्य संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के पुत्र स्वदेश कुमार, दैनिक जागरण दिल्ली में कार्यरत राजकेश्वर सिंह, टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार और अब मुलायम सिंह यादव के समधी अरविंद सिंह बिष्ट, चर्चित राजनीतिक पत्रिका के पत्रकार डा0 विजय शर्मा, उर्दू पत्रकारिता से संबद्ध अब्बास रिजवी और एनडीटीवी के गजेन्द्र यादव शामिल हैं। गजेन्द्र यादव ने विधान सभा चुनाव के समय अखिलेश यादव को एनडीटीवी पर काफी सुर्खिंया दिलाईं थी। चर्चा है कि अखिलेश की ताजपोशी के बाद राज्य सूचना आयुक्त बनने के चक्कर में वह काफी पहले ही अपनी नौकरी छोड़ चुके थे।
    
राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों में देरी की बात की जाये तो इस मामले में राज भवन और सरकार के बीच कई प्रयासों के बाद बेहद मुश्किल से सहमति बन पायी। अखिलेश यादव ने सीएम की कुर्सी पर बैठने के बाद 23 अगस्त 2012 को पहली बार राज्य सूचना आयुक्त के पद ले लिये आठ नामों को संस्तुति के लिये गर्वनर के पास भेजा था। इसमें एक ईसाई, दो अन्य अल्पसंख्यक, एक रिटायर्ड नौकरशाह, एक अधिवक्ता और तीन पत्रकारों के नाम शामिल थे। यह पत्र एक माह तक राजनभवन में पड़ा रहा। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश सामने आया तो राजभवन से संस्तुति की फाइल सरकार को यह कहते हुए वापस लौटा दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशानुसार नाम तय करके भेजे जायें। सरकार ने फिर से प्रक्रिया शुरू की। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सूचना आयुक्त के पद के लिये विज्ञापन निकाला गया। दो हजार रूपये की फीस आवेदन शुल्क के साथ वसूली गई। करीब छह सौ आवेदन पत्र आये, जिनकी जांच तीन सदस्यीय चयन समिति ने की। आठ नाम तय हुए। समिति के अध्यक्ष मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सदस्य नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या एवं विधान परिषद में नेता सत्तापक्ष तथर स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन थे। राजभवन को इस बार भी चयन समिति पूरी तरह से संतुष्ट नहीं कर पाई। राजभवन ने यह कहते हुए सरकार को फाइल लौटा दी कि चुने गये नामों की योग्यता और विशेषता भी उनके नाम के आगे दर्शायी जाये। राज्य सरकार ने ऐसा ही किया। इसके बाद ही गर्वनर ने संस्तुति प्रदान की। मुख्य सूचना आयुक्त ने सात जनवरी 2014 को सभी नवनियुक्त सूचना आयुक्तों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।

उधर, आईजी स्तर के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच में चले गये। वह भी सूचना आयुक्त बनने की दौड़ में थे। उन्हें चयन प्रक्रिया से एतराज था। खैर, राज्य को लम्बी जद्दोजहद के बाद नये सूचना आयुक्त नसीब हुए हैं। पहली बार छह पत्रकार राज्य सूचना आयुक्त के पद पर विराजमान हुये हैं। अलीगढ़ विवि के पूर्व छात्र नेता और सपा यूथ से जुड़े रहे हाफिज उस्मान और बसपा शासनकाल में स्थायी अधिवक्ता के पद पर तैनात रहे पारसनाथ गुप्ता को स्वामी प्रसाद मौर्या का करीबी होने का फायदा मिला है। उत्तर प्रदेश में एक पद मुख्य सूचना आयुक्त और दस पद सूचना आयुक्त के हैं। मुख्य सूचना आयुक्त रणधीर सिंह पंकज और एक अन्य सूचना आयुक्त ज्ञान प्रकाश मौर्या इसी वर्ष जून के अंत में अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। वहीं श्रीमती खदीजातुल कुबरा जून 2016 में रिटायर होंगी। इन तीनों की नियुक्ति बसपा शासनकाल में हुई थी।

संजय सक्सेना

लखनऊ

जागरण वालों के खिलाफ मानवाधिकार आयोग को भेजे पत्र में पत्रकार श्रीकांत ने क्या लिखा, पढ़ें

दैनिक जागरण, नोएडा के चीफ सब एडिटर श्रीकांत सिंह ने हिम्मत का काम किया है. उन्होंने अपने शोषण, उत्पीड़न, प्रताड़ना से आजिज आकर आज मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा है. दैनिक जागरण प्रबंधन के शोषण, उत्पीड़न और अत्याचार के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की शरण लेकर श्रीकांत ने एक मिसाल कायम की है और बहुत से पत्रकारों को रास्ता दिखाया है. पढ़िए वो पत्र जो आयोग को भेजा है…

अध्यक्ष

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

दिल्ली

महोदय,

मैं श्रीकांत सिंह दैनिक जागरण के नोएडा स्थित कार्यालय में 1995 से कार्यरत हूं। इस समय मुख्य उपसंपादक हूं। मुझे तरह-तरह से प्रताड़ित और परेशान किया जा रहा है। प्रताड़ना, वेतनमान में भेदभाव और कार्य का अत्यधिक दबाव बनाए जाने के कारण मुझे एक बार हार्ट अटैक हो चुका है। अब स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लगातार बढ रही हैं। मधुमेह और अस्थमा से अक्सर परेशान रहता हूं। मेट्रो, कैलाश और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान-एम्स आदि में मेरा इलाज हो चुका है। चिकित्सा सुविधाओं को ध्यान में रखकर नोएडा के सेक्टर-12 में पत्नी और दो बच्चों के साथ किराये के मकान में रह रहा हूं। नौकरी के अलावा मेरी आय का और कोर्इ स्रोत नहीं है। प्रबंधन की भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण मेरी आर्थिक सिथति काफी खराब हो चुकी है। कर्ज का बोझ दिनोंदिन बढ रहा है।

प्रताड़ना कुछ ऐसी है कि बिना किसी गलती के किसी न किसी बहाने अनिशिचत काल के लिए फोर्स लीव पर भेज दिया जाता है। अक्सर 15 दिनों की सैलरी काट ली जाती है और परिवार का बजट खराब हो जाता है। कठोर और आपतितजनक भाषा में एसएमएस भेज कर आहत किया जाता है। विरोध करने पर ऐसे स्थान पर तबादला कर दिया जाता है, जहां की जलवायु स्वास्थ्य के प्रतिकूल होती है। हाल ही में मेरा तबादला जम्मू कर दिया गया। इससे पहले भी परेशान करने लिए मुझे पानीपत भेजा गया था, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण नोएडा वापस लाया गया।

एम्स के चिकित्सकों ने काम के अधिक दबाव से बचने का सुझाव दिया था। इसके बावजूद स्थानीय संपादक विष्णु त्रिपाठी ने मुझे लगातार रात्रि पाली में काम करने के लिए बाध्य किया। किशोर झा के जरिये आपत्तिजनक एसएमएस भिजवा कर आहत किया। बिना पर्याप्त कारण के बीमारी की हालत में मेरा तबादला जम्मू करा दिया। अस्थमा, हार्इ ब्लड शुगर और बुखार के कारण मेरे लिए जम्मू में ज्वाइन करना संभव नहीं था। मैंने थोडा समय मांगा, लेकिन कोर्इ सुनवार्इ नहीं की गर्इ। बार-बार जम्मू में ज्वाइन करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। इससे पूर्व नौकरी से निकालने की धमकी देकर मजीठिया वेतन बोर्ड से संबंधित कागजात पर हस्ताक्षर करा लिया गया था और दिनोंदिन हमारी आर्थिक हालत को बिगाडने का कुचक्र रचा गया।

इस संबंध में मैंने समय-समय पर प्रधान संपादक संजय गुप्त को अवगत भी कराया, लेकिन उन्होंने इस अत्याचार पर रोक लगाने के लिए कोर्इ कदम नहीं उठाया। जागरण प्रबंधन की ओर से कहा गया कि जम्मू में जान चली जाएगी तो नौकरी छोड दो। इतने दिनों तक समर्पित होकर सेवा करने का सिला अभाव और मुसीबत के रूप में मिला है। मानवाधिकार आयोग से प्रार्थना है कि मेरे जीवन की रक्षा और पुनर्वास के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन को उचित निर्देश जारी किया जाए। इस संबंध में हमने महाप्रबंधक नितेंद्र श्रीवास्तव से भी बात की, लेकिन समस्या का कोर्इ समाधान नहीं हुआ। प्रधान संपादक संजय गुप्त को मेल के जरिये समस्या से अवगत कराया, लेकिन उन्होंने कोर्इ कदम नहीं उठाया। समस्या इतनी गंभीर है कि मुझे मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाना पड रहा है।

प्रताड़ित करने वालों के नाम और मोबाइल नंबर इस प्रकार हैं…

1- स्थानीय संपादक विष्णु त्रिपाठी – मोबाइल नंबर-9810109481

2- समाचार संपादक किशोर झा – मोबाइल नंबर-9717096012

This notice has been sent to Editor in chief Dainik Jagran Mr. Sanjay Gupta.

From: srikant.jagran@hotmail.com

To: sanjaygupta@jagran.com

CC:kishor@nda.jagran.com; vishnu@jagran.com

Subject: NOTICE

Date: Tue, 7 Jan 2014 05:29:55 +0000

Respected Sir,

I am being mentally tortured continuously by News Editor Mr. Kishor Jha and Resident Editor Mr. Vishnu Tripathi. The promotion, increment and transfer policies of the organisation is against my physical and economic health. If any relief will not be provided by you, then I will be bound to take the help of related organisations like, NATIONAL HUMAN RIGHTS COMMISSION and SUPREME COURT.

Thanking You

Shrikant Singh

Chief Sub Editor

Dainik Jagran, Noida.

Mob. 99111 24356.

आशु जी, कहीं आप मुझे कक्षा मित्र ही न मानने से इनकार कर दें, इसलिए यह फोटो अपलोड कर रहा हूं

: आम आदमी की जिन्हें खोज, बहुत खास हैं वे आशुतोष : आशुतोष जी या यूं कहें आशु जी, सुना है आप आम आदमी बन गए हैं। एकायक आम आदमी से इतना मोह क्यों! आप तो आम आदमी क्या आम पत्रकार को भी अछूत मानते रहे हैं—भले ही वह आपका कक्षा मित्र ही क्यों न हो।

मैं सोच रहा था कि कहीं आप मुझे कक्षा मित्र ही मानने से इनकार न कर दें, इसलिए संभालकर रखी गई वह फोटो भी अपलोड कर रहा हूं, जिसे हमने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग में खिंचवाई थी।

पहचानिए! फोटो में कई और हमारे कक्षा मित्र हैं—इस फोटो को आप ही पहचान सकते हैं, क्योंकि अब हमारी शारीरिक संरचना में काफी अंतर आ गया है। मुझे इस बात का कोई गिला नहीं है कि खास पद पर रहते हुए भी आपने दैनिक जागरण में शोषण के शिकार अपने इस पत्रकार मित्र की कोई मदद नहीं की, भले ही आप उसके हिंदी लेखन का लोहा मानते रहे हैं।

मुझे गिला तब होगी जब आम आदमी के नाम पर भी आप खास हो जाएंगे। तब कहीं हमें डॉक्टर मोहन अवस्थी का यह अनुगीत गुनगुनाना पडेगा— आम मानव की जिन्हें खोज बहुत खास हैं वे, उनके संग चलने का मतलब है उजड़ते रहिए। हम नहीं तुम, तुम नहीं हम, खूब अकड़ते रहिए।

श्रीकांत सिंह

चीफ सब एडिटर

दैनिक जागरण

नोएडा

srikant.jagran@hotmail.com

शोषणवादी आशुतोष और समाजवादी “आप”

IBN7 के प्रबंध सम्पादक, आशुतोष ने इस्तीफ़ा देकर "आप" पार्टी ज्वाइन करने का मन बनाया है ! सतही तौर पर ये ख़बर "आप" के नेताओं के लिए उत्साहजनक है, मगर बुनियादी तौर पर बेहद खतरनाक ! आइये देखते हैं, आशुतोष जैसे पत्रकार, "आप" जैसे समाजवाद के लिए क्यों खतरनाक हो सकते हैं ! आशुतोष वो बला हैं, जो बसपा पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष, कांशीराम से थप्पड़ खाने के बाद, पत्रकारिता जगत में चमके थे ! तक़रीबन 10-11 साल "आज-तक" की सेवा करने के बाद 2005 में IBN7 के साथ जुड़े ! बतौर पत्रकार बहुत ख़ास नहीं हैं, पर काम की जगह नाम के बल पर तवज्जो पाने वाले हिंदुस्तान में, आशुतोष को नाम का फ़ायदा मिला ! लाखों के पैकेज़ पर उन्हें नौकरी मिलने लगी ! नामचीन बन गए !

लेकिन इसी के साथ, आशुतोष उन पत्रकारों की श्रेणी में शामिल होते चले गए जो सिद्धांत से समझौता सिर्फ इसलिए करते गए कि उनकी कुर्सी बची रहे और मेहनताना लाखों रुपये महीने का आता रहे ! "मालिक़ की जूती और नौकर का सर", ये आज-कल मीडिया हाउस के ज़्यादातर "नामचीन" टी.वी. पत्रकारों का हाल है ! हाल में IBN7 से एक दो नहीं, बल्कि पूरे साढ़े तीन सौ कर्मचारी एक झटके में निकाल दिए गए और आशुतोष चुप्पी साधे रहे ! मालिक़ की जूती को अपने सर पर रखा आदेश मान कर, आशुतोष ने IBN7 के मालिक़, अम्बानी के ख़िलाफ़ एक शब्द तक नहीं बोल पाये ! "पूंजीवाद के दौर में शोषण होता है और होता रहेगा" ये आशुतोष जैसे पत्रकारों का निजी सिद्धांत है ! पत्रकारिता का मतलब गुलामी और चापलूसी कर अपना क़द बनाये रखना, आशुतोष जैसे पत्रकारों के प्रोफेशनल सिद्धांत का बुनियादी हिस्सा है ! निजी नफ़ा-नुक्सान को तवज्जो , ये आशुतोष के व्यक्तित्व का हिस्सा है, जो गाहे-बगाहे उभर कर आया है !

अब बात उस समीकरण की जो आत्म-घाती है !  केजरीवाल ने "सर पर क़फ़न" बाँधने का जूनून पैदा कर दिया है ! आशुतोष के विपरीत, ऐसा जज़्बा, जो निजी नफ़ा-नुक्सान को तवज्जो देने से ,फिलहाल, परहेज़ कर रहा है ! केजरीवाल ने, अम्बानी नाम के दुस्साहस की उस सीमा को भी पार कर दिया, जहां पर साहस पैदा करना ही अपने-आप में एक साहस होता है ! आशुतोष के उलट, केजरीवाल ने अम्बानी को खुलेआम ललकारा ! आशुतोष, अम्बानी की जूती को सर पर रख, 350 लोगों के पट पर लात मारने का "गुनाह" कर चुके हैं, जिसकी सज़ा मिलना बाकी है !  केजरीवाल ने आई.आर.एस. जैसी दुधाऊ नौकरी छोड़ कर, वामपंथ की तर्ज़ पर समाजवाद को विकसित किया !

आशुतोष ने पढ़ाई-लिखाई वामपंथ की की , मगर पूंजीवाद की जूती को सर पर रखने से कभी गुरेज नहीं किया ! केजरीवाल ने शोषण के बुनियादी सिद्धांत को, नंगा करने का बीड़ा उठाया और आशुतोष अभी कुछ दिनों पहले तक यही राग अलाप रहे थे कि, बाज़ार और बाजारू होकर ही अपना क़द उंचा रखा जा सकता है ! शोषण जारी रखने की स्वीकृति, आशुतोष के प्रोफेशनल व्यक्तित्व का अहम् हिस्सा रहा है , जिसकी पुरज़ोर खिलाफ़त कर केजरीवाल आज हीरो बने हैं ! केजरीवाल सिर्फ कहते भर नहीं, कर दिखलाने के लिए प्रेरित करते नज़र आते हैं ! आशुतोष , अपनी अब-तक की ज़िन्दगी में सिवाय टी.वी. पर (स्पौन्सर्ड) बहस कराने या टी.पी. पर लिखा-लिखाया न्यूज़ पढ़ते नज़र आये हैं ! अपनी निजी ज़िन्दगी में केजरीवाल, लोगों के लिए कर्म के ज़रिये समर्पित नज़र आये हैं, आशुतोष अपने निजी जीवन में सिवाय बैंक- बैलेंस बनाने के और कुछ ख़ास नहीं कर पाए !

केजरीवाल का मानना है कि, विचारक या बुद्धिजीवी बन कर टी.वी. पर बोल भर लेने को, कोई योगदान नहीं माना जाना चाहिए ! अब कर्म करने का वक़्त आ गया है ! सिर्फ बोलने भर से और लाखों रुपयों की सैलरी लेने से राष्ट्र या समाज की तक़दीर या तस्वीर बदलने वाली नहीं ! इसके उलट , आशुतोष का ऐसा कोई सिद्धांत आज तक नुमायाँ नहीं हो पाया, जो जनमानस के हित में ज़ाहिर हो ! आशुतोष जैसे कई पत्रकार (जो लाखों-करोड़ो में खेल रहे हैं ), अपने निजी जीवन में ऐसा कोई योगदान नहीं देते, जो केजरीवाल के वाम मिश्रित समाजवाद से मेल खाते हों ! ग़र फेमस आदमी को लेकर ही केजरीवाल को अपनी पार्टी या "आप" का कुनबा बढ़ाना हो तो अलग बात है ! आशुतोष जैसे पत्रकारों का "आप" से जुड़ाव कुछ वैसा ही होगा, जैसे पैसा और नाम कमाने के लिए रियलिटी शो में गया कोई कलाकार, समाज में कुछ रूतबा पाने के लिए सुधारक बनने के जुगाड़ में हो !

आम आदमी, अरविन्द केजरीवाल की "आप" की जान हैं और शान हैं ! क्वालिटी और क्वान्टिटी में फ़र्क भी केजरीवाल को बखूबी मालूम है ! मशहूर चेहरे, अपना निजी-नुक्सान देखने के बाद ही,  औरों के लिए आवाज़ बुलंद करते हैं ! केजरीवाल, निजी नफ़ा-नुक्सान के सिद्धांत से , संभवतः, दूरी बना कर रखते हैं ! भ्रष्ट सत्ता से टकराना, "आप" का बुनियादी सिद्धांत है, जबकि भ्रष्ट सता की जूती को सर पर रख कर घूमना, आशुतोष जैसे कई पत्रकारों का मौलिक सिद्धांत रहा है ! बेहद नामचीन बौलीवूड के तमाम सितारों को जोड़ने वाली कांग्रेस और भाजपा, आम आदमी वाली "आप" से खौफज़दा हैं ! आज नेतृत्व करने का हक़ उसी को है, जो औरों के लिए भी लड़ सके ! ज़ाहिर है, औरों के हक़ को कुचलने वाले पूंजीवादी सिद्धांत के कट्टर समर्थक, बे-मेल आशुतोष का केजरीवाल की पार्टी से तालमेल , "आप" के समाजवाद की खुशकिस्मती नहीं कही जा सकती ! ख़ुदा खैर करे !

नीरज वर्मा

journalistebox@gmail.com

अमर उजाला के ब्यूरो चीफ के खिलाफ राजुल माहेश्वरी को पत्र

रुद्रपुर (उत्तराखंड)। वर्तमान में समाज की सोच में जबरदस्त बदलाव आया है। पेशे की नैतिकता की बातें बेमानी हो गई हैं और हर कोई अधिक से अधिक धन, संपत्ति और आनंद लूट लेना चाहता है। अधिकांश पत्रकार भी बहती गंगा में हाथ धोने की तर्ज पर नैतिकताओं को धता बताते हुए खूब खा-कमा रहे हैं। उत्तराखंड में ऊधम सिंह नगर जिला मुख्यालय ‘रुद्रपुर’ में भी अधिकतर पत्रकार भूमि कब्जाकर मकान बनाने, बड़े लोगों/कंपनियों के गलत कामों की खबरों को दबाकर नोट पीटने में लगे हैं।

कुछ स्थानीय और कुछ बाहर से पिछले कुछ सालों में आये पत्रकारों की निरंतर बढ़ती संपत्ति इसका प्रमाण है। कुछ पत्रकार खबरें तो बहुत कम लिखते हैं उनका मुख्य काम सौदेबाजी करने, उपहार एकत्र करने और सुविधाएं जुटाने का है। यहां सबसे ज्यादा लूट जमीन की मची है। अधिकांश क्षेत्रीय नेता या उनके लगुए-भगुए जमीनें कब्जाने, बिकवाने, खरीदवाने आदि में लगे हैं। प्रशासन के लोग भी इस लूट का फायदा उठा रहे हैं। मीडिया के अधिकतर लोग इन्हीं के साथ हैं ऐसे में जमीनों से संबंधित नियम-कानून अपने फायदे और नुकसान के हिसाब से तोड़े-मरोड़े जा रहे हैं। यह केवल स्थानीय स्तर का ही मामला नहीं है, इसमें देहरादून तक शासन और प्रशासन में शामिल लोगों की भूमिका कहीं न कहीं है, क्योंकि तमाम शिकायतों के बावजूद विभिन्न प्रकार की सरकारी जमीनों को भारी पैमाने पर खुर्द-बुर्द किया जाना जारी है और कहीं से कोई कार्यवाही नहीं हो रही।

विगत दिनों रामपुर रोड स्थित होटल सोनिया के निकट एक सरकारी जमीन पर भूमाफियाओं ने प्लाटिंग करने के क्रम में तमाम पेड़ काट डाले गये। मामला उछला तो मीडिया को मैनेज करने के लिए बताया जाता है कि एक प्रमुख हिंदी दैनिक के ब्यूरो चीफ को लाखों रुपये दिए गये, जो प्रिंट मीडिया को मैनेज करने के लिए थे। चैनलों को मैनेज करने की व्यवस्था अलग से की गई। पेड़ काटने, जमीन की प्लॉटिंग और नदी पर पुल के मामले में भूमाफिया, पत्रकार और प्रशासन एकमत हैं यह इस बात से पता चलता है कि पुल अपनी जगह पूर्ववत् सही सलामत है लेकिन मीडिया में बड़े प्रमुखता से बताया गया कि पुल ध्वस्त कर दिया गया है और कि मामले में एडीएम ने सख्त रुख अपनाया है। जबकि जमीन पर प्लॉटिंग और विक्रय जारी है, माफियाओं के कारिंदे जमीन पर कुर्सी-मेज डाले दिन भर बैठे रहते हैं।

पत्रकारों की कार्यशैली पर उठते सवालों के बीच यह भी बात अक्सर होती है कि यहां माल काट रहे पत्रकार अपने बॉसों (संपादक और प्रबंधक) को भी नजराना पेश कर खुश किए रहते हैं, इसलिए प्रबंधन इनके खिलाफ आई शिकायतों पर ध्यान नहीं देता। अमर उजाला के ब्यूरो चीफ की कारगुजारियों के संबंध में एक शिकायत पत्रकार केपी गंगवार ने अमर उजाला के मालिक राजुल माहेश्वरी सहित कई जगह भेजी है लेकिन कहीं से कोई कार्यवाही नहीं हुई, उनका पत्र नीचे संलग्न है। सर्वाधिक दिक्कत उन पत्रकारों को होती है जो किसी के लेने-देने में नहीं हैं लेकिन सबको हिस्सा देने के नाम पर चंद लोग पूंजीपतियों से  मोटा पैसा ले लेते हैं। इससे सीधे-साधे पत्रकार मुफ्त में बदनाम होते हैं। चर्चा तो कई बार यह भी होती है कि यह सौदेबाज पत्रकार दूसरों को क्या छोड़ेंगे जब अपने स्टाफ के लिए आये उपहार तक यह गायब कर देते हैं। पूरे जिले में ही पत्रकारों ने नेताओं, माफियाओं, प्रशासनिक अफसरों/कर्मचारियों, कारोबारियों, उद्योगपतियों आदि से मधुर संबंध बना रखें हैं और सब एक दूसरे को फायदा पहुंचाने में लगे हैं। नियम-कानून प्रायः कागजों तक सीमित रह जाते हैं। लिखित शिकायतें जांच के नाम पर यहां-वहां धक्के खाती रहती हैं।

प्रेषक- अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ रुद्रपुर (उत्तराखंड)।

सेवा में,

श्रीमान राजुल माहेश्वरी जी,

प्रबन्ध निदेशक,

अमर उजाला, नोएडा।

विषयः- जनपद ऊधमसिंह नगर (उत्तराखण्ड) के अमर उजाला प्रभारी श्री अनुपम सिंह के कार्यकलापो के सम्बन्ध में।

महोदय,

अमर उजाला की छवि को धूमिल करते हुए पूर्व में श्री फणीन्द्र नाथ गुप्ता ने अमर उजाला के नाम पर लाखों रूपये अवैध रूप से लिये जिसकी पुष्टि होने के बाद अमर उजाला ने उनके खिलाफ कार्यवाही की और बाद में श्री अनुपम सिंह को अमर उजाला का प्रभारी बनाया, लेकिन आज भी श्री फणीन्द्र नाथ गुप्ता और श्री अनुपम सिंह मिलकर अमर उजाला के नाम पर लाखों रूपये के बारे न्यारे कर रहे हैं जिसकी जव चाहें दोनो की मोबाइल फोन की काल डिटेल निकाल कर की जा सकती है। अमर उजाला प्रभारी की कुछ कारगुजारियां के बारे में आपको पूर्व में भी शिकायत के रूप मे भेजी गई है लेकिन कोई कार्यवाही नही हुई। एक बार पुनः आपको क्रमवार शिकायत की जा रही है जिसकी आप पुष्टि कर सकते हैं।

1. अमर उजाला के एक हॉकर श्री शम्भू नाथ द्वारा नगर निगम रूद्रपुर की कल्याणी नदी के किनारे सरकारी नजूल की भूमि पर कब्जा कर उसे बेचा जाता है जिसकी रकम का बटवारा अमर उजाला के कार्यालय मे होता है, उसमें कई लोग हिस्सेदार हैं। ‘मानव कल्याण समिति की जगह पर कब्जा’ सम्बन्धित शिकायती पत्र जिलाधिकारी, ऊधमसिंह नगर को भेजा गया है, जिसकी पुष्टि की जा सकती है।

2. अमर उजाला के प्रभारी श्री अनुपम सिंह द्वारा शहर के उन लोगो को धमकाया जाता है जो विरोध करते है तथा अधिकारियों पर दबाव बनाकर शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्यवाही कराई जाती है, जिसकी पुष्टि महामहिम राज्यपाल महोदय को शहर के आधा दर्जन से अधिक मान्यता प्राप्त पत्रकारों द्वारा भेजे गये शिकायती पत्र से की जा सकती है।

3. अमर उजाला के कार्यालय बनाने के लिए दबाव बनाकर भूमाफियाओं से रजिस्ट्री का एक भूखण्ड लिया गया जिसकी रजिस्ट्री अमर उजाला के प्रभारी अनुपम सिंह की पत्नी के नाम की गयी है। जिसकी पुष्टी किच्छा तहसील से की जा सकती है।

4. यह कि अमर उजाला से प्रभारी द्वारा सोनिया होटल के निकट कुछ भूमाफियाओं के साथ हिस्सेदारी करते हुए एक सीलिंग की जमीन पर अवैध प्लाटिंग शुरू कर दी, इतना ही नहीं अधिकारियों व कर्मचारियों को अमर उजाला के दबाव में लेकर अवैध पुलिया का निर्माण कर दिया गया। इसके अलावा सिलिंग की जमीन में खड़े आम के पेड़ों को काट दिया गया। जब मामला खुला तो शहर के सारे समाचार पत्रों व टीवी चैनलों ने इस खबर को प्राथमिकता से छापा व दिखाया लेकिन सिर्फ उमर उजाला व दैनिक जागरण ने यह खबर भूमाफियों के पक्ष में छापी जिसकी पुश्टि पिछले एक माह स्थानिए समाचार पत्र व समाचार एवं अमर उजाला के समाचार से की जा सकती है।

जब इस मामले में जांच के आदेश हुए तो कई भूमाफियों पर कई मुकदमें दर्ज हुए आम की लकड़ी कब्जे में ली गयी। अवैध कालोनी का गेट तोड़कर कब्जे में लिया गया। अवैध पुलिया को तोड़ा गया तथा मुकद्मा दर्ज किया गया। जिसका समाचार सभी समाचार पत्रों व चैनलों में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। लेकिन अमर उजाला व दैनिक जागरण ने छोटा सा समाचार भूमफियों के पक्ष में ही लगाया जिसकी पुष्टि 20 दिसंबर से लेकर 29 दिसंबर तक के सभी समाचार व अमर उजाला की तुलना करके की जा सकती है। सभी समाचार पत्रों में लगातार प्रमुखता से यह खबर छपी है और अमर उजाला में सिर्फ एक दिन छोटा सा समाचार भूमाफियों के पक्ष में छपा है। पूरे मामले की जानकारी के लिए आप अपर जिलाधिकारी निधि यादव, तहसीलदार किच्छा, रजिस्टार किच्छा, वन क्षेत्राधिकारी रूद्रपुर एवं (शहर अमर उजाला व जागरण को छोड़कर कर बाकी) सभी समाचार पत्रों के मान्यता प्राप्त पत्रकारों से ले सकते हैं।

महोदय इतना ही नहीं अनुपम सिंह के खिलाफ माननीय मंत्री इन्दिरा इदयेश को एक पत्र दिया गया था जिसकी जांच जिलाधिकारी से करायी जा रही है और उसमें अनुपम सिंह पर दोश भी सिद्व है, लेकिन अमर उजाला के दबाव में प्रशासन चुप बैठा है, अनुपम सिंह के खिलाफ महामहिम राज्यपाल, मुख्य सचिव उत्तराखण्ड शासन सहित दर्जनों शियकते जिला प्रशासन से की गयी है जिसे अनुपम सिंह अमर उजाला की धौंस दिखाकर निबटाने का प्रयास कर रहे हैं। आप चाहे तो आपकों पूर्व मंे भेजे गये शिकायत पत्रों की फोटो प्रति देख सकते हैं या जिला प्रशासन से सम्पर्क कर सकते हैं।

अतः महोदय जी से अनुरोध है कि अमर उजाला की छवि को बचाये रखने के लिए समाचार पत्र के कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर कर उचित निर्णय ले।

आपकी अति कृपा होगी।

प्रेषक

केपी गंगवार

अध्यक्ष, मानव कल्याण समिति ,

रूद्रपुर, जिला-उधमसिंह नगर।
 


रुद्रपुर से अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ की रिपोर्ट.

इलाहाबाद विश्वविद्यालयः पुलिस ने सहायक कुलानुशासक से की अभद्रता

पूरब के ऑक्सफोर्ड, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आजकल अनुशासनहीनता का बोलबाला है। कुछ छात्रों की दबंगई के चलते गुरुजनों से अभद्रता की कई घटनाएं हो चुकीं है। इनसे सबक लेते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिला प्रशासन से सहयोग माँगा। इसके बाद विश्वविद्यालय के सभी प्रवेश द्वारों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर पुलिस तैनात की गयी। विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश के लिए परिचय-पत्र दिखाना भी अनिवार्य कर दिया गया।

कल दोपहर पत्राचार विभाग का एक छात्र बिना परिचय-पत्र दिखाए विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने का प्रयास कर रहा था। सुरक्षाकर्मी नें उसे रोका तो वह उससे से भिड़ गया। उसी समय वहाँ सहायक कुलानुशासक आ गए, उन्होंने उस छात्र को समझाने का प्रयास किया। छात्र ने उनकी बात अनसुनी कर दी और एक पुलिसवाले के सहयोग से परिसर में प्रवेश कर गया। सहायक कुलानुशासक ने पुलिसवाले के इस व्यवहार पर आपत्ती जतायी तो उसने उनसे से अभद्रता की और गाली-गलौच भी किया। इस मामले की शिकायत जब विश्वविद्यालय के चौकी प्रभारी से बात की गयी तो वह भी पुलिस वाले के पक्ष में खड़े हो गये। चौकी प्रभारी नें भी कुलानुशासक से अभद्रता की।

ऐसे माहौल में विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर भी स्वयं को अपमानित और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के कुलपति अवकाश लेकर भ्रमण कर रहे हैं। उनकी उदसीनता के चलते पिछले तीन वर्षों में विश्वविद्यालय में एक भी निर्माण कार्य नहीं हुआ है। लोगों का मानना है के इन बातों के चलते विश्वविद्यालय की गरिमा कम हुई है।

उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार में कानून-व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब है। पुलिस और माफिया दोनों में अन्तर करना कठिन होता जा रहा है। बिगड़े माहौल का असर शिक्षा संस्थानों पर भी पड़ रहा है। पत्रकार बंधुओं से उम्मीद है कि वे ऐसी घटनाओं की आलोचना करेंगे और इनकी पुनरावृत्ति न हो इसके लिए माहौल बनानें में सहयोग करेंगे।

लेखक से संपर्क उनके ईमेल dr.dnmishrapti@gmail.com पर किया जा सकता है।

यूपी में हिंदुस्तान के संपादकों मनोज पमार, दिनेश पाठक और नागेंद्र का होगा तबादला

लखनऊ : एक बड़ी खबर है. यूपी में हिंदुस्तान के तीन संपादकों का आपस में तबादला हो रहा है. कानपुर में तैनात दिनेश पाठक को गोरखपुर भेजा जाएगा और बनारस के मनोज पमार को कानपुर का संपादक बनाया जाएगा. गोरखपुर के संपादक नागेंद्र को बनारस की जिम्मेदारी दी जा रही है. चर्चा है कि ये फेरबदल 15 जनवरी के आसपास अमल में लाया जाएगा.

बताया जा रहा है कि प्रबंधन कानपुर यूनिट की असफलता के कारण दिनेश पाठक को बनारस भेज रहा है. मनोज पमार की तैनाती करके कानपुर यूनिट को नए सिरे से जमाने की कोशिश की जाएगी. वहीं गोरखपुर में लंबे समय से तैनात नागेंद्र को बनारस जैसी महत्वपूर्ण यूनिट की जिम्मेदारी दी जा रही है.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

संपादक सलाउद्दीन को राजद्रोह में सात साल की सजा

ढाका। बांग्लादेश की राजधानी ढाका की एक अदालत ने आज एक अंग्रेजी के साप्ताहिक पत्र व्लिज के संपादक सलाउद्दीन शोएब चौधरी को राजद्रोह मामले में सात साल के कारावास की सजा सुनाई है। ढाका के एयरपोर्ट पुलिस थाने के तत्कालीन अधिकारी मोहम्मद अब्दुल हनीफ ने शोएब चौधरी के विरुद्ध 24 जनवरी 2004 को एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें कहा गया था कि व्लिज के संपादक का संबंध इजरायल की गुप्तचर एजेंसी मोसाद से है।

मेट्रोपॉलिटन सेशन कोर्ट के जज मोहम्मद जहीरुल हक ने आज शोएब को सजा सुनाई। शोएब एक और धोखाधड़ी के मामले में इस समय जेल में हैं। शोएब को 29 नवंबर 2003 को गिरफ्तार किया गया था। वह उस दिन तेल अवीव जाने वाला था, जहां वह सेमिनार में अपना पेपर पढ़ने वाला था।

…और टूट गई इन पत्रकारों की सूचना आयुक्‍त बनने की उम्‍मीद

यूपी में सूचना आयुक्‍तों के खाली पड़े पदों पर नियुक्ति की जा चुकी है. इसमें आधे से ज्‍यादा पत्रकार हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि ये लोग नेताजी और सपा के दरबारी हुआ करते थे. अखिलेश सरकार में भी ये लोग कलम बेचकर लगे हुए थे, लिहाजा उनको इसका प्रतिफल मिल चुका है. पर अब भी वे पत्रकार इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं, जो किसी की भी सरकार रहे, मलाई जरूर खाते थे और इस सरकार में भी सूचना आयुक्‍त बनने के लिए जी जान से जुटे हुए थे. ऐसे कई लोग इस सदमे को बरदास्‍त कर पाने की स्थिति नहीं हैं.

शुरुआत सरकारी चैनल में काम कर चुके एक पत्रकार से. ये पत्रकार भी सूचना आयुक्‍त बनकर बची खुची जिंदगी आराम से काटना चाहते थे. दिन भर विधानसभा की प्रेस रूम में बैठकर सूचना आयुक्‍त बनने के सपने देखा करते थे. पर लिस्‍ट जारी होने के बाद इनकी उम्‍मीदों का दीवान टूटकर जमीन पर गिर गया.

दूसरे पत्रकार भी लखनऊ में लंबे समय से कार्यरत हैं. भोकाल में कोई कमी नहीं है. भाजपा की सरकार रही हो, सपा की सरकार रही हो या फिर बसपा की, सबमें इनकी दाल गली. इस बार ये भी सूचना आयुक्‍त बनने की कोशिश में जुटे हुए थे. लेकिन बसपा से नजदीकी इनके खिलाफ चली गई. आजकल एक चैनल से जुड़े हुए हैं. इनको सूचना आयुक्‍त बनवाने का ठेका पत्रकारों ने नेता 'विक्रमादित्‍य' ने ले रखी थी. लेकिन सफलता नहीं मिली. सूचना आयुक्‍त बनने की ख्‍वाहिश में इन्‍होंने अपने शादी के नाम पर होटल ताज में पार्टी दी थी, लेकिन सारे किए धरे पर पानी फिर गया.

एक और जनाब थे सूचना आयुक्‍त की दौड़ में. पिछले बीस सालों से किसी अखबार में नौकरी नहीं की या मिली नहीं, इसकी जानकारी नही है, लेकिन यह अपने पूर्व अखबार, जो उस दौरान बंद होने के बाद पांच-छह महीना पूर्व नए सिरे से लांच हुआ है, का नाम लेकर परिचय देकर जगह बनाने की कोशिश करते रहते हैं. ये भी सूचना आयुक्‍त की दौड़ में बड़ी तल्‍लीनता से लगे थे, लेकिन सपा सरकार ने इन्‍हें भी बाबा जी का ठुल्‍लू थमा दिया.

देश में तीसरे पायदान पर खड़े हिंदी अखबार के एक पूर्व संपादक भी इस रेस में लगे थे. नेताजी का गुणगान भी अक्‍सर अपने अखबार के माध्‍यम से करते रहते थे. इन्‍हें पूरी उम्‍मीद थी कि नेताजी उनका उपकार जरूर चुकाएंगे, लेकिन जब नवीन सूचना आयुक्‍तों की घोषणा हुई तो इनका जोश खतम हो गया. इनके अलावा एक अंग्रेजी अखबार की संपादक भी इस रेस में खुद को मान रही थीं, उन्‍होंने प्रदेश के मुखिया पर किताब भी लिखी थी, लेकिन लिखा-पढ़ी और किताब कापी कोई काम नहीं आया. ऐड़ा बनकर सूचना आयुक्‍त पद का पेड़ा कोई और खा गया.

लखनऊ के एक और बड़े पत्रकार, जो अपने ज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन के अलावा नैतिकता का लबादा भी ओढ़े रहते हैं, भी इस दौड़ में लगे हुए थे. हालांकि कुछ लोगों ने उनके नैतिकता की पोल उस समय सार्वजनिक कर दी, जब खुद सरकारी मकान में रहने और अपने मकान का कामर्शियल इस्‍तेमाल करने की कहानी लखनऊ की गलियों में सुनाने लगे. इनकी भी नेताजी से खास जमती थी, लेकिन आखिरी मौका पर गच्‍चा खा गए. हालांकि यह कहा जा सकता है कि दावेदारों में ये सबसे काबिल जरूर थे.

लखनऊ से छपने वाले एक पुराने अखबार के पत्रकार भी इस दौड़ में शामिल थे. वे पत्रकारिता भले कम करते थे, लेकिन नेताजी का पैर छूने में कभी कोई कमी नहीं की थी. पर नतीजा सामने आने के बाद यह सदमे में हैं. स्‍वतंत्र भारत देश इन्‍हें रास नहीं आ रहा है.

इन लोगों के अलावा अल्‍पसंख्‍यक कोटे से एक वकील कम पत्रकार भी इस रेस में शामिल थे. इन्‍हें सूचना आयुक्‍त बनवाने की सुपारी जौनपुर वाले एक पत्रकार ने ले रखी थी. हालांकि ठेका देने के बाद भी पत्रकार महोदय वकील साहब को सूचना आयुक्‍त बनने की राज्‍य स्‍तरीय मान्‍यता नहीं दिला सके. इनके अलावा भी दर्जनों पत्रकारों के अरमान भी सरकार ने तोड़ दिए. वे न तो हंस पा रहे हैं और ना रही रो पा रहे हैं. (कानाफूसी)

आजतक नम्‍बर वन पर काबिज, जी न्‍यूज खिसका

टैम ने वर्ष 2014 के पहले सप्‍ताह की टीआरपी जारी कर दी है. पिछली कई बार की तरह इस बार फिर आजतक लगातार नंबर वन के पायदान पर बना हुआ है. एबीपी न्यूज ने दूसरे पायदान पर अपना कब्‍जा बरकरार रखा है. 2013 के आखिरी सप्‍ताह में चौथे पायदान पर पहुंचा इंडिया टीवी ने तीसरे नंबर पर वापसी कर ली है. इंडिया न्‍यूज चौथे स्‍थान पर आ गया है. जी न्‍यूज तीसरे स्‍थान से खिसककर पांचवें नंबर पर पहुंच गया है. नीचे नए साल के पहले सप्‍ताह की टीआरपी..

WK 01 2014, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 20.8 up 0.3
ABP News 14.7 up 1.5
India TV 11.4 up 1.7
India news 9.0 dn 0.3
ZN 8.5 dn 2.0
News24 7.7 dn 0.2
News Nation 7.3 dn 0.5
IBN 6.6 dn 0.3
NDTV 6.3 dn 0.3
Samay 3.2 same
Tez 3.0 up 0.4
DD 1.6 dn 0.3

Tg CS M 25+ABC

Aaj Tak 20.9 dn 0.2
ABP News 14.6 up 1.7
India TV 10.7 up 0.6
India news 9.0 same
ZN 9.0 dn 1.8
NDTV 7.6 up 0.1
IBN 7.0 dn 0.4
News24 7.0 dn 0.1
News Nation 6.7 dn 0.2
Samay 3.4 up 0.4
Tez 2.4 dn 0.1
DD 1.5 same

‘साधना न्यूज’ के मालिकों के संरक्षण में चलता है स्टिंग और उगाही का गोरखधंधा!

साधना न्यूज में कार्यरत नीरज महेरे और मनोज नामक पत्रकारों ने दो लड़कियों के साथ दिल्ली के एक नेता का स्टिंग किया और बाद में पैसे के लिए धमकी देना शुरू किया. नेता की शिकायत पर मनोज और दोनों लड़कियों को नोएडा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. नीरज महेरे फरार है. नीरज महेरे इटावा का निवासी है और वहीं से पत्रकारिता का करियर शुरू किया था. बाद में वह नोएडा में आकर पत्रकारिता करने लगा.

साधना न्यूज से जुड़े सूत्रों का कहना है कि नीरज महेरे की सीधी रिपोर्टिंग साधना न्यूज के एक मालिक को थी. बताया जाता है कि करोड़ों रुपये कमाने के चक्कर में साधना न्यूज के मालिकान अपने रिपोर्टरों को बिल्डरों, नेताओं, डाक्टरों, कंपनी मालिकों आदि का स्टिंग करने को प्रेरित करते थे और फिर उनसे डील कर ली जाती थी. यह चलन हाल के दिनों में कई छोटे मोटे न्यूज चैनलों ने पकड़ा है.

अब जब स्टिंगबाजी के जरिए उगाही की पोलपट्टी खुली है तो साधना न्यूज के मालिक इससे अपना पल्ला झाड़ लेंगे और रिपोर्टरों को उनके हाल पर छोड़ देंगे. पर पहले यही मालिकान अपने रिपोर्टरों को करोड़ों लाने के लिए मजबूर करते हैं और उनसे स्टिंग के जरिए पैसा कमाने व कमवाने को कहते हैं.

नोएडा की सेक्टर 39 पुलिस ने बताया कि एक पत्रकार, जिसका नाम मनोज है, ने एक महिला के साथ मिलकर दिल्ली की जनभावना पार्टी के नेता अवधेश को जाल में फंसाया. नेता अवधेश को एक महिला के जरिए जीआईपी मॉल में बुलाया गया. फिर महिला के साथ नेता जी की तस्वीरें ले ली गईं.

पुलिस के अनुसार, इन आरोपियों ने अवधेश के फोटो सार्वजनिक करने की धमकी देते हुए लाखों रुपये की मांग की. यही नहीं, अवधेश के पास पड़े पैसे और कार छीन ली. जिस महिला के सहारे अवधेश को फंसाया गया, उसका नाम सुमन है. पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद मनोज समेत तीन पत्रकारों को गिरफ्तार किया है. नीरज महेरे फरार है. नोएडा पुलिस के डिप्टी एसपी शिवराम यादव ने बताया कि नीरज को भी जल्द ही पकड़ लिया जाएगा.

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मूल खबर:

साधना न्‍यूज के पत्रकार ब्‍लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तार

पत्रकार संजय बनर्जी और पीड़िता के वायस रिकार्डिंग टेस्ट को कोर्ट ने दी मंजूरी

देहरादून: हाई प्रोफाइल यौन उत्पीड़न प्रकरण में अदालत ने आरोपी पीड़िता, सपा नेता नीरज चौहान व पत्रकार संजय बनर्जी के वाइस रेकॉर्डिग टेस्ट की अनुमति दे दी है। तीनों आरोपियों का 10 जनवरी को अदालत में टेस्ट किया जाएगा। इस मामले में बचाव पक्ष की आपत्ति को अदालत ने खारिज कर दिया।

मामले में पुलिस ने पीड़िता, सपा नेता नीरज चौहान और चैनल के पत्रकार संजय बनर्जी की वाइस रेकॉर्डिग टेस्ट के लिए दो जनवरी को अपील की थी। बचाव पक्ष की तरफ से इस पर आपत्ति लगा दी गई। तर्क दिया गया कि जब पुलिस के पास पहले से कोई वाइस रेकॉर्डिग मौजूद नहीं है तो अब टेस्ट लेकर मिलान किससे किया जाएगा।

अदालत ने सोमवार को सुनवाई कर अपना फैसला बुधवार तक के लिए सुरक्षित रखा था। बुधवार को अदालत ने बचाव पक्ष की आपत्ति खारिज करते हुए तीनों आरोपियों के वाइस रेकॉर्डिग टेस्ट को मंजूरी दे दी। अदालत ने आदेश दिए कि टेस्ट कराने के लिए आरोपियों को 10 जनवरी को जेल से अदालत में पेश किया जाए। टेस्ट के दौरान पुलिस व फोरेंसिक एक्सप‌र्ट्स वहां मौजूद रहेंगे।

सचिवालय से जुड़े इस यौन-उत्पीड़न प्रकरण में निलंबित अपर सचिव जेपी जोशी, संयुक्त सचिव एसएस वल्दिया व पीड़िता समेत आठ आरोपी जेल में हैं। बाकी पांच आरोपियों में कांग्रेस नेत्री रितु कंडियाल, सपा नेता नीरज चौहान, चैनल के पत्रकार अमित गर्ग, शाइनी मैक खान व संजय बनर्जी शामिल हैं। अभी दो आरोपी पत्रकार फरार हैं। दुष्कर्म व जान से मारने की धमकी के मामले में जेपी जोशी व रितु कंडियाल के विरुद्ध चार्जशीट हो चुकी है। वहीं, जोशी की ब्लैकमेलिंग संबंधी रिपोर्ट पर पुलिस की विवेचना चल रही है।

CM lauds role of Small newspapers in publicizing government initiatives

SHIMLA : Chief Minister Shri Virbhadra Singh said that small newspapers were playing important role in publicizing the developmental and public welfare oriented policies of the Government to the farthest corners of the State. The Government was providing all possible assistance to these small newspapers and periodicals who were working with zeal despite financial constraints.

The Chief Minister was presiding over the 34th annual function of Himachal Kesari newspaper at Dharamshala today. He said that press was the fourth pillar of democracy which played pivotal role in the freedom struggle of the country and thereafter for the reconstruction of the modern India. He expressed concern over the yellow journalism in big media houses adding that true and transparent journalism should be encouraged so that the vital socio-economic issues could be highlighted in right perspective.

Shri Virbhadra Singh lauded the efforts of Himachal Kesari newspaper for its consistent efforts during past over three decades for the society and journalism. He also appreciated the initiatives of the newspaper in honouring the eminent personalities of different fields.

Shri Praveen Roy, Editor, Himachal Kesari said that the newspaper had strived hard to maintain the standards of journalism during its journey of 34 years. He thanked the Chief Minister for gracing the occasion and said that he had always given protection and support to the small newspapers in the State.

Chief Minister honoured various personalities with the Himachal Kesari Award on the occasion. Shri Karan Singh, MLA was honoured in the field of politics. Shri Devesh Kumar, Deputy Commissioner, Mandi for administration, Shri Abhishek Dullar, S.P. Shimla for police services, Shri Amitabh Awasthi, Mission Director, NHRM for health services, Landmark Hotel Shimla for tourism, Divya Manav Anathalaya, Dehar, district Mandi for social services, Shri Pawan Sharma, correspondent, Divya Himachal for journalism, Shri Krishan Kumar Nutan for literary work, Shoolini University, Solan for education, Pt. Lekh Raj Sharma for astrology, Jagran Pahal NGO for environment, J.P. Cements Ltd. for industries, Shri Anurag Prashar for electronic media, Shri Harbhajjan Singh for youth power, Shri Surender Sharma for youth entrepreneur, Shri J.S. Guleria for art and culture, Shri Prem Prasad advocate for legal affairs and Shri Desh Raj, photographer, Dainik Jagran for photo journalism.

Shri Sudhir Sharma, Urban Development Minister, Shri Jagjivan Pal, Chief Parliamentary Secretary, Shri Ajay Mahajan and Shri Pawan Kajal, MLAs, Shri Kewal Singh Pathania, Vice Chairman, H.P. Forest Development Corporation, Smt. Viplove Thakur, Senior Congress leader, Shri Surender Kaku, Ex MLA, Shri Rohan Thakur, ADC and other prominent persons were present on the occasion among others.

-Vijyender Sharma

जजों के चलते वक्त चुटकी बजाने की परंपरा बंद हो

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आज भारत के मुख्य न्यायाधीश को इलाहाबाद हाई कोर्ट और यूपी के विभिन्न ट्रिब्यूनल में चल रही दो व्यवस्थाओं के बारे में पत्र लिखा है. उन्होंने कहा है कि वर्तमान में जजों के कोर्ट में आने से पहले उनके अर्दली आते हैं और उनकी सीट को अत्यंत दास भाव से ठीक करते हैं जिसके बाद जज आते हैं जिनके लिए अर्दली झुक कर सीट पीछे करते हैं जिस पर जज बैठते हैं, जिस प्रक्रिया में सामंती व्यवस्था साफ़ दृष्टिगोचर होती है.

डॉ ठाकुर के अनुसार इसी प्रकार जब जज कोर्ट में एक स्थान से दूसरे तक जाते हैं तो वे अर्दली कमर झुकाए आगे-आगे चलते हैं और चुटकी बजाते रहते हैं ताकि सभी लोग रास्ता छोड़ते जाएँ. इन व्यवस्थाओं को मानवीय सम्मान के विपरीत, अनुचित और प्रतिगामी तथा संविधान की भावना, विभिन्न कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के विरुद्ध बताते हुए उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से इन्हें तत्काल रोकवाने जाने का अनुरोध किया है.

Copy of Letter–

To,

The  Chief Justice of India,

Supreme Court of India,

New Delhi-110001

Subject-As regards certain improper and retrograde traditions being followed in the Allahabad High Court

Respected Sir,

I am Dr Nutan Thakur, a social activist, working primarily in the field of transparency and accountability in governance and Human Rights issues. I present before you two matters related with the Allahabad High Court and many other Tribunals in Uttar Pradesh which very apparently seem to be against the dignity of Human Beings and
hence as being definitely improper and retrograde in nature.

I present these matters on the basis of my personal experience in the High Court and Central Administrative Tribunal because I have filed a large number of Public Interest Litigations and other Petitions in the Lucknow Bench of the Allahabad High Court and have had many occasions to visit CAT where I have personally witnessed these traditions that come as being the relic of the past and as being not in tune with the present times. I have been told by many lawyers that the same is true for the Allahabad Bench of the High Court and many other Tribunals as well.

The first tradition being followed is that before the Judges come to the Court, one or more of their Ardali (personal staff) wearing a Chapras (a cross-sectional leather belt) and a headgear come to the Court and adjust their seats in an extremely subservient manner. This is followed by the Judges coming to the Court and here again these Ardali take the chair back in an equally servile manner on which the Judges sit down, giving a very apparent impression of some Lord from the feudal past.

Both these acts are definite retrograde and servile which do not go in tune with the present days of respect for human dignity and equality among the individuals. The Judges of the High Court are definitely extremely respectable persons, they occupy Constitutional posts and do an extremely important and respectful function in the society. But it would be agreed upon that there is a great difference between respect and servility. The way this entire exercise is conducted every day in the High Court has nothing to do with human respect but is an artificial and improper means of imposing a false persona to the office of the Judgeship which definitely goes against the present times because firstly the human dignity of the Orderly (personal assistant) is being compromised and degraded and secondly other persons are being imposed the authority of the Judge in an unwarranted and artificial manner, as if the Judge won’t even  taken back his seat and sit on that. All this happens in the open court with many spectators.

The second tradition being conducted is even more disgraceful and humiliating where when the Judges move from one place to another in the Court (for instance, from their Court to their Chamber or to their official car etc) the same Ardalis (personal assistants) move ahead of these Judges with their backs curved and bowed and filliping and tweaking with their fingers (चुटकी बजाना) all through so that everyone on the way immediately jumps to the sideways and give way to the Judge. This again comes as being a poor caricature of the regal times as if some Lord is moving and the Praja (his people) are making way for him.

Only recently the Hon’ble Supreme Court stated in a PIL filed by 75-year-old advocate Sri Shiv Sagar Tiwari that Judges should be addressed in courts in a respectful and dignified manner and it is not compulsory to call them "my lord", "your lordship" or "your honour”. A bench comprising Justice H L Dattu and Justice S A Bobde observed
that-“To address the court what do we want. Only a respectable way of addressing. You call (judges) sir, it is accepted. You call it your honour, it is accepted. You call lordship it is accepted. These are some of the appropriate way of expression which are accepted”.

These observations make it very apparent that the Supreme Court itself is not in favour of any deliberate and intentional colonial hangovers and has an extremely pragmatic and modernistic outlook in this regards. Sadly these observations and this outlook of the Supreme Court goes in direct contravention to the obsequious practices being presently adopted in the Allahabad High Court and many of the Tribunals in Uttar Pradesh.

It also goes completely against the spirit of human dignity and self-respect that the Constitution of India, the various laws promulgated in independent India, the large number of judgements and orders of the Supreme Court and the various High Courts, including the Allahabad High Court have so far been striving for.

Hence I request you to kindly look into this matter immediately and to kindly direct the concerned authorities in Allahabad High Court and any other place where these practices are in existence that these retrograde and undignified traditions going against the basic Human dignity are stopped with immediate effect. It is prayed that this matter is very important because it concerns the highest court of justice in the State of Uttar Pradesh and any symbolic or others acts in the High Court has its direct and massive effect on various agencies and aspects related with the rest of the State.

Lt No- NT/AHC/Tweak Yours,
Dated-09/01/2014
(Dr Nutan Thakur )
5/426, Viram Khand,
Gomti Nagar, Lucknow
nutanthakurlko@gmail.com

Copy to-1. Chief Justice, Allahabad High Court, Allahabad for kind perusal and necessary action please

मोदी या सिब्बल के खिलाफ ‘आप’ के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे आशुतोष

आम आदमी पार्टी के अंदर से एक बड़ी सूचना निकल कर आ रही है कि आईबीएन7 से हटाए गए पत्रकार आशुतोष को नरेंद्र मोदी या कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए उतारा जा सकता है. नरेंद्र मोदी ने अगर इलाहाबाद से पर्चा भरा, जैसी की चर्चा है, तो मोदी के खिलाफ आम आदमी पार्टी की तरफ से आशुतोष पर्चा भरेंगे. अगर मोदी यूपी से चुनाव नहीं लड़ते हैं तो आशुतोष चांदनी चौक सीट से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे.

चांदनी चौक सीट बनिया बहुल है और आशुतोष जाति से गुप्ता यानि बनिया हैं, सो उनके जीतने के चांसेज यहां ज्यादा रहेंगे. साथ ही दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पक्ष में हवा है, सो आशुतोष लोकसभा सांसद बन सकते हैं. मोदी या सिब्बल, दोनों में से किसी को भी आशुतोष हराते हैं तो उन्हें राजनीति में गंभीरता से लिया जाएगा. जिस तरह कुमार विश्वास को राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा जा रहा है, उसी तरह आशुतोष को नरेंद्र मोदी के खिलाफ मैदान में उतारा जा सकता है. पर अगर मोदी यूपी से नहीं पर्चा भरते हैं तो फिर चांदनी चौक लोकसभा सीट से आशुतोष का आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ना तय है.

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आशुतोष ने दुर्व्यवहार के लिए यशवंत से माफी मांगी

आशुतोष ने दुर्व्यवहार के लिए यशवंत से माफी मांगी

कल देर रात जब भड़ास के एडिटर यशवंत ने आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष को फोन कर यह कनफर्म करना चाहा कि क्या उन्होंने आईबीएन7 से इस्तीफा दे दिया है तो इस पर आशुतोष भड़क गए और समय का हवाला देने लगे. उन्हें यशवंत ने बताया कि आईबीएन7 से इस्तीफे से संबंधित कई फोन आए हैं और फेसबुक पर आईबीएन7 के कुछ लोग आशुतोष की फोटो यह कहकर शेयर कर रहे हैं कि ये आफिस में अंतिम मुलाकात है, इसलिए यह जानना जरूरी है कि आपने इस्तीफा दिया है या नहीं, इस पर भी आशुतोष यही कहते घुड़कते डांटते रहे कि यह कोई वक्त है फोन करने का.

यशवंत लगातार पूछते रहे कि आप हां या ना में जवाब दे दो कि इस्तीफा दिया है या नहीं. पर आशुतोष सिर्फ एक लाइन रटते रहे कि ये कोई टाइम है फोन करने का. उल्लेखनीय है कि भड़ास के एडिटर यशवंत ने आशुतोष को दिन में फोन किया पर आशुतोष ने फोन नहीं उठाया. तब एसएमएस किया. उसका भी जवाब नहीं आया. ऐसे में देर रात जब कई फोन आए कि आशुतोष का इस्तीफा फाइनली हो गया है, तब उन्होंने एक अलग नंबर से आशुतोष को फोन किया तो उन्होंने उठा लिया. पर ज्योंही आशुतोष ने सुना कि ये यशवंत का फोन है, वे भड़क गए और समय का हवाला देने लगे.

आज सुबह आशुतोष ने यशवंत को फोन कर रात के दुर्व्यवहार के लिए माफी मांगी और इस मामले को तूल न देने की अपील की. यशवंत ने उनसे कहा कि अगर देश दुनिया में कोई दूसरा नेता अफसर मंत्री इस्तीफा देता तो जाने कितने मीडिया वाले उसे कितनी बार फोन करते रहते और लगातार करते रहते, बिना रात दिन देखे, ये कहते हुए कि खबर तो खबर होती है, इसमें टाइम नहीं देखा जाता. लेकिन जब भड़ास ने मीडिया को एक बीट की तरह मानकर लगातार उसकी रिपोर्टिंग कर रहा तो मीडिया के संपादक लोग रात को फोन करने पर जाने क्यों भड़क जाते हैं. एक संपादक जो आजकल चिटफंडिया बन गया है, रात के फोन से इतना नाराज हुआ कि पुलिस में फर्जी कहानियां तक यशवंत के खिलाफ लिखवा दी और शासन सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की सिफारिश लगवाकर यशवंत को जेल भिजवा दिया. पर यशवंत के लिए जेल क्या और बाहर क्या. जहां बैठे वहीं मंगल मंगल जय जय.

लेकिन सोचने की जरूरत संपादक लोगों को है. आखिर संपादक लोगों के पास इतना बड़ा सा इगो क्यों है. आखिर संपादक लोग इतने बड़े हिप्पोक्रेट क्यों हैं. आखिर संपादक लोग खुद को बेहद एलीट और सुपरस्टेटस वाला क्यों मानते हैं. आखिर संपादक लोग खुद को महामठाधीश क्यों मानते हैं. संपादक लोगों के पास क्या इतनी धैर्य अक्ल नहीं कि अगर वो दूसरों को खबर बना सकते हैं तो खुद को भी खबर बनने के लिए तैयार रखें. बहरहाल, यशवंत ने आशुतोष द्वारा गल्ती कुबूल किए जाने के बाद उनसे कहा कि उनका गुस्सा स्थायी नहीं होता और न है, लड़ाई विचारों व सरोकार की है, जो आगे भी चलती रहेगी.

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आशुतोष के आईबीएन7 से इस्तीफा देने की बात झूठी है. उन्हें निकाला गया है. ऐसा दावा नेटवर्क18 से जुड़े एक वरिष्ठ व भरोसेमंद पदाधिकारी ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में. सूत्र का कहना है कि आशुतोष के नेतृत्व में आईबीएन7 का लगातार पतन हुआ. यह न्यूज चैनल कभी टीआरपी के मामले में नंबर चार तक पहुंच गया था लेकिन वर्षों से यह आखिरी पायदान पर पड़ा हुआ है. अब तो यह नौवें नंबर पर आ चुका है.

कंटेंट से लेकर मैनेजमेंट तक के मामले में आशुतोष फेल रहे और न्यूज चैनल चलाने के नाम पर केवल खुद की ब्रांडिंग करते रहे. प्रबंधन ने पहले आशुतोष की सहमति से सैकड़ों लोगों को चैनल से निकाला और जब सबका सफाया कर लिया तो आशुतोष को भी इशारा कर दिया कि वे खुद निकल जाएं अन्यथा उन्हें बाहर कर दिया जाएगा. यह भी कहा जा रहा है कि आईबीएन7 से इस्तीफा देने वाले ढेर सारे वरिष्ठ पत्रकारों ने एचआर को एक्जिट इंटरव्यू में चैनल फेल्योर के लिए केवल आशुतोष का नाम लिया. साथ ही अन्य कई ऐसी जानकारियां दीं जो आशुतोष के खिलाफ गईं.

आशुतोष को मैनेजिंग एडिटर के रूप में कोई नया व कायदे का चैनल मिल नहीं रहा था. वे विनोद कापड़ी की तरह चिटफंडिया संपादक बनना नहीं चाह रहे थे. इस बीच आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में झंडा गाड़ दिया. अवसर व मौके को भांपने में माहिर आशुतोष ने आम आदमी पार्टी के नेताओं से सीधे संपर्क साधा और उन्हें अपने भरोसे व आभामंडल के अधीन किया.

इसी बीच अंदरुनी तौर पर यह डील तय हो गई कि आशुतोष इस्तीफ देकर राजनीति में आएं और आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ें. आशुतोष ने आम आदमी पार्टी वालों के सामने खुद को इस्तीफा देने जैसा शहीदाना कार्य करने वाला पेश किया. 'आप' वाले भी इस दबाव में आकर उन्हें लोकसभा टिकट देने का वादा कर बैठे. पर अब जब आशुतोष की सच्चाई एक-एक कर सामने आ रही है तो 'आप' नेता भी सकते में हैं. आशुतोष की छवि मीडिया जगत में कार्पोरेट फ्रेंडली जर्नलिस्ट की रही हैं. आईबीएन7 से निकाले गए सैकड़ों कर्मचारियों के समर्थन में जो धरना प्रदर्शन आईबीएन7 गेट के सामने हुआ उसमें लोग आशुतोष को अंबानी का दलाल बताकर नारेबाजी करते रहे.

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आशुतोष के इस्तीफे के बाद आईबीएन7 में उनकी जगह लेंगे विनय तिवारी

साधना न्‍यूज के पत्रकार ब्‍लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तार

नोएडा से खबर है कि पुलिस ने ब्‍लैकमेलिंग करने के आरोप में साधना न्‍यूज के पत्रकारों को अरेस्‍ट किया है. इसमें एक पु‍रूष तथा दो महिला शामिल हैं. एक पत्रकार फरार बताया जा रहा है. पुलिस ने यह कार्रवाई दिल्‍ली के नेता की शिकायत पर किया है. तीनों को पुलिस ने सूरजपुर कोर्ट में पेश किया, जिसके बाद उन्‍हें जेल भेज दिया गया.

जानकारी के अनुसार साधना न्‍यूज की एसआईटी टीम में कार्यरत पत्रकार नीरज मेहरे तथा मनोज दिल्‍ली के किसी नेता का स्टिंग करने में जुटे हुए थे. इसमें दो युवतियां भी शामिल थीं. बताया जा रहा है कि उक्‍त नेता ने नोएडा के सेक्‍टर 39 थाने में इसके खिलाफ शिकायत की थी. पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पत्रकार मनोज तथा शालिनी व सुमन को अरेस्‍ट किया. इनमें से एक युवती भी पत्रकार बताई जा रही है.

पुलिस नीरज मेहरे को अरेस्‍ट करने में असफल रही. पुलिस ने उसे फरार घोषित कर दिया है. पुलिस ने मनोज समेत दोनों युवतियों को गुरुवार को सूरजपुर कोर्ट में पेश किया, जहां मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने तीनों को न्‍यायिक हिरासत में चौदह दिन के लिए जेल भेज दिया है. 

प्रसार भारती और जीएसटीवी में नौकरियां, आवेदन करें

प्रसार भारती की तरफ से दूरदर्शन के लिए कई तरह की वैकैंसी निकाली गई है. इसमें प्रोग्राम मैनेजर से लेकर विशेषज्ञ तक की भर्ती शामिल है. कई अन्य पद भी हैं. सारे डिटेल दूरदर्शन की साइट पर उपलब्ध है. कुल छह किस्म की नई भर्तियां की जा रही हैं.

मीडियाकर्मी व गैर-मीडियाकर्मी अपनी सुविधा व योग्यतानुसार इसमें अप्लाई कर सकते हैं. सभी आनलाइन लिंक व विज्ञापन देखने के लिए इस पर क्लिक करें…

http://ddindia.gov.in/Business/Job Opportunities/Pages/Job Opportunities.aspx
 


गुजरात के लीडिंग रीजनल न्यूज चैनल गुजरात समाचार टीवी यानि जीएसटीवी को दिल्ली में कई रिपोर्टरों की जरूरत है. दिल्ली ब्यूरो के लिए जीएसटीवी को दो फीमेल और एक मेल रिपोर्टर चाहिए. इन्हें पोलिटिकल व लाइफस्टाइल बीट कवर करना होगा. अनुभवी व ट्रेनी पत्रकार हफ्ते भर में अप्लाई कर सकते हैं. इसके लिए आनलाइन पता है: gstvnational@gmail.com

जागरण मेरठ से अनुराग का लखनऊ तबादला, राजकुमार देखेंगे जनरल डेस्क

दैनिक जागरण मेरठ में जनरल डेस्क के इंचार्ज अनुराग गुप्ता का ट्रान्सफर लखनऊ कर दिया गया है. उन्होंने अपने ट्रान्सफर की अर्जी निजी कारणों के चलते दे रखी थी. वो फरवरी के शुरुआत में लखनऊ दफ्तर से काम करना शुरू करेंगे.

लखनऊ में उन्हें लोकल डेस्क की जिम्मेदारी दी गयी है. वो लखनऊ के ही मूल निवासी हैं. अनुराग के जाने के बाद मेरठ में जागरण के जनरल डेस्क की जिम्मेदारी डीएनई राजकुमार शर्मा संभालेंगे.

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दैनिक जागरण बरेली के कर्मियों में मारपीट, दैनिक जागरण मुरादाबाद से राजीव हटे

खबर है कि कुछ रोज पहले दैनिक जागरण बरेली के एक रिपोर्टर व इसी ग्रुप के बच्चा अखबार आईनेक्स्ट बरेली के एक फोटोग्राफर के बीच मारपीट हो गई. मारपीट के कई कारण बताए जा रहे हैं. कुछ इसे इगो प्राब्लम कह रहे हैं तो कुछ फील्ड में कामकाज के दौरान की दिक्कत. वहीं कुछ अन्य चर्चाएं भी हैं. बताया जाता है कि जागरण के रिपोर्टर को नोटिस जारी कर लिखित जवाब देने को कहा गया है.

वहीं दैनिक जागरण मुरादाबाद से सूचना है कि राजीव शर्मा ने भी इस्तीफा दे दिया है. वे अमर उजाला, आगरा ज्वाइन कर रहे हैं. राजीव ने इस बाबत सूचना अपने फेसबुक वॉल पर पोस्ट की है.

एक अन्य जानकारी के मुताबिक हिंदुस्तान, गोरखपुर से कापी एडिटर मृत्युंजय कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. वे दैनिक जागरण, पटना से जुड़ने जा रहे हैं.

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समीर अब्बास ने भी छोड़ा आईबीएन7, अब भास्कर न्यूज से जुड़े

आशुतोष के बाद समीर अब्बास ने भी आईबीएन7 छोड़ दिया है. समीर अब्बास नए लांच होने वाले न्यूज चैनल भास्कर न्यूज के साथ जुड़ गए हैं. उन्हें एक्जीक्यूटिव एडिटर बनाया गया है. वे आईबीएन7 में एसोसिएट एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हुआ करते थे. समीर अब्बास आईबीएन7 से पहले जैन टीवी, इंडिया टीवी में भी काम कर चुके हैं.

ज्ञात हो कि भास्कर समूह के मालिकों में से एक हेमलता अग्रवाल की तरफ से भास्कर न्यूज नाम से न्यूज चैनल शुरू होने जा रहा है. इस चैनल में अतुल अग्रवाल, राहुल मित्तल जुड़े हुए हैं. हेमलता अग्रवाल ने चैनल संचालन के सारे अधिकार राहुल मित्तल को दे रखे हैं. इसी वजह से राहुल एमडी व एडिटर इन चीफ के रूप में कार्यरत हैं. चैनल का आफिस नोएडा के सेक्टर 63 में A-147 पते पर शुरू हो चुका है..

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आशुतोष के इस्तीफे के बाद आईबीएन7 में उनकी जगह लेंगे विनय तिवारी

आशुतोष के आईबीएन7 से इस्तीफा देने के बाद उनकी जगह विनय तिवारी लेंगे. विनय नेटवर्क18 समूह के अंग्रेजी न्यूज चैनल सीएनएन-आईबीएन में मैनेजिंग एडिटर के रूप में कार्यरत हैं. विनय तिवारी पत्रकारिता में दो दशक से ज्यादा समय से सक्रिय हैं. वह टीवी टुडे नेटवर्क, टाइम्स ग्रुप, पायनियर आदि से जुड़े रहे हैं.

इस बीच, भड़ास पर आशुतोष के इस्तीफे की खबर फ्लैश होने के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर हर कहीं आशुतोष के इस्तीफे और आम आदमी पार्टी ज्वाइन करने की संभावना पर खबर प्रकाशित प्रचारित होने लगी. अब आशुतोष ने भी इस्तीफे की पुष्टि कर दी है.

इस घटनाक्रम पर नेटवर्क18 के ग्रुप सीईओ बी. साई कुमार का कहना है कि वे आशुतोष के योगदान और समर्पण के लिए उनको धन्यवाद कहते हैं. विनय तिवारी ने सीएनएन-आईबीएन में प्रशंसनीय काम किया है, उम्मीद है वह आईबीएन7 को नए शीर्ष पर ले जाने में सफल होंगे.

वहीं एडिटर इन चीफ राजदीप सरदेसाई ने भी कहा है कि वे शानदार सेवाओं के लिए आशुतोष को शुक्रिया कहते हैं और भविष्य के लिए शुभकामना देते हैं. राजदीप ने कहा कि उन्हें विनय से उम्मीद है कि वह अपने एक्सपीरियेंस व सोच से आईबीएन7 को आगे ले जाएंगे. विनय तिवारी ने कहा है कि आईबीएन7 का नेतृत्व करना उनके लिए सम्मान की बात है.

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महिला पत्रकार ने मकान खाली करने के लिए लाखों रुपये मांगे!

कुरुक्षेत्र की एक महिला पत्रकार के बारे में दिल्ली की एक महिला ने प्रेस कांफ्रेंस कर सनसनीखेज खुलासा किया है। दिल्ली की रहने वाली एक महिला रेणु टूरा (पत्नी लखवीर टूरा) ने कुरुक्षेत्र में आकर एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया। इसमें कुरुक्षेत्र के ज्यादातर सक्रिय पत्रकार पहुंचे। महिला ने पत्रकार वार्ता शुरू करते ही महिला पत्रकार नीना गुप्ता जो कि जगमार्ग नामक एक अखबार से जुड़ी हुई हैं, के बारे में बताना शुरू किया। रेणु ने कुरुक्षेत्र की कृष्णा गेट चौकी में एक शिकायत दी हुई है।

इसमें आरोप है कि उसने एक मकान खरीदा है, जिसकी बाकायदा उसके पास रजिस्ट्री व मलकियत के पूरे कागज है, लेकिन उस मकान पर नीना गुप्ता अपना कब्जा छोडऩे के नाम पर पैसे मांग रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि पांच लाख रुपये उन्होंने नीना को दे भी दिए, लेकिन इसके बावजूद वह मकान खाली नहीं कर रही।

जब ये सारा मामला चौकी में आया और चौकी के इंचार्ज कृष्ण मेहता ने दोनों का पक्ष सुनने के बाद जब नीना को कागज दिखाने के लिए कहा तो वो कोई भी कागज दिखा ना पाई। मामला चूंकि पत्रकार से जुड़ा था, इसलिए अधिकारी ने बीच में पड़ना मुनासिब नहीं समझा व मामले को रफा दफा करने की कोशिश की, लेकिन दिल्ली वासी रेणु भी हार कहां मानने वाली थी। उसने सबसे पहले मामला पत्रकारों की पंचायत में रखा और वहां नीना के बारे में कई सनसनीखेज खुलासे कर डाले।

पत्रकार वार्ता के दौरान कुरुक्षेत्र के पत्रकारों द्वारा खुले रूप से दिल्ली से आई दुखियारी महिला को आश्वासन दिया गया कि वह किसी के भी निजी मामले में दखलअंदाजी नहीं करेंगे व ना ही नाजायज करने वाले किसी पत्रकार का साथ देंगे। उसके बाद महिला ने पुलिस अधीक्षक कुरुक्षेत्र को महिला पत्रकार सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ एक शिकायत दी। पुलिस अधीक्षक कार्यालय द्वारा शिकायत का नंबर 1036/पी/सिटी लगाकर जांच के लिए भेज दी है।

दस साल बाद फिर दम दिखाएंगे कापड़ी और सतीश!

मीडिया की दुनिया अजीब है. जो बेकार हो जाता है, वो बेचारों के हाथ चला जाता है. यही हाल विनोद कापड़ी और सतीश के. सिंह का है. दस साल पहले ये लोग कभी एक साथ जी न्यूज में हुआ करते थे. आज मजबूरी इन्हें फिर एक नए चैनल में एक साथ एक मंच पर ले आई है. मजबूरी कामन है. पेट की मजबूरी. लाखों की सेलरी की मजबूरी. घर चलाने की मजबूरी.

जाहिर है कि ये कितना व किस तरह की पत्रकारिता करेंगे, लेकिन शब्द हैं, शब्दों का क्या. लोग कुछ भी बोले दिखाए बताए सुनाए जा रहे हैं और बेरोजगारों की भीड़ ऐसी, बेचारों की भीड़ ऐसी की वाह वाह किए जा रही है. विनोद कापड़ी ने अपने फेसबुक वॉल पर पुराने दिनों के किसी जादू का हवाला देते हुए फिर से एक नया ड्रामा शुरू होने का डमरू बजाया है. विनोद कापड़ी के दंश से अभी फिलहाल रजत शर्मा निपट रहे हैं और इंडिया टीवी को पटरी पर लाने में लगे हुए हैं.

देखना है कि न्यूज एक्सप्रेस का क्या होता है. ताजी सूचना के मुताबिक विनोद कापड़ी के खिलाफ न्यूज एक्सप्रेस के कुछ वरिष्ठों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया है. ये विनोद कापड़ी के एफबी वॉल पर प्रकाशित उनका स्टेटस है, पढ़ें और आनंद लें..

Vinod Kapri : 10 साल । पूरे 10 साल बाद मैं और Satish K Singh एक साथ, एक मकसद के लिए काम करेंगे । यूँ तो हम दोनो ने साल 1995 में साथ ही टीवी में क़दम रखा। चैनल था ज़ी टीवी। लेकिन असली परीक्षा की घड़ी आई 2002 में जब ज़ी न्यूज़ में सतीश जी को Input और मुझे Output एडिटर बना दिया गया। जानने वाले जानते हैं कि उस दौरान क्या क्या नहीं हुआ था । मेरे हिसाब से लक्ष्मी जी के समय में वो ज़ी न्यूज़ का सबसे शानदार दौर था। सतीश जी जैसी न्यूज़ सेंस वाले संपादक टीवी में बहुत कम हैं। आज उन ऐतिहासिक पलो को याद करते हुए हम दोनो फिर 10 साल बाद वर्तमान में खड़े हैं। क्या पता भविष्य फिर से कुछ इतिहास बनाने का अवसर दे रहा है !! Fingers Crossed !! अभी ज्यादा नहीं कह पाऊंगा लेकिन संभव है कि इस बार सतीश जी आपको नए अंदाज़ में नज़र आएं।


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सतीश के साथी इंद्रजीत, आमोद भी पहुंचे न्यूज एक्सप्रेस, संजय पांडेय बने जीएम

विनोद कापड़ी अपनी दुकान सजाने में लगे हैं. अपने अधीन सतीश के. सिंह को ले आए तो सतीश अपने साथियों को पीछे पीछे ले आए. वही पुराने नाम. इंद्रजीत राय. आमोद राय. ये दोनों पहले भी सतीश के. सिंह के साथ जी न्यूज में थे, फिर लाइव इंडिया में आए और उसके बाद पाजिटिव मीडिया ग्रुप के फोकस व हमार टीवी में. अब ये न्यूज एक्सप्रेस के हिस्से हैं.

इंद्रजीत राय को एसआईटी हेड यानि स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम का हेड बनाया गया है. उनका पद डिप्टी एडिटर का है. वहीं आमोद राय को डिप्टी एडिटर बनाया गया है. वो पोलिटिकल रिपोर्टर होंगे. एक अन्य नियुक्ति संजय पांडेय की हुई है. संजय जी न्यूज से आए हैं. उनका पद क्या है, यह पता नहीं चल सका है. कोई उन्हें संपादकीय का हिस्सा बता रहा है तो कोई तकनीकी का. कुछ का कहना है कि उनका पद जनरल मैनेजर का है. आने वाले दिनों में इधर उधर के कई और लोग न्यूज एक्सप्रेस में भर्ती किए जाएंगे और फिर न्यूज एक्सप्रेस के पुराने लोगों को किन्हीं बहानों से निकाला जाएगा.

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आईबीएन7 से आशुतोष की अनआफिसियल विदाई की कुछ तस्वीरें

आईबीएन7 से इस्तीफा देने के बारे में भड़ास द्वारा फोन करने, एसएमएस करने पर मैनेजिंग एडिटर आशुतोष भले कुछ न रिप्लाई करे और बाद में किसी दूसरे नंबर से फोन किए जाने पर देर रात का हवाला देते हुए घुड़कने लगे, पर तस्वीरें बता रही हैं कि वो आईबीएन7 से जा चुका है. उसके साथ काम करने वाले लोग उसकी विदाई की तस्वीरें फेसबुक पर साझा करने लगे हैं. उन्हीं में से कुछ तस्वीरें यहां पेश हैं ताकि सनद रहे….

पता चला है कि सैकड़ों कर्मियों की नौकरी खाने वाला और कार्पोरेट के आगे पूंछ हिलाने वाला आशुतोष आम आदमी पार्टी ज्वाइन करने वाला है और उसके टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़कर सांसद बनने वाला है. जाहिर है, ऐसा अंबानियों के इशारे पर ही संभव है और ऐसा करके आशुतोष एक बड़े गेम प्लान को अंजाम देने वाला है, आम आदमी पार्टी को माध्यम बनाकर.

फिलहाल कुछ वो तस्वीरें जो गवाही दे रही हैं कि आशुतोष का आईबीएन7 से नाता खत्म होने में बस कुछ घंटे शेष हैं…


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कांशीराम के बेडरूम में घुसने पर झापड़ खाने वाला आशुतोष पूछ रहा कि फोन करने का ये कोई टाइम है!

कांशीराम के बेडरूम में घुसने पर झापड़ खाने वाला आशुतोष पूछ रहा कि फोन करने का ये कोई टाइम है!

Yashwant Singh : अभी मैंने आशुतोष को फोन किया. आईबीएन7 वाले को. तो भाई ने बोला कि ये कोई टाइम है फोन करने का. मैंने पूछा- ''भइया, हां या ना में बता दो कि इस्तीफा दिया है या नहीं, क्योंकि आपकी विदाई की फोटो शेयर हो रही है फेसबुक पर''. तब भी भाई मुझे घुड़कता रहा, बोलता रहा कि… ''ये कोई टाइम है भला फोन करने का''.

हद है यार.

ये वही आशुतोष भाईसाहब हैं जो बिना बुलाए दिन दहाड़े कांशीराम के घर में ही नहीं बल्कि बेडरूम में घुस गए थे और झापड़ खाकर बाहर निकले थे. और, उसी के बाद एसपी सिंह के रहमोकरम पर पत्रकार बन गए थे. पर अब यही महोदय खबर के लिए फोन किए जाने पर समय का हवाला दे रहे हैं.

बताया जा रहा है कि ये आशुतोष महाशय आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लडेंगे लोकसभा का, इसलिए पत्रकारिता नामक महान पेशे का दिल पर पत्थर रखकर महान त्याग किया है. अगर ऐसे लोगों ने आम आदमी को चपेटे में ले लिया तो खून चूसने वाले जंगली छोटे जानवरों के जीवन का क्या होगा और उन मोटे जानवरों के खून का क्या होगा जिसका इंतजार जंगली छोटे खूनपिस्सू प्राणी करते हैं.. लगता है प्रकृति का संतुलन गड़बड़ाने वाला है…

पता नहीं अरविंद केजरीवाल के पास कोई छननी बची है या नहीं या फिर दिल्ली प्रदेश में चुनाव जीतने के बाद इन 'आप' वालों की छननी छलनी-छलनी हो चुकी है… जो भी हो, वे खुद जानें.. लेकिन सैकड़ों मीडियाकर्मियों की नौकरी खाने वाले आशुतोष जैसे कार्पोरेट संपादकों की जगह आम आदमी पार्टी में हो गई तो भगवान जाने ये पार्टी कैसे आम आदमी की रह पाएगी….

सुना तो ये भी है कि आम आदमी पार्टी वाले अब अपने यहां जहाज कंपनियों के प्रबंधकों से लेकर बैंकरों तक और माफियाओं के परिजनों से लेकर पुराने गिरहकटों तक को टिकट देने को तैयार बैठे हैं. अगर ये सच है तो हम सब कुछ दिन बाद आम आदमी पार्टी के पर्चे को जहाज बनाकर आने वाले बरसात में अपने अगल-बगल की चोक गलियों नालियों में बहाया-भगाया करेंगे… या फिर उसे इतिहास अतीत की बातें मानकर रद्दी के भाव कबाड़ी साथियों को बेच बैठेंगे, ताकि किसी गरीब का तो घर चले…

पढ़ते रहिए डंके की चोट पर…

http://bhadas4media.com/edhar-udhar/17095-ashutosh-resing-ibn7.html

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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आईबीएन7 से आशुतोष का इस्तीफा, आज आफिस में आखिरी दिन

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भड़ास की सूचना सच है. आशुतोष का आईबीएन7 से इस्तीफा हो चुका है. उनका आज आखिरी दिन है. कल शाम उन्होंने आफिस से निकलते वक्त आफिस के कर्मियों के साथ खूब फोटोग्राफी कराई. आफिस के लोगों ने इसे अपने फेसबुक वॉल पर भी शेयर किया है. हालांकि जब भड़ास ने उनसे उनके इस्तीफे के बार में बात की तो उन्होंने देर रात होने का हवाला देते हुए भड़ास से ही पूछ लिया कि क्या ये वक्त होता है फोन करने का. याद रखिए, ये वही आशुतोष हैं जो काशीराम के बेडरूम में बिना बुलाए घुसकर झापड़ खा चुके हैं और आज वही खबर के लिए फोन किए जाने पर समय का हवाला दे रहे थे.

चर्चा है कि सैकड़ों लोगों की नौकरी खाने वाला आशुतोष जल्द ही आम आदमी पार्टी ज्वाइन करने वाला है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद देश भर के अवसरवादियों के दिल-दिमाग जाग उठे हैं और टिकट मांगने व चुनाव लड़ने के वास्ते अपनी-अपनी कंपनियों से इस्तीफा देकर आम आदमी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर रहे हैं. अगर जहाज कंपनी चलाने वाले से लेकर बैंकर तक और कार्पोरेट मीडिया के दलालों से लेकर माफियाओं के परिजनों तक ने आम आदमी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीत लिया तो इसका अंजाम समझा जा सकता है. इस मसले पर भड़ास जल्द ही कुछ बड़ा खुलासा करेगा. इंतजार करें.

मूल खबर..

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सैफई में मीडिया कैमरों के साथ प्रवेश पर प्रशासन ने लगाई रोक

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सैफई में हो रहे सैफई महोत्सव के समापन पर बुधवार को मीडिया पर कैमरे के साथ प्रवेश पर रोक लगा दी गई। मीडिया की सैफई महोत्सव की आलोचनात्‍मक कवरेज के बाद विपक्षी दलों द्वारा सरकारी धन की बर्बादी और मुजफ्फरनगर हिंसा पीड़ितों के प्रति सरकार की असंवेदनहीनता के आरोपों की वजह से ही यह कदम उठाया गया है।

सैफई महोत्सव की समापन संध्या में प्रस्तुति देने के लिए सलमान खान, माधुरी दीक्षित, राखी सावंत, रणवीर सिंह और आलिया भट्ट सहित कई बॉलीवुड सितारे सैफई पहुंच चुके हैं। इसके बाद इटावा प्रशासन ने मीडिया को बुधवार के सभी समापन कार्यक्रम की कवरेज करने से रोक दिया। प्रशासन ने मीडियाकर्मियों को कैमरा ले जाने पर रोक लगा दी। हालांकि सपा की तरफ यह कहकर मामले को टालने की कोशिश की जा रही है कि मीडिया पर रोक उन्‍होंने नहीं लगाई है बल्कि सलमान खान और अन्‍य सितारे मीडिया कवरेज नहीं चाहते, लिहाजा कैमरों पर रोक लगाई गई है।

सहारा समय के पत्रकार एमबी हैदर का निधन

लखनऊ। सहारा समय के पत्रकार एमबी हैदर का बुधवार को संजय गांधी पीजीआई में निधन हो गया. हैदर पिछले एक साल से मुंह के कैंसर से पीडि़त थे. लंबे समय से उनका इलाज चल रहा था. आज उन्‍होंने एसजीपीजीआई में ही आखिरी सांस ली. वे अपने पीछे पत्‍नी और तीन पुत्र छोड़ गए हैं. हैदर के निधन पर मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव समेत तमाम पत्रकारों एवं समाजसेवियों ने गहरा शोक व्‍यक्‍त किया है.

स्‍वीडन के अपहृत दोनों पत्रकार मुक्‍त हुए

स्वीडन के जिन दो पत्रकारों का सीरिया में अपहरण कर लिया गया था, उन्हें मुक्त कर दिया गया है। बीते साल नवम्बर माह के आख़िर में इन दोनों पत्रकारों का किन्हीं अज्ञात लोगों ने अपहरण कर लिया था। पिछले दो महीने से ज्‍यादा समय से ये लोग अपहर्ताओं के ही कब्‍जे में थे।

सीरिया में चल रहे गृह-युद्ध के कारण, पश्चिमी एशिया का यह देश पत्रकारों के लिए एक सबसे ख़तरनाक देश बन गया है। ’पत्रकार रक्षा समिति’ की सूचना के अनुसार पिछले साल सारी दुनिया में अपना काम करते हुए कुल 74 पत्रकार मारे गए हैं, जिनमें से 29 पत्रकार सिर्फ़ सीरिया में मारे गए।

देवरिया के जिला समाज कल्याण अधिकारी को जान की धमकी

देवरिया: समाजवादी पार्टी की सरकार में बढ़ती आपराधिक घटनाओं से आम जनता ही नहीं अधिकारी भी त्रस्त हैं। कुछ ही दिन पहले जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अमर नाथ तिवारी के सरकारी वाहन को, भाटपाररानी क्षेत्र में, आग लगाने का प्रयास किया गया था। अब जिला समाज कल्याण अधिकारी जी. आर. प्रजापति को उनके मोबाइल फोन पर जान से मारने की धमकी एवं गालियां दी जा रही है। इन धमकियों से समाज कल्याण अधिकारी एवं उनका परिवार अत्यन्त दहशत में है।

जी. आर. प्रजापति नें इस सम्बन्ध में पुलिस में प्राथमिकी दर्ज़ करायी है तथा अपने परिवार की सुरक्षा की मांग की है। इस बाबत थाना प्रभारी कोतवाली, अनिल पाण्डेय ने बताया कि मुकदमा दर्ज कर लिया गया है तथा अभियुक्त की गिरफ्तारी का प्रयास किया जा रहा है।

मूल रूप से झांसी जिले के रहने वाले जी. आर. प्रजापति ने मंगलवार को बताया कि अखिलेश सिंह पुत्र बृजराज, निवासी ग्राम बेलडाड, थाना बरहज, जिला देवरिया द्वारा आए दिन उनके मोबाइल फोन पर गालियां व उनको परिवार सहित जान से मारने की धमकी देता है। उनसे फिरौती की मांग भी की जा रही है। 

सोमवार को अखिलेश सिंह नें, जिला मुख्यालय स्थित विकास भवन में अपने तीन चार अन्य साथियों के साथ जी. आर. प्रजापति से मार-पीट एवं गाली-गलौज की तथा सरकारी कार्य में बाधा पहॅुचायी। समाज कल्याण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं कमीशनखोरी के कारण आए दिन कुछ न कुछ बवाल होता रहता है।

ओ. पी. श्रीवास्तव की रिपोर्ट।

फोटो खींचकर ब्लैकमेल कर रहा चैनल का रिपोर्टर गिरफ्तार

कुरुक्षेत्र पुलिस ने ब्लैकमेलिंग करके तीन लाख रूपए वसूलने के आरोपी इलेक्ट्रॉनिक चैनल के रिपोर्टर मेघराज मित्तल को गिरफ्तार कर लिया है। रिपोर्टर ने कुछ महिलाओं के साथ मिलकर एक व्यक्ति की आपत्तिजनक फोटो खींचकर बदनाम करने की धमकी देकर तीन लीख रूपए वसूल लिए थे। इसी मामले में पुलिस ने इससे पहले तीन महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया था।

गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने रिपोर्टर को न्यायालय में पेश कर रिमांड की मांग की। न्यायालय ने रिपोर्टर को दो दिन की पुलिस रिमांड में भेजे जाने का आदेश दे दिया। दरअसल नारंग सिंह निवासी बाखली ने थाना शहर थानेसर में शिकायत दर्ज कराई थी कि रीना नाम की महिला व अन्य ने उसे उसके मोबाइल पर फोन करके बुलाया और धोखे से एक मकान में ले गए। वहां पर ये लोग पहले से प्लान बनाकर गए थे और वहां पहुंचते ही इन लोगों ने नारंग को नशा दिया। जब नारंग नशे में थे तो इन लोगों ने नारंग की आपत्तिजनक तस्वीरें खींचकर, बदनाम करने की धमकी देकर ब्लैकमेल किया और तीन लाख रूपए वसूले।

शिकायत मिलने पर पुलिस अधीक्षक ने अपराध शाखा से मामले की जांच कराई। उप निरीक्षक जगदीश चंद्र ने जब जांच की तो पता चला कि इसमें एक पत्रकार भी शामिल है। पुलिस ने आरोपी मेघराज मित्तल पुत्र मोती लाल निवासी नन्द कॉलोनी पिहोवा को गिरफ्तार कर जब सख्ती से पूछताछ की तो इस ब्लैकमेलर पत्रकार ने सारी कहानी उगल दी।

पुलिस पूछताछ में पत्रकार ने पुलिस के सामने कबूल किया कि उसने व आशा रानी उर्फ सिमी पत्नी रामपाल निवासी बाहरी मोहल्ला थानेसर, आशा रानी पत्नी राकेश कुमार निवासी रेलवे रोड कुरुक्षेत्र व रजनी बाला पत्नी राजिन्द्र सिंह निवासी चक्रवर्ती मोहल्ला थानेसर व दो अन्य ने मिलकर नारंग सिंह से पैसे वसूलने के लिए जाल बिछाया था।

पत्रकार ने बताया कि नारंग सिंह उसके जाल में फंस गए थे और उसने नारंग से तीन लाख रूपए वसूल किए थे। गिरफ्तारी के बाद मंगलवार को मेघराज मित्तल को अदालत में पेश किया गया जहां न्यायालय ने उसे दो दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया। अभी पुलिस मामले में जांच कर रही है और पुलिस को उम्मीद है कि इसमें और लोगों के नाम भी सामने आ सकते हैं।

सिविल सेवा में जाते ही करोड़ों लेकर अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ शादी कर लेते हैं

Tara Shanker : हर साल दर्ज़नों दोस्त देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा में चुने जाते हैं! कहने को तो समाज सेवा के लिए इस सेवा में जाना चाहते हैं लेकिन सिलेक्शन के छः महीने के अन्दर ही पता चलता है कि पचास लाख से लेकर दो-तीन करोड़ रुपये दहेज लेकर पूरे ताम झाम के साथ शादी की! शादी भी अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ!

न तो जातिवाद गया मन से, न लालच और न ही मर्दवाद! अब ऐसे होनहारों से समाज का कैसा भला होगा, आप खुद ही अंदाज़ा लगा लो! जो व्यक्तिगत तौर पे अच्छा नहीं वो क्या ख़ाक समाजहित करेगा!

नोट: सब नहीं लेकिन अधिकांश की बात कर रहा हूँ! दोस्तों आपसे बहुत उम्मीदें होती हैं, आप सक्षम भी होते हो बेहतर काम करने में! कुछ साथियों ने निराश नहीं किया है!

जेएनयू में अध्ययनरत तारा शंकर के फेसबुक वॉल से.

काश सैफई जैसी किस्मत यूपी के और गांवों की भी होती

Arvind K Singh : सैफई का समाजवाद… सैफई गांव अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है..मुलायम सिंह जी का गांव है..1990 के बाद से यहां समाजवाद का रंग चढ़ा है…जब मायावती आती हैं तो यहां की इमारतें बेरौनक होती है और बादलपुर चमकने लगता है..गांव है तो सात हजार की आबादी का लेकिन यहां इतनी रकम खर्च की गयी है कि उससे कमसे कम तीन हजार गांव आबाद हो जाते…

इसी बार अखिलेश यादव गांव को 334 करोड़ की सौगात दे चुके हैं…सैफई महोत्सव होता है तो उसे देख कर ही इटावा वाले धन्य हो जाते हैं…आज कल भी धन्य हैं…धन्य है सैफई का समाजवाद…हालांकि मैं भी वहां कई बार जा चुका हूं…एक बार मुलायम सिंह जी के साथ…तब वे रक्षा मंत्री थे…लेकिन अब तो यहां की और उन्नति हो गयी है… काश ऐसी किस्मत यूपी के और गांवों की भी होती.

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

एसएमएस करके पत्रकारों की नौकरी खा लेता है विष्णु त्रिपाठी!

दैनिक जागरण, नोएडा में निशिकांत ठाकुर राज खत्म हुआ तो अब विष्णु त्रिपाठी राज शुरू हो गया है. निशिकांत ठाकुर के जमाने के लोगों को बुरी तरह हड़काया धमकाया निकाला जा रहा है. हर राज के अपने सुख दुख होते हैं. पता चला है कि विष्णु त्रिपाठी ने अब एसएमएस करके लोगों को नौकरी से निकालने का काम शुरू कर दिया है.

यही हरकत उन्होंने एक महिला पत्रकार के साथ की. उस महिला पत्रकार को जब विष्णु त्रिपाठी ने एसएमएस कर कहा कि तुम्हें नौकरी से निकाला जा रहा है, अब आफिस आने की जरूरत नहीं है, तब उस महिला पत्रकार ने रिप्लाई किया- मैं इस बर्ताव की शिकायत महिला आयोग में करूंगी. महिला आयोग का नाम सुनते ही विष्णु त्रिपाठी की बहादुरी और साहबई गायब हो गई. उन्होंने फौरन उस महिला पत्रकार से माफी मांगते हुए उन्हें ससम्मान नौकरी पर आने का अनुरोध किया. अब वो महिला पत्रकार जागरण नोएडा में काम करने लगी है.

ऐसा नहीं कि विष्णु ने सिर्फ महिला पत्रकार की नौकरी एसएमएस पर खाई. वो कई पत्रकारों को एसएमएस के जरिए नौकरी से निकाले जाने का फरमान सुना चुके हैं. ज्यादातर पत्रकार इस एसएमएस का उपर वाले का आदेश मानकर शिरोधार्य कर लेते हैं और चुप्पी साध लेते हैं. पर इस लड़की ने हिम्मत दिखाकर ढेर सारे कायर व कमजोर पुरुष पत्रकारों को आइना दिखाने का काम किया है. (कानाफूसी)

सार्वजनिक मंचों से मीडिया को धमका रहे सपा के माननीय पहले खुद को सुधारें : भाजपा

लखनऊ : भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि सपाई अराजकता के चरमोत्कर्ष पर है। सार्वजनिक मंचों से मीडिया को धमकाने पर उतरे सपा के माननीय अपनी कारस्तानियां ठीक करे तो ज्यादा बेहतर होगा। पार्टी प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा कि सपा के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में मीडिया को दी जा रही धमकियां सपाईयों के बढ़े हौसलों का परिणाम है।

पार्टी मुख्यालयों पर मंगलवार को पार्टी प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा कि आज फिरोजाबाद जनपद के सिरसागंज में समाजवादी पार्टी की संकल्प रैली के दौरान सपाई मीडिया पर घुडकी-धमकी पर उतर आये। घटना का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि आगरा के वाह इलाके से अगवा किशोरी और उसके परिजन लगातार कह रहे है कि अगवा किशोरी की बरामदगी सिरसागंज के सपा विधायक के शिकोहाबाद आवास से हुई।

सत्ता के उच्च संरक्षण के कारण लाचार पुलिस ने दबाव डाला। बयान बदलने को मजबूर किया। अब पीड़िता के परिजन न्याय पाने के लिए कोर्ट में अपील कर एक बार फिर पीडि़ता का बयान दर्ज किए जाने की मांग कर रहे है। पीड़िता का आरोप है कि उसे अगवा कर सिरसागंज के विधायक के घर पर बंधक बना कर रखा गया और दो लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया।

उन्होंने कहा कि जब पीड़िता और उसके परिजन आरोप लगा रहे हैं तो मीडिया छाप रहा है। एक तो पहले लड़की की बरामदगी के बाद उसे चार दिन तक महिला थाने में बैठाये रखा गया। जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने इंसाफ की गुहार के लिए लाठियां खाई तो पुलिस ने बयान करा घरवालों के सुपुर्द कर दिया। अब जब मीडिया में किशोरी ने पूरा मामला बताते हुए पुलिस की भूमिका और विधायक पर सवाल खड़े किये तो बौखलाहट में मीडिया पर ही बरस पड़े नेता जी।

श्री पाठक ने कहा जिस मंच से विधायक मीडिया को धमका रहे थे उसी मंच पर बैठे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने अभी पिछले दिनों सैफई में प्रदेश में हो रही सपाई गुण्डई रोकने की वकालत करते हुए कहा था कि बिना इसे रोके प्रदेश में किसी उपलब्धि का कोई मतलब नही है। फिर आज फिरोजाबाद में हो रही रैली में मुकदमा दर्ज कराने तक की चेतावनी क्यों? लगातार हो रही सपाई अराजकता से आजिज अब सपा के बड़े नेता अपने लाख दावे के बावजूद इसे रोक पाने में असफल हो रहे है। कथनी और करनी मे अंतर के कारण उनकी बातो का कोई असर नही पड़ रहा है। मीडिया को निशाने पर ले अब घुड़की-धमकी पर उतर आये हैं।

प्रेस विज्ञप्ति


मूल खबर :

मीडिया को धमका रहा है रामगोपाल और बेचारे मीडिया वाले चुप्पी साधे हैं

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यूपी में जंगलराज : सपा विधायक के घर से मिली अपहृत किशोरी

 

मीडिया को धमका रहा है रामगोपाल और बेचारे मीडिया वाले चुप्पी साधे हैं

यूपी में राज कर रहे यादव बंधुओं में से एक रामगोपाल यादव ने मीडिया वालों को खुलेआम धमकी दी है कि उन्हें सबक सिखाया जाएगा और जेल भेजा जाएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि मीडिया वालों ने खबर छापा व दिखाया कि सपा के एक विधायक के घर से अपहृत किशोरी बरामद हुई. यूपी की पुलिस और खुद रामगोपाल ने विधायक को क्लीनचिट देने के बाद खबर छापने दिखाने वालों को एजेंडे पर ले लिया है.

अपने पुत्र के चुनाव क्षेत्र फिरोजाबाद में प्रचार के वास्ते पहुंचे सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने मीडिया को निशाने पर लिया. सिरसागंज से विधायक हरिओम यादव को क्लीन चिट देते हुए कहा- मीडिया दुष्प्रचार कर रहा है, विधायक का चरित्र हनन किया जा रहा है. धमकाने वाले अंदाज में उन्होंने कहा, मई के दूसरे हफ्ते में अखबारों और चैनलों पर मुकदमा किया जाएगा, जिम्मेदार लोगों की जमानत भी नहीं होने दी जाएगी.

रामगोपाल ने कहा कि 1977 में प्रदेश सरकार में मुलायम सिंह सहकारिता मंत्री बने थे. उस वक्त मुलायम सहित पूरे परिवार पर काली कमाई समेत कई आरोप लगाए. मुंबई और एक लखनऊ के समाचार पत्र ने इन्हें प्रकाशित किया था. इनमें एक मालिक ने छह माह जेल काटी थी और दूसरे को हार्ट अटैक हो गया.

उन्होंने कहा कि विधायक हरिओम के खिलाफ अखबारों और चैनलों में गलत दिखाया जा रहा है, उनके खिलाफ मई के दूसरे सप्ताह में मुकदमा दर्ज कराया जाएगा. मुकदमे के बाद आरोपी जेल जाएंगे और जमानत भी नहीं होने दी जाएगी. इसके लिए अखबार और चैनलों के मालिक मुल्जिम नंबर एक और बाद वाले दूसरे नंबर पर होंगे. उल्लेखनीय है कि आगरा से अगवा एक किशोरी ने विधायक के शिकोहाबाद स्थित आवास में खुद को रखे जाने की बात कही है. वहीं से खुद के बरामद होने की जानकारी दी है. इसी के बाद से विधायक हरीओम चर्चा में हैं.

उधर, इस खुलेआम धमकी के बाद भी मीडिया वाले चुप्पी साधे हुए हैं. मीडिया के नाम पर बने संगठनों, संपादकों के संगठनों, पत्रकारों के संगठनों, मीडिया मालिकों के संगठनों को अब कतई नहीं लग रहा कि रामगोपाल का बयान अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात है. क्यों? सिर्फ इसलिए कि रामगोपाल एक बड़े प्रदेश के सत्ताधारी सरकार के कुनबे का प्रभावशाली नेता है और इस सरकार से मीडिया मालिकों व मीडिया वालों को काफी कुछ फायदा पहुंचता मिलता है? अगर वाकई दम हो तो पत्रकार संगठनों और मीडिया संगठनों को रामगोपाल की धमकी का मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए.

वैसे, मेरी निजी सलाह रामगोपाल को है कि मीडिया वालों को सबक सिखाने, जेल भेजने, जमानत न होने देने जैसी बातों में दिमाग लगाने की जगह लोकसभा के चुनाव और यूपी में सुशासन पर ध्यान लगाओ. ऐसा न हो कि लोकसभा तो हाथ से जाए ही जाए, अगली दफे यूपी के विधानसभा में तुम लोगों का अता-पता भी न चले.

और हां, रामगोपाल यादव, सुन ले, मैंने भी भड़ास पर खबर छाप रखी है कि सपा के विधायक के घर से अपहृत किशोरी बरामद हुई… मुझे भी गिरफ्तार करा लेना और जमानत न होने देना…

समय बड़ा क्रूर होता है प्रोफेसर. आज सत्ता के मद में पगलाए कुछ भी बोले कहे जा रहे हो, बिना अपने गिरेबां में देखे कि जनता से क्या वादा किया था और यूपी में हो क्या रहा है. बाकी, ये बड़ा आसान काम होता है किसी को पकड़ लेना, जेल में डाल देना, जमानत न होने देना. मुश्किल काम होता है जनता को राहत देना, गुंडों- भ्रष्टों को पकड़ना, अपने पार्टी व शासन के करप्टों को दंडित करना. खैर, विनाश काले विपरीत बुद्धि.

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनके संपर्क 9999330099 या yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


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भारत में इस बार राजनीतिक पार्टियां नहीं बल्कि पीआर एजेंसियां चुनाव लड़ रहीं हैं

Anurag Anant : भारत में इस बार राजनीतिक पार्टियां नहीं बल्कि पीआर एजेंसियां चुनाव लड़ रहीं हैं. मोदी जिन्हें मैं 'साहेब' बुलाता हूँ. उनके तरफ से एप्को वर्ल्ड वाइड है, तो राहुल गाँधी जिन्हें सब पप्पू और मोदी शहजादे कहते है, ने जापानी पीआर कंपनी देन्त्सू इंडिया को 500 करोड़ रुपये का ठेका दिया है,  अपनी तरफ से चुनाव लड़ने के लिए.

और तीसरा पक्ष है 'आप' का, ये लोग खुद ही एजेंसी है. इनकी पार्टी का नाम ही ऐसा है की चाहो न चाहो दिन में 365 बार लेना ही पड़ता है. और अगर आप औसत से ज्यादा सभ्य है तो ये आंकड़ा 1000 भी पार कर जाता है.

हम तो खांटी इलाहाबादी है. ज्यादा 'आप' 'आप' करना हमें अच्छा नहीं लगता. तुम में जो बात है "आप' में कहाँ. ये सब पीआर एजेंसी की माया है कि आज नारा लागते किसी कार्यकर्ता से पूछो भैया आपकी विचारधारा क्या है ? तो ऐसा मुँह बनाता है जैसे अचानक आईएस की परीक्षा में बैठा दिया गया हो. कुछ देर चुप रहता है फिर सोच के बोलता है. नमो-नमो !!, राहुल गाँधी जिंदाबाद !! अरविन्द तुम संघर्ष करो आप आदमी तुम्हारे साथ है.

अनुराग अनंत के फेसबुक वॉल से.


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हद है… ये भारतीय रेल है…

Satyendra Pratap Singh : अभी महाराष्ट्र में एक ट्रेन के स्लीपर क्लास में आग लगने से सात लोग मर गए। इसके पहले आंध्र प्रदेश में ट्रेन में आग लगी थी। अगर चालीस साल की दुर्घटनाओं और लाशों को गिनें तो बस लाश ही गिनेंगे। अगर ये घटना यूपी/बिहार में होती तो शायद बुद्धिजीवी लोग कह देते कि ये भुच्चड़, मूर्ख, गंवार और बीड़ी पियाक हैं, मरने के ही काबिल हैं।

और एक जापान है। हिताची वहां रेल चलाते हैं साढ़े तीन सौ किलोमीटर प्रति घंटे रफ्तार से। मुस्कुराते हुए कहते हैं कि हमारी बुलेट ट्रेन एक्सीडेंट फ्री है, जो चालीस साल से ऊपर हुई चलते। उसमे यात्रा करने वाले बताते हैं कि अगर ट्रेन अचानक रुक जाए तो हम बूझ जाते हैं कि तेज भूकंप आने वाला है! बस हम लोग लगे रहें साम्प्रदायिकता / गैर साम्प्रदायिकता में! न पढने दें 80% आबादी को! मानें 20% को जन्मजा योग्य! गाएं कि हमारे पास पुष्पक विमान था, शल्य चिकित्सा थी, हाथी का मुंह आदमी को लगा देते थे! ये करने के अलावा हम कबार ही क्या सकते हैं…

पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.

Trivedi Nikhilesh : कल रात एक भयानक हादसे में देहरादून एक्सप्रेस के 9 यात्री जिन्दा जल गए। ये सभी गहन निद्रा में थे। एक दो हफ्ते पहले आंध्र में भी ऐसी ही घटना में 30 मुसाफिर चल बसे। अक्सर रात्रि में आग लगने पर सोये हुए यात्रियों पर आफत टूट पड़ती है और रेल विभाग मुआवजा देकर मामला नत्थी कर देता है। क्या रेलवे बोर्ड ऐसा सिस्टम विकसित नहीं कर सकता क्या कि आग की शुरुआत होते ही या धुँआ उठते ही ट्रेन के ब्रेक लग जाएँ और पूरी ट्रेन में सायरन बज उठे। यदि ऐसा हो जाये तो कितनी जिंदगियां बच सकेंगी।

निखिलेश त्रिवेदी के फेसबुक वॉल से.


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‘आप’ आफिस पर हमले से पार्टी की टीआरपी में बेतहाशा वृद्धि…

Yashwant Singh : 'आप' आफिस पर हमले से पार्टी की टीआरपी में बेतहाशा वृद्धि… यकीन मानिए, चीजें खुद ब खुद जिधर जा रही हैं, उसके हिसाब से लोकसभा चुनाव नतीजों में दिखेगा कि केजरीवाल की पार्टी किंगमेकर बनकर उभरी है… तब, मजबूरी में सभी 'आप' को ही किंग बना देंगे यानि पीएम का पद दे डालेंगे… सो, तुम सितम और करो…

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Yashwant Singh : लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जब दस भ्रष्ट कांग्रेसियों और पांच भ्रष्ट भाजपाइयों को केजरीवाल जेल में बंद करा देंगे तब पूछना कि कुछ ज्यादा तो नहीं हो गया…. मित्रों, राजनीति की दशा-दिशा कोई एक घटना-परिघटना बदल देती है. इस समय गेंद केजरीवाल के पाले में है और किसी को नहीं पता कि वो कब व किस तरह की किक लगाने वाले हैं… पर मुझे जो खबर है, लोस चुनाव अधिसूचना जारी होने से ठीक पहले तहलका मचेगा और कई भ्रष्ट कांग्रेसी भाजपाई जेल जाएंगे… बस इसी के बाद देश की जनता झूम झूम कर केजरीवाल केजरीवाल कहेगी… कुछ दिमाग में घुसा या नहीं!

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Yashwant Singh :  मुझे 'आप' से इसलिए स्नेह है क्योंकि इस पार्टी के माध्यम से कुछ ऐसे लौंडे, लड़के, लोग सांसद विधायक बन जाएंगे, बन रहे हैं, जो कभी सपना नहीं देख सकते थे चुनाव जीतने का… राजनीति नामक चीज पर पूरी तरह कुंडली मारकर उसे अपने कब्जे में कर रखे दलों को खोद खोद कर खिझाने, तड़पाने, भगाने, झुकाने का यही मौका है… मुझे पता है, 'आप' वाले कोई सुपरमैन नहीं जो भ्रष्ट नहीं होंगे और पतित नहीं होंगे.. पावर का चरित्र ऐसा है कि इससे कम्युनिस्ट से लेकर संघी तक, सभी मदमस्त हो जाते हैं.. इसलिए भरम न पालिए पर 'आप' वालों को सपोर्ट करिए… ताकि प्रोफेशनल नेताओं, धनपशुओं, माफियाओं, हरामियों के तिकड़म को बिगाड़ कर पपूवा रजूवा मुन्नवा पिंटुआ टाइप किन्हीं आम लोगों को सांसद विधायक मंत्री बनाया जाए… यही प्रक्रिया लोकतंत्र को जिंदा रखेगी… जैसे बहता जल पवित्र होता है वैसे नई राजनीति भी भ्रष्ट सिस्टम का शुद्धीकरण कर देती है…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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'आप' आफिस पर हमला : ये भारत के हिंदू तालिबान हैं, देश को अफगानिस्तान बनाना चाहते हैं…

‘आप’ आफिस पर हमला : ये भारत के हिंदू तालिबान हैं, देश को अफगानिस्तान बनाना चाहते हैं…

Anand Pradhan : आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर हमला और उससे कुछ महीने पहले प्रशांत भूषण पर उनके दफ्तर में हमला अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है. इन हमलों और इनका किसी भी अगर-मगर से बचाव करने या उसे ठीक ठहरानेवाले जनतंत्र के दुश्मन और फासीवाद के समर्थक है.

ये वही फासीवादी भगवा गुंडे हैं जो कभी राष्ट्रवाद और देशभक्ति की आड़ लेकर हिंदू कट्टरपंथियों की राजनीति को एक्सपोज करनेवाले बुद्धिजीवियों-पत्रकारों-लेखकों पर हमले करते हैं और कभी हिंदू संस्कृति की रक्षा के नामपर वैलेंटाइन डे पर प्रेमी और मित्र युवक-युवतियों को निशाना बनाते हैं और कभी मृत गाय का बहाना बनाकर दलितों की हत्याएं करते हैं और कभी ‘लव जिहाद’ का हौव्वा खड़ा करके दंगे और कत्लेआम करवाते हैं और कभी धर्मान्तरण रोकने का बहाना बनाकर चर्च जलाते और निर्दोष लोगों की हत्याएं करते हैं…. यह सूची लंबी है… ये भारत के हिंदू तालिबान हैं और किसी भ्रम में मत रहिये, ये देश को अफगानिस्तान बनाना चाहते हैं…

Sanjay Sharma : शर्मनाक ..भगवा झंडे लिए श्री राम सेना के लोगो ने वही काम किया जिसके लिए नैतिकता बाली पार्टी उन्हें उकसा रही थी ..किसी के वयान से आपत्ति है तो उसका मौखिक और लिखित विरोध कीजिए .आप पार्टी के दफ्तर पर हमला करके क्या सिद्ध करना चाह रहे है …?क्या आप लोगो की जिंदगी में सिर्फ हिंसा ही है?

Payal Chakravarty : शुरू हो गई बीजेपी की गुंडागर्दी…हिंदुत्व की आड़ में झगड़ा फसाद करना इनकी पुरानी आदत है….जिंदगी भर राम मंदिर का मुद्दा पकड़कर ही बैठे रहेंगे…अब सीएम के घर में तोड़फोड़ कर रहे हैं….भाई कोई इनसे पूछे….कि इनके हिंदू धर्म नें बस यही सिखाया है इन्हें….जबरदस्ती करके बातें मनवाना ? वहां एक भाईसाहब नें मेरा खून पी रखा है…जब भी इनबॉक्स खोलती हूं बीजेपी की तरफदारी से भरा एक मैसेज होता है…भाई न जान न पहचान मैं तेरा मेहमान…..

Nadim S. Akhter : 'आप' के मुख्यालय पर हमला.. लीजिए, भगवा ब्रिगेड अपने असली रंग में. आम आदमी पार्टी के कौशाम्बी स्थित मुख्यालय पर हमला कर दिया. 40-50 लोग गाड़ियों पर सवार होकर आए थे. बजरंग दल से लेकर ना जाने कौन-कौन से दल. अब इन्हें कौन समझाए कि ऐसी घटनाओं के बाद जनता इनसे और इनके राजनीतिक संगठन से दूर ही छिटकेगी. अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं ये लोग. ठीक उसी तरह, जैसे मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों के मामले में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की सरकार -आ बैल मुझे मार- वाली रणनीति पर चल रही है और आजम खां सीन से गायब हैं.

Surendra Grover : केजरीवाल के घर पर हमला करने वाले राष्ट्रवादी मुझे तो राष्ट्र भंजक अधिक लगते हैं..

Ujjwal Bhattacharya : मेरी राय में कौशांबी में आप पार्टी मुख्यालय पर हमला कोई विच्छिन्न घटना नहीं, बल्कि एक शुरुआत है. सिर्फ़ हिंदू रक्षा संगठनों की ओर से ही नहीं, खाप पंचायत वाले भी हमले करेंगे. बात कुछ अजीब है ना? 'आप' पार्टी ने सांप्रदायिकता विरोध को अपना कार्यक्रम नहीं बनाया है, यहां तक कि वह 'खाप' पंचायत के साथ विमर्श की बात कर रही है. लेकिन…

Suresh Swapnil : AAP के दफ़्तर पर हमला यानी मोदी को 10 और सीटों का घाटा ! आज सुबह 11 बजे कौशांबी, ग़ाज़ियाबाद स्थित आम आदमी पार्टी के मुख्यालय पर ख़ाकी नेकर वाले संघी हुड़दंगियों के ताज़ा समूह 'हिंदू रक्षा दल' ने हमला कर दिया ! इस हमले की निन्दा सबसे पहले राम माधव ने की, इसलिए कि कह सकें कि 'हिंदू रक्षा दल' से 'संघ' का कोई सम्बंध नहीं है ! अब बताइए, 'संघ' के इस बयान पर क्या आपको अभी भी हंसी आती है ? हम तो भाई, सुन-सुन कर बोर हो चुके ! पहले तो हर 'हमले' के लिए एक नया संगठन बनाना, फिर सफ़ाई देते फिरना कि 'हमारा' कोई सम्बंध नहीं है ! इतना भय लगता है अपना नाम आने से तो यह टुच्चई, लुच्चई, लफंगई बंद क्यों नहीं कर देते ? यक़ीन मानिए, ऐसी हर हरकत से एक से दस सीटों का घाटा उठाना पड़ सकता है भाजपा को ! आपको क्या लगता है?

फेसबुक से.

तो प्यारी लड़कियों… पति करोड़पति हो तब भी कमाओ, पिता अरबपति हों तब भी कमाओ!

Pallavi Trivedi : मैं आज उनतालीस वर्ष की उम्र तक भी अविवाहित रहने का साहस इसलिए कर सकी क्योंकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई! मैं मुझसे शादी के लिए मिलने आये कई लड़कों को इसलिए मना कर सकी क्योंकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई! मैं मेरा पैसा घूमने में खर्च करना चाहती हूँ या शॉपिंग में या चैरिटी में , ये फैसला इसलिए कर पाती हूँ क्योंकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई!

आज परिवार और समाज में इज्जत पाती हूँ और लोग महत्वपूर्ण फैसलों में मुझसे सलाह ले लिया करते हैं क्योंकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई! मुझमे सारी दुनिया अकेले घूमने का आत्मविश्वास और साहस है, क्योंकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई! मुझे अकेलापन नहीं होता और समय काटने के लिए किसी और की ज़रुरत नहीं होती क्योंकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई! कमाना केवल पेट भरने के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए भी ज़रूरी है ! आर्थिक आत्मनिर्भरता आपको वास्तविक आजादी देती है!

तो प्यारी लड़कियों… हर हालत में आर्थिक आत्मनिर्भर बनो. सिर्फ टाइम पास करने के लिए नहीं बल्कि अपनी आज़ादी के लिए कमाओ! पति करोड़पति हो तब भी कमाओ, पिता अरबपति हों तब भी कमाओ! जी भर के सुख लूटो अपनी स्वतंत्रता का!

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Pallavi Trivedi : शर्म आती है उन लड़कियों पर जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपने दहेज़ के लिए माँ बाप को कर्ज़दार होते देखती हैं पर दहेज़ लेने वाले परिवार में शादी से इंकार नहीं करतीं !

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Pallavi Trivedi : अगर कोई स्त्री बोलचाल में माँ , बहन की अथवा स्त्री अंगों से सम्बंधित गालियां उपयोग करती है तो वह स्वयं स्त्री विरोधी व पुरुषवादी ही है ! फिर चाहे वो खुद को कितना भी " फेमिनिस्ट " या "स्त्री विमर्श की नेता" क्यों न घोषित करती फिरे ! जब तक स्वयं अपना सम्मान नहीं करोगी तब तक दूसरों से सम्मान की अपेक्षा व्यर्थ है !

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Pallavi Trivedi :  अगर कोई भी स्त्री या पुरुष अपने जीवन के अकेलेपन से उकताकर किसी भरोसेमन्द साथी की तलाश में घूमता घूमता फेसबुक पर चला आया है तो वह एक बेहद जटिल जाल में खुद को उलझाने के लिए तैयार रहे! ये प्लेटफॉर्म केवल अपना टेलेन्ट शो करने ,अपने विचार रखने , देश दुनिया में क्या चल रहा है , इस पर विभिन्न लोगों की राय जानने और शुद्ध टाइम पास करने के लिए है! भांति भांति के लोगों की भीड़ में आपके सपनों का हमसफ़र ढूंढना अति मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है! इससे बेहतर तो अचार पापड बनाना, एक अखबार को दस बार पढ़ना, सास बहू के सीरियल देखना और हिमेश रेशमिया के गाने सुनकर समय बिताना है! सिर्फ स्टेटसों को किसी व्यक्ति का आईना न माना जाए! लाइक और कमेंट के रिश्ते ही यहाँ बन सकते हैं और निभ सकते हैं!

मध्य प्रदेश की महिला पुलिस अधिकारी पल्लवी त्रिवेदी के फेसबुक वॉल से.

पापा ने अपनी देह जब छोड़ी तब भी उनके हाथ में उस दिन का अखबार ही था जो वे पढ़ रहे थे…

Utkarsh Sinha : पापा स्मृति शेष…. वो आप ही थे पापा जिसने हमें जिंदगी सिखाई, स्मृतियों की सड़क आज पांच साल वाली उम्र में ले जा रही है जब बनारस के पिपलानी कटरा के मकान नंबर 24/44 के दरवाजे पर सुबह-सुबह आप हमारे हाथों से अखबार खरीदवाया करते थे… तब हमें मालूम ही नहीं था कि यह होता क्या है? मगर आपने आदत डलवा कर इसकी जरूरत सिखा दी…

फिर उम्र थोड़ी बढ़ी तो हम भी बड़े भाई और बहनों के साथ उस कतार का हिस्सा हो गए जो हर रात आठ बजे पापा की चारपाई के पास चटाई पर लगती थी, और बगल के स्टूल पर बड़ा वाला रेडियो बीबीसी पर ट्यून होता… हम सब भाई बहनों को आधा घंटा इसे सुनना कम्पलसरी था और फिर हर इतवार इस आधार पर टेस्ट देना होता था जिसके बाद हमें मनचाही कामिक्स खरीदने का इनाम मिलता था…

घर में कई अखबार और मैगजीन की परंपरा आप ने ही डाली… छात्र जीवन में जब मेरा पहला लेख साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपा तब आप कितने खुश हुए थे. और जब बतौर संपादक मैंने अखबार निकाला तब भी खबरों के चयन और लेआउट को लेकर हम घंटों बहस करते रहे… और अपने इस प्रिय कार्य को आप अंत तक नहीं भूले…. पापा ने अपनी देह जब छोड़ी तब भी उनके हाथ में उस दिन का अखबार ही था जो वे पढ़ रहे थे…

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट उत्कर्ष सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

हिन्दी की एकमात्र यहूदी उपन्यासकर सम्मानित

शुक्रवार दिनांक 3 जनवरी को सोसाइटी फॉर सोशल रिजेनेरेशन ऐंड इक्यूटी नामक ग़ैर सरकारी संगठन ने कल्याणपुर, लखनऊ स्थित अपने कार्यालय में एक समारोह में हिन्दी भाषा की एक मात्र यहूदी उपन्यासकार, शीला रोहेकर, को सम्मानित किया। पिछले ही वर्ष, 2013 में भारतीय ज्ञानपीठ ने शीला रोहेकर का तीसरा उपन्यास मिस सैमुएल: एक यहूदी गाथा प्रकाशित किया।

शीला रोहेकर के इस उपन्यास के सिवा हिन्दी में केवल एक ही और ऐसा उपन्यास है जो भारतीय यहूदी जीवन का चित्रण करता है। मगर वह उपन्यास आज से बावन वर्ष पूर्व 1961 में प्रकाशित हुआ था जिसे मीरा महादेवन ने लिखा था। मीरा महादेवन एक भारतीय यहूदी परिवार में जन्मी थीं तथा उनके माता पिता ने उन्हें मिरियम जेकब मेंद्रेकर नाम दिया था। मेंद्रेकर की मृत्यु के पश्चात अब शीला रोहेकर ही हिन्दी की एक मात्र यहूदी उपन्यासकार हैं।

सम्मान समारोह में सोसाइटी फॉर सोशल रिजेनेरेशन ऐंड इक्यूटी की अध्यक्षा शुमा तालुकदार ने शीला रोहेकर को एक मेमेंटो पेश किया। इस अवसर पर एक परिचर्चा और काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गया। परिचर्चा का विषय था “हिन्दी उपन्यास में धार्मिक अल्पसंख्यकों का चित्रण”। परिचर्चा में सबसे पहले ग्रेटर नोएडा में स्थित गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नवरस जाट आफरीदी ने हिन्दी उपन्यासों में यहूदियों के चित्रण पर एक व्याख्यान दिया, जिसके उपरांत परिचर्चा का संचालन करते हुए उन्होने शीला रोहेकर को बोलने के लिए आमंत्रित किया। रोहेकर ने अपने भारतीय यहूदी समुदाय का परिचय देते हुए उसके इतिहास और सामाजिक ताने बाने पर प्रकाश डाला। यहूदी समुदाय भारत का सबसे छोटा अल्पसंख्यक संप्रदाय है। परिचर्चा में लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के सेवानिवृत प्रवक्ता डॉ तुकाराम वर्मा ने हिन्दी उपन्यासों  में ईसाइयों और बौद्ध बुद्धजीवी तथा हास्य कवि डॉ डंडा लखनवी ने बौद्धों के चित्रण पर ध्यान आकर्षित किया।

परिचर्चा के उपरांत होने वाली काव्य गोष्ठी में देवकी नन्दन शांत, अनवर नदीम, डॉ पद्मिनी नातू, डॉ तुकाराम वर्मा और डॉ डंडा लखनवी ने अपने काव्य पाठ से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। गोष्ठी का संचालन किया उर्दू शायर अनवर नदीम ने। इस अवसर पर हिन्दी उपन्यासकर रवीन्द्र वर्मा तथा नारी शिक्षा निकेतन स्नातकोत्तर महाविद्यालय के अरब संस्कृति विभाग की सेवा निवृत अध्यक्षा डॉ मंजु सिकरवार भी उपस्थित थीं।

आईबीएन वाले आशुतोष इस्तीफा देकर ‘आप’ ज्वाइन करने वाले हैं?

आशुतोष को लेकर समय-समय पर चर्चाएं उड़ती रहती हैं. ताजी गासिप ये है कि आशुतोष आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर पद से इस्तीफा देकर आम आदमी पार्टी ज्वाइन करने जा रहे हैं और लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे. सूत्रों के मुताबिक नेटवर्क18 के मालिक अंबानी अब अपने तरीके से चैनल चला रहे हैं और उनका झुकाव मोदी की तरफ है.

ऐसे में आशुतोष और राजदीप के लिए बहुत मुश्किल स्थिति बनती जा रही है. पर नौकरी जो न कराए और लाखों की सेलरी की मजबूरी जितना न झुकाए की स्थिति में ये दोनों खून के घूंट पीकर काम कर रहे हैं. बताया जाता है कि इसी पाप को धोने के वास्ते और राजनीत में नया व जोरदार करियर बनाने की खातिर आशुतोष बड़ा फैसला ले चुके हैं. वो आम आदमी पार्टी के टिकट से दिल्ली या यूपी से चुनाव लड़ सकते हैं. इसको लेकर अंदरखाने आम आदमी पार्टी व आशुतोष के बीच सहमति बनने की चर्चा है. हालांकि इन सब बातों की पुष्टि न तो आशुतोष कर रहे हैं और न ही आम आदमी पार्टी वाले. (गासिप)

टीवी जर्नलिस्ट ऋषि दत्त तिवारी के पिता का निधन

न्यूज एक्सप्रेस चैनल के नोएडा मुख्यालय में एसाइनमेंट हेड के पद पर कार्यरत ऋषि दत्त तिवारी के पिता श्री अशोक कुमार तिवारी का पिछले दिनों लखनऊ में निधन हो गया. उनकी उम्र 68 वर्ष की थी. वे यूपी स्टेट एग्रो में कार्यरत रहे. आठ वर्षों पहले वे रिटायर हुए.

अपने पीछे वे चार बेटे बेटियों का भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं. आज लखनऊ में तेरहवीं हैं. ऋषि दत्त तिवारी के परिचितों, शुभचिंतकों और जानने वालों ने पिता के निधन पर उन्हें शोक संवेदना व्यक्त की है.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

एडीजी अरुण कुमार की गैर-कानूनी पोस्टिंग रद्द हो

लखनऊ : सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आज यूपी के प्रमुख सचिव गृह तथा डीजीपी को पत्र लिख कर एडीजी अरुण कुमार के रूल्स एवं मैनुअल्स विभाग में की गयी तैनाती को निरस्त करते हुए उन्हें कानूनी रूप से अनुमन्य स्थान पर नियुक्त करने को कहा है. पत्र में डॉ ठाकुर ने कहा है कि उनके पति अमिताभ ठाकुर पूर्व में इस दफ्तर में तैनात थे और इसलिए वह जानती हैं कि इस विभाग में ना तो बुनियादी सुविधाएँ हैं और ना ही कोई काम आवंटित है. उनके पति को एक स्वतंत्र रूम नहीं होने के कारण लॉन में बैठना पड़ा था.

उन्होंने कहा है कि यह तैनाती आईपीएस अफसरों के लिए बनाए गए आईपीएस कैडर रूल्स 1954, आईपीएस (फिक्सेशन ऑफ कैडर स्ट्रेंथ) नियमावली 1955 तथा आईपीएस पे रूल्स 2007 के खिलाफ है जिनके अनुसार आईपीएस अफसर केवल कुछ निश्चित पदों पर ही तैनात किये जा सकते हैं. ऐसी नियुक्तियां मात्र अफसरों का मनोबल तोड़ने और दूसरे अफसरों को कडा सन्देश देने के लिए की जाती हैं.

उन्होंने इसे व्यापक जनहित का मुद्दा बताते हुए डीजीपी से अनुरोध किया है कि वे नियम के विपरीत स्थानों पर तैनात सभी आईपीएस अफसरों को कानूनी रूप से वैध स्थानों पर नियुक्त करना सुनिश्चित करें.

पत्र की प्रति–

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ
विषय- श्री अरुण कुमार के रूल्स-मैनुअल्स में तैनाती विषयक  

महोदय,

आज समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ है कि श्री अरुण कुमार, आईपीएस की तैनाती एक लम्बे समय के अंतराल के बाद एडीजी, रूल्स एवं मैनुअल्स पर की गयी है. मेरे पति श्री अमिताभ ठाकुर, आईपीएस भी एक लम्बे समय तक एसपी रूल्स एवं मैनुअल्स के पद पर तैनात थे, अतः मैं इस कार्यालय के बारे में विस्तार से जानती हूँ.

मेरे पति की तैनाती के समय वहां पहले से तीन आईपीएस अफसर तैनात थे और उनके बाद चार-चार अफसर एक ही रूम में पोस्ट कर दिए गए थे. वहां एक स्वतंत्र रूम तक नहीं था और हर छोटी-छोटी बात की परेशानी थी. अंत में मेरे पति को बाहर लॉन में बैठ कर दफ्तर का काम करना पड़ा था जिसके बाद ही उन्हें एक ऑफिस रूम मिल सका था. चूँकि मेरे पति वहां तैनात रहे अतः मैं यह भी जानती हूँ कि इस ऑफिस में सरकार की ओर से कोई भी काम तक नहीं दिया गया है. बल्कि अभी तक यह ऑफिस निर्माण की प्रक्रिया में है और इसे शासन की स्वीकृति भी नहीं मिली है. मेरी जानकारी के अनुसार मेरे पति सहित तमाम अफसरों को मात्र दफ्तर आने-जाने की तनख्वाह दी जाति है क्योंकि वहां कोई काम ही नहीं है.

चूँकि मैं पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व के क्षेत्र में काम करती हूँ, अतः मैं यह भी जानती हूँ कि रूल्स एवं मैनुअल्स में ना तो कोई पद नियम से स्वीकृत है और ना ही आईपीएस अफसरों के लिए आईपीएस कैडर रूल्स 1954 के नियम 2(बी), आईपीएस (फिक्सेशन ऑफ कैडर स्ट्रेंथ) नियमावली 1955 के नियम चार अथवा आईपीएस पे रूल्स 2007 की अनुसूची दो में निर्धारित किये गए हैं. मैं यह भी जानती हूँ कि आईपीएस अफसर इन नियमों के अनुसार निर्धारित निश्चित पदों पर ही तैनात किये जा सकते हैं.

इसके बाद भी अभी तक इस विभाग में दो आईपीएस अफसर श्री सुव्रत त्रिपाठी डीजी तथ श्री चन्द्र प्रकाश, आईजी पहले से इस विभाग में कार्यरत रहे हैं जो बिना किसी काम के हैं. अब एक और एडीजी स्तर के अधिकारी को बिना काम के, बिना स्थान के और नियम के विरुद्ध स्थान पर तैनात करना पूरी तरह गलत है. यह आईपीएस अफसरों के प्रति अनुचित तो हैं ही, यह पूरे प्रदेश सरकार के लिए गलत है क्योंकि यह दर्शाता है कि किस प्रकार आईपीएस एवं आईएएस अफसरों को राज्य सरकार द्वारा मनमर्जी काम नहीं करने पर प्रताड़ित किया जाता है. अपने पति के प्रकरण से मैं बखूबी जानती हूँ कि इस पद पर किसी अफसर की तैनाती क्यों और किन स्थितियों में होती है- ताकि उसे प्रताड़ित और उपेक्षित महसूस कराया जाए.  

चूँकि श्री अरुण कुमार की तैनाती से एक बहुत गलत सन्देश पूरे प्रदेश में गया है, अतः मैं निवेदन करुँगी कि कृपया इस मामले में तत्काल अपने स्तर से पुनर्विचार करते हुए उनकी और रूल्स एवं मैनुअल्स विभाग में तैनात सभी अधिकारियों की वाजिब और कानूनी रूप से अनुमन्य पदों पर तैनाती करने की कृपा करें.

मैं इसे एक दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहना चाहूंगी कि यह मामला मात्र एक आईपीएस अफसर या एक सेवा संवर्ग का मामला नहीं है बल्कि इसके साथ पूरे व्यापक जनहित का प्रकरण जुड़ा हुआ है क्योंकि यह शासन और प्रशासन में पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व के सन्दर्भों से ताल्लुख रखता है.

अतः आपसे निवेदन है कि श्री अरुण कुमार के मामले को एक दृष्टान्त के रूप में लेते हुए प्रदेश के समस्त आईपीएस अधिकारियों की तैनाती का कानूनी रूप से मूल्यांकन करने और उन सभी अफसरों को, जो वर्तमान में कानूनी रूप से गलत स्थानों पर तैनात हैं, को आईपीएस अफसरों के लिए बनाए गए आईपीएस कैडर रूल्स 1954 के नियम 2(बी), आईपीएस (फिक्सेशन ऑफ कैडर स्ट्रेंथ) नियमावली 1955 के नियम चार तथा आईपीएस पे रूल्स 2007 की अनुसूची दो के नियमों के अनुसार सही जगहों पर तैनात करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था के इस महत्वपूर्ण आयाम से जुडी विसंगति को दूर करने की कृपा करें

दिनांक-08/01/2014
पत्र संख्या- NT/Arun/DG                                         
भवदीय,

डॉ नूतन ठाकुर
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ

प्रतिलिपि- प्रमुख सचिव, गृह, उत्तर प्रदेश को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

आप लोग रेलवे के खिलाफ क्यों नहीं लिखते?

प्रियंका ओझा भार्गव ने भड़ास को मेल कर रेलवे के बारे में अपनी पीड़ा का इजहार किया है. आम जनता से जुड़ी इस सरकारी सेवा से इन दिनों हर कोई दुखी, उदास, त्रस्त और खीझा हुआ रहता है. प्रियंका भी उन्हीं में से हैं. उन्होंने जो कुछ बातें कहीं हैं, वो इस प्रकार हैं…

Sir aap logo ne kabhi railway ke bare me comment kyu nahi diya kyuki aajkal agar dekha jaye to sabse jada problem railway hi karti hai…

-Irctc  online ticket karne ke eak bahut achi website hai lekin tatkal subha 10:00 khulta hai and irctc ki website down hoti hai. Eak aam admi kya kare jo subha 9:30 office attend karna ho.

-Broker ko ticket kaise confirm mil jati hai i.e online.

-On the spot 5 times extra paise dekar railway station per seat kaise mil sakte hai. Confirm list to train chalne ke 3 hours pehle chart done hota hai.

-Agar TT and protection force ke liye har 3rd boogie me seat available hoti hai wo needy ko nahi balki paise wale ko kyu milti hai.Kyuki protection force ko sona nahi hota to unke liye seat kyu hoti hai.

-Broker ke liye restriction kyu nahi hai brokerage me kyu unhe reservation confirm karwane ka double paise chaiye.

प्रियंका से संपर्क priyanka.ojha3@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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हद है… ये भारतीय रेल है…

चैनल के रिपोर्टर ने रिश्तेदार से ऐंठे पौने तीन लाख रुपये

मीडिया का मतलब दलाली व दलालों का अड्डा हो गया है. मीडियाकर्मियों का काम जनता के सुख-दुख से सरोकार रखने की जगह सत्ता, प्रशासन, पुलिस के साथ सांठगांठ कर खुद को मालदार व वीआईपी बनाना होता जा रहा है. यही कारण है कि अब अपराधियों का बचाने का ठेका भी मीडिया वाले लेने लगे हैं. पंजाब के मोंगा जिले में ऐसा ही कुछ मामला सामने आया है. इस बारे में एक स्थानीय अखबार में खबर भी छपी है, जो नीचे है.

अगर आप भी मीडिया को लेकर कुछ बताना, कहना, सुनाना चाहते हैं तो फौरन भड़ास से संपर्क करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें. देश में भड़ास ही एक ऐसा मंच है जहां मीडिया के स्याह-सफेद को बिना किसी दुराव के प्रकाशित किया जाता है.

विश्वनाथ सिंह, सुनील कुमार, नवदीप ठाकुर की नई पारी

इंदौर से सूचना है कि दबंग दुनिया अखबार से इस्तीफा देने वाले विश्वनाथ सिंह नामक रिपोर्टर ने दैनिक भास्कर के साथ नई पारी की शुरुआत की है. बताया जाता है कि भास्कर में अंदरुनी राजनीति ज्यादा होने के कारण यहां काम करने से लोग घबराते हैं. पिछले दिनों दूसरे अखबार के क्राइम रिपोर्टर ने भास्कर से आफर लेटर लेने का बाद यहां काम करने से मना कर दिया और अपने पुराने संस्थान लौट गया.

सुनील कुमार दैनिक भास्कर, जमशेदपुर से इस्तीफा देकर प्रभात खबर, पटना के साथ जुड़ गए हैं. सुनील तीन वर्षों से दैनिक भास्कर के साथ थे और प्रोडेक्शन डिपार्टमेंट में कार्यरत थे. वे अपनी उपेक्षा से दुखी चल रहे थे. इसी कारण प्रभात खबर ज्वाइन कर लिया.

दैनिक भास्कर, बठिंडा से खबर है कि सब एडिटर नवदीप ठाकुर ने एक डीएनई के खराब व्यवहार से नाराज होकर इस्तीफा दे दिया. उन्होंने दैनिक जागरण, जालंधर के साथ नई पारी की शुरुआत की है. बताया जाता है कि प्रताड़ना के कारण अब तक दुर्गेश मिश्र, अखिलेश यादव, विनोद कुमार, संदीप जोशी, अश्विनी लखनपाल सहित छह सब एडिटर बठिंडा भास्कर को अलविदा कह चुके हैं.

भड़ास तक अपनी बात, रिएक्शन, राय, खबर पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

एटा में पत्रकार पर हमला, नौकर घायल

एटा : मिरहची कस्बे में देर शाम स्थानीय पत्रकार कुलदीप गुप्ता पर जान लेवा हमला करते हुए अज्ञात हमलावरों ने फायरिंग की। मौके पर मौजूद नौकर के गोली लगने से घायल हो गया, जिसे जिला अस्पताल भेजा गया है। मिरहची में पत्रकार कुलदीप गुप्ता की मुख्य चौराहे पर दुकान है। गुरुवार की शाम सात बजे के लगभग कुलदीप अपनी दुकान के पास खड़े थे तभी एक बाइक पर सवार दो युवक आए और फिल्मी अंदाज में बीच सड़क पर बाइक खड़ी कर उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी।

हमलावरों ने सीधे फायर झोंके। एक गोली दुकान के अंदर मौजूद नौकर पुष्पेन्द्र कुमार पुत्र जीवाराम निवासी मारहरा रोड मिरहची के पाव में जा लगी, जिससे वह घायल हो गया। घटना के दौरान अफरा-तफरी मच गई और गोली की आवाज सुनकर चौराहे के व्यापारियों में दहशत फैल गई। उन्होनें शटर गिराकर दुकानें बंद कर दीं। घायल को उपचार के लिए पीएचसी पर ले जाया गया जहां से उसे एटा रैफर कर दिया गया। सूचना के बाद देरी से पहुंची थाना पुलिस के विरुद्ध भी व्यापारियों एवं कस्बा के निवासियों में रोष था। अपर पुलिस अधीक्षक संजय यादव ने बताया कि हमलावर चाहे कोई भी हों बख्शे नहीं जाएंगे। पुलिस उन्हें तलाश कर रही है।

भड़ास की तर्ज पर बनारस से ‘आईसीएन न्यूज’, राजेंद्र और अवनिंद्र को कमान

वाराणसी : भडास4मीडिया डॉट कॉम से उत्प्रेरित होकर वाराणसी जिले के कुछ मीडियाकर्मियों ने न्यूज़ पोर्टल आई.सी.एन. न्यूज़ की शुरुआत की है। समाचार संपादक पद पर जहा राजेंद्र मोहनलाल श्रीवास्तव (पप्पू) कमान सम्भाल रहे हैं वही मीडिया के नाम पर खेल खेलने वालों को बेनकाब अर्थात जनपद स्तरीय खबरों की जिम्मेदारी युवा पत्रकार अवनिन्द्र सिंह (अमन) ने ली है।

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मेल टुडे से सौरभ शुक्ला का इस्तीफा, कार्तिकेय शर्मा और रिफत जावेद में विवाद

दो अपुष्ट सूचनाएं टीवी टुडे ग्रुप से मिल रही हैं. पहली तो ये कि इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के बाद इन दिनों मेल टुडे में कार्य कर रहे सौरभ शुक्ला ने इस्तीफा दे दिया है. दूसरी सूचना कार्तिकेय शर्मा को लेकर है जो आजतक न्यूज चैनल में हैं. बताया जाता है कि उनका विवाद रिफत जावेद से हो गया है जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया है.

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‘रोशनी के रास्‍ते पर’ के लिए अनीता वर्मा सम्‍मानित

अनीता वर्मा की कविताएं सकारात्‍मक एवं संवेदनात्‍मक जीवन की मांग रचती कविताएं हैं जो एक ऐसे आंतरिक विश्‍वास को मुट्ठी में कसकर आगे बढ़ती हैं कि ‘हत्‍यारे समय’ में भी घर और ‘पतझड़ समय’ में हरी संवेदना का अनुरोध बचा रहे। ये कविताएं समाज की निस्‍तेज सतह के नीचे दबे पड़े अर्धपूर्ण अन्‍तर्विरोधों को उभारती हुई वृहत्‍तर समाज के दु:ख दर्द, निराशाओं उत्‍साहों, आवेगों की सहभागी होती हैं और उम्‍मीद का हाथ पकड़ कर दार्शनिक समयहीनता के वीरान में भटकने से बच जाती हैं। अनीता वर्मा की कविताएं अभियानों में शामिल होने के आग्रह की कविताएं हैं। वरिष्‍ठ कथाकार महेश कटारे ने अनीता वर्मा की कविताओं पर यह वक्‍तव्‍य उन्‍हें केदार सम्‍मान 2013 दिए जाने के अवसर पर दिया।

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केंद्र के सत्‍यप्रकाश मिश्र सभागार में इलाहाबाद के तमाम वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों एवं सुधीजनों के बीच वरिष्‍ठ कवि श्री नरेश सक्‍सेना एवं वरिष्‍ठ कथाकार श्री विभूति नारायण राय के द्वारा उन्‍हें प्रशस्ति पत्र, शॉल, स्‍मृति चिन्‍ह और सम्‍मान राशि प्रदान की गई। सम्‍मान समारोह के अध्‍यक्ष श्री नरेश सक्‍सेना ने कहा कि अपने से युवतर कवियों को सम्‍मानित होते देखना बहुत सुखद अनुभव है। अनीता वर्मा की कविताओं में जटिलता नहीं है। उन्‍हें लगातार मनुष्‍यता माजती रहती है। उनकी कविताएं अपराधबोध से मुक्‍त करती हैं। सम्‍मान समारोह के मुख्‍य अतिथि श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि अनीता वर्मा की कविताएं मुझे इसलिए प्रिय हैं, क्‍योंकि वे समय और अपने समाज से मुठभेड़ करती हैं। संकट के दौर में उनकी कविताएं याद आती हैं यही इनकी ताकत है।
 
सम्मान प्राप्‍त करने के उपरान्‍त सुश्री अनीता वर्मा ने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि कविता पढ़ने और पढ़ाने के क्रम में मेरा केदारनाथ अगवाल की कविता से गहरा परिचय हुआ। उनकी कविता के सहज मानवीय विंब मुझे प्रभावित करते हैं। जनता के चहेते ऐसे कवि के नाम पर स्‍थापित सम्‍मान को ग्रहण करना मेरे लिए सौभाग्‍य की बात है। उन्‍होंने कहा मेरे लिए कविता जीवन की तरह है, वह हृदय से निकलती हुई एक आवाज है। यह अन्‍तर के स्‍पंदनों के साथ-साथ बाहर की आवाजों की भीतर ले जाकर गुंजाने की एक छोटी सी कोशिश है।
 
केदार शोधपीठ (न्‍यास) बांदा द्वारा आयोजित इस गरिमापूर्ण सम्‍मान समारोह का संचालन डॉ. संजय श्रीवास्‍तव ने किया। अतिथियों का स्‍वागत प्रो. ए.ए. फातमी, श्री असरार गांधी, प्रो. अनीता गोपेश, सुश्री संध्‍या नवोदिता द्वारा किया गया। समारोह के अंत में समस्‍त अतिथियों एवं सुधीजनों का आभार केदार सम्‍मान समारोह के सह संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।
 
केदार सम्‍मान समारोह में प्रमुख रूप से जियाउल हक, रामजी राय, ए.ए. फातमी, असरार गांधी, हरीशचन्द्र पाण्डेय, उमेश नारायण शर्मा, असरफ अली बेग, अनीता गोपेश, अनुपम आनन्‍द, के.के. पाण्‍डेय, जयकृष्‍ण राय तुषार, नीलम शंकर, सालेहा जर्रीन, फखरूल करीम, संध्‍या नवोदिता, रामायन राम, सुभाष चन्‍द्र गांगुली, एहतराम इस्‍लाम, रतिनाथ योगेश्‍वर, श्रीरंग पाण्‍डेय, अनिल सिंह, अनिल रंजन भौमिक, आनंद मालवीय, पूर्णिमा मालवीय, सविता सक्‍सेना, निलय उपाध्‍याय, सुधीर सुमन सहित तमाम साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्‍तुति
संतोष भदौरिया
सह संयोजक
केदार सम्‍मान

बद्दी (हिमाचल प्रदेश) की भ्रष्ट पत्रकारिता

: बीबीएन (बद्दी बरोतीवाला नालागढ़), जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश : औद्योगिक नगरों के बसने पर वहां पर अनेक तरह के लोग कारोबार करने पहुंच जाते हैं। राजनीतिज्ञ जहां अपने पदों का दुरुपयोग करते हैं वहीं अधिकारी भी इन स्थानों पर आने के लिए लालायित रहते हैं। तो फिर पत्रकार बन्धुओं का कहना ही क्या जो कि हर किसी की टांग खीचने में लगे रहते हैं। वे भी इन क्षेत्रों में पत्रकारिता की दुकान खूब चलाते हैं। औद्योगिक नगरी बीबीएन में भी इस तरह की पत्रकारिता करने वालों की कमी नहीं है।

एक गैंग के रूप में संगठित पत्रकारों का समूह कब किसके लिए  नाराज हो जाए और कब किसका बहिष्कार कर दे, इसका किसी को पता नहीं। सही पत्रकारिता करने वाले इन्सान को गलत ठहराने से परहेज नहीं किया जाता है। उद्योगपति इन पत्रकारों के लिए विशेष आयोजन करते हैं, त्योहारों व उत्सवों पर उनको तोहफे दिए जाते हैं जिनकी चमक उनकी कलम की स्याही को धूमिल कर देती है। इस प्रकार पेड न्यूज का कारोबार फलता-फूलता रहता है।

औद्योगिक नगरी बीबीएन में  करीब 3000 उद्योग हैं जिनमें से कुछ बन्द भी हो गए हैं। यहां कोई मार्केटिंग एजेंसी काम नहीं कर रही है। यहां के पत्रकार ही इस क्षेत्र से अपने-अपने समाचार पत्रों के लिए  करीब 10 लाख से 16 लाख तक का वार्षिक विज्ञापन देते हैं। अब इसे पेड न्यूज नहीं तो क्या कहेंगे। कोई यूं ही तो उनको इतने विज्ञापन नहीं दे जाएगा। कल के पत्रकार आज करोड़पति बन गए हैं।

सही पत्रकारिता करने वाले इन करोड़पति पत्रकारों को एक फूटी आंख नहीं सुहाते हैं। इसी क्षेत्र में कार्यरत एकमात्र महिला पत्रकार नयना वर्मा कुछ भ्रष्ट पत्रकारों की नज़रों में काफी समय से खटक रहीं हैं। नयना वर्मा हाल समय तक पंजाब केसरी के लिए समाचार संकलन का कार्य कर रहीं थीं। उनके विरोधी कई बार अपने सह व उप सम्पादको से मिल कर, समाचार कटवा कर कई अखबारों से उनको निकावाने की साजिशें रच चुके हैं। विभिन्न समारोहों में भी भेदभावपूर्ण रवैया झेलती महिला पत्रकार इस भ्रष्ट पत्रकारिता से जूझ रही हैं। उम्मीद है नया साल शायद कोई बदलाव लाए क्योंकि नयना वर्मा को इस क्षेत्र से निकलवाने के लिए भ्रष्ट पत्रकार-मण्डली की साजिशें लगातार जारी है, ताकि कोई भी इमानदारी से पत्रकारिता नही कर सके।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

समय और समाज से मुठभेड़ कविता की अनिवार्य जरूरत : नरेश सक्‍सेना

कवि को सदैव प्रतिपक्ष में रहना होगा तभी कविता भी प्रतिपक्ष की कविता होगी। कविता को अगर सुना नहीं गया तो समझिए कवि द्वारा कहा ही नहीं गया। समय चट्टानों को बदल देता है, समय कविता को बदल रहा है, स्‍वयं मुझे बदल रहा है। फैंटेसी और यथार्थ जो भी हो पर कविता को प्रतिपक्ष में खड़ा होना चाहिए क्‍योंकि समय और समाज से मुठभेड़ कविता की अनिवार्य जरूरत है। मेरा मानना है कि भाषा से निर्मित कलाए/विधाएं मनुष्‍य बनाने के जरूरी औजार हैं। ये बातें महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के क्षेत्रीय केंद्र इलाहाबाद द्वारा ‘समय, समाज और हिंदी कविता’ विषय पर आयोजित गोष्‍ठी के मुख्‍य अतिथि वरिष्‍ठ कवि श्री नरेश सक्‍सेना ने कही।

इलाहाबाद में बड़ी संख्‍या में जुटे साहित्‍यकारों की उपस्थिति में विषय की प्रस्‍तावना रखते हुए क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने कहा कि मैजूदा बाजारवादी दौर के बरअवस प्रगतिशील वैचारिक आग्रहों वाली रचना और आलोचना के जनवादी सरोकारों पर बहस जरूरी है। जब हम कहते है कि कविता मनुष्‍य बनाती है तो कविता के संदर्भ में जनपक्षधरता का सवाल भी बहस तलब है। कार्यक्रम के अध्‍यक्ष वरिष्‍ठ कथाकार एवं विश्‍वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि यह समय चुनौतियों से भरा है, और यह समय कविता विरोधी समय भी है। कठिन समय में ही बड़ी रचना संभव होती है। सोवियत रूस इसका उदाहरण है। आजादी के संघर्ष के दौर में कविता साहित्‍य के केंद्र में थी। आजादी के बाद मध्‍यम वर्ग के बढ़ते आकार के कारण कथा साहित्‍य केंद्र में आया। कविता की आंतरिक लय टूट रही है। कविता ऐसी रची जाए जो संदर्भ बने और समय पर बड़ी टिप्‍पणी की तरह पढ़ी जाए।
 
अपने बीज वक्‍तव्‍य में वरिष्‍ठ आलोचक श्री रविभूषण ने कहा कि कवि कर्म क्‍या है? कविता का क्‍या काम है? इसे पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। कवि और कविता समय और समाज में हस्‍तक्षेप करके ही जीवित रह सकते हैं। कवि को अपने समय और समाज की चुनौतियों की पहचान सबसे जरूरी कार्यभार है। पूंजीवादी सभ्‍यता के दौर में स्‍वार्थपरता को बढ़ावा मिल रहा है। हिंदी कविता के टोन को समझें तो इसमें कई काल खण्‍ड मौजूद है। समय का बदलना कैलेण्‍डर का बदलना नहीं है। वरिष्‍ठ आलोचक श्री चौथीराम यादव ने बहस को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, वही कविता कालजयी होती है, जिसकी चिंता के केंद्र में मनुष्‍य होता है। हिंदी कविता की शुरूआत मनुष्‍य केंद्रित कविता से होती है। कबीर की कविता हिंदी कविता का प्रस्‍तान बिंदु है। कबीर ने सर्वप्रथम अपने समय में समाज की अलगाववादी शक्तियों को पहचाना। कबीर ने धूमिल के तीसरे आदमी की शिनाख्‍त बहुत पहले कर ली थी। आज शहरी मध्‍य वर्ग की मानसिकता की कविता लिखी जा रही है।
 
वरिष्‍ठ कथाकार श्री महेश कटारे ने कहा कि हिंदी की आलोचना अलोकतांत्रिक रही है। उसने प्रतिरोध की संस्‍कृति को रेखांकित करने में कोताही की। इसीलिए मुक्तिबोध अभिव्‍यक्ति के सारे खतरे उठाने की वकालत करते हैं। गोष्‍ठी के वक्‍ता डॉ. संजय श्रीवास्‍तव ने कहा कि कविता बहुतायत में लिखी जा रही है, लेकिन वह पाठक तक किस रूप में पहुंच रही है यह महत्‍वपूर्ण है। कविता के आस्‍वाद के सवाल पर भी पुन: विचार की जरूरत है। क्षेत्रीय केंद्र के सत्‍य प्रकाश मिश्र सभागार में आयोजित गोष्‍ठी में अतिथियों का स्वागत सहायक क्षेत्रीय निदेशक, श्री यशराज सिंह पाल ने किया। कार्यक्रम का संयोजन, संचालन और धन्‍यवाद ज्ञापन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।

गोष्ठी में प्रमुख रूप से जियाउल हक, रामजी राय, ए.ए. फातमी, असरार गांधी, हरीशचन्द्र पाण्डेय, उमेश नारायण शर्मा, असरफ अली बेग, अनीता गोपेश, अनुपम आनन्‍द, के.के. पाण्‍डेय, जयकृष्‍ण राय तुषार, नीलम शंकर, सालेहा जर्रीन, फखरूल करीम, संध्‍या नवोदिता, रामायन राम, सुभाष चन्‍द्र गांगुली, एहतराम इस्‍लाम, रतिनाथ योगेश्‍वर, श्रीरंग पाण्‍डेय, अनिल सिंह, अनिल रंजन भौमिक, आनंद मालवीय, पूर्णिमा मालवीय, सविता सक्‍सेना सहित तमाम साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया पर मुकदमा चलेगा, पुलिस की अपील कोर्ट में मंजूर

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया पर मुकदमा न चलाए जाने की सारी कवायदों पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने पानी फेर दिया है. कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ी खबर प्रसारित न करने के बदले में कथित रूप से 100 करोड़ रुपये की उगाही के मामले में पटियाला हाउस कोर्ट स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने ने कहा कि मामले में पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट रिपोर्ट के आधार पर आरोपियों पर मुकदमा चलाया जा सकता है.

इससे पहले मुख्य महानगर दंडाधिकारी अमित बंसल ने पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इन्कार करते हुए दोबारा जांच के आदेश दिए थे. इनका कहना था कि इस मामले में पुलिस के पास मुकदमा चलाने लायक सुबूत नहीं हैं. तब पुलिस ने इस फैसले को सत्र अदालत में चुनौती दी.

पटियाला हाउस कोर्ट स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा के आदेश के बाद सुधीर और समीर पर मुकदमा चलने का रास्ता साफ हो गया है. पुलिस ने 2 अक्टूबर 2012 को कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल की कंपनी जेएसपीएल की शिकायत पर जी न्यूज चैनल समूह के संपादक सुधीर चौधरी और बिजनेस हेड समीर अहलूवालिया के खिलाफ साजिश रचने व वसूली करने का मामला दर्ज किया था.

शिकायत में कहा गया था कि आरोपियों ने कोल ब्लॉक आवंटन से संबंधित खबरें नहीं दिखाने के लिए सौ करोड़ रुपये की मांग की. जब रुपये देने से इन्कार कर दिया गया तो कंपनी के खिलाफ दुर्भावना से प्रेरित होकर कई खबरें जी न्यूज और जी बिजनेस पर प्रसारित की गईं.

भड़ास को आपकी मदद / फेवर / सहयोग की जरूरत…

भड़ास को संचालित करने के लिए इसके पाठकों से समय-समय पर आर्थिक मदद की अपील की जाती रही है. एक बार फिर नौबत आ गई है कि हम आपसे भड़ास की आर्थिक सेहत को लेकर बात करें. सरोकार व सच्चाई की अलख जगाए रखने को तत्पर भड़ास ने अपने सीमित संसाधनों में वो कर दिखाया है जो बड़े बड़े मीडिया हाउस नहीं कर पाते.

पर ऐसा हम तभी कर पाते हैं जब आर्थिक रूप से हम किसी पर निर्भर न हों, किसी पूंजीपति के पैसे से संचालित न हों, किसी राजनीतिक पार्टी के पैसे से न चलाए जा रहे हों, किसी करप्ट अफसर या नेता की रकम से न काम कर रहे हों.

सच्चाई को पूरी साफगोई व साहस के साथ सामने रखना आज के दौर में आसान काम नहीं है. भड़ास ने यह लगातार किया है और ऐसा करते हुए इसकी कीमत भी चुकाई है. हर तरह की प्रताड़नाओं को झेलते हुए भड़ास की टीम लगातार अपने रास्ते पर अग्रसर है. कुल मिलाकर भड़ास अब भी एक चमत्कार की तरह आप सभी आम-खास साथियों, समर्थकों, शुभचिंतकों, प्रशंसकों के सहयोग-समर्थन से ही संचालित हो रहा है.

जिस-जिस ने पैसे के प्रलोभन के बल पर भड़ास को इसके तेवर के साथ समझौता करने का प्रलोभन दिया, भड़ास ने उनके प्रस्तावों को तुरंत झटक दिया, नकार दिया. जाहिर है, ऐसी स्थितियों में, किसी एक आम पत्रकार के बूते सर्वाधिक लोकप्रिय मीडिया पोर्टल संचालित कर पाना आसान काम नहीं है. इसके लिए हमको-आपको सभी को एकजुट रहना पड़ेगा. मिलजुल कर, आपसी सहयोग से भड़ास का संचालन करना पड़ेगा. यही वजह है कि हम लोग समय-समय पर आप सभी के सामने भड़ास की आर्थिक स्थिति को लेकर अपील करते रहते हैं.

इन दिनों पुन: भड़ास की आर्थिक स्थिति खराब है. नए वर्ष की शुरुआत से ही हम लोग उधार व चंदा इकट्ठा करके भड़ास को जिंदा रखने में तत्पर हैं. ऐसे में आपको भी अपने हिस्सा का फेवर / सहयोग / सपोर्ट / मदद भड़ास को देने के लिए आगे आने की जरूरत है.

निजी तौर पर या संस्थान / संगठन / कंपनी के रूप में आप न्यूनतम 12000 रुपये (प्रति माह एक हजार रुपये के हिसाब से एक साल के लिए बारह हजार रुपये) से लेकर अधिकतम एक लाख बीस हजार रुपये रुपये (प्रति महीने दस हजार रुपये के हिसाब से एक साल के लिए एक लाख बीस हजार रुपये) की मदद दे सकते हैं. या फिर उपरोक्त के अलावा आप जो भी स्वेच्छा स्वविवेक से निजी स्तर पर मदद कर सकते हों, जरूर करिए.

मदद करने वाले साथियों / संगठनों / संस्थानों का नाम उनकी इच्छा से भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा. आपको अगर लगता है कि भड़ास जैसे डेमोक्रेटिक और रेडिकल न्यू मीडिया मंच को मदद कर आम पत्रकार साथियों, आम जनता की आवाज को बुलंद करते रहना है तो भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत को सीधे yashwant@bhadas4media.com पर मेल करें. आप सीधे भड़ास के एकाउंट में पैसे जमा कराने के बाद भी सूचित कर सकते हैं. एकाउंट डिटेल इस प्रकार है….

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राहुल भले कहते रहें कि सीखना ‘आप’ से है, लेकिन वो नकल नरेंद्र मोदी की कर रहे हैं

Avinash Das : क्‍या आपने APCO Worldwide का नाम सुना है? यह बीजेपी के पीएम इन वेटिंग Narendra Modi के लिए पीआर का काम अपने हाथ में लेने वाली कंपनी है। यह दुनिया भर में धतकर्मों में लिप्‍त तानाशाहों की इमेज बिल्डिंग का काम करती रही है। अमेरिकी सेना की युद्धनीति के पक्ष में जनमत संग्रह से लेकर इजराइल के बर्बर चेहरे को न्‍यायप्रिय छवि के रूप में प्रचारित करने की रणनीति इसी कंपनी ने बनायी थी।

भारत में नरेंद्र मोदी ने अपनी महत्‍वाकांक्षा को अंजाम देने के लिए इस कंपनी की सेवा ली है। अब राहुल गांधी के लिए इसी तर्ज पर एक पीआर कंपनी हायर की जा रही है। यानी राहुल भले कहते रहें कि सीखना Aam Aadmi Party से है, लेकिन वो नकल नरेंद्र मोदी की कर रहे हैं।

पत्रकार अविनाश दास के फेसबुक वॉल से.

अगर दिल्ली में कांग्रेस या बीजेपी की सरकार होती तो भी क्या पुण्य यह सवाल दागते

Nadim S. Akhter :  आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास के एक पुराने वीडियो में जो बातें बोली कही गई हैं, वो बेहद आपत्तिजनक हैं. विश्वास ने समुदाय विशेष का मजाक उड़ाया है. अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के लोगों को ये समझना होगा कि अब वे सिर्फ आंदोलन से नहीं जुड़े हैं. राजनीतिक पार्टी बना ली है और बाकायदा सरकार चला रहे हैं.

कभी प्रशांत भूषण कश्मीर पर बोल देते हैं, कभी एक नवजात की मौत पर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री गैरजिम्मेदाराना बयान दे देते हैं कि हमारे पास कागज आएंगे तो देखेंगे. कभी कार का शीशा टूटने पर राखी बिड़लान (बिड़ला या बिरला नहीं) विवादों में घिर जाती है तो कभी मनीष सिसोदिया पर यह आरोप लगने लगता है कि उन्होंने आम लोगों से अपने घर पर मिलना बंद करके सप्ताह के दो दिन निर्धारित कर दिए हैं. फरियादी लौटकर जा रहे हैं, सिसोदिया ध्यान तक नहीं दे रहे, वगैरह-वगैरह.

लेकिन एक आदमी है, जो इन सारे विवादों को अपने कंधे पर संभाले हुए है. संभल-संभल कर बोल रहे हैं और काम कर रहे हैं. वह हैं अरविंद केजरीवाल. और मीडिया है कि माइक लिए हमेशा तैयार है ये पूछने के लिए कि बोलो-बोलो, बताओ-बताओ, ये काम आपने अब तक क्यों नहीं किया. वादा क्यों नहीं निभाया??!!

अरे भैया, इस देश को आजाद हुए 65 साल से ऊपर हो गए. क्या इतनी ही तत्परता और त्वरित कार्रवाई की अपेक्षा आपने दूसरे राजनीतिक दलों से की?? उनसे सवाल पूछे?? कल न्यूज चैनल AAJ TAK पर दिल्ली के सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार का स्टिंग दिखाने के बाद एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी -आप- के नेता गोपाल राय से पूछ रहे थे (पूछने का लहजा इतना कड़ा जैसे गोपाल राय को डांट रहे हों) कि बताइए स्टिंग दिखा रहे हैं, कैमरे पर लोग घूस लेते दिख रहे हैं और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल खामोश हैं. उनका दफ्तर चुप्पी साधे है. कोई बयान नहीं दे रहे. कब कार्रवाई करेंगे अरविंद केजरीवाल??

पुण्य प्रसून वाजपेयी चाहते थे कि स्टिंग दिखाने के दौरान ही दिल्ली के सीएम केजरीवाल कार्रवाई कर दें. स्टिंग में दिखाए गए अफसरों के खिलाफ एक्शन ले लें. और पैनल में बीजेपी-कांग्रेस के जो नेता बोल रहे थे (जिनके खिलाफ कभी स्टिंग हो तो हमेशा यही कहते हैं कि सीडी की जांच कराएंगे, बाद में बताएंगे और एंकर भी यह बात मानता-जानता है), वो भी अड़े थे कि कार्रवाई क्यों नहीं करेंगे, जल्दी करिए कार्रवाई. जैसे -आज तक- का स्टिंग ऑपरेशन ना हो गया, कोई आकाशवाणी हो गई कि जो दिखाया जा रहा है, वह परम सत्य है. अभी के अभी कार्रवाई करो.

चूंकि सरकार नई है. केजरीवाल एंड टीम काफी दबाव में काम कर रही है, सीएम ने स्टिंग दिखाए जाने के दौरान हीं अफसरों को सस्पेंड कर दिया. आज तक को बधाई भी दे डाली. मनीष सिसोदिया भी -आज तक- की स्क्रीन पर दिखे, चैनल ने ये बताया कि नंबर-2 सिसोदिया भी live आज तक पर स्टिंग देख रहे हैं. फिर सिसोदिया ने -आज तक- का धन्यवाद किया और लम्बा इंटरव्यू भी चैनल को दिया.

ये सब ठीक था लेकिन पुण्य प्रसून वाजपेयी जिस तरह से सवाल कर रहे थे कि एक्शन कब लोगे? अभी लेना चाहिए, ऐसा लग रहा था कि वह आम आदमी पार्टी से कोई व्यक्तिगत खुन्नस निकाल रहे हैं. उनके जैसे मंजे हुए पत्रकार को यह शोभा नहीं दे रहा था. फर्ज कीजिए कि अगर दिल्ली में कांग्रेस और बीजेपी की सरकार होती तो भी क्या पुण्य यह सवाल दागते कि सीएम और उनका दफ्तर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा (स्टिंग दिखाए जाने के दौरान ही). और इसी बहाने फिर संबंधित पार्टी और जनता से उसके सरोकार पर सवाल खड़े करते??

मेरी नजर में ये ठीक नहीं था क्योंकि स्टिंग ऑपरेशन की सच्चाई अपनी जगह है और कार्रवाई अपनी जगह. सरकारें टीवी स्टूडियो के सवाल-जवाब से नहीं चलतीं. उसके काम करने का एक तरीका होता है लेकिन चूंकि -आप- अभी नई पार्टी है, उसने पहली बार सरकार बनाया है तो कोई टीवी चैनल का एंकर उसे मजबूर नहीं कर सकता, ये सवाल नहीं उठा सकता कि हम स्टिंग दिखा रहे हैं और सीएम जवाब नहीं दे रहे, उनका दफ्तर खामोश है. क्या हो जाएगा अगर सीएम पूरे मामले को देखने-जानने-समझने के बाद कुछ घंटों के उपरांत या अगले दिन कार्रवाई का आदेश दें. ऐसी क्या जल्दी थी पुणय प्रसून वाजपेयी को कि स्टिंग ऑपरेशन अभी ऑन एयर ही है, पूरा दिखाया भी नहीं गया, पैनल पर बहस जारी है और पुण्य चाहते हैं कि अभी तुरंत सीएम केजरीवाल इस पर बयान दें.

कार्रवाई का ऐलान करें. एक्शन लें. क्यों भाई. आप नैशनल टीवी पर बैठे हैं तो इस तरह की बात करके (mass communication करके) किसी पार्टी की छवि और जनता से जुड़े उसके सरोकार पर हमला कर दोगे?? मान लीजिए कि अगर केजरीवाल ने सदाशयता और अपने विवेक का उपयोग दिखाते हुए कल तुरंत कार्रवाई का ऐलान ना किया होता (स्टिंग दिखाए जाने के दौरान ही) तो पुण्य प्रसून वाजपेयी तो इसी बात को मुद्दा बनाकर आम आदमी पार्टी की बखिया उधेड़ देते!! और देश से कहते कि देखिए, हम स्टिंग दिखा रहे हैं और ये अभी तक कोई कार्रवाई नहीं कर रहे. इन्होंने जनता को ठगा है वगैरह-वगैरह.

ये अलग बात है कि -आज तक- जैसे प्रतिष्ठित चैनल का स्टिंग genuine था, इसमें मीडिया सरकार वाले स्टिंग जैसी बेईमानी नहीं थी (जिसके होने का अंदेशा होता है कई बार), फिर भी कोई लोकतांत्रिक सरकार किसी न्यूज चैनल के स्टिंग दिखाए जाने के दौरान ही उसमें बताए गए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई कैसे कर सकती है. कम से कम सरकार का इतना तो हक है कि वह चैनल से स्टिंग की सीडी मांगे, जांच कराए और फिर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे. ये नहीं कि हमने इधर स्टिंग दिखाया नहीं और उधर आप कार्रवाई करो और अगर नहीं करोगे तो चैनल का एंकर ये लाइन ले ले कि संबंधित पार्टी जनता से वादाखिलाफी कर रही है, वह भ्रष्टाचार के खिलाफ सीरियस नहीं है. ये क्या बात हुई भला!! कम से कम पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे एंकर मैच्योर-सूझबूझ वाले एंकर से तो ये देश इतनी उम्मीद कर सकता है कि एंकर की हॉट सीट पर बैठने के बाद ऐसे संवेदनशील मामलों में वह धीरज धरेंगे और तुरंत-फुरत कार्रवाई-बयान की मांग करने की बजाय संबंधित सरकार को जांच करने और फैसला लेने का वक्त देंगे. लोग क्यों ये भूल जाते हैं कि वे पत्रकार हैं, कोई जज नहीं कि फैसला सुना दिया. अरे भाई, स्टिंग करने के बाद आपने भी तो स्टिंग के टेप्स को जांचा-परखा होगा, मीटिंग की होगी, माथापच्ची की होगी तब कहीं जाकर इस पूरी जिम्मेदारी के साथ इस स्टिंग के टेप्स को ऑन एयर किया होगा. जब एक जिम्मेदार न्यूज चैनल होने के नाते आपको अपना काम पूरा करने के लिए समय चाहिए तो फिर एक जिम्मेदार सरकार को भी तो मामले को ठोक-बजाकर देखकर-समझकर फैसला लेने का-बयान जारी करने का-प्रतिक्रिया देने का वक्त आपको देना पड़ेगा. वो कहते हैं ना कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. क्यों एक्सिडेंट करवाने पर तुले हैं?

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

Hindustan ADVT Scam : Mantoo Sharma tells Supreme Court the main reason of economic offence

By ShriKrishna Prasad, Advocate

New Delhi, January 07. In the Dainik Hindustan Advertisement Scam, the Respondent No.02, Mr. Mantoo Sharma, in his counter-affidavit to the Supreme Court in the Special Leave Petition (Criminal) No.1603 of 2013 (filed by the petitioner, Shobhna Bhartia,the Chairperson of M/S The Hindustan Times Limited, M/S H.T.Media Limited, M/S Hindustan Media Ventures Limited), has tried  his best to explain  the main reason behind this economic offence on large scale for a decade , committed by the petitioner and her  editors and publisher.

The content of Mr. Mantoo Sharma’s counter-affidavit in this matter,submitted to the Supreme Court(New Delhi) is given in the orginal form  here so that the world internet readers could know the depth of the economic offence of this powerful corporate print media house of India.

TERMS AND CONDITIONS OF ADVERTISEMENT POLICY OF UNION GOVERNMENT IN INDIA

The Union Government through the Directorate of Advertising & Visual Publicity(D.A.V.P),Information& Broadcasting Ministry,Government of India,New Delhi,approves "the Govt. Advertisement Rates" and releases "the Union Govt. advertisements" to newspapers in bulkevery year after fulfilling the certain conditionssuch as

(1) The Newspaper must have ''the Certificate of Registration'' and ''The Registration  Number',

(2) The Evidence of uninterrupted publication of the newspaper for 36 months(three years) regularly,

(3) The Certificate of Audit Bureau of Circulation regarding the circulation of the newspaper,etc.

(4) There must be a minimum of seventy five thousand of circulation of the newspaper.

TERMS AND CONDITIONS OF ADVERTISEMENT POLICY OF BIHAR GOVERNMENT

The Bihar govt. also through the Information & Public Relation Department (IPRD), Patna, approves the "Govt. Advertisement Rate" and releases the "State Government Advertisements" in bulk to newspaperseither directly or through different district stategovt.offices every year in all districts of Bihar.

The Information & Public RelationDepartment(IPRD),Patna,Bihar enlists the eligible newspapers for the "State Govt. Advertisements" onthefollowing terms and conditions such as

(1) the Newspaper must have "The Certificate of Registration" from the office of the  Press Registrar,New Delhi,

(2) the number of sold Hindi daily newspaper must be a minimum of 45 thousand per day,

(3) the newspaper must have obtained " the Approved D.A.V.P Rate".etc.

 
DAINIK HINDUSTAN NOT ENTITLED TO PUBLISH ADVERTISEMENTS FROM AUGUST ,03, 2001 TO JUNE 30, 2011

Under the terms and conditions of the Advertisement Policies of the Union Govt. and the  Bihar Govt. as well, the new Bhagalpur and Munger publications/editions of Dainik Hindustan were not entitled to get and publish the Government Advertisements from the Union Government and theBihar Government as well as  both publications/editions had completely failed tocomply with the mandatory provisions of the Press & Registration of Books Act,1867 and theRegistration of Newspapers(Central) Rules, 1956 and the statutory rules and regulations of Advertisement Policies.The statutory provisions ofAdvertisement Policies include obtaining "the Certificateof Registration" & "the Registration Number" from  thePress Registrar,New Delhi.

EVEN AFTER REGISTRATION ,BOTH PUBLICATIONS WERE NOT ENTITLED TO GET AND PUBLISH GOVERNMENT ADVERTISEMENTS FOR THREE YEARS

Under the terms and conditions of the Advertisement Policies of .D.A.V.P(New Delhi) and I.P.R.D (Patna,Bihar),the new Bhagalpur and Munger publications/editions of Dainik Hindustan were not entitled to get the govt advertisements from the union govt. and the state govt. for three years from August ,03,2001 to July 31,2004,even though they would have obtained 'the Certificates of Registration'' and ''the Registration Numbers'' because there must have been an uninterrupted publication of the daily Hindi newspaper forthree years regularly even after obtaining the "Certificate of Registration" and the "Registration Number" from the office of the Press Registrar,New Delhi as per terms and conditions of the Advertisment Policy of the D.A.V.P,New Delhi.

Thus , when the company completes three yours publication regularly even after obtaining “the Certificate of Registration” & “the Registration Number”, it will ,then, be eligible only to apply for “the DAVP Advertisement Rate” and “DAVP Advertisements.”

It is also crystal clear that the Bihar Govt will consider enlisting any Hindi newspaper for the release of the "State Govt. Advertisements" if that newspaper  gets the "D.A.V.P Approved Advertisement Rate" from the DAVP ,New Delhi as per one of the three main termsandconditions of the I.P.R.D,Patna,Bihar .

MAIN REASON BEHIND THE ECONOMIC OFFENCE

To compensate the possible gross loss of income in the head of the publication of the advertisements of the union government and the Bihar government in the wake of a new publication/edition, the publisher/owner as well as the editors fraudulently induced the officials of the D.A.V.P(New Delhi) and I.P.R.D(Patna,Bihar) to deliver the advertisements of the union government and the Bihar govt. respectively to the illegal and unauthorised Bhagalpur and Munger publications of Dainik Hindustan forwrongful gain from August, 03 ,2001 to June 30,2011 by wrongly presenting the Bhagalpur and Munger publications/editions as "Registered Newspapers" before the Govts. in Delhi and Patna.  The Bhagalpur and Munger publications of Dainik Hindustan went in circulation/publication among readers and advertisers without the "Certificates of Registration'' and ''Registration Numbers''.But to cheat the officials ofD.A.V.P(New Delhi),I.P.R.D(Patna,Bihar) and private advertisers,too,the publishr/owner and the editors of Dainik Hindustan of Bhagalpur and Munger editions continued printing on the "Print-line" on the last  page of the newspaper the "Registration No.44348/1986" from August 03,2001 to June 30,2011, thus falsely and dishonestly presenting the newspaper to be "a lawfully registered newspaper".In reality, the truth is that the "printed Registration No.44348/1986" has been officially allocated to the Patna publication/edition of Dainik Hindustan from the office of the Press Registrar,New Delhi in 1986,some 15 years ago before the start of the new printing and publications of Bhagalpur and Munger editions of Dainik Hindustan in the year 2001 last.The documentary evidences of forgery and cheatings in the printing of the Patna Publication Registration No.44348/1986 on the "Print-line of theBhagalpur and Munger publications/editons of Dainik Hindustan by such a powerful media house is a serious economic offence which has never been heard in thepast hundred years in the world. "Thus,the company plundered the government exchequer upto about two hundred crores during the period.


The content  of Mr. Mantoo Sharma’s counter-affidavit in this matter,submitted to the Supreme Court(New Delhi) is given in the orginal form  here so that the world internet readers could know the depth of the economic offence of this powerful corporate print media house of India.

ONE MORE IMPORTANT REASON FOR CHEATINGS AND FORGERY OF THE MEDIA  HOUSE

The DAVP(New Delhi), the sole agency of the union government for the approval of "the Govt. Advertisement  Rate" and the "release" of "all central gov.  advertisements (Advts)" to newspapers, has made it "compulsory" that the minimum circulation of the daily  newspaper must be 75,000(Seventy five thousand ) per  day while the I.P.R.D(Patna,Bihar), the sole agencyof the  Bihar govt. for approval of "the Govt. Advertisement  Rate" and the "release" of the "State Govt.  Advertisements" to newspapers, has made it  "compulsory" in its terms and conditions that the  minimum circulation of the newspaper must be  20,000(Twenty thousand) per day from 1981 to 2008,  and  45,000(forty five thousand) per day from 2008 to till  now.And under the terms and conditions in respect  of the minimum circulation ,Dainik Hindustan  could/ can/would never fulfil the terms and  conditions in all times to come as in each district of Bihar,the circulation of Dainik Hindustan does  not cross ten thousand except some exceptions .

Under the circumstances, the company gets ''the  Certificate of Registration'' and '' the Registration NO.'' of  Dainik Hindustan for "one place of publication", but the  company prints, publishes and circulates "38 different  publications/editions" for "all thirty eight districts" of  Bihar with same title 'Dainik Hindustan',same editor, same  publisher,same printer, same registration No., same telephone No.,same local editor,but each districtwise  publication/ edition of Dainik Hindustan in Biharis  totally "different" in news as has been "certified"by "the  Enquiry-Report" of the Munger District Magistrate which  was sent to the Hon'ble Patna High Court in connection  with Criminal Misc.No.2951 of 2012 ( Shobhana Bharatiya  Vs State of Bihar and others) in this case.

But when the company prints and publishes 38 different newspapers with totally different  news contents in each districtwise  edition/publication under one registration No.,the  Publisher/owner presents the circulation figure taking together of figures of all the different  editions/publications of the Hindi daily  “Hindustan” ,thus fulfilling the terms and  conditions of the allotment of the union and the  state govt. advertisements. Thereby they  committed such a fraud to obtain the government  advertisements.  As it is the powerful media house,none  in the govt. machinery from district to Delhi dares even to  probe the allegations of economic offences ,what to speak  of conducting any deep enquiry and taking any legal  actions against the economic offenders.Such a big  economic offence has come to light only due to the action  of the judiciary at Munger.

By ShriKrishna Prasad, Advocate

Mobile No- 09470400813

जी न्यूज के बिहार प्रभारी श्रीकांत प्रत्यूष ने दिया इस्तीफा

जी न्यूज़ के 18 वर्षों से बिहार के प्रभारी श्रीकांत प्रत्यूष ने इस्तीफा दे दिया है. श्रीकांत ने तीन दिन पूर्व अपने भेजे इस्तीफे में बिहार में चल रहे अपने प्रोडक्शन हाउस में अपनी व्यस्तता का हवाला दिया है. सूत्र बताते हैं कि जी न्यूज़ मैनेजमेंट ने उनका पर कतर कर उनके उपर किसी को बैठाने की तैयारी कर ली है. मालूम हो कि श्रीकांत प्रत्यूष कई वर्षों से पटना में अपना एक निजी न्यूज़ चैनल पीटीएन न्यूज, नवबिहार, सन्मार्ग हिंदी दैनिक का प्रकाशन कर रहे हैं.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

उम्मीद की किरण हैं केजरीवाल

स्वभाव से विद्रोही, काम से एक्टिविस्ट और लक्ष्य केंद्रित व्यक्ति होने के बाद आज मुझे अरविन्द केजरीवाल का दीवाना होना चाहिए था। जैसे कि भारत के तमाम लोग हो रहे हैं। लेकिन बार-बार मस्तिष्क ऐसा होने से मना कर देता है। ये बिलकुल सही है कि केजरीवाल ने आज हिंदुस्तान की नब्ज पर हाथ रख दिया है क्योंकि आम भारतीय महँगाई, भ्रष्टाचार, भाई -भतीजावाद और तुष्टिकरण की राजनीति से गले तक आजिज आ गया है। वो इससे मुक्त होना चाह रहा है।

इसी तलाश में उसने ४० साल पहले जंजीर के विजय यानि अमिताभ में वो अक्स तलाशा था। फिर एक गम्भीर और गुस्सैल यंग मैन से धीरे -धीरे मसखरेपन की तरफ बढ़ते हुए अमिताभ ने आम भारतीय का दिमाग पलट दिया। फिर जयप्रकाश नारायण में वे आदर्श तलाशे गए लेकिन जयप्रकाश के खुद के आदर्श आम भारतीय के सपने के आड़े आ गए। तब से भारतीय आदमी की तलाश निरंतर जारी है, कभी इंदिरा, कभी संजय, कभी राजीव, कभी आडवाणी, कभी अखिलेश से होता हुआ तलाश का ये सफ़र फिलहाल केजरीवाल पर अटक गया है।

माहौल कुछ ऐसा है कि केजरीवाल के खिलाफ ज्यादातर लोग सुनने को तैयार नहीं। केजरीवाल ने पार्टी निर्माण के 13 माह के अंदर दिल्ली की सत्ता जरुर हासिल की लेकिन इसके लिए उन्होंने पिछले १० साल से अथक मेहनत की है। आयकर विभाग की नौकरी छोड़ी, अन्ना जैसा कंधा तलाशा जिस पर रख कर बंदूक चल सके। फिर भी कुछ कमी जरुर है कि इतना सब कुछ करने के बाद भी किरण बेदी, हेगड़े, राजगोपाल, राजेन्द्र सिंह, मेधा पाटकर आदि को रिझा नहीं सके, बाँध नहीं सके। अगर ये भी कह दूँ तो गलत नहीं होगा कि अन्ना के प्रिय और परदे के पीछे के दिग्दर्शक होने के बाद भी सर्वमान्य चेहरा न हो सके.

आज केजरीवाल की टीम में विश्वस्त चेहरे तलाशने को कहा जाए तो मुश्किलें पेश आएंगी। विश्वास लगातार अपनी विश्वशनीयता खो रहे है, अब तो उनके बयानों और हरकतों पर चुटकुले भी बनने लगे है। प्रशांत भूषण के कारनामों से भी उम्र का असर झलकने लगा है। धर्मेंद्र कोली और राखी बिडलान जैसे उनके नए-नए विधायक लगातार विवादस्पद होते जा रहे है। सिसोदिया एक धीर और गम्भीर चेहरा नजर आते है। किन्तु मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ फैसलों से खुद केजरीवाल की कसमों और वादों पर भी सवाल उठने लगे है.

मगर सच ये भी है कि इतनी जल्दी आम भारतीय मीडिया, टीम केजरीवाल और अन्ना के छोड़े गए असर से बाहर आने को तैयार नहीं है। ऐसा तब तक होगा जब तक की केजरीवाल एण्ड कम्पनी पूरी तरह से अपना अस्तित्व ना खो बैठे। वैसे आज पूरा देश ये चाहता है कि काश ये पल ना आयें, क्योंकि केजरीवाल जैसी उम्मीद जल्दी-जल्दी पैदा नहीं होती। भारतवासी जल्दी किसी के ऐसे दीवाने नहीं होते जैसे केजरीवाल के हुए हैं। यकीन नहीं हो पा रहा है कि अरविन्द उस उम्मीद को पूरा कर पाएंगे जो आम भारतीय चाहता है। उस चाह को अरविन्द पूरा करें या कोई और लेकिन अगर अरविन्द और उनके साथी पूरा करते है तो ये एक और चमत्कार होगा।तमाम शंकाओं के बावजूद अरविन्द भारतीय राजनीति और व्यवस्था का चेहरा और चरित्र बदलने में कामयाब हो सकें, ये मैं ही नहीं हर आम आदमी-ख़ास आदमी चाहता है.

 

लेखक से संपर्क उनके ईमेल  vishwakarmaharimohan@gmail.com पर किया जा सकता है।

केजरावाल को समय दीजिए, फिर कीजिएगा आलोचना

किसी भी नई सरकार के गठन के बाद यह परंपरा रही है कि उसे अपने चुनावी घोषणापत्र पर अमल के लिए कम से कम एक वर्ष का समय अवश्य दिया जाता है। विपक्षी दल भी इससे पहले सरकार पर टीका टिप्पणी करने से परहेज करते हैं। हिमाचल प्रदेश में भी इसी कारण वीरभद्र सरकार का एक वर्ष होने तक विपक्षी दल भाजपा ने संयम बरते रखा और ऐसा हमेशा से होता आया है।

लेकिन दिल्ली में आप(आम आदमी पार्टी) की सरकार को मीडिया और समस्त विपक्षी दलों ने एक सप्ताह तक का भी समय नहीं दिया। सब आप सरकार के पीछे पड़ गए हैं। दिल्ली में 28 दिसंबर को स्पष्ट हुआ कि वहां आप की सरकार बनने जा रही है। दो जनवरी को केजरीवाल सरकार ने विधानसभा में शपथ लेकर कार्यभार संभाला। नई सरकार को कुर्सी संभाले एक सप्ताह नौ जनवरी को होगा। लेकिन हमारा तथाकथित राष्ट्रीय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और तमाम विपक्षी दल सरकार को सांस तक नहीं लेने की फुरसत नहीं दे रहे। छोटी-मोटी बातों पर भी पूरे-पूरे दिन खबरें चल रही हैं।

कांग्रेस और भाजपा की बात तो समझ में आती है कि आप के कारण अब उनकी जान पर बन आई है। लेकिन इलैक्ट्रानिक मीडिया को क्या हो गया है। वह क्यों जनता में पत्रकारिता की फजीहत करने पर तुला हुआ है। मीडिया को किसी के हाथों में इतना भी नहीं खेलना चाहिए कि लोग उसे सरेआम बिकाऊ मीडिया… नियंत्रित मीडिया… कंट्रोल्ड मीडिया… रेग्युलेटेड मीडिया जैसे नामों से पुकारने लगें।  

लेखक शिमला में रहते हैं, उनसे संपर्क h.anandsharma@yahoo.com पर किया जा सकता है।

प्रकाश झा हड़प गए रिपोर्टरों का पैसा!

नमस्कार,

संपादक महोदय,

भाड़स4मडिया।

बड़े दुख के साथ आपको कहना है कि मैं बिहार में मौर्य टीवी का  रिपोर्टर हूं। पिछले अप्रैल माह से मौर्य प्रबंधन ने किसी भी रिपोर्टर को बकाया पैसे का भुगतान नही किया है। पिछले नवंबर माह में ही शायद प्रकाश झा ने चैनल को ज़ी मीडिया को बेच दिया था लेकिन रिपोर्टरों को पता तक नही चला। 15 दिसंबर तक खबरें मांगी जाती रही लेकिन पैसों का भुगतान नही किया गया।

अपने आप को समाजसेवी बताने वाले प्रकाश झा राजनीति, सत्याग्रह जैसे फिल्म बना कर समाज के सिरमौर बनने का दावा करते है लेकिन बिहार झारखंड के रिपोर्टरों को बिना पैसा दिये चैनल बेच कर कहां चले गए, पता नहीं चल रहा है। अब कोई पैसे की बात सुनने वाला भी नहीं है। जी न्यूज ने भी अपने ज़ी के रिपोर्टर्स को लगभग रख लिया लेकिन मौर्या के रिपोर्टरों को फिलहाल नहीं हटाया है।

अब सवाल उठता है कि जब चैनल को प्रकाश झा ने बेच लिया तो मंगनी में चैनल बेचा नहीं होगा, पैसा लिया होगा, तो इस रिपोर्टर को पैसा नहीं देकर क्यूं हाय लेने में जुटा है। सुपौल में बाढ़ पीडि़तों के लिए घर बना कर अच्छा काम किया, पर क्या वह सिर्फ दिखावा था समाज में प्रतिष्ठिा पाने के लिए। वो गरीब रिपोर्टर जो 9 माह तक दिन-रात एक कर खबर कर उन्हें भेजता रहा उसका कोई ख़्याल नही है।

जिन जिलों में केबल वालों का एग्रीमेन्ट था उनको नो डयूज करा कर हर जिले में केबल वालों को पैसा दिया गया लेकिन रिपोर्टर को नहीं क्योकि रिपोर्टर के साथ कोई एग्रीमेन्ट नहीं है। अब ये बेचारा रिपोर्टर किससे गुहार लगाए। प्रकाश झा जैसे आदमी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। ये अभी नीतीश बाबू के गुणगान में लगे हैं कि कहीं इनका राजनीतिक करियर उठ जाए लेकिन इन रिपोर्टरों की हाय तो इन्हें जरूर लगेगी।

आप से अनुरोध है कि इस खबर को अपने भाड़स पर जगह देने की कृपा करें।

आपका

एक रिपोर्टर

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘ओपेन’ में अंदरुनी हलचल तेज, एडिटर इन चीफ मनु जोसेफ का इस्तीफा

'ओपेन' मैग्जीन से सूचना है कि एडिटर इन चीफ मनु जोसेफ ने इस्तीफा दे दिया है. ओपेन मीडिया नेटवर्क की तरफ से प्रकाशित 'ओपेन' मैग्जीन को मैनेजिंग एडिटर के बतौर पीआर रमेश संभालेंगे. ओपेन मैग्जीन लगातार विवादों में है. इसके पोलिटिकल एडिटर हरतोष सिंह बल ने कई तरह के आरोप लगाकर मैग्जीन से इस्तीफा दे दिया था. एक पत्रकार ने भड़ास को इस पूरे प्रकरण पर एक मेल भेजा है, जो इस प्रकार है…

Joseph Steps Down as Editor Open Magazine

New Delhi: Editor in Chief of Open magazine, Manu Joseph has resigned from Open Media Network, a media venture of Sanjiv Goenka Group. PR Ramesh will take over the reins as the new Managing Editor.

Open Magazine was in news of late when Hartosh Singh Bal, its erstwhile political editor, was asked to leave the journal. Bal had hinted to moving court in the pursuit of a better severance deal, but nothing of the sort happened.

PR Ramesh resigned as political editor from The Economic Times in December. It was well known that he would be joining Open and the decision by Manu Joseph to step down has come as a surprise to many of his colleagues. The journalistic circle, however, sees this as a logical step after Hartosh S Bal's exit.

जेपी जोशी सेक्स स्कैण्डल, पीड़िता बन सकती है सरकारी गवाह!

देवभूमि उत्तराखण्ड में राजनेताओं के साथ-साथ राज्य के उच्च अधिकारियों पर भी यौन शोषण के आरोप लगते रहे हैं। हाल ही में चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में गिरफ्तार और अब निलंबित अपर सचिव जेपी जोशी और कांग्रेस नेत्री रितु कण्डियाल के खिलाफ कोर्ट में 192 पेज की चार्जशीट दाखिल की गई है। पुलिस ने इस हाई-प्रोफाईल मामले में 40 दिन के अंदर पीड़िता, डाक्टर, पुलिस रेस्ट-हाउस, नैनीताल के स्टाफ कर्मचारीयों व दिल्ली पुलिस के अफसरों समेत 22 लोगों को गवाह बनाया है।

पुलिस द्वारा शनिवार को कोर्ट में दाखिल की गई चार्जशीट में जेपी जोशी के खिलाफ आईपीसी की धरा 376सी व धारा 506, नौकरी का झांसा देकर दुष्कर्म व जान से मारने की धमकी देना, जबकि रितु कण्डियाल के खिलाफ धरा 376सी व धारा 506 और 109, नौकरी का झांसा देकर दुष्कर्म को दुष्प्रेरित करना व जान से मारने की ध्मकीद देने का आरोप लगाया गया है। इस हाई-प्रोफाईल मामले में पुलिस द्वारा  चार्जशीट दाखिल करने के बाद माना जा रहा है कि पुलिस पीड़िता को सरकारी गवाह बना सकती है।

उल्लेखनीय है कि यह मामला बीती 22 नवंबर को पीड़िता ने दुष्कर्म किये जाने का आरोप जोशी पर लगाया था और 22 नवंबर को ही यह मामला दिल्ली में दर्ज हुआ था। पीड़िता का यह भी आरोप था कि जोशी द्वारा उसकी अश्लील सीडी बनायी गई हैं। इतना ही नहीं पीड़िता ने कांग्रेस नेत्री रितु कण्डियाल पर जोशी से मिलाने और दुष्कर्म के लिए दुष्प्रेरित करने के साथ-साथ जान से मारने की ध्मकी देने का भी आरोप लगाया गया था। दिल्ली में मुकदमा कायम होने के बाद 25 नवंबर को यह मामला देहरादून ट्रांसपर्फर कर दिया गया था। उससे पहले 23 नवंबर को देहरादून के बसंत बिहार थाने में पीड़िता व उसके कुछ साथियों पर अश्लील सीडी के नाम पर ब्लैकमेलिंग किए जाने का मुकदमा जेपी जोशी द्वारा दर्ज कराया गया था। दोनों मामलों की जांच पुलिस मुख्यालय के स्पेशल सैल को सौंपी गई थीं। मामले की त्वरित जांच करते हुए पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी है। लेकिन अभी भी इस मामले में कई लोगों के चेहरे से नाकाब नहीं उतर सका है। वहीं, जेपी जोशी और रितु कण्डियाल को जेल में बंद हुए काफी समय हो गया है। रितु व जोशी की न्यायिक हिरासत 18 जनवरी तक तथा सपा नेता नीरज चैहान की न्यायिक हिरासत 15 जनवरी तक बढ़ा दी गई है।

इसी मामले में सुमन सिंह वल्दिया, अमित गर्ग, संजय बनर्जी आदि की गिरफ्तारी पुलिस पहले ही कर चुकी है। अब इस मामले में पुलिस की जांच पीड़िता के इर्द-गिर्द घूमती हुई नजर आ रही है। वहीं, पुलिस अभी तक इस बात का पता नहीं लगा पायी है के पीड़िता की सीडी किस मीडिया संस्थान  में बनाई गयी थी। हालांकि एक निजी चैनल के कर्मचारी को पुलिस ने गिरफ्तार कर पूछताछ की है। पुलिस द्वारा बड़े स्तर पर इस मामले की जांच की जा रही है, जिसके चलते सचिवालय के साथ-साथ शासन स्तर पर भी यह मामला काफी किरकिरी करा चुका है। उत्तराखण्ड में इस मामले के उछल जाने के बाद सरकारी दफ्रतरों से लेकर प्राईवेट कंपनियों में भी महिलाओं को रखे जाने पर खासी सावधनी बरती जा रही है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बाबा रामदेव अर्द्धसाक्षरनुमा इंसान हैं, पढ़े-लिखे कम हैं पर चालाक ज्यादा हैं

बाबा रामदेव अर्द्धसाक्षरनुमा इंसान हैं। पढ़े-लिखे कम हैं पर चालाक ज्यादा हैं। चालाक न होते तो योग की इतनी बढ़िया मार्केटिंग कैसे करते? योग स्वस्थ रहने जरिया रहा है। रामदेव ने उसे चिकित्सा विज्ञान के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। उनके "चमत्कारों" को चैनलों ने प्रसारित किया। चैनलों और रामदेव की कमाई साथ-साथ आगे बढ़ी।

एक कम पढ़े-लिखे इंसान ने जब अपनी सामर्थ्य से ज्यादा कमाई कर ली तो उसे सत्ता की हवस जागी। उसे लगा कि जैसे उसने व्यापार में अप्रत्याशित कमाई कर ली वैसे ही वह सत्ता के गलियारों को लांघकर शीर्ष पद पर पहुंच सकता है। इसी लालसा में उन्होंने अपनी अधकचरी समझ के बावजूद राजनीतिक मुद्दे उठाने का प्रयास किया, हालांकि इसकी शुरूआत देशभक्ति के साथ हुई। देशभक्ति का भी अपने देश में बहुत बड़ा बाजार है और लोगों में भावनाएं जागृत कर स्वदेशी या हर्बल बताकर किसी भी माल को आसानी से टिकाया जा सकता है।

बाबा के इस काम में राजीव दीक्षित ने मदद की जो उन दिनों हिंद स्वराज आंदोलन से निकाले जाने के बाद बेरोजगार चल रहे थे।  आंदोलन के कार्यकर्ता उन्हें पथभ्रष्ट नेता मानने लगे थे और वर्धा की एक सभा में उन्हें आंदोलन से निकाले जाने का निर्णय ले लिया गया। यह आंदोलन खुद राजीव दीक्षित ने खड़ा किया था और अपने आपको बनवारी लाल शर्मा वाले आजादी बचाओ आंदोलन से अलग करके किया था। वर्धा की इस मीटिंग ने रामदेव ने बीच-बचाव किया था और आंदोलन के कार्यकर्ताओं को कुछ आश्वासन दिये थे जो आज तक पूरे नहीं हो सके।

यह पूरी कहानी प्रथम प्रवक्ता में छप चुकी है, जब उसका संपादन रामबहादुर राय के जिम्मे था। अब आंदोलन के कुछ कार्यकर्ता अलग हो चुके हैं, कुछ "आप" में शामिल है, कुछ रामदेव के साथ भी है। इन्हीं में कुछ लोग बताते हैं कि प्रखर मेधा के बावजूद राजीव दीक्षित की हैसियत रामदेव के वेतनभोगी की ही थी। उनके नजदीकियों का मानना है कि इतनी कम उम्र में उनके दिल के दौरे के पीछे एक तरह की घुटन ही थी। यह सब यहां बताने का मकसद केवल इतना है कि जिस काले धन के मुद्दे को रामदेव ने जोर-शोर से उठाया और जिस मुद्दे के सहारे वे राजनीति के गलियारे में प्रवेश करना चाहते थे वह मुद्दा दरअसल राजीव दीक्षित ने जोर-शोर से उठाया था, जिसका श्रेय रामदेव ने उन्हें कभी नहीं दिया।

यह एक तरह का पायेटिक जस्टिस था क्योंकि खुद राजीव दीक्षित कभी अपने मुद्दों के संदर्भ में उन साथियों की चर्चा कभी भी नहीं करते थे जो इन कामों के लिये शोध हेतु कड़ी मेहनत करते थे। इनमें से एक नाम वर्धा के शिवदत्त भाई का है जो गांधीवादी कार्यकर्ता हैं। बहरहाल इससे पहले कि रामदेव सत्ता के गलियारे में प्रवेश के लिये आंदोलन के जरिये थोड़ी बहुत जगह बना पाते, उनकी चालाकी ने उनका खेल बिगाड़ दिया और सलवार-कुर्ता पहनकर मैदान से भागने की उनकी कहानी सबको पता है।

तो कांग्रेस से रामदेव के रिश्ते इतने खराब हुए कि भाजपा की गोद में जाकर बैठने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं रह गया था। वरना एक समय था कि बड़े-बड़े कांग्रेसी मंत्री भी उनके चरण स्पर्श करते थे। अब भाजपा का साथ बाबा की मजबूरी है पर हाल की रैली में उन्होंने एक बार फिर चालाकी दिखाते हुए संकेत यह दिया कि उन्हें समर्थन वे कुछ "शर्तों" पर देंगे। ये शर्तें क्या थीं? एक तो वही कालेधन वाली, जिसका कापीराइट आजादी बचाओ आंदोलन के पास था। कुछ अन्य शर्तें कर प्रणाली में सुधार वाली हैं, जो दरअसल अर्थक्रांति आंदोलन की हैं, जिनका खुलासा भड़ास4मीडिया में कोई साल भर पहले हो चुका है।

कल एनडीटीवी में रविश ने इस पर प्रोग्राम किया। बाबा इस तरह बोल रहे थे जैसे ये सारे प्रस्ताव उनके अपने हों और वे अर्थशास्त्र के बहुत बड़े विद्वान हों। हकीकतन सुनी-सुनाई बात को भुनाने में वे बेहद माहिर हैं और सारी चीजों का क्रेडिट अपने पास रखना चाहते हैं। इसी चालाकी में पिटते हैं और सलवार-कुर्ते का सहारा लेते हैं। मुझे कहना केवल इतना है कि कम से कम जिनके मुद्दे उठायें, उन्हें थोड़ा-सा श्रेय तो दें।

देंखें :

http://old.bhadas4media.com/lifestyle/12522-2011-08-15-13-58-24.html

http://old.bhadas4media.com/lifestyle/12523-2011-08-15-14-11-43.html


लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं.  उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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भड़ास पर दिनेश

मेरे कार्य क्षेत्र में कोई भी संपादकीय व प्रशासकीय हस्तक्षेप नहीं करेगा, नोएडा भी नहीं : एसएन विनोद

न्यूज़ एक्सप्रेस में विनोद कापड़ी के आगमन के साथ मेरे नाम को लेकर भी कुछ टिप्पणियां की जा रही है. सैकड़ों मेल, एसएमएस व सोशल मीडिया के माध्यम से सवाल खड़े किये जा रहे है कि मैंने अपने से अत्यंत ही कनिष्ठ विनोद कापड़ी की अधीनता कैसे स्वीकार कर ली? अपेक्षा व्यक्त की जा रही है कि मैं इस्तीफा दे दूँ. टिप्पणियां की जा रही हैं, मेरी कथित मजबूरी को ले कर,  टिप्पणियां की जा रही हैं मेरे पत्रकारीय पार्श्व, अतीत, वर्तमान और वरिष्ठता को ले कर, टिप्पणियां की जा रही हैं मेरी कथित "बेचारगी'' को ले कर! 

पहले तो मैंने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन सैकड़ों पत्रकार मित्रों और शुभचिंतकों, विशेषकर युवा पत्रकार मित्रों, की जिज्ञासा के आलोक मैं इस छोटे से स्पष्टीकरण को शब्दांकित करने को बाध्य हुआ- बगैर किसी पूर्वाग्रह के निश्छल भाव से !

१. सर्व प्रथम विनोद कापड़ी के विषय में :

चूँकि न्यूज़ एक्सप्रेस प्रबंधन ने विश्वास और अनेक उम्मीदों के साथ उन्हें न्यूज़ एक्सप्रेस की कमान सौंपी है, उन्हें हर तरह का सहयोग और समर्थन मिलना चाहिए। वे एक अनुभवी पत्रकार है और ऐसी आशा की जा सकती है कि अपनी टीम के साथ वे स्वयं को प्रमाणित भी कर सकेंगे इसके लिए जरुरी है कि उन्हें प्रबंधन की और से पूरी स्वतंत्रता मिले। इसके बगैर कोई भी परिणाम नहीं दे सकता है. उन्हें समय दिया जाना चाहिए…

२. अब अपने विषय में :

संस्थान में मेरे पास तीन जिम्मेदारियां हैं.

क- एडिटर, न्यूज़ एक्सप्रेस (महाराष्ट्र )

ख- चैनल हेड, न्यूज़ एक्सप्रेस (मराठी) और प्रधान संपादक, साप्ताहिक "हमवतन''. प्रबंधन के साथ मौखिक समझौते के अनुसार मेरे कार्य क्षेत्र महाराष्ट्र राज्य में कोई भी, सम्पादकीय व प्रशासकीय दोनों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा, नोएडा भी नहीं। प्रबंधन ने इसे स्वीकारा और अभी तक ऐसा ही होता रहा है। प्रबंधन की और से किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं हुआ है. उपर्युत तीनों जिम्मेदारियों को निभाने के क्रम में मेरे शब्द अंतिम रहे हैं.

अब नई व्यवस्था मैं प्रबंधन कोई परिवर्तन करना चाहता है, तो यह उस का अधिकार है. इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता,  मुझे प्रबंधन की और से अभी तक इस सम्बन्ध मैं कोई निर्देश नहीं मिला है. हाँ, नई व्यवस्था सम्बन्धी मुझे कोई निर्देश मिलता है तब मैं अपने विषय मैं निर्णय लेने को स्वतंत्र रहूँगा। मैं अपने मित्रों को आश्वस्त कर दूँ कि मजबूरी, समर्पण, समझौता, अधीनता जैसे शब्द मेरी डिक्शनरी में नहीं हैं- जब बीस वर्ष कि आयु मैं नहीं किया, तब बहत्तर में कैसे ??

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग 'चीरफाड़' से लिया गया है.

‘दलित दस्तक’ के पत्रकार के साथ लखनऊ में सिपाही ने की गुंडई

Akhilesh Krishna Mohan : दिल्ली से प्रकाशित दलित चिंतन की मैग्जीन 'दलित दस्तक के लखनऊ संवाददाता दिव्यांशु आज लखनऊ के अलीगंज से गुजर रहे थे तो उनके स्कूटर का पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने यह कहते हुए चालान कर दिया कि तुम 'दलित दस्तक' का प्रेस स्टीकर लगाकर कैसे चल सकते हो। गाड़ी के सभी कागज मौजूद थे, दिव्यांशु हेलमेट भी लगाए हुए थे और जो लखनऊ में नहीं देखा जाता पॉल्यूशन का कागज भी दिव्यांशु के पास था। खबर है कि पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने दलित विरोधी शब्द भी बोले। पत्रकार ने एसएसपी और मुख्यमंत्री से गुंडई करने वाले सिपाही जे. उपाध्याय की शिकायत करने की तैयारी की है। एक भी कागज ऐसा नहीं था जो दिव्याशु के पास नहीं था। वो हेलमेट भी पहने थे। इसके बाद भी सिपाही ने यह कहते हुए चालान किया कि तुमने 'दलित दस्तक' का स्टीकर क्यों लगाया। ऐसी गुंडई तो अगर पुलिस वाला कर रहा है तो फिर बाकी दबंग करेंगे ही।

Shiv Das अखिलेश भाई। आपकी सूचना में दो बातें हैं जिसे मैं रखना चाहता हूं। पहले यह कि माननीय न्यायालय के आदेशों के तहत प्रेस, पदनाम या अन्य किसी प्रकार के स्टिकर को वाहन पर चस्पा कर चलना गैर-कानूनी है। दूसरा, यह कि अगर पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने 'दलित दस्तक' शब्द की उल्लेख दुर्भावनापूर्ण ढंग से किया है तो फिर इसके खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए। इस लड़ाई में हम आपके साथ हैं। हालांकि यह स्पष्ट कैसे होगा, यह जरूरी विषय है।

 Akhilesh Krishna Mohan शिवदास जी हम लोग तो इसी में उलझे रहते हैं कि हाईकोर्ट ने क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा। अरे भाई जब प्रेस लगाकर फर्जी पत्रकार चल रहे हैं कोर्ट और पुलिस कुछ नहीं बोल रही है बल्कि सलूट कर रही है तो हम लोग तो काम करते हैं सचिवालय विधानसभा की रिपोर्टिंग करते हैं। इस तरह की बाते हम लोग करते हैं तभी कुछ नहीं कर पाते हैं केवल चिल्लाते रहते हैं बस।  जे उपाध्याय ने अपनी गलती मानते हुए हेलमेट सिर पर न होने या ठीक से नहीं देखने की दलील दी है। खैर मामला एससपी या डीजीपी तक जाने से बच गया लेकिन एक बात रही दलित दस्तक के मुद्दे पर जे उपाध्याय ने कहा कि हमारे लिए दलित दस्तक या दैनिक जागरण, अमर उजाला सब बराबर है। मैं ऐसा नहीं कर सकता। खैर चालान का उपाध्याय ने तुरंत थाने में ही निपटारा करवाया। मामले का पटापेक्ष हो गया है। लेकिन दोस्तों आवाज गलत लोगों के खिलाफ दबनी नहीं चाहिए। चाहे कोई कितना भी बड़ा हो लेकिन हमें एक होकर मुकाबला करना ही है।

अखिलेश कृष्ण मोहन के फेसबुक वॉल से.

‘आप’ के संजय सिंह शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद से मिलने उनके घर पहुंचे

Anil Kumar Yadav : "आप" के यूपी संयोजक, पुरातन परिचित सुल्तापुर के एक्टिविस्ट संजय सिंह से बड़े दिनों बाद कल मुलाकात हुई. रैशनल लगे जब कहा कि जाति और धर्म के मुद्दे नकली हैं हम असली मुद्दे उठाएंगे. नखलऊ का कॉफी हाउस देर तक तालियों से गूंजता रहा जब उदाहरणों के साथ उन्होंने बताया कि मेनस्ट्रीम की पार्टियां जब सत्ता का केक खाना हो बेहिचक भाजपा के साथ चली जाती है और जब जरूरत हो तो सांप्रदायिकता विरोध का नाटक करने लगती हैं.

लेकिन तालियों की गूंज अभी हवा में ही ठहरी थी कि संजय शिया धर्मगुरू मौलाना कल्बे जवाद से मिलने उनके घर पहुंच गए. क्या यह वैसी ही रस्म थी जो मेनस्ट्रीम पार्टियों के नेता मुसलमानों की ओर देखते हुए चुनाव के वक्त निभाते हैं या कुछ और? आशा है संजय बताएंगे।

नवभारत टाइम्स, लखनऊ में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव के फेसबुक वॉल से.

‘बर्सन-मार्सलेटर’ नामक इस पीआर कंपनी को जनमत प्रभावित करने में महारत हासिल है

इतना तो पता चल ही गया है आपको की राहुल गांधी की छवि को सुधारने का ठेका एक विदेशी कंपनी को मिला है. लेकिन शायद ये नहीं जानते होंगे आप की वो कंपनी कौन सी है. जी हाँ. ये वही कंपनी है जिसने भोपाल में गैस के द्वारा जनसंहार करने वाली कंपनी यूनियन कार्बाइड की छवि सुधरने का जिम्मा लिया था. 'बर्सन-मार्सलेटर' नाम की इस कंपनी को जनमत को प्रभावित करने में महारत हासिल है.

इस कंपनी की सेवायें कई सैन्य तानाशाहों ने ली है. इसके आलावा मानव अधिकारों के अभियानों के खिलाफ कोर्पोरेट कंपनियों की छवि सुधारने का काम भी ये करती रही है. कनाडा-अमेरिका आदि देश भी इसकी सेवायें लेते रहे हैं. इसी कंपनी ने अलास्का में तेल रिसाव मामले में फंसी कंपनी 'एक्सन शिपिंग' की भी मदद की थी. 500 करोड रूपये का कांग्रेस का यह प्रोजेक्ट शुरू हो चुका है जिसमें जापानी कंपनियों की भी मदद ली जा रही है.

आपको याद है न की यूनियन कार्बाइड के माई-बाप वारेन एंडरसन को तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आदेश पर तब के सीएम अर्जुन सिंह ने ससम्मान भोपाल और बाद में देश से बाहर किया था. कांग्रेस के 'संकट' के समय ये कंपनियां तो उपकार चुकायेगी ही न? तो फेसबुक समेत हर माध्यमों पर कांग्रेस के आक्रामक प्रचार अभियानों के लिए तैयार हो जाइए.

पत्रकार और बीजेपी एक्टिविस्ट पंकज कुमार झा के फेसबुक वॉल से.

पीलीभीत में हिन्दुस्तान का विरोध, प्रतियां जलायीं गयीं

पीलीभीत में हुए उर्स-ए-हशमती में हिन्दुस्तान भर के उलेमाओं और ज़ायरीनों ने शिरकत की. उर्स में एक लाख से ज्यादा की भीड़ जुटी. अमर उजाला और दैनिक जागरण अखबारों ने उर्स की अच्छी रिपोर्टिंग की पर हिन्दुस्तान अखबार ने उर्स की एक भी खबर नहीं छापी. दरगाह के लोगों ने फोन कर खबर न छापने की वजह हिन्दुस्तान अखबार के ब्यूरो चीफ से जाननी चाही. उनका का कहना था कि वे एलएच शुगर फैक्ट्री में पुलिस प्रशासन और मीडिया के बीच खेले जा रहे