1984 बनाम 2002: चुनावी समर में दंगा राजनीति

लोकसभा का चुनावी समर काफी करीब आ गया है। ऐसे में, वोट बैंक की राजनीति के नए-नए दांव चलाए जाने लगे हैं। एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक चक्रव्यूह भी रचे जा रहे हैं। ताकि, आसानी से सामने वाले विपक्षी को इसमें फंसाया जा सके। यदि बात सम-सामयिक मुद्दों से ही नहीं बनती है, तो इतिहास के पन्नों को भी खंगाला जा रहा है। ताकि, विपक्ष के खिलाफ ‘इतिहास’ से कुछ कीचड़ निकाला जाए। फिर, इसी से प्रतिद्वंद्वी समूह की चमक धूमिल की जाए। कुछ इसी तरह की कोशिशें इन दिनों भाजपा और कांग्रेस के बीच दिखाई पड़ रही हैं। ‘पीएम इन वेटिंग’ बनने के बाद नरेंद्र मोदी पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने में जुटे हैं। वे तो कांग्रेस के विरुद्ध वातावरण बनाने के लिए हर मसाला आजमाने के लिए तैयार रहते हैं। ताकि, वे अपने ‘मिशन पीएम’ के करीब पहुंचते जाएं। कांग्रेस ने भी पलटवार की अपनी रणनीति तेज कर दी है। पार्टी के रणनीतिकार जगह-जगह लोगों को मोदी और भाजपा के ‘खतरे’ बताने में जुट गए हैं।

 
मोदी तो पिछले कई महीनों से राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान पर सीधे निशाने साधने में लगे रहे हैं। लेकिन, कांग्रेस प्रमुख सीधे तौर पर जुबानी जंग से बचती रही हैं। यदि उन्होंने अपने भाषणों में कहीं मोदी का जिक्र भी किया, तो कटाक्ष के रूप में ही करने की रणनीति अपनाई है। लेकिन, अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। कांग्रेस ने यह साफ कर दिया है कि यदि चुनाव में पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आती है, तो राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के चेहरे होंगे। यह अलग बात है कि भाजपा की तरह कांग्रेस ने राहुल के नाम का औपचारिक ऐलान नहीं किया। कांग्रेस के रणनीतिकार अच्छी तरह से समझने लगे हैं कि भाजपा ने जिस तरह से आक्रामक तेवर अपना लिए हैं, ऐसे में इनकी चुनावी मुहिम का मुकाबला बहुत नरमी की राजनीति से संभव नहीं है।
 
कांग्रेस के उस्ताद नहीं चाहते हैं कि पूरा चुनाव अभियान मोदी बनाम राहुल की जंग में केंद्रित हो जाए। क्योंकि, घाघ राजनीतिक समझे जाने वाले मोदी के मुकाबले राहुल कुछ ‘कच्चे’ हैं। वे एक दशक से सक्रिय राजनीति में जरूर हैं। लेकिन, संसद से सड़क तक उनकी राजनीति, जुझारू तेवरों की कभी नहीं रही। नेहरू-गांधी परिवार का वारिस होना ही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। इसी के चलते पूरी पार्टी, सर्वोच्च कुर्सी पर बैठाने के लिए उनकी मनुहार करती नजर आती है। जबकि, दूसरी तरफ मोदी को इस मुकाम तक पहुंचने के लिए पार्टी के अंदर लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी है। हालांकि, वे गुजरात में तीन बार बहुमत वाली सरकार बनवाकर ‘जीत का सिकंदर’ बन चुके हैं। लेकिन, तमाम कोशिशों के बावजूद कट्टर हिंदुत्व वाली छवि उनका पीछा नहीं छोड़ रही।
 
शुरुआती दौर में इसी छवि के चलते मोदी ने गुजरात में अपना राजनीतिक सिक्का चलाया था। कांग्रेस की तमाम कोशिशें उन्होंने सफल नहीं होने दीं। ऐसे में, मोदी संघ नेतृत्व के खास चेहते बन गए। वैसे भी 2002 के दंगों के दौरान मोदी की छवि एक कट्टर हिंदुत्ववादी नेता की बनी थी। वे राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह का भाषण करते हैं, ऐसे में संघ परिवार के तमाम घटक उनके मुरीद बनते रहे हैं। यह जरूर है कि गुजरात में मोदी ने संघ परिवार के कई बड़ों को भी बौना बनाने में देर नहीं लगाई। ऐसे लोगों ने मोदी की ‘दिल्ली मंजिल’ रोकने की अपनी तईं कोशिशें भी की थीं। लेकिन, ये लोग सफल नहीं हुए। अब तो मोदी की मुहिम रफ्तार पकड़ चुकी है। वे अब राहुल पर सीधे निशाने साध रहे हैं। कह रहे हैं कि मुकाबला एक चाय बेचने वाले पिछड़े वर्ग के शख्स से है। ऐसे में, कांग्रेस ने मुकाबले में खुलकर अपने ‘युवराज’ को उतारने की हिम्मत नहीं की। इस तरह की टिप्पणियां करके मोदी राजनीतिक समीकरण बनाने का भी खेल करते दिखाई पड़ते हैं।
 
मोदी
के खिलाफ कांग्रेस के पास सबसे बड़ा हथियार 2002 के दंगों का ही है। पिछले दिनों अपने पहले टीवी इंटरव्यू में राहुल ने गुजरात के इन दंगों में मोदी को घेरने की कोशिश की। यही कहा कि वहां पर एक समुदाय विशेष (मुस्लिम) के लोगों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम हुआ था। इन दंगों में कहीं न कहीं उनकी भूमिका थी। ऐसे में, यह वर्ग कभी भी उन पर विश्वास नहीं कर सकता। जब उन्हें याद दिलाया गया कि किसी अदालत ने मोदी को दोषी नहीं ठहराया, तो उन्होंने झट से कह दिया कि अदालत ने भले कोई फैसला न दिया हो, लेकिन उन्हें तो मीडिया के तमाम लोगों ने प्रत्यक्षदर्शी के तौर पर बताया है कि उनकी भूमिका ठीक नहीं थी। जब उन्हें 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस की चर्चित भूमिका की याद दिलाई गई, तो वे कन्नी काटते नजर आए।
 
जब उनसे पूछा गया कि गुजरात के दंगों और 84 के सिख विरोधी दंगों में क्या बड़ा फर्क महसूस करते हैं? तो उन्होंने कहा कि उस समय दिल्ली में कांग्रेस की सरकार ने दंगा नियंत्रण के लिए जरूरी कदम उठाए थे। जबकि, गुजरात में ऐसा नहीं किया गया। इस तरह की विवादित टिप्पणी करके राहुल ने जाने-अनजाने विवाद का एक नया पिटारा खोल दिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली कहते हैं कि दंगों पर काबू करने के लिए मोदी सरकार ने कुछ घंटों में ही सेना बुला ली थी। पुलिस और सेना ने 200 से ज्यादा दंगाइयों को गोली का निशाना बनाया था। जबकि, सिख विरोधी दंगों में पुलिस ने एक भी दंगाई को मार नहीं गिराया। इससे राहुल के दावे की पोल खुल जाती है। सच्चाई तो यह है कि कांग्रेसी उस दौर में ‘खून के बदले खून’ के नारे लगाकर सिखों का कत्लेआम करा रहे थे। कई आरोपी कांग्रेसियों को कांग्रेस ने टिकट देकर सांसद और मंत्री तक बनवाया है। यदि मुख्यमंत्री के तौर पर राहुल, मोदी को दोषी मानते हैं तो वे इसी फार्मूले से तत्कालीन प्रधानमंत्री अपने पिताश्री राजीव गांधी को दोषमुक्त कैसे मानते हैं?
 
जबकि, गुजरात में 800 से ज्यादा लोगों को दंगों के मामले में सजा मिल चुकी है। मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री रहीं माया कोडनानी सजा काट रही हैं। अकाली दल के सांसद नरेश गुजराल भी राहुल की टिप्पणी से आहत हैं। उन्होंने कहा है कि इस तरह की बात कह कर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने सिखों के साथ क्रूर मजाक किया है। सोनिया गांधी भी पिछले दिनों एक रैली में कह चुकी हैं कि उन लोगों ने एक ऐसे शख्स (मोदी) को प्रधानमंत्री बनवाने का सपना देखा है, जो कि हमेशा से लोकतांत्रिक तौर-तरीकों को ठेंगा दिखाता रहा है। पूरी दुनिया इनके बारे में अच्छा नजरिया नहीं रखती। भला, ऐसा व्यक्ति वहां कैसे पहुंच सकता है?
 
वोट बैंक की राजनीति में कांग्रेस सहित सपा जैसे दल भी अल्पसंख्यक कार्ड का खेल जमकर खेल रहे हैं। राष्ट्रीय वक्फ विकास निगम के उद्घाटन समारोह के दौरान यहां दिल्ली में बुधवार को एक मुस्लिम युवक ने हंगामा किया। उसका ऐतराज यही था कि सरकार अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर तमाम घोषणाएं करती हैं। लेकिन, इनका अमल नहीं हो पाता। कहीं इस हंगामे का गलत राजनीतिक संदेश अल्पसंख्यकों के बीच न जाए, ऐसे में हंगामा करने वाले शख्स की मनुहार की गई। इस बीच अलीगढ़ विश्वविद्यालय की किशनगंज (बिहार) शाखा के शिलान्यास समारोह को लेकर जदयू और कांग्रेस के बीच ठन गई है। क्योंकि, उद्घाटन के लिए सोनिया गांधी का कार्यक्रम बना, तो राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश को न्यौता तक नहीं दिया गया। ऐसे में, वे कांग्रेस को कोसने लगे हैं। यह बवाल वोट बैंक की राजनीति से जुड़ा है। ‘सेक्यूलर’ दलों के ऐेसे टंटों से भाजपाई रणनीतिकार भला खुश क्यों न हों?

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

उत्तराखंड सरकार ने मंत्रियों, विधायकों के वेतन-भत्तों में तीन गुना तक वृद्धि की

स्कूल में एक मुहावरा पढ़ा था "अंधा बांटे रेवड़ियां, फिर-फिर अपनों को ही दे।" मैंनें आज तक ना तो किसी अंधे को रेवड़ी बांटते देखा और ना ही बार-बार अपनों को ही देते। लेकिन इस मुहावरे में अंधे की जगह सत्ता के मद में अंधे कर दिया जाए तो यह मुहावरा अक्सर सही साबित होता हुआ दिखाई देगा। 28 जनवरी को उत्तराखंड की विजय बहुगुणा सरकार के मंत्रिमंडल के निर्णय अपनों को रेवड़ी बांटने का ही नहीं, उन पर रेवड़ियों का पूरा गोदाम लुटाने की एक और मिसाल है। राज्य का कांग्रेसी मंत्रिमंडल बैठा और उसने मंत्रियों, विधायकों, विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के वेतन भत्तों में दोगना से तीन गुना तक की वृद्धि करने की घोषणा कर डाली।

बात इतने पर ही रुक जाती तो भी गनीमत होती, लेकिन न्याय के मंदिर की मूर्ति रहे मुख्यमंत्री ने तो खजाना लुटाने में न्याय की देवी वाली पट्टी आँखों पर बाँधी ली। कहा तो यह भी जाता है कि न्याय के घर में भी ऐसी ही पट्टी बांधे रखने के कारण उन्हें वहाँ से रुखसत होना पड़ा था। हांलांकि उनका दावा है कि वे बेआबरू होकर नहीं आबरू समेत ही उस कूंचे से निकले थे। मुख्यमंत्री ने ना केवल विधायकों के वेतन-भत्ते बढ़ा दिए बल्कि भविष्य में विधायकों के कुनबे में शामिल होने वालों के लिए भी पेंशन बढ़ने का एडवांस इंतजाम कर दिया। मंत्रिमंडल के निर्णय के अनुसार पहली बार विधायक चुने जाने पर बीस हजार, दूसरी बार चुने जाने पर तीस हजार और तीन बार चुने जाने पर पैंतीस हजार रुपया प्रतिमाह पेंशन मिलेगी। विधायक रहने पर हर साल एक हजार रुपये बढ़ेंगे सो अलग। चूंकि यह कृपा सभी विधानसभा में बैठने वालों पर बरसेगी, इसमें पार्टी और गुट जैसे "तुच्छ" भेदों के लिए कोई जगह नहीं है। सो इस पर विरोध की आवाज तो क्या आहट भी नहीं है।

बढ़े हुए वेतन-भत्तों की सूची देखें तो एक-एक विधायक हर महीने लाखों का बैठ रहा है। कुछ-कुछ विवरण तो बड़े रोचक हैं। विधानसभा अध्यक्ष का जेब खर्च तीस हजार रुपया प्रतिमाह से बढ़ कर साठ हजार रुपया प्रतिमाह हो गया है तो विधानसभा उपाध्यक्ष का जेबखर्च तीस हजार रुपया प्रतिमाह से बढ़कर पचास हजार रुपया प्रतिमाह कर दिया गया है। ज़रा सोंचिये कितनी बड़ी तो वो जेब है और कितना उसका खर्चा, जो हर महीने छत्तीस हज़ार रुपये बढ़ा हुआ वेतन मिलने के बाद भी पचास-साठ हजार रुपया और चाहती है। इसके अतिरिक्त स्पीकर व डिप्टी स्पीकरों के आवासों के सौन्दर्यीकरण को भी सरकार ने बेहद जरूरी काम मानते हुए दोनों माननीयों के आवासों के लिए क्रमशः बीस हज़ार और पंद्रह हज़ार रुपया प्रतिमाह देने का इंतजाम किया है।

विधानसभा का एक सत्र बमुशिकल 7 दिन ही चल पाता है, आपदा के बाद हुआ सत्र और हाल ही में लोकायुक्त विधेयक पारित करवाने के लिए बुलवाया गया विशेष सत्र तो तीन ही दिन का था। सत्र तीन दिन चले या छह दिन पर माननीय अध्यक्ष जी और उपाध्यक्ष जी का जेब खर्च और वेतन-भत्ता तो हर महीने ही फलेगा-फूलेगा। विधायकों के वेतन-भत्ते दुगने तो हुए ही हैं, कुछ नया भी उसमें जुड़ गया है जैसे कि अब विधायकों को पांच लाख रुपये का दुर्घटना बीमा भी मिलेगा। गौरतलब है कि उत्तराखंड में हाल ही में आई भीषण आपदा में मरने वालों के आश्रितों को पांच लाख रुपया केंद्र सरकार का अंश जुड़ने के बाद ही मिल पाया था। इससे पहले की आपदाओं में मरने वालों के आश्रितों  को तो एक लाख रुपया ही मिला था। पर माननीय विधायकों का जीवन तो आम लोगों से कई गुना ज्यादा अनमोल है इसलिए हर महीने वेतन-भत्ते के रूप में लाखों रुपया पाने के बाद भी वे पांच लाख रुपये के दुर्घटना बीमे के हकदार बनाये गए हैं। नेता प्रतिपक्ष का भत्ता तीस हज़ार से बढ़ कर पचास हज़ार रुपया प्रतिमाह हो गया है और इनके आवास के सौन्दर्यीकरण के लिए भी दस हज़ार रुपये का प्रावधान कर दिया गया है। मंत्रियों का वेतन पंद्रह हज़ार दे बढ़ाकर पैंतालीस हज़ार रुपया प्रतिमाह कर दिया गया है और आवास का किराया भी दस हज़ार से तीस हज़ार रुपया प्रतिमाह कर दिया गया है।

सामन्य लोगों और बेरोगारों की बात करते ही, अपनों और अपने जैसों के लिए खजाने का मुंह खोल देने वाली सरकार को, तुरंत ही खजाने पर बोझ पड़ने की चिंता सताने लगती है। यह उत्तराखंड की सरकार के साथ भी हुआ। जून 2012 में उत्तराखंड सरकार ने निर्णय लिया था कि राज्य सरकार की नौकरियों के आवेदन करने के लिए बेरोजगार युवाओं से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। लेकिन मंत्रियों विधायकों को छप्पर फाड़ कर देने वाली सरकार ने बेरोजगारों से सरकारी नौकरियों के आवेदन के लिए धनराशी वसूलने की पुरानी परिपाटी पुनः बहाल कर दी है। अब सामान्य श्रेणी के युवाओं को पांच सौ रुपये और अनुसूचित जाति-जनजाति के युवाओं को हर आवेदन पर तीन सौ रुपये खर्च करने होंगे। इस छूट का राज्य के युवाओं ने बहुत लाभ उठा लिया हो ऐसा भी नहीं है। बिना शुल्क के आवेदन वाली बीते दो सालों में केवल एक ही सरकारी परीक्षा आयोजित हुई है।

विधायकों मंत्रियों के वेतन-भत्ते बेहिसाब बढ़ाने के पीछे कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि बढ़ती महंगाई को देखते हुए ऐसा करना जरूरी था। जिस विधानसभा के 70 विधायकों में से 33 घोषित तौर पर करोड़पति हों और बाकी भी लाखों में खेल रहे हों उन्हें तो महंगाई से बचाने का इंतजाम करने के लिए रुपये की नदियाँ बरस रही हैं, लेकिन बेरोजगारों को तीन सौ पांच सौ की राहत देने में खजाना लुटा जा रहा है। यह कुतर्क नहीं तो और क्या है। बिल्लियों द्वारा दूध की रखवाली में दूध चट करना तो सुना था पर यहाँ तो जनता के खजाने की हिफाजत के लिए चुनी गयी सरकार खजाना अपने और अपने जैसों की जेबों में भर रही हैं और सीना ठोक कर इसका ऐलान भी कर रही हैं।

 

इन्द्रेश मैखुरी

हुड्डा ने सरकारी खजाने से विज्ञापनों पर करोड़ों खर्चे, लोकायुक्त ने मांगा जवाब

नई दिल्ली। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा अखबारों और टीवी चैनलों में करोड़ों रूपए के विज्ञापन देकर चुनाव जीतने की रणनीति पर पलीता लग गया है। सूचना अधिकार कार्यकर्ता पी.पी. कपूर की शिकायत पर हरियाणा के लोकायुक्त प्रीतमपाल ने मामले की प्रारंभिक जांच शुरू करके सरकार से जवाब मांगा है। प्रीतमपाल ने बताया कि मामले की प्रारंभिक जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। कपूर ने लोकायुक्त के पास बाकायदा शपथ-पत्र दाखिल करके आरोप लगाया था कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा और लोक संपर्क महकमे के अफसर सुधीर राजपाल ने चालू वर्ष में विज्ञापनों के लिए एक सौ चैदह करोड़ रूप्ए का बजट रखा है। सूचना अधिकार के अंतर्गत प्राप्त जानकारी के अनुसार विज्ञापनों में प्रदेश में पूंजी निवेश और नौकरियां देने के दावे झूठे पाए गए हैं। कपूर ने शपथ-पत्र में कहा है कि यदि उनकी शिकायत झूठी पाई जाए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

 
लोकायुक्त द्वारा मामले का प्रथम दृष्टि में संज्ञान लेने से हरियाणा की अफसरशाही और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। रामकिशन फौजी की सीडी कांड में लोकायुक्त द्वारा उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की सिफारिश से सरकार पहले ही परेशान थी। सूत्रों के अनुसार कल देर शाम लोक संपर्क विभाग के मुखिया केके खंडेलवाल, सीएम के प्रधान सचिव एसएस ढिल्लों और मुख्य सचिव एससी चैधरी और मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार प्रमोद वशिष्ठ सरकार की रणनीति बनाने में जुटे हैं। कपूर की शिकायत में कहा गया है कि विज्ञापनों में दावा किया है कि हरियाणा में एक से एक विषेश आर्थिक क्षेत्र खुलेगा जिनसे प्रदेश में विकास का नया युग शुरू होगा लेकिन केवल चार विषेश आर्थिक ही बने हैं। विज्ञापनों में दावा किया गया है कि प्रदेष में दो लाख करोड़ रूपए का पूंजी निवेश होगा जबकि निवेश केवल 3189 करोड़ रूपए का हुआ है। यही नहीं हरियाणा नम्बर वन के नाम से चर्चित विज्ञापनों में दावा किया गया है कि प्रदेश के बीस लाख बेरोजगार युवाकों को रोजगार मिलेगा जबकि करीब 36 हजार लोगों को ही रोजगार मिला है।

शिकायत में कहा है कि लोक संपर्क विभाग के अफसर सुधीर राजपाल ने आंख मूंदकर हुड्डा के विज्ञापन दिए। शिकायत के मुताबिक हरियाणा सबसे आगे के भ्रामक विज्ञापनों पर सरकारी खजाने से पैसे खर्च करना ना केवल गैरकानूनी है बल्कि जनता के साथ धोखा भी है। याद रहे कि राष्ट्रीय अखबारों और खासतौर पर अंग्रेजी अखबारों पर हुड्डा की खास मेहरबानी रही है। पूरे के पूरे विज्ञापनों में भूपेंद्र हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा की फोटो के साथ विकास के लंबे चैड़े दावे किए जाते थे। यही नहीं हुड्डा गुजरात, दिल्ली और राजस्थान आदि प्रदेशों के चुनावों में भी इन्हीं विज्ञापनों को आधार बनाकर भाषण देते थे। विज्ञापनों में हुड्डा कहते थे कि उनका सपना है कि हरियाणा के लोग स्वस्थ और खुशहाल रहे इसलिए उनकी सरकार अस्पतालों में मुफ्त दवाइयां देने की योजना बना रही है। जबकि असलियत में इस योजना की पोल तो उनके गृह नगर रोहतक में ही खुल गई थी।

अखबारों के विज्ञापनों में सोनिया गांधी की फोटो भी लगाई जाती थी। विज्ञापन देने में भी अफसर मनमानी करते थे। टेंडर नोटिस और नियुक्तियों के विज्ञापन अखबारों के साउथ के संस्करणों में छपवा देते हैं जिससे लोगों को पता ही नहीं चलता। विज्ञापन देने में भी अफसर काफी कमीशन भी वसूलते हैं।

 

 पवन कुमार बंसल
 

सोनभद्र, चंदौली और मिर्जापुर की समस्याओं को लेकर आइपीएफ के अखिलेन्द्र करेंगे संसद पर उपवास

सोनभद्र, 29 जनवरी: सोनभद्र, चंदौली और मिर्जापुर के विकास के लिए विशेष पैकेज, वनाधिकार कानून के तहत जंगल की जमीनों पर बसे लोगों के मालिकाना अधिकार, ठेका मजदूरों के नियमितिकरण, हर मजदूर को दस हजार रूपए न्यूनतम मजदूरी, कोल को आदिवासी के दर्जे, अवैध खनन की सीबीआई जांच के लिए, आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक का. अखिलेन्द्र प्रताप सिंह आगामी 7 फरवरी से संसद के सम्मुख दस दिवसीय उपवास करेंगे। इस कार्यक्रम की तैयारी के लिए आज आइपीएफ की जिला संयोजन समिति की बैठक हुई।

 
29
जनवरी की बैठक में लिए राजनीतिक प्रस्ताव में कहा गया कि उ. प्र. सरकार के खजाने में सबसे ज्यादा राजस्व देने और प्राकृतिक संसाधनों, कल कारखानों से समृद्ध होने के बाबजूद यह क्षेत्र बेहद पिछड़ा हुआ है। यहां की खेती तबाह है किसानों के खेतों को पानी नहीं मिल रहा है और धान से लेकर गेहूं तक की सरकारी खरीद नहीं हो रही है। जो थोड़ा बहुत खरीदा गया है, उसके पैसे का भी भुगतान नहीं किया गया है।
मधुपुर से लेकर राजगढ़ तक पैदा होने वाला किसानों का टमाटर बिना संरक्षण के खेतों में ही सड़ जाता है। हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि वनाधिकार कानून के तहत गांवों से स्वीकृत दावों को स्वीकार कर जंगल की जमीन पर मालिकाना अधिकार दिया जाए, जिसे भी लागू नहीं किया गया है। आदिवासी होने के बाबजूद कोल को आदिवासी का दर्जा नहीं मिला है। जिस इलाके की पैदा की हुई बिजली से दिल्ली और लखनऊ जगमगाता है उसके गांवों में बिजली नहीं है। अनपरा और ओबरा की बिजली पैदा करने वाली परियोजनाएं भ्रष्टाचार और ठेकेदारी प्रथा के कारण अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पा रही हैं।

हाई कोर्ट के आदेश के बाबजूद यहां दसियों वर्षों से कार्यरत ठेका मजदूरों को नियमित नहीं किया गया है। लाखों की संख्या में काम करने वाले ठेका मजदूरों के ईपीएफ, मजदूरी और बोनस तक को लूट लिया गया है। कमरतोड़ महंगाई में भी 10000 रू0 न्यूनतम मजदूरी देने की मांग पूरा करने को सरकार तैयार नहीं है। गांव में मनरेगा में काम नहीं मिल रहा परिणामतः मजदूरों को पलायन करना पड़ रहा है। हालत इतनी बुरी है कि आज भी लोग बरसाती कुओं, कच्चे कुओं से पानी पीने और चकवड़ का साग और गेठी कंदा जैसी जहरीली जड़ खाने के लिए मजबूर है।

अवैध खनन कर इस क्षेत्र की नदी, पहाड़, जंगल, जमीन को माफियाओं द्वारा लूट लिया गया और पर्यावरण के लिए गहरा खतरा पैदा कर दिया गया है। इसलिए इस क्षेत्र के आम नागरिकों की जिदंगी के लिए जरूरी सवालों को केन्द्र सरकार के सामने उठाने और इसे देश का राजनीतिक सवाल बनाने के लिए अखिलेन्द्र द्वारा किए जा रहे उपवास में बड़ी संख्या में हिस्सेदारी का निर्णय बैठक में लिया गया।
      
बैठक को प्रदेश संगठन प्रभारी दिनकर कपूर, राजेश सचान, प्रमोद चैबे, सुरेन्द्र पाल, रमेश खरवार, शाबिर हुसैन, रामदेव गोड़, श्रीकांत सिंह, अनंत बैगा, श्यामाचरण कोल, रामदुलारे खरवार, मणिशंकर पाठक, नागेन्द्र पनिका, विनोद बैगा, महेन्द्र प्रताप सिंह, राजेन्द्र गोंड़, इंद्रदेव खरवार, देवकुमार विश्वकर्मा, मनोज भारती, महेन्द्र कुशवाहा एडवोकेट आदि ने सम्बोधित किया और संचालन आइपीएफ जिला संयोजक शम्भूनाथ गौतम ने किया।

भवदीय
शम्भूनाथ गौतम
जिला संयोजक
आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ)

विमलेश त्रिपाठी के कविता संग्रह “एक देश और मरे हुए लोग” का लोकार्पण

26 जनवरी, को सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से विमलेश त्रिपाठी के दूसरे कविता संग्रह का लोकार्पण समारोह भारतीय भाषा परिषद के सभागृह में कोलकाता के रचनाकारों एवं बीएचयू के श्रीप्रकाश मिश्र, बस्ती के अष्टभुजा शुक्ल तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. शंभुनाथ, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के डॉ. वेद रमण की उपस्थिति के बीच वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह के हाथों संपन्न हुआ। इस अवसर पर सबसे पहले युवा कवि श्री प्रकाश मिश्र एवं अष्टभुजा शुक्ल का काव्य पाठ हुआ।

इस अवसर पर विमलेश की किताब पर एक परिचर्चा का भी आयोजन हुआ। परिचर्चा में भाग लेते हुए डॉ. वेद रमण ने कहा कि विमलेश गहरे तनाव, बेचैनी और उदासी के कवि हैं। उनका संग्रह कोलकाता के हिन्दी परिवेश को बहुत ही सशक्ति के साथ अजागर करता है। कवि कोलकाता महानगर में रहते हुए खुद को अजनबियत का शिकार महसूस करता है। ऋषिकेश राय ने कहा कि विमलेश अपने दूसरे संग्रह में अधिक बौद्धिक और परिपक्व दिखते हैं तथा उनकी लंबी कविताएं यह संकेत करती हैं कि आगे उनकी दिशा और अच्छी लंबी कविताओं की ओर जाएगी। विमलेश इस संग्रह में अपनी लंबी कविताओं की बदौलत एक सशक्त कवि नजर आते हैं। नील कमल का कहना था कि विमलेश का लोक उनका कॉम्फर्ट जोन है, उनके अंदर खुद को बदलने की एक बेचैनी और पीड़ा को उनकी कविताओं में साफ महसूस किया जा सकता है। सन्मार्ग के संपादक डॉ. अभिज्ञात ने बताया कि विमलेश के इस कविता संग्रह में समकालीन कविता से होड़ लेती हुई सशक्त कविताएं हैं, विमलेश समकालीन युवा कविता के जाने पहचाने हस्ताक्षर हैं और अब समय आ गया है कि उनकी कविताओं पर गंभीरता से बात होनी चाहिए।

शोधार्थी श्री कुमार संकल्प ने कहा कि विमलेश की लंबी कविता एक देश और मरे हुए लोग, राम की शक्तिपूजा, असाध्य वीणा, अंधेरे में तथा पटकथा की परम्परा में आती है। युवा समीक्षक जयप्रकाश ने विमलेश की संवेदना को उनकी कविताओं की ताकत के रूप में रेखांकित किया, उन्होंने कहा कि विमलेश के यहां एक गहन स्त्री विमर्श है जिसके उपर ध्यान देने की जरूरत है। विमलेश की लंबी कविताएं वर्तमान समाज की अवस्था का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देती हैं।

श्री विजय गौड़ ने कहा कि विमलेश की कविताओं में अपने पूर्वज कवियों की अनुगूंज सुनायी पड़ती हैं, विमलेश के लिए यह जरूरी है कि उनकी कविताओं को अलग से पहचाना और चिन्हित किया जाय। इसी क्रम में डॉ. ऋषि भूषण ने यह जोड़ा कि विमलेश कि कविताओं को समझने के लिए टुल्स उनकी कविताओं में ही मौजूद हैं, विमलेश अपने इस संग्रह की अच्छी कविताओं के कारण बधाई के पात्र हैं।
डॉ. शंभुनाथ ने विमलेश के निरंतर लेखन की सराहना की और कहा कि कविता की दूसरी किताब कवि की प्रस्थान विंदु की तरह होनी चाहिए। विमलेश अच्छे कवि हैं और उनकी कविता से हिन्दी को बहुत उम्मीदे हैं। वरिष्ठ कवि केदाननाथ सिंह ने उक्त अवसर पर विमलेश को बधाई देते हुए कहा कि विमलेश इसलिए महत्वपूर्ण कवि हैं कि उनकी कविताओं में मिट्टी की खुशबू है। वर्तमान समय में एक लंबे अंतराल के बाद कोलकाता में अच्छे कवियों की एक नई जमात तैयार हो रही है, एक तरह से यह कोलकाता के लिए दूसरे नवजागरण की तरह है। उक्त अवसर पर डॉ. केदारनाथ सिंह न् विमलेश के संग्रह से एक कविता आत्म स्वीकार पढ़ी और कहा कि यह छोटी कविता अपने आप में गहरे अर्थ को समेटे हुए है। अंत में धन्यवाद ज्ञापन कवि एवं पत्रकार श्री राज्यबर्धन ने किया।

 

प्रस्तुतिः ऋतेश पाण्डेय

मुकेश कुमार लाइव इंडिया से जुड़े, राकेश शर्मा को प्रमोशन

दो सूचनाएं हैं. वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने 'लाइव इंडिया' के साथ नई पारी की शुरुआत की है. उन्होंने अबकी टीवी की जगह प्रिंट में काम करना स्वीकारा है. वे 'लाइव इंडिया' समूह की 'लाइव इंडिया' नामक मैग्जीन के एडिटर बने हैं. इसके पहले वे न्यूज एक्सप्रेस के एडिटर इन चीफ हुआ करते थे.

मुकेश कई चैनलों के संस्थापक संपादक रहे हैं. बीच में वे अपने शोध कार्य में जुटे हुए थे. उनकी कई किताबें भी मार्केट में हैं. ज्ञात हो कि लाइव इंडिया ग्रुप से एनके सिंह, प्रबल प्रताप सिंह, प्रदीप सिंह जैसे वरिष्ठ पत्रकार पहले से ही जुड़े हुए हैं. लाइव इंडिया समूह को 'समृद्ध जीवन' नामक एक चिटफंड कंपनी संचालित करती है जो निवेशकों से कई तरह से पैसे उगाहने के मामले में सेबी समेत कई एजेंसियों की जांच का सामना कर रही है.

एक अन्य जानकारी के मुताबिक कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा के अखबार आज समाज में सीईओ के रूप में कार्यरत राकेश शर्मा को प्रमोट करके मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया है. अभी तक यह पद विनोद शर्मा के बेटे कार्तिकेय शर्मा के पास हुआ करता था. राकेश शर्मा पहले हिंदुस्तान अखबार में वरिष्ठ पद पर थे. चर्चा है कि विनोद शर्मा और कार्तिक शर्मा अखबार को अब अप्रत्यक्ष रूप से संचालित करेंगे.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

दिल्ली पुलिस ने फोटो जर्नलिस्ट मानस रंजन को मारा थप्पड़

दिल्ली के राजघाट पर एक पागल हाथी की तस्वीरें ले रहे फोटो जर्नलिस्ट मानस रंजन को एक पुलिसवाले ने थप्पड़ मार दिया। इस घटना पर दिल्ली के पत्रकारों ने आक्रोश व्यक्त किया है और दोषी पुलिस वाले के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग की है।  मानस रंजन ट्रिब्यून अखबार के फोटो जर्नलिस्ट हैं।

देखें वीडियो, किस तरह पुलिस वाले ने सरेआम थप्पड़ मारा… क्लिक करें… https://www.youtube.com/watch?v=r3CN2DcvR60

अभी कुछ दिन पहले भी दिल्ली पुलिस के तीन सिपाहियों की तस्वीरें जारी हुई थीं, जिसमें वे लालकिले के पास एक व्यक्ति को बुरी तरह पीटते और उसके पैसे छीनते देखे गए थे।

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अनिल, नीरज, निर्मलेंदु, कौशल, भूप के बारे में सूचनाएं

नोएडा से प्रकाशित दैनिक राष्ट्रीय उजाला की मार्केटिंग टीम से अनिल ने भी इस्तीफा दे दिया है. सीनियर सब एडिटर नीरज श्रीवास्तव ने भी अखबार को बाय बाय कह दिया है. यहां कार्यकारी संपादक के रूप में निर्मलेंदु साहा ने ज्वाइन किया है. निर्मलेंदु पहले स्वाभिमान टाइम्स, हमवतन में हुआ करते थे.

गुड़गांव से खबर है कि भूप सिंह ने दैनिक जागरण से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने नई पारी की शुरुआत देशबंधु अखबार के साथ की है. उन्हें गुड़गांव का ब्यूरो चीफ बनाया गया है.

कौशल किशोर सिंह के बारे में पता चला है कि उन्होंने अमर उजाला, गाजियाबाद में सीनियर सब एडिटर के रूप में ज्वाइन किया है. वे दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण में काम कर चुके हैं.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

‘श्री न्यूज’ ने स्ट्रिंगरों का बकाया भुगतान किया

श्री न्यूज प्रबंधन ने यूपी के सभी स्ट्रिंगरों को आफिस बुला कर उनका बकाया दे दिया. साथ ही एक करार के तहत निश्चित मासिक मानदेय और सुविधाएं देने का वादा किया. संस्थान के सीओओ प्रशान्त द्विेदी ने स्ट्रिंगरों की समस्याओ को सुना और सुझावों पर विचार किया.

एक्सीक्यूटिव एडिटर नजीब मलिक के दिशा निर्देश में स्ट्रिंगरों को पूरे मनोयोग से काम करने को कहा गया. साथ ही अपने जिले की हर खबर पर पकड़ मजबूत रखने को कहा गया. हाल ही में श्री समूह ने श्री वर्ल्ड के नाम से मैग्जीन भी लांच की है. 

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.
 

छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के लिए बीमा योजना शुरू

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की घोषणा के अनुरूप छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के लिए संचार प्रतिनिधि व्यक्तिगत दुर्घटना योजना शुरू हो गई है। इस योजना में पत्रकारों का पांच लाख रूपए तक का बीमा किया जाएगा। योजना में शामिल होने के लिए संचार प्रतिनिधियों से आवेदन पत्र आमंत्रित किए गए हैं। आवेदन का प्रारूप और योजना का ब्यौरा राज्य के जिला जनसम्पर्क कार्यालयों से प्राप्त किया जा सकता है।

आवेदन सभी आवश्यक जानकारी के साथ अपने जिले के जिला जनसम्पर्क कार्यालय में जमा किया जा सकता है। इसके अलावा योजना से संबंधित सभी जानकारी जनसम्पर्क संचालनालय की वेबसाईट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट डीपीआरसीजी डॉट जीवोव्ही डॉट इन (www.dprcg.gov.in)पर भी अपलोड कर दी गई है। दुर्घटना बीमा एक वर्ष के लिए होगा।

कांग्रेस को ‘अपने’ ही ठेंगा दिखाने पर उतारू

कांग्रेस के रणनीतिकार गठबंधन राजनीति को लेकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा पर तीखे कटाक्ष करते रहते हैं। अक्सर, सवाल किया जाता है कि आखिर भाजपा नेतृत्व अपने गठबंधन के लिए ‘नए किरदार’ लाएगा कहां से? क्योंकि, अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में एनडीए के पास दो दर्जन घटकों का जमावड़ा था। लेकिन, अब सहयोगी दलों का टोटा हो गया है। जदयू के अलग हो जाने के बाद कोई और बड़ा दल एनडीए में जुड़ने का इच्छुक नहीं है। खास तौर पर नरेंद्र मोदी की विवादित छवि के कारण एनडीए के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हैं। जबकि, कांग्रेस अपने नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन पर इतराती रहा है। लेकिन, इधर उसके कई सहयोगी दलों ने भी ‘झटका’ देना शुरू कर दिया है। इससे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में खासी बेचैनी बढ़ी है।

ताजा मामला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का है। पिछले महीनों में कई बार इस पार्टी के दिग्गज नेता अपनी नाराजगी के तेवर दिखा चुके हैं। इन तेवरों से कई बार कांग्रेस को खासी किरकिरी का सामना करना पड़Þा है। इस पार्टी के प्रमुख शरद पवार एक जमाने में कांग्रेस के ही उस्ताद खिलाड़ी होते थे। अब उन्होंने अपनी पार्टी एनसीपी के जरिए दबाव की राजनीति का खेल तेज कर दिया है। पवार के खास सिपहसालार एवं केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने एक ऐसी टिप्पणी कर दी है, जिससे कि राजनीतिक हल्कों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पिछले दिनों एक टीवी चैनल को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक चर्चित इंटरव्यू दिया। इसमें उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों के मामले में नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

जबकि, एक सच्चाई यह भी है कि किसी अदालत ने दंगों के मामले में मोदी को कसूरवार नहीं ठहराया। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायलय की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) सालों तक पड़ताल करता रहा है। लेकिन, इसने भी मोदी को क्लीनचिट दी है। कई और मामलों में भी वे कानूनी लपेट में नहीं आए। फिर भी, राहुल गांधी उन्हें दोषी करार करते हैं। इसको लेकर मीडिया और राजनीतिक हल्कों में खासी बहस भी शुरू हुई है। जब इस प्रकरण में एनसीपी नेता पटेल से सवाल किया गया, तो उन्होंने कह दिया कि जब किसी अदालत ने मोदी को दोषी नहीं माना, तो मोदी को लेकर स्यापा करने की ज्यादा जरूरत नहीं है। उनकी यह टिप्पणी मोदी के प्रति खासी नरमी वाली मानी जा रही है। कांग्रेस के नेता भी अंदर खाने इस टिप्पणी के अलग-अलग निहितार्थ निकाल रहे हैं। कुछ को लगता है कि इस तरह के पैंतरों से एनसीपी लोकसभा में कांग्रेस से ज्यादा सीटें लेने की जुगत भिड़ा रही है। लेकिन, कुछ को लगता है कि मौका देखकर शरद पवार दूसरे पाले से भी हाथ मिला सकते हैं।

हालांकि, गुरुवार को शरद पवार ने मीडिया से कहा है कि उनकी पार्टी के बारे में कुछ बेबुनियाद बातें की जा रही हैं। जबकि, सच्चाई यह है कि उनकी पार्टी ने दंगों के मामले में मोदी को कभी क्लीनचिट नहीं दी। उनकी पार्टी धर्म-निरपेक्षता में पक्का विश्वास करती है। ऐसे में, उन्हें इस तरह की अफवाहों से दुख पहुंचता है कि एनसीपी, एनडीए गठबंधन से भी हाथ मिला सकती है। जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। वे इतना जरूर मानते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही फैसला करती है। यदि मोदी के पक्ष में जनादेश आता है, तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? उन्होंने यही सफाई दी है कि उनकी पार्टी यूपीए का हिस्सा है। वे उम्मीद करते हैं कि इसी गठबंधन में बात बन जाएगी। उल्लेखनीय है कि लोकसभा में एनसीपी के पास 9 सदस्य हैं। जबकि, राज्यसभा में उसके 6 सांसद हैं। कांग्रेस के हल्कों में चर्चा यही है कि मोदी के प्रति नरम रुख का संकेत देकर यह पार्टी सीटों के लिए अभी से सौदेबाजी के दांव चला रही है।

उल्लेखनीय है कि यूपीए गठबंधन से पहले ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस अलग हुई थी। इसके बाद एम. करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक ने यूपीए से नाता तोड़ा था। सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद भी कांग्रेस और द्रमुक के बीच राजनीतिक रिश्तों की डोर जुड़ी रही है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रणनीतिकार द्रमुक से गठबंधन बनाने के इच्छुक हैं। लेकिन, इस मुद्दे पर करुणानिधि खासी दुविधा में माने जा रहे हैं।   इसकी एक खास वजह 2जी स्पेक्ट्रम मामले का झमेला है। इस घोटाले में द्रमुक नेताओं की काफी किरकिरी हुई थी। यहां तक कि करुणानिधि की सांसद बेटी कानिमोझी को महीनों तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ा। अभी भी यह मामला अदालत में लंबित है। घोटाले की किरकिरी के चलते द्रमुक, जयललिता के मुकाबले में लगातार कमजोर होती दिख रही है। इन दिनों वैसे भी करुणानिधि अपने कुनबे में चल रही रार के पचड़े में फंसे हैं। इन कारणों से भी लोकसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक की स्थिति काफी मजबूत मानी जा रही है।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के निजी रिश्ते नरेंद्र मोदी से काफी अच्छे माने जाते हैं। अन्नाद्रमुक की राजनीतिक लाइन भी भाजपा की हिंदुत्ववादी लाइन के काफी करीब समझी जाती है। आकलन है कि तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, तो जयललिता की राजनीति सब पर भारी पड़ेगी। अन्नाद्रमुक के बारे में कयास यही है कि वह सत्ता मिलने की स्थिति में टीम मोदी से आराम से हाथ मिला सकती है। तृणमूल नेता ममता बनर्जी ने कह दिया है कि वे पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लडेÞंगी। भाजपा, सीपीएम व कांग्रेस के खिलाफ उनकी पार्टी मजबूती से मोर्चा साधेगी। ममता ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव के बाद तीसरे मोर्चे के विकल्प के लिए वे निर्णायक योगदान करेंगी। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से चुनावी समझदारी बनाने की कई बार कोशिश की है। लेकिन, पटनायक ने कांग्रेस के नेताओं को ठेंगा ही दिखाया है। यही कहा कि महंगाई और घोटालों के चलते यूपीए गठबंधन बदनाम है। ऐसे में, वे कांग्रेस से कोई तालमेल की राजनीति नहीं कर सकते।
कांग्रेस ने इस बार राहुल को चुनावी अभियान की कमान दी है। राहुल आमूलचूल परिवर्तन के लिए भाषणबाजी तो खूब करते हैं, लेकिन किसी को नहीं पता कि वे पार्टी में क्या-क्या बदलाव करने जा रहे हैं? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राहुल की राजनीति पर कटाक्ष किया है। सवाल किया कि एक तरफ तो वे ईमानदार राजनीति का ढोल पीट रहे हैं। दूसरी तरफ, भ्रष्ट छवि वाले राजद से चुनावी गठबंधन कर रहे हैं। जबकि, इस पार्टी के मुखिया लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में अदालत से सजा भी हो चुकी है। वे जमानत पर बाहर हैं। राजद और कांग्रेस का संभावित गठबंधन इस बात का संकेत है कि राहुल केवल भाषणों में ही राजनीतिक बदलाव करने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों कोशिश हुई थी कि इस बार राजद के बजाए ईमानदार छवि वाली जदयू से कांग्रेस चुनावी हाथ मिला ले। लेकिन, इसके आसार नहीं बचे।

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के बीच मजबूत गठबंधन चलता आ रहा है। राज्य में दोनों दलों की मिली-जुली सरकार है। केंद्र में एनसी के नेता फारुख अब्दुल्ला मंत्री हैं। राज्य में नई प्रशासनिक इकाइयों के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच मतभेद गहरे हो गए हैं। इसके चलते मुख्यमंत्री उमर ने इस्तीफा देकर कांग्रेस को ‘पाठ’ पढ़ाने की धमकी भी दे डाली थी। इससे राजनीतिक हल्कों में चर्चा शुरू हुई कि भाजपा की चुनावी बढ़त के आसार देखकर उमर पाला बदल सकते हैं। हालांकि, इस तरह के कयासों पर उन्होंने सफाई दी है कि टीम मोदी के खेमे का साथ नहीं देने जा रहे। लेकिन, अब्दुल्ला परिवार के तेवरों से कांग्रेस में इनके प्रति अविश्वास की लकीर कुछ और गहरी हो गई है। वैसे भी, वाजपेयी सरकार के दौर में फारुख अब्दुल्ला ने एनडीए से हाथ मिलाया था। उन्होंने वाजपेयी की सरकार में भागीदारी भी की थी। कांग्रेस के रणनीतिकार पिछले दिनों सवाल करते रहे हैं कि मोदी फैक्टर की वजह से एनडीए में कौन से नए घटक भला जुट सकते हैं? लेकिन, भाजपा का चुनावी अभियान तेज होते ही इस तरह का राजनीतिक संकट कांग्रेस के सामने भी खड़ा होने लगा है। मौका देखकर अब एनसीपी जैसे दल भी कांग्रेस को ‘पाठ’ पढ़ाने की हिम्मत करने लगे हैं, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दल भी कांग्रेस को आंखें दिखाने की हिम्मत कर रहे हैं। कांग्रेस के दिग्गज इन राजनीतिक हलचलों को शुभ संकेत नहीं मान रहे। यह जरूर है कि कांग्रेस आलाकमान का रुख सहयोगी दलों के प्रति काफी नरमी वाला है। कोशिश की जा रही है कि बात ज्यादा न बिगड़ने पाए। लेकिन, कब तक…

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

अनिमेष शंकर, आदेश रावल, हिमानी नैथानी की नई पारी

नवीन जिंदल के मीडिया समूह पाजिटिव टीवी ग्रुप के नए लांच होने वाले नेशनल चैनल के लिए इनपुट हेड के बतौर अनिमेष शंकर ने ज्वाइन किया है. आदेश रावल ने भी न्यूज24 से इस्तीफा देकर पाजिटिव टीवी ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. अनिमेष शंकर लंबे समय तक सहारा में काम कर चुके हैं. ज्ञात हो कि जिंदल के चैनल के एडिटर इन चीफ संजीव श्रीवास्तव हैं. अखिल भल्ला भी ज्वाइन कर चुके हैं.

उधर, एक अन्य खबर आईबीएन7 से हैं. यहां से लोगों के जाने का सिलसिला जारी है. ताजी सूचना के मुताबिक एंकर हिमानी नैथानी इस्तीफा देकर आजतक ज्वाइन करने वाली हैं. वे प्रोड्यूसर के रूप में आजतक जाएंगी. हिमानी आईबीएन7 के साथ करीब तीन वर्षों से हैं. उत्तराखंड निवासी हिमानी सहारा में भी काम कर चुकी हैं.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

कोई भी अखबार मोदी का इतना बड़ा बयान झूठ नहीं छाफ सकता, भास्कर ने छाप दिया

Rohini Gupte : कोई भी समाचार पत्र नरेंद्र मोदी का इतना बड़ा बयान झूठ नहीं छाप सकता। परदे के पीछे जरूर कुछ है जो जल्‍द ही हो सकता है कि श्रीमंत पुरोहि‍त के इस्‍तीफे के बाद सामने आए। पर एक बात तो साफ है, संघि‍यों को कुछ पढ़ तो लेना ही चाहि‍ए।

चंद्रगुप्‍त मौर्य के वंश तक न जाएं, पर आजादी और उसके बाद का समकालीन इति‍हास तो जरूर ही पढ़ लेना चाहि‍ए।

रोहिणी गुप्ते के फेसबुक वॉल से.
 
 

उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री क्या इन नौकरशाहों पर लगाम लगा पाएगा?

मुझे विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री पद से विदाई पर कोई हैरत नहीं है और ना ही किसी नये व्यक्ति के मुख्यमंत्री पद पर आने की खुशी, भले ही किसी के आने से पुरे फेसबुक पर भले ही उत्सव का माहोल हो जाए, मैं कुछ बातों को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित हूँ और मेरा होना भी लाजिमी है? मेरी चिंता का कारण मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मुख्यमंत्री से जबरन को अँधेरे में रखकर जनहित विरोधी काम करवाने वाले वे नौकरशाह हैं जिन्हें बदले बगैर इस राज्य का तकदीर नहीं बदलने वाली, भले ही मुख्यमंत्री कोई ही आ जाये, क्या फर्क पडता है, ये नौकरशाह यही सोचते है!

क्या नया मुख्यमंत्री पिछले दिनों अपने जनहित विरोधी कुकर्मो से काफी नाम कमा चुके नौकरशाह राकेश शर्मा का कुछ इलाज कर पायेंगे? क्या नये मुख्यमंत्री आम बाग जैसे कई अन्य जमीन घोटालों पर से पर्दा उठवा पायेंगे? क्या नये मुख्यमंत्री हरीशचन्द्र सेमवाल, सचिन कुर्बे, शैलेश बगौली, मीनाक्षी सुन्दरम, चंद्रेश यादव, निधीमणी त्रिपाठी, उमाकांत पंवार, ओमप्रकाश, बंसीधर तिवारी, एमएच खान, रामास्वामी जैसे नौकरशाहों पर लगाम लगा पाएंगे?

क्या नया मुख्यमंत्री डीजीपी की जमीन खरीद में किये गये हेर फेर को बेनकाब कर पायेंगे? क्या नये मुख्यमंत्री राज्य के सिड्कूल में रोज होते श्रम कानूनों के उल्लंघन को रोक पायेंगे? क्या राज्य के मुख्यमंत्री सत्ता में चल रहें पुत्र कल्चर खत्म कर पायेंगे? क्या नये मुख्यमंत्री सड़कों के निर्माण में हो रहें नित रोज के घपलों को रोक पायेंगे? क्या नये मुख्यमंत्री पुराने मुख्यमंत्री के द्वारा नदियों के किये गये निजीकरण के फैसले को पलट पायेंगे? क्या राज्य के नये मुख्यमंत्री राज्य के युवा बेरोजगारों में पनप रहें असंतोष को शांत कर पायंगे?

क्या नये मुख्यमंत्री राज्य के पर्यटन स्थलों पर हो रहें अवैध निर्माणों को रोक पायेंगे, ऐसे में तब जब उनके मन्त्रिमन्डल के सदस्य ही उसे करवा रहें हो? क्या नये मुख्यमंत्री राज्य की निरंतर कम होती कृषि भूमि को बचाने के लिए हिमाचल की तर्ज कोई कानून बनवा पायेंगे? क्या राज्य के नये मुख्यमंत्री राज्य में पहाडो में कृषि भूमि की चकबंदी करवा पायेंगे,जिससे कृषि को लाभप्रद बनाया जा सके?

क्या राज्य के मुख्यमंत्री राज्य की पटरी से उतरी चिकित्सा व्यवस्था को लाइन पर लाने हेतु पहाड़ में चिकित्सकों की नियुक्ति करवा पायेंगे? क्या राज्य के मुख्यमंत्री राज्य की पटरी से उतरी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लाइन पर लाने हेतु खाली पड़े स्कूलों में RTE के मानक अनुसार शिक्षकों की नियुक्ति करवा पायेंगे? क्या नये मुख्यमंत्री राज्य में थाने कोतवाली बिकने की परम्परा को रोक पायेंगे? क्या राज्य के नये मुख्यमंत्री नकारा और योग्य नौकरशाहों को चिन्हित कर उन्हें दण्डित और पुरस्कृत कर पायेंगे? क्या नये मुख्यमंत्री राज्य कई स्थायी राजधानी पर कोई निर्णय ले पायेंगे?

राज्य निर्माण के इन तेरह सालों ने इतने सवाल खड़े किये है, जिन्हें हल करना किसी मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं है ! बस जरुरत है तो एक दृढ इच्छा शक्ति की, एक कारण की, कि मुझे करना है, जो मुख्यमंत्री यह सोच लेगा, वह कर जायेगा, नहीं तो क्या फर्क पड़ता है कोई भी मुख्यमंत्री बने, जब पद है तो कोई ना कोई तो बनेगा, नीयत बदले बगैर राज्य की किस्मत भी बदलने वाली नहीं है, इतने सालो से देखते ही आये है, आगे भी देखेंगे….

चन्द्रशेखर करगेती के फेसबुक वॉल से.

तेरा क्या होगा निशांत चतुर्वेदी!

एसएन विनोद ने तो अपनी लाज बचा ली. उन्होंने उम्र भर की अपनी पूंजी जाया नहीं होने दी. विनोद कापड़ी की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया. पर निशांत चतुर्वेदी अब भी चुप्पी साधे हैं. निशांत चैनल हेड हुआ करते थे और उनकी तूती बोला करती थी. पर उनके उपर न सिर्फ विनोद कापड़ी को ले आया गया बल्कि अब रवि मित्तल को मैनेजिंग एडिटर बनाकर निशांत चतुर्वेदी के उपर एक और शख्स को बिठा दिया गया है.

बावजूद इसके निशांत चतुर्वेदी चैनल से चिपके हुए हैं. प्रबंधन किसी वरिष्ठ को इस्तीफा देने के लिए ऐसे ही तरीके आजमाता है. संकेत समझने वाले समझ कर चले जाते हैं. पर निशांत चतुर्वेदी ने नए निजाम में भी अपनी बेहतरी के संपने संजोए हुए हैं. विनोद कापड़ी और निशांत चतुर्वेदी के रिश्ते इंडिया टीवी के दिनों से ही ठीक नहीं रहे. साथ ही विनोद कापड़ी कभी भी अपनी टीम के अलावा किसी और पर भरोसा नहीं करते. ऐसे में निशांत चतुर्वेदी के लिए न्यूज एक्सप्रेस में दुर्दिन हैं पर वो अब भी अपने पत्ते नहीं खोल रहे. बताया जा रहा है कि निशांत चतुर्वेदी अगर जल्द ही चैनल से नहीं जाते हैं तो उन्हें बर्खास्त भी किया जा सकता है.

विनोद कापड़ी न्यूज एक्सप्रेस को छह महीने में तीसरे नंबर का चैनल बना देंगे!

चर्चा है कि विनोद कापड़ी ने साईं प्रसाद मीडिया के मालिकों से वादा किया है कि वे छह महीने में न्यूज एक्सप्रेस को टीआरपी चार्ट में तीसरे नंबर का चैनल बना देंगे. इसी वादे पर यकीन करके विनोद कापड़ी को न्यूज एक्सप्रेस की पूरी जिम्मेदारी दी गई है जिसके तहत वो किसी को भी निकाल सकते हैं और किसी की भी नियुक्ति कर सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक विनोद कापड़ी और साईं प्रसाद मीडिया के बीच जो अघोषित अनुबंध है उसके मुताबिक विनोद कापड़ी ज्वाइन करने के बाद अपनी टीम बनाएंगे और उसके बाद छह महीने के भीतर चैनल को तीसरे नंबर पर ले जाएंगे.

ऐसा हो जाने के बाद साईं प्रसाद के मालिक विनोद कापड़ी को एक फिल्म बनाने के लिए फाइनेंस करेंगे. उल्लेखनीय है कि साईं प्रसाद समूह फिल्म निर्माण के भी क्षेत्र में है और पिछले दिनों इस ग्रुप के बैनर तले एक फिल्म का निर्माण हो चुका है. विनोद कापड़ी अब न्यूज की बजाय फिल्म के क्षेत्र में ज्यादा सक्रिय होना चाहते हैं इसलिए वह ऐसे लोगों को तलाश रहे हैं जो उन्हें फिल्म के लिए फाइनेंस कर सकें. सूत्र बताते हैं कि साईं प्रसाद ग्रुप ने कापड़ी को भरोसा दिया है कि अगर वो न्यूज चैनल को जमा देते हैं तो उन्हें अगला एसाइनमेंट फिल्म निर्माण का दिया जाएगा.

जानकारों का कहना है कि मीडिया इंडस्ट्री में विनोद कापड़ी के एक दो नहीं बल्कि दर्जनों घनघोर शत्रु हैं. कापड़ी के साईं प्रसाद ग्रुप से जुड़ने के बाद ये शत्रु अब साईं प्रसाद समूह के खिलाफ सक्रिय हो चुके हैं. अब देखना है कि विनोद कापड़ी करोड़ों रुपये खर्च कराकर साईं प्रसाद मीडिया को आगे ले जाते हैं या फिर साईं प्रसाद समूह के लिए अरबों रुपये के घाटे का कारण बन जाते हैं.

टीआरपी की होड़ और चरण-वंदन संस्कृति के चलते पत्रकारों की विश्वसनीयता खतरें में

इन दिनों चैनलों या अख़बारों द्वारा प्रस्तुत की जा रही खबरों पर पाठको की आने वाली टिप्पड़ियां इस बात का स्पष्ट संकेत कर रही हैं कि पाठकों की नजर में अब "पत्रकारों की विश्वसनीयता" खतरें में है। खबर चाहे प्रिंट की हो या इलक्ट्रॉनिक मीडिया की सब पर आने वाली ज्यादातर टिप्पड़ियों में पाठक खबर को दिखाने वाले पत्रकार की निष्ठा पर सवाल उठाने लगते है और उसे दलाल जैसे अमुक शब्दों से सुशोभित करते है।

ऐसे में गम्भीर सवाल ये है कि आखिर ऐसी परिस्थितियां बनी क्यों कि पाठकों की नजर में अब एक पत्रकार, पत्रकार से ज्यादा एक दलाल है? जाहिर है साधारण शब्दों में इसका जवाब वही होगा जो आज के टाइम में ज्यादातर बुद्धिजीवी अपनी समीक्षाओं में लिखते है। इस विषय पर आने वाली अब तक की ज्यादातर समीक्षाओं में लिखा गया है कि "आज के समय में पत्रकार अपने पत्रकारीय दायित्वों को निभाने से ज्यादा राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठावान है, दलगत समर्पण व टीआरपी की होड़ में वो ऐसी ख़बरों को बना रहे हैं जिनकी विश्वसनीयता आम जनमानस में हमेशा सवालों के घेरे में रही है। बात कुछ हद तक सही है पर ये तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है, इसके दूसरे पहलू में वो सभी बातें शामिल होती है जिनके विषय में न तो सरकार बात करना चाहती है और न ही पत्रकारों का बड़ा से बड़ा संगठन।

पहला सवाल ये कि आखिर क्यों एक बड़े मीडिया संस्थान में काम करने वाला पत्रकार टीआरपी के होड़ में खबरो की विश्वसनीयता से खिलवाड़ करता है? और दूसरा ये, कि क्यों एक पत्रकार राजनीतिक दलों से लेकर वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स तक की चरण वंदना करता है? यहाँ इन दोनों सवालों को अलग-अलग इसलिए उठा रहा हूँ क्योकि कुछ जगहों पर स्थिति भिन्न है, जिनका विधवत उल्लेख करना आवश्यक है, अन्यथा बात फिर अधूरी ही रह जायेगी।

पहले सवाल का जवाब, मालिक के रूप में पड़ने वाला वो अनैतिक दबाव है जो एक पत्रकार को उसके जीवकोपार्जन के लिए मिलने वाली तन्ख्वाह के बदले उपहार स्वरुप मिलता है। अगर इस अनैतिक दबाव के विरुद्ध वो कोई आवाज़ उठाता है या वो ये कहता है कि वो पत्रकारिता के सिद्धन्तों के खिलाफ जाकर काम नहीं करेगा तो संस्थान में उस सिद्धांतवादी पत्रकार का एक क्षण भी रुकना नामुमकिन है। उसे तत्काल उसकी सेवाओं से बर्खास्त कर दिया जायेगा और यदि किन्ही मजबूरियों के चलते संसथान उसे बर्खास्त करने अक्षम है, तो वो विभिन्न तरीकों से उसे प्रताड़ित करने की प्रक्रिया शुरू कर देगा, ताकि प्रताड़ना से त्रस्त होकर वो सिद्धांतवादी पत्रकार स्वयं ही संस्थान को छोड़ दे। ऐसी प्रताड़ना और ऐसे निर्णयों के खिलाफ पत्रकारिता का बड़ा से बड़ा संगठन कुछ भी बोलने को तैयार नहीं होता।

अभी कुछ दिन पहले ही देश के जाने माने मीडिया संस्थान आईबीएन-7 ने सैकड़ों पत्रकारों को एक साथ बर्खास्त कर दिया। इस बर्खास्तगी के खिलाफ कुछ दो-चार जुझारों पत्रकारों के आलावा पत्रकारिता के बड़े से बड़े संगठन ने कोई आवाज़ नहीं उठायी, अलबत्ता सबने ख़ामोशी को ही कायम रखना बेहतर समझा। मीडिया संस्थान के मालिकों की नजर में एक पत्रकार की हैसीयत उतनी ही है जितनी सरकारी अफसरों की नजर में उनके चपरासियों की।

पर यहां चपरासियों और पत्रकारों में एक बेसिक अंतर है, वो ये कि सरकारी चपरासियों का संगठन अपनी अवमानना और प्रताड़ना का विरोध करता है, जब तक न्याय न मिल जाये वो अपना विरोध कायम रखता है। पत्रकारों का बड़ा से बड़ा संगठन विरोध के नाम पर मीडिया संस्थानो से लेकर सत्ता में आसीन राजनैतिक दलों की चापलूसी करता है। ऐसी स्थिति में बड़े मीडिया घरानों में काम करने वाला कोई भी पत्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता के दायित्व को सम्पादित नहीं कर सकता, क्योकि एक तो उसे नौकरी जाने का खतरा होता है, दूसरा उसे पत्रकारिता के किसी भी संगठन से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रहती।

अब आता हूँ अपने दूसरे सवाल पर कि आखिर क्यूँ एक पत्रकार राजनीतिक दलों से लेकर वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स तक की चरण वंदना करता है?

छोटे अख़बारों और चैनलों में काम करने वाले एक पत्रकार का अधिकतम वेतन पांच से दस हजार रूपये प्रतिमाह से ज्यादा नहीं होता। ऐसे में मज़बूरी में ही सही, पर उस संस्थान में काम करने वाला पत्रकार उस तरफ अपने कदम बढ़ाता है जो पत्रकारिता के सिद्धांतो के विरुद्ध है क्योकि सिद्धांतो से वो अपने परिवार का पेट नहीं भर सकता है। लिहजा वो लग जाता है उन राजनेताओं और अधिकारीयों की चापलूसी में जहाँ से उसे चार पैसे मिल जाएँ। अब जाहिर सी बात है कि पत्रकार जिस नेता या अधिकारी से पैसे ले रहा है उसके विरुद्ध नहीं लिखेगा चाहे वो अधिकारी/नेता कितना ही भ्रष्ट क्यों न हो।

कहने का तात्पर्य ये है की दोनों ही परिस्थतियों में एक पत्रकार स्वयं उस राह पर नहीं चलता बल्कि जीवकोपार्जन की समस्या उसे उस राह पर ले जाती। ऐसे में गम्भीर प्रश्न ये है कि इस समस्या का समाधान क्या है, कि एक पत्रकार का जीवकोपार्जन भी चलता रहे और वो निष्पक्ष पत्रकारिता के सिद्धांतो का भी पालन करता रहे?

इस समस्या का समाधान उसी सूक्ति में छुपा है जो वर्षों से कही जाती रही है कि "संगठन में ही शक्ति है'। अब ये समय की मांग है कि पत्रकार इस शोषण के खिलाफ एकजुट हों और मूलभूत समस्याओं के प्रति अपनी आवाज़ बुलंद करें। किन्तु यक्ष प्रश्न तो यही है कि हिजड़ों की बारात में दूल्हा बनेगा कौन?

 

लेखक लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं, उनसे मो-9389990111 पर संपर्क किया जा सकता है।
 

विनोद कापड़ी की अधीनता स्वीकार करने से एसएन विनोद का इनकार, दिया इस्तीफा

अंततः वही हुआ जिसकी संभावना थी. वरिष्ठ पत्रकार एसएन विनोद ने विनोद कापड़ी की अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया और अपना इस्तीफा दे मारा. एसएन विनोद को साईं प्रसाद मीडिया मैनेजमेंट ने न्यूज एक्सप्रेस के महाराष्ट्र चैनल लांचिंग की जिम्मेदारी दे रखी थी. पर इसी बीच मीडिया समूह का सीईओ बनाकर विनोद कापड़ी को ले आया गया.

अपने से बेहद कम अनुभवों वाले विनोद कापड़ी की अधीनता स्वीकार करने के लिए एसएन विनोद को कहा गया. पर एसएन विनोद ने इससे इनकार करते हुए अपना इस्तीफा प्रबंधन को भेज दिया है. बताया जा रहा है कि एसएन विनोद के पास कई प्रस्ताव हैं. जल्द ही वे अपनी नई शुरुआत के बारे में घोषणा करेंगे. नीचे एसएन विनोद का वो इस्तीफानामा है जिसे उन्होंने साईं प्रसाद मैनेजमेंट को भेजा है.

प्रतिष्ठा में,
श्री शशांक भापकर
प्रबंध निदेशक
श्री साई प्रसाद मीडिया,
पुणे (महाराष्ट्र)

प्रिय शशांक जी,

आपका सन्देश मिला। आपने मेरे निर्णय की जानकारी चाही है| आपकी भावना और पेशकश का मै सम्मान करता हूँ. लेकिन मेरी मजबूरी है कि मैं इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं कर सकता। मैं जिन शर्तो पर आपके साथ जुड़ा था अगर आप उसमे कोई भी संशोधन/परिवर्तन करना चाहते हैं, तो आपका विशेषाधिकार है। बल्कि, जैसा कि मैं सार्वजनिक रूप से कह चूका हूँ कि आप संस्थान में की गयी अपनी नई व्यवस्था पर अमल करें। यह आपके और संस्थान के हित में होगा। जिन लोगों पर आपने भरोसा किया है, उन्हें पर्याप्त अवसर दें, तभी अच्छे परिणाम मिलेंगे। आधे-अधूर मन से कोई काम न करें।

साई प्रसाद परिवार के साथ मेरे अत्यंत ही मधुर सम्बन्ध रहे हैं। आपने जो अवसर व सम्मान मुझे प्रदान किया उनके प्रति मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा। भविष्य में कभी भी कहीं भी मेरी किसी भी प्रकार की जरूरत पड़े तो मैं उपलब्ध रहूँगा। फिलहाल बदली हुई परिस्थितियों में मेरे इस पत्र को त्याग पत्र मान कर स्वीकार कर लें तो मै आपका कृतज्ञ रहूँगा।

हां, एक विशेष अनुरोध! कुछ लोगों को हमने जो शब्द दिए हैं, जिन्हें आपने स्वीकार भी किया है, उसे अति शीघ्र पूरा करने की कोशिश करेंगे ताकि उन लोगों के साथ हमारे सम्बन्ध बने रहें|

सादर

आपका ही,

एसएन विनोद
चैनल हेड व संपादक
न्यूज़ एक्सप्रेस (महा)
मुम्बई

आशीष भारद्वाज, अंकित फ्रांसिस, निखिल भूषण और भूपेश ठाकुर ने ‘इंडिया न्यूज’ ज्वाइन किया

चार पत्रकारों के बारे में सूचना मिली है कि उन्होंने इंडिया न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की है. इनमें से तीन ने इंडिया न्यूज के आनलाइन सेक्शन में आमद दी है. आशीष भारद्वाज ने इंडिया न्यूज आनलाइन में वेब बेड के बतौर ज्वाइन किया है. निखिल भूषण और अंकित फ्रांसिस ने इंडिया न्यूज आनलाइन में सीनियर सब एडिटर के रूप में दस्तक दी है. निखिल और अंकित दोनों ही आईआईएमसी के छात्र रहे हैं.

आईबीएन7 में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत भूपेश ठाकुर ने इस्तीफा दे दिया है. भूपेश करीब पांच वर्षों से आईबीएन के साथ थे. उन्होंने नई पारी की शुरुआत इंडिया न्यूज के साथ की है. वे दैनिक भास्कर में भी काम कर चुके हैं.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

झूठे केसों से परेशान जादूगोड़ा का पत्रकार

मैं झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के छोटे से गाँव जादूगोड़ा, जो यूरेनियम खनिज के लिए विश्वविख्यात है, में रहता हूँ। पत्रकारिता जगत में मुझे मात्र दो साल हुए हैं, लेकिन इन दो सालों का मेरा अनुभव बहुत कड़वा रहा है। सच्चाई लिखने की वजह से मुझे और मेरे भाई को एक महीने तक जेल में रहना पड़ा। पुलिस की पिटाई से आयीं चोटों की वजह से चार दिन टीएमएच अस्पताल में भी रहे। लेकिन हमनें सच लिखना नहीं छोड़ा, जिसकी वजह से असामाजिक लोगो ने झूठा केस करना जारी रखा और कहते फिरते हैं कि साला जब तक सच्चाई का भूत नहीं उतार देंगे तब तक केस करवाते रहेंगे।

 
मैंने
देखा की सच्चाई को सामने लाना और सच लिखना कितना घातक होता है। मैंने सबसे पहले 27 जनवरी 2012 को एक भू-माफिया के कारनामों को अखबार मे प्रकाशित किया तो मेरे ऊपर पहला कोर्ट केस किया गया। इसमें जादूगोड़ा के तत्कालीन थाना प्रभारी नयन सुख दाड़ेल मिले हुए थे। यह केस उच्च अधिकारियों ने जांच कर झूठा साबित कर दिया। इसके बाद मैंने सितंबर 2012 को अखबार एवं भड़ास4मीडिया में लिखा था की जादूगोड़ा मे बेखौफ होकर चल रहा है अवैध जुआ और हब्बा-डब्बा। इससे बौखला कर थाना प्रभारी ने हमें जेल भेजने की धमकी दी थी, यह भी भड़ास4मीडिया में प्रकाशित हुआ था। इस घटना के बाद थाना प्रभारी ने हम दोनों भाइयों पर झूठा मामला अपने परिचित मुखिया से दर्ज़ करवा दिया। लेकिन उच्च अधिकारियों की जांच मे यह केस झूठा निकला, हालांकि थाना प्रभारी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, हमे जेल भेजवाने का पूरा इंतेजाम कर रखा था।  

इसके बाद, 14 जनवरी को अवैध जुआ संचालको ने जादूगोड़ा थाना के ईमानदार इंस्पेक्टर अवधेश कुमार सिंह पर अवैध जुआ रोकवाने के कारण में जानलेवा हमला कर दिया, बचाव में उनके जवानों ने पाँच राउंड हवाई फाइरिंग किया तब जाकर इंस्पेक्टर की जान बची इस मामले को हमने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। जादूगोड़ा मे एक 14 वर्षीय छात्र पीरू मांझी की हत्या 14 मार्च 2012 को कर दी गयी थी। इस मामले में हत्यारो को स्थानीय नेता टिकी मुखी ने बचा रखा था और एक साल हो जाने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की थी। इस मामले में हमने पीड़ित परिवार का इंटरव्यू लिया और अखबार में प्रकाशित किया कि "भटक रही है पीरू की रूह मांग रही है इंसाफ।" यह खबर हमने पीरू की पहली बरसी 14/03/2013 पर छापी थी, जिसमे यह भी लिखा हुआ था की स्थानीय नेता दबा रहा है मामले को और थाना प्रभारी की भूमिका संदेहास्पद है ।

इस खबर से बौखलाकर 18/03/2013 को हम दोनों भाइयों पर झूठा मामला दर्ज करा दिया गया और इस मामले का अनुसंधानकरता खुद थाना प्रभारी नयन सुख दाड़ेल बन गया। इस मामले की जांच चल ही रही थी की बिना किसी वारंट के 12/04/2013 को हम दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया। हमें हमारे घर से जादूगोड़ा थाना तक पैदल बिना चप्पल पहनाकर धकेलते हुए ले जाया गया, जहां हमें कोर्ट के बजाए अन्य थाने भेजकर मारपीट की गयी। मारपीट की वजह से हमें चार दिन टीएमएच मे रहना पड़ा, मेरे बाएं हाथ की कलाई की एक नस काट दी गयी और अस्पताल से जबर्दस्ती छुट्टी दिलाकर जेल भेज दिया गया, जहां हमें एक माह रहना पड़ा। इस मामले मे डीआईजी ने जांच की और थाना प्रभारी नयन सुख दाड़ेल को दोषी पाया और उस पर कार्यवाही की गई।

जिस दिन 12/04/2013 को हमें गिरफ्तार किया गया उसी दिन थाना प्रभारी ने एक और फर्जी केस हम पर करा दिया ताकि हम जल्दी जेल से बाहर न आ सकें। थाना प्रभारी सब से कहते फिर रहे थे की एक साल तक सालों को जेल से बाहर आने नहीं दूंगा लेकिन मामले में बड़े अधिकारियों के आ जाने से उनकी दाल नहीं गली और हमे बिना केस डायरी देखे ही जज साहब ने बेल दे दी। इसके बाद 23/09/2013 को जादूगोड़ा से अवैध चिटफंड संचालक कमल सिंह लोगो का अरबों लेकर फरार हो गया इस घोटाले में कमल के कई एजेंट भी शामिल थे और एजेंटो को संरक्षण देने का काम कर रहा था जादूगोड़ा थाने का दलाल टिकी मुखी। हमने 12/11/2013 को अखबार में कमल के कई एजेंटो का नाम छापा जिसमें बाल्मीकी प्रसाद मेहता और हरीश भकत का नाम भी शामिल था। इस समाचार से टिकी की सेटिंग गड़बड़ाने लगी क्योंकि उसने एजेंटो को संरक्षण दिया हुआ था।

समाचार से बौखला कर टिकी मुखी ने बाल्मीकी मेहता की पत्नी से हमपर कोर्ट मे 30/11/2013 को झूठी शिकायत दर्ज़ करवा दी। इसके बाद इंस्पेक्टर पर हमला के आरोपी जुआ संचालओ को उच्च न्यायालय  से बेल पर रिहा किया गया। रिहा होने के कुछ दिनो बाद से ही टिकी मुखी उन्हे भड़काने लगा की उसके कारण ही तुम लोगों को जेल हुई थी और हब्बा-डब्बा जुआ क्षेत्र मे बंद हुआ है। यह जानकारी मिलने पर एक जुआ संचालक को हमने कहा की देखो टिकी मुखी तुम लोगों को भड़का रहा है जुआ खेलाना, नहीं खेलाना प्रशासन का काम है इसमे हमलोग क्या कर सकते है। इसके दूसरे दिन 12/01/2014 को जुआ संचालक भूषण प्रसाद और जगन्नाथ पात्रो सुबह हमारे दुकान पर आए और हमे धमकी देने लगे की तुम्हारे कारण जुआ नहीं हो रहा है तुम्हें देख लेंगे। हमने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया इस घटना के बाद उसी दिन शाम चार बजे भूषण प्रसाद ने जगन्नाथ पात्रो के फोन से मेरे बड़े भाई को धमकाया और दुकान घर मे तोड़फोड़ की भी धमकी दी।

हमनें पूरे मामले की जानकारी अविलंब थाना प्रभारी नन्द किशोर दास को दी, उन्होनें हमे सनहा दर्ज़ कराने की सलाह दी जिसके बाद शाम करीब 5 बजे मैंने सनहा दर्ज़ कराया। उसी समय थाना प्रभारी ने उनदोनों को भी थाने बुला लिया और पूछताछ के बाद दोनों पर धारा 107 का केस दर्ज किया। थाना प्रभारी के सामने ही भूषण प्रसाद ने हमें बलात्कार के मामले में फँसाने की धमकी दी, मैंने सनहा की प्रतिलिपि ली और अपने घर आ गया। इसके बाद टिकी मुखी ने भूषण प्रसाद से हम पर झूठा केस घाटशिला कोर्ट से 21/01/2014 को दर्ज़ करवा दिया।

……अब आप ही बताइये की हमने क्या गलत किया? पत्रकार सच नहीं लिखेगा तो क्या लिखेगा? क्या पत्रकार असामाजिक तत्वो के डर से सच्चाई लिखना छोड़ दे? मुझे ऐसा लगने लगा है कि सच्चाई को दबाने का माध्यम बन गया है झूठा केस और यह एक नयी संस्कृति को जन्म दे रहा है।

संतोष अग्रवाल
जादूगोड़ा(झारखंड)

भड़ास4मीडिया को भेजा गया पत्र।

हरिवंश : एक सीधा, सहज और सरल संपादक

बात उन दिनों की है जब पत्रकारिता का छात्र हुआ करता था. दिल्ली में रहता था. भारत और चीन के बीच विवाद चल रहा था. सारे चैनल उसी में डूबे हुए थे. एक उन्माद की तरह दिखाया जा रहा था कि बस कल चीन भारत पर हमला करेगा और भारत की कहानी खत्म. हम दोस्तों के बीच इसी बात पर रोजाना बहस होती थी, बतकही भी. एक दिन हमारे साथी विकास ने कहा कि यार एक नई साइट है भड़ास, उस पर प्रभात खबर के संपादक हरिवंश का लेख आया है. इसी मामले पर.

मैंने झट से खोला उस पेज को और देखते ही पहली नजर में मेरी प्रतिक्रिया थी- महराज, इतना बड़का लेख कौन पढ़ेगा!

विकास ने दबाव बनाया कि अरे मरदे एक बार पढ़िये तो सही. मैने पढ़ना शुरू किया और सच कह रहा हूं कि बिना रुके पूरा पढ़ गया. और तब से लगातार हरिवंश जी को पढ़ रहा हूं. दिल्ली रहते हुए उन्हें पढ़ने की लत-सी लग गयी. धीरे धीरे समझदारी बढ़ी, अनुभव हुए और हरिवंश जी का कद मेरी नजर में उतना ही बड़ा होता गया. मैं अपने एक साथी को अक्सर कहा करता था कि यार हरिवंश जी तो मेरे लिये पत्रकारिता के अमिताभ बच्चन ही हैं न.

कुछ माह पहले की बात है. तहलका वाले निराला और वे साथ में बनारस जा रहे थे. निरालाजी मेरे साथ ही थे. हरिवंशजी उन्हें लेने पटना में किराये वाले आवास के पास के चौक अनिसाबाद पहुंचे. मैं भी चौक पर निरालाजी को छोड़ने गया. हरिवंशजी से मुलाकात हुई. मैं थोड़ा नर्वस था कि उनसे क्या बात करूंगा. हरिवंशजी मुझसे गर्मजोशी से मिले, बता नहीं सकता, उस वक्त मैं कैसा महसूस कर रहा था. उन्होंने ड्राइवर को कहा था, गाड़ी साइड में कर लो, शशि से पहली बार मिल रहा हूं, थोड़ी देर बातचीत तो कर लूं.

लगभग 10-15 मिनट तक उनसे बातचीत होती रही. मैं सम्मोहित सा हो गया था. मुझे लग ही नहीं रहा था कि मैं इतने बड़े संपादक से मिल रहा हूं. बड़ी ही सहजता से वे पूछ रहे थे क्या चल रहा है शशि तुम्हारे जिले में, क्या राजनैतिक स्थिती है वहां की, क्या खबर लिख रहे हो आदि-इत्यादि. कुछ दिनों बाद वे फिर निरालाजी के साथ ही कहीं जा रहे थे. पटना हाईकोर्ट मोड़ पर फिर उनसे मुलाकात हुई. गाड़ी से उतरते ही उन्होंने गर्मजोशी से मिलते हुए कहा कि चलो उस दिन चाय नहीं पी सके थे हम लोग, अभी कहीं पीते हैं.

मैं बता नहीं सकता, दो मुलाकातों के बाद वे मेरे मानसपटल में किस तरह से रच-बस गये हैं. इतना बड़ा पत्रकार, संपादक क्या हकीकत में इतना सीधा, सरल, सहज हो सकता है. अभिमान से कोसो दूर रहनेवाला…!

कल हरिवंश जी को फिर देखा. लेकिन इस बार जानबूझ कर मिला नहीं, बस दूर से देखा. वे राज्यसभा चुनाव के लिए पर्चा भरने आये थे. वही साधारण वेश-भूषा, शर्ट-पैंट और स्वेटर. इससे पहले भी दो नेताओं को परचा भरते हुए देखा. तमाम लटके-झटके नारेबाजी, माला गाजा-बाजा के साथ पहुंचे हुए. इन सब के बीच हरिवंश जी को देख आश्चर्य हो रहा था. वे उसी तरह धीरे-धीरे जा रहे थे. कार्यकर्ताओं की भीड़ में कहीं पीछे छूट जा रहे थे. एकदम अकेले.

मैं गांव का रहनेवाला हूं, मैंने देखा है कि एक वार्ड कमिश्नर का चुनाव लड़नेवाला भी कितनी तैयारी के साथ जाता है परचा भरने. एक अच्छी पहल आज उन्होंने की, जो उनसे ही उम्मीद की जा सकती थी. उन्होंने आज बिना कुछ छिपाये अपने सम्पत्ति और परिवार का विस्तृत ब्यौरा दिया. जितने विस्तार से उन्होंने बताया है, उसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने विवेक से सब कुछ बताया. बहुतों को बहुत निराशा हुई होगी. सब अनुमान लगाते थे कि हरिवंशजी अरब तक तो कमा ही लिये होंगे लेकिन 37 सालों की नौकरी में जो हिसाब उन्होंने दिये हैं, वह तो बिहार में आजकल कई विभागों के मामूली से क्लर्क भी रखते हैं.

लेखक शशि सागर युवा और प्रतिभावान पत्रकार हैं. उनसे संपर्क shashi sagar shashi.sagar99@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


इसे भी पढ़ें:

राज्यसभा के लिए आज नामांकन दाखिल करने वाले हरिवंश के बारे में कुछ बातें

‘न्यायालय बना भ्रष्टालय’ पुस्तक के लेखक की पीआईएल खारिज

उत्तर प्रदेश सरकार के नौ उर्जा कंपनियों के निदेशक मंडल में एक ही आदमी के कई पदों पर नियुक्ति के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर और देवेन्द्र दीक्षित द्वारा दायर पीआईएल इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आज खारिज कर दी. राज्य सरकार के अधिवक्ता ने श्री दीक्षित द्वारा उच्चतर न्यायपालिका के कथित भ्रष्टाचार पर लिखित पुस्तक ''न्यायालय बना भ्रष्टालय'' के रोके जाने सम्बन्धी हाई कोर्ट का आदेश प्रस्तुत किया जिस पर जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा तथा जस्टिस डी के उपाध्याय की बेंच ने पीआईएल खारिज कर दिया.

पीआईएल ने उर्जा विभाग के प्रमुख सचिव संजय अग्रवाल तथ आईएएस अफसर कामरान रिज़वी की ज्यादातर उर्जा कंपनियों में अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक तथा अन्य कई लोगों के विभिन्न कंपनियों के निदेशक मंडल में नियुक्ति को उत्तर प्रदेश ऊर्जा सुधार अधिनियम 1999 तथा यूपी उर्जा नीति के विरुद्ध होने के आधार पर निरस्त करने की मांग की गयी थी.

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD, LUCKNOW BENCH

Court No. – 2

Case :- MISC. BENCH No. – 607 of 2014

Petitioner :- Nutan Thakur & Another [P.I.L.]

Respondent :- State Of U.P.Thr.Prin.Secy.Energy Deptt.Govt.Of U.P.Lucknow

Counsel for Petitioner :- Dr.Nutan Thakur (Inperson)

Counsel for Respondent :- C.S.C.

Hon'ble Imtiyaz Murtaza,J.

Hon'ble Devendra Kumar Upadhyaya,J.

Heard the petitioner no.1, Dr. Nutuan Thakur, in person.

Petitioner No.2 is not present.

Supplementary affidavit filed today be taken on record.

A preliminary objection has been raised on behalf of the State that looking into the antecedents and credentials of petitioner no.2-Devendra Kumar Dixit, public interest litigation petition on his behalf should not be entertained.

To bring home his argument, learned Senior Advocate appearing on behalf of the State has brought to the notice of this Court an order dated 23.02.2012 passed in Writ Petition No.1511 (M/B) of 2012 whereby direction was issued to immediately stop the publication, circulation and sale of the book titled "Nyayalay Bana Bhrastalay" written by Sri Devendra Kumar Dixit (petitioner no.2 herein). The said order was passed taking into consideration the allegations made in the aforesaid Writ Petition no. 1511 (M/B) of 2012 to the effect that the publication not only contains highly scandalous and derogatory remarks against the judiciary and Hon'ble Judges of this Court but also tends to destroy the respect of the judiciary as well as Hon'ble Judges of Higher Judiciary and damages the respect of institution and the sovereign, socialist democratic republic. It was also asserted in the said case that author and publisher had committed offence under Sections 153A, 153B and 292 of Indian Penal Code.
This Court after going through the contents of the said book written by the petitioner no.2 found that allegations made in the said writ petition were highly scandalous containing derogatory remarks against the judiciary and the Hon'ble Judges of this Court. The relevant paragraph of the said order dated 23.02.2012 is being quoted below:-
"We have gone through the contents of the book annexed as Annexure No.1 to the writ petition and find that the allegations made, are highly scandalous and contains derogatory remarks against the Judiciary and Hon'ble Judges of this Court. The allegations have the potential to disturb the respect of judiciary in the general public. "
This Court, thus, directed the Principal Secretary, Department of Home, Lucknow to take immediate notice of the allegations made in the writ petition as well as the contents of the book and consider to take immediate appropriate action under Section 95 Cr.P.C. for stopping the publication, printing, sale and circulation of book. It was also provided that till appropriate action is taken by the Principal Secretary, Department of Home, the publication, circulation and sale of the book shall remain suspended.
We have been taken through the affidavit filed in support of this petition wherein the petitioner no.1, who is the deponent of the said affidavit, has stated that she is fully conversant with the facts and circumstances of the case and further that she presents this petition/affidavit on behalf of respondent no.2 as well.
On being enquired, the petitioner no.1 states that the word respondent no.2 has occurred in paragraph 1 of the said affidavit by mistake and it should be read as petitioner no.2.
In the affidavit, it has been stated that petitioner no.1 has been authorized by the petitioner no.2 to make deposition and present this petition/affidavit on his behalf as well.
Looking into the order dated 23.02.2012 passed by this Court in Writ Petition No.1511 (M/B) of 2012 and also taking into consideration the contents of the affidavit filed in support of this writ petition, we are not inclined to entertain this petition. It is accordingly dismissed.
Order Date :- 29.1.2014
Renu/-

सुधीर चौधरी ‘जी न्यूज’ को ले डूबे, आईबीएन7 पतन के गर्त में

दो बड़े न्यूज चैनलों का इन दिनों बुरा हाल हुआ पड़ा है. जी न्यूज कभी देश का जाना-माना चैनल हुआ करता था, लेकिन आजकल इसके दिन गर्दिश में चल रहे हैं. जिंदल ने जी ग्रुप के संपादकों का पैसे मांगते हुए स्टिंग क्या कर लिया, इस ग्रुप के चैनल देखते ही देखते बदनाम चैनल में शुमार होते चले गए. कितनी भी कोशिश की गई पर चैनल नहीं उठा तो नहीं उठा.

इन दिनों तो हालत और ज्यादा खराब हो चुकी है. सुधीर चौधरी को जी न्यूज का फेस बनाकर पेश करना और इन पर दांव खेलना जी समूह को भारी पड़ने लगा है. चैनल की टीआरपी दिनोंदिन धड़ाम होती जा रही है. ताजे आंकड़े बताते हैं कि जी न्यूज अब छठें नंबर का चैनल होकर रह गया है. जी न्यूज से ज्यादा टीआरपी इंडिया न्यूज और न्यूज24 को मिल रही है.

उधर, आईबीएन7 चैनल इन दिनों अपने पतन के चरम पर चल रहा है. आशुतोष के जाने के बाद चैनल चेहराविहीन हो चुका है. जो चेहरे दिखते हैं, उसमें ज्यादातर मिसफिट, बूढ़े, कांतिहीन दिखते हैं जिन्हें दर्शक कुबूल नहीं कर पा रहा. चैनल के पास कोई नया विजन और कांसेप्ट नहीं है. लाखों की सेलरी पाने वाले दर्जनों लोग अपनी अपनी सीट तोड़ रहे हैं और चैनल दिनोंदिन गर्त में जा रहा है.

जिन लोगों की वाकई छंटनी होनी चाहिए थी, वो जुगाड़, चापलूसी और शब्दाडंबर के बल पर चैनल के भीतर मौजूद रहकर चैनल की बैंड बजा रहे हैं. छंटनी उन युवाओं की हुई जो वाकई ऊर्जावान और उत्साही लोग थे, साथ ही कम सेलरी में ज्यादा प्रभावशाली तरीके से काम कर रहे थे. असल में आईबीएन7 में एक काकस काम करता है. उस काकस के बाहर के लोगों की नौकरी चैनल में ज्यादा दिन तक नहीं चल पाती. लगता है कि चैनल का उद्धार तभी होगा जब इस काकस को किक और फायर किया जाएगा.

हां, सबसे जोरदार अगर कोई चैनल लगातार चल रहा है तो वो है आजतक. सुप्रिय प्रसाद ने चैनल को वहां पहुंचा दिया है जिसके आसपास नंबर दो वाला चैनल भी नहीं है. आजतक 20.6 के जरिए नंबर एक पर है तो नंबर दो पर मौजूद एबीपी न्यूज 14.0 पर है. यानि एक नंबर और दो नंबर के चैनल के बीच इतना फासला है कि आजतक का प्रतिस्पर्धी कोई भी चैनल नहीं है. लड़ाई दो नंबर के लिए इन दिनों एबीपी न्यूज और इंडिया टीवी में चल रही है. कापड़ी के काकस से इंडिया टीवी के मुक्त होने के बाद चैनल न्यूज कंटेंट पर खेल रहा है. इसके कारण कई हफ्तों तक चैनल का आडियेंस, व्यूवर कनफ्यूज रहा. अब लग रहा है कि चैनल को एक नए किस्म का सीरियस व्यूवर मिल रहा है, जिसके कारण चैनल स्थायित्व की ओर अग्रसर है.

इस साल के चौथे हफ्ते की टीआरपी इस प्रकार है….

WK 04 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:
Aaj Tak 20.6 up 0.6
ABP News 14.0 dn 0.3
India TV 11.0 dn 0.9
News24 9.0 up 0.8
India news 8.6 dn 0.2
ZN 8.1 dn 1.0
News Nation 8.1 up 1.5
NDTV 6.9 dn 0.2
IBN 6.4 dn 0.1
Samay 2.7 dn 0.4
Tez 2.7 dn 0.1
DD 1.7 up 0.3

Tg CS M 25+ABC
Aaj Tak 21.1 up 1.1
ABP News 14.3 up 0.1
India TV 11.2 dn 0.9
News24 8.6 up 1.2
India news 8.3 dn 0.5
ZN 8.2 dn 1.3
NDTV 8.0 same
News Nation 7.6 up 0.9
IBN 6.7 up 0.1
Samay 2.8 dn 0.3
Tez 1.8 dn 0.4
DD 1.5 up 0.1

सहारा, मीडिया, समय, सपने और नए सौदागर

सहारा मीडिया जब सुब्रत रॉय के भाई जयब्रत रॉय से नहीं संभला तो अब एक नई चौकड़ी लाई गई। पूर्व फिल्म अभिनेता विश्वजीत की बहू अर्पिता चटर्जी के नेतृत्व में वरुण दास, बीवी राव, गुलाटी की नई टीम को गाजे बाजे के साथ आई है। ऐसी पैकेजिंग की गई कि लगा, अब बस सहारा या तो सुधर जाएगा या बिक जाएगा। वरुण दास ने आते ही सहारा मैनेजमेंट के सामने नया चारा डाला।

थोड़ा इनकी प्रोफाइल देख लेंगे तो कहानी और समझ में आएगी। सहारा मीडिया के सीईओ वरुण दास Mydia 100 Communications Private Limited Corporate Identification Number (CIN U74940DL2012PTC246701) और Cent Percent Media Solutions Private Limited (Corporate Identification Number –CIN U22130DL2013PTC247166 ) का डायरेक्टर भी हैं। (सोर्स- http://companyinfoz.com/company/mydia-100-communications-private-limited)

तो यह चारा था कि पैसा कमाने के लिए इवेंट किया जाय जिसमें लॉबिंग करने वाली मैगजीन 'गवर्नेंस नाउ' के पूर्व संपादक के अनुभवों का भरपूर इस्तेमाल होगा। इन पूर्व संपादक का नाम बीवी राव है जो अब सहारा टीवी न्यूज़ के समूह संपादक हैं। इस चौकड़ी ने यूपी, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों के छोटे-लघु उद्योगों को सम्मानित करने का फैसला किया। तंबू बाजा, विज्ञाप​​​​न सब जुटाया गया। यूपी में 23 फरवरी को और झारखंड में 09 फरवरी 2014 को समय उद्यमी 2013 दिया जाएगा। वाह…..।

आपको बता चुके हैं कि जो नए नवेले सीईओ हैं वे दो तीन साल में किसी न किसी कंपनी को खोलते बंद करते रहते हैं। फिलहाल दो में डायरेक्टर हैं और इनमें से एक कंपनी MYDIA00 इस पैसा कमाऊ मुहिम “समय उद्यमी 2013” की कर्ताधर्ता है। लोगो पर लिखा है ''समय उद्यमी 2013” A MYDIA00 INITATIVE''। हालांकि डिजाइनर की हुनर से इसमें कुछ बदलाव है।

ये तो रही नए चौकड़ी कार्यकर्ताओं की टीम। अब यह टीम गोबर कैसे करती है यह देखिए। समय (सहारा अब नाम से गायब है) की वेब पोर्टल पर नई उगाही “स्कीम समय उद्यमी 2013” के संदर्भ में सूचनाएं दी गई हैं। पहले इंट्रोडक्शन का बड़ा हिस्सा ही सरकार की वेबसाइट से उड़ाया गया है। चोरी करने वाले ने निशान मिटाने की कोशिश जरूर की है लेकिन दो शब्द के बाद धैर्य छोड़ दिया है।

उसके बाद क्या यूपी, बिहार और झारखंड, हर राज्य के सूचना को यहां-वहां से उड़ाकर चिपका दिया है। चोरी करने वाले को होश नहीं कि जहां से उड़ाया जा रहा है वे सब पुराने आंकड़े हैं। उसने किसी भी उड़ाए गए सोर्स का जिक्र नहीं किया है। यही नहीं, समय पोर्टल का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि 5,000 पत्रकारों की टीम पोर्टल चलाती है। वाकई यह कमाल है 5000 पत्रकारों और चालीस…. (सीनियरों) का।

अंदरखाने चर्चा है कि सहारा को यह नई चौकड़ी बेचने आई है। वैसे Mydia 100 Communications Private Limited की प्रोफाइल में मर्जर एक्विजिशन में महारत की बात गिनाया गया है।​

 

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘जानो दुनिया’ : घर फूंक तमाशा देख

मैं इस कंपनी को अपने इंटरव्यू के तीन महीने बाद ज्वाइन किया एवं तीन महीनों के अंदर अलविदा कह ​दिया। अलविदा कहने के बहुत सारे कारण थे, लेकिन सबसे पहला कारण। इस चैनल के मालिक का टारगेट केवल पैसा है। अगर यकीन न आए तो इंटरनेट पर सर्च कर लें, आपको लिखा मिल जाएगा- मेरा टारगेट एक करोड़ बिलियन : संजय गुप्ता। इस चैनल के मालिक कभी आईएएस अधिकारी थे। मगर गुजरात में आए भूकंप के बाद गुजरात एवं मालिक की जिन्दगी बदल गई।

एक आईएएस अधिकारी कुछ सालों में गुजरात का एक बड़ा नामी गरामी बिजनसमैन बन गया। बहुत सारे धंधे शुरू कर​ दिए हैं। दूसरे धंधों में जुटे हुए लोगों का तो पता नहीं, लेकिन मीडिया जोन में काम करने वाले, बड़े पैकेजों पर हायर किए जाते हैं एवं एक महीने के वेतन में तीन महीने काम कर निकल लेते हैं, जिसको निकलने का रास्ता नहीं मिलता, वे केवल रोशनी की किरण का इंतजार करते हैं।

मैंने कंपनी छोड़ी। दूसरा कारण। हर दिन घर का मालिक बदल रहा था। हर रोज नए व्यक्ति के पास चैनल का जिम्मा होता था। अब स्थिति ऐसी है कि एक आईटी का बंदा चैनल संभाल रहा है। हो सकता है कि ख़बर प्रकाशित होने से पहले ही चैनल का​ जिम्मा किसी होटल के वेटर के हाथ में आ जाए।

इस चैनल को शुरू हुए दो साल हो चले हैं। सैंकड़े लोगों ने दिल्ली से अहमदाबाद एवं अहमदाबाद से वापिस दिल्ली का रास्ता नापा। अब तक इस चैनल के पास टैगलाइन नहीं। इसलिए इस चैनल के लिए 'जानो दुनिया — घर फूंक तमाशा देख' बेहतर टैगलाइन रहेगी।

कहते हैं कि चैनल का नाम सोच समझ कर नहीं। बल्कि इस ग्रुप के एक अन्य सैर सपाटा कारोबार से मिला, जो कभी सुनने में नहीं आया। सैर सपाटे के लिए जानो दुनिया का टैग था, जो एक चैनल में बदल गया। जैसे कि मैंने पहले ही कहा बच्चों की जिद्द की तरह बनाते चले गए।

मैं 'जानो दुनिया' छोड़ने वाला था। स्थितियां वैसी ही थी, जैसी ज्वॉइनिंग के बाद एचआर कर्मचारी ने कही थी, वेतन तीन माह इंतजार करने के बाद मिलेगा। मेरा वेतन कम था, मिलता रहा। जिस दिन छोड़ा। उस दिन एचआर ने कहा, ईमानदारी ​दिखाओ या न, यहां वेतन नहीं मिलेगा, अंतिम माह का। तब एक चुटकला जेहन में आया। यों कुछ यूं है।

चुटकला :- एचआर के गुप्ता जी को फोन आता है। दिल्ली से एक हाईप्रोफाइल न्यूज एडिटर बहुत हाई पैकेज मांग रहा है। गुप्ता जी ने कहा, हां बोल दो। एचआर मैनेजर चौंका एवं पूछा क्यूं। इतना वेतन। तो गुप्ता जी ने कहा, अरे पगले, क्या तुम्हारा पहला महीना है। यहां एक महीने के वेतन में तीन महीने काम हो जाता है। अंत सब बराबर। :-

बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा हुआ। मेरा तो महीने का वेतन गया। मुझे दुख नहीं, लेकिन आने वालों के लिए इतना संदेश है, तीन महीने की सैलेरी का पैकेज लेकर आना। अगर तीन महीने न मिले तो काम चल जाए या फिर घर फूंक घर फूंक तमाशा देखने आना।

कुलवंत हैप्पी

संपर्क 9904204299

ईमेल : sharma.kulwant84@gmail.com


इसे भी पढ़ सकते हैं…

अहमदाबाद के 'नीसा' समूह और 'जानो दुनिया' चैनल का काला सच

xxx

'जानो दुनिया' नामक एक चैनल की हकीकत जानो दुनिया वालों

माखनलाल में वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र शर्मा बोले- बलिदान की कीमत न वसूलें

: पं. माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि पर व्याख्यान का आयोजन : भोपाल । जिन लोगों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया और उसकी कीमत वसूल ली, वे समाज और देश का भला नहीं कर सकते। पत्रकार की रीढ़ कभी नहीं झुकनी चाहिए। पं. माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए यह बात वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र शर्मा ने कही। वे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित व्याख्यान कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे।

श्री शर्मा ने कहा कि माखनलाल जी ने भाषा की शुद्धता और संस्कार के लिए जीवनभर संघर्ष किया। जब भारत सरकार ने राष्ट्रभाषा अधिनियम पारित किया तो उन्होंने विरोध स्वरूप पद्मविभूषण का अलंकरण सरकार को लौटा दिया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार विजय कुमार दास ने कहा कि माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता में जो योगदान दिया है, वह साहित्य के लिए भी धरोहर है। उन्होंने कहा कि माखनलाल जी से प्रेरणा लेकर युवाओं को आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद के खिलाफ युद्ध का हिस्सा बनने की तैयारी करनी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव प्रो. रामदेव भारद्वाज ने कहा कि सार्थक और सकारात्मक सोच के साथ जब पत्रकारिता की जाएगी तो उससे समाज और देश का उत्थान होगा। कार्यक्रम का संचालन मीता उज्जैन और आभार प्रदर्शन दीपक शर्मा ने किया।

नेत्र परीक्षण शिविर का आयोजन: पं. माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि के अवसर पर एमसीयू की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में नेत्र परीक्षण शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में विद्यार्थियों सहित करीब दो सौ लोगों ने नेत्र परीक्षण कराया।

प्रेस विज्ञप्ति
 

‘पत्रिका’ और ‘भास्कर’ ने ‘नईदुनिया’ को मीलों पीछे छोड़ा

: सिमट रहा पत्रकारिता की पाठशाला रहा 'नईदुनिया' : अड़ियल संपादक और नौसिखिए स्टाफ का कारनामा : पाठक सर्वे की ताजा रिपोर्ट ने हिंदी अखबारों की दुनिया के एक पुराने अखबार 'नईदुनिया' की बदतर होती हालत बयां कर दी। मध्यप्रदेश में आज ये अखबार सिकुड़कर ख़त्म होने की कगार पर खड़ा दिखाई देता है! हिंदी अख़बारों की दुनिया में 'नईदुनिया' बरसों तक एक सुसंस्कृत समाज का सभ्य भाषा वाला सामाजिक अखबार माना जाता था!

इस अखबार ने खबरों की विश्वसनीयता का ऐसा शिखर खड़ा किया था, जिसे कई बरसों तक कोई हिला तक नहीं सका! 'नईदुनिया' के आधार स्तम्भ रहे राजेंद्र माथुर ने एक कार्यक्रम में कहा था कि इंदौर में घटनाएं घटती ही इसलिए हैं, कि वो 'नईदुनिया' में खबर बनें! किसी अखबार के लिए ये सम्मान वाली बात होगी कि उससे राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, शरद जोशी जैसे नाम जुड़े थे, जिनकी हिंदी पत्रकारिता में एक साख रही है। लेकिन, दुःखद बात ये है कि इंदौर को हिंदी पत्रकारिता का तीर्थ बनाने वाला ये अखबार आज सिमट गया है।

इस अखबार के बनने और बर्बाद होने की दास्ताँ भी अजीब है, जिसकी शुरुआत हुई २००६ से! सन २००६ के बाद एक ऐसा दौर आया कि 'नईदुनिया' ध्वस्त हो गया था! अभय छजलानी और महेंद्र सेठिया के हाथ से विनय छजलानी के हाथ में 'नईदुनिया' की बागडोर आते ही 'नईदुनिया' की विश्वसनीयता की धज्जियाँ उड़ गई! बाद में ये इसलिए संभला की २००९ तक इसकी कमान तत्कालीन ग्रुप-एडीटर उमेश त्रिवेदी के हाथ में आ गई थी! अखबार कि जबरदस्त समझवाले इस पत्रकार ने अपनी लीडरशिप के जरिए 'नईदुनिया' की साख को काफी हदतक संभाला। लेकिन, २००९ में जब विनय छजलानी ने 'नईदुनिया' के इंदौर संस्करण का स्थानीय संपादक जयदीप कर्णिक को बनाया तो इस अखबार का पूरा बंटाढार हो गया! ख़बरों के नाम पर ऐसा प्रयोग हुआ कि सारी विश्वसनीयता धराशायी हो गई। हालात ये हो गए कि 'नईदुनिया' के घाटे को सँभालने के लिए इसे 'जागरण समूह' को बेचने का फैसला करना पड़ा! मार्च २०१२ से 'नईदुनिया' का मालिकी हक 'जागरण समूह' का हो गया!

जागरण प्रबंधन ने 'नईदुनिया' की कमान भास्कर से रिटायर हुए अड़ियल और मुँहजोर संपादक श्रवण गर्ग को सौंप दी। मुद्दे की बात ये रही कि श्रवण गर्ग को प्रधान संपादक बनाने की सलाह भी विनय छजलानी की थी। दो साल बाद आज 'नईदुनिया' का दायरा इतना सिमट गया कि जिस इंदौर में इस अखबार का तूती बोलती थी, वहाँ ये दैनिक भास्कर और पत्रिका से सर्कुलेशन में बहुत पीछे रह गया! ताजा पाठक के मुताबिक जहाँ पत्रिका की पाठक संख्या ३ लाख ३२ हज़ार बढ़कर ४३ लाख २६ हज़ार हो गई और दैनिक भास्कर की पाठक संख्या ३९ लाख ९४ हज़ार पर पहुँच गई, वहीँ 'नईदुनिया' की पाठक संख्या सिमटकर ७ लाख १७ हज़ार रह गई! इसपर  भी इस अखबार को सँभालने की कोई कोशिश नहीं हो रहे है। श्रवण गर्ग के साथ कभी काम करने वाले लोग धीरे-धीरे 'नईदुनिया' के शीर्ष पदों पर बैठ गए और आज ये अखबार इंदौर जैसे बड़े शहर के कोने में रह गया है। 'जागरण समूह' की नईदुनिया को लेकर क्या नीति है, इस पर तो कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती, पर यदि किसी अखबार में अच्छी ख़बरें नहीं है, छपाई ख़राब है, ख़बरों की विश्वसनीयता संदिग्ध है और पाठकों के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं है तो कोई उसे क्यों खरीदेगा और पढ़ेगा?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

जागरण के मुताबिक लेफ्टीनेंट जनरल से मेजर में प्रमोशन होता है!

Roy Tapan Bharati : क्या लेफ्टीनेंट जनरल से मेजर में प्रमोशन होता है… जागरण के मुजफ्फरपुर संस्करण की खबर से यह मुझे पता चला… आज मैं जागरण ई-पेपर का मुजफ्फरपर संस्करण (30 जनवरी) पढ़ रहा था. दैनिक जागरण के मुजफ्फरपुर संस्करण के पेज-5 पर पुणे में एक मेजर की प्रशिक्षण के दौरान मौत की खबर में यह बात पढ़ी…

इस खबर में रिपोर्टर ने लिखा है कि अविनाश आनंद को लेफ्टीनेंट जनरल से मेजर में प्रमोशन के बाद पुणे तैनात किया गया था… क्या ऐसा संभव है… क्या अखबारों में संपादन नहीं होता या वहां का काम बोझ अधिक है…. लिंक ये है…

http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/30-jan-2014-edition-Muzaffarpur-Nagar-page_9-1277-2878-203.html

वरिष्ठ पत्रकार राय तपन भारती के फेसबुक वॉल से.

वीरेन डंगवाल अस्पताल से घर लौटे, सुनील छंइया को ब्रेन हैमरेज

दिल्ली के अपोलो अस्पताल में कैंसर के आपरेशन के बाद वीरेन डंगवाल अब दिल्ली स्थित अपने बेटे के घर लौट आए हैं. उनका पिछले दिनों मेजर आपरेशन हुआ. कई घंटे तक वह आपरेशन थिएटर में ही रहे. बाद में उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया. अब उन्हें घर भेज दिया गया है. डाक्टरों ने कुछ जांच के लिए उन्हें अस्पताल बुलाया और पाया कि सारा कुछ ठीक रहा.

उधर एक दुखद सूचना मेरठ से है. सुभारती ग्रुप के अखबार दैनिक प्रभात के संपादक सुनील छंइया के बारे में सूचना मिली है कि उनको ब्रेन हैमरेज हो गया है. वह मेरठ में ही सुभारती अस्पताल में भर्ती हैं. डॉक्टर अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं. मेरठ के पत्रकारों ने उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए दे सकते हैं.

वो लाल किला तुम्हारे नहीं बल्कि हमारे बाप ने बनवाया था : अर्जीज बर्नी

Aziz Burney : (29-01-14) अबे रमा शंकर… तू जिस मोदी की बात कर रहा है, उसको आज ही तेरे शंकराचार्य ने हिंदुओं का सबसे बड़ा दुश्मन कहा है, और तू समझता है हमें आईसोलेटेड (isolated)… हम दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं और दुनिया की पहली सबसे बड़ी ताक़त हैं…

बुश की हवा ख़राब करने के लिए भी एक ही लादेन काफ़ी था… और, तू क्या जाने हमारी औक़ात… पूछो अपने मोदी से, वो जिस लाल क़िला पर झंडा फहराने की हसरत में मरा जा रहा है वो उसके बाप ने नहीं, हमारे बाप ने बनवाया था… और सुन, मोदी आरएसएस का खिलौना है जो यूज़ ऐंड थ्रो (use and throw) की पालिसी पर चलती है।

इलेक्शन के बाद किसी पोलीटिकल डस्टबिन (dustbin) में फेंक दिया जाएगा। बता कहाँ है आज तोगड़िया फ़ोगड़िया, उमा भारती, कल्याण सिंह, साध्वी ऋतम्भरा जिसने जनसंघ को जन्म देने वाले दीनदयाल उपाध्याय को नहीं छोड़ा, उनके लिए ये मोदी क्या चीज़ है। मेरा नाम अज़ीज़ बर्नी है, मेरे क़लम की नोक से सारे संघ परिवार की चीख़ निकल जाती है।

ये मोदी फोदी क्या हैं, मैं हिंदुओं का दोस्त हूँ मगर उनका जो श्रीराम को अपना आदर्श मानते हैं मगर जो रावण को माने उसे मैं तो क्या इस देश का हिंदू भी नहीं मानता और सुन 700 बरस हुकूमत की है हमने हिंदुस्तान पर, अभी 70 बरस भी नहीं हुए और तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया, डरो उस वक़्त से जब हम हमसे हमारी औक़ात पूछने वालों को औक़ात बताने पर मजबूर हो जाएं, समझा क्या?

वरिष्ठ पत्रकार अजीज बर्नी के फेसबुक वॉल से.

हे पत्रकार, तुमको मैं बालकनी से फेंक दूंगा!

भारत में ही नहीं, अमेरिका में भी सांसद बदमिजाज होते हैं. वॉशिंगटन से खबर है कि कैपिटल पर मंगलवार की रात रिपब्लिकन सांसद माइकल ग्रिम ने एनवाई-1 के न्यूज रिपोर्टर को धमकी दी कि वे उन्हें बालकनी से उठाकर बाहर फेंक देंगे. हालांकि सांसद ने बाद में अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने संवाददाता को पेशेवर रवैया अपनाने के लिए मौखिक रूप से समझाया भर था.

वर्ष 2010 के चुनाव प्रचार के लिए अवैध रूप से चंदा उगाहने के एक मामले में न्याय विभाग की जांच का सामना कर रहे ग्रिम से स्टेट ऑफ द यूनियन के बाद रिपोर्टर ने ऑन कैमरा इंटरव्यू चाहा था. रिपोर्टर माइकल स्कॉटो ने उनके ऊपर लगाए गए आरोपों को लेकर सवाल पूछने चाहे. जब ग्रिम ने ऐसा करने का कोई इरादा जाहिर नहीं किया तो स्कॉटो को कहना पड़ा कि कांग्रेसमैन माइकल ग्रिम आरोपों को लेकर कोई बात नहीं करना चाहते हैं.

इससे पहले कि कैमरा बंद हो, सवाल से नाराज दिखाई दे रहे ग्रिम रिपोर्टर के पास आए और उन्होंने धमकी की कि वे उन्हें बालकनी से बाहर फेंक देंगे. दूसरी बार सांसद बने ग्रिम पहले एक सैनिक और एक एफबीआई एजेंट रहे हैं. उन्होंने करीब 20 सेकेंड तक स्कॉटो को धमकाया. स्कॉटो का कहना था कि वे तो मात्र एक वैध सवाल पूछना चाह रहे थे. ग्रिम के इस कारनामे को चैनल ने दर्शाया और उन स्थानों को बीप आउट कर दिया जहां-जहां ग्रिम ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था. एनवाई-1 के राजनीतिक निदेशक बॉब हार्ट ने सांसद के इस व्यवहार को 'अस्वीकार्य' बताया. उनका कहना था कि यह बहुत दुखद बात है कि कोई भी आपके रिपोर्टर को धमकाता है लेकिन यह मामला तो एक सांसद से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि वे ग्रिम से माफीनामे की मांग करते हैं.

मिस्र में 16 स्थानीय और चार विदेशी पत्रकारों पर मुकदमा चलाने की तैयारी

मिस्र में 16 पत्रकार चरमपंथी संगठनों से संबंध रखने और चार पत्रकार उनकी मदद करने या झूठी खबरें फैलाने संबंधी आरोपों का सामना कर रहे हैं. इन कुल बीस पत्रकारों में से दो ब्रिटेन, एक हालैंड और एक ऑस्ट्रेलिया का पत्रकार है. समझा जाता है कि ऑस्ट्रेलिया के वो पत्रकार पीटर ग्रेस्ट हैं, जो अल-जज़ीरा के संवाददाता हैं. इससे पहले, बीबीसी समेत अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ नेटवर्क्स ने अल-जज़ीरा के पांच पत्रकारों की रिहाई की मांग की थी. बाकी 16 पत्रकार मिस्र के ही हैं जिन पर एक चरमपंथी संगठन से संबंध रखने, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक शांति को नुक़सान पहुंचाने तथा अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए चरमपंथ को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करने जैसे कई आरोप हैं.

चार विदेशी पत्रकारों पर मिस्र के पत्रकारों के साथ सूचना, उपकरण, धन संबंधी सहयोगी करने, ग़लत सूचना प्रसारित करने और ऐसी अफ़वाहें फैलाने का आरोप है जिनसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में यह संदेश जाए कि मिस्र में गृह युद्ध के हालात हैं. सरकारी वकीलों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इन बीस में से आठ पत्रकार हिरासत में हैं जबकि 12 अन्य गिरफ़्तारी वॉरंट जारी होने के बावजूद फ़रार हैं.

बयान में किसी का नाम नहीं लिया गया है लेकिन इतना अवश्य कहा गया है कि चार विदेशी संवाददाता क़तर के अल-जज़ीरा नेटवर्क के लिए काम करते थे. वहीं अल-जज़ीरा के समाचार संकलन विभाग की प्रमुख हेदर एलन का कहना है, ''हम केवल इतना जानते हैं कि पांच लोग जेल में हैं. हमें नहीं पता कि आरोप क्या हैं. इस समय चीजें स्पष्ट नहीं हैं. हम अब भी बातें स्पष्ट होने का इंतज़ार कर रहे हैं.''

ग़ौरतलब है कि पीटर ग्रेस्ट ने उन्हें बिना किसी आरोप के हिरासत में रखे जाने के ख़िलाफ़ अपील की थी जिसे काहिरा की एक अदालत ने बुधवार को ख़ारिज़ कर दिया था. एक होटल के कमरे से अवैध तरीक़े से प्रसारण करने के आरोप में मिस्र के गृह मंत्रालय ने बीते साल दिसम्बर में अल-जज़ीरा के पत्रकारों और कर्मचारियों को गिरफ़्तार किया था. इस पर अल-जज़ीरा की ओर से कहा गया था कि उसके पत्रकार महज़ मिस्र के हालात पर रिपोर्टिंग कर रहे थे.

एक महीने पहले जिन तीन पत्रकारों को गिरफ़्तार किया गया था, उनमें ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार पीटर ग्रेस्ट भी शामिल थे. उन पर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों से बात करके 'चरमपंथियों' के साथ सहयोग करने का आरोप है. मुस्लिम ब्रदरहुड पर सैन्य समर्थित सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है. अल-जज़ीरा के काहिरा ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद फ़ाहमी और मिस्र के प्रोड्यूसर बहर मोहम्मद पर मुस्लिम ब्रदरहुड की सदस्यता का कहीं अधिक गंभीर आरोप है.

अल-जज़ीरा नेटवर्क का कहना है कि मिस्र के अधिकारियों ने जब उसके संवाददाताओं को गिरफ़्तार किया तो उसे बड़ी 'हैरानी' हुई. उसके दो अन्य कर्मचारी- पत्रकार अब्दुल्लाह अल-शमी और कैमरामैन मोहम्मद बद्र को बीते साल जुलाई-अगस्त में गिरफ़्तार किया गया था. बीबीसी, स्काई और डेली टेलीग्राफ़ अख़बार सहित अन्य समाचार संगठनों ने बुधवार को एक न्यूज़ कॉन्फ्रेंस करके मिस्र में पकड़े गए सभी पत्रकारों को फ़ौरन रिहा किए जाने की मांग की है. (साभार- बीबीसी)

मेरठ में पत्रकार दंपति ने चीफ इंजीनियर के आफिस पर आत्मदाह का प्रयास किया

मेरठ से खबर है कि एक पत्रकार दंपती ने ऊर्जा निगम के चीफ इंजीनियर के दफ्तर पर आत्मदाह का प्रयास किया. सूचना पर पहुंची दंपति को महिला थाने ले आई. पत्रकार दंपति का आरोप है कि तीन महीने पहले इंजीनियर ने उनके साथ अभद्रता की और कैमरा तोड़ दिया था. इस मामले में कहीं भी उनकी सुनवाई नहीं हुई और न ही इंजीनियर पर कोई कार्रवाई हुई.

एक स्थानीय अखबार के पत्रकार नरेंद्र कुमार गौतम और उनकी पत्नी बॉबी गौतम बुधवार दोपहर चीफ इंजीनियर वीके सिन्हा के दफ्तर पर पहुंचे और अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगाने का प्रयास किया. आनन-फानन में वहां पहुंचीं सीओ मनीषा सिंह, इंस्पेक्टर सिविल लाइन अजय अग्रवाल और महिला थाना पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया और महिला थाने ले आए.

नरेंद्र ने बताया कि तीन माह पूर्व कवरेज के लिए वह वीके सिन्हा के पास गए थे. वहां उनके साथ मारपीट और अभद्रता की गई, कैमरा तोड़ दिया गया. शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. इसके चलते उन्होंने बुधवार को आत्मदाह का ऐलान किया था. सीओ मनीषा सिंह ने बताया कि बाद में दोनों पक्षों में समझौता हो गया है. उधर, ऊर्जा निगम के चीफ इंजीनियर वीके सिन्हा का कहना है कि ये पत्रकार दंपति एक मामले में जबरन बाइट देने का दबाव बना रहे थे. इन्कार करने पर मेरे साथ अभद्रता की गई. सिन्हा ने कैमरा तोड़ने का आरोप गलत बताया.

लाइव इंडिया पर नए लोगों की ऐसी कृपा बरसी की चैनल टीआरपी लिस्ट से बाहर हो गया!

खबर लाइव इंडिया से……. चैनल पर नये लोगों की कृपा इतनी बरस रही हैं कि चैनल TRP  की लिस्ट से ही बाहर हो गया है….. लेकिन सपने और बाते और दावे और बैठकों का दौर तो ऐसा कि नंबर वन चैनल वाले भी हिल जाएं….. शरमा जाएं…… लाइव इंडिया का ऑफिस नोएडा जाने की तैयारी में है….. राय मशविरा रोजाना जारी है…. कुछ लोग पैसा बनाने के रास्तों पर जी जान से जुटे हैं….. मालिकों को विश्वास में लेने की कोशिश जारी है….

एक संपादक महोदय चाहते है कि उनकी मर्जी के मुताबिक नियुक्तियां की जाएं… इसलिए पुराने काबिल लोगों को भी परेशान करने की प्रक्रिया पूरी शिद्दत से जारी हैं….. M  फैक्टर अपने आप को चैनल का सबसे सक्रिय चेहरा बनाने की कोशिश में लगा है….. फिर चाहें बैसिर पैर की खबरों को भी डेस्क पर लादने की बात ही क्यों न हो…. असाइनमेंट में बैठीं मोहतरमा का ज्ञान जगजाहिर है….. संपादक महोदय की दया पर आगे बढ रहे हैं कुछ लोग… अब तो एंकरिंग भी करने लगे… फंबल इतने कि अल्लाह मालिक……. सामान्य जानकारी का तो जिक्र ही छोड़िए …. मैनेजमेंट को धीरे धीरे कई तरह के सबूत मिल रहे हैं … धमाका नोएडा जाने तक हो जायेगा…..

जानकारी ये भी मिली है कि कुछ लोगों को जल्द लिफाफा थमाया जा सकता है… कुल छह बंदे हैं… नाम धीरे-धीरे कनफर्म होने लगे हैं… चैनल में ये ऐसे प्राणी हैं जो बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं लेकिन इनकी हालत बद से बदतर होती जा रहीं है …… माना जा रहा हैं कि कुर्सी बचाने के लिए ये लोग भी पूरी तैयारी में हैं …लड़ाई आर पार की ही होगी………. जाते जाते एक और खबर… यह चैनल आम आदमी पार्टी के लिए जी जान से काम कर रहा हैं …. इसकी खबरें चलाने का सीधा आदेश डेस्क को आये दिन दे दिया जाता है …. (कानाफूसी)

11 पारिवारिक कहानियां : रिश्‍तों के जाल में उलझे कुछ किस्‍से

दुनिया और समाज चाहे जितने बदल जाएं परिवार और परिवार की बुनियाद कभी बदलने वाली नहीं है। माहेश्वर तिवारी का एक गीत है, 'धूप में जब भी जले हैं पांव, घर की याद आई !' सार्वभौमिक सच यही है। भौतिकता की अगवानी में आदमी चाहे जितना आगे बढ़ जाए, जितना बदल जाए परिवार के बिना वह रह नहीं सकता और परिवार उस के बिना नहीं रह सकता। कहा ही जाता है कि कोई भी घर छत, दीवार और दरवाजे से नहीं बनता। घर बनता है आपसी रिश्तों से।

बहुत पुराना फ़िल्मी गाना है, ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर तो मुझ से आ के मांग ले तेरी नज़र, मेरी नज़र! घर की तफ़सील की इबारतें और भी कई हैं। बस देखने की अपनी-अपनी नज़र है। इस संग्रह में संग्रहित ग्यारह कहानियों में भी परिवार का यह उतार-चढ़ाव, यह बुनावट, यह संवेदना आप को निरंतर मथती मिलेगी। बड़की दी का यक्ष प्रश्न संयुक्त परिवार की भावनाओं और ज़िम्मेदारियों की ही कहानी है। बाल विधवा बड़की दी की यातना सारे परिवार की यातना बन जाती है। चाहे मायका हो, चाहे ससुराल ! हर कोई बड़की दी का तलबगार है। सब के सब बड़की दी में अपना आसरा ढूंढ़ते हैं। लेकिन यही बड़की दी जब वृद्ध होती है तो अपना आसरा, अपनी इकलौती बेटी में ढूंढ़ती है। अपनी बेटी के प्रति वह इतनी आशक्त हो जाती है, इतनी पजेसिव हो जाती है कि उस के बिना रह नहीं पाती। उस के साथ रहने चली जाती है। तो जैसे कोहराम मच जाता है। परिवार का बना-बनाया ढांचा टूट जाता है। लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। क्या मायका, क्या ससुराल। हर कहीं बड़की दी की थू-थू होने लगती है।

और जब बड़की दी अपना सब कुछ बेटी के नाम लिख देती है तो जैसे तूफान-सा आ जाता है। और बड़की दी अकेली पड़ जाती है। बेटी को कैंसर हो जाता है। बड़की दी असहाय हो जाती है। बड़की दी का यक्ष प्रश्न में बड़की दी की यातना को बांचना किसी भी भारतीय विधवा स्त्री की यातना को बांचना है। सुमि का स्पेस कहानी में कैरियर और विवाह के बीच झूलती एक लड़की की कहानी है। सुमि कैसे तो अपने कैरियर के फेर में पड़ कर विवाह को टालती जाती है, यह परिवार के नित बदलने और युवाओं की छटपटाहट की अद्भुत कहानी है। सुमि अंततः अपना कैरियर चुनती है। न सिर्फ अपना कैरियर चुनती है बल्कि अपनी बहन को भी खींच लाती है। इस कैरियर की दौड़ में। यह सुमि का अपना स्पेस है जहां परिवार भौचक हो कर खड़ा ताकता रहता है और वह आगे बढ़ जाती है। संगम के शहर की लड़की भी शादी के छल-कपट की मारी हुई है।

दहेज और पुरुष के दूसरे विवाह की यातना की मारी यह लड़की पारिवारिक अदालत में चक्कर लगाने को मजबूर हो जाती है। सिंदूर लगाते ही तलाक के दंश का दाहक विवरण अगर पढ़ना हो तो संगम के शहर की लड़की को पढ़ा जा सकता है। सूर्यनाथ की मौत कहानी में संयुक्त परिवार जैसे एक बार फिर लौटता है। परिवार के बच्चे एक साथ दिल्ली घूम रहे हैं सूर्यनाथ के साथ। सूर्यनाथ की प्राथमिकताएं गांधी की हत्या की जगह बिरला भवन, राष्ट्रपति भवन, नेशनल म्यूजियम आदि हैं तो बच्चों की प्राथमिकता पर मेट्रो और माल हैं। परिवार के मुखिया और बच्चों की सोच में बदलाव और प्राथमिकता की जो धड़कन है, बाज़ार और मूल्यों की जो मार है वह एक साथ सूर्यनाथ की मौत में उपस्थित हैं। घोड़े वाले बाऊ साहब एक निःसंतान दंपति की कथा तो है ही, सामंती अवशेष और उस की ऐंठ की पड़ताल भी इस कहानी में दिलचस्प है।

मन्ना जल्दी आना परिवार की ऐसी त्रासदी में डूबी कहानी है जो सरहदें लांघती मिलती है। अब्दुल मन्नान देश-दर- देश बदलते हैं एक साज़िश का शिकार हो कर लेकिन अगर वह भारत देश से फिर भी जुड़े रहते हैं तो वह परिवार और पारिवारिक विरासत के ही चलते। यहां तक कि तोता भी उन के परिवार का अटूट हिस्सा बन जाता है। मन्ना जल्दी आना में तमाम यातनाओं और मुश्किलों के बावजूद परिवार कैसे तो एकजुट रहता है। यह देखना अविरल अनुभव है। संवाद कहानी में पिता, पुत्र और विमाता के अर्तंसंघर्ष की कड़वी टकराहट है। कैसे दो पीढ़ियों का टकराव जिसे हम जनेरेशन गैप भी कह सकते हैं संवाद में हमारे रु-ब-रु है। तो भूचाल कहानी में एक मां और बेटे का संघर्ष, महत्वाकांक्षा, अपेक्षा और कुढ़न की अजीब कैफियत है।

जब मां कहती है कि बलात्कार से पैदा हुआ बेटा, बेटा नहीं होता ! तो उस मां की यातना, उस की तड़प का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। लेकिन परिवार तो परिवार है। वह टूटता है तो जुड़ता भी है। हर परिवार की यही कहानी है। राम अवतार बाबू कहानी में तो जीव-जंतु भी कैसे तो परिवार के अभिन्न सदस्य बन जाते हैं, देख कर कौतूहल होता है, आश्चर्य होता है। कन्हई लाल की मुश्किलें और हैं तो मेड़ की दूब की जिजीविषा और संघर्ष का ताना-बाना और है। सूखे का मारा पूरा गांव और परिवार का जीवन इस कहानी की इस इबारत में बांचा जा सकता है, ‘हम तो मेड़ की दूब हैं, काकी ! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो जिंदगानी है। और यह बज्जर सूखा सदा थोड़े ही रहेगा। इन ग्यारह पारिवारिक कहानियों के सारे रेशे, सारे तनाव और सारी भावनाएं परिवार की खुशियों, परिवार की अनिवार्यता और उसके तनाव से ही जुड़े हुए हैं। आमीन !

 -अब की पुस्तक मेले में मेरी तीन नई किताबें –

१-ग्यारह पारिवारिक कहानियां
[कहानी-संग्रह]
२-सात प्रेम कहानियां
[कहानी-संग्रह]
३-सिनेमा-सिनेमा
[सिनेमा से संबंधित लेखों और इंटरव्यू का संग्रह]

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित

दनपा
पुस्तक मेले में जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली के स्टाल पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

सात प्रेम कहानियां : मासूम दिलों के निश्‍छल प्‍यार की कथा

अकथ कहानी प्रेम की। तो कबीर यह भी कह गए हैं कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय! कबीर के जीवन में दरअसल प्रेम बहुत था। जिस को अद्वितीय प्रेम कह सकते हैं। उन की जिंदगी का ही एक वाकया है। कबीर का विवाह हुआ। पहली रात जब कबीर मिले पत्नी से तो पूछा कि क्या तुम किसी से प्रेम करती हो? पत्नी भी उन की ही तरह सहज और सरल थीं। दिल की साफ। सो बता दिया कि हां। कबीर ने पूछा कि कौन है वह। तो बताया पत्नी ने कि मायके में पड़ोस का एक लड़का है।

कबीर बोले फिर चलो तुरंत तुम्हें मैं उस के पास ले चलता हूं और उसे सौंप देता हूं। पत्नी बोलीं, तुम्हारी मां नाराज हो जाएंगी। तो कबीर बोले, नहीं होंगी। और जो होंगी भी तो मैं उन्हें समझा लूंगा। पत्नी बोलीं, लेकिन बाहर तो बहुत बारिश हो रही है। भींज जाएंगे। कबीर ने कहा होने दो बारिश। भींज लेंगे। पत्नी बोलीं, बारिश बंद हो जाने दो, सुबह चले चलेंगे। कबीर बोले नहीं फिर तो लोग कहेंगे कि रात बिता कर आई है। सो अभी चलो ! पत्नी बोलीं, और अगर उस लड़के ने नहीं स्वीकार किया मुझे तो? कबीर बोले तो क्या हुआ, मैं तो हूं न ! तुम्हें वापस लौटा लाऊंगा। पत्नी बोलीं, अरे, इतना परेम तो वह लड़का भी मुझे नहीं करता। और कहा कि मुझे कहीं नहीं जाना, तुम्हारे साथ ही रहना है।

कबीर और उन की पत्नी जैसा यह निश्छल प्रेम अब बिसरता जा रहा है। यह अकथ कहानी अब विलुप्त होती दिखती है। आई लव यू का उद्वेग अब प्यार का नित नया व्याकरण, नित नया बिरवा रचता मिलता है। प्यार बिखरता जाता है। प्यार की यह नदी अब उस निश्छल वेग को अपने आगोश में कम ही लेती है। क्यों कि प्यार भी अब शर्तों और सुविधाओं पर निसार होने लगा है। गणित उस का गड़बड़ा गया है। प्यार की केमेस्ट्री में देह की फिजिक्स अब हिलोरें मारती है और उस पर हावी हो जाती है। लेकिन बावजूद इस सब के प्यार का प्याला पीने वाले फिर भी कम नहीं हैं, असंख्य हैं, सर्वदा रहेंगे। क्यों  कि प्यार तो अमिट है। प्यार की इन्हीं अमिट कथाओं को इस संग्रह में संग्रहित कुछ कहानियां बांच रही हैं। इन कहानियों की तासीर और व्यौरे अलग-अलग हैं जरूर लेकिन आंच और प्याला एक ही है। वह है प्यार।

मैत्रेयी की मुश्किलें कहानी का ताप और उस की तपिश उसे हिंदी की अनन्य कहानी बना देती है। बर्फ में फंसी मछली की आकुलता प्रेम के हाइटेक होने का एक नया बिरवा रचती है। एक जीनियस की विवादास्पद मौत में प्रेम का एक नया रस और आस्वाद है जो अवैध संबंधों की आग में दहकता और भस्म होता मिलता है। फोन पर फ़्लर्ट आज के जीवन और प्रेम का दूसरा सच है। प्रेम कैसे देह की फितरत में तब्दील हुआ जाता है, इन कहानियों का एक प्रस्थान बिंदु यह भी है। मैत्रेयी की मुश्किलें, बर्फ़ में फंसी मछली, एक जीनियस की विवादास्पद मौत और फ़ोन पर फ़्लर्ट कहानियां अगर एडल्ट प्रेम में नहाई कहानियां हैं तो सुंदर भ्रम, वक्रता और प्रतिनायक मैं जैसी कहानियां टीनएज प्रेम के पाग में पगलाई, अकुलाई और अफनाई कहानियां है।

इन कहानियों की मांस-मज्जा में प्रेम ऐसे लिपटा मिलता है जैसे किसी लान में कोई गोल-मटोल अकेला खरगोश। जैसे कोई फुदकती गौरैया, जैसे कोई फुदकती गिलहरी। जीवन में परेम का यह अकेला खरगोश कैसे किसी की जिंदगी में एक अनिर्वचनीय सुख दे कर उसे कैसे तो उथल-पुथल में डाल देता है, तो भी यह किसी फुदकती गौरैया या गिलहरी की सी खुशी और चहक किसी भी प्रेम की जैसे अनिवार्यता बन गया है। प्रेम की पवित्रता फिर भी जीवन में शेष है। प्रेम की यह पवित्राता ही उसे दुनिया में सर्वोपरि बनाती है। कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर मौजू है यहां:

मैं तो चुपचाप तेरी याद मैं बैठा था
घर के लोग कहते हैं, सारा घर महकता था।

जीवन में प्रेम इसी पवित्रता के साथ सुवासित रहे। ऐसे ही चहकता, महकता और बहकता रहे। सात जन्मों के फेरे की तरह। तो क्या बात है !

 -अब की पुस्तक मेले में मेरी तीन नई किताबें –

१-ग्यारह पारिवारिक कहानियां
[कहानी-संग्रह]
२-सात प्रेम कहानियां
[कहानी-संग्रह]
३-सिनेमा-सिनेमा
[सिनेमा से संबंधित लेखों और इंटरव्यू का संग्रह]

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित

दनपा
पुस्तक मेले में जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली के स्टाल पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

चिटफंडियों के चैनल के स्टिंगर भुखमरी के कगार पर, मालिक भंगू विदेश में मौज मना रहा

कभी पीएसील तो कभी पर्ल तो कभी वाइटल तो कभी कोई नया नाम धारण करके देश की आम जनता से हजारों करोड़ रुपये लूटने वाले सरदार जी निर्मल सिंह भंगू इन दिनों आस्ट्रेलिया में मौज कर रहे हैं पर उसके न्यूज चैनल पी7न्यूज के भारतीय स्ट्रिंगर भूखों मरने के कगार पर हैं. इन्हें करीब छह महीने से उनका मेहनताना नहीं दिया गया है. पी7न्यूज चैनल के एक स्ट्रिंगर ने नाम न छापने की शर्त पर भड़ास के पास एक मेल भेजा है, जिसे हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है.

खबर तो ये भी है कि निर्मल सिंह भंगू ने आस्ट्रेलिया की नागरिकता ले ली है और भारत से हड़पा गया सारा माल विदेशों में सेटल करना शुरू कर दिया है. बताया जाता है कि फरवरी में पीएसीएल पर सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा और फाइनल फैसला आने वाला है. उस फैसले के संभावित नकारात्मक असर से बचने के लिए अभी से पीएसीएल के बड़े लोग कई नई नई कंपनियां बनाकर पैसा इधर का उधर कर रहे हैं. अगर आपको भी इस बारे में कुछ पता हो तो भड़ास को सूचित करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करें. इन सारी सूचनाओं पर खबरें विस्तार से, जल्द ही भड़ास पर, लेकिन पहले तो पी7न्यूज चैनल में कार्यरत एक स्ट्रिंगर की कहानी सुनिए…
 

सिनेमा सिनेमा : बड़़े पर्दे के सरोकार को बताती एक पुस्‍तक

सिनेमा के सच और समाज के सच जैसे एक दारुण सच बन गए हैं। लगता ऐसे है जैसे सिनेमा न हो तो जीवन न हो। जीवन का एक विकट सच यह भी है कि हमारे भारतीय समाज में, दुनिया में हिंदी अगर आज तमाम दुश्वारियों के बावजूद सर उठा कर खड़ी है तो उस में हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा योगदान है। सोचिए कि अगर हिंदी सिनेमा हिंदीमय और बाज़ार न हो तो हिंदी कौन बोलेगा? कौन सुनेगा? रोजगार से हिंदी गायब है, अदालतों से, विधाई कार्यों से, ज्ञान-विज्ञान से और तमाम हलकों में हिंदी का नामलेवा कोई नहीं है। ऐसे में हिंदी सिनेमा और उस का संगीत हिंदी की अप्रतिम ताकत है।

गरज यह है कि सिनेमाई सरोकार हमारे जीवन की धड़कन बन चले हैं। खाना, ओढ़ना, पहनना, रहना, जीना यानी जीवन के सारे रंग, रस और रोमांच जैसे सिनेमाई सरोकारों ने ज़ब्त कर लिए हैं। अमिताभ बच्चन बताते हैं कि उन के बाबू जी हरिवंश राय बच्चन कहते थे कि हिंदी फ़िल्में पोयटिक जस्टिस देती हैं। कहीं सच भी लगता है। क्यों कि सेल्यूलाइड के परदे पर अन्याय की सारी इबारतों को मिटा कर नायक सत्यमेव जयते एक बार लिख तो देता ही है। जीवन में यह संभव हो, न हो लेकिन सिनेमा में सब कुछ संभव है।

इस किताब में सिनेमा के कुछ नायकों, नायिकाओं का बड़े मन से ज़िक्र किया गया है। उन के काम को ले कर चर्चा की गई है। उन की अदा, उन के अभिनय में सराबोर कुछ लेख यहां अपने पूरे ताप में उपस्थित हैं। तो कुछ लेखों में सिनेमाई सरोकार, उन की प्रवृत्तियां और उन के लाग लपेट का व्यौरा है। जैसे सिनेमा हमारे जीवन की धड़कन है, फैंटेसी होते हुए भी हमारे जीवन का एक सच है, सच होते हुए भी हमारे जीवन का मनोरंजन है, मनोरंजन होते हुए भी हमारे जीवन का रंग और रस है। ठीक वैसे ही इस किताब में उपस्थित तमाम लेखों में सिनेमा का सच, सिनेमा का जीवन, सिनेमा का रस और उस का सौंदर्य, उस का संघर्ष बार-बार रेखांकित हुआ है। जैसे समाज में सब कुछ अस्त-व्यस्त और पस्त है वैसे ही सिनेमा और सिनेमाई व्याकरण भी अब अस्त-व्यस्त और पस्त है।

कभी बनती थी दो आंखें बारह हाथ, मदर इंडिया या मुगले आज़म, लेकिन अब दबंग, गैग्स आफ़ वासेपुर, डेढ इश्किया और जय हो जैसी हिंसा और सेक्स से सराबोर फ़िल्में हैं। कभी बनती थीं उमराव जान और लोग उस की गज़लें गुनगुनाते थे पर अब तो फ़िल्में जैसे हिंसा और सेक्स की चाश्नी में लथपथ हैं, सराबोर हैं। गीत-संगीत जैसे नदी के इस पार, उस पार बन गए हैं। गुलज़ार, श्याम बेनेगल, शेखर कपूर, मुज़फ़्फ़र अली, गोविंद निहलानी, केतन मेहता, एन. चंद्रा, भीमसेन, सागर सरहदी, सुधीर मिश्रा जैसे निर्देशक अब जाने कहां बह-बिला गए हैं। अब तो कुछ और ही है। संजीव कुमार, सुचित्रा सेन, नूतन जैसे लोगों की अदायगी की याद अब बस याद ही रह गई है। सब कुछ करिश्माई सिनेमा, हिंसा और क्रूर गीत-संगीत में डूब गया है।

मुज़फ़्फ़र अली ने डेढ़ दशक पहले ही मुझ से एक इंटरव्यू में कहा था कि हम व्यावसायिकता की मार में खो गए हैं। और अब तो परिदृश्य बहुत बदल चुका है। समाज और सिनेमा दोनों का। ऐसे में जब हमारा सिनेमा 100 साल का हो गया है तो इस किताब के मायने बढ जाते हैं। सिनेमा की बात हो और बोलना-बतियाना न हो यह भला कैसे संभव है? तो कई सारे इंटर्व्यू भी हैं इस किताब में। इस में गायक भी हैं, संगीतकार भी और अभिनय की दुनिया के सरताज भी। जिन से आप मुसलसल रूबरू हो सकते हैं। कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर है, 'आंख अपना मज़ा चाहे है, दिल अपना मज़ा चाहे है।' तो इस किताब के मायने इस अर्थ में भी भरपूर हैं। यानी आलेख भी और इंटरव्यू भी।

 -अब की पुस्तक मेले में मेरी तीन नई किताबें –

१-ग्यारह पारिवारिक कहानियां
[कहानी-संग्रह]
२-सात प्रेम कहानियां
[कहानी-संग्रह]
३-सिनेमा-सिनेमा
[सिनेमा से संबंधित लेखों और इंटरव्यू का संग्रह]

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित

दनपा
पुस्तक मेले में जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली के स्टाल पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

250 रुपए से कारोबार शुरू करने वाला यह पूर्व पत्रकार 800 करोड़ का मालिक है

नई दिल्ली : राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए नामांकन दाखिल करने वाले सभी उम्मीदवारों में सबसे अमीर बीजेपी की ओर से प्रत्याशी रविंद्र किशोर सिन्हा हैं। उनकी और उनकी पत्नी की कुल संपत्ति करीब 800 करोड़ बताई गई है। सिन्हा के नाम दर्ज संपत्ति की कीमत 564 करोड़ रुपये जबकि उनकी पत्नी के पास 230 करोड़ रुपये कीमत की संपत्ति है। सिन्‍हा चार सालों तक पटना के एक अखबार में पत्रकार भी रहे हैं। 

सेक्योरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विस (सिस) नाम की सेक्योरिटी एजेंसी के मालिक सिन्हा ने जेडीयू की ओर से राज्यसभा सांसद का चुनाव लड़ चुके महेंद्र प्रसाद को धन के मामले में पीछे छोड़ दिया है। प्रसाद के पास करीब 683 करोड़ रुपये की संपत्ति बताई गई थी। स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा पहुंच चुके विजय माल्या (615 करोड़ की संपत्ति) और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा पहुंची गुजरे जमाने की सिने स्टार जया बच्चन (493 करोड़ की संपत्ति) के पास भी रविंद्र किशोर सिन्हा जितना धन नहीं है।
 
62 साल के रविंद्र किशोर सिन्हा आरएसएस से जुड़े रहे हैं और बीजेपी से राज्यसभा के नामांकन के लिए लगातार कोशिशें कर रह थे। 1971 पटना के एक दैनिक अखबार में ट्रेनी जर्नलिस्ट के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले सिन्हा को बांग्लादेश वॉर कवर करने का मौका मिला था। सिन्हा ने 1974 में पत्रकारिता छोड़ दी। बांग्लादेश युद्ध को 'कवर' करने के दौरान उनकी मुलाकात कुछ फौजियों से हुई थी जिन्होंने उन्हें सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेस सर्विस (सिस) बनाने की सलाह दी थी।

रविंद्र किशोर सिन्हा ने महज 250 रुपये से अपना कारोबार शुरू किया था और देखते ही देखते उनकी कंपनी सैकड़ों करोड़ का कारोबार करने लगी। सेक्योरिटी फर्म के कारोबार में क्या हैसियत है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2008 में 'सिस' ने ऑस्ट्रेलियन सेक्योरिटी एजेंसी क्यूब को टेकओवर किया। (भास्‍कर)

20 पत्रकारों पर मुकदमा लादने की तैयारी

मिस्र में सरकारी वकीलों का कहना है कि 16 पत्रकार 'चरमपंथी संगठनों से संबंध रखने' और चार पत्रकार उनकी मदद करने या झूठी ख़बरें फैलाने संबंधी आरोपों का सामना कर रहे हैं. इन कुल बीस पत्रकारों में से दो ब्रिटेन, एक हालैंड और एक ऑस्ट्रेलिया का पत्रकार है. समझा जाता है कि ऑस्ट्रेलिया के वो पत्रकार पीटर ग्रेस्ट हैं, जो अल-जज़ीरा के संवाददाता हैं.

इससे पहले, बीबीसी समेत अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ नेटवर्क्स ने अल-जज़ीरा के पांच पत्रकारों की रिहाई की मांग की थी. बाकी 16 पत्रकार मिस्र के ही हैं जिन पर एक चरमपंथी संगठन से संबंध रखने, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक शांति को नुक़सान पहुंचाने तथा अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए चरमपंथ को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करने जैसे कई आरोप हैं.

चार विदेशी पत्रकारों पर मिस्र के पत्रकारों के साथ सूचना, उपकरण, धन संबंधी सहयोगी करने, ग़लत सूचना प्रसारित करने और ऐसी अफ़वाहें फैलाने का आरोप है जिनसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में यह संदेश जाए कि मिस्र में गृह युद्ध के हालात हैं. सरकारी वकीलों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इन बीस में से आठ पत्रकार हिरासत में हैं जबकि 12 अन्य गिरफ़्तारी वॉरंट जारी होने के बावजूद फ़रार हैं.

बयान में किसी का नाम नहीं लिया गया है लेकिन इतना अवश्य कहा गया है कि चार विदेशी संवाददाता क़तर के अल-जज़ीरा नेटवर्क के लिए काम करते थे. वहीं अल-जज़ीरा के समाचार संकलन विभाग की प्रमुख हेदर एलन का कहना है, ''हम केवल इतना जानते हैं कि पांच लोग जेल में हैं. हमें नहीं पता कि आरोप क्या हैं. इस समय चीजें स्पष्ट नहीं हैं. हम अब भी बातें स्पष्ट होने का इंतज़ार कर रहे हैं.''

ग़ौरतलब है कि पीटर ग्रेस्ट ने उन्हें बिना किसी आरोप के हिरासत में रखे जाने के ख़िलाफ़ अपील की थी जिसे काहिरा की एक अदालत ने बुधवार को ख़ारिज़ कर दिया था. एक होटल के कमरे से अवैध तरीक़े से प्रसारण करने के आरोप में मिस्र के गृह मंत्रालय ने बीते साल दिसम्बर में अल-जज़ीरा के पत्रकारों और कर्मचारियों को गिरफ़्तार किया था. इस पर अल-जज़ीरा की ओर से कहा गया था कि उसके पत्रकार महज़ मिस्र के हालात पर रिपोर्टिंग कर रहे थे.

एक महीने पहले जिन तीन पत्रकारों को गिरफ़्तार किया गया था, उनमें ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार पीटर ग्रेस्ट भी शामिल थे. उन पर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों से बात करके 'चरमपंथियों' के साथ सहयोग करने का आरोप है. मुस्लिम ब्रदरहुड पर सैन्य समर्थित सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है. अल-जज़ीरा के काहिरा ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद फ़ाहमी और मिस्र के प्रोड्यूसर बहर मोहम्मद पर मुस्लिम ब्रदरहुड की सदस्यता का कहीं अधिक गंभीर आरोप है.

अल-जज़ीरा नेटवर्क का कहना है कि मिस्र के अधिकारियों ने जब उसके संवाददाताओं को गिरफ़्तार किया तो उसे बड़ी 'हैरानी' हुई. उसके दो अन्य कर्मचारी- पत्रकार अब्दुल्लाह अल-शमी और कैमरामैन मोहम्मद बद्र को बीते साल जुलाई-अगस्त में गिरफ़्तार किया गया था. बीबीसी, स्काई और डेली टेलीग्राफ़ अख़बार सहित अन्य समाचार संगठनों ने बुधवार को एक न्यूज़ कॉन्फ्रेंस करके मिस्र में पकड़े गए सभी पत्रकारों को फ़ौरन रिहा किए जाने की मांग की है. (बीबीसी)

रीडरशिप घटाने वाला सर्वे जागरण को मंजूर नहीं

नई दिल्ली। देश के सभी समाचार पत्रों के बीच दैनिक जागरण ने लगातार 26वीं बार पहले पायदान पर अपना कब्जा बरकरार रखा है। हालांकि, आइआरएस के जून-दिसंबर, 2013 सर्वेक्षण के मुताबिक देश के ज्यादातर अखबारों की रीडरशिप घटी है, लेकिन बावजूद इसके दैनिक जागरण को देश का नंबर एक अखबार घोषित किया गया है।

आइआरएस की ओर से सर्वेक्षण एजेंसी एसी नील्सन ने यह जो सब्जबाग दिखाया था कि वह कंप्यूटरीकृत वैज्ञानिक आधार पर सर्वे करेगी उस पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यही कारण है कि दैनिक जागरण सर्वेक्षण की प्रक्रिया और उसके नतीजों का विरोध करता है। इस सर्वेक्षण में रीडरशिप को लेकर बहुत विसंगतियां है और वह सर्कुलेशन की वास्तविकता को नकारता है, जबकि सर्कुलेशन ही रीडरशिप का मूल आधार और उसकी आत्मा होता है।

आइआरएस-2013 के सर्वेक्षण में जो वास्तविक स्थिति दिखाने की कोशिश की गई है वह हकीकत से बड़ी हद तक दूर है। सर्वेक्षण के नतीजों ने अखबारों के सर्कुलेशन को हाशिये पर ले जाने का काम किया है। सर्वेक्षण के लिए जो पद्धति अपनाई गई है उस पर सवालिया निशान इसलिए लग गए हैं, क्योंकि वह इस नतीजे पर पहुंचता है कि किसी शहर में एक अखबार की एक प्रति को तो 10-12 लोग पढ़ते हैं, लेकिन दूसरे अखबार की एक प्रति को महज दो-तीन लोग और वह भी उसे जो उस शहर का शीर्ष अखबार है।

बतौर उदाहरण कानपुर में दैनिक जागरण की एक प्रति को पढ़ने वालों की संख्या दो ही बताई गई है। वहीं प्रतिद्वंद्वी अखबार की एक प्रति को पढ़ने वालों की संख्या 11 बताई गई है। यही विसंगति वाराणसी में भी है। यहां दैनिक जागरण की एक प्रति पढ़ने वालों की औसत संख्या 2.6 बताई गई है और प्रतिद्वंद्वी अखबार की एक प्रति को 4.8 पाठक दिए गए हैं। सभी राज्यों के कुछ इलाकों में इसी तरह के हास्यास्पद आकलन किए गए हैं।

कई जगहों पर निकटतम प्रतिद्वंद्वी अखबार वहां के अग्रणी अखबार का महज 30 फीसद है, लेकिन आइआरएस ने उन जगहों पर प्रतिद्वंद्वी को नंबर एक बता दिया है। इन्हीं विसंगतियों के चलते सर्वेक्षण के नतीजे सवालों के घेरे में आ गए हैं। दैनिक जागरण ने सर्वेक्षण के नतीजों पर सख्त एतराज जताया है।

दैनिक जागरण का कहना है कि आइआरएस, 2013 में उसे भले ही नंबर एक अखबार घोषित किया गया हो, लेकिन इसके बावजूद वह इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि यह मौजूदा समय का सबसे ज्यादा खामियों भरा सर्वेक्षण है। दैनिक जागरण सच्चाई के साथ है और इसी कारण इस सर्वेक्षण से असहमत है। (जागरण)

दरअसल दैनिक जागरण और अमर उजाला की अपनी दिक्‍कतें हैं

जिस अखबार का प्रसार ज्यादा है, अगर उसी की रीडरशिप भी ज्यादा होगी तो क्या जरूरत है, रीडरशिप सर्वे की। कोई यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि वह पिछड़ गया है। अपने अखबारों में पहले पेज पर खबर छाप रहा कि सर्वे गलत है। यह फर्जीबाड़ा है। तकनीक गलत है। कंपनी को कोई ज्ञान ही नहीं है। अरे .. .. .. कुछ नया करोगो नहीं। खुद को बदलोगे नहीं। जब पिछड़ोगे, तो हल्ला करोगे।

दरअसल दैनिक जागरण और अमर उजाला की अपनी दिक्कतें हैं। उन्हें सर्वे के सही और गलत होने से कोई लेना देना ही नहीं है। उन्हें पीड़ा सिर्फ इस बात की है कि हिन्दुस्तान आगे कैसे निकल गया। इसीलिए अन्य मामलों में स्वयं का प्रतिस्पर्धी कहने वाले अखबार अब एक हो गए हैं। दैनिक जागरण ने बुधवार के अखबार में क्या खूब तथ्य रखे हैं। वह कहता है कि दैनिक जागरण को सिर्फ दो लोग पढ़ते हैं। और दूसरे अखबार को 11 लोग कैसे पढ़ते हैं। अरे ज्ञानियों, यह पाठक पर है कि वह कौन सा अखबार पढ़ता है। वह सालों से आपका अखबार खरीद रहा है, तो वह खरीद रहा है, लेकिन पढ़ेगा भी आपका ही अखबार यह जरूरी तो नहीं।

जरा ध्यान दीजिए। प्रसार में दैनिक जागरण और अमर उजाला आगे हैं। अगर यह बात सही है तो जाहिर है कि इनके पास विज्ञापन भी ज्यादा होगा। जब विज्ञापन ज्यादा होगा तो खबरों के लिए जगह कम होगी। खबरों के लिए जगह कम होगी तो सबकी खबरें छप पाना मुश्किल होगा। जब सबकी खबरें नहीं छपेंगी तो कोई व्यक्ति आपका अखबार खरीद तो लेगा, लेकिन पढ़ेगा कि नहीं, यह कह पाना दुश्कर है। दूसरी ओर हिन्दुस्तान में इतना विज्ञापन नहीं होता। कम से कम उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों के बात करें तो। यहां अखबारों में खबरें ज्यादा रहती हैं। यानी सबकी खबरें छप जाती हैं। अगर हिन्दुस्तान में सबकी खबरें छपेंगी तो किसी व्यक्ति के यहां भले हिन्दुस्तान न आता हो, लेकिन वह किसी से मांग कर पढ़ तो जरूर लेगा। तो बताओ रीडरशिप हिन्दुस्तान की बढ़ेगी कि नहीं। शोर मचाना हो, हल्ला करना हो तो करते रहिए। पाठक बहुत समझदार है वह सब जानता है।

जरा गौर कीजिएगा, चार राज्यों के चुनाव से पहले जो एक्जिट पोल आया था, उसमें सिर्फ एसी नेलसन ने यह बताया था कि आम आदमी पार्टी को 28 सीटें तक मिल सकती हैं। इसका सबने मजाक बनाया। लेकिन जब परिणाम सामने आए तो सबकी बत्तीसी अंदर की ओर चली गई। एसी नेलसन ही कंपनी है, जिसने इस बार रीडरशिप का सर्वे किया है। अगर दो तीन अखबार मिलकर किसी सर्वे पर संदेह कर रहे हैं तो यह वाकई शर्मनाक और निंदनीय है। वही सर्वे जब आपको नम्बर वन बता देता है तब तो आप खुश हो जाते हैं और जब वही आपको पीछे दिखा देता है तो आप नाराज हो जाते हैं। ऐसा क्यों। फिर आप कहिए कि एबीसी का सर्वे भी गलत है और हम नम्बर वन नहीं हैं।

पहली बार कोई नई तकनीक इजाद होती है तो इस तरह से सवाल उठते ही हैं, जैसे उठ रहे हैं। जब पहली बार ईबीएम आया तब भी तो लोगों ने फर्जीबाडे़ की आशंका जताई थी। फिर क्या हुआ। सबने उस पर विश्वास किया और वह तकनीक आज हमारे लिए सहूलियत का विषय बन गई है। तो मित्रों सवाल उठना छोड़ो अपने आप को बदलो, क्योंकि तरक्की करनी है तो नया नजरिया तो लाना ही पड़ेगा।

हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के सीनियर कॉपी एडिटर पंकज मिश्रा के एफबी वॉल से साभार.

जापान के दो पत्रकार कल आयेंगे भभुआ

भभुआ : जापान की एक पत्रिका के एडिटर सहित दो सदस्यीय टीम 30 जनवरी को ग्रीन सिटी भभुआ आयेंगे. इस पत्रिका के संपादक ने यह जानकारी डीएम अरविंद कुमार सिंह को दी. दो सदस्यीय टीम ग्रीन सिटी बनाये जाने में लोगों के सहयोग की विस्तृत जानकारी लेगी. साथ ही ग्रीन सिटी के रूप में पहचान बना चुके भभुआ का भ्रमण कर अपनी पत्रिका के लिए रिपोर्ट तैयार करेंगे.

गौरतलब है कि पिछले 16 जनवरी को नगर पर्षद द्वारा संकल्प यात्र व एकता चौक पर सभा आयोजित कर भभुआ को ग्रीन सिटी के रूप घोषणा की गयी थी. डीएम की पहल पर सड़क किनारे की मकानों को लोगों ने अपने खर्च पर हरे रंग से रंग लिया है. (प्रभात खबर)

सलमान खान की गुहार- मेरे खिलाफ चल रहे सभी केस एक साथ जोड़ दिए जाएं

जोधपुर। अपनी अय्याशी के लिए हिरणों की हत्या करना सिने स्टार सलमान खान को काफी महंगा पड़ रहा है। मुंबई में फिल्मों की शूटिंग और भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के साथ पतंग उड़ाने के अपने व्यस्त कार्यक्रम में से समय निकाल कर उसे जोधपुर की अदालत में एक आम मुजरिम की तरह पेश होना पड़ रहा है। आज सलमान खान चार्टेड विमान से जोधपुर आए और जोधपुर की चीफ ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट चन्द्रकला जैन की अदालत में पेश हुए।

सलमान खान ने अदालत से गुहार की कि उनके खिलाफ चल रहे सभी केस एक साथ जोड़ दिए जाएं। काबिलेगौर है कि पन्द्रह साल पहले फिल्म ''हम साथ साथ हैं'' की शूटिंग के दौरान सलमान खान और उनकी टीम के अन्य कलाकारों के खिलाफ हिरण का शिकार करने और अवैध हथियार रखने के आरोप में चार मुकदमे जोधपुर की अदालत में दर्ज हुए थे। अब सलमान खान ठहरे व्यस्त अभिनेता और अब नेता भी। अभिनेतागिरी के साथ-साथ अब तो वे नेतागिरी भी करने लगे हैं। जनाब इन दिनों नरेंद्र मोदी के साथ पतंग उड़ाकर उन्हें प्रधानमंत्री बनवाने में जुटे हैं। इसलिए उनके पास अदालत में अने का समय नहीं है फिर अलग-अलग केस में अलग-अलग दिन पेशी, लेकिन अदालत तो भई अदालत है। यह तो भगवान का न्याय का मंदिर है, जहां सबको सिर झुकाना ही पड़ेगा।

सलमान खान ने अदालत से गुहार लगाई कि उनके खिलाफ चल रहे सभी मुकदमे एक साथ जोधपुर उनकी सुनवाई की जाए। हिरण मारने के आरेाप में चल रहे मुकदमों की बिश्नोई समाज की तरफ से पैरवी कर रहे वकील महीपाल बिश्नोई ने बताया कि सलमान खान ने उक्त आग्रह सीआरपीसी की धारा 313 के तहत किया है ताकि उन्हें बार-बार अदालत में नहीं आना पड़े।

अदालत के बाहर मीडिया और पुलिस का भारी जमावड़ा था। दोनों अपनी-अपनी डयूटी कर रहे थे। जहां पुलिस सलमान खान को भीड़ से बचाने के लिए थे वहीं मीडिया उनकी बाइट लेने के लिए खड़ा था। सलमान खान ने इस संवाददाता को बताया कि उन्हें अदालत पर पूरा विश्वास है। इधर अखिल भारतीय विश्नोई महासभा मांग कर रहा है कि चूंकि उन्होंने निर्दोष प्राणियों की हत्या की है, इसलिए उन्हें कानून के मुताबिक कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।

पेशी के दौरान जोधपुर के डिप्टी कमिश्नर आफ पुलिस हरियाणा के रहने वाले राहुल जैन अपनी पूरी फौज के साथ मुस्तैदी से डटे रहे। सलमान खान के साथ उनका निजी कमांडो शेरा भी आया था। काबिलेगौर है कि बिश्नोई हिरणों और वृक्षों को अपने बच्चे की तरह पालते हैं। यहां महिला हिरण के बच्चों को अपना दूध पिलाती हैं। अखिल भारतीय बिश्नोई समाज के मीडिया सलाहाकार अरूण जोहर बताते हैं कि जोधपुर के पास खेडदजदली गांवों में सन 1730 में जोधपुर के महाराजा अभय सिंह के निवास के लिए वृक्षों की जरूरत पड़ी तो उनके सिपाही पेड़ काटने गए। जब उन्होंने पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलानी शुरू की तो एक बिश्नोई महिला अमृता देवी के नेतृत्व में 363 बिश्नोई महिला, पुरुष और बच्चों व नवविवाहिता दुल्हनों ने भी पेड़ों की रक्षा के लिए वृक्षों से चिपक कर अपना बलिदान दे दिया लेकिन पेड़ नहीं कटने दिए। बाद में महाराज ने वहां जाकर माफी मांगी और आदेश दिया कि आगे से उनकी रियासत में वृक्ष नहीं कटेंगे। बिश्नोई समाज के लोगों ने खुद कट कर हरे भरे वृक्षों को कटने से बचाकर इतिहास में अमर हो गए।

लेखक पवन कुमार बंसल हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

एचटी ने दिल्ली-एनसीआर में खुद को नंबर वन कहा तो टाइम्स ने गोवा में खुद को नंबर दो बताया

नीचे दो खबरें हैं. एक टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित हुई है. इसमें उसने खुद को गोवा में नंबर दो अखबार बताया है. दूसरी हिंदुस्तान टाइम्स में. इसमें दिल्ली एनसीआर में एचटी को नंबर वन अखबार बताया गया है. आईआरएस 2013 के आंकड़ों को सारे अखबार अपने अपने तरीके से व्याख्यायित कर अपने अपने यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

TOI becomes No. 2 English daily in Goa

TNN | Jan 29, 2014

PANAJI: The Times of India has become number two English daily in the Goa market as per the latest Indian Readership Survey (IRS) with a 12.9% increase in readership in 2013.

TOI has consistently grown in Goa with its many initiatives taking it closer to its readers. TOI is now ahead of The Navhind Times and is only behind OHeraldO in the English space. Overall, TOI is in the top five in terms of readership in Goa for the first time, which include the Marathi dailies. TOI is the only newspaper among the top five to register a positive growth in the period.


Delhi, NCR has voted decisively. HT is No. 1

HT Correspondent, Hindustan Times  New Delhi, January 29, 2014

The city threw up a fractured mandate at the state elections. But when it comes to choosing its favourite newspaper, Delhi has decisively voted for Hindustan Times. Again.

Your paper has retained its No. 1 position in the city for the 13th consecutive time, as per the latest  round of the Indian Readership Survey (IRS). These findings were released by the Media Research Users’ Council and Research Studies Council of India on Tuesday. HT’s readership in Delhi is 16.39 lakh, while its nearest competitor, The Times of India, is at 13.94 lakh. HT is ahead of TOI in the National Capital Region as well. HT’s Delhi-NCR combined readership stands at 22.65 lakh, while TOI is at 16.51 lakh. Among the more educated and affluent households (NCCS A, or New Consumer Classification System A), HT has a lead of nearly six lakh readers over TOI.

With a sample size of over 2.35 lakh, the new Readership Survey – conducted now by global Market Research agency AC Nielsen – is one of the most robust readership studies in the world. For the first time, the entire interview was conducted on double-screen CAPI (Computer Aided Personal Interview) to ensure top-quality and secure data collection with the effective use of technology.

While these numbers reflect HT’s continuous growth trajectory, they also bear testimony to the love and faith readers have reposed in the newspaper. This growth, we believe, is a result of our relentless focus on the most important stakeholder – you, the reader. Our campaigns, each one of them, have put the lens on issues that matter to you and our great city. Through our HT For Delhi, HT For Gurgaon and HT For Noida & Ghaziabad, or You Read They Learn initiatives, we have raises issues that matter to you, tried to solve them with your help, and worked towards making our city and our world better. We’ve succeeded in many ways,  but we know there are still miles to go.

In Mumbai, HT has continued to take giant strides. Less than nine years after launching in the city, it enjoys a healthy readership of 13.62 Lakh, over 60% of the Times of India, and more than six times bigger than DNA, its one-time rival.

What’s more, as many as seven lakh readers in Mumbai have opted to read HT as their only English newspaper.  

Hindustan, HT Media Group’s Hindi daily, has moved a step ahead to become India’s No. 2 daily, with a readership of 1.42 crore. In UP, Hindustan has unseated Amar Ujala to become the No. 2 paper with 72 lakh readers, while consolidating its No. 1 position in Bihar and Jharkhand and No. 2 in Delhi. It has also become No. 1 in Uttaranchal.

Mint, the Group’s financial daily, has consolidated its No. 2 position with a readership of 3.1 lakh.

वरिष्ठ IAS ने अधिकारी बनाने का वादा किया और बदले में मोहतरमा ने अपनी ‘सेवाएं’ अर्पित कीं…

Amit Tripathi : इस लड़की के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने का केस क्यों दर्ज नहीं होना चाहिए? बड़ा अधिकारी बनने की 'दृढ़ इच्छाशक्ति' के साथ 23 वर्षीय मैडम ने Rajasthan Civil Services Appellate Tribunal के चेयरमैन से दोस्ती गांठी… वरिष्ठ IAS ने मैडम को शॉर्ट कट के जरिए अधिकारी बनाने का वादा किया… बदले में मोहतरमा ने उदयपुर, गोआ, चेन्नई और भरतपुर के होटलों के अलावा IAS के फ्लैट में उन्हें अपनी 'सेवाएं' अर्पित कीं…

लेकिन सालभर के घनघोर 'परिश्रम' के बावजूद जब मनमाफिक रिजल्ट नहीं आया तो 23 वर्षीय कन्या ने बलात्कार का केस दर्ज करा दिया…. लेकिन ये मैडम किस एंगल से 'बलात्कार पीड़ित' हैं? वर्षों कड़ी मेहनत करने वाले स्टूडेंट्स के अधिकारों पर डाका डालने की साजिश रची, फरेब का जाल बुना, सौदेबाजी की.. काम हो जाता तो सब अच्छा लगता, नहीं हुआ तो 'शोषण' का आरोप? अगर होटलों में 'इंटरव्यू' देने वाली ऐसी लड़कियों-महिलाओं को पीड़ित माना जाता रहेगा, तो उन लड़कियों को नौकरी कौन देना चाहेगा, जो अपनी काबिलियत के दम पर परीक्षा पास करके नौकरी करना चाहती हैं? बेहतर होता अगर 'मैडम' और आरोपी IAS दोनों के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश रचने का केस दर्ज करके कानूनी कार्यवाही की जाती… ऐसा होगा नहीं, इसलिए 'शॉर्टकट' अपनाने वालों की संख्या बढ़नी तय है…

अमित त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

‘भड़ैती के कुछ सीन’ सीरिज के प्रकाशन पर ‘साधना न्यूज’ वालों ने भड़ास पर किया मुकदमा

Yashwant Singh : 'एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन' नामक सिरीज के प्रकाशित किए जाने पर साधना न्यूज चैनल वालों ने भड़ास पर मुकदमा किया… चार तारीख को पेशी है, दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में… पहले साधना वाले कोर्ट के माध्यम से मेरे पुराने पते पर नोटिस भेजते रहे.. पर वहां कोई था नहीं, इसलिए नोटिस रिसीव नहीं हुआ… उन लोगों ने मेरे एक करीबी मित्र से किसी बहाने से मेरा नया पता हासिल किया और धड़ाधड़ चार नोटिस सर्व करा दिए…

मैंने भी अपने वकील साहब को जगा दिया है.. उन्होंने लंबा चौड़ा जवाब तैयार कर साधना वालों को निपटाने की तैयारी कर ली है… पर मुझे एक बात समझ में नहीं आ रही है अब तक कि इन साधना न्यूज वालों को कैसे पता चल गया कि ये सब उन्हीं के बारे में लिखा जा रहा है… जरा आप भी पढ़िए…

http://bhadas4media.com/component/search/?searchword=भड़ैती+के+कुछ+सीन&ordering=newest&searchphrase=exact

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

रायपुर के पत्रकारों ने दर्ज कराया मुकदमा, भड़ास को साइबर क्राइम का एक वकील चाहिए…

Yashwant Singh :  साइबर क्राइम का एक वकील चाहिए. कृपया कोई सस्ता सुंदर टिकाऊ हो तो मुझे बताएं. रायपुर के भाजपा प्रेमी कुछ पत्रकार पीछे पड़े हैं. स्टेट मशीनरी का दुरुपयोग कर भड़ास को डराने-धमकाने में लगे हैं. आईटी एक्ट का मुकदमा लिखकर खबर भेजने वाले का नाम पता पूछा जा रहा है. हम लोगों ने किसी भी हाल में बताने से इनकार कर दिया है. कानूनी लड़ाई अब कानूनी तरीके से भरपूर ढंग से लड़ने की सोच रहा हूं. कृपया आप लोग भी इस यज्ञ में आहुति दें.

ये है पहली और दूसरी नोटिस…
—-
पहली नोटिस…

To,
Yashwant Singh
Editor, Bhadas4Media.com
Subject : – Provide information regarding "fake post" on bhadas4media.com.
Sir,
A complain has been received at this office regarding fake post. Here someone posted fake & intractable matter on your website date 13/12/2013 that is enclose with this mail .Therefore you are requested to furnish the below mentioned information as early as possible to facilitate the inquiry.
url address:- http://bhadas4media.com/vividh/16525-2013-12-13-11-04-37.html
01. Article sender IP address with date & time
02. Article sender all detail like name, address, contact no. ,email_id
03. Any relevant information from your end that can help to investigate.

Enclose:
1. Matter about complainant.

दूसरी नोटिस

(धारा 91 जा0फौ0)
प्रति ,
यशवंत सिंह
संचालक bhadas4media.com
आपको इस नोटिस के माध्यम से सूचित किया जाता है कि आवेदक आशीष तिवारी एवं धनवेन्द्र जायसवाल द्वारा शिकायत प्राप्त हुआ है की bhadas4media.com पर दिनांक 13.12.2013 को प्रकाशित शीर्षक ''रायपुर की पत्रकार तिकड़ी के बीजेपी प्रेम की चर्चा जोरो पर http://bhadas4media.com/vividh/16525-2013-12-13-11-04-37.html '' की जांच पर धारा 66क आई.टी. एक्ट का पाये जाने से थाना पंडरी जिला रायपुर में अप0 क्र. 451/13, 452/13 धारा 66क आई.टी. एक्ट पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया है। उक्त टिप्पणी किस व्यक्ति के द्वारा वेबसाईट में प्रकाशित करने हेतु आपको दी गई है, उसकी जानकारी नाम, पूर्ण पता, मोबाईल नं., ईमेल आईडी सहित देने का कष्ट करें ताकि प्रकरण में विवेचना पूर्ण की जा सके।
प्रभारी
सायबर लैब
सिविल लाईन
रायपुर
(छ0ग0)

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


Samar Anarya ढूँढा जायेगा प्रभु.

Samar Anarya यह फर्जी नोटिस लग रही है. किसी भी केस में नोटिस विवेचनाधिकारी देता है. और यह साइबर सेल तो सुना था, लैब क्या है?

Pradeep Mahajan वो पत्रकार क्या जिसकी खबर पे कोई प्रतिकिर्या न हो नोटिस तो बोनस हैं यशवंत भाई
 
Shorit Saxena pehli baat to yah..ki shikayat par sidhe mukadma kese darj ho gaya..aapki baat sune bina mukadama darj nahi ho sakta..
 
Prashant Kumar Did u get this by email?? SI cant issue notice . U better call SHP pandari.
 
Shorit Saxena dada ek baat or aur. aamtor par ek hi maamle me police ek hi apradh darj karti he.. jese mere shahr me 5-10 dukano me ek sath chori hoti he to ek dukaandaar ki or se prakran darj hota he or baki ke maamle usi me add kar diye jate he. magar yaha do maamle darj kar diye gaye. ek hi post ke liye do alag alag maamle. raajneeti lagti he.
 
Arshad Rasheed ab lag raha hai bhadas tarakki ki rah pe hai
 
Aap Ka Praveen bhai jaan jab kisi ki aalochna ho rahi ho to samjho ki vo tarakki kar raha hai.. so in chatukaaro se durne ki jarurat nahi. isi tarah se satya se avgat karvaate raho ..
 
Sharma Sonu right to information act ke section 9 and section 16 me saf h ki media or army person se unki khabar ka sourse nhi malum kiya ja sakta h
 
Utkarsh Sinha मारा सारन के कुल लाफंदर हवुँन्न स….
 
Farhan Quraishi वो पत्रकार क्या जिसकी खबर पे कोई प्रतिकिर्या न हो___
 
Guddu Yadav आवाज दबाने की कोशिश कभी परवान न चढ़ सकेगी ।
 
Naveen Naveen Arey kuch nahi hota ye sab wahi hai jo mobile ke bill baki hone pe kavi mumbai to kavi dilli to kavi tis hazari ke ( garib ) wakil call karke 5-700 rupay ke liye dahmaki dete hai
 
Vishal Sharma dada…kindly contact rakshit tandon cyber crime expert he is in fb also
 
Prabudha Saurabh यशवंत भैया का अगला नोवेल – "जानेमन कोर्ट"
 
Kumud Singh सुंदर वकील लेकर क्‍या कीजिएगा।
 
Amit Dwivedi 09811235958 avinash hai mayur vihar me rahte hain. ye wakeel bhi hain achhe bhi hain aur sath me honest bhi hain…
 
Rishi Raj बाबा पत्रकारों का नाम बता दीजये मैनेज किया जायेगा।
 
Sajjad Badshah Ji jaoor

Kumar Nandan सच को क्या आंच जो छुपाने की जरुरत पड़ गयी बता दीजिये ।
 
Ashutosh Na Real आप तो इस फन के उस्ताद हैं, निपटा ही डालिए चिरकुटों को। हमारी शुभकामनाएं
 
Madan Tiwary Yashwant Singhइस तरह पेज पे विग्यापन देने से अच्छे वकील नही मिलते, आप खुशकिस्मत हो कि मदन तिवारी आपका वकील है वह भी बिना फ़ीस के। अगर कानूनी तरीके से लडने के लिये सोच रहे है तो डिटेल्स बताये फ़ोन पर । फ़ेसबुक पर वकील से सलाह लेने की जगह नही है समझे श्रीमान ।
 
Yashwant Singh अरे मदन सर फ्री में कब तक सेवा लेंगे आपसे… मैं प्रोफेशनली एक वकील हायर करना चाहता हूं जो दिल्ली एनसीआर में हो और सस्ता सुंदर टिकाऊ हो… यानि वो भड़ास के सरोकारी तेवर को समझे और पैसे से ज्यादा मिशनरी एप्रोच के तहत काम करे…वैसे, मैं इस मामले में आपको लैटेस्ट अपडेट यहीं फेसबुक मैसेज बाक्स में दे रहा हूं..
 
Shivani Kulshrestha मैं कोशिश करती हूँ। आपको कहां के लिये चाहिये?
 
पंकज कुमार झा अब फिर क्या हो गया Yashwant भाई? सरकारी मशीनरी ने क्या किया? कम से कम आपको या किसी मित्र को रायपुर वाला सरकारी मशीनरी तो बिलकुल परेशान नही कर सकता है कभी. अगर छत्तीसगढ़ का कोई मामला होगा तो आराम से सभी पक्ष मिल कर सलटा लेंगे. मामला-मुकदमा के फेरी में पड़ने की ज़रूरत नही है भाई.
 
Madan Tiwary जो जमुरे आईटी की धारा की धमकी देते है, उन्हे बता देता हूं पुलिस के अधिकार बहुत सिमित है इस मामले मे खासकर धारा 66A मे। पुलिस इसका दुरुपयोग अपनी गुंडागर्दी दिखाने के लिये न करे वरना जनता पुलिस की पिटाई पर उतर जा सकती है ।
 
Aap Ka Praveen ye sab aapke manobal ko todne ka prayaas hai… adig rahiye ….
 
Yashwant Singh पंकज झा जी, मैं जानता हूं जब तक आप हैं तब तक छत्तीसगढ़ में कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता… लेकिन कानूनी रुटीन को कानूनी तरीके से ही चलाना पड़ेगा…

आरजे सिमरन ने रेडियो सिटी दिल्ली को अलविदा कहा, राष्ट्रीय सहारा देहरादून से हरीश जोशी कार्यमुक्त

रेडियो सिटी दिल्ली की ब्रेकफास्ट शो एंकर सिमरन कोहली ने तकरीबन सात वर्ष बाद रेडियो सिटी से इस्तीफा दे दिया है. श्रोताओं के बीच अपने पहले नाम से पहचानी जाने वालीं सिमरन सुबह 7-11 बजे के शो 'ढिंचैक मोर्निंग्स' को प्रस्तुत करती हैं. शहर की सबसे मशहूर रेडियो जॉकी कोहली ने अपने करियर की शुरुआत ऑल इंडिया रेडियो के साथ की थी.

जल्दी ही वे उभरते हुए प्राइवेट रेडियो उद्योग में शामिल हो गईं. रेडियो सिटी दिल्ली के अतिरिक्त सिमरन रेड एफएम में क्रिएट्व हेड तथा ब्रेकफास्ट शो के आरजे के रूप में काम कर चुकीं हैं. उन्होने रेडियो मिर्ची और बिग एफएम में भी काम किया है. उन्होंने एक किताब "अन्डरस्टैन्डिंग रेडियो" भी लिखी है.

देहरादून से खबर है कि राष्ट्रीय सहारा के स्टेट ब्यूरो में सीनियर रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हरीश जोशी कार्यमुक्त हो गए हैं. वे पूर्व संपादक एलएन शीतल के नजदीकी माने जाते थे. एक अन्य जानकारी के मुताबिक कल के राष्ट्रीय सहारा देहरादून के अखबार में पेज एक पर जो खबर लीड में लगी है, वही खबर पेज नंबर तीन पर भी लगा दी गई है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

हिंदुस्तान पटना में ब्लंडर, साहित्यकारों के साथ मजाक

हिन्दुस्तान, पटना के आज के यानि बुधवार 29 जनवरी 2014 के अंक में 'पटना लाइव' परिशिष्ट के 'पटनानामा' पेज पर एक शर्मनाक भूल हुई है। इसमें महत्व के साथ एक परिचर्चा छपी है- 'क्या आज कविता पाठकों से दूर हो रही है'। इस परिचर्चा की प्रस्तुति में कवि सत्यनाराण की फोटो के नीचे उऩका नाम 'नंदकिशोर नवल, वरिष्ठ समालोचक' लिख दिया गया है।

वरिष्ठ समालोचक नंदकिशोर नवल के फोटो के नीचे 'सुरेंद्र स्निग्ध' लिख दिया गया है… और सुरेंद्र स्निग्ध के फोटो के नीचे 'कवि सत्यनारायण' लिख दिया गया है। ये तीनों लेखक देश भर में ख्यातिप्राप्त हैं। इन्हें हर कोई पहचानता है, पर पेज संपादक से कैसे गलती हुई-कौन बताएगा? क्या साहित्य पेज देखने वाला इन लेखकों को पहचानता नहीं है या वह पेज ही नहीं देखता है ठीक से?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

प्रो. निशीथ राय बने डा. शकुंतला मिश्रा विश्‍वविद्यालय के वीसी

लखनऊ। डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के चेयरमैन एवं प्रोफेसर निशीथ राय ने उत्तर प्रदेश विकलांग उद्धार डा: शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय के कुलपति पद का कार्यभार मंगलवार को ग्रहण कर लिया। यह जानकारी यहां देते हुए एक सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि प्रो. राय का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा।

उल्‍लेखनीय है कि प्रो. निशीथ राय इससे पूर्व लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे। इसके अलावा श्री राय केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय द्वारा स्थापित रीजनल सेंटर फॉर अर्बन एण्ड इन्वायरमेन्टल स्टडीज के निदेशक पद

प्रो.निशीथ राय
पर भी कार्यरत थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए एवं पीएचडी की उपाधि प्राप्त की तथा जनवरी, 1991 से लखनऊ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया।

प्रो0 राय ने एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन व सम्पादन के साथ-साथ 13 शोध पत्रों का प्रकाशन भी किया। उन्होंने 13 बुक रिव्यू, दो दर्जन से अधिक शोध कार्य एवं ट्रेनिंग माड्यूल तैयार किए। इसके अलावा 200 से अधिक राज्य स्तरीय एवं राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन भी किया। प्रो0 राय ने लखनऊ विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, भावनगर विश्वविद्यालय, गुजरात एवं पाण्डेचेरी विश्वविद्यालय की कार्य परिषद एवं सेलेक्शन कमेटी के सदस्य के रूप में कार्य भी किया।

दैनिक जागरण के लोकल इंचार्ज ने एनबीटी के फोटोग्राफर को हड़काया

दैनिक जागरण, लखनऊ के लोकल इंचार्ज की दबंगई संस्‍थान के अंदर और बाहर दोनों जगह एक जैसे ही चालू हैं. इनकी दबंगई का सार्वजनिक मुजाहिरा नगर निगम में सदन की कार्यवाही के दौरान देखने को मिले. मंगलवार को नगर निगम के सदन के दौरान पार्षदों के बीच हुए हंगामे के दौरान एनबीटी के फोटोग्राफ्रर आशुतोष त्रिपाठी फोटो खींच रहे थे. ये जनाब बार बार आशुतोष के सामने आकर अपने मोबाइल से फोटो क्लिक कर रहे थे. 

आशुतोष ने जब इनसे थोड़ा हटने की गुजारिश करते हुए कहा कि हट जाइए फोटो के फ्रेम में आप आ रहे हैं. तो इन्‍होंने कई बार उसकी गुजारिश को अनसुना करके अपने मोबाइल से फोटो खिंचते रहे. आशुतोष ने जब जोर से कहा तो यह भड़क गए तथा उसकी औकात बताने लगे. हुआ कुछ यूं कि दैनिक जागरण के लोकल इंचार्ज अजय श्रीवास्तव ने हाल ही में एक नया फोन लिया है, जिसमें इन्होंने व्हाट्स एप डाउनलोड किया है. इसी मोबाइल के सहारे ये हर जगह खुद ही फोटो खीचने लगते हैं, जबकि उनके अखबार के फोटोग्राफर मौके पर मौजूद रहते हैं.  

नगर निगम में हंगामे के दौरान जब इनसे एनबीटी के फोटोग्राफर ने कहा कि आपका फोटोग्राफर मौजूद है, वो फोटो खींच रहा है. आप थोड़ा किनारे हट जाइये तो मैं फोटो खीच सकूं. इस पर लोकल इंचार्ज महोदय तमतमा गए. फोटोग्राफर की ऐसी तैसी करते हुए कहने लगे कि जानते हो किससे बात कर रहे हो. मैं दैनिक जागरण का चीफ रिपोर्टर हूं. तुम्‍हारी औकात क्या है मेरे सामने? इसके बाद  उन्होंने फोटोग्राफर का हाथ पकड़ लिया तथा कहने लगे अभी दिखाता हूं मै क्या हूं.  मौके पर मौजूद अन्‍य अखबारों के फोटोग्राफरों ने बीच बचाव किया तब जाकर मामला शांत हुआ. हालात कुछ इस तरह हो गए थे कि हाथापाई की नौबत आ गई थी.

हालांकि अजय श्रीवास्‍तव केवल बाहर ही इस तरह का व्‍यवहार नहीं करते बल्कि ऑफिस के अंदर भी इनका व्‍यवहार इसी तरह का होता है. इसी का परिणाम है कि ज्‍यादातर रिपोर्टर जागरण को अलविदा कहकर दूसरे संस्‍थानों में जा चुके हैं. तमाम रिपोर्टर दूसरे संस्‍थानों में जुगाड़ खोज रहे हैं. रिपोर्टरों की नाराजगी संपादक दिलीप अवस्‍थी तक भी पहुंच चुकी है, इसलिए वे प्रत्‍येक कर्मचारी से व्‍यक्तिगत रूप से मिलकर उसकी समस्‍याओं के बारे में पूछताछ कर रहे हैं.

आईआरएस 2013 IRS 2013 : बनारस में हिंदुस्‍तान ने जागरण को पछाड़ा

आईआरएस के सर्वे में सबसे बुरी ख‍बर दैनिक जागरण के लिए आई है. लांचिंग के बाद से बनारस में नम्‍बर एक रहे अखबार को हिंदुस्‍तान ने खिसका कर दूसरे स्‍थान पर कर दिया है. दैनिक जागरण में जहां विजन की कमी और गुटबाजी हावी रही वहीं हिंदुस्‍तान की टीम एकजुट होकर काम में जुटी रही. बनारस दैनिक जागरण के गढ़ के रूप में जाना जाता रहा है. अमर उजाला, हिंदुस्‍तान, राष्‍ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्‍स के आने के बाद भी दैनिक जागरण को उसकी गद्दी से कोई उतार नहीं पाया था, परंतु 2013 के चौथी तिमाही में जागरण का राज खतम हो गया.

बनारस में हिंदुस्‍तान अखबार को नंबर एक पर पहुंचाने का श्रेय पूर्व संपादक मनोज पमार को है तो दैनिक जागरण को दूसरे स्‍थान पर खिसकाने का श्रेय आशुतोष शुक्‍ला को दिया जा सकता है. मनोज पमार ने पब्लिक कनेक्‍ट अभियान चलाकर लोगों को हिंदुस्‍तान से जोड़ा तो दैनिक जागरण के संपादक ऐसा कोई अभियान नहीं चला सके. दूसरे मनोज पमार बिखरी हुई टीम को एकजुट किया तो आशुतोष शुक्‍ल ने एकजुट टीम को बिखेर दिया. इसका परिणाम रहा कि हिंदुस्‍तान ने दैनिक जागरण को पीछे छोड़कर नम्‍बर एक पर पहुंच गया है.

हिंदुस्‍तान में बिना भेदभाव के सबको जिम्‍मेदारी सौंपी गई तो दैनिक जागरण में पुराने संपादक के लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया. सूत्रों का कहना है कि इसी के चलते दैनिक जागरण पहली बार दूसरे नंबर पर खिसका है. राघवेंद्र चड्ढा के समय में जो टीम एकजुट होकर अखबार को नम्‍बर एक पर बनाए रखा, उसके बिखरने की कीमत दूसरे नंबर पर पहुंच कर चुकानी पड़ी है. सूत्र बता रहे हैं कि पद्म पुरस्‍कारों के दौरान भी एक पत्रकार को संपादक आशुतोष शुक्‍ल ने दो दिन की छुट्टी पर भेज दिया जबकि वह बीट उस रिपोर्टर की थी ही नहीं.

आईआरएस 2013 IRS 2013 : चौथे स्‍थान पर पहुंचा राजस्‍थान पत्रिका

जयपुर। आज का दिन मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए ऎतिहासिक है, जब इन दोनों प्रदेशों ने एक नए प्रदेश को जन्म दिया है। यह नया प्रदेश एक नई सोच और आम आदमी के विश्वास का प्रतीक है। भारतीय पाठक सर्वेक्षण की मंगलवार को मुम्बई में जारी वर्ष 2013 की नवीनतम रिपोर्ट में "पत्रिका" ने मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में अपनी ऎतिहासिक सफलता का परचम लहराते हुए वृद्धि के आंकड़ों में शेष सभी अखबारों को पीछे छोड़ दिया है।

वर्ष 2012 की अंतिम तिमाही की तुलना में वर्ष 2013 में पत्रिका डबल से भी अधिक हो गया है। पत्रिका ने इस अवधि में अपनी पाठक संख्या में 124 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की है, जो कि देश के हिन्दी समाचार पत्रों में सर्वाधिक है, जबकि मध्यप्रदेश का सिरमौर कहलाने वाला अखबार अपने 11 प्रतिशत पाठक खोकर देश में तीसरे स्थान पर लुढ़क गया है।

सफलता की इस दौड़ में "राजस्थान पत्रिका" ने भी झण्डे गाड़ने का सिलसिला बनाए रखा है। राजस्थान पत्रिका अपने पाठकों की संख्या 12 प्रतिशत बढ़ाते हुए देश के शीर्ष दस हिन्दी अखबारों की सूची में अब चौथे स्थान पर आ गया है। आईआरएस 2012 की चौथी तिमाही में इसका स्थान पांचवां था।

पत्रिका समूह की यह सफलता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि देशभर में कई अखबारों की पाठक संख्या घट रही है। शीर्ष दस हिन्दी अखबारों में दैनिक भास्कर सहित छह समाचार पत्र ऎसे हंै, जिनकी पाठक संख्या में गिरावट आई है। इस अवधि में इन अखबारों को 50 लाख 94 हजार पाठकों से हाथ धोना पड़ा है। जिन चार अखबारों के पाठक बढ़े हैं, उनमें पत्रिका समूह के दोनों समाचार पत्र शामिल हैं, जिन्होंने 33 लाख 88 हजार नए पाठक जोड़े हैं।

पत्रिका समूह के अखबारों की बढ़ती लोकप्रियता मीडिया विश्लेषकों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं है। दूसरी ओर, अंग्रेजी समाचार पत्रों की हालत तो और भी बुरी है। देश के शीर्ष दस अंग्रेजी अखबारों में से मात्र चार ही ऎसे हैं, जो 13 से 32 हजार तक नए पाठक जोड़ पाए हैं।

शेष सभी की पाठक संख्या गिर गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में "पत्रिका" की पाठक संख्या में तेज वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि पाठक निष्पक्ष, गंभीर और मुद्दे आधारित पत्रकारिता के हिमायती हैं। पत्रिका की बेबाक कलम अन्याय, अत्याचार, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ बिना किसी दबाव के निरंतर चलती रही। हाल ही सम्पन्न विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी निष्पक्षता के कारण "पत्रिका" पाठकों की पहली पसंद बन गया।

चुनाव में "पत्रिका" की सकारात्मक भूमिका को देखते हुए राष्ट्रपति ने पिछले दिनों पत्रिका को राष्ट्रीय मीडिया पुरस्कार भी प्रदान किया है। दूसरी ओर, जिन अखबारों ने वास्तविक पत्रकारिता से मुंह मोड़कर "चटपटेपन" का सहारा लिया, पाठक उनका साथ छोड़ते चले गए। जिन अखबारों ने राजनीतिक दलों से जुड़कर या बिजनेस हित में निष्पक्षता त्याग दी, वे पाठकों के दिल से भी उतर गए।"पत्रिका" के खाते में एक उपलब्घि यह भी जाती है कि इस वर्ष यह देश के दस शीर्ष हिन्दी अखबारों की सूची में न सिर्फ शामिल हो गया है, बल्कि इसमें छठा स्थान हासिल कर लिया है।

इतने सारे पाठकों का पत्रिका से जुड़ना अपने आप में एक नए प्रदेश के जन्म जैसा ही है। ऎसा प्रदेश जिसका हर नागरिक अपने कत्तüव्यों के प्रति जागरूक है। जो स्थानीय समस्याओं के प्रति संवेदनशील है। जो प्रदेश के विकास को लेकर सक्रिय है। और जो एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सौहार्द्र की भावना रखता है। यही तो है हमारी कल्पनाओं का प्रदेश। पत्रिका के पाठकों का अपना प्रदेश।

उम्मीदों का यह कारवां एक समाचार पत्र से कहीं आगे बढ़ कर हमारी जिन्दगी ही बन गया है। यह सब आप सुधि पाठकों के समर्थन और विश्वास के कारण ही संभव हुआ है। पाठकों का यही विश्वास वो ऊर्जा है जिसके दम पर पत्रिका आज इस मुकाम पर पहुंचा है। इस सफलता से पत्रिका ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पाठकों के दिल में एक खास जगह बनाई है। हम अपने पाठकों के इस स्नेह से अभिभूत हैं और उनके प्रति अपना कोटि-कोटि आभार व्यक्त करते हैं। (पत्रिका)

एक जज ने कहा- सुब्रत रॉय सेबी के बाद सुप्रीम कोर्ट को भी चुनौती दे सकते हैं (देखें वीडियो)

सुप्रीम कोर्ट की सरेआम धज्जी उड़ाई सुब्रत रॉय ने… सहारा के चीफ सुब्रत रॉय ने साफतौर पर से देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट से पंगा ले लिया है… कोलकाता में 27 नवंबर 2013 को सुब्रत रॉय ने सहाराकर्मियों को ज्ञान देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट 15 महीने बाद भी अपने फैसले को लागू नहीं करा पा रहा है… सुब्रत रॉय का दावा है कि भारत में एक नजीर बन गया है कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को लागू नहीं करा पा रहा है…

सुब्रत रॉय खुलेआम सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देते हुए कह रहे हैं कि सहारा सही है और कोर्ट गलत… अहंकार में चूर सुब्रत रॉय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पार्टी की घटना का जिक्र करते कहते हैं कि एक जज ने कहा- सुब्रत रॉय सेबी के बाद सुप्रीम कोर्ट को भी चुनौती दे सकते हैं… सुब्रत रॉय की हिमाकत देखिए कि जिस कोर्ट और न्याय की मानने की हर भाषण में दुहाई देते हैं उसी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं…

यह कोई छुपे हुए कैमरे का स्टिंग नहीं है… यह दुस्साहसी टिप्पणी तालियों के बीच सुब्रत रॉय ने अपने कर्मचारियों के बीच खुलेआम तौर पर की… नीचे हम वीडियो का लिंक दे रहे हैं… आप भी देखिए सुब्रत रॉय की हिमाकत…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/777/interview-personality/subrat-roy-s-bhadas-against-supreme-court-and-sebi.html


इसे भी पढ़ें:

सेबी को बिना पूरा कागज दिए विदेश नहीं जा सकते सुब्रत राय : सुप्रीम कोर्ट

‘आजतक’ की सबसे बड़ी चिंता- फिल्म के सेट से सनी लियोन के अंतरवस्त्र चोरी!

Balendu Swami : देश की सबसे बड़ी चिंता, अपराध और समस्या बताई "आजतक" ने: फिल्म के सेट से सनी लियोन के अंतरवस्त्र चोरी! कल्पना करिए कि मीडिया कंपनियों का क्या स्तर हो गया है, और दोष केवल इनका ही नहीं, बात यह है कि दर्शक यही देखना, सुनना और पढना चाहते हैं! कितने महत्वपूर्ण हैं एक पोर्न स्टार के अंतर्वस्त्र! जिसके चोरी की घटना राष्ट्रीय मीडिया की खबर बन जाती है!

वृंदावन के स्वामी बालेंदु के फेसबुक वॉल से.

आईआरएस 2013 IRS 2013 : यूपी में दूसरे स्‍थान पर पहुंचा हिंदुस्‍तान

आम चुनाव अभी चंद महीने दूर हैं लेकिन पाठकों की पसंद के आधार पर जिन हिन्दी अखबारों का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है उस सर्वे के नतीजे आ गए हैं। ‘हिन्दुस्तान’ ने दौर-दर-दौर अपनी पाठक संख्या को बढ़ाते जाने वाले इकलौते हिन्दी दैनिक के तौर पर शानदार प्रदर्शन जारी रखा है।

‘हिन्दुस्तान’ की औसत अंक पाठक संख्या पिछले दौर से 20 लाख बढ़कर अब 1.42 करोड़ हो गई है। रिसर्च एजेंसी एसी नीलसन तथा एमआरसीयू द्वारा आयोजित नवीनतम आईआरएस सर्वे (आईआरएस क्यू4 2013) में औसत अंक पाठक संख्या के परिणामों के मुताबिक ‘हिन्दुस्तान’ एक पायदान और आगे बढ़कर पूरे भारत में दूसरे नंबर पर आ गया है।

जबकि ‘हिन्दुस्तान’ के प्रतियोगी अखबारों दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर तथा अमर उजाला की पाठक संख्या में इस अवधि में कमी दर्ज की गई है। प्रिय पाठकों, ये नतीजे आपके सहयोग का परिणाम हैं। आपने हमारे तथ्यों, पत्रकारिता के उच्चस्तरीय मानदंडों को हमेशा सराहा और तरक्की की राह दिखाने वाले अखबार के जरिए सेवा करने का मौका दिया है। पिछले तीन साल में हमने पाठक संख्या में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज की है। ‘हिन्दुस्तान’ की पाठक संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है और आईआरएस सर्वे के नवीनतम दौर में हमने उत्तराखंड में पहले स्थान पर कब्जा कर लिया है। उत्तर प्रदेश में हम दूसरे स्थान पर आ गए हैं जबकि बिहार और झारखंड में हमारा पहला स्थान बरकरार है।

दिल्ली में ‘हिन्दुस्तान’ 8.3 लाख पाठकों की औसत अंक पाठक संख्या के साथ दूसरे स्थान पर बना हुआ है। पाठक संख्या में हुई तीव्र वृद्धि पिछले तीन वर्षों में अखबार द्वारा चलाए गए विस्तार अभियान का परिणाम है और पाठकों ने मौजूदा दैनिक अखबारों की तुलना में हमारे तथ्य तथा अनूठेपन को सराहा है। आर्थिक परिदृश्य पर मंदी के बादल छाने के बावजूद ‘हिन्दुस्तान’ ने राज्य के सभी प्रमुख शहरों में जोरदार तेजी दर्ज कराई है जबकि ज्यादातर शहरों में प्रतियोगियों की पाठक संख्या में कमी आई है।

उत्तर प्रदेश में ‘हिन्दुस्तान’ ने एक नई ऊंचाई को छुआ है और 29.7 लाख पाठकों को अपने साथ जोड़ा है। अब उत्तर प्रदेश में हम 72 लाख पाठक संख्या के साथ दूसरे स्थान पर आ गए हैं जबकि राज्य में लंबे समय से दूसरे स्थान पर काबिज अमर उजाला को 8.45 लाख पाठकों का नुकसान उठाना पड़ा है। (हिंदुस्‍तान)

पुस्तक मेला के लिए युवा पत्रकारों को पंकज चतुर्वेदी का आफर

Pankaj Chaturvedi : हर साल की तरह इस बार भी विश्‍व पुस्‍तक मेला, नई दिल्‍ली 15 से 23 फरवरी 2014 के दौरान हम एक दैनिक बुलेटिन का प्रकाशन करेंगे जो हर रात को छपेगा व अगले दिन मेला परिसर में भागीदारों व आगंतुकों के बीच बंटेगा. इसमें मेले में घटित वाली और संपन्‍न होने वाली सभी गतिविधियों पर सामग्री होती है. इसके लिए हम तीन स्‍वत़ंत्र पत्रकार भी रखते हैं.

हमें १४ फरवरी से २२ फरवरी तक के लिए युवा, ना थकने वाले, कंप्यूटर पर काम करने में सक्षम तीन साथी चाहिए. हर दिन एक हज़ार रुपये मानदेय राशि होगा. साथ ही, पत्रिका में नाम भी होगा. पूरे नौ दिन व सुबह साढे दस बजे से रात देर तक, जब तक काम पूरा ना हो जाए. दिल्ली में रहने वाले इच्छुक तत्काल संपर्क करें. अपना परिचय या बायोडाटा मेरे इमेल pc7001010@gmail.com पर भेज सकते हें. लेकिन हमें दो दिन में ही लोग चाहिए ताकि उनके नाम आदि की स्वीकृति ली जा सके.

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

पत्रकार अज़ीज़ बर्नी ने फेसबुक पर मुस्लिमों को क्या चुनावी पाठ पढ़ाया, आप भी पढ़ें

Aziz Burney : अज़ीज़उल-हिंद एनजीओ प्लान फ़ॉर इलेक्शन 2014 (28-01-2014)… कुल 543 पार्लियामेंट्री सीटों में से 127 रिज़र्व (Reserve) सीट्स हैं जिनमें आधी से ज़्यादा सीटों पर मुस्लिम वोट फ़ैसलाकुन है, जैसे नगीना (उत्तर प्रदेश) 7 लाख, बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) 5 लाख से ज़्यादा। हिंदुस्तान भर की तफ़्सील मेरे पास है। इसी तरह से 100 से ज़्यादा सीट्स हैं जहां मुसलमान फ़ैसलाकुन हैं, ये तफ़्सील भी है, रिज़र्व सीट्स पर वोट किसी दलित को ही देना है। हर पार्टी का अपना उम्मीदवार होगा। कुछ रियासतों में हमारी सपोर्ट उस पार्टी को हो सकती है जिसे हमारी मर्कज़ी कमेटी तय करे। उनसे कुछ सीटें अपने उम्मीदवारों के लिए छोड़ने की बात की जा सकती है।

सबसे पहले हम रिज़र्व सीटों पर ध्यान देना चाहते हैं, जहां मुसलमान फ़ैसलाकुन हैं और सिर्फ़ अपने वोट पर भी उम्मीदवार को कामयाब बना सकते हैं। वहां हम अपना उम्मीदवार खड़ा करेंगे, ये वो उम्मीदवार होगा जिसे एनजीओ की लोकल यूनिट की सिफ़ारिश पर मुंतख़ब किया जायेगा। उम्मीदवार का इंतिख़ाब इनमें से किया जा सकता है जो डिज़र्व (Deserve) करते हैं मगर अपनी पार्टी से टिकट नहीं पा सके, ज़ाहिर है ये इलेक्शन लड़ने की तैय्यारी कर चुके लोग हैं। इनमें से सब से बेहतर का इंतेख़ाब कर अगर हम उसे अपना उम्मीदवार बना दें तो वो सिर्फ़ मुसलमानों के वोट पर ही जीत सकता है, ज़ाहिर है वो दलित हो कर भी मुसलमानों का उम्मीदवार होगा, वो किसी पार्टी के लिए पाबंद नहीं होगा। ये हमारी हिक्मते- अमली का पहला क़दम होगा। मेरे अपने एनजीओ के मेम्बरान से दरख़्वास्त है कि आज ही से ऐसे लोगों के राब्ते में रहना शुरू करें और अपनी रिपोर्ट हम तक भेजें। उनका मुकम्मल प्रोफ़ाइल भेजें। जल्द ही इन्शाअल्लाह अगले क़दम पर भी बात होगी।

आपका

अज़ीज़

अज़ीज़ बर्नी के फेसबुक वॉल से.

सोशल मीडिया पर गंदे मैसेज से परेशान महिला ने की आत्‍महत्‍या

कोच्चि से खबर है कि सोशल मीडिया पर आपत्‍तिजनक संदेश मिलने से एक महिला ने आत्‍महत्‍या कर ली. बताया जाता है कि महिला को फेसबुक पर लगातार अश्‍लील संदेश मिल रहे थे जिससे परेशान होकर उसने आत्‍मघाती कदम उठा लिए. महिला दो बच्‍चों की मां भी थी. कोच्चि के पास चेरनल्लोकर में 27 वर्षीय विवाहित महिला फेसबुक पर अश्लील संदेश डाले जाने के बाद यह अपमान नहीं सह पाई और उसने आत्महत्या कर ली.

बताया जाता है कि महिला ने अपने पति के साथ इसकी शिकायत पहले पुलिस से भी की थी लेकिन पुलिस ने शिकायत दर्ज नहीं की. आरोपी ने महिला को बदनाम करते हुए फेसबुक पर संदेश डाले थे और ऐसे ही संदेश उसके मोबाइल फोन पर भेजे थे. केरल न्‍यायालय के दखल के बाद पुलिस ने इसकी जांच शुरू कर दी है. पुलिस ने कहा कि 30 वर्षीय आरोपी महिला का रिश्तेदार था और उसे महिला को बदनाम करने से बाज आने की चेतावनी दी गई थी.
 

डीडी न्यूज़ के डॉ. ओपी यादव को महात्मा गांधी मीडिया एक्सीलेंस आवार्ड

नई दिल्ली, 28 जनवरी। अशोका होटल में आयोजित 33वीं अन्तर्राष्ट्रीय एन.आर.आई. कांफ्रेंस में डीडी न्यूज नई दिल्ली के वरिष्ठ पत्राकार डॉ. ओ.पी. यादव को ‘‘महात्मा गांधी मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड’’ से सम्मानित किया गया। यादव को यह पुरस्कार केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री श्री तारिक अनवर, पूर्व राज्यपाल श्री भीष्म नारायण सिंह, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य गुरिंदर सिंह और हांगकांग जैम्स स्टोन इंडस्ट्री के चैयरमेन एवं एनआरआई. नीरज कुमार जैन ने दिया। पुरस्कार के रूप में यादव को महात्मा गांधी की तस्वीर के साथ स्वर्ण पदक और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

           तारिक अनवर से महात्मा गांधी मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड ग्रहण करते डॉ. ओ.पी.यादव

डॉ. यादव को यह पुरस्कार उनके विशेष कार्यक्रम ‘‘गांधी और खादी विजन फोर वर्ल्ड’’ के लिए दिया गया है। इसका प्रसारण 33वीं अन्तर्राष्ट्रीय एनआरआई कांफ्रेंस में किया गया था, जिसकी दुनिया भर से आए प्रवासी भारतीयों ने काफी सराहना की थी। पुरस्कार देने के बाद मंत्री श्री तारिक अनवर ने डॉ. यादव के व्यक्तित्व पर प्रकार डालते हुए उनके द्वारा निष्पक्ष रूप किए गय कार्यों की सराहना की। हांगकॉग निवासी श्री नीरज के. जैन ने बताया कि इस तरह के कार्यक्रम निश्चित तौर पर प्रवासी भारतीयों को अपने वतन से जोड़ने के साथ गांधी जी के शांति संदेश को दुनियाभर में पहुंचाने में मददगार साबित होगें।

इस अन्तर्राष्ट्रीय कांफ्रेस का आयोजन ‘‘एनआरआई वेलफेयर सोसायटी ऑफ इंडिया’’ की और से किया गया था जिसमें 250 से भी अधिक प्रवासी भारतीयों ने भाग लिया और देश के विकास के लिए निवेश की पहल की।

 

Rajasthan Information Centre,New Delhi.

उग्रवादियों की धमकी के बावजूद गुवाहाटी प्रेस क्लब में फहराया गया तिरंगा

गुवाहाटी। उग्रवादी संगठनों की धमकियों को दरकिनार करते हुए अन्य संगठनों और सरकारी संस्थानों के साथ गुवाहाटी प्रेस क्लब में भी 65वां गणतंत्र दिवस समारोह का आयोजित किया गया। समारोह में प्रेस क्लब के सदस्यों के साथ बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक और बच्चे शामिल हुए।

इस मौके पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद पत्रकारों और वरिष्ठ नागरिकों के साथ स्कूली बच्चों ने आमबाड़ी इलाके में एक जुलूस निकाला। इससे पहले राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देते हुए वरिष्ठ पत्रकार दयानाथ सिंह ने गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उग्रवादियों की धमकियों को दरकिनार कर, राष्ट्रीय पर्व को उत्साह और उमंग के साथ मनाने की लोगों से अपील की। उन्होंने कहा कि यह दो दिन देश के प्रत्येक नागरिक के लिए अहम है। क्योंकि यह आज़ादी हमें यूं ही नहीं मिली है, इसके लिए हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की आहूती दी है।  

दयानाथ सिंह ने इस मौके पर उपस्थित लोगों को अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि स्वतंत्रता सेनानी रहे उनके पिता के घर को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तहस-नहस कर दिया गया था। उसके बाद उनका पूरा परिवार उत्तर प्रदेश से भाग कर पश्चिम बंगाल चला गया था।

वरिष्ठ पत्रकार रूपम बरुवा ने बताया कि किस प्रकार वर्ष 1998 से पत्रकारों ने उग्रवादियों की धमकियों को नजरअंदाज कर गणतंत्र दिवस समारोह आयोजन शुरू किया था और उसके बाद किस तरह से कुछ पत्रकारों को उग्रवादियों के गुस्से को सहना पड़ा था। ध्वजारोहन के बाद निकाले गए जुलूस में वरिष्ठ पत्रकार हितेन महंत, अजीत पटवारी, नव ठाकुरिया और रणेन कुमार गोस्वामी, राजीव भट्टाचार्य, डॉ. जगदीन्द्र रायचौधरी, प्रमोद कलिता, गिरीन काजी, पुरबी बरुवा, प्रदीप ठाकुरिया, काजी नेकीब अहमद और कैलाश शर्मा सहित कई गणमान्य लोग शामिल हुए।

 

गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट।

बिहार में पत्रकारों की चांदी, पांच लाख की बीमा योजना मंजूर

बिहार सरकार ने पत्रकारों को खुश करने का मन बना लिया है. मंत्रिपरिषद की बैठक में पत्रकारों के लिए ग्रुप मेडिक्लेम तथा व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना को मंजूरी दे दी गई है। लगभग तीन हजार पत्रकार इस योजना के तहत लाभान्वित होंगे। बिहार सरकार की इस योजना के तहत पत्रकारों के लिए व्यक्तिगत तौर पर पांच लाख का बीमा तथा साथ में पत्नी एवं दो बच्चों के साथ पांच लाख का पारिवारिक मेडिक्लेम भी शामिल है।

इस योजना में राज्य सरकार बीमा राशि का 80 प्रतिशत रकम देगी। शेष 20 प्रतिशत राशि पत्रकारों को देनी होगी। योजना के लागू होने पर पहले से जारी पत्रकार कल्याण कोष समाप्त कर दिया जाएगा। इस कोष की राशि बीमा योजना मद में हस्तांतरित कर दी जाएगी। इस योजना में प्रति वर्ष बीमा कंपनियों से कोटेशन प्राप्त कर न्यूनतम दर निर्धारित करने वाली एजेंसी के साथ वार्ता के आधार पर बीमा का प्रीमियम निर्धारित किया जाएगा। बीमा योजना के लिए पात्रता एवं शर्तों को निर्धारित करने के लिए नियमावली सूचना एवं जनसम्मर्क विभाग बनाएगा।

2014 के लिए सार्वजनिक उपक्रम की सभी चार बीमा कंपनियों से इस संबंध में कोटेशन प्राप्त किये गए। न्यूनतम दर का कोटेशन देने वाली कंपनी नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के द्वारा दर पर वार्ता के बाद ग्रुप मेडिक्लेम एवं ग्रुप पर्सनल एक्सीडेंट बीमा योजना के लिए प्रति पत्रकार के लिए 7983 रुपये की प्रीमियम राशि पर सहमति जता दी गई है। बताया जा रहा है कि इस बीमा योजना पर कुल 2 करोड़ 69 लाख 10 हजार रुपये का खर्च आएगा, जिसमें लाभ लेने वालों पत्रकारों को 53 लाख 82 हजार रुपए अदा करने होंगे। शेष 2 करोड़ 15 लाख रूपए की राशि राज्य सरकार द्वारा वहन की जाएगी।

जमानत न होने देने और फंसाने के लिए तरुण तेजपाल पर लगाया गया धमकाने का आरोप!

तरुण तेजपाल ने अपने उपर लगे आरोपों की जांच कर रही महिला अधिकारी को पत्र लिखकर कई बातें कही हैं. ये पत्र उन्होंने तब लिखा जब उन्हें पता चला कि महिला अधिकारी सुशीला सावंत ने उन पर यानि तरुण तेजपाल पर धमकी देने का आरोप लगाया है और इस बारे में कोर्ट को सूचित किया है. तरुण तेजपाल ने पत्र लिखकर कहा है कि ये सब इसलिए किया जा रहा है ताकि उनको जमानत न मिले और पूरी तरह फंसाया जा सके. पत्र अंग्रेजी में है और जेल से लिखा गया है.

अंग्रेजी में लिखा पत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:

Tarun Tejpal Letter to Sushila Sawant

उपरोक्त पत्र के शुरुआती पांच पैरों में तरुण तेजपाल ने यह बताया है कि किस तरह उन्होंने हिरासत, रिमांड के दौरान पूछताछ और मेडिकल टेस्ट आदि के दौरान हर स्तर पर लगातार सहयोग किया, सारे सवालों के जवाब दिए. तरुण ने यहां तक लिखा है कि अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ उनका व्यवहार पूरी तरह सम्मानजनक रहा. उन्होंने धमकी या दबाव की बात तो छोड़िए, कभी किसी अधिकारी या कर्मचारी से गलत शब्द कहना तो दूर, ऊंची आवाज में बात तक नहीं की. धमकी के आरोपों के बारे में सफाई देते हुए तरुण ने लिखा है: ''मेरा ये डर पुख्ता होने लगा है कि आपके पूर्वाग्रहयुक्त रवैये के चलते आपसे मुझे इंसाफ मिलने की उम्मीद कम से कम होती नजर आ रही है. ऐसा लग रहा है कि एक तयशुदा रणनीति के तहत चुने हुए तथ्यों और सुबूत पेश किए जा रहे हैं जिनका उद्देश्य किसी भी तरह मुझ पर लगे तथाकथित आरोपों को सिद्ध करना है ना कि सच्चाई तक पहुंचना. ये जाहिर है कि मुझ पर आपको धमकाने और दबाव देने के झूठे आरोप इसलिए लगाए गए हैं ताकि मुझे जमानत मिलने के हर मौके खारिज हो सकें. ये तथ्य कि माननीय सेशन कोर्ट में पेश की मेरी जमानत याचिका पर आपके दिए जवाब में धमकी या दबाव का उल्लेख ना होना और बाद में इसका शामिल किया जाना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. मेरी जमानत याचिका की जिरह के दौरान सरकारी वकील ने कहा कि मैंने अपनी गलती मान ली है. जबकि अब भी मैं कह रहा हूं कि हर बार मैंने हर एक आरोपों को पूरी तरह खारिज किया, और कहा कि ये सही नहीं हैं.''

कई पत्रकार, समाज सेवक और कलाकार इम्वा अवार्ड से सम्मानित

गणतंत्र दिवस के मौके पर इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन ने पूर्वी दिल्ली के पीएसके में "यह देश है वीर जवानों का" नाम से एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें पत्रकारिता जगत के कई जाने-मानें नामों समेत कला और समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम कर रहे लोगों को इम्वा अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह दूसरा मौका था जब इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन ने सांस्कृतिक कार्यक्रम और सम्मान समारोह को एक साथ आयोजित किया।

कार्यक्रम का आयोजन इम्वा के अध्यक्ष राजीव निशाना के नेतृत्व में किया गया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में उपाध्यक्ष सुरेश झा, महासचिव सकिल अहमद, सचिव संदीप सहगल और अजय सेठी, सुरेन्द्र कुमार, नारायण दास, अरुण निशाना के अलावा महत्वपूर्ण योगदान प्रदीप श्रीवास्तव का रहा जिन्होने हर तरह से अपना सहयोग दिया। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री ऑक्सर फर्नांडीस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे।

 

इस मौके पर पंजाब की जानी-मानी गायिका खुशबू, सीमा अंजुम और यंग सेंसेशन माने जाने वाले पॉप स्टर ग्रीक अमन ने अपनी गायिकी से पीएसके में मौजूद कला-संगीत प्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया। इनके अलावा प्रेम भाटिया के देशभक्ति के गानों को लोगों ने पसंद किया। लाफ्टर शो में हिस्सा ले चुके हास्य कलाकार प्रताप फौजदार ने भी अपनी अदाओं और हास्य-व्यंग के दर्शकों का जमकर मनोरंजन किया, लेकिन छोटे-छोटे स्कूली छात्र और छात्राओं की प्रस्तुतियों ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। स्कूली बच्चों ने अपनी नृत्य प्रस्तुतियां दीं और कविता पाठ किया। इतना ही नही मास्टर दिव्यांशु नें तो मंच का संचालन भी किया और लोगों को शेर सुना कर हंसने को मजबूर कर दिया

न्यूज चैनल के जिन पत्रकारों को इम्वा अवार्ड 2014 से सम्मानित किया गया उनमें देश के पहले एचडी चैनल के लिए श्री यश मेहता का नाम उल्लेखनीय है। बेस्ट क्राइम एंकर का सम्मान एबीपी न्यूज के श्रीवर्धन द्विवेदी, बेस्ट क्राइम शो का अवार्ड आजतक के कार्यक्रम वारदात और तेजी से उभरते हुए चैनल का अवार्ड इंडिया न्यूज को दिया गया। बेस्ट मीडिया कोऑर्डिनेटर का अवार्ड अमित आर्या के दिया गया।

बेस्ट चाइल्ड एंकर का अवार्ड आयुषी मेहता, बेस्ट रीजनल चैनल का अवार्ड हरियाणा न्यूज को दिया गया। उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा के दौरान बेहतरीन रिपोर्टिंग के लिए न्यूज नेशन के एंकर रमेश भट्ट और पीड़ितों के बीच सराहनीय काम करने के लिए अमर उजाला युवान के न्यूज एडिटर अर्जुन निराला और युवा पत्रकार सुरेश झा को इम्वा अवार्ड 2014 से सम्मानित किया गया। बेस्ट आरजे का अवार्ड जाने-माने आरजे राजेश पंडित को दिया गया।

अब तक 6 लाख से ज्यादा आंखों का आपरेशन करने वाले और ना जाने कितने गांवों में कैंप लगानें वाले डॉक्टर राजेन्द्र खन्ना को सामाजिक कार्य के लिए सम्मानित किया। साथ ही स्पाईन सर्जन सुदीप जैन को गरीबों के लिए 1100 कैंप लगाने पर उन्हें इम्वा अवार्ड से सम्मानित किया। गिनिज बुक में कई रिकॉर्ड बनाने वाले गिनिज रिशी को भी सम्मानित किया गया। लेखन की कला उम्र की मोहताज नही होती यह साबित कर दिखाया लक्ष्मण राव नें जो आईटीओ पर हिन्दी भवन के बाहर चाय की दुकान चलाते हैं, और अब भी पढ़ाई में लगे हैं। आज बच्चों को इनसे सीख लेनी चाहिए, इस कार्य के लिए इन्हें भी सम्मानित किया गया।

इनके अलावा टी-सीरीज के डायरेक्टर जसवंत सिंह, न्यूजपेपर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के विपिन गौड़ और योगिता सिंह को डिवोशन यंग एचीवमेंट के लिए इम्वा अवार्ड 2014 से सम्मानित किया गया। कला के क्षेत्र में चंडीगड़ के कलाकार सुरेश पुष्पाकर और पत्रकारों की अवाज कहे जाने वाले भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह को भी इस कार्यक्रम में सम्मानित किया गया।

गणतंत्र दिवस और इम्वा अवार्ड 2014 के मौके पर आयोजित सम्मान और सांकृतिक कार्यक्रम में अलग पहचान बनाने वाले और सामाजिक भजनों से संदेश देने वाले गायक कुमार विशु को भी सम्मानित किया गया। पंजाबी गायिका खुशबू को महिला युवा पंजाबी गायिका का अवार्ड दिया गया। ग्रीक अमन को उभरती गायकी के लिए सम्मानित किया गया। नई हास्य कला के जाने माने कलाकार सरदार प्रताप फौजदार को बेस्ट लाफ्टर कलाकार अवार्ड से नवाजा गया। इनके अलावा कार्यक्रम में कई जानी मानी हंस्तिया मौजूद थी।

कार्यक्रम के अन्त में राजीव निशाना ने कहा की अगले साल यह अवार्ड राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाएगा। जो पत्रकार बंधू इस साल समाज के लिए या पत्रकारिता जगत में कुछ खास करेंगे उन्हें सम्मानित किया जाएगा।

ब्लैकमेल करने वाल पत्रकार हिमांशु जैन जेल गया, महिला पत्रकार बरखा नाग फरार

मध्य प्रदेश के बालाघाट से खबर है कि रेप के एक आरोपी को ब्लैकमेल करने वाले स्थानीय पत्रकार हिमांशु जैन को जेल भेज दिया गया है. इसी मामले में महिला पत्रकार बरखा नाग फरार है. अदालत के निर्देश पर पुलिस ने बलात्कार के मामले में कथित आरोपी को ब्लैकमेल करने के मामले में एक पत्रकार को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में आज जेल भेज दिया गया. पुलिस ने बताया कि इसी मामले से जुड़ी एक महिला पत्रकार फरार है, जिसकी पुलिस तलाश कर रही है.

इस प्रकरण के बारे में पुलिस ने बताया कि व्यापारी राजा सावलानी को बलात्कार के एक मामले में ब्लैकमेल करने पर व्यापारी ने स्थानीय पत्रकार हिमांशु जैन एवं बरखा नाग पत्रकारों के खिलाफ जिला अदालत में एक परिवाद पेश किया था और इस बारे में दस्तावेजी साक्ष्य, मोबाइल कॉल डिटेल और मोबाइल पर हुई बातचीत की रिकार्डिग भी अदालत को दी थी.

इस पर न्यायालय ने दोनों पत्रकारों पर भादंवि की धारा 384, 417, 429, 120 तथा आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत प्रकरण कायम कर पुलिस को इन्हें गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करने के निर्देश दिए थे. अदालत के इसी आदेश पर पुलिस ने पत्रकार जैन को गिरफ्तार कर मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी की अदालत में पेश किया, जहां से आज उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया है, जबकि इस मामले में फरार पत्रकार बरखा नाग की पुलिस तलाश कर रही है.

IRS 2013 – Top Magazines : आईआरएस 2013 – शीर्ष पत्रिकाएं

नीचे शीर्ष भारतीय पत्रिकाओं, शीर्ष हिंदी पत्रिकाओं और शीर्ष क्षेत्रीय पत्रिकाओं के बारे में आंकड़े दिए जा रहे हैं. ये आंकड़े मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (एमयूआरसी) द्वारा जारी इंडियन रीडरशिप सर्वे पर आधारित हैं. हिंदी में नंबर वन पर प्रतियोगिता दर्पण मैग्जीन है. नंबर दो पर सरस सलिल और नंबर तीन पर इंडिया टुडे है. अंग्रेजी में नंबर एक पर इंडिया टुडे है. नंबर दो पर प्रतियोगिता दर्पण और नंबर तीन पर स्पोर्ट्स स्टार है. यह महत्वपूर्ण है कि मैग्जीन कैटगरी में न्यूज-व्यूज पर आधारित मैग्जीन की जगह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए केंद्रित मैग्जीन प्रतियोगिता दर्पण कहीं नंबर एक तो कहीं नंबर दो पर है. बाकी आप खुद देख लें…

* सभी अंक के आगे तीन शून्य 000 लगा लें.


संबंधित खबरें:

IRS 2013 Launch – Press Note Final

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष भारतीय अखबार Top Indian Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष हिंदी अखबार Top Hindi Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष अंग्रेजी अखबार Top English Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष क्षेत्रीय अखबार Top Regional Newspaper

IRS 2013 Launch – Press Note Final

January 28, 2014 : The MRUC (Media Research Users Council), a not for profit industry body along with RSCI (Research Studies Council of India) has announced the launch of its all new IRS (Indian Readership Survey). The new IRS follows a completely new methodology equipped with modern technology and is much more robust, and enhanced data quality. For the first time the entire interview has been conducted on double screen CAPI (Computer Aided Personal Interview). This is a first, globally considering the large sample size. DS CAPI has ensured top quality data collection, and effectiveness in gathering better consumer insights.

Better control over data capturing is also ensured with ‘Real Time Workforce Tracking’, through which interviewers are tracked while they are on field. DS CAPI does not allow manual data processing. Removal of manual interviews reduces interview duration to 30 minutes as against over an hour previously as a result it reduces respondent fatigue and provides better quality response. All show cards and mast heads are digitally displayed through this device. The use of DS CAPI has not only made it simpler for the interviewer to navigate through the questionnaire but, it has also become much more easier to interview female respondents, as it allows her to sit at a distance from the interviewer and respond to the questions.

The use of advanced technology has improved data quality in other IRS components like Product Linkages data, Television Report, Radio Report, DTH Report, Telecom Report and Indian Demographics. Show cards, logos of channels, radio stations etc. have also been digitized. To help our subscribers keep up with the fast growing Media Industry, IRS has added a lot of information areas in DTH, Print, Internet, Television and Radio reports. The interview length has been shortened (not more than 30 minutes each) at both Household and Individual level in order to ensure good quality data.
 
IRS 2013 update:

  • Census 2011 has been used for Universe Projection.
  • Unlike previous rounds, IRS 2013 is releasing as a single consolidated report.
  • IRS does not recommend trending or comparing IRS 2013 data with previous rounds due to the changes in methodology and questionnaire administration. However IRS 2014 onwards it would continue to deliver data on quarterly basis.
  • By incorporating district level reporting we have made the data even more useful for micro comparison leading to more accurate assessment.
  • IRS software has completely changed. The new software is called Clear Decisions. It is user friendly, and rich in features.
  • AIR (Average Issue Readership) will be the only currency used for readership numbers.

Methodology:

  • Face to Face interview, across the Country
  • All interviews conducted will be through Double Screen CAPI

The sample size is 2.35 lacs and it covers the following reporting breaks:

  • All India
  • States
  • All towns with a population of 5 Lakh and above to be reported individually
  • All towns with population of 50 Lakh and above, to be further divided into Zones.
  • All Pop-Strata
  • All Districts
  • 92 Districts independently
  • 99 District clusters

The Survey has two components:

Household Component:  Administered to the householder for household demographics, product penetration / product profile and access to different media. This is a common section which will be asked in the entire sample.

Individual Component: A randomly selected individual of 12+ years from the same household will respond to all relevant questions on Print, Other media related questions, Demographics as well as Individual Product Consumption.

Considering respondent/interviewer fatigue, and the impact on quality of data, it has been decided that only key questions are asked to all. And rest asked in two equal part- samples. These will be fused together to generate the complete database. For IRS 2013 Topline numbers, please visit MRUC website www.mruc.net

About IRS: Modelled on internationally accepted annual sample spread, the IRS is the largest continuous readership research study in the world with an annual sample size of 2.35 lakh respondents Technical Committee and Marketing Committee members have invested a lot of time and effort to ensure a truly robust new IRS. Information Areas: Apart from Print, IRS extensively captures TV, Radio, DTH, Telecom, Cinema and Internet data. Apart from Media, IRS provides subscribers wealth of information on Product linkages at both Category level and Brand Level.

Press Release


संबंधित खबरें:

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष भारतीय अखबार Top Indian Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष हिंदी अखबार Top Hindi Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष अंग्रेजी अखबार Top English Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष क्षेत्रीय अखबार Top Regional Newspaper

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष भारतीय अखबार Top Indian Newspaper

1- दैनिक जागरण 15,526,000 एआईआर
2- हिन्दुस्तान 14,245,000 एआईआर
3- भास्कर 12,855,000 एआईआर
4- मलयाला मनोरमा 8,565,000 एआईआर
5- दैनिक तांती 8,156,000 एआईआर

6- राजस्थान पत्रिका 7,665,000 एआईआर
7- टाइम्स ऑफ इंडिया 7,253,000 एआईआर
8- अमर उजाला 7,071,000 एआईआर
9- मातृभूमि 6,136,000 एआईआर
10- लोकमत 5,601,000 एआईआर

IRS 2013 Launch – Press Note Final

 


  • एआईआर का मतलब है एवरेज इश्यू रीडरशिप.
  • मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (एमयूआरसी) द्वारा इंडियन रीडरशिप सर्वे के जारी आंकड़ों पर आधारित.

 


संबंधित खबरें:

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष हिंदी अखबार Top Hindi Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष अंग्रेजी अखबार Top English Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष क्षेत्रीय अखबार Top Regional Newspaper

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष क्षेत्रीय अखबार Top Regional Newspaper

1- मलयाला मनोरमा 8,565,000

2- दैनिक तांती 8,156,000

3- मातृभूमि 6,136,000 एआईआर

4- लोकमत 5,601,000 एआईआर

5- आनंद बाजार पत्रिका 5,515,000 एआईआर

6- इनाडु 5,380,000 एआईआर

7- गुजरात समाचार 4,339,000 एआईआर

8- दिव्य भास्कर 3,770,000 एआईआर

9- संदेश 3,724,000 एआईआर

10- दैनिक सकाल 3,707,000 एआईआर

IRS 2013 Launch – Press Note Final

 


  • एआईआर का मतलब है एवरेज इश्यू रीडरशिप.
  • मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (एमयूआरसी) द्वारा इंडियन रीडरशिप सर्वे के जारी आंकड़ों पर आधारित.

 


संबंधित खबरें:

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष भारतीय अखबार Top Indian Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष हिंदी अखबार Top Hindi Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष अंग्रेजी अखबार Top English Newspaper

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष अंग्रेजी अखबार Top English Newspaper

1- टाइम्स ऑफ इंडिया 7,253,000 एआईआर 

2- हिंदुस्तान टाइम्स 4,335,000 एआईआर

3- द हिंदू 1,473,000 एआईआर

4- मुंबई मिरर 1,084,000 एआईआर

5- द टेलिग्राफ 937,000 एआईआर

6- द इकॉनमिक्स टाइम्स 722,000 एआईआर

7- मिड डे 500,000 एआईआर

8- डेक्कन हेराल्ड 458,000 एआईआर

9- द ट्रिब्यून 453,000 एआईआर

10- डेक्कन क्रॉनिकल 337,000 एआईआर

IRS 2013 Launch – Press Note Final

 


  • एआईआर का मतलब है एवरेज इश्यू रीडरशिप.
  • मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (एमयूआरसी) द्वारा इंडियन रीडरशिप सर्वे के जारी आंकड़ों पर आधारित.

 


संबंधित खबरें:

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष भारतीय अखबार Top Indian Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष हिंदी अखबार Top Hindi Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष क्षेत्रीय अखबार Top Regional Newspaper

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष हिंदी अखबार Top Hindi Newspaper

1- दैनिक जागरण 15,526,000 एआईआर

2- हिन्दुस्तान 14,245,000 एआईआर

3- भास्कर 12,855,000 एआईआर 

4- राजस्थान पत्रिका 7,665,000 एआईआर

5- अमर उजाला 7,071,000 एआईआर 

6- पत्रिका 4,628,000 एआईआर

7- हरिभूमि 2,757,000 एआईआर

8- प्रभात खबर 2,718,000 एआईआर 

9- नवभारत टाइम्स 2,291,000 एआईआर 

10- पंजाब केसरी 2,480,000 एआईआर


  • एआईआर का मतलब है एवरेज इश्यू रीडरशिप.
  • मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (एमयूआरसी) द्वारा इंडियन रीडरशिप सर्वे के जारी आंकड़ों पर आधारित.

 


संबंधित खबरें:

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष भारतीय अखबार Top Indian Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष अंग्रेजी अखबार Top English Newspaper

xxx

आईआरएस 2013 IRS 2013 : शीर्ष क्षेत्रीय अखबार Top Regional Newspaper

दूरदर्शन को लखनऊ और पीटीआई को कई शहरों में चाहिए मीडियाकर्मी, करें आवेदन

दूरदर्शन केंद्र, लखनऊ के समाचार विभाग के लिए मीडियाकर्मियों की जरूरत है. कॉपी एडिटर, एंकर सह संवाददात, संवाददाता, ट्रेनी पैकेजिंग, नॉन लीनियर विडियो एडिटर, ब्रॉडकास्ट एग्जिक्यूटिव, लाइब्रेरी असिस्टेंट, जूनियर असाइनमेंट को-ऑर्डिनेटर जैसे पदों के लिए कान्ट्रैक्ट पर नियुक्तियां की जाएंगी. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार ''उप निदेशक (प्रशासन), दूरदर्शन केंद्र लखनऊ – 226001'' के पते पर 7 फरवरी, 2014 तक आवेदन कर सकते हैं.

किस पद के लिए कितनी योग्यता चाहिए, कितना अनुभव चाहिए, कितनी सेलरी मिलेगी, कुल कितने पद हैं और किस ग्रेड के हैं, आवेदन किस तरह करें… इस सबके बारे में विस्तार से जानकारी दूरदर्शन केंद्र लखनऊ की वेबसाइट पर है. आप ddlucknow.com पर जाएं, फार्म डाउनलोड करें, डिटेल देखें और आवेदन कर दें.

न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया यानि पीटीआई में अंग्रेजी पत्रकारों के लिए काफी वैकेंसी है. नई दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बंगलुरू और अहमदाबाद के लिए मुख्य संवाददाता (प्रिंसिपल कॉरेसपॉन्डेंट्स) चाहिए. योग्यता है मुख्यधारा के अंग्रेजी मीडिया के लिए रिपोर्टिंग में न्यूनतम आठ साल का अनुभव. आयुसीमा 35 वर्ष. वरिष्ठ उप संपादक (सीनियर कॉपी एडिटर्स) की पोस्ट नई दिल्ली, चेन्नई और मुंबई में खाली है. मुख्यधारा के अंग्रेजी मीडिया में एडिटिंग और न्यूज डेस्क पर काम का न्यूनतम 6 साल का अनुभव चाहिए और आयुसीमा 30 वर्ष है.

दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में मुख्य उप संपादक यानि प्रिंसिपल कॉपी एडिटर्स की जरूरत है. मुख्यधारा के अंग्रेजी मीडिया के लिए एडिटिंग में न्यूनतम आठ साल का अनुभव होना चाहिए. आयुसीमा 35 वर्ष.  प्रोबेशनरी जर्नलिस्ट दिल्ली के लिए चाहिए. इसके लिए योग्यता है पत्रकारिता में 50 फीसदी अंकों के साथ डिग्री या डिप्लोमा. साथ ही मुख्यधारा की पत्रकारिता में न्यूनतम दो साल का अनुभव. आयुसीमा 27 वर्ष. ट्रेनी जर्नलिस्ट दिल्ली के लिए चाहिए. इसके लिए योग्यता है पत्रकारिता में डिग्री / डिप्लोमा न्यूनतम 50 फीसदी अंकों के साथ. आयुसीमा 25 वर्ष. प्रोबेशनरी और ट्रेनी जर्नलिस्ट के लिए लिखित परीक्षा होगी.

सभी पदों के लिए अप्लीकेशन पीटीआई की वेबसाइट ptinews.com पर जाकर डाउनलोड किया जा सकता है. जिस पद के लिए आवेदन करना हो, उसका जिक्र करते हुए सभी आवेदन hrm@pti.in पर मेल करें. आखिरी तारीख है सात फरवरी 2014. डाक के जरिए भी आवेदन कर सकते हैं. पता है.

सीनियर मैनेजर
पीटीआई बिल्डिंग
4, पार्लियामेंट स्ट्रीट
नई दिल्ली – 110001
 

राहुल गांधी ने कैंब्रिज की अपनी एमफिल डिग्री फर्जी होने का तथ्य के साथ खंडन किया

Sheetal P Singh : इस मशहूर साक्षात्कार में एक बात राहुल गांधी ने मेरे हिसाब से score की और मेरी ज़िम्मेदारी बनती है कि उसे दर्ज किया जाय, क्योंकि मैंने राहुल की आलोचना भी की है। राहुल ने कैम्ब्रिज की अपनी M Phil की डिग्री के फ़र्ज़ी होने का तथ्य के साथ खंडन किया, सुब्रमण्यम स्वामी का पुराना आरोप है कि यह डिग्री जाली है।

Mukesh Kumar : राहुल गाँधी ने अपने पहले इंटरव्यू में इतनी बार सिस्टम को कोसा और व्यवस्था बदलने की बात कही कि किसी को भी ये भ्रम हो सकता है कि अगर उनका बस चले तो काँग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी या किसी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो जाएंगे। व्यवस्था परिवर्तन के नारे का पेटेंट अभी उन्हीं के पास है। लेकिन ये सचाई नहीं है। ये छद्म क्रांतिकारिता या पप्पू विद्रोह उनके खुद के भ्रमों का नतीजा है। वे समझ नहीं पाए हैं कि उनकी पार्टी और सरकार व्यवस्था को कायम रखने वाले सबसे बड़े औज़ार हैं। बीजेपी की तरह वे अतीतवादी भले न हों मगर उनके यथास्थितिवादी होने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। अगर वे सचमुच में व्यवस्था परिवर्तन को लेकर ईमानदार हैं तो सबसे पहले उन्हें उन आर्थिक नीतियों को पलटना चाहिए जो देश का बेड़ा गर्क कर रही हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

चंडीगढ़ से शुरू हुआ नया अखबार ‘प्रखर भारत’

चंडीगढ़ से एक नए अखबार 'प्रखर भारत' की शुरुवात हुई है। फिलहाल यह अखबार साप्ताहिक छपेगा। इस अखबार के संस्थापक दिवाकर चौधरी के अनुसार आने वाले समय में इस अखबार को डेली बनाया जाएगा। यह अखबार फिलहाल राष्ट्रीय खबरों के साथ-साथ चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश की खबरों को कवर करेगा. मैनेजमेंट ने अभी मार्केट में 20 पेज का अखबार लांच किया है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

नीतीश सरकार ने पत्रकारों के लिए बीमा योजना को मंजूरी दी

पटना : बिहार की नीतीश सरकार ने पत्रकारों के लिए बीमा योजना को आज मंजूरी प्रदान कर दी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में आज संपन्न राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक के दौरान मंत्रिपरिषद ने बिहार राज्य पत्रकार बीमा योजना 2014 के स्वरुप एवं उसमें अंतर्निहित शर्तो को लागू किए जाने को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी.

इस योजना के तहत दुर्घटना जोखिम के साथ पत्रकारों के स्वास्थ्य का इलाज भी शामिल हैं. मंत्रिपरिषद ने 19 राज्य उच्च पथ एवं वृहद जिला पथों का उन्नयन और निर्माण कार्या के लिए 541.85 करोड रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान कर दी है.

मंत्रिपरिषद ने अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों एवं लोकायुक्तों को पारस्परिकता के अधार पर राज्य अतिथि घोषित किए जाने को भी मंजूरी प्रदान कर दी है. बिहार राज्य मंत्रिपरिषद ने स्वास्थ्य, वन एवं पर्यावरण, शिक्षा और पंचायती राज सहित कुल 17 विषयों से जुडे प्रस्तावों को आज अपनी मंजूरी प्रदान की.

दिल्ली पुलिस का हाल बता रही हैं एबीपी न्यूज की पत्रकार पवन रेखा

धन्यवाद दीजिए अरविंद केजरीवाल और उनके लोगों को जिन्होंने दिल्ली पुलिस और नेताओं के बीच अपवित्र सांठगांठ का पर्दाफाश कर उन काले कारनामों पर सवाल उठाया जो पुलिस संरक्षण में संचालित किया जाता है. दिल्ली में सारे अवैध काम, अनैतिक काम पुलिस संरक्षण में किया जाता है. सब कुछ तय है. महीना बंधा हुआ है. नेता का, पुलिस का, सिस्टम का, सत्ता का. आम जनता मरे तो मरे. भुगते तो भुगते.

घटना हो जाने पर नेता और पुलिस वाले घड़ियाली आंसू और फर्जी तत्परता दिखा दाते हैं. उसके बाद फिर सब कुछ पहले जैसा. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस से पंगा लेकर और नंगा करके एक बड़ा काम ये किया है कि दिल्ली पुलिस को दबाव में ले आए हैं. आम आदमी पार्टी वालों ने दिल्ली पुलिस के जवानों द्वारा एक निर्दोष युवक की पिटाई का वीडियो जारी कर दिल्ली पुलिस के असली चेहरे का खुलासा किया. अब एबीपी न्यूज की पत्रकार पवन रेखा दिखा रही हैं दिल्ली पुलिस का एक और कपटी, अनैतिक और जनविरोधी चेहरा.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


ड्रग्स और शराब चलेगा क्या कर लोगी?

-पवन रेखा-

एबीपी न्यूज़

नई दिल्ली: अब छेड़खानी और रेप की खबरें सुननी आम बात सी हो गई है. एक दिन पहले की ही बात है जब एक लड़की के दोस्तों ने ही रेप करके उन्हें कार से बाहर फेंक दिया. ऐसी तो बहुत सारी खबरें सुनने को मिलती हैं लेकिन यह घटना गणतंत्र दिवस के दिन हुई. सुरक्षा चाकचौबंद थी. पुलिस ने तो कुछ ऐसा ही दावा किया था लेकिन फिर ऐसी घटना कैसे हो गई?  कहीं ना कहीं यह पुलिस की नाकामी का ही नतीजा है.

कभी-कभी अनायास ही मन में सवाल आते हैं कि क्या अपराधियों को कानून का डर क्यों नहीं? क्या उन्हें इस बात का खौफ नहीं कि एक अपराध से उनकी पुरी जिंदगी बर्बाद हो सकती है? लेकिन जिस तरह से इस क्राइम का ग्राफ ऊपर जा रहा है उससे तो यही लगता है कि लोगों में कानून और पुलिस प्रशासन का डर है ही नहीं. डर नहीं होने का कारण भी पुलिस ही है. उनकी हरकतें, अपने काम के प्रति उनकी लापरवाही, किसी भी शिकायत को गंभीरता से ना लेना और फिर सुन भी ली तो एक्शन लेने की जरूरत तो उन्हें लगती नहीं. अब जब पुलिस ही ऐसा करेगी तो लोग डरेंगे भी क्यों?

खुद के साथ भी बड़ा ही कड़वा अनुभव रहा है. 26 जनवरी के रात की बात है. कुछ ब्लैक शराब बेचने वालों से हमारी झड़प हो गई. यहां से पुलिस स्टेशन तो लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर है लेकिन शराब और ड्रग्स का धंधा हमेशा ही चलता रहता है. सुबह से लेकर शाम हो गई यह देखते-देखते की इनका यह ड्रामा कब खत्म होगा. देखना इसलिए पड़ रहा था कि यह सब हमारे फ्लैट के आस-पास ही हो रहा था. पिछले 2 साल से देख रहे हैं ऐसा होते हुए. जब हमें ज्यादा परेशानी होती है तो बोल देते हैं कि यहां से कहीं और जाकर यह सब काम करो. कुछ लोग है जो कि चुपचाप चले जाते हैं कुछ लोग है जो हमें यह बताने लगते हैं कि हम यहां के नहीं है तो हमें इन सब पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए और ऐसी हरकतों को इग्नोर करना चाहिए. कुछ हद तक हम लोग इग्नोर करते भी है. पुलिस स्टेशन के पास रहने वाले लोगों को इस बात का डर नहीं है कि वे इस तरह का काम क्यों कर रहे हैं तो हम क्या कर सकते हैं. हालांकि हम लोग कई बार इस बात की जानकारी पुलिस को दे चुके हैं.

शाम के 7-8 बज रहे थे. हमने गेट खोला तो सामने यह सब चल रहा था. जब उनसे यह कहा कि प्लीज आप लोग यहां से कहीं और चले जाइए तो उनका कहना था कि रेंट पे रहते हो तो मत बोलो, तुम्हारा घर होता तो कोई और बात होती. हमने कहा- यहां लड़कियां रहती हैं आप लोग यहां से कहीं और जाओ नहीं तो हम लोग पुलिस को कंप्लेन करेंगे. उसका कहना था कि पुलिस क्या कर लेगी? हमने कहां बहुत कुछ कर लेगी चुपचाप जाओ यहां से. उनका कहना था- नहीं जा रहे क्या कर लोगे?

हमने फिर पुलिस को फोन किया.. सोचा दिल्ली पुलिस है कम से कम आज के दिन तो लापरवाही नहीं बरतेगी. समय से पहुंच ही जाएगी. वे लोग हमें डराने की कोशिश में हमारे गेट तक आ गए. बस अब तो बर्दाश्त के बाहर था.. ना चाहते हुए भी घर से बाहर आकर उनसे लड़ने में हम भी लग गए कि तब तक तो पुलिस पहुंच ही जाएगी. लेकिन शायद हम गलत थे. यहां पुलिस क्राइम होने के बाद ही पहुंचती है तो इतिहास रहा है फिर हमारे साथ ऐसा क्यों नहीं होता?

वे लोग बात लड़ाई से बढ़ाते-बढ़ाते हाथापाईं तक ले आए…शायद उनकी मंशा कुछ और ही रही होगी. उन्हें लगा कि लड़कियां है डर जाएंगी.. डर तो जरूर जाती ..लेकिन शायद आदत नहीं रही डरने की,.. किसी से भी.. आश्चर्य की बात ये थी कि जो आस पास के लोग थे वे तमाशबीन की तरह देख रहे थे और शायद मजे भी ले रहे होंगे.

मैं और मेरी रूमी संगीता… जब हम आगे बढ़ने लगे तब वे लोग डरे और भगे वहां से यह कहते हुए कि आगे गली में आ जाओ फिर तुम्हें बताते हैं..अब कोई ऐसी बात बोलता है तो सच कहूं तो बर्दाश्त नहीं होता. बचपन से कभी आदत नहीं रही किसी की भी ऐसी बातें सुनने की. यहां तक कि घर में पैरंट्स ने तो हमेशा से ही सिखाया है कि जब अपनी गलती ना हो और कोई तुम्हें बेवजब परेशान करने की कोशिश करें तो उनसे लड़ो..जरूरत पड़े तो हाथ-लात घूसे देके आओ…लेकिन डरना किसी से नहीं और कभी भी नहीं. खैर,

…उस गुस्से में तो यही लग रहा था कि अब जाकर भी देख लेते हैं गलियों में कि वे लोग क्या करते है.. गए भी लेकिन वे लोग भाग पराए. कुछ ही सकेंड में सब अपने अपने घऱों में छिप गए. पास के ही थे बस मौके का फायदा उठाकर ऐसा कर रहे थे क्योंकि उन्हें इस बात की पहले से खबर थी कि हमारे लैंडलार्ड इस समय कुछ दिनों के लिए दिल्ली में नहीं है.

…लगभग 15 मिनट बाद पेट्रोलिंग वाले का फोन आया कि हां जी क्या बात है…और आप लोगों का एड्रेस हमें नहीं मिल रहा है. बहुत आश्चर्य हुआ यह सुनकर क्योंकि पुलिस स्टेशन हमारे फ्लैट से बस आधा किलोमीटर की दूरी पर है… और उन्हें अपने एरिया में कौन सा एड्रेस कहां पर है यह भी नहीं पता..चलो जी कोई बात नहीं… लोकेशन बताया..फिर आए..परेशानी सुनी..फिर कहा- मामला शांत हो गया, अब हमारे एसआई साहब आएंगे उन्हें लिखित एप्लिकेशन दे दीजिएगा आप लोग.

वैसे ये कंप्लेन हम पहली बार नहीं कर रहे थे..इससे पहले भी हम यह लिखित कंप्लने कर चुके थे कि यहां पर शराब, ड्रग्स जैसी चीजें खुलेआम बेची जाती है. हमें बेचने से क्यों परेशानी होगी जब पुलिस ही कुछ नहीं करती. परेशानी बस इस बात से है कि यह सब हमारे रेसिडेंस के आस पास ही होता है. कई दोस्तों ने यह भी सलाह दी कि अपना रूम ही बदल लो… यह समस्या का समाधान तो नहीं. कब तक भागते रहेंगे ऐसे लोगों से? अपने परेशानियों से? और यहां यह यह परेशानी है कहीं और जाएंगे तो कुछ और होगी. तो जरूरत है इसके खिलाफ लड़ने की ना कि उनसे भागने की. इसलिए घर बदलने के बारे में कभी सोचा ही नहीं.

फिर हम इंतजार करने लगे कि पुलिस कितनी देर में आती है. लगभग आधे घंटे बाद आ गई पुलिस. झगडे की वजह पूछी, हमें उस इंसान के बारे में पता चल गया था जिसने इस झगड़े की शुरूआत की थी. हमने घर बताया पुलिस वहां पहुंच तो गई लेकिन वैसा ही हुआ जैसा बहुत पहले से होता आया है. वह घर से गायब था.. उसके घर की औरते पुलिसवालों से ही उलझ गईं. बजाय हमारी प्राब्लम औऱ उस आदमी को ढ़ुढ़ने के पुलिस उन्हें चुप कराने में लग गई.

सब के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि हमें कई सारे नंबर दे दिए कि जब भी ऐसा कुछ लगे तो हम उन्हें इन्फार्म कर दें. फिर वे आएंगे और ऐसी हरकतें करने वाले लोगों को अरेस्ट करेंगे. वाह रे पुलिस.

बहुत ही आश्चर्य हुआ कि अगर हमारे साथ कुछ और अनहोनी हो जाती तो पुलिस को बार-बार फोन करके घर का रास्ते कौन बताता? वे लोग हमसे मारपीट करके अगर भाग जाते तो पुलिस उन्हें कैसे गिरफ्तार कर पाती? वैसे ये मारपीट से कम नहीं थी.. अकेली लड़कियों को देखकर उनके घर में घुसने की कोशिश करना… उनसे लड़ना और फिर हाथापाई करना यह किसी अपराध से कम नहीं है. ऐसे में इतना तो हमें भी पता है कि पुलिस को क्या करना चाहिए. खासकर तब जब उनके  सामने बीसों गवाह मौजूद हैं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

कुछ लोगों का कहना था कि पुलिस को यह बताओ कि तुम लोग मीडिया में काम करते हो.. अगर एक्शन नहीं लिया तो अच्छा नहीं होगा. लेकिन हम यह चाहते थे कि अगर कोई एक्शन पुलिसवाले लें तो हमारे पोजिशन की वजह से नहीं बल्कि एक आम लड़की की तरह जो कोई भी हो सकती है. इसलिए हमने इस बात को नजरअंदाज किया.

यह तो पहले से पता था कि दिल्ली पुलिस कितनी अलर्ट रहती है लड़कियों की सुरक्षा को लेकर… लेकिन इस घटना ने यह मिसाल भी दे दी कि चाहें कुछ भी हो पुलिस अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगी. एक पल के लिए ऐसा लगा कि अगर यहां रहना है तो खुद को इस काबिल बना ले कि सारे मुसीबतों से खुद ही निबट ले. पुलिस तो बस दिखावा करने के लिए है. सोचने वाली बात है कि पुलिस स्टेशन के बगल के लोकेशन पर पुलिस अगर आधे घंटे में पहुंचती है तो बाकी जगहों का क्या होगा? अपराधी तो अपने आराम से जो भी करना चाहे कर के निकल ले क्योंकि उन्हें भी पता ही है कि पुलिस कब तक पहुंचेगी.

लेकिन इन सब हालातों से गुजरने के बाद एक बहुत बड़ा सवाल है…कल मौका देखकर हमारे साथ लड़ने की कोशिश की.. दूसरे दिन कुछ औऱ प्लान करेंगे… अगर हमारे साथ कुछ अनहोनी हो गई तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? किसी ने हमारे साथ कुछ बुरा कर दिया तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

‘राष्ट्रीय उजाला’ से सुबोध, अजीत समेत कई का इस्तीफा

खबर है कि नोएडा से प्रकाशित हिंदी दैनिक राष्ट्रीय उजाला अखबार से पिछले दो महीने के अंदर आधा दर्जन से अधिक उच्च पदों पर आसीन लोगों ने इस्तीफा देकर प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर दिया है. खबर है कि कई जिलों के प्रभारियों ने भी अखबार को छोड़ दिया है. इससे अखबार की वित्तीय हालत डगमगा गई है. राष्ट्रीय उजाला से कार्यकारी संपादक सुबोध कुमार ने दीपावली के दिन इस्तीफा दिया था.

बताया जाता है कि सुबोध ने मैनेजमेंट की पालिसी से नाराज़ होकर इस्तीफा दिया. सुबोध कुमार के जाते ही कंपनी के जनरल मैनेजर अजीत कुमार पाण्डेय ने भी इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद आधा दर्जन से अधिक जिलों के प्रभारियों ने भी इस्तीफ़ा देकर अखबार लेना बंद कर दिया. बताया जाता है कि मार्केटिंग टीम की हेड हिमानी चौहान और एडिटोरियल टीम की हेड वंदना यादव ने भी इस्तीफ़ा दे दिया है.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर आपके पास उपरोक्त कोई नई या संशोधित सूचना है तो भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

सेबी को बिना पूरा कागज दिए विदेश नहीं जा सकते सुब्रत राय : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट से सहारा को नहीं मिली राहत… सहारा के चीफ सुब्रत रॉय की विदेश जाने की अर्जी आज सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी… देश की सर्वोच्च अदालत ने सहारा को अपने बैंक स्टेटमेंट और निवेशकों से जुड़ी जानकारी जमा करने को कहा है… मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी को होगी… सुप्रीम कोर्ट ने निवेशकों का धन लौटाने संबंधी विवाद में सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय को विदेश जाने की इजाजत मंगलवार को भी नहीं दी… न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस केहर की खंडपीठ ने कहा कि सहारा प्रमुख तब तक देश छोड़कर नहीं जा पाएंगे जब तक वह भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (सेबी) को आवश्यक और मूल दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा देते…

न्यायमूर्ति राधाकृष्णन ने कहा, हम सहारा प्रमुख को देश से बाहर जाने की इजाजत तभी दे सकते हैं जब वह सेबी द्वारा मांगी गई जानकारियां उपलब्ध करा देते हैं.  सहारा प्रमुख ने व्यावसायिक कारणों से विदेश जाने की कोर्ट से अनुमति मांगी थी. कोर्ट ने इससे पहले भी कहा था कि वह प्रथम दृष्ट्या इस बात से संतुष्ट हैं कि सहारा समूह ने उसके गत 28 अक्टूबर के आदेश का अक्षरश: पालन नहीं किया है. इसलिए सहारा प्रमुख और कंपनी के दो अन्य निदेशक देश छोड़कर जाने की अनुमति नहीं होगी. जब तक उसके संबंधित आदेश पर अमल नहीं हो जाता, तब तक कंपनी अपनी कोई सम्पत्ति नहीं बेच सकेगी.

कोर्ट ने सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रीयल इस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड और सहारा इंडिया हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन लि. द्वारा वसूली गई राशि निवेशकों को नहीं लौटाने पर समूह को आडे हाथों लेते हुए 20 हजार करोड़ रूपए की सम्पत्ति के मूल दस्तावेज सेबी को सौंपने का गत 28 अक्टूबर को निर्देश दिया था. सेबी की दलील थी कि सहारा समूह ने अपनी परिसम्पत्तियों का तो बढ़ा-चढ़ाकर मूल्यांकन किया ही है, उसने जायदाद से संबंधित मूल दस्तावेज भी उसे जमा नहीं कराए हैं. सेबी का कहना था कि सहारा समूह ने जायदातों के दस्तावेज की फोटोस्टेट कॉपी ही उपलब्ध कराई है और वह भी अधूरी. सेबी ने निवेशकों का धन लौटाने के आदेश पर अमल नहीं करने को लेकर अदालत की अवमानना का मामला शीर्ष अदालत में दायर किया है.

इसे भी पढ़ें:

सुब्रत राय ने तो सुप्रीम कोर्ट-सेबी की सरेआम ऐसी-तैसी कर दी! (देखें वीडियो)

पत्रकारिता और जनवादी आंदोलनों से जुड़े राघवेन्द्र पर सपा सरकार के इशारे पर हमला

लखनऊ/प्रतापगढ़ : रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा है कि वरिष्ठ पत्रकार एवं अल्पसंख्यक समेत हाशिए पर रह रहे लोगों की आवाज मजबूती से उठाने वाले जन आंदोलनों के नेता राघवेन्द्र प्रताप सिंह के फतेहपुर स्थित पैत्रिक आवास पर हमला सपा सरकार के इशारे पर किया गया। उन्होंने कहा कि दबंग सुनील यादव एवं उसके सैकड़ो हथियार बंद समर्थकों द्वारा बीते इक्कीस जनवरी को दिन-दहाड़े ताबड़तोड़ हमले के एक सप्ताह से ज्यादा बीत जाने के बाद भी, जनपद पुलिस प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाई न किये जाने से आरोपियों के हौसले बुलंद है।

वे लगातार घूम-घूम कर राघवेन्द्र प्रताप सिंह को परिवार समेत जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, जिससे दहशत जदा परिवार घर से पलायन को मजबूर हो रहा है। मोहम्मद शुऐब ने कहा कि राघवेन्द्र प्रताप सिंह लंबे अरसे से पत्रकारिता एवं जनवादी आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। चूंकि जेल में बंद बेगुनाहों की रिहाई के सवाल को अपने लेखन एवं जन आंदोलनों द्वारा समय समय पर उठाते रहे हैं, जिससे वो संघी ताकतों के निशाने पर भी हमेंशा रहे हैं। उनके परिवार पर हुए इस ताजे हमले के बाद यह साफ हो चुका है कि पूरे प्रदेश में कानून के राज की जगह जंगल राज कायम हो चला है। उन्होंने कहा कि पुलिस जिस तरह से मामले की लीपा पोती में जुटी है उससे यह साफ हो चला है कि वह स्थानीय सपा नेताओं के दबाव में है। ऐसे में जरूरी है कि उन्हे और उनके परिवार को सुरक्षा उपलब्ध कराते हुए आरोपियों के खिलाफ कठोर कार्यवायी सुनिश्चित की जाय ताकि भविष्य में किसी अन्य अप्रिय घटना को रोका जा सके।

रिहाई मंच के नेता हरे राम मिश्र ने कहा है कि जनपद के अंतू थाना क्षेत्र के गोपालपुर गांव में जिस तरह से अवैध रूप से चलने वाली आरा मशीन की शिकायत अधिकारियों से करने वाले दो अल्पसंख्यक नौजवानों इफ्तेखार और अनीस को सरेआम दबंगों ने काट डाला, वह यह साबित करता है कि प्रदेश की सपा सरकार कानून और व्यवस्था सहित सारे मोर्चे पर फेल हो चुकी है। सरकारी कर्मचारी केवल अवैध वसूली में व्यस्त हैं। अगर पहले ही शिकायत पर वन विभाग चेत गया होता तो शायद इन नौजवानों को अपनी जान से हाथ नही धोना पड़ता। उन्होंने इलाके में चल रही सभी आरा मशीनों के लाइसेंस की जांच की मांग की।

हरे राम मिश्र ने कहा कि आज चारों ओर प्रदेश में अराजकता का माहौल हैं टोल बूथों पर आये दिन सपा के नेताओं द्वारा जिस तरह से मार पीट की जा रही है उससे यह साबित हो चला है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का अपने नेताओं पर कोई कन्ट्रोल नही रह गया है। उन्होंने मांग की कि प्रतापगढ़ में घटी इस घटना की प्रदेश सरकार सीबीआई जांच करवाए ताकि इस दोहरे हत्याकांड में वन विभाग के कर्मियों की भूमिका भी सामने आ सके। हरे राम मिश्र ने कहा कि मृतकों के आश्रितों को 25-25 लाख का मुवाबजा दिया जाय तथा दोषियों पर कठोरतम कार्यवाई की जाय।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
राजीव यादव
प्रवक्ता
रिहाई मंच

Senior journalist Amin Qureshi has been appointed as…

Senior journalist Amin Qureshi has been appointed as an inspecting authority in Maulana Azad education foundation by the central minister of minority affairs Mr K. Rehman Khan. The Maulana Azad Education Foundation , an autonomous body under the Ministry of Minority Affairs, Govt. of India working for the educational upliftment of educational backward Minority.

अमीन कुरेशी की नियुक्ति : अल्पसंख्यक मामलों के केन्द्रीय मंत्री के. रहमान खान ने वरिष्ठ पत्रकार अमीन कुरेशी को मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन में इंस्पेक्टिंग अथॉरिटी के रूप में नियुक्त किया है. मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधीन काम करने वाली ऑटोनोमस बॉडी है. यह बॉडी शिक्षा में पिछड़े अल्पसंख्यकों में शिक्षा के प्रसार का काम करती है. श्री कुरेशी ने इंस्पेक्टिंग अथॉरिटी के रूप में मनोनयन पर श्री खान का आभार प्रकट किया है. मित्रों, पत्रकारों और संगठनों ने श्री कुरेशी को बधाई दी है. श्री कुरैशी नवभारत टाइम्स मुम्बई में प्रमुख संवाददाता रहे है.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.

राज्यसभा के लिए आज नामांकन दाखिल करने वाले हरिवंश के बारे में कुछ बातें

बिहार से राज्यसभा चुनाव के लिए जनता दल (यू) की तरफ से आज जाने-माने पत्रकार हरिवंश ने नामांकन पत्र दाखिल किया. आज नामांकन करने का आखिरी दिन था. बिहार विधान सभा के सचिव कार्यालय कक्ष में वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने नामजदगी का पर्चा दाखिल किया. इस मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जद (यू) के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह समेत नीतीश मंत्रिमंडल के कई सदस्य और विधायक मौजूद थे.

जद (यू) ने इस बार अपने निवर्तमान राज्यसभा सदस्य शिवानंद तिवारी, एनके सिंह और साबिर अली को दोबारा राज्यसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया है. बिहार से जदयू के राज्यसभा सदस्य शिवानंद तिवारी, एन के सिंह और साबिर अली, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के डा.सी.पी. ठाकुर तथा राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रेमचंद गुप्ता का कार्यकाल इस वर्ष नौ अप्रैल को समाप्त हो रहा है.

इन सीटों के लिए सात फरवरी को वोट डाले जायेंगे. भाजपा की ओर से कल पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. सी.पी. ठाकुर और वरिष्ठ नेता आर.के. सिन्हा ने अपना नामजदगी का पर्चा दाखिल किया था. आज जदयू की तरफ से हरिवंश के अलावा रामनाथ ठाकुर, कहकशां परवीन ने भी पर्चा दाखिल किया. रामनाथ ठाकुर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के पुत्र हैं तथा राज्य में मंत्री भी रह चुके हैं. कहकशां परवीन बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रह चुकी हैं. 

वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश देश के जाने-माने जर्नलिस्ट हैं. बिहार और झारखंड के लीडिंग हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनके नेतृत्व में प्रभात खबर ने अपने इलाके में नंबर वन अखबार का स्थान हासिल किया. इसकी वजह प्रभात खबर के कंटेंट को जनपक्षधर, सरोकारी और तेवरदार बनाए रखना है. हरिवंश सिताबदियारा (जयप्रकाश जी के गांव) के रहनेवाले हैं. 30 जून, 1956 को जन्मे हरिवंश के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों में नाम, हरिबंश नारायण सिंह है. क्योंकि प्राइमरी स्कूल के आरंभिक कागजातों में अभिभावकों ने यही दर्ज कराया था. पर 1974 के जयप्रकाश आंदोलन के प्रभाव में इन्होंने जनेऊ भी छोड़ा और अपना नाम सिर्फ हरिवंश लिखना शुरू किया.

गांधी, जेपी, लोहिया और सर्वोदय की विचारधारा से प्रभावित छात्र राजनीति में भी वह सक्रिय रहे. शायद इसी कारण उनके संपादन में निकलने वाले अखबार प्रभात खबर में बिहार जद (यू) द्वारा उन्हें राज्यसभा प्रत्याशी बनाने पर उनकी तस्वीर छपी. हरिवंश ने बनारस से पढ़ाई की. अर्थशास्त्र में एमए (बीएचयू) किया. मार्च, 1976-1977 के बीच उन्होंने बीएचयू से ही पत्रकारिता में डिप्लोमा डिग्री ली. फरवरी, 1977 में वह टाइम्स आफ इंडिया  समूह में प्रशिक्षु पत्रकार (हिंदी) चुने गये. प्रशिक्षण के बाद धर्मयुग  (मुंबई) में डा. धर्मवीर भारती के साथ उप संपादक के रूप में काम किया. मुंबई से मन उचटने के कारण कुछ वर्षो बाद, 1981 में बैंक आफ इंडिया  में अधिकारी के रूप में वह गये. इसी दौर में उन्हें रिजर्व बैंक में भी अधिकारी की नौकरी मिली. पर बैंक की नौकरी छोड़ कर वह पुन: पत्रकारिता में लौट आये.

कोलकाता रविवार में सहायक संपादक के रूप में. पांच वर्षो से अधिक समय तक काम करने के बाद उन्हें लगा कि महानगरों की पत्रकारिता से हट कर ग्रासरूट की पत्रकारिता का अनुभव होना चाहिए. अक्तूबर, 1989 में वह नितांत अपरिचित जगह रांची, प्रभात खबर  आये. तब प्रभात खबर  की प्रसार संख्या लगभग चार सौ प्रतियां प्रतिदिन थी और यह सिर्फ रांची से छपता था. आज प्रभात खबर,  झारखंड, बिहार और बंगाल समेत कुल दस जगहों से प्रकाशित होता है. वर्तमान में इसकी पाठक संख्या इंडियन रीडरशीप सर्वे के अनुसार रोजाना 89.26 लाख है. हर दिन आठ लाख से अधिक प्रतियां छपती हैं. एक जगह, रांची से शुरू होकर यह अखबार अब तीन राज्यों (बिहार, झारखंड और बंगाल) के दस जगहों (रांची, जमशेदपुर, धनबाद, देवघर, पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, गया, कोलकाता एवं सिलीगुड़ी) से छप रहा है. प्रभात खबर  को यहां तक लाने वाली जो अग्रणी टीम रही है, उसमें हरिवंश भी रहे हैं. जब श्री चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने, तो उस समय हरिवंश प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव (एडिशनल इनफारमेशन एडवाइजर) के रूप में गये. फिर प्रभात खबर  में ही लौटे. हरिवंश को कई मशहूर पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं. लगभग बीस महत्वपूर्ण सरकारी और गैर सरकारी समितियों के सदस्य या बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में वह रहे हैं.

हरिवंश ने मार्च, 1977 में टाइम्स आफ इंडिया  समूह (मुंबई) में काम शुरू किया. फिर कुछेक वर्ष बाद बैंक आफ इंडिया  में काम किया. फिर आनंद बाजार पत्रिका समूह (कोलकाता) में रहे. इसके बाद प्रभात खबर , रांची आये. चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने पर वह प्रधानमंत्री कार्यालय (दिल्ली) गये. फिर प्रभात खबर  में ही लौटे. इस तरह वह मार्च, 1977 से 2014 के आरंभ तक यानी लगभग 37 वर्षो तक नौकरी में रहे. कई संस्थानों में. कई जगहों पर. यूपी से पढ़ाई. मुंबई (महाराष्ट्र) में नौकरी. फिर हैदराबाद (आंध्र) में. पुन: बिहार में. फिर कोलकाता (बंगाल) में. पत्रकारिता में. फिर 1990 से रांची. पुन: दिल्ली. फिर रांची वापसी. प्रभात खबर  में वह लगभग 65 लाख  के सालाना पैकेज (तनख्वाह व अन्य सुविधाएं) पर हैं. इस बीच  कुछेक बड़े समूहों से उन्हें महत्वपूर्ण पद और इससे बड़े पैकेज के प्रस्ताव मिले, पर वह प्रभात खबर  में ही बने रहे.

हरिवंश खेतिहर परिवार से हैं. पुश्तैनी गांव में लगभग साढ़े सोलह एकड़ खेत है. दो राज्यों (उत्तर प्रदेश और बिहार) के दो जिलों [बलिया (उत्तर प्रदेश), सारण (बिहार)] स्थित इस पैतृक संपत्ति का आज बाजार मूल्य लगभग 1.9 करोड़ है. रांची में वह तीन कमरों के फ्लैट में रहते हैं. यह उनका निजी फ्लैट है. रांची में ही उनकी पत्नी के नाम से एक छोटा (लगभग 750 वर्ग फुट) आफिस स्पेश है. वर्षो पहले रांची से सटे इलाके में खरीदी गयी लगभग 25 डिसमिल जमीन है. पत्नी के नाम से ही रांची के ग्रामीण इलाके में 117 डिसमिल खेतिहर जमीन है. सामाजिक काम के उद्देश्य से गांव (सिताबदियारा) में लगभग 39 कट्ठा जमीन खरीदी है. हरिवंश के नाम से तकरीबन 37 लाख के फिक्स डिपाजिट (एफडी) और रेकरिंग डिपाजिट (आरडी) में जमा धन है. शेयर बाजार व म्यूचूअल फंड में लगभग साढ़े पंद्रह लाख का निवेश है. पोस्ट आफिस के पीपीएफ स्कीम में 14 लाख 21 हजार जमा हैं. लगभग 26 लाख रुपये निजी फर्मो में निवेश हैं. पत्नी के पास लगभग दस लाख के फिक्स डिपाजिट हैं तथा तीन लाख साठ हजार के शेयर और म्यूचूअल फंड में निवेश हैं. पत्नी के नाम से ही 13 लाख 11 हजार पोस्ट आफिस में जमा है. पत्नी के पास 26.30 लाख के सोने-चांदी के सिक्के व अन्य गहने (स्त्री धन) हैं. दोनों (पति और पत्नी) को मिलाकर चार जीवन पालिसी हैं. बैंक व नगद राशि मिलाकर हरिवंश के पास कुल छह लाख हैं और इसी के तहत पत्नी के पास एक लाख तीस हजार है. दशकों पहले गाजियाबाद (यूपी) में पत्रकारों द्वारा बने जनसत्ता कापरेटिव सोसाइटी में लिया गया एक फ्लैट भी है. इस तरह हरिवंश व उनकी पत्नी के पास कुल संपत्ति, आज के बाजार मूल्य पर 4.75 करोड़ का है. हरिवंश और उनकी पत्नी पर कुल कर्ज है, 43.71 लाख. हरिवंश की दो संतानें हैं. वर्षो से दोनों नौकरी में हैं. और आत्मनिर्भर हैं. हरिवंश की नौकरी पेशा, शादीशुदा बेटी ने पटना (बिहार) में एक छोटा फ्लैट (1360 वर्ग फुट) ले रखा है.

हरिवंश पर एक भी निजी मुकदमा या विवाद नहीं है. अखबार की खबरों पर मानहानि या मनी सूट या दीवानी से जुड़े जो मामले होते हैं, वे नियमत: केस रजिस्ट्रेशन एक्ट व भारतीय दंड संहिता के तहत अखबार के संपादक, उसके प्रकाशक और खबर लिखनेवालों पर होते हैं. ऐसे ही तीन मुकदमों पर उनके खिलाफ भी संज्ञान हैं, जिनके खिलाफ झारखंड हाई कोर्ट में क्वैशिंग (निरस्त) याचिका दायर है. अन्य मामले मनी सूट, दीवानी वगैरह से संबंधित है. झारखंड के एक बड़े राजनेता, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर मामले चल रहे हैं, उन्होंने हरिजन उत्पीड़न के तहत दो लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी है, जिनमें से एक बड़े दल के प्रमुख नेता और दूसरे हरिवंश हैं.

उनके संपादन व अपने लेखों के संकलन को मिलाकर लगभग बारह पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. धर्मयुग,  रविवार, प्रभात खबर  समेत अनेक महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में, पिछले 37 वर्षो से लगातार वह राजनीति, अर्थनीति, समाजनीति, यात्र वृत्तांत से लेकर धर्म, अध्यात्म व अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर लिखते रहे हैं. कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी व अंग्रेजी में उन पर कई लेख भी प्रकाशित हुए हैं. हिंदी व अंग्रेजी के जानेमाने लोगों के संपादन में निकली कई महत्वपूर्ण पुस्तकों में भी उनके लेख छपे हैं. बिहार और झारखंड पर भी कई पुस्तकों का संपादन किया है. 

विभिन्न निमंत्रणों के तहत वह अमेरिका, रूस, चीन, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, जापान समेत दुनिया के लगभग दो दर्जन से अधिक महत्वपूर्ण देशों की यात्रएं कर चुके हैं. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ भी उन्होंने कई देशों की यात्रएं की हैं. कैलास मानसरोवर भी वह हो आये हैं. अपने रोचक यात्र अनुभव भी लिखे हैं.


पांच वर्ष पहले भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत ने वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश का इंटरव्यू किया था, उसे पढ़कर हरिवंश को संपूर्णता में समझने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक कर सकते हैं…

वे 20 माह नहीं दे रहे थे, मैंने 20 साल ले लिया

xxx

खतरनाक खेल खेल रहे अखबार

xxx

रिटायर होकर चैन से नहीं रह सकता


इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

हरिवंश को राज्यसभा में भेजने वाले नीतीश बधाई के पात्र हैं

xxx

शुक्रिया हरिवंश जी, इस अदभुत अमेरिकी स्वामी की किताब (आटोबायोग्राफी) पढ़ाने के लिए…

xxx

इन मुख्यमंत्रियों ने डेढ़-दो लाख करोड़ हाउसिंग सेक्टर से कमाये और विदेश भेजे

xxx

पत्रकारों को गढ़ने वाला आज कोई नहीं है

xxx

'प्रभात खबर' ने झारखंड के बेहद गरीब गांव जमुनियां को लिया गोद

xxx

दरअसल, खबर बिकने की शुरुआत यहीं से हुई

xxx

भारत में भी नवधनाढ्यों के प्रति समाज में गहरी नफरत-घृणा है

 

इलाहाबाद के एनडीटीवी संवाददाता पद से मानवेंद्र का इस्तीफा, ‘न्यूज नेशन’ से जुड़ेंगे

इलाहबाद के एनडीटीवी संवाददाता मानवेन्द्र सिंह ने इस्तीफा दे दिया है. वो करीब आठ सालों से एनडीटीवी के लिए काम कर रहे थे. बीते कुछ महीनों से उनका चैनल के साथ काम को लेकर मनमुटाव-सा चल रहा था. खबर है कि मानवेन्द्र सिंह 'न्यूज़ नेशन' के साथ जुड़ने जा रहे हैं.

मानवेन्द्र ने एनडीटीवी के लिए कुम्भ और हाईकोर्ट सम्बंधी कई अच्छी खबरें कीं. उन्हें प्रतिभाशाली युवा टीवी जर्नलिस्ट माना जाता है. खबर ये भी है कि अभी कई और एनडीटीवी संवाददाता चैनल को बाय बाय करने जा रहे हैं. वजह खबरों को लेकर प्रबंधन की घटिया नीतियां बतायी जा रही हैं. 

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.

प्रभात रंजन दीन ने कैनविज टाइम्स की टीम साफ करने की रणनीति बना ली है!

स्वघोषित चैम्पियन सम्पादक प्रभात रंजन दीन ने कैनविज टाइम्स से मुक्त होते-होते अपने रास्ते के सबसे बड़े कांटें धर्मेंद्र सक्सेना को आखिरकार जप ही दिया। इसके पहले वह पूरी टीम को तोड़ चुके हैं। प्रभात रंजन ने जब से संस्थान छोड़ने का मन बनाया था, उसके बाद से ही वह धर्मेन्द्र सक्सेना को लगातार प्रताड़ित कर रहे थे। अक्टूबर महीने में तो उन्होंने धर्मेन्द्र सक्सेना को फोन पर एसएमएस कर कार्यालय आने से मना कर दिया था और कारण कार्यों की समीक्षा बताया था।

धर्मेन्द्र के काम में कोई कमी न होने के कारण उन्हें न चाहते हुए भी धर्मेन्द्र को वापस लेना पड़ा। जाने से पहले अपने स्वभाव के अनुसार प्रभात रंजन दीन कैनविज टाइम्स को जहां तक सम्भव हो सके नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। उन्होंने कार्यमुक्त होते ही कैनविज की टीम साफ करने की भी रणनीति बना ली है।

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अहमदाबाद के ‘नीसा’ समूह और ‘जानो दुनिया’ चैनल का काला सच

अहमदाबाद से हाल ही में शुरू हुए टीवी न्यूज़ चैनल 'जानो दुनिया' नीसा समूह की प्रोपर्टी है. नीसा समूह के चेयरमैन संजय गुप्ता (पूर्व आईएस ऑफिसर) गुजरात के हैं. संजय गुप्ता कुछ समय गुजरात मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के चेयरमैन भी रहे. कई आरोपों के कारण कुछ समय पहले उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया गया. संजय गुप्ता को पोलिटिकल सपोर्ट खूब है.

खबरों के मुताबिक नरेन्द्र मोदी से अच्छे सम्बन्ध होने के कारण ये आदमी हमेशा बच जाता है. नीसा समूह के कई प्रोजेक्ट मार्केट में चल रहे हैं. जैसे कैम्बे होटल्स, नीसा टेक्नोलोजी, नीसा प्रोपर्टी, नीसा एज्युकेशन, स्पा आदि. लेकिन कहते हैं न, हाथी के दांत खाने के कुछ और होते हैं और दिखाने के कुछ और… यहाँ भी कुछ ऐसा ही है.

कंपनी का माहौल : 2-3 महीने की सैलरी पैंडिंग में रखना नीसा ग्रुप की आदत है. 2-3 महीने पर एक महीने की सैलरी दी जाती है. अगर कोइ एम्प्लोई जॉब छोड़ के जाता है तो उसके 2-3 महीने के पैसे नीसा कंपनी डकार जाती है. होटल्स में कर्मचारियों की भी यही हालत है.

काम का माहौल : अगर आपने काम करने के उद्देश्य से कंपनी ज्वाईन की है तो आप ज्यादा से ज्यादा 3 महीने कंपनी में टिक सकते हैं. ऐसा मैं नहीं, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं. नॉन टेक्नीकल लोगों को टेक्नीकल हेड बना देना, मीडिया से ना होते हुए भी पत्रकार का पद देना… ऐसे कई मामले में नीसा बहुत ही दिलदार कंपनी है.

((इस न्यूज़ को पब्लिश करने की कृपा करें क्योंकि हम तो दलदल में फंस के 2 महीने की सैलरी दान कर आए. HR वाले स्वयं बोलते हैं कि छोड़ के जाओगे तो बाकी पैसा नहीं मिलेगा. दूसरों को 'नीसा' और 'जानो दुनिया' जैसे दलदल में फंसने से बचाएं. बच के दोस्तों, इसे नरेन्द्र मोदी का चैनल भी कहा जाता है.))

मेरे आरोपों के कुछ उदाहरण :

http://www.complaintboard.in/complaints-reviews/neesa-group-neesa-leisure-ltd-l195547.html

http://www.consumercomplaints.in/bycompany/neesa-group-neesa-leisure-ltd-a284849.html

http://www.consumercomplaints.in/complaints/neesa-leisure-ltd-neesa-group-not-getting-my-full-final-holding-c728956.html

http://www.consumercomplaints.in/?search=neesa-group

http://www.consumercomplaints.in/complaints/neesa-leisure-ltd-neesa-group-sanjay-gupta-forced-to-put-resignation-by-emotionally-blackmail-even-not-released-pending-salaries-for-last-3-months-c719978.html

http://www.consumercourt.info/topic/salary-due-but-not-paid-by-neesa-technologies

अहमदाबाद से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बाड़मेर के इस गांव में, लड़की के जन्‍म पर खुशियां मनाई जातीं है

बाड़मेर: पाकिस्‍तान की सीमा से सटे राजस्थान के बाड़मेर जिले के सरहदी गांव खच्चरखड़ी की मुस्लिम बस्ती में लड़की के जन्म पर खुशियां मनाने की अनूठी परम्परा है। शिव तहसील के इस गांव में करीब चालीस परिवारों की मुस्लिम बस्ती है, जहां बेटी की पैदाइश पर खुशियां मनाई जाती हैं तथा खास तरह के नृत्य का आयोजन होता है। किसी भी घर में बेटी के जन्म पर गांव भर में गुड़ बांटा जाता है और सामुहिक भोजन की अनूठी परम्परा का निर्वाह किया जाता है।

इस सीमावर्ती जिले के कई गांवों में भ्रूण-हत्या की कुप्रथा की वजह से जहां सदियों से बारातें नहीं आईं, वहीं खच्चरखडी की लड़कियों के लिए अच्छे परिवारों से रिश्तों की कोई कमी नहीं रहती है। अच्छे नाक-नक्श वाली इस गांव की खूबसूरत लड़कियां और महिलाएं कांच कशीदाकारी में सिद्धहस्त होती हैं। हस्तशिल्प की इस कला से उन्हें खूब काम मिलता है। इससे घर चलाने लायक पैसा आ जाता है। हस्तशिल्प कला में अग्रणी इस गांव की लड़कियों के रिश्ते आसानी से होने और साथ ही, ससुराल पक्ष द्वारा शादी-विवाह का खर्चा देने की परम्परा के चलते भी यहां बेटियों का जन्म खुशियों का सबब बना हुआ है। इसी गांव के खुदा बख्‍श बताते हैं, ‘सगाई से लेकर निकाह तक सारा खर्चा लड़के वालों की तरफ से होता है। निकाह के कपड़े, आभूषण, भोजन आदि का खर्चा लड़के वाले ही उठाते हैं। यहां तक की मेहर की राशि भी लड़के वाले अदा करते हैं। लड़की जितनी अधिक सुन्दर और गुणवान होगी, निकाह के वक्त उतनी ही अधिक राशि मिलती है।’ गांव की बुजुर्ग महिला सखी बाई ने बताया कि गांव की लडकियों के रिश्‍ते की मांग अच्छे परिवारों में लगातार बनी हुई है।

भारत-पाकिस्तान विभाजन से पहले सिन्ध से(वर्तमान में पाकिस्‍तान का एक प्रांत) इस गांव की लड़कियों के रिश्ते बहुत आते थे। इस गांव की लड़कियां गजब की खुबसूरत, घरेलू कामकाज में निपुण और गुणीं होती हैं। बहरहाल, भारत-पाक सरहद पर बसे खच्चरखड़ी गांव में उच्च प्राथमिक विद्यालय की जरूरत गांव के लोगों को महसूस हो रही हैं, ताकि बेटियों को पढ़ाई सही तरीके से चल सके। राज्य सरकार ने इस गांव में उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने के लिए जिला प्रशासन बाड़मेर से रिपोर्ट मांगी थी। मगर रिपोर्ट ठन्डे बस्ते में जाने से गांव कि बेटियां उच्च शिक्षा से आज भी वंचित हें।

 

चन्दन सिंह भाटी

 

जांच के दौरान उचित विश्राम व समय पर भोजन भी मानवाधिकार हैं

आवेदक राजेंद्र सिंह ने दिनांक 08/09/2010 से 10/09/2010 के बीच अपने आवासीय परिसर में आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा की गयी खोज और जब्ती की कार्यवाही के दौरान अपने मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायत को लेकर बिहार मानवाधिकार आयोग से निवेदन किया था| आवेदक की शिकायत थी कि वह अल्पसंख्यक सिख समुदाय से संबंध रखता है| उसने कहा कि पटना शहर में मीठापुर में आरा मिल व लकड़ी का व्यापार कर वह अपनी आजीविका अर्जित करता था| दिनांक 08/09/2010 को श्री सौरभ कुमार, श्री सुमन झा, श्री कनकजी और श्री अचुतन नामक आयकर विभाग के अधिकारीगण छह अन्य सहयोगियों के साथ उसके घर आये और मुख्य गेट बंद कर दिया जो कि प्रवेश और निकास का एक मात्र रास्ता था| उन्होंने आवेदक और उपस्थित दूसरे लोगों के मोबाइल फोन ले लिये और छापे के दौरान उन्हें बाहर के किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी| यहाँ तक कि उन्हें खाना पकाने के लिए भी अनुमति नहीं दी गयी| उन्होंने महिलाओं सहित परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया| उन्होंने निर्भय होकर वहां धूम्रपान किया है, शिकायतकर्ता की  धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है, तथा सिख गुरुओं और स्वर्ण मंदिर की तस्वीरों पर सिगरेट के टुकड़े और सिगरेट के खाली पैकेट फेंक दिये| उन्हें शौचालय जाने की अनुमति भी नहीं दी गयी| आवेदक ने अपने वकील को बुलवाया किन्तु उसे वह जगह छोड़ने के लिए विवश किया गया| उन्होंने छापे के दौरान अन्य दंडात्मक कार्रवाई की धमकियां भी दीं|

उक्त के आलोक में आयोग द्वारा मुख्य आयकर आयुक्त बिहार को नोटिस जारी किया गया, जो आगे आयकर महानिदेशक(अनुसंधान) को भेज दिया गया| अंततः विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में आवेदक द्वारा किए गए आरोपों का खंडन किया गया| कई बार स्थगन के बाद अंत में आवेदक अपने वकील के साथ उपस्थित हुए और श्री विजय कुमार, अपर आयकर आयुक्त की उपस्थिति में प्रकरण दिनांक को 18/04/2011 को सुना गया|  

आयोग के समक्ष कार्यवाही में आवेदक ने शिकायत में वर्णित आरोपों को दोहराया| उसने खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता और औचित्य पर सवाल उठाया| शिकायतकर्ता ने कहा कि उक्त सम्पूर्ण कार्यवाही मात्र आवेदक को परेशान करने के लिए की गयी है और अधिकारियों के इस  वैमनस्यपूर्ण कार्यवाही से भी संतुष्ट नहीं होने पर यह खोज और जब्ती की कार्यवाही आज तक जारी है| शिकायतकर्ता द्वारा यह जानकारी भी दी गयी कि विभाग ने आवेदक के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार के वन विभाग और पंजीकरण विभाग से भी संपर्क किया है| श्री विजय कुमार, विभागीय प्रतिनिधि ने आवेदक के आरोपों का खंडन किया|

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद आयोग ने महिला सदस्यों सहित अपीलार्थी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने व परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार के संबंध में आरोप के तथ्यों के निर्धारण हेतु विचारण उचित समझा|   

सुनवाई के अनुक्रम में आयोग ने यह कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता की जांच का मामला आयकर अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत उचित मंच पर उठाया जा सकता है| आयोग ने माना कि आवेदक के यहाँ 8 से 10 सितंबर 2010 तक जिस ढंग से खोज और जब्ती की कार्रवाई की गयी उसका मूल्यांकन करने में आयोग सक्षम नहीं है| विभाग के प्रतिनिधियों ने कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही तो इस प्रकरण में लगे समय से भी ज्यादा समय के लिए भी जारी रह सकती है| आयोग मोटे तौर पर इससे सहमत है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही के लिए अवधि के रूप में कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती लेकिन आयोग की राय में खोज और जब्ती की कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के मानवाधिकारों के अनुरूप होनी चाहिए|

आयोग ने माना कि यह स्वीकृत तथ्य है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही दिनांक 08/09/2010 को प्रात: 9:30 बजे शुरू और दिनांक 10/09/2010 को रात्रि 9.20 बजे संपन्न हुई है| आवेदक की शिकायत थी कि इस अवधि के दौरान उससे लगातार 30 घंटे के लिए पूछताछ की गयी| आयकर विभाग द्वारा धारा 132 के तहत शपथ पर दर्ज आवेदक के बयान के प्रश्न संख्या 15 में अधिकारी श्री सौरभ कुमार ने दर्ज किया है कि उससे खाताबहियाँ आदि पेश करने के लिए कहा जा रहा था लेकिन 36 से अधिक घंटे बीतने के बावजूद आवेदक ने एक भी प्रस्तुत नहीं की है| इससे कार्यवाही में लगे समय का अनुमान लगाया जा सकता है|  

विभागीय प्रतिनिधि द्वारा यह बताया गया कि दिनांक 09.09.2010 को रात्रि 10 बजे तक मात्र 15 प्रश्न पूछे गए थे जिससे यह स्पष्ट है कि पूछताछ में लिया गया समय किसी भी प्रकार से उचित नहीं था| आयोग का विचार है कि छापामार दल के सदस्यों को खोज और जब्ती कार्यवाही संपन्न करने में समय लग सकता है लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों में व्यक्ति के बुनियादी मानवाधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए| उन्हें कार्यवाही करने के लिए शारीरिक और मानसिक यातना देने का कोई अधिकार नहीं है| प्रभारी अधिकारी यदि पूछताछ/बयान की रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया जारी रखना चाहता है तो वह दिन के उचित समय पर ही बंद कर दी जानी चाहिए और अगली सुबह फिर से शुरू की जानी चाहिए थी| लेकिन हस्तगत प्रकरण में किसी भी विश्राम या अंतराल के बिना प्रात: 03:30 बजे तक प्रक्रिया जारी रही है जबकि यह शयन का समय है और आवेदक तथा/ या उनके परिवार के सदस्यों को ऐसे अनुचित समय तक जागते रहने के लिए के लिए मजबूर करना एक सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता| यह व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इसलिए मानवाधिकारों का उल्लंघन था| यहां तक ​​कि दुर्दांत अपराधियों को भी मानवाधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता| आवेदक की स्थिति तो इससे बदतर नहीं थी| आयोग की राय में आयकर विभाग को भविष्य में बड़े पैमाने पर खोज और जब्ती कार्यवाही में सुनिश्चित करना चाहिए कि बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो| आयोग ने आगे कहा कि वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि खोज और जब्ती कार्यवाही जारी रखते हुए आयकर विभाग के संबंधित अधिकारियों द्वारा आवेदक के मानव अधिकारों का उल्लंघन किया गया है जिसके लिए वह आर्थिक मुआवजा पाने का अधिकारी है|

लेखक का मत है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी परिस्थितियों के विपरीत व्यवहार भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| यथा कश्मीर जैसे शीत प्रदेश के निवासी को भीषण गर्मी वाले मरुस्थल में या इसके विपरीत रखना या रहने के विवश करना मानवाधिकारों का हनन है| ठीक इसी प्रकार अशक्त या अस्वस्थ व्यक्ति को उसकी परिस्थति के अनुसार भोजन न उपलब्ध करवाना भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| पंजाब राज्य मानावाधिकार आयोग ने तो सेवा, न्याय आदि से सम्बंधित मामलों को भी मानवाधिकार हनन माना है| भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, “किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं|”

हाल ही में सांसद धनञ्जय सिंह को एक अभियोग में पुलिस हिरासत में लिया गया था और हिरासत अवधि के दौरान उन्होंने अपने घर पर बने भोजन के लिए पुलिस से अपेक्षा की किन्तु पुलिस ने कहा कि न्यायालय की अनुमति के बाद ही ऐसा किया जा सकता है| जबकि कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि एक परीक्षण के अधीन हिरासत में व्यक्ति को घर के भोजन से वंचित किया जाएगा अथवा इसके लिए कोई अनुमति की आवश्यकता है| लेखक ने स्वयं यह प्रकरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया और आयोग ने इस प्रकरण में गृह मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये हैं| ठीक इसी प्रकार तरुण तेजपाल के मामले में भी हाल ही में तहलका की एक संपादिका को गोवा पुलिस ने गवाही हेतु पूछताछ के लिए उसके निवास से भिन्न स्थान पर बुलाया और रात्रि 2 बजे तक उससे पूछताछ की गयी| जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार एक महिला और 15 वर्ष तक के बालक गवाह से मात्र उसके निवास पर ही पूछताछ की जा सकती है| लेखक द्वारा यह मामला भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाये जाने पर गोवा पुलिस को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये गए हैं| अत: जागरूक पाठकों से आग्रह है कि जहां भी वे मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला देखें उसकी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजें ताकि मानव गरिमा का रक्षा हो सके|

 

लेखक मनीराम शर्मा विधि विशेषज्ञ हैं।

 

किस बड़े मीडिया हाउस ने ‘बहादुर बाई आबिद सुरती’ नाम का ट्रेडमार्क अपने नाम रजिस्टर्ड करा लिया है?

पंकज शुक्ल दिल्ली में लंबे समय तक कई चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद कई वर्षों से मुंबई में हैं. भोजपुरी फिल्म बनाया और फिर एक अखबार के लिए रिपोर्टिंग करने लगे. उन्होंने चेन्नई एक्सप्रेस फिल्म की रिलीज से पहले एक इंटरव्यू शाहरुख खान का किया था. उस इंटरव्यू के बारे में उन्होंने विस्तार से अपने ब्लाग क़ासिद पर लिखा, पिछले साल जून महीने में.

किसी मित्र ने पंकज की इस स्टोरी का एक लिंक मुझे मेल किया, जिसमें बताया गया है कि आबिद सुरती के कैरेक्टर बहादुर का ट्रेडमार्क एक बड़े मीडिया हाउस ने करा लिया. यानि आबिद सुरती का जिस पर हक था, उस पर एक बड़े मीडिया हाउस ने डाका डाल दिया. लोग जानना चाहेंगे कि यह कारनामा करने वाला कौन-सा मीडिया हाउस है. फिलहाल पंकज शुक्ल का लिखा वो पोस्ट पढ़ें जिसमें इस डकैती का जिक्र है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


आबिद सुरती, बहादुर, शाहरुख, वॉटरमैन और ट्रेडमार्क

-पंकज शुक्ल-

बातचीत के दौरान शाहरुख खान के दिल से छलक आई वो ख्वाहिश जो वो हिंदी सिनेमा के बादशाह होकर भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, शाहरुख बड़े परदे पर 'बहादुर' बनना चाहते हैं। जिनकी उम्र पैंतालिस पचास के आसपास होगी, उनको अपने बचपन के इंद्रजाल कॉमिक्स ज़रूर याद होंगे। एक रुपये की एक किताब मिलती थी और वो एक रुपया भी जुगाड़ना जतन का काम होता था। किराए पर तब 10 पैसे में मिला करते थे कॉमिक्स।

इंद्रजाल कॉमिक्स याद होंगे तो फिर उनका एक किरदार ‘बहादुर’ भी याद होगा। ‘बहादुर’ यानी इसी नाम से बनी कॉमिक सीरीज का हीरो। बाप जिसका डाकू था, लेकिन उसने कानून के पाले में आने का फैसला किया। केसरिया कुर्ता, डेनिम की जींस। कॉमिक्स की दुनिया का पहला हिंदुस्तानी हीरो। दुनिया भर में वो आबिद सुरती के बहादुर के नाम से मशहूर हुआ। शाहरुख खान इस किरदार का चोला पहनकर बड़े परदे पर आना चाहते हैं। बोले, “बचपन में इसके बारे में खूब पढ़ा। पूरा कलेक्शन जमा करके रखा। अब मन किया कि इस पर फिल्म बनाई जाए तो इसके कॉपराइट नहीं मिल रहे।” शाहरुख खान जैसी हस्ती किसी किरदार पर फिल्म बनाना चाहे और उसके सामने ऐसी अड़चनें आ जाए कि वो भी न पार सकें तो मन में उत्सुकता तो जागती ही है।

यहां से शाहरुख ने शुरू की कहानी मुंबई के वॉटरमैन की। ये वॉटरमैन और कोई नहीं, हमारे आपके अजीज़ आबिद सुरती साब ही हैं। जी हां, वही जिनके कॉमिक किरदार ढब्बू जी ने कभी धर्मवीर भारती तक पर उर्दू को बढ़ावा देने का इल्जाम लगा दिया था, और वो इसलिए कि ढब्बूजी धर्मयुग के पीछे के पन्ने पर छपते थे और लोग धर्मयुग खरीदने के बाद उसे पीछे से ही पढ़ना शुरू करते थे। आबिद सुरती के किरदार दुनिया भर में मशहूर हैं। उनकी लिखी कहानियां परदेस में हिंदी सीखने के इच्छुक लोगों को क्लासरूम में पढ़ाई जाती हैं। नाटककार भी वो रहे। फिल्मों में स्पॉट बॉय से लेकर लेखन तक में हाथ आजमाया। पेंटर ऐसे कि अगर एक ही लीक पकड़े रहते तो आज एम एफ हुसैन से आगे के नहीं तो कम से कम बराबर के कलाकार होते।

आबिद सुरती मुंबई से थोड़ा दूर बसे इलाके मीरा रोड में अकेले रहते हैं। दोनों बेटे सैटल हो चुके हैं। एक का तो शाहरुख ने नाम भी लिया, किसी कंपनी में नौकरी लगवाने के सिलसिले में। आबिद की पत्नी अपने बच्चों के साथ हैं, और वो मीरा रोड में ही ड्रॉप डेड एनजीओ के नाम पर नलों से पानी टपकने के खिलाफ मुहिम चलाते हैं। पढ़ने में अजीब सा लग सकता है लेकिन कोई छह साल पहले अपने एक दोस्त के घर में लेटे आबिद सुरती को घर के बूंद बूंद टपकते नल ने सोने नहीं दिया।

और, बस वहीं से ये ख्याल जनमा। हर इतवार आबिद अपना झोला लेकर घर से निकलने लगे। झोले में होती कुछ रिंचे, प्लास और वाशर। वो सोसाइटी के घर घर जाकर टपकते नल ठीक करने लगे। और, यहीं से शुरू हुई ड्रॉप डेड फाउंडेशन की। शाहरुख खान ने आबिद सुरती की इस मुहिम के बारे में किसी अखबार में पढ़ा और उन्हें एक लंबा एसएमएस भेज दिया। शाहरुख ने ये भी लिखा कि कैसे वो बचपन से 'बहादुर' के फैन रहे हैं। फैन मैं भी बचपन से 'ढब्बू जी' का रहा हूं। शाहरुख ने बस इस किरदार को बनाने वाले आबिद सुरती से मुलाकात की मेरी इच्छा को फिर से जगा दिया। आबिद सुरती की फ्रेंड लिस्ट में मैं शामिल रहा हूं और उनकी सालगिरह पर मुबारक़बाद भी भेजता रहा हूं। इस बार बात आगे बढ़ी। मैंने संदेश भेजा। उनका जवाब आया। पिछले इतवार हम मिले फन रिपब्लिक के पास एक रेस्तरां में।

बातों बातों में ज़िक्र फिर से 'बहादुर' का निकला। 'बहादुर' के परिवेश के बारे में बताते वक्त 78 साल के आबिद सुरती के चेहरे की चमक देखने लायक थी। फिर जैसे ज़ोर का झोंका आए और लौ फड़फड़ाने लगे, वैसी ही बेचैनी के साथ बताने लगे, “शाहरुख से पहले कबीर सदानंद ने भी बहादुर पर फिल्म बनाने की प्लानिंग की थी। हमने इस किरदार को ट्रेडमार्क रजिस्टर्ड कराना चाहा। पर पता चला कि एक बहुत बड़े मीडिया हाउस ने 'बहादुर बाई आबिद सुरती' नाम का ट्रेडमार्क अपने नाम रजिस्टर्ड करा लिया है।”

सुनकर बड़ा दुख हुआ। दूसरों के अधिकारों की दिन रात बात करने वाले मीडिया हाउस क्या ऐसे भी किसी कलाकार का हक मार देते हैं। कॉपीराइट कानून कहता है कि किसी कृति के बनाते ही उसका कॉपीराइट सृजक के नाम हो जाता है। उसका कहीं रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं। माने कि अगर कोई ढंग का वकील आबिद सुरती का मामला अपने हाथ में ले तो उनके बौद्धिक संपदा अधिकार उन्हें मिल सकते हैं। मुझे खुद एक हफ्ता लग गया इस बात को दुनिया के सामने लाने में। चाहता हूं उनकी लड़ाई लड़ूं। जितना बन सकेगा कोशिश करूंगा। क्या आप साथ देंगे?

सलमान खान की अवसरवादिता और कौम के साथ गद्दारी ‘जय हो’ को मार गई!

Yashwant Singh : असल में सलमान खान एक बड़ी पावरफुल और एंबिशियस स्ट्रेटजी के तहत नरेंद्र मोदी के साथ पतंगबाजी करने और उनकी तारीफ करने को गए थे… उन्हें अब सौ, दो सौ करोड़ रुपये कमाने वाली फिल्मों से उब हो गई थी और वो इकट्ठे हजार करोड़ रुपये वाली फिल्म बनाकर फिल्म इंडस्ट्री का महारिकार्ड बनाने की तैयारी में थे…

उन्हें लगता था कि मुसलमान तो उन्हें भाई मानता ही है, सो बेचारा मजबूरन आएगा ही देखने… और इधर, मोदी से टांका भिड़ा लिया, उनकी जय जय कर दी तो फिर हिंदू भाई भी टूटकर फिल्म देखने आ जाएंगे और इस प्रकार एक हजार करोड़ की 'जय हो' हो जाएगी…

पर मिस्टर सलमान खान साहब… दुनिया के सबसे समझदार और काबिल इन्सान आप ही नहीं हैं… जनता को आपके अवसरवाद को राइट टू रिजेक्ट करने का अधिकार है, और उसने उसी अधिकार का इस्तेमाल किया… जिस नरेंद्र मोदी को गुजरात में नरसंहार के बाद उन्हीं की पार्टी के बड़े नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री ने राजधर्म सिखाया, उस मोदी को भले ही हर कोई अपने अपने निहित स्वार्थ के तहत माफ कर दे पर वो लोग कतई माफ नहीं कर सकते जो किसी भी प्रकार के राज्य संरक्षित नरसंहार के विरोधी हैं… मैं भी नहीं…

ये अलग बात है कि इस देश में विकल्पहीनता की इस परम बेचारगी भरी अवस्था में ढेरों को मोदी ही अगला पीएम बनता हुआ नजर आ रहा है पर भारत की धरती की एक खास बात है…. ये ऐन मौके पर पासा पलट देने का माद्दा रखती है… देखते जाइए प्रभु… अभी बड़ा वक्त है… फिलहाल तो सलमान खान को होश में आने दीजिए… लोकसभा चुनाव बाद खुद मोदी भी होश में आएंगे..

'जय हो' का मैं भी बहिष्कार करता हूं… आप भी मत जाइएगा… हालांकि सलमान खान 'आजतक' समेत कई न्यूज चैनलों पर पेड इंटरव्यू देकर फिल्म देखने जाने को प्रेरित कर रहा है पर अब जब तीन दिन तक जनता प्रेरित नहीं हुई तो आगे कहां होने वाली… और, मोदी समर्थक फिल्म देखने जाने से रहे क्योंकि उनका कोई आफलाइन वजूद तो है नहीं… वो सिर्फ आनलाइन, फर्जी शकल लगाकर, पेड एजेंट बनकर हुआं हुआं करते रहते हैं….

फिल्मों को मजहब के हिसाब से देखने और न देखने का मैं भी कतई समर्थक नहीं हूं.. पर कष्ट तब होता है जब सलमान खान जैसा स्टार अपने फिल्म के प्रमोशन के वास्ते रणनीतिक तौर पर एक नई लॉबी के पास चला जाता है, पोलिटिकल गेम खेलने लगता है, अच्छे-बुरे का सर्टिफिकेट बांटने लगता है.. अमां यार, जाओ तुम चैनलों पर प्रमोशन करो, इंटरव्यू दो, शोज करो, कामेडी सर्कस में बैठकर हंसो-गाओ, रियल्टीज शोज के मंच पर जय हो करो…

किसने कह दिया कि मोदी साहब को अच्छा होने का सर्टिफिकेट जारी कर दो… यह गुनाह है सलमान…. और तुम्हारी इस चालाकी, कि मुस्लिम भाई तो मेरे गुलाम हैं ही, सो वो देखेंगे ही, और मोदी को अच्छा कह देने से देश भर के हिंदू जय हो जय हो करते हुए चले जाएंगे 'जय हो' को देखने, को बहुत आहिस्ते से समझदार लोगों ने समझ लिया और दिल ही दिल तुझे सबक सिखाने की ठान ली… सो पिट गई 'जय हो'…

पचास या साठ सा सत्तर या अस्सी या नब्बे या सौ करोड़ अब बहुत छोटी राशि हो गई है इन बड़े स्टारों के लिए… इसीलिए तो ये अबकी पांच सौ करोड़ से लेकर हजार करोड़ का सपना पाले बैठा था.. पर बेचारा अपने पुराने आंकड़ों से भी नीचे आ गिरा… जरूरी नहीं कि मेरी हर बात से आप सहमत हों, सो इस पोस्ट से भी सहमत हों. मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना… बात और विचार रखने का सबको अधिकार है… मुझे भी…

मेरा भी दिल उस दिन टूटा था जब मोदी की 'जय हो' करके सलमान खान लौटा था और मैंने तय कर लिया था कि यह फिल्म नहीं देखनी मुझे.. फिल्में सभी मजहब, जाति के लोग देखते हैं और फिल्म को उसके कंटेंट के आधार पर हिट या फ्लाप करते हैं. स्टार लोग अपनी कला में लीन रहते थे. राजनीति नहीं करते थे. लेकिन पहली बार एक खान ने एक मोदी से हाथ मिलाया, मोदी को अच्छा कहा और बेचारा धूल चाट गया….

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


Mohammad Anas : मैं अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के अंतर्गत आने वाले ‘राईट टू रिजेक्ट ’ के जरिए सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ का बहिष्कार करता हूं. यदि आप चाहे तो ऐसा कर सकते हैं .गुजरात एवं मुज़फ्फरनगर दंगे के कथित ज़िम्मेदारों के मंच और उनके साथ के बाद सलमान खान की आने वाली हर फिल्म का मैं ठीक उसी तरह से विरोध करूँगा जैसे आज तक नरेंद्र मोदी का करता आया हूं. मेरा पैसा है ,मैं उसे तुम्हारे नाच पर नहीं खर्च कर सकता जबकि तब तुमने पैसों के लिए मोदी की पतंग उड़ा उसे गुड मैन कहा हो .

फुटपाथ पर सोये मासूम गरीबों की हत्या करने वाले सलमान खान जैसे लोग न सिर्फ रुपहले पर्दे पर बल्कि आम जिंदगी में भी इंसानियत का रत्ती भर ख्याल नहीं रखते . ह्युमन बीइंग नाम का टोटका चिंकारा और फुटपाथ कांड से बचने की सहानुभूति है . ह्यूमन की टीशर्ट का दाम ही दो हजार रुपए से शुरू है ,ऐसे बिजनेस माइंडेड सो काल्ड हीरो ने गुजरात दंगे के कथित ज़िम्मेदार मोदी की शान में कसीदे गाए और मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद नाच नाचा .

इनकी कमर तोड़ने के लिए इनकी फिल्मों का बहिष्कार ही एक मात्र रास्ता है . मोदी ने यदि दस करोड़ दिए थे पतंग उड़ाने के लिए तो आप जनता लोग मिल कर तीस -चालीस करोड़ के बिजनेस का चपत लगा दीजिए . फिर पतंग उड़ाए या बेचे ,अपने से क्या मतलब .

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.


Vikas Mishra : एक गुजारिश है। सलमान को सलमान ही रहने दीजिए मु-सलमान मत बनाइए। फेसबुक पर देख रहा हूं नरेंद्र मोदी के साथ पतंगबाजी को लेकर संग्राम मचा है। विरोधियों और समर्थकों दोनों के खुश होने और दुखी होने की वजह एक है-सलमान के आगे खान लगा हुआ है। ये बात सलमान खान ने आजतक के इंटरव्यू में कही भी थी। बॉलीवुड के तमाम सितारे वैसे भी धर्म-जाति के बंधनों से बहुत ऊपर होते हैं। सलमान के घर में गणेश पूजा होती है। हर साल उनके घर गणपति पधारते हैं। शाहरुख के घर ईद और दीपावली दोनों की धूम रहती है। रिश्ते भी जाति-धर्म से ऊपर उठकर होते हैं। शाहरुख-गौरी, सुनील दत्त-नरगिस, आमिर खान-रीना, किरण राव, ऋतिक रोशन-सुजैन खान, सलीम खान-हेलेन… लंबी फेहरिस्त है। नरेंद्र मोदी के तमाम प्रशंसक खुश हैं कि सलमान ने कह दिया कि मोदी को दंगों के लिए माफी नहीं मांगनी चाहिए, जरूरत पड़ी तो मोदी के लिए वो प्रचार करेंगे और ये भी कि मोदी गुड मैन हैं। सलमान न तो रसूल हैं और न ही इस्लामिक विद्वान जिन्होंने कह दिया और फतवा हो गया। जो लोग सलमान के बयान और मोदी के साथ पतंगबाजी को लेकर बौरा रहे हैं उनसे भी विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि कोटरी की सोच से बाहर निकलिए। हर इंसान पहले इंसान है उसके बाद हिंदू या मुसलमान। एक पोस्ट देखी मैंने.. जो उसमें लिखा है, हूबहू पोस्ट कर रहा हूं।

पोस्ट इस तरह है– 'मोदी की पतंग उड़ाने चला था… ख़ुद की पतंग कटने वाली है.. सल्लू मियां हम मुस्लिम हैं हमने तुम्हें सर पे बैठाया है तो उतारना भी जानता हैं…हम तुम्हे 'भाई' कहते हैं और तुम कहते हो मोदी को माफ़ी मांगने की कोई ज़रुरत नहीं?? जो लोग गुजरात में मरे थे चाहे किसी भी धर्म के हों वो भी तुम्हे भाई कहते होंगे… अगर मोदी के पीछे दुम हिलाना ही तुम्हारी भाईगिरी है तो रहने दो.. हमें ऐसा भाई नहीं चाहिए…।'

अब आप ही फैसला कीजिए क्या इस तरह की पोस्ट को किसी भी तरह से उचित ठहराया जा सकता है।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.


Komal Nahta :  Figures prove dat a section of Muslims has boycottd salman's JaiHo coz dey havn't liked his comments on modi.Wil the hero do damage control?

Salman said, main kaun hota hoon modi saab ko bolne wala, after all janata ne unhe elect kiya hai. Where is salman wrong? Kuchh bhi?!?!

And what salman said was quite different frm what some fanatics wud hav us believe. He DID NOT say modi shd not apologise

फिल्म समीक्षक कोमल नाहटा के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ सकते हैं:

सलमान खान के धमकाने पर ब्लागर ने पोस्ट हटाई, माफी मांगी!

xxx

 

सलमान खान ने ब्लागर सौम्यदीप्त बनर्जी को धमका कर इन दो आर्टिकल्स को हटवाया, अब भड़ास पर पढ़ें

पी7न्यूज के स्ट्रिंगर भुखमरी के कगार पर

प्रिय संपादक जी, भड़ास4मीडिया, महोदय… आपसे एक निवेदन है कि मेरी ये बात पी7न्यूज चैनल में बैठे अधिकारियों तक जरूर पहुंचायें क्योंकि ये बात उन पीड़ित स्ट्रिंगरों की है जो बिचारे दिन-रात चैनल के लिए खबरें लाते हैं और अगर किसी खबर पर शहीद हो जाएं तो चैनल वाले हमें स्ट्रिंगर नाम का तमगा देकर हाथ हटा लेते हैं. जब खबर पर फोनो या पैकेज चलना हो तो तब हमें ये 'हमारे संवाददाता' का नाम देते हैं. खैर, हम तो पत्रकारिता की दुनिया में इंसान माने ही नहीं जाते, कीड़े मकोड़ों की तरह इस्तेमाल करके मार दिए जाते हैं.   आज बहुत दुःख होता है कि हम इतनी मेहनत करते हैं और उसका भी भुगतान हमें पूरा तो करना दूर, समय पर ही दे दें, यही बहुत बड़ी बात है.

आज पी7 के स्ट्रिंगरों की हालत इतनी बुरी हो गयी है कि अब तो कहने में भी शर्म आने लगी है. हम स्ट्रिंगरों को पिछले 6 महीनों से हमारा मेहनताना नहीं मिला है और जब पूछो तो ढांढस बंधा कर बात को रफा-दफा कर देते हैं. हम लोग पिछले 6 महीनों से इतनी महनत कर रहे हैं और हमारी मजदूरी भी देने में ये लोग कतराते हैं. आखिर हम क्या करें, कहाँ जायें, किससे कहें? चैनल में बैठे स्टाफ यहाँ तक कि वहाँ के चपरासी को भी उसकी तनख्वाह महीने की 6 तारीख को मिल जाती है लेकिन हमको देने में क्या परेशानी है. आखिर हम भी तो इंसान हैं. हमारा भी तो परिवार है. तो क्या करें, भूखों मर जायें या फिर इस पत्रकारिता के नाम पर शहीद हो जायें. मैं अपने चैनल में बैठे बड़े अधिकारियों से निवेदन करना चाहता हूँ कि हमें हमारा हक़ दे दें और हमें पिछले 6 महीनों से रुका हुआ मेहनताना दिलवा दें क्यूंकि हम अब भुखमरी की कगार पर पहुँच गए हैं.
 

REQUEST-: आदरणीय संपादक जी, इस खबर पर मेरा नाम मत दीजियेगा वरना बहुत बुराई हो जायेगी और शायद मुझे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़े. बस इस खबर को इतना फैलायें कि हमें इन्साफ मिल सके. मुझे आपसे बहुत उम्मीद है.

आपका छोटा भाई –
xyz
उत्तर प्रदेश

सैफई महोत्सव के मैनेजर वेदव्रत गुप्ता को अब दैनिक जागरण का पत्रकार रहना कुबूल नहीं, दिया इस्तीफा (पढ़ें पत्र)

मुलायम सिंह और उनके खानदान के नजदीकी वेदव्रत गुप्ता ने दैनिक जागरण से इस्तीफा दे दिया है. वेदव्रत गुप्ता सैफई महोत्सव के मैनेजर थे. मुलायम सिंह परिवार के नजदीकी होने के कारण उन्हें दैनिक जागरण की वो खबरें रास नहीं आईं जिनकी वजह से मुलायम सिंह, उनके कुनबे और सैफई महोत्सव पर सवालिया निशान लगा.

बाद में सैफई महोत्सव को लेकर सीएम अखिलेश यादव ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर दैनिका जागरण के आरोपों का खंडन किया और दैनिक जागरण के मालिकों की पोल खोली. अब वेदव्रत गुप्ता ने दैनिक जागरण का साथ छोड़ने का ऐलान कर दिया है. वो करीब 25 वर्षों से दैनिक जागरण के साथ कार्यरत थे. नीचे वो पत्र है जो उन्होंने दैनिक जागरण को भेजा है…


संबंधित खबरें:

महेंद्र मोहन और संजय गुप्‍ता को सरकारी मकान खाली करने का अल्‍टीमेटम

xxx

मीडिया पर क्यों भड़के अखिलेश…

xxx

अखिलेश जी बताएं कि अखबार मालिकों को दो बार राज्यसभा क्यों भिजवाया और अब क्या खटपट हो गई

xxx

इंडिया न्यूज और टाइम्स नाऊ पर अखिलेश यादव ने गिराई गाज

xxx

अखिलेश ने कहा- पत्रकारों ने खबर दिखाने के नाम पर दांव दिया

xxx

अखिलेश सही हों या गलत, लेकिन मीडिया को धोया बहुत सही है

xxx

तीन सौ करोड़ रुपये खर्च बताने वाला अखबार माफी मांगे : अखिलेश यादव

xxx

अखिलेश ने मीडिया से संबंधित जो सवाल उठाए हैं उस पर आत्ममंथन करना ही होगा

xxx

मुलायम अपने चहेते पत्रकारों से पूछें कि भैया तुम लोग बदल क्यों गए?

xxx

लखनऊ के पत्रकारों की ऐसी बेइज्जती तो मायावती ने भी नहीं की जैसी आज अखिलेश न कर दी

सुब्रत राय ने तो सुप्रीम कोर्ट-सेबी की सरेआम ऐसी-तैसी कर दी! (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : ये सुप्रीम कोर्ट, ये सेबी, ये नियम, ये कानून.. ये सब हमारे आप जैसे गरीबों, आम लोगों के लिए हैं.. हजारों लाखों करोड़ रुपयों में खेलने वालों के लिए ये सब तो प्रहसन, उपहास, हंसी के पात्र भर हैं.. यकीन न हो तो सुब्रत रॉय का ये लेक्चर सुन लीजिए..

वे अपने सहारा कर्मियों को भाषण पिला कर उत्साहित कर रहे थे… इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट, सेबी आदि की ऐसी-तैसी भी कर रहे थे… किसी मित्र ने मुझे गोपनीय रूप से इसे भेजा है, तो भड़ास पर लगा दिया… आप भी देखें और अपने किसी बौद्धिक मित्र को दिखाइए ताकि उनके बुद्धि की शुद्धि हो सके और सिस्टम-तंत्र को समझने की नई दृष्टि हासिल कर सकें… लिंक ये है…

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/777/interview-personality/subrat-roy-s-bhadas-against-supreme-court-and-sebi-1.html

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

मुंबई प्रेस क्लब में कामतानाथ की कहानी पर बनी शार्ट फिल्म का हुआ प्रदर्शन

24 जनवरी, 2014 की शाम प्रेस क्लब, मुंबई में हिंदी के सुपरिचित कथाकार कामतानाथ द्वारा लिखित कहानी 'सारी रात' पर बनी शार्ट फ़िल्म का चित्रण किया गया। फ़िल्म के चित्रण के उपरांत फ़िल्म के कलाकारों के साथ चर्चा-परिचर्चा में मशहूर चित्रकार-लेखक आबिद सुरती, प्रतिष्ठित कथाकार श्रीमती सुधा अरोड़ा, सुप्रसिद्ध समाजसेवी, लेखक एवं आयकर आयुक्त आर.के.पालीवाल तथा मशहूर रंगकर्मी एवं फ़िल्म अभिनेत्री डॉली ठाकौर ने भागीदारी की. कार्यक्रम का संचालन कवि-शायर देवमणि पांडेय ने किया.

फ़िल्म के युवा निर्देशक परिमल आलोक, अभिनेत्री पारू गम्भीर और सिने सम्पादक बलजीत कौर लाल ने दर्शकों के सवालों के जवाब दिए. इस परिचर्चा में मुम्बई महानगर के चित्रकार जैन कमल, कवि शैलेश सिंह, कवि संजय भिसे, कवि बसंत आर्य, कहानीकार शाश्वत रतन, गीतकार रासबिहारी पांडेय आदि रचनाकारों ने प्रमुखता से हिस्सा लिया.

फ़िल्म के निर्देशक परिमल आलोक ने बताया कि 12 सिने उत्सवों में इस लघु फ़िल्म का चित्रण हो चुका है. टाटा स्टील सुपर शार्ट्स 2013, जमशेदपुर में इसे बेस्ट डाइरेक्टर एवं बेस्ट फीमेल ऐक्टर अवार्ड तथा बंग्लूर शार्ट्स फ़िल्म फेस्टीवल में इसे स्पेशल जूरी अवार्ड प्रदान किया गया. न्यूयार्क में आयोजित इंडियन फ़िल्म फ़ेस्टीवल 2013 में इसे बेस्ट शार्ट फ़िल्म के लिए तथा स्टु्टगार्ट (जर्मनी) के फ़िल्म फ़ेस्टीवल 2013 में इसे ऑडियंस अवार्ड के लिए नामांकित किया गया.

फ़िल्म के युवा निर्देशक परिमल आलोक एक प्रतिभाशाली रंगकर्मी हैं और जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के रंग समूह मोटली से जुड़े हैं. ग़ौरतलब है कि अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने स्वर्गीय कामतानाथ की लोकप्रिय कहानी संक्रमण का नाट्य रूपांतरण किया जिसकी देश-विदेश में अनेक प्रस्तुतियाँ हुईं और इसे दर्शकों का ज़बरदस्त प्रतिसाद मिला. हाल ही में त्रैमासिक पत्रिका शब्दयोग ने स्वर्गीय कामतानाथ पर केंद्रित विशेषांक का प्रकाशन किया.

दिबांग बने एबीपी न्यूज के हिस्से, दीन से मुक्त हुआ कैनिवज टाइम्स, सुशील भारती के साथ जहरखुरानी

वरिष्ठ पत्रकार दिबांग अब एबीपी न्यूज में नौकरी करने लगे हैं. पहले वे आजाद पत्रकार थे और टीवी चैनलों पर डिस्कशन वगैरह में शामिल होते रहते थे. बीच में एक फिल्म मद्रास कैफे में भी दिबांग दिखे थे. दिबांग का स्वर्णिम काल एनडीटीवी के साथ रहा. तब वे वहां मैनेजिंग एडिटर हुआ करते थे और उनकी तूती बोला करती थी. अपनी तानाशाही के कारण दिबांग एनडीटीवी के भीतर और बाहर काफी अलोकप्रिय हो गए. आखिरकार एनडीटीवी ने एक दिन उनसे मुक्ति पा ली. उसके बाद दिबांग ने कहीं ज्वाइन करने की जगह विभिन्न किस्म के प्रयोग किए और आजाद पत्रकारिता की राह अपनाई. अब जानकारी मिल रही है कि एबीपी न्यूज ने उन्हें पूरी तरह अपने साथ जोड़ लिया है.

प्रभात रंजन दीन अब कैनविज टाइम्स, लखनऊ से कार्यमुक्त हो गए हैं. कैनविज टाइम्स प्रबंधन उनसे काफी समय से मुक्ति चाहता था. इसी कारण कैनविज टाइम्स के बरेली एडिशन की लांचिंग से दीन को अलग रखा गया. अनुपम मार्कंडेय और मुशाहिद रफत के नेतृत्व में अखबार की लांचिंग बरेली में की गई. अपनी उपेक्षा के कारण प्रभात रंजन दीन ने इस्तीफा दे दिया. सूत्रों का कहना है कि कन्हैया गुलाटी के मालिकाना वाले कैनविज टाइम्स के संपादकीय विभाग में अब मार्केटिंग एप्रोच वाले लोग ज्यादा रखे जा रहे हैं ताकि अखबार के जरिए गुलाटी के धंधों को बढ़ाया जा सके, साथ ही विज्ञापन और पेड न्यूज का भी कारोबार हो सके.

जहरखुरानी के कारण प्रभात खबर, देवघर के संपादक सुशील भारती इन दिनों बेहोशी की स्थिति में अस्पताल में भर्ती हैं. सुशील भारती अपने रिपोर्टर संजीत मंडल के साथ ट्रेन से धनबाद जा रहे थे. ट्रेन में जहरीली चाय इन्हें कुछ लोगों ने पिला दी जिसके बाद बेहोशी की स्थिति में चले गए. उन्हें धनबाद में एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

दैनिक जागरण ने हड़पे फोटोग्राफर के पैसे

दैनिक जागरण पत्रकारों के शोषक के रूप में पहले से ही जाना जाता रहा है. अब लखनऊ से खबर है कि मैनेजमेंट ने एक फोटोग्राफर का भी लगभग दस हजार रुपए मार लिया है. उक्‍त फोटोग्राफर से दो महीने काम कराया गया और जब पैसा देने की बात आई तो उसे हटा दिया गया. फोटोग्राफर कई बार प्रबंधन के वरिष्‍ठ लोगों से मिलकर अपने साथ हुए अन्‍याय की गुहार कर चुका है, परंतु मोटी चमड़ी वाले प्रबंधन पर इसका कोई असर नहीं है.

जानकारी के अनुसार बबलू शर्मा ने लगभग तीन माह पूर्व दैनिक जागरण में फोटोग्राफर के पर पर ज्‍वाइन किया था. हालांकि उसको ज्‍वाइन कराने के बाद भी ज्‍वाइनिंग लेटर नहीं दिया गया. अमूमन जागरण में ज्‍यादातर नियुक्तियां मुंहजबानी ही की जाती हैं ताकि शोषण का दौर चालू रखा जा सके. ऐसा ही इस फोटोग्राफर के साथ प्रबंधन ने किया. बताया जा रहा है कि एक महीना पूरा होने पर जब फोटोग्राफर ने अपनी सैलरी के बारे में पूछा तो उसे कागजी कार्रवाई का आश्‍वासन देकर मामले को टाल दिया गया.
 
हालांकि इसके बाद फोटोग्राफर बबलू शर्मा को प्रताडित करने का दौर भी शुरू हो गया. उसे एक ही टाइम पर दो से तीन असाइनमेंट सौंपे जाने लगे. बबलू किसी तरह मैनेज करके सारे असाइनमेंट पूरा करते रहे, लेकिन जब दो महीने पूरे होने के बाद भी उनकी सैलरी नहीं मिली तो उन्‍होंने प्रबंधन से पूछा. फिर आश्‍वासन देकर टाल दिया गया. बताया जा रहा है कि यह सब लोकल इंचार्ज की शह पर किया जा रहा था, क्‍योंकि एक बार बबलू ने सभासदों के एक कार्यक्रम में खाने के दौरान गलती से उनका भी फोटो खींच लिया था, जिससे वे कुपित हो गए थे और फोटो भी डिलीट करवा दी थी.

खैर, दो महीना पूरा होने के बाद भी जब बबलू को पैसा नहीं मिला तो उन्‍होंने हारकर दैनिक जागरण जाना ही बंद कर दिया. प्रबंधन ने उन्‍हें सैलरी की बजाय फोटो के हिसाब से रकम देने की बात कही. इस हिसाब से भी बबलू ने दो महीने में साढ़े नौ हजार रुपए बने. परंतु यह रकम दैनिक जागरण ने बबलू को नहीं दी. वे अब भी अपने पैसे के लिए जागरण के लोगों के पास भटक रहे हैं. अब देखना है कि दैनिक जागरण प्रबंधन एक गरीब फोटोग्राफर को उसके मेहनत का पैसा देता है या उस रकम को हड़प कर खुद को और अमीर बनाता है.

भास्‍कर न्‍यूज से जुड़े सरफराज सैफी

भास्‍कर न्‍यूज से खबर है कि सरफराज सैफी ने वीपी कारपोरेट के पर पर ज्‍वाइन किया है. वे इसके पहले इसी पद पर जय महाराष्‍ट्रा चैनल से जुड़े हुए थे. इस समूह के हिंदी चैनल लांचिंग में देरी के चलते उन्‍होंने इस्‍तीफा देकर अपनी नई पारी भास्‍कर न्‍यूज से शुरू की है.

 पिछले एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय सरफराज ने करियर की शुरुआत मेरठ में आजतक के रिपोर्टर के रूप में की थी. इसके बाद वे एसवन न्‍यूज चैनल से जुड़े और लंबी पारी खेली. इसके बाद वे आजाद न्‍यूज से जुड़े. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे न्‍यूज एक्‍सप्रेस पहुंचे. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद सरफराज ने महुआ समूह के यूपी-उत्‍तराखंड बेस्‍ड चैनल महुआ न्‍यूजलाइन ज्‍वाइन कर लिया था. यहां पर एंकरिंग में अपनी अलग पहचान बनाई. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे चैनल विजन वर्ल्‍ड से जुड़ गए थे.

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएट सरफराज को पत्रकारिता के लिए कई पुरस्‍कार भी मिल चुके हैं, जिनमें 2009 में बेस्‍ट क्राइम रिपोर्टर के लिए नेशनल टेलीविजन जर्नलिज्म अवार्ड और 2010 में बेस्‍ट यूथ एंकर के लिए राजीव गाँधी ग्लोबल एक्सेलेंस अवार्ड शामिल है.

आई नेक्‍स्‍ट के संपादक के घर चोरी दैनिक भास्‍कर व प्रभात खबर के लिए न्‍यूज नहीं

दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले मीडिया संस्‍थान प्रतिस्‍पर्धा के चक्‍कर में कितने अनैतिक हो चुके हैं, इसकी बानगी पटना में देखने को मिली. पटना में दैनिक जागरण समूह के अखबार आई नेक्‍स्‍ट के संपादक चंदन शर्मा के घर में चोरी हुई. चोरों ने तीन चार लाख का सामान साफ कर दिया. चंदन शर्मा ने चोरी की घटना की एफआईआर दर्ज कराई, इसके बाद भी दैनिक भास्‍कर और प्रभात खबर जैसे अखबारों ने चोरी की खबर प्रकाशित नहीं की.

सवाल यह है कि क्‍या एक पत्रकार के घर में चोरी की घटना इन अखबारों के लिए कोई खबर नहीं थी. या इस खबर को इसलिए प्रकाशित नहीं किया गया कि वो प्रतिस्‍पर्धी अखबार का पत्रकार है. इस खबर को दैनिक जागरण ने अच्‍छे से प्रकाशित किया तो हिंदुस्‍तान ने भी छोटी सी जगह देकर खबर छूटने के आरोप से बच निकला, लेकिन प्रभात खबर और दैनिक भास्‍कर ने इसकी भी जरूरत नहीं समझी.   

भारतीय राजनीति की आईटम-गर्ल, अरविन्द केजरीवाल

अंग्रेज इस देश को आजाद कराने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महात्मा गांधी को अव्वल दर्जे का धूर्त कहते थे। क्यों? गांधी जी ने अहिंसा के दम पर अंगरेजों की नाक में दम कर रखा था। गांधी अनशन करते। देश में अलख जगाते और प्राण त्यागने से पहले अनशन तोड़ देते (जैसा अंगरेज समझते थे)। बंदूक और तोपों के दम पर दुश्मनों से निपटने वालों के लिए यह नया अस्त्र था, सो अंगरेजों की खीज स्वाभाविक थी।

अब बाजार के चहेते लेखक चेतन भगत और पिता की वैमन्स्य राजनीति के उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे ने अरविंद केजरीवाल को राजनीति की आइटम गर्ल कहा है। खैर….किसी घुटे हुए राजनेता से ज्यादा लेखक या बुद्धिजीवी जैसे जीव की बातें हमेशा गौर से सुनी जाती हैं । उद्धव की पीड़ा समझी जा सकती है। मीडिया में उन्हें कितनी जगह मिलती है और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता कितनी है यह बताने की जरूरत नहीं है। वे जिस तरह की राजनीति की उपज हैं, वह भारतीय दर्शन और संस्कृति के सर्वथा विपरीत और अति निदंनीय रही है। फिर मुंबई जैसी जगहों पर अचानक उगी एक पार्टी की सक्रियता उन्हें परेशान तो करेगी ही।

और चेतन भगत… बाजार की भाषा समझते हैं और यह जान गए हैं कि जीवन में हर कर्म का आखिरी ध्येय धनोपार्जन होता है। धन आगमन के लिए वे लिखने के अलावा युवाओं में जोश जगाने का काम भी करते हैं। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और गुजरात जैसे कुछ खास राज्यों में उनकी आमद से धनोपार्जन होता है, कितना? यह वही जानें। सवाल राजनीति के आइटम गर्ल का है। जवाब यह यह है कि इसी आइटम गर्ल से कुछ सीखने की बात राहुल गांधी कर रहे हैं और भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह गली-मोहल्लो में नहीं, फुटपाथ पर चप्पल घिस रहे हैं। राजस्थान की सीएम वसुंदरा राजे ने यूं ही अपनी सुरक्षा में लगे दर्जनों जवानों की संख्या आधी नहीं कर दी है। और छत्तीसगढ़ के सीएम डा. रमन सिंह अपने 80 करोड़ की लागत से बनने वाले बंगले की फाइल लौटा नहीं रहे हैं। भाजपाई गोवा के सीएम की सादगी का अचानक गुणगान यूं ही नहीं कर रहे हैं।

नेताओं की यह सादगी उनके मूल स्वभाव में नहीं है। न खून में हैं। यह बदली हवाओं के साथ बहने का प्रयास है। यह हवा चलाने का श्रेय अरविंद से कौन छीन सकता है। हमारा मानना है कि भारतीय व्यवस्था (कानून या सामाज) को क्षति न पहुंचाने वाले हर प्रहार का इस्तेमाल जायज है। इस सड़ी-गली व्यवस्था के गिरेबां को पकड़ने के लिए जो हो सकता है करना चाहिए। परंपराएं टूटनी चाहिए। गरिमा के नाम पर फैली गंदगी को साफ करना ही चाहिए। अगर लालू प्रसाद यादव जैसा अपराधी अरविंद केजरीवाल की मजाक उड़ाने लगे तो समझना चाहिए कि खीज क्यों हैं और किस स्तर के लोगों में हैं।
 
दरअसल, अगर अरविंद राजनीति के तय मानकों की उपज होते तो उनसे निपटना आसान होता। वे चंदाखोर होते, ठेकेदारों के कंधे पर चढ़कर राजनीति करते या फिर कारपोरेट के अरबपतियों के स्पांसर बनकर किसी एकाध राज्य पर कब्जा करते तो शायद उनके खिलाफ आरोप लगाने में आसानी होती।  कुछ लोगों का दर्द स्वाभाविक है। पीआर पर अरबों खर्च कर जितना प्रचार कुछ नेता नहीं पा रहे हैं वे अरविंद एंड कंपनी को यूं ही मिल रहा है। फिर अचानक मोदीमय टीवी को अरविंद मय होते देख अगर चेतन भगत के पेट में दर्द होता है तो गलती अरविंद की नहीं है। चेतन की पाचन शक्ति की है।
 
रही
बात अरविंद के तौर तरीको की, तो इस मुल्क को कई क्षेत्रों में आइटम गर्ल की जरूरत है। ताकि मुफ्त की ऐश करने वालों को काम की आदत पड़े। पांच साल में, या जरूरत पड़ने पर एकाध बार शपथ दिलाने वाले राज्यपालों की खबर ली जाए। महामहिमों को यह समझा सकें कि प्रतिभा पाटिल की तरह सिर्फ हवाई यात्राएं कर इस देश के गरीबों की आह न लें। जरूरी काम भी करें। संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को झकझोंर पूछे कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है। आम लोगों को सड़क से हटाने वाले हाथों को भी मरोड़ने की जरूरत है।

दरअसल जब भी कोई आम आदमी खास तबके के हिस्से पर दावा जताता है, प्राचीन दावेदारों की जुबान कड़वी होने लगती है। और दावेदारों के आसपास के ‘सुख भोगने वाले’भी सक्रिय हो जाते हैं। चेतन भगत और उद्धव ठाकरे ऐसे ही लोगों की नुमाइंदगी करते हैं।

आखिरी बात…
अरविंद एंड कंपनी इस देश में लंबे समय तक चलेगी या नहीं, यह सवाल फिलहाल अनुत्तरित ही रहेगा। क्योंकि बिना कुछ लिए, इस देश ही नहीं, पूरी दुनिया में कुछ नहीं मिलता। खासतौर पर वोट तो बिल्कुल नहीं। फिलहाल बिजली पानी सस्ता देकर अरविंद ने वोट की कीमत चुका दी है। पर हर बार वोट पाने के लिए वे क्या दे पाएंगे यह सवाल अनुत्तरित है। अगर इस देश के नागरिक इतने ही ईमान पसंद होते तो लालू, जयललिता, मुलायम, मायावती, येद्दूरप्पा जैसे लोगों का नाम लेवा कोई नहीं बचता।

 

ब्रह्मवीर सिंह

 

साहित्यिक-सांस्कृतिक कवरेज को लेकर गंभीर नहीं हैं लखनऊ के समाचार पत्र

पिछले दिनों लखनऊ में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन हुआ। शिवपूजन सहाय की स्मृति में हुए इस समारोह में गिरिराज किशोर, अरुण कमल, रवीन्द्र वर्मा, नरेश सक्सेना, वीरेन्द्र यादव, अखिलेश, आउटलुक के सम्पादक नीलाभ मिश्र सहित कई प्रमुख लेखकों, पत्रकारों ने शिरकत की। बताने की जरूरत नहीं गिरिराज किशोर, अरुण कमल, नीलाभ मिश्र सहित कई लोग दूसरे नगरों से समारोह में आए थे लेकिन रचनाकारों के   इस बड़े जमावड़े का पता दूसरे दिन के प्रमुख समाचार पत्रों से नहीं चला। एक बड़े समाचार पत्र ने तो पूरी खबर ही गोल कर दी। दूसरे ने छापी मगर सिंगल कालम, बहुत मुश्किल से उसे खोजा जा सकता था।  यह समारोह नगर के बड़े अखबारों के लिए कोई महत्वपूर्ण खबर नहीं बन सका ।

लखनऊ के समाचार पत्रों से साहित्यिक-सांस्कृतिक कवरेज को लेकर गंभीरता का अभाव दिखने लगा है। हालांकि इसके पीछे संस्थानों का कोई सर्वेक्षण नहीं है लेकिन यह मान लिया गया है कि ऐसी खबरों के पाठक कम हैं। रविवार की साप्ताहिकी जिसमें साहित्य, संस्कृति, कला या विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर गंभीर लेख हुआ करते थे, पूरी तरह फिल्म और टेलीविजन पर आधारित कर दी गई है। राजनीति, अपराध, सरकारी योजनाओं या नागरिक समस्याओं के बाद फिल्म और टेलीविजन की खबरें ही अखबारों के लिए महत्वपूर्ण बन गई हैं। अब कतई यह जरूरी नहीं रह गया है, कि इन अखबारों के दर्जनों रिपोर्टरों में कम से कम एक रिपोर्टर ऐसा हो जिसकी साहित्य, कला, संगीत या फिल्मों की जानकारी और दृष्टि दुरुस्त हो। ऐसा न करने के पीछे इन संस्थानों का यह दंभ झलकता है, कि किसी से भी इन कार्यक्रमों की कवरेज करायी जा सकती है। यही कारण है कि ज्यादातर ऐसी रिपोर्टिंग वे नवोदित पत्रकार कर रहे हैं जो या तो प्रशिक्षु हैं या कुछ समय पहले सब एडिटर बने हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बड़ी-बड़ी फोटो लगाकर अखबार को तो आकर्षक बना लिया जाता है लेकिन अखबार की हकीकत का पता उन कार्यक्रमों की खबरों से चलता है।

गंभीर जानकारी के अभाव और ग्लैमर की दुनिया से आक्रान्त ये साथी इस क्षेत्र में एक छद्म संसार को बढ़ावा दे रहे हैं जो प्रतिबद्ध कला और लेखन जगत पर हावी हो गया है। ऐसा ही एक उदाहरण पिछले दिनों हुआ रेपेटवा नाट्य समारोह का रहा जिसे खूब कवरेज मिली। टीवी और फिल्म कलाकारों तथा हास्य-सेक्स के संवादों से भरे इन नाटकों की कवरेज के दौरान किसी रिपोर्टर साथी ने यह सवाल उठाने की कोशिश नहीं की कि क्या हमारे समाज की जरूरी समस्याएं या द्वंद इनमें उभर पा रहे हैं या नहीं?

विडम्बना यह है कि ऐसी कवरेज में लगे ज्यादातर साथी टीवी-फिल्म कलाकारों के साथ फोटो खिंचाते और फेसबुक पर अपलोड करते-करते जल्द ही आत्ममुग्ध स्थिति में आ जाते हैं। वे पं. हरिप्रसाद चौरसिया से यह पूछते हुए नहीं हिचकते कि आप क्या बजाते हैं? और पंडित जी अगर इस बात पर नाराज हो जाए तो अपनी कवरेज में उनकी ऐसी-तैसी कर सकते हैं। ये वे साथी हैं जिनके लिए सुरेन्द्र वर्मा और सुरेन्द्र शर्मा या हबीब तनवीर और जावेद हबीब में फर्क करना मुश्किल होता है लेकिन क्या दोष सिर्फ उनका है?

 

पत्रकार आलोक पराड़कर की फेसबुक वॉल से।

 

पत्रकार सुरक्षा कानून व अन्य मांगों को लेकर महाराष्ट्र के पत्रकार 17 फरवरी को आन्दोलन करेंगे

पत्रकार सुरक्षा कानून और पत्रकार पेन्शन की मांग को लेकर महाराष्ट्र के पत्रकार 17 फरवरी को राज्य के सभी जिला सूचना कार्यालयों का घेराव करेंगे। महाराष्ट्र की पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति ने इस आंदोलन का ऐलान किया है। महाराष्ट्र के 35 जिलों के पत्रकार अपने-अपने जिले के सूचना कार्यालय के सामने बैठकर वहां के दैनिक काम का विरोध करेंगे। पत्रकार वहां अपनी मांगों के समर्थन में नारे लगायेंगे और जिला सूचना अधिकारी को ज्ञापन भी देंगे। यह जानकारी पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति के अध्यक्ष एस. एम. देशमुख द्वारा दी गई।

महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर बढ़ते हमलों को लेकर राज्य के पत्रकार काफी चिंतित हैं। हमले रोकने के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून बनाए जाने की मांग को लेकर पत्रकार पिछले पांच साल से आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकार इस मामले में उदासीनता बरत रही है। इससे पत्रकारों में काफी रोष है। सरकार के इसी रवय्ये के विरोध मे पत्रकारों नें अब सड़क पर उतर कर आंदोलन करने का निर्णय किया है। पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकार पेन्शन के अलावा एक्रेडिटेशन(मान्यता) समिति का गठन, पत्रकार बीमा योजना, छोटे और मध्यम वीकली और डेली अखबारों को दिए जाने वाले विज्ञापन के दरों में बढ़ोत्तरी, टीवी और प्रिन्ट मिडिया के श्रमिक-पत्रकारों को नोकरी की गारंटी, तहसील स्तर पर पत्रकार भवन के लिए जगह और अनुदान, पत्रकारिता विश्वविद्यालय का गठन और प्रेस कौन्सिल ऑफ इंडिया की तरह स्टेट प्रेस कौन्सिल का गठन आदि मांगें भी आन्दोलन में उठाई जाएंगीं। एस.एम.देशमुख ने महाराष्ट्र के पत्रकारों से 17 फरवरी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की अपील की है।

केजरीवाल ने अंबानी को लिखा- मैंने आपको डिफेम किया, मीडिया ने नहीं, इसलिए मीडिया को मत धमकाओ

ये हिम्मत, ये तेवर केवल अरविंद केजरीवाल में ही हो सकता है. पिछले साल 31 अक्टूबर और 9 नवंबर को प्रेस कांफ्रेंस कर अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने मुकेश अंबानी पर कई तरह के आरोप लगाए थे और उस प्रेस कांफ्रेंस का लाइव प्रसारण कई न्यूज चैनलों ने किया.

तब मुकेश अंबानी की तरफ से बीते दिसंबर महीने में कई न्यूज चैनलों को सात पेज का लीगल नोटिस भेजकर उन पर मानहानि करने का आरोप लगाया. पर इस लीगल नोटिस में न तो स्विस बैंक में अंबानी के एकाउंट जैसे आरोपों का जिक्र था और न ही कृष्णा गोदावरी बेसिन में आरआईएल द्वारा किए गए गड़बड़झाले के आरोपों का वर्णन.

आश्चर्य तो ये कि लीगल नोटिस में अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण तक को पार्टी नहीं बनाया गया. सिर्फ मीडिया को, न्यूज चैनलों को टारगेट किया गया. एक तरह से अंबानी ने न्यूज चैनलों को डराने, धमकाने के लिए ये लीगल नोटिस भेजा. न्यूज चैनलों ने पता नहीं क्या जवाब दिया या क्या डील कर लिया, पर अरविंद केजरीवाल ने अपनी तरफ से मुकेश अंबानी को पत्र लिखकर कहा है कि न्यूज चैनलों ने नहीं बल्कि मैंने यानि अरविंद केजरीवाल ने आपकी मानहानि की है, इसलिए मेरे पर मुकदमा करो, मीडिया को लीगल नोटिस भेजकर मत धमकाओ. केजरीवाल का पूरा पत्र इस प्रकार है…

Shri Mukesh Ambaniji

Recently you have sent a legal notice to all TV channels in the county. Their fault is that they “live” telecast the press conference addressed by Prashant Bhushan and me on 31 October 2012 and 9 November 2012.

We, in our press conferences, informed the citizens of India on how you illegally pressured the government for a hike in fuel prices. Our expose was covered “live” by many TV channels.

You have sent them a legal notice for defamation suit.

I am not able to understand this.

If you have been defamed by Prashant Bhushan and me, then we are at fault. Why has the notice been sent to TV channels and not us? This clearly reveals that your motive was to exert pressure on the TV channels….

According to your company, the “live” telecast by TV channels is a case of defamation.

Just think through: is it really me or Prashant Bhushan or the TV channels who have defamed you, or have you yourself defamed your image by your acts?

I request you do not try to threaten the media of this country.

There could be a few people in the media who are biased; they can follow you.

Still, there are many journalists who work for this country. They will not be influenced by you. History is witness that such journalists come forward to save democracy.

There could be some media houses where you could have directly or indirectly invested money; they could come under your control. But the journalists working for them will not.

Yours, etc

Arvind Kejriwal


इसे भी पढ़ें:

अरनब से कोई टाइम्स आफ इंडिया वालों के इस करप्शन पर पूछे

xxx

केजरीवाल एंड कंपनी, एजेंडा पत्रकारिता और कुछ तथ्य

पत्रकार ज्ञानेश श्रीवास्तव के साथ लूटपाट की कहानी, उन्हीं की जुबानी

Gyanesh Srivastava : मित्रों, कल यानी 25 जनवरी को मैं भी सरेशाम लूटेरों का शिकार हो गया। दो अपराधियों ने मुझे गन-प्वाइंट पर वैशाली अंसल प्लाजा के सामने डाबर रेड लाइट (तिराहा) के पास मुझे कुछ देर के लिए किडनैप कर लिया, और फिर कैश, एक अंगूठी, और कलाई घड़ी लूटने के बाद चलते बने। घटना करीब शाम आठ से साढ़े आठ बजे की है।

मैं अपने ऑफिस अंसल प्लाजा से अपने घर आईपी एक्सटेंशन की ओर जा रहा था। जैसे ही डाबर तिराहे वाली रेडलाइट के चंद कदम आगे बढ़ा, एक फोन रिसीव करने के लिए अपनी कार को साइड किया। अभी बात शुरू ही किया था कि सामने से टहलते आ रहे दो युवक आए।

एक मेरे ड्राइवर सीट के पास आ कर खड़ा हो गया जबकि दूसरे ने बगल से दरवाजे खोलकर अंदर आ गया। मेरे पास खड़े अपराधी ने विदेशी रिवाल्वर मेरे कनपटी पर सटा दी। फिर जल्दी से सारा कैश देने को कहा। सब कुछ इतनी जल्दी में हुआ कि समझ में नहीं आया कि क्या करूं।

तब तक मेरे ब्लेजर में हाथ डालकर सारा कैश, (3000) अंगूठी और कलाई घड़ी उतरवा ली। उसके बाद लुटेरों ने धमकाते हुए मुझे सीधे जाने को कहा। मैं गाड़ी आगे बढ़ा दिया और फिर पुलिस को फोन करते हुए सामने कुछ ही दूरी पर स्थित कौशांबी पुलिस चौकी पहुंचा। वहां से करीब सात-आठ पुलिसवालों के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुंचा और काफी देर तक अपराधियों को खोजने का प्रयास किया लेकिन तब तक वे लोग निकल गए थे।

मैंने पुलिस थाने में देर रात रिपोर्ट दर्ज करा दी है। दिल्ली में रहते करीब 18 साल हो गए, ये पहला हादसा था मेरे साथ। इस पूरे हादसे में सबसे खास बात ये रही कि मेरा लैपटॉप, जो पीछे वाली सीट पर था, और मेरे दोनों मोबाइल को अपराधियों ने हाथ नहीं लगाया। अपराधियों का हुलिया, कदकाठी और बोलने का अंदाज ऐसा था मानो कोई पुलिसवाला हो। अपराधियों ने कनपटी पर जो रिवाल्वर सटाया था, वो माउजर था, कोई कट्टा नहीं।

उपर वाले की मेहरबानी थी कि कोई बड़ा हादसा होने से बच गया, क्योंकि जिस अंदाज में लुटेरों ने लूटपाट की, और चहलकदी करते चले गए उससे तो यही लग रहा था कि वो कुछ भी कर सकते थे। आज सुबह पुलिस वालों से पता चला कि मेरे पहले ठीक यानी उसी समय इसी अंदाज में एक व्यापारी से दोनों लूटेरों ने लूटपाट की थी। ईश्वर को साधुवाद कि एक बड़ा हादसा टल गया।

पत्रकार ज्ञानेश श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

कुछ भी कहो, ये मुसलमान गद्दार ही रहेंगे!

Himanshu Kumar : कल मुज़फ्फरनगर में अपने एक संबंधी के साथ बैठा था. पूछने लगे कि क्या कर रहे हो आजकल? मैंने बताया कि मुज़फ्फरनगर दंगा पीड़ितों को मुफ्त कानूनी सहायता देने के लिए एक केन्द्र शुरू किया है. कहने लगे कि कुछ भी कहो, ये मुसलमान गद्दार ही रहेंगे. ये कभी इस देश के नहीं हो सकते. अब मैं अचकचाया कि बात को शुरू कहाँ से करूँ.

जो मेरे सामने थे वो रिश्ते में आदरणीय हैं, इसलिए तुर्शी दिखाने की मुझे यहाँ छूट नहीं थी. मैंने आहिस्ता से कहना शुरू किया कि यहाँ जो एक राहत शिविर है 'जौला' गाँव में उसमें करीब हज़ार लोग रह रहे हैं. ये लांक बहावडी लिसाढ़ अदि गाँव के लोग हैं. इन्होने जौला में इसलिए आकर शरण ली है क्योंकि जौला पूर्णतः मुस्लिम गाँव है.

मेरे आदरणीय की पेशानी पर अभी भी तनाव था. मैंने कहना जारी रखा. मैंने कहा कि सन अट्ठारह सौ सत्तावन में जौला गांव की आबादी करीब पांच सौ लोगों की थी. और भारत के उस पहले स्वतंत्रता संग्राम में जौला के ढाई सौ मुसलामानों को अंग्रेजों ने मार डाला था.

मेरे आदरणीय के चेहरे का भाव अब बदलने लगा था. उनकी पत्नी भी कमर पर हाथ रख कर मेरी पराजय की प्रतीक्षा में सन्नद्ध खड़ी थीं. लेकिन अब उन्होंने भी अपनी कमर से हाथ नीचे कर लिए. मुझे लगा कि मौका अच्छा है अब अगला कारतूस दाग दो.

मैंने आगे कहा कि भारत के ख़ुफ़िया राज़ विदेशों को बेचने के जितने भी मामले पकड़े गए हैं, उनमे पकड़े गए नब्बे फीसदी आरोपी हिंदू हैं. मैंने राजनयिक महिला जासूस माधुरी गुप्ता और सब्बरवाल का नाम बताया.

अब मेरे आदरणीय के चेहरे का भाव एकदम बदल गया. बोले- नहीं, सभी मुसलमान खराब नहीं होते. लेकिन कुछ तो इनमें से बदमाश हैं ही.

मैंने कहा कि जी, यूं तो कुछ हिंदू भी बदमाश होते हैं.

अब मेरे आदरणीय पूरी तरह अपने हथियार डाल चुके थे.

मैंने अच्छा मौका भांप कर कहा कि देखिये हम न तो इस देश की एक भी इंच ज़मीन को इधर से उधर कर सकते हैं, न किसी एक भी नागरिक को भारत से बाहर भगा सकते हैं. हमें इन्हीं मुसलमानों के साथ ही रहना है. अब फैसला ये ही करना है कि मिल कर रहना है या लड़ते लड़ते रहना है.

अब वे योद्धा की भूमिका छोड़ शिष्यत्व मुद्रा में आ चुके थे. बोले- हाँ सही कह रहे हो, तुम्हारा काम बहुत ज़रूरी है. हमारी किसी मदद की ज़रूरत हो तो बताना.

आज सुबह मुज़फ्फरनगर की पुलिस लाइन में पहुंचा तो साईकिल पर एक टिपिकल मुल्ला जी दाढ़ी और गले में फिलीस्तीनी काले चेक वाला रुमाला लपेटे अपने सात एक साल के बच्चे को साईकिल पर आगे बिठा कर छब्बीस जनवरी की परेड में शामिल होने की लिए आ रहे थे. बच्चे के हाथ में छोटा सा प्लास्टिक का तिरंगा था जिसे वो जोर-जोर से हवा में डुला रहा था. भारतीय मुसलमानों के बारे में मेरे सभी दावों को इस दृश्य ने पुख्ता कर दिया था. मैं भी मुस्कुराता हुआ छब्बीस जनवरी की उस भीड़ में मुल्ला जी और उनके बच्चे के साथ-साथ शामिल हो गया.

जाने-माने मानवाधिकारवादी और सोशल एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

ये Kavita Krishnan ‘आप’ पर इतनी आक्रामक क्यों हैं चचा?

Samar Anarya : ये Kavita Krishnan 'आप' पर इतनी आक्रामक क्यों हैं चचा?

भतीजे- इनकी करतूतों के चलते भाकपा माले (लिबरेशन) में जो 'आप' में जाने के लिए भगदड़ मची है, तो बिचारी, और कर भी क्या सकती हैं?

-वो तो ठीक है चचा. पर लिबरेशन का राज्य पार्टी होने का दर्जा तो पिछले चुनाव में ही छिन गया था.

-टीवी क्रांतिकारी होने का दर्जा तो बाकी है चचा.

xxx

लिबरेशन का राज्य पार्टी होने भर का अधिकार बस बिहार भर में बचा था. वो पिछले चुनाव से ही छिनने के कगार पर था. इस बार Kavita Krishnan और जहरीले प्रोफ़ेसर की करतूतों के चलते चला ही जाएगा। बेचारे, अब क्या करेंगे?

xxx

एनडीटीवी से लेकर आजतक पर दहाड़ते रहने वाली नारीवादियों में से कितनों को बीरभूम सामूहिक बलात्कार मामले पर मुंह खोलते तक सुना है? रस्मी बयानों को छोड़ मुज़फ्फरनगर पर भी चुप ही थे ये सब. उदारवादी, समाजवादी, अराजकतावादी आदि आदि नारीवादी आन्दोलनों को चुनौती दे रही इन कैमरा-माइक नारीवादियों को मेरा सलाम!

xxx

राज्यसभा उपसभापति कुरियन साहब बलात्कार आरोपी हैं. बाकी हजार नेताओं पर भी यौन हिंसा के हजार मामले हैं. पर तमाम नारीवादी उनके खिलाफ कभी ऐसे नहीं बोले, ऐसे आग नहीं उगली जैसी 'आप' के सोमनाथ भारती पर उगल रहे हैं. मैं समझ नहीं पा रहा क्यों। आप बता दें प्लीज़।

xxx

सुना है कि Kavita Krishnan सुनन्दा पुष्कर मामले में एआईसीसी को चिट्ठी लिखेंगी। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने खुर्शीद भाई के मामले में लिखी थी. बाकी बेचारी जहरीले प्रोफ़ेसर के साथ मिल के भी वीडिओ का जुगाड़ नहीं कर पा रही है.

xxx

ऑल इंडिया स्टूडैंट एसोसिएशन (आइसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और और पूर्व अध्यक्ष जेएनयू छात्रसंघ संदीप सिंह के इस्तीफे की अब तक उड़ रही ख़बरों की पुष्टि। 'आप' में शामिल होने के लिए चल रही है बातचीत। जमीनी राजनीति को टीवी स्टूडियो की बहसों में बेच आये, मधु किश्वर के नेतृत्व में बिरादराना कामरेडों की हत्या पर उतर आये संगठन में ईमानदार लोग रह भी कब तक सकते थे. जहाँ भी रहें कामरेड, आपकी प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता असंदिग्ध है. लाल सलाम।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.


Shahnawaz Malik : खुर्शीद प्रकरण पर आईसा के एक कॉमरेड मुझपर भड़क गए। सामान की क्वालिटी पर शक करेंगे तो दूकानदार भड़क ही जाता है।

xxx

संदीप सिंह आईसा के ज़मीनी, जुझारू और तूफानी कार्यकर्ता थे। उम्मीद करता हूँ कि संदीप पर गद्दार, अवसरवादी और कैरियरिस्ट का ठप्पा नहीं लगाया जाएगा।

xxx

आईसा के पेशेवर आंदोलनकारी अभी संघियों से बड़े शैतान नहीं हुए हैं। फिर भी उन्हें बताना चाहता हूं कि जब मोदी की साइबर टीम मेरे पीछे पड़ी हुई थी और वर्चुअल किलिंग के अलावा मुझे हर तरह से डैमेज करने में पूरी ताकत झोंक दी थी, तब भी मैं यहीं रहा। कुछ भी नहीं बिगड़ा मेरा। अपनी सारी एनर्जी लगाने के बाद वो दुम दबाकर भाग गए। अब उनकी जगह आईसा के फासीवादी कॉमरेड्स ने ले ली है। लेकिन हे कॉमरेड…मैं हफ्ते में चार दिन आपके गढ़ में ही रहता हूं। पेरियार हॉस्टल में नाइट स्टे करता हूं। डिनर भी वहीं करता हूं। फिर आमने-सामने टकराने की बजाय आपको स्टेटस लगाने की क्या ज़रूरत पड़ गई? भाई ये संदीप सिंह और राजन पांडेय और अलंकार के जाने का फ्रस्टेशन है या फिर अक्ल से पैदल हैं आप। मेरी गुज़ारिश है कि मुझे धमकाने की बजाय अपना वक्त सबूत मिटाने में लगाइए। पुलिस जल्दी आपके आलाकमान के हाथों में हथकड़ी पहनाएगी। वैसे दिलचस्प ख़बर तो यह भी आ रही है कि हिंदी पट्टी के ज्यादातर कॉमरेड्स आपकी पार्टी को बाय-बाय करने वाले हैं।

नवभारत टाइम्स में कार्यरत पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.

अरनब गोस्वामी से कोई लाइव ही टाइम्स आफ इंडिया वालों के इस करप्शन के बारे में पूछ ले

Yashwant Singh :  लगातार बोलते रहने वाले अरनब गोस्वामी से कभी किसी को लाइव ही पूछ लेना चाहिए कि हे टाइम्स आफ इंडिया के गुलाम संपादक, क्या मुंबई में जो जमीन एक रुपये में सरकार ने टाइम्स ग्रुप को अखबार निकालने के लिए दी, वहां से अब भी अखबार निकल रहा है या नहीं? उस एक रुपये में मिली सरकारी जमीन पर टाइम्स वाले बिजनेस, धंधा, बैंकिंग, किराया आदि का कारोबार कर रहे हैं और टाइम्स आफ इंडिया का आफिस कहीं और शिफ्ट कर दिया है… यह अनैतिक काम है या नहीं?

मुंबई के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कल विस्तार ये यह जानकारी दी तो मैं चौंक गया. लगा कि इस पर विस्तार से लिखा जाना चाहिए. दूसरों को नसीहत, खुद मियां फजीहत. आजकल का दौर ऐसा है कि लोग अपने गिरेबां में नहीं, दूसरों के चेहरों-घरों की रंगत देखा करते हैं… हिप्पोक्रेसी का ऐसा चरम पता नहीं कभी था या नहीं… या, संभव है, यही हिप्पोक्रेसी, यही अंतरविरोध की प्रकृति का मूल स्वभाव हो… पता नहीं… कनफ्यूज हूं.. लेकिन मुझे इन उलटबांसियों को देखकर सच में बांसुरी बजाने का मन कर रहा है, किसी पड़ोसी के खेत में उगे पेड़ की डाल पर बैठकर…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. फेसबुक पर यशवंत से संपर्क https://www.facebook.com/yashwant.bhadas4media या https://www.facebook.com/yashwantbhadas के जरिए किया जा सकता है.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

        Subhash Tripathi oh Really com
 
        Pawan Kumar सही कहा सर
   
        Amit Maurya Dho dala bhaiya ji
    
      माधो दास उदासीन ऊंची जबान वाले प्रमोशन भी जल्दी पा जाते होंगे
         
        Anurag Chaturvedi मुंबई में टाइम्स लीज को लेकर महाराष्ट्र की सरकार पर हमेशा दबाब बनाता है.कांदिवली में कब्रिस्तान पर प्रेस खोला और वीटी की इमारत में जम कर तोड़फोड़ की. टाइम्स ने कानून तोड़ना अपना अधिकार मान लिया है. इनकी जाँच ज़रूरी है.
 
      पी सी रॉय जो पैसे से फिट है, वही चैनल अखबार हिट है ।
         
        Narendr Kumar Gupta सबके सब नंगे! जो छिपाने में माहिर, वो ईमानदारी का अवतार.
         
        Ashok Tiwari आज सुबह जब रोज की तरह मैंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया का मुख्य पेज देखा तो यकीन नहीं हुआ की ये नेशनल न्यूज़ पेपर है। गत वर्षो में 26 जन के पेपर में राष्ट्रपति का रास्त्र के नाम संदेश एवं उनका फोटो जरूर होता रहा परन्तु आज यह सब नदारद रहा। आज दिल्ली के cm छाये रहे। क्या यह सब किसी दबाव में या प्रेम में।
         
        Ashutosh Na Real कोई तो हो जो लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण खम्भे के काले सच को उजागर करे।
         
        Journalist Pankaj Sharma Pankaj good
         
        Vikas Pandit Veeky Sir dhandha h par ganda h ye . .
         
        Alok Ranjan nice one sir….mai bhi suna hu ki congress ne…HO RAHA BHARAT NIRMAN ke liye heavy amount diya hai sath…me rahul gandhi ka interview bhi bonus me mila hai…..usne TIMES NOW debate me anarchy 66 times bola ….jab bjp or congress bhart bund karte hai aur road pe kisi ko nikal ne nai dete…us din kya hota hai….jab emergency ,sikh riot,godhra,bhagalpur,mujaffarnagar…ye sab kya hai…..????? arnav goswami ka double standard aap log aise log ko aage aa kar batana chahiye…..
         
        Suresh Gandhi true…
         
        Nripendra Singh फिर भी अर्नव गोस्वामी निष्पक्षता के साथ कांग्रेस सहित सभी के विरुद्ध समय-समय पर चर्चा कराते रहते है| आप के कथन के परिपेक्ष्य में उनके हिम्मत की दाद देनी चाहिए|

TC Chander दिल्ली का हाल कौन सा कम है, नज़र डालें और छापें…
 
Faisal Anurag Arnav ji es par hansenegen.kahengen desh yah nahi jaanana chahta.modi ko esase kya nuksaan hai.
 
Ashish Pandey Baba sahmat hun…
 
Syed Quasim aur ito ki tamaam buildigen bhi…
 
Alka Bhartiya aisa hi hain gar mediay wale imandar ho jate to kab desh ka yah haal hota jo ho rahh hain
 
Alok Kumar यशवंत भाई, टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक अशोक जैन पर फेरा का गंभीर केस रहा। वो फरार थे। विदेश में ही उनके रहस्यमत निधन की बात सामने आई । इंडियन एक्सप्रेस से उनका परिवारिक रिश्ता है। हिंदुस्तान टाइम्स की भी ऐसी ही कहानी है। इनके करतूत के आगे पेड न्यूज से करप्शन की गंभीर कहानी छोटी लगती है।
 
Shyamnandan Kumar गुरुदेव, मेरे पास एक एक्सक्लूसिव इंफॉर्मेशन है। आबिद सुरती साहब को आप जानते ही हैं। बात उनसे सीधे तौर पर जुड़ी है। आपके इनबॉक्स में एक लिंक शेयर कर रहा हूं, जरा मामले की तह तक पहुंचिए। घपला ही घपला है…!!! जनता को हक दिलाने वाले कब किसी का हक मार जाते हैं, खुद हकदार को भी पता नहीं चल पाता है।
 
Sanjay Sharma Sach hai yah ?


इसे भी पढ़ें:

आम आदमी पार्टी के मुद्दे पर Times Group सफाई क्यों दे रहा है?

xxx

केजरीवाल एंड कंपनी, एजेंडा पत्रकारिता और कुछ तथ्य

xxx

आधे मीडिया मालिक मोदी के पक्षधर और आधे राहुल गांधी के साथ : केजरीवाल

xxx

दो दिन से तरुण को बेच रहे हैं अर्नव… पर तेजपाल जैसी पत्रकारिता कब करेंगे गोस्वामी?

केजरीवाल एंड कंपनी, एजेंडा पत्रकारिता और कुछ तथ्य

Yashwant Singh : सोमनाथ भारती और केजरीवाल ने मीडिया वालों को गरिया क्या दिया, कुछ मीडिया वालों की सुलग गई.. न्यूज नेशन के अजय कुमार और एबीपी न्यूज के विजय विद्रोही लगे अपने कथित सरोकारी तेवर का प्रदर्शन करने… लगे प्रमाण मांगने और 'आप' को सबक सिखाने… अरे अजय और विद्रोही जी… सच्चाई आप भी जानते हैं, काहें मुंह खुलवाते हो… वैसे, मुंह खुलवाने की भी क्या जरूरत है…

मुझे पता है कि आप सभी छुप छुप के भड़ास http://www.bhadas4media.com पढ़ते हो और यहां प्रकाशित होने वाली मीडिया की अंधेर नगरी के किस्सों से खूब वाकिफ हो… न्यूज नेशन किसका चैनल है, इसमें किसका पैसा लगा है, इस चैनल के परदे के पीछे कौन है… यह अगर किसी को न पता हो तो कोई बात नहीं… लेकिन हम सब तो जानते हैं… चैनलों के जरिए कैसे ब्लैक को ह्वाइट किया जाता है, यह आपको बताने की जररूत नहीं है…

एजेंडा पत्रकारिता के इस दौर में कोई भी न्यूज चैनल यह नहीं कह सकता कि वह निष्पाप है और किसी एजेंडे के तहत नहीं बल्कि जनता के लिए पत्रकारिता करता है… न्यूज नेशन भी नहीं… जब किसी नेता के पास अकूत संपत्ति और अकूत ब्लैकमनी हो जाया करती है तो वह अपना मीडिया हाउस खोल लेता है, सीधे या छिपे नाम से.. ताकि एक तो वह अपने हिसाब से एजेंडा पत्रकारिता कर अपनी पार्टी व अपने पक्ष में जनमत तैयार कर सके, दूसरे इन चैनलों की आड़ में अपनी विशाल ब्लैक मनी को ह्वाइट कर सके…

अगर नैतिकता है तो आप लोग खुद मांग करिए कि सभी न्यूज चैनलों की आडिटिंग सीएजी यानि कैग के जरिए कराई जाए.. अगर निजी बिजली कंपनियों का आडिट सीएजी के जरिए होने पर मुहर लग चुकी है तो चौथे स्तंभ जैसे संवेदनशील खंभे का आडिट क्यों नहीं होना चाहिए… दलालों, बिल्डरों, चिटफंडियों, ब्लैकमार्केटियरों, भ्रष्ट नेताओं, करप्ट अफसरों, कारपोरेट घरानों के पैसे पर चलने वाले इन न्यूज चैनलों की असलियत जनता जानती है. कहीं अंबानी का पैसा किसी चैनल में लगा है तो कहीं बिड़ला घराना खुद ही मीडिया हाउस चला रहा है… दर्जनों कार्पोरेट घराने मीडिया मालिक बन चुके हैं और बड़े चैनलों अखबारों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संचालित कर रहे हैं.. ऐसे में अगर कोई कार्पोरेट टाइप एंकर या पत्रकार यह चिल्लाए कि मीडिया पर कैसे आरोप लगा दिया तो उसे विशुद्ध मूर्ख व बेवकूफ ही माना जा सकता है, इसके अलावा कुछ नहीं. वैसे भी, लाखों की सेलरी लेकर एंकरिंग करने वालों से यह अपेक्षा मालिक तो करता ही है कि वह जोर-जोर से बोल के, आंखें तरेर तरेर के एंकरिंग करे ताकि लोगों को भ्रम बना रहे कि यह चैनल तो बड़ा दबंग है

एबीपी न्यूज में एक महिला ने खुलेआम यौन शोषण का आरोप लगाया लेकिन विद्रोही जी के मुंह से विद्रोह के बोल न फूटे… ऐसे सभी पत्रकार, न्यूज चैनल जब एकजुट होकर अपने मालिकों के अघोषित निर्देश पर आम आदमी पार्टी पर टूट पड़ते हैं, आम आदमी पार्टी के लोगों के हगने-मूतने से लेकर छींकने-पादने तक पर खबर, बाइट, न्यूज, पैकेज, शो, डिस्कशन करने लगते हैं तो शक तो होता ही है कि पार्टनर, आखिर आपकी पालिटिक्स क्या है..

विधानसभा चुनाव चार-पांच प्रदेशों में हुए हैं.. लेकिन मीडिया सिर्फ केजरीवाल एंड कंपनी का पोस्टमार्टम कर रहा है… शिवराज सिंह चौहानों, रमन सिंहों, वसुंधारे राजों जैसों को तो इन मीडिया वालों ने 'एवमस्तु' कह दिया है… अभी ओम थानवी जी ने लिखा था कि वसुंधरा राजे ने वन माफिया के पक्ष में एक पुराने कानून को यह कहकर पलट दिया कि इस पलटने से आदिवासियों को फायदा होगा. ( देखें लिंक: http://www.bhadas4media.com/vividh/17442-2014-01-25-07-32-22.html )…

शंकराचार्य ने पत्रकार को खुलेआम मार दिया, कहीं कुछ नहीं हुआ…. एफआईआर तक नहीं हुआ क्योंकि एक तो हिंदू धर्म के बाबा का मामला था, सो बीजेपी कुछ बोलेगी नहीं. दूसरे, बाबा के गुरु कांग्रेसी दिग्विजय सिंह थे, जिन्होंने पिट चुके पत्रकार को शराबी बता दिया और उसके मालिक को माफी मांगने के लिए सार्वजनिक रूप से चेता दिया तो भला किस मीडिया घराने की हिम्मत कि वह शंकराचार्य से पिटे व पीड़ित पत्रकार को न्याय दिलाए… सो, सब ऐसी चुप्पी साध गए जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो… सब के सब माइक आईडी लेकर केजरीवाल, सिसोदिया, भारती, राय के पीछे दौड़ते भागते रहे क्योंकि मालिकों के एजेंडे के तहत केजरीवाल एंड कंपनी को बदनाम, बेकार, घटिया, दुश्मन बताना साबित करना जो है….

हालिया चुनाव वाले भाजपाई शासित राज्यों में दर्जनों बड़े, खूंखार, गंभीर मसले हैं.. करप्शन से जुड़े, जनता पर अत्याचार से जुड़े, शासन-सिस्टम के पंगु होने से जुड़े.. पर कार्पोरेट मीडिया को केजरीवाल पर इसलिए पिलना है क्योंकि मोदी के पक्ष में खजाना खोलकर बैठे कार्पोरेट घरानों ने मीडिया की दशा-दिशा को तय कर दिया है.. यह सिर्फ संयोग नहीं है कि एक तरफ मीडिया केजरीवाल को पीट-पीट कर बेदम करने में लगा है तो दूसरी तरफ मोदी के पीएम बन जाने वाले सर्वे दिखाकर बीजेपी को फुलाने में लगा है…

मीडिया वालों, अगर तुम लोगों के पास अपनी मौलिक अकल, ओरीजनल आंख होती तो तुम्हें पहले ही पता चल गया होता कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी वालों की अंडर करंट चल रही है.. मौलिक अकल और ओरीजनल आंख न होने के कारण ही मीडिया वाले दिल्ली विधानसभा से संबंधित अपने सर्वे में केजरीवाल एंड कंपनी को इकाई-दहाई यानि 9 सीट या दस सीट के बीच समेट रहे थे..

पर जनता सच में बहुत समझदार होती है. जनता के पास एक सिक्स्थ सेंस होता है. जनता के पास कपार के पीछे एक तीसरी आंख भी होती है. वो सारी नौटंकी और निशाने को समझ रही है. लोकसभा चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं.. देखते रहिए, मीडिया और नेताओं के केजरीवाल विरोधी अभियान का जवाब जनता किस रूप में देती है…

कहा सुनी लेनी देनी माफ के साथ आप सभी की जय जय…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.  फेसबुक पर यशवंत से संपर्क https://www.facebook.com/yashwant.bhadas4media या https://www.facebook.com/yashwantbhadas के जरिए किया जा सकता है.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं….

Sheetal P Singh शाबाश
 
Shammi Harsh जागरूक जनता सबको झाडू से जवाब देगी
 
Murlie Prithyani एक जैसी बातों पर घंटों न्यूज़ चैनल वाले बेमतलब की बहस करते है .. उन्हें तो इस बात की भी परवाह नही कि " अंजानी राहो में चलते जाने वाले " फ्लेवर कंडोम के विज्ञापन बच्चे भी देखते है .. क्या वे कोई ऐसा प्रोग्राम भी करना चाहते है जिसमे बच्चों से यह पूछ सके कैसे लगते है आपको चोकलेट फ्लेवर के विज्ञापन ..

Anil Dixit Lakh takke ki baat…
 
Shailendra Singh जनता समझदार है ,
 
Vimal Kumar पत्राकारों और मीडिया की कलाई खुलनी ही चाहिए.बहुत गंदगी है इसमें भी
 
Trilochan Rakesh जय जय ।
 
A Ram Pandey कमाल का लेखन है दमदार!
 
Usmaan Siddiqui मुझे नहीं पता न्यूज़ नेशन किसका चैनल है..? यशवंत भाई…स्पष्ट करने की कृपा करें..?

Shailesh Tiwari जय जय यसवंत भाई खरी खरी बोलना तो आपसे सिख रहे है हम, अभी बेबाकी नहीं आ पाई है। घुमाके जो मारा है आपने, जनता सब जानती है।

Deepu Naseer न्यूज़ नेशन का मालिक कौन है ?
 
Ram Dayal Rajpurohit sacchi bat ji
 
Yashwant Singh यही तो रहस्य है कि न्यूज नेशन का मालिक कौन है.. चैनल दर चैनल लांच हो रहे हैं और पत्रकारों की भर्तियां चल रही है पर बहुत सारे लोगों को पता ही नहीं है कि आखिर कौन है भाई जो अरबों खरबों रुपये चैनल में लगा रहा है, बिना लाभ की इच्छा रखे… 🙂 बूझो तो जाने….

Sanjay Tiwari कपार के पीछे तीसरी आंख. गजब.

Dhananjay Singh कपार में भी कुछ है?

Pranaw Awasthii ये पते की बात कही चौथा स्तंभ मानी जाने वाली मीडिया को अपने गिरेबाँ में झाँकने की जरुरत है…
 
Peeyush Singh Rao Yashwant Singhआप यह क्यों भूलते हो की पांच राज्यों में चुनाव हुए पर जितना महिमा मंडन "आप"और केजरीवाल का हुआ उतना किस का हुआ! जबकि दुसरे राज्यों में उनसे कही ज्यादा बहुमत से सरकारें बनी। वास्तविकता तो यह है कि जिस मीडिया की केजरीवाल एंड कंपनी आदि हो गई थी उसी का दुष्परिणाम अभी हो रहा है। क्या ibn7 के आशुतोष अपने रुतबे के हिसाब से मीडिया को प्रभावित नही कर रहे होंगे या करेंगे?
 
Yashwant Singh पीयूष सिंह राव. आप ठीक से पढ़ें. मैंने लिखा है कि मीडिया को अंदाजा ही नहीं था कि आप वाले इतनी सीट पा जाएंगे. दूसरे, मीडिया को केजरीवाल में टीआरपी दिख रहा था, सो वो चला रहे थे… अब जब मालिकों का आदेश आ गया है तो टीआरपी वीआरपी भूलकर केजरीवाल निपटाओ मुहिम में लगे हुए हैं.. जहां तक आशुतोष की बात है तो भाई… चैनल से विदाई के बाद पत्रकार ढक्कन हो जाता है क्योंकि चैनल के भीतर जो आका होते हैं, वो अपने मालिकों के हिसाब से चैनल चलाते हैं.. किसी पत्रकार के कहने या दोस्ती यारी में नहीं…
 
Sanjay Chandna सही लिखा… यशवंत भाई…..
 
Amit Maurya Bhaiya chaple raha
 
मधेपुरा टाइम्स जबरदस्त विश्लेषण…और खुलासा.

Sadique Zaman yashwant bhai ki jai ho.

Aap Ka Praveen behtareen lekhan aur molikta ka parichay ….. god bless ur writing skill ….
 
Kunal Krishna yashwant ji badhai ke para hai
 
Ramanuj Singh आप बिल्कुल सही कह रहे हो सर

माधो दास उदासीन बेहतरीन लेख
 
Soban Singh Bisht मोदी सभी की उम्मीद की किरण है और केजरीवाल उसमे पलीता लगा रहे है,विरोध तो होगा ही।
 
Rajaram Legha Neera radiya case main bhi kuch ptrkaron ka name aaya tha
 
TC Chander सुलग गई..?
 
Ajay Kumar Srivastava Abhi share kar raha hu taaki aapki aawaaj ko pdh kr aauro ko bhi is sachaai ka pta chle.
 
Maahi Mk वाकई गजब है ।
 
Vikrama Singh आप को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।
 
A.p. Soni यशवंत जी अयोध्या में पत्रकारिता दिवस पर हमारी आपकी मुलाकात में आपने मुझसे बात की थी और तब मैं अपने संबोधन में इसी विषय को प्रमुख रूप से विवशता के साथ उठाया था कि हम अगर कुछ करना चाहते हैं तो ऊपर वाले करने नहीं देते… तब आपने एक बात कही थी कि आप सच्चाई को प्रमुखता से उठाइये आपके यानि हम लोगों के पास अपनी आवाज़ उठाने के लिए कई माध्यम हैं.. आपके मार्गदर्शन को मैं आज भी फालो कर रहा हुं…

Ashim Kumar Singh Thanks jaswant singh ji…….ur this realty thought really required for the nation.we should attempt to empower on priority basis.some body may take it as ur an advocacy for Aap party or kejriwal. But as I think , if right not more than an example…thnx again….Ashim Patna.

Amar Nath Jha Yashwant Singh , I very often read your posts and find that you are very close to the sentiments of common people — Aam Adami — you are blunt and ruthless. But I really like your this very ruthlessness. I also do have personal experience of corrupt media personnel for the last three decades. But all are not bad in the media. There are wonderful and committed reporters in media too, specially in the print media.

Ajit Harshe शायद मीडिया वालों को शंकराचार्य ही रास आते हैं!
 
Rajesh Singh यशवंत भाई आपकी बेबाकी को सलाम
 
Syed Quasim bhadaas ka hona b in sb ko khatakta hai..
 
Prabhat Dixit आज बहुत दिन बाद पूरे रंग तरंग में नज़र आये हो साहब….बहुत खूब लिखा …ज़ोरदार
 
Pawan Rajput Wah yaswant ji, Bhut din bad barse pr sahi time pr,,,
 
Abhishekh Tripathi बात मे दम तो है सर…किँतु पत्रकार भी तो मजबुर हे … जिसका नमक खाएगा उसकी बजाएगा भी..। 😐
 
Sanjaya Kumar Singh समझदार तो मीडिया वाले भी हैं। लाला और उनके यहां मोटी तनख्वाह पर काम करने वाले भी। कोई कुछ नहीं बोलेगा। सब का एजंडा है। जैसे कांग्रेस समर्थन वापस नहीं लेगी वैसे ही मीडिया वाले ऐसे मामलों में मुंह नहीं खोलेंगे। इसपर बहस नहीं कराएंगे।
 
मो॰ जावेद YES YASHWANT SAHAB…… "AAP" AUR AAPNE SATAK MARA
 
शेखर त्रिपाठी good sir. you are a real journalist and real journalism. thx for pole khole abhiyan.
 
Narendra Mishra Vaah G.. Saraahneeya .
 
Amit Chauhan Sabse tej hone ka dava karne wale ye kukurmutte chennel sirf corporate ki aguwai karte ha ye bajarwadi media ha.
 
Jai Prakash Tripathi लोकसभा चुनाव में 'आप' जीते या हारे, वह भी अब ज्यादा दूर की बात नहीं रह गयी है, नाई भाई कितने बाल, जैसे दिल्ली में सामने आ गये थे, वही इतिहास देश देुहराने के लिए बेताब बैठा है, जैसे शीला बहन आज कल मार्निंग वॉक कर रही होंगी, डॉक्टर साहब कटीली मुस्कान से झूठ के फव्वारे छोड़ रहे होंगे, उसी तरह दूसरे जनाब के भी सफेद दाढ़ी मुड़वाने का समय आ रहा है। छोटे कुंअर तो मुड़वा चुके। दीदी के पीछे पीछे डोल रहे हैं। बेचारे दोनो पूंजीपतियों के लिए अरबों की सौगात देते रहते हैं, उनके लिए रात दिन जीते मरते रहते हैं, घूम घूम कर सर्कस दिखाते रहते हैं, तो इतना फर्ज तो उन थैलीशाहों का भी बनता है कि जनता को उल्लू बनाने के दिग्विजय पर निकले इन झूठो-मक्कारों को सरमायेदार भी खाद-पानी देकर थैली तर रखें और उनके पैसे पर पल रहे पत्तलचटोर चैनल वाले झूठ पर झूठ, झूठ पर झूठ, झूठ पर झूठ झूठ पर झूठ…….झुट्ठे कहीं के, धत्त ….विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को छह सीटें दिलवा रहे थे…क्या करें बेचारे चैनल के चमाचम चेहरे वाले और गंदी बोल के पत्रकार, कागज के फूल सूंघना उनकी मजबूरी है, आपने ठीक लिखा है कि सच तो वे भी जानते हैं, लेकिन उनमें भी कई वीररस का कवि बनते डोलते रहे हैं तो उनका चेहरा आपने ठीक ही नंगा किया है, इसके खिलाफ अभियान जारी रहना चाहिए…जर्नलिज्म जिंदाबाद….
 
Suresh Gandhi solaho aana sach…sach likhne v bolne pr patrakar pr jurm dhaya ja rha..ghar bar loot liya gaya..bachcho ki padhai chaupt ho rhi lekin kuchh ko chhod de to sab maun hai..jhuth ki bunigad pr hm pr sarkari gunde kahar dhaha rhe hai…
 
Suresh Kr Singh सर आप पता करिए न्यूज़ नेशन का मालिक कौन है आप ही हथियार डाल देगे तो हम लोगो को पता कैसे चलेगा।।
 
Suresh Gandhi bhaija koi kuchh bhi chala le dikha de public sab janti hai…mauka aane dijie sab hawa ho jayenge..dilli ho ya up pulis k gundai sab jante hai..up me sapa k to vo hsra hone wala hai ki ventilater bhi nasib nhi hoga…
 
Suresh Gandhi jai prakash ji sahi kaha apne..car v bangle k alava chhote chhote karkrmo pr karono fukne wale ab nhi chahte ki koi riksha chalane wala hospital ka udghatn kre…
 
Suresh Gandhi sach likhne pr sarkari gundo ne ek saptah k ander gunda act..jilabadar kr 16 sal ki puri grihsthi loot li..highcort k stay k bavjood pakd kr sare rah mara pita..pair m kil thok diya..bal ukhad liya..ab jb maine 156(3) k taht rapat likhai hai to pulis mere loote hue samano ki baramdgi nhi kr rhi hai..bachho ki padhai likhai chaupt hi rhi hai..lukhnow k kai sanghthano s shikat ki lekin sarkar ki chamchai ke chalte sab maun hai…
 
Shakur Khan आप बिल्कुल सही कह रहे हो सर
 
Sandeep Verma तगड़ी खरी खोटी . यशवंत जिंदाबाद .भड़ास जिंदाबाद
 
Mohd Rais आप ने कह के ले ली…शब्द चयन के लिए क्षमाप्रार्थी….
 
Amrita Maurya Very true !! Now media is coming in front of mirror, rather showing the mirror to others. Half hidden reflections are not actual images…..curtain is raising slowly-slowly…..Ibtidaye eishk hai rotaa hai kya, aage,aage dekhiye hota hai kya !!!!
 
Akhilesh Akhil baklol patrakaro ko kyo shiksha de rahe hai yashvant bhai.
 
Suhel Ahmad Siddiqui Yashwant bhai aap ne goya mere dil ki baat kah di. Bahot afsos hota hai is baat par ki desh ki adhisankhya janta itni bholi hai ki media ki jhooti hawa ko sahi maan leti hai. Media is behaving like a prostitute.
 
Latif Kirmani Exellent analysis SHABASH !!!!!


इसे भी पढ़ें:

अरनब गोस्वामी से कोई लाइव ही टाइम्स आफ इंडिया वालों के इस करप्शन के बारे में पूछ ले

xxx

सोशल मीडिया ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को छेड़ा… जानिए, अराजकता किसे कहते हैं महामहिम!

xxx

केजरीवाल के टायलेट में न्यूज चैनलों के कैमरे, प्रेस क्लब आफ इंडिया में केजरीवाल को लेकर पत्रकारों में दो फाड़

xxx

 

आसाराम भी पत्रकारों को लप्पड़-झापड़-तमाचा-घूंसे मारने का उस्ताद था…

xxx

अरविंद केजरीवाल के पक्ष में….

xxx

बेचारे भाजपा वाले, न सत्ता पा सके, न विपक्ष में रह पाए

xxx

केजरीवाल के करप्शन विरोधी फंदे में वो फंस रहे जिनसे देश को खतरा नहीं

xxx

पत्रकार न हो गया चौराहे का घंटा हो, जिसका मन किया बस बजा दिया!

xxx

एक लोकतान्त्रिक और गणतांत्रिक देश की वास्तविकता यहां है… पढ़िए…

xxx

मीडिया को बाजार के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाना है…

xxx

आधे मीडिया मालिक मोदी के पक्षधर और आधे राहुल गांधी के साथ : केजरीवाल

xxx

गांधी जी सत्ता में आते तो शायद इसी तरह सड़क से सरकार चलाते (देखें तस्वीर)

xxx

एक पर्ची पर SHO नियुक्त हो सकता है लेकिन ठंडी रात में सीएम धरने पर बैठकर भी SHO का तबादला नहीं करा सकता

xxx

पत्रकारों को उनके मालिकों का डायरेक्शन आया है कि 'आप' को फोड़ डालो!

xxx

दीपक चौरसिया और अनुरंजन झा यानि सुपारी पत्रकार!

xxx

सुपारी पत्रकारों और कांग्रेसी चैनल मालिक के खिलाफ मुकदमा ऐतिहासिक

xxx

कांग्रेसी चैनल की दलाली करने वाले अनुरंजन झा को डा. कुमार विश्वास ने दिया ज्ञान

xxx

दीपक चौरसिया और अनुरंजन झा की 'सुपारी पत्रकारिता' पर कुमार विश्वास ने किया वीडियो जारी

सोशल मीडिया ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को छेड़ा… जानिए, अराजकता किसे कहते हैं महामहिम!

शेखर कपूर ने बहुत साफ-साफ शब्दों में प्रणव मुखर्जी को बताया कि अराजकता किसे कहते हैं. फिल्मकार शेखर कपूर काफी समझदार और स्पष्ट विजन वाले शख्स माने जाते हैं. अभी उनके द्वारा बनाया गया 'प्रधानमंत्री' नामक एक सीरिज का प्रसारण एबीपी न्यूज पर किया गया जो काफी लोकप्रिय था. वहीं, अराजकता के मसले पर राष्ट्रपति की निशानेबाजी को लेकर फेसबुक व ट्विटर, दोनों जगह राष्ट्रपति के विरोध में कमेंट आ रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और अमिताभ श्रीवास्तव ने भी सच्चाई बयान किया है. किस तरह सत्ता-सिस्टम, बाजार, कारपोरेट से किसी भी रूप में जुड़ा हर शख्स 'आम आदमी पार्टी' को निशाना बना रहा है, इसके बारे में लोगों ने बताया, लिखा है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि आम आदमी पार्टी के लोग सच में आम जनों के लिए न सिर्फ बात कर रहे हैं, बल्कि लड़ रहे हैं और कई दशकों की सत्ता-सिस्टम की जड़ता को तोड़ते हुए संपूर्ण यथास्थितिवादियों को चुनौती दे रहे हैं. जो लोग काली कमाई कर, वोट बैंक की पालिटिक्स कर, पूंजीपतियों से पैसे लेकर सत्ता लाभ लेते चले आ रहे हैं, केंद्र में या प्रदेशों में, उन्हें आम आदमी पार्टी से दिक्कत महसूस हो रही है क्योंकि उन्हें उनके दिन खत्म होते हुए दिख रहे हैं.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Amitaabh Srivastava : राष्ट्रपति का इतना तीखा और सीधा राजनैतिक संदेश आम आदमी पार्टी के खिलाफ! हैरानी हो रही है। कांग्रेस की सरकारों में वित्त और वाणिज्य जैसे विभाग संभाल चुके प्रणव मुखर्जी इस चुनावी साल में क्या बोल गये- सुनकर हैरत हो रही है। अराजकता का जिक्र करके अरविंद केजरीवाल पर बिना नाम लिये निशाना साधा। एक तरफ राहुल गांधी आम आदमी के वोट लेने के लिए यूपीए सरकार से सिलेंडर तक बढ़ाने के लिए खुलेआम कहते हैं और दूसरी तरफ राष्ट्पति महोदय कह रहे हैं कि सरकार कोई charity shop यानी दान खाता नहीं है। सब्सिडी पर सोच अपनी जगह लेकिन अरे महामहि्म- आप तो देश के प्रथम नागरिक है- आम आदमी के हक में बोलना चाहिए था। जिस पार्टी से आपका रिश्ता रहा है कहीं उसे चुनाव में लेने के देने न पड़ जाएँ । सरकार का डर आपके इस संबोधन में साफ दिख रहा था महामहिम।

Sheetal P Singh : राष्ट्रपति की "लोकलुभावन अराजकता" वाली टिप्पड़ी समेत सोमनाथ भारती प्रकरण पर बीजेपी और कांग्रेस के स्वर एक ही ध्वनि पैदा कर रहे हैं। बीजेपी धीरे-धीरे अपने आरोप को खो देगी जिसमें वह "आप" को कांग्रेस की बी टीम ठहरा रही थी। बात फिर वहीं पहुँच रही है कि सारी पार्टियाँ यथास्थितिवादी हैं और "आप" के ख़िलाफ़ एक हैं।

AAM AADMI PARTY 272+ : युगांडा लडकियों के वकील का नाम है हरीश साल्वे और बिजली कम्पनियों के CAG ऑडिट के खिलाफ भी कम्पनियों के वकील है हरीश साल्वे। Is it mere coincidence?

Sheetal P Singh : हरीश साल्वे की फीस देश के सबसे मंहगे वकीलों में शुमार होती है, जिसे अंबानी तो दे सकते हैं, पर चार पाँच हज़ार रुपये किराये के कमरे में तीन-तीन लोगों द्वारा शेयर करने वाली अंगोलन लड़कियाँ कहाँ से दे सकती हैं?

Shahid Khan : केजरीवाल बाबू ने एक रिक्शेवाले से एक नए अस्पताल का उदघाटन कराया! देश में पहली बार भाजपाई और कांग्रेसी स्पौन्सर्ड हिन्दू-मुस्लिम तुष्टीकरण से इतर गरीबों के तुष्टिकरण की ये जो शुभ बेला आई है… उस पर नाक-भौं ना सिकोड़ें! बल्कि इस इतिहास-बनाऊ क्षण का साक्षी बन बालकोनी पर खड़े हो जायें और वहीँ से खंचिया भर गेंदा फूल 'मफलरिया' बाबु पर झर-झर गिराएं!

Sanjay Tiwari : एक और 'लोकलुभावन अराजकता'. रिक्शाचालक से अस्पताल का उद्घाटन करवा दिया. हद है. ऐसा कैसा गणतंत्र बना रहा है यह अराजक आदमी? आदमी बोल भी कहां पाता है प्रणब दा? कुर्सियां बोला करती हैं. गनतंत्र के व्यवस्थित लूटतंत्र में 'अराजकता' के लिए कोई जगह होती भी कहां है, प्रणव दा. मुझे दिल्ली में रहते एक दशक से दो साल ज्यादा हो गया है. लेकिन इन बारह सालों में बीते दस बारह दिनों से पहली बार इतने साफ पानी की सप्लाई आ रही है कि मेरा बोतल (पानी की) खरीदने का खर्चा खत्म हो गया है. क्या हुआ पता नहीं, लेकिन कुछ तो हुआ है.

Rising Rahul : कल राष्‍ट्रपति ने राष्‍ट्र को संबोधि‍त करके साफ बता दि‍या है कि भारत अभी ब्रि‍टि‍श राज की मानसि‍कता से मुक्‍त नहीं। ब्रि‍टि‍श राज की वि‍शेषता थी कि सबसे पहले उसने ही हिंदू को मुस्‍लि‍म अलग कि‍या, वैमनस्‍य की शुरुआत की। राष्‍ट्रपति का एक एक अंग्रेजी का शब्‍द भारत की संप्रभुता पर वि‍देशी आक्रमण की तरह टूटता लगा मुझे। हमारी गंगा जमुनी तहजीब जि‍से पि‍छले तीन सौ सालों से लगातार तोड़ने की कोशि‍श की जा रही है, जि‍से अंग्रेजों ने शुरू कि‍या और अब कांग्रेस-भाजपा बढ़ा रहे हैं, उसकी अकड़ मुझे राष्‍ट्रपति के हर अंग्रेजी के शब्‍द में दि‍खी। साथि‍यों, अभी हमें अपनी ही सरकार से और संघर्ष करना है…बार बार करना है जब तक उनके दि‍माग में संवि‍धान की सारी बातें सही तरीके से नहीं भर जातीं।

Vimal Kumar : किस मीडिया की तारीफ करूँ जो मोदी या राहुल को लाइव टेलीकास्ट करता है या केजरीवाल को अब गरियाता है.

‘पंजाब केसरी’ वालों ने हिम्मत कर दी चिदंबरम-जेठमलानी पत्राचार के बारे में छापने की

एक मसला है जिसे उठाने, छापने की हिम्मत न तो भाजपा वालों में है और न ही किसी मेनस्ट्रीम मीडिया में. इस मसले को सबसे पहले भड़ास4मीडिया ने उठाया और धीरे-धीरे एक-एक पहलू को उजागर किया. कई तरह के दबावों, धमकियों के बावजूद भड़ास ने जब हिम्मत और सतर्कता के साथ इस गंभीर-सनसनीखेज मामले के एक-एक परत को उघाड़ना शुरू किया तो अब कई वेबसाइटें और अखबार इसको लेकर छापने लगे हैं. पर अब भी संख्या बहुत कम है.

हां, सोशल मीडिया पर यह मसला खूब लिखा, पढ़ा, शेयर, ट्विट, री-ट्विट किया जा रहा है. 'पंजाब केसरी' ने पहली दफे इस प्रकरण पर विस्तार से छापा है. हालांकि यह खबर के फार्मेट में नहीं है. इसे लेख के रूप में दिया गया है. लेखक हैं वीरेंद्र कपूर जो 'अंदर की बातें' नामक कालम लिखते हैं पंजाब केसरी में. क्या छपा है, उसे जानने के लिए नीचे जो अखबारी कटिंग है, उस पर क्लिक कर दें… उसके बाद अखबारी कटिंग के ठीक नीचे दिए गए लिंक्स पर एक-एक कर क्लिक करते जाएं.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया



संबंधित खबरें:

मुंबईवाला डाट काम ने अभिसार शर्मा और तेलगुमिर्ची डाट काम ने दीपक चौरसिया को लपेटा

xxx

एनडीटीवी मनी लांड्रिंग को लेकर प्रणय राय और गुरुमूर्ति के बीच हुए पत्राचार को पढ़ें

xxx

एनडीटीवी, ब्लैकमनी, एसके श्रीवास्तव, जांच और जेठमलानी-चिदंबरम पत्राचार

xxx

एक चैनल में कांग्रेसी नेता के कथित हजारों करोड़ निवेश के मसले में कुछ अपडेट

xxx

एक बड़े न्यूज चैनल में कई हजार करोड़ रुपये डालकर ब्लैक को ह्वाइट कर लिया एक बड़े कांग्रेसी नेता ने!

एक लोकतान्त्रिक और गणतांत्रिक देश की वास्तविकता यहां है… पढ़िए…

Azhar Khan :

    एक लोकतान्त्रिक, गणतांत्रिक'' देश की वास्तविकता को

    गरीबों से पूछिए

    मजदूरों से पूछिए

    हर समय हर पल जातिवाद का दंश झेलते दलितों से पूछिए

    हर समय अपमान भेदभाव झेलते,  पुलिस के अधिकारीयों के द्वारा प्रताड़ना झेलते आदिवासियों से पूछिए

    हर पल दंगों के डर के साये में जीते और दंगों में मार दिए गए लोगों को न्याय दिलाने के लिए दर डर भटकते अल्पसंख्यक समुदाय से पूछिए

    भ्रष्ट व्यवस्था से आजिज आ चुके आम नागरिक से पूछिए

    'आर्म्ड फ़ोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट' के साए में हर पल जीते कश्मीरियों से,उत्तर पूर्व के लोगों से,इरोम शर्मीला से पूछिए

    फर्जी एनकाउंटर में मार दिए गए आम नागरिकों के रिश्तेदारों से पूछिए

    बड़े बड़े नरसंहारों के प्रत्यक्षदर्शियों से पूछिए

    अपने ही देश में शरणार्थी बन कर रह रहे कश्मीरी पंडितों से पूछिए

    कड़ाके की ठण्ड में मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद वहां टेंट लगाकर रहने को मजबूर और पाने बच्चों को ठण्ड से मरते हुआ देखने वालों से पूछिए

    रेप, छेड़छाड़ की पीड़ित महिलायों से पूछिए

   आतंकवाद के झूठे आरोपों में सालों जेल में बंद रहकर अपनी ज़िन्दगी के दस साल, पंद्रह साल, अठारह साल काट देने के बाद अंततः कोर्ट द्वारा निर्दोष साबित होने के बाद जेल से बाहर आये मुस्लिम युवायों से पूछिए….

   भ्रष्ट, सामंती, जातिवादी, घोर साम्प्रदायिक, गरीब विरोधी, जनविरोधी, परिवारवाद से ओत-प्रोत, पीड़ितों को न्याय देने में असफल ''कानून का राज वाले'' और ''लोकतान्त्रिक''' देश का ''गणतंत्र दिवस'' आप लोगों को मुबारक हो!

अजहर खान के फेसबुक वॉल से.


और, तस्वीर का दूसरा पहलू देखना हो तो इसे पढ़ लें…

बहुत नकारात्मक होने से कुछ नहीं बनता…

मुंबईवाला डाट काम ने अभिसार शर्मा और तेलगुमिर्ची डाट काम ने दीपक चौरसिया को लपेटा

न्यू मीडिया के सामने आ जाने से मेनस्ट्रीम मीडिया के महारथियों की खोज-खबर भी मिलती रहती है. इन दिनों दो वेबसाइटें काफी चर्चा में हैं. एक वेबसाइट अभिसार शर्मा को टारगेट किए हुए है तो दूसरी वेबसाइट दीपक चौरसिया को. मुंबईवाला डाट काम नामक वेबसाइट ने अभिसार शर्मा और उनकी आईआरएस अधिकारी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए हैं. वहीं तेलगुमिर्ची डाट काम ने दीपक चौरसिया को गिरफ्तार न किए जाने का मुद्दा उठाया है. दोनों वेबसाइटों पर खबरें अंग्रेजी में हैं.

अभिसार शर्मा के खिलाफ मुंबईवाला डाट काम पर जो खबर है वह सत्ता-सिस्टम से लड़ रहे आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव के समर्थकों-शुभचिंतकों द्वारा प्रायोजित लगती है तो तेलगुमिर्ची डाट काम पर जो खबर है वह आसाराम समर्थकों द्वारा दीपक चौरसिया के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा प्रतीत होता है.

अभिसार शर्मा और एनडीटीवी से संबंधित मुंबईवाला डाट काम की खबर को फेसबुक-ट्विटर पर खूब शेयर किया जा रहा है. पत्रकार अमरेंद्र किशोर इस लिंक को शेयर करते हुए लिखते हैं-  ''Now again a new SAANPNATH''. दुष्यंत राय ने इस खबर को यह लिखकर शेयर किया है…  ''सच का सामना . . . . . . . सच के साथ … NDTV''. वहीं समरेंद्र सिंह ने इस खबर को शेयर करते हुए लिखा है- ''काश! ये सच नहीं हो!''. इनके अलावा सौमित सिन्ह, जयंत घोषाल आदि ने भी इस खबर को शेयर किया है.

नीचे दोनों वेबसाइटों पर प्रकाशित खबरों का संक्षिप्त स्क्रीनशाट और लिंक दिया जा रहा है. भड़ास को दोनों ही खबरों का लिंक मेल के जरिए मिला है, जिसे कुछ लोगों ने भड़ास के संज्ञान के लिए भेजा है. भड़ास दोनों एकपक्षीय खबरों में पार्टी बने बिना सिर्फ इस लिहाज से यहां इनके बारे में जिक्र कर रहा है, प्रकाशन कर रहा है ताकि लोगों को इन मीडिया महारथियों के बारे में चल रहे, छप रहे सच-झूठ के बारे में पता चल सके.

ये हैं खबरों के लिंक व संबंधित स्क्रीनशॉट…

http://mumbaiwalla.com/prannoy-sponsor-rs-1-crore-holiday-small-time-ndtv-anchor/


http://www.telugumirchi.com/en/other-news/arrestchorasia.html

इस बारे में अभिसार शर्मा और दीपक चौरसिया, दोनों के करीबियों से भड़ास ने बात की. अभिसार के करीबियों का कहना है कि मुंबई वाला डाट काम में प्रकाशित खबर झूठ पर आधारित है. अभिसार शर्मा बीबीसी में स्ट्रिंगर नहीं बल्कि प्रोड्यूसर हुआ करते थे. लंदन का हालीडे का जो मामला है वह कंपनी ने सिर्फ अभिसार को ही नहीं बल्कि उस के कई इंप्लाइज को दिया था, पर्क के रूप में. एक करोड़ का आंकड़ा कहां से आया… ये सब आरोप एसके श्रीवास्तव ने लगाए हैं… पर आरोप के समर्थन में कुछ तो प्रूफ हो ना…. अभिसार शर्मा बीबीसी लंदन के स्टाफ थे… झूठ ये भी है कि अभिसार ने एनडीटीवी अक्टूबर 2003 में ज्वाइन किया. अभिसार ने जनवरी 2003 में एनडीटीवी के हिस्से बने. अभिसार के ज्वाइन करने के बाद उनकी आईआरएस अधिकारी पत्नी ने कभी एनडीटीवी को एसेस नहीं किया. जो भी दुष्प्रचार अभियान अभिसार और उनकी आईआरएस अधिकारी पत्नी के खिलाफ चलाया जा रहा है, उसके पीछे एसके श्रीवास्तव है, जिसे अदालत दो बार इन्हीं घटिया हरकतों के कारण जेल की सजा सुना चुकी है. सारी बातों का जिक्र सुप्रीम कोर्ट में किया जा चुका है. पर एसके श्रीवास्तव झूठ का सहारा लेकर अभिसार और उनकी पत्नी पर अटैक कर रहा है. इन लोगों के पास इस बात के कोई सुबूत नहीं है कि एक करोड़ रुपये खर्च किए गए. ये सिर्फ मनगढ़ंत, अनर्गल, मानहानि कारक और दुष्प्रचार है. एक और बात है. सेक्सुअल हैरसमेंट पर कमेटी की फाइंडिंग्स को खुद सरकार ने रद्द कर दिया है और नई कमेटी बनाई है, जो अब जांच कर रही है. क्या एसके श्रीवास्तव ने इसका जिक्र कहीं किया है? बाकी, पूरे मसले पर कोर्ट के फैसले को ध्यान से देखना और पढ़ना चाहिए. इस लिंक के जरिए सच्चाई को जाना जा सकता है. इसमें आपको समझ में आ जाएगा कि इसने कैसी भाषा का इस्तेमाल किया है.
 
http://lobis.nic.in/dhc/VIB/judgement/10-01-2014/VIB10012014CCA12013.pdf

उधर, दीपक चौरसिया के करीबियों का कहना है कि घटिया आदमी आसाराम और उसके बेटे नारायण के खिलाफ इंडिया न्यूज चैनल पर लगातार खबरें दिखाने के कारण आसाराम और नारायण साईं के लोग करोड़ों खर्च कर दीपक चौरसिया के खिलाफ कुत्सित अभियान चलवा रहे हैं. इस अभियान के तहत दीपक को जातिसूचक तरीके से अपमानित किया जा रहा है और अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं. ऐसे कुत्सित अभियानों से इंडिया न्यूज और दीपक चौरसिया आसाराम के खिलाफ अभियान बंद नहीं करने वाले हैं क्योंकि ऐसे फ्राड बाबाओं को सबक सिखाए जाने के बाद ही किसी अन्य बाबा की घृणित कर्म करने की हिम्मत नहीं पड़ेगी.

लोकसभा चुनाव के लिए ईटीवी पर नया प्रोग्राम- ‘वोट करेगा इंडिया’

लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजी तो ईटीवी ने भी कमर कस ली. ईटीवी ने एनटीआई मीडिया प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले एक नए प्रोग्राम का आगाज कर दिया है। नाम है- 'वोट करेगा इंडिया'। एनटीआई मीडिया वही प्रोडक्शन हाउस है जिसने यूपी विधानसभा चुनाव में ईटीवी के लिए 'वोट करेगा यूपी' प्रोग्राम बनाया था। इस प्रोग्राम को काफी टीआरपी मिली थी।

एक बार फिर एनटीआई प्रोडक्शन हाउस के सीएमडी त्रिदीब रमण ईटीवी के सभी क्षेत्रीय चैनलों में शाम 6 बजे से एंकरिंग करते नजर आ रहे हैं। इस प्रोग्राम की खासियत है इसका पैकेज। इसमें उन सभी पहलुओं को एक-एक करके उकेरा जा रहा है जो आगामी लोकसभा चुनाव में बड़ी भूमिक निभाने वाले हैं। वहीं चुनावी चटपट में उन खबरों को रखा जा रहा है जो खबर बनने से पहले की आहट होती है। 'चोट करेगा ताऊ' सेग्मेंट में बड़े से बड़े नेता पर कटाक्ष करता 'ताऊ' बखिया उधेड़ रहा है।

ग्वालियर के सिर्फ एक चिटफंडी बीएल कुशवाह के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ा है ‘पत्रिका’ अखबार?

ग्वालियर महानगर में पिछले कई दिनों से 'पत्रिका' अखबार एक चिटफंड कंपनी के मालिक बी.एल. कुशवाह के खिलाफ छाप रहा है। 'पत्रिका' वाले चिटफंड कंपनी के मालिक कुशवाह के पीछे इतना क्यों पड़ा है, यह ग्वालियर की पूरी मीडिया जानती है लेकिन कोई इसके खिलाफ आवाज उठाने को तैयार नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि 'पत्रिका' की जो डिमांड है, उसे बी.एल. कुशवाह पूरा करने से इनकार कर रहे हैं।

चर्चा है कि 50 लाख रुपयों की रंगदारी न देने के कारण कुशवाह के खिलाफ कंपेन चलाया जा रहा है। चूंकि चिटफंडी बी.एल. कुशवाह ने स्पष्ट शब्दों में 'पत्रिका' वालों की मांग मानने से मना कर दिया है, इस कारण सम्पादक और क्राइम रिपोर्टर महोदय इसके पीछे पड़े हैं.

हालांकि चिटफंड कंपनियों में गरिमा रियल स्टेट के अलावा और भी बहुत सी कंपनियां हैं जो ग्वालियर से फरार हैं, लेकिन उनके बारे में ये पेपर छापने को तैयार नहीं है। इसका कारण है कि पत्रिका वालों ने मिलकर केएमजे और परिवार डेयरी आदि कम्पनियों से डीलिंग कर ली है। इसी कारण उनको ये चस्का लगा जिसके चलते वह अब चिटफंडी बी.एल. कुशवाह के पीछे पड़े। लेकिन बी.एल. कुशवाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मैं कोई पैसा नहीं दूंगा, जिसके चलते यह सब अखबार में छापा जा रहा है।

ग्वालियर का हर मीडियाकर्मी इस बात को जानता है कि इस तरह से किसी अन्य चिटफंडी की खबर पत्रिका अखबार क्यों नहीं लगा रहा। यह पत्रिका अखबार अब अखबार न होकर ब्लैकमेलिंग का अखबार बन गया है जिसके चलते ग्वालियर पत्रिका की साख को बट्टा लग रहा है। अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में पत्रिका को लोग हाथ में पकडऩे से भी परहेज करेंगे।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पत्रकार नारायण परगई दोस्त से मारपीट के मामले में जेल भेजे गए

मसूरी। दोस्त के साथ मारपीट करने पर पत्रकार नारायण परगई के खिलाफ कोतवाली पुलिस ने केस दर्ज किया है। पुलिस ने पत्रकार नारायण परगई को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।

लाइब्रेरी चौकी इंचार्ज एसआई राजीव सेमवाल ने बताया कि शुक्रवार को दून स्थित विजयनगर निवासी पत्रकार नारायण परगई अपने जाखन निवासी दोस्त अजय के साथ उसके क्यारकुली समीप कॉटेज में पार्टी मानने आए थे। जहां पर दोनों ने शराब पी। शराब के नशे में परगई की अजय के साथ मारपीट कर दी। अजय ने देर रात इसकी सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। बाद में नारायण परगई को जेल भेज दिया गया.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचाई जा सकती हैं.

मीडिया को बाजार के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाना है…

Samarendra Singh : मीडिया क्या है? व्यवस्था का हिस्सा. जिसे संविधान की मूल भावना का ख्याल रखते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है. मीडिया को नियंत्रित कौन करता है? बाजार. मतलब संविधान की मूल भावना के साथ बाजार के हितों का भी ख्याल रखना है. बाजार का हित किसमें है? यही कि मौजूदा व्यवस्था बनी रहे और बाजार को लेकर उदार होती रहे. मीडिया को बाजार के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाना है. अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसे मिलने वाली पूंजी घटेगी और उसका सीधा असर संस्थान की सेहत पर पड़ेगा और पत्रकार सीधे तौर पर प्रभावित होगा.

मतलब आजादी सीमित है. आजादी है भी और नहीं भी. यही स्थिति व्यवस्था के हर हिस्से में है. हर जगह आजादी है लेकिन सीमित. व्यवस्था ऐसे ही चलती है. कोई भी पूरी तरह आजाद नहीं है. खुद केजरीवाल भी आजाद नहीं हैं. उन्हें चुनाव लड़ना है. चाहते हैं कि 400 सीट पर चुनाव लड़ें. विधानसभा चुनाव में उन्होंने प्रति सीट 28 लाख रुपये खर्च किए थे. इस लिहाज से अब उन्हें लोकसभा चुनाव में प्रत्येक सीट औसतन 2-2.5 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. 400 सीट के हिसाब से उन्हें 800-1000 करोड़ रुपये चाहिए. पैसे जुट नहीं रहे हैं. तो चुनाव खुल कर नहीं लड़ सकेंगे. मजबूर हैं. यह समझना होगा.

अब सवाल उठता है कि क्या कोई सेठ मुंजाल उन्हें 1000 करोड़ रुपये चुनाव लड़ने के लिए देगा? अगर देगा तो क्या उसका कोई हिडेन एजेंडा होगा? और अगर हिडेन एजेंडा नहीं हुआ तो भी अगर उनकी सरकार कोई नीतिगत फैसला लेती है और उससे उस मुंजाल को फायदा पहुंचता है तो क्या यह दूसरों को हक मिलना चाहिए कि वह केजरीवाल को बेईमान कहें?

जब तक वह यह नहीं समझेंगे कि व्यवस्था में एक जाल बुना होता है. यहां कोई पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. आप जाल के सभी धागों को एक साथ काट देंगे तो अराजकता होगी. सब खत्म हो जाएगा. हिंसा होगी. सड़कों पर लहू बिखरेगा. इसलिए व्यवस्था के जाल से वही धागा काटिए जिसकी जरूरत नहीं है. या जो धागा कमजोर हो गया है. गल गया है. इससे स्पेस बढ़ेगा और स्थितियां सुधरेंगी. सबकुछ धीमे-धीमे होगा. व्यवस्था को पारदर्शी बनाइये. चीजें बेहतर होंगी. यह नहीं कहना पड़ेगा कि सब बिका हुआ है. तब लगेगा कि व्यवस्था बनाने से बनती है. सुधार करने से होता है. देश जोड़ कर चलता है. बहुत नकारात्मक होने से कुछ नहीं बनता.


Samarendra Singh : बिहार के दौरे पर हूं. अगले दस-पंद्रह दिन इधर ही रहना है. गणतंत्र दिवस की सुबह एक ऐसे गांव से गुजरा हूं जहां गरीबी है. लेकिन यहां भी गणतंत्र दिवस का उत्साह देखने को मिला. आदिवासियों के इस गांव में मैंने बच्चों के हाथ में तिरंगा लहराते देखा. उनके चेहरे पर खुशी नजर आई. यह खुशी भारतीय होने की खुशी है और तिरंगा लहरा कर वह बच्चे अपनी इसी खुशी का इजहार कर रहे हैं. बता रहे हैं कि देश पर गर्व करने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं. उनकी जेब में भले ही ज्यादा पैसे नहीं हों मगर भारत पर उनका भी उतना ही हक है जितना दिल्ली में बैठे लोगों का.

देखा जाए तो आजाद हिंदुस्तान में दो-तीन ही राष्ट्रीय पर्व हैं. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस. तीसरा राष्ट्रीय पर्व दो अक्टूबर है. महात्मा गांधी का जन्मदिन. इन राष्ट्रीय त्योहारों पर जमकर जश्न मनाना चाहिए. इससे देश की एकता मजबूत होती है. देश मजबूत होता है. इन तीन राष्ट्रीय पर्वों के अलावा बाकी जो कुछ भी है वह किसी धर्म, किसी जाति और किसी क्षेत्र का पर्व है. हम उन सब मौकों पर एक दूसरे को बधाई देते हैं. लेकिन बावजूद इसके वह है तो एक धर्म, जाति और क्षेत्र विशेष का. इसलिए गणतंत्र दिवस के दिन जो कोई भी मातम मना रहा है, दरअसल उसकी भावनाओं में देश की कभी कोई अहमियत ही नहीं रही. वह लोग बहुत नकारात्मक किस्म के लोग हैं. ऐसे लोग जो सिर्फ दूसरों की आलोचना करना जानते हैं. ऐसे लोगों की वजह से समाज में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आता.

आज भी फेसबुक पर ऐसे बहुत से लोग सक्रिय होंगे. यह दिल्ली के किसी चैनल, किसी अखबार या अन्य कॉरपोरेट हाउस में काम करते हुए सत्ता तंत्र के हितों को पोषित करते हैं. और गणतंत्र दिवस को कोसते हैं. आज के दिन भी यह धर्म, जाति और क्षेत्र का कार्ड खेल रहे होंगे. गरीबों की आड़ में देश की निंदा कर रहे होंगे. इनकी नजर में गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड सैन्य शक्ति की नुमाइश है. अय्याशी का साधन है. इनमें से ज्यादातर लोगों को इल्म ही नहीं कि इस परेड की तैयारी कितने दिन चलती है और यह किस तरह पूरे देश को जोड़ता है. इनका काम निंदा करना है और यह निंदा करेंगे.

यह हर अच्छे काम में नकारात्मक पहलू खोज लेंगे. हर त्योहार से मातम जोड़ लेंगे. इनकी नजर में क्रिकेट गुलामी का प्रतीक है. बॉलीवुड अय्याशी का अड्डा है. स्पेस साइंस अनैतिक महत्वाकांक्षा है. इसलिए आप इन्हें नजरअंदाज कीजिए. और खुले दिल से गणतंत्र दिवस मनाइये और भारतीय होने पर गर्व कीजिए.

एनडीटीवी में कार्यरत रहे पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से.

जयवीर तोमर की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब

बागपत : वरिष्ठ पत्रकार जयवीर सिंह तोमर का शनिवार प्रात: उनके पैतृक गांव रंछाड़ में अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस दौरान नम आंखों से मीडिया जगत के अलावा राजनीतिक, शिक्षा व अन्य क्षेत्रों के लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी। अंतिम दर्शन के लिए बागपत ही नहीं अन्य कई जिलों के लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

पूर्व विधायक स्व. कटार सिंह के पुत्र जयवीर सिंह तोमर वरिष्ठ पत्रकार थे, जिनका शुक्रवार देर शाम हृदय गति रुकने से निधन हो गया था। शनिवार प्रात: उनके पैतृक गांव रंछाड़ में शव को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया और करीब 10 बजे उन्हें पंचतत्व में विलीन कर दिया गया। उनके इकलौते पुत्र उत्कर्ष ने उन्हें मुखाग्नि दी।

शोक संवेदना प्रकट करने के लिए बागपत, मेरठ, सहारनपुर, दिल्ली, हरियाणा, मुजफ्फरनगर से मीडियाकर्मी पहुंचे। वरिष्ठ पत्रकार ओमकार चौधरी, यशपाल सिंह के अलावा दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री चौधरी साहब सिंह, पूर्व विधायक डॉ. महक सिंह, विधायक वीरपाल राठी, जिला उपभोक्ता फोरम के न्यायिक सदस्य जमाल अख्तर, भाजपा नेता सर्वदमन त्यागी, सपा जिलाध्यक्ष प्रदीप ठाकुर, रालोद जिलाध्यक्ष अनिल जैन, सोमेंद्र ढाका व अनुज ढाका, बृजपाल शास्त्री, सुनील रोहटा, पहलवान शौकेंद्र तोमर आदि ने भी शोक संवेदना जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

वरिष्ठ पत्रकार जयवीर सिंह तोमर के निधन से जिला शोक में डूबा हुआ है। मीडिया के अलावा राजनीतिक, सामाजिक संगठनों, शिक्षा क्षेत्रों के लोगों ने शोकसभाएं कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। बागपत में दैनिक जागरण कार्यालय पर हुई शोकसभा में ब्यूरो चीफ रामानुज ने कहा कि उनके जाने से मीडिया को बड़ी क्षति हुई है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है। इस दौरान पंकज तोमर, राजीव पंडित, प्रदीप द्विवेदी, प्रदीप राघव, गौरव कुमार, अमित पुंडीर, वीबी शास्त्री, नीरज त्यागी, सुरेंद्र कश्यप, अनुराग गुप्ता, रोहित आदि ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। बड़ौत कार्यालय पर हुई शोकसभा में विनीत तोमर, नवीन चिकारा, संदीप कुमार, मनोज कलीना, वीरपाल दाहा, प्रहलाद खोखर, इंशाद अली, गफ्फार, रोबिन, विकास आदि ने शोकसभा कर संवेदनाएं व्यक्त कीं।

इनके अलावा आम आदमी पार्टी कार्यालय, रालोद कार्यालय, नगर जाट सभा, बागपत व्यापारी एसोसिएशन, राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण संगठन, भारतीय किसान यूनियन, बागपत चिकित्सा संघ, बड़ौत में अखिल भारतीय मानव मिलन, अखिल भारत वर्षीय ब्राह्मण महासभा, ग्रामीण अंचलीय पत्रकार एसोसिएशन आदि ने भी उनके निधन पर शोकसभाएं आयोजित कीं।

खेकड़ा से खबर है कि वरिष्ठ पत्रकार जयवीर सिंह तोमर के निधन पर गणमान्य लोगों ने गहरा शोक जताया। दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। विजय मान, प्रवीण कुमार, विपिन कुमार शर्मा, प्रवीण शर्मा, विकास कुमार, राकेश मोहन, डा. दिनेश बंसल, समाजसेवी वेदपाल सिंह यादव, अर्जुन सिंह समेत अनेक गणमान्य लोगों ने अपनी शोक संवेदना व्यक्त कीं। (जागरण)

जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष संदीप ने ‘आइसा’ से इस्तीफा दिया, ‘आप’ ज्वाइन करने के आसार

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष संदीप सिंह ने आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा)से नाता तोड़ लिया है. उनके बारे में चर्चा है कि वे आम आदमी पार्टी के साथ नई पारी शुरू करने वाले हैं. संदीप सिंह आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे. उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है. आइसा के राष्ट्रीय महासचिव अभ्युदय ने उनके इस्तीफे की पुष्टि की.

संदीप 2007 में संदीप जेएनयू. छात्रसंघ के अध्यक्ष बने. संदीप ने भी पुष्टि की है कि उनकी 'आप' में ज्वायनिंग के लिए बातचीत चल रही है. बताया जाता है कि वे 'आप' नेता योगेंद्र यादव और आनन्द कुमार के संपर्क में हैं. संभव है कि कुछ दिनों में संदीप सिंह 'आप' ज्वाइन करने की घोषणा कर देंगे.

ममता की मेहरबानी से उर्दू पत्रकार अहमद हसन भी जाएंगे राज्यसभा

नई दिल्ली : प्रभात खबर अखबार के प्रधान संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश को जहां जेडीयू ने राज्यसभा उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया है वहीं तृणमूल कांग्रेस की तरफ से भी एक पत्रकार को राज्यसभा के लिए नामित किया गया है. इनका नाम है बंगाली दैनिक कालोम के संपादक अहमद हसन.  राज्यसभा के लिए 28 जनवरी नामांकन की अंतिम तिथि है और 7 फरवरी को चुनाव होना है.

भड़ास तक जानकारी bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

रमन सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार रामचन्द्र नचरानी के निधन पर शोक प्रकट किया

रायपुर : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने राज्य के वरिष्ठ पत्रकार और राजधानी रायपुर के हिन्दी दैनिक ‘प्रतिदिन राजधानी’ के प्रधान सम्पादक रामचन्द्र नचरानी के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। नचरानी का कल सवेरे यहां उनके निवास पर निधन हो गया।

मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के विकास में स्वर्गीय श्री नचरानी के योगदान का उल्लेख करते हुए उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना और सहानुभूति प्रकट की है। डॉ. सिंह ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है।

भड़ास तक जानकारी bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.