सपा – बसपा गठबंधन : संभावना एवं सफलता

एस.आर.दारापुरी

भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक, जनमंच उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल के उपचुनावों के परिणामों के बाद सपा, बसपा के गठबंधन के भविष्य, संभावनाएं एवं संभावित खतरों की चर्चा बहुत जोर शोर से चल रही है. उपचुनाव में बसपा द्वारा सपा  के समर्थन से दो सीटें जीतने को उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि यदि 2019 में भी सपा और बसपा का यह गठबंधन कायम रहे तो इससे भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. कुछ अतिउत्साही लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि इससे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि शेष भारत में भी भाजपा को हराया जा सकता है. कुछ लोग इसे 1993 के गठजोड़ की पुनरावृति के रूप में भी देख रहे है.

अतः उपरोक्त उत्साहपूर्ण परिस्थितियों में यह देखना ज़रूरी है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में  सपा-बसपा गठबंधन की सम्भावना क्या है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हाल के उपचुनाव में सपा- बसपा का गठजोड़ निस्वार्थ नहीं था. मायावती ने सपा को समर्थन इस शर्त पर दिया था कि वह राज्यसभा चुनाव में बसपा के प्रत्याशी को जिताने के लिए अपने विधायकों के फालतू वोट बसपा प्रत्याशी को देगी. बहरहाल बसपा के समर्थन से सपा गोरखपुर और फूलपुर की दोनों लोकसभा सीट जीतने में सफल रही परन्तु भाजपा की तगड़ी सेंधमारी के कारण राज्यसभा चुनाव में सपा के समर्थन के बावजूद बसपा प्रत्याशी हार गया. अतः उपचुनाव के दौरान बसपा का समर्थन राज्यसभा के चुनाव में सपा के समर्थन से सीधा जुड़ा हुआ था. एक तरीके से यह समर्थन सशर्त था.

उपचुनाव के बाद सपा–बसपा के कार्यकर्ताओं द्वारा आगामी चुनाव के लिए भी आपसी गठजोड़ की मांग को जोर से उठाया गया है.  अब तक मायावती और अखिलेश ने भी राज्यसभा में हार के बावजूद भविष्य में गठबंधन को बनाये रखने की बात कही है. इस सन्दर्भ  में 1993 का गठबंधन जिसके बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की मिलीजुली सरकार बनीं थी, के इतिहास को भी देखना होगा. उस समय भी दलितों और पिछड़ों की सरकार बनने  से इन वर्गों में बहुत उत्साह पैदा हुआ था और पिछड़ी जातियां ख़ास करके यादव और कुर्मी  सामाजिक भेद भाव भूल कर राजनीतिक स्तर पर दलितों के नजदीक आये थे और इससे राष्ट्रीय स्तर पर नए राजनीतिक समीकरण की सम्भावना बनती दिखाई दे रही थी.

परन्तु उक्त गठजोड़ शीघ्र ही व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया. इस विघटन के पीछे उस समय भी भाजपा की मुख्य भूमिका थी क्योंकि इससे उसे अपना भविष्य धूमिल होता दिखाई दे रहा था. अतः उसने कांशी राम को मायावती को मुख्य्मंत्री बनाने का लालच देकर मुलायम सिंह की सरकार  गिराने के लिए प्रेरित किया. गेस्ट हाउस काण्ड तो केवल निमित मात्र था जबकि उसमें भी भाजपा की बहुत बड़ी भूमिका थी.

गेस्ट हाउस काण्ड के बाद भाजपा ने दलितों और पिछड़ों खास करके यादव जातियों और चमार जाति  में अधिक से अधिक दुश्मनी और दूरी पैदा करने की कोशिश की और दुर्भाग्यवश कांशी राम और मायवती उनके इस कुचक्र में बुरी तरह से फंस गये. नतीजतन जिन्हें कुदरती दोस्त होने के नाते बड़े दुश्मन के खिलाफ एकजुट होना चाहिए था वे आपस में ही उससे से भी बड़े दुश्मन बन गये. यह भाजपा की दलितों-पिछड़ों के सामाजिक तथा राजनीतिक गठजोड़ को ध्वस्त करने की सबसे बड़ी सफलता थी.

इतना ही नहीं इसके बाद भाजपा की बराबर कोशिश रही कि दलितों और पिछड़ों का पुराना गठजोड़ किसी भी तरह से पुनर्जीवित न हो पाए. इसके बावजूद भी 1996 में सपा के कुछ दलित विधायकों द्वारा मुलायम सिंह की अनुमति से पुनः गठजोड़ करने हेतु दिल्ली जाकर कांशी राम से बातचीत की गयी थी.

आश्चर्यजनक तौर पर कांशी राम इसके लिए राजी हो गए थे और उन्होंने उसी दिन दिल्ली में इसकी घोषणा भी कर दी. उस दिन मायावायी लखनऊ में थी और उसने अगले दिन यह कह कर कि ”इसका सवाल ही पैदा नहीं होता” इसका प्रतिकार कर दिया और उस समय भी उक्त गठबंधन पुनर्जीवित होते होते मर गया. यह इस लिए हुआ क्योंकि उस समय मायावती पूर्णतया भाजपा के प्रभाव में थी और कांशी राम मायवती के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद काफी कमज़ोर स्थिति में आ गये थे. इस प्रकार 1996 में भी उक्त गठबंधन बीजेपी के कारण पुनर्जीवित होने से रह गया. इसके बाद भाजपा ने दोबारा दो बार मायावती को केवल इस आशय से समर्थन दिया कि कहीं सपा-बसपा गठबंधन पुनर्जीवित न हो जाये और इसमें वह पूरी तरह से सफल भी रही थी.

वर्तमान में भाजपा केंद्र तथा उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार चला रही है. भाजपा मायवती की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को भी पूरी तरह से जानती है और मायवती की कमजोरियों को भी. यह सर्वविदित है कि मायावती और उसका भाई आनंद कुमार  भ्रष्टाचार के कई मामलों में बुरी तरह से फंसा हुआ है और सीबीआई और ईडी का फंदा भाजपा के हाथ में है. ऐसा हो सकता है कि मोदी सरकार लालू प्रसाद की तरह सीबीआई का फंदा मायावती पर भी कसने लगे. क्या ऐसी परिस्थिति में मायावती इसी प्रकार की स्वतंत्र राजनीति करने का साहस दिखा पाएगी और सपा के साथ आसानी से गठजोड़ कर पायेगी?

भाजपा की अब तक यह कोशिश रही है कि अगर मायवती उसके साथ खुले गठबंधन में नहीं आती तो उसे किसे दूसरे के साथ भी गठबंधन न करने दिया जाये. उसकी हमेशा कोशिश रही है कि मायावती सभी सीटों पर अकेली लड़े ताकि उसका दलित वोट किसी दूसरी पार्टी खास करके कांग्रेस को न जाये. अब तक के सभी लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनाव में यही स्थिति देखने को मिली है. इससे भाजपा को दोहरा लाभ होता है. एक उसका अपना प्रतिबद्ध वोट तो उसे मिलता ही है दूसरे वह मायावती के माद्यम से दलित वोट कांग्रेस को जाने से रोकने में भी सफल रहती है जैसा कि पिछले गुजरात चुनाव में भी देखा गया है. 

अतः भाजपा संभावित सपा-बसपा गठबंधन को रोकने के लिए मायावती पर दबाव बना कर उसे अकेले ही सभी सीटों पर लड़ने के लिए बाध्य कर सकती है. यह भी उल्लेखनीय कि मायावती इससे पहले सत्ता पाने के लिए तीन बार भाजपा से गठजोड़ कर चुकी है. कुछ लोगों की आशंका है कि वह चौथी बार ऐसा नहीं करेगी, की भी कोई गारंटी नहीं है. 

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान में भाजपा को मायावती की सोशल इन्जीनीरिंग से कोई खतरा नहीं है क्योंकि उसने भी उसी फार्मूले का इस्तेमाल करके दलितों और पिछड़ों के बहुत बड़े हिस्से को वृहद हिंदुत्व के छाते के तले ले लिया है.  इसके परिणामस्वरूप अब सपा के साथ पिछड़ों में केवल यादव ही प्रमुख वर्ग बचा है और अतिपिछड़ों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पास चला गया है. इसी प्रकार बसपा के दलित मतदाताओं का भी बहुत बड़ा हिस्सा चमार/जाटव उपजाति को छोड़कर हिंदुत्व के छाते तले भाजपा के साथ जा चुका है जैसा कि पिछले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव से स्पष्ट हो चुका है.

अतः इस समय यह कहना कि सपा- बसपा  गठजोड़ से पिछड़ा और दलित वर्ग उसी संख्या में एकजुट हो जायेगा जितना कि वह 1993 में था, केवल दिवास्वपन होगा और यथार्थ से कोसों दूर. ऐसी परिस्थिति में अगर किसी तरह सपा-बसपा गठबंधन बनता भी है तो बहुत मजबूत नहीं होगा जब तक अपने जाति वोट के इलावा इसमें दूसरी जातियों/वर्गों के वोट नहीं मिलते.

उपरोक्त वर्णित परिस्थियों में यह प्रशन पैदा होता है कि क्या सपा–बसपा का जातिगत गठजोड़ भाजपा को हराने में सक्षम होगा? क्या उनके गठजोड़ की घोषणा मात्र से सभी दलित, पिछड़े और मुसलमान बड़ी संख्या में इसके साथ आ जायेंगे? क्या सपा- बसपा उन पिछड़ों  और दलितों को जो वृहद हिंदुत्व के छाते तले भाजपा में चले गये हैं, आसानी से अपनी पार्टियों में वापस ला पाएगी? क्या जाति की राजनीति की काट जाति की राजनीति से हो पाएगी?

वास्तव में अब तक की जाति की राजनीति ने हिंदुत्व को कमज़ोर करने की बजाये उसे मजबूत ही किया है जिसका फायदा भाजपा ने उठाया है. यह भी एक सत्य है कि जिस प्रकार कांग्रेस हिंदुत्व की राजनीति में भाजपा को नहीं हरा पायी है उसी तरह  जाति की राजनीति जो कि हिंदुत्व की पोषक है में सपा-बसपा गठबंधन भी उसे हरा नहीं पाएगी. अतः सपा-बसपा गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने से अलग हुए वोट बैंक को भाजपा से वापस छीनने की होगी और क्या वह केवल गठजोड़ हो जाने से ही वापस आ जायगा? भाजपा की वर्तमान साम,दाम, दंड,भेद की राजनीति के सामने यह आसान नहीं लगता.

यह भी उल्लेखनीय है कि जाति की राजनीति जातिगत भावनाओं के जोड़तोड़ की राजनीति है जिसमे जातिहितों के टकराव और अलगाव की भी प्रमुख भूमिका रहती है. अब तक भाजपा जातिगत भावनाओं को भुनाने का हुनर बहुत अच्छी तरह से सीख चुकी है. अतः अब जातिगत गठजोड़ और टकराव को तोड़ने के लिए जातिगत भावनाओं को भुनाने के  स्थान पर वर्गहित को आगे लाने  की जरूरत  है. इसके लिए ज़रूरी है कि वर्तमान जाति आधारित गठजोड़ के एजंडा की बजाये वर्गहित आधारित राजनीतिक एजंडा आगे लाया जाये जो बेरोज़गारी, गरीबी, कृषि संकट, निजी क्षेत्र में आरक्षण,आदिवासी समस्या, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के निजीकरण को रोकने और सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से आगे लाया जाये. इसके साथ ही वर्तमान सरकार की कार्पोरेट परस्त नीतियों के स्थान पर वैकल्पिक नीतियों को लाने की भी ज़रुरत है.

मेरा यह निश्चित मत है कि केवल इस प्रक्रिया द्वारा ही सपा-बसपा वर्गहित को आधार बना कर अपने खोये हुए वोट बैंक को भाजपा की झोली से वापस लाने में सीमित सफलता प्राप्त कर सकती है. डॉ. आंबेडकर ने भी कहा है- “जो राजनीति वर्गहित की बात नहीं करती वह धोखा है.” क्या अब तक जातिगत जोड़तोड़ करके सत्ता की दौड़ में लगी रही सपा और बसपा अपनी कार्यशैली में उक्त आमूलचूल परिवर्तन ला पायेगी? इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर सपा-बसपा जाति की राजनीति को त्याग कर वर्गहित की राजनीती का राजनीतिक एजंडा अपनाती है तो वह भाजपा को 2019 में पुनः सत्ता में आने से काफी हद तक रोकने में सफल हो सकती है. मायावती और अखिलेश को यह भी याद रखना चाहिए कि यह उनके लिए अपना अस्तित्व बचाने का आखिरी मौका है.

S.R. Darapuri

I.P.S.(Retd)

Organiser,

Jan Manch Uttar Pradesh

srdarapuri@gmail.com

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यूपीकोका में न्यायिक हिरासत अवधि साल भर, पुलिस रिमांड 60 दिन

आतंकवाद विरोधी कानून से भी कठोर है यूपीकोका… हाल में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा यूपीकोका अर्थात उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक- 2017 लाया गया है जो कि आतंकवाद विरोधी कानून (विधि विरुद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधिनियम-1967) से भी कठोर है. इसमें पुलिस को इस प्रकार की शक्तियां दी गयी हैं जो कि आज तक किसी भी कानून में नहीं दी गयी हैं. योगी सरकार ने इसे बड़ी चालाकी से विधान सभा के पटल पर रखा और अगले दिन ही इसे ध्वनिमत से पारित भी करा दिया.

अधिकतर विधायकों तथा विरोधी पक्ष के सदस्यों तक को इसे उपलब्ध नहीं कराया गया. इस कारण अधिकतर विधायक इसके लोकतंत्र तथा मानवाधिकार विरोधी प्राविधानों के बारे में जान तक नहीं सके और वे उस पर कोई चर्चा तथा आपत्ति भी नहीं उठा पाए. इसके अभाव में विपक्ष केवल इसके विपक्षगण तथा दलितों एवं मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा और इसके कठोर प्रावधानों और पुलिस को बहुत शक्तियां दिए जाने की बात नहीं उठा सका. यही स्थिति प्रेस की भी रही. वह केवल सरकार के संगठित अपराध पर नियंत्रण पाने के दावे तथा विपक्ष द्वारा अपने विरुद्ध दुरूपयोग के आरोप की ही बात करता रहा. किसी ने भी इस कानून के कठोर प्राविधानों तथा पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों पर कोई चर्चा नहीं की तथा आपत्ति नहीं उठाई.

फिलहाल यह बिल विधानसभा से पास हो कर विधान परिषद् को भेजा गया है जिसे सलेक्ट कमेटी को संदर्भित कर दिया गया है. यदि यह किसी तरह वहां से भी पास हो जाता है तो फिर यह राष्ट्रपति को स्वीकृति  के लिए भेजा जायेगा जहाँ पर इसे स्वीकृति मिल जाने की पूरी सम्भावना है. यह ज्ञातव्य है कि जो मायावती इस समय इसका विरोध कर रही है उसी मायावती ने अपने शासनकाल में 2008 में इसे विधान सभा और विधान परिषद् से पास कराकर कर राष्ट्रपति के पास भेजा था परन्तु वहां पर इसे स्वीकृति नहीं मिल पायी थी. वर्तमान में विपक्ष द्वारा इस बिल का सही और जोरदार ढंग से विरोध नहीं किया गया जिस कारण यह विधान सभा में बड़ी आसानी से पास हो गया. विपक्ष केवल इसके विपक्षीगण, दलितों और मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा परन्तु बिल के अति कठोर प्राविधानों और पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों की बात नहीं उठा सका जिस कारण भाजपा के लिए उनका प्रतिकार करना बहुत आसान रहा.

वास्तव में इस कानून के कठोर प्राविधान जिनका दुरूपयोग होने की पूरी सम्भावना है हमारी चिंता का मुख्य विषय होना चाहिए. इस कानून के अंतर्गत सबसे कड़ा प्रावधान यह है कि इसकी धारा 28(2) में सीआरपीसी की धारा 167 जिसमें न्यायालय को गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध की प्रकृति के अनुसार 15 दिन, 60 दिन तथा 90 दिन तक जेल (न्यायिक हिरासत) में रखने के अधिकार को बढ़ा कर 60, 180 तथा 365 दिन कर दिया गया है. इसका अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति इस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है तो उसे एक वर्ष तक अदालत में मुकदमा शुरू होने से पहले जेल में रहना पड़ सकता है जब कि सामान्य कानून के अंतर्गत यह अवधि अधिकतम 90 दिन ही थी. इसके मुकाबले में आतंकवाद विरोधी कानून  के अंतर्गत यह अवधि क्रमशः 30, 60 तथा 90 दिन ही है. इस प्रकार गिरफ्तार व्यक्ति को जेल में रखने के मामले में यूपीकोका के प्रावधान अधिक कठोर हैं. अब अगर यूपीकोका के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति मुकदमे में छूट भी जाता है तो उसे विवेचना के दौरान 365 दिन तक जेल में रहना पड़ सकता है. यह सर्वविदित है कि पुलिस बहुत से मामलों में निर्दोष व्यक्तियों को गिरफ्तार करके जेल में डाल देती है जहाँ उन्हें इस कानून के अंतर्गत लम्बे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है.

इस कानून का ऐसा ही दूसरा कड़ा प्राविधान पुलिस रिमांड को लेकर है. वर्तमान में सामान्य अपराधों में पुलिस को अधिकतम रिमांड 15 दिन तक ही मिल सकता है जबकि इस कानून की धारा 28(3)(क) में इसे बढ़ा कर 60 दिन कर दिया गया है. इसके विपरीत आतंकवाद विरोधी कानून में पुलिस रिमांड की अधिकतम अवधि 15 दिन की ही है. यह सर्वविदित है कि पुलिस रिमांड के दौरान पुलिस हिरासत में गिरफ्तारशुदा व्यक्तियों का उत्पीड़न (टार्चर) किया जाता है जिस कारण कई बार उस व्यक्ति की मौत तक हो जाती है. हमारे देश में पुलिस हिरासत में टार्चर की शिकायतें बहुत अधिक होती हैं तथा पुलिस कस्टडी में मौतों की संख्या भी बहुत अधिक है. वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस मानवाधिकार हनन के मामलों में देश में अव्वल है जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों से स्पष्ट है. इसके अनुसार 2013-14 से 2015-16 के दौरान पूरे देश में से 44% शिकायतें अकेले उत्तरप्रदेश से थीं. इसी माह 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि मानवाधिकार हनन की 67% शिकायतें पुलिस के विरुद्ध हैं. अब यूपीकोका के अंतर्गत पुलिस रिमांड की अवधि को 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन करना पुलिस को टार्चर के लिए खुली छूट देना है.

इतना ही नहीं, इस कानून की धारा 33 (तीन) में जेल में निरुद्ध व्यक्ति से मुलाकात की प्रक्रिया को भी कठिन कर दिया गया है. इसके अनुसार जेल बंदी से मुलाकात जिलाधिकारी की पूर्वानुमति से ही हो सकेगी और वह भी हफ्ते में अधिकतम दो बार ही. इसी प्रकार इस कानून की धारा 28(4) के अंतर्गत आरोपी को किसी भी न्यायालय से अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी. इस कानून की धारा 3 (ख) और 5 में यह प्रावधान किया गया है कि न्यायालय इस कानून के अंतर्गत किसी मामले में अदालती कार्रवाही प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा सकता है जिसका उलंघन करने पर सम्बंधित व्यक्ति को 1 माह की सजा तथा 1 हज़ार रूपये का जुर्माना तक हो सकता है. इस प्रकार यह कानून प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी प्रतिबंधित करता है. इसी प्रकार इस कानून में किसी व्यक्ति के एक मामले में दण्डित होने के बाद दूसरे मामले में बढ़ी हुयी सजा दिए जाने का भी प्राविधान है.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यद्यपि यूपीकोका संगठित अपराध को कम करने में कुछ हद तक उपयोगी हो सकता है परन्तु इसमें विवेचना के दौरान आरोपी को सामान्य अपराध में अधिकतम 90 दिन की बजाये एक साल तक जेल में रखने तथा पुलिस रिमांड की अवधि 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन किया जाना मानवाधिकारों के हनन और टार्चर को बढ़ावा देना है. इस कानून के कई प्रावधान आतंकवाद विरोधी कानून से भी कड़े हैं जिनके दुरूपयोग की पूरी सम्भावना है.    

लेखक एस.आर. दारापुरी यूपी में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर कार्य कर चुके हैं और रिटायरमेंट के बाद फिलवक्त जन मंच उत्तर प्रदेश के संयोजक के रूप में समाज के शोषित तबके की लड़ाई लड़ रहे हैं.

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सहारनपुर के दलित दोहरे अत्याचार का शिकार!

-एस.आर.दारापुरी-

संयोजक जन मंच उत्तर प्रदेश एवं सदस्य स्वराज अभियान समिति उत्तर प्रदेश

सभी भलीभांति अवगत हैं कि 5 मई, 2017 को सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव के दलितों के घरों पर उस क्षेत्र के ठाकुरों ने हमला किया था. इसमें लगभग दो दर्जन दलित बुरी तरह से घायल हुए थे और 50 से अधिक घर बुरी तरह से जला दिए गये थे. उक्त हमले में रविदास मंदिर की मूर्ती तोड़ी गयी थी और मंदिर को बुरी तरह से जलाया तथा क्षतिग्रस्त किया गया था. उक्त हमले में एक ठाकुर लड़का जिसने रविदास मंदिर में घुस कर कोई ज्वलनशील पदार्थ छिड़क कर रविदास मंदिर को जलाया था तथा मूर्ती तोड़ी थी दम घुटने के कारण मंदिर से बाहर निकलते ही बेहोश हो गया था और बाद में मर गया था. इस पर हजारों की संख्या में ठाकुरों ने दलित बस्ती पर हमला किया था. हमले में दो दर्जन के करीब दलित बुरी तरह से घायल हुए थे, एक औरत की छाती काटने की कोशिश की गयी थी, दलित औरतों की इज्ज़त लूटने की कोशिश की गयी, ज्वलनशील पदार्थ छिडक कर घरों को जलाया गया और गाय/ भैसों तक को घायल किया गया.

जिस समय ठाकुर लोगों ने दलित बस्ती पर हमला किया उस समय पुलिस मौके पर मौजूद थी परन्तु उसने भी रोकने की बजाये हमलावरों को तांडव करने का खुला मौका दिया. जांच के दौरान औरतों ने हमें बताया था कि पुलिस वाले दंगाईयों को कह रहे थे कि आपको दो-तीन घंटे का समय दिया जाता है, जो कुछ करना है कर लो. इस प्रकार पुलिस ने बचाने की बजाये दलितों के घरों को जलाने, उन्हें घायल करने तथा लूटने में पूरा सहयोग दिया. पुलिस की यह भूमिका दलितों के प्रति दुर्भावनापूरण रवैइये का प्रतीक है.

इतना ही नहीं पुलिस ने दलितों के विरुद्ध ठाकुरों की तरफ से 5 मुक़दमे दर्ज किये जिन में 9 दलितों को नामज़द किया गया परन्तु दलितों की तरफ से ठाकुरों के विरुद्ध केवल एक मुकदमा दर्ज किया गया जिसमे 9 ठाकुर नामज़द तथा काफी अन्य को आरोपी बनाया गया था. इस पर पुलिस ने 8 दलितों को तो उसी दिन गिरफ्तार कर लिया और केवल 9 ठाकुरों को गिरफ्तार किया गया. इसके बाद में एक अन्य दलित को भी गिरफ्तार किया गया परन्तु ठाकुरों की तरफ से कोई भी अन्य गिरफ्तारी नहीं की गयी जबकि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने हमारी जांच टीम को बताया था कि उन्होंने लगभग 40 ठाकुर हमलवरों को चिन्हित कर लिया है और उनकी गिरतारी जल्दी ही की जाएगी परन्तु आज तक कोई भी गिरफ्तारी नहीं की गयी.  इसके लगभग तीन हफ्ते बाद जब मायावती शब्बीरपुर गयी तो उस दिन जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण शब्बीरपुर से लौट रहे एक दलित लड़के की हत्या कर दी गयी जिसमे केवल दो ठाकुर लड़कों की गिरफ्तारी की गयी.

पुलिस के पक्षपाती रवैये का इससे बड़ा क्या सुबूत हो सकता है है कि पुलिस ने पिटने वाले दलित और पीटने वाले ठाकुरों के साथ एक जैसा बर्ताव किया है. बराबर की गिरफ्तारियां की गयी है. दो दलितों तथा दो ठाकुरों पर एनएसए लगा दिया गया है और सभी लोग जेल में हैं. परिस्थितियों से पूरी तरह स्पष्ट है कि दलितों ने अपने बचाव में जो भी पथराव किया वह आत्मरक्षा में ही किया था. परन्तु दलितों द्वारा आत्मरक्षा में की गयी कारवाही को भी हमलावर ठाकुरों पर हमले के रूप में लिया गया और उनकी गिरफ्तारियां की गयीं जबकि आईपीसी की धारा 100 में प्रत्येक नागरिक को आत्मरक्षा में कार्रवाही करने का अधिकार है. इस प्रकार एक तो दलितों पर ठाकुरों द्वारा अत्याचार किया गया और दूसरे पुलिस ने उन्हें आत्मरक्षा के अधिकार का लाभ न देकर गिरफतार किया गया. इस प्रकार दलित दोहरे अत्याचारका शिकार हुए हैं.

हमारी टीम द्वारा जांच के दौरान औरतों ने यह बताया था कि हमलावरों के पास गुब्बारे थे जिसको फेंक कर आग लगाई गयी थी. इससे स्पष्ट है कि दलितों पर हमला पूर्व नियोजित था. औरतों का कहना था कि हमलावरों की मोटर साईकलों की डिग्गियों में किसी ज्वलनशील पदार्थ से भरे हुए गुबारे थे और सृन्ज आदि भी थी जिस से वे कुछ छिडक कर आग लगा रहे थे. हम लोगों ने इस बात का उल्लेख अपनी जांच रिपोर्ट में भी किया था परन्तु पुलिस ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर दिया. प्रशासन द्वारा दलितों के घरों तथा सामान के नुक्सान का आंकलन कराया गया था परन्तु अब तक जो मुयाव्ज़ा दिया गया है वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही है. जो दलित ठाकरों द्वारा लिखाये गये मुकदमों में नामज़द हैं और जेल में हैं उन्हें न तो सरकार की तरफ से नुक्सान की भरपाई हेतु कोई मुवावजा मिला है और न ही एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत मिलने वाली अनुग्रहराशी ही मिली है. इसके इलावा गिरफ्तार हुए दलितों को निजी वकील रखने पर भी खर्चा करना पड़ रहा है.

यह भी उल्लेखनीय है कि दलितों को घटना से एक दिन पहले ही आभास हो गया था कि 5 मई को महाराणा प्रताप जयंती पर दलितों पर हमला हो सकता है. इसी लिए ग्राम प्रधान ने उसकी सूचना पुलिस अधिकारियों तथा एसडीएम को दे दी थी परन्तु इसके बावजूद भी उस दिन दलितों की सुरक्षा के लिए पुलिस का कोई उचित प्रबंध नहीं किया गया. इसके साथ ही जब 9 मई को भीम आर्मी ने प्रशासन द्वारा शब्बीरपुर में हुए हमले के सम्बन्ध में वांछित कारवाही न करने पर विरोध जिताने की कोशिश की तो पुलिस द्वारा बलप्रयोग किया गया. इस पर भीम आर्मी के सदस्यों तथा पुलिस के बीच मुठभेड़ होने पर भीम आर्मी के संयोजक चन्द्र शेखर तथा उसके साथियों के विरुद्ध 21 मुक़दमे दर्ज कर लिए गए. इसके बाद चन्द्र शेखर सहित 40 लोगों को गिरफतार करके जेल में डाल दिया गया. जिनमे से दो लोग अभी तक जेल में हैं. चन्द्र शेखर और वालिया को छोड़ कर भीम आर्मी के अन्य गिरफ्तार सदस्यों की जमानत हो चुकी है. इन दोनों की जमानत जिला स्तर से रद्द हो चुकी है और अब यह इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित है. जेल में चन्द्र शेखर की सेहत बराबर गिर रही है और 28 अक्तूबर को उसे जिला अस्पताल में आईसीयू में भर्ती करवाना पड़ा था.

भीम आर्मी के दमन की ताज़ा उदहारण यह है कि कुछ दिन पहले जब भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर को इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिली तो उसके जेल से छूटने के पहले ही उस पर रासुका लगा दिया गया. दरअसल योगी सरकार नहीं चाहती की चंद्र्शेखर किसी भी हालत में जेल से बाहर आये क्योंकि उसके बाहर आने पर दलितों के लामबंद होने का खतरा है. सरकार की यह कार्रवाही रासुका जैसे काले कानून का खुला दुरूपयोग है. इस कानून के अंतर्गत आरोपी को बिना किसी कारण के एक साल तक जेल में रखा जा सकता है. यह नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का खुला उलंघन है..

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि सहारनपुर में शब्बीरपुर के दलित आत्मरक्षा में कार्रवाही करने पर भी गिरफ्तार किये गये और उनकी गिरफ्तारियां हम्ला करने वाले ठाकुरों के समतुल्य ही की गयीं. रासुका के मामले में भी उन्हें हमलावरों के समतुल्य रखा गया है. पीड़ित दलितों को बहुत कम मुयाव्ज़ा दिया गया है  और जो दलित मुकदमों में नामज़द हैं उन्हें कोई भी मुयाव्ज़ा नहीं मिला है. इस प्रकार शब्बीरपुर के दलित एक तरफ जहाँ ठाकुरों के हमले का शिकार हुए हैं वहीँ दूसरी ओर वे प्रशासन के पक्षपाती रवैइये का भी शिकार हो रहे हैं. इसके इलावा भीम आर्मी के दो सदस्य अभी भी जेल में हैं और तीन दर्जन से अधिक नवयुवक पुलिस से मजामत के मुकदमे झेल रहे हैं. पुलिस ने भीम आर्मी के एक पदाधिकारी की गिरफ्तारी के लिए 12000 का इनाम घोषित कर रखा है. सरकार द्वारा हमलावरों के विरुद्ध सखत कार्रवाही न करने के कारण उनके हौसले बुलंद हैं और वे अभी भी दलितों को  धमका रहे है. इस प्रकार सहारन पुर के दलित दोहरे अत्याचार का शिकार हो रहे हैं. इस उत्पीडन के विरुद्ध सभी दलित संगठनों और प्रगतिशील जनवादी ताकतों को एकजुट हो कर संघर्ष करने की ज़रुरत है. स्वराज अभियान और स्वराज इंडिया सहारन पुर के दलितों के संघर्ष में पूरी तरह से सहयोग दे रहा है.

I.P.S.(Retd) S.R.Darapuri से संपर्क Mob 919415164845 के जरिए किया जा सकता है.

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मायावती का धर्म परिवर्तन राजनीति से प्रेरित!

लखनऊ : ‘मायावती का धर्म परिवर्तन राजीनीति से प्रेरित है.’ यह बात आज एस. आर. दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि मायावती की धर्म परिवर्तन की धमकी के पीछे उसके दो उद्देश्य हैं- एक तो भाजपा जो हिंदुत्व की राजनीति कर रही है पर दबाव बनाना और दूसरे हिन्दू धर्म त्यागने की बात कह कर दलितों को प्रभावित करना.  मायावती की इस धमकी से बीजेपी और हिन्दुओं पर कोई असर होने वाला नहीं है क्योंकि हिन्दू तो बुद्ध को विष्णु का अवतार और बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म का एक पंथ मानते है.

वैसे एक यह बात भी उल्लेखनीय है कि मायावती ऐसी घोषणा तब तब करती है जब वह सत्ता के बाहर होती है. मायावती सत्ता में होने पर धर्म परिवर्तन की बात करके सर्वजन को नाराज़ करने से डरती है और अब उसके खिसक जाने से धमकी दे रही है और दलितों को प्रभावित करना चाहती है. 

यह भी ज्ञातव्य है कि मायावती ने इसी प्रकार की घोषणा 2006 में भी की थी. उस समय उसने कहा था कि वह धर्म परिवर्तन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर नागपुर जा कर धर्म परिवर्तन करेगी. वह उस दिनांक को नागपुर गयी भी थी परन्तु उसने वहां धर्म परिवर्तन नहीं किया था बल्कि वह अपने अनुयायियों से यह कह कर चली आई थी कि वह धर्म परिवर्तन तभी करेगी जब केंद्र में बसपा की बहुमत की सरकार बनेगी.

अब यह बात स्पष्ट है कि मायावती का धर्म परिवर्तन व्यक्तिगत आस्था से नहीं बल्कि राजनीति से जुड़ा हुआ है. मायावती अगर वास्तव में धर्म परिवर्तन करना चाहती है तो उसे कौन रोक रहा है. यह बात गौर तलब है कि भाजपा ने धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए सभी भाजपा शासित राज्यों में सखत कानून बनाये हैं. अगर मायावती सचमुच में धर्म परिवर्तन की पक्षधर है तो उसे इन कानूनों का राजनितिक स्तर पर विरोध करना चाहिए. परन्तु उसने आज तक ऐसा नहीं किया है.

यह भी देखना समीचीन होगा कि सत्ता में रह कर मायावती ने बौद्ध धर्म के लिए क्या किया है? हाँ, उसने बुद्ध की कुछ मुर्तिया तो ज़रूर लगवायीं परन्तु बुद्ध की विचारधारा को फ़ैलाने के लिए कुछ भी नहीं किया. यह बात विशेष तौर पर विचारणीय है कि 2001 से 2010 के दशक में जब मायावती तीन बार मुख्य मंत्री रही उसी दशक में उत्तर प्रदेश में बौद्धों की जनसख्या एक लाख कम हो गयी जैसा कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है. क्या यह बौद्ध धर्म आन्दोलन पर सर्वजन की राजनीति के कुप्रभाव का परिणाम नहीं है?

एस.आर.दारापुरी
पूर्व पुलिस महानिरीक्षक
एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश
मोब: 9415164845 

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मायावती का दलित वोट बैंक क्यों खिसका?

हाल में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी की बुरी तरह से हार हुयी है। इस चुनाव में उसके बहुमत से सरकार बनाने के दावे के विपरीत उसे कुल 19 सीटें मिली हैं जिनमें शायद केवल एक ही आरक्षित सीट है। उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है। एनडीटीवी के विश्लेषण के अनुसार इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा को दलित वोटों का केवल 25% वोट ही मिला है जबकि इसके मुकाबले में सपा को 26% और भाजपा को 41% मिला है। दरअसल 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 22% पर पहुँच गया है। इसी अनुपात में बसपा के दलित वोटबैंक में भी कमी आयी है। अभी तो बसपा के वोटबैंक में लगातार आ रही गिरावट की गति रुकने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। मायावती ने वर्तमान हार की कोई ईमानदार समीक्षा करने की जगह ईवीएम में गड़बड़ी का शिगूफा छोड़ा है। क्या इससे मायावती इस हार के लिए अपनी जिम्मेदारी से बच पायेगी या बसपा को बचा पायेगी?

यद्यपि कुछ बसपा समर्थकों ने इन आंकड़ों के सही होने के बारे में प्रश्न उठाया है परंतु उत्तर प्रदेश में दलित जातियों की संख्या के विश्लेषण से यह आंकड़ा सही प्रतीत होता है। आइये सब से पहले उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी देखी जाये और फिर उसमें मायावती को मिले वोटों का आंकलन किया जाये. उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी कुल आबादी का 21% है और उनमे लगभग 66 उपजातियां हैं जो सामाजिक तौर पर बटी हुयी हैं. इन उप जातियों में जाटव /चमार – 56%, पासी – 16%, धोबी, कोरी और बाल्मीकि – 15%, गोंड, धानुक और खटीक – 5% हैं. 9 अति- दलित उप जातियां – रावत, बहेलिया खरवार और कोल 5% हैं. शेष 49 उप जातियां लगभग 3% हैं.

चमार/ जाटव आजमगढ़, आगरा, बिजनौर , सहारनपुर, मुरादाबाद, गोरखपुर, गाजीपुर, सोनभद्र में हैं. पासी सीतापुर, राय बरेली, हरदोई, और इलाहाबाद जिलों में हैं. शेष समूह जैसे धोबी, कोरी, और बाल्मीकि लोगों की अधिकतर आबादी बरेली, सुल्तानपुर, और गाज़ियाबाद जनपदों में है. आबादी के उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर मायावती की बसपा पार्टी को अब तक बिभिन्न चुनावों में मिले दलित वोटों और सीटों का विश्लेषण करना उचित होगा. अब अगर वर्ष 2007 में हुए विधान सभा चुनाव का विश्लेष्ण किया जाये तो यह पाया जाता है कि इस चुनाव में बसपा को 87 अरक्षित सीटों में से 62 तथा समाजवादी (सपा) पार्टी को 13, कांग्रेस को 5 तथा बीजेपी को 7 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा को लगभग 30% वोट मिला था. इस से पहले 2002 में बसपा को 24 और सपा को 35 आरक्षित सीटों में विजय प्राप्त हुई थी. वर्ष 2004 में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को कुल आरक्षित 17 सीटों में से 5 और सपा को 8 सीटें मिली थी और बसपा का वोट बैंक 30% के करीब था.

वर्ष 2009 में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को आरक्षित 17 सीटों में से 2, सपा को 10 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा का वोट बैंक 2007 में मिले 30% से गिर कर 27% पर आ गया था. इसका मुख्य कारण दलित वोट बैंक में आई गिरावट थी क्योंकि तब तक मायावती के बहुजन के फार्मूले को छोड़ कर सर्वजन फार्मूले को अपनाने से दलित वर्ग का काफी हिस्सा नाराज़ हो कर अलग हो गया था. यह मायावती के लिए खतरे की पहली घंटी थी परन्तु मायावती ने इस पर ध्यान देने की कोई ज़रुरत नहीं समझी.
अब अगर 2012 के विधान सभा चुनाव को देखा जाये तो इसमें मायावती की हार का मुख्य कारण अन्य के साथ साथ दलित वोट बैंक में आई भारी गिरावट भी थी. इस बार मायावती 89 आरक्षित सीटों में से केवल 15 ही जीत पायी थीं जबकि सपा 55 सीटें जीतने में सफल रही थी. इन 89 आरक्षित सीटों में 35 जाटव/चमार और 25 पासी जीते थे इस में सपा के 21पासी और मायावती के 2 पासी ही जीते थे।मायावती की 16 आरक्षित सीटों में 2 पासी और 13 जाटव/चमार जीते थे. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि इस बार मायावती की आरक्षित सीटों पर हार का मुख्य कारण दलित वोटों में आई गिरावट भी थी. इस बार मायावती का कुल वोट प्रतिशत 26% रहा था जो कि 2007 के मुकाबले में लगभग 4% घटा था.
मायावती द्वारा 2012 में जीती गयी 15 आरक्षित सीटों का विश्लेषण करने से पाता चलता है कि उन्हें यह सीटें अधिकतर पच्छिमी उत्तर प्रदेश में ही मिली थीं जहाँ पर उसकी जाटव उपजाति अधिक है. मायावती को पासी बाहुल्य क्षेत्र में सब से कम और कोरी बाहुल्य क्षेत्र में भी बहुत कम सीटें मिली थीं. पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में यहाँ प़र चमार उपजाति का बाहुल्य है वहां पर भी मायावती को बहुत कम सीटें मिली थीं। मायावती को पशिचमी उत्तर प्रदेश से 7 और बाकी उत्तर प्रदेश से कुल 8 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में यह भी उभर कर आया था कि जहाँ एक ओर मायावती का पासी, कोरी, खटीक, धोबी और बाल्मीकि वोट खिसका था वहीँ दूसरी ओर चमार/जाटव वोट बैंक जिस में लगभग 70% चमार (रैदास) और 30% जाटव हैं में से अधिकतर चमार वोट भी खिसक गया था। इसी कारण से मायावती को केवल पच्छिमी उत्तर परदेश जो कि जाटव बाहुल्य क्षेत्र है में ही अधिकतर सीटें मिली थीं। एक सर्वेक्षण के अनुसार मायावती का लगभग 8% दलित वोट बैंक टूट गया था.

2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती को एक भी सीट नहीं मिली थी। इस चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 19.6% रह गया था। इस चुनाव में भी चमार/जाटव वोट का बड़ा हिस्सा मायावती से अलग हो गया था परंतु मायावती ने इससे कोई सबक नहीं लिया जिसका खामियाजा इस चुनाव में भुगतना पड़ा है। मायावती के दलित वोट बैंक खिसकने का मुख्य कारण मायावती का भ्रष्टाचार, विकासहीनता, दलित उत्पीड़न की उपेक्षा और तानाशाही रवैय्या रहा है . मायावती द्वारा दलित समस्याओं को नज़र अंदाज़ कर अंधाधुंध मूर्तिकर्ण को भी अधिकतर दलितों ने पसंद नहीं किया है. सर्वजन को खुश रखने के चक्कर में मायावती द्वारा दलित उत्पीड़न को नज़र अंदाज़ करना भी दलितों के लिए बहुत दुखदायी सिद्ध हुआ है. दलितों में एक यह धारणा भी पनपी है कि मायावती सरकार का सारा लाभ केवल मायावती की उपजाति खास करके चमारों/जाटवों को ही मिला है जो कि वास्तव में पूरी तरह सही नहीं है. इस से दलितों की गैर चमार/जाटव उपजातियां प्रतिक्रिया में मायावती से दूर हो गयी हैं. अगर गौर से देखा जाये तो यह उभर कर आता है कि मायावती सरकार का लाभ केवल उन दलितों को ही मिला है जिन्होंने मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार में सहयोग दिया है. इस दौरान यह भी देखने को मिला है कि जो दलित मायावायी के साथ नहीं थे बसपा वालों ने उन को भी प्रताड़ित किया था. उनके उत्पीडन सम्बन्धी मामले थाने पर दर्ज नहीं होने दिए गए. कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि मायावती ने अपने काडर के एक बड़े हिस्से को शोषक, भ्रष्ट और लम्पट बना दिया है जिसने दलितों का भी शोषण किया था. यही वर्ग मायावती के भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और दलित विरोधी कार्यों को हर तरीके से उचित ठहराने में लगा रहता है. दलित काडर का भ्रष्टिकरण दलित आन्दोलन की सब से बड़ी हानि है.

इस के अतिरिक्त बसपा की हार का एक कारण यह भी है कि मायावती हमेशा यह शेखी बघारती रही है कि मेरा वोट बैंक हस्तान्तरणीय है. इसी कारण से मायावती असेम्बली और पार्लियामेंट के टिकटों को धड़ल्ले से ऊँचे दामों में बेचती रही है और दलित उत्पीड़क, माफिया और अपराधियों एवं धनबलियों को टिकट देकर दलितों को उन्हें वोट देने के लिए आदेशित करती रही है। दरअसल मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, माफियाओं, दलित उत्पीड़कों एवं पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया है जिनसे उनकी लड़ाई है। इस चुनाव में भी मायावती ने आधा दर्जन ऐसे सवर्णों को टिकट दिया था जो दलित हत्या, दलित बलात्कार और दलित उत्पीड़न के आरोपी हैं । इसी लिए इस बार दलितों ने मायावती के इस आदेश को नकार दिया है और बसपा को वोट नहीं दिया. दूसरे दलितों में बसपा के पुराने मंत्रियों और विधायकों के विरुद्ध अपने लिए ही कमाने और आम लोगों के लिए कुछ भी न करने के कारण प्रबल आक्रोश भी था और इस बार वे उन्हें हर हालत में हराने के लिए कटिबद्ध थे. तीसरे मायावती ने सारी सत्ता अपने हाथों में केन्द्रित करके तानाशाही रवैय्या अपना रखा था जिस कारण कुछ लोगों को छोड़ कर कोई भी व्यक्ति मायावती से नहीं मिल सकता था। मायावती केवल मीटिंगों में भाषण देने के लिए ही आती थीं । इसके इलावा उसका दलितों से कोई संपर्क नहीं रहा है जिसने दलितों की मायावती से दूरी को बढ़ाया है। इसके इलावा मायावती ने जिन छोटी दलित उपजातियों को नज़रअन्दाज़ किया था भाजपा ने उन तक पहुँच बना कर उन्हें चुनाव में टिकट देकर अपने साथ कर लिया।

मायावती की अवसरवादी और भ्रष्ट राजनीति का दुष्प्रभाव यह है कि आज दलितों को यह नहीं पता है कि उन का दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है. उनकी मनुवाद और जातिवाद के विरुद्ध लड़ाई भी कमज़ोर पड़ गयी है क्योंकि बसपा के इस तजुर्बे ने दलितों में भी एक भ्रष्ट और लम्पट वर्ग पैदा कर दिया है जो कि जाति लेबल का प्रयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए ही करता है. उसे दलितों के व्यापक मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं है. एक विश्लेषण के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित आज भी विकास की दृष्टि से बिहार, उड़ीसा राजस्थान और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर भारत के शेष सभी राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं. उतर प्रदेश के लगभग 60% दलित गरीबी की रेखा से नीचे जी रहे हैं. लगभग 60% दलित महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार 70% दलित बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. अधिकतर दलित बेरोजगार हैं और उत्पादन के साधनों से वंचित हैं. मायावती ने सर्वजन के चक्कर में भूमि सुधारों को जान बूझ कर नज़र अंदाज़ किया जो कि दलितों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार हो सकता था. मायावती के सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के कारण आम लोगों के लिए उपलब्ध कल्याणकारी योजनायें जैसे मनरेगा, राशन वितरण व्यवस्था , इंदिरा आवास, आंगनवाडी केंद्र और वृद्धा, विकलांग और विधवा पेंशन आदि भ्रष्टाचार का शिकार हो गयीं और दलित एवं अन्य गरीब लोग इन के लाभ से वंचित रह गए. मायावती ने अपने आप को सब लोगों से अलग कर लिया और लोगों के पास अपना दुःख/कष्ट रोने का कोई भी अवसर न बचा. इन कारणों से दलितों ने इस चुनाव में मायावती को बड़ी हद तक नकार दिया जो कि चुनाव नतीजों से परिलक्षित है.

कुछ लोग मायावती को ही दलित आन्दोलन और दलित राजनीति का पर्याय मान कर यह प्रश्न उठाते हैं कि मायावती के हारने से दलित आन्दोलन और दलित राजनीति पर बुरा असर पड़ेगा. इस संबंध में यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि मायावती पूरे दलित आन्दोलन का प्रतिनधित्व नहीं करती है. मायावती केवल एक राजनेता है जो कि दलित राजनीति कर रही है वह भी एक सीमित क्षेत्र : उत्तर प्रदेश और उतराखंड में ही. इस के बाहर दलित अपने ढंग से राजनीति कर रहे हैं. वहां पर बसपा का कोई अस्तित्व नहीं है. दूसरे दलित आन्दोलन के अन्य पहलू सामाजिक और धार्मिक हैं जिन पर दलित अपने आप आगे बढ़ रहे हैं. धार्मिक आन्दोलन के अंतर्गत दलित प्रत्येक वर्ष बौद्ध धम्म अपना रहे हैं और सामाजिक स्तर पर भी उनमें काफी नजदीकी आई है. यह कार्य अपने आप हो रहा है और होता रहेगा. इस में मायावती का न कोई योगदान रहा है और न ही उसकी कोई ज़रुरत भी है. यह डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन है जो कि स्वतस्फूर्त है. हाँ इतना ज़रूर है कि इधर मायावती ने एक आध बौद्ध विहार बना कर बौद्ध धम्म के प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल ज़रूर किया है. यह उल्लेखनीय है मायावती ने न तो स्वयं बौद्ध धम्म अपनाया है और न ही कांशी राम ने अपनाया था. उन्हें दर असल बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन के जाति उन्मूलन में महत्व में कोई विश्वास ही नहीं है. वे तो राजनीति में जाति के प्रयोग के पक्षधर रहे हैं न कि उसे तोड़ने के. उन्हें बाबा साहेब के जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य में कोई दिलचस्पी नहीं है. वह दलितों का राजनीति में जातिवोट बैंक के रूप में ही प्रयोग करके जाति की राजनीति को कायम रख कर अपने लिए लाभ उठाना चाहती है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक बहुत हद तक खिसक गया है। शायद मायावती अभी भी दलितों को अपना गुलाम समझ कर उस से ही जुड़े रहने की खुशफहमी पाल रही है. मायावती की यह नीति कोंग्रेस की दलितों और मुसलामानों के प्रति लम्बे समय तक अपनाई गयी नीति का ही अनुसरण है. मायावती दलितों को यह जिताती रही है कि केवल मैं ही आप को बचा सकती हूँ कोई दूसरा नहीं. इस लिए मुझ से अलग होने की बात कभी मत सोचिये. दूसरे दलितों के उस से किसी भी हालत में अलग न होने के दावे से वह दूसरी पार्टियों से दलितों से दूरी बनाये रखने की चाल भी चल रही है ताकि दलित अलगाव में पड़ कर उस के ही गुलाम बने रहें. पर अब दलित मायावती के छलावे से काफी हद तक मुक्त हो गए हैं. अब यह पूरी सम्भावना है कि उत्तर प्रदेश के दलित मायावती के बसपा प्रयोग से सबक लेकर एक मूल परिवर्तनकारी, अम्बेडकरवादी राजनीतिक विकल्प की तलाश करेंगे और जातिवादी राजनीति से बाहर निकल कर मुद्दा आधारित जनवादी राजनीति में प्रवेश करेंगे. केवल इसी से उनका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकर्ण हो सकता है।

एस.आर. दारापुरी
आई.पी.एस. (से.नि.)
राष्ट्रीय प्रवक्ता
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
srdarapuri@gmail.com

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क्या मायावती का दलित वोट बैंक खिसका है?

पिछले लोक सभा चुनाव के परिणामों पर मायावती ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था  कि उन की हार के पीछे मुख्य कारण गुमराह हुए ब्राह्मण, पिछड़े और मुसलमान समाज द्वारा वोट न देना है जिस के लिए उन्हें बाद में पछताना पड़ेगा. इस प्रकार मायावती ने स्पष्ट तौर पर मान लिया था कि उस का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया है. मायावती ने यह भी कहा था कि उस की हार के लिए उसका यूपीए को समर्थन देना भी था.

उस ने आगे यह भी कहा था कि कांग्रेस और सपा ने उस के मुस्लिम और पिछड़े वोटरों को यह कह कर गुमराह कर दिया था कि दलित वोट भाजपा की तरफ जा रहा है. परन्तु इस के साथ ही उस ने यह दावा किया था कि उत्तर प्रदेश में उसकी पार्टी को कोई भी सीट न मिलने के बावजूद उस का दलित वोट बैंक बिलकुल नहीं गिरा है. इसके विपरीत उसने अपने वोट बैंक में इजाफा होने का दावा भी किया था.

आइये उस के इस दावे की सत्यता की जांच उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करें:-

यदि बसपा के 2007 से लेकर अब तक चुनाव परिणामों को देखा जाये तो यह बात स्पष्ट तौर पर उभर कर आती है कि जब से मायावती ने बहुजन की राजनीति के स्थान पर सर्वजन की राजनीति शुरू की है तब से बसपा का दलित जनाधार बराबर घट रहा है. 2007 के असेंबली चुनाव में बसपा को 30.46%, 2009 के लोकसभा चुनाव में 27.42% (-3.02%), 2012 के असेंबली चुनाव में 25.90% (-1.52%) तथा 2014 के लोक सभा चुनाव में 19.60% (-6.3%) वोट मिला था. इस से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक के स्थिर रहने का दावा उपलब्ध आंकड़ों पर सही नहीं उतरता है.

मायावती का यह दावा कि उस का उत्तर प्रदेश में वोट बैंक 2009 में 1.51 करोड़ से बढ़ कर 2014 में 1.60 करोड़ हो गया है भी सही नहीं है क्योंकि इस चुनाव में पूरे उत्तर प्रदेश में बढ़े 1.61 करोड़ नए मतदाताओं में से बसपा के हिस्से में केवल 9 लाख मतदाता ही आये थे. राष्ट्रीय चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भी बसपा का वोट बैंक 2009 के 6.17 % से 2% से अधिक गिरावट के कारण घट कर 4.1% रह गया था. सेंटर फार स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटी के निदेशक संजय कुमार ने भी बसपा के कोर दलित वोट बैंक में सेंध लगने की बात कही थी.

मायावती का कुछ दलितों द्वारा गुमराह हो कर भाजपा तथा अन्य पार्टियों को वोट देने का आरोप भी बेबुनियाद है. मायावती यह अच्छी तरह से जानती हैं कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा चमारों सहित 2012 के असेंबली चुनाव में ही उस से अलग हो गया था. इसका मुख्य कारण शायद यह था कि मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुण्डों. माफियों और पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया है जो कि उनके वर्ग शत्रु हैं. इस से नाराज़ हो कर चमारों/जाटवों का एक हिस्सा और अन्य दलित उपजातियां बसपा से अलग हो गयी हैं.. मायावती का बोली लगा कर टिकट बेचना और दलित वोटों को भेड़ बकरियों की मानिंद किसी के भी हाथों बेच देना और इस वोट बैंक को किसी को भी हस्तांतरित कर देने का दावा करना दलितों को एक समय के बाद रास नहीं आया. इसी लिए पिछले असेंबली चुनाव और  लोक सभा चुनाव में दलितों ने उसे उसकी हैसियत बता दी थी.

किसी भी दलित विकास के एजंडे के अभाव में दलितों को मायावती की केवल कुर्सी की राजनीति भी पसंद नहीं आई है क्योंकि इस से मायावती के चार बार मुख्य मंत्री बनने के बावजूद भी दलितों की माली हालत में कोई परिवर्तन नहीं आया है. एक अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित बिहार. उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलितों को छोड़ कर विकास के सभी मापदंडों जैसे: पुरुष/महिला शिक्षा दर, पुरुष/महिला तथा 0-6 वर्ष के बच्चों के लैंगिक अनुपात और नियमित नौकरी पेशे आदि में हिस्सेदारी में सब से पिछड़े हैं. मायावती के व्यक्तिगत और राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण दलितों को राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल सका. दूसरी तरफ बसपा पार्टी के पदाधिकारियों की दिन दुगनी और रात चौगनी खुशहाली से भी दलित नाराज़ हुए हैं जिस का इज़हार उन्होंने लोकसभा चुनाव में खुल कर किया था. यह भी ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश की 40 सीटें ऐसी हैं जहाँ दलितों की आबादी 25% से भी अधिक है. 2009 के लोक सभा चुनाव में बसपा 17 सुरक्षित सीटों पर नंबर दो पर थी जो कि 2014 में  कम हो कर 11 रह गयी थी. इस से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक के बरकरार रहने का दावा तथ्यों के विपरीत है.

मायावती ने 2012 के असेंबली चुनाव में भी मुसलामानों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उसे वोट नहीं दिया. पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने इस आरोप को न केवल दोहराया था बल्कि बाद में उनके पछताने की बात भी कही थी. मायावती यह भूल जाती हैं कि मुसलामानों को दूर करने के लिए वह स्वयं ही जिम्मेवार हैं. 1993 के चुनाव में मुसलामानों ने जिस उम्मीद के साथ उसे वोट दिया था मायावती ने उस के विपरीत मुख्य मंत्री बनने की लालसा में 1995 में मुसलामानों की धुर विरोधी पार्टी भाजपा से हाथ मिला लिया था. इस के बाद भी उसने कुर्सी पाने के लिए दो बार भाजपा से सहारा लिया था. इतना ही नहीं 2003 में उस ने गुजरात में मुसलमानों के कत्ले आम के जिम्मेवार मोदी को कलीन चिट दी थी तथा उस के पक्ष में गुजरात जा कर चुनाव प्रचार भी किया था. आगे भी मायावती भाजपा से हाथ नहीं मिलाएगी इस की कोई गारंटी नहीं है. ऐसी मौकापरस्ती के बरक्स मायावती यह कैसे उम्मीद करती है कि मुसलमान उसे आँख बंद कर के वोट देते रहेंगे. मुज़फ्फरनगर के दंगे में  मायावती द्वारा कोई भी प्रतिक्रिया न दिया जाना भी मुसलामानों को काफी नागुबार गुज़रा था.

मायावती द्वारा पिछली तथा 2014 की हार के लिए अपनी कोई भी गलती न मानना भी दलितों और मुसलामानों के लिए असहनीय रहा है. 2012 में उसने इस का दोष मुसलामानों को दिया था. 2014 में उसने इसे कांग्रेस सरकार को समर्थन देना बताया था . अगर यह सही है तो मायावती के पास इस का क्या जवाब है कि उस ने कांग्रेस सरकार को समर्थन क्यों दिया? केवल कट्टरपंथी ताकतों को रोकने की कोशिश वाली बात भी जचती नहीं. दरअसल असली बात तो सीबीआई के शिकंजे से बचने की मजबूरी थी जो कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में अभी भी बनी हुयी है. भाजपा भी मायावती की इसी मजबूरी का फायदा उठाती रही है और आगे भी उठाएगी.

उपरोक्त संक्षिप्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि दलितों ने पिछली बार मायावती के सर्वजन वाले फार्मूले को बुरी तरह से नकार दिया था. मुसलामानों ने भी उस से किनारा कर लिया था. इस चुनाव में भी इस स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन आने की सम्भावना दिखाई नहीं देती है.  वर्तमान में दलितों, मुसलामानों, मजदूरों, किसानों और छोटे कारखानेदारों और दुकानदारों के लिए मोदी की कार्पोरेटप्रस्त हिंदुत्व फासीवादी राजनीति सब से बड़ा खतरा है जिस का मुकाबला मायावती और मुलायम सिंह आदि की सौदेबाज, अवसरवादी और कार्पोरेटप्रस्त राजनीति द्वारा नहीं किया जा सकता है. इसके लिए सभी वामपंथी, प्रगतिशील और अम्बेडकरवादी ताकतों को एकजुट हो कर कार्पोरेट और फासीवाद विरोध की जनवादी राजनीति को अपनाना होगा.

लेखक एस. आर. दारापुरी रिटायर आईपीएस अधिकारी हैं. वे आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं.

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दलित राजनीति की दरिद्रता

क्या यह दलित राजनीति की दरिद्रता नहीं है कि यह केवल आरक्षण तक ही सीमित
हो कर रह जाती है या इसे जानबूझ कर सीमित कर दिया जाता है? क्या दलितों
की भूमिहीनता, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, तथा सामाजिक एवं आर्थिक शोषण
एवं पिछड़ापन दलित राजनीति के लिए कोई मुद्दा नहीं है? भाजपा भी आरएसएस के
माध्यम से चुनाव में आरक्षण के मुद्दे को जानबूझ कर उठवाती है ताकि
दलितों का कोई दूसरा मुद्दा चुनावी मुद्दा न बन सके। इसके माध्यम से वह
हिन्दू मुस्लिम की तरह आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधियों का ध्रुवीकरण
करने का प्रयास करती है जैसा कि पिछले बिहार चुनाव से पहले किया गया था.
ऐसा करके वह दलित नेताओं का काम भी आसान कर देती है क्योंकि इससे उन्हें
दलितों के किसी दूसरे मुद्दे पर चर्चा करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। इसी
लिए तो दलित पार्टियां को चुनावी घोषणा पत्र  बनाने और जारी करने की
ज़रूरत नहीं पड़ती। परिणाम यह होता है कि दलित मुद्दे चुनाव के केंद्र
बिंदु नहीं बन पाते.

इसके मुकाबले में ज़रा डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र
पढ़िए जो कि बहुत व्यापक और रैडिकल होते थे। कृपया इस संबंध में
www.dalitmukti.blogspot.com पर ” डॉ. आंबेडकर और जाति की राजनीति” आलेख
पढ़िए और उसकी तुलना वर्तमान दलित राजनीति से कीजिये। इसके विवेचन से एक
बात बहुत स्पष्ट हो जाती है कि डॉ. आंबेडकर जाति की राजनीति के कतई
पक्षधर नहीं थे क्योंकि इस से जाति मजबूत होती है. इस से हिंदुत्व मजबूत
होता है जो कि जाति व्यवस्था की उपज है. डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य तो जाति
का विनाश करके भारत में जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था.
डॉ. आंबेडकर ने जो भी राजनैतिक पार्टियाँ बनायीं वे जातिगत पार्टियाँ
नहीं थीं क्योंकि उन के लक्ष्य और उद्देश्य व्यापक थे. यह बात सही है कि
उनके केंद्र में दलित थे परन्तु उन के कार्यक्रम व्यापक और जाति निरपेक्ष
थे. वे सभी कमज़ोर वर्गों के उत्थान के लिए थे. इसी लिए जब तक उन द्वारा
स्थापित की गयी पार्टी आरपीआई उन के सिद्धांतों और एजंडा पर चलती रही तब
तक वह दलितों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने में सफल रही. जब तक
उन में आन्तरिक लोकतंत्र रहा और वे जन मुद्दों को लेकर संघर्ष करती रही
तब तक वह फलती फूलती रही. जैसे ही वह व्यक्तिवादी और जातिवादी राजनीति के
चंगुल में पड़ी उसका पतन हो गया. यह अति खेद की बात है कि वर्तमान दलित
राजनीति व्यक्तिवाद, जातिवाद, अवसरवाद, भ्रष्टाचार और मुद्दाविहिनता का
बुरी तरह से शिकार हो गयी है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि दलित वर्ग जो
कि सामाजिक तौर पर उपजातियों में विभाजित है, अब राजनितिक तौर पर भी बुरी
तरह से विभाजित हो गया है जिसका लाभ सबसे अधिक हिंदुत्व की पक्षधर पार्टी
भाजपा ने उठाया है. पिछले लिक्सभा चुनाव से यह बात बिलकुल स्पष्ट हो गयी
है और वर्तमान विधानसभा चुनाव में भी इसकी महत्वपूरण भूमिका रहेगी.

यह दलित राजनीति की त्रासदी ही है कि गैरदलित पार्टियों को तो छोडिये,
दलित राजनीतिक पार्टियाँ भी दलितों के ठोस मुद्दों पर कोई संघर्ष करने की
बजाये चुनाव में जाति के नाम पर उनका भावनात्मक शोषण करके वोट बटोर लेती
हैं और दलित जैसे थे वैसे ही बने रहते हैं. अतः मेरा यह निश्चित मत है कि
जब तक दलित राजनीति जाति की राजनीति के मक्कड़जाल से निकल कर व्यापक दलित
मुद्दों पर नहीं आएगी तब तक दलितों का उद्धार नहीं हो सकेगा। इसके लिए
दलित राजनीति को एक रेडिकल  एजंडा अपनाना होगा. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
ने इस दिशा में एक बड़ी पहल की है.

S.R.Darapuri I.P.S.(Retd)
National Spokesman,
All India Peoples Front
www.dalitliberation.blogspot.com
www.dalitmukti.blogspot.com
Mob919415164845

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दलित उत्पीड़न में भाजपा शासित राज्य आगे!

राष्ट्रीय अपराध अनुसन्धान ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल में जारी की गयी क्राईम इन इंडिया– 2015 रिपोर्ट से एक बात पुनः उभर कर आई है कि भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न के मामले में देश के अन्य राज्यों से काफी आगे हैं. लगभग यही स्थिति वर्ष 2014 में भी थी. वर्तमान में भाजपा शासित राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा और हिमाचल प्रदेश हैं. इनके इलावा कुछ अन्य राज्य जैसे उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उत्तर प्रदेश और बिहार हैं जिन में दलित उत्पीड़न के मामले राष्ट्रीय दर (प्रति एक लाख दलित आबादी पर) से ज्यादा हैं. भाजपा शासित राज्यों व् अन्य  राज्यों में दलितों पर उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार घटित अपराधों की स्थिति निम्न प्रकार है:-

दलितों पर 2015 में कुल घटित अपराध: इस वर्ष में यह संख्या 45,003 है जो कि यद्यपि वर्ष 2014 की संख्या 47,064 से कम है परन्तु 2013 की संख्या 39,408 से लगभग 5,500 अधिक है. इसी प्रकार 2015 में प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की राष्ट्रीय दर 22.3 है जो कि यद्यपि 2014 की 23.4 से कम है परन्तु  2013 की 19.6 से 2.7 अधिक है. इस से स्पष्ट है कि यद्यपि 2015 में कुल घटित अपराध में पिछले वर्ष की अपेक्षा कुछ कमी आई है परन्तु यह 2013 की अपेक्षा काफी बढ़ा है. यह वृद्धि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में अपराध में बढ़ोतरी के कारण ही है.

दलितों पर वर्ष 2015 में घटित अपराधों में से उत्तर प्रदेश- 8,358, राजस्थान- 6,998, बिहार- 6,438,  आंध्र प्रदेश- 4,415, मध्य प्रदेश- 4,188, उड़ीसा- 2,305, महाराष्ट्र- 1,816, तमिलनाडु– 1,782, गुजरात- 1,046, छत्तीसगढ़- 1,028 तथा झारखण्ड- 752 अपराध घटित हुए हैं. इसी प्रकार 22.3 की राष्ट्रीय दर के विपरीत राजस्थान- 57.2, आन्ध्र प्रदेश- 52.3, गोवा- 51.1, बिहार- 38.9, मध्य प्रदेश- 36.9, उड़ीसा- 32.1,छत्तीसगढ़- 31.4, तेलन्गाना-30.9, गुजरात- 25.7, केरल- 24.7, उत्तर प्रदेश- 20.2 रही है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, गोवा तथा अन्य राज्य जैसे आन्ध्र प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, तेलन्गाना, केरल, उत्तर प्रदेश में दलितोंपर घटित अपराध की दर राष्ट्रिय दर से काफी अधिक है. 

हत्या: 2015 में दलितों की हत्या के 707 अपराध हुए थे और राष्ट्रीय औसत 0.4 थी. इन में से मध्य प्रदेश-80, राजस्थान- 71, बिहार- 78, महाराष्ट्र- 42, उड़ीसा- 21, गुजरात- 17, तमिलनाडु- 48, तेलन्गाना -17, हरियाणा- 22, आन्ध्र प्रदेश- 23 तथा उत्तर प्रदेश- 204 थे. हत्या के अपराध की राष्ट्रीय औसत दर 0.4 थी  परन्तु भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश (0.7), राजस्थान (0.6), झारखण्ड (0.5), बिहार (0.5), उत्तर प्रदेश (0.5), हरियाणा (0.4) और गुजरात में (0.4) थी. इन आकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान में दलित हत्यायों की दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही है.

बलात्कार: वर्ष 2015 में दलित महिलायों के बलात्कार के राष्ट्रीय स्तर पर कुल मामले 2,326 थे तथा राष्ट्रीय दर 1.2 थी. इन में से मध्य प्रदेश (460), उत्तर प्रदेश (444), राजस्थान (318), महाराष्ट्र (238), उड़ीसा (129), हरियाणा (107), तेलन्गाना (107), आन्ध्र प्रदेश (104), केरल (99) छत्तीसगढ़ (81), गुजरात (65), तमिलनाडु (43) और बिहार (42) में रहे. इसी प्रकार बलात्कार की राष्ट्रीय दर 1.2 थी जबकि इसके मुकाबले में मध्य प्रदेश (4.1), केरल (3.3), राजस्थान (2.6), छत्तीसगढ़ (2.5), हरियाणा (2.1), तेलन्गाना (2.0), महाराष्ट्र (1.8), उड़ीसा (1.8), गुजरात (1.6) और आन्ध्र प्रदेश (1.2) रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि दलित महिलाओं पर बलात्कार के मामले में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात में अपराध दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही है.

दलित महिलाओं पर शील भंग के लिए हमला:  वर्ष 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर इस शीर्षक के अंतर्गत कुल 2,800 अपराध घटित हुए तथा राष्ट्रीय दर 1.4 रही. इन में से मध्य प्रदेश- 777, उत्तर प्रदेश- 756, महाराष्ट्र- 353, आन्ध्र प्रदेश- 153, उड़ीसा- 155, हरियाणा- 109, राजस्थान- 107, कर्नटका- 60 और गुजरात- 51 थे.  इस प्रकार के अपराध की राष्ट्रीय दर 1.4 थी जबकि यह मध्य प्रदेश- 6.9, महाराष्ट्र- 2.7, हरियाणा- 2.1, केरल- 2.2, उड़ीसा- 2.2, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलन्गाना- 1.8, उत्तर प्रदेश -1.8 रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है भाजपा शासित राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में दलितों महिलायों पर शीलभंग के लिए हमले के अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची रही है.

दलित महिलायों का अपहरण: वर्ष 2015 में इस प्रकार के कुल 687 अपराध हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.3 रही. इस प्रकृति के अपराध उत्तर प्रदेश- 415, राजस्थान- 62, मध्य प्रदेश- 43, गुजरात- 37, महाराष्ट्र- 34, हरियाणा-29, उड़ीसा- 22 और आन्ध्र प्रदेश- 10 थे. इसकी राज्यवार दर उत्तर प्रदेश- 1.0, गुजरात- 0.9, राजस्थान- 0.5, मध्य प्रदेश- 0.4, महाराष्ट्र और उड़ीसा- 0.3 रही. इस विश्लेषण से भी स्पष्ट है कि इस अपराध में भी उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊपर रही.

दलित महिलायों का विवाह के लिए अपहरण: वर्ष 2015 में पूरे देश में इस प्रकार के 455 प्रकरण हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.2 रही. इनमे उत्तर प्रदेश- 338, राजस्थान- 28, गुजरात- 20, मध्य प्रदेश- 18, महाराष्ट्र- 18 तथा मध्य प्रदेश- 18 घटित हुए.  इसकी राज्यवार दर उत्तर प्रदेश- 0.8, गुजरात- 0.5, मध्य प्रदेश और राजस्थान- 0.2  रही. इससे से भी स्पष्ट है इस अपराध में भी उत्तर प्रदेश के बाद राजस्थान, गुजरात और राजस्थान की दर राष्ट्रीय दर से ऊँची रही.

आगजनी: वर्ष 2015 में आगजनी के कुल 179 मामले हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.1 रही. इसमें से छत्तीसगढ़- 43, उत्तर प्रदेश- 30, मध्य प्रदेश- 21, राजस्थान- 21, तमिलनाडु- 14, उड़ीसा- 15 तथा महाराष्ट्र- 11 में अपराध घटित हुए.  दर की दृष्टि से छत्तीसगढ़- 0.3, मध्य प्रदेश- 0.2, राजस्थान- 0.2, गुजरात- 0.2 की दर रही. इस से भी  स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में आगजनी के अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही.

एससी/एसटी एक्ट के अपराध: इस एक्ट के अंतर्गत वर्ष 2005 में कुल 6,005 अपराध पंजीकृत हुए और राष्ट्रीय दर 3.0 रही. इनमें से मध्य प्रदेश-1, महाराष्ट्र- 290, हिमाचल प्रदेश- 74, गुजरात- 190, छत्तीसगढ़- 0, हरियाणा- 19, उड़ीसा- 1, राजस्थान- 92 तथा तेलन्गाना- 358 पंजीकृत हुए. इस अपराध के अंतर्गत भाजपा शासित राज्यों में कम आंकड़ों का कारण इन राज्यों में इस अपराध का कम होना नहीं बल्कि इस एक्ट का प्रयोग न किया जाना है.

एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग न किया जाना: उपरोक्त रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि लगभग सभी भाजपा शासित राज्यों में एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग नहीं किया जा रहा है जिस कारण दलितों पर अत्याचार के मामले सामान्य कानून के अन्तर्गत दर्ज किये जाते हैं. इससे दलितों को अत्याचार के मामलों में न तो कोई मुयाव्ज़ा मिलता है और न ही दोषियों को कड़ी सजा. इन राज्यों में 6,009 आईपीसी अपराध के मामलों में इस एक्ट का प्रयोग नहीं किया गया है. राज्यवार स्थिति यह है: आन्ध्र प्रदेश -2050, राजस्थान- 1,040, छत्तीसगढ़- 790, मध्य प्रदेश- 638, उड़ीसा- 482, तेलन्गाना- 357, हरियाणा- 322, कर्नाटक- 131. इन आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, हरियाणा के इलावा आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उड़ीसा और कर्नाटक में भी एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग नहीं किया जा रहा है जो कि इन राज्यों के दलितों के साथ बहुत बड़ा अन्याय और धोखा है.

अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार: वर्ष 2015 में इस वर्ग पर 10,914 अपराध घटित हुए और अपराध की राष्ट्रीय दर 10.5 रही जो 2014 के कुल अपराध 11, 415 और राष्ट्रीय दर 11.0 से तो कुछ कम है परन्तु 2013 के 6,793 अपराध और राष्ट्रीय दर 6.5 से काफी अधिक है. 2015 के कुल अपराध में से राजस्थान -3,207, मध्य प्रदेश- 1,531, छत्तीसगढ़- 1,518, उड़ीसा- 1,307, आन्ध्र प्रदेश- 719, तेलन्गाना- 698, महारष्ट्र-483, गुजरात- 256 और झारखण्ड में 269 अपराध घटित हुए. इनकी राज्यवार दर राजस्थान- 34.7, आन्ध्र प्रदेश- 27.3, तेलन्गाना- 21.2, छत्तीसगढ़- 19.4 और उड़ीसा- 14.5 है जो कि राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है.

उक्त रिपोर्ट के अनुसार 2015 में अनुसूचित जनजातियों पर इस वर्ष कुल 10,914 अपराध घटित हुए तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 10.5 रही. इनमें से राजस्थान- 3,207, मध्य प्रदेश- 1,531, छत्तीसगढ़- 1,518, उड़ीसा- 1,387, आन्ध्र प्रदेश- 719, तेलन्गाना- 698 में अपराध घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 36.3, राजस्थान- 34.7, आन्ध्र प्रदेश- 27.3, तेलन्गाना- 21.2, छत्तीसगढ़- 19.4, उड़ीसा- 14.5, मध्य प्रदेश- 10.0 की दर रही. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि केरल, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश तथा तेलन्गाना को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, और मध्य प्रदेश में अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची रही है.

हत्या:  वर्ष 2015 में अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध हत्या की 144 अपराध घटित हुए जिन में से मध्य प्रदेश- 50, राजस्थान- 22, उड़ीसा- 14, गुजरात- 13, महाराष्ट्र- 11 में घटित हुए. इससे भी स्पष्ट है इस वर्ग पर भाजपा शासित राज्यों में हत्या के अधिक अपराध हुए.

बलात्कार: उक्त अवधि में पूरे देश में अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं पर बलात्कार के 952 अपराध घटित हुए और इसकी राष्ट्रीय दर 0.9 रही. इन में से मध्य प्रदेश- 359, छत्तीसगढ़- 138, महाराष्ट्र- 99, उड़ीसा- 94, राजस्थान- 80, केरल- 47, गुजरात और तेलन्गाना- 44, तथा आन्ध्र प्रदेश- 21 में अपराध हुए. दर की दृष्टि से केरल- 9.7, मध्य प्रदेश- 2.3, छत्तीसगढ़- 1.8, तेलन्गाना- 1.3, उड़ीसा- 1.0, महाराष्ट्र- 0.9 की दर रही. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि केरल को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों में ब्लात्कार की दर राष्ट्रिय दर से काफी अधिक रही है.

महिलायों पर शीलभंग के लिए हमले:  वर्ष 2015 में अनुसूचित जनजातियों पर इस प्रकार के 818 अपराध घटित हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.8 रही. इनमें से मध्य प्रदेश- 378, महाराष्ट्र- 146, छत्तीसगढ़- 86, उड़ीसा- 65, तेलन्गाना- 32 तथा आन्ध्र प्रदेश- 29 में अपराध घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 3.9, मध्य प्रदेश- 2.5, महाराष्ट्र- 1.4, छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश- 1.1, तेलन्गाना- 1.0 की रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है किकेरल को छोड़ कर शेष सभी भाजपा शासित राज्यों में इस वर्ग पर सब से अधिक अपराध घटित हुए हैं.   

एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत अपराध: वर्ष 2015 में पूरे देश में अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के सम्बन्ध में इस एक्ट के अंतर्गत 6,275 अपराध पंजीकृत हुए. इनमें से राजस्थान- 1,409, मध्य प्रदेश- 1,358, उड़ीसा- 691, महाराष्ट्र- 481, तेलन्गाना और कर्नाटक- 386, छत्तीसगढ़- 373, आन्ध्र प्रदेश- 362 और गुजरात- 248, केरल- 165 घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 34.0, राजस्थान- 15.3, आन्ध्र प्रदेश- 13.8,तेलन्गाना- 11.7, मध्य प्रदेश- 8.9, उड़ीसा- 7.2 की रही. इस विश्लेषण से भी स्पष्ट है कि केरल को छोड़ कर भाजपा शासित राज्य इस अपराध में भी अन्य से आगे हैं.  

एससी/एसटी एक्ट का लागू न किया जाना: वर्ष 2015 के दौरान अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध आईपीसी के 4203 मामले रहे हैं जिन में इस एक्ट का प्रयोग ही नहीं किया गया. इनमें से राजस्थान- 1,746, छत्तीसगढ़- 816, उड़ीसा- 696, आन्ध्र प्रदेश- 352, तेलन्गाना- 302 तथा मध्य प्रदेश- 171 में घटित हुए. दर की दृष्टि से राजस्थान- 18.9, आन्ध्र प्रदेश- 13.4, छत्तीसगढ़- 10.4, तेलन्गाना- 9.2, उड़ीसा- 7.3 रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना और उड़ीसा को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों में एससी/एसटी एक्ट को लागू न करने की दर काफी ऊँची है. 

दलित उत्पीड़न के मामलों में न्यायालय से सज़ा की दर: वर्ष 2015 के दलित उत्पीड़न के मामलों के न्यायालय द्वारा निस्तारण के अनुसार इस वर्ष में 17,012 मामले निस्तारित किये गए जिन में से केवल 4,702 मामलों में ही सजा हुयी तथा 12,310 मामलों में आरोपी दोष मुक्त हो गए. इस प्रकार सजा होने की दर केवल 27.6 प्रतिशत रही. इसी प्रकार उक्त अवधि में न्यायालय द्वारा अनुसूचित जनजाति के 4,894 मामले निस्तारित किये गए जिन में से केवल 1,349 मामलों में सजा हुयी और 3,545 मामलों में आरोपी रिहा हो गए. इस मामले में भी सजा की दर केवल 27.6 ही रही. इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को उत्पीड़न के मामलों में न्याय दिलाने के लिए सरकारों की क्या प्रतिबद्धता है?

वर्ष 2015 के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के मामलों के आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों गुजरात, महारष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा में इन वर्गों पर अत्याचार के मामले आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, तेलन्गाना, कर्नाटक को छोड़ कर बहुत अधिक हैं. इन राज्यों में न तो एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है और न ही दोषियों को सजा दिलाने के लिए प्रभावी कार्रवाही  की जा रही है. इन राज्यों में 2013 के मुकाबले में अत्याचार के मामलों में बहुत वृद्धि हुयी है. यह भी सर्वविदित है कि सरकारी आंकड़ों में दिखाया गया अपराध वास्तविक आंकड़ों का एक छोटा हिस्सा होता है. कुल घटित अपराध तो इससे कहीं अधिक होता है. मोदी सरकार ने एक तरफ तो एससी/एसटी एक्ट में संशोधन करने का दिखावा किया है वहीँ दूसरी ओर इस एक्ट को भाजपा शासित तथा कुछ अन्य राज्यों में लागू ही नहीं किया जा रहा है. गुजरात का दलित आक्रोश इसी की परिणति है. ऐसी परिस्थिति में दलितों को इस सम्बन्ध में गंभीरता से मनन करना चाहिए और दलित नेताओं और भाजपा शासित तथा अन्य राज्यों की सरकारों के विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट को सख्ती से लागू करने के लिए जनांदोलन करना चाहिए.    

लेखक एस.आर. दारापुरी उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिरीक्षक रह चुके हैं.

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उत्तर प्रदेश में जंगलराज : पूर्व आईजी बता रहे हैं यूपी में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं

हाल में राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो द्वारा क्राईम इन इंडिया- 2015 रिपोर्ट जारी की गयी है. इस रिपोर्ट में वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित उत्पीड़न के अपराध के जो आंकड़े छपे हैं उनसे यह उभर कर आया है कि इसमें उत्तर प्रदेश काफी आगे है. उत्तर प्रदेश की दलित आबादी देश में सब से अधिक आबादी है जो कि उत्तर प्रदेश की आबादी का 20.5 प्रतिशत है. रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2015 में दलितों के विरुद्ध उत्पीड़न के कुल 45,003 अपराध घटित हुए जिन में से उत्तर प्रदेश में 8,358 अपराध घटित हुए जो कि राष्ट्रीय स्तर पर कुल घटित अपराध का 18.6 प्रतिशत है. इस अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की दर 22.3 रही और उत्तर प्रदेश की यह दर 20.2 रही.

यह भी उल्लेखनीय है कि 2013 की राष्ट्रीय दर 19.6 के मुकाबले में यह काफी अधिक है. इन आंकड़ों से एक बात उभर कर आई है कि उत्तर प्रदेश में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि दलित महिलाओं पर अत्याचार के मामलों की संख्या और दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है और कुछ अपराधों में तो सब से अधिक है. यद्यपि उत्तर प्रदेश में दलितों के विरुद्ध कुल अपराध की दर राष्ट्रीय दर से कुछ कम है परन्तु आंकड़ों के निम्नलिखित विश्लेषण से यह पाया गया है कि गंभीर अपराधों के मामले में यह राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है.

हत्या: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों की हत्यायों की संख्या 707 थी जिन में अकेले उत्तर प्रदेश में 204 हत्याएं हुयीं. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.4 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 0.5 रही जो की काफी ऊँची है. इससे स्पष्ट है कि दलित हत्यायों के मामले में उत्तर प्रदेश काफी आगे है.

बलात्कार: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के बलात्कार के 2,332 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 444 तथा बलात्कार के प्रयास के 22 मामले दर्ज हुए. यद्यपि इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 1.1 रही परन्तु कुल अपराधों की संख्या काफी अधिक रही.

शीलभंग के प्रयास में हमला: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के शीलभंग के प्रयास में हमला के 2.800 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 756 अपराध हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.4 के विरुद्ध उत्तर प्रदेश की यह दर 1.8 रही जो कि बहुत अधिक है.

यौन उत्पीड़न: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के यौन उत्पीड़न के 1,317 अपराध दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 704 मामले घटित हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.7 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.7 थी जो कि देश में सब से ऊँची है.

विवाह के लिए अपहरण: वर्ष 2015 में पूरे देश में विवाह के लिए अपहरण के कुल 455 मामले घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 338 अपराध घटित हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की यह दर 0.8 रही जो कि पूरे देश में सब से ऊँची है. इसी प्रकार पूरे वर्ष में दलितों के अपहरण के 687 मामले दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 415 मामले घटित हुए. राष्ट्रीय स्तर पर इस अपराध की दर 0.3 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.0 रही जो कि देश में सब से ऊँची है.

गंभीर चोट: उपरोक्त अवधि में पूरे देश में गंभीर चोट के 1,007 मामले दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 366 मामले घटित हुए. इसकी राष्ट्रीय दर 0.5 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.9 रही जो कि काफी अधिक है.

बलवा: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों के विरुद्ध बलवे के 1,465 मामले दर्ज हुये जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 632 मामले घटित हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.7 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.5 रही जो कि काफी अधिक है.

एससी/एसटी एक्ट के अपराध: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों के उत्पीडन के 38,564 अपराध दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 8,357 केस दर्ज हुए. इस एक्ट के अंतर्गत अपराधों की राष्ट्रीय दर 19.2 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 20.2 रही जो कि काफी अधिक है.

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि यद्यपि वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश में दलितों के विरुद्ध घटित कुल अपराध की दर राष्ट्रीय दर से कुछ कम है परन्तु दलितों के विरुद्ध गंभीर अपराध जैसे हत्या, शीलभंग का प्रयास, यौन उत्पीड़न, गंभीर चोट, अपहरण और विवाह के लिए अपहरण, बलवा और एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत घटित अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही. इन आंकड़ों से एक बात उभर कर सामने आई है कि उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं के विरुद्ध अपराध जैसे बलात्कार, शीलभंग का प्रयास, अपहरण, यौन उत्पीड़न तथा विवाह के लिए अपहरण आदि की संख्या एवं दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है. अपहरण और विवाह के लिए अपहरण एवं यौन उत्पीड़न की दर तो देश में सब से ऊँची है. इससे यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार में दलित महिलाएं बिलकुल सुरक्षित नहीं हैं.

एससी/एसटी की नियमावली 1995 में यह आदेश है कि इस एक्ट के मामलों की सुनवाई हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना की जाएगी परन्तु उत्तर प्रदेश में ऐसा न करके केवल वर्तमान अदालतों को ही विशेष अदालतों का नाम दे दिया गया है जिस से इन मामलों के निस्तारण में लम्बी अवधि लगती है. इससे यह  भी लगता है कि उत्तर प्रदेश में दलितों के उत्पीड़न के अपराधों को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाही नहीं की जा रही है और न ही दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए उचित व्यवस्था. समाजवादी सरकार को तो छोड़िये मायावती ने भी इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया. इसी प्रकार नियमों के अनुसार मुख्य मंत्री को दलित  उत्पीड़न के मामलों की समीक्षा हेतु वर्ष में दो बार समीक्षा मीटिंग बुलानी चाहिए परन्तु न तो चार वार मुख्य मंत्री रही मायावती ने और न ही वर्तमान मुख्य मंत्री ने आज तक ऐसी कोई मीटिंग बुलाई है. लगभग यही स्थिति जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में प्रति माह बुलाये  जाने वाली समीक्षा मीटिंगों की भी है.

उत्तर प्रदेश जहाँ पर देश की दलितों की सब से बड़ी आबादी है में दलितों पर होने वाले उत्पीड़न के अपराध खास करके संगीन अपराध बहुत अधिक हैं जो कि चिंता का विषय है. एक तो वैसे ही समाजवादी सरकार का अब तक का रवैय्या दलित विरोधी ही रहा है. इस की सब से बड़ी उदहारण यह है कि थानों पर थानाध्यक्षों की नियुक्ति में 21% का आरक्षण होने के बावजूद भी थानों पर उन की बहुत कम नियुक्ति की गयी है जिस का सीधा प्रभाव दलितों सम्बन्धी अपराध के पंजीकरण पर पड़ता है.  यह भी उल्लेखनीय है अपराध के यह सरकारी आंकड़े बहुत विश्वसनीय नहीं हैं क्योंकि बहुत से मामले तो दर्ज ही नहीं किये जाते. अतः दलितों के विरुद्ध घटित होने वाले अपराधों की तस्वीर सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक भयावह है. इस लिए उत्तर प्रदेश में दलितों के उत्पीड़न के मामलों को रोकने तथा उन पर प्रभावी कार्रवाही करवाने के लिए राजनितिक इच्छा शक्ति और जन दबाव  की ज़रुरत है जिसका फिलहाल सर्वथा अभाव है.   

लेखक एस.आर. दारापुरी उत्तर प्रदेश में भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक रहे हैं.

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मोदी की आंबेडकर पर अशिष्टता

-आनंद तेल्तुम्ब्ड़े-

हाल में मोदी जी ने अपने आप को आंबेडकर भक्त कहा था और दलितों को यह भरोसा दिलाया था कि वह आरक्षण के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं होने देंगें चाहे आंबेडकर ही आ कर इस की मांग क्यों न करें. मोदी की यह अशिष्टता यह दर्शाती है कि हिंदुत्व की ताकतों के लिए दलितों को पटाने के लिए आंबेडकर को गलत ढंग से पेश करने तथा शासक वर्गों की राजनीतिक रणनीति में आरक्षण की कितनी नाज़ुक भूमिका है. आरक्षण जो कि दलितों के लिए वरदान है वास्तव में उनकी गुलामी का औज़ार बन गया है.

मोदी ने 22 मार्च को विज्ञान भवन, नयी दिल्ली में आंबेडकर मेमोरियल व्याख्यान देते हुए कई दिलचस्प बातें कहीं. उनमे से दो बातें ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण हैं जो कि डॉ. आंबेडकर को जानबूझ कर गलत ढंग से पेश करने के कारण उन्हें शासक वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में दर्शाती हैं. उनकी पहली घोषणा थी कि वह आंबेडकर भक्त है. दूसरी उनकी यह दावेदारी थी कि वह आरक्षण को किसी भी तरह से हल्का नहीं करने देंगें चाहे आंबेडकर स्वयं भी जीवित होकर इसे ख़त्म करने की मांग क्यों न करें. निस्संदेह उस की यह दोनों घोषणाएं और आंबेडकर प्रेम का दिखावा वास्तव में दलितों को भाजपा के पाले में खींचने के लिए ही हैं.

आंबेडकर प्रेम के पीछे का तर्कशास्त्र 
दलित संघ परिवार की चाल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह उनकी भारतीय जनता का हिन्दू बनाम अन्य के तौर पर ध्रुवीकरण की रणनीतिक चाल को पलटने की ताकत रखता है. उनके सामाजिक, एतहासिक, वैचारिक और सांस्कृतिक परिवेश के कारण दलित एक बड़ा खेल बिगाड़ने वाले हो सकते हैं. इस बात का भरोसा नहीं है कि दलित अपने आप को हिन्दुओं के रूप में चिन्हित ही करेंगे.

यह स्वाभाविक है कि 1909 में जब भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के बीज बोए गए उसी समय यह मुद्दा भी उभरा था. मिन्टो-मार्ले सुधारों पर बातचीत के दौरान मुस्लिम लीग ने कांग्रेस को यह चुनौती दी थी कि दलित और आदिवासी हिन्दू समाज का अंग नहीं हैं. प्रारंभिक दलित आन्दोलन जो अभी मानव होने के नाते अपने मानवाधिकारों की मांग तक ही सीमित था अभी अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना पाया था. तब भी कांग्रेस को मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता करने के बाद मान्टेग्यु-चेमस्फोर्ड सुधारों के परिपेक्ष्य में गवर्नमेंट  आफ इंडिया एक्ट के लागू होने पर दलितों की ओर ध्यान देना पड़ा. संकेत के तौर पर गाँधी जी को जून 1916 को छुआछूत की प्रथा के खिलाफ बोलना पड़ा और दलितों के लिए चिंता जतानी पड़ी.

दलितों का समर्थन लेने के लिए कांग्रेस को अकेले बम्बई प्रान्त में ही चार सम्मलेन करने पड़े. 1927 में महाड़ तालाब संघर्ष से हिन्दुओं से मोहभंग होने के बाद आंबेडकर ने दलितों के लिए एक राजनीतिक पह्चान बनानी शुरू कर दी थी. उनके हिन्दुओं और हिन्दू धर्म पर हमलों जिनकी परिणति उनके परिनिर्वाण से दो माह पहले बौद्ध धम्म अपनाने में हुयी, ने दलितों को हमेशा के लिए एक अलग सामाजिक-धार्मिक पहचान दे दी. यह इतिहास है जो कि संघ परिवार के भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने के आड़े आ रहा है. उनकी यह सोच उच्च वर्णीय अधिनायक्वादी और ब्राह्मणवादी है जो कि नाज़ीवाद की एक लोग, एक राष्ट्र, एक नेता की अवधारणा पर आधारित है.

इस कारण से संघ परिवार की रणनीति में डॉ. आंबेडकर का आलोचनात्मक महत्व हो जाता है. जब तक वे आंबेडकर का पर्याप्त भगवाकरण नहीं करेंगे तब तक उन्हें इस का डर बना रहेगा. डॉ. आंबेडकर के प्रति नया उपजा प्रेम इसी राजनीतिक मजबूरी की उपज है. दलित आन्दोलन की वैचारिक दुर्बलता, दलित नेतृत्व का दिवालियापन, आत्ममुग्ध मध्य दलित वर्ग और हिन्दू देवताओं जिन्हें उन्होंने आंबेडकर के आह्वान पर त्याग दिया था, के स्थान पर आंबेडकर का बड़े स्तर पर देवकरण ने संघ परिवार के आंबेडकर के भगवाकरण के असंभव कार्य को बहुत आसान बना दिया है. यह वास्तव में बालासाहेब देवरस जो कि आरएसएस के सब से लो – प्रोफाइल वाले सरसंघचालक थे के समय में ऐसी कुछ चालें चली गयीं.

उसके समय में ही दलित उत्थान के नाम पर “सेवा भारती” संगठन के नाम से दलितों में काम शुरू किया गया. इस में डॉ. आंबेडकर को प्रात:स्मरणीय सूचि में रखना, और मध्य वर्ग के दलित जो कि उच्च जातियों में अपनी सामाजिक पहचान बनाना चाहते थे, के लिए एक विशेष अभिप्राय से “समरसता मंच” का सृजन करना था. तब तक उन द्वारा पवित्र माने जाने वाले पर डॉ. आंबेडकर द्वारा कटु हमले किये जाने के कारण वे उन के लिए अभिशाप थे. इस रणनीतिक बदलाव के कारण उन्होंने डॉ. आंबेडकर को के.बी.हेडगेवार का दोस्त, हिन्दुओं के महानतम हितैषी, आरएसएस के प्रशंसक, मुस्लिम और कम्युनिस्ट विरोधी, घर वापसी के समर्थक, भगवा झंडे के राष्ट्रीय झंडे के तौर पर समर्थक, एक महान राष्ट्रवादी के तौर पर पूरे जोर शोर के साथ सत्य के रूप में प्रचारित किया गया.

चाहें तो आप इन्हें तमाशा कह कर नकार सकते हैं परन्तु इन्हें नज़रंदाज़ नहीं कर सकते. इन्होने दलित नेताओं के सहयोजन करने की ठोस ज़मीन बनायी.  पिछले कुछ चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सभी पार्टियों को मिला कर सब से ज्यादा आरक्षित सीटें जीतती रही है. परन्तु केवल अरक्षित सीटें ही काफी नहीं हैं. उनकी ध्रुवीकरण की रणनीति में दलितों का अमूल परिवर्तन करना और जीतना भी था. तभी उनका ध्रुवीकरण संभव हो सकता है. क्योंकि इस का उल्टा अल्पसंख्यक जो दलितों को मिला कर 30 प्रतिशत वोटर हैं जो उन की हिन्दू राष्ट्र की योजना में रोड़ा बन सकते हैं, का पृथकीकरण संभव है. इस रणनीति में रोहित वेमुला जैसे रेडिकल्स का बहिष्कृतीकरण और आदिवासियों को माओवादी कह कर दमन करना शामिल है.

आंबेडकर को भक्त पसंद नहीं थे
मोदी जी को जानना चाहिए के उन्हें भक्त पसंद नहीं थे. उन्हें नायक पूजा से नफरत थी. वे राजनीतिक जीवन में इस के घोर विरोधी थे क्योंकि इस से अन्वेषण की स्फूर्ति, सृजन की भावना और सोच का स्वतंत्र नजरिया बाधित हो जाते हैं. उनके जीवनी-लेखक धनंजय कीर लिखते हैं: मार्च 1933 के प्रथम सप्ताह में बम्बई में एक मीटिंग में उन्हें एक प्रशस्ति पत्र देने पर उन्होंने कहा,” इस पत्र में मेरे कार्यों और गुणों का बहुत बखान किया गया है. इस का मतलब है कि आप लोग मेरे जैसे आदमी को देवता बना रहे हैं. अगर आप लोगों ने नायक पूजा के इन विचारों को शुरू में ही ख़त्म नहीं किया तो यह तुम्हें बर्बाद कर देगा. एक व्यक्ति को देवता बना कर आप अपनी सुरक्षा और मुक्ति के लिए एक व्यक्ति पर विश्वास करने लगते हैं और आप में दूसरों पर निर्भरता और अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता की भावना घर कर जाती है. अगर आप इन विचारों के शिकार हो गए तो जीवन की राष्ट्रीय धारा में लकड़ी के लठ्ठों की तरह हो जायेंगे. आप का संघर्ष ख़त्म हो जायेगा..

1943 में महादेव गोविन्द रानाडे जी के 101वें जन्म दिन पर भाषण में उन्होंने बताया था कि वे नायक पूजा खिलाफ क्यों है. नागपुर में 1956 में धर्म परिवर्तन के समारोह के दौरान लोग उनका अभिवादन करने और उन के चरणों पर सम्मान में गिरने लगे. यद्यपि उन की तबियत ठीक नहीं थी उन्होंने छड़ी उठा कर एक को मारी और चिल्लाये कि वे उनका गुलामों वाला व्यवहार पसंद नहीं करते हैं. अगर वे आज जीवित होते तो मोदी को भी इसी प्रकार की झिड़की सुननी पड़ती. आंबेडकर उन्हें दलितों को सामाजिक भेदभाव से बचाने के लिए उनके संवैधानिक कर्तव्य का स्मरण दिलाते.

मोदी जी दलित विकास के लिए बजट में फंड की कमी करके दलित विद्यार्थियों की उन्मुक्त अभिव्यक्ति को कुचलने की खुली छूट दे रहे हैं और रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्रों की संस्थागत हत्या की परिस्थितयां पैदा कर रहे हैं. न्याय मांगने पर पुलिस उन्हें बुरी तरह पीट रही है जैसा कि 22 मार्च को हैदराबाद विश्वविद्यालय में हुआ. वह उसी समय आंबेडकर का स्तुतिगान कर रहे थे. मोदी जी को मालूम होना चाहिए कि आंबेडकर कोई टुच्चे नेता नहीं थे जिन्हें चापलूस पटा सकते थे. उनका चित्रण करना अपमान है.

आरक्षण का फंदा
दूसरा बिंदु जो मोदी जी ने उठाया वह अधिक जटिल एवं महत्वपूर्ण है. दलितों के लिए आरक्षण एक भावनात्मक मुद्दा रहा है और इसी  लिए इसे किसी ने कभी भी निष्पक्ष दृष्टि से नहीं देखा है. जब मोदी जी ने आश्वस्त करने वाले स्वर में कहा कि आरक्षण को छुया नहीं जायेगा बेशक आंबेडकर भी आ कर इस की मांग क्यों न करें, इससे उन्होंने अपने वर्ग को इस के महत्व के बारे में समझा दिया है.

आरक्षण के लिए अकेले आंबेडकर ही ज़िम्मेदार हैं: पहले राजनैतिक प्रतिनिधित्व के लिए और बाद में सरकारी सेवाओं और शैक्षिक  संस्थानों में. पहले का मंतव्य तो शुरू में ही परास्त हो गया था. इस का इरादा दलितों के प्रतिनिधियों को विधायिका संस्थाओं में दलित प्रतिनिधियों को उनके हित संवर्धन के लिए भेजना था. दलितों के सच्चे प्रतिनिधियों को चुनने के लिए डॉ. आंबेडकर ने अलग मताधिकार की व्यवस्था चुनी थी. उन्होंने इसे गोलमेज़ कांफ्रेंस (1930-1932) में गाँधी जी के कट्टर विरोध के बावजूद प्राप्त किया था. परन्तु इस की घोषणा के तुरंत बाद गाँधी जी ने मरण व्रत रख कर उन्हें ब्लैकमेल किया. आंबेडकर जी को अलग मताधिकार छोड़ कर संयुक्त मताधिकार व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी जिसे पूना पैकट कहते हैं.

अलग मताधिकार जिस से दलितों के सच्चे प्रतिनिधि चुनना सुनिश्चित हो सकता के विरुद्ध संयुक्त मताधिकार से केवल वे चुने जाते हैं जो गैर दलितों के बहुमत को स्वीकार होते हैं जिस से कांशी राम के कथनानुसार केवल चमचे ही पैदा होते हैं. इस द्वारा दलितों के सच्चे प्रतिनिधि को चुनने की कोई सम्भावना नहीं होती है. इस का सब से पहला सबूत डॉ. आंबेडकर खुद हैं जो कि स्वतंत्र भारत में छुट भैय्या नेताओं के विरुद्ध भी कभी चुनाव नहीं जीत सके.

आंबेडकर इस (राजनैतिक) आरक्षण को पचा नहीं सके परन्तु इन के संविधान में समावेश के समय 10 वर्ष की समय सीमा लगाने के सिवाय कुछ भी नहीं कर सके. शासक वर्ग के लिये इस की उपयोगिता का यह सबूत है कि 10 वर्ष की समय सीमा समाप्त होने पर बिना कोई मांग उठे इसे हर बार बढ़ा दिया जाता है. यह आरक्षण स्पष्ट तौर पर दलित हितों के खिलाफ है क्योंकि इस ने दलितों के स्वतंत्र आन्दोलन को बर्बाद कर दिया है और दलालों के रूप में दलित नेता पैदा किये हैं..

सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण पहले वरीयता व्यवस्था के रूप में आया और 1943 में डॉ. आंबेडकर जो उस समय वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य थे, के जोर देने पर कोटा सिस्टम बनाया गया. शुरू में यह बहुत लाभदायिक रहा क्योंकि आज हम शहरों में जो दलित मध्य वर्ग देखते हैं वह इसी की ही देन है. परन्तु इस के बाद इस का प्रतिगामी और सीमान्तिक प्रभाव उभरना शुरू हो गया. शासक वर्गों के हाथ में आरक्षण जाति बनांये रखने और भारतीय जनमानस को विभाजित रखने का एक सशक्त औजार बन कर रह गया है.

संविधान बनाते समय सामाजिक न्याय का सारा मुद्दा अलग से हल किया जा सकता था परन्तु इसे व्यवस्थित तौर पर न केवल जाति को बनाये रखने बल्कि उन्हें मज़बूत करने की दिशा में ले जाया गया. क्योंकि आरक्षण अंग्रेजों के समय में ही कोटा की शक्ल धारण कर गया था और इसे अनुसूचित जाति की सरकारी पहचान से दिया गया था जिस से उन का हिन्दू धर्म से सम्बन्ध कट गया था तो जाति को आसानी से छोड़ा जा सकता था जब कि जोरशोर से छुआछूत को गैर क़ानूनी घोषित करके गायब कर दिया गया था.

इस के साथ ही आरक्षण को एक अपवाद की नीति के तौर पर और विशेष लोगों के लिए जिन्हें अधिकतर समाज बराबर के मनुष्यों के रूप में स्वीकार नहीं कर सका है अपनाया जाना चाहिए था. इस अवधारणा के तहत आरक्षण समाज की जाति समाप्त करने की असमर्थता के कारण इस प्रकार की जननीति के लिए एक आखरी सशक्त ताकत बन सकता था. केवल बड़ा समाज ही जाति का विनाश कर सकता है. आरक्षण में पिछड़ेपन की अवधारणा जो कि अदृश्य रहती है ने समाज में निचली जातियों की हीनता के बारे में व्याप्त बुनियादी अवधारणा  को मज़बूत किया है.

एक निरीह कृत्य नहीं
नीति की इस निर्णायिक अवधारणा की अनुपस्थिति दुर्भाग्य से संविधान निर्मात्री सभा का एक निरीह कृत्य या कल्पनाहीनता नहीं है बल्कि आरक्षण को शासक वर्गों के राजनैतिक सत्ता पर एकाधिकार को चुनौती देने के लिए सशाक्त हथियार बनने को असंभव बनाना था. इस की प्रक्रिया  ने यह भी सुनिश्चित किया है कि यह लगातार लाभार्थियों को ही मिलेगा जिस से इन्हीं लोगों में ही लाभार्थी वर्गों का गठजोड़ बन जायेगा.

सरकारी क्षेत्र की नौकरियों को छोडिये जो कि 1991 से नव-उदारवादी नीतियों के दबाव में लगातार कम हो रही हैं जिस से सरकारी क्षेत्र  में आरक्षण लगभग समाप्त हो गया है. हमारे प्रमुख संस्थानों में सीटें बराबर भरी नहीं जा रही हैं. आईआईएम और आईआईटी में पिछले कई सालों से आरक्षित सीटें भरी नहीं जा रही हैं दलितों और आदिवासियों का उपलब्ध करने का क्षेत्र लगातार घट रहा है. कई विसंगतियां हैं जिन के सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर निहितार्थ हैं. आरक्षण का लाभ लाभार्थी के परिवार को मिलता है परन्तु वह जाति के नाम पर दिया जाता है जिस का खामियाजा समाज को भुगतना पड़ता है. इन्हें ग्रामीण क्षेत्र में दलितों पर लगातार बढ़ रहे अत्याचारों के लिए उत्तरदायी भी माना जा सकता है.

आरक्षण को दलित समुदाय के लिए बाधक के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि इन्हें उन के शहरी तबके द्वारा शुरू से ही हथियाया जा रहा है. आरक्षण को निस्संदेह तौर पर लाभकारी माना जाता है परन्तु इस के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मूल्यों को नहीं देखा जाता. आरक्षण की सब से बड़ी कीमत जातियों के जीवित रहने और डॉ. आंबेडकर की “जाति विनाश” की योजना को चुकानी पड़ी है. प्राइमरी स्तर पर इसका जो कहर बच्चों पर गुजरता है कि वे कोई निम्न प्रजाति के हैं, उन्हें अपने आप में हीन भावना से भर देता है. आरक्षण ने शासक वर्गों को इन जातियों को बुनियादी सुविधाएँ जैसे बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ, शिक्षा और रोज़गार आदि देने की जुम्मेदारी से बचने का बहाना भी दे दिया है.

डॉ. आंबेडकर अपने सपने की कमियों को समझ गए थे जिस ने उच्च शिक्षित दलितों का अलग वर्ग पैदा कर दिया था. उन्होंने 1953 में आगरा में एक भाषण में खुले तौर पर कहा था कि पढ़े लिखे दलितों ने मुझे धोखा दिया है. उन्होंने अपने जैसी उदहारण का सपना देखा था कि कुछ पढ़े लिखे दलित महत्वपूरण प्रशासनिक पदों पर बैठ जायेगे और दलित हित का समर्थन करेंगे. उन्होंने अपने जीवन काल में ही देख लिया था कि दलितों की परवाह करने के स्थान पर पढ़े लिखे दलित उन से ही कटने लगे थे. दुर्भाग्यवश वे इस बात को नहीं देख सके कि उच्च शिक्षित दलितों का वर्ग परिवर्तन उन्हें दलित वर्ग के साथ सम्बन्ध रखने में बाधक होगा.

अगर आंबेडकर इन नीतियों को देखने के लिए आज जीवित होते तो वे निश्चित तौर पर इन्हें समाप्त करने की मांग करते जैसी की मोदी जी ने भी आशंका व्यक्त की है. आरक्षण का असली अभिप्राय इस बात से समझना चाहिए कि इस का लाभ कौन ले रहा है और इनकी कीमत कौन अदा कर रहा है.

(अनुवादक– एस.आर. दारापुरी)

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