…चिक्कन भारत क बापू के सपना पुरावल जाई हो… (सुनें)

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जाने-माने गीतकार डा. एमडी सिंह ने स्वच्छता अभियान को लेकर भोजपुरी में एक गीत की रचना की है. गाजीपुर के जाने माने होम्यो चिकित्सक डा. एमडी सिंह की इस भोजपुरी रचना को स्वर दिया है डा. अरविंद पांडेय ने.

आप भी सुनिए और आनंद लीजिए… नीचे क्लिक करें…

महतमा गांधी के तनी त करजा चुकावल जाई हो
चिक्कन भारत क बापू के सपना पुरावल जाई हो

मोदी जोगी सिनहा शाह
सबका हिया में जागल चाह
मलि देशवा क मइल धोइहैं
बुताई तब जियरा क दाह

अरे हमनियो के ओ सभनिन क संघत निभावल जाई हो
चिक्कन भारत क बापू के सपना पुरावल जाई हो

पनडोहा ना बज बज करी
घर दुआर ना माछी मरी
जे बस्सइहैं ना पोखरि डगर
तब्बै बुद्धी क दियना बरी

लीप पोति एहि देशवा के महमह महकावल जाई हो
चिक्कन भारत क बापू के सपना पुरावल जाई हो

करे न बहरे जाई मैदान
तबै कनिया पाई सम्मान
निम्मन सुघ्घर दिख्खी सबके
त देशवा के होई गुनगान

बइठल सबके अँखिया पर से गरदा उड़ावल जाई हो
चिक्कन भारत क बापू के सपना पुरावल जाई हो

-डॉ एमडी सिंह
गाजीपुर

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अखंड गहमरी ने अमर उजाला के स्थानीय संवाददाता से दुखी होकर प्रधान संपादक को भेजा लीगल नोटिस

हमारे गहमर में एक समाचार पत्र है अमर उजाला जिसके स्‍थानीय संवाददाता को कार्यक्रम में बुलाने के लिए जो मानक है वह मानक मैं पूरा नहीं कर पाता। इस लिए वह न तो हमारे कार्यक्रम की अग्रिम सूचना छापते हैं और न तो दो दिनो तक कार्यक्रम के समाचार। तीसरे दिन न जाने उनको क्‍या मिल जाता है जो आनन फानन में मुझसे बात कर न करके अन्‍य लोगो से व्‍यक्ति विशेष के बारे में सूचना मॉंगते है और मनगढ़त खबर बना कर प्रकाशित कर देते है।

अब इस मनगढ़त समाचार पर अमर उजाला समाचार पत्र के संवाददाता, ब्‍यूरो और संपादक के खिलाफ मानहानि और पेड-न्‍यूज का मुकदमा तो बनता ही है। हमारे संवाददाता महोदय ने पूरे के पूरे कार्यक्रम को बदल दिया… देखें कैसे…

(1) कार्यक्रम गहमर के आशीर्वाद पैलसे में किया गया परन्‍तु श्रीमान जी उसका नाम भूल गये एक जगह तो उन्‍होेनें लिखा ” एक” पैलसे और दूसरी जगह चित्र के नीचे लिख दिया ” गहमर पैलेस”। कम से कम बैनर तो देख लिया होता।

(2) उन्‍होंनेे बड़ी आसानी से मेरे मेहनत पर पानी फेरते हुए कवि सम्‍मेलन को काव्‍य-गोष्‍ठी बना दिया, अब जब श्रीमान जी को काव्‍य सम्‍मेलन या काव्‍य गोष्‍ठी में फर्क नहीं मालूम है तो किसी से पूछ लेना चाहिए था।

(3) उनके अनुसार कार्यक्रम में जो सम्‍मान दिये गये थे वो काव्‍य गोष्‍ठी के बाद तय किये गये थे, जब कि श्रीमान को यह पता नहीं कि मेरे सारे सम्‍मान 9 अगस्‍त 2017 को ही तय किये जा चुके थे, जिसकी सूचना सोशलमीडिया से लेकर समाचार पत्रों को प्रेस नोट के द्वारा दे दिया गया था।

(4) श्रीमान जी को आये हुए अतिथियों के नाम नहीं मिले और जो सम्‍मान न आने के कारण मंच से निरस्‍त कर दिये गये वही नाम उन्‍होनें प्रकाशित कर दिया। जिन्‍हेें सम्‍मान मिला ही नहीं, जो सम्‍मान पाये उनका नाम हवा में।

(5) श्रीमान जी ने रविता पाठक, सुलक्षणा अहलावत, बीना श्रीवास्‍तव, डा0 चेतना उपाध्‍याय, कमला पति गौतम, डा0 ज्‍योति मिश्रा को अलग अलग सम्‍मान दिया जाना लिखा है जबकि इन सभी को साहित्‍य सरोज शिक्षा प्रेरक सम्‍मान दिया गया। यहॉं तक की आरती का सम्‍मान न आने के कारण दिया ही नहीं गया।

(6) भाई साहब ने फोटो में भी लिखा है कि बीना श्रीवास्‍तव को सम्‍मानित करते साहित्‍यकार जबकि फोटो में साफ दिख रहा है कि बीना श्रीवास्‍तव जी को मुख्‍य अतिथि कमल टावरी जी सम्‍मानित कर रहे हैं।

(7) पूरे समाचार में आप कही भी इस कार्यक्रम को आयोजित करने वाली संस्‍था या आयोजक का नाम और साथ में यह कार्यक्रम कब हुआ उसका पता नहीं।

(8) जो सम्‍मान दिया जा रहा है वह शिक्षक दिवस के अवसर पर दिया गया 5 सितम्‍बर को और जो समाचार की हेडिंग बनी है वह है चार सितम्‍बर की।

(9) 4 सितम्‍बर को आयोजित ” आखिर क्‍यो कटघडे में मीडिया” परिचर्चा के अन्‍य वक्‍ताओं, सभा अध्‍यक्ष, मुख्‍यअतिथि सबके नाम गायब।

और भी बहुत कुछ है जिसकी चर्चा मैंने अपने कोर्ट नोटिस में किया है।

भाई, आपको मुझसे एलर्जी थी तो आप मत छापते मेरा समाचार. मैं आपके चरण तो पखार नहीं रहा था. और न ही आपको किसी डाक्‍टर ने मेरा समाचार छापने को कहा था। और यदि किसी मजबूरी या लालच के आधार पर छाप भी दिया तो सही सही छापना था। क्‍यों गलत सही छाप कर मेरे कार्यक्रम की तौहीन कर दिये। आपको किसने हक दिया था इसका।
अब आप सब खुद समझदार हैं। मैं अधिक बोलूगॉं तो आप सब यही कहेंगे कि मैं बेफजूल की बात कर रहा हूँ।

चलिये मैंने वीडियो रिकार्डिग और फोटो के आधार पर कोर्ट की नोटिस तो दिनांक 08 सितम्‍बर 2017 को प्रधान संपादक के नाम भेज कर कापी टू संपादक, ब्‍यूरो, कर दिया है। आगे देखते हैं क्‍या हेाता है। कुछ हो न हो पर मन को तसल्‍ली तो मिलेगी कि मैंने आवाज उठाई।

अखंड गहमरी

गहमर

गाजीपुर (उत्तर प्रदेश)

akhandgahmari@gmail.com

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अपराधी को हिरासत से भगाने वाली गाजीपुर पुलिस ने निर्दोष बुजुर्ग का मोबाइल फोन छीन लिया!

Yashwant Singh : ग़ज़ब है यूपी का हाल। अपराधी भाग गया हिरासत से तो खिसियानी पुलिस अब बुजुर्ग और निर्दोष को कर रही परेशान। मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह का फोन ग़ाज़ीपुर की नन्दगंज थाने की पुलिस ने छीना। बिना कोई लिखा पढ़ी किए ले गए। अब बोल रहे फोन हिरासत में लिया है। शर्मनाम है यह सब। जो पुलिस वाले नशे में होकर अपराधी को भगाने के जिम्मेदार हैं, उनको तो अरेस्ट किया नहीं होगा, एक बुजुर्ग को ज़रूर घर से उठा ले गए और फोन छीन लिया। चाचाजी फिलहाल लौट आए हैं, लेकिन फोन पुलिस ने रख लिया। यही है मोदी-योगी राज का स्मार्ट और डिजिटल इंडिया। राह चलते आदमी का फोन पुलिस छीन ले जाए और पूछने पर कहे कि फोन हिरासत में लिया है। माने बिना लिखा पढ़ी किसी का भी फोन छीनकर हिरासत में लेने का अधिकार है पुलिस को? यूपी की पुलिस कभी न सुधरेगी।

चाचा का मोबाइल पुलिस वालों ने लौटा दिया. गाजीपुर के एसपी का फोन आया था. पर सवाल ये है कि क्या पुलिस होने का मतलब यही होता है कि आप किसी भी सीनियर सिटीजन को उठा लो और फिर उनको यहां-वहां घुमाने के बाद छोड़ते हुए फोन छीन लो. जब फोन के बारे में पूछा जाए तो कह दीजिए कि फोन हिरासत में है. बिना लिखत पढ़त आपका फोन कैसे ले सकते हैं पुलिसवाले? डिजिटल इंडिया के इन दिनों में जब फोन आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है, आपकी वर्चुवल / आनलाइन पर्सनाल्टी की तरह है मोबाइल फोन, इसमें सारे मेल, सारे पेमेंट डिटेल्स, सारे कार्ड्स, सारे सोशल मीडिया साइट्स, सारे कांटैक्ट्स, सारे आफिसियल और परसनल डिटेल्स होते हैं तो आप पुलिस वाले इन्हें यूं ही छीन कर कैसे ले जा सकते हो और और पूछने पर तपाक से कैसे कह दोगे कि फोन आपका हिरासत में लिया गया है? मने कुछ भी कर दोगे और कुछ भी कह दोगे? कोई नियम-कानून आपके लिए नहीं है? अपराधी आप पुलिस वाले खुद ही हिरासत से भगा दीजिए और इसका बदला किन्हीं दूसरे निर्दोषों से लीजिए?

गाजीपुर के पुलिस कप्तान सोमेन वर्मा को मुझे यह समझा पाने में काफी मुश्किल हुई कि आपका थानेदार किसी का फोन यूं ही कैसे छीन कर ले जा सकता है? आपको किसी आदमी पर शक है, उसकी बातचीत या उसके मैसेजेज पर शक है तो आप उसके फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा लो, सीडीआर निकलवा लो, सारे मैसेज पता करवा लो, सारे फोन सुन लिया करो… चलो ये सब ठीक, देश हित का मामला है, अपराध खोलने का मामला है, अपराधी पकड़ने का मामला है, कर लो ये सब, चुपचाप. लेकिन आप किसी का फोन कैसे छीन लेंगे? और, पूछने पर कहेंगे, पूरी दबंगई-थेथरई से, कि हम फोन चेक कर रहे हैं? ऐसे कैसे फोन छीनकर चेक कर सकते हैं आप लोग? आपने अगर फोन छीनकर आपके लोगों ने इसी फोन से अपराधियों को फोन कर दिया, इसी फोन से अपराधियों को मैसेज कर दिया और फिर बाद में यह कह कर फोन वाले को फंसा दिया कि इस फोन से तो अपराधियों को काल किया गया है, मैसेज किया गया है तो फिर हो गया काम… इस तरह से आप लोग किसी भी निर्दोष को फंसा सकते हैं.

देश में अभी निजता की बहस चल ही रही है. किसी के फोन में देखना तक अनैतिक होता है. किसी के फोन को बिना पूछे उठाना गलत माना जाता है. आप पुलिस वाले तो किसी दूसरे का पूरा का पूरा फोन ही छीन लेते हो? ये इस लोकतंत्र में किस किस्म का निजता का अधिकार है? या फिर ये निजता का अधिकार सिर्फ बड़े शहरों के बड़े लोगों के लिए है?

ट्विटर पर यूपी पुलिस, डीजीपी, सीएम योगी आदि को टैग करते हुए जब मैंने ट्वीट किया और कई साथियों ने इस ट्वीट पर यूपी पुलिस व गाजीपुर पुलिस से जवाब मांगा तो गाजीपुर पुलिस सक्रिय हो गई. रात में ही चाचा का फोन नंदगंज थाने से शहर कोतवाली मंगवा लिया गया और मुझे इत्तला किया गया कि फोन आ चुका है, किसी को भेज कर मंगवा लें. मेरे अनुरोध करने पर शहर में रहने वाले साथी Sujeet Singh Prince और Rupendra Rinku भाई रात करीब एक बजे गाजीपुर कोतवाली जाकर चाचा का फोन ले आए.

सवाल ये भी है कि क्या हम आप अगर ट्विटर और एफबी पर सक्रिय हैं, तभी जिंदा रहेंगे, वरना पुलिस आपके साथ कोई भी सलूक कर जाएगी? ऐसा देश मत बनाइए भाइयों जहां किसी निर्दोष और किसी आम नागरिक का जीना मुहाल हो जाए. क्या फरक है सपा की अखिलेश सरकार और भाजपा की योगी सरकार में? वही पुलिस उत्पीड़न, वही अराजकता, वही जंगलराज. जिसका जो जी कर रहा है, वह उसे धड़ल्ले से कर रहा है, बिना सही गलत सोचे.

हमारे गांव का एक अपराधी गाजीपुर शहर में पुलिस हिरासत से फरार हो गया. बताया जाता है कि पुलिस वाले जमकर पीने खाने में मगन थे और उसी बीच वह भाग निकला. जो पुलिस वाले उसे पेशी पर लाए थे, उन्हें करीब दो घंटे बाद पता चला कि पंछी तो उड़ चला. मुझे नहीं मालूम गाजीपुर के पुलिस कप्तान ने इन लापरवाह, काहिल और भ्रष्ट पुलिस वालों को गिरफ्तार कराया या नहीं, जो अपराधी को भगाने के दोषी हैं. इन पुलिस वालों ने कितने पैसे लेकर अपराधी को भगाया, इसे जांच का विषय बनाया या नहीं, मुझे नहीं मालूम. पर पुलिस विभाग शातिर अपराधी के भाग जाने के बाद उसे खोजने-पकड़ने के चक्कर में अब उन निर्दोषों को परेशान करने लगा जिनका इस शख्स से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं.

खिसियानी बिल्ली खंभो नोचे के क्रम में पुलिस वाले भागे हुए अपराधी को पकड़ने के नाम पर मेरे गांव पहुंचे और मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह को उठा ले गए. वे उन्हें गाजीपुर शहर उनके बड़े वाले पुत्र यानि मेरे कजन के घर पर ले गए. उनका बड़ा पुत्र गांव छोड़कर गाजीपुर शहर में गांव की किचकिच / राजनीति से बचने के लिए सपरिवार किराये पर रहने लगा. वहां जब उनका बड़ा बेटा नहीं मिला तो पुलिस वाले चाचा को छोड़ तो दिए पर जाते-जाते उनका फोन ले गए. उस फोन को ले जाकर उन्होंने उसमें सेव सभी नामों पर मिस काल मारने लगे. जिसका भी पलट कर फोन आए, उससे फोन पर ही पूछताछ करने लगते.

अरे भाई गाजीपुर पुलिस! आजकल की पुलिसिंग बहुत एडवांस है. कहां बाबा आदम के जमाने के इन तौर-तरीकों / टोटकों में अटके पड़े हो और अपनी कीमती उर्जा यूं ही खर्च कर रहे हो. आजकल अव्वल तो शातिर अपराधी फोन पर बात नहीं करते. दूसरे, पुलिस के लोग अब तकनीकी रूप से काफी ट्रेंड किए जाने लगे हैं ताकि वे सारे आयाम को समझ कर अपराधी को बिना भनक लगे दबोच सकें. साइबर अपराध बढ़े हैं और इसी कारण इसको हैंडल करने के लिए ट्रेंड पुलिस वालों की भी संख्या बढ़ाई जा रही है. पर यूपी में लगता है कि पुलिस अब भी बाहुबल और बकैती को ही अपराध खोलने का सबसे बड़ा माध्यम मानती है.

भाई एडवोकेट Prateek Chaudhary की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने लिखा है कि अलीगढ़ में एक थाने में एक लड़की को 12 दिन तक लगातार गैर-कानूनी रूप से रखा गया. उस पर शायद अपनी भाभी की हत्या का आरोप था. जब हो-हल्ला हुआ तो उसे 12 दिन के बाद जेल भेजा गया. बताइए भला. एक लड़की को आप 12 दिन तक हवालात में रखते हो! ये कहां का नियम कानून है. आप रिमांड पर लो. पूछताछ करो. पर ये क्या कि न कोर्ट में पेश करेंगे न जेल भेजेंगे, बस हवालात में रखे रहेंगे! वो भी एक लड़की को! क्या इन्हीं हालात में (गाजीपुर में मेरे चाचाजी वाले मामले और अलीगढ़ में लड़की वाले मामले में) पुलिस वाले उगाही और बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं करते?

योगी सरकार को यूपी में पुलिसिंग दुरुस्त करने के लिए बहुत सख्त कदम उठाने की जरूरत है अन्यथा सरकार बदलने के बावजूद जनता के कष्ट कम न हो सकेंगे. अखिलेश यादव के राज में जो जंगलराज था, वही हालात आज भी जमीन पर है. खासकर छोटे और पिछड़े जिलों में तो पुलिस विभाग का बुरा हाल है. वहां पुलिस का मतलब ही होता है गरीबों को प्रताड़ित और शोषित करने वाले. निर्दोष जनता से बदतमीजी करने के आरोपी / दोषी पुलिस वालों को बिना देर किए सस्पेंड-बर्खास्त करने में कतई हिचकने-झिझकने की जरूरत नहीं. शायद तभी ये सुधर सकें.

मेरे चाचा के फोन छीने जाने वाले मामले में डॉ Avinash Singh Gautam और Avanindr Singh Aman समेत ढेरों साथियों ने ट्विटर पर तुरंत सक्रियता दिखाई, इसके लिए इन सभी का दिल से आभार.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : 9999330099 या yashwant@bhadas4media.com

गाजीपुर पुलिस का हाल जानने के लिए इसे भी पढ़ें…

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चला सखी रोप आईँ खेतवन में धानी…. (सुनें)

Yashwant Singh :  भोजपुरी में सावन का एक गीत… चला सखी रोप आईँ खेतवन में धानी…. गाजीपुर के जाने माने होम्यो चिकित्सक डा. एमडी सिंह की एक भोजपुरी रचना को स्वर दिया है डा. अरविंद पांडेय जी ने. दोनों लोग वीडियो पर तस्वीर में दिख रहे हैं. टोपी वाले डा. एमडी सिंह हैं और दाएं वाले अरविंद पांडेय.

भोजपुरी इलाकों में सावन के गीतों का बहुत महत्व है. भोजपुरी में सावन का मौसम दरअसल गीतों का मौसम है. आप भी सुनिए और आनंद लीजिए… चला सखी रोप आईं खेतवन में धानी… सुनने के लिए नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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मुहआ चैनल के मालिक पीके तिवारी जमीन विवाद में गाजीपुर कोतवाली में बैठे दिखे (देखें तस्वीरें)

महुआ चैनल के मालिक पीके तिवारी को आज गाजीपुर कोतवाली जाना पड़ा. बताया जाता है कि उन्होंने अपनी एक जमीन और मकान गाजीपुर के व्यवसायी रिंकू अग्रवाल को बेचने का लिखित एग्रीमेंट कर रखा था जिससे अब वो मुकर रहे हैं. इसी को लेकर दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर मुकदमा कराया और पीके तिवारी को कोतवाली जाना पड़ा. बताया जाता है कि पीके तिवारी अपने साथ एक भाजपा विधायक को भी लेकर विवादित जमीन पर कब्जा लेने गए थे लेकिन मामला बढ़ते देख भाजपा विधायक नौ दो ग्यारह हो गए.

उल्लेखनीय है कि फर्जीवाड़े के कई मामलों के आरोपी और तिहाड़ जेल काट चुके पीके तिवारी इन दिनों आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं. वे पहले भी किसी एक प्रापर्टी पर कई किस्म के लोन लेने के मुकदमे झेल चुके हैं. गाजीपुर वाली प्रापर्टी के मामले में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया है. फिलहाल गाजीपुर कोतवाली में विराजे पीके तिवारी को लेकर मीडिया जगत में चर्चाओं का बाजार गर्म है. लोगों का कहना है कि बुजुर्ग पीके तिवारी को इस उम्र में जाने कैसे कैसे दिन देखने पड़ रहे हैं. चर्चा है कि पीके तिवारी का निजी पारिवारिक जीवन भी इन दिनों झंझावात से घिरा हुआ है. अंदरखाने बंटवारे की खबर गर्म है.

दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ की गई शिकायत की कॉपी ये है…

गाजीपुर से भड़ास संवाददाता सुजीत कुमार सिंह प्रिंस की रिपोर्ट. संपर्क : 9451677071

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रेलवे स्टेशन पर पान खाने गए यशवंत पहुंचा दिए गए कोतवाली!

Yashwant Singh : रात मेरे साथ कहानी हो गयी। ग़ाज़ीपुर रेलवे स्टेशन पर पान खाने गया लेकिन पहुंचा दिया गया कोतवाली। हुआ ये कि स्टेशन पर मंदिर के इर्द गिर्द कुछ संदिग्ध / आपराधिक किस्म के लोगों की हरकत दिखी तो एसपी को फोन कर डिटेल दिया। उनने कोतवाल को कहा होगा। थोड़ी ही देर में मय लाव लश्कर आए कोतवाल ने मंदिर के पास वाले संदिग्ध लोगों की तरफ तो देखा नहीं, हम दोनों (मेरे मित्र प्रिंस भाई) को तत्काल ज़रूर संदिग्ध मानकर गाड़ी में जबरन बिठा कोतवाली ले गए। मुझे तो जैसे आनंद आ गया। लाइफ में कुछ रोमांच की वापसी हुई। कोतवाल को बताते रहे कि भाया हम लोगों ने तो संदिग्ध हरकत की सूचना दी और आप मैसेंजर को ही ‘शूट’ कर रहे हो।

कोतवाली में नीम के पेड़ के नीचे चबूतरे पर मेरा आसन लगा और गायन शुरू हो गया- ना सोना साथ जाएगा, ना चांदी जाएगी…। पुलिस वालों ने मेडिकल कराया जिसमें कुछ न निकला। अंततः एक स्थानीय मित्र आए तो उनके फोन से फिर एसपी को फोन कर इस नए डेवलपमेन्ट की जानकारी दी। एसपी भौचक थे सुनकर। उन्होंने फौरन कोतवाल को हड़काया। सीओ को कोतवाली भेजा। आधे घंटे में खुद भी प्रकट हो गए।

तब तक दृश्य बदल चुका था।

शहर कोतवाल सुरेंद्र नाथ पांडेय हम लोगों के चरण छूकर माफी मांग रहा था। उनका अधीनस्थ दरोगा जनार्दन मिश्रा जो बदतमीजी पर आमादा था, कोतवाली लाए जाते वक्त, गायब हो चुका था। हम लोगों ने नीम के पेड़ के नीचे पुलिस जुल्म के खिलाफ ऐतिहासिक अनशन शुरू कर देने की घोषणा की। माफी दर माफी मांगते रुवांसे कोतवाल को हम अनशनकारियों ने आदेश दिया कि फौरन तुलसी रजनीगंधा की व्यवस्था कराओ, तब अनशन खत्म करने पर विचार किया जाएगा। कोतवाल ने अल्फा बीटा गामा चीता कुक्कुर सियार जाने किसको किसको आदेश देकर फौरन से पेशतर उच्च कोटि का पान ताम्बूल लेकर हाजिर होने का हुक्म सुनाया।

सीओ को हम लोग कम भाव दिए क्योंकि निपटना कोतवाल से था।

कप्तान आए तो मेरा पुलिस, जनता, पत्रकरिता और सरोकार पर भाषण शुरू हुआ जो अनवरत आधे घंटे तक चला। मैं रुका तो मेर साथ अनशनकारी मित्र प्रिंस का उग्र भाषण शुरू हुआ। कप्तान सोमेन वर्मा माफी मांगने लगे और कोतवाल को जमकर लताड़ने लगे। अगले घण्टे भर तक सुलहनामे की कोशिश चलती रही। मेरी एक ही शर्त थी कि अगर मेरे दोस्त प्रिंस ने माफ कर दिया तो समझो मैंने भी माफ कर दिया वरना ये कोतवाली का धरना सीएम आवास तक पहुंचेगा। एसपी ने प्रिंस भाई के सामने हाथ जोड़ा और पुलिस विभाग की तरफ से मांफी मांग कर उन्हें गले लगाया। साथ ही साथ वहां हाथ बांधे खड़े कोतवाल की जमकर क्लास लगाई- ‘तुम नहीं सुधर सकते… चीजों को ठीक नहीं कर सकते हो तो कम से कम रायता तो न फैलाया करो…’।

मैंने कहा- ‘इसके पास वसूली उगाही से फुरसत हो तब न सकारात्मक काम करे… ऐसे ही लोग विभाग के लिए धब्बा होते हैं जो राह चलते किसी शख्स से बदतमीजी से बात करते हुए उसे थाने-कोतवाली तक उठा लाते हैं, जैसा आज हुआ’।

कोतवाल बेचारे की तो घिग्घी बंधी थी। एसपी और सीओ माफी पर माफी मांग अनशन से उठने का अनुरोध करते जा रहे थे। हम लोग जेल भेजे जाने की मांग पर यह कहते हुए अड़े थे कि अरेस्टिंग और मेडिकल जैसे शुरुआती दो फेज के कार्यक्रम हो चुके हैं, तीसरे फेज यानि जेल भेजे जाने की तरफ प्रोसीड किया जाए।

इसी बीच बाइक से आए एक पुलिस मैन ने कोतवाल के हाथों में चुपके से कुछ थमाया तो कोतवाल ने हाथ जोड़ते हुए मुझे तुलसी रजनीगंधा का पैकेट दिखाया। मैं मुस्कराया, चॉकलेट को मुंह से कट मारने के बाद सारे दुख भूल जाने वाले विज्ञापन के पात्र की तरह। उधर प्रिंस भाई का भी भाषण पूरा हो चुका था और पूरा पुलिस महकमा सन्नाटे में था। अनुनय विनय की चौतरफा आवाजें तेज हो चुकी थीं। अंततः आईपीएस सोमेन वर्मा के बार बार निजी तौर पर मांफी मांगने और आइंदा से ऐसी गलती न होने की बात कही गयी तो मैंने उनसे बोतल का पानी पहले प्रिंस भाई फिर मुझे पिला कर अनशन खत्म कराने का सुझाव दिया जिसे उन्होंने फौरन लपक लिया।

आंदोलन खत्म करने का एलान करते हुए नीम के पेड़ के चबूतरे से उठ कर मैं सीधे कोतवाल की तरफ मुड़ा और उसके हाथ से तुलसी रजनीगंधा झपटते हुए कहा- ”तुम यहां आंख के सामने से निकल लो गुरु, वर्दी न पहने होते तो दो कंटाप देता, लेकिन ये तुलसी रजनीगंधा मंगा कर तुमने थोड़ा अच्छा काम किया है इसलिए जाओ माफ कर रहा हूं। बस ध्यान रखना आगे से कि पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य ही नहीं होता इसलिए किसी आम आदमी से बदतमीजी करने से पहले सौ बार जरूर सोचना।”

कोतवाल सिर झुकाए रहा।

कप्तान ने हम लोगों का जब्त मोबाइल और लाइसेंसी रिवाल्वर वापस कराया। एक दोस्त रिंकू भाई की कार पर सवार होने से पहले कोतवाली के गेट पर बंदूक लिए खड़े संतरी से जोरदार तरीके से हाथ मिलाते हुए उन्हें इस कोतवाली का सबसे बढ़िया आदमी होने का खिताब दिया और उन्हें ‘जय हिंद’ कह कर सैल्यूट ठोंकते हुए घर वापस लौट आया।

अभी सो कर उठा तो सबसे पहले रात का पूरा वृत्तांत यहां लिखा ताकि भड़ास निकल जाए। आज रोज से ज्यादा एनर्जेटिक फील कर रहा हूं क्योंकि वो मेरा प्रिय गाना है न – ‘वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो’। दिक्कत ये है कि मैं पूरी जिंदगी में एक नहीं बल्कि हर रोज एक कहानी चाहता हूं और जिन-जिन दिनों रातों में कोई कहानी हो जाया करती है उन उन दिनों रातों में ज्यादा ऊर्जा से भरा जीवंत महसूस करता हूँ।

कह सकते हैं मेरे साथ हर वक्त कहानी हो जाया करती है, कभी इस बाहरी दुनिया में घटित तो कभी आंतरिक ब्रम्हांड में प्रस्फुटित।

फिर मिलते हैं एक कहानी के बाद।

जै जै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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सिर पटकते ही रुक गई कुल्हाड़ी, बच गई पीपल की जान (देखें तस्वीरें)

सामाजिक कार्यकर्ताओं का गाजीपुर के औरिहार रेलवे स्टेशन पर पीपल के वृक्ष को बचाने के लिए अनोखा पहल… विदेशों से वृक्षों के प्लांटेशन का गुण सीखे भारत सरकार… पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के जाने माने समाजसेवी और राजनेता बृजभूषण दुबे एक रोज ट्रेन से लौट रहे थे तो देखा कि कुछ लोग एक पीपल के पेड़ को काटने में जुटे हैं. वो फौरन ट्रेन से उतरे और जाकर कुल्हाड़ी के नीचे अपनी गर्दन रख दी कि पहले मेरा सिर काटो फिर इस पवित्र और पर्यावरण हितैषी वृक्ष को काटना. आखिरकार उनके प्रयासों से पेड़ की जान बच सकी.

पीपल के वृक्ष पर दना-दन चल रही आधा दर्जन कुल्हाड़ियां उस समय रुक गई जब सामाजिक कार्यकर्ता ब्रज भूषण दूबे ने अपना सिर कट रहे वृक्ष पर पटक दीया दिया। कहा पहले हमारी गर्दन पर चलाओ कुल्हाड़ी तब कटने देंगे वृक्ष। इस तरह औरिहार रेलवे स्टेशन के उत्तरी पश्चिमी सिरे पर कट रहे पीपल की जान कुछ दिनों के लिए तो बच गई किंतु  विकास के नाम पर हो रही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई शायद ही रुकने का नाम ले।

रविवार को वाराणसी से गाजीपुर लखनऊ छपरा एक्सप्रेस से यात्रा कर रहे ब्रज भूषण दुबे की नजर औरिहार रेलवे स्टेशन के उत्तरी पश्चिमी  छोर पर स्थापित एक युवा पीपल के वृक्ष पर पड़ी जिसे आधा दर्जन लकडहारे कुल्हाड़ी से काट रहे थे। श्री दुबे ने अपनी यात्रा वहीं रोक कर पीपल के पेड़ के पास पहुंच काटने से मना किया। मजदूरों के ऐसा ना करने पर उन्होंने रेलवे के ठेकेदार से अनुरोध किया किंतु उसके भी हिला हवाली करने पर उन्होंने कट रहे वृक्ष के आगे अपनी गर्दन टिका दिया। चलती कुल्हाड़ियां रुक गई।

उन्होंने वहीं से रेल मंत्री सुरेश प्रभु, रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के अलावा प्रधानमंत्री आदि को ट्वीट करते हुए पीपल के वृक्ष का फोटो भेजा और कहा कि रेलवे के विकास में बाधा पहुंचा रहे वृक्षों का वह मशीनों द्वारा प्लांटेशन कराएं।  फिलहाल पीपल का कटना तो बंद हुआ किंतु यह कहना काफी मुश्किल है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां विकास के नाम पर नित्य प्रति कंक्रीट के जंगल स्थापित हो रहे हैं वहां भी कभी वृक्षों का प्लांटेशन हो पाएगा?

ब्रज भूषण दुबे ने बताया कि उनकी टीम द्वारा इस समय उत्तर प्रदेश ही नहीं देश की सड़कों पर चौड़ीकरण में बाधा पहुंचा रहे वृक्षों को न काट प्लांटेशन कराए जाने की पहल पर संघर्ष जारी है। उनके कार्यकर्ताओं ने एक माह का समय केंद्र व प्रदेश सरकार को दिया है यदि वह इस पर ठोस निर्णय नहीं लेते हैं तो अपनी जीवन लीला समाप्त करने की भी धमकी दी गई है। उक्त अवसर पर श्री दुबे के साथ सामाजिक कार्यकर्ता शिवचरण यादव भी उपस्थित थे।

संबंधित तस्वीरें देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

ब्रज भूषण दुबे
राष्ट्रीय अध्यक्ष
समग्र विकास इंडिया
शास्त्रीनगर
गाजीपुर
मोबाइल 9452455444

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