मीडिया घरानों को नंगा करने वाले ‘कोबरा पोस्ट’ के संपादक अनिरुद्ध बहल का वीडियो इंटरव्यू देखें

दो पार्ट में मीडिया घरानों का स्टिंग कराने वाली मीडिया कंपनी कोबरापोस्ट के कर्ताधर्ता हैं अनिरुद्ध बहल. चमक-दमक और प्रचार से दूर रहने वाले इस शख्स के बारे में लोग कम ही जानते हैं. भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह ने कल नोएडा स्थित कोबरापोस्ट के आफिस जाकर अनिरुद्ध बहल का एक विस्तृत वीडियो इंटरव्यू किया. Continue reading

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सुप्रिय प्रसाद मीडिया इंडस्ट्री के सर्वश्रेष्ठ बॉसेज में से एक हैं!

Yashwant Singh : संपादक को अपने व्यवहार और दिमाग से कैसा होना चाहिए… मैं जो समझ पाता हूं वो ये कि उसे नितांत डेमोक्रेटिक होना चाहिए. सबकी सुने…सबको मौका दे.. सरल-सहज रहे ताकि उससे कोई भी मिल जुल कह बता सके… नकारात्मकता न हो… कोई बुरा कहे तो जज्ब कर ले… कोई अच्छा करे तो उसे वाहवाही दे दे… आज के दौर के युवा संपादकों की बात करें तो कुछ ही हैं जो इस पैमाने पर खरे उतरते हैं… सुप्रिय प्रसाद को उनमें से एक मानता हूं…

सुप्रिय प्रसाद

सुप्रिय टीवी टुडे ग्रुप के सभी न्यूज चैनलों के मैनेजिंग एडिटर हैं…. जाहिर है, आजतक चैनल उनकी टाप प्रियारिटी में रहता है… सुप्रिय ने हिंदी टीवी पत्रकारिता के जनक एसपी सिंह के साथ लंबे समय तक काम किया.. आईआईएमसी से पढ़े सुप्रिय ने टेलीविजन की तकनीक और इसकी विशिष्टता को पकड़ा-समझा… और यूं कंटेंट-विजुवल के मास्टर बने…

वे सुबह आंख खुलने और रात सोने से पहले तक लगातार कई न्यूज चैनलों को मानीटर करते रहते हैं… चाहें वे घर रहें या आफिस… उनके इर्द गिर्द कई स्क्रीन पर कई हिंदी अंग्रेजी चैनल म्यूट मोड में लगातार चलते रहते हैं…

उन्हें ठीक ठीक पता रहता है कि कब क्या चलना चाहिए आजतक पर… हां, हम आप उनके प्रयोगों की आलोचना कर सकते हैं, वैचारिक आधार पर… लेकिन ये सच है कि उन्होंने आजतक न्यूज चैनल को कंटेंट से लेकर टीआरपी तक में हमेशा नंबर वन बनाए रखा…

ये भी सच है कि नंबर वन हो जाना बड़ी बात नहीं होती… नंबर वन हो जाने के बाद इस नंबर वन की कुर्सी पर बने रहना मुश्किल काम होता है… आजतक नबर वन न्यूज चैनल है और जमाने से नंबर वन है… इसकी काट तलाशने की बहुत कोशिश हुई लेकिन कोई कामयाब न हो पाया…

संपादकीय गुणवत्ता, दर्शनीयता, टीआरपी, देश और समाज के हितों के साथ कदम-ताल करते हुए फैसले लेने पड़ते हैं… बहुत कुछ होता है जिसके आधार पर खबर / विजुअल को लेकर फाइनल डिसीजन की ओर बढ़ना पड़ता है… लेकिन सुप्रिय उलझते नहीं… वे तुरंत फैसले करते हैं… टेलीविजन में देरी-सुस्ती चलती भी नहीं… सुप्रिय की टीवी की समझ और फैसले लेने की तेजी उन्हें सबसे अलग बनाती है.. यही वजह है कि सुप्रिय बरसों से आजतक के संपादक हैं… और, अब तो पूरे ग्रुप के सभी चैनलों के मैनेजिंग एडिटर हैं…

सुप्रिय के बारे में ये मेरा निजी आकलन है… जरूरी नहीं कि आपका नजरिया इससे मेल खाए… ये भी सच है कि मैंने उनके साथ कभी काम नहीं किया.. इसलिए आफिस के अंदर के उनके व्यवहार-रवैये के बारे में नहीं जानता… लेकिन उनके साथ काम कर चुके और करने वाले कई लोगों को अक्सर ये कहते सुना हूं- ”सुप्रिय मीडिया इंडस्ट्री के सर्वश्रेष्ठ बॉसेज में से एक हैं”.

सुप्रिय के खिलाफ, आजतक चैनल के खिलाफ और इस समूह के मालिकों के खिलाफ भड़ास पर कई दफे खबरें छपी…. लेकिन सुप्रिय ने कभी बुरा नहीं माना… वो जानते हैं कि भड़ास होने का क्या मतलब है.. उनका व्यवहार न बदला… मैं कई बार सोचता हूं कि उनकी जगह मैं खुद होता तो क्या ऐसा व्यवहार अगले के साथ कर पाता… मैंने दशक भर में कई संपादक देखे हैं जो अच्छा छपने पर तो खुश रहते हैं लेकिन जहां कोई एक खबर उनके या उनके संस्थान के खिलाफ छपी, एकदम से गदा लेकर हनुमान बन जाते हैं… गदर काटने पर तुल जाते रहे हैं… खैर, यह सब हमेशा होता है, जो खबर के कामकाज से ताल्लुक रखते हैं, उन्हें अच्छे से पता होता है…

सुप्रिय की चर्चा यहां यूं कर रहा था कि उनका एक इंटरव्यू मैंने वर्ष दो हजार दस में लिया था. तब वो इंटरव्यू मैंने लिखकर भड़ास पर प्रकाशित किया था. टेक्स्ट फारमेट में. उसी दरम्यान यूं ही, बातचीत के कुछ वीडियो क्लिप्स भी तैयार कर लिया था… कल एक हार्ड ड्राइव चेक करते हुए संयोग से वो वीडियो क्लिप्स मुझे मिल गए… अब जबकि मैं वीडियो एडिटिंग भी सीख रहा हूं तो फौरन उन वीडियो क्लिप्स को जोड़कर यूट्यूब पर अपलोड कर दिया… सुप्रिय को सुनिए… ये आठ साल पहले वाले सुप्रिय हैं… जब उनको मैंने ये वीडियो लिंक भेजा तो बोले- अब तो नया इंटरव्यू लेने का वक्त आ गया है… मैंने जवाब दिया- आपने मेरे मुंह की बात छीन ली…

सुप्रिय के पुराने वीडियो इंटरव्यू को देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=Kniys9qyXyQ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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भास्कर ग्रुप को धूल चटाने वाली इस लड़की का इंटरव्यू देखें-सुनें

मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने में बहुत बड़े बड़े पत्रकारों की पैंट गीली हो जाती है लेकिन भास्कर समूह में रिसेप्शनिस्ट पद पर कार्यरत रही एक लड़की ने न सिर्फ भास्कर ग्रुप से कानूनी लड़ाई लड़ी बल्कि अपना हक हासिल करने की अग्रसर है.

कोर्ट के आदेश पर भास्कर ग्रुप ने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत इसे मिलने वाले लाखों रुपये अदालत में जमा करा दिए हैं. लतिका चह्वाण नामक यह लड़की डीबी कार्प के मुंबई आफिस में रिसेप्शनिस्ट हैं. इनसे बातचीत की आरटीआई एक्सपर्ट और मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह जी ने.

इंटरव्यू देखने सुनने के लिए नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें :

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मजीठिया वेज बोर्ड मुद्दे पर सीनियर एडवोकेट मदन तिवारी का जोरदार इंटरव्यू, देखें वीडियो

बिहार के गया जिले के सीनियर एडवोकेट मदन तिवारी मजीठिया वेज बोर्ड मुद्दे पर गया के ही दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार पंकज जी का फ्री में मुकदमा लड़ रहे हैं और जागरण प्रबंधन के हर दांव को न्यायालय में फेल करते हुए विजयश्री दिलाने की ओर अग्रसर हैं. पत्रकार पंकज ने मजीठिया वेज बोर्ड के मुद्दे पर मदन तिवारी से विस्तार से बातचीत की ताकि देश भर के मजीठिया क्रांतिकारी इस मामले के विभिन्न बिंदुओं को बारीकी से समझ कर अपने संघर्ष के हथियार को पैना कर सकें.

देखें वीडियो इंटरव्यू….

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‘मलिकज़ादा’ के विमोचन के बाद यशवंत ने की इसके लेखक नज़ीर मलिक से बातचीत, देखें वीडियो

35 साल सेवा के बाद वरिष्ठ पत्रकार को क्यों देना पड़ा दैनिक जागरण से इस्तीफा, जानिए पूरी दास्तान… सिद्धार्थनगर जिले के दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ रहे वरिष्ठ पत्रकार नज़ीर मलिक अपने जीवन, करियर और संघर्षों की कहानी बयां कर रहे हैं, भड़ास संपादक यशवंत से एक विशेष बातचीत में… 

‘मलिकज़ादा’ क़िताब का विमोचन पिछले दिनों सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज में आयोजित पूर्वांचल साहित्य सम्मलेन में किया गया. इसके लेखक हैं नज़ीर मलिक.  दैनिक जागरण के गोरखपुर एडिशन से संबद्ध सिद्धार्थनगर जिले के लंबे समय तक ब्यूरो चीफ रहे वरिष्ठ पत्रकार नज़ीर मलिक ने भड़ास संपादक यशवंत से एक विशेष बातचीत में इस किताब के अलावा अपने करियर और जीवन में आए ढेर सारे उतार-चढ़ावों को लेकर विस्तार से बात की.

दैनिक जागरण ने करीब साढ़े तीन दशक के सेवा के बाद नज़ीर साहब से किस किस्म का सुलूक किया, इसका खुलासा भी उन्होंने किया. नेपाल के मामलों के विशेषज्ञ नज़ीर मलिक ने ढेर सारी बड़ी खबरें ब्रेक कर चुके हैं और उनकी खबरें पूरे देश में दैनिक जागरण की पहले पन्ने पर लीड बनी हैं. माया मैग्जीन से करियर की शुरुआत करने वाले नज़ीर मलिक से पूरी बातचीत को आप नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करके देख-सुन सकते हैं :  

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मोदी जी का इंटरव्यू और जी न्यूज के सामने पकौड़े वाला….

Nitin Thakur : सुधीर सर ने जो इंटरव्यू लिया उसे जर्नलिज़्म के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाए. छात्रों को वो हुनर सिखाया जाए कि एकतरफा संवाद करनेवाले नेता के भाषण के बीच में सवालनुमा टिप्पणी कुशलतापूर्वक घुसाकर कैसे इंटरव्यू होने का भ्रम पैदा किया जाता है. मोदी जी ने बाकायदा समझाया कि कैसे ज़ी न्यूज़ के बाहर पकौड़े तलनेवाले को 200 रुपए रोज़ाना का रोज़गार मोदीकाल में मिला है।

उन्होंने कायदे से ये भी बताकर कि ऐसे रोज़गार सरकारी आंकड़ो में नहीं आ पाते आगे तक की शंकाओं का समाधान कर दिया। अब कोई उनसे आंकड़े लेकर सवाल ना करे क्योंकि ये सब आंकड़ों में तो होता नहीं। सबसे अद्भुत तो वो दृश्य था जब मोदी जी इस अनर्थशास्त्र की आखिरी लाइन बोल रहे थे तो एंकर महोदय ने पूरी श्रद्धा से उनकी वो लाइन अपने शब्दों से पूरी की। आह… खेल लो बैडमिंटन.. जितनी देर खेलना चाहते हो.. लोग लंबे वक्त तक एक ही आदमी से मूर्ख नहीं बनते रह सकते। जिस दिन कुएं में डाली गई तुम्हारी अफीम का नशा टूटा ये ही तुम्हें दौड़ाएंगे.. फिर तुम पकौड़े तलना.. जैसे इतिहास के कई नायकों ने बाद में तले।

वैसे, टेक्निकली देखा जाए तो ज़ी के सामने कोई पकौड़े वाला नहीं खड़ा है. हर जगह सिर्फ अवैध अतिक्रमण किए ज़ी वालों की कारें पार्क रहती हैं. अगर कहीं कोई पकौड़े वाला है तो वो “आज तक” के सामने और “दैनिक भास्कर” के बगल में है. मोदी जी जब मिसाल दे रहे थे तो एंकर को उन्हें बताना चाहिए था कि सर हम तो किसी ठेलेवाले को खड़ा ही नहीं होने देते. यूं मोदी जी को एक दौरा फिल्मसिटी का भी करना चाहिए. उनके ढेरों छिपे-खुले प्रशंसक बड़ी मेहनत से चैनलों की नौकरी करते हुए बीजेपी की बेगार करते हैं. अब ये भी क्या बात हुई कि वो इंटरव्यू के लिए भी जाएं तो निर्जन में बसे इंडिया टीवी जाएं. हमारे यहां आएं.. दो सौ रुपए रोज़ की कमाई वाले पकौड़े वाले से लाकर पकौड़े मैं खिलाऊंगा.. चाय वो झा जी की पियेंगे या चंदू की वो तो उन्हें ही बताना पड़ेगा.

Anand Sharma : पकोड़ा जलेबी बेचने वाले हल्दीराम हैं। पैन कांटिनेंट ब्रांड। आप जैसे डिग्रीधारियों की फौज रोज़ सुबह लाला का चरणामृत करती है। बुरा न मानना पर उद्यमिता से आप का दूर दूर तक वास्ता नही क्यों कि उसमें लगता है जिगर जिसको आपने अपनी तनखा के लिए गिरवी रख दिया है। जिगर वाले रामदेव, गोपालजी मिल्क, सलोनी मस्टर्ड आयल, पारस मिल्क, घासीटाराम कराची हलवाई, MDH और शक्ति मसाला होते हैं, किसी प्लांट के सुपरवाइजर नहीं।

Sheetal P Singh : महान मोदी जी ने करीब पौने चार साल बिताने के बाद पहली बार एक तिहाड़ी पत्रकार को आमने सामने से उपकृत किया। वैसे मंच से तो वे रोज भाषण ठेले रहते हैं पर किसी असली पत्रकार से आमना सामना करने का साहस उनमें नहीं दिखता। कांग्रेस के राहुल गांधी ने इधर कुछ इम्प्रूव किया है वरना तो वे भी प्रायोजित प्रेस का ही सामना करते थे।

Rakesh Kayasth : किस्सा पुराना हो चुका है, लेकिन सुधीर चौधरी को प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करता हुआ देखकर दोबारा याद आ गया। जयललिता जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं, तब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए एक डिबेट कंपीटशन हुआ था। विषय था– अम्मा ज्यादा hardworking हैं या फिर ज्यादा efficent. पक्ष और विपक्ष में जोरदार दलीले पेश की गईं। विजेता वह सरकारी कर्मचारी बना जिसने धारदार तर्कों के आधार पर साबित कर दिया कि अम्मा दोनो हैं।

Rajeev Ranjan Jha : संघ-भाजपा से ‘जुड़े’ पत्रकार जब तक वाम-कांग्रेस के अनुकूल सवाल पूछते हैं, तब तक ही वे खरे व सच्चे होते हैं। दूसरा कोई भी सवाल पूछते ही वापस संघी-भाजपाई हो जाते हैं। दूसरी ओर वाम-कांग्रेस के पत्रकार स्वाभाविक रूप से ही खरे व सच्चे होते हैं और कभी भी गलत सवाल नहीं पूछते हैं। वाम-कांग्रेस के पत्रकार कभी पक्षपात नहीं करते, क्योंकि पक्ष एकमात्र उन्हीं का है, दूसरों का कोई पक्ष नहीं होता। दूसरों का जो होता है, वह केवल गलत होता है। वाम-कांग्रेस की बातों को काटने वाला हमेशा अलोकतांत्रिक, फासीवादी, सांप्रदायिक, कट्टर, मनुवादी, ब्राह्मणवादी, प्रतिक्रियावादी होता है। और हाँ, कम समझ रखने वाला मूर्ख भी…

सौजन्य : फेसबुक

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प्रणय राय की काली कमाई की पोल खोल दी इस IRS अधिकारी ने, देखें वीडियो

प्रणय राय अपना अफ्रीका वाला फार्म हाउस गिरवी रख देते तो सैकड़ों कर्मचारियों की नौकरी बच जाती… 

Yashwant Singh :  आपको मालूम है, प्रणय राय ने काली कमाई से अफ्रीका में सैकड़ों एकड़ का फार्म हाउस खरीद रखा है जिसमें ऐय्याशी के सारे साजो-सामान उपलब्ध है. प्रणय राय ने गोवा में समुद्र किनारे बंगला खरीद रखा है. दिल्ली और देहरादून में बंगले खरीद रखे हैं. एक हेलीकाप्टर भी खरीदा हुआ है. अगर वो सिर्फ अफ्रीका का अपना सैकड़ों एकड़ वाला रैंच या गोवा का सी-बीच वाला बंगला गिरवी रख दें तो सैकड़ों करोड़ रुपया मिल जाएगा. इस पैसे से वह एनडीटीवी की माली हालत ठीक कर सकते थे. सैकड़ों कर्मियों का ‘कत्ल’ करने से बच सकते थे.

लेकिन जिस शख्स का इरादा सिर्फ अपना फायदा देखना हो, वह अपने कर्मियों का हित क्यों देखेगा. सरोकारी पत्रकारिता का दावा करने वालों की कलई एक आईआरएस अधिकारी ने खोली. ये वही अधिकारी हैं जिन्हें मीडियाा हाउस और सत्ता ने मिलकर पागलखाने भिजवा दिया था, क्योंकि इनने एनडीटीवी के घपले-घोटाले-काली कमाई के सारे दस्तावेज एकत्र कर लिए थे. कल उनसे मैंने विस्तार से बातचीत की. इंटरव्यू का पहला पार्ट आज रिलीज कर रहा हूं. दूसरे और तीसरे पार्ट को क्रमश: कल परसों अपलोड किया जाएगा. आप ध्यान से पूरे वीडियो को देखें-सुनें. वीडियो ये रहा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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युवा अखबार मालिक अभिजय चोपड़ा शतरंज के जरिए पंजाबी युवाओं में फैली नशे की लत को देंगे मात

दिमाग के खेल शतरंज यानि चेस में अब उत्तर भारत, खासतौर पर पंजाब के कई खिलाड़ी अपनी धाक जमाने लगे हैं। पंजाब में चेस के इस बढ़ते कल्चर का श्रेय ‘पंजाब केसरी’ के डायरैक्टर अभिजय चोपड़ा को जाता है जिन्होंने जालन्धर में पंजाब केसरी सेंटर ऑफ चेस एक्सीलैंस शुरू किया है। इस मंच के तहत जालन्धर में चेस प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है जिसमें बड़ी संख्या में बच्चे भाग लेकर चेस की बारीकियां सीख रहे हैं और अपने आपको बड़े टूर्नामैंट के लिए तैयार कर रहे हैं। भड़ास ने अभिजय चोपड़ा के साथ जालन्धर में विशेष बातचीत की। पेश है अभिजय चोपड़ा से बातचीत का एक अंश :

प्रश्र : चेस प्रतियोगिता के आयोजन के पीछे सोच क्या है?
उत्तर : पंजाब इस समय नशे की समस्या से जूझ रहा है। युवा पीढ़ी नशे में डूब रही है जिस कारण देश का नुकसान हो रहा है। हालांकि इसकी रोकथाम के लिए प्रयास हो रहे हैं लेकिन ये प्रयास सही दिशा में न होने के कारण उनके नतीजे नहीं मिल पा रहे। इस बीच मैंने सोचा कि मैं इस बीमारी से युवाओं को दूर रखने के लिए किस तरह का योगदान दे सकता हूं तो मेरे दिमाग में सबसे पहला रास्ता युवाओं को खेलों से जोडऩे का ही आया। पंजाब में युवा स्कूल से छुट्टी होने के बाद गाड़ी उठा कर गेड़ी मारने निकल जाते हैं। यदि उससे मन भर जाता है तो शराब या बीयर का सहारा लेते हैं लेकिन कुछ समय से युवाओं का रुझान शराब के अलावा चरस, अफीम और हैरोइन जैसे नशे की तरफ बढ़ गया था। युवा ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास वक्त है और जिंदगी में उन्होंने अपने लक्ष्य निर्धारित नहीं किए हैं। मेरी सोच है कि युवा यदि अपने लक्ष्य निर्धारित करेंगे तो वे उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मेहनत करेंगे जिससे वे नशे से दूर रहेंगे। मुझे बाकी खेलों में इस तरह का फोकस नजर नहीं आता है। मैं इसका एक उदाहरण भी देना चाहूंगा। जालन्धर में चेस एसोसिएशन चेस प्रतियोगिताओं का आयोजन करती है और ‘पंजाब केसरी’ इन प्रतियोगिताओं में प्रायोजक की भूमिका में रहता है। मेरे पिता श्री अविनाश चोपड़ा जी ने एक बार मुझे ऐसी प्रतियोगिता में जाने को कहा तो मैंने देखा कि राऊंड खत्म होने के बाद खाली समय में भी बच्चे अपने चेस मैप खोल कर अभ्यास कर रहे थे। यह बात मेरे दिमाग में बैठ गई। फिर मैंने जालन्धर के जूनियर चैस खिलाड़ी दुष्यंत से बात की। वह इस समय ग्रैंडमास्टर बन चुका है। दुष्यंत उस वक्त लास वेगास में चेस खेल कर आया था। मैंने उससे पूछा कि उसने वेगास में क्या कैसीनो, ट्वाय शॉप या बड़े-बड़े होटल देखे तो दुष्यंत का जवाब था कि मैं वहां चैस खेलने गया था और मेरा पूरा ध्यान खेल में था। होटल में अपने कमरे में भी चेस का ही अभ्यास कर रहा था क्योंकि मुझे जीतना था। ये दोनों बातें मेरे दिमाग में बैठ गईं और मुझे लगा कि पंजाब के युवाओं को लक्ष्य देना पड़ेगा और यह लक्ष्य सिर्फ चेस से दिया जा सकता है।

प्रश्र: शतरंज में आपको निजी तौर पर क्या पसंद है?
उत्तर : शतरंज एक खूबसूरत खेल है और इस खेल में आप 15 मिनट में ही जीत का मजा व संतुष्टि हासिल कर सकते हैं। मैं अखबार से जुड़ा हुआ हूं और हमारे प्रोफेशन में सही या गलत का निर्णय अगले दिन का अखबार देख कर होता है लेकिन चेस के खेल में आप 15 मिनट में सही या गलत का नतीजा पा सकते हैं। मैं यहां एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। मैं ट्रेन में अपने दोस्तों के साथ यात्रा कर रहा था और मैंने अपने एक दोस्त तजिन्द्र बेदी को यात्रा के दौरान चेस खेलते समय 2 घोड़ों के साथ मात दे दी। इस बीच हमारे एक तीसरे दोस्त हेमकंवल ने इस गेम पर टिप्पणी करते हुए फेसबुक पर लिखा-‘बेदी दी हार दो घोड़ेयां दी मार’। जब हम तीनों दोस्त इकट्ठे होते हैं तो यह घटना हम आज भी याद करते हैं।

प्रश्र : चेस में प्यादा बढ़ते-बढ़ते रानी जितनी ताकत पा लेता है। क्या असल में भी जीवन आपको ऐसा ही लगता है?
उत्तर : बिल्कुल। भारत में तो हम कर्मों के सिद्धांत को मानते हैं और भगवद् गीता में भी कर्मों का फल मिलने की बात कही गई है लेकिन हम यदि दुनिया के सफल लोगों की बात करें तो वे भी धीरे-धीरे ही ताकतवर हुए। मशहूर पेंटर बिनसन वैंगो ने 18 साल की उम्र में पेंटिंग बनाना सीखा और 32 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई लेकिन उन्होंने अपने जीवन की बेहतरीन पेंटिंग्स 30 साल की उम्र के बाद बनाई। इसी तरह दुनिया की मशहूर फूडचेन मैकडोनल्ड के मालिक ने यह कंपनी रिटायरमेंट के बाद शुरू की थी और बाद में यह दुनिया की सफल कंपनियों में से एक बनी।

प्रश्र : मीडिया में चेस के खेल को जगह नहीं मिलती लेकिन ‘पंजाब केसरी’ में चेस को प्रमुखता से कवर करने के पीछे क्या सोच है?
उत्तर : मैं बाकी अखबारों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा क्योंकि वे भी हमारी इंडस्ट्री का हिस्सा हैं लेकिन जिस तरह से टेलीविजन में सारा खेल टी.आर.पी. यानी कि टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट का होता है और टी.आर.पी. हासिल करने के लिए ही खबरें चलाई जाती हैं उसी तरह अखबार में वही छपता है जिससे पाठकों की संख्या बढ़े लेकिन पंजाब केसरी समूह की शुरू से ही यह परंपरा रही है कि हम खबरों के मामले में सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। मेरे परदादा शहीद लाला जगत नारायण, मेरे दादा जी श्री विजय चोपड़ा और पिता श्री अविनाश चोपड़ा के बाद मुझ पर भी समाज के लिए कुछ करने की जिम्मेदारी है तथा मैं उन्हीं के सिद्धांतों पर चल कर वह काम कर रहा हूं जिससे समाज का भला हो और समाज में बदलाव हो। समाज में इस बदलाव के लिए अखबार की बड़ी भूमिका होती है। जब हम अखबार में लिखते हैं कि प्रागनंदा जैसे छोटे खिलाड़ी दुनिया भर में चेस के माध्यम से देश का नाम रोशन कर रहे हैं तो अभिभावकों को भी लगता है कि उनके बच्चे भी ऐसा कर सकते हैं।

प्रश्र : ‘पंजाब केसरी’ के टूर्नामेंट से सीखने वाले जालन्धर के जूनियर खिलाड़ी विदित जैन ने टॉप रेटिड खिलाड़ी को हराया तो कैसा लगा?
उत्तर : विदित की सफलता ने मुझे भावुक कर दिया। यह विदित की जीत नहीं थी, यह मेरी खुद की जीत थी और इस जीत से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है। लोगों में यह धारणा है कि मैं अमीर परिवार में पैदा हुआ हूं और हमें सब कुछ विरासत में मिला है लेकिन जब विदित जीत कर आया तो मुझे लगा कि मेरे द्वारा शुरू किए गए इस छोटे से प्रयास से बच्चे आगे बढ़ रहे हैं। यह मेरे लिए परम संतुष्टि की बात थी। मैं चाहता हूं कि देश से सैकड़ों बच्चे ग्रैंडमास्टर बनें और देश चेस की दुनिया में सुपर पावर बन कर उभरे।

प्रश्र : भविष्य में चेस को लेकर आपकी क्या योजनाएं हैं?
उत्तर : मैंने बचपन में डर के कारण चेस खेलना छोड़ा था लेकिन अब मैं वह डर बच्चों के मन से खत्म करना चाहता हूं। यह डर तभी खत्म होगा जब बच्चे ज्यादा से ज्यादा प्रतियोगिताएं खेलेंगे। ऐसा करके उनमें आत्मविश्वास आएगा। सवाल यह नहीं है कि हम रेटिंग टूर्नामैंट करवाते हैं या नहीं क्योंकि मैं ये सब पब्लिसिटी के लिए कर रहा हूं। मैं यह चाहता हूं कि मेरे शहर, मेरे राज्य और मेरे देश के बच्चे चेस में आगे बढ़ें और ‘पंजाब केसरी’ की यह प्रतियोगिता उनके लिए अभ्यास का एक मंच बने।

प्रश्र : प्रतियोगिता के लिए कोई भी एंट्री फीस न लेने के पीछे क्या सोच है?
उत्तर : इसका सारा श्रेय मेरे पिता श्री अविनाश चोपड़ा जी को जाता है। उन्होंने मुझे कहा कि बेटा किसी भी खिलाड़ी से एक रुपया भी चार्ज नहीं करना है। हम समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं और इसके लिए हमने उन बच्चों से कुछ नहीं लेना जिनमें आगे चल कर देश के लिए खेलने की संभावना है तो मैं कुछ बोल नहीं पाया। अखबार के जरिए यदि मैं समाज में सुधार कर सकता हूं तो मैं यह क्यों न करूं?

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जंगल से आदिवासियों को बेदखल कर कारपोरेट को बसाने का अभियान मोदी सरकार ‘नक्सल सफाया’ के नाम पर चला रही है : वरवर राव

1940 में आंध्र-प्रदेश के वारंगल में जन्मे वरवर राव ने कोई 40 सालों तक कॉलेजों में तेलुगू साहित्य पढ़ाया है और लगभग इतने ही सालों से वे भारत के सशस्त्र माओवादी आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं। वैसे वरवर राव को भारतीय माओवादियों के संघर्ष का प्रवक्ता माना जाता है, सरकारी दावे के अनुसार वे सशस्त्र माओवादियों के नीतिकार भी हैं, परंतु वरवर राव अपने को क्रांतिकारी कवि कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। सत्ता के खिलाफ लिखने-पढ़ने, संगठन बनाने और पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित करने वाले वरवर राव टाडा समेत देशद्रोह के आरोप में लगभग 10 वर्षों तक जेल में रहे हैं और अभी लगभग 50 मामलों पर विभिन्न कोर्टों में सुनवाई चल रही है तो कुछ मामलों पर जमानत पर हैं।

2001-02 में तेलुगू देशम और 2004 में कांग्रेस पार्टी ने जब माओवादियों से शांति वार्ता की पेशकश की तो वरवर राव को मध्यस्थ बनाया गया था। नक्सलबाड़ी आंदोलन की 50वीं वर्षगांठ पर झारखंड के गिरिडीह में आयोजित समारोह में शिरकत करने आए क्रान्तिकारी कवि, लेखक, पूर्व शिक्षक, क्रान्तिकारी लेखक संघ के संस्थापक एवं आरडीएफ के अध्यक्ष 76 वर्षीय कामरेड वरवर राव का विशद कुमार से एक बातचीत :—

विशद कुमार:— नक्सलबाड़ी आंदोलन के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, आप इसे कैसे देखते हैं?

वरवर राव:— दुनिया के आंदोलनों के इतिहास में नक्सलबाड़ी आंदोलन का इतिहास सबसे लंबा रहा है। भारत में तेलंगाना का आंदोलन भी 1946 से 1951 तक मात्र पांच साल ही टिक पाया था। जिसका कारण यह था कि वह मात्र दो जिलों तक ही सिमट कर रह गया था। जबकि नक्सलबाड़ी आंदोलन आज लगभग पूरे देश में अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुका है, आपने देखा होगा पूरे देश में विभिन्न संगठनों द्वारा इसका 50वां वर्षगाठ मनाया जा रहा है।

विशद कुमार:— आपको लगता है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन का रास्ता सही है?

वरवर राव:— एकदम सही है, जनता का शासन स्थापित करने बस यही एक रास्ता है और यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक जनता का शासन पूरे देश पर कायम नहीं हो जाता। हम सरकार बनाने का सपना नहीं देख रहे हैं बल्कि आदिवासी, दलित, शोषित, पीड़ित एवं छोटे मझोले किसानों के हक अधिकार के लिए आंदोलित हैं।

विशद कुमार:— इस आंदोलन की अब तक की सफलता क्या है?

वरवर राव :— ग्राम राज्य की सरकार का हमने सारंडा, जंगल महल, नार्थ तेलंगाना और ओडीसा के नारायण पटना में गठन कर दिया है। दण्डकारण्य में जनताना सरकार पिछले 12 वर्षों से काम कर रही है। जहां एक करोड़ लोग रह रहे हैं। जिनके समर्थन से पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बना है। जनताना सरकार आदिवासियों, दलितों, छोटे व मझोले किसानों का मोर्चा है और इस सरकार ने वहां बसने वाले सभी परिवारों को बराबर-बराबर जमीन बांट दी है। जिसका नतीजा यह है कि जो आदिवासी पहले केवल प्रकृति पर निर्भर था, कभी खेती के बारे जानता तक नहीं था, वह अब तरह-तरह की सब्जियां व अनाज की उपज कर रहा है। इन किसानों द्वारा मोबाइल स्कूल, मोबाइल हॉस्पिटल चलाया जा रहा है। जनताना सरकार की क्रांतिकारी महिला संगठन में एक लाख से अधिक सदस्य हैं, सांस्कृतिक टीम चेतना नाट्य मंच में 10 हजार सदस्य हैं, जो एक मिसाल है, क्योंकि किसी भी बाहरी महिला संगठन एवं सांस्कृतिक टीम में इतनी बड़ी संख्या में सदस्य नहीं हैं। वहां अंग्रेजों से लड़ने वाले क्रांतिकारी गुण्डादर के नाम पर पीपुल्स मिलिशिया (जन सेना) है। जनताना सरकार माओत्से तुंग के तीन मैजिक वीपन्स — पार्टी, यूनाइटेड फ्रंट और सेना की तर्ज पर चल रही है। अत: माओवादी आंदोलन ही क्रांति ला सकता है।

विशद कुमार:— इस आन्दोलन ​में आपका वाम जनवादी भागीदारी पर भी कोई स्टैड है?

वरवर राव :— माओवादी आंदोलन के साथ वाम जनवादी भागीदारी में वे लोग आ सकते हैं जो सत्ता से दूर हैं, उनके साथ हम फ्रंट बना सकते हैं। जैसे हमने आंध्रा व तेलंगाना में तेलंगाना डेमोक्रेटिक फोरम में सीपीआई, सीपीएम, एमएल के अलग अलग ग्रुप सहित आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक, छात्र आदि के 10 संगठन शामिल किया है।

विशद कुमार:— चीन की कम्युनिस्ट सरकार पर आपका नजरिया?

वरवर राव :— दुनिया में कहीं भी समाजवाद नहीं है। रूस व चीन साम्राज्यवादी देश बन गए हैं, नेपाल से आशा थी वह भी समाप्त हो गया है, वह भी भारत का उपनिवेश बन गया है। भारत का अमेरिका के साथ गठबंधन यहां के आदिवासियों व दलितों के लिए काफी खतरनाक है। अमेरिका की नजर हमारे जंगल, पहाड़ व जमीन पर है, जहां काफी प्राकृतिक संपदाएं हैं। जिसे लूटने की तैयारी में अमेरिका मोदी सरकार को हथियार और जहाज दे रहा है जिससे आसमान से जंगलों को निशाना बनाकर वहां से आदिवासियों को भगाया जा सके और उस पर कब्जा करके मल्टीनेशनल और कारपोरेट कंपनियों को दिया जा सके। जंगल से आदिवासियों को बेदखल करने का अभियान मोदी सरकार नक्सल सफाया के नाम पर चला रही है। मेरा मानना है कि देश को नवजनवाद की जरूरत है, ऐसी स्थिति में नवजनवाद केवल नक्सल आंदोलन से ही आ सकता है, जो सशस्त्र संघर्ष से ही संभव है।

विशद कुमार:— हाल में यूपी में आक्सीजन के अभाव में 72 बच्चे मर गए, आपकी प्रतिक्रिया?

वरवर राव :— आजादी के 71 वर्षों बाद भी जिस देश में बच्चों के लिये आक्सीजन नहीं हो जो प्राकृतिक है। मॉ के पेट में बच्चों का पूर्ण विकास होता है और उनके विकास के लिये सारी मौलिक चीजें मॉ के पेट में मिलती हैं। जबकि बाहर आने पर आक्सीजन के बिना वे मरे जा रहे हैं, यह कितना शर्मनाक है अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। अजीब कॉम्बिनेशन है कि आजादी के 71 साल 72 बच्चों की मौत और झारखण्ड में 70 इंडस्ट्रीज को जमीन आवंटन और आनलाईन उद्घाटन करने की योजना।

विशद कुमार:— देश में उद्योग लगेगा तभी न लोगों को रोजगार मिलेगा, फिर इन कंपनियों से परहेज क्यों?

वरवर राव :— मल्टीनेशनल कम्पनियां या कॉरपोरेट कम्पनियां पूरी तरह हाई टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। एक प्रतिशत श्रम पर काम करवाएंगी यानी कम से कम श्रम और अधिक से अधिक मुनाफे का इनकी थ्योरी है, ऐसे में रोजगार की संभावना कहां है। अत: साफ है कि इनके आने से श्रम बेकार पड़ जायेगा और जो आदिवासी, दलित छोटे किसान अपने श्रम को कृषि में लगाकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते रहे हैं वे बेकार हो जाएंगे, भूखे मरने की नौबत आ जएगी। मतलब कि श्रमिक वर्ग की रोटी का जुगाड़ समाप्त हो जायेगा। यह कौन सा विकास है।

विशद कुमार:— मोदी सरकार को आप कैसे देखते हैं?

वरवर राव :— सब तो साफ दिख रहा है, किस तरह गौ हत्या, बीफ, देशभक्ति का नाटक करके संघ के इशारे पर लोगों को आपस में लड़वाने का काम हो रहा है। देश के टुकड़े करने की योजना पर मोदी के लोग काम कर रहे हैं और यही लोग आरोप लगा रहे हैं दूसरों पर।

विशद कुमार:— इस संसदीय व्यवस्था पर आपकी टिप्पणी?

वरवर राव :— मैं ऐसे लोकतंत्र के संसदीय रास्ते पर कतई भरोसा नहीं कर सकता जिस लोकतंत्र के संसदीय रास्ते के ही कारण 4000 लोगों की हत्या करवाने वाला मोदी आज देश का प्रधानमंत्री बना हुआ है। वहीं इतिहास गवाह है कि इन्दिरा की हत्या के बाद 3 से 4 हजार सिखों की हत्या का ईनाम राजीव गांधी को प्रधानमंत्री रूप में मिला। यह इसी लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली की देन है। फिर हम ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की संसदीय प्रणाली पर कैसे भरोसा करें?

विशद कुमार:— आप माओवाद के समर्थक हैं और माओवाद जनता के शासन की बात करता है, दूसरी तरफ बड़ी बड़ी कंपनियों से लेवी वसुलने का माओवादियों पर आरोप है, अप क्या कहेंगे?

वरवर राव :— लेवी के पैसे से संगठन चलता है। उससे हथियार खरीदे जाते हैं। आंदोलन के लिए पैसों की जरूरत होती है जो सारे संगठन करते हैं। सत्ता में बैठे लोग इसे चंदा कहते हैं। हमारे और उनमें मौलिक फर्क यह है कि वे लोग कारपोरेट की दलाली के लिये, उनकी ही सुरक्षा के लिए उनसे पैसा लेते हैं और माओवादी उनसे लेवी लेकर उनके ही खिलाफ जनता की हक की लड़ाई लड़ते हैं। हमें भगत सिंह की विरासत के रास्ते पर चलना होगा, तभी देश में जनता का शासन सम्भव है।

विशद कुमार: – मोदी सरकार कह रही है माओवादी कमजोर हुए है। आप क्या कहना चाहेंगे?

वरवर राव : – अगर ऐसा यह मान रहे हैं तो फिर वे आन्दोलनकारी जनता के बीच पारा मिलिट्री फोर्स क्यों भेज रहे हैं ? यह इस तरह के बयान देकर ऐसे क्रांतिकारी विचारों को भयभीत करके जिनसे अप्रत्यक्ष हमें समर्थन मिलता है उसे समाप्त करना चाह रहे हैं।

विशद कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

9234941942

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