तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है, हमारे पास जय शाह!

Atul Chaurasia : जिनको लगता है कि मोदीजी ने भ्रष्टाचार मुक्त, स्वच्छ सरकार दे रखी है देश को उसे अमित शाह के बेटे जय शाह का प्रकरण जानना चाहिए. साथ ही आनंदी बेन पटेल के बेटे और बेटी का भी मामला जोड़ लीजियेगा। पिछली सरकार में दामादों की चांदी थी इस बार गुजरातियों के हाथ सोना-चांदी है।

Thakur Gautam Katyayn :  तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है तो हमारे पास जय शाह है। दोनों इतने प्रतिभावान हैं कि अपने -अपने सरकार के दौरान एक -दो साल में हीं इनकी कंपनी ने कई हज़ार गुना कमाई कर ली। रॉबर्ट वाड्रा को DLF ने unsecured लोन दिया था और अमित भाई शाह जी के बेटे जय शाह को रिलायंस के करीबी सांसद परिमल नाथवानी के समधी ने 15 करोड़ का लोन दिया। दोनों उद्योगपतियों ( रॉबर्ट और जय ) को प्राकृतिक संसाधनों से बहुत प्यार है। रॉबर्ट वाड्रा जमीन के धंधे में थे और जय शाह अनाज की खरीद- बिक्री और अक्षय ऊर्जा के कारोबार में। दोनों को खुद सामने आकर सफाई देने की कोई जरूरत नहीं है , उनके बिना कहे हजारों- लाखों लोग उनके वकील और चार्टर्ड एकॉउंटेंड बन कर उन्हें सही ठहराने में जुटे मिलेंगे। (नोट- संविधान के मुताबिक जब तक दोषसिद्ध नहीं हो जाता , व्यक्ति निर्दोष माना जायेगा। उपरोक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार श्री मनीष झा जी के हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छा लगा तो साझा कर रहा हूँ।)

Mayank Saxena : भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे के पक्ष में देश का रेलमंत्री प्रेस कांफ्रेंस कर के, उनकी कम्पनी की आय और काम के तरीके के आंकड़े समझा रहा है…आपको और अच्छे दिन चाहिए तो इस बार अमित शाह को ही प्रधानमंत्री बनाने की मांग कीजिए क्योंकि दाउद तो पीएम बनने भारत आने से रहा….

Rohini Gupte : अमि‍त शाह के सुपुत्र की कारस्‍तानी देख ली ना? शि‍वराज सिंह के सुपुत्र पर भी ध्‍यान रखि‍एगा। इसी साल से पट्ठे ने भोपाल में खोमचा खोलकर ‘फूल’ बेचना शुरू कि‍या है, र्स्‍टाटअप के नाम से…

पत्रकार अतुल चौरसिया, ठाकुर गौतम कात्यायन, मयंक सक्सेना और रोहिणी गुप्ते की एफबी वॉल से.

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रिजर्व बैंक के आंकड़े दे रहे गवाही, कालाधन रखना अब ज्यादा आसान हुआ!

Anil Singh : 2000 के नोट 1000 पर भारी, कालाधन रखना आसान! आम धारणा है कि बड़े नोटों में कालाधन रखा जाता है। मोदी सरकार ने इसी तर्क के दम पर 1000 और 500 के पुराने नोट खत्म किए थे। अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा कहता है कि मार्च 2017 तक सिस्टम में 2000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा 6,57,100 करोड़ रुपए है, जबकि नोटबंदी से पहले 1000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा इससे 24,500 करोड़ रुपए कम 6,32,600 करोड़ रुपए थी।

यानि, रिजर्व बैंक ने सालाना रिपोर्ट के आंकड़े पेश किए हैं इससे साफ पता चलता है कि पहले सिस्टम में 1000 के नोट में जितना धन था, वह अब 2000 के नोट में रखे धन से 24,500 करोड़ रुपए कम है। तो, कालाधन खत्म हुआ या कालाधन रखने की सहूलियत बढ़ गई?

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नोटबंदी के ज़रिए कालेधन को खत्म करने का नहीं, बल्कि अपनों के कालेधन को सफेद करने का सरंजाम-इंतजाम किया गया था। सच एक दिन सामने आ ही जाएगा। ठीक जीएसटी लागू के 48 घंटे पहले जिन एक लाख शेल कंपनियों का रजिस्ट्रेशन खत्म किया गया है, उनके ज़रिए नोटबंदी के दौरान कई लाख करोड़ सफेद कराए गए हैं। मुश्किल यह है कि डी-रजिस्टर हो जाने के बाद इन एक लाख कंपनियों का कोई ट्रेस नहीं छोड़ा है मोदी एंड जेटली कंपनी ने। लेकिन सच एक न एक दिन सामने आ ही जाएगा। हो सकता है सुप्रीम कोर्ट के जरिए या सीएजी की किसी रिपोर्ट में।

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आईटीआर रिटर्न पर किसको उल्लू बना रहे हैं जेटली जी! वित्त मंत्री अरुण जेटली का दावा है कि नोटबंदी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि देश में वित्त वर्ष 2016-17 के लिए भरे गए इनकम टैक्स ई-रिटर्न की संख्या 25% बढ़ गई है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 के लिए कुल दाखिल आईटीआर 2.83 करोड़ रहे हैं। यह संख्या ठीक पिछले वित्त वर्ष 2015-16 के लिए 2.27 करोड़ थी। इस तरह यह 24.7% की वृद्धि है। अच्छी बात है। लेकिन गौर करने की बात है कि इससे पहले वित्त वर्ष 2014-15 के लिए यह संख्या 2.07 करोड़ थी। अगले साल 2015-16 में यह 9.7% बढ़कर 2.27 करोड़ हो गई। वहीं, पिछले साल 2013-14 से 8.7% कम (2.25 करोड़ से घटकर 2.07 करोड़) थी। आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या वित्त वर्ष 2010-11 के लिए 90.50 लाख, 2011-12 के लिए 1.64 करोड़ और 2012-13 के लिए 2.15 करोड़ रही थी। इस तरह वित्त वर्ष 2010-11 से लेकर वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या क्रमशः 82.22%, 31.10% और 4.65% बढ़ी थी। अतः जेटली महाशय! वित्त मंत्री के रूप में आप किसी कॉरपोरेट घराने की वकालत नहीं कर रहे, बल्कि देश का गुरुतर दायित्व संभाल रहे हैं। इसलिए झूठ बोलने की कला यहां काम नहीं आएगी। जवाब दीजिए कि वित्त वर्ष 2010-11 और 2011-12 में कोई नोटबंदी नहीं हुई थी, फिर भी क्यों आईटीआर भरनेवालों की संख्या 82 और 31 प्रतिशत बढ़ गई? इसलिए नो उल्लू बनाइंग…

कुल दाखिल आईटीआर रिटर्न की संख्या

वित्त वर्ष  : संख्या (लाख में) : पिछले साल से अंतर (%)

2016-17 : 283 : +24.67

2015-16 : 227 : +9.66

2014-15 : 207 : (-)8.69

2013-14 : 225 : +4.65

2012-13 : 215 : +31.10

2011-12 : 164 : +82.22

2010-11 : 90.5 : +78.39

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वित्त मंत्रालय = भारत = भारतीय नागरिक! गुरुवार को इकनॉमिस्ट इंडिया समिट में एक पत्रकार ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से पूछा कि क्या ऐसा नहीं है कि नोटबंदी वित्त मंत्रालय के लिए अच्छी थी, लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए नहीं, जिन्हें जान से लेकर नौकरी तक से हाथ घोना पड़ा और मुश्किलें झेलनी पड़ीं। इस पर जेटली का जवाब था, “मैं मानता हूं कि जो भारत के लिए अच्छा है, वही भारतीय नागरिकों के लिए अच्छा है।” धन्य हैं जेटली जी, जो आपने ज्ञान दिया कि सरकार और देश एक ही होता है। यही तर्क अंग्रेज बहादुर भी दिया करते थे। अच्छा है कि आम भारतीय अब भी सरकार को सरकार और अपने को प्रजा मानता है। वरना, जिस दिन वो इस मुल्क से सचमुच खुद को जोड़कर देखने लगेगा, उस दिन से आप जैसी सरकारों का तंबू-कनात उखड़ जाएगा, जिस तरह अंग्रेज़ों की सरकार का उखड़ा था। तब तक अंग्रेज़ों के बनाए औपनिवेशिक शासन तंत्र और कानून की सुरक्षा में बैठकर मौज करते रहिए, वित्त मंत्रालय के हित को भारत का हित बताते रहिए और विदेशी व बड़ी पूंजी का हित साधते रहिए।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार अनिल सिंह की एफबी वॉल से. अनिल सिंह अर्थकाम डाट काम नामक चर्चित आर्थिक पोर्टल के संस्थापक और संपादक भी हैं.

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न्यूज लांड्री डॉट कॉम की शर्मनाक, एकपक्षीय और निहित स्वार्थी पत्रकारिता

मधु त्रेहन नामक एक बुजुर्ग महिला जो एक जमाने में ठीकठाक पत्रकार थीं और आजतक चैनल वाले मालिकों के खानदान की हैं, कुछ बरसों से न्यूज लांड्री डाट काम नामक वेबसाइट चलाती हैं. अंग्रेजी की इस वेबसाइट में अच्छे अच्छे चमकते लोगों की अच्छी अच्छी बातें छपती रहती हैं. इस किस्म की ढेरों पीआर वेबसाइट्स अंग्रेजी में हैं जो निहित स्वार्थी पत्रकारिता के तय एजेंडे के तहत किन्हीं कंपनियों और व्यक्तियों की महिमा मंडन या गरिमा खंडन करके पैसे बनाती कमाती हैं. इनसे पत्रकारिता की उम्मीद नहीं की जाती. लेकिन मधु त्रेहन की न्यूज लांड्री डाट काम ने एक समय तक अपनी अच्छी खासी पत्रकारीय छवि बना ली थी. वह प्रतिमा अब ध्वस्त होने लगी है.

कई किस्म के संगीन विवादों से घिरे अभिसार शर्मा ने पिछले दिनों न्यूज लांड्री डाट काम पर एक आर्टकिल लिखा. इस आर्टकिल में आईआरएस अफसर एसके श्रीवास्तव समेत सीबीआई आदि को गरियाया. भड़ास के यशवंत सिंह को अबकी तिहाड़ जेल भिजवाने की धमकी दे डाली. प्रणय राय और चिदंबरम की मिलीभगत से 2जी स्कैम का पैसा मनी लांड्रिंग के जरिए विदेश भेजने के चर्चित गड़बड़-घोटाले को पकड़ने वाले आईआरएस अफसर एसके श्रीवास्तव ने जब न्यूज लांड्री डाट काम पर अभिसार शर्मा द्वारा उनके बारे में लिखे गए एकतरफा प्रलाप को पढ़ा तो तत्काल मधु त्रेहन और उनकी कंपनी के लोगों को फोन किया. उन लोगों ने एसके श्रीवास्तव का कई घंटे इंटरव्यू कराया और उसे नहीं अपलोड किया.

बाद में एसके श्रीवास्तव ने लंबा चौड़ा लिखित जवाब भेजा अभिसार शर्मा के आर्टकिल के जवाब में तो उसे भी नहीं छापा. ये कहां की पत्रकारिता है कि आप किसी के खिलाफ अनाप शनाप छापते जाओ और जब वह दूसरा पक्ष अपनी बात लिखित रूप में भेजे, इंटरव्यू दे डाले तो उसे प्रकाशित अपलोड न करो. यह भी एक किस्म का यलो जर्नलिज्म, पेड न्यूज पत्रकारिता है. सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर अभिसार शर्मा ने मधु त्रेहन और उनकी कंपनी को कितना व किस तरह से ओबलाइज कर दिया है कि ये लोग एसके श्रीवास्तव का पक्ष नहीं छाप रहे हैं?

इसी पूरे मामले में भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने एसके श्रीवास्तव से विस्तार से बात की ताकि असलियत दुनिया के सामने आए. साथ ही यह भी जानने की कोशिश की कि आखिर ये अभिसार शर्मा नामक जीव इतना बेचैन क्यो हैं और क्यों आत्मुग्धता की चरम या आत्मविक्षिप्तता के परम पर जाकर खुद को खुद के हाथों पाक-साफ घोषित कर रहा है. एसके श्रीवास्ताव ने न्यूज लांड्री और अभिसार शर्मा की जमकर धुलाई की है. देखें ये वीडियो : https://www.youtube.com/watch?v=AmmbpgiB53I

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भक्तों को मौका दिया गया है कि वे भी अपना काला धन सफेद कर लें!

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव से पहले विदेशों में रखे काले धन को मुद्दा बनाने और उसे वापस लाकर देश के हर नागरिक को 15 लाख रुपए मिलने का सपना दिखाने और फिर उसे जुमला बताकर झांसा देने वाली सरकार ने विदेशों में काले पैसे रखने वालों के लिए एक योजना पेश की है। कायदे से सरकार को इसका खूब प्रचार करना चाहिए ताकि लोग इसका भरपूर लाभ उठाएं और सरकार को टैक्स मिले। स्पष्ट कारणों से इसका वैसा प्रचार नहीं किया जा रहा है।

इस योजना के तहत विदेशों में काले धन की घोषणा करने की तारीख 30 सितंबर 2015 है। अगर आपने भी विदेश में काला धन छुपा रखा है तो जल्दी कीजिए, घोषणा करके, टैक्स देकर काले धन को सफेद बनाइए। समय रहते मौके का लाभ उठाइए। (नोट : यह विदेशों में काला धन रखने वाले देशभक्त मित्रों के लिए सूचना भर है। इसका कोई और मतलब ना लगाया जाए।) हां, खबर तो पुरानी है। पर इसका प्रचार औपचारिक तौर पर ही किया गया। असल में पहले कहा जाता था कि कांग्रेसियों का काला पैसा विदेश में है। अब भक्तों को मौका दिया गया है कि वे अपना सफेद कर लें। फिर शायद कोई कार्रवाई हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सोशल मीडिया पर खूब शेयर हो रही बाबा रामदेव और बालकृष्ण की ये तस्वीर, जानें क्यों…

 

जब तक कांग्रेस की सरकार केंद्र में थी, बाबा रामदेव रोज काला धन की हुंकार भरते थे. काला धन का हिसाब अपने भक्तों और देशवासियों को बताते थे कि अगर वो काला धन आ गया तो देश की सारी समस्याएं हल हो जाएंगी. काला धन के मुद्दे को नरेंद्र मोदी ने भी लपका और बाबा रामदेव की मुहिम को समर्थन किया. माना जाने लगा कि रामदेव और नरेंद्र मोदी की जोड़ी अगर जीतकर केंद्र में सरकार बनाने में सफल हो गई तो यह तो तय है कि देश में काला धन वापस आ जाएगा. लेकिन जोड़ी के जीतने और सरकार बनाने के बावजूद काला धन देश वापस नहीं आया.

मोदी के आदमियों ने तो अपने वोटरों को औकात बताने के लिए यहां तक कह दिया कि काला धन वाला नारा केवल नारा था यानि जुमला था, जनता को भरमाने, वोट खींचने के लिए. खैर, बेचारी जनता, वो तो अब पांच साल के लिए झेलने को मजबूर है. पर बाबा रामदेव ने गजब की चुप्पी साध रखी है. कुछ बोलते ही नहीं. काला धन को लेकर उनका अभियान भी शांत हो गया है.

इसी बीच सोशल मीडिया पर ढेर सारे लोग बाबा रामदेव से सवाल करने लगे कि आखिर वे काला धन के मसले पर केंद्र सरकार को घेरते क्यों नहीं, काला धन के लिए अब वो अभियान चलाते क्यों नहीं. वे काला धन पर अब कुछ बोलते क्यों नहीं? इसी बीच, कुछ लोगों ने बाबा रामदेव और उनके प्रधान शिष्य बालकृष्ण की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर यह कहते हुए शेयर कर दी कि देखिए, बाबा और उनके चेले काला धन खोजने में लगे हैं. इस मजेदार तस्वीर को काला धन खोज से जोड़ देने के बाद लोगों की हंसी रोके नहीं रुक रही है. जो भी इसे देख रहा है, अपने वाल पर शेयर कर रहा है.

तस्वीर में बाबा रामदेव और बालकृष्ण एक टीले नुमा पहाड़ी या पहाड़ी नुमा टीले, जो कह लीजिए, पर कुछ तलाश रहे हैं. जाहिर है, वह कोई जड़ी बूटी तलाश रहे होंगे, लेकिन काला धन तलाशने का जो जुमला सोशल मीडिया वालों ने इस तस्वीर के कैप्शन के रूप में फिट किया है, वह खूब हिट जा रहा है. लोग बाबा रामदेव से उम्मीद तो करते ही हैं कि संत होने के नाते वो अपनी चुप्पी का राज सच सच बताएंगे.

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विदेश से आनेवाले ब्लैकमनी में से मुझे भी सवा सौ करोड़ भारतीयों की तरह 15 लाख रुपये मिलने की आशा है

मेरे तमाम लेनदार कृपया तत्काल तकादा लिखित में बासबूत पेश करें.  विदेश से आनेवाले ब्लैकमनी में से मुझे भी सवा सौ करोड़ भारतीयों की तरह 15 लाख रुपये मिलने की आशा है. 15 लाख मिलते ही सबकी पाई पाई चुका देने का वादा रहा.  एक साल से 15 लाख रुपए की प्लॉनिंग कर रहा हूं। 15 लाख कहां-कहां खर्च हो सकते है, इससे किस-किस का कर्जा पटाया जा सकता है, घर में क्या सामान आ सकता है, बीवी को कितने गहने दिला सकता हूं, बच्चों को कौन-सी गाड़ी सूट करेगी, बुढ़ापे के लिए कितने पैसे बचाकर रखना मुनासिब होगा आदि-आदि में उलझा हुआ हूं। मुझ जैसे मध्यवर्गीय आदमी के लिए 15 लाख बहुत मायने रखते हैं। कभी 15 लाख रुपए इकट्ठे देखे नहीं। हां, बैंक में जरूर देखे है, लेकिन वो अपने कहां। अने १५ लाख नगद हो तो बात ही क्या। कुछ न करो 15 लाख रुए खाते में ही रखे रहने दो, तो 12 – 13  हजार रुपए के आसपास ब्याज ही आ जाएगा। एक तरह से पेंशन समझो और मूल धन तो अपना है ही। यह पंद्रह लाख रुपए तो मेरे अपने है। बीवी, बच्चों सबके अपने-अपने पंद्रह लाख होंगे पर बीवी बच्चों के पैसे पर मैं निगाह क्यों डालूं। मेरा अपना भी तो स्वाभिमान है।

लोकसभा चुनाव के पहले जब यह पता चला कि विदेश में भारत का इतना काला धन जमा है कि अगर वह भारत लाया जाए तो हर आदमी को 15 लाख रुपए मिल सकते है। मेरे घर में कुल 5 सदस्य है, तो इस हिसाब से मेरे घर के लोगों को मिलाकर 75 लाख रुपए होते है। पर मैं ठहरा लोकतांत्रिक आदमी। बीवी, बच्चों को करने दो उनका हिसाब-किताब। मैं तो अपने 15 लाख पर ही अडीग रहूंगा। न किसी को पैसा दूंगा, न किसी से पैसा लूंगा। हिसाब लगा-लगाकर कई रजिस्टर फाड़ चुका हूं। 3-4 लाख रुपए की एक कार आ जाएगी। 1 लाख रुपए से घर का सामान खरीद लूंगा। 50 हजार रुपए में अपने लिए शानदार वार्ड रोब बनवाउंगा। डिजाइनर घड़ी 20-25 हजार की। 50 हजार रुपए का शानदार मोबाइल। 1 लाख रुपए घर की रंगाई-पुताई पर खर्च। इस सब के बाद भी अच्छा खासा पैसा बचा रहेगा। बचे हुए पैसे को अगर में बैंक में रख दूं और उसके ब्याज से काम चलाऊं, तो भी ज्यादा तकलीफ नहीं होने वाली। बीवी से इन सब बातों पर चर्चा करने का कोई मतलब है नहीं क्योंकि वह ठहरी बचत की प्रवृत्ति वाली। जिंदगी जीना उसे कहां आता है? पाई-पाई का हिसाब तो पूछती रहती है। पर मैं उससे उसके पंद्रह लाख रुपए के बारे में कुछ भी नहीं पूछुंगा। लोकतंत्र है सबको अपने पैसे खर्च करने का हक है और मैं कोई इतना गयागुजरा नहीं कि दूसरे के पैसे पर नजर डालूं। इतना डरपोक भी नहीं कि अपने पैसे किसी और को उड़ाने दूं।

रजिस्टर पर रजिस्टर, डायरी पर डायरी भरी पड़ी है। कईयों को तो फाड़-फाड़कर पेंâक चुका हूं। रोज रात को सपने में 15 लाख रुपए दिखाई देते है। सुबह पंद्रह लाख रुपए की कल्पना में बीत जाती है। आते-जाते सोते-उठते गरीबी दूर होने का विचार ही जिंदगी को नई ऊर्जा से भर देता है। जिंदगी में इतनी खुशियां पहले कभी नहीं देखी। अब जाकर जीवन धन्य हुआ है। कई नासमिटे कहते है कि पंद्रह लाख तो मिलेंगे, पर उसमें से टीडीएस कट जाएगा। भई आपको इतने पैसे मिलेंगे, तो सरकार का भी हक है कि उससे इनकम टैक्स काट लें। अधिकतम इनकम टैक्स है 30 प्रतिशत। अब अगर सरकार ये मानें कि हम ३० प्रतिशत के ब्रेकेट में है, तो भी 4.50 लाख काटकर 10 लाख 50 हजार रुपए तो बनते ही है। वैसे अपन 30 प्रतिशत के ब्रेकेट में नहीं है, पर अगर सरकार चाहें तो देश के लिए साढ़े चार लाख रुपए का सहयोग करने के लिए भी तैयार है। एक जागरुक नागरिक होने के नाते हमें पता है कि हमारे पैसे से ही सरकार चलती है। मंत्रियों के हवाईजहाज हमारे टैक्स के पैसे से उड़ते है। करोड़ों के शपथ समारोह में हमारे खून-पसीने की कमाई उड़ाई जाती है। सब ठीक है। खूब घूमो हवाईजहाज में, ताजपोशी के शानदार प्रोग्राम करो, महंगी-महंगी कारों में घूमो, सेवन स्टार होटलों में ऐश करो, कोई बात नहीं। बस हमारे15 लाख रुपए हमें लौटा दो। चाहो तो उसमें से भी टैक्स काट लो।

हिसाब बनाते-बनाते काफी वक्त बीत गया है। एक सीए कह रहे है कि यह 15 लाख रुपए सरकारी खजाने में जमा हो जाएंगे। आपको एक पैसा भी मिलेगा नहीं। आपने जब कमाया ही नहीं है, तो सरकार आपको यह पंद्रह लाख रुपए क्यों दें। राहु लगे ऐसे सीए को। हमारे पैसे हमको देने में उसकी नानी मर रही है। सीए न हुआ, अरुण जेटली हो गया। हमारा पूरा पैसा ही खाने के मूड में है। पर वह खा नहीं पाएंगे। हमारी बद्दुआ लगेगी। चुनाव के पहले इतना ज्ञान देते थे कि भैया हमारा इतना पैसा विदेश के बैंकों में है कि हरेक को पंद्रह लाख रुपए मिल सकते है। 5-10 प्रतिशत कम ज्यादा कर लो, पर पैसे तो लौटाओ। भरोसा है कि अगले चुनाव तक मेरे 15 लाख रुपए का हिसाब हो जाएगा।

लेखक प्रकाश हिन्दुस्तानी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा ‘वीकेंड पोस्ट’ में प्रकाशित हो चुका है.

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आइये, काले धन को वैध बनाएं

जैसा कि सर्वविदित है भारत में काले धन को वैध बनाने की हाल की गतिविधियां राजनीतिक दलों, कॉरपोरेट कंपनियों और शेयर बाजार के माध्यम से हुई हैं। काले धन को वैध बनाने को रोकने के लिए मनी-लॉन्ड्रिंग निरोध अधिनियम  2002, 1 जुलाई 2005 को प्रभाव में आया था। धारा 12 (1) बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और बिचौलियों पर निम्नांकित दायित्व निर्धारित करता है (क) निर्देशित किये जाने वाले लेनदेनों की प्रकृति और मूल्य का विवरण देने वाले रिकॉर्डों को कायम रखना, चाहे इस तरह के लेनदेनों में एक एकल लेनदेन या एकीकृत रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए लेनदेनों की एक श्रृंखला शामिल हो और जहां लेनदेनों की ऐसी श्रृंखला एक महीने के भीतर देखी गयी हो; (ख) खंड (क) में संदर्भित लेनदेनों की जानकारी और अपने सभी ग्राहकों की पहचान के रिकॉर्ड्स निर्धारित की जाने वाली अवधि के भीतर निदेशक के समक्ष प्रस्तुत करना. धारा 12 (2) में यह प्रावधान है कि उपरोक्त उल्लिखित उप-खंड (1) में संदर्भित रिकॉर्डों को लेनदेन पूरा होने के बाद दस साल तक बनाए रखा जाना चाहिए। अधिनियम के प्रावधानों की अक्सर समीक्षा की जाती है और समय-समय पर विभिन्न संशोधन पारित किये गए हैं।

काले धन को वैध बनाना (मनी लॉन्डरिंग) अवैध रूप से प्राप्त धन के स्रोतों को छिपाने की कला है। अंततः यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा आपराधिक आय को वैध बनाकर दिखाया जाता है। इसमें शामिल धन को नशीली दवाओं की सौदेबाजी, भ्रष्टाचार, लेखांकन और अन्य प्रकार की धोखाधड़ी और कर चोरी सहित अनेक प्रकार की आपराधिक गतिविधियों के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। काले धन को वैध बनाने की प्रक्रिया अक्सर तीन चरणों में पूरी होती है: पहला, कुछ माध्यमों से वित्तीय प्रणाली में नगदी को डाला जाता है (“प्लेसमेंट”), दूसरे चरण में अवैध स्रोत के छलावरण के क्रम में जटिल वित्तीय लेनदेनों को निष्पादित करना (“लेयरिंग”) शामिल है और अंतिम चरण अवैध राशियों के लेनदेनों से उत्पन्न धन को प्राप्त करना अपरिहार्य बना देता (“इंटीग्रेशन”) है। इनमें से कुछ चरणों को परिस्थितियों के आधार पर छोड़ा जा सकता है; उदाहरण के लिए, वित्तीय प्रणाली में पहले से मौजूद गैर-नकदी आय के प्लेसमेंट की कोई आवश्यकता नहीं होगी। काले धन को वैध बनाने की प्रक्रिया कई अलग-अलग रूपों में संपन्न होती है हालांकि अधिकांश तरीकों को इनमें से कुछ प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इनमें “बैंक की विधियां, स्मर्फिंग [जिसे स्ट्रक्चरिंग के रूप में भी जाना जाता है], मुद्रा विनिमय और दोहरा-चालान बनाना” शामिल हैं। यह प्लेसमेंट की एक विधि है जिसके द्वारा नगदी को छोटी-छोटी जमा राशियों में बाँट दिया जाता है, इस विधि का प्रयोग काले धन को वैध बनाए जाने के संदेह को मात देने और काले धन को वैध बनाने के खिलाफ सूचना की आवश्यकताओं से बचने के लिए किया जाता है। इसका एक उप-घटक है नगदी की छोटी-छोटी राशियों का प्रयोग धारक के लेखपत्रों, जैसे कि मनी ऑर्डर को खरीदने में करना और उसके बाद अंततः उन्हें फिर से छोटी-छोटी राशियों में जमा करना। किसी अन्य अधिकार क्षेत्र में नगदी की प्रत्यक्ष रूप से तस्करी जहां इसे एक वित्तीय संस्थान में जमा कर दिया जाता है, जैसे कि एक ऑफशोर बैंक जहां बैंक में काफी गोपनीयता बरती जाती है या काले धन को वैध बनाने की प्रक्रिया कम जटिल होती है। ऐसा व्यवसाय जो आम तौर पर नकदी जमा प्राप्त प्राप्त करता है वह अपने खातों का इस्तेमाल वैध और आपराधिक दोनों तरह से उत्पन्न नगदी के संपूर्ण हिस्से को अपनी वैध आय बताकर जमा करने में करेगा. अक्सर, व्यापार की कोई वैध गतिविधि नहीं होगी। धन के आवागमन को छिपाने के लिए चालानों को कम या अधिक करके तैयार करना। न्यास और मोहरा कंपनियां धन के असली मालिक को छिपा देती हैं। न्यास और कॉरपोरेट साधनों को अपने अधिकार क्षेत्र के आधार पर अपने असली हितकारी, मालिक के बारे में खुलासा करने की जरूरत नहीं होती है। काले धन को वैध बनाने वाले व्यक्ति या अपराधी ख़ास तौर पर एक ऐसे अधिकार क्षेत्र में जहां काले धन को वैध बनाने वालों पर नियंत्रण की प्रणाली कमजोर होती है, किसी बैंक में एक नियंत्रक हित खरीद लेते हैं और उसके बाद बैंक के माध्यम से जांच के बिना धन का आदान-प्रदान करते हैं।

कोई व्यक्ति नगदी के साथ एक कैसीनो या एक घुड़दौड़ ट्रैक में प्रवेश करेगा और चिप्स खरीदेगा, कुछ देर के लिए खेलेगा और उसके बाद अपने चिप्स को नगदी में बदल लेगा जिसके लिए उसे एक चेक जारी किया जाएगा। उसके बाद काले धन को वैध बनाने वाला व्यक्ति चेक को उसके बैंक में जमा करने में सक्षम होगा और इसके जुए में जीती गयी राशि होने का दावा करेगा। अगर कैसीनो संगठित अपराध के नियंत्रण में है और काले धन को अवैध बनाने वाला व्यक्ति उनके लिए काम करता है तो वह व्यक्ति अवैध रूप से प्राप्त राशि को कसीने में किसी उद्देश्य के लिए छोड़ देगा और आपराधिक संगठन द्वारा उसका भुगतान अन्य निधि के जरिये किया जाएगा। रियल एस्टेट (अचल संपत्ति) को अवैध आय के जरिये खरीदा और बेचा जा सकता है। बिक्री से प्राप्त आय बाहरी लोगों के सामने वैध आय प्रतीत होता है। वैकल्पिक रूप से, संपत्ति के मूल्य में हेरफेर की जाती है; विक्रेता एक ऐसे अनुबंध पर सहमत होगा जिसमें संपत्ति के मूल्य को कम करके आंका जाता है और इस अंतर को पाटने के लिए वह आपराधिक आय प्राप्त करेगा। तकनीकी रूप से यह काले धन को वैध बनाने की प्रक्रिया बिलकुल भी नहीं है; जबकि काले धन को वैध बनाने में आम तौर पर धन के स्रोत को छिपाना शामिल होता है जो अवैध है, आतंकवादी वित्तपोषण संबंधी मामलों में स्वयं धन के गंतव्य को छिपाया जाता है जो कि अवैध है। कंपनियों के पास ऐसे अपंजीकृत कर्मचारी हो सकते हैं जिनके पास कोई लिखित अनुबंध नहीं होता है और जिन्हें नगद वेतन दिया जाता है। उन्हें भुगतान करने के लिए काली नकदी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

काले धन को वैध बनाने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं और इसका विस्तार सरल से लेकर जटिल आधुनिकतम तकनीकों के रूप में हो सकता है। कई विनियामक और सरकारी प्राधिकरण दुनिया भर में या अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के भीतर वैध बनाए गए काले धन की मात्रा के लिए हर साल अनुमान जारी करते हैं। 1996 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अनुमान लगाया था कि दुनिया भर में वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो से पाँच प्रतिशत हिस्से में काले धन को वैध बनाने का मामला शामिल था। हालांकि, काले धन को वैध बनाने की प्रक्रिया का मुकाबला करने के लिए एक अंतःसरकारी निकाय, एफएटीएफ का गठन किया गया था जिसने यह स्वीकार किया कि “कुल मिलाकर वैध बनाए गए काले धन की मात्रा का एक विश्वसनीय अनुमान प्रस्तुत करना पूरी तरह से असंभव है और इसलिए एफएटीएफ द्वारा इस संदर्भ में कोई आंकड़ा प्रकाशित नहीं किया जाता है। इसी प्रकार शैक्षिक टिप्पणीकार भी स्वीकृति के किसी भी स्तर तक इस धन की मात्रा का अनुमान लगाने में असमर्थ रहे हैं।

लेखक शैलेन्द्र चौहान जयपुर के निवासी हैं. उनसे संपर्क 07838897877 के जरिए किया जा सकता है.

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एनडीटीवी की काली कथा को ईटी में विज्ञापन के रूप में छपवाया, आप भी पढ़ें

एनडीटीवी वाले खुद को साफ पाक और दूध का धुला की तरह पेश करते हैं लेकिन इनके दामन पर भी दाग कम नहीं हैं. एनडीटीवी के एक शेयरहोल्डर ने एनडीटीवी की पूरी कहानी बाकी शेयर होल्डर्स को सुनाई है, दी इकानामिक टाइम्स में विज्ञापन छपवाकर. आइए हम आपको भी पढ़ाते हैं इकानामिक टाइम्स में प्रकाशित एनडीटीवी की काली कथा…. इसे पढ़कर आप खुद दंग हो जाएंगे कि आखिर प्रणय राय, राधिका राय सरीखे ईमानदार कहे जाने वाले मीडिया मालिकान भी इतने बड़े चोर हैं….

इस कहानी में एनडीटीवी मनी लांड्रिंग स्कैम का भी उल्लेख है. 30 अक्टूबर 2014 के दी इकानामिक टाइम्स के अंक में एनडीटीवी  के एक माइनारिटी शेयरहोल्डर ने एनडीटीवी द्वारा छिपाई गई कई बातों को उजागर कर बाकी शेयर होल्डर्स को आगाह किया है ताकि वे सारे तथ्यों के आधार पर पूरी तरह सोच समझ कर कंपनी के बारे में राय बनाएं और आगे का निर्णय लें.

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जो सौ दिन में काल धन लाने का सपना दिखा रहे थे वो बेइमानों के साथ खड़े हो गए

Sanjay Sharma : जो सौ दिन में काल धन लाने का सपना दिखा रहे थे वो बेईमानों के साथ खड़े हो गए. कह रहे थे संधि के मुताबिक सूची नहीं दी जा सकती … सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा तो नानी याद आई.. आज 627 लोगों की सूची दी.. लिफाफा बंद है तो भक्त लोग इतना खुश हो रहे हैं मानो किला ही फतह कर लिया.. बात सही भी है… लिफाफा खुल जाता तो भक्तों और उनके आकाओं को मुंह दिखने लायक कुछ भी नहीं बचता… जिन तीन नाम को बता कर सरकार बहुत खुश हो रही थी उनमें से 2 नामों का खुलासा अरविन्द केजरीवाल एक साल पहले ही कर चुके थे… वैसे मोदी सरकार की भी मज़बूरी है और अब समझ आ रहा है कि नामों का खुलासा क्यों नहीं कर रही थी सरकार… दरअसल जिन तीन नामों का पता चला उनमें एक राधा ने कांग्रेस को पैसठ लाख और बीजेपी को एक करोड़ अठारह लाख रुपया का चंदा दिया था… इन बेशर्मों को शर्म भी नहीं आती ऐसे कालाबाजारियों से पैसा लेकर जनता को मूर्ख बनाते हुए…

Meenu Jain : सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में में जो लिस्ट दाखिल की है उसे कोर्ट ने बिना खोले SIT को दे दिया है जो उस पर आगे की कार्यवाही करेगी . कल से अरुण जेटली कह रहे हैं कि उन्होंने यह लिस्ट जून माह में ही SIT को सौंप दी थी . जब SIT के पास पहले से ही यह लिस्ट थी तो फिर दोबारा वही लिस्ट सरकार से लेकर वापिस SIT को सौंपने के पीछे का तर्क क्या है , यह समझ नही आया .लगता है सरकार ने जो लिस्ट जून में SIT को दी थी उसमे ‘ गड़बड़ ‘ थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पकड़ लिया और अब पूरी और सही लिस्ट SIT को दी गई है . यह तो एक HSBC के खाताधारकों कि लिस्ट है. अन्य देशों में खातों के बारे में कोई कार्यवाही हो रही है या नहीं ?

Navin Kumar : मोदी सरकार की नीयत पर ये सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है- “अगर हमने काले धन को आपके भरोसे छोड़ दिया तो ये जिंदगी में वापस नहीं आ सकता। कल तक एक-एक खातेदार का नाम बताइए। हम अपने आदेश में एक शब्द नहीं बदलेंगे।”

संजय शर्मा, मीनू जैन और नवीन कुमार के फेसबुक वॉल से.

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