राजेश शर्मा के निधन से भड़ास ने एक सच्चा शुभचिंतक खो दिया

राजेश शर्मा चले गए. दिवाली की रात. हार्ट अटैक के कारण. उमर बस 44-45 के आसपास रही होगी. वे इंडिया न्यूज यूपी यूके रीजनल चैनल के सीईओ थे. राजेश भाई से मेरी जान पहचान करीब आठ साल पुरानी है. वो अक्सर फोन पर बातचीत में कहा करते- ”यशवंत भाई, तुम जो काम कर रहे हो न, ये तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता. मैंने मीडिया इंडस्ट्री को बहुत करीब से देखा है. यहां सब मुखौटे लगाए लोग हैं. भड़ास के जरिए तुमने आजकल की पत्रकारिता को आइना दिखाया है.”

राजेश प्रैक्टिकल आदमी थे. वह मीडिया और बाजार के रिश्तों को अच्छे से समझते थे. वह कहते भी थे- ”यार, हम लोगों को टारगेट पूरा करना होता है, रिजल्ट देना होता है. तब जाकर सेलरी मिलती है.”

मेरी पिछली बातचीत राजेश शर्मा से तब हुई जब इंडिया न्यूज के मालिक कार्तिक शर्मा ने भड़ास पर मुकदमा किया था. बहुत सारी बातें हुई थी फोन पर. राजेश ने कहा था कि यार यशवंत, बहुत दिन हुआ, बैठते हैं अपन एक दिन.

काफी पहले की बात है. राजेश तब इंडिया न्यूज में नहीं थे. नौकरी तलाश रहे थे. उनके रिक्वेस्ट पर एक बार मैं तबके अपने मित्र रहे समाचार प्लस वाले उमेश शर्मा के पास ले गया. वहां से मिलकर हम दोनों बाहर निकले. राजेश के कार में ज्यों ही बैठा, त्यों कुछ लोगों ने मेरा नाम पूछा और मुझे बाहर निकाल कर टांग लिया. वे लोग खुद को पुलिस वाले बता रहे थे. राजेश बेहद डर गए, इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से. बाद में उन्होंने बताया था- ”यशवंत, मैं यार इतना डर गया था कि गाड़ी फुल स्पीड में भगाते हुए सीधे अपने घर जाकर ही रुका.” यह राजेश की साफगोई थी, उनकी सहजता थी जो इस बात को भी सीधे-सीधे कह दिया.

बता दें कि नोएडा पुलिस की एसटीएफ द्वारा की गई उस गिरफ्तारी के बाद मुझे दो दिन नोएडा के कई थानों के हवालातों में रखा गया. फिर डासना जेल भेज दिया गया जहां 68 दिन रहने के बाद छूटा. इस जेल जीवन पर ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिखी. यह गिरफ्तारी इंडिया टीवी, दैनिक जागरण समेत कई चैनलों-अखबारों के मालिकों-मैनेजरों-संपादकों की एक बड़ी साजिश के तहत हुई थी. तात्कालिक कारण बना विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी साक्षी जोशी से मेरा पुराना झगड़ा. इन दोनों के कंधें पर बंदूक रहकर ढेर सारे मीडिया हाउसेज ने पूरी योजना बनाई कि अबकी यशवंत और भड़ास को नेस्तनाबूत कर देना है. इस साजिश में मीडिया मालिकों ने यूपी की तत्कालीन नई-नई आई अखिलेश सरकार के बड़े अफसरों और मुलायम घराने के कुछ बड़े नेताओं को भी शामिल कर लिया था, गलत तथ्य और गलत जानकारियां देकर.

खैर, बात हम लोग कर रहे थे राजेश शर्मा की.

भड़ास पर जब जब आर्थिक मदद के लिए अपील की गई, राजेश भाई ने हर बार चुपचाप पांच हजार या दस हजार रुपये भड़ास के एकाउंट में डालने के बाद फोन पर कहते- ”यशवंत यार इस मदद के बारे में किसी से न जिक्र करना और न कुछ लिखना.”

राजेश प्रबंधन के हिस्से हुआ करते थे, इसलिए जानते थे कि भड़ास से खुलेआम संबंध शो करना करियर के लिए अच्छा नहीं. वो इसका जिक्र फोन पर मजाक में किया करते थे और चुटकी लेते हुए कहते थे- ”भड़ास से दोस्ती और दुश्मनी दोनों करियर के लिए बुरी है…” यह कहते हुए वह ठठा कर हंसते थे…

जिंदादिल राजेश से एक दफे लखनऊ के एक होटल में मुलाकात हो गई, अचानक. राजेश अपने आफिसियल टूर पर लखनऊ गए थे और होटल में रुके हुए थे. मैं एक प्रोग्राम में शिरकत करने होटल में गया हुआ था. हम दोनों होटल के रेस्टोरेंट में अचानक टकरा गए. निगाह मिलते ही राजेश भाई एकदम से खड़े हुए और दोनों हाथ फैलाकर मुस्कराते हुए आगे बढ़े, मैं भी उनकी ओर मुखातिब हुआ. उन्होंने गले लगाया और पीठ थपथपाते हुए कई बार कहा- ”मेरे भाई, मेरे भाई… जमाने बाद मिले हम लोग.” फिर देर तक बात हुई, हंसी-मजाक चला.


मूल खबर :


राजेश को लेकर बहुत सारी बातें हैं, यादें हैं. क्या-क्या कहा जाए. एक इतने जीवंत, सहज, सरल, जिंदादिल और भावुक आदमी का इतना जल्द चले जाना किसी को भी हजम नहीं हो रहा. पर मौत एक कड़वी सच्चाई है जिसे मन मसोस कर कुबूल करना पड़ता है, हजम करना पड़ता है. राजेश का शरीर भले ही आग के हवाले होकर राख में तब्दील हो चुका है लेकिन उनकी यादें हम जैसों के दिलों में हमेशा बनी रहेंगी, जीवंत रहेंगी…

राजेश मेरे अच्छे शुभचिंतकों में से थे लेकिन हम दोनों फेसबुक पर फ्रेंड नहीं थे. राजेश रिश्तों की शो-बाजी पसंद नहीं करते थे. और, शायद भड़ास वाला यशवंत होने के कारण मेरे साथ रिलेशन को पब्लिक डोमेन में चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि यह उनके करियर की भी मजबूरी थी. राजेश के मन-दिल को मैं समझता था इसलिए उनकी भावनाओं, उनकी मजबूरियों को भी महसूस करता था. सो, हम लोग फेसबुक पर भले फ्रेंड न रहे हों, लेकिन दिल के स्तर पर बेहद करीबी नाता था…

दोस्त, जिस भी दुनिया में गए हो, ऐसे ही हंसते मुस्कराते इठलाते जीना.. तुम्हारे जाने से मीडिया की दुनिया एक शानदार शख्सियत से महरूम हो गई है… खासकर मैंने अपना एक सच्चा शुभचिंतक / साथी खो दिया है जो हमेशा पूछा करता था- ”यशवंत, कोई दिक्कत हो तो बताना…” ये पूछना ही मेरे लिए काफी था क्योंकि आजकल की मायावी दुनिया में कौन किसकी चिंता करता है…

राजेश भाई, आप कहा करते थे, साथ क्या जाएगा, सब यहीं रह जाएगा, इसलिए किसके खातिर बेइमानी करना. आपके भीतर एक उदात्त किस्म का इंसान था जो सब कुछ, हर ओर-छोर महसूस करता था और सबकी सीमाओं-दायरों को समझा करता था. राजेश अपनी व्यस्त लाइफ, आफिसियल टूर आदि को लेकर कई बार चिंतित होते थे. कहते- यार सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती. एक जगह से टूर निपटा कर लौटे तो दूसरा टूर तैयार रहता है.

राजेश भाई, आपने देख लिया न करियर की आपाधापी का नतीजा. इस तनाव और भागदौड़ से निजात पाने के लिए एल्कोहल का सहारा लेते हैं. योगा कसरत के लिए समय निकाल नहीं पाते. नतीजा, शरीर और नसें दिन प्रतिदिन शिथिल होती जातीं. कई किस्म के लेयर्स नसों के भीतर चढ़ते भरते चले जाते हैं… एक दिन नतीजा आता है हार्ट अटैक के रूप में… उम्मीद करते हैं आपके असमय चले जाने से मीडिया के कुछ ऐसे साथी सबक लेंगे जो आपकी ही तरह की व्यस्ततम लाइफस्टाइल जीते हैं. मुझे याद आता है राजेश भाई आपके घर पर घंटों बैठकर बतियाना. तब मैं दिल्ली के बाबा नीम करोली आश्रम गया था और बगल में ही छतरपुर में आपका घर था. मैंने फोन लगाया और आपने फौरन घर पर बुला लिया. वह केयर, प्यार और सम्मान सब याद आ रहा.

लव यू राजेश भाई, सैल्यूट यू राजेश भाई…

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक हैं. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

भड़ास पर राजेश शर्मा को लेकर छपी पिछली खबर ये है…

इस खबर में राजेश शर्मा की तस्वीर है, दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ…

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यह संजय, शराब और शेरो शायरी का दौर था…. कह सकते हैं डिप्रेसन की इंतिहा थी…

स्वर्गीय संजय त्रिपाठी


होते हैं कुछ लोग जो सिर्फ़ संघर्ष के लिए ही पैदा होते हैं। हमारे छोटे भाई और फ़ोटोग्राफ़र मित्र संजय त्रिपाठी ऐसे ही लोगों में शुमार रहे हैं। आज जब संजय त्रिपाठी के विदा हो जाने की ख़बर सुनी तो दिल धक से रह गया। फ़रवरी, 1985 से हमारा उन का साथ था। 32 साल पुराना साथ आज सहसा टूट गया। लखनऊ में वह पहले मेरे ऐसे दोस्त बने जिन से आत्मीयता बनी। दुःख सुख का साथ बना। बिना किसी टकराव और अलगाव के कायम रहा। बिना कुछ कहे-सुने भी हम एक दूसरे को समझ लेते थे। साथ खबरें करते थे, घूमते थे, सिनेमा देखते थे। खुद्दारी रास आई सो दलाली, फोर्जरी, चापलूसी, चमचई न मुझे कभी भाई न संजय को जबकि पत्रकारिता में यह आम बात हो चली है। बिना इस के अब गुज़ारा नहीं है।

जो जितना बड़ा दलाल, उतना बड़ा पत्रकार। हम यह नहीं कर सके सो हम ने तो इस की भारी क़ीमत चुकाई है, चुका रहा हूं। कहां होना था और आज कहीं का नहीं रह गया हूं। एक से एक कौवे दलाली, चापलूसी कर के भाग्य विधाता बन गए और हम इन कौवों की बीट देखते-देखते खत्म हो गए। संजय त्रिपाठी भी इस मामले मेरे हमराही थे। वह इस बेरंग जिंदगी को विदा कह गए, मैं जाने क्यों शेष रह गया हूं। वह कोई तीन साल मुझ से छोटे थे। जब मेरे घर आते तो मेरे पैर छूते मेरे बड़े होने के नाते। बाद में मैं ने बहुत मना किया कि हम दोस्त हैं तो वह किसी तरह माने।

जनसत्ता, दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ में जब मैं रिपोर्टर हो कर आया था तब संजय वहां पहले ही से फ़ोटोग्राफ़र थे। हम भी तब मुटाए नहीं थे लेकिन संजय त्रिपाठी ख़ूब दुबले-पतले थे। सींक सलाई जैसे। उन के चेहरे पर मासूमियत कुलांचे मारती थी, उत्साह जैसे हिलोरें मारता था। संकोच की चादर जैसे उन के पूरी देह पर लिपटी रहती थी। खुद्दारी की खनक उन के हर भाव से मिलती रहती थी। वह साईकिल से चलते थे। गले में कैमरा लटकाए, कैमरा संभालते, साईकिल चलाते उन को देखना मुश्किल में डालता था। लेकिन वह मुश्किल में नहीं रहते थे। पान कूंचते हुए वह अपनी सारी मुश्किलें जैसे साईकिल के टायर से कुचलते चलते थे। स्वतंत्र भारत था तो उस समय लखनऊ का सब से बड़ा अखबार, सवा लाख रोज छपता था लेकिन संजय त्रिपाठी का शोषण तब यह अख़बार बहुत करता था। उस समय सब को पालेकर अवार्ड के हिसाब से तनख्वाह मिलती थी, ठीक ठाक मिलती थी लेकिन संजय त्रिपाठी को प्रति फ़ोटो पांच रुपए मिलते थे। वह भी प्रकाशित फ़ोटो पर।

वह फ़ोटो चाहे जितनी खींचें पर पैसे छपी फ़ोटो पर ही मिलती थी। और कई बार फ़ोटो सेलेक्ट हो कर भी नहीं छपती थी। कभी अचानक विज्ञापन आ जाने के कारण जगह की कमी के चलते। तो कभी किसी फ्रस्ट्रेटेड डेस्क के साथी की मनबढ़ई और सनक के चलते। खैर जैसे-तैसे संजय त्रिपाठी फोटोग्राफरी क्या चाकरी करते रहे थे। इस उम्मीद में कि कभी तो नौकरी पक्की होगी और कि उन्हें भी पालेकर अवार्ड वाली तनख्वाह मिलेगी। वह भी सम्मानजनक जीवन जिएंगे। लेकिन उन दिनों स्वतंत्र भारत में एक विशेष प्रतिनिधि थे शिव सिंह सरोज। निहायत ही मूर्ख, दुष्ट और धूर्त प्रवृत्ति के थे लेकिन चूंकि दलाल टाईप के पत्रकार थे सो उन की अख़बार और अख़बार से बाहर भी ख़ूब चलती थी। संजय को वह भरपूर परेशान और अपमानित करते। नित नए ढंग से। उन को चढ़ाई करने के लिए अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए रोज कोई शिकार चाहिए होता था। संजय त्रिपाठी से कमज़ोर शिकार कोई और नहीं मिलता था।

संजय त्रिपाठी और शिव सिंह सरोज जब कि एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे। बाराबंकी के हैदरगढ़ के। बल्कि संजय त्रिपाठी के पिता श्री रामकिशोर त्रिपाठी साठ के दशक में हैदरगढ़ से विधायक रहे थे। लेकिन वह गांधीवादी थे सो पैसा नहीं बनाया, बेईमानी नहीं की। वह  पराग दुग्ध संघ के अध्यक्ष थे। चाहते तो संजय को कहीं अच्छी नौकरी दे सकते थे, किसी जगह सिफ़ारिश कर सकते थे। संजय ने ऐसा कई बार चाहा भी लेकिन पिता ने सख्ती से हर बार इंकार किया। संजय मन मसोस कर रह जाते थे। संजय के पिता जी एक समय भूदान आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उत्तर प्रदेश में तमाम भूमिहीनों को भूमि के पट्टे दिए। लेकिन अपने किसी परिजन को एक इंच भूमि नहीं दी। अपने बच्चों को तो खैर क्या देते। आवश्यक वस्तु निगम के भी एक समय प्रशासक रहे। लेकिन उस भ्रष्ट विभाग में भी एक पैसा भी संजय के पिता ने न तो छुआ, न किसी को छूने दिया।

ऐसे ईमानदार पिता के पुत्र संजय त्रिपाठी पांच रुपए प्रति फ़ोटो पर गुज़ारा कर रहे थे। रोज जीते थे, रोज मरते थे। किसी-किसी दिन एक भी फ़ोटो नहीं छपती। वह उदास हो जाते। शिव सिंह सरोज को बर्दाश्त करना उन के लिए दिन पर दिन भारी होता जा रहा था। नौकरों को भी कोई क्या डांटेगा जिस तरह शिव सिंह सरोज उन्हें डांटते, जलील करते। पर संजय करते भी तो क्या करते। उन के पास कोई विकल्प नहीं था। मैं देख रहा था, संजय दब्बू बनते जा रहे थे।  उन की मासूमियत उन से मिस हो रही थी। खैर थोड़े दिन में वह संपादक वीरेंद्र सिंह की कृपा से दैनिक वेतन भोगी फ़ोटोग्राफ़र बन गए। अब थोड़ा ही सही, कम से कम एक निश्चित पैसा प्रति माह उन्हें मिलने लगा था। दबे-दबे से रहने वाले संजय अब फिर से हंसने लगे थे। उभरने लगे। संजय त्रिपाठी की खिंची फ़ोटो में भी निखार आने लगा।

वह जो कहते हैं बाईलाईन, वह भी कभी-कभार संजय त्रिपाठी को फ़ोटो पर मिलने लगी। लेकिन कनवेंस अलाऊंस उन्हें नहीं मिलता था। जो उन दिनों डेढ़ सौ रुपए होता था। क्या तो उन के पास अपना कनवेंस नहीं था। हालां कि वह बहुत गुरुर के साथ कहते कि, ‘ है तो साईकिल मेरे पास! ‘ लोग हंस पड़ते। बहुत लड़े वह इस के लिए। कुछ संघर्ष के बाद उन्हें कनवेंस अलाऊंस भी मिलने लगा। और यह देखिए कि शिव सिंह सरोज के तमाम विरोध के बावजूद संपादक वीरेंद्र सिंह ने संजय त्रिपाठी को स्टाफ़ फ़ोटोग्राफ़र का नियुक्ति पत्र थमा दिया। अब संजय ने लोन ले कर एक मोपेड भी ख़रीद लिया। जिसे उन के साथी फ़ोटोग्राफ़र संजय की बकरी कहते। अभी तक शिव सिंह सरोज के अपमान सहते आ रहे संजय अब थोड़ा दब कर ही सही उन से प्रतिवाद करने लगे थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में एक क्राईम रिपोर्टर थे आर डी शुक्ल जो वीरेंद्र सिंह के बड़े मुंहलगे थे, वह भी सताने लगे। लेकिन संजय मेरे साथ बहुत कंफर्ट फील करते।

बहुत से एसाइनमेंट हमारे साथ किए संजय ने। जब साईकिल से चलते थे तब वह हमारे साथ जब चलते तो अपनी साईकिल आफिस में छोड़ कर मेरी स्कूटर पर आ जाते। पीछे बैठे-बैठे ही वह फ़ोटो खींच लेते। ऐसी बहुत सी घटनाएं और यादें हैं। लेकिन कुछ दृश्य भुलाए नहीं भूलते। जैसे एक बार एक प्रदर्शन के समय विधान सभा के सामने लाठी चार्ज हो गया था। संजय बोले, थोड़ा रिश्क लीजिए तो हम बढ़िया फ़ोटो बना लें। हामी भरते ही वह रायल होटल की तरफ से हमारे स्कूटर पर पीछे की सीट पर पीछे मुंह कर के बैठे। बोले, बस खरामा-खरामा चलते चलिए। चौराहे पर आते ही पुलिस ने रोका लेकिन हम झांसा दे कर प्रेस-प्रेस कहते निकल लिए। बीच लाठी चार्ज में हमारी स्कूटर निकली। और संजय का कैमरा चमकने लगा। अचानक ठीक विधान सभा के सामने के आते ही पुलिस की चपेट में हम आ गए।

संजय घबराए और बोले, फुल स्पीड में भाग लीजिए, नहीं पिट जाएंगे। हम कितना भागते। पुलिस की एक लाठी संजय के कैमरे पर आती-आती कि संजय ने कैमरे पर झुक कर अपना सिर लगा दिया। कैमरा बच गया, संजय का सिर फूट गया। चोट गहरी नहीं थी पर थी।  स्कूटर सरपट भगा कर सिविल हास्पिटल आया। संजय को पट्टी वगैरह करवाई। लेकिन संजय को सिर पर चोट की परवाह नहीं थी। ख़ुश थे वह कि कैमरा बच गया और फ़ोटो अच्छी मिल गई थी। इस के पहले एक बार किसी प्रदर्शन में संजय का कैमरा टूट गया था। पांच हज़ार का उन का नुकसान हुआ था तब के दिनों। दफ़्तर से कोई सहयोग नहीं मिला था। वीरेंद्र सिंह ने बाद में मुझे डांटा। कहा कि, वह तो फ़ोटोग्राफ़र है, बैल है, बुद्धि नहीं है पर आप तो रिपोर्टर हैं, तिस पर लेखक भी, अकल से काम लेना था।  कहीं जान पर बन आती तो? एक लाठी चार्ज में एक नेता अक्षयवर मल की ऐसे ही किसी पुलिस लाठी चार्ज में सिर में चोट लगने से उन्हीं दिनों मौत हो चुकी थी। लेकिन दूसरे दिन संजय हीरो थे। अख़बार में आठ कालम की संजय की खींची फ़ोटो संजय की बाईलाईन के साथ छपी थी। ऐसी फ़ोटो किसी और अख़बार के पास नहीं थी। सभी अख़बार पिट गए थे।

एक बार लखनऊ महोत्सव के कवि सम्मेलन में शिव सिंह सरोज ने अपना सम्मान आयोजित करवाया। सम्मान समारोह की गरिमा बनाने के लिए अमृतलाल नागर सहित कुछ और लोगों को भी सम्मान सूची में रखवा लिया। तब के मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी को सम्मानित करना था। ठाकुर प्रसाद सिंह कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। वह सम्मान के समय शिव सिंह सरोज का नाम भूल गए और कवि सम्मेलन शुरू कर दिया। शिव सिंह सरोज संजय को ख़ास ताकीद कर के ले गए थे समारोह में कि मेरे सम्मान की बढ़िया फ़ोटो खींचना। पर जब सम्मान समारोह खत्म हो गया, शिव सिंह सरोज का नाम नहीं पुकारा गया तो कवि सम्मेलन शुरू होते ही संजय पेशाब करने पंडाल से बाहर चले गए। लेकिन एक कवि के कविता पाठ के बाद सरोज ने संचालक को याद दिलाया कि उन के सम्मान का क्या हुआ? तो उन्हों ने कवि सम्मेलन रोक कर शिव सिंह सरोज का सम्मान भी करवा दिया। फिर जल्दी ही शिव सिंह सरोज को कविता पाठ के लिए भी बुला लिया।

शिव सिंह सरोज का डबल अपमान हो गया। एक तो क्रम से सम्मान नहीं हुआ दूसरे उन की वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखते हुए नए कवियों के साथ पहले ही कविता पाठ करने के लिए बुला लिए गए। गुस्से में आग बबूला वह कविता पाठ करने आए। आग्नेय नेत्रों से ठाकुर प्रसाद सिंह को देखते हुए उन्हों ने बेलीगारद शीर्षक लंबी कविता पढ़नी शुरु की और हूट होने लगे। इतना कि वीर रस की यह कविता करुण रस में तब्दील हो गई। लेकिन लाख हूटिंग के शिव सिंह सरोज ने पूरी कविता पढ़ी। सम्मान में मिली कंधे से गिर गई शाल पीछे मुड़ कर उठाई, कंधे पर रखी और अपनी जगह ऐसे आ कर बैठे सीना तान कर कि हल्दीघाटी जीत कर लौटे हों। लेकिन असली हल्दीघाटी तो दूसरे दिन की रिपोर्टिंग मीटिंग में शेष थी। उन्हों ने संजय से अपने सम्मान समारोह की फ़ोटो मांगी। तो संजय बिदक कर पूछ बैठे कि, ‘आप का सम्मान हुआ भी था?’ और उन्होंने जैसे जोड़ा, ‘हां आप के बेलीगारद कविता पाठ की फ़ोटो ज़रूर खींची है!’; कह कर उन के काव्य पाठ की फ़ोटो सामने रख दी।

शिव सिंह सरोज ऐसे फटे गोया आसमान फट गया हो। फ़ोटो फेकते हुए बोले, ‘बेलीगारद! भाग जाओ यहां से।’ मुख्य मंत्री ने हमको सम्मानित किया, पूरी दुनिया ने देखा और ई बेलीगारद देखि रहे थे!’ संजय उठ कर मीटिंग से बाहर चले गए। फिर घर चले गए। शिव सिंह सरोज ने संजय को बर्खास्त करने के लिए लिख दिया। वीरेंद्र सिंह ने टालते हुए कहा, यह बर्खास्तगी का विषय नहीं है। लेकिन संजय की तबीयत ख़राब हो गई। डिप्रेसन में चले गए। हफ़्ते भर बाद लौटे। संजय की जिंदगी फिर रफ़्तार पर आ गई। लेकिन अकसर बुदबुदाते हुए कहते यह बुड्ढा मेरी नौकरी खा जाएगा किसी दिन। शिव सिंह सरोज के इस बेलीगारद प्रसंग का सविस्तार वर्णन मैं ने अपने उपन्यास अपने-अपने युद्ध में किया है। हुआ यह भी कि मैं संजय को जब-तब बेलीगारद कह कर भी बुलाने लगा। वह कभी मुस्कुरा पड़ता तो कभी ताव खा जाता।

उन दिनों मैं दारुलशफा में रहता था तो मेरे घर अकसर आते संजय। दफ़्तर का दुखड़ा रोते। घर में भी कम दिक्कत नहीं थी। एक दिन वह बहुत ख़ुश होते हुए बोले, मालूम है पांडेय जी, इस दारुलशफा में मैं भी रहा हूं काफी समय। बचपन गुज़रा है मेरा यहां। पूछा कैसे? तो हलके से मुस्कुराते हुए बताया कि पिता जी एम एल थे न! फिर चुप हो गए।

पिता ईमानदारी का बरगद थे पर एक सौतेली माता भी थीं। उन का सौतेलापन भी कम नहीं था। संजय भीतर-बाहर दोनों तरफ टूट रहे थे। संयोग देखिए कि वीरेंद्र सिंह ने स्वतंत्र भारत से इस्तीफ़ा दे दिया तो शिव सिंह सरोज कार्यकारी संपादक बना दिए गए। कुछ दिनों के लिए ही सही। सरोज से मेरी भी नहीं निभती थी। संजय की तो खैर क्या कहूं। वह सरोज को का वा स बोलता। खैर सरोज के बाद पत्रकारिता में एक और दलाली के चैंपियन राजनाथ सिंह सूर्य संपादक की कुर्सी पर शोभायमान हो गए। मेरे लिए और मुश्किल हो गई। स्वतंत्र भारत से छुट्टी हुई और नवभारत टाइम्स आ गया। जल्दी ही राष्ट्रीय सहारा शुरू हुआ तो संजय त्रिपाठी भी स्वतंत्र भारत छोड़ राष्ट्रीय सहारा आ गए।

अब हम उन को संजय के बजाय मज़ा लेते हुए कहते, का हो , बेलीगारद!  राष्ट्रीय सहारा में आ कर संजय की जिंदगी जैसे पटरी पर आ गई। अब वह ख़ुश और मस्त दिखने लगे। लेकिन जल्दी ही वह फिर पटरी से उतर गए। रणविजय सिंह नाम का एक मूर्ख संपादक बन गया। जो पत्रकारिता का क ख ग भी नहीं जानता था। यह रणविजय सिंह शिव सिंह सरोज से भी ज़्यादा मूर्ख और धूर्त निकला। संजय से भी जूनियर था, मुझ से भी। वह संजय जैसे खुद्दार आदमी को निरंतर अपमानित करने लगा। संजय गालियां देते हुए कहता कि यार यह साला किस्मत का पट्टा लिखवा कर लाया है। अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। फिर जैसे टूटते हुए कहता हम जैसों की किस्मत भगवान ने गधे के लिंग से लिखी है। रणविजय को पेट भर गरियाता और कहता साले को कुछ आता-जाता नहीं लेकिन दिन-ब-दिन मज़बूत हुआ जाता है पैर छू-छू कर। तंत्र-मंत्र कर के। बाद के दिनों में हम भी राष्ट्रीय सहारा पहुंचे। संजय और हम फिर साथ हो गए।

रणविजय सिंह जैसे साक्षर, दलाल और धूर्त से मेरी भी कभी नहीं निभी। अजब अहमक था यह आदमी। बीच मैच में फ़ोटोग्राफ़र से मैन आफ़ द मैच की फ़ोटो मांगता। फ़ोटोग्राफ़र कहता कि अरे मैच खत्म होगा तब तो मैन आफ़ द मैच होगा। वह कहता टेक्निकल्टी मत समझाओ मुझे। मुझे तो बस फ़ोटो चाहिए। एक से एक मूर्खताएं करता रहता वह। समझ से पूरी तरह पैदल। निर्मल वर्मा का निधन हुआ तो तब के दिनों दिल्ली में फ़ीचर देख रहे मित्र से मैं ने फ़ोन कर कहा कि निर्मल जी पर एक विशेष पेज निकलना चाहिए। मेरे पास उन के एक इंटरव्यू सहित कुछ सामग्री है, कहिए तो भेज दूं। वह बोले, पहले संपादक से बात कर लूं फिर बताता हूं।थोड़ी देर में उन का फ़ोन आया। कहने लगे कुछ मत भेजिए। मैं ने कारण पूछा तो वह बताने लगे कि संपादक ने पूछा कि क्या बहुत बड़ा कलाकार था? मैं ने कहा, नहीं लेखक थे। तो मुंह बिचका कर कहने लगा फिर रहने दीजिए।

ऐसी मूर्खताओं के उस के अनेक किस्स्से हैं। लेकिन संजय सही कहता था, अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। रणविजय तो समूह संपादक हो गया। और यह देखिए कि औरतबाजी, दलाली  करते-करते, ट्रांसफर, पोस्टिंग करते-करवाते सांसद निधि बरसने लगी उस पर, विधायक निधि बरसने लगी उस पर। लाखों, करोड़ों में। वह मैनेजमेंट कालेज खोल बैठा , इंजीनियरिंग कालेज भी। बारात घर भी। कई-कई घर और फार्म हाऊस। इधर संजय नींद की दवा खाने लगा। डिप्रेसन में जाने लगा। बच्चे बड़े हो रहे थे जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। तनाव उस से ज़्यादा। शराब तनाव से भी ज़्यादा। लाठियां खा कर भी फ़ोटो खींचने वाला संजय, कैमरे बचाने में सिर फोड़वा लेने वाला संजय अब एसाइनमेंट से भागने लगा। कभी मासूम सा दिखने वाला संजय अब अड़ने, लड़ने और झगड़ने वाला हो चला था। शिव सिंह सरोज से बड़ा सिरदर्द रणविजय सिंह हो गया संजय के लिए। लेकिन वह जैसे तैसे निभाता रहा। फ़ोटो खींचने में फ़ोटोग्राफ़र अकसर पिटते रहते हैं। कभी पुलिस पीटती है तो कभी गुंडे, कभी भ्रष्ट अफ़सर।

संजय राष्ट्रीय सहारा की नौकरी में भी कई बार पिटा। लेकिन वापस दफ़्तर आ कर भी जलील हुआ तो टूट-टूट गया। परिवार बिखरने लगा। अब यह देखिए कि एक दिन पता चला कि संजय ने आत्महत्या की कोशिश की। ढेर सारी नींद की दवा खा ली थी। परिवारीजनों ने अस्पताल ले जा कर किसी तरह बचा लिया। जल्दी ही संजय ने दूसरी बार आत्म हत्या की कोशिश की। फिर घर वालों ने बचा लिया। पहली बार मैं ने समझाया था, सांत्वना दी थी। दूसरी बार डांटा। कि यह बार-बार की क्या बेवकूफी है। वह लिपट कर रोने लगा। कहने लगा आप बड़े भाई हैं, आप को डांटने का हक़ है! पर मेरी लाचारी समझिए। बच्चों का वास्ता दिया, बेटी का वास्ता दिया। पर एक बहादुर आदमी हर बात पर रोता रहा। अंततः उस ने वायदा किया कि अब यह गलती नहीं करेगा। लेकिन उस की जिंदगी पटरी से उतर गई थी। डिप्रेशन उस का बड़ा भाई बन गया था। अब वह जिस तिस से लड़ पड़ता। इसी बीच वह मुनव्वर राना से उस की मुलाकात हो गई। अब वह उन की शायरी का मुरीद हो गया। बात-बात में वह मुनव्वर राना के शेर कोट करता रहता। अब वह गजलों का शौक़ीन हो चला था। अकसर रात को फ़ोन करता। कहता सो न रहे हों तो बड़े भाई कुछ शेर सुनाऊं। फिर एक से एक शेर सुनाता। कई बार वह यह काम सुबह-सुबह भी करता। फ़ोन करता और कहता, अरे, कब तक सोते रहेंगे, शेर सुनिए। अब वह जब घर आता तो ग़ज़लों की कोई सी डी लिए। कभी पेन ड्राइव लिए हुए।कहता इसे सुनिए।

अब यह संजय,  शराब और शेरो शायरी का दौर था। कह सकते हैं उस के डिप्रेसन की इंतिहा थी।

पिछले दिनों हम दोनों बेटी की शादी खोजने में लगे थे। संजय की बेटी की शादी तय हुई तो वह कार्ड ले कर आया। शादी के दिन ही दिल्ली में मेरा एक कार्यक्रम था। बताया तो कहने लगा कुछ नहीं आना है। अपनी बेटी की शादी में नहीं आएंगे तो कब आएंगे? मैं ने टिकट कैंसिल किया। गया भी शादी में। बेटी की शादी संजय ने ख़ूब धूमधाम से की। इस के पहले संजय के एक छोटे भाई की शादी में अंबेडकर नगर के एक गांव में बारात गई थी। तब संजय का और ही रुप देखने को मिला था। बहुत सी रिपोर्टिंग यात्राओं में भी संजय का साथ रहा है। पर उस के रंग में फर्क नहीं आता था। उस की शेरो शायरी का रंग और ज़िम्मेदारी का रंग कैसे तो सुर्खरू थे। बेटी की शादी कर के वह बहुत निश्चिंत हो गया था। बिलकुल मस्त और मगन। मुझे बेटी के विवाह के लिए परेशान देखता तो कहता कि बेटियां अपना भाग्य ले कर आती हैं सो घबराओ नहीं यार! हो जाएगी बिटिया की शादी भी! वह बेटी की एक से एक फ़ोटो सेशन करता और कहता यह फ़ोटो भेज कर देखिए। अब की तो बात बन जाएगी। जब मेरी बेटी की शादी हुई तो वह आया और ख़ूब ख़ुश। 

ऐसे ही एक दिन मिला तो कहने लगा मालिनी अवस्थी से कभी बात होती है। मैं ने कहा हां, होती है कभी-कभार। मैं ने पूछा कि क्यों क्या हुआ? कहने लगा कि यार अब हमें वह पहचानती ही नहीं। फिर याद दिलाते हुए कहा कि याद है मालिनी अवस्थी के बलरामपुर अस्पताल वाले घर में आप के साथ गया था। आप ने इंटरव्यू किया था, हम ने फ़ोटो खींची थी। वह घर में स्कर्ट पहने बैठी थीं, उन की स्कर्ट में फ़ोटो। स्वतंत्र भारत में छपी थी बड़ी सी। किसी अख़बार में मेरी खींची फ़ोटो ही पहली बार उन की छपी थी, उन्हें याद तो दिलाइए। कि उन को स्टार बनाने में मेरा भी हाथ है। पहचान लिया करें मुझे भी तो अच्छा लगेगा। हम ने कहा, ठीक है। लेकिन मालिनी अवस्थी से यह कभी कह नहीं पाया।

क्या कहता भला। यह भी कोई कहने की बात होती है। रिपोर्टिंग और फ़ोटोग्राफ़ी में ऐसे तमाम मुकाम आते-जाते रहते हैं। बहुत से लोग कंधे पर सिर रख कर निकल गए। जब ज़रुरत हुई सुबह-शाम सलाम किया। ज़रूरत खत्म, पहचान खत्म। कौन किस को याद करता है। लेकिन संजय अकसर याद दिलाता और कहता कि कहा नहीं मालिनी अवस्थी से क्या। मैं हर बार कहता हूं, कह कर टाल जाता। फिर बहुत दिन हो गए इस बात को उस ने यह कहना बंद कर दिया। पर एक दिन फ़ेसबुक पर संजय की वाल पर देखा कि वह मालिनी अवस्थी के साथ एक फ़ोटो में मुस्कुरता हुआ खड़ा था। लेकिन मैं ने उस से कुछ कहा नहीं। जाने कितनी सांस और फांस है संजय के साथ हमारी। जाने कितने लोगों के इंटरव्यू, सेमिनारों, नाटकों, राजनीतिक कार्यक्रमों, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन आदि-इत्यादि में उस के साथ की अनेक यादें जैसे दफ़न हैं हमारे सीने में।

कुछ समय पहले इस राष्ट्रीय सहारा की नौकरी से भी इस्तीफ़ा दे दिया था संजय ने। सो जिंदगी जो थोड़ी बहुत पटरी पर थी बिलकुल पटरी से उतर गई थी। आर्थिक समस्याएं जब नौकरी करते हुए नहीं खत्म हुईं तो बिना नौकरी के कैसे खत्म होतीं। उसे अपना फाइनल हिसाब मिलने का इंतज़ार था कि ख़ुद फाइनल हो गया। संजय का एक छोटा भाई विनोद त्रिपाठी भी टाइम्स आफ़ इंडिया में फ़ोटोग्राफ़र था। कुछ साल पहले विनोद भी विदा हो गया था। अब संजय अपने गांव की बात करता रहता था। लेकिन गांव में भी कौन सी जमींदारी थी भला। पुरखे देवरिया से आ कर हैदरगढ़ के पास के गांव पूरे झाम तिवारीपुरवा में बसे थे और पिता विरासत में ईमानदारी और संघर्ष दे गए थे। दुर्भाग्य से संजय भी अपने दोनों बेटों को यही विरासत सौंप गए हैं।

शुरु के दिनों में जब संजय स्वतंत्र भारत में अपने को फ़ोटोग्राफ़र साबित करने के संघर्ष में लगा था, उसे हर कोई फ़ोटोग्राफ़ी सिखाने में लगा था। जिसे कैमरा पकड़ने का शऊर नहीं होता वह भी, जिसे फ़ोटो की समझ नहीं होती वह भी। उन्हीं लोगों में से एक मैं भी था। मैं भी उसे कभी रघु रॉय के फ़ोटो दिखाता तो कभी सत्यजीत रॉय के फ़ोटो। और बताता कि देखो फ़ोटो यह होती है। वह फ़ोटो देखता, मेरी बात सुनता और टाल जाता। यह सब जब कई बार हो गया तो संजय कहने लगा यह दिल्ली नहीं है, बंबई और कलकत्ता नहीं है, लखनऊ है। यहां ऐसी फ़ोटो कौन खींचता है, कौन छापता है। तो मैं उसे अनिल रिसाल सिंह के फ़ोटो दिखाता। सत्यपाल प्रेमी के फ़ोटो दिखाता और कहता यह देखो, यह तो लखनऊ के फ़ोटोग्राफ़र  हैं। वह तड़पता हुआ कहता, इन के कैमरे देखे हैं, इन के लेंस देखे हैं? क्या है मेरा कैमरा? यह कोई कैमरा है?

वह कहने लगा दिला दीजिए ऐसा ही कैमरा, ऐसा ही लेंस और ऐसी ही सुविधा। और फिर धरना, प्रदर्शन, नाटक, नौटंकी की रूटीन फोटुओं से फुर्सत, डाल दीजिए मेरे पेट में भरपेट रोटी। ऐसी ही सुविधा और ऐसी ही निश्चिंतता। इन से अच्छी फ़ोटो खींच कर न दिखाऊं तो कहिएगा। वह कहता, यहां तो रोज जब फ़ोटो खींचता हूं तो शिव सिंह सरोज का अपमानित करने वाला सामंती रवैया दिमाग में सवार रहता है। फ़ोटो क्या खाक खींचूंगा? रोटी दाल चलाने दीजिए परिवार की। व्यवहार में यही है, बाकी सब सिद्धांत है। सच यही है कि अधिकांश रिपोर्टर, फ़ोटोग्राफ़र रोटी दाल में ही स्वाहा हो जाते हैं और अपना बेस्ट नहीं दे पाते हैं। शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे पत्रकारिता के दलाल गिद्ध जाने कितने संजय त्रिपाठी खा गए हैं, खाते रहेंगे। क्यों कि अब इन्हीं शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे दलालों और भडुओं का ज़माना है। अख़बारों में यह भडुए दलाल ही भाग्य विधाता हैं। पढ़े-लिखे लोगों की ज़रुरत अब किसी प्रबंधन को नहीं है।

अलविदा मेरे भाई, मेरे दोस्त, मेरे बेलीगारद! बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारी यादें हैं। स्मृतियों में तुम सर्वदा उपस्थित रहोगे। अभी इतना ही। शेष फिर कभी। लेकिन तुम ने आज मुझे रुलाया बहुत है। अकसर तुम्हें चुप कराने वाला मैं आज कैसे चुप रह पाता भला। सो रो-रो कर हलका किया ख़ुद को। तुम धू-धू कर जलते रहे, मैं फूट-फूट रोता रहा। यही तो आज हुआ, मेरे बेलीगारद, डियर बेलीगारद! पर अब किसे इतने दुलार से कहूंगा डियर बेलीगारद! तुम तो चले गए!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है। यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है।


मूल खबर…

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बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

बिग्गन महाराज गांव के सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बड़े बेटे थे. अभाव और अराजकता के दुर्योग से वह भरी जवानी में बाबा बनने को मजबूर हुए. अगल-बगल के गांवों के मंदिरों पर रहने लगे. कुछ बड़े बाबाओं के शिष्य भी बने. बताया गया कि वह कल मरने से पहले एक यजमान के यहां जाकर उन्हें दीक्षा दी. गुरुमुख बनाया. बदले में उन्हें नया स्टील का कमंडल और एक बछिया मिली. जिस दिन उन्हें इतना कुछ मिला, उसी दोपहर उनके पेट में अन्न जल न था. उपर से तगड़ी धूप. बिग्गन महाराज मंदिर लौटे और गिर कर मर गए. शव के साथ बैठे लोग किसिम किसिम की चर्चाएं कर रहे थे. कौन जानता था अपने यजमान को मोक्ष-मुक्ति का मार्ग बता मंदिर लौट रहे गुरु पर इस मायावी संसार को अलविदा कहने के वास्ते मारण मंत्र का जाप शुरू हो चुका था.

बतकही जारी थी. पुरवा हवा की सरसराहट से बिग्गन महाराज के शव पर पड़ा चद्दर सर से पांव तक इस कदर फड़फड़ा रहा था जैसे पंडीजी बस अब कुछ बोलने के लिए उठने ही वाले थे. ताड़ी से तारी साथ बैठे एक सज्जन उदात्त भाव और तेज स्वर से कहने लगे- बिग्गन महराज गांजा के बाद हीरोइन पीने लगे थे. आजकल तो पैसे के लिए गांव आकर अपनी मां से लड़कर सौ पचास ले जाने लगे थे. जितने मुंह उतनी बातें. कईयों ने मौत को अनिवार्य सच बताया. कुछ ने बिग्गन महाराज की कम उमर होने का हवाला दिया. मुझे अजीब इच्छा हुई. तख्त पर लिटाए गए बिग्गन महाराज के चेहरे को देखने की. रात दो बजे के करीब उनके छोटे भाई ने महराज के चेहरे से चद्दर हटाया. लंबी बाबाओं वाली दाढ़ी और सांवला चेहरा. बिलकुल शांत. लग ही नहीं रहा था कि यह मरे आदमी का चेहरा है. जैसे वो सोए हों. ध्यान में हों. चिलम के असर के बाद मौन साध गए हों.

चार भाइयों में सबसे बड़े बिग्गन महाराज के गुजर जाने से उनके परिवार पर कोई असर न पड़ेगा. एक तो उनका खुद का कोई निजी परिवार न था. उनने शादी न की थी. कह सकते हैं शायद हुई ही न हो. इसलिए वे बाल ब्रह्मचारी कहलाए गए. दूसरे उनके जाने से सगे भाइयों को कभी कभार सौ पचास मां से मांग ले जाने के अप्रत्याशित कर्म से मुक्ति मिली.

हां, बुजुर्ग महतारी जरूर देर तक छाती पीट पीट कर रोती रहीं. शायद मां के कलेजे में उस बेटे के खास तड़प होती है जो थोड़ा मजबूर हो, जो थोड़ा शोषित हो, जो थोड़ा अव्यवस्थित हो, जो थोड़ा मिसफिट हो, जो गैर-दुनियादार हो, जो संघर्षरत हो.

शाम के समय मरने की खबर जब घर पहुंची तो नाती-नातिन के साथ बैठी बुजुर्ग महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी. अगल-बगल घरों की महिलाएं एक एक कर पहुंच कर उन्हें पकड़ कर दिलासा देने लगीं- ”होनी को कौन टाल सकता है मइया, चुप रहिए, भगवान को शायद यही मंजूर था.” पड़ाइन मइया कुछ गा-गा कर लगातार रोती बिलखती हिलती फफकती हांफती रहीं. शायद इस तरह बेटे को अंतिम बार पूरे दिल और पूरी शिद्दत से याद किया उनने.

मुझे बिग्गन महाराज के साथ बचपन के दिन याद आए. उनके साथ बगीचों में आम तोड़ना, उनके साथ पूड़ी खाने दूसरे गांवों में जाना, ढेर सारी शरारतों और बदमाशियों में उनको अपने विश्वासपात्र सिपाही की तरह साथ रखना. बिग्गन महाराज लायल थे. निष्ठा उनने कभी न तोड़ी. दोस्ती की तो खूब निभाया. बाबा बने तो उसी दुनिया के आदमी हो गए, बाकी सबसे नाता तोड़ लिया. बस केवल अपनी मां से नाता रखा. देखने या मांगने चले आते थे, आंख चुराए, मुंह नीचे झुकाए.

बिग्गन महाराज जीते जी मरने की कामना करने लगे थे. मौत के दर्शन और लाभ का शायद वह कोई रहस्यमय धार्मिक अध्याय बांच चुके थे. तभी तो वह दुनियादारों की तरह मौत से डरते न थे और मौत से बचने के लिए कोई उपक्रम न करते. जैसे वह मौत को चुनौती देते रहते. खुद को नशे में डुबोने के लिए वह अतिशय गांजा-चिलम पीने लगे.

बताते हैं कि जिस गांव के मंदिर पर वह पुजारी थे, उस गांव के कुछ नशेड़ियों की संगत में सुल्फा-हीरोइन को अपना बैठे. गांजे के असर की हद-अनहद वह जी चुके थे. उन्हें इसके परे, इससे भी दूर, अंतरिक्ष के पार, जाना था. सफेद धुओं के रथ पर सवार होकर जाना था. हीरोईन-सुल्फा ने इसमें उनकी मदद की होगी शायद.

इस नई शुरुआत ने इतना आनंदित किया कि वह इसे अपना गुरु बना बैठे. हीरोइन-सुल्फा की लत के शिकार बिग्गन महाराज को पहले कभी-कभार फिर अक्सर पैसे का अभाव खलने लगा. ऐसे में उन्हें अपनी मां याद आतीं जिनके अलावा किसी पर उनका कोई अधिकार न था. वह अपने घर आ जाते, चुपके से. मां से लड़ते-झगड़ते और आखिर में कुछ पैसे पा जाते. घर वाले थोड़े परेशान रहने लगे. उनके लिए बिग्गन महराज की यह आदत नई और अप्रत्याशित थी. छोटे तीन भाइयों के बच्चे-पत्नी हैं. वे छोटे-मोटे काम धंधा कर जीवन गृहस्थी चलाने में लगे रहते. पैसे का अभाव सबके लिए एक बराबर सा था. ऐसे में मां जाने कहां से सौ-पचास उपजा लेतीं और बिग्गन महाराज को डांटते डपटते, आगे से आइंदा न मांगने की लताड़ लगाते हाथ पर चुपके से धर देतीं.

बिग्गन महाराज की मिट्टी को जब आज सुबह अंतिम यात्रा पर ले जाया गया तो मैं गहरी नींद में था. देर रात तक सोए बिग्गन महाराज संग जगा मैं जीवन मौत के महात्म्य को समझता गुनता रहा. घर आकर बिस्तर पर गिरा तो सुबह दस बजे आंख खुली. तब तक बिग्गन महाराज गांव से कूच कर चुके थे. उनके शरीर को गंगा के हवाले किया जा चुका था. उन्हें साधुओं सरीखा सम्मानित सुसज्जित कर जल समाधि दी गई.

इस देश में अभाव और गरीबी के चलते जाने कितने बिग्गन महाराज भरी जवानी बाबा बनने को मजबूर हो जाते हैं. फिर इस मजबूरी को ओढ़ने के लिए नशे के धुएं में उड़ने लगते हैं. बिग्गन महाराज हमारे गांव के लिए कोई उतने जरूरी शख्स नहीं थे. वैसे भी गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. बिग्गन महाराज किसी से कुछ न बोलते और गांव से परे रहते. बेहद गरीब परिवार के सबसे बड़े बेटे बिग्गन महाराज को पता था कि उनके लिए कोई निजी इच्छा रखना, किसी कामना को पालना नामुमकिन है इसलिए उनने इसे विरुपित करने वाले चोले को ओढ़ लिया. एक आकांक्षाहीन जीवन को साधु के चोले से ही दिखावट कर पाना संभव था.

बिग्गन महाराज का जाना मेरे लिए बचपन के एक निजी दोस्त का असमय काल के गाल में समाना है. उनने जिस राह को चुना और आगे जिस राह पर जाने को इच्छुक थे, बाबागिरी से मृत्यु यात्रा तक, इसका सफर उनने रिकार्ड कम समय में, बेहद सटीक-सधे तरीके से की. शायद देश के करोड़ों युवा बिग्गन महाराजों के लिए इस व्यवस्था ने मोक्ष और मुक्ति के लिए यही आखिरी रास्ता बुन-बचा रखा है जिससे परे जाने-जीने के लिए कोई विकल्प नहीं है.

राम-राम बिग्गन महाराज.

नई दुनिया के लिए शुभकामनाएं. इस लुटेरी-स्वार्थी दुनिया से जल्द निकल लेने पर बधाई.

दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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