ट्रेनी आईपीएस से दुखी मीडिया ने उसे हीरो बना दिया!

मीडिया के रुतबे, दंभ और दबंगई की भोपाल में भोंडी नुमाइश…  भोपाल के एक अखबारी छायाकार के कैमरे के साथ एक रंगरूट पुलिस अफसर द्वारा कथित तोड़फोड़ की घटना पर जो हंगामा बरपा उससे और कुछ हुआ हो या ना हुआ हो पर वह अफसर रातों रात मशहूर हो गया. एक छोटी सी घटना, जिसका जिले के पुलिस कप्तान के स्तर पर निपटारा होना था, मीडिया के ईगो और अहंकार के चलते कई दिनों तक अखबारों में छाई रहीं. इसी कारण मुख्यमंत्री से लेकर नेता प्रतिपक्ष तक सब अपने शब्दबाणों से एक अदने से अफसर पर हमला करने लगे..!

मध्यप्रदेश में अख़बार बड़े-बड़े पर पत्रकारिता नदारद

मध्य प्रदेश में आपको देश में नंबर-1 और विश्वसनीयता का दावा ठोकने वाले अखबार तो जरूर मिल जाएंगे पर पत्रकारिता उनमे लुप्त होती जा रही है. अलबत्ता प्रापर्टी एक्सपो,ऑटो एक्सपो और डांडिया गरबा के आयोजनों तथा अपने स्कूल-यूनिवर्सिटी तथा कल-कारखानों के माल की प्रशस्ति की खबरों से ये अखबार पटे रहते हैं. पत्रकारिता का इन अखबारों से किस प्रकार लोप हो रहा है इसकी एक बानगी पेश है.

मध्य प्रदेश में अभिव्यक्ति की आजादी पर सत्ता के अहंकार का निर्लज्ज हमला

नईदुनिया समूह के भोपाल दैनिक नवदुनिया पर भाजपा पार्षद और उनके गुर्गों का हमला कहीं अभिव्यक्ति की स्वाधीनता पर पार्टी की अभिव्यक्ति तो नहीं है..! अपना मानना है की ऐसा नहीं है। यह दरअसल यह सत्ता के अहंकार का निर्लज्ज प्रदर्शन है जिसमे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के जिम्मेदार लोग भी आकंठ डूबे हुए हैं। जरा याद करें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का यह दंभी डायलाग –पत्रकार-वत्रकार क्या होता है ,हमसे बड़ा कोई है क्या..! चिंता की बात यह है की सरकार ने मीडिया मालिकों को तो खूब मैनेज कर रखा है जिससे इस भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ खबरें कभी-कभार ही छपती हैं। इसे भी सत्ताधीश और उनसे जुड़े लोग पचा नहीं पाते और उनके कोप का शिकार पत्रकारों को होना पड़ता है।