गाजियाबाद में छुटभैये भाजपा नेता ने अखबार को दी गालियां और पत्रकार को दी धमकी (सुनें टेप)

इंदिरापुरम (गाजियाबाद) भाजपा के मंडल अध्यक्ष नवनीत मित्तल ने ‘शिप्रा दर्पण’ नामक अखबार निकालने वाले पत्रकार नवीन द्विवेदी को एक खबर छापने पर जमकर धमकाया. नवीन द्विवेदी ने इस बारे में भड़ास को बताया कि वह सम्पादक हैं, शिप्रा दर्पण समाचार पत्र के. कल शाम 5.00 बजे इंदिरापुरम (गाजियाबाद) भाजपा के मंडल अध्यक्ष नवनीत मित्तल का फोन आया. उन्होंने मुझे गालियां देना शुरू कर दिया और फिर मुझे जान से मारने की धमकी भी दी.

साथ ही अखबार शिप्रा दर्पण को भी गालियां दी. नवीन के मुताबिक वे अत्यंत भयभीत हैं और उन्हें आशंका है कि मुझे किसी भी समय यह बाहुबली मार सकता है. नवीन ने पुलिस में लिखित शिकायत दे दी है. वे धमकी को देखते हुए इंदिरापुरम गाजियाबाद क्षेत्र छोड़ने पर विचार कर रहे हैं. उनका कहना है कि जब तक वे इंदिरापुरम में हैं, अगर उनका एक्सीडेंट भी होता है तो इसके लिए जिम्मेदार भाजपा मंडल अध्यक्ष नवनीत मित्तल माने जाएं.

टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://youtu.be/ioweiDrwNKw

नीचे है वो खबर जिसके छपने के बाद भाजपा नेता को गुस्सा आ गया…

इंदिरापुरम भाजपा नेता और आरएसएस के अधिकारी के बीच तीखी तू..तू..में…में..

Naveen Dwivedi –
शिप्रा दर्पण!

जिस राज्य में विपक्ष नही होता या कमजोर होता हैं उस राज्य सत्ताधारी दल की विचारधारा के लोग कभी कभी विपक्ष की भूमिका अदा कर लेते हैं, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के इंदिरापुरम क्षेत्र में यह माहौल साफ़ तौर पर देखा गया जब इंदिरापुरम के बीजेपी के मंडल अध्यक्ष नवनीत मित्तल और आरएसएस के अधिकारी अविनाश चंद्र के बीच तीखी नोक झोंक हुई मुद्दा था बिहारी मार्केट।

कुछ समय से स्थानीय लोग अवैध बने बिहारी मार्केट का विरोध कर रहे हैं उनका कहना है कि खुले में मॉस व सब्जी और अन्य गलत कार्य इस अवैध बाजार में होते है जिसके चलते क्षेत्र में चोरी और स्नेचिक की वारदात बढ़ी है और बिहारी मार्केट के विरोध के समर्थन में आरएसएस के अधिकारी अविनाश चन्द्र कर रहे थे मगर बीजेपी के मंडल अध्यक्ष ने एक चौपाल पर एक बैठक के दौरान बिहारी मार्केट का समर्थन किया और कहा कि बिहारी मार्केट को हटने नही देना चाहिए वही उपस्थित बीजेपी के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय सिंह भी नवनींत मित्तल के सुर में सुर मिलाते नज़र आये और कहा कि बिहारी मार्केट के व्यापारियों को वैकल्पिक स्थान मिलना चाहिए।

वही दूसरी और स्थानीयजनों और आरएसएस अधिकारी अविनाश चन्द्र ने इस बात का विरोध किया कि वह अवैध बाजार है जिसके चलते रात में महिलाएं सड़क पर चल भी नही पाती खुले में गालियां दी जाती है और खुले में मांस की बिक्री होती हैं कुछ स्थानीयजन यहाँ तक कह गए की सत्ता आते ही भाजपा के कार्यकर्ताओं में सपा का रंग दिखने लगा हैं।हालांकि बात बिगड़ने की स्थति को देखते हुए स्थानीय लोगों ने सम्भाल लिया।

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लखनऊ के पत्रकार कबाब और रोगन जोश खाते थे इसलिए पांच कालीदास मार्ग का शुद्धीकरण जरूरी!

Ambrish Kumar : लोगों को पता नहीं होगा अखिलेश यादव पांच कालीदास में नहीं रहते थे. मायावती रहती थीं. पर दोनों के दौर में पत्रकारों के चक्कर में प्रेस कांफ्रेंस के बाद खाने में कई बार कबाब से लेकर रोगन जोश तक परोसा जाता था. ऐसे में किसी संन्यासी के प्रवेश से पहले शुद्धिकरण तो जरूरी है. शम्भुनाथ शुक्ल का सुझाव भी ठीक है कि आसपास के सभी रिहाइसी इलाकों को गोबर और गोमूत्र से शुद्ध किया जाना चाहिए. वैसे सारे अतिथि गृह भी इसमें शामिल किये जाएं.

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Amitaabh Srivastava मांसाहार के बाद शुद्धिकरण वाले तर्क से तो चौक अमीनाबाद नखास और अकबरी गेट जैसी जगहों पर गंगाजल के टैंकर रोज़ाना भिजवाने पड़ेंगे कई महीनों तक। हालांकि मुख्यमंत्री जी के निवास से ये सब दूर हैं लेकिन फिर भी माहौल में शुद्धता, साफ सफाई तो रहनी ही चाहिए। टुंडे कबाबी के यहां अब शायद करमकल्ले की टिकिया मिलने लगे शुद्धिकरण के inagural offer के तौर पर।

Pavan Kumar Yadav Sir JI a Jo bjp ke lakho karykarta hai Jo meet bhakosate hai kya unka bhi shudhi karan hoga

Ambrish Kumar व्यापक शुद्धिकरण कार्यक्रम हेतु मीडिया के वरिष्ठ पत्रकारों की मदद ली जानी चाहिए Shambhunath Nath

Shambhunath Nath अब अपन तो अदना-से पत्रकार। न लीपने के न पोतने के। और यूँ भी मैं तो प्याज़-लाहशुन तक नहीं खाता सो अपन क्या कहें।

Ambrish Kumar आप संपादक रहे हैं, इस समय तो गोरखपुर के स्टिंगर भी प्रभावशाली माने जा रहे हैं. अपने वाले ने भी पूछा था- भाई साहब,महाराज से कुछ कहना हो तो बताएं. दस साल से ज्यादा का साथ है.

Amitaabh Srivastava लखनऊ के खान पान में तो वैसे भी इस तरह के व्यंजनों का चलन रहा है जो होते शाकाहारी हैं लेकिन उनका ज़ायका मांसाहार को भी मात करता है. मिसाल के तौर पर ज़मीकंद और कटहल के कबाब – कई बार गोश्त से फर्क बताना मुश्किल हो सकता है. अब्दुल हलीम शहर की किताब ‘गुजिश्ता लखनऊ’ में लखनऊ के दिलचस्प खान पान का विस्तार से ज़िक्र मिलता है. राज्य सरकार के संस्कृति विभाग को नयी सरकार और उसके मुखिया को ये सब भी बताना चाहिए. आखिरकार संस्कृति कुल मिला कर राजनीति का ही हिस्सा है.

Deepu Naseer मुलायम शाकाहारी हैं, अखिलेश भी हैं क्या? अटल जी नॉनवेज के शौक़ीन थे, मोदी शाक़ाहारी हैं.. 7RCR का शुद्धिकरण हुआ था क्या?

Shriram Sen घृणा पाप से करो पापी से नही

Sushil Kaul आपने जानकारी दी तो पता चला कि बहन मायावती जी पांच कालीदास मार्ग में रहतीं, हम भी जब अपने नये मकान मे हमने भी वही किया था, जो योगी जी कर रहे, आपकी जानकारी से शुद्धीकरण का महत्त्व अब समझ आ रहा है। हाँ एक बात है, पत्रकार जो शाकाहारी के साथ-साथ मांसाहारी हैं, उनके लिए अलग भवन की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

Santosh Singh भाई उनका घर है जो मर्जी करें दूसरों को क्या?

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नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने लिए एक भस्मासुर चुन लिया है : दयानंद पांडेय

Dayanand Pandey : जो लोग महंथ आदित्यनाथ को जानते हैं , वह जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने लिए एक भस्मासुर चुन लिया है।

Nadim S. Akhter : उमा भारती से योगी आदित्यनाथ की तुलना ठीक नहीं। उमा जी बीजेपी की त्रिमूर्ति की प्रिय थीं, मंदिर आंदोलन से जुड़ी थीं और तब बीजेपी सत्ता में आने के लिए संघर्ष कर रही थी। उनका बीजेपी से रूठने-मनाने का दिल वाला रिश्ता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने चरम पर आसीन आडवाणी जी का सार्वजनिक तिरस्कार किया, बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, अपनी जिद में थका देने वाली पदयात्रा की, फिर पार्टी में लौटीं और आज केंद्र में मंत्री हैं।

योगी आदित्यनाथ दूसरी मिट्टी के बने हैं। उमा जी का युग और था, ये युग कुछ और है। और मुझे ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव से अच्छा यूपी चला के दिखा देंगे। मुज़फ्फरनगर अखिलेश की सरपरस्ती में ही हुआ था और बाबरी मस्जिद कांग्रेसी नरसिम्हा राव के शासन में गिराई गई थी।

Yusuf Ansari : योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया जाना चुनावी नतीजों के बाद दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में कही गई बाते से मेल नहीं खाता। प्रधानमंत्री ने कहा था जब पेड़ फलदार हो जाता है तो वो झुक जाता है। अब भाजपा के नरम होने का वक्त आ गया है। लगता है कि 325 फूल खिलने के बाद पेड़ और तन कर खड़ा हो गया है। इसका दूसरा पहलू ये है कि मोदी ने दूर की कौड़ी चली है।

योगी अगर सत्ता से बाहर रहते तो अपने हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर आए दिन बवाल मचा सकते थे। लिहाज़ा मोदी ने योगी को सत्ता की कमान देकर इस फायर ब्रांड नेता को संविधान और कानून के दायरे में बांध दिया है। मोदी ने योगी को “सबका साथ, सबका विकास” का अपना एजेंडा लागू करके दिखाने की बड़ी चुनौती दे दी है। देश का प्रधानमंत्री हो या प्रदेश का मुख्यमंत्री काम सभी को संविधान के दायरे में ही रह कर करना है। लिहाजा योगी के मुख्यमंत्री बनने पर किसी को डरना चाहिए।

अभी तो योगी को नेता चुना गया है। अभी तो शपथ होगी। सरकरी का एजेंडा सामने आएगा। तब कहीं जाकर पता चलेगा कि मोदी के चहेते योगी सचमुच विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे या फिर सांप्रदायिक ताक़ते विकास के चोले में छिप कर यूपी को ठीक उसी तरह विनाश के रास्ते पर ले जाएंगी जैसे तालिबानी सोच ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद करके दिया है। आखिर मोदी जी ने खुद कहा है कि सरकार बनती भले ही बहुमत से हो लेकिन चलती सर्वमत से है। ये देखना दिलचस्प होगा कि प्रचंड बहुमत वाली इस सरकार के फायरब्रांड मुखिया सर्वमत कैसे बनाते है।

पत्रकार त्रयी दयानंद पांडेय, नदीम एस. अख्तर और युसूफ अंसारी की एफबी वॉल से.

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पत्रकार पुष्य मित्र ने योगी आदित्यनाथ की तुलना शहाबुद्दीन से कर डाली

Pushya Mitra : दिलचस्प है कि कुछ महीने पहले कुछ लोग शहाबुद्दीन की तारीफ जिस अंदाज में करते थे, आज कुछ दूसरे लोग योगी आदित्यनाथ की तारीफ उसी अंदाज में कर रहे हैं। गुंडई से किसी को परहेज नहीं है, बस गुंडा अपना होना चाहिये।

बिहार में प्रभात खबर अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार पुष्य मित्र के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Chitra Agrawal : आप शहाबुद्दीन और आदित्यनाथ की तुलना कैसे कर सकते हैं? और गुंडा जैसे शब्द? दोनों में कोई समानता, कोई तुलना नहीं। हां हिन्दुत्ववाद के मुद्दे पर आप उसे नापसंद कर सकते हैं लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि उन्हें शहाबुद्दीन के साथ खड़ा कर दिया जाए। शहाबुद्दीन के कारनामों के बारे में तो खुद आपने इतना लिखा है लेकिन योगी आदित्यनाथ का एक भी ऐसा काम नहीं है। हां यह ज़रूर है कि वो अपने फायरी विचारों के कारण कट्टरवादी नेता समझे जाते हैं लेकिन आजतक एक भी दंगे करवाने, लोगों के साथ बुरा करने या किसी क्राइम में .योगी आदित्यनाथ का नाम नहीं आया है… और गुंडा अपना होना चाहिए…कैसी भाषा है यह? सच में… क्या आपको ऐसा वाकई लगता है…। दरअसल दूसरों के विचारों, पसंद, नापसंद के प्रति खुलापन होना चाहिए। आप के विचार आपके अपने हैं लेकिन दूसरों के भी अपने स्वतंत्र विचार हैं, अगर उनका आपसे इत्तिफाक नहीं है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप उसे जज कर सकते हैं या उसकी पसंद को गुंडे का नाम दे सकते हैं।

Pushya Mitra मेरी नजर में दोनों गुंडे हैं। इनका देश में और मानवता की भावना में कोई भरोसा नहीं है।

Chitra Agrawal फिर आपमें और उन न्यूज़ चैनल के अन्य पत्रकारों में क्या फर्क है जो अपनी राय के आधार पर लोगों को जज करते हैं और बिना सही बात जाने उनको प्री कन्सीव्ड नोशन्स के आधार पर कतारों में खड़ा कर देते हैं।

Pushya Mitra आप सोच सकती हैं। मगर मेरे लिये अपना सच ही महत्वपूर्ण है। मैं गलत को गलत कहना कभी नहीं छोड़ूंगा

Chitra Agrawal एक बात और जैसा कि आपने खुद अपनी पोस्ट में मोदी जी के लिए लिखा था कि जब तक मोदी के विरोधी रहेंगे वो और मज़बूत, और ज्यादा मज़बूत होंगे, ज़रा सोचिए अब वैसा ही कुछ आप योगी आदित्यनाथ के साथ कर रहे हैं। लोग उन्हें जितना नीचे गिराएंगे, दरअसल में उनकी छवि उतनी ही करिश्माई बनेगी।

Pushya Mitra इस चक्कर में मैं एक दंगाई मानसिकता के व्यक्ति का समर्थन नहीं कर सकता।

Jai Kumar Singh पुष्य मित्रा जी आपके शब्दों में अजीब सी बू आती है! एक पत्रकार के लिए अशोभनीय है। योगी आदित्यनाथ जी को जनता ने बहुमत से चुनाव किया है। आपकी गाली योगी के लिए नहीं वरन जनता को है। खास विचारधारा के साथ पत्रकारिता छोड़ दें। धन्यवाद!

हिमांशु कुमार घिल्डियाल ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी पूर्वाग्रही पत्रकार ही पत्रकारिता को बदनाम करते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया के आने के बाद इनकी प्रासांगिकता और विश्वसनीयता ही ख़त्म हो गई है तथा इन पर आम आदमी भरोसा ही नहीं कर पाता है। ये सही खबर को छुपा कर, छापने की कीमत मांग कर,तोड़ मरोड़ कर तथा एक निश्चित एजेंडे पर चलकर अपने ऐशो आराम का सामान जुटाते हैं। अब तक की सभी सरकारों ने इस तथाकथित चौथे स्तम्भ को रीढ़ विहीन कर दिया है।

Ajay KS पुष्यमित्र जी आज आपका पाला पक्के टाइप के भक्तों से पड़ा है। बिरहिनि के खोंता में हाथ दाल दिए हैं।  फिर भी डंटे रहिये ।

Sumit Choudhary आपको योगी को समझने के लिए गोरखपुर जाना पड़ेगा। कहीं आप भी योगी को वैसा ही तो नहीं समझ रहे जैसा मोदी को गुजरात दंगे के बाद समझा गया था।

Anand Sharma कहीँ आप त्वरित अतिवादी प्रतिक्रिया तो नहीँ दे रहे शाहाबुद्दीन और योगी को एक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा कर……मैं योगी को सम्पूर्णता से जानना चाहता हूँ

Pushya Mitra आप एक बुरे व्यक्ति में अच्छाई तलाशना चाह रहे हैं। आप योगी को इसलिये मौका देना चाहते हैं क्योंकि अगर वह बुरा भी हुआ तो आपका हमारा नुकसान नहीं करेगा।

Jai Kumar Singh क्या बुराई है बतायें। हिंदू होना गुनाह है और हिंदुत्व की बातें अपराध है ? उन्होंने कब और कहां दूसरे धर्म के लोगों को गाली दी है?

Praveen Jha योगी-ओवैसी का भेद निकालिए। शहाबुद्दीन जी तो जेल में ही रहते हैं।

Pushya Mitra मैं साम्राज्य के मामले में कह रहा हूँ। बाकी योगी की तुलना छोटे ओबैसी से हो सकती है। बड़ा भाई पढ़ा-लिखा समझदार है।

Praveen Jha यह अवश्यंभावी था। इसमें बित्ता भी शक नहीं था। पाँच बार लगातार सांसद रहे। यूपी में उनसे बड़े कद का कोई नेता नहीं। हिंदुत्व एजेंडा के पूरे भारतवर्ष में सबसे बड़े नेता हैं योगी (आडवाणी जी और मोदीजी के बाद)। इतनी बड़ी बहुमत में किसी ऐरू-गैरू के चुनाव का मतलब ही नहीं।  बाकी, योगीजी का एक और पहलू है, उस पर फिर कभी। वो मुलायम जी के खास रहे हैं, और बैकग्राउंड इमेज अलग रखी है। बड़े टैक्टिकल आदमी हैं। मुझे पक्का यकीन था, उनके नतीजे के बाद वाले दो मिनट के भाषण से ही।

Shubam Kuamar Rai योगी और शहाबुद्यीन की तुलना करना मानसिक दिवालीएपन की निशानी है

Dharmendra Pandey योगी जनता की चुनी हुई सरकार के सदस्य और जननेता हैं तथा लोकतंत्र की अपनी मर्यादा है। शहाबुद्दीन अदालत द्वारा दोष सिद्ध व्यक्ति हैं पर योगी के साथ ऐसा कुछ नहीं है।  दोष देने वाले तो उच्चतम न्यायालय द्वारा बरी मोदी को भी बहुत कुछ कहते हैं पर एक पत्रकार की हैसियत से बस इतना ही कहना चाहूंगा कि जब तक व्यक्ति न्यायपालिका द्वारा दोषी न पाया जाए तब तक खुद ही व्यक्तिगत आकलन के आधार पर कोई कटु शब्द प्रयोग न करें। यही नियम राष्ट्रदोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति पर भी लागू होता है, जबकि उस गुनाह पर खिलाफ का अदालती फैसला न आया हो।

Indu Bhushan शाहबुद्दीन से योगी की तुलना करके आपने हाईट ही कर दिया। योगी पर आज आपका लगातार कई पोस्ट पढ़कर आपकी मानसिक स्थिति के बारे में ही सोचता रहा हूँ। सर पानी पीजिये और आराम कीजिये।

Abhay Dubey तिहाड की बैरक और लखनऊ की गद्दी मे कुछ तो अंतर होगा?

Satyendra Singh आपके तर्क के हिसाब से भगवान श्री राम भी और देश के सीमा प्रहरी या सैनिक भी “गुंडो” की श्रेणी मे आयेंगे, क्योकि वे भी नर संहारक हैं! धन्य हैं आपकी मानसिकता और पत्रकारिता ।

Naresh Jha बेटा बिहार में रहते रहते लालू वाला बुद्धि हो गया है का। कुछ दिन आराम क्यों नहीं कर लेते। पत्रकार का कमी है क्या। एक से एक नमूने हैं।

Girish Pandey आप जैसे गंभीर आदमी को सुनी सनाई बात पर टिप्पड़ी नही करनी चाहिए।

Navin Kr Roy आप पत्रकार हो सकते हो पर यह जरूरी नही कि आप बुद्धिजीवी भी हो। जैसे कोई डिग्रीधारी हो सकता है,पर जरूरी नही कि शिक्षित भी हो। पता नहीं क्यों अधिकाँश पत्रकार अपने आप को राष्ट्रीय कर्णधार क्यों समझने लगते हैं। अखबारों में खबर लिखो भाई, तुम्हारी सोच और ज्ञान की सीमा इससे अधिक नही है। जैसे ही तुमने शहाबुद्दीन से योगी जी की तुलना की, वैसे ही तुम्हारे ज्ञान की सीमा का पता चल गया।

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योगी आदित्यनाथ को उदय प्रकाश की कई कहानियां और कविताएं याद हैं!

Satyendra PS : महंत आदित्यनाथ। शपथ ग्रहण के बाद यूपी के मुख्यमंत्री हो जाएंगे। यूपी के मुख्यमंत्री से मतलब मिनी प्रधानमंत्री। नरेंद्र मोदी द्वारा महंत को मुख्यमंत्री बनाना वास्तव में बहुत साहसिक कार्य है। इस साहस के लिए कॉमरेड मोदी को लाल सलाम। आदित्यनाथ उस दौर के हैं जो पीढ़ी Uday Prakash की पीली छतरी वाली लड़की पढ़कर बढ़ रही थी। मेरे लिए तो खुशी की बात है कि आदित्यनाथ भी उदय प्रकाश के न सिर्फ अच्छे पाठक रहे हैं, बल्कि उनको कई कहानियां और कविताएं याद थीं। साथ ही यह भी खुशी है कि लंबे समय से शीर्ष राजनीति से वंचित गोरखपुर को फिर एक शीर्ष नेता मिला है। उम्मीद की जाए कि उस इलाके की तकदीर और तस्वीर बदलेगी।

उदय प्रकाश जब गोरखपुर में अपने रिश्तेदार की याद में आयोजित कार्यक्रम में गए थे और आदित्यनाथ के साथ मंच साझा किया था तो उस समय बड़ा बवाल हुआ था। आदित्यनाथ ने उदय प्रकाश की कहानियों व कविताओं का कई मौकों पर उल्लेख किया। इसके चलते उदय प्रकाश को दक्षिणपंथी और जाने क्या क्या घोषित किया गया था। कथित और असली तमाम मतलब ढाई सौ से ऊपर वामपंथियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था कि उन्होंने कैसे योगी के साथ मंच साझा किया? उदय प्रकाश को खूब गरियाया गया…

है न मजेदार!!

महंत आदित्यनाथ को दक्खिन टोले के धुर आलोचक की ओर से ढेरों शुभकामनाएं। उम्मीद है कि वह पूर्वांचल की गरीबी मिटाने और पूरे प्रदेश को एक बेहतर मुकाम देने में सफल होंगे और भाजपा को मिले प्रचंड जनादेश का लाभ उठाते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे।

बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी, दिल्ली में कार्यरत पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Saurabh Pandey उसी ‘बदनामी’ के कारण सम्मान वापसी का कु/सु चक्र रचा और चला गया था। उसे भी नयनतारा हथिया ली थी..

Satyendra PS जिन लोगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाए थे, वह साहित्य क्षेत्र की एक गिरोह है. उनको कोई गलतफहमी नहीं थी. उदय़ जी ने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी लौटाया तब भी बाकायदा इस गिरोह के कुछ सदस्यों ने अभियान चलाता था। लेकिन जो लोग गिरोहबंदी से हटकर उदय जी को व्यक्तिगत जानते हैं, वह उनकी भावनाओं को समझते हैं.

Saurabh Pandey सम्मान लौटाने वाले पहले लेखक कवि उदय प्रकाश ही थे। चाहे जिस नाम से लौटाए हों। वो योगी के साथ मंच साझा करने का प्रायश्चित ही था। बाद में ये दूसरे रूप में प्रचार पा गया

Satyendra PS मुझे उस समय का आपका स्टैंड नहीं पता था Saurabh Pandey जी। अभी भी मैं गैर साहित्यिक आदमी हूं. साहित्य थोड़ा बहुत समझ मे आ भी जाए तो कविता फविता तो बिल्कुल समझ में नहीं आती है। बकिया हमें आज तक समझ में न आया कि उदय जी का अपने रिश्तेदार की बरखी में जाना बुरा था, या योगी आदित्यनाथ वहां आए थे, वह बुरा था। या आदित्यनाथ का उदय प्रकाश के लेखन का प्रशंसक होना वामपंथी बंधुओं को नागवार गुजरा था. साहित्यकार और वामपंथी लोगों को दर्द किधर से उठा था. यह आज तक समझ में न आया.

Satyendra PS मने हम अपने वामपंथी साथियों से जानना चाहेंगे कि पुरस्कार लौटाना अगर उदय जी का प्रायश्चित था तो वह पूरी तरह पाप मुक्त हुए हैं या उनको काशी ले जाया जाए। अब वामपंथी भाइयों के इतना चिढ़ने और दक्खिन टोला वाले भाइयो के उदय प्रकाश का प्रशंसक होने से कुछ कुछ हम्मै भी संदेह होता है. दक्खिन टोला वाले तमाम लोग उदय प्रकाश की कहानियों के प्रशंसक हैं. एक रोज मैंने कहा कि आप अपने किताब के पहले पेज पर डिस्क्लेमर छपवाइए कि दक्खिन टोले वाले लोग इस किताब को न पढ़ें, लेकिन उदय जी कहते हैं कि किसी को पढ़ने से रोकना कहां का न्याव है.

Amit Pandey वो सिर्फ लेखक हैं। कोई भी पंथी नहीं हैं।

Satyendra PS मुझे भी कुछ ऐसा लगता है अमित जी. लेकिन साहित्यकार लोग जब कुछ कुछ कहते हैं तो कुछ कुछ गड़बड़ लगने लगता है अचानक. और आप शायद इससे वाकिफ नहीं हैं. आदित्यनाथ से मंच साझा करने के कारण उनके खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया गया। उसके कई साल बाद जब उन्होंने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में पुरस्कार लौटाने की घोषणा की तो वामपंथी भाई लोगों ने नए सिरे से अभियान चलाया कि आदित्यनाथ के साथ बैठक र उन्होंने जो पाप किया था, पुरस्कार लौटाकर उसका प्रायश्चित कर रहे हैं.

Shashi Bhooshan आप पत्रकार हैं। भूत भले न जानें भविष्य बेहतर समझते हैं। अब सम्मान के लायक अवस्था में भी पहुँच चुके हैं। लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है आपने यह संस्मरण लिखकर अच्छा नहीं किया। या पता नहीं आपने यह संस्मरण लिखने का इंतज़ार ही किया हो। कुछ भी हो सकता है। आज आदमी अपनी विवेचना के साथ कहीं तक जा सकता है।

Bhoot Nath भाय जी योगी से नाल जोड़नी है तो सीधे जोड़िये. उदय को बहाना मत बनाइये. बाकी आपने यह मजेदार कहा कि योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद हैं? किसने बताया योगी ने? गजब है भई. वैसे देश में बढ़ती सांप्रदायिकता व फासीवाद के लिए चिंतित उदय जी ने कुछ लिखा की नहीं योगी भाई के सीएम बनने पर!

Satyendra PS महंत आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना यूपी के इतिहास की एक अनोखी परिघटना है Shashi Bhooshan ji. उदय जी का उनके साथ मंच साझा करने के बाद उठे तूफान को भी अनोखा माना जा सकता है। वह क्यों हुआ कैसे हुआ किसने किया कैसे गिरोहबंदी हुई सब कुछ अजीब था। उस पर चर्चा एक स्वाभाविक सी बात है।

Satyendra PS योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद थीं, यह लिखा मैंने Bhoot Nath ji. अब का पता नहीं। यह उन दिनों छपी खबरों से और अपने वामपंथी साथियों की सुलगन से पता चला था, वरना आदित्यनाथ को मैं साइंस का विद्यार्थी ही मानता था जो कुसंगत में पड़ गया हो। मेरा ऑब्जर्वेशन रहा है कि साइंस स्ट्रीम वाले कट्टर होते हैं चाहे वह वामी हो या दक्खिन टोले का। नाल जोड़ने वाली बात आपने बहुत महत्त्वपूर्ण कही। गोरखपुर में मैंने बमुश्किल 6 माह काम किया है और उस दौरान 10 मुलाकातें हुई होंगी। वो भी प्रोफेशनल। दिल्ली में आने के बाद मैं अपने काम में लग गया। वो अपने काम में लगे ही थे। दूसरे तरीके से जरूर नाल जुड़ा हुआ है। गोरखपुर में मेरे 90% रिश्तेदार, परिजन आदित्यनाथ से जुड़े हैं। सब अब बम बम हैं। उस साइड से मैं चाहकर भी कभी नाल तोड़ न पाया!

Satyendra PS हम तो यही उम्मीद करेंगे कि वो अच्छा काम करें। बाकिया नरेंद्र मोदी ने 3 साल में फेंकने के अलावा देश में कुछ भी नही किया। उनके 5 काम भी नही गिनाए जा सकते जो उनकी सरकार के हों और उसका कोई इम्पैक्ट देश या पब्लिक पर सकारात्म क पड़ा हो। बनारस वाले 3 साल से काशी को क्योटो बनने के इन्तजार में हैं। हां, गोरखपुर वालों को उम्मीद है। महज डेढ़ साल के लिए गोरखपुर से वीर बहादुर सिंह सीएम बने थे और उतने ही समय में गोरखपुर जितना चमका था उतना ही आज भी चमक रहा है। कुछ चमक नष्ट भी हुई है। रामगढ़ ताल, नेहरू पार्क, तारा मंडल, इंदिरा पार्क जो भी खूबसूरत दिखे वह सिंह की योजनाएं थीं। हम तो उम्मीद करेंगे कि आदित्यनाथ गोरखपुर मंडल को टूरिस्ट हब के रूप में डेवलप करें जिसमे देशी विदेशी पर्यटक गोरखपुर में ठहरें। वहां रामगढ़ ताल में दिन भर बोटिंग, उसके अगले बगल विकसित दिव्य मार्केट में लोकल शॉपिंग करें। बखिरा झील में एक दिन प्रवासी पक्षियों को देखने में बिताने के साथ नौकायन और बोट में कुछ नाइट स्टे टाइप करें। वहां से लुम्बिनी घूमने जाएं। लुम्बिनी से पोखरा नेपाल के हिल स्टेशन का आनन्द लें। और गोरखपुर लौटकर आएं तो बुद्ध स्थल कुशीनगर में एक दिन बिताकर घर के लिए फ्लाइट पकड़ें। यह पूरी तरह 5 दिन का पॅकेज हो सकता है जो गोरखपुर मंडल की तस्वीर बदल देगा। यह इंफ्रा डेवलप में महज 6 महीने लगेंगे। साथ ही गोरखपुर के लिए अब सस्ती विमान सेवा भी शुरू हो जाएगी जिससे आफ सीजन में फ्लाइट से हम लोग भी घर जा सकेंगे। रेल तो प्रभु जी खा ही गए 2 साल में। हम तो अच्छे की ही उम्मीद करेंगे। हेल्थ, एजुकेशन में भी बहुत कुछ साल भर में करके पूर्वांचल को डेवलपमेंट मॉडल बनाया जा सकता है।

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योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है!

Abhishek Srivastava : अब योगी के बारे में कुछ बातें। मैं मानता हूं कि योगी आदित्‍यनाथ भाजपा के लिए बिलकुल सही चुनाव हैं। योगी को चुनकर भाजपा ने जनादेश को सम्‍मान दिया है। भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिहाज से भी यह उपयुक्‍त चुनाव है। तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं योगी के चयन को लेकर आ रही हैं। कई जगह पढ़ा कि कुछ लोगों के मुताबिक वे भाजपा के लिए भस्‍मासुर साबित होंगे। ऐसे लोग योगी को जानने का दावा करते हैं। मुझे लगता है अभी वह वक्‍त नहीं आया कि हम योगी की तरफ़ खड़े होकर उनके चुनाव का विश्‍लेषण करें।

मेरा मानना है कि अब भी मोदी, आरएसएस और भाजपा की ओर खड़े रह कर ही योगी पर बात होनी चाहिए। जो लोग मोदी को जानते हैं, वे यह चूक न करें कि भस्‍मासुर वाली बात मोदी खुद समझ नहीं रहे होंगे। आखिर मोदी जैसा ताकतवर नेता अपने लिए भस्‍मासुर को क्‍यों खड़ा करेगा भला? मामला यह है ही नहीं। जबरन दोनों के बीच अंतर्विरोध को दिखाकर खामख़याली न पालिए। फि़लहाल, मोदी, योगी, संघ और भाजपा के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। हां, आखिरी वक्‍त में मनोज सिन्‍हा का नाम क्‍यों और कैसे कटा, उस पर बात बेशक की जानी चाहिए।

मोदीजी का तात्‍कालिक एजेंडा यह है कि 2019 तक अबकी मिले हिंदू वोटों को कंसोलिडेट रखा जाए और कोई नुकसान न होने पाए। केशव मौर्या और शर्मा इसमें सहायक होंगे। दीर्घकालिक एजेंडा मेरी समझ से दक्षिणपंथी राजनीति का एक लंबा खिलाड़ी तैयार करना है जो 2024 में मोदीजी का उपयुक्‍त उत्‍तराधिकारी बन सके। मोदीजी जानते हैं कि वे बालासाहेब ठाकरे नहीं हो सकते। अगर वैसा बनने की कोशिश करेंगे तो जो इमारत खड़ी कर रहे हैं वह उनके बाद ढह जाएगी। योगी इस लिहाज से मोदी के सक्‍सेसर हैं और योगी खुद इस बात को समझते होंगे।

इसीलिए योगी गरम दिमाग से कोई काम नहीं करेंगे, मुझे भरोसा है। वे मोदी के विकास और न्‍यू इंडिया के आड़े कम से कम 2019 तक नहीं आएंगे क्‍योंकि इसी में उनकी भी भलाई है। हां, योगी के सामने एक चुनौती अवश्‍य होगी- गोरखनाथ मठ की समावेशी परंपरा के साथ हिंदुत्‍व की राजनीति का संतुलन बैठाना। मुझे लगता है कि अगर योगी का सामाजिक काम पहले की तरह चलता रहा, तो वे बड़ी आसानी से एक राज्‍य के प्रमुख के बतौर और एक मठ के महंत के बतौर अपनी दो अलहदा भूमिकाओं को खे ले जाएंगे। मुझे फिलहाल कहीं कोई लोचा नज़र नहीं आ रहा है योगी के चुनाव में। यह नरम हिंदू वोटरों को कट्टर हिंदुत्‍व समर्थक बनाकर एकजुट करने का एजेंडा है। योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है। असल लड़ाई यहां है। बशर्ते कोई लड़ सके।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Akhilesh Singh योगी ..मोदी-2.0 होंगे…जैसे मोदी ..अटल-2.0 हुए थे …और वैसा ही गुणात्मक कंटिनुअम भी होगा …

विभांशु केशव इस मुद्दे पर लड़ेंगे तो जो कट्टर हो चुके हैं वो और कट्टर होते जायेंगे और फेसबुक व्हाट्स एप पर दौड़ने वाले मन्त्रों के सहारे दूसरों को भी कट्टर बनाते जायेंगे। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने जो वादे किए हैं उन पर लड़ाई हो सकती है तब शायद जनता भी साथ खड़ी हो। जनता और कुछ विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त युवाओं के वैचारिक स्तर का पता लगा लेना चाहिये

Abhishek Srivastava फ़ोन पर बात करेंगे। यहाँ समझाने में बहुत लिखना पड़ेगा।

Majid Ali Khan अभिषेक जी क्या हिंदुत्व की संतृप्ति के लिए अहमदाबाद को दोहराए जाने की संभावना उत्तर प्रदेश में कहीं नज़र आ रही है या नहीं कुछ रौशनी डालें, यानी मुसलमानों का कुछ दिन खुलकर कत्लेआम हो और हिंदुत्ववादी वोटर संतुष्ट हो जाए और अपने आप को विजयी समझ कर शांति से रहता रहे

Abhishek Srivastava कुछ भी हो सकता है होने को तो, लेकिन हमें ऐसा लगता नहीं है कि कुछ दुर्दांत होगा। मने लगने का मामला है। अगर ज़रूरत लगेगी उन्हें तो उसे वे पूरी करेंगे। चूंकि ऐसा कुछ किये बगैर ही प्रचंड बहुमत है, तो हिन्दू वोटर आलरेडी संतुष्ट है। योगी के cm बनने से अब वो चैन की नींद सोयेगा की रामराज आ गया।

Poojāditya Nāth मुझे लगता है कि बाबा को साल भर में निपटा दिया जाएगा। मतलब राजनीतिक अंत हो जाएगा ताकि ये ज़्यादा फड़फड़ाए नहीं।

Abhishek Srivastava बाबा कौन है अगर आप समझते हैं तो ऐसा नहीं कहेंगे।

Akhilesh Pratap Singh सही है….लेकिन योगी के आने से पहले हिंदुओं में लिबरल स्पेस का घटना शुरू हो चुका है और केवल गोरखनाथ मठ की छवि की बात करें तो उसकी कथित लिबरल छवि की पोल अवैद्यनाथ के जमाने में ही खुल चुकी थी….बाकी ” समाजसेवी और शिक्षा प्रेमी ” तो मुख्तार अंसारी भी हैं और रघुराज प्रताप सिंह भी…..यह बात बिल्कुल सही है कि मोदी और योगी में अंतर्विरोध खोजना बेमतलब है……

Abhishek Srivastava मामला मठ की छवि का उतना नहीं है जितना मठ की परंपरा और छवि के बीच टकराव का है। हम मठ की परंपरा पर ज़ोर दें तो छवि बिगाड़ने वालों को नंगा कर सकते हैं, साथ ही हिंदू लिबरल स्‍पेस को भी बचा सकते हैं। दिक्‍कत यह है कि इस एंगिल से बात करने को कोई तैयार नहीं।

Akhilesh Pratap Singh अब कहां परंपरा…अब तो हिंदू का मतलब बीजेपी-आरएसएस समर्थक कमोबेश मान लिया गया है…यही बिल्ला हटाए न हट रहा….जबकि हिंदू वह है नहीं, जिसका ढोल पीट रहे हैं सब लोग…बहुत विनम्रता और धीरज की जरूरत है मनाने के लिए और मानने के लिए….लेकिन शोर इतना है और हर तरफ से शोर है कि हिंदू के बारे में बात करना बीजेपी के बारे में बात करना मान लिया जा रहा है…..डेडली साउंड मिक्सिंग

Abhishek Srivastava यह बिल्‍ला हटाने के लिए काम कौन कर रहा है? एक नाम गिनवाइए। दरअसल बुनियादी लड़ाई यहां है जहां से आप संघ को नाथ सकते हैं, लेकिन हमारे यहां लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से ही परहेज है तो अल्‍ला खैर करे।

Akhilesh Pratap Singh लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से परहेज है … 🙂

Abhishek Srivastava मजाक नहीं कर रहे, सीरियस हैं। क्‍यों नहीं कोई जाकर बताता जनता को कि हिंदू नाम की चिडि़या वेदों में नहीं है। कहीं नहीं है। जो है सनातन है। इनके हिंदुत्‍व के बरक्‍स सनातन धर्म को खड़ा करिए फिर देखिए कैसी हवा निकलती है।

Akhilesh Pratap Singh मजाक नहीं कर रहा….आप ठीक कह रहे हैं…लेकिन यह ऐसा प्रोजेकट है, जिसके लिए अपार धीरज की जरूरत है…चुनावी चिंता के पार जाने वाली नजर की…गांधी…गांधी…गांधी

Jaya Nigam योगी, मोदी के सक्सेसर हैं, 2024 के लिये, यह कैसे ?

Abhishek Srivastava वो ऐसे कि ऐसे के पीछे ऐसा ही होता है।

Shashank Dwivedi मनोज सिन्हा का पत्ता क्यों कटा?

Abhishek Srivastava राजनाथ सिंह से पूछिए

K Kumar योगी से योगी उनके समर्थक रोटी कपड़ा और मकान से पहले मंदिर की उम्मीद कर रहे हैं दादा। ऐसे में यदि योगी मोदी की राजनीति करेंगे तो उनका बेस खिसकेगा और योगी, योगी की राजनीति करते हैं तो मोदी धराशायी हो सकते हैं। बस अपना एक यह भी थीसिस है।

अभिषेक श्रीवास्तव का लिखा यह भी पढ़ सकते हैं….

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अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा : अभिषेक श्रीवास्तव

Abhishek Srivastava : ‘उत्‍सव के नाम पर उपद्रव नहीं होना चाहिए’ – बतौर भावी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ का यह पहला निर्देश प्रशासन के लिए आया है। रामगोपाल वर्मा की फिल्‍म ‘रक्‍तचरित्र-1’ का आखिरी सीक्‍वेंस याद करिए जब मुख्‍यमंत्री बनने के बाद रवि ने सभी बाहुबलियों को अपने घर खाने पर बुलाकर ज्ञान दिया था कि जंगल का राजा केवल एक होता है और राजा चूंकि वो है, इसलिए बाकी जानवर अब हुंकारना बंद कर दें। इस हिसाब से सोचिए तो उम्‍मीद बनती है कि अगला निर्देश मुख्‍यमंत्री पद पर शपथ ग्रहण के बाद उन लोगों के लिए आएगा जो प्रशासन को अपनी जेब में रखने का शौक पालते हैं यानी गुंडे, बदमाश और माफिया।

उत्‍तर प्रदेश नाम के जंगल में अब पशुता केंद्रीकृत होगी। इससे आम आदमी को थो़ड़ा राहत बेशक़ मिलेगी। गुजरात के सूरत में कुछ साल रहकर आया मेरा साला कल बता रहा था कि वहां अपराध, छिनैती, गुंडई बिलकुल गायब है और जनता चैन से रहती है। अपने काम से काम रखती है। यूपी की राजनीतिक सत्‍ता में धर्म और बाहुबल का यह विलय यूपी को गुजरात बनाएगा। यह एक भी मुसलमान को टिकट दिए बगैर केवल हिंदू वोटों से बहुमत की सरकार बनाने का स्‍वाभाविक विस्‍तार है। योगी अगर कुछ न करें, तो भी उनका नाम और चेहरा काफ़ी होगा। अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा।

योगी एक साथ तीन चीज़ों की नुमाइंदगी करेंगे- राज्‍य के राजपूत-भूमिहार नेतृत्‍व बहुल धार्मिक मठों की; मज़बूत स्‍टेट की; और वर्ण व्‍यवस्‍था के मुताबिक रक्षक-धर्म की (आंतरिक और बाहरी खतरों से)। सवाल है कि विरोधी दल इस स्थिति से कैसे निपटेंगे? अगर जनता को ताकतवर स्‍टेट, योद्धा जाति से आने वाला सिपहसालार और धार्मिक मठों का रहनुमा तीनों चीज़ें एक पैकेज डील में मिल रही हैं, तो जनता स्‍टेट को कमज़ोर करने वालों को चारा क्‍यों डालेगी? कांग्रेस, सपा, बसपा, वाम, लिबरल, नागरिक समाज, एनजीओ, समाजवादी- किसी के पास इस फॉर्मूले की काट हो तो बताए।

तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म ले लिया है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

Punya Prasun Bajpai : शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग…. ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है। ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है। ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है। ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है। ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है। ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे।

यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया। लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था। संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी। तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी।

संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता। लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कहीं ना कहीं संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया।

ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा। अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उन पर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेंगे।

इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेंगे कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नहीं सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिंदू है तो फिर उसके पिछडे़पन का इलाज कैसे होगा। तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था। यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरिये उभारा जायेगा।

जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है। एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी। 50 के दशक में तो गोरखपुर मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया। लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई।

यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में बदल दिया है उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा। तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी। लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा, इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी।

आजतक में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की एफबी वॉल से.

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ये योगी जो आज यूपी के CM बने हुए हैं, ये ‘आपकी’ ही देन हैं, प्रभु! : अभिषेक उपाध्याय

Abhishek Upadhyay : योगी आदित्यनाथ को शपथ लेने से पहले इस देश के कथित सेक्युलरों का, कथित बुद्धिजीवियों का जमकर शुक्रिया अदा करना चाहिए। ये है प्रतिक्रियावाद की ताकत। योगी क्यों CM बने? पांच बार से गोरखपुर का सांसद होने के बावजूद गोरखपुर बुरी तरह खस्ताहाल है। गोरखपुर की सड़कें……. हे राम….। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली….. सब का सब भगवान भरोसे। राप्ती की बाढ़ आज भी पूर्वांचल का काल है। हर साल सैकड़ों नौनिहाल इंसेफेलाइटिस यानि मस्तिष्क ज्वर के चलते अकाल मौत मर जाते हैं। हर साल……..। फिर भी, न कोई शोर। न कोई सुनवाई। न कोई इलाज।

पर अचरज की बात है कि इन आधारों पर कभी योगी का मूल्यांकन किया ही नहीं गया। इन सेक्युलरों की नज़र में योगी का मतलब सिर्फ हिन्दू…हिन्दू…और हिन्दू है। साल दर साल योगी के नाम पर सिर्फ हिन्दू…हिन्दू…हिन्दू… का हव्वा खड़ा करते इन “पुरूस्कार वापसी टाइप” बुद्धिजीवियों ने योगी को देश के सबसे बड़े हिन्दू हृदय सम्राट की कतार में खड़ा कर दिया। योगी ने असल जिंदगी में एक चींटी भी न मारी होगी पर इन महान आत्माओं ने उन्हें मुसलमानों के खिलाफ सबसे बड़ा खतरा साबित कर दिया। योगी के ख़िलाफ़ तमाम बातों के बीच ये एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि गोरखनाथ मंदिर के चिकित्सालय में सस्ते पैसों पर इलाज कराने वालों में अच्छी खासी संख्या मुसलमानो की भी है। पर ये बात कहते हुए सेक्युलरों की जीभ जल जाएगी क्योंकि फिर हिन्दू-मुसलमान का गणित कहां सेट होगा? फिर योगी को सबसे बड़ा खतरा कैसे बताया जाएगा?

तो ये योगी जो आज यूपी के CM बने हुए हैं, ये आपकी ही देन हैं, प्रभु। आपने ही इनका कद इतना बड़ा, इतना विकराल बना दिया है। आपने ही इन्हें हिन्दू हृदय का ऐसा सम्राट बना दिया है कि हिन्दू अपनी रोजमर्रा की सारी तक़लीफ़ें, सारा दर्द, सारी वादाखिलाफी भूलकर भी अपने “मसीहा” के नाम पर हिंदुत्व की मुहर मार आता है। आपको मुबारक हो आपका बनाया ये CM। आज दोपहर इनका शपथ ग्रहण है। वक़्त निकालकर चले आइयेगा। थोड़ी तालियों पर आपका भी हक़ बनता है हुजूर!

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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यूपी में भ्रष्ट नौकरशाहों का गैंग भाजपा राज में भी मलाई चाटने-चटाने के लिए तैयार : सूर्य प्रताप सिंह

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश की ‘नौकरशाही के भ्रष्ट चेहरे’ अपनी पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने में लगे! उत्तर प्रदेश में कुछ नौकरशाहों की ‘भ्रष्ट लेकिन धनाढ़्य’ गैंग (CAUCUS) की आज ये हिम्मत / हस्ती है कि दिल्ली से लेकर नागपुर तक अपने पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने के किए पैरवी में लगे हैं…. पिछली दो सरकारों में जिस नौकरशाह गैंग की तूती बोलती थी वे ‘पैसे व रसूक़’ के बल पर ‘मलाई चाटने व चटाने’ के लिए फिर से तैयार हैं…

सम्भावित नामों में १-२ चेहरे इसी गैंग की पसंद है…. इस गैंग के दो सदस्य उत्तर प्रदेश में शपथ ग्रहण समारोह की व्यवस्था में भी लगे व भाजपा नेताओं की चमचागिरी करते समारोह स्थल पर देखे गए… मित्रों, शायद आप में से कुछ लोग जिन्हें इस गैंग की ताक़त का अहसास नहीं है, मेरी बात पर विश्वास नहीं कर रहे…. विश्वास करें! मेरी जानकारी अत्यंत सटीक है …

उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री का चयन ‘नौकरशाही की चयन समिति’ ने किया…. नाम लगभग तय! उ० प्र० के मुख्यमंत्री के चयन में उत्तर प्रदेश के दिल्ली में तैनात ३ बड़े अधिकारियों की अहम भूमिका मानी जा रही है …लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का मतलब अब जनता की पसंद नहीं बल्कि जो नौकरशाही को पसंद हो, वही भविष्य में बनेगा उ०प्र० का मुख्यमंत्री….इन ३ नौकरशाहों में से दो के उ० प्र० की पूर्व की दो सरकारों (सपा व बसपा) में नॉएडा में तैनात रहे बड़े अधिकारियों (जिन्होंने भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह को बचाया है) व उत्तर प्रदेश के पूर्व सरकार के महा बदनाम बड़े लंबे-२ से भ्रष्ट IAS से भी गरमा-गरम सम्बंध बताए जा रहे हैं….

इन नौकरशाहों की टोली ने CM पद के कई ‘लोकप्रिय’ दावेदारों की छुट्टी करा दी….. तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा ….शायद इनमें से कई के साथ इन भ्रष्ट नौकरशाहों की दाल नहीं गलती…. अब ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उ०प्र० का आने वाला मुख्यमंत्री Proxy CM सिद्ध न हो…..

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे और अब भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

सूर्य प्रताप का लिखा ये भी पढ़ें…

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सरकार बनी नहीं, हेमंत तिवारी मुख्य सचिव और डीजीपी बनवाने में जुट गया!

कुमार सौवीर

सरकार कहीं नही, पत्रकार लपके अफसरों की सेटिंग कराने… बेहद गहरी और अथाह कथा है सेटिंगबाज पत्रकारों की… मुख्‍यमंत्री कौन बनेगा, इसका पता भाजपा को भी नहीं मगर मुख्‍य-सचिव और डीजीपी के लिए लामबन्‍दी स्‍टार्ट… मुख्‍यसचिव के लिए संजय अग्रवाल और डीजीपी के लिए सुलखान सिंह के लिए पेशबंदी शुरू…

लखनऊ : न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा। यह कहावत तो आप सभी ने खूब सुनी होगी। लेकिन उसे चरितार्थ करने का जिम्‍मा निभाने के लिए यूपी के तथाकथित पत्रकारों के बीच धंधाबाजी की दूकान चमकाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। जाहिर है कि इन पत्रकारों का मकसद इस तरह की चर्चा छेड़ कर अपने लिए पसंदीदा माहौल तैयार कराना ही है, जहां वे बेहतर तरीके से पत्‍तलें चाट सकें।

जी हां, यह कवायद यूपी के मुख्‍य सचिव और डीजीपी की नियुक्ति को लेकर छेड़ी जा चुकी है। हैरत की बात है कि यह चर्चा तब शुरू हो चुकी, जब यूपी विधानसभा की कई सीटों के नतीजे तक नहीं सामने आ पाये। इतना ही नहीं, अभी यह तक तय नही हो पाया है कि बनने वाली सरकार का मुखिया यानी मुख्‍यमंत्री कौन होगा और, नयी सरकार किस तारीख को राजभवन में शपथ ग्रहण करेगी। लेकिन यूपी के धंधेबाज पत्रकर पत्रकार इस मामले में अपनी-अपनी टांग सरकार के फटे में फंसाने में आमादा दिख रहे हैं।  

शनिवार की शाम नेशनल वायस न्‍यूज चैनल में एक स्‍वयंभू पत्रकार हेमंत तिवारी ने अपनी रणनीति का खुलासा कर दिया। इस चैनल पर आयोजित एक परिचर्चा पर उन्‍होंने बताया कि किस-किस तर्क-कुतर्क के बल पर नयी सरकार के गठन के बाद प्रदेश के सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण ओहदों पर किन-किन लोगों की तैनाती होगी। जिन पदों पर नियुक्ति की बात हुई, उसमें मुख्‍य सचिव और प्रदेश पुलिस प्रमुख आदि प्रमुख हैं।

इस चैनल पर चल रही इस परिचर्चा को भांपने-सूंघने की कोशिश कर रहे एक दर्शक ने बताया कि इस परिचर्चा के दौरान हेमंत तिवारी को भी मौका दिया गया था। इस दौरान हेमंत तिवारी ने खुलासा कर दिया कि अगला डीजीपी और मुख्य सचिव कौन-कौन होगा। इस दर्शक को इस बात पर ऐतराज था कि जब यह भी नही पता चल पाया है कि कौन मुख्यमंत्री की पद की शपथ लेगा और कौन-कौन कैबिनेट मंत्री रहेगा, ऐसी हालत में नये डीजीपी और मुख्य सचिव के संभावित नामों का ऐलान कर देना चाटुकारिता ही नहीं तो और क्या है?

इस दर्शक के अनुसार हेमंत तिवारी ने अगले डीजीपी 1980 बैच के आईपीएस अफसर सुल्खान सिंह और 82 बैच के प्रवीण कुमार का नाम ले लिया, जबकि दूसरी ओर मुख्य सचिव के नाम पर वरिष्ठ आईएएस अफसर संजय अग्रवाल के नाम की घोषणा कर दी। कहने की जरूरत नहीं कि हेमंत तिवारी की लोकप्रियता पुलिस अफसरों से घनिष्‍ठता को लेकर मानी जाती है। इसी मसले पर एक अन्‍य वरिष्‍ठ पत्रकार ने एक तल्‍ख टिप्‍पणी कर दी कि डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी की तैनाती के लिए इन नामों को उछालने में जुटे हेमंत तिवारी दरअसल अपनी गोटी फिट कराने की फिराक में हैं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और मेरी बिटिया डॉट कॉम नामक न्यूज पोर्टल के संपादक हैं.

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बहनजी हार का कारण खुद को बतातीं तो समर्थक टूट जाते, इसलिए EVM को दुश्मन बनाया!

मायावती के निशाने पर ईवीएम के मायने… राजनीति में अक्सर ईवीएम को मोहरा बना दिया जाता है…  बीएसपी की हार से नाखुश दिख रहे दलित हितों को प्रमुखता से उठाने वाले एक संपादक ने मुझसे निजी बातचीत में बहन मायावती जी रवैये पर खासी नाराजगी जाहिर की. कहा, हार के कारणों की सही से समीक्षा नहीं होगी, तो ईवीएम को गलत ठहराने से बहुजन समाज पार्टी का कुछ भी भला नहीं होगा. बहन जी से मिलकर सबको सही बात बतानी चाहिए, भले ही उसमें अपना घाटा ही क्यों ना हो जाये. मैंने अपने संपादक मित्र से इस मामले पर एक घटना का जिक्र किया. जिसे आपके लिए भी लिख रहा हूं.

कांग्रेस ने 13वीं लोकसभा चुनाव (1999) में मिली हार की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई. सोनिया गांधी जी चर्चा में तमाम दिग्गज कांग्रेसियों की राय ले रही थी. बात आगे बढ़े, उससे पहले बता दिया देना उचित होगा कि पहली बार लोकसभा चुनाव में ईवीएम को आंशिक तौर पर 1999 में इस्तेमाल शुरू किया गया था. उस समय विदेशी मूल का मुद्दा 12वीं लोकसभा में एक मत से गिरी अटल सरकार के वरदान साबित हुआ. जिसके कारण ही अटल सरकार या कहें पहली गैर-कांग्रेसी सरकार अपने 5 साल पूरा करने में कामयाब रही.

मंच में कांग्रेस के तमाम ऊंची जाति के नेता कांग्रेस की हार समीक्षा में अपनी ऊर्जा इस तरह खपा रहे थे कि कहीं भी हार का ठीकरा सोनिया गांधी पर नहीं फूटे. किसी ने हार का कारण चुनाव में गलत टिकट बटवारे को बताया, किसी में संगठन में अनुशासनहीनता को जिम्मेदार ठहराया, तो किसी चुनाव में युवाओं की भागीदारी की कमी को लेकर भी सवाल खड़ा किया. इसी बीच सोनिया जी ने पूर्वांचल के दिग्गज कांग्रेसी दलित नेता महावीर प्रसाद जी से पूछा कि आपकी राय में कांग्रेस की हार के लिए कौन जिम्मेदार है.

महावीर प्रसाद जी ने कहा कि हार का एकमात्र कारण ईवीएम है. जिसमें वोट डालने पर बीजेपी को एक की जगह दो वोट मिलते थे. दलित नेता की बेतुकी बात सुनकर तमाम दिग्गज और ऊंची जाति के कांग्रेसी नेता व्यंग्य से हंसे और हार के कारणों को जानने के लिए लिए दूसरे नेता की बारी आ गई. ऊंची जाति के नेताओं की व्यंग्यात्मक हंसी महावीर प्रसाद जी के एक समर्थक को काफी खली. चर्चा खत्म होने के बाद जैसे ही महावीर प्रसाद जी बाहर निकले, करीबी समर्थक ने बिलखकर बोला, बाबूजी आप भी गजब करते हैं, आपकी राय को तमाम दिग्गज नेता उपहास में उड़ा दिये. ऐसी राय आपको नहीं जतानी चाहिए थी.

इतना सुनते ही टोपी वाले नेता और बाबूजी के नाम से प्रसिद्ध महावीर प्रसाद जी गुस्से में बोले, मुझे राजनीति मत सिखाओ. हार का कारण क्या है, किसको नहीं मालूम है… सबको मालूम है कि हार का कारण सोनिया जी ही हैं. उनके विदेशी मूल का मुद्दा ही बड़ा कारण है. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन. मैं फिर कहता हूं कि ईवीएम ही हार की जिम्मेदार है.

अब समर्थक सन्न. उसने महावीर प्रसाद जी के सामने श्रद्धा से हाथ जोड़ लिये.

दिवंगत महावीर प्रसाद जी की तरह बहन मायावती जी को भी अच्छी तरह मालूम है कि 2017 यूपी विधानसभा चुनाव में किस कारण से बहुजन समाज पार्टी चुनाव हारी. लेकिन हार की जिम्मेदारी बहन जी के खुद लेने से क्या करोड़ों बीएसपी के वोटरों का मनोबल नहीं गिरेगा? इस सवाल जवाब के बाद मेरे साथी संपादक के चेहरे शांति भाव से खिल गया. जय भीम के नारे संग वो अगली रणनीति को सफल बनाने के लिए बढ़ चले.

नोट : इस लेख का मकसद ईवीएम मशीन को क्लीनचिट देना बिल्कुल नहीं है.

लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई न्यूज चैनलों के एडिटर इन चीफ रह चुके हैं. उनसे संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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यूपी में इस वक्त प्रशासन नाम की चीज नहीं है, नकल माफिया कर रहे नंगा नाच : आईएएस सूर्यप्रताप सिंह

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश में नक़ल माफ़िया का नंगा नाँच…. नयी सरकार की ‘ट्रैंज़िशन-अवधि’ में उ० प्र० में प्रशासन नाम की चीज़ नहीं है…. भारी ‘जनादेश’ देकर भी नक़ल माफ़िया के सामने जनता बेबसी से ‘कौन होगा मुख्यमंत्री’ के खेल का मंचन देख रही है… नक़ल के लिए कुख्यात कौशाम्बी, इलाहाबाद में यूपी बोर्ड परीक्षा में धुंआधार नकल, यहां इमला बोलकर लिखाया गया एक-एक उत्तर… नीचे देख सकते हैं प्रमाण के तौर पर संबंधित वीडियो…

नकल के लिए बदनाम कौशांबी जिले मे इस बार 112 परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं। जिला प्रशासन ने नकल विहीन परीक्षा करने का दिखावे पूर्ण दावा किया था लेकिन उसके दावे की हवा पहले दिन ही निकल गई। जिले के विभिन्न परीक्षा केंद्रों पर जमकर नकल हुई। कक्ष निरीक्षक कहीं इमला बोलकर नकल कराते दिखे तो कहीं परीक्षार्थी की कापी भी लिखते दिखाई दिये। कहने को नकल रोकने के लिए सचल दस्ते परीक्षा केंद्रों तक पहुंचे। सचल दल मे शामिल लोग महज खाना पूर्ति करके वापस लौट जाते रहे। जिला प्रशासन के दावों की पोल खोलने के लिए मीडिया के कैमरों मे कैद तस्वीरे हकीकत को बयां करने के लिए बहुत हैं। निम्न दो वीडियो देखें तो माजरा समझ में आ जाएगा ….

https://youtu.be/0vaUptWANMw

https://youtu.be/8rUviGRU4Ow

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आज आरंभ हुई उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल का बोलबाला….. नयी सरकार के संकल्प को चुनौती! आपको याद हो की गोण्डा की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में व्याप्त नक़ल के अभिशाप के मुद्दे को उठाया था …इस वर्ष भी मैंने अपना नक़ल के विरुद्ध ‘सविनय सुचिशिक्षा अभियान’ यानि ‘नक़ल रोको अभियान’ चलाने का संकल्प लिया है…

मैं कल अलीगढ़ में आपने ‘नक़ल रोको अभियान’ के सम्बंध में गया था और अपने इस अभियान को इस वर्ष भी निजी प्रयासों के रूप में चालू रखने के लिए वालंटीर्स के साथ कार्ययोजना बनायी गयी…. आज इस अभियान के तहत मेरठ, ग़ाज़ियाबाद, व हापुड़ जनपदों का भ्रमण पर हूँ। ज्ञात हुआ कि अलीगढ़ के नक़ल के लिए कुख्यात वीआईपी तहसील “अतरोली” में खुले आम सामूहिक नक़ल हुई। जब कि मेरे अभियान के अलीगढ़ में शुरुआत पर अलीगढ़ के अख़बारों के प्रतिनिधियों के पूछे जाने पर राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह ने कल ही कहा था कि ‘अतरोली इस वर्ष अपने ऊपर से नक़ल के दाग़ की नहीं लगने देगा’…..परंतु आज यह सत्य साबित नहीं हुआ और अतरोली में धड़ल्ले से सामूहिक नक़ल हुई।

ज्ञात हो कि बोर्ड परीक्षा में पैसे देकर नक़ल से बोर्ड परीक्षा पास करने अतरोली में मिज़ोरम, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर तक के बच्चे आते हैं। नयी सरकार के लिए बोर्ड की परीक्षाओं में नक़ल रोकना बड़ी चुनौती बनेगी….. प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा विभाग के रूप में मैंने परीक्षा केंद्रों पर CCTV कैमरा लगाने व नक़ल रोकने जे किए छात्रों, अभिववकों, अध्यापकों, प्रबंधकों की हर मंडल में बैठकें कर नक़ल के विरुद्ध अभियान चलाया था…. मात्र ३ महीने में ही सपा सरकार ने मेरा ट्रान्स्फ़र कर दिया था….. मैंने २५५ परीक्षा केंद्रों को ब्लैकलिस्ट किया था जिन्हें सपा सरकार ने मेरे ट्रान्स्फ़र के बाद बहाल कर दिया था। यदि नक़ल रोकने के लिए आने वाली सरकार नक़ल रोकने जे किए मेरे अनुभव का लाभ उठाना चाहती है तो युवाओं के जीवन जे हित में, मैं सहर्ष अपना योगदान देने के किए तैयार हूँ…..

यूपी कैडर के चर्चित आईएएस रहे और इन दिनों भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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अखिलेश यादव को मेरी आह लग गई : नूतन ठाकुर

Nutan Thakur : मैंने 18 दिसंबर 2016 को लिखा था-

“मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सत्ता में होने के नाते अभी अपनी जितनी भी तारीफ कर लें, पर उन्हें मेरी आह जरूर लगेगी. उन्होंने मेरे पति के खिलाफ लगातार फर्जी आधार पर कार्रवाई की. ईश्वर उन्हें इस बात का दंड अवश्य देगा.” मैंने कहा था-“अखिलेश के आगे पीछे घूम रहे जो अफसर मेरे पति को प्रताड़ित कर रहे हैं, कल सत्ता जाने के बाद वे कहीं नजर नहीं आएंगे. तब अखिलेश को अपने किये पर पछतावा होगा.”

आज मुझे अपनी कही हुई बात फिर याद आ गयी. अब सामने आयेंगे अखिलेश के भ्रष्टाचार के एक एक कारनामे…

यूपी के चर्चित आईजी अमिताभ ठाकुर की पत्नी और एडवोकेट नूतन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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आजतक की अहमदाबाद ब्यूरो चीफ गोपी घांघर को पता था यूपी में भाजपा 300 से उपर सीट लाएगी!

Vikas Mishra : ये हैं गोपी घांघर। अहमदाबाद में हमारे चैनल की ब्यूरो चीफ। लंबे वक्त से गुजरात की राजनीति को करीब से देख रही हैं। पिछले दिसंबर महीने में एजेंडा आजतक में आई थीं, तब गोपी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सीटों का आकलन किया था। गोपी ने कहा था कि मोदी और अमित शाह यूपी में करामात करने वाले हैं, बीजेपी को तीन सौ के आसपास सीटें मिलेंगी।

मैंने कहा कि यहां तो बहुमत मिलता नहीं दिख रहा। कुछ तर्क भी रखे मैंने। गोपी बोली-आप तर्क की बात कर रहे हैं, मैंने मोदी को गुजरात में 12 साल देखा है, मैं मोदी को जानती हूं। खैर, चुनाव के बाद यहां मेरे दफ्तर में सीटों के आकलन को लेकर शर्तें लग रही थीं। गोपी मुझसे बार-बार कह रही थी कि आप कम से कम 280 सीटों पर दांव लगाइए। मैंने डरते-डरते बीजेपी को 209 सीटें दी थीं। अब नतीजे आए तो गोपी सौ फीसदी सही साबित हुई। मान गए गोपी Gopi Maniar आपके आकलन को।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत टीवी पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से एक प्रमुख कमेंट इस प्रकार हैं….

Sanjay Dave गोपी मणीयार घांघर को मैं २००२ से जानता हूं, एक ही शहर के होने के नाते कई बार रीपोर्टिंग भी साथ साथ कि है, स्टोरी और स्थल कोई भी हो गोपी के अन्दर हंमेशा एक अलग सा आत्मविश्वास देखा है । मुझे बराबर याद है २००८ दिपेश-अभिषेक मौत मामला समय अहमेदाबाद स्थित आसाराम आश्रम कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों के उपर आसाराम के गुंडों ने अचानक किए हमले समय प्रेग्रन्ट होने के बावजूद स्टोरी करने आई गोपी ने अपने शरीर के उपर लाठीया खाई लेकिन डटी रही पीछे नहीं हटी। हम सबको गोपी मणीयार-घांघर के उपर गर्व है ।

Vikas Mishra सही कहा आपने, गोपी हमारी जांबाज सेनानी है।

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यूपी में भाजपा विधायक ने सीओ को धमकाया

यूपी में भारी बहुमत पाने वाली भाजपा की छवि पर पलीता लगाने का काम उसके कुछ नए बने विधायकों ने शुरू कर दिया है. सत्ता के नशे में चूर इन विधायक महोदय को मर्यादा का खयाल नहीं है. इस आडियो में सुनिए एक भाजपा विधायक (सवायजपुर, हरदोई) की सीओ (शाहाबाद, हरदोई) से बातचीत. लोग इस टेप को सुनकर कहने लगे हैं कि लगता है यूपी के अच्छे दिन आ गए हैं… टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

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