मजीठिया मांगने पर ‘हिंदुस्तान’ अखबार ने दो और पत्रकारों को किया प्रताड़ित

लगता है खुद को देश के कानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझ रहा है हिंदुस्तान अखबार प्रबंधन। शुक्रवार को एक साथ उत्तर प्रदेश और झारखण्ड से तीन कर्मचारियों को प्रताड़ना भरा लेटर भेज दिए गए। इन कर्मचारियों की गलती सिर्फ इतनी थी की बिड़ला खानदान की नवाबजादी शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिन्दुस्तान मैनेजमेंट से उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और अपना बकाया मांग लिया था।

गोरखपुर के हिंदुस्तान संस्करण में सीनियर कॉपी एडिटर के पोस्ट पर कार्यरत सुरेंद्र बहादुर सिंह और इसी पोस्ट पर कार्यरत आशीष बिंदलकर को कंपनी ने शुक्रवार को ट्रांसफर और टर्मिनेशान की तरफ कदम बढ़ाते हुए एक पत्र भेजा है। इन दोनों साथियों ने 17 (1) के तहत लेबर विभाग में अपने बकाये की रिकवरी के लिए कलेम लगा रखा था। इस पत्र से इन दोनों साथियों को ज़रा भी अचरज नहीं है। आशीष कहते हैं मुझे लेटर अभी नहीं मिला लेकिन कंपनी ने शुक्रवार को मुझे ऑफिस में काम नहीं करने दिया और बताया कि आपको एक पत्र घर पर भेजा गया है। उधर सुरेन्द्र बहादुर सिंह का ट्रांसफर देहरादून कर दिया गया है।

यही नहीं, झारखण्ड में हिन्दुस्तान समाचार पत्र में कार्यरत उमेश कुमार मल्लिक को हिंदुस्तान प्रबंधन के निर्देश पर एचआर डिपार्टमेंट की तरफ से शुक्रवार को एक मेल  भेजा गया है। उमेश का अपराध बस ये है कि उन्होंने कानून और न्याय के निर्देश का पालन करते हुए मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर व सेलरी देने की मांग अखबार प्रबंधन से कर दी थी। कंपनी टर्मिनेशन के पीछे बहाना खराब परफारमेंस को बना रही है। उमेश दैनिक हिंदुस्तान, रांची के मीडिया मार्केटिंग यानि सेल्स डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं।

इन तीनों साथियों के उत्पीड़न से देश भर में हिंदुस्तान में कार्यरत समाचार पत्र कर्मियों में प्रबंधन के खिलाफ जमकर आक्रोश है। सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने अपने प्रबंधन और संपादक के खिलाफ ना सिर्फ लोकल पुलिस को बल्कि मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत कर रखा है। आप तीनों साथियों से निवेदन है कि आप खुद को अकेले मत समझिये। आपको आपका अधिकार मिलेगा। ये अखबार मालिक सुप्रीम कोर्ट से कतई बड़े नहीं है। आप के साथ आज देश भर के समाचारपत्र कर्मचारी हैं। जल्द ही हिंदुस्तान अखबार की भी चूल हिलेगी।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिवेस्ट
मुंबई
9322411335

इसे भी पढ़ें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कैमरे से सच दिखाने वाले आजाद पत्रकार गौतम पर आज 15 केस हैं…

कैमरे पर सच दिखाने की हिमाकत का नतीजा यह रहा कि कोलकाता पुलिस गौतम कुमार विश्वास को बालों से नोचती हुई घसीट कर ले गई। उन्हें जहां चाहा मारा। लातें, घूसे सब। गौतम कोलकाता के फ्रीलांस पत्रकार हैं, जो पुलिस और प्रशासन की पोल खोलती फिल्में बनाते हैं। जान की परवाह किए बिना भ्रष्ट तंत्र से टकराने वाले गौतम के महीने के आधे से ज्यादा दिन अदालतों में जाते हैं। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा वकीलों को जा रहा है लेकिन फिर भी गौतम इस घुन लगी व्यवस्था के आगे न झुकते हुए बखूबी अपना काम कर रहे हैं।

वह पिछले सात सालों से कोलकाता टीवी और एनई बांग्ला के लिए इंवेस्टिगेटिव प्रोग्राम बना रहे हैं। गौतम बताते हैं ‘जैसे अगर किसी पुलिसकर्मी ने बैज नहीं लगाया है तो हमने उसे शूट कर लिया क्योंकि प्रत्येक पुलिसकर्मी के लिए बैज लगाना अनिवार्य होता है। रात के ड्यूटी में हमने तमाम पुलिस थानों का दौरा किया तो पुलिसकर्मी सोए हुए मिले। हमने वो भी शूट किया, उच्च न्यायालय में मैं दीवारें फांदते हुए हथियार लेकर घुस गया, मेरे साथी ने वो शूट किया। किसी ने न मुझे देखा न रोका। मैं आसानी से बाहर भी आ गया। फिर महिलाओं की कई गिरफ्तारियों में महिला पुलिस नहीं होती। हमने इन तमाम मुद्दों पर बेहतरीन फिल्में बनाईं।‘

इसके अलावा सोनागाची जैसे इलाकों में महिलाओं की तस्करी और कोलकाता में तमाम सामाजिक मुद्दों पर भी गौतम ने फिल्में बनाईं। गौतम इसी प्रकार जनता के मौलिक अधिकारों से जुड़े अहम मुद्दों पर छोटी फिल्में दिखा पुलिस और प्रशासन की नींद तोड़े हुए थे। वह बताते हैं ‘एक जगह पुलिस एक बूढ़े आदमी की पिटाई कर रही थी, मुझसे रहा नहीं गया। मैं बीच-बचाव के लिए कूद गया तो पुलिस ने उस आदमी को छोड़ मुझे पीटना शुरू कर दिया। वह मुझे बालों से नोचती हुई ले गई। जबकि पुलिस जानती थी कि सब शूट हो रहा है।’  गौतम के अनुसार ‘पुलिस वालों ने मुझे देखते ही बोला आज इसे पीटेंगे।’

गौतम पर आज 15 केस हैं। जिनके लिए उन्हें सात अलग-अलग अदालतों में जाना पड़ता है। कमाई का बड़ा हिस्सा अपने खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने में दे रहे हैं। वह कहते हैं ‘मैं अदालतों में जाकर थक गया हूं। मानवाधिकार हनन वाले कार्यक्रमों में जाकर अपनी व्यथा बताते-बताते थक गया हूं बावजूद इसके सच दिखाने का मेरा हौसला कभी पस्त नहीं होता। मैं ऐसा करता रहूंगा।’

आउटलुक में प्रकाशित मनीषा भल्ला की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मेरठ के ‘प्रभात’ अखबार के मीडियाकर्मी सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी से परेशान

मेरठ के सुभारती समूह द्वारा हिंदी दैनिक अखबार ‘प्रभात’ का प्रकाशन किया जाता है. आरोप है कि अखबार के सिटी इंचार्ज के रवैये से कई पत्रकार अखबार छोड़कर चले गए. इन दिनों छायाकार समीर सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी के रवैये से सकते में हैं. 31 मार्च को दैनिक प्रभात समाचार पत्र में सुबह के समय सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी कई पत्रकार एवं छायाकारों के साथ बैठक कर रहे थे. इस बीच छायाकार समीर की कार्यप्रणाली को लेकर सिटी इंचार्ज ने गलत शब्द बोले. सिटी इंचार्ज ने फोटोग्राफर समीर को सभी लोगों के सामने ही बैठक से बाहर निकाल दिया. इससे फोटोग्राफर के सम्मान को काफी ठेस पहुंची.

फोटोग्राफर अपने साथ हुए कृत्य को लेकर दो दिन तक मानसिक तनाव में रहा. स्वास्थ्य खराब होने के बाद परिजनों ने निजी अस्पताल में भर्ती कराया. इस छायाकार ने हमेशा कंपनी के नियमों एवं हित में रहकर कार्य किया. उधर, सिटी इंचार्ज के रवैये से परेशान होकर पत्रकार कपिल, प्रीति, प्रशांत गौड़, सुमेंद्र व संजू सिंह दैनिक प्रभात समाचार पत्र से त्याग पत्र देकर जा चुके हैं.  कुछ अन्य लोग त्याग पत्र देने की तैयारी में हैं. सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी पर कई किस्म के आरोप हैं. सिटी इंचार्ज ने क्राइम इंचार्ज जीवन कुमार को दो बार सस्पेंड किया. कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों ने संपादक एके अस्थाना के समक्ष गुहार लगाई लेकिन संपादक सभी को सिटी इंचार्ज से जाकर मिलने को कह देते हैं, जिससे सभी लोग निराश हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक न्यूज चैनल जहां महिला पत्रकारों को प्रमोशन के लिए मालिक के साथ अकेले में ‘गोल्डन काफी’ पीनी पड़ती है!

चौथा स्तंभ आज खुद को अपने बल पर खड़ा रख पाने में नाक़ाम साबित हो रहा है…. आज ये स्तंभ अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रहा है… खासकर छोटे न्यूज चैनलों ने जो दलाली, उगाही, धंधे को ही असली पत्रकारिता मानते हैं, गंध मचा रखा है. ये चैनल राजनेताओं का सहारा लेने पर, ख़बरों को ब्रांड घोषित कर उसके जरिये पत्रकारिता की खुले बाज़ार में नीलामी करने को रोजाना का काम मानते हैं… इन चैनलों में हर चीज का दाम तय है… किस खबर को कितना समय देना है… किस अंदाज और किस एंगल से ख़बर उठानी है… सब कुछ तय है… मैंने अपने एक साल के पत्रकारिता के अनुभव में जो देखा, जो सुना और जो सीखा वो किताबी बातों से कही ज्यादा अलग था…. दिक्कत होती थी अंतर आंकने में…. जो पढ़ा वो सही था या जो इन आँखों से देखा वो सही है…

कहते हैं किताबी जानकारी से बेहतर प्रायोगिक जानकारी होती है तो उसी सिद्धांत को सही मानते हुए मैंने भी उसी को सही माना जो मैंने अपनी आखों से देखा…  बहुत सुंदर लगती थी ये मीडिया नगरी बाहर से…. पर यहां केवल खबर नहीं बिकती… कुछ और भी बिकता है… यहाँ सिर्फ अंदाज़ नीलाम नहीं होते, यहां बिकता है स्वाभिमान… यहां क्रोमा के साथ और भी बहुत कुछ कट जाता है… यहां कटते हैं महिला पत्रकार के अरमान… यहां बलि चढ़ती है उसकी अस्मिता…. कामयाबी दूर होती है, लेकिन उसे पास लाने के यहां शॉर्टकट भी बहुत हैं… और उसे नाम दिया जाता है समझौता…

जब पहली बार एक नेशनल न्यूज़ चैनल के दफ्तर में कदम रखा तो सोचा था की अपनी काबलियत और हुनर के बलबूते बहुत आगे जाउंगी… आडिशन दिया… पीसीआर में खड़े लोगों ने अपनी आखों से ऐसे एक्सरे किया जैसे मेट्रो स्टेशन पर लगी एक्सरे मशीन आपके सामान का एक्सरे करती है… सिलेक्शन हुआ और शुरू हुआ मेरा भी करियर….. कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अपनी काबिलियत के बलबूते शायद मैं कुछ लोगों की आँखों की किरकिरी बनने लगी…

जब एक नन्हा परिंदा खुले आसमान में उड़ने की कोशिश करता है तब उसी आसमान में उड़ती हुई चील उस पर झपट्टा मारकर उसे अपना शिकार बनाने की कोशिश करती है… कुछ वैसा ही मेरे साथ भी होने लगा… मैं परेशान होकर सबसे पूछती फिरती कि आखिर बात क्या है… लेकिन किसी से जवाब नहीं मिलता… हार कर सीधे चैनल के मालिक से मिलने पहुंच गई… सोचा था कि यहाँ से तो हल जरूर मिलेगा.. लेकिन दिलो-दिमाग़ को तब 440 वोल्ट का झटका लगा जब ये पता चला कि मालिक से मिलने के बाद उनके साथ अंतरंग में एक कप काफ़ी पीनी पड़ेगी जो मेरे काम भी करा देगी, साथ ही साथ प्रमोशन और सैलरी में अच्छी खासी बढ़ोतरी करा देगी… ऑफिस की कई लड़कियां वो काफ़ी पी चुकी हैं… तब समझ आया कि जिनको JOURNALISM का J नहीं आता वो कैसे इतनी ऊंची पोस्ट पर पहुंच गये… जाहिर है सारा कमाल उस गोल्डन काफ़ी का था…

अब दो आप्शन थे मेरे सामने… या तो नौकरी छोड़ दूं या उस काफ़ी का एक सिप ले लूं… लेकिन मैं बेचारी, अपने काबिलियत को एक कप काफ़ी की कीमत से नहीं तौल पाई… और नौकरी छोड़ दी मैंने…. अब दूसरे संस्थान में हूं… ये कैसा सच है, जिसे सब जानते हैं लेकिन सब झूठ मानकर अपनी नौकरी बचाने के लिए चुपचाप बस देखते हैं… आंखें बंद कर लेते हैं… बात होती भी है तो बड़ी गोपनीयता से अपने विश्वसनीय सहयोगी के साथ.. प्राइम टाइम में गला फाड़-फाड़ कर दुनिया भर को बात-बात पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ये बातें करते समय शायद अपने चरित्र के बारे में भूल जाते हैं….  मैंने कहा था ना….. यहाँ सब बिकता है….. नैतिकता भी…..चरित्र भी….

एक युवा महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. महिला पत्रकार ने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. उन्होंने जिस न्यूज चैनल के बारे में उपरोक्त बातें लिख कर भेजा है, वह चैनल कई वजहों से कुख्यात और विवादित रहा है. चैनल के बारे में कहा जाता है कि नाम बड़ा और दर्शन छोटे. चैनल हिंदुत्व के नाम पर चलाया जाता है और जमकर मीडियाकर्मियों का शोषण किया जाता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रसार भारती के नौकरशाहों ने एससी-एसटी कर्मियों के साथ अन्याय किया, विरोध में कैंडल मार्च और सभा

नई दिल्ली : आकाशवाणी और दूरदर्शन के एसटी-एससी प्रशासनिक कर्मचारी महासंघ ने नियुक्ति, प्रोन्नति, बैकलाग भरने और स्थानांतरण में अन्याय, उत्पीडन और जातिगत भेदभाव के खिलाफ शांतिपूर्ण कैंडल मार्च आयोजित किया। यह मार्च आकाशवाणी भवन से प्रसार भारती, पीटीआई बिल्डिंग तक जुलूस की शक्ल में पहुंचा जहां एक सभा  के रूप में तब्दील हो गया। इसमें देश भर में कार्यरत आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के अभियांत्रिकी, तकनीकी और प्रोग्राम के प्रशासनिक वर्ग के अधिकारियों ने भाग लिया।

महासंघ के महासचिव ओ पी गौतम ने सभा को संबोधित करते हुए कहा प्रसार भारती के नौकरशाहों को अपने दिमाग से जातिगत भेदभाव और गंदगी साफ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री जवाहर सरकार से कई बार अनुरोध किया जा चुका है पर उनकी आंखे नहीं खुल रही। बीते 14 नवंबर को संघ ने सालों से सभी कैडरों में जातिगत उत्पीडन, स्थानांतरण, बैकलाग, रोस्टर, प्रोमोशन व नियुक्तियों में हो रहे भेदभाव से उच्चाधिकारियों को नोटिस द्वारा सूचित कर दिया गया था। इससे पहले भी दो अक्तूबर को गांधी जयंती पर जंतर मंतर से प्रसार भारती तक कैंडल मार्च निकालकर विरोध जताया गया पर अधिकारियों की कुंभकर्णी नींद नहीं खुल रही।  गौतम ने अधिकारियों को चेताते हुए कहा कि अगर उनकी मांग नहीं मानी गई तो आकाशवाणी व दूरदर्शन के अभियांत्रिकी, कार्यक्रम, तकनीकी एवं प्रशासनिक कर्मचारी आंदोलन को उग्र रुप देने को विवश हो जाएंगे और इसके लिए सरकार के संबंधित तंत्र जिम्मेवार होंगे।

प्रेस विज्ञप्ति

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मेरे साथ न्याय नहीं हुआ, बुलाया गया तो मोदी के साथ रहने दिल्ली जाऊंगी : जसोदा बेन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पत्नी जसोदाबेन का कहना है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है और उन्हें वे सुविधाएं नहीं मिली हैं, जो एक पीएम की पत्नी होने के नाते उन्हें मिलनी चाहिए थीं। यदि उन्हें बुलाया जाता है तो वह दिल्ली मोदी के साथ रहने जाएंगी। सोमवार को मेहसाणा में स्कूटर की पिछली सीट पर बैठकर घर लौट रहीं जसोदाबेन से जब एक न्यूज चैनल के पत्रकार ने पूछा कि उन्होंने आरटीआई आवेदन क्यों दिया है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें न्याय नहीं मिला है और कोई सुविधा भी नहीं मिल रही है।

अपनी सुरक्षा व्यवस्था से नाखुश जसोदाबेन ने आरटीआई के तहत आवेदन देकर खुद को मिल रही सुरक्षा का ब्योरा भी मांगा है। उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि पीएम की पत्नी के तौर पर वह किन-किन सुविधाओं की हकदार हैं। जब उनसे पूछा गया कि यदि उन्हें बुलाया जाए तो क्या वह मोदी के साथ रहने के लिए तैयार हैं। इस पर उनका जवाब था कि बुलाया जाता है तो वह दिल्ली जाएंगी। जसोदाबेन अपने भाई अशोक मोदी के साथ गुजरात के मेहसाणा जिले के ऊंझा कस्बे में रहती हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मेहसाणा पुलिस ने उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई है।

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दिए आवेदन में जसोदाबेन ने उन्हें प्रोटोकॉल के तहत मिल रही सुरक्षा से संबंधित कई दस्तावेज पुलिस विभाग से मांगे हैं। इसमें सुरक्षा मुहैया कराने के बारे में सरकार से जारी वास्तविक आदेश की प्रमाणित कॉपी भी शामिल है। उन्होंने एक प्रधानमंत्री की पत्नी को सुरक्षा मुहैया कराने के बारे में भारतीय संविधान में प्रावधान और कानूनों की भी जानकारी मांगी है। इसमें उन्होंने खुद को मुहैया मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था पर भी नाखुशी जाहिर की है और कहा है कि पीएम की पत्नी होने के बावजूद वह सार्वजनिक वाहन से यात्रा करती हैं जबकि उनके सुरक्षा गार्ड सरकारी वाहन से चलते हैं।

जसोदाबेन ने लिखा है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही सुरक्षा गार्डों ने कर दी थी। इसके चलते उन्हें अपने सुरक्षा गार्डों से भय महसूस होता है। इसलिए सरकार उन्हें उनकी सुरक्षा में लगे हर गार्ड की तैनाती के आदेश की कॉपी दे। मेहसाणा पुलिस अधीक्षक (एसपी) जेआर मोठालिया ने बताया कि जसोदाबेन ने आरटीआई के तहत जानना चाहा है कि प्रधानमंत्री की पत्नी होने के नाते सुरक्षा को लेकर उनके क्या अधिकार हैं। उन्होंने बताया कि सोमवार को वह हमारे दफ्तर आईं और एक आरटीआई आवेदन दिया। जसोदाबेन की सुरक्षा के लिए सशस्त्र गार्डों के समेत 10 पुलिसकर्मी तैनात हैं। ये सभी दो शिफ्ट में काम करते हैं। हर शिफ्ट में पांच-पांच जवान होते हैं।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सिर्फ 5000 रुपये में काम कर रहे हैं दैनिक जागरण, लखीमपुर के रिपोर्टर

दैनिक जागरण लखीमपुर ब्‍यूरो आफिस में इन दिनों संवाददाताओं / रिपोर्टरों का जमकर शोषण हो रहा है… बेहद कम पैसे में ये लोग काम करने पर मजबूर हैं.. प्रबंधन की तरफ से वेतनमान बढाने का झांसा काफी समय से दिया जा रहा है… बार वादा हर बार वादा ही साबित हो रहा है… बेरोजगारी के कारण रिपोर्टर चुपचाप मुंह बंद कर काम कर रहे हैं.. कोई आवाज नहीं उठाता क्योंकि इससे उन्हें जो कुछ मिल रहा है, वह भी मिलना बंद हो जाएगा…

आपको विश्वास नहीं होगा लेकिन ये सच है कि इतनी महंगाई के बावजूद दैनिक जागरण लखीमपुर में रिपोर्टर 5000 हजार रुपये में कार्य करने को विवश हैं… कई बार बात करने के बाद भी वेतन में इजाफा नहीं हो रहा है… उच्‍चाधिकारियों की मिली भगत से संवादाताओं का शोषण हो रहा है… लखीमपुर की टीम समेत अन्‍य पत्रकारों ने इसके विरोध में कार्य बहिष्‍कार करने की रणनीति बनाई है… महंगाई के वक्‍त जागरण को लखीमपुर के संवादाताओं का वेतन बढाना होगा… इसके लिये लड़ाई होगी… दैनिक जागरण जिले में अमर उजाला व हिंदुस्‍तान से लड़ रहा है जबकि दोनों संस्‍थानों में रिपोर्टर को 10 हजार रूपये वेतन दिया जा रहा है… ऐसे में जागरण प्रबंधन बेहद कम वेतन देकर कंपनी की नाक कटा रहा है…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

लोकमत प्रबंधन की प्रताड़नाओं ने बुझा दिया एक दीपक

: लोकमत समाचार पत्र समूह के अन्याय, अत्याचार और प्रताड़नाओं से हार गए दीपक नोनहारे :  नागपुर :  लोकमत समाचारपत्र समूह के मगरूर प्रबंधन के अन्याय, अत्याचार और प्रताड़नाओं के आगे ‘लोकमत समाचार’ का एक पत्रकार पराजित हो गया. ‘लोकमत समाचार’ में पिछले 25 सालों से व्यापार-व्यवसाय डेस्क संभाल रहे दीपक नोनहारे ने गुरुवार 6 नवंबर की दोपहर को इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (मेयो अस्पताल) नामक सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया.

दीपक पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. इससे पूर्व उन्हें गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल में भरती किया गया था, जहां से ठीक होकर वे घर वापस आ गए थे. बुधवार 5 नवंबर को उनकी तबियत अचानक बिगड़ गई और उन्हें मेयो अस्पताल में दाखिल किया गया, जहां गुरुवार की दोपहर करीब दो बजे उन्होंने अंतिम सांसें ली.  दीपक नोनहारे पिछले कुछ माह से ‘लोकमत समाचार’ से बाहर थे. उनका नई दिल्ली ट्रांसफर किया गया था, जिसका उन्होंने विरोध किया था. औद्योगिक न्यायालय नागपुर ने इस तबादले पर रोक लगा दी थी, मगर लोकमत प्रबंधन ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया था. प्रबंधन इस स्थगनादेश के विरोध में हाई कोर्ट गया था. 5 नवंबर को इस मामले पर फैसला आना था, मगर किसी कारण से तारीख आगे बढ़ाकर 10 नवंबर कर दी गई थी, लेकिन दीपक उससे पहले ही दुनिया छोड़ गए.

दीपक को पिछले साल भर से लोकमत प्रबंधन प्रताड़ित कर रहा था. दरअसल, दीपक ने पिछले साल नवंबर में कागज के उन टुकड़ों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था जिस पर सारे कर्मचारियों ने चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए थे. इन कागजों में लोकमत श्रमिक संघटना से कोई संबंध नहीं होने और मजीठिया के संबंध में कुछ लिखा था. बस, वही दिन दीपक की जिंदगी से उनकी खुशियां छीन ले गया था. नवंबर-दिसंबर 2013 में बीमार होने के कारण उन्होंने एक माह का अवकाश लिया था, मगर उनके मेडिकल सर्टिफिकेट को अस्वीकार कर दिया गया था. एक माह की तनख्वाह भी काट ली गई थी. उसके बाद एक दिन अचानक उनका तबादला नई दिल्ली कर दिया गया. बिना प्रमोशन के, उसी वेतन पर. उसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई में भी वे जीतते गए, मगर इससे उपजे तनाव तथा डिप्रेशन को वे झेल नहीं पाए. मई से उनका वेतन भी बंद कर दिया गया था, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी. इसके चलते वे अपना इलाज भी ठीक से नहीं करा पाए.

दीपक पिछले 25 साल से भी अधिक समय से ईमानदारी और मेहनत से व्यापार-व्यवसाय के पेज देख रहे थे, मगर वे सीनियर सब एडीटर से आगे नहीं बढ़ पाए थे. वैसे भी, लोकमत प्रबंधन कभी ईमानदारी और मेहनत से काम करने वालों को उनका हक नहीं देता. सिटी में रहते हुए दीपक के बॉस हमेशा ऐसे लोग रहे जो उनसे सालों जूनियर थे. चूंकि दीपक सिर्फ अपने काम में ही मग्न रहने वाले इंसान थे, किसी की सिफारिश और चापलूसी उन्हें छू तक नहीं गई थी. चुपचाप रहते, सब-कुछ सहते रहते. कभी लोकमत श्रमिक संघटना से जुड़े रहे, मगर उससे भी अलग होकर अकेले ही लोकमत प्रबंधन के अन्याय से लड़ते रहे. मगर ताकतवर प्रबंधन से वे जीत नहीं पाए. इस प्रबंधन ने अपनी आदत के मुताबिक उन्हें जीतने नहीं दिया. 

(साप्ताहिक ‘विदर्भ समाज’ में छपी खबर के आधार पर)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जनसंदेश टाइम्स बनारस तालाबंदी की ओर, संपादक आशीष बागची ने डेढ़ दर्जन लोगों को निकाला

खबर है कि जनसंदेश टाइम्स, बनारस अब तालाबंदी के मुहाने पर है। सिर्फ घोषणा ही बाकी है। मालिकों ने हिटलरशाही रवैया अपनाते हुए एक नवंबर को डेढ़ दर्जन से अधिक कर्मचारियों को कार्यालय आने से मना कर दिया। इन कर्मचारियों का कई माह का वेतन भी बकाया है, जिसे मालिकानों ने देना गवारा नहीं समझा। इसके साथ ही अखबार के संस्करण भी सिमटा दिये गये। सिटी और डाक दो ही संस्कदर अब रह गये। पहले सभी जिलों के अलग-अलग संस्करण छपते थे। अब दो ही संस्करण में सभी जिलों को समेट दिया गया है।

ये हालात तब हैं जब काशी पत्रकार संघ के अध्याक्ष-कोषाध्यक्ष समेत कई महत्वकपूर्ण पदाधिकारी जनसंदेश टाइम्सज के ही है, लेकिन उन्होंने अपने साथियों के मनमाने तरीके से निकाले जाने पर चूं करने तक की जहमत नहीं उठायी। कई निकाले गये कर्मी तो यह आरोप लगाते घूम रहे थे कि इस खेल में पत्रकार संघ के पदाधिकारी भी शामिल हैं। मालिकानों ने उन्हें सेट कर लिया है। जो निकाले गये हैं उनमे संपादकीय विभाग के डीएनई वशिष्ठर नारायण सिंह, रतन सिंह संदीप त्रिपाठी, रमेश श्रीवास्तव, अशोक यादव, राजकुमार यादव, संजय श्रीवास्तव, सौरभ बनर्जी आदि शामिल हैं।

निकाले गये किसी भी कर्मचारी को कुछ भी लिखित में नहीं दिया गया है। उन्हें संपादक आशीष बागची ने 31 अक्टूबर की रात में मौखिक रूप से फरमान सुना दिया कि आप लोगों को कल से नहीं आना है। इन कर्मियों को नियमानुसार दो माह का अतिरिक्त वेतन दिया जाना तो दूर उनका कई माह का बकाया वेतन भी नहीं दिया गया। एक नवंबर को ये सभी कर्मी जब अपना हिसाब लेने आफिस पहुंचे तो कोई सीधे मुंह बात करने को तैयार नहीं हुआ। एचआर कर्मियों ने उन्हें पन्द्रह दिन बाद आफिस आने को कहा।

साभार- क्लाउन टाइम्स, वाराणसी.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: