केंद्रीय मंत्री का घटिया बयान और गुलाम मीडिया की चुप्पी

बेंगलुरु में केंद्रीय सरकार में कौशल विकास राज्यमंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भारत के संविधान की धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे बेहद घटिया और असंवैधानिक टिप्पणी की है। इसे गुलाम मीडिया द्वारा मात्र विवादास्पद बयान बताकर मंत्री को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। राज्यमंत्री हेगड़े ने कहा कि ”धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील होने का दावा वे लोग करते हैं, जिन्हें अपने मां-बाप के खून का पता नहीं होता। लोगों को अपनी पहचान सेक्युलर के बजाय धर्म और जाति के आधार पर बतानी चाहिए। हम संविधान में संशोधन कर सेक्युलर शब्द हटा सकते हैं।”

अपने मंत्री पद की शपथ और संविधान के उपबन्धों के विरुद्ध दिये गये, इस बयान के बावजूद आश्चर्यजनक रूप से हेगड़े अपने पद पर बने हुए हैं! मीडिया इसे केवल विवादास्पद बयान बता रहा है और संविधान की रक्षा की गारण्टी देने वाली न्यायपालिका स्वयं संज्ञान लेकर हेगड़े को मंत्री पद से बर्खास्त करने की जिम्मेदारी निभाने के बजाय मौन है! जबकि इससे भी कम गंभीर मामलों में न्यायपालिका स्वयं संज्ञान लेकर दिशानिर्देश जारी करती रही है।

संघ की साम्प्रदायिक नीतियों के क्रियान्वयन के लिये अग्रसर केन्द्र सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि संविधान का अपमान करने वाले लोगों को मंत्री पद से बर्खास्त किया जा सके? बल्कि मेरा तो स्पष्ट मत है कि हेगड़े के बयान के द्वारा संघ भारत के संविधान को तोड़ने और बदलने से पहले देश के लोगों और संवैधानिक संस्थानों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।

ऐसे असंवैधानिक और अपमानकारी बयानों के माध्यम से संघ द्वारा यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि यदि भाजपा द्वारा संविधान के साथ खिलवाड़ किया जाये तो देश के लोग क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? हेगड़े के इस बयान से एक बार फिर से यह बात सिद्ध हो गयी है कि भारत का संविधान इतना कमजोर है, कि वह खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ है। यदि संविधान निर्माताओं ने संविधान के उल्लंघन और अपमान को दण्डनीय अपराध घोषित किया होता तो आज संविधान का मजाक उड़ाने की हेगड़े जैसों की हिम्मत नहीं हो पाती?

इन हालतों में यदि संविधान के अनुसार संचालित लोकतांत्रिक गणतंत्रीय व्यवस्थाओं और संस्थानों को बचाना है तो भारत के संविधानविदों को इस बात पर गम्भीरता पूर्वक विमर्श करना होगा कि संविधान के उल्लंघन और अपमान को रोकने के लिये संविधान में कठोर दण्डात्मक प्रावधान किस प्रकार से लागू किये जावें? इन हालातों में, मैं इस तथ्य को दोहराने को विवश हूं कि देश के सभी समुदायों के प्रबुद्ध लोगों को इस बारे में गम्भीरतापूर्वक चिंतन, मंथन और विमर्श करने के सख्त जरूरत है। अन्यथा भारत भी उन देशों में शामिल हो सकता है, जहां पर जनता को दशकों से फासिस्ट लोगों के अधिनायकतंत्र से मुक्ति मिलना असंभव हो चुका है! आखिर हम कब तक यों ही चुपचाप सिसकते रहेंगे? देशवासियों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी, क्योंकि बालेंगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ सामाजिक संगठन हक रक्षक दल के प्रमुख हैं और जयपुर में पदस्थ हैं. उनसे संपर्क 9875066111 के जरिए किया जा सकता है.

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रवीश कुमार ने पूछा- मीडिया क्यों सरकार से दलाली खा रहा है?

Ravish Kumar : नागरिक निहत्था होता जा रहा है…. राजस्थान के डॉक्टरों की हड़ताल की ख़बर पर देर से नज़र पड़ी। सरकार ने वादा पूरा नहीं किया है।हमने प्रयास भी किया कि किसी तरह से प्राइम टाइम का हिस्सा बना सकें। मगर हम सब ख़ुद ही अपने साथियों से बिछड़ने की उदासी से घिरे हुए थे। हर दूसरे दिन संसाधन कम होते जा रहे हैं। हम कम तो हुए ही हैं, ख़ाली भी हो गए हैं। साथियों को जाते देखना आसान नहीं था। वर्ना डॉक्टरों को इनबाक्स और व्हाट्स अप में इतने संदेश भेजने की ज़रूरत नहीं होती। आगरा से आलू किसान और दुग्ध उत्पादक भी इसी तरह परेशान हैं। दूध का दाम गिर गया है और आलू का मूल्य शून्य हो गया है। इन ख़बरों को न कर पाना गहरे अफसोस से भर देता है। कोई इंदौर से लगातार फोन कर रहा है।

सबने यही कहा कि एनडीटीवी के अलावा तो कोई हमारी स्टोरी करेगा नहीं। सबको इसी वक्त पत्रकारिता की याद क्यों आती है? आप समझते तो हैं फिर भी क्यों ऐसे अख़बार और चैनल के लिए पैसे देते हैं जहाँ पत्रकारिता के नाम पर तमाशा हो रहा है। हम सवाल करने की कीमत चुका रहे हैं। गुणगान करने वालों को कोई तकलीफ नहीं है। उनके पास सारे संसाधन हैं मगर उन चैनलों पर आम लोगों की खोजकर लाई गई कहानी नहीं होती है। तभी तो आप परेशान वक्त में एनडीटीवी की तरफ देखते हैं। हम किसकी तरफ देखें।
अपवादों को छोड़ दें तो टीवी मीडिया के लिए किसान अब आलू से भी गया गुज़रा हो गया है। मीडिया के लिए डॉक्टरों की भी हैसियत नहीं रही। राजस्थान के डाक्टर महसूस कर ही रहे होंगे। वे भी आलू किसानों की तरह अपने हालात पर चर्चा के लिए परेशान हैं। क्या इस दौरान डॉक्टरों ने मीडिया और उसके साथ नागरिकं के रिश्ते के बारे में सोचा ? आप सरकार चुनते हैं, आपकी जगह मीडिया क्यों सरकार का दोस्त बन जाता है? मीडिया क्यों सरकार से दलाली खा रहा है? क्या मीडिया ने सरकार चुना है?

क्या डॉक्टर आलू किसानों की पीड़ा की ख़बरों को पढ़ते हैं? अपने राजनीतिक फैसले में इस बात को महत्व देते हैं कि फ़लाँ सरकार ने किसानों को सताया है। क्या आलू किसान डाक्टरों से हो रही नाइंसाफी से नाराज़ होते होंगे? नागरिकता का बोध खंडित हो चुका है। सिस्टम एकजुट है। गोदी मीडिया उस सिस्टम का हिस्सा हो चुका है। नागरिक निहत्था हो चुका है। चैनलों को पता है कि लोग उसका परोसा हुआ तमाशा देखेंगे, डॉक्टर और आलू किसान न देखें तो कोई बात नहीं। बाकी बहुत लोग देख रहे हैं। ट्वीटर पर ख़बरें फ्री मिल जाती हैं मगर आप तब भी अख़बार मँगाते हैं जबकि उसमें काम का कुछ नहीं होता। टीवी के साथ भी यही है। जब आपकी ख़बरें नहीं हैं तो बकवास बहसों के लिए आप क्यों पैसे देते हैं?

आप किस चैनल में रिपोर्टिंग देखते हैं ? कितना डिबेट देखेंगे? मीडिया ने आपको भांग की गोली खिला दी है। आप भी नशे में हैं। मैं भले सबकी स्टोरी नहीं कर पा रहा और अब तो और भी कम कर पाऊँगा लेकिन साफ साफ दिख रहा है कि लोग कितने परेशान हैं। वो अपनी आवाज़ सुनाना चाहते हैं मगर कोई चैनल नहीं है। कहीं आवाज़ उठा भी दी जाती है तो किसी पर असर नहीं है। असर तभी पैदा होगा जब आप ख़ुद को इस मीडिया से मुक्त कर लें क्योंकि मीडिया ने ख़ुद को आपसे मुक्त कर लिया है। आप उसके लिए कुछ नहीं है।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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बड़े मीडिया हाउसों के पास है बड़े कारपोरेट घरानों का निवेश और सरकार का समर्थन : सिद्धार्थ वरदराजन

DUJ SEMINAR ON ‘DEMOCRACY IN DANGER : UNETHICAL REPORTING / ATTACKS ON INDEPENDENT JOURNALISM AND JOURNALISTS’

In a sharp counter to the BJP Sangh Parivar’s campaign, Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan said the state has been targeted as it champions the values of secularism, socialism and democracy. He was speaking at a function organized by the Delhi Union of Journalists in the national capital on ‘Democracy in Danger : Unethical Reporting/ Attacks on Independent Journalism and Journalists’ on 15 October at Kerala House. The Chief Minister said slogans like ‘Love Jehad’ have been used to disrupt the state’s centuries old communal harmony but the RSS will not succeed in its game plan. He slammed several media houses for ferociously targeting Kerala and congratulated those journalists who are standing up for the truth despite pressure from employers.

He said Kerala is the first to raise the voice of dissent whenever there are anti-people moves such as demonetization which he described as a disaster, an ill conceived, immature move. Kerala and its people have also rejected the beef ban, he said, as it has an adverse effect on dairy farming and the meat and leather industries. He listed out Kerala’s many achievements in the fields of healthcare, education, nutrition, child survival, gender budgeting and other social indicators in which the state leads, far ahead of others. He also said the spread of fake news through social media was being ably countered by the Keralite diaspora.

Siddharth Varadarajan, editor of ‘The Wire’, said India is going through a very difficult period with freedom of expression under attack, in ways parallel to the Emergency. He regretted that a section of the media is hand in glove with the government in promoting the agenda of fomenting hatred. He said the big media has big corporate investments and the support of the government. He pointed out that the media’s job was becoming more difficult as the RTI instrumentalities had been weakened, information was being blocked and it took months and multiple appeals to secure information from government authorities through the RTI. He pointed out that different sections of the people were under attack, particularly minorities, academics and students. University campuses that are places for debate and discussion and the raising of questions are being targeted. He said the entire attempt was to stop people from asking inconvenient questions.

John Brittas, editor of Kairali TV, said he was amazed to find Kerala being portrayed in the media as a hotbed of Islamic terrorism when it is a liberal, tolerant state. He pointed out that 45% of the state’s population comprises minorities and inter-religion and inter-caste love marriages are common.  He said there are cases of conversions for marriage, citing personal examples of such conversions from different religions to Christianity, Hinduism and Islam. He said the media should not distort facts, e.g. a leading English daily had falsely claimed that there have been 90 cases of love jehad, whereas these were cases of conversion.

Seema Mustafa, editor of The Citizen, said today people are being defined by various identities. She finds herself vulnerable because of three identities, first as a woman, next as a Muslim and last as a journalist. Vicious social media attacks and threats to women journalists like her are common, she said. She reflected on the changes in media over the years, saying that with private TV channels big money came into the media. In the corporatized media the mass of journalists became contract workers whose insecure jobs force them to toe the line. She said the honesty, independence and spirit of irreverence that was the hallmark of journalists in the 1980s has been deliberately killed by successive governments. She recalled how the Congress government had nearly managed to shut down the Asian Age daily over the issue of the nuclear deal.  Today, she said, we have created monsters in the form of propaganda channels that spew hatred night after night. These do not deserve to be called news channels, she said. She regretted the rot within journalism, saying too many of us today are servile, embedded, selfie journalists. It is not the role of journalists to rub shoulders with the powerful and ride in their corporate planes, she said. We are people’s watchdogs, she said.

Veteran journalist Sukumar Muralidharan pointed out the dangers of increasing monopolies in the media. He observed that corporate media has entrenched itself through cross-media monopolies over print, television, advertising and online media. Government controls in this sphere have been lax and the big media has colonized the entire spectrum.  While FDI in media was controlled, foreign investment in Indian advertising agencies was opened up during the period of liberalization, he said, leading to corporate control over the media revenue stream. He said government reports on the issue of cross-media monopolies, such as the ASCI report and the TRAI report had been mothballed. He said public service broadcasting could be used to counter the viewpoint of corporate media, if governments are determined to do so, mentioning that the United Front government had made some attempts in this direction but the Congress government had been lukewarm on the issue.

Thomas Dominic, president of the Kerala Union of Working Journalists’ Delhi chapter, spoke of the recent attacks on journalists such as Gouri Lankesh in Karnataka and Shantanu Bhowmik in Tripura. He said such attacks reflect the intolerant mindset of those in power today.

Veteran journalist and activist John Dayal said that dying is an occupational hazard for reporters as they work in the field covering all kinds of occurrences. However, it is also important to speak of the large number of journalists who have been silenced in other ways. Reporters can be easily intimidated because they can be sacked, he said. He pointed out that the new media is not necessarily different from the old, because in many cases it is the same corporates who have invested in websites and online media. There is a nexus between new/old media and the government. The same opinions, the same kind of unwritten censorship is therefore likely in new media too.  He also said that independent journalists with inconvenient opinions have been quietly blacklisted by public broadcast channels.

Dayal spoke of his recent journey with the Karwaan e Mohabbat across the country, visiting the homes of 56 victimised families whose relatives had been killed by cow vigilantes and other intolerant groups. He said they had come across largely unreported deaths of Muslim boys in 110 police encounters. Islamophobia reigns, he regretted.  He also spoke of the subversion of institutions, the indifference of government appointed human rights commissions, minorities commissions, SC/ST Commissions, the judiciary and other authorities to the plight of many victims. 

A short video film about attacks on the media, with particular focus on the plight of mofussil journalists was shown by Kondaiah and A.Amaraiah National Alliance of Journalists. He said that life was very difficult for stringers in the rural areas of Andhra Pradesh and Telangana where any reports on the doings of the land mafia are met with reprisals including severe beatings. Local politicians are often involved in such attacks.The video gave flashes of all India attacks on Journalists, listed some of the murders and attacks .
K.Manjari, secretary Andhra Pradesh Working Journalists Federation , spoke of the gender bias prevalent in media. She said that for many years there had been an unwritten ban on women reporters on the excuse that they would require transport at night and would also demand maternity leave. Women like her had to fight it out. However, their opportunities continue to be limited. She herself had joined as a senior reporter and after 29 years had retired as a senior reporter. Not a single promotion had come her way. She also commented on media bias in reporting on women’s issues, particularly the prejudices that surface in headlines and reportage on crimes against women. She said the reports on the Arushi murder case carried unsubstantiated allegations and conclusions on the morality of a 13 year old girl. The media had been too quick to judge.

Som Dutt Sharma of the General Secretary of the  All India Lawyers Union observed that the right of the citizen to privacy, the right to question, the right to scrutinise and the right to dissent are the core of the Indian Constitution. He regretted the lethargy of the justice delivery system in defending the rights of citizens. On the recent case of The Wire being attacked for its expose on Jay Amit Shah’s financial dealings, he said it cannot be called defamatory at this stage when not even an inquiry has been done to establish the truth or otherwise of the report carried by the Wire. He also said it was incorrect for a minister to publicly defend a private individual like Shah.

Sujata Madhok, General Secretary of the DUJ, said journalists are particularly vulnerable today because of a series of attacks on them. These include physical attacks; virtual attacks and threats on social media, and financial attacks through legal notices and defamation charges.  She said women journalists are invariably targeted with sexual abuse on social media. She demanded a special law for the protection of journalists. She referred to the draft law framed by the People’s Union of Civil Liberties for journalists and human rights defenders in Chhattisgarh. She also repeated the longstanding DUJ demand for an independent Media Council to replace the toothless Press Council of India and cover the entire media spectrum.

S.K. Pande, President of the DUJ, asked for solidarity with the Hindustan Times workers who are still struggling for justice 13 years after being retrenched. He asked those present to observe two minutes silence in the memory of Ravindra Singh, the worker who died last week while on dharna outside the HT building.  He warned of RSS moves to revive the Hindustan Samachar news agency at the expense of UNI and PTI and with government doles. He regretted the decline of Urdu journalism  but noted that UNI Urdu was doing well .He pointed out that  UNI regular employees were not getting salaries for months and said the government was trying to boost Hindustan Samachar and Doordarshan and pack them with drumbeaters of the government .

SK Pande announced the formation of a National Alliance of Journalists with journalists,  trade unions from several states as members and others proposing to join. He stressed how the KUWJ and DUJ were a cementing force for over 12 years. He also noted the battles waged by the All India Newspaper Employees Federation of which the DUJ was now an associate member .During wage boards , we always got the help of a united confederation of Newspaper and News Agencies Employees Federation, he added.

He  however regretted that journalism which  was described by Marquez as one of the best professions in the world was now turning out to be the worst, most exploited and hazardous :’ where sufferance  was indeed the badge of all our tribe’ . The ethics is missing and in sections of TV it is 24X7 noise  and muzzling  dissenting voices. Scientific temper as suggested by the first Press Commission was dying in the media – and era of McCarthyism of a new type was beginning  with liberal and left bashing  increasing . More than shades of emergency were visible and living wages and the working journalist Act was being slowly ended. There is no pension and no security  for journos.

Resolutions on the death of a Hindustan Times employee recently, on non-implementation of the wage board Award , on the contempt slapped on The Wire  were unanimously passed. The formation of a National Gender Equity Council of journos was announced.

PRESS RELEASE

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हे टीवी संपादकों, तुम लोग ही इन हरामी बाबाओं को प्रमोट करते हो… प्रसाद में थप्पड़ मिला तो हल्ला क्यों?

Shaitan Singh Bishnoi : कल ये देख के मुझे बेहद ताज्जुब हुआ कि ओबी वैन जलाने पर और मीडिया कर्मियों की पिटाई पर प्रलाप मचा कर गुरमीत सिंह को फर्जी बाबा घोषित कर उन्हें अन्धविश्वास फैलाने का आरोपी ठहराने वाला एक चैनल मात्र आधे घण्टे के बाद “समुद्र में मायावी मंदिर” नामक कवर स्टोरी दिखा रहा था।

आप अपने फायदे के लिए खून पीने वाली चुड़ैलों का प्रोग्राम बनायेंगे… सवेरे शाम घंटों चमत्कारी ताबीजों, यंत्रों की मार्केटिंग करेंगे… सुबह ज्योतिषाचार्यों को बैठा के सम्पूर्ण भारत के भविष्य की घोषणा करवा देंगे… फिर इल्जाम दूसरों पे लगायेंगे कि अगला जनता को भ्रमित कर रहा है?

आप स्वयं “सभी दुखों को हरने वाले उपायो को सुझाने वाले बाबाओ की मार्केटिंग करते हैं”

आप फर्जी तस्वीरो के सहारे विमानों के अवशेष तथा घटोत्कच का कंकाल ढूंढ निकालते हैं।

आप ही साईं बाबा के चमत्कारो की 20 कहानिया सुबह शाम जनता को दिखाते हैं।

मुझे गुरमीत सिंह को भगवान् समझने वाले उन भोले भाले मासूम इंसानो, औरतो बच्चों से भी सहानुभूति है.. जो ये समझते हैं कि कुछ पत्थर फेंक के, वाहनों में आग लगा के वे शासन तंत्र को झुका लेंगे।

पर ना जाने क्यों… गुरमीत समर्थकों द्वारा कूटे जाते इन खबरिया चैनलों वालों से चाह के भी सहानुभूति पैदा नहीं होती।

भारत की जनता को अशिक्षित, अराजक बनाने में सबसे बड़ा योगदान तो आप लोगों का ही है।

दो चार थप्पड़ और पड़ने चाहिए! उम्मीद है, न्यायपालिका ओर प्रशासन मिलकर इसपे काबू पा लेंगे

जयपुर के युवा उद्यमी शैतान सिंह बिश्नोई की एफबी वॉल से.

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बाबा की गुफा से आ रहे पैसों से अब तक मीडिया की आंख पर पट्टी बंधी हुई थी!

..पत्रकार कर रहे दो जून की रोटी का संघर्ष… लेकिन उनका दर्द किसी को नहीं दिख रहा… अगर न्यूज चैनलों के नाम ‘आया राम‘ और ‘गया राम‘ हो जाये और इनकी टैग लाइन भ्रष्टाचार, अनियमितता, ‘ब्लैक मेलिंग के बादशाह‘ या फिर ‘लूटने के लिए ही बैठे हैं’…. हो जाये तो आश्चर्य मत कीजियेगा… क्योंकि न्यूज़ चैनल इस रूप में सामने आने भी लगे हैं.. वो भी बिल्कुल कम कपड़ों के साथ, जिसमें उसका काला तन साफ नजर आ रहा है… कोई चैनल बीजेपी समर्थित तो कोई कांग्रेस, तो कोई बाबाओं की चरणों की धूल खाकर जिंदा है। सभी चैनल लगभग अपने उद्योगपति आकावों की जी हुजरी में लगे हैं।

आका का जैसा हुकम होता है वैसा ही चैनल पर चलने लगता है ओर रही सही कसर डीपीआर पूरी कर देता है। सरकार के खिलाफ ये नहीं चलेगा, मंत्री के खिलाफ ये लगाना है कि नहीं, पैनल में किससे क्या पूछना है? किस मंत्री या विधायक की तारीफ करनी है? ये पीछे बैठे पैसों के दलाल तय कर लेते हैं और इनपुट पर संदेश आते ही खबर की हत्या हो जाती है। ऐसे में जो दिख रहा है या दिखाया जा रहा है वो सच है, ये मान लेना बेवकूफी हो सकती है।

अब गुरमीत राम रहीम का ही केस ले लीजिये। 2002 से एक दर्द की कहानी बयां करता एक पत्र आई-गई सरकार और मीडिया संस्थाओं के बाजार में घूमता रहा। इस पर मीडिया जमकर खेल सकता था लेकिन बाबा की गुफा से आ रहे पैसों ने इनकी आंखों पर पट्टी बांध दी ओर सभी मीडिया संस्थान मनमोहन सिंह की ही तरह मौन हो गए। सजा का ऐलान हुआ और बाबा को नपता देख मीडिया ने तुरंत पाला चेंज कर बीजेपी ओर कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ बाबा के कई सारे वीडियो और फोटो चलाने के साथ ही बाबा के डेरे में हथियारों के प्रशिक्षण के साथ कई ऐसी चीजों को दिखाने लगे मानो मीडिया चैनलों ने सच्चे मन से बाबा के खिलाफ सब कुछ दिखाया था जिसके चलते उसे जेल हो गई… लेकिन इन बुड़बकों को कौन समझाये कि साहब, आप लोगों ने तो बाबा की फिल्म आने पर सुबह से शाम तक फिल्म और बाबा के इंटरव्यू एक्सलूसिव तारीफ के साथ ऐसे दिखाया कि शहद भी क्या मीठा होता होगा! पैसा बरसता गया, बाबा का प्रमोशन होता गया…

ना जाने ऐसे कितने बाबा और उद्योगपति हैं जिसके किस्से कहानी मीडिया ऐसे ही आए दिन सुनाता आ रहा है… कब वो अपना पाला बदल ले, कहते नहीं बनता। ऐसे में एक कहावत याद आती है कि पुलिस वाले किसी के नहीं होते… ना इनकी दोस्ती अच्छी ना दुश्मनी… बस ये कहावत आज के मीडिया पर भी फिट बैठती है। आप रूपए बरसाते जाओ और तमाशा देखते रहो। खैर, बाबा कई आये कई गए और चैनल भी कई आएंगे और जाएंगे, लेकिन इन सब के बीच दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते कई पत्रकार दम तोड़ रहे हैं। समय पर सैलरी नहीं। काम के अनुसार नहीं। गधा हम्माली अलग। न ही समय पर छोड़ने की बात। और, हैरानी जब होती है जब जाने-माने पत्रकार चाहे वो नेशनल के हों या प्रदेश के, जिन्होंने अपना जीवन पत्रकारिता में खपा दिया और अब जब वो दर दर की ठोकर खाते दिखते हैं तो पत्रकारिता से विश्वास उठ जाता है।

अब पत्रकार सिर्फ एक चैनल से दूसरे में, दूसरे से तीसरे और तीसरे से दसवें चैनल में जा जा कर केवल नौकरी बचाने में लगा दिखता है। कई तो नाम बना रहे, इसलिए फ्री में भी ड्यूटी बजा रहे हैं। दलाली में भी लगे कई पत्रकार तो ऐसे हैं जो घर बैठे-बैठे रूपए कमा रहे हैं और वहीं दूसरी और आफिस में दिनभर सिर फोड़ने वाले अगले माह की सैलरी के लिए राह देखता नजर आता है। ऐसे में आने वाले नए दौर की पत्रकारिता में किस तरफ और किसकी ओर देखा जाए, ये समझ से परे है। ना जाने इंतजार किसका है और किसका रहेगा… लेकिन इंतजार ये जारी रहेगा कि काश पत्रकारिता में उजाला आ जाए…

हेमंत मालवीय
hemant malviya
malviyah7@gmail.com

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दो मीडिया हाउसों के एचआर की कहानी- ”किसी की पैरवी है आपके पास?”

Hi all,

Although I didn’t want to share with you but now I feel it is must to share that how people from Hr Department waste job seeker candidates time. I guess they believe that they are equal to God and all job seekers are beggars.

Incident No-1

A friend of mine who is also a Hindi writer/journalist yesterday he received an interview call from India’s most trusted  media house that has both Hindi and English Language services for their readers. After completing the call the Hr said he is going to send him an SMS regarding Interview schedule, but he didn’t. Today Morning when my friend called him up regarding the interview schedule the Hr said that I thought I have sent you yesterday, its OK now I am going to send you an SMS…..

At the time of Interview my Friend was there in front of the Hr, Who took him to another room for written test. There my friend was given a laptop by some IT guy to do some translation job English to Hindi, to check his skills. As soon as my friend had stated his test he found there no Hindi Software in the given laptop, he asked the IT guy that where to get the Hindi Font?  Initially the IT guy was clueless, later some other person suggested him to the translation with the help of Google translation. My friend who is from a long time into Hindi Media knew everything but he was just observing the services or the system of their interview process. He started doing the translation with the help of Google tool. After completing the first paragraph…. all of sudden the laptop went off…. and he lost all his translated content as it was on Google tool.

He called the IT guy instantly who came and reacted very casually and after some technical exercise the laptop got started However he started doing the same task again the translation and after doing one and half paragraph translated the laptop went off again….

Now my friend became fed up with that, again he called up the IT Guy who was shocked and saying in Hindi “बंद कैसे हो गया ये?”   Before the IT Guy started the same IT Exercise again my friend asked him, that he wants to meet the Hr. Now the Hr has nothing to justify their services. He asked my Friend to wait outside after 5 minutes later the Hr came to my friend and said “YOU CAN LEAVE” without even saying sorry for his 3rd class services and for wasting someone’s precious time

Incident No-2

Around 6 months back another friend of mine who is also a Hindi writer/journalist received a call from one of the leading Hindi News paper. The female Hr told him that she got his CV from job portal and invited him for the interview. She sent him an email for the Interview scheduled.

While my friend reached their office he called the Hr before entering the office who answered him that she doesn’t sit at that office. However she guided him to go and meet the editor. My friend went to the reception of that Media House where he was guided towards the editor’s room. 

After some time he was sitting in front of the editor, the editor went through his CV and asked him 5 to 7 questions. Later the editor asked him “किसी की पैरवी है आपके पास?” My friend was shocked as he was called by their Hr Team; He said No, I got a call from your Company’s Hr department. The editor didn’t reply him anything… after that my friend was asked to wait and then he was finally answered actually there is no such post for which he was called, so he can leave. After coming out from the premises my friend called that female Hr to tell what he faced but she never received his call.

….AND THE MOST IMPORTANT THING IS THAT BOTH OF THE MEDIA HOUSE IS INDIA’S MOST POPULAR PUBLISHING HOUSES.

लेखक Vikash Rishi से संपर्क 9818868890 या vikash.makkar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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मीडिया से सावधान रहने का वक्त आ गया है!

Dinesh Choudhary : कथित पत्रकारों के साथ लालू यादव की क्या झड़प हुई है, मुझे नहीं मालूम। लालू बहुत डिप्लोमेटिक हैं और प्रेस से भागते भी नहीं। भागने वाले तो 3 साल से भाग रहे हैं। लालू मुलायम की तरह ढुलमुल भी नहीं रहे और उनका स्टैंड हमेशा बहुत साफ़ रहा। पर थोड़ी बात आज की पत्रकारिता पर करनी है, जो बहुत थोड़ी बची हुई है।

छत्तीसगढ़ में देशबन्धु को छोड़कर अन्य अखबारों ने सरकार विरोधी विज्ञापन छापने से मना कर दिया। यानी अब पेड न्यूज वाला वह दौर भी चला गया जब आप पैसे देकर कुछ भी छपवा सकते थे। अब जो दौर आ गया है उसमें आप पैसे देकर खबर छपवा सकते हैं और पैसे देकर विज्ञापन रुकवा सकते हैं। यानी यह पेड न्यूज के साथ पेड सेंसरशिप की नई जुगलबन्दी है और पेड न्यूज के बीते दौर से और भी ज्यादा खतरनाक है। कैसा बुरा जमाना आ गया है कि जो सरकार सूचनाओं को अनब्याही माँ की तरह छुपाती थी, वो अब सूचनाओं के लिए बाध्य है और जो मीडिया इनके लिए जमीन-आसमान एक कर देता था, अब उन्हें छुपाने के खेल में शामिल हो गया है।

यह पैसे की ताकत का निर्लज्ज खेल है और इसमें लिप्त लोग जो कुछ भी कर रहे हों, कम से कम पत्रकारिता तो नहीं कर रहे हैं। ये शक्तिशाली माफियाओं के नेतृत्व वाले संगठित गिरोह हैं, जिनकी गर्भनाल सत्ता और पूंजी के निर्लज्ज गठजोड़ के केंद्र में है और जिन्होंने पत्रकारों के नाम बाउंसर्स को छुट्टा छोड़ रखा है। इनके बॉस वे एंकर हैं जो चरित्र हत्या की सुपारी लेते हैं।

पेड न्यूज तब था जब मीडिया और सेठ भिन्न थे। सेठ मीडिया को पे करता था। अब सेठ ही मीडिया हो गया है तो नंगा नहाए क्या और निचोड़े क्या, छापे क्या और छुपाए क्या? ये बेशर्म पूँजी का खुला खेल फरक्काबादी है। इसे मीडिया कहना मीडिया की तौहीन है क्योंकि पुराने दिनों के कामों के कारण अब भी इस शब्द में थोड़ी गरिमा चिपकी हुई है।

श्वान अपने मालिक का कितना भी वफादार हो, राह चलते को लपक कर काटता नहीं है। इस तरह काटता वही है जो एक विशेष अवस्था को प्राप्त हो जाता है। ये सब विशेष अवस्था को पहुँचे हुए हैं और इनसे बचाव करने की जिम्मेदारी खुद की है।

लेखक दिनेश चौधरी थिएटर और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

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छत्तीसगढ़ में ‘देशबंधु’ के अलावा बाकी सभी अखबार हुए नपुंसक, सरकार विरोधी विज्ञापन छापने से किया इनकार, कांग्रेस ने की शिकायत

मीडिया वाले खुद भक्ति में इतने ली हो गए हैं कि उन्हें यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि वे कितने पतित होंगे. छत्तीसगढ़ में अखबार वालों ने कांग्रेस के उस विज्ञापन को ही छापने से मना कर दिया जिसमें भाजपा सरकार के शासनकाल को लेकर सवाल उठाए गए थे. सिर्फ देशबंधु अखबार ने विज्ञापन छापा. बाकी सभी अखबार नपुसंक साबित हो गए. इस प्रकरण से ये भी पता चलता है कि भाजपा सरकारें किस तरह मीडिया का मुंह बंद करते हुए गला दबाए रहती हैं. छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को पत्र लिखकर अखबारों की इस भक्तिपूर्ण हरकत की शिकायत की है.

कांग्रेस पार्टी के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल का कहना है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के छत्तीसगढ़ दौरे के वक्त कांग्रेस शासन कर रही बीजेपी से कुछ सवाल पूछना चाहती थी. इन सवालों वाले विज्ञापनों को छापने से राज्य के तकरीबन सारे अखबारों ने इनकार कर दिया, सिवाय ‘देशबंधु’ अखबार के. अधिकृत रूप से समाचार पत्रों ने न छापने की कोई वजह नहीं बताई. आफ द रिकार्ड अखबारों के विज्ञापन मैनेजरों ने माना कि ऐसे विज्ञापन छपने से संस्थान को सरकार की ओर से दिक्कत हो जायेगी. छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने इन मुद्दों को लेकर रायपुर में विरोध प्रदर्शन भी किया है. देशबंधु में छपे कांग्रेस के विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के नारे को याद दिलाते हुए राज्य सरकार पर 3600 करोड़ के नॉन घोटाले, विदेशों में काले धन और शराब बिक्री में 1500 करोड़ रुपए कमीशन खाने का आरोप लगाया गया है.

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बाबा रामदेव द्वारा सेना को घटिया आंवला जूस सप्लाई करने की खबर को न्यूज चैनलों ने दबा दिया

पतंजलि और बाबा रामदेव के अरबों-खरबों के विज्ञापन तले दबे मीडिया हाउसेज ने एक बड़ी खबर को दबा दिया. भारतीय सेना ने बाबा रामदेव द्वारा सप्लाई किए जा रहे आंवला को घटिया पाया है और इसकी बिक्री पर फौरन रोक लगा दी है. यह खबर दो दिन पुरानी है लेकिन इस मुद्दे पर किसी न्यूज चैनल में कोई चीखमचिल्ली नहीं है. सब बड़े आराम से चूं चूं के मुरब्बा की तरह इस बड़ी खबर को पी गए और देश को बांटने वाले विषयों पर हो-हल्ला जारी रखे हुए हैं.

असल में बाबा रामदेव का पतंजलि ग्रुप आंवला जूस भारतीय सेना को सप्लाई करता है. भारतीय सेना कोई भी प्रोडक्ट अपने यहां आने पर उसका अपने लैब में परीक्षण करती है. इस परीक्षण में बाबा रामदेव का आंवला घटिया पाया गया. यानि जो पैरामीटर भारतीय सेना ने बनाए हैं, उस पर यह प्रोडक्ट खरा नहीं उतरा. इसके फौरन बाद सेना ने इस प्रोडेक्ट को न सिर्फ कैंटीन से हटवा दिया बल्कि आगे से ऐसे प्रोडक्ट्स को लाने पर पाबंदी लगा दी है.

ये तो रही मूल खबर. अब यहां से शुरू होती है मीडिया वालों के हरामीपने की खबर. दिन रात न्यूज चैनलों पर बाबा रामदेव और उनके प्रोडेक्टस का हरिकीर्तन चलता रहता है. जाहिर है सबकी जेबें इस विज्ञापन की रकम से भरी जा रही है. अरुण पुरी हो या रजत शर्मा, सुभाष चंद्रा हो या अवीक सरकार, मुकेश अंबानी के न्यूज चैनल हों या विनोद शर्मा का मीडिया हाउस, सब के सब रामदेव के नोटों के तले दबे हैं. सो इन्हें तो इस खबर को दबा ही देना था. लेकिन क्या इस खबर को एनडीटीवी पर भी नहीं दिखाया गया? बताया जा रहा है कि एनडीटीवी भी बाबाजी के रुपयों रुपी आशीर्वाद तले दबा है, सो प्रणय राय ने भी खबर पर आंख मूंद लेने का फरमान अपने यहां जारी कर दिया.

मतलब कि बाबा रामदेव के एक घटिया प्रोडक्ट ने भारतीय मीडिया के घटिया और घृणित चेहरे का भी पर्दाफाश कर दिया. अखबार हों या न्यूज चैनल, जबसे इनका कारपोरेटीकरण हुआ है, तबसे इनने शीर्ष लेवल के घपले घोटाले दिखाने छापने बंद कर दिए हैं क्योंकि इन घोटालों में या तो इनका कोई करीबी शामिल होता है या फिर इनके मीडिया हाउसों का बड़ा विज्ञापनदाता. हुआ यह भी है कि ये मीडिया हाउसेज सत्ता से लंबी चौड़ी डील कर पैसे उगाह लेते हैं और फिर सत्ता के खिलाफ भी खबरें नहीं दिखाते, जैसा कि आजकल मोदी राज में हो रहा है. दिन रात मोदी और योगी कीर्तन चल रहा है. इसके पहले यूपी की अखिलेश सरकार ने अरबों रुपये लुटाकर को मीडिया को मैनेज कर रखा था.

बंगाल की पब्लिक हेल्थ लैब में आंवला जूस के फेल हो जाने के बाद आर्मी कैंटीन द्वारा इसकी बिक्री पर रोक लगा देने की खबर पर किसी न्यूज चैनल में प्राइम टाइम पर डिबेट न होना शर्मनाक है. नैतिकता का दिन-रात पाठ पढ़ाने वाले मीडिया हाउसों के संपादकों और एंकरों को एक दिन के लिए अपने मुंह पर कालिख पोत कर स्क्रीन के सामने बैठना चाहिए ताकि जनता जान सके कि इनने एक बड़ी खबर विज्ञापनदाता के दबाव में न सिर्फ दबा लिया बल्कि राष्ट्रहित और भारतीय सेना से जुड़े इस मसले पर जनहित में खबर न दिखाकर राष्ट्रद्रोह किया है.

पतंजलि के प्रोडक्ट आंवला जूस पर सेना की कैंटीन में बिक्री पर रोक लगाने की खबर को अपने चैनल पर न दिखाए जाने को लेकर न तो अजीत अंजुम ने कोई ट्वीट या एफबी पोस्ट जारी किया होगा और न ही सुधीर चौधरी इस बड़े विषय पर अपने दर्शकों का ज्ञान सोशल मीडिया पर बढ़ाते पाए गए होंगे.

रक्षा मंत्रालय ने आयुर्वेद पतंजलि को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है. इस मामले में रक्षा मंत्रालय ने बाबा रामदेव की कंपनी से जल्द से जल्द जवाब भी मांगा है. लेकिन हमारे महान एंकर और संपादक लोग सो रहे हैं. हमारे महान मीडिया मालिक इस मामले में सेना और राष्ट्र का हवाला देकर छाती बिलकुल नहीं कूट रहे हैं.

खबरों के मुताबिक पतंजलि के इस आंवाल जूस की जांच कोलकाता की सेंट्रल फूड लैबरेटरी में भी जांच कराई गई और वहां भी इसे खाने के लिए ठीक नहीं पाया गया. इसके बाद ही पतंजलि को आर्मी की सभी कैंटीनों से आंवला जूस वापस लेने का निर्देश दिया गया और पतंजलि ने चुपचाप अपना प्रोडक्ट वापस मंगा भी लिया है.

इस पूरे मामले में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह का कहना है- ”देशभक्ति यही है क्या? फौज को नकली आंवला जूस बेचने के अपराधी रामदेव पर किसी भक्त को अब कुछ नहीं कहना है, क्यों? अब कहां गया राष्ट्र और कहां गया सेना का अभिमान? तीन दिन हो गये किसी चैनल पर सांस तक नहीं आई. गूगल करें. दस स्रोत हैं इस खबर के. तीन दिन से प्रिंट मीडिया में ख़बर है. लेकिन चैनल वाले अभी हिंदू मुस्लिम और केजरीवाल में उलझे हैं.”

वरिष्ठ पत्रकार Jaishankar Gupta का साफ कहना है कि सब के सब मीडिया हाउस पतंजलि के विज्ञापनों के बोझ तले दबे हैं. पत्रकार Kumar Narendra Singh कहते हैं- ”यदि आपके पैसा और पॉवर हो, तो आपका हर कुकर्म देशभक्ति है। लेकिन यदि आप गांठ के पूरे नहीं हैं, तो आप देशभक्त नहीं हो सकते।”

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. यशवंत से संपर्क ह्वाट्सअप नंबर 9999330099 के जरिए किया जा सकता है.

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पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

अखबार मालिक ही नहीं मालिक का एजेंट संपादक भी यही सवाल दाग देता है कि अखबार निकालने में करोड़ों खर्च होते हैं कोई करोड़ों रुपए समाजसेवा पर क्यों खर्च करेगा। बस यही से शुरू होता है खेल। पहले विज्ञापन के नाम पर या आड़ में होता था अब पेड न्यूज जैसी तमाम चीजें शामिल हो गई है। इन्ही तमाम चीजों में एक है लठैती। मीडिया धीरे-धीरे ही सही पेशेवर लठैत होता जा रहा है। एक कहावत है कि,” पूत के पांव हमेशा पालने में ही नहीं रहते”। विज्ञापन के मायाजाल से ही इसने केंचुल बदलना शुरू किया। पाठकों को सूचना देना, गरीबों-मजलूमों की आवाज बनने के बजाए मालिकों, नेताओं की ढाल बनने लगा। अब यह ढाल वार रोकने तक ही सीमित नहीं वह प्रहार भी करने लगा। यह प्रहार गरीब निरीह जनता के लिए नहीं मालिकों और नेताओं के लिए होने लगी। यानी मीडिया लठैत हो गया। सामंतयुगीन व्यवस्था में लठैत अपने मालिक के लिए ” कुछ भी” करने को तैयार रहते थे वो भी सेवाभाव से। आज मीडिया भी तैयार रहता है सेवाभाव से। आज का मीडिया लाठी लिये मालिक के धंधों को हांकता रहता है।

आज एक नया शब्द सुनने को मिल रहा है वह है कारपोरेट मीडिया। अब ये काँपोरेट मीडिया क्या है अपुन अभी तक नहीं समझ पाये हैं। जब बड़े घराने मीडिया के “धंधे” में आये तो मोटामोटी एक ही बात भेजे में घुसेड़ी जाती थी कि, ये अपने अन्य धंधों की रक्षा के लिए अखबार (तब टीवी चैनल नहीं थे) निकालते हैं। अपने अन्य धंधों के होने वाले मुनाफे का कुछ प्रतिशत अखबार को दे दें तो वह चाहे घाटे में रहे या फायदे में कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब बिड़ला के हिंदुस्तान अखबार को ही ले लें। बिड़ला जी के पचासों धंधे थे उसके मुनाफे से कुछ फीसद अखबार को दे दिया तो अखबार चाहे जैसे चले कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे घाटे में ही रहे। लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि बंटवारे के बाद एक पारिवारिक सदस्य को सिर्फ अखबार ही मिला है।

बात लठैत की। हाल के चुनावों व उसके मीडिया की भूमिका किसी लठैत से कम नहीं रही। लठैत की सबसे बड़ी खूबी यह भी होती है कि वह अपने मालिक के इशारों को अच्छी तरह से समझता है। मीडिया भी समझने लगा है। मसलन कब उसे किसे कितना महत्व देना है। किसकी रैली, रोड शो या जनसभा को कितना कवर करना है। बसपा का एक नारा था, ”जिसकी जितनी आबादी, उतनी उसकी हिस्सेदारी”। मीडिया भी पार्टी प्रचारकों की लाइव कवरेज भी कुछ इसी आधार पर करता रहा। भाजपा का सबसे ज्यादा, बाकी में कांग्रेस, सपा और बसपा ही होते थे जबकि चुनाव में आरएलडी, जेडयू, राजद, यूकेडी, अकाली और वामपंथी भी थे। नेताओं के साथ विशेष कवरेज भी विशेष तक ही सीमित रही। गोया अन्य दलों के प्रमुख गाजर-मूली हैं।

ये तो रही चुनाव के आगे-पीछे की कवरेज। उसके बाद भी मीडिया की भूमिका लठैत की ही होती है। वह कौन सा अखबार और चैनल है जो अपने मालिक के खिलाफ एक लाइन भी लिख दे। दैनिक जागरण में नरेंद्र मोहन के खिलाफ कभी एक लाइन छपा है। राष्ट्रीय सहारा के सहारा श्री लखनऊ में गिरफ्तार हुए किसी संस्करण में एक लाइन खबर नहीं थी, क्यों। क्योंकि लठैत कि यह भी खूबी होती है कि वह मालिक के आगे शीश नवाये रखता है। मालिक तो मालिक के करीबी के खिलाफ भी तब तक खबर नहीं छपती जब तक की वह बुरी तरह से फंस न जाए। रामदेव के करीबी बाल कृष्ण फर्जी डिग्री के मामले में देहरादून में गिरफ्तार हुए। राष्ट्रीय सहारा के अन्य  संस्करण की जाने दीजिए देहरादून में भी एक लाइन खबर नहीं छपी। हां इंदौर से रामदेव का खंडन हर अंक के पहले पेज पर छपा। (अखबार की फाइल गवाह है)

यही लठैत कभी भी विज्ञापन देने वाले पर तब तक खबर नहीं लिखते जब तक वह बुरी तरह से घिर न जाए या मालिक हरी झंडी न दे दे। विज्ञापन देने वाले इनके लिए पार्टी होते हैं। आजकल एक नया रिवाज शुरू हो गया है। स्क्रीन पर एक ही नेता की दो-दो फोटो वो भी एक साथ। मसलन, विज्ञापन की जगह एल बैंड के रूप में आदित्य नाथ और समाचार में भी वो भी एक ही समय में। आने वाले दिनों में दांये-बांये, ऊपर नीचे भी हो सकती है। अखबार का मास्टहेड एक ही दिन तीन-तीन होता है यानी  पहले पेज की तरह तीन तो कभी चार पेजों पर अखबार का नाम होता है।

यह भी एक तरह से मीडिया की लठैती ही है। कभी मीडिया की लाठी कमजोरों के लिए, उत्पीड़ितों के लिए उठती थी अब किसके लिए उठती है और क्यों उठती है सब जान गये हैं। भाजपा से राज्यसभा की शोभा बढ़ाने वाले जी मीडिया के मालिक सुभाष चंद्रा के खिलाफ जीटीवी की लाठी जीटीवी के लठैत उठा सकते हैं क्या?

अरुण श्रीवास्तव
07017748031
08881544420

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