लक्ष्मी का बहिर्गमन नियंत्रित हो

स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व हमारे देशवासियों ने भावी भारत के रूप में सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का सपना देखा था। उन्हें विश्वास था कि अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिलते ही हम भारतीयों का ‘स्वराज्य’ स्वावलम्वन से सशक्त और सम्पन्न बनकर ‘सुराज’ की स्वार्णिम कल्पनाएं साकार करेगा। प्रख्यात सुकवि-नाटककार जयशंकर प्रसाद कृत ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक के निम्नांकित गीत में इस जनभावना की अनुगूँज दूर तक सुनाई देती है-

‘हिमाद्रि तुंग श्रृंगसे, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती।

उपर्युक्त पंक्तियों में स्वतंत्रता का ‘स्वयंप्रभा’ (आत्मनिर्भर) और ‘समुज्ज्वला’ (भ्रष्टाचार मुक्त) रूप कल्पित है। महात्मागाँधी के ‘हिन्द स्वराज’ में वर्णित तत्कालीन राजनीतिक-दृष्टि भी स्वतंत्रता के इसी रूप का स्वागत करने को प्रस्तुत मिलती है। स्वाधीनता संग्राम के अहिंसक आन्दोलनों की धूम के मध्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाना, उनकी होलियाँ जलाया जाना और घर-घर में सूत कातकर, वस्त्र बुनकर स्वावलम्वन का आधार पुष्ट करना स्वतंत्रता को ‘स्वयंप्रभा’ बनाने के ही व्यावहारिक प्रयत्न थे। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के अनन्तर देशहित के ये महान प्रयत्न हाशिये पर डाल दिए गए।

खादी जो तप-त्याग की प्रतीक थी ; सादगी का प्रतिमान थी, वह चुनावों में मत प्राप्त करने का साधन बन कर रह गई। महात्मा गाँधी का नाम लेकर सत्ता सुख भोगने वालों ने औद्योगीकरण, आधुनिकता और विकास का नारा उछालकर गाँधी के सपनों के भारत हिन्द स्वराज की भारतीय प्रगति-योजना महानगरीय चकाचैंध की वेदी पर बलिदान कर दी। हमारी स्वतंत्रता न ‘स्वयंप्रभा’ बन सकी और न ‘समुज्ज्वला’ हो सकी। भ्रष्टाचार ने स्वतंत्रता की सारी उज्ज्वलता निगल ली। स्वतंत्र भारत में स्वदेशी के प्रयोग के स्थान पर आयातित विदेशी वस्तुओं के प्रदर्शन का ऐसा चाव चढ़ा है कि आज हमें यही ज्ञात नहीं कि हम जो वस्तुएं क्रय कर रहे हैं उनमें क्या स्वदेशी है और क्या विदेशी ? क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं ? आज हम आयातित वस्तुएं क्रय करके स्वयं को अधिक गौरवान्वित अनुभव करते हैं। यह दुखद है। उन्नीसवीं शताब्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा था –

‘‘अंग्रेज राज सुख साज सबै अति भारी।
सब धन विदेस चलि जात यहै अति ख्वारी।।

परतंत्र भारत में हमारे साहित्यकार नेता और बुद्धिजीवी सजग थे। उन्हें चिन्ता थी कि देश की लक्ष्मी षडयन्त्रपूर्वक देश के बाहर ले जायी जा रही है। ब्रिटिश शासन की वाणिज्य नीतियाँ हमारे राष्ट्र की आर्थिक संप्रभुता पर आघात कर रही हैं ; हमारे कुटीर उद्योग मिट रहे हैं और आयातित वस्तुओं का उपयोग देश-हित में नहीं है। उन्होंने हर संभव बलिदान देकर इस स्थिति को बदला और देश को ब्रिटिश-शासन से मुक्ति दिलाई ताकि भारतीय-नेतृत्व भारतीय-हितों की सिद्धि हेतु प्रयत्नशील हो किन्तु कैसी विडम्बना है कि देश में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने वाली हमारी सरकारों ने स्वदेशी के उपयोग की भावना को ऐसी तिलांजलि दी कि हमारे बाजार विदेशी माल बेचने के केन्द्र बनकर रह गये। यहाँ तक कि पटाखा, दीपक, विद्युतबल्ब झालर जैसी छोटी-छोटी वस्तुएं भी आयातित हो रही हैं। हम पर हर अवसर पर आघात करने वाला, हमारे हितों की पूर्ति में बाधक बनने वाला और हमारी सीमाओं पर गृद्ध-दृष्टि गड़ाने वाला हमारा पड़ोसी चीन हमारे ही बाजारों से लाभान्वित होकर सशक्त हो रहा है ; उसकी जनशक्ति रोजगार पा रही है और हमारे अपने देशवासी कारीगर बेरोजगार हो रहे हैं। इस चिन्ताजनक स्थिति के लिए हम और हमारी चुनी हुई सरकारें ही उत्तरदायी हैं।

यह सुखद है कि विगत कुछ वर्षों में हुई राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं में चीन की भारत-विरोधी भूमिका से भारतीय जनमानस पुनः सजग हुआ है और चीन से आयातित वस्तुओं का बहिष्कार कर रहा है। आवश्यकता इस बात की भी है कि हम भारत में वस्तुएं बनाने के साथ-साथ उन्हें खरीदने और उनका उपयोग करने के लिए सच्चे मन से संकल्प लें। दीपावली के शुभ अवसर पर हम भारतीयों की लक्ष्मी भारत की सीमाओं के अन्दर ही सुशोभित हो ; हमारी लक्ष्मी का बहिर्गमन यथासंभव नियंत्रित हो, यही सच्चा लक्ष्मी-पूजन है। जनता और सत्ता दोनों स्तरों पर ऐसे सार्थक प्रयत्न किये जाने पर ही हमें लक्ष्मी मैय्या की कृपा प्राप्त होगी और हमारी स्वाधीनता स्वयंप्रभा हो सकेगी।

डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र

विभागाध्यक्ष-हिन्दी

शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय

होशंगाबाद म.प्र.

drkrishnagopalmishra@yahoo.com

mob – 9893189646

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आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं.

आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

मैं हर तरफ और हर किसी के लिए शांति-सुख-समृद्धि की कामना करता हूँ।

आभार

यशवन्त

फाउंडर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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राजिम कुंभ 2017 : चलो नहा आएं… समापन महाशिवरात्रि के दिन..

12 वर्षों के अंतराल में देश के चार प्रमुख तीर्थस्थानों पर कुंभ का आयोजन किया जाता है. छत्तीसगढ़ के राजिम में यह उत्सव हर वर्ष माघी पूर्णिमा से आरंभ होकर महाशिवरात्रि पर पूर्ण होता है. इस बार का राजिम कुंभ विशेष महत्व लिए हुए है इसलिए राजिम कुंभ कल्प-2017 का नाम दिया गया है.  राजिम कुंभ लोगों के मन की सहज श्रद्धा, उनके जीवन की सहज आस्था, सामान्य उल्लास लगने वाले जीवन को अद्भुत उल्लास और पूर्णता से भर देता है. एक ओर जहाँ श्रद्धा के भाव से भरे होते हैं तो दूसरी तरफ मेले के उल्लास के चटख रंग भी यहाँ मौजूद हैं.

कुंभ स्नान का अपना महत्व है और इस स्नान का धार्मिक दृष्टि से अपनी तरह का पुण्य. भारत में चार स्थानों पर प्रत्येक बारह वर्षों में कुंभ का आयोजन होता है और बीते 12 से लगातार हर वर्ष कुंभ का आयोजन कर छत्तीसगढ़ ने धार्र्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ की पावन धरा से आम आदमी का साक्षात्कार कराया है. आज से 12 वर्ष पहले राजिम का चयन कुंभ के आयोजन के लिए चयन किया गया था. यह वह स्थान है जहां तीन नदियों का संगम है.

सोंढूर, पैरी और महानदी के त्रिवेणी संगम-तट पर बसे छत्तीसगढ़ की इस नगरी को श्रृद्धालु श्राद्ध तर्पण, पर्व स्नान और दान आदि धार्मिक कार्यों के लिए उतना ही पवित्र मानते हैं, जितना कि अयोध्या और बनारस को. तीनों नदियों के संगम पर हर वर्ष न जाने कब से आस-पास के लोग राजिम कुंभ मनाते आ रहे हैं. राजिम कुंभ के त्रिवेणी संगम पर इतिहास की चेतना से परे के ये अनुभव जीवित होते हैं. हमारा भारतीय मन इस त्रिवेणी पर अपने भीतर पवित्रता का वह स्पर्श पाता है, जो जीवन की सार्थकता को रेखांकित करता है. अनादि काल से चली आ रहीं परम्पराएँ और आस्था के इस पर्व को राजिम कुंभ कहा जाता है..छत्तीसगढ़ का उल्लेख आते ही राजिम कुंभ का उल्लेख सर्वप्रथम होता है. 12 वर्ष पहले आरंभ हुए राजिम कुंभ ने छत्तीसगढ़ को पृथक पहचान दी है. आज 12वें वर्ष में जब राजिम कुंभ का आयोजन हो रहा है तब छत्तीसगढ़ के साथ पूरा संसार धर्म और आध्यात्म में डुबकी लगाने को तैयार है. राजिम कुंभ की तिथि हर वर्ष पहले से तय रहती है.

राजिम छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित हैं. धार्मिक एवं सांस्कृतिक नज़रिये से राजिम एक ऐतिहासिक नगर हैं. यहाँ 8वीं-9वीं शताब्दी निर्मित राजीव लोचन मंदिर हैं. ऐसी पौराणिक मान्यता हैं कि़ जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूरी नहीं होती जब तक इस मंदिर का दर्शन ना किया जाये. संगम के बीचो-बीच कुलेश्वर महादेव का मंदिर हैं. वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक ‘महाप्रभु वल्लभाचार्य’ का जन्म भी राजिम से लगे चंपारण में हुआ था. राजिम ऐतिहासिक रूप से शैव एवं वैष्णव संप्रदाय की मिश्रित भूमि हैं. श्रद्धालुओं के लिये श्राद्ध, पिंड दान, धार्मिक कार्यों के लिये राजिम का त्रिवेणी संगम प्रयाग के संगम जितना ही पवित्र हैं.

12 वर्ष पहले प्रयाग के रूप में पहचाने जाने वाले राजिम को देश के संतों ने कुंभ का दर्जा दिया साल-दर-साल राजिम कुंभ वैभव का प्रकाश धर्मालुओं को आलौकित करता आ रहा है. धर्म, अध्यात्म और विज्ञान के इस सालाना अनुष्ठान का उपक्रम शुरू हो चुका है. राजिम कुंभ सदा से ही भारतीय मानस के गहरे अर्थों को रेखांकित करता रहा है. वह भारतीय जीवन के उल्लास पक्ष को भी दिखाता रहा है. शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, अखाड़ा प्रमुख तथा संतों की अमृत वाणी को लोगों ने जब ग्रहण किया, तो दुनिया के नये अर्थ सामने आए. उनका यहाँ एकत्र होना बताता है कि राजिम में त्रिवेणी पर कुंभ है और राजिम कुंभ के पावन पर्व की अनुभुति को गहराई प्रदान करते हैं. 10 फरवरी से शुरू हुये इस आयोजन को इस बार राजिममहाकुंभ कल्प-2017 नाम दिया गया है. कुंभ के 12 वर्ष पुरे होने पर इस वर्ष विशेष तैयारियां की गयी हैं. इस वर्ष तीन शाही स्नान होंगे. 24 फरवरी महाशिवरात्रि के शाही स्नान के साथ यह कुंभ समाप्त होगा. लोगों की मान्यताएं हैं कि राजिम संगम में स्नान करने से सारे रोग, सारे पाप से मनुष्य मुक्त हो जाता हैं.

राजिम कुंभ छत्तीसगढ़ के लिए महज एक उत्सव नहीं है और ना ही कोई धार्मिक मेला बल्कि यह अनुष्ठान है जीवन के उस प्रकल्प का जो इस नश्वर शरीर को परमात्मा से मिलाता है. ऐसा मानना है उन दिव्य गुरुजनों का जिन्होंने अपना जीवन ईश्वर को सौंप दिया है. ऐेेसे दिव्य गुरुओं के आश्रय में छत्तीसगढ़ की जनता धन्य धन्य हो जाती है और जीवन के वास्तविक अर्थों को समझ कर जीने का प्रयास करती है.

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कई मर्दों से संबंध रखने वाली ये महिला भी करवा चौथ व्रत कर रही है!

Balendu Swami : मैं करवा चौथ रखने वाली अपने आस-पास की कुछ महिलाओं को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ: 1) एक महिला, जो 15 साल से विवाहित है और रोज आदमी से लड़ाई होती है, सभी जानते हैं कि इनका वैवाहिक जीवन नरक है। 2) एक और महिला, जिसकी महीने में 20 दिन पति से बोलचाल बंद रहती है और वह उसे छिपाती भी नहीं है तथा अकसर अपनी जिन्दगी का रोना रोती रहती है।

3) इस तीसरी महिला को हफ्ते में दो-तीन बार उसका पति दारु पीकर पीटता है और उस महिला के अनुसार वेश्याओं के पास भी जाता है। 4) इस महिला के अपने मोहल्ले के ही 3 अलग अलग पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध हैं और इस बात को लेकर पति के साथ उसकी लड़ाई सड़क पर आ चुकी है तथा सबको पता है. 5) पांचवीं महिला की बात और भी विचित्र है: उसका अपने पति से तलाक और दहेज़ का केस कोर्ट में चल रहा है। केवल कोर्ट में तारीखों पर ही आमना-सामना होता है!

परन्तु ये सभी करवा चौथ का व्रत रखतीं हैं! क्यों रखती हैं तथा इनकी मानसिक स्थिति क्या होगी? ये कल्पना करने के लिए आप लोग स्वतंत्र हैं! इनके अतिरिक्त उन्हें आप क्या कहेंगे जो खुद को प्रगतिशील, नारीवादी और आधुनिका भी कहतीं हैं और करवा चौथ का व्रत भी रखतीं हैं! आप करवा चौथ करो, घूँघट करो या बुरका पहनो कम से कम इन रुढियों को संस्कार तो मत कहो! फिर आप स्त्री मुक्ति का झंडा भी उठातीं है। बहुत अजीब लगता है यह सब। आप स्वयं जिम्मेदार व्यक्ति हैं!

Chandan Srivastava : करवा चौथ के बेसिक कंसेप्ट से मेरा असहमत होना तो खैर लाजमी है। लेकिन मैने गौर किया कि पिछले कुछ सालों से बहुत से पति लोग भी पत्नी के साथ निर्जल व्रत रखने लगे हैं। यह एक बेहतरीन बदलाव आ रहा। सीधा सा संदेश है कि तुम मेरी सलामती के लिए उपवास रख रही हो तो मैं तुम्हारी ही पद्धति को फॉलो करके तुम्हारे इस समर्पण के प्रति शीश नवाता हूं। पति-पत्नी के बीच प्रेम और एकदूसरे के प्रति आपसी समझ बढ़ाने का इससे बढ़िया और क्या तरीका हो सकता है। 

काश कि इतनी ही समझ उन पतियों में भी होती और कहते कि तीन तलाक का अधिकार मेरी बीवी को भी दो, जब उसे एक से अधिक पति की इजाजत नहीं तो मुझे क्यों? मैं यह अधिकार स्वतः त्यागता हूं। इसके लिए बनाए कानून का मैं समर्थन करूंगा। निकाह-ए-हलाला जैसा घटियापन आज और अभी खत्म किया जाए। ऐसी घिनौनी प्रथा का समर्थक मुझे बलात्कारी नजर आता है। काश कि वे अपनी पत्नियों से इतना प्यार करते। काश कि वे अपने हिंदू दोस्तों से कुछ अच्छी बातें सीखते। काश की वे परिवर्तन के अहमियत को समझ पाते।

वृंदावन के नास्तिक स्वामी बालेंदु और लखनऊ के पत्रकार व वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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…क्योंकि रावण अपना चरित्र जानता है!

कथा का तानाबाना तुलसीबाबा ने कुछ ऐसा बुना की रावण रावण बन गया। मानस मध्ययुग की रचना है। हर युग के देशकाल का प्रभाव तत्कालीन समय की रचनाओं में सहज ही परीलक्षित होता है। रावण का पतन का मूल सीता हरण है। पर सीताहरण की मूल वजह क्या है? गंभीरता से विचार करें। कई लेखक, विचारक रावण का पक्ष का उठाते रहे हैं। बुरी पृवत्तियों वाले ढेरों रावण आज भी जिंदा हैं। कागज के रावण फूंकने से इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर जिस पौराणिक पात्र वाले रावण की बात की जा रही है, उसे ईमानदार नजरिये से देखे। विचार करें। यदि कोई किसी के बहन का नाक काट दे तो भाई क्या करेगा।

आज 21वीं सदी में ऐसी घटना किसी भी सच्चे भाई के साथ होगी, तो निश्चय ही प्रतिशोध की आग में धधक उठेगा। फिर मध्य युग में सुर्पनखा के नाम का बदला रामण क्यों नहीं लेता। संभवत्त मध्ययुग के अराजक समाज में तो यह और भी समान्य बात रही होगी। अपहृत नारी पर अपहरणकर्ता का वश चलता है। रावण ने बलात्कार नहीं किया। सीता की गरीमा का ध्यान रखा। उसे मालूम था कि सीता वनवासी बन पति के साथ सास-श्वसुर के बचनों का पालन कर रही है। इसलिए वैभवशाली लंका में रावण ने सीता को रखने के लिए अशोक बाटिका में रखा। सीता को पटरानी बनाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन इसके लिए जबरदस्ती नहीं की। दरअसल का मध्य युग पूरी तरह से सत्ता संघर्ष और नारी के भोगी प्रवृत्ति का युग है। इसी आलोक में तो राजेंद्र यादव हनुमान को पहला आतंकवादी की संज्ञा देते हैं। निश्चय ही कोई किसी के महल में रात में जाये और रात में सबसे खूबसूरत वाटिका को उजाड़े तो उसे क्यों नहीं दंडित किया जाए। रावण ने भी तो यहीं किया।

सत्ता संघर्ष का पूरा जंजाल रामायण में दिखता है। ऋषि-मुनि दंडाकारण्य में तपत्या कर रहे थे या जासूसी। रघुकुल के प्रति निष्ठा दिखानेवाले तपस्वी दंडाकारण्य अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह क्यों करते थे। उनका कार्य तो तप का है। जैसे ही योद्धा राम यहां आते हैं, उन्हें अस्त्र-शस्त्रों की शक्ति प्रदान करते हैं। उन्हीं अस्त्र-शस्त्रों से राम आगे बढ़ते हैं। मध्ययुग में सत्ता का जो संघर्ष था, वह किसी न किसी रूप में आज भी है। सत्ताधारी और संघर्षी बदले हुए हैं। छल और प्रपंच किसी न किसी रूप में आज भी चल रहे हैं।

सत्ता की हमेशा जय होती रही है। राम की सत्ता प्रभावी हुई, तो किसी किसी ने उनके खिलाफ मुंह नहीं खोला। लेकिन जनता के मन से राम के प्रति संदेह नहीं गया। तभी एक धोबी के लांछन पर सीता को महल से निकाल देते हैं। वह भी उस सीता को तो गर्भवती थी। यह विवाद पारिवारिक मसला था। आज भी ऐसा हो रहा है। आपसी रिश्ते के संदेह में आज भी कई महिलाओं को घर से बेघर कर दिया जाता है। फिर राम के इस प्रवृत्ति को रावण की तरह क्यों नहीं देखी जाती है। जबकि इस तरह घर से निकालने के लिए आधुनिक युग में घरेलू हिंसा कानून के तहत महिलाओं को सुरक्षा दे दी गई है। बहन की रक्षा, उनकी मर्यादा हनन करने वालों को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा, पराई नारी को हाथ नहीं लगाने का उज्ज्वल चरित्र तो रावण में दिखता है।

लोग कहते भी है कि रावण प्रकांड पंडित था। फिर भी उसका गुणगणान नहीं होता। विभिषण सदाचारी थे। रामभक्त थे। पर उसे कोई सम्मान कहां देता है। सत्ता की लालच में रावण की मृत्यु का राज बताने की सजा मिली। सत्ता के प्रभाव से चाहे जैसा भी साहित्या रचा जाए, इतिहास लिखा जाए। हकीकत को जानने वाला जनमानस उसे कभी मान्यता नहीं देता है। तभी तो उज्ज्वल चरित्र वाले विभिषण आज भी समाज में प्रतिष्ठा के लिए तरसते रहे। सत्ता का प्रभाव था, राम महिमा मंडित हो गए। पिता की अज्ञा मानकर वनवास जाने तक राम के चरित्र पर संदेह नहीं। लेकिन इसके पीछे सत्ता विस्तार की नीति जनहीत में नहीं थी। राम राजा थे। मध्य युग में सत्ता का विस्तार राजा के लक्षण थे। पर प्रकांड पंडित रावण ने सत्ता का विस्तार का प्रयास नहीं किया। हालांकि दूसरे रामायण में देवताओं के साथ युद्ध की बात आती है। पर देवताओं के छल-पंपंच के किस्से कम नहीं हैं।

काश, कागज के रावण फूंकने वाले कम से कम उसके उदत्ता चरित्र से सबक लेते। बहन पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए हिम्मत दिखाते। उसकी रक्षा करते। परायी नारी के साथ जबरदस्ती नहीं करते। ऐसी सीख नहीं पीढ़ी को देते। समाज बदलता। मुझे लगता है कि राम चरित्र की असंतुलित शिक्षा का ही प्रभाव है कि 21वीं सदी में भी अनेक महिलाएं जिस पति को देवता मानती है, वहीं उन पर शक करता है, घर से निकालता है। संभवत: यहीं कारण है कि आज धूं-धूं कर जलता हुए रावण के मुंह से चीख निकलने के बजाय हंसी निकलती है। क्योंकि वह जनता है कि जिस लिए उसे जलाया जा रहा है, वह चरित्र उसका नहीं आज के मानव रूपी राम का है।

लेखक संजय स्वदेश पत्रकार हैं. उनसे संपर्क sanjayinmedia@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकार की कलम न रुकनी चाहिए, न झुकनी चाहिए : राधेश्याम

पंचकूला : कलम न रुकनी चाहिए और न झुकनी चाहिए, कलम न अटकनी चाहिए और न ही भटकनी चाहिए। एक पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी होती है उसकी कलम। ये सहज उदगार व्यक्त कर रहे थे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के संस्थापक कुलपति राधेश्याम शर्मा। अवसर था आदि पत्रकार देवर्षि नारद की जयंती। 

पंचनद शोध संस्थान, पंचकूला एवं विश्व संवाद केंद्र, हरियाणा के तत्वावधान में सेक्टर 12ए के रोटरी क्लब भवन में एक सीधे सादे पत्रकार सम्मान समारोह कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राधेश्याम शर्मा ने अपने पत्रकारिता के अनुभव को लोगों से साझा किया। उन्होंने कहा कि चुनौतियां हर युग में रही हैं। रामायण और महाभारत के काल में भी सज्जन पुरूषों को परेशान किया जाता था लेकिन उस जमाने में भी नारद जैसे लोग लोकोपयोगी कार्य करने में कोताही नहीं बरत रहे थे। नारद ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। इसलिए उन्हें आदि पत्रकार का ओहदा प्राप्त है। 

श्री शर्मा ने कहा कि जिस प्रकार से हमारे पूर्ववर्ती वक्ता आज के चित्र को नकारात्मक ढंग से चित्रित करते हैं, उससे मैं सहमत नहीं हूं। आज चुनौती जरूर है लेकिन आशा की कुछ किरणें भी दिख रही हैं। हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के चेयरमैन भारत भूषण भारती ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आज पत्रकार अपने दायित्व को भूल रहे हैं। पत्रकारिता भारतीय लोकतंत्र का चौथा खंभा है। भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब हमारे देश की पत्रकारिता परिपक्व होगाी। दुनिया के कई देशों में नकारात्मक खबर के प्रकाशन पर अघोषित प्रतिबंध है लेकिन भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। हमारे लोकतंत्र को ठीक करने में समाचार माध्यमों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता लेकिन नकारात्मक खबरों के कारण देश और समाज का माहौल खराब होता है। पत्रकारों को इसका खयाल जरूर रखना चाहिए। 

कार्यक्रम में चंडीगढ दूरदर्शन केन्द्र के पूर्व निदेशक केके. रत्तू ने पत्रकारिता के धर्म और उसकी दिशा पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अनुभव लोगों के साथ साझा किया और कहा कि समाचार माध्यमों में निराशा का वातावरण बन रहा है। इसे ठीक करने की जरूरत है। 

कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों और समाचार पत्रों की मौजूदा स्थिति पर चर्चा हुई और आये हुए पत्रकारों को संस्था की ओर से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर डॉ. संजीव सोनी ने मुख्यातिथि को पुष्प देकर स्वागत किया, जबकि राकेश शर्मा ने केके. रत्तू को पुष्प देकर आदर प्रदान किया। अंत में पत्रकारों का सामूहिक चित्र मुख्य अतिथि के साथ करवाकर कार्यक्रम संपन्न हुआ। संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन अमर उजाला के वरीय उप संपादक दिनेश शर्मा ने किया।

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