पैराडाइज पेपर्स में कई मीडिया मालिकों के नाम भी

Dilip Khan : पैराडाइज़ पेपर्स में कई मीडिया मालिकों के नाम हैं। शोभना भरतिया, सुभाष चंद्रा, राघव बहल, कलानिधि मारन, नवीन जिंदल। मीडिया में ये ख़बर क्यों चलेगी फिर? गड़ा हुआ कालाधन उखाड़कर दिखाने वाले ज़ी न्यूज़ के मालिक सुभाष चंद्रा का भी नाम पैराडाइज़ पेपर्स में है। महान देशभक्त सुधीर चौधरी ने इस पर DNA किया कि नहीं? देखिए इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट : news on ie website

राज्यसभा टीवी में कार्यरत दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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पैराडाइज पैपर्स : साक्ष्यों का अपमान करती पत्रकारिता

विवेक शुक्ला

लोकतंत्र में मीडिया को अपने कामकाज को  निर्भीकता से करने की पूर्ण स्वतंत्रता मिलना स्वाभाविक है। सच्चा लोकतंत्र तब ही फल-फूल सकता है जब प्रेस की आजादी संदेह से परे हो। पर इमरजेंसी के काले दौर को छोड़कर  हमारे यहां कमोबेश सभी केन्द्र और राज्य सरकारें सुनिशिचित करती रही हैं कि किसी भी परिस्थिति में प्रेस की आजादी पर हमला ना हो। ये तो सिक्के का एक पहलू है। हाल के दौर में बार-बार देखने में आ रहा है कि कुछ अखबार, खबरिया टीवी चैनल और न्यूज वेबसाइट किसी व्यक्ति या संस्था के ऊपर ठोस और पुख्ता साक्ष्यों के बिना भी आरोप लगाने से नहीं चूकते।  इन्हें भारतीय सेना के पाकिस्तान में किए गए सर्जिल स्ट्राइक पर भी संदेश था। कुछेक मीडिया घराने रंगदारी में भी लिप्त रहते हैं विज्ञापन पाने के लिए। ये स्टिंग आपरेशन करके किसी अफसर, किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि या खास शख्स को बदनाम करने के बदले में पैसे की मांग करने से भी पीछे नहीं हटते। ये भारत की पत्रकारिता का नया मिजाज है। आप कह सकते हैं कि बीसेक  साल पहले तक हमारे देश के मीडिया में नहीं होता था।

मीडिया की लक्ष्मण रेखा

मीडिया का अपनी लक्ष्मण रेखा को पार करने का एक गंभीर मामला विगत जून महीने में कर्नाटक में सामने आया। कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष केबी कोलीवाड ने राज्य विधानसभा के कुछ विधायकों के ख़िलाफ़ अपमानजनक आलेख लिखने के मामले में  पत्रकार रवि बेलागेरे समेत एक कन्नड़ पत्रिका के दो पत्रकारों को एक साल जेल की सज़ा सुनाई। कोलीवाड ने जेल की सज़ा के अलावा दोनों पर दस-दस हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। कोलीवाड ने कहा, ‘मैं विशेषाधिकार समिति की सिफारिशों को मंज़ूरी देता हूं जिसने हाय बेंगलुरू और येलहांका वॉयस के संपादकों को एक साल के लिए जेल भेजने और उन पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाने की अनुशंसा की थी।’

दरअसल सदन की विशेषाधिकार समिति ने कोलीवाड के अलावा दूसरे विधायकों के ख़िलाफ़ लेख प्रकाशित करने के लिए यह सज़ा सुनाई थी। कोलीवाड के ख़िलाफ़ ‘हाय बैंगलोर’के सितंबर 2014 के अंक में लेख प्रकाशित किया गया था। रवि बेलागेरे कन्नड़ टेबलॉयड ‘हाय बैंगलोर’ के संपादक हैं जबकि ‘येलहांका वॉयस’ के संपादक अनिल राजू हैं। इस सारे केस का एक अहम बिन्दु ये भी रहा कि कर्नाटक में एक-दूसरे की राजनीतिक शत्रु कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सदन में यह मामला उठाया।

अनदेखी साक्ष्यों की

अब असली मुद्दे पर आते हैं। क्या प्रेस की आजादी का अर्थ ये हुआ किसी पत्रकार, अखबार, टीवी चैनल वगैरह को किसी की इज्जत उतराने की अनुमति मिल जाती है? कतई नहीं। पत्रकारिता का मूल आधार है साक्ष्य। साक्ष्यों के बिना किसी पर आरोप लगाना पत्रकारिता के सिद्धातों के साथ खिलवाड़ करने के समान है। ये बेहद गंभीर मामला है। लेकिन यह हो रहा है। कम से कम कुछ पत्रकार और मीडिया संस्थान तो ये करने से पीछे नहीं हटते।कर्नाटक में दो विधायकों को  जेल की सजा सुनाए जाने के बाद दिल्ली के प्रेस क्लब में
 मीडिया पर हमले’ विषय पर सार्थक चर्चा भी हुई। उसमें  वक्ताओं ने महसूस किया कि मानहानि जैसे मामलों में जेल की सजा विधानसभा के विशेषाधिकारों का दुरुपयोग है। इस पर सहमति या असहमति हो सकती है। लेकिन मीडिया के दिग्गजों ने इस ओर कोई चर्चा करना उचित नहीं समझा कि इस बेहतरीन पेशे में कुछ अराजक और भ्रष्ट तत्व प्रवेश कर चुके हैं। ये किसी की जीवन भर की इज्जत को अपने अधकचरे ज्ञान और साक्ष्यों के बल पर तार-तार कर देते हैं। क्या इसे ही पत्रकारिता कहते हैं?

एक दौर में ब्लिटड अखबार के संपादक आर.के.करंजिया अपने साप्ताहिक अखबार में समाज के खासमखास शख्सियतों के खिलाफ अभियान चलाते थे। वे  बदनाम भी हुए, पर बाज नहीं आए। अभी कुछ समय पहले रामनाथ गोयनका जैसी महान शखिसयत द्वारा शुरू किए गए इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने खबर छापी कि एनडीटीवी खबरिया चैनल बिक गया है। उसे स्पाईजेट एयरलाइन ने खरीद लिया है। पर दो -तीन के भीतर ही वो खबर टांय-टांय फिस्स हो गई। एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय और स्पाईजेट की तरफ से बयान आ गए  कि ये खबर बेबुनियाद है। इसके बाद भी इंडियन एक्सप्रेस ने माफीनामा छापने की जरूरत नहीं समझी। इस तरह के आपको दर्जनों उदाहरण दिए जाते सकते हैं। अभी कुछ दिन पहले इसी अखबार ने पैराडाइज पेपर के आधार पर कई नामी हस्तियों को भ्रष्ट करार दिया। लेकिन उसी पैराडाइज पेपर में पी.चिदंबरम, सचिन पायलट, शोभना भरतिया और सुभाष चंद्र के भी नाम हैं। उन्हें इस अखबार नें छोड़ दिया। क्यों?

ना करें सरकार का गुणगान

प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ है दायित्वों और कर्तव्यों का साथ-साथ चलना। हां, मीडिया  से केवल सरकार के गुणगान करने की भी अपेक्षा नहीं की जाती।  लेकिन,वो अपने दायित्वों को लेकर सजग भी रहे। कर्नाटक विधानसभा में विशेषाधिकार हनन के मामले में कुछ पत्रकारों को सजा दिए जाने के बाद बीते अगस्त महीने में दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि “प्रेस को कोई ऐसी टिप्पणी करने, आलोचना करने या आरोप लगाने का विशेषाधिकार नहीं है जो किसी नागरिक की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए पर्याप्त हो।” ये खबर दि वायर में छपी थी। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश राज कपूर ने कहा कि पत्रकार किसी अन्य व्यक्ति से बेहतर स्थान वाले व्यक्ति नहीं हैं। प्रेस को संविधान के तहत किसी नागरिक के मुकाबले कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हैं। अदालत ने कहा कि प्रेस को टिप्पणी करने, आलोचना करने या किसी मामले में तथ्यों की जांच करने के कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हैं तथा प्रेस के लोगों के अधिकार आम आदमी के अधिकारों से ऊंचे नहीं हैं।

मीडिया और सर्जिकल स्ट्राइक

आपको याद होगा कि पठानकोट, पुंछ और उरी पाकिस्तान ने जब सब्र का बांध तोड़ दिया तो मजबूर होकर भारत को सर्जिकल स्ट्राइक का सहारा लेना पड़ा। भारतीय कमांडो ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में  घुसकर आतंकियों को ढेर किया। इस खतरनाक ऑपरेशन को अंजाम देकर हमारे जवान सुरक्षित अपनी सीमा में लौट भी आए। पर उस सर्जिकल स्ट्राइक की विश्वसनीय पर भी मीडिया का एक तबका सवाल खड़े करता रहा। ये भूल गए कि देश हित के सवालों पर भारत को एक होना चाहिए। सर्जिकल स्ट्राइक यानी दुश्मन को उसी के घर में घुसकर मार गिराना। ऐसे हमले बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं बल्कि सीमित दायरे में मौजूद दुश्मन को मार गिराने के लिए किए जाते हैं। हमारे जाबांज सैनिकों के शौर्य की अनदेखी की  मीडिया के एक हिस्से ने। देश ने करगिल या उससे पहले पाकिस्तान के साथ हुई जंगों में मीडिया का इस तरह का चरित्र नहीं देखा था।

अंत में कर्नाटक के मामले पर फिर से बात करना समीचीन रहेगा। चूंकि संविधान विधायकों और सांसदों को विशेषाधिकार देता है। उसी के चलते कर्नाटक के कुछ विधायकों की बात को सुना गया। पर एक आम नागरिक पर यदि मीडिया बेबुनियाद टीका-टिप्पणी  करेगा तो उसे कौन न्याय दिलायेगा? अभिव्यक्ति की आजादी की भी एक लक्ष्मण रेखा है। कोई उसका उल्लंघन या  दुरुपयोग नहीं कर सकता।सदन के पास विशेषाधिकार हनन के मामले में किस तरह के अधिकार होने चाहिए, इस मुद्दे पर बहस होती रही है। कोई संहिता न होने की वजह से यह पूरी तरह सदन पर निर्भर करता है कि वह जिस मामले को चाहे विशेषाधिकार हनन का मामला बता दे। इस लिहाज से स्थिति और स्पष्ट और पारदर्शी बनाई जा सकती है। अगर विधायिका विशेषाधिकार के मामले में संहिता बनाए और न्यायपालिका तय करे कि विशेषाधिकार हनन होने पर संबंधित समिति क्या-क्या सजा सुना सकती है,तो सही रहेगा।  और दूसरी बात ये कि मीडिया भी अपनी प्रसार संख्या या टीआरपी बढ़ाने के लिए पत्रकारिता के स्थापित नियमों के साथ खिलवाड़ ना करे।

लेखक विवेक शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे यूएई दूतावास, नई दिल्ली में  सूचना अधिकारी भी रह चुके हैं. उनसे संपर्क 9818155246 के जरिए किया जा सकता है.

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मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है

Sanjaya Kumar Singh : प्रेस की स्वतंत्रता का भाजपाई अर्थ… अमित शाह के बेटे के खिलाफ खबर छपने पर 100 करोड़ का दावा और स्टे। हालांकि बहाल नहीं रह पाया। भाजपा के सबसे पैसे वाले सदस्यों में एक माने जाने वाले राजस्यसभा सदस्य का नाम पैराडाइज पेपर में आने पर एक सप्ताह का मौनव्रत और अगले ही दिन अखबारों के लिए विज्ञापन तैयार हो जाना – बताता है कि भाजपा के नेताओं के लिए प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का अलग मतलब है। और इसे रोकने के लिए 40 साल पुराना मामला भी अचानक निकल सकता है। आइए, फिलहाल आरके सिन्हा का मामला देखें।

मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है। हालांकि, यह विज्ञापन इंडियन एक्सप्रेस में नहीं है। पता नहीं एक्सप्रेस ने छापा नहीं या उसे दिया ही नहीं गया। भाजपा राज में विज्ञापनों का अपना खेल चल रहा है और वह अलग मुद्दा है। विज्ञापन के रूप में छपा आरके सिन्हा का स्पष्टीकरण उनके सांसद के लेटरहेड पर है और राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को संबोधित है। इसमें उन्होंने विदेशी कंपनी में शेयर होने के आरोप तो स्वीकार कर लिए हैं पर बताया है कि वह क्यों है और कैसे हुआ तथा कैसे गलत नहीं है। चुनाव के समय की जाने वाली घोषणा में इसका विवरण न होने के बारे में सफाई दी है और कारण बताया है कि नियमतः यह जरूरी नहीं है। श्री सिन्हा का यह स्पष्टीकरण अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ है।

विज्ञापन के रूप में छपे लेडर हेड पर उन्हें कानून व न्याय मंत्रालय और दूरसंचार मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य भी बताया गया है। विकीपीडिया के मुताबिक वे एक भारतीय पत्रकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक उद्यमी हैं और सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज के संस्थापक हैं। अपने पत्र में श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस पर अनैतिक पत्रकारिता का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस अखबार ने दशकों से बरकरार उनकी छवि को निहित स्वार्थों से धूमिल करने की कोशिश की है। श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस के अध्यक्ष विवेक गोयनका, मुख्य संपादक राजकमल झा और संपादकीय कर्मी रितु सरीन और श्याम लाल यादव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई शुरू करने का आग्रह किया है।

एक्सप्रेस ने यह खुलासा 6 नवंबर को छापा था और उसी दिन उन्होंने लिखकर बताया था कि वे मौनव्रत पर हैं पर आज (09 नवंबर) छपा जवाब अगले ही दिन यानी 7 नवंबर की तारीख का है। इसमें उन्होंने लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले पत्र में दिए गए तथ्य “पारदर्शितापूर्ण तरीके से” इंडियन एक्सप्रेस टीम के साथ साझा किए गए थे। इसके बावजूद एक्सप्रेस ने बगैर तथ्यों के भ्रम पैदा करने वाली खबर फैलाई है और निहित स्वार्थों के लिए छवि खराब करने का काम किया है। खास बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर के साथ बॉक्स में इनका पक्ष भी छापा था और यह सूचना भी लगाई थी कि पूरी प्रतिक्रिया के लिए एक्सप्रेस की साइट देखें। मैंने उनकी प्रतिक्रिया एक्सप्रेस की साइट पर नहीं देखी (मुझे देखने की जरूरत नहीं लगी)।

सिन्हा साब पत्रकार हैं, मुझसे भी पुराने और सीनियर पर मुझे लगता है कि एक्सप्रेस ने जो खबर छापी है वह तथ्यों पर आधारित है और जो छापा है उससे संबंधित उनके पारदर्शी जवाब का अंश भी छाप दिया है। बाकी वेबसाइट पर है। और यह तथ्य वे मान रहे हैं कि विदेशी कंपनी में शेयर है और उसकी जानकारी राज्य सभा चुनाव में नहीं दी गई थी। यही एक्सप्रेस की खबर है फिर भी वे एक्सप्रेस पर प्रेस की आजादी के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही कांग्रेस के नेताओं के नाम लेकर कहा है कि दूसरे लोगों को लक्ष्य क्यों नहीं किया जा रहा है। जबकि एक्सप्रेस ने पहले ही दिन लिखा था कि करोड़ों पेज के ये मामले 10 महीने की पड़ताल के बाद छापे जा रहे हैं औऱ अगले 40 दिनों तक छपेंगे। भाजपा की प्रेस की स्वतंत्रता के मायने बिल्कुल अलग लगते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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आरके सिन्हा का अख़बारों ने भावनात्मक दोहन किया है : रवीश कुमार

Ravish Kumar : क्यों छपी बीजेपी सांसद सिन्हा की सफाई विज्ञापन की शक्ल में… पैराडाइस पेपर्स में भाजपा के राज्य सभा सांसद आर के सिन्हा का भी नाम आया था। इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने उनकी सफाई के साथ ख़बर छापी थी। पैराडाइस पैराडाइस पेपर्स की रिपोर्ट के साथ यह भी सब जगह छपा है कि इसे कैसे पढ़ें और समझें। साफ साफ लिखा है कि ऑफशोर कंपनी कानून के तहत ही बनाए जाते हैं और ज़रूरी नहीं कि सभी लेन-देन संदिग्ध ही हो मगर इसकी आड़ में जो खेल खेला जाता है उसे भी समझने की ज़रूरत है। सरकार को भी भारी भरकम जांच टीम बनानी पड़ी है। ख़ैर इस पर लिखना मेरा मकसद नहीं है।

आज कई अख़बारों में आर के सिन्हा का बयान विज्ञापन की शक्ल में छपा देखा। यह चिन्ता की बात है। मुझे जानकारी नहीं कि अख़बार ने इसके लिए पैसे लिए हैं या नहीं। अगर मुफ्त में भी छापा है तो भी इस तरह से छापना ग़लत है। आर के सिन्हा ने बतौर सांसद राज्य सभा के अध्यक्ष वेंकैया नायडू को पत्र लिखा है और इस पत्र को विज्ञापन की शक्ल में छापा गया है।

मेरी नज़र में यह फिरौती वसूलना है। पेड न्यूज़ भी है। क्या जिन अख़बारों ने सिन्हा की सफाई छापी है, उन्होंने पैराडाइस पेपर्स की रिपोर्ट छापी थी? अगर नहीं तो यह और भी गहरा नैतिक अपराध है? ख़बर नहीं छापी मगर सफाई के नाम पर धंधा कर लिया? मीडिया और राजनेता का संबंध विचारों और बयानों के आदान प्रदान का होना चाहिए। इस आधार पर कोई अखबार किसी नेता का हर बयान नहीं छापेगा मगर छापने के लिए पैसे नहीं ले सकता है, यह तय है। एक्सप्रेस ने विज्ञापन वाली सफाई नहीं छापी है। अगर नहीं छापी है तो ठीक किया है।

हमारे देश में किसी संस्था की कोई विश्वसनीयता नहीं रह गई है, वरना इस पर उन अखबारों के ख़िलाफ़ एक्शन हो जाना चाहिए था जिन्होंने सिन्हा का विज्ञापन छापा। ठीक है कि सिन्हा ही लेकर आए होंगे मगर अखबारों को मना करना चाहिए था और कहना चाहिए कि हम ऐसे ही आपकी सफाई छापेंगे।

कई बार कंपनियां अपनी सफाई में विज्ञापन देती हैं ताकि सारी बात उनके हिसाब से छप जाए जिसे कोई नहीं पढ़ता है। हो सकता है कि कुछ लोग पढ़ लेते। कायदे से इस पर भी खबर छपनी चाहिए कि फला कंपनी ने हमारे अखबार में 5 लाख का विज्ञापन देकर विस्तार से सफाई छापी है, उसे भी पेज नंबर दस पर जाकर पढ़ें। वैसे भी सिन्हा की सफाई तो बतौर सांसद है। उसमें राजनीतिक आरोप भी है। उनकी कंपनी की तरफ से सफाई नहीं छपी है। क्या राजनेताओं से उनकी सफाई के लिए पैसे लिए जाएंगे?

मेरी राय में अख़बारों को आर के सिन्हा का पैसा लौटा देना चाहिए। सिन्हा ख़ुद चलकर फिरौती देने आए, इससे अपहरण का अपराध कम नहीं जाता और न फिरौती नैतिक हो जाती है। किसी के कमज़ोर वक्त में फ़ायदा नहीं उठाना चाहिए। हम कार्टून बना सकते हैं, उन पर हंस सकते हैं उनके खिलाफ लिख सकते हैं तो उनकी सफाई भी बिना पैसे के छपनी चाहिए। इससे राजनेता और मीडिया का संबंध बदल जाएगा। अख़बार फिरौती वसूलने लगेंगे। नेता ख़बर दबाने के लिए पहले ही विज्ञापन दे देगा और सफाई छाप देगा कि एक पत्रकार उनकी कंपनी को बदनाम करने में लगा है। कई नेताओं की अपनी कंपनियां होती हैं। तब क्या होगा।

मैं मानता हूं कि आरके सिन्हा का अख़बारों ने भावनात्मक दोहन किया है। उन्हें फ्री में सफाई का स्पेस मिलना चाहिए था। वैसे भी सिन्हा भागवत यज्ञ के बीच में है । मौन धारण किए हुए हैं। विज्ञापन की शक्ल में इतनी लंबी सफाई लिख डाली। यज्ञ से उनका ध्यान हट गया है। किसी का भी हट जाएगा। क्या उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी? संपादकों तक भी भिजवा सकते थे। मुझे इसकी जानकारी नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया या नहीं। फिर भी मुझे लगता है कि सफाई को विज्ञापन के मामले में छाप कर या छपवा कर दोनों ने ग़लत किया है।

एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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पैराडाइज पेपर्स ने फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ की अनैतिकता और लालच का किया खुलासा

सिंगापुर की स्टेंट बनाने वाली कंपनी ने डा. अशोक सेठ को अपने शेयर दिए और डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की.. इस तरह प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया.. कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है… यह मामला चिकित्सा पेशे में शीर्ष स्तर की अनैतिकता और लालच को दर्शाता है जहां मरीज का हित प्रमुख नहीं बल्कि डाक्टर और अस्पताल का लाभ सर्वोच्च हो गया है…

-संजय कुमार सिंह-

इंडियन एक्सप्रेस ने विदेशी कंपनियों में धन जमा करने के मामलों का अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है। खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संघटन की इस खोज में 714 भारतीय लिंक मिले हैं और ऐसी फर्में भी हैं जिनकी जांच सीबीआई कर रही है। अखबार इससे पहले पनामा पेपर छाप चुका है। इसे पैराडाइज पेपर नाम दिया गया है। अखबार का दावा है कि इस जांच में उसने 10 महीने लगाए हैं और 13.4 मिलियन (एक करोड़ 34 लाख) दस्तावेजों की जांच की है। इसके लिए 195 समाचार संगठनों के साथ मिलकर काम किया है। इनमें दि गार्जियन, बीबीसी (यूके), दि न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका), ओसीसीआरपी (रूस), ली मोन्डे (फ्रांस) , ईआई कांफिडेंशियल (स्पेन), एबीसी फोर कॉर्नर्स (ऑस्ट्रेलिया), सीबीसी/रेडियो (कनाडा), ला नैसियॉन (अर्जेन्टीना) शामिल हैं।

अखबार ने पहले पन्ने पर अपनी इस खबर को पूरे आठ कॉलम में बैनर बनाया है और उन्नी का कार्टून, “बिजनेस ऐड यूजुअल” भी लीड के साथ आ गया है. सिंगल कालम का यह छोटा सा कार्टून आज मारक है। इसमें 8 नवंबर को नोटबंदी दिवस के रूप में याद किया गया है और कहा गया है, “गुड मॉर्निंग! प्रकाश ध्वनि से थोड़ा पहले पहुंच गया है”। इसका मतलब बहुत गहरा है और समझने की जरूरत है, इसे समझाया नहीं जा सकता है। खासकर तब जब नोटबंदी का कोई फायदा दिखा नहीं सिर्फ बताया जाता रहा है और उसमें यह भी कि करोड़ों लोगों की जांच चल रही है। दो सौ लोगों को मारकर साल भर से जांच चल रही है और जैसा कि एक्सप्रेस के कार्टून में कहा गया है प्रकाश की किरण वहां से आ रही है, आवाज कहीं और से बाद में आएगी – यह विज्ञान है। लेकिन इसी को काबिलयत बना कर पेश करने का भी एक अंदाज है। संयोग से, आज इंडियन एक्सप्रेस के शुरू के पन्नों में विज्ञापनों का जैकेट नहीं है। इसलिए पढ़ना भी सुविधाजनक है और देखने में भी आज इंडियन एक्सप्रेस अपने पुराने तेवर में लग रहा है। एक्सप्रेस का यह खुलासा अभी जारी है। अखबार के कई पन्ने रंगने के बाद अभी आगे भी मसाला आएगा।    

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने खुलासे में पहले पेज पर फोर्टिस के डॉक्टर अशोक सेठ का मामला भी छापा है। शीर्षक में ही कहा गया है कि डॉ. सेठ अपने मरीजों के लिए जिस कंपनी के स्टेंट का उपयोग करते थे उन्हें उसके शेयर मिले थे। इस खबर के साथ डॉ अशोक सेठ की फोटो है और कैप्शन लगा है नो रांग डुइंग, क्लेम्स कार्डियोलॉजिस्ट अशोक सेठ। यानी कोई गलत काम नहीं, हृदय रोग विशेषज्ञ अशोक सेठ ने दावा किया। ऋतु सरीन की इस खबर के मुताबिक जांचे गए दस्तावेजों के एक सेट में यह हितों के संभावित टकराव के रूप में सामने आता है। इंडियन एक्सप्रेस ने रिकार्ड की जांच के बाद लिखा है कि पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित, फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ को 2004 में सिंगापुर आधार वाली एक कंपनी जो स्टेंट बनाती है, ने पूंजी बाजार में जाने से पहले अपने शेयर दिए थे। बाद में डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की और प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया। कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है। यह इंटरवेंशन कार्डियोलॉजी और क्रिटिकल केयर प्रक्रियाओं के लिए चिकित्सा उपकरणों का निर्माण और उनका विपणन करती है। कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक,  बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप लिमिटेड का निगमन बरमुडा में 28 मई 1998 को हुआ था और यह सिंगापुर में पंजीकृत है।

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि संपर्क करने पर डॉ.सेठ ने बताया कि उन्होंने तीन साल तक बायोसेंसर्स के शेयर अपने पास रखे और 54 लाख रुपए का मुनाफा कमाकर बेच दिया। डॉ. सेठ का दावा है कि जब तक कंपनी के शेयर उनके पास रहे उन्होंने इसका उपयोग उनका दावा है कि अपने टैक्स रिटर्न में उन्होंने इसकी घोषणा की है। अखबार की खबर में हितों के टकराव आदि का विस्तार से विवरण है। जब मेरे पास कंपनी के शेयर थे (कंपनी ने आवंटित 2004 में किए थे पर इन्होंने लिया अप्रैल 2013 में पर उसी कीमत में, ठीक से समझने के लिए एक्सप्रेस की पूरी खबर देखें) तब मैंने सिर्फ सिर्फ सात बायोमेट्रिक्स स्टेंट लगाए। डॉ. सेठ का कहना है कि उनके पास कंपनी के शेयरों की संख्या बहुत मामूली थी पर इसे हितों का टकराव माना जा सकता है इसलिए जब मेरे पास शेयर थे तब मैंने बायोसेंसर्स के उत्पादों का उपयोग नहीं किया।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी मूल खबर में लिखा है, तेजी से अंतरराष्ट्रीय हो रही दुनिया में कॉरपोरेट पुनर्गठन या विस्तार के लिए विदेशी इकाई की स्थापना भले ही अवैध न हो पर एक अहम मुद्दा तो है ही कि कैसे कुछ विदेशी फर्में (यहां ऐप्पलबाई का जिक्र है) बहुराष्ट्रीय निगमों को कानून में गड़बड़ियों या चूक का लाभ उठाने का मौका देती हैं जिससे वे अपने देश में जायज टैक्स देने से बच जाती हैं। इसलिए पैराडाइज पेपर्स नियामक एजेंसियों के लिए जांच के दरवाजे खोलती हैं ताकि वे तय करें कि ये सौदे अथवा लेन-देन संबंधित देश के कायदे कानूनों के मुताबिक वैधानिक और विधिवत हैं कि नहीं। यहां सवाल उठता है कि एक्सप्रेस ने जब पनामा पेपर्स की रिपोर्ट छापी थी उसकी ही कौन सी जांच हुई और क्या फर्क पड़ा।

उल्टे, नोटबंदी की बरसी पर सरकार बता रही है कि एक साल से (नोटबंदी से मिले) कितने लोगों की जांच चल रही है और नोटो की गिनती की तरह जारी है। कार्रवाई करने में कितना समय लगेगा या कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है समझा जा सकता है। अखबार की खबर के मुताबक, लीक हुए डाटा में 180 देशों का प्रतिनिधित्व है उसमें भारत का स्थान, नामों की संख्या के लिहाज से 19वां हैं (इसका ईज ऑफ बिजनेस से संबंध है कि नहीं, राम जाने)। कुल मिलाकर 714 भारतीयों के नाम हैं। यह दिलचस्प है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐप्पलबाई के दूसरे सबसे बड़े क्लाइंट होने का श्रेय एक भारतीय कंपनी सन ग्रुप को है जिसकी स्थापना नंद लाल खेमका ने की है। इस कंपनी की 118 इकाइयां अलग-अलग देशों में हैं।

ऐप्पलबाई के भारतीय ग्राहकों में कई प्रमुख कॉरपोरेट और कंपनियां हैं जिनकी बाद में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसी जांच भी कर रही है। और इस जांच का आलम यह है कि सीबीआई का भेजा एक लेटर रोगेटरी ऐप्पलबाई के पास पहुंच चुका है। कॉरपोरेट के अलावा जो नाम हैं उनमें अमिताभ बच्चन, नीरा राडिया और फिल्म स्टार संजय दत्त की पत्नी शामिल हैं। एक नया नाम जो मुझे चौंकाने वाला लगा वह सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज (एसआईएस) के संस्थापक और भाजपा के राज्य सभा सदस्य आरके सिन्हा से जुड़ी है। नाम तो जयंत सिन्हा, सचिन पायलट और कार्ति चिदंबरम के भी हैं पर मेरे लिए ताज्जुब वाला नाम आरके सिन्हा का ही है।  

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.


ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद, संजय कुमार सिंह के सौजन्य से, पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें : 

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जयंत सिन्हा, ईबे, पियरे ओमिडयार, नरेंद्र मोदी और बाहरी पूंजी का भारतीय चुनाव में खुला खेल!

ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह के सौजन्य से पढ़ें…

केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद pando.com पर Mark Ames ने 26 मई 2014 को लिखा था- “भारत में चुनाव के बाद एक कट्टरपंथी हिन्दू सुपरमैसिस्ट (हिन्दुत्व की सर्वोच्चता चाहने वाले) जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है, को सत्ता मिल गई है। इसके साथ ही व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जय कारने (यहां भी जय) ने कहा है कि ओबामा प्रशासन एक ऐसे व्यक्ति के साथ “मिलकर काम करने का इंतजार कर रहा है” जो अल्पसंख्यक मुसलमानों (और अल्पसंख्यक ईसाइयों) के घिनौने जनसंहार में भूमिका के लिए 2005 से अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) के वीजा ब्लैकलिस्ट में है।

इस शुरुआती पैरा ग्राफ से आपको लेखक, पांडो डॉट कॉम के तेवर और लेख का अंदाजा हो जाएगा। इसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा के बारे में लिखा था, पांडो के पाठक जानते हैं कि ओमिडयार (Omidyar Network) नेटवर्क ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार की लोकोपकारी शाखा है। 2009 से ओमिडयार नेटवर्क ने भारत में अपने पोर्टफोलियो के किसी अन्य देश की तुलना में ज्यादा निवेश किया है। ये निवेश मुख्य रूप से जयंत सिन्हा की बदौलत हैं जो मैकिन्जी के पूर्व साझेदार और हावर्ड के एमबीए हैं जिसे अक्तूबर 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स को चलाने के लिए नौकरी पर रखा गया था।

सिन्हा के कार्यकाल में ओमिडयार नेटवर्क ने अपने निवेश का बड़ा हिस्सा भारत की ओर घुमा दिया। इस तरह 2013 तक भारत में निवेश ओमिडयार नेटवर्क के प्रतिबद्ध कोष का 18 प्रतिशत जो 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा था हो चुका था। इसमें इसके पोर्टफोलियो की कुल कंपनियों का 36 प्रतिशत शामिल था। इस साल श्री सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की नौकरी छोड़ दी ताकि मोदी के चुनाव अभियान में सलाह दे सकें और भाजपा के टिकट पर एक संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ सकें। सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने 1998 से 2002 तक पिछली भाजपा सरकार में वित्त मंत्री के रूप में काम किया था जब उनकी सरकार ने परमाणु बम का परीक्षण किया था। इस साल सिन्हा के पिता ने अपनी संसदीय सीट छोड़ दी और बेटे जयंत सिन्हा को अपनी जगह लेने दी।

चुनाव प्रचार के दौरान जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने गुजरात दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी द्वारा माफी मांगने से मना किए जाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। तब उन्होंने कहा था, “मोदी सही हैं … वे माफी क्यों मांगें?”  ओमिडयार के पूर्व कर्मचारी उनके बेटे जयंत सिन्हा ने (जब लेख लिखा गया था उससे कुछ सप्ताह पहले) दावा किया कि उनके पिता की भाजपा सरकार ने 1998 में अंतरराष्ट्रीय नाराजगी को नजरअंदाज कर परमाणु बम का परीक्षण किया जिसे पोखरण के नाम से जाना जाता है। मोदी को चुनाव जीतने में सहायता करने के लिए जयंत सिन्हा के ओमिडयार नेटवर्क छोड़ने के कुछ ही समय बाद मोदी ने एक भाषण दिया जिसमें भारत के ई कामर्स बाजार को ई-बे जैसी विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की मांग की। ईबे के सबसे बड़े शेयरधारक पियरे ओमिडयार हैं।

संदेश स्पष्ट था- मोदी हाईटेक इंडिया के उम्मीदवार हैं, हिंसक अतिराष्ट्रवाद के बावजूद। इसी समय सिन्हा ने मोदी और बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों जैसे जेपी मोरगन, मोरगन स्टैनली और नोमुरा बैंक के बीच एक समिट मीटिंग का आयोजन करने में सहायता की। संभवत: इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है कि मोदी के अति राष्ट्रवादी प्रयासों की सवारी करके पिछले सप्ताहांत (लेख पुराना है, उसके हिसाब से) जब जयंत सिन्हा चुनाव जीत गए तो ओमिडयार नेटवर्क ने उन्हें बधाई दी।  इसके कुछ ही समय बाद ओमिडयार के पूर्व कर्मी (पुराने आदमी भी कह सकते हैं) ने जोर देकर कहा कि, “श्री मोदी एक महान लोकतांत्रिक (हस्ती) हैं।”

इसके बाद pando.com पर Mark Ames ने ही 9 नवंबर  2014 को (नोटबंदी के बाद) एक और दिलचस्प पीस लिखा था। इसका शीर्षक था, भारत में पियरे ओमिडयार का आदमी मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दूसरा शीर्षक था, ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार के ग्लोबल इंपैक्ट फंड में लंबे समय तक सीनियर एक्जीक्यूटिव रहे जयंत सिन्हा को भारतीय अतिराष्ट्रवादी नेता नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।  बोल्ड अक्षर में अपडेट के साथ शुरू होने वाली कहानी इस प्रकार थी – सिन्हा (जयंत) का नया पद स्पष्ट बता दिया गया है – वो अब भारत के जूनियर वित्त मंत्री हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के तहत काम कर रहे हैं। लंबे समय तक ओमिडयार का आदमी रहा व्यक्ति अब इस स्थिति में है कि 2015 का बजट तैयार करने में सहायता करेगा जिसके बारे में (प्रधानमंत्री) नरेन्द्र मोदी ने (हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक) संकेत दिया है कि “बदलाव लाने वाला” होगा। 

जयंत सिन्हा ने 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स की स्थापना की थी और फर्स्ट लुक मीडिया पब्लिशर्स इंपैक्ट फंड में साझेदार और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की पांच सदस्यों वाली ग्लोबल एक्जीक्यूटिव कमेटी में भी काम किया था तथा ओमिडयार नेटवर्क के 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा के फंड को भारत की ओर मोड़ दिया था। इस तरह इसे दुनिया के सबसे बड़े, 700 मिलिय़न डॉलर के इंपैक्ट फंड के लिए सबसे सक्रिय अकेले देश का निवेश बनाया था।  इस साल के शुरू में ओमिडयार नेटवर्क के साझेदार और प्रबंध निदेशक का पद छोड़ दिया था ताकि धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपने पिता की संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकें।

अब मोदी मंत्रिमंडल में सिन्हा की नियुक्ति ने उन्हें पिछले दो सप्ताह में किसी दक्षिण पंथी, कारोबार समर्थक सरकार में सत्ता तक पहुंचने वाली दूसरी ओमिडयार हस्ती बना दिया है।  
पांडो डॉट कॉम ने आगे लिखा है, जैसा पांडो डेली पूरे साल सूचित करता रहा है, जयंत सिन्हा और उनके बॉस, ओमिडयार भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक अस्वाभाविक दोहरी भूमिका निभाते रहे हैं और लोकोपकारी दिखने वाले काम सोच-समझ कर राजनीतिक निवेश के रूप में किए गए हैं जो सिन्हा के राजनैतिक अभियान का हिस्सा रहा है।

ओमिडयार के ऐसे ग्रांट में से कुछ लाभ के लिए किए गए निवेश थे। जैसे एसकेएस माइक्रोफाइनेंस जैसी माइक्रोफाइनेंस फर्म में ओमिडयार निवेश जिसका समापन बहुत ही घातक ढंग से हुआ जब एसकेएस के कर्ज वसूलने वालों ने जोर लगाया और उनपर सैकड़ों गरीब ग्रामीणों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप लगा। इन लोगों ने कीटनाशक पीकर, डूबकर और अन्य तरीकों से आत्महत्या कर ली थी। ओमिडयार सिन्हा का एक और निवेश गैर सरकारी संगठनों में गया जिसने धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर अच्छी तरह काम किया जब वह विपक्ष में थी और यह काम खासतौर से पिछली (सेंटर-लेफ्ट) सरकार के भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करने का था  जो 2007 से इस साल तक लगातार सत्ता में बनी रही।

भाजपा ने इस साल का चुनाव भ्रष्टाचार के विरोध के दम पर जीता और ओमिडयार सरकार ने भारत के सबसे प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी गैर सरकारी संगठनों के अभियान, “आई पेड अ ब्राइब” के लिए धन मुहैया कराया।  2010 में सिन्हा और ओंमिडयार नेटवर्क ने एक भारतीय गैरसरकारी संगठन, जनाग्रह को तीन मिलियन डॉलर दिए ताकि वह  “आई पेड अ ब्राइब” अभियान चला सके। इस खबर में भी जयंत सिन्हा ओमिडयार नेटवर्क की मिलीभगत का जिक्र है तथा गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक सहायता तथा उसकी शैली का विवरण है। इसमें अजीत डोभाल के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाना शामिल है। 

इसी खबर में आगे बताया गया है कि सिन्हा और ओमिडयार से धन पाने वाला एक और गैर सरकारी संगठन 2012 में सांसदों को देश के सख्त ई कामर्स कानून के संबंध में अवैध रूप से प्रभावित करता पकड़ा गया था। उस समय भारत की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी ने इस एनजीओ की निन्दा की थी और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक कहा था तथा विदेशी खुफिया एजेंसी को छिपकर काम करने और भारत सरकार में घुसपैठ करने में सहायता करने का आरोप लगाया था और इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था (इस एनजीओ का नाम नहीं है)।

इस मामले के पकड़े जाने के बाद संबंधित एनजीओ के सह-संस्थापक सीवी मधुकर को ओमिडयार ने नौकरी पर रख लिया। अब वे “सरकारी पारदर्शिता” में  ओमिडयार नेटवर्क इंडिया के डायरेक्टर ऑफ इनवेस्टमेंट हैं। इस बीच सिन्हा अपना काम करते रहे हैं … जिससे ओमिडयार को प्रत्यक्ष लाभ होता है जो अभी भी ईबे के चेयरमैन हैं। … जून (2014 में) के शुरू में मोदी और सिन्हा के चुनाव जीतने के बाद, मोदी की नई सरकार ने ईबे साथ-साथ अमैजन और गूगल के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था ताकि भारत के ई कामर्स कानून लिखने में सहायता की जा सके।

अनुवादक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय लंबे समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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काला धन और टैक्स चोरी का प्रकरण जब-जब उठेगा, अमिताभ बच्चन का नाम जरूर आएगा!

पनामा पेपर्स के बाद अब पैराडाइज़ पेपर्स में भी अमिताभ बच्चन का नाम! जहां कहीं टैक्स चोरी और काला धन का नाम आता है तो उसमें अमिताभ बच्चन जरूर होता है. कौन बनेगा करोड़पति के पहले सीजन के बाद अमिताभ ने एक विदेशी कंपनी में पैसा लगाया था. इंडियन एक्सप्रेस में Paradise Papers Leak के भारत के मामले की खबर आज छपी है. इंडियन एक्सप्रेस इंटरनेशनल कॉन्सार्शियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट यानि आईसीआईजे का सदस्य है.

आईसीआईजे ने कर चोरों के स्वर्ग माने जाने वाले देशों की कंपनियों से मिले एक करोड़ 34 लाख दस्तावेज में भारत से संबंधित दस्तावेज की पड़ताल इंडियन एक्सप्रेस को सौंपी. इस खुलासे से पता चलता है कि अमिताभ बच्चन ने केबीसी 2000-02 में प्रसारित पहले सीजन के बाद बरमूडा की एक डिजिटल मीडिया कंपनी में हिस्सेधार बना. साल 2004 में भारतीय रिजर्व बैंक के नियमानुसार सभी भारतीयों को विदेश में निवेश की जानकारी आरबीआई को देनी होती थी.  अमिताभ बच्चन और सिलिकॉन वैली के वेंचर इन्वेस्टर नवीन चड्ढा ‘जलवा मीडिया लिमिटेड’ के 19 जून 2002 को शेयरधारक बने. यह जानकारी बरमूडा की कंपनी एप्पलबी के दस्तावेज से मिली है. ये कंपनी बरमूडा में 20 जुलाई 2002 को बनी. साल 2005 में इसे खत्म कर दिया गया.

जलवा मीडिया की स्थापना चार भारतीय एंटरप्रेन्योर ने कैलिफोर्निया में की थी. इसकी भारतीय इकाई जलवा डॉट कॉम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड जो बाद में जलवा मीडिया इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में कनवर्ट हो गई, फरवरी में बनी. बाद में जुलाई में बरमूडा में एक तीसरी कंपनी बनी. जर्मन अखबार Süddeutsche Zeitung को बरमूडा की कंपनी एप्पलबी, सिंगापुर की कंपनी एसियासिटी ट्रस्ट और कर चोरों के स्वर्ग समझे जाने वाले 19 देशों में कराई गई कार्पोरेट रजिस्ट्रियों से जुड़े करीब एक करोड़ 34 लाख दस्तावेज मिले. जर्मन अखबार ने ये आईसीआईजे के साथ साझा किया. इंडियन एक्सप्रेस ने आईसीआईजे का सदस्य होने के नाते भारत से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की.

जुलाई 2000 में जलवा-इंडिया ने कंपनी में करीब 32 लाख डॉलर का निजी निवेश हासिल करने की घोषणा की थी. निवेशकों में कैलिफोर्निया के बिजट्रो चेयरमैन नवीन चड्ढा भी शामिल थे. जलवा मीडिया ने 1.5 करोड़ डॉलर वेंचर इन्वेस्टमेंट हासिल करने को अपना लक्ष्य बताया. जलवा मीडिया को इस निवेश से पहले ही लंदन के मिलेनियम डोम से इंटरनेशनल इंडियन फिल्म एकैडमी के लाइव वेबकास्ट का अधिकार मिल चुका था. कंपनी ने अक्टूबर 2000 में ‘देखो फिल्म डॉ़ट कॉम’ नामक वेबसाइट लॉन्च की. इसने अमेरिकी कंपनी आईबीएम से जून 2001 में मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की वेबसाइट के लिए एक कंटेट मैनेजमेंट सोल्यूशन देने का समझौता किया. जलवा ने मुंबई में अपना डिजिटल मीडिया इन्नोवेशंस लैब्रोटरी की भी शुरुआत की. आईबीएम से समझौते के साल भर बाद अमिताभ बच्चन और चडढा को एप्पलबी के जलवा-बरमूडा दस्तावेज में निवेशक बताया गया.

इस कंपनी से जुड़े तीन लोगों उर्शित पारिख, गौतम आनंद और शैलेंद्र पी सिंह ने साल 2004 तक कंपनी छोड़ दी. 28 अक्टूबर 2005 को द बरमूडा सन अखबार में नोटिस प्रकाशित हुई कि जलवा बरमूडा कर्जदार है और उसे भंग किया जाता है. एप्पलबी ने भी जलवा बरमूडा को 14 जनवरी 2004 से सेवाएं देना बंद कर दिया. जलवा इंडिया कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय की “ईजी एग्जिट स्कीम 2011” के आने तक कागज पर मौजूद रही. कंपनी ने इस योजना का लाभ उठाते हुए बताया कि कंपनी कारोबार सफल न होने से छह सालों से निष्क्रिय है.

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पैराडाइज पेपर्स में फंसा भाजपा सांसद आरके सिन्हा ने लिख कर कहा- ‘सात दिन के भागवत यज्ञ में मौन व्रत हूं’

Shahnawaz Malik : साल 2017 की‌ सबसे बड़ी ख़बर पैराडाइज़ पेपर्स के मार्फ़त कर चोरी और काले धन पर हुआ ख़ुलासा है। और, किसी रिपोर्टर को साल 2017 में दिया गया सबसे शानदार जवाब आरके सिन्हा का है। सवाल पूछने पर रिपोर्टर से कलम मांग कर सिन्हा ने काग़ज़ पर लिख दिया, ‘सात दिन के भागवत यज्ञ में मौन व्रत हूं’…

Syed Mazhar Husain : बीजेपी सांसद आरके सिन्हा ने #paradisepapers में नाम आने के बारे में पूछे गए सवाल पर लिखकर बताया, ‘7 दिन के भागवत यज्ञ में मौनव्रत है। “न खाऊँगा और न खाने दूंगा”… इन सबको पकिस्तान कब भेजा जायेगा?

Vijender Masijeevi : किसी किसी को अब भी उम्मीद है कि पैराडाइज पेपर्स से हमारे देश में कोई कार्रवाई होगी। सच में। दुनिया भोलेपन से खाली नहीं हुई है अभी।

पत्रकार शाहनवाज मलिक, सैय्यद मजहर हुसैन और विजेंद्र मसिजीवी की एफबी वॉल से.

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पैराडाइज पेपर्स में अमिताभ बच्चन, आरके सिन्हा, जयंत सिन्हा समेत 714 भारतीयों के नाम

Priyabhanshu Ranjan : दि इंडियन एक्‍सप्रेस ने रविवार रात 12.30 बजे से पैराडाइज़ पेपर्स पर 40 किस्‍तों पर अपनी स्‍टोरी की श्रृंखला शुरू की है लेकिन इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्‍ट्स की वेबसाइट से पता चलता है कि ऑफशोर कंपनियों में पैसा लगाने वाले दो बड़े नेताओं का नाम कुल 714 लोगों की सूची में शामिल है। ये दोनों नेता सत्‍ताधारी पार्टी बीजेपी से हैं- सांसद आरके सिन्‍हा और नागरिक उड्डयन मंत्री जयन्‍त सिन्‍हा।

आप तो जानते ही हैं कि मोदी जी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए ही धरती पर अवतरित हुए हैं। तभी #PanamaPapers का मामला उन्होंने जादू से छू मंतर कर दिया। कुछ याद है आपको? अब #ParadisePapers के मामले को भी अपने प्रभावी सड़क छाप भाषणों से फ़ना कर देंगे। ये भ्रष्टाचार से लड़ने का Gujarat Model है! वैसे, पैराडाइज पेपर्स में जयंत सिन्हा… रवीन्द्र किशोर सिन्हा… अमिताभ बच्चन… के नाम हैं… हां, मैंने इनकी जाति ढूंढ ली है 😉 ये कहीं कायस्थों को बदनाम करने की साज़िश तो नहीं 🙂

Narendra Nath : आज हुए खुलासे के अनुसार पूरे विश्व में भारत “Ease Of Hiding Tax and Making Black Money” में 19 वें नंबर पर हैं। जिस तरह के नाम इसमें हैं, उससे मेरा दावा है कि सरकार और विपक्ष “सब मिले हुए हैं जी” के फार्मूले के साथ चुप ही रहेंगे। और, हर खुलासे के बाद अमिताभ बच्चन के प्रति धारणा और मजबूत होती है। मंगल ग्रह पर भी ब्लैक मनी की बात होगी तो अगर एक शख्स का नाम आएगा तो शायद इनका आए। वही बच्चन जी जो आजकल लोगों को टैक्स देने और बेहतर नागरिक बनने के सरकार से फीस लेकर विज्ञापन कर रहे हैं।

Anil Jain : अमिताभ बच्चन ने अपनी कामयाबी के झंडे अभिनय और विज्ञापन के क्षेत्र में ही नहीं गाडे हैं, बल्कि एक निवेशक के तौर पर भी वे लगातार अपने कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं। पनामा पेपर्स के बाद पैराडाइज पेपर्स में भी उनका नाम अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा है।

Satyendra PS : एक साल पहले जब पनामा पेपर्स में टैक्स हैवन्स देशों में कंपनियां बना कर टैक्स चोरी करने वालों नाम आया तो बड़ी उम्मीद जगी थी कि काला धन खत्म करने के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली मोदी सरकार अब इन्हें धर दबोचेगी। जिस सरकार के मंत्री पाकिस्तान को नरक कहते थे वहां पनामा पेपर्स के नाम पर पीएम नवाज शरीफ की गद्दी चली गई। लेकिन खोजी पत्रकारों की स्टोरी में बॉलीवुड से लेकर बिजनेस वर्ल्ड के नामी-गिरामी लोगों के नाम आने के बाद भी अपने यहां किसी का भी बाल बांका नहीं हुआ।

पत्रकार प्रियभांशु रंजन, नरेंद्र नाथ, अनिल जैन और सत्येंद्र पी सिंह की एफबी वॉल से.

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साल 2017 की‌ सबसे बड़ी ख़बर… पैराडाइज़ पेपर्स के मार्फ़त कर चोरी और काले धन पर ख़ुलासा…

Dilip Khan : पनामा पेपर्स में जिनके नाम थे उनमें से कुछ को मोदी जी ने ब्रैंड एंबैसेडर बना लिया, कुछ ज़ुबां केसरी बोलने लगे, कुछ समय-समय पर सरकार को “नीतिगत” समर्थन जताने लगे। एक को ये सब करने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि वो ख़ुद बीजेपी में थे और एक के छोटे भाई का नाम गौतम अडानी है, तो उन्हें किसी चीज़ का डर क्यों हो! अब पैराडाइज़ पेपर्स वालों के लिए पहले से एक मॉडल तैयार है। वो चाहे तो पनामा वालों की कॉपी कर सकते हैं। इनमें तो केंद्रीय मंत्री तक के नाम शामिल है। वे कोई न कोई व्यवस्था कर ही देंगे। दो दिन बाद सरकार काला धन विरोधी दिवस मना कर इन्हें भी ब्रैंड एंबैसेडर बना सकती है।

Shahnawaz Malik : साल 2017 की‌ सबसे बड़ी ख़बर पैराडाइज़ पेपर्स के मार्फ़त कर चोरी और काले धन पर हुआ ख़ुलासा है। और, किसी रिपोर्टर को साल 2017 में दिया गया सबसे शानदार जवाब आरके सिन्हा का है। सवाल पूछने पर रिपोर्टर से कलम मांग कर सिन्हा ने काग़ज़ पर लिख दिया, ‘सात दिन के भागवत यज्ञ में मौन व्रत हैं.’

पत्रकार दिलीप खान और शाहनवाज मलिक की एफबी वॉल से.

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हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए

Ravish Kumar : इंडियन एक्सप्रेस में छपे पैराडाइस पेपर्स और द वायर की रिपोर्ट pando.com के बिना अधूरा है… हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए। एक पाठक के रूप में आप बेहतर होंगे। हिन्दी में तो यह सब मिलेगा नहीं क्योंकि ज्यादातर हिन्दी अख़बार के संपादक अपने दौर की सरकार के किरानी होते हैं। कारपोरेट के दस्तावेज़ों को समझना और उसमें कमियां पकड़ना ये बहुत ही कौशल का काम है। इसके भीतर के राज़ को समझने की योग्यता हर किसी में नहीं होती है। मैं तो कई बार इस कारण से भी हाथ खड़े कर देता हूं। न्यूज़ रूम में ऐसी दक्षता के लोग भी नहीं होते हैं जिनसे आप पूछकर आगे बढ़ सकें वर्ना कोई आसानी से आपको मैनुपुलेट कर सकता है।

इसका हल निकाला है INTERNATIONAL CONSORTIUM OF INVESTIGATIVE JOURNALISTS ने। दुनिया भर के 96 समाचार संगठनों को मिलाकर एक समूह बना दिया है। इसमें कारपोरेट खातों को समझने वाले वकील चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। एक्सप्रेस इसका हिस्सा है। आपको कोई हिन्दी का अख़बार इसका हिस्सेदार नहीं मिलेगा। बिना पत्रकारों के ग्लोबल नेटवर्क के आप अब कोरपोरेट की रिपोर्टिंग ही नहीं कर सकते हैं।

1 करोड़ 30 लाख कारपोरेट दस्तावेज़ों को पढ़ने समझने के बाद दुनिया भर के अख़बारों में छपना शुरू हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस में आज इसे कई पन्नों पर छापा है। आगे भी छापेगा। पनामा पेपर्स और पैराडाइस पेपर्स को मिलाकर देखेंगे तो पांच सौ हज़ार लोगों का पैसे के तंत्र पर कब्ज़ा है। आप खुद ही अपनी नैतिकता का कुर्ता फाड़ते रह जाएंगे मगर ये क्रूर कुलीन तंत्र सत्ता का दामन थामे रहेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसके यहां कोई नैतिकता नहीं है। वो नैतिकता का फ्रंट भर है।

राज्य सभा में सबसे अमीर और बीजेपी के सांसद आर के सिन्हा का भी नाम है। जयंत सिन्हा का भी नाम है। दोनों ने जवाब भी दिया है। नोटबंदी की बरसी पर काला धन मिटने का जश्न मनाया जाने वाला है। ऐसे मौके पर पैराडाइस पेपर्स का यह ख़ुलासा हमें भावुकता में बहने से रोकेगा। अमिताभ बच्चन, अशोक गहलोत, डॉ अशोक सेठ, कोचिंग कंपनी फिट्जी, नीरा राडिया का भी नाम है। आने वाले दिनों में पता नहीं किस किस का नाम आएगा, मीडिया कंपनी से लेकर दवा कंपनी तक मालूम नहीं।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जयंत सिन्हा की सफाई पढ़ेंगे तो लगेगा कि कोई ख़ास मामला नहीं है। जब आप इसी ख़बर को PANDO.COM पर 26 मई 2014 को MARKS AMES के विश्लेषण को पढ़ेंगे तो लगेगा कि आपके साथ तो खेल हो चुका है। अब न ताली पीटने लायक बचे हैं न गाली देने लायक। जो आज छपा है उसे तो MARK AMES ने 26 मई 2014 को ही लिख दिया था कि ओमेदियार नेटवर्क मोदी की जीत के लिए काम कर रहा था। यही कि 2009 में ओमेदियार नेटवर्क ने भारत में सबसे अधिक निवेश किया, इस निवेश में इसके निदेशक जयंत सिन्हा की बड़ी भूमिका थी।

2013 में जयंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर मोदी के विजय अभियान में शामिल होने का एलान कर दिया। उसी साल नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों की एक सभा मे भाषण दिया कि ई-कामर्स को खोलने की ज़रूरत है। यह भाजपा की नीति से ठीक उलट था। उस वक्त भाजपा संसद में रिटेल सेक्टर में विदेश निवेश का ज़ोरदार विरोध कर रही थी। भाजपा समर्थक व्यापारी वर्ग पार्टी के साथ दमदार तरीके से खड़ा था कि उसके हितों की रक्षा भाजपा ही कर रही है मगर उसे भी नहीं पता था कि इस पार्टी में एक ऐसे नेटवर्क का प्रभाव हो चुका है जिसका मकसद सिर्फ एख ही है। ई कामर्स में विदेश निवेश के मौके को बढ़ाना।

मुझे PANDO.COM के बारे में आज ही पता चला। मैं नहीं जानता हूं क्या है लेकिन आप भी सोचिए कि 26 मई 2014 को ही पर्दे के पीछे हो रहे इस खेल को समझ रहा था। हम और आप इस तरह के खेल को कभी समझ ही नहीं पाएंगे और न समझने योग्य हैं। तभी नेता हमारे सामने हिन्दू मुस्लिम की बासी रोटी फेंकर हमारा तमाशा देखता है। जब मोदी जीते थे तब ओमेदियार नेटवर्क ने ट्वीट कर बधाई दी थी। टेलिग्राफ में हज़ारीबाग में हे एक प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। जिसमें स्थानीय बीजेपी नेता शिव शंकर प्रसाद गुप्त कहते हैं कि जयंत सिन्हा 2012-13 में दो साल मोदी की टीम के साथ काम कर चुके हैं। इस दौरान जयंत सिन्हा ओमिदियार नेटवर्क में भी काम कर रहे थे। उन्होंने अपने जवाब में कहा है कि 2013 में इस्तीफा दिया।

इसमें मार्क ने लिखा है कि जयंत सिन्हा ओमेदियार नेटवर्क के अधिकारी होते हुए भी बीजेपी से जुड़े थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में निदेशक हैं। इसी फाउंडेशन के बारे में इन दिनों वायर में ख़बर छपी है। शौर्य डोवल जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के बेटे हैं, वो इस फाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं। जयंत सिन्हा ई कामर्स में विदेशी निवेश की छूट की वकालत करते रहते थे जबकि उनकी पार्टी रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर ज़ोरदार विरोध करने का नाटक करती थी। जनता इस खेल को कैसे देखे। क्या समझे। बहुत मुश्किल है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट को the wire.in और PANDO.COM के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

क्या सही में आप इस तरह के खेल को समझने योग्य हैं? मेरा तो दिल बैठ गया है। जब हम वायर की रिपोर्ट पढ़ रहे थे तब हमारे सामने PANDO.COM की तीन साल पुरानी रिपोर्ट नहीं थी। तब हमारे सामने पैराडाइस पेपर्स नहीं थे। क्या हम वाकई जानते हैं कि ये जो नेता दिन रात हमारे सामने दिखते हैं वे किसी कंपनी या नेटवर्क के फ्रंट नहीं हैं? क्या हम जानते हैं कि 2014 की जीत के पीछे लगे इस प्रकार के नेटवर्क के क्या हित रहे होंगे? वो इतिहास का सबसे महंगा चुनाव था।

क्या कोई इन नेटवर्कों को एजेंट बनकर हमारे सामने दावे कर रहा था? जिसे हम अपना बना रहे थे क्या वो पहले ही किसी और का हो चुका था? इसलिए जानते रहिए। किसी हिन्दी अख़बार में ये सब नहीं मिलने वाला है। इसलिए गाली देने से पहले पढ़िए। अब मैं इस पर नहीं लिखूंगा। यह बहुत डरावना है। हमें हमारी व्यक्तिगत नैतिकता से ही कुचल कर मार दिया जाएगा मगर इन कुलीनों और नेटवर्कों का कुछ नहीं होगा। इनका मुलुक एक ही है। पैसा। मौन रहकर तमाशा देखिए।

वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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