हिन्दू और मुसलमान दोनों पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव आज तक सहला रहे हैं

किसी व्यक्ति परिवार या समाज में कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं कि वे सब कई पीढियों तक उस घटना से प्रभावित होते रहते हैं। ये प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। ऐसी ही एक घटना है सन १७६१ में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। इस लड़ाई के बारे में जानने से पहले लड़ाई क्यों हुई, यह जानना दिलचस्प होगा। इतिहास की एक धारा के मुताबिक उत्तर भारत में अंतिम महान हिन्दू सम्राट हर्ष वर्धन और दक्षिण भारत में रायरायान कृष्णदेव राय थे। मुस्लिम आक्रांताओं के हमले भारत पर आठवीं-नवीं शताब्दी से ही शुरू हो गए थे। लेकिन ११वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ ही भारत में उनके साम्राज्य की शुरूआत हो गई।

मुस्लिम राजा जब आए तो निरूसन्देह उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए। लेकिन ऐबक के दामाद और दूसरे सम्राट इल्तुतमिश के साथ ही मुस्लिम आक्रमणकारी राजाओं ने यहां की हिन्दू बाहुल प्रजा के साथ मेल मिलाप शुरू कर दिया और कोशिश की कि हिन्दुओं की भावनाएं आहत नही हों। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही गई और १८वीं-१९वीं शताब्दी तक हिन्दू-मुसलमान खिचड़ी के दानों की तरह आपस में मिल गए।

लेकिन इस प्रवृत्ति के अपवाद भी रहे और वर्चस्व की लड़ाई में कई बार धर्म को भी हथियार बनाया गया। साथ ही यह भी हुआ शासक मुस्लिम वर्ग के विरुद्ध एक स्वाभाविक नाराजगी यहां के पुराने प्रभुवर्ग हिन्दुओं में बनी रही। यही नाराजगी औरंगजेब के शासन के बाद बहुविध तरीके से सामने आई। मुगलों के जमाने तक भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार मुख्यतरू खेती ही था। कई वजहों से, जिनको गिनाना यहां अप्रासंगिक है, शाहजहां के अंतिम दिनों में खेती के संकट के दिन शुरू हो गए। कोढ़ में खाज यह भी हुआ कि औरंगजेब ने अपनी साम्राज्य लिप्सा में इस संकट को न केवल उत्तर भारत वरन दक्षिण भारत में भी बढ़ा दिया।

परिणाम स्वरूप पहला विद्रोह खेतिहर जाट बिरादरी ने किया। जिसका नेतृत्व गोकुल जाट ने किया। विद्रोही भविष्य में भी सिर न उठा पाएं इसलिए औरंगजेब ने गोकुल जाट को बड़ी कठोर पीड़ादायी सार्वजनिक मौत दी। लेकिन जब जीवन का आधार ही नष्टड्ढ हो रहा हो तो मौत का खौफ नहीं रह जाता। परिणाम स्वरूप ज्यादातर खेतिहर जातियां देश भर में मुगल शासन के खिलाफ उठ खड़ी हुईं। जिनमें सबसे ज्यादा सफल रहे जाट और मराठे। इस बगावत के तार्किक परिणाम स्वरूप मराठा क्षत्रपति शिवाजी और राजा सूरजमल जाट शासकों के रूप में सामने आए। महाराजा रणजीत सिंह को भी एक हद तक इसी श्रेणी में रख सकते हैं।

इन सबमें भी सबसे पहले व सबसे अधिक सफलता मराठों को मिली। हालाकि इसके लिए उन्होंने बड़ी कीमत भी चुकाई। शिवाजी जिन्दगी भी औरंगजेब से लड़े। उनके पुत्र सम्भाजी को भी औरंगजेब ने मार डाला और पौत्र साहू को अपने यहां नजरबंद कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने साहू को सशर्त रिहा कर दिया और उन्होंने पूना पहुंचकर क्षिन्न भिन्न और विखंडित मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। शिवाजी के बाद किसी केन्द्रित नेतृत्व के अभाव में मराठा साम्राज्य एक ढीला ढाला सा संगठन था। जिसमें सिंधिया, होलकर और गायकवाड़ समेत पांच बड़े घराने थे जो लगभग स्वतंत्र थे।

इन सब को एकत्रित कर अपने प्रधानमंत्री पेशवा, जो ब्राह्मण थे, की मदद से साहू ने मराठा साम्राज्य को मुगलों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश शुरू की। मुगलों के खिलाफ अपने संघर्ष को न्यायोचित, प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए जब ब्राह्मड्ढण पेशवा बाजीराव ने हिन्दू स्वराज की बात की तो उसका जनमानस पर खासा असर पड़ा। बाजीराव बड़े योद्धा थे, उन्होंने मराठा साम्राज्य को लगभग आधे हिन्दुस्तान में प्रभावी बना दिया। लेकिन मराठा शासक एक काम नहीं कर पाए। जो जगहें उन्होंने जीती वहां पर प्रभावी शासनतंत्र स्थापित कर वे जनता के प्रिय नहीं बन सके। दूसरे उस समय मराठों से इतर जो दूसरी ताकतें सक्रिय थीं उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाकर भारत सम्राट मुगल ही बने रहे।

इन्हीं सब परिस्थितियों में अपने अंतकाल में साहू जी ने घोषणा की कि उनके बाद मराठा साम्राज्य के अधिपति पेशवा ही होंगे। और मराठा क्षत्रप पेशवा के अधीन मराठा शासन को विस्तार देकर मुगलों को अपदस्थ करेंगे। इस तरह साहू राजा की मृत्यु के बाद खेतिहर जाति मराठों के साम्राज्य के अधिपति ब्राह्मड्ढण पेशवा हो गए। मुगल साम्राज्य भी उस समय लग रहा था कि अस्त होने वाला ही है, बस एक सांघातिक धक्के की जरूरत है। साथ ही उस समय की अराजकता से फायदा उठाकर साहसी और लूटमार करने वाले शासक और लुटेरे भी सिर उठाने लगे थे।

ऐसा ही एक शासक था अफगानिस्तान का अहमद शाह अब्दाली। वह लूटमार के इरादे से कई बार भारत आ चुका था। लेकिन ऐसा नहीं था कि वह महमूद गजनवी की तरह केवल लुटेरा ही था। वह एक कूटनीतिक शासक भी था। ऐसे में कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों के साथ उसके मित्रता के संबंध थे। ऐसी स्थिति में १७६१ में जब एक बार फिर अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया तो उसका सामना न ही भारत सम्राट मुगलों ने किया और न ही किसी और क्षत्रप ने। पेशवा के अधीन मराठों ने रणनीति बनाई कि अगर अब्दाली का सामना कर उसे हरा देते हैं तो फिर स्वाभाविक रूप से जो परिस्थितियां बनेंगी उनमें मुगलों को सांघातिक धक्का देने में पेशवा सफल रहेंगे। साथ ही हिन्दू स्वराज का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा।

इस सोच के तहत पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली और पेशवा की सेनाओं ने युद्ध का फैसला किया। मराठों ने निरूसन्देह बहुत अच्छी सेना सजाई और वह जीत के प्रति इतने अधिक अश्वस्त थे कि इस लड़ाई में पहली बार मराठा सरदारों की पत्नियां और परिवारीजन भी उनके साथ आए कि लड़ाई जीतने के बाद उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा करने के बाद तब पूना वापस जाएंगे। लेकिन मराठों के शत्रुओं ने भी इस लड़ाई में अवसर देखा। उन्होंने अब्दाली की सहायता की। उनमें से कई आमने-सामने मराठों से संघर्ष का सामर्थ्य नहीं रखते थे। इसलिए सोचा कि अब्दाली जीता तो अफगानिस्तान लौट जाएगा और मराठों को नष्ट कर देगा साथ ही वे स्थानीय राजा मराठों के प्रकट शत्रु भी नहीं बनेंगे। इसी पृष्ठड्ढभूमि में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई और अपराजेय मराठा सेना बुरी तरह हारी, इस हद तक कि लड़ाई में तत्कालीन पेशवा के भाई व बेटे भी मारे गए।

अब परिदृश्य बदल गया था। सांघातिक धक्का मुगलों के बजाय मराठों को लग चुका था। साथ ही प्लासी और बक्सर की लड़ाईयां जीतकर अब अंग्रेज भारत के अधिपति बनने की ओर अग्रसर थे। मुगलों का गौरव और पेशवा का हिन्दू स्वराज का सपना चकनाचूर हो चुका था। अब शासन अंग्रेजों को करना था और जाहिर है कि उनकी अपनी प्राथमिकताएं थी। गौर से देखें तो तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू और मुसलमान दोनों आज तक पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव सहला रहे हैं। लेकिन काल की गति निराली है। कई बार मनुष्य की सोच काल की गति के सामने धराशायी हो जाती है। फिर भी दोनों अपनी फितरत से बाज नहीं आते।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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‘आप’ पर स्टिंग वार ; अब लड़ाई आर-पार

दिल्ली : अब तो सचमुच यकीन सा होने लगा है कि सियासत भी एक-की-तीन बातों से चलती है- इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट। देखिए न कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की परेशानियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पार्टी में महाभारत गहराती जा रही है। केजरीवाल के खिलाफ ऑडियो टेप जारी होने के बाद पार्टी पूरी तरह से बिखरती दिख रही है। किसी ने खबर पर टिप्पणी की है – ‘हम तो नई, साफसुथरी राजनीति करने आये है जी, लेकिन क्या करें, हमाम में नंगा होना पडता है….

दूसरे दलों के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए मशहूर अरविंद केजरीवाल खुद ही विवादित बयानों के साथ आडियो टैप में कैद हो गए हैं। केजरीवाल हमेशा लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए प्रेरित करते थे। अब विडंबना यह है कि आप ही के अंदर से अरविंद केजरीवाल के खिलाफ स्टिंग निकला। इन घटनाक्रमों के बीच केजरीवाल से आहत होकर महाराष्ट्र में आप का चेहरा रहीं अंजलि दमानिया ने पार्टी छोड़ने का एलान कर दिया।

आप के पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने आरोप लगाया है कि उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कांग्रेस विधायकों के संपर्क में थे और उन्हें एक नया राजनीतिक दल बनाने और बाहर से आप का समर्थन करने के लिए उकसा रहे थे क्योंकि केजरीवाल दोबारा विधानसभा चुनाव के हक में नहीं थे। गर्ग के इस तरह के आरोपों के बीच एक आडियो टैप सामने आया है, जिसमें केजरीवाल और रोहिणी के पूर्व विधायक गर्ग के बीच कथित बातचीत दर्ज है। इसमें आप नेता को कांग्रेस में फूट डालने के बारे में बात करते सुना जा सकता है। 

गर्ग के साथ बातचीत में केजरीवाल कथित रूप से यह कहते हुए सुने जा सकते हैं-हम सरकार बनाने के लिए तैयार हैं, लेकिन कांग्रेस हमारा समर्थन करने को तैयार नहीं है। मनीष (सिसोदिया) कांग्रेस के साथ संपर्क में है। एक काम करें, कांग्रेस में फूट डालें और छह विधायकों से नई पार्टी बनाने और हमारा समर्थन करने के लिए कहें। विधानसभा चुनावों में दिल्ली के मतदाताओं के इतने जोशोखरोश के साथ शामिल होने के बाद अपनी सरकार में बैठे भ्रष्टाचार विरोधी रखवालों की ऐसी मुर्ग-लड़ैया देखनी पड़ेगी, शायद इससे पहले किसी ने सोचा भी न हो। 

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मायावती कभी मुख्यमंत्री बन गईं तो अखिलेश दास से सौ करोड़ का सौ गुना यानी एक खरब से भी ज्यादा दुह लेंगी!

Kumar Sauvir : मायावती ने एलान किया कि अखिलेश दास ने राज्यसभा की मेम्बरी के लिए बसपा को सौ करोड़ रुपया देने की पेशकश की थी। अखिलेश दास ने इस आरोप को ख़ारिज किया और कहा कि उन्होंने कभी भी एक धेला तक नहीं दिया। हालांकि सभी जानते हैं कि अखिलेश दास के पास बेहिसाब खज़ाना है। बस, वो खर्च तब ही लुटाते हैं जब उनकी कोई कर्री गरज फंसी होती हो। लखनऊ वालों को खूब याद है की लखनऊ संसदीय सीट के चुनाव की तैयारी में अखिलेश दास ने रक्षाबंधन, दीवाली, भैया दूज, होली, ईद-बकरीद तो दूर, करवा-चौथ तक के मौके पर घर-घर मिठाई और तोहफों के पैकेट भिजवाने के लिए सैकड़ों कार्यकर्ताओं की टीम तैनात कर रखी थी।

कुछ भी हो, जानने वाले जानते हैं कि अखिलेश दास का दावा सिरे से झूठा है और मायावती बिना पैसे के अपनी थाली से एक कौर तक नहीं उठाती हैं। अब जानकार लोगों को आशंका है कि मायावती और अखिलेश दास के बीच घोड़ा-भैंसा जैसी खतरनाक जानी-दुश्मनी शुरू हो चुकी है। खुदा-ना-खास्ता, अगर भविष्य में किन्हीं समीकरण के चलते मायावती कभी मुख्यमंत्री बन गईं तो अखिलेश दास से सौ करोड़ का सौ गुना यानी एक खरब से भी ज्यादा दुह लेंगी। एक सौ करोड़ तो बसपा के बड़े चोर-सियार तक नोंच डालेंगे। खुद को दुहाने के लिए अखिलेश दास ने मायावती के सिपहसालार नसीमुद्दीन सिद्दीकी के दरवाज़े पर महीनों तक सुबह-दोपहर-शाम खूब माथा टेका।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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अमरीका-वियतनाम युद्ध को कवर करने वाले एकमात्र भारतीय पत्रकार थे हरिश्चन्द्र चंदोला

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हरिश्चन्द्र चंदोला ने वर्ष 1950 में दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान टाइम्स से अपने पत्रकारिता कैरियर की शुरूआत की। यह वह समय था, जब देश को आजाद हुऐ ज्यादा समय नहीं हुआ था। भारत में संचार माध्यमों का खास विकास नहीं हुआ था। मुद्रित माध्यमों में भी ज्यादातर अंग्रेजी अखबार ही प्रचलन में थे। उसमें भी टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स व इंडियन एक्सप्रेस ही प्रमुख अखबारों में थे। ऐसे में देश के प्रमुख समाचार पत्र में नौकरी मिलना हरिश्चन्द्र जी के लिए अच्छा मौका था। हरिश्चन्द्र जी की पारिवारिक पृष्ठभूमि पत्रकारिता से जुड़ी रही। यही कारण रहा कि उन्होंने देश के नहीं बल्कि विदेशी समाचार पत्रों में भी लेख लिखे। चंदोला विश्व के प्रमुख युद्ध पत्रकारों में पहचाने जाते हैं। उन्होंने सन् 1968 से लेकर 1993 तक के सभी महत्वपूर्ण युद्धों व क्रांतियों के बारे में घटना स्थल पर जाकर लिखा।

हरिश्चन्द्र ने अपनी पत्रकारिता के अधिकतम समय तक देश व देश के बाहर कई युद्धों व क्रांतियों को देखा और उस पर लिखा। उन्होंने युद्ध पत्रकारिता उस दौर में की जब जनसंचार माध्यमों का विकास ऐसा नही था जैसा वर्तमान में है। आज जनसंचार माध्यम अत्याधुनिक सुविधाओं से जुड गये हैं। विश्व के किसी भी कोने में यदि कोई घटना होती है तो पलभर में इसकी पूरी जानकारी लोगों को हो जाती है। लेकिन जब हरिश्चन्द्र ने पत्रकारिता में कदम रखा तो उस समय सीमित संसाधन थे और समाचारों के संप्रेषण में काफी दिक्कतें आती थी। अब यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि हरिश्चन्द्र ने किन और कैसी परिस्थितियों में पत्रकारिता की होगी। रणभूमि में जाकर जान की परवाह किये बगैर रिर्पोटिंग करना, इस बात की तस्दीक करता है कि पत्रकारिता के प्रति वो कितना संजीदा रहे हैं। चंदोला ने नागा समस्या को भी भूमिगत नागाओं के बीच में जाकर लिखा। 1979 में जब चीन ने वियतनाम पर हमला किया तो हरिश्चन्द्र चंदोला विश्व के दो पत्रकारों में एक थे, जो घटना की कवरेज के लिए सरहद पर पहुंचे। इसके एक साल बाद वो मिडिल ईस्ट में ईरान व ईराक युद्ध को कवर करने गये।

1- अमेरिका – वियतनाम युद्ध

यह युद्ध काफी लम्बे समय तक चला। हरिश्चन्द्र चंदोला ने इसका विवरण अपने समाचार पत्र जिसके वो प्रतिनिधि थे इंडियन एक्सप्रेस के अलावा भारत व विदेश के अन्य समाचार पत्रों के लिए भी लिखा। युद्ध भूमि में जाकर कवरेज करने वाले विश्व के गिने चुने पत्रकारों में वो भी एक थे। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण खबरें लिखी। कई बार उन्होंने अमेरिकन सैनिकों के साथ बखतरबंद गाड़ियों व हैलिकाप्टर में बैठकर रिपोंटिग की। दो तीन बार ऐसे मौके भी आये जब मौत उनके करीब से होकर गुजरी। अमेरिका वियतनाम युद्ध की लगातार कवरेज करने वाले वो एकमात्र भारतीय पत्रकार थे। इस दौरान हरिश्चन्द्र ने कई युद्ध प्रभावित वियतनामी क्षेत्रों का भी दौरा किया। इस युद्ध में अमेरिकी सेना द्वारा युद्ध पत्रकारों को पास दिये गये थे। लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें भी थीं। इस युद्ध में पत्रकारों के लिए अमेरिकी सेना ने काफी सुविधाएं उपलब्ध कराई थी। सैनिक छावनी में ठहरने की व्यवस्था थी। सैनिक कैंटीन से रियायती दरों पर पत्रकार को दिये गये पास दिखाकर सामान खरीद सकते थे। जो पत्रकार कवरेज के लिए युद्ध स्थल में जाना चाहता था, उसके लिए हैलीकाप्टर की सुविधा हर समय उपलब्ध थी।

2- ईरान ईराक युद्ध

ईरान-ईराक युद्व 1980 में छिड़ गया था। यहां सबसे पहले हरिश्चन्द्र ने कुवैत में भारतीय मजूदरों की व्यथा पर इंडियन एक्सप्रेस में लिखा। इसका असर यह हुआ कि इससे भारत का विदेश मंत्रालय हरकत में आया। 8 साल तक चली इस लड़ाई का हाल हरिश्चन्द्र ने दोनों देशों में जाकर लिखा। युद्ध पत्रकार के रूप में उनका यह दूसरा महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण युद्ध था। कई सालों तक चले इस युद्ध की उन्होंने रणभूमि में जाकर रिपोंटिग की। उस समय ईराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को ईराक में आने पर पाबंदी थी। लेकिन हरिश्चन्द्र ने सद्दाम के खिलाफ खबर लिखने के बावजूद उनके क्षेत्र में गये और बेबाकी से लेखनी चलाई। हजबजा नरसंहार तथा मृत्युलोक की इंडियन एक्सप्रेस में लिखी उनकी रिर्पोट ने काफी हलचल मचाई। इस युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व के सभी युद्ध पत्रकार अपने अपने देशों में लौटकर जब आने देश के समाचार पत्रों में बड़ी-बड़ी खबरें लिख रहे थे, तब हरिश्चन्द्र ने मानवीय संवदेना व एक कुशल पत्रकार का धर्म निभाते हुए ईरान के युद्ध प्रभावितों के कैंप में गये और प्रभावितों की समस्यओं की ओर पूरे विश्व का ध्यान खींचा। उन्होनें अपनी खबरों में लिखा कि कैसे प्रभावित लोग सूखे ब्रेड व खजूर के सहारे दिन काट रहे हैं। उनकी इस रिपोंटिग को पत्रकारिता जगत द्वारा काफी सराहा गया।

3- कुवैत पर ईराकी हमला

1 अगस्त 1990  की रात 2 बजे ईराक की रिपब्लिकन गार्ड की छह डिविजन सरहद पार कर कुवैत में दाखिल हो गई। उस घटना की जानकारी मिलते ही हरिश् ने इसका विवरण समाचार पत्रों में भेजा। चूंकि खाड़ी युद्ध के समय हरिश्चन्द्र इस क्षेत्र में लम्बे समय तक रहे थे इसलिए उन्हें कवरेज में ज्यादा दिक्कतें नहीं आई। पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला ने भारतीय दूतावास के गायब हो जाने की खबर लिखी। दूसरे दिन दिल्ली में इस खबर के छपने के बाद विदेश मंत्रालय पता लगाने लगा कि आखिर दूतावास कहां गया। इस युद्ध की खबरें भी कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई।

4- फ्रांस-अल्जीरिया संघर्ष

फ्रांस और अल्जीरिया के बीच लम्बे समय तक संघर्ष चला। हरिश्चन्द्र ने इस पूरे संघर्ष का ब्यौरा भारत के अलावा चिश्व के कई अन्य प्रमुख समाचार पत्रों में भेजा। एक बार जब वो खबर भेज रहे थे कि तभी फ्रांसिसी सैनिकों ने अल्जीरियनों पर आक्रमण कर दिया। कुछ पलों में सडकें खून से लाल हो गई। किसी तरह हरिश्चन्द्र इस घटना में बचे।

इसके अलावा हरिश्चन्द्र ने एक युद्ध पत्रकार के तौर पर कई जनक्रांतियों, संघर्षो व युद्धों को युद्ध भूमि व घटना स्थल पर जाकर लिखा। हरिश्चन्द्र जिम्बाबबें से अल्जीरिया गये। यहां फ्रांसासी साम्राज्य के खिलाफ वहां के लोगों का हथियारबंद युद्ध चल रहा था। हरिश्चन्द्र फ्रांस और अल्जीरिया लड़ाकुओं के 18 मार्च 1962 के युद्ध विराम से पहले वहां पहुंचे और यहां के हालात पर उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए खबर लिखी। उस समय यहां का माहौल काफी संवेदनशील था। सड़कों पर चलने वाले अल्जीरियनों पर अपने घरों से फ्रांसिसी गोलियां चला उन्हें मार रहे थे। शहर में कई दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा। ऐसे में खबर करना जान जोखिम में डालने से कम नहीं था, लेकिन हरिश्चन्द्र निरंतर इससे संबधित समाचार भेजते रहे।

एक दिन फरवरी की ठंडी सुबह जब वो पास के पहाड़ी के डारघर में खबर भेजने गये थे कि तभी नीचे से अल्जीरियनों का एक जलूस नारे लगाते आ रहा था। तारघर के पास बड़ी संख्या में फ्रांसिसी सशस्त्र पुलिस खड़ी थी, जिसका काम जलूस को आगे आने से रोकना था। वो तारघर से बाहर निकल ही रहे थे कि तभी गोलीबारी शुरू हो गई। कुछ ही देर में सड़क खून से लाल हो गई। कई अल्जीरियन सड़क पर मरे पड़े थे। हरिश्चन्द्र ने आंखों देखी इस घटना की खबर कई समाचार पत्रों को भेजी।
 
उपरोक्त के अतिरिक्त हरिश्चन्द्र ने इजरायल से अरबों की लडाई, फिलीस्तीनी क्रांति को भी कवर किया।

नागा भूमि का संघर्ष

हरिश्चन्द्र ने 1954 से 1960 के बीच चार सालों तक द टाइम्स ऑफ इंडिया के उत्तरपूर्व संवाददाता के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्होंने उत्तरपूर्व की कई महत्वपूर्ण समस्याओं और घटनाओं को समाचार पत्र के माध्यम से लोगों के सामने लाया। इसमें नागाओं की लडाई महत्वपूर्ण थी।

नागालिम या नागा भूमि की लड़ाई विश्व की सबसे लंबी चली गुरूल्ला लड़ाईयों में एक है। सन् 1955 से प्रांरभ हुई लड़ाई के आज 56 साल हो चुके हैं। यह आने सामने में लड़ाई नहीं रही। बल्कि छिट-पुट गुरिल्ला युद्ध रहा। वर्ष 1997 से यहां युद्ध विराम है।
 
शुरूआत में नागाओं की लड़ाई राजनीतिक ही रही। सन् 1947 में भारत के अधिकार में आने के बाद नागाओं ने आंरभ के दशकों में आजादी अलावा कुछ नहीं मांगा। उल्लेखनीय है भारत सरकार व नागाओं के बीच कई दौर की वार्ताएं चली लेकिन इसका कोई समाधान नहीं निकल पाया। पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला ने चार साल तक टाइम्स आफ इंडिया के लिए यहां से खबर लिखी। उन्होंने नागा गुरूल्लाओं के क्षेत्र में जाकर कई विवरण लिखे। वर्ष 1964 से 1968 तक वो भारत सरकार व नागाओं के बीच शांति वार्ता के सदस्य भी रहे। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के अनुरोध पर हरिश्चन्द्र इस वार्तादल के सदस्य बने थे।

 

बृजेश सती

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