भिंडरावाले और गोडसे के कितने पूजने वालों को देशद्रोह में जेल भेजा!

जेएनयू प्रकरण पर कुछ सवाल हैं जो मुंह बाए जवाब मांग रहे हैं। मालूम है कि जिम्मेदार लोग जवाब नहीं देंगे, फिर भी। लेकिन उससे पहले नोट कर लें-

1. देश को बर्बाद करने की कोई भी आवाज़, कोई नारा मंजूर नहीं। जो भी गुनाहगार हो कानून उसे माकूल सजा देगा।
2. कोई माई का लाल या कोई सिरफिरा संगठन न देश के टुकड़े कर सकता है न बर्बाद कर सकता है। जो ऐसी बात भी करेगा वो यकीनन “देशद्रोही” है।
3. किसी नामाकूल से या देशभक्ति के किसी ठेकेदार से कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
4. कोई भी किसी भी मुद्दे पर असहमत है तो ये उसका हक़ है। हां कोई भी। कोई माई का लाल असहमति को “देशद्रोह” कहता है तो ये उसकी समझ है।

आइये अब जेएनयू पर बात कर ली जाये। आज़ाद भारत के इतिहास में आधी रोटी पर दाल लेकर दौड़ पड़ने का ये सबसे जीवंत नज़ारा है। उस पर भी दाल में उन्माद का तड़का लग गया है।

1. जेएनयू में एक संगठन ने एक सभा की जिसका वीडियो एक चैनल के पास आया। हंगामाखेज नारेबाजी में पाकिस्तान ज़िंदाबाद और देश की बर्बादी के सुर सुनाई दे रहे हैं।
2. हल्ला मचा और मचना ही चाहिए।उन्माद के ताप में जलती भीड़ ने पूरे जेएनयू को देशद्रोही बता कर हांका लगाना शुरू कर दिया।
3. दूसरे दिन एक और वीडियो आया जिसमें दूसरा पक्ष पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहा है। अगर पहले वीडियो पर इतना भरोसा है तो इस पर भी कर लीजिये।
4. जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज़ हो जाता है जो कि न आयोजक था न भारत विरोधी नारे लगा रहा था।उसका बाद का भाषण कल से अनकट चल रहा है चैनलों पर सुन लीजिये क्या कह रहा है।
5. जिसने भी भारत की बर्बादी के नारे लगाये उसे पकड़ कर मुकदमा चलाइये लेकिन चार, चालीस या चार सौ के किये के लिए पूरी यूनिवर्सिटी को देशद्रोह का अड्डा किस आधार पर कहा जा सकता है?
6. झूठ का सहारा लेकर आग में घी के लिए हाफिज सईद के फ़र्ज़ी ट्विटर से ट्वीट करवा दिया। हद ये है कि दिल्ली पुलिस ने फ़ौरन आगाह कर दिया कि ये ट्वीट फ़र्ज़ी है। देश भर को अलर्ट भी किया।
7. गृह मंत्री शायद इसी फ़र्ज़ी ट्वीट पर भरोसा कर जेएनयू के पीछे हाफिज का हाथ बता रहे हैं। क्या विडम्बना है।

अब ज़रा कुछ और सवाल-

a) देशभक्ति के रंग में ऊभ-चूभ हो रही पार्टी अभी कल तक इस पीडीपी के साथ कश्मीर में सत्ता में थी जो ऐलानिया अफज़ल की आरती उतारती है। महबूब मुफ़्ती और उनके साथ पूरे कश्मीरी अवाम को भी देशद्रोह के मुक़दमे में बंद कब करेंगे? वहां आये दिन पाकिस्तान का झंडा कुछ ज्यादा ही फहरा रहा है। लेकिन फिर भी हर कश्मीरी देशद्रोही नहीं है न, कहा जाना चाहिए।

b) एक मोहतरमा हैं आसिया अंद्राबी। कश्मीर में दुख्तराने- मिल्लत की मुखिया। अभी बीते साल आसिया ने पाकिस्तान का जश्ने आज़ादी मनाया और मोबाइल से ही पाकिस्तान को तकरीर की। क्या हुआ, क्या कोई मुकदमा दर्ज़ हुआ? आपकी ही सरकार थी वहां और कल अगर महबूब एक जरा सा इशारा कर दें तो आप फिर शपथ लेने को उतावले बैठे हैं। तब भूल जायेंगे ये मोहतरमा भी अफज़ल को शहीद मानतीं हैं?

c) जरनैल सिंह भिंडरावाले का नाम याद है क्या ..! आज़ाद भारत का सबसे खतरनाक विद्रोह करने वाला। सबसे बड़ा देशद्रोही। पता है आपको कि पंजाब में आज भी तमाम लोग उसे पूजते हैं।लोग ही क्यों अब तो पंजाब सरकार ने अपने खजाने से उसके नाम पर स्टेडियम भी बनवा दिया है। तो क्या पूरे पंजाब को देशद्रोही मान लेंगे? कुछ किया क्या? एक भी देशद्रोह का मुकदमा? नहीं ना…। क्योंकि वहां भी आप सरकार में हैं।

d) और वो जो गोडसे की पूजा करते हैं ..! उसकी पिस्तौल की फोटू की आरती उतारते हैं ..! 26 जनवरी को काला दिवस मनाते हैं। कितने लोग जेल भेजे गए बताइये तो…! वो देशद्रोह नहीं है क्या?? आप अफज़ल की फांसी के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हैं उसी सुप्रीम कोर्ट ने गौडसे को फाँसी दी थी तो गौडसे को पूजना देशद्रोह नहीं है..?

अरे भाई ये देशद्रोह का ठप्पा भी आप इतना चीन्ह चीन्ह कर चस्पा करेंगे तो ठीक नहीं है…!

तुरंता न्याय पर आमादा भीड़…

अर्द्ध सत्य की आधी रोटी पर उन्माद की दाल लेकर लपलपाती दौड़ रही भीड़ तुरंता न्याय चाहती है। कोई जाँच नहीं, कोई सुनवाई नहीं ,कोई सबूत गवाही नहीं। बस भीड़ के एक अगुआ ने कह दिया है कि नारे लगाने वालों की जीभ काट ली जाये तो दूसरे ने फ़तवा जारी कर दिया है कि गोली मार दी जाये। बस..! एक बार फिर साफ़ कर दिया जाये कि देश की कीमत पर कोई नारा मंज़ूर नहीं है लेकिन झूठ और फरेब से गढ़े जा रहे किसी भी ज़हरीले जाल में फंस कर उन्मादी होना भी गलत ही है। कोई भी ये न भूले कि तुरंता न्याय करने को बौरा रही भीड़  किसी अफवाह से हरहरा कर जिस दिन आपकी घर की सांकल बजाएगी तब आपकी गुहार सुनने वाला कोई नहीं होगा।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया न्यूज पोर्टल के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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योगेंद्र यादव ने पूछा- स्वराज का मंत्र लेकर चली इस यात्रा का ‘स्व’ कहीं एक व्यक्ति तक सिमट कर तो नहीं रह जायेगा?

Yogendra Yadav : आज एक सवाल आपसे… अमूमन अपने लेख के जरिये मैं किसी सवाल का जवाब देने की कोशिश करता हूँ। लेकिन आज यह टेक छोड़ते हुए मैं ही आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। देश बदलने की जो यात्रा आज से चार साल पहले शुरू हुई थी उसकी दिशा अब क्या हो? पिछले दिनों की घटनाओं ने अब इस सवाल को सार्वजनिक कर दिया है। जैसा मीडिया अक्सर करता है, इस सवाल को व्यक्तियों के चश्मे से देखा जा रहा है। देश के सामने पेश एक बड़ी दुविधा को तीन लोगो के झगड़े या अहम की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऊपर से स्टिंग का तड़का लगाकर परोसा जा रहा है। कोई चस्का ले रहा है, कोई छी-छी कर रहा है तो कोई चुपचाप अपने सपनों के टूटने पर रो रहा है। बड़ा सवाल सबकी नज़र से ओझल हो रहा है।

 

आज से चार साल पहले जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से एक नयी यात्रा शुरू हुई थी। पैंसठ साल से तंत्र के तले दबे लोक ने अपना सर उठाया था। हर शहर, हर कस्बे ने अपना जंतर-मंतर ढूंढ लिया था, हर गाँव ने अपना अन्ना खोज निकाला था। घोटालों के विरुद्ध शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कारवाँ बन गयी। भ्रष्टाचार की गंगोत्री को रोकने की कोशिश इस यात्रा को चुनावी राजनीति के मैदान तक ले आई। राजनीति का विकल्प बनने के बजाय यह आंदोलन वैकल्पिक राजनीति का वाहन बनता दिखाई दिया।

आज यह यात्रा जिस पड़ाव पर खड़ी है, वहां कुछ बुनियादी सवालों का उठना लाज़मी है। क्या इस आंदोलन का राजनैतिक वाहन वैकल्पिक राजनीति की जगह सामान्य पार्टियों जैसा एक चालू राजनैतिक विकल्प बनेगा? पूरे देश में बदलाव का बीड़ा उठाने वाले क्या सिर्फ दिल्ली का क्षेत्रीय दल बनाकर रह जायेंगे? स्वराज का मंत्र लेकर चली इस यात्रा का ‘स्व’ कहीं एक व्यक्ति तक सिमट कर तो नहीं रह जायेगा? मतलब, इस आंदोलन का राजनैतिक औज़ार कहीं इस आंदोलन की मूल भावना से ही विमुख तो नहीं हो गया?

जो सवाल आज सार्वजनिक हुए हैं वो मेरे और प्रशांत भूषण जैसे सहयात्रियों के मन में बहुत समय से चल रहे हैं। इस यात्रा के भटकाव के चिन्ह बहुत समय से दिख रहे थे। कुछ साथी उन मुद्दों को उठाकर यात्रा छोड़ भी चुके थे। लेकिन हम दोनों जैसे अनेक साथियों ने तय किया कि इस सवालों को अंदर रहते हुए ही सुलझाने की हर संभव कोशिश करेंगे। चूंकि तोड़ना आसान है और बनाना बहुत मुश्किल। एक बार लोगों की आशा टूट जाये तो फिर भविष्य में कुछ भी नया और शुभ करना असंभव हो जायेगा। हमारी दुविधा यह थी कि आंदोलन की एकता भी बनाये रखी जाय और इसकी आत्मा भी बचायी जाय। एक तरफ यह खतरा था कि कहीं हमारी भूल से इतना बड़ा प्रयास टूट न जाये, कहीं देश भर में फैले हुए कार्यकर्ताओं की उम्मीदें न टूट जाएँ तो दूसरी ओर यह खतरा था की हम कहीं पाप के भागीदार ना बन जाएँ, कल को ये न लगे कि सब कुछ जान-बूझते हम इस आंदोलन के नैतिक पतन के मूक दर्शक बने रहे।

आज इस आंदोलन के कार्यकर्ता, समर्थक और शुभचिंतक एक तिराहे पर खड़े हैं। एक रास्ता है कि हम जहां से आये थे वहीं वापिस चले जाएँ। यानी राजनीति को छोड़ दें और अपने अपने तरीके से समाज की सेवा में लग जाएँ। दिक्कत ये है कि ऐसा करने से लोकतंत्र मजबूत होने की बजाय और कमजोर हो जायेगा। ‘राजनीति तो गन्दी ही होती है’ वाला विचार लोकतन्त्र की जड़ काटने का काम करता है। राजनीति को छोड़ देंगे तो लोकतंत्र को कैसे सुधारेंगे?

दूसरा रास्ता है कि इसी वाहन को ठोक-पीट कर ठीक किया जाय। कई लोगों की राय है कि पिछले दिनों की गलतियों को सुधारने के लिए कोर्ट-कचहरी या फिर चुनाव आयोग की शरण ली जाय। इसमें कोई शक नहीं कि 28 तारीख को आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में जो कुछ हुआ वह पार्टी के संविधान और लोकतंत्र की मर्यादा के बिलकुल खिलाफ था। लेकिन क्या इस मामले को खानदानी जायदाद के झगड़े की तरह कोर्ट-कचहरी में सालों तक घसीटा जाय ? लोकतान्त्रिक राजनीति में सबसे बड़ी अदालत तो जनता की अदालत होती है। अगर कोर्ट-कचहरी नहीं तो फिर और किस तरीके से इस वाहन को सुधारा जाय? जहाँ हर मतभिन्नता को विद्रोह करार दिया जाय, वहां भीतर से बदलाव कैसे हो?

तीसरा रास्ता एक नयी किस्म की राजनीति की ओर ले जाता है। ऐसी राजनीति जो स्वराज के आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप हो। राजनीति का विकल्प बनाने या सिर्फ चालू राजनैतिक विकल्प बन जाने की जगह एक सच्चे अर्थ में वैकल्पिक राजनीति का रास्ता। सवाल है कि कैसी होगी यह राजनीति? इसका वैचारिक ताना-बाना क्या होगा ? तात्कालिक सफलता के लालच से मुक्त कैसे रहा जाय? अपने नैतिक आदर्शों से समझौता किये बिना सफलता कैसे हासिल की जा सकती है? और, यह भी कि क्या दूध से जली जनता क्या ऐसे किसी नए प्रयास से जुड़ेगी? ये मेरे और प्रशांत भूषण के प्रश्न नहीं है। यह आज पूरे देश के प्रश्न हैं। आपके प्रश्न हैं। इस बार उत्तर भी आप ही देंगे।

‘आप’ के नेता योगेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त प्रकरण पर Rakesh Srivastava की पोस्ट : Yogendra Yadav जिन सिद्धांतों पर अड़े हैं, उस पर न अड़ें, तो वह राजनीति में हों ही क्‍यों .. एक पार्टी बने, वह पार्टी सत्‍ता में आ जाए, वह पा‍र्टी बहुत अच्‍छा शासन भी दे दे, योगेंद्र यादव का विजन यहीं पर जाकर खत्‍म नहीं हो सकता .. … कुछ लोग उस मिट्टी के बने होते हैं जिनकी जिंदगी का सारा डायनामिक्‍स उनके नैतिक विश्‍वास से चालित होता है .. बौद्धिकता के तेज के पीछे वह मानवीय करूणा होती है .. दुनियावी मानदंडों पर यह आदमी पिछड़ जाएगा, इसे अपना बोया काटने को नहीं मिलेगा, पर यह अपने उसूल पर बना रहेगा .. .. योगेंद्र उस वि़जन के निर्माताओं में केंद्रीय हैं जिसे केजरीवाल ने बेचा .. योगेंद्र और उन जैसे सैकड़ों विद्वानों और सिविल राईट व नव आंदोलनों के नेताओं अध्‍येताओं ने केजरीवाल की उर्जा देखकर उनपर बाजी लगाई .. जनता ने ख्‍ाूब खूब खरीदा क्‍योंकि जनता को अभी परिवर्तन की तगड़ी भूख है .. केजरीवाल को अब राजनीति की व्‍यावहारिकताएं दिख रही हैं, उनके करीब के लोगों को नई- पुरानी लॉबियों से मिलने वाले संभावित लाभ और सत्‍ताएं दिख रही हैं .. पर योगेंद्र को यह दिख रहा है कि इस ‘नई’ राजनीति को जमीनी अधिकार- आंदोलनों और संगठनों से अपनी सापेक्षताएं बनाए रखनी चाहिए और पार्टी की वह लोकतांत्रिकता बनाए रखनी चाहिए जिससे पार्टी और गवर्नेंस नए- नए लोगों और नए उभरे हित- समूहों को इस नई राजनति में ऊपर खींचने का माध्‍यम बनी रहे .. यही परिवर्तन की राजनीति है .. .. सिविल संगठनों से निरपेक्ष होकर पार्टियां व्‍यक्ति- केंद्रित हो जाती है, और व्‍यक्ति- केंद्रित होकर सिविल संगठनों से निरपेक्ष हो जाती है .. मध्‍यमार्ग की सभी पार्टियां ऐसी ही हैं .. दक्षिणपंथी कही जाने वाली भाजपा के तार आरएसएस जैसे सिविल संगठन से तो कम्‍यूनिस्‍ट पार्टियों के तार मजदूर और किसान संगठनों से जुड़ते हैं इसलिए ये पार्टियां करिश्‍माई नेतृत्‍व पैदा करने वाली होते हुए भी व्‍यक्ति पूजक नहीं हैं .. मध्‍यमार्गी पार्टियां व्‍यक्ति- पूजक, और कालांतर में परिवारवादी, वंशवादी, जातिवादी और क्रोनी कैपिटलिजम से आर्थिक- सुरक्षा प्राप्‍त करने वाली होकर रह जा रही हैं .. .. योगेंद्र यादव उस राजनीति के प्रतीक हैं जो मध्‍यमार्गी राजनीति को नव सृजित और विकेंद्रित हजारों सिविल संगठनों से जोड़कर नई उर्जा की राजनीति बनाना चाहता है .. इस राजनीति की जमीन तैयार है, फसल पकी है .. इसके लिए आम आदमी पार्टी को आंतरिक लोकतंत्र से पूर्ण प्रतिबद्धता दिखानी होगी जिससे कोई समझौता नहीं हो सकता .. इसी बिंदु पर योगेंद्र यादव की जिद को समझा जा सकता है .. .. केजरीवाल की सफलता सिर्फ केजरीवाल की सफलता नहीं है .. यह उस विजन और जनता में परिवर्तन की गहरी इच्‍छा की सफलता थी .. कुछ लोग उस सफलता को ले उड़ें, पर योगेंद्र अपने विश्‍वास अपनी जिद पर बने रहेंगे ..”

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अरविन्द ‘आप’ को क्या हो गया ? – अब राकेश पारिख के निशाने पर केजरीवाल

AC कमरों और गाडियों का आराम छोड़कर जंतर मंतर पर बिना गद्दे और तकिये के बिताये वो दिन सचमुच यादगार है. ये वो दिन थे जब नींद 16 घंटे के बजाय 70 घंटे काम करने के बाद आती.

और फिर 2 अगस्त की वो शाम जब अन्ना जी ने राजनैतिक विकल्प देने की घोषणा कर दी. टीवी पर खबर देखते ही पत्नी का फ़ोन आया. उसने कहा “तुरंत वापस आ जाओ. हमें बेवकूफ बनाया गया है. आन्दोलन के नाम पर हमारी भावनाओ से खेलकर ये लोग राजनीति कर रहे है”. याद होगा आपको मैंने बताया था, उसने मुझे तलाक की धमकी तक दे डाली थी. अगली मुलाकात में आपने पूछा था “अब क्या कहती है भाभी जी?” अब तक तो मैं उसे समझाता रहा लेकिन आज क्या जवाब दू? मिशन बुनियाद जयपुर में हुआ. कार्यक्रम का आयोजन किया और सभी के आग्रह के बावजूद मैं जयपुर जिला कार्यकारिणी से बाहर रहा. एक अच्छे राजनैतिक विकल्प का बुनियादी ढांचा अपने जिले में बन जाए यही तक मैंने अपनी भूमिका सोची थी. उसके 2 महीनो बाद कौशाम्भी कार्यालय में हुई वो मुलाकात भी याद भी होगी जब मनीष जी ने मुझसे कहा था “अच्छे लोग अपनी जिम्मेदारियों से भागते है, और फिर शिकायत करते है की राजनीति गन्दी है. आपको जिम्मेदारी लेनी होगी डॉ साहब”. कुछ दिनों बाद वो प्रदेश कार्यकारिणी बनाने जयपुर आये, मेरे घर रुके और फिर उन्ही भावुक तर्कों के साथ मुझे राजस्थान सचिव की जिम्मेदारी सौंप दी. कौशाम्भी कार्यालय में हुई उसी मुलाकात में मैंने कहा था आप दोनों से “आजादी की लड़ाई का सिपाही हु, गुलामी अपने सेनापति की भी नहीं करूँगा”. मेरे तेवर तो आपने उस दिन ही भांप लिए होंगे. यदि जी हुजूरी करनी होती तो इतना संघर्ष ही क्यों करते?

क्या हमें आज राजनीति में अपना भविष्य बनाने को आये, जी हुजूरी करने वाले लोगो की ही आवश्यकता रह गई? सवाल पूछने वालो की नहीं? लोकसभा चुनाव हुए, राजस्थान में प्रत्याशियों की स्क्रीनिंग की जिम्मेदारी भी संभाली. 22 प्रत्याशी भी उतारे लेकिन ये तो आप भी जानते है की मैंने खुद चुनाव लड़ने की इच्छा कभी नहीं रखी. कार्यकर्ताओ को हमेशा यही कहता रहा की हमारी जिम्मेदारी है समाज के अच्छे से अच्छे लोगो को ढूंड कर राजनीति में लाना, उन्हें चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना. यदि हम मान ले की हम ही सबसे अच्छे है तो हमारी खोज ख़त्म हो जाएगी. राष्ट्रिय कार्यकारिणी की बैठकों में भी मैंने ये प्रस्ताव कई बार रखा की संघटन में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगो को चुनाव नहीं लड़ना चाहिए. और देखिये ये राजनीति हमें कहा ले आई? चुनाव लड़ने की, मंत्री बनने की इच्छा रखना सही है लेकिन सवाल पूछना गलत?

आज शांति भूषण जी जैसे वरिष्ठ सदस्य का खुले आम अपमान हो रहा है. 80 साल की उम्र में क्या पार्टी के उस साधारण सदस्य को अपनी राय रखने का अधिकार नहीं? संविधान की धारा VI A (a) iv में हमने लिखा है की पार्टी के हर सदस्य को (जो जिम्मेदार पदों पर नहीं है) अपनी राय सार्वजनिक मंच पर रखने का अधिकार होगा. हमने एक ऐसी पार्टी बनायीं थी जिसमे किसी भी साधारण सदस्य को सोनिया गाँधी या नरेन्द्र मोदी के विचारो से असहमत होने का अधिकार हो. जिंदगी भर साफ राजनीति की उम्मीद लेकर बैठे उस बुजुर्ग को उम्र के आखरी पड़ाव में उम्मीद की एक किरण दिखाई दी थी। मैं जानता हु की उनकी आँखों में आँखे डाल कर आप वो नहीं कह सकते जो “आप” के प्रवक्ता टीवी पर कहते है। क्या हमारी पार्टी में अब भिन्न राय रखने वालो को गद्दार ही कहा जाएगा? आपके पास 12 हजार लोगो के दस्तखत लेकर आया था निवेदन करने की आप सुरक्षा लीजिये. आपने कहा था “इस आन्दोलन का एक लक्ष्य यह भी है की लोगो के मन से भय समाप्त हो, वो बोलने की हिम्मत जुटा सके” लेकिन वास्तविकता यह है की आज सच कहने में ही भय लगता है. सोशल मीडिया पर बनी हुई फ़ौज उस व्यक्ति को दोषी नहीं मानती जो पार्टी के अंदरूनी ईमेल एक साजिश के तहत लीक करे या पार्टी के ही पुराने कार्यकर्ताओ के खिलाफ साजिश कर झूटे SMS भेज उन्हें बदनाम करे. लेकिन ऐसे समय जब आप देश की राजनीति के बेताज बादशाह हो आपसे सवाल करने की हिम्मत जुटाए उसे गद्दार, देशद्रोही और जाने किन किन नामो से नवाजती है.

क्या हम वास्तव में एक भय मुक्त समाज बना रहे है? मैं राष्ट्रिय कार्यकारिणी की बैठक में आपसे ये सवाल बिना भय करता आया हु की क्या “आप” याने सिर्फ अरविन्द केजरीवाल है? क्या देश माने सिर्फ दिल्ली है?” आपके सामने यह सवाल रखने का साहस तो हमेशा था लेकिन आज यही सवाल पूछना तो देशद्रोह से भी बड़ा अपराध बन गया है. हमने पार्टी बनायीं तो नारा दिया था “आम आदमी जिंदाबाद”. हमने टोपी पर लिखा था “मुझे चाहिए स्वराज” और आज स्वराज की बात करने वालो को पार्टी विरोधी कहा जाता है. हमारी पार्टी की विचारधारा, जो आप ही की लिखी पुस्तक पर आधारित है, उसमे तो स्वराज एक बड़ा ही पावन शब्द था. मानता हु की स्वराज का अर्थ यह नहीं की मेरे जैसा एक साधारण कार्यकर्ता आपके बड़े निर्णयों में हस्तक्षेप करे. निर्णय आप करे, लेकिन हमें अपनी बात तो रखने दे, बैठक तो होने दे. या वह भी स्वराज के खिलाफ है? आपको शायद जानकारी न हो हमारे ही कार्यकर्ता स्वराज शब्द को उपयोग चुटकुलो में करते है, सवाल पूछने वालो की खिल्ली उड़ाने के लिए. 330 संस्थापक सदस्यों ने मिलकर पार्टी बनायीं. देश भर के 300 से अधिक जिलो में हमारी इकाईया है. अपने घरो को फूंक कर हज़ारो कार्यकर्ता इस आन्दोलन की लौ को देशभर में जीवित रख रहे है. उनकी पचासों समस्याए है, सवाल है. आज पार्टी बने 3 साल हो गए. स्थापना के बाद परिषद् की केवल एक बैठक हुई वो भी एक दिन की. आज तक उन सदस्यों को कभी सुना नहीं गया. पिछली बैठक में आपने ये वादा किया था की अगली बैठक 3 दिनों की होगी.

बहोत मिन्नतें की लेकिन फिर भी कोई उन्हें सुनना ही नहीं चाहता. 28 मार्च की बैठक में औपचारिकताये पूरी होगी, 31 मार्च को इन सभी की सदस्यता समाप्त होगी और फिर उम्मीद है की सवाल पूछने वाले उस परिषद् के सदस्य नहीं होंगे. जानता हु की आपको आलोचना पसंद नहीं लेकिन मुझे चापलूसी पसंद नहीं. आपकी तारीफ करने वाले तो करोडो है, सौ दो सौ तो सवाल पूछने वाले भी हो? आप समेत राष्ट्रिय कार्यकारिणी के सभी सदस्यों को मेल लिखकर निवेदन किया था की परिषद् की बैठक कमसे कम 2-3 दिनों की रखिये. हमारी समस्याए सुनिए. और उसी मेल में मैंने सभी परिषद् सदस्यों से भी निवेदन किया था की अधिकारिक बैठक न सही, हम अनौपचारिक बैठक करे. क्या यह भी देशद्रोह है? हमारी सोशल मीडिया टीम की समझ के अनुसार तो है. राष्ट्रिय परिषद की बैठक की मांग को लेकर 45 सदस्यों के पत्र जो आपको भेजे थे क्या वो कोई षड्यंत्र था? बैठक से पहले अनौपचारिक ही सही सभी सदस्य चर्चा कर पाये इस उद्देश् से आप ही को भेजा हुआ मेल क्या कोई साजिश हो सकती है? परिषद् के सदस्य यदि अपने विचार एक दुसरे के साथ साझा करते है और अपने मुद्दों को परिषद् की बैठक में उठाते है तो क्या हो जायेगा?

किस बात का भय है? और किसे? क्यों हम चर्चा से इतने भागने लगे? परिषद् में शायद ही कोई सदस्य हो जो आपके नेतृत्व पर सवाल उठाये। लेकिन आप के नाम का उपयोग कर इस राजनैतिक आंदोलन को दूषित करने वालो को निश्चित भय होना चाहिए। परिषद् के सदस्य उनसे खफा जरूर है। और इस बैठक को नाम दिया गया केजरीवाल के खिलाफ साजिश। खैर ये विश्वास है की आप के नेतृत्व में यह पार्टी देश की राजनीति में एक बहोत बड़ा बदलाव लाएगी. हो सकता है आंदोलनकारियो की अब आवश्यकता न हो. और यह भी विश्वास है की आपके रहते कोई गलत आदमी इस पार्टी में आ तो सकता है लेकिन गलत काम आप उसे करने नहीं देंगे. लेकिन अरविन्द जी व्यक्तिकेंद्रित बदलाव दीर्घकालीन नहीं हो सकता. किसी प्रभावशाली नेता द्वारा बनाई व्यवस्था केवल तब तक टिक पाती है जब तक वह व्यक्ति खुद सत्ता में हो. अंत में “आप” की सोशल मीडिया फ़ौज से हाथ जोड़कर निवेदन -राजनीती में भविष्य बनाने के लिए आये लोग सवाल नहीं पूछते। दिल्ली में इतनी बड़ी जित मिलने के बाद सवाल पूछने का साहस कोई समझदार नेता नहीं कर सकता। ये हिम्मत तो वही कर सकते है जिन्हें अपने नहीं इस वैकल्पिक राजनीति के सपने की फ़िक्र हो। हमने आन्दोलन में अपनी भूमिका ऐसे ही निभाई। हमें न टिकट चाहिए, न पद, न कोई सम्मान। बस एक निवेदन है इस टोपी की लाज रखे। सवाल पूछने वालो को अपमानित करने के लिए इतना निचे न गिरे की इस टोपी की गरिमा को चोट पहुंचें। जाने कितने परिवार स्वाहा हुए इस टोपी को बनाने में।

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