रामगोपाल यादव बोले- आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के दिमाग का स्क्रू ढीला!

Yashwant Singh : मुलायम ने आईपीएस Amitabh Thakur को सीधे फोन कर हड़काया तो रामगोपाल ने आईएएस Surya Pratap Singh के दिमाग का स्क्रू ढीला बताया. रामगोपाल ने सूर्य प्रताप सिंह के बारे में शर्मनाक बयान मीडिया के सामने दिया है, ऐसा यह वीडियो देखकर लगता है.

सपा के इन दिग्गज नेताओं को प्रदेश में किसी अन्य आईपीएस और आईएएस से दिक्कत नहीं है. सिर्फ अमिताभ ठाकुर और सूर्य प्रताप सिंह आंखों में चुभ रहे हैं. आपको भी वजह पता है. रामगोपाल का आईएएस सूर्य प्रताप के बारे में बयान किसी चैनल पर नहीं चला और न ही किसी अखबार में छपा है. इसलिए आप लोग इसे देखिए व दूसरों को दिखाइए. लिंक ये है: goo.gl/BERVUM

आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के बारे में आप ज्यादा नहीं जानते हों तो इस वीडियो को देख सुन लीजिए, खुद समझ आ जाएगा कि ये अफसर कितना बेबाक और कितना जनपक्षधर है: goo.gl/3EXxVS

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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भारत के एक मुस्लिम नेता ने पत्रकारों-कार्टूनिस्टों की हत्या और आतंकी हमले को जायज ठहराया, ईनाम देने की घोषणा की

डेनमार्क के कार्टूनिस्ट और पत्रकारों की निर्मम हत्या का विरोध पूरी दुनिया कर रही है और पूरी दुनिया आतंक के विरोध में एकजुट होने का प्रयास कर रही है लेकिन भारत में बहुजन समाज पार्टी के एक नेता हाजी याकूब कुरैशी ने पेरिस में शार्ली एब्दो मैगजीन के दफ्तर पर हुए हमले का न सिर्फ समर्थन किया बल्कि यहां तक कह दिया कि अगर हमला करने वाले दावा करें तो उन्हें 51 करोड़ रूपये का इनाम दिया जायेगा.

शहीद पत्रकारों और कार्टूनिस्टों को श्रद्धांजलि देने के बाद मैग्जीन शार्ली एब्डो के समर्थन में एकजुटता दिखा रहे ‘एजेंसी फ्रांस प्रेस’ (फ्रांसीसी नेशनल न्यूज एजेंसी) के हांगकांग स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के मीडियाकर्मी.

दफ्तर पर हुए हमले को याकूब ने सही ठहराया और कहा, जो भी पैगंबर के प्रति अनादर दिखाएगा, उसकी मौत शार्ली एब्दो के पत्रकारों और कार्टूनिस्टों की तरह ही होगी.  बीएसपी नेता ने कहा- ‘पैगंबर की शान से छेड़छाड़ करने वाला सिर्फ मौत का हकदार है. ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है. इन लोगों को रसूल के चाहने वाले सजा देंगे.’  वे आगे बोले- पैरिस मैगजीन के पत्रकार धर्म के साथ खिलवाड़ कर रहे थे इसीलिए उनके साथ ऐसा सुलूक हुआ है.
 
भारतीय जनता पार्टी ने इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज करायी है. पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, इस तरह का बयान भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब करेगा. बसपा को इस तरह के बयान देने वाले को पार्टी में नहीं रखना चाहिए. इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार को भी इस तरह के बयान देने वाले के खिलाफ कड़े कदम उठाने चाहिए. हालांकि इस पूरे बयान पर अबतक बीएसपी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है.
 
याकूब ने 2006 में घोषणा कर दी थी कि कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने वाले को 51 करोड़ का इनाम दिया जाएगा. इस बयान के बाद हलचल मच गयी थी. उन्होंने कहा यह उनके धर्म के साथ जुड़ा हुआ मामला है, इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए. याकूब का यह पहला बयान नहीं है जब वह विवादों में रहा है. इससे पहले भी उन्होंने कई विवादस्पद बयान दिये हैं. उनके बयानों के कारण उन्हें कई पार्टियों को छोड़ना पड़ा है.

उधर, फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली एब्डो से जुड़े एक एडिटोरियल कर्मचारी ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को जानकारी दी है कि फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली एब्डो अगले हफ़्ते अपने समय पर फिर निकलेगी. स्तंभकार पैट्रिक पेलू ने समाचार एजेंसी को बताया कि पत्रिका अगले हफ़्ते बुधवार को फिर निकलेगी ताकि बताया जा सके कि ”बेवकूफ़ी नहीं जीत सकती.” पेलू ने कहा, “यह बहुत मुश्किल है. हम सभी दुखी हैं और डरे हुए हैं लेकिन हम इसे इसलिए छापेंगे क्योंकि बेवकूफ़ी नहीं जीत सकती.”

उन्होंने कहा कि पत्रिका को शार्ली एब्डो के मुख्यालय के सामने रखा जाएगा जो फिलहाल हमले के बाद बंद है. शार्ली एब्डो के कई ऐसे ट्वीट रहे हैं, जो कट्टरपंथियों के गले नहीं उतरे. पेरिस में पत्रिका के दफ़्तर पर हमले से कुछ देर पहले पत्रिका के ट्विटर अकाउंट से किया गया आख़िरी कार्टून मीडिया में चर्चा का विषय है. पत्रिका के आधिकारिक ट्विटर हैंडल @Charlie_Hebdo_की तरफ़ से ट्वीट किए गए इस कार्टून में चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के नेता अबु बक्र अल-बग़दादी को दिखाया गया है. इस कार्टून के कैप्शन में लिखा है, “बेस्ट विशेज़, टु यू टू अल-बग़दादी.” (आप सभी को शुभकामानाएँ, अल-बग़दादी तुम्हें भी). जिसके जवाब में कार्टून में बग़दादी को कहते हुए दिखाया गया है, “एंड स्पेशली गुड हेल्थ” (और ख़ासकर अच्छी सेहत के लिए).

फ्रांसीसी समय के अनुसार यह ट्वीट बुधवार सुबह किया गया था. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इसे हमले के कुछ देर पहले पोस्ट किया गया या हमले के दौरान ही. लेकिन यह स्पष्ट है कि मीडिया में हमले की ख़बरों के आने से पहले इसे पोस्ट किया जा चुका था. इस बात को लेकर आशंका जताई जा रही है कि क्या इस ट्वीट से हमले को कोई संबंध है या नहीं. यह कार्टून पहले पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुआ था लेकिन यह पत्रिका में प्रकाशित हो रहे कार्टूनों की कड़ी से जड़ा प्रतीत हो रहा है.

पत्रिका के इस हफ़्ते के अंक में एक कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमें कहा गया था, “फ्रांस में हाल में कोई हमला नहीं हुआ है.” लेकिन कार्टून का एक पगड़ीधारी चरित्र, जिसके पीठ पर क्लाशनिकोव बंदूक़ है, कह रहा है, “इंतज़ार करो- शुभकामानाएं देने के लिए हमारे पास जनवरी तक का वक़्त है.” फ्रांस में जनवरी के अंत तक नए साल की बधाई देने का रिवाज है. हमले के दिन ही इस कार्टून का प्रकाशित होना क्या महज़ संयोग है? फ्रांसीसी मीडिया में कुछ जगहों पर इस बात की आशंका जताई जा रही है पत्रिका का ट्विटर अकाउंट हैक कर लिया गया था. इस कार्टून पर पत्रिका के मशहूर कार्टूनिस्ट होनोरे के हस्ताक्षर हैं लेकिन यह स्पष्ट नहीं है क्या सचमुच उन्हीं का बनाया कार्टून है या इसे कब बनाया गया?

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डीआईजी गोरखपुर डा. संजीव गुप्ता और एसपी पीलीभीत सोनिया सिंह को जेल भेजा जाए : सुबोध यादव

: मृतक सिपाहियो के परिजनों को 50-50 लाख का मुआवजा मिले : इटावा। उत्तर प्रदेश पुलिस एसोषियेषन के अध्यक्ष सुबोध यादव ने आत्महत्या करने वाले दो पुलिस कर्मियों के परिजनों को 50-50 लाख रूपये मुआवजा व डीआईजी गोरखपुर डा0 संजीव गुप्ता व एसएसपी पीलीभीत सोनिया सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जेल भेजने की मांग की है। उन्होंने इस सम्बन्ध मे मुख्यमंत्री को पत्र भी भेजा है।

इस प्रकरण के सम्बन्ध में अध्यक्ष सुबोध यादव ने बताया कि पीलीभीत में पुलिस अधीक्षक के आवास पर ड्यूटी कर रहे सिपाही दिनेश प्रजापति उम्र 27 वर्ष, 2011 बैच, ने सरकारी रायफल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली। दूसरी घटना गोरखपुर रेंज के डीआईजी के लखनऊ स्थित निजी आवास की बेगारी से आजिज होकर गोरखपुर के डीआईजी के पीआरओ सेल में तैनात सिपाही अरूण कुमार चौधरी उम्र 25 वर्ष का शव डीआईजी के लखनऊ स्थिति निजी आवास पर पंखा पर लटकता मिला। सिपाही ने इससे पूर्व अपने घर पर फोन करके अपने पिता से डीआईजी द्वारा करायी जा रही बेगारी का दुखड़ा रोया था।

अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में बताया कि शासन का कोई ऐसा आदेश नहीं है कि डीआईजी अपने निजी आवास पर भी सुरक्षा लगायें अथवा कानून के रक्षक से बेगार करायें।  ऐसे डीआईजी को मुकदमा दर्ज कर जेल भेजना चाहिये। उन्होंने कहा कि जब थाना में ऐसी घटना होती है तो प्रभारी निरीक्षक / थानाध्यक्ष व पहरा पर ड्यूटी करने वाला व कार्यालय का स्टाफ दोषी माना जाता है और जेल भेजा जाता है जैसा कि तीन दिन पूर्व थाना जसवन्तनगर इटावा में प्रभारी निरीक्षक व कई को निलम्बित किया गया है।

उन्होंने कहा कि पीलीभीत में जिस सिपाही ने आत्महत्या की है उसकी शादी हो रही थी और एसपी द्वारा 30 दिन अवकाश नहीं दिया जा रहा था। जब वह अवकाश लेने गया तो एसपी ने उसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर भगा दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि डीआईजी गोरखपुर व एसपी पीलीभीत के खिलाफ मुकद्मा दर्ज कर जेल भेजा जाये और मृतक पुलिसकर्मी के परिजनों को पचास- पचास लाख रुपये का मुआवजा व एक-एक परिजन को तत्काल सेवा में लिया जाये। उन्होंने कहा कि प्रदेश में यह कोई पहली घटना नहीं है। पूर्व में भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं जिन्हें हल्के में लिया गया। अगर उसी समय गम्भीरता बरती जाती तो ये घटनाएं नहीं घटती।

प्रेस रिलीज

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सलाम मांझी! सलाम कंवल भारती!

दलित-पिछड़ों यानी मूलनिवासी की वकालत को द्विज पचा नहीं पा रहे हैं। सामाजिक मंच पर वंचित हाषिये पर तो हैं ही, अब राजनीतिक और साहित्यिक मंच पर भी खुल कर विरोध में द्विज आ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान से उच्च जाति वर्ग पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर बौखलाहट और तीखा विरोध के साथ सामने आया तो वहीं लखनउ में कथाक्रम की संगोष्ठी ‘लेखक आलोचक, पाठक सहमति, असहमति के आधार और आयाम’, में लेखक कंवल भारती के यह कहने पर कि ‘साहित्य और इतिहास दलित विरोधी है। ब्राह्मण दृष्टि असहमति स्वीकार नहीं करती।

सत्ता में बदलाव और संघ परिवार के मजबूत होने से दलित साहित्य के ज्यादा बुरे दिन आने वाले हैं।’ बस इतना ही कहना था कि संगोष्ठी में मौजूद द्विजों ने कंवल पर मुद्दे को भटकाने का आरोप लगाते हुए हमला बोल दिया। साहित्यिक माहौल में द्विजों का एक दलित लेखक पर उसकी अभिव्यक्ति पर हमला, साबित करता है कि राजनीतिक और सामाजिक मंच की तरह साहित्यिक मंच भी जातिवादी जड़ता से बाहर नहीं आ पाया है। जातिवादी जड़ता पूरी मजबूती से कायम है। तथाकथित जातिवादी नहीं होने का जो मुखौटा दिखता है वह नकली है।

जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान पर द्विजों की बौखलाहट और तीखा विरोध से एक बात बिलकुल साफ है कि उच्च जाति वर्ग के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं में पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर उच्च जाति के मुद्दे पर एक एकता है। पीएमएआरसी के अध्यक्ष और दलित चिंतक अरूण खोटे मानते हैं कि उन सबके बीच इस बात की भी आम सहमति है कि सत्ता व्यवस्था पर चाहें कोई भी दल, व्यक्ति या विचाधारा का कब्जा हो लेकिन वह पूर्णरूप से उच्च जाति वर्ग के अधीन हो और जो उच्च जाति की वर्चास्यता को चुनौती न दे सके वहीं दलित और पिछड़े वर्ग के नेता और बुद्धिजीवी अपनी पार्टी, नेता और विचारधारा को अपने वर्ग से ज्यादा महत्त्व देते हैं बल्कि अनेक अवसरों पर अपने वर्गीय हितों के खिलाफ होने वाली गोलबंदी के समथन में भी खड़े हो जाते हैं। सच भी है मांझी के बयान से सभी द्विज गोलबंद हो गये। हिन्दूवादी मीडिया भी मांझी के बयान के विपक्ष में खड़ा दिखा। सोषल मीडिया पर जीतन राम मांझी के ज़ज्बे को सलाम किया गया। सत्ता व व्यवस्था के शिखर पर पहुंच कर जिस तरह से मांझी ने वंचित वर्ग की अस्मिता, पहचान और हक-हूक के सवाल को पूरी ताकत के साथ रखा है वह काबिले तारीफ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जीतन राम मांझी ने अपने बयान में दलित, आदिवासी और पिछड़ों को एक पहचान दिलाने की भरपूर कोषिष की। मूल निवासियों के हक की बात की। वह भी व्यवस्था के उच्च पद से।

मूल निवासी की बात को लेकर मुख्यधारा की मीडिया कभी सामने नहीं आयी। सोशल मीडिया में मूल निवासी की अवधारणा पर बहस करने वालों को इस बहस को आगे बढ़ाने में बल मिलेगा। साथ ही जीतनराम मांझी के समर्थन में मजबूती से साथ खड़ा सार्थक भूमिका होगी। जीतन राम मांझी  और कंवल भारती के बयान से बौखलाये द्विजों की प्रतिक्रिया ने बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकत्ताओं के चेहरे से नकाब हटा दिया है। बल्कि खुद ही उनके असली और नकली होने का प्रमाण दे दिया। थोड़ी देर के लिए राजनीतिक मंच को छोड़ दिया जाये और साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों को देखा जाये तो, जो कुछ कथाक्रम की संगोष्ठी में दलित मुद्दे की बात कहने पर घटित हुई वह द्विजों के लिए अक्षम है। संस्कृति की राह दिखाने वाले खुद जब अपसंस्कृति की राह पकड़ ले तो इसे क्या कहा जाये?

इस हंगामे पर प्रो रमेश दीक्षित कहते हैं, कंवल भारती बढि़या बोल रहे थे। किसी को कोई दिक्कत थी, तो उसके लिए मंच था। वैचारिक स्वतंत्रता है, देश में अभी फासीवाद नहीं आया। वहीं जलेस के नलिन रंजन सिंह मानते हैं कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने का हक है। ऐसे में कंवल भारती का विरोध करना गलत था। उनसे असहमति रखने के बाद भी उनके बोलने के अधिकार पर रोक का विरोध करता हूं। लेखक पंकज प्रसून कहते हैं, कंवल भारती तय करके के आए थे कि उनको क्या बोलना है। ऐसा कई बार लोग लोकप्रियता के लिए भी करते हैं। वे मुद्दों पर रहते तो विवाद नहीं होता। साहित्य में विवाद न हो तो संवाद नहीं होगा। विरोध पर कंवल भारती कहते हैं, ऐसा विरोध मेरे लिए नया नहीं है। मेरे साथ अक्सर ऐसा होता रहता है मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात तो कहूंगा ही आप असहमत हैं तो अपना पक्ष रख सकते हैं।

द्विजों ने मूल निवासी पर मांझी को एवं साहित्य-इतिहास दलित विरोधी पर कंवल भारती को जिस तरह से धेरा वह सवाल खड़ा करता है। क्या कोई दलित-पिछड़ा (वंचित वर्ग) अपनी बात नहीं कह सकता? मांझी या फिर कंवल भारती ने कौन सी गलत बात कर दी? जब किसी वंचित को सत्ता-व्यवस्था में उच्च स्थान मिलता है तो उसे उसकी जाति से जोड़ कर क्यों देखा जाता है? सवाल उठाया जाता है। मुद्दों-बयानों में धेरा जाता है और साबित करने की कोषिष की जाती है कि दलित-पिछड़े-आदिवासी है इसलिये मोरचे पर असफल हैं! जबकि द्विजों पर यह हमला दलित-पिछड़े-आदिवासी की ओर से नहीं होता है। बहरहाल, दलित-पिछड़े-आदिवासी की आवाज को बुलंद करने के लिये जीतन राम मांझी और कंवल भारती को सलाम!

लेखक संजय कुमार बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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भड़ास पर खबर छपने के बाद कल्पतरु एक्सप्रेस ने राज कमल को फिर से नौकरी पर रखा

कल्पतरु एक्सप्रेस में छंटनी और यहां कार्यरत पत्रकार राज कमल के दुखों को लेकर भड़ास पर खबर छपने के बाद कल्पतरु प्रबंधन ने राज कमल को फिर से नौकरी पर रख लिया है. प्रबंधन के इस कदम की सराहना की जा रही है. हालांकि बाकी निकाले गए पत्रकार अब कल्पतरु समूह की असलियत सामने लाने के लिए लगातार रिसर्च वर्क कर रहे हैं और जल्द ही ढेर सारे डाक्यूमेंट्स के साथ कल्पतरु समूह के गड़बड़झाले का खुलासा मीडिया जगत के सामने करेंगे.

उधर, पत्रकार राज कमल ने भड़ास को एक मेल भेजकर कहा है कि उन्हें निकाला नहीं गया था, वे अवकाश पर गए थे. राज कमल ने अपने पत्र के समर्थन में लीव अप्लीकेशन भी भेजा है. राज कमल का पूरा पत्र इस प्रकार है…

”महोदय आपके पोर्टल पर मेरे बारे में डाली गई खबर कल्पतरु एक्सप्रेस छटनी कथा, बेटा गवाया, मां गवाई, उंगुली कटाई और नौकरी भी चलूी गई इस संबंध में अवगत कराना है कि यह खबर पूरी तरह तथ्यहीन, गलत व भ्रामक है, जो किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी व्यकि्त ने आपको भेजी है, जबकि सत्यता यह है कि मैं स्वयं नौ तारीख से अवकाश पर था और मैं आकर कार्यलय में आकर सेवाएं दे रहा हूं। अत उक्त खबर को अपने पोर्टर से तत्काल हटाकर मेरी वास्तविक बात को लोगों के समक्ष रखें मैं कल्पतरु एक्सप्रेस संस्थान में काफी समय से पूर्ण निष्ठा के साथ काम कर रहा हूं और प्रबंधन का हमेशा निष्ठावान लोगों के प्रति सहयोगात्मक रवैया रहा है। कुछ गैरजिम्मेदार लोगों की वजह से छटनी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसे कोई भी संस्थान बर्दाश्त नहीं करता। कृपया मेरे इस स्टेटमेंट को जारी कर पूर्व में दिए गए आपके पोर्टल के बयान को तत्काल हटा देने की कृपा करें।
राज कमल
सी. सब एडीटर
कल्पतरु एक्सप्रेस, लखनऊ”


 

मूल खबर…

कल्पतरु एक्सप्रेस छंटनी कथा : बेटा गंवाया, मां गंवायी, ऊंगली कटायी और नौकरी भी चली गयी

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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर उपजा ने मनाया समारोह, पत्रकारिता की जीवंतता पर छिड़ी बहस

लखनऊ। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया जगत, खासकर अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों का आह्वान किया है कि वे अच्छी खबरें लिखकर समाज में सकारात्मक सोच पैदा करें। माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया काउंसिल की पुरजोर वकालत की। पाण्डेय रविवार को राजधानी में राष्ट्रीय प्रेस दिवस समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इसका आयोजन उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) और इसकी स्थानीय इकाई ‘लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन’ ने संयुक्त रूप से किया था।

शीघ्र ही राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त होने जा रहे प्रदेश के वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी, भारतीय प्रेस काउंसिल के सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी, राज्य के सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के लखनऊ ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी, पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना, ‘उपजा’ के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित, महामंत्री रमेश चन्द्र जैन आदि ने निडर एवं फ्री प्रेस की महत्ता पर अपने गम्भीर विचार रखे और प्रेस की मजबूती तथा स्वतंत्रता के अलावा पत्रकारों के आर्थिक हितों व उनकी सुरक्षा पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ल ने किया।

सप्रू मार्ग स्थित उद्यान विभाग सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करने वाले उप्र विधानसभा के अध्यक्ष पाण्डेय ने अपने सारगर्भित सम्बोधन में कहा कि लोकतंत्र में ‘पब्लिक ओपिनियन’ का बहुत महत्व होता है। इस प्रणाली में विशेष रूप से प्रिण्ट मीडिया जनता की राय बनता है। लिहाजा उसके पत्रकारों को चाहे वे संवाददाता हों, अथवा डेस्क पर कार्यरत सम्पादक, उन्हें बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि उनकी लिखी और सम्पादित खबरें सनद व दस्तावेज बन जाती हैं जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग तो अपने समाचार प्रस्तुत करने के बाद उसे हटा भी लेते हैं।

पाण्डेय ने कहा कि खबरों, पत्रकारों और मीडिया मालिकों पर भी अंकुश रखने तथा उन्हें मार्गदर्शित करने के लिए प्रेस परिषद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है किन्तु इसका विस्तार किया जाना चाहिए ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा खबरिया चैनल भी इसकी परिधि में आ सकें। इस सम्बन्ध में उन्होंने मीडिया काउंसिल बनाये जाने की पुरजोर वकालत की। उन्होने कहा कि एसोसिएशन के माध्यम से मीडिया काउंसिल के गठन के लिए एक प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार के पास भेजना चाहिए।

इसके साथ ही पाण्डेय ने, जिनकी समाज में एक समाजवादी ‘एक्टिविस्ट’ के रूप में अहम भूमिका रही है, पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा बढाये जाने की जरूरत पर बल दिया। विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पाण्डेय ने पूर्व में एक बार  विधानसभा में  पत्रकारों के लिए पेश पेंशन विधेयक के  पूर्ववर्ती एक सरकार द्वारा वापस ले लेने पर अफसोस जताते हुए कहा कि पत्रकारों के लिए सरकार को कुछ अलग से देने के लिए सोचना चाहिए । पाण्डेय ने कहा कि समाज के सजग प्रहरी के नाते मीडिया के लोग खुद अपने लिए आचार संहिता बनाएं, साथ ही अपने कर्त्तव्यों को सही ढंग से समाज के व्यापक हित में निभाएं।

उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद के अध्यक्ष जावेद उस्मानी ने (जिन्हें शीघ्र राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालना है) इस अवसर पर अत्यन्त विस्तार से पत्रकारिता के स्वरूप व इसकी महत्ता की विवेचना की। उस्मानी ने कहा कि मीडिया सर्चलाइट के समान है। स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग, घटक तथा कडी है। यह सूरज की रोशनी की मानिन्द ‘समाज के अंधेरे’ में पहुंचकर उसके सभी विकारों को खत्म कर सकता है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मीडिया और सूचना के अधिकार अधिनियम का उपयोग लोकतंत्र में शासन-प्रशासन तथा प्रणाली की खामियों को दुरुस्त करने में करें।

राज्य के मुख्य सचिव रह चुके उस्मानी ने कहा कि अच्छे पत्रकारों को चाहिए कि वे अपनी बौद्धिकता तथा साधनों का इस्तेमाल उन लोगों के विरुद्ध करें जो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए समाज तथा जन के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रेस की भूमिका समाज हितैषी बातों तथा सुझावों को नीति निर्माताओं तक पहुंचाना और उनकी पैरोकारी करना होनी चाहिए। प्रेस के लोग शासन के कार्यों की सही मॉनिटरिंग करें। इस मौके पर  उस्मानी ने उपस्थित पत्रकार-समुदाय को आश्वस्त किया कि मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालने पर वे देखेंगे की जनता को सूचनाएं मिलने में कहां अवरोध हैं और उन्हें यथासम्भव दूर करने की कोशिश करेंगे।

एनयूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके व प्रेस काउंसिल के नव मनोनीत सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी ने अपने सम्बोधन में पत्रकारों के संकल्प तथा विजन पर जोर दिया, साथ ही कहा कि केवल लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता सम्भव हैय लिहाजा प्रेसकर्मियों, कर्मचारियों और नियोक्ताओं में बेहतर समझ होनी चाहिए। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे छद्म जीवन का मोह न रखें, और अपने कार्यों को विश्वास व समझ के साथ पूरा करें तभी प्रेस काउंसिल बनाने का लक्ष्य पूरा होगा और इसे सशक्त बनाया जा सकेगा।

सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार ने सूचना के अधिकार अधिनियम को पत्रकारों के लिए ब्रम्हास्त्र बताया और इसके उपयोग से हो रहे नित खुलासों के प्रति सन्तोष प्रकट किया है। उन्होने कहा कि आरटीआई के प्रयोग से पत्रकार पारदर्शी शासन व्यवस्था कायम करने की दिशा में काम कर सकता है। स्वदेश कुमार ने सोशल मीडिया, प्रिण्ट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दायित्व की चर्चा करते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सक्रियता ने अखबारों पर दबाव बढा दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के व्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने समाज को दिशा तथा निर्देशन में मीडिया की अहमियत को रूपांकित करते हुए लोकतंत्र में इसकी भूमिका पर जोर दिया एवं यह भी कहा कि मीडिया और इसके लोग भी अपने गिरेबान में झांकें।  वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का कहना था कि समय तथा समाज में तेजी से बदलाव के साथ पत्रकारिता में भी जबर्दस्त गिरावट आयी है। आवश्यक है कि पत्रकार नैतिक मूल्यों पर ध्यान दें। वीरेन्द्र सक्सेना ने समूची मीडिया में बढते व्यवसायीकरण को चिन्ताजनक बताया तथा कहा कि इससे पत्रकार जगत को भारी क्षति हो रही है। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने मीडिया पर शासन प्रशासन तथा मीडिया पर कारपोरेट घरानों के बढते प्रभुत्च वर चिंता व्यक्त की। महामंत्री रमेश चन्द्र जैन ने कहा कि प्रेस काउंसिल के दायरे में अभी सिर्फ प्रिण्ट मीडिया है, इसके स्वरूप में परिवर्तन कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसकी परिधि में ले आया जाना चाहिए।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों माता प्रसाद पाण्डेय,जावेद उस्मानी, प्रज्ञानन्द चैधरी , स्वदेश कुमार व विधानसभा के  प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को अंगवस्त्रम और प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया।  इसके पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि व अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस मौके पर षेयसी पावगी ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन एलजेए के महामंत्री के0के0वर्मा ने किया। इस अवसर पर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों सर्वश्री पी.के. राय, पी.बी. वर्मा, डॉ. प्रभाकर शुक्ल, सुनील पावगी, प्रदेश उपाध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह, वीर विक्रमबहादुर मिश्र, कोषाध्यक्ष प्रदीप कुमार शर्मा , मंत्री सुनील त्रिवेदी, एलजेए के उपाध्यक्ष भारतसिंह, सुशील सहाय, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, एस0बी0सिंह, विकास श्रीवास्तव कोषाध्यक्ष  मंगल सिंह और समेत अनेक गणमान्य लोगों के आलावा प्रदेश के विभिन्न जिलों से आये पत्रकार इस समारोह में बडी तादाद में जिलों से वाराणसी से अनिल अग्रवाल,आगरा से अशोक अग्निहोत्री ,पंकज सचदेवा,राजीव सक्सेना,सुभाष जैन,सुल्तानपुर से अरूण जायसवाल,शहजहांपुर से सरदारशर्मा, जरीफ मलिक, राजबहादुर, बराबकी से सलीम और फरहत भाई, प्रतापगढ से सन्तोष गंगवार हरीश सैनी आदि उपस्थित रहे।        
प्रेस रिलीज    

अरविन्द शुक्ला
अध्यक्ष
लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन

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हिंदुस्तान अखबार ने प्रेस काउंसिल से कहा- आजम खान ने वाकई ‘डंडे की भाषा’ वाला बयान दिया था

30 जनवरी 2013 को यूपी के वरिष्ठ मंत्री आज़म खां द्वारा समाजवादी पार्टी मुख्यालय में कथित रूप से सरकारी अफसरों द्वारा डंडे की भाषा समझने और उन पर चाबुक चलाने की बात कही गयी जो अगले दिन विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई, लेकिन उसके अगले दिन उन्होंने आधिकारिक बयान दे कर इससे इनकार किया और इसे भ्रामक और उनकी छवि खराब करने की साजिश बताया. मीडिया की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला होने के कारण सामाजिक कार्यकर्त्ता डॉ नूतन ठाकुर ने प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया से इस आज़म के दोनों बयानों की सच्चाई की जांच की मांग की थी.

प्रेस कौंसिल ने इस बारे में तमाम समाचारपत्र के संपादकों से उनका पक्ष बताने को निर्देशित किया था जिस पर एक (हिंदुस्तान) ने कौंसिल को अपना जवाब देते हुए कहा है कि आज़म के बयान पूरी तरह सही तथ्यों पर आधारित थे. अख़बार ने अपने जवाब में कहा कि यह एक मीटिंग में मंत्री द्वारा दिया गया सार्वजनिक बयान था जो कई अन्य अखबारों में भी प्रकाशित हुआ था. यह भी कहा गया है कि खबर के तथ्य इतने स्पष्ट थे कि कोई भी समझ सकता है यह बयान उत्तर प्रदेश के अफसरों के लिए था. जवाब में कहा गया है कि आज़म खान ने वास्तव में काफी लोगों के सामने कहा था कि “डंडे की भाषा समझते हैं अफसर” और अतः यह खबर पूरी तरह सही है.

सेवा में,
जस्टिस मार्कंडेय काटजू,
अध्यक्ष,
प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया,
नयी दिल्ली

विषय- विभिन्न समाचार पत्रों में श्री आज़म खां के बयान छापने और उनके द्वारा इस सम्बन्ध में खंडन करने तथा मीडिया को दोही ठहराए जाने के प्रकरण की जांच किये जाने विषयक 
महोदय,

कृपया निवेदन है कि मैं इस पत्र के माध्यम से मीडिया से जुड़ा एक अत्यंत गंभीर प्रकरण आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ और साथ ही निवेदन करती हूँ कि मामले की आवश्यकता और तात्कालिकता को ध्यान में रखते हुए इस सम्बन्ध में विशेष तत्परता के साथ यथाशीघ्र जांच करते हुए नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करें. यह प्रकरण श्री आज़म खां, नगर विकास मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार और वरिष्ठ समाजवादी पार्टी द्वारा समाजवादी पार्टी के पार्टी मुख्यालय, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में दिनांक 30/01/2013 को कथित रूप से दिये गए बयान से सम्बंधित है जिसके विषय में दिनांक 31/01/2013 तथा 01/02/2013 को विभिन्न समाचार पत्रों में प्रमुखता से खबरें प्रकाशित हुई हैं.

दिनांक 31/01/2013  के दैनिक हिंदुस्तान- लखनऊ संस्करण के मुख्य पृष्ठ की खबर “डंडे की भाषा समझते हैं अफसर- आज़म” के अनुसार- “कार्यकर्ताओं को संबधित करते हुए वरिष्ठ मंत्री आज़म खां भी अफसरों पर खूब बरसे. उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता इस मुगालते में न रहें कि अफसर उनके रिश्तेदार हैं. वे किसी के नहीं होते. सिर्फ डंडे की भाषा समझते हैं और डंडा जनता के पास है”, जबकि दैनिक जागरण- लखनऊ संस्करण के “डंडे की भाषा समझते हैं अधिकारी- आज़म” के अनुसार- “मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जहाँ आईएएस वीक के मौके पर क्रिकेट मैच खेल कर नौकरशाही से सौहार्द्रपूर्ण रिश्तों का परिचय देते हैं वहीँ उनकी ही सरकार के वरिष्ठ मंत्री आज़म खां मानते हैं कि अधिकारी सिर्फ डंडे की भाषा समझते हैं. मुलायम सिंह यादव की मौजूदगी में बुधवार को आज़म ने कार्यकर्ताओं के बीच अपनी यह राय जाहिर भी की.” इसी समाचारपत्र में उनका कथन छपा-“फसर ना आपके रिश्तेदार हैं और ना मेरे. आप हठ में चाबुक रखिये वह सब सुनेंगे. इलाहाबाद कुम्भ में मैं चाबुक से ही काम ले रहा हूँ, सब ठीक से हो रहा है.”  अमर उजाला, लखनऊ संस्करण में “नाकारा अफसरों के खिलाफ मुलायम-आज़म के तेवर तल्ख़, डंडे के आदी हो गए हैं सूबे के अफसर” के अनुसार-“अफसरों के कामकाज से नाराज सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के सामने नगर विकास मंत्री आज़म खां बेहद तल्ख़ हो गए. उन्होंने कहा कि प्रदेश के अफसर डंडे के आदी हो चुके हैं.” इसी समाचारपत्र में छपा है-“कुम्भ में देखिये डंडे का असर -आज़म ने कहा कि कुम्भ की व्यवस्था के लिए सरकार ने उन्हें जिम्मेदारी सौंपी थी. देखिये सब ठीक से चल रहा है. यह उस डंडे का असर है जो कार्यकर्ताओं ने उन्हें सौंपा है. इससे पहले भी मुलायम सिंह सरकार में मुझे अर्धकुम्भ के दौरान यह जिम्मेदारी दी गयी थी. वह भी उसी डंडे ने अधिकारियों को अच्छी व्यवस्थाओं के लिए मजबूर कर दिया था.”
हिंदुस्तान टाइम्स के “Do a sting on officials: Khan to partymen” के अनुसार-“The officers understand the language of the stick and the whip.” जबकि द इंडियन एक्सप्रेस के “As Azam urges Mulayam to crack the whip on bureaucrats, later says transfers soon” के अनुसार-“Parliamentary Affairs Minister Azam Khan on Wednesday criticized the bureaucracy and asked Samajwadi Party President Mulayam Singh Yadav to shed his magnanimity and wield the whip. Khan said that the whip was necessary because the officials are only concerned about their posting and transfer. “At Kumbh the work is being done with the whip” said Khan.”

लेकिन इन खबरों के प्रकाशित होने के अगले ही दिन श्री आज़म खां का बयान विभिन्न समाचारपत्रों में आया. इनमे दिनांक 01/02/2013 के हिंदुस्तान में “मैंने ऐसा नहीं कहा- आज़म” के अनुसार-“प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री मोहम्मद आज़म खां ने दावा किया है कि उन्होंने अफसरों के लिए यह कहा ही नहीं कि वे डंडे की भाषा समझते हैं. गुरुवार को जारी बयान में उन्होंने कहा कि अख़बारों में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हुए छपी खबरों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है. बयान में उन्होंने दावा किया है कि उस मौके पर मीडिया आमंत्रित नहीं थी और उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही थी. खबरें भ्रामक हैं. बकौल श्री खां, ऐसी भ्रामक खबरों से उनकी और प्रदेश सरकार की छवि खराब करने की साजिश रची जा रही है.” जबकि दैनिक जागरण के “यह हाल भी तो बना रखा है अफसरों ने!” के अनुसार-“रात होते-होते बदल गए आज़म के बोल- बुधवार को अपनी तल्ख़ टिप्पणी से ब्यूरोक्रेसी में हंगामा खड़ा करने वाले आज़म खां के बोल गुरुवार रात होते-होते बदल गए. गुरुवार रात उनकी ओर से एक बयान जारी हुआ जिसमे उन्होंने कहा कि अधिकारियों को ले कर उन्होंने कोई अशोभनीय टिप्पणी नहीं की है, बयान के अनुसार- मीडिया ने जिस कार्यक्रम के हवाले से यह खबर प्रकाशित की है उसमे मीडिया को आमंत्रित तक नहीं किया गया था. ऐसी स्थिति में इस प्रकार का भ्रामक खबर उनकी और उनकी सरकार की छवि को खराब करने की साजिश है.” इसी प्रकार से अमर उजाला के “अफसरों पर क्यों खफा” के अनुसार-“ नगर विकास मंत्री आज़म खां बैकफुट पर- अफसरों पर डंडा और चाबुक की बात करने वाले नगर विकास मंत्री मो० आज़म खां २४ घंटे के भीतर ही बैकफुट पर चले गए. उन्होंने सफाई दी है कि उन्होंने इस तरह का कोई बयान नहीं दिया. आज़म ने सारा  ठीकरा मीडिया के सिर फोड दिया. उन्होंने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि जो खबरें प्रकाशित हुई हैं उनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है. माना जा रहा है कि अफसरों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया के मद्देनज़र आज़म ने अपना बयान वापस लिया है.”

मैं इन सभी समाचारपत्रों में छपी इन खबरों की प्रति इस पत्र के साथ संलग्न कर प्रेषित कर रही हूँ.

उपरोक्त तथ्यों के अवलोकन से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश शासन के एक जिम्मेदार और वरिष्ठ मंत्री ने अपना आधिकारिक बयान दिया है कि उन्होंने अफसरों के लिए यह कहा ही नहीं कि वे डंडे की भाषा समझते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अख़बारों में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हुए छपी खबरों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है और ये खबरें भ्रामक हैं. उनके द्वारा यहाँ तक कहा गया है कि ऐसी भ्रामक खबरों से उनकी और प्रदेश सरकार की छवि खराब करने की साजिश रची जा रही है.  अमर उजाला के अनुसार “आज़म ने सारा  ठीकरा मीडिया के सिर फोड दिया.”

आप सह्मत होंगे कि विभिन्न समाचारपत्रों में इस तरह की खबरें छपने और इसके बाद एक वरिष्ठ और जिम्मेदार मंत्री द्वारा इन खबरों को गलत ठहराना तथा यह कहना कि इन खबरों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है और ये खबरें भ्रामक हैं जिनसे उनकी और प्रदेश सरकार की छवि खराब करने की साजिश रची जा रही है, अपने आप में बहुत गंभीर बात है. स्पष्ट है कि या कि इन सभी समाचारपत्र में गलत खबरें छपी थीं या फिर श्री आज़म खां ने बाद में गलत बयान दिया.

यदि श्री आज़म खां का बाद का बयान सही है तो यह निश्चित रूप से पूरी मीडिया और विशेषकर ऊपर अंकित समाचारपत्रों के लिए बहुत ही गंभीर मामला है और इससे मीडिया की विश्वसनीयता तो निश्चित रूप से धक्का लगेगा. यदि मीडिया में पहले प्रकाशित खबरें सही हैं तो स्वतः ही श्री आज़म खां के उस खंडन का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा और यह उनकी एक व्यर्थ कोशिश मानी जायेगी जैसा प्रायः कई राजनेताओं द्वारा अपनी कही गयी बात का बाद में खंडन करने की चर्चाएँ होती रहती हैं.

उपरोक्त तथ्यों के दृष्टिगत मैं डॉ नूतन ठाकुर, कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरम, लखनऊ यह शिकायती पत्र प्रेषित करते हुए आपसे निम्न निवेदन करती हूँ-

कृपया इस पूरे प्रकरण की अपने स्तर से तत्काल वृहत जांच करने की कृपा करें कि श्री आज़म खां द्वारा समाजवादी पार्टी के पार्टी मुख्यालय, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में दिनांक 30/01/2013 को कथित रूप से दिये गए बयान जिसके सम्बन्ध में दिनांक 31/01/2013 के दैनिक हिंदुस्तान- लखनऊ संस्करण में “डंडे की भाषा समझते हैं अफसर- आज़म”, दैनिक जागरण- लखनऊ संस्करण में “डंडे की भाषा समझते हैं अधिकारी- आज़म”, अमर उजाला, लखनऊ संस्करण में “नाकारा अफसरों के खिलाफ मुलायम-आज़म के तेवर तल्ख़, डंडे के आदी हो गए हैं सूबे के अफसर”, हिंदुस्तान टाइम्स के “Do a sting on officials: Khan to partymen”, द इंडियन एक्सप्रेस के “As Azam urges Mulayam to crack the whip on bureaucrats, later says transfers soon” तथा इसी प्रकार संभवतः कई अन्य समाचारपत्रों में प्रकाशित खबर जिसमे श्री आज़म खां द्वारा दिये कथित विवादास्पद बयान प्रमुखता से छपे हैं, सही हैं अथवा नहीं.

स्पष्ट है कि इस जांच से यह बात साफ़ हो जायेगी कि अगले ही दिन श्री आज़म खां द्वारा अपने बयान के माध्यम से इन खबरों को गलत बताने, ये खबरें भ्रामक होने और ऐसी भ्रामक खबरों से उनकी और प्रदेश सरकार की छवि खराब करने की साजिश की बात कितनी सही अथवा गलत है.

मैं पुनः निवेदन करुँगी कि ये गंभीर प्रकरण हैं और इनमे आपके व्यक्तिगत रूप से ध्यान देने और तत्काल जांच किये जाने की जरूरत है क्योंकि श्री आज़म खां के आधिकारिक बयान द्वारा मीडिया की छपी खबरों को भ्रामक, द्वेषपूर्ण और साजिशन बताए जाने से पूरी मीडिया की स्थिति असहज हुई है और इस मामले में मीडिया की गरिमा और विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखे जाने हेतु सत्यता सबों के सामने लाया जाना नितांत आवश्यक हो गया है .

पत्र संख्या- NRF/AK/Press/01
दिनांक-01/02/2013
(डॉ नूतन ठाकुर )
कन्वेनर,
नेशनल आरटीआई फोरम,
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
094155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

वैसे तो इस देश में जहाँ अधिकाँश चीजें जाति से ही तय होती है,ऐसे में अपने परिचित क्या,राह चलते किसी भी व्यक्ति की जाति जान लेना बेहद आसान काम है लेकिन उतना ही मुश्किल है किसी प्रोग्रेसिव की जान लेना..वो बताते तो हैं और बरतते भी हैं,बस अपने को उस नॉक पॉइंट को पकड़ना आना चाहिये..और तब आप जो उनकी जाति जानेंगे वो सामाजिक रूप से तो आपके किसी काम का नहीं होगा लेकिन आपकी समझदारी बढ़ाने के बहुत काम आयेगा..आपको क्या लगता है, राजदीप का शुक्रिया अपनी जाति सारस्वत ब्राह्मण बताने पर अदा किया है?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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मौलाना आजाद की जयंती पर मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा पुरानी स्टोरी गरम करके परोसने के मायने

Vineet Kumar : आज यानी 11 नवम्बर को मौलादा अबुल कलाम आजाद की जयंती है. इस मौके पर मेनस्ट्रीम मीडिया ने तो कोई स्टोरी की और न ही इसे खास महत्व दिया. इसके ठीक उलट अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उनके ना से जो लाइब्रेरी है, उससे जुड़ी दो साल पुरानी बासी स्टोरी गरम करके हम दर्शकों के आगे न्यूज चैनलों ने परोस दिया. विश्वविद्यालय के दो साल पहले के एक समारोह में दिए गए बयान को शामिल करते हुए ये बताया गया कि इस लाइब्रेरी में लड़कियों की सदस्यता दिए जाने की मनाही है. हालांकि वीसी साहब ने जिस अंदाज में इसके पीछे वाहियात तर्क दिए हैं, उसे सुनकर कोई भी अपना सिर पीट लेगा. लेकिन क्या ठीक मौलाना आजाद की जयंती के मौके पर इस स्टोरी को गरम करके परोसना मेनस्ट्रीम मीडिया की रोचमर्रा की रिपोर्टिंग और कार्यक्रम का हिस्सा है या फिर अच्छे दिनवाली सरकार की उस रणनीति की ही एक्सटेंशन है जिसमे बरक्स की राजनीति अपने चरम पर है. देश को एक ऐसा प्रधानसेवक मिल गया है जो कपड़ों का नहीं, इतिहास का दर्जी है. उसकी कलाकारी उस दर्जी के रूप में है कि वो भले ही पाजामी तक सिलने न जानता हो लेकिन दुनियाभर के ब्रांड की ट्राउजर की आल्टरेशन कर सकता है. वो एक को दूसरे के बरक्स खड़ी करके उसे अपनी सुविधानुसार छोटा कर सकता है. मेनस्ट्रीम मीडिया की ट्रेंनिंग कहीं इस कलाकारी से प्रेरित तो नहीं है?

मीडिया के पास इस बात का तर्क हो सकता है कि ऐसे मौके पर अगर मौलादा आजाद के नाम की लाइब्रेरी का सूरत-ए-हाल लिया जाता है तो इसमें बुराई क्या है ? तब तो उन्हें सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर पिछले दिनों जब देश ने एकता दिवस मनाया तो मेनस्ट्रीम मीडिया को ये बात प्रमुखता से शामिल की जानी चाहिए थी कि जो शख्स आकाशवाणी से मिराशियों को इस बिना पर गाने से रोक दिए जाने के आदेश देता है कि इससे समाज पर बुरा असर पड़ेगा, आखिर उसके नाम पर एकता दिवस कैसे मनाया जा सकता है ? मीडिया इतिहास और वर्तमान के तार जोड़ने में अगर इतना ही माहिर है तो फिर उसके तार एक के लिए जुड़कर राग मालकोश क्यों फूटते हैं और दूसरे के लिए कर्कश क्या पूरी तरह तार ही टूट जाते हैं.

मेरी ही एफबी स्टेटस पर टिप्पणी करते हुए( Animesh Mukharje) ने हमें ध्यान दिलाया है कि एएमयू के वीसी के बयान और लाइब्रेरी में लड़की-छात्र के साथ भेदभाव मामले को लेकर हंगामा मचा हुआ है, इस पर निधि कुलपति ने बहुत पहले स्टोरी की थी लेकिन किसी ने इसे सीरियली नहीं लिया.. अनिमेश एक तरह से बता रहे हैं कि हम दर्शकों की यादाश्त कई बार चैनलों से ज्यादा होती है.

Vineet Kumar : दो साल बाद मीडिया ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी के बयान को जिस तरह यूट्यूब से खोदकर निकाला है, ये उस बयान को ऐसे दौर में इस्तेमाल करने की कोशिश है जिससे पूरे देश को ये संदेश दिया जा सके कि देखो मुसलमानों के नाम का ये मशहूर विश्वविद्यालय जिस पर खामखां आप गर्व करते रहे, लड़कियों को लेकर क्या रवैया रखता है ? नहीं तो वीसी साहब के इस बयान पर आज से दो साल पहले जब सभागार में तालियां पिटी थी, उस वक्त मीडिया क्या सुंदरकांड का पाठ कर रहा था ? तब यूपीए की सरकार थी और इस पर ज्यादा बात करने का मतलब था- सेकुलर राजनीति पर चोट करना लेकिन अब ? बाकी ऐसी बातें क्या मुस्लिम क्या हिन्दू संस्थान, कुढ़मगजी क्या जाति और संप्रदाय देखकर पनपती है?

Vineet Kumar : देश के हिन्दू शैक्षणिक संस्थानों में सब मामला ठीक है न ? मतलब वहां तो लड़कियों को लेकर कोई भेदभाव नहीं है कि हवन-पूजन स्थल पर रजस्वला( पीरियड्स) के दौरान यहां गमन करना मना है..इसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी के अंग्रेजी में दिए गए बयान की बायनरी मत समझ लीजिएगा, बस ये है कि हमें इन संस्थानों को लिंग-भेद रहित संस्थान करार देने की बेचैनी है.

Vineet Kumar : आपको निजी संस्थान स्वर्ण मुकुट से नवाजेंगे एमयू के वीसी साहब… आप देश के किसी भी निजी शिक्षण संस्थान चाहे वो मेडिकल, इंजीनियरिंग, मीडिया, एमबीए,बीएड या सामान्य कोर्स के कॉलेज, यूनिवर्सिटी हों, के विज्ञापन, होर्डिंग्स, पोस्टर पर एक नजर मार लें.. आप पाएंगे कि लैब में मेंढ़क का चीरा लड़की लगा रही है, ताम्रपत्र की तरह एक्सेल सीट लड़की फैलाकर आंख गड़ाए हुई है, स्केल-फीते से वो नाप-जोख का काम कर रही है.वही कैमरे से शूट कर रही है, उसी के हाथ में चैनल की माइक है. कुछ संस्थानों में तो कोएड होने के बावजूद सिरे से लड़के ऐसे गायब होते हैं कि एकबारगी तो आपको “सिर्फ लड़कियों के लिए” होने का भ्रम पैदा हो जाए…सवाल है, ये सब किसलिए और किसके लिए ? स्वाभाविक है संस्थान की ब्रांड पोजिशनिंग इस तरह से करने के लिए कि लड़के एडमिशन लेकर चट न जाएं. अंडरटोन यही होती है कि यहां वो खुलापन है, उस दोस्ती की गुंजाईश है जिसकी उम्मीद में आप कॉलेज-संस्थान जाते हो..फर्क सिर्फ इतना है कि सलून और जिम अलग से यूनिसेक्स लिख देते हैं और ये इसके लिए कोएड या सहशिक्षा शब्द का प्रयोग करते हैं.. ग्लैमरस बनाने के लिए और दूसरी तरफ लगे हाथ लड़कियों को भी ये भी बताने के लिए जहां पहले से आपकी इतनी सीनियर्स और दीदीयां पढ़ती आयीं हैं, वहां आप बिल्कुल सुरक्षित हो. गार्जियन को ये कन्विंस करने के लिए कि जो संस्थान लड़कियों को ये सब करने की छूट दे रहा है वो भला ऐेंवे टाइप का संस्थान कैसे हो सकता है ? कुल मिलाकर इन निजी संस्थान को बाजार की गहरी समझ है. उन्हें पता है कि छात्रनुमा ग्राहक सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों से किस बात का मारा है, किस बात से चट चुका है और किस चीज पर लट्टू होता है ? लड़कियों की तस्वीरें थोक में लगाने के पीछे उनकी ये बिजनेस स्ट्रैटजी काम करती है. वो ऐसा करके एक ही साथ बाजार को भी साध लेता है, उस तथाकथित प्रोग्रेसिव समाज को भी जिसे और बंदिशें नहीं चाहिए और सार्वजनिक संस्थानों का बाप बनकर भी खड़ा हो जाता है. नहीं तो इन तस्वीरों के पीछे जाकर देखिए, क्या आप दावा कर सकते हैं कि इन निजी संस्थानों में लड़कियों के साथ किसी तरह के भेदभाव नहीं किए जाते, शोषण नहीं होता. इधर सार्वजनिक संस्थान, ताजा मामला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के उस बेहूदा बयान और रवैये को ही लें जिसे पिछले दो साल से मीडिया अंडे की तरह सेवता रहा और अब यूटीवी की खान से खोदकर लाया है- लड़कियों को लेकर बिल्कुल उलट रवैया..उसके लिए कम से कम जगह..एक तरह से अघोषित रुप से ये कहने की कोशिश-यहां लड़कियां न ही आएं तो अच्छा..अब देखिए इसकी मीडिया में आलोचना..जमकर, धुंआधार..और हो भी क्यों न..एक तो महावाहियात बात और दूसरा कि हर तीसरे चैनल का प्रायोजक अमेटी इन्टरनेशनल, मानव रचना, गलगोटिया जैसे निजी संस्थान हों..ऐसे कुलपति तो उनके सपूत बनकर काम कर रहे हैं. लेकिन गंभीरता से सोचें तो क्या ये अपने आप में सवाल नहीं है कि जब निजी संस्थान अपने बाजार से रग-रग वाकिफ है तो क्या सार्वजनिक संस्थानों को अपने समाज को इसका आधा भी वाकिफ नहीं होना चाहिए ? कुलपति का ये बयान ये बताने के लिए काफी है कि वो न तो अपने इस बदलते समाज को समझ रहे हैं, न समाज की जरूरत को और लड़कियों के शिक्षित होने के महत्व..खैर, इसे तो रहने ही दीजिए..लाइब्रेरी में वैसे ही पहले से जानेवालों की संख्या तेजी से घटी है, वो जल्द ही किताबों की कब्रगाह बनकर रह जाए, आप जैसे महाशय देते रहिए ऐसे बयान.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Samar Anarya : कई तथ्य गड़बड़ हो गए हैं विनीत. जैसे कि यह 2 साल पुराना बयान नहीं बल्कि परसों का है. बाकी यह रहे.

1. यह मामला मीडिया ने किसी साजिश में नहीं उछाला है. वीसी साहब का एएमयू छात्रसंघ के उद्घाटन के वक्त अपना बयान है. यह बयान उन्होंने वीमेंस कॉलेज छात्रसंघ की माँग के जवाब में दिया है, और कॉलेज की प्रिंसिपल बयान/फैसले के समर्थन में हैं.

2. वीसी साहब ने कहा है कि लड़कियाँ आयीं तो लाइब्रेरी में चार गुना ज्यादा लड़के आएंगे, जगह नहीं बचेगी। यह वह नुक्ता है जिसको सारे ‘सेकुलर’ भूले बैठे हैं. इस बयान की अपनी मिसाजाइनी, औरतों से नफ़रत, पर उनका कोई ध्यान नहीं है.

3. तीसरा तर्क कि मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में पोस्टग्रेजुएट (परास्नातक) लडकियों को पढ़ने की इजाजत है इसीलिए यह मीडिया साजिश है. इस बयान का नुक्ता यह है कि इसी लाइब्रेरी में अंडरग्रेजुएट लड़कों को भी पढ़ने की इजाजत है. जगह नहीं है तो किसी के लिए न होगी, लड़कों के लिए है लड़कियों के लिए नहीं? इस पर सोचने का वक़्त कट्टर सेकुलरों के पास नहीं है. (यह बात पता न हो यह मानना जरा मुश्किल है).

4. वीमेंस कॉलेज छात्रसंघ की सदर गुलफिज़ां खान ने कहा था कि जगह की दिक्कत हो तो किताबें इश्यू की जायें वह इस पर भी तैयार हैं, यह मसला भी बहस से खारिज है. तमाम लोग दूरी का तर्क दे रहे हैं, वीमेंस कैम्पस लाइब्रेरी से 3 किलोमीटर दूर है, वहाँ तक आने में लड़कियों को दिक्कत होगी। पर फिर केवल अंडरग्रेजुएट लड़कियों को? पोस्टग्रेजुएट लड़कियाँ कैसे पँहुच जाती हैं?

5. एक और तर्क है कि यह कैम्पस के भीतर के एक तबके की साजिश है. दिक्कत यह कि यह तर्क बहुत पुराना है. एक लड़की का दुपट्टा खींचने के आरोपों के बीच जेएनयू तक में हुई तीखी लड़ाइयों के दौर से दिया जा रहा तर्क। तब के जनरल सेक्रेटरी ने बाकायदा बयान दिया था कि दुपट्टा खींचा भी गया हो तो दुपट्टा खींचना कोई सेक्सुअल हरैसमेंट नहीं है. उस दौर में जिन कुछ एएमयू वालों से हाथापाई तक की नौबत आ गयी थी, लोगों ने बड़ी मुश्किल से अलग किया था वह अब अच्छे दोस्त हैं. जैसे Shadan Khan, Khalid Sharfuddin… इनसे भी इस नुक्ते की दरयाफ़्त की जा सकती है. इसकी भी कि एएमयू को बदनाम करने की साजिश वाला तर्क भी तभी से चला आ रहा है.
6. अंत में यह कि जनाब दुनिया के किसी ठीक ठीक शहर में अलीग बोल देने पर तमाम आँखों में चमक भर देने वाला एएमयू किसी इमाम बुखारी का इस्लाम या किसी तोगड़िया का हिन्दू धर्म नहीं है जो किसी वीसी की मर्दवादी सोच के विरोध से, उसकी मुखालफत से खतरे में पड़ जाए.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.

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