उर्दू अख़बारों का फर्ज़ीवाड़ा

डीएवीपी में अपने अख़बार को इम्पैनल कराने के लिए उर्दू अख़बार वाले तबियत से झूठ का सहारा लेते हैं

डीएवीपी में फर्ज़ीवाड़ा करने वालों पर शिकंजा कैसे जाने की ख़बर से बहुत खलबली है. काग़ज़ों पर चलने वाले अख़बारों और अपने समाचारपत्र का सर्कुलेशन दसों हज़ार में बताने वालों में बैचेनी है. अगर ईमानदारी से कार्रवाई हुई तो दर्जनों अख़बारी घपलेबाज़ों को रिकवरी के नाम पर अपने मकान बेचने पड़ जायेंगे. वेसे तो फर्ज़ीवाड़ा करके सरकारी विज्ञापन का पैसा हड़पने में सभी भाषाओँ के अख़बारों का हिस्सा है लेकिन इसमें उर्दू अख़बार किसी से काम नहीं हैं.

डीएवीपी में अपने अख़बार को इम्पैनल कराने के लिए उर्दू अख़बार वाले तबियत से झूठ का सहारा लेते हैं, आपको जान कर हैरत होगी कि अकेले दिल्ली में डीएवीपी करा चुके उर्दू अख़बारों की संख्या 129 है. इनमे से हर एक अख़बार ने अपना सर्कुलेशन 50 से 70 हज़ार तक लिखवाया हुआ है. अगर इनको जोड़ दिया जाये तो दिल्ली में उर्दू अख़बारों की रोज़ाना 65 लाख प्रतियां छप रही हैं. अब अगर हक़ीक़त देखें तो दिल्ली में किसी भी अख़बार वाले की दूकान पर वही गिनती के 5-6 अख़बार होते हैं.

इन पांच छह में से भी किसी भी अख़बार का सर्कुलेशन पांच हज़ार से ज़्यादा नहीं है. ये पांच हज़ार भी सिर्फ दो ही अख़बारों का सर्कुलेशन है वरना बाकी का तो सर्कुलेशन पांच सौ से एक हज़ार के बीच है. यानी 129 में से 120 अख़बार ऐसे हैं जो सिर्फ काग़ज़ों पर छप रहे हैं. इनके मालिक कुछ ले दे कर डीएवीपी करा लेते हैं और सिर्फ जमा करने करने के लिए फाइल कॉपी छपवाते हैं. जो काग़ज़ों पर नहीं हैं और छप रहे हैं वो अपना सर्कुलेशन कई सौ गुना बता कर माल कूट रहे हैं.

ये सारा मामला भ्रष्ट अफसरों की मिली भगत के बिना संभव नहीं है. अगर सिर्फ दिल्ली में इतना बड़ा घपला है तो देश भर में क्या हो रहा होगा समझा जा सकता है. मज़े की बात ये है कि अगर इन अख़बारों के खिलाफ कार्रवाई हुई तो ये सब चीख चीख कर कहेंगे कि उर्दू पर हमला हो रहा है.

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‘तहफ़्फ़ुज़े उर्दू’ का स्लोगन जो आप लगा रहे, मुझे पता है इसके लिए भी मोटा फंड जारी होता है

भाषा (ज़ुबान) की हैसियत मात्र एक माध्यम की होती है इससे अधिक कुछ नहीं। ये जो आप लोग उर्दू उर्दू और हिंदी हिंदी लगा रखे हैं ना, मुझे तनिक सा नहीं सुहाता है। आइए इस बात को दुसरे तरीके से समझते हैं।  आप को तो मालूम ही होगा कि तौरात, ज़बूर, इंजील और क़ुरआन मजीद विभिन्न भाषाओँ में उतरी हैं, और वो वेद भी एक अलग भाषा में है जिन्हें हिन्दू भाई ईश्वर की वाणी मानते हैं आखिर अल्लाह/ईश्वर ने किसी एक भाषा को आसमानी भाषा घोषित करके ये सभी किताबें उसी एक भाषा में नाज़िल क्यों नहीं की? हमेशा, हर दौर की सब से बड़ी और दूरगामी भाषा को ही अपना माध्यम क्यों बनाया ? इसलिए ना कि अल्लाह का उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपना संदेश पहुँचाना होता है न कि हमारी और आप की तरह किसी एक भाषा को मुक़द्दस (पवित्र) क़रार दे कर उसे अपनी मजबूरी बना लेना ! ध्यान रखिए, अधिक महत्त्व आप की बात और आप के सन्देश का होता है न कि उस माध्यम का जिससे आप अपना सन्देश पहुंचा रहे हैं। इसलिए कृपा करके “तहफ़्फ़ुज़े उर्दू” की राग अलापना बंद कीजिए, आप को किस ने रोका है अपनी तहज़ीब व सक़ाफ़त (संस्कृति) के साथ अपने दौर बड़े माध्यमों में शिफ्ट होने से?

याद रखिए कि अगर किसी देश की हुकूमत किसी भाषा को ठंडा करने की ठान ले तो हम और आप, आम लोग उसे नहीं बचा सकते। सत्ता पक्ष की भाषा ही हर युग की भाषा रही है। मगर क्या करेंगे, राजनीति आप को पसंद नहीं है, आप की नज़र में राजनीति करना गैरों का मौलिक अधिकार है, सत्ता से आप को एलर्जी हुए ज़माना बीत गया है, फिर भी आप चाहते हैं कि उर्दू का बोल बाला हो, उर्दू का इक़बाल बुलंद रहे ! आप के इस भोलेपन पर हज़ारों जानें क़ुर्बान ! आप की इन नेक इच्छाओं से तो ऐसा मालूम पड़ता है कि जब तक उर्दू ज़िंदा है तब तक आप भी ज़िंदा हैं, अगर उर्दू को कुछ हुआ तो उसी के साथ साथ आप भी अपनी जान क़ुर्बान कर देंगे ! हुज़ूर, आप के इस जज़्बे को मेरा सलाम।

अच्छा ये बताइए, आप मात्र उर्दू को ही मुसलमान बना कर उसी पर संतोष करके बैठ क्यों गए ? क्या अन्य भाषाएँ मुसलमान बनने की हक़दार नहीं हैं? आप बैठे रहिए एक भाषा को मुसलमान बना कर, मैं तो अब हिंदी को भी मुसलमान बनाने का संकल्प कर चूका हूँ। ऐसे क्या हैरत से आँखें फाड़ कर पढ़ रहे हैं? ऐसा क्या कह दिया मैं ने? क्यों, उर्दू मुसलमान हो सकती है तो हिंदी क्यों नहीं हो सकती मुसलमान? आप क्यों हिंदी के हिन्दू बने रहने पर अडिग हैं और खुश भी नज़र आ रहे हैं, क्यों ? इस्लाम के प्रचार का आप का दायित्व केवल उर्दू तक ही सीमित था क्या? आखिर आप क्यों नहीं चाहते की हिंदी भी मुसलमान हो जाए?

और हाँ, मुझ पर ये बेहूदा कटाक्ष मत कीजिएगा कि उर्दू का हो कर हिंदी को बढ़ावा दे रहा हूँ, बड़े आए है उर्दू के मुहाफ़िज़ बनने… आप कीजिए उर्दू का तहफ़्फ़ुज़ (रक्षा)…. उर्दू ने आप को इतना कुछ दिया है…. आप को प्रोफेसर, एडिटर, चैयरमैन….. क्या क्या न बनाया, आप नहीं करेंगे उर्दू की रक्षा तो फिर और कौन करेगा… लेकिन ढंग से कीजिए जो आप नहीं कर रहे हैं। मुझे मालूम है यह जो “तहफ़्फ़ुज़े उर्दू” का स्लोगन आप लगा रहे हैं ना, ये स्लोगन भी आप की जेब का एक साधन मात्र है, इसके लिए भी मोटा फंड जारी होता है, फिर आप नहीं लगाएंगे “तहफ़्फ़ुज़े उर्दू” का नारा तो और कौन लगाएगा? आप कीजिये अपने साधन और माध्यम की साधना और पूजा अर्चना, हम से न होगा, हम जैसे आम लोगों से ऐसे किसी स्लोगन की उम्मीद न ही करें तो बेहतर होगा। हम जैसे आम लोगों को क्या दिया है उर्दू या हिंदी ने ? 8-10 हज़ार की नौकरी! यही ना? उस पर भी महीने भर जानवरों की तरह काम करने के बाद वो 8-10 हज़ार इस भाव से मिलते हैं मानो तनख्वाह नहीं क़र्ज़ या खैरात मिल रहे हों!

इस आठ दस हज़ार की खैरात में ज़िन्दगी की ज़रूरतों और इच्छाओं से समझौता करते करते अब तो अब हमारे पेट की अंतड़ियां भी सिकुड़ने लगी हैं। तहफ़्फ़ुज़े उर्दू का नारा अब हम से न बुलंद हो सकेगा। अब हम से और न ढोया जाएगा उर्दू से वफादारी का ये बोझ। ये बोझ ढोते ढोते अब हमारी कमर टूटने लगी है, हमारे आसाब (तंत्रिका) जवाब देने लगे हैं, अब अगर हम ने इस बोझ को न उतार फेंका तो हमारा अंतिम संस्कार होना तय है। मुझे अपने वजूद (अस्तित्व) की रक्षा करने दीजिए…… जी हाँ, अपने आर्थिक वजूद की, अपने वैचारिक और शैक्षिक वजूद की…. अपने धार्मिक वजूद की। मुझे अपना वजूद प्यारा है, मैं अपने वजूद की रक्षा के लिए किसी भी भाषा को अपना साधन बना सकता हु। मैं अपने वजूद को किसी माध्यम या किसी भाषा का अविभाज्य अंग (लाज़िम व मल्ज़ूम) नहीं बनने दूंगा कि अगर सत्ता पक्ष या कोई और शक्ति उस माध्यम को ख़त्म करने पर तुल जाए तो मेरा वजूद भी खतरे में पड़ जाए!

Imamuddin Alig
Mob No. 8744875157
Email : imamuddinalig@gmail.com

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विवाद के बाद बंद हुए ‘उर्दू टाइम्स मुंबई’ अखबार को ‘मुम्बई उर्दू न्यूज़’ नाम से लाने की तैयारी!

मुम्बई । उर्दू टाइम्स मुंबई का पिछले 3 महीने से प्रकाशन बन्द हो गया है। इसकी वजह चाचा भतीजे के बीच पारिवारिक सम्पत्ति का बटवारा बताया जा रहा है। सईद अहमद और इम्तेयाज के बीच चल रहे विवाद में मुम्बई का एक पुराना उर्दू अखबार लगभग 3 महीना पहले से पूरी तरह बन्द हो गया है। अभी तक दोनों फरीक किसी नतीजे पर नही पहुँचे है। अब उर्दू टाइम्स के पार्टनर सईद अहमद के भतीजे इम्तेयाज मुम्बई उर्दू न्यूज़ नामक अखबार लाने की जुगत में हैं।

कहा तो यह भी जा रहा है कि इम्तेयाज ने उर्दू टाइम्स के नाम से मिलता जुलता नाम रजिस्टर्ड कराने की पूरी कोशिश किया मगर नाकामी हाथ लगी जिसके बाद वह 2010 में साप्ताहिक के तौर पर रजिस्टर्ड मुम्बई उर्दू न्यूज़ नामक अखबार को दैनिक कर उर्दू टाइम्स की मार्किट पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहते है। मगर अभी तक रजिस्ट्रार आफ न्यूज़ पेपर आफ इण्डिया की वेबसाइट पर मुम्बई उर्दू न्यूज़ साप्ताहिक के तौर पर ही दर्ज है।

सूत्रों की मानें तो उर्दू टाइम्स के पुराना स्टाफ इम्तेयाज अहमद के साथ है इसी बल पर इम्तेयाज उर्दू टाइम्स की मार्केट पर कब्ज़ा ज़माने का सपना देख रहे हैं। लगभग 3 महीने से मुम्बई की मार्किट से गायब अखबार को पाठक पचा पाएंगे, यह अब भी एक बड़ा सवाल है। जहां तक उर्दू पाठकों की बात है तो उर्दू टाइम्स विवाद का सबसे बड़ा फायदा जागरण समूह के रोज़नामा इंक़लाब को मिला है और उसके ज़्यादातर पाठको ने इंक़लाब को अपना लिया, इसलिए इम्तेयाज के लिए आज के समय में यह नया तजरबा कितना कारगर साबित होगा, वह अखबार के मार्केट में आने के बाद साफ़ हो पायेगा मगर इतना तो है मुंबई उर्दू न्यूज़ का जो नाम है उसको उर्दू टाइम्स की तरह हूबहू नकल किया गया है।

सूत्रों के अनुसार इस अखबार का विमोचन देश के किसी बड़े मुस्लिम राजनेता से कराने की तैयारी चल रही है। मगर उर्दू टाइम्स का इतिहास और अतीत मुम्बई के पाठक वर्ग से लेकर हर किसी की ज़ुबान पर है। ऐसे में इस अखबार के लिए मुम्बई में पैठ बनाना आसान नहीं होगा। वैसे इस पारवारिक झड़गे की मुख्य वजह पेड न्यूज़ से मिले माल और एक पेज पर दो दलों को हराना जिताना बताया जा रहा है। इम्तेयाज अहमद इन सब मुद्दों पर महज़ यह कहकर निकल गए कि जल्द ही सब कुछ साफ़ हो जाएगा। फिलहाल मुम्बई उर्दू न्यूज़ का प्रचार पम्पलेट के ज़रिये तेज़ी से किया जा रहा है। वैसे उर्दू टाइम्स ने भी मुम्बई विश्व प्रहरी टाइम्स के नाम से एक तजरबा 12 साल पहले किया था मगर नाकामी हाथ लगी। अब देखना यह होगा कि उर्दू नाम से यह प्रयोग कितना सफल होता है।

मुंबई से दानिश आजमी की रिपोर्ट. संपर्क: danishazmireporter@gmail.com

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ज़्यादातर उर्दू अख़बारों की माली हालत

‘सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं, मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं’…. मशहूर शायर हसन काज़मी साहब का यह शेअर देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए काफ़ी है. हालांकि इस मुल्क में उर्दू के कई अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को अमूमन ईद-बक़रीद, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतें अख़बारों के लिए परेशानी का सबब बनी रहती हैं. 

उर्दू अख़बारों का इतिहास काफ़ी पुराना है. सबसे पहले 1785 में इंग्लिश साप्ताहिक कलकत्ता गैज़ेट में फ़ारसी में एक कॊलम शुरू किया गया था, जिसमें दिल्ली और लाल क़िले की ख़बरें होती थीं. उर्दू का पहला अख़बार जाम-ए-जहां-नमाह 27 मार्च 1822 को कोलकाता में शुरू हुआ था. इस साप्ताहिक अख़बार के संपादक मुंशी सदासुख मिर्ज़ापुरी थे. उर्दू मीडिया ने जंगे-आज़ादी में अहम किरदार निभाया. इसकी वजह से ब्रिटिश सरकार ने 1857 पर उर्दू प्रेस पर पाबंदी लगा दी. 1858 में कोलकाता से ही उर्दू गाइड नाम से उर्दू का पहला दैनिक अख़बार शुरू हुआ. इसके संपादक मौलवी कबीर-उद्दीर अहमद ख़ान थे. 1822 के आख़िर तक कोलकाता से फ़ारसी के दो अख़बार शाया होते थे. फ़ारसी साप्ताहिक मीरत-उल-अख़बार के संपादक राजा राममोहन राय थे. 1823 में मनीराम ठाकुर ने शम्सुल अख़बार शुरू किया, जो सिर्फ़ पांच साल ही ज़िन्दा रह पाया. 

ब्रिटिश शासनकाल में हिन्दुस्तानी भाषाओं के अख़बार की अनदेखी की गई. 1835 में हिन्दुस्तानी भाषाओं के सिर्फ़ छह अख़बार ही शाया होते थे, जो 1850 में 28 और 1878 में 97 हो गए. इनकी प्रसार संख्या क़रीब डेढ़ लाख थी. हिन्दुस्तानी अख़बारों की अधिकारिक जानकारी 1848 से मिलती है, जब 26 अख़बार शाया होते थे. इनमें 19 उर्दू में, तीन फ़ारसी में, तीन हिन्दी में और एक बंगला भाषा का अख़बार शामिल था. उर्दू अख़बारों ने 1857 की जंगे-आज़ादी में अहम किरदार अदा किया. इसकी वजह से उर्दू अख़बारों को नियंत्रित करने के लिए जून 1857 में गवर्नर जनरल द्वारा एक एक्ट लाया गया. इसका मक़सद उर्दू अख़बारों के प्रसार को रोकना था. इस एक्ट के मुताबिक़ प्रेस के लिए सरकार से लाइसेंस लेना लाज़िमी था. इस एक्ट की आड़ में संपादकों और प्रकाशकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज कर उन्हें तंग किया गया. फ़ारसी अख़बार सुल्तान-उल-हक़ को कोलकाता के सुप्रीम कोर्ट में तमाम इल्ज़ामात का सामना करना पड़ा और उसका लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया. इसी तरह गुलशन-ए-नौबहार को बंद कर दिया गया और रायज़ुल अख़बार के साथ भी ऐसा ही किया गया. फ़ारसी साप्ताहिक मुर्तज़ई के संपादक को पेशावर जेल भेज दिया गया. यह उर्दू अख़बारों के लिए एक बुरा दौर था. 1858 में 35 उर्दू अख़बार शाया हो रहे थे. 1857 की जंगे-आज़ादी के बाद उर्दू अख़बार फिर से लोकप्रिय होने लगे, जिनमें लखनऊ का अवध अख़बार और अवध पंच, अलीगढ़ का साइंटिफ़िक, ग़ज़ट और तहज़ीब-उल-अख़्लाक़, दिल्ली का अकमालुल, लाहौर का पंजाब अख़बार, मद्रास का शम्सुल अख़बार, बॊम्बे का काशफ़ुल, बंगलौर का क़ासिम-उल-अख़बार और हैदराबाद का असीफ़ुल अख़बार शामिल है. इनमें से लखनऊ का अवध अख़बार लंबे अरसे तक शाया हुआ. इस दौरान 18 नई पत्रिकाएं भी शुरू हुईं, जिनमें 11 उर्दू के रिसाले शामिल हैं. अलहिलाल ऐसा पहला उर्दू अख़बार था, जिसने तस्वीरों को भी प्रकाशित किया.

1873 तक उर्दू काफ़ी तादाद में उर्दू अख़बार और पत्रिकाएं शाया होने लगीं. सरकार ने भी अख़बारों की प्रतियां ख़रीदना शुरू कर दिया. उत्तर-पश्चिम प्रांत की सरकार ने 1876 में इस व्यवस्था को बंद कर दिया. इसके साथ ही कई अख़बार भी बंद हो गए. 1884-85 के दौरान उर्दू के 117 अख़बार शाया हो रहे थे. इनकी प्रसार संख्या भी अच्छी थी. 

1891 में 16,256 

1901 में 23,747      

1911 में 76,608 और 

1922 में 1,40,486 

भारतीय रिसर्च इंस्टीट्यूट नेशनल डॊक्यूमेंटेशन ऒन मास कम्युनिकेशन की एक रिपोर्ट में जीडी चंदन का कहना है कि देश के बंटवारे, संकीर्णता और सियासी पूर्वाग्रह की वजह से उर्दू अख़बारों को नुक़सान पहुंचा. बंटवारे के दौरान उर्दू जानने वाली एक बड़ी आबादी यहां से पलायन कर गई और नई पीढ़ी के बहुत कम लोग ही उर्दू जानते हैं. इसका सीध असर अख़बारों की प्रसार संख्या पर पड़ा. प्रदेश सरकारों ने उर्दू की तरक़्क़ी पर ध्यान नहीं दिया.

दरअसल, बांग्लोदश बनने के बाद उर्दू अख़बारों की तरक़्क़ी अचानक रुक गई. उर्दू अख़बारों को बंगाली सरकार से काफ़ी उम्मीदें थीं. यह बात सही है कि उर्दू अख़बार जनता की आवाज़ उठाते थे. उर्दू अख़बारों को सरकार से मदद मिलती थी. बाद में सरकार ने उर्दू अख़बारों में दिलचस्पी लेना कम कर दिया, जिसका सीधा असर अख़बारों की माली हालत पर पड़ा. उर्दू अख़बार सस्ते काग़ज़ पर छापे जाने लगे. अख़बारों का स्टाफ़ कम हो गया. इसकी वजह से पाठकों को कई अहम और ताज़ा ख़बरें नहीं मिल पाती थीं. नतीजतन, उर्दू के पाठक दूसरी भाषाओं के अख़बारों की तरफ़ जाने लगे. हालात ये हो गए कि कई अख़बार बंद होने की कगार पर पहुंच गए, जिनमें अख़बारे-मशरिक़, आज़ाद हिन्द, आबशार और साप्ताहिक नशेमन और ग़ाज़ी शामिल थे. आज भी उर्दू अख़बारों की हालत अच्छी नहीं है.

आज़ादी से पहले अंग्रेज़ों ने हिन्दुस्तानी भाषाओं को पनपने नहीं दिया और आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी के बढ़ते चलन की वजह से लोग अपनी भाषा से दूर हो रहे हैं. उर्दू अख़बारों की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है कि उर्दू अख़बारों को सरकारी मदद मिले और उनकी प्रसार संख्या बढ़ाई जाए. और इस सबके लिए उर्दू का प्रचार-प्रसार ज़रूरी है. हालांकि देश में उर्दू अकादमियों की कोई कमी नहीं है और उर्दू सिखाने के कई संस्थान भी हैं, जिनमें उर्दू अकादमी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जमीअत उलेमा-ए-हिन्द, अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू और क़ौमी काउंसिल बराए-फ़रोग़-ए-उर्दू शामिल हैं. मदरसों में तो शिक्षा का माध्यम ही उर्दू है. यह कहना ग़लत न होगा कि उर्दू महज़ मदरसों तक ही सिमटकर रह गई है. जब तक उर्दू को रोज़गार की भाषा नहीं बनाया जाएगा, तब तक इसकी तरक़्क़ी नहीं हो सकती. किसी भाषा को ज़िन्दा रखने का काम सरकार के साथ ही उस ज़बान के लोगों को भी है, जिनकी वो मातृभाषा है. इसलिए यह ज़रूरी है कि हम अपनी मातृभाषा को ज़िन्दा रखने के लिए आने इसके प्रचार-प्रसार पर ज़ोर दें. अपनी मातृभाषा के अख़बार या अन्य साहित्य पत्र-पत्रिकाएं ख़रीदें. ग़ौरतलब है कि 1991 की जनगणना के मुताबिक़ चार करोड़ 34 लाख 6 हज़ार 932 उर्दू भाषी लोग थे, जबकि इनकी वास्तविक संख्या 12 करोड़ बताई जाती है. उर्दू उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा बोली जाती है. इसके बाद बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक का स्थान आता है. यह जम्मू-कश्मीर की सरकारी भाषा है. 

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सरकार उर्दू के ज़रिये अपने पड़ौसी देशों के साथ बेहतर तालमेल क़ायम कर सकती है. भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं और उर्दू पड़ौसी देशों के साथ आपसी सद्भाव बढ़ाने में अहम किरदार निभा सकती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

लेखिका फ़िरदौस ख़ान से संपर्क : newsdesk.starnewsagency@gmail.com

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‘जश्न-ए-रेख्ता’ में होगा उर्दू का जश्न

नयी दिल्ली : यहां 14 मार्च से शुरू हो रहे दो दिन के समारोह ‘जश्न ए रेख्ता’ में उर्दू के बेहतरीन शायरों, अफसानानिगारों और फनकारों का जमावड़ा होने जा रहा है। उर्दू के इस जश्न में भारत, पाकिस्तान, अमेरिका और कनाडा से उर्दू के बेहतरीन शायर, अफसानानिगार, अदाकार और फनकार शिरकत करेंगे। जश्न में शिरकत करने वाली हस्तियों में इंतिजार हुसैन, जिया मोहिद्दीन, गोपीचंद नारंग, मुजफ्फर अली, निदा फाजली, जावेद अख्तर, रेखा भारद्वाज, रख्शंदा जलील, अशोक वाजपेयी और पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम उल्लेखनीय हैं । 

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