पीछा छुड़ाने के लिए नेशनल दुनिया के एडिटोरियल डाइरेक्‍टर बनाए गए आलोक मेहता

नेशनल दुनिया प्रबंधन ने इस समूह के एकलौते एडिशन के समूह संपादक आलोक मेहता को एडिटोरियल डाइरेक्‍टर बना दिया है. हालांकि उपरी तौर पर इसे आलोक मेहता का प्रमोशन के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है, जबकि अंदरखाने की बात यह है उनके तरीके से किनारे कर दिया गया है. इस पद पर करने के लिए कुछ खास बचा भी नहीं है. वैसे भी तमाम मीडिया समूहों में इस तरह की नीतियां पहले भी अपनाई जाती रही हैं. जब वरिष्‍ठों को प्रमोट करके किनारे किया जाता है.

इंडिया टुडे समूह ने इसी तरह से प्रभु चावला को प्रमोट कर दिया था तथा उनकी जगह एमजे अकबर को संपादक बना दिया था. प्रबंधन का इशारा समझते हुए प्रभु चावला ने इस्‍तीफा दे दिया और न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस से जुड़ गए. इसी तरह के तमाम प्रमोशन कई वरिष्‍ठ पत्रकारों ने झेले हैं. माना जा रहा है कि प्रबंधन ने आलोक मेहता को इशारा कर दिया है. अब यह देखना बाकी है कि आलोक मेहता खुद नेशनल दुनिया से चले जाते हैं या फिर एडिटोरियल डाइरेक्‍टर बनकर नेशनल दुनिया को अपनी सेवाएं देते हैं.

वैसे भी उनके नजदीकी लोग अब नेशनल दुनिया से अपना बोरिया बिस्‍तर समेटने लगे हैं. कुछ लोग अभी भी उम्‍मीद में हैं कि शायद उनकी पारी लंबी खिंच सकती है. वैसे भी प्रबंधन ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि वे अपने समूह का विस्‍तार करने जा रहे हैं. इसके लिए वे अलग-अलग संपादक भी नियुक्‍त करेंगे. यानी आलोक मेहता को अब यहां करने के लिए कुछ नहीं बचा है, सिवाय एडिटोरियल डाइरेक्‍टर के पद के. आलोक मेहता के कद और शख्सियत को देखते हुए माना जा रहा है कि जल्‍द ही वे नेशनल दुनिया से अलग अपनी नई दुनिया बसाएंगे.

एसएल चौधरी, अंकित माथुर, अजय कुमार, गोपाल शर्मा समेत कई ने दी रंगदारी

भड़ास4मीडिया को रंगदारी मिलने का सिलसिला लगातार जारी है. हजार रुपये रंगदारी देकर भड़ास पढ़ने और भड़ास को सपोर्ट करने के आह्वान का असर देश भर में देखने को मिल रहा है. चंडीगढ़ से गोपाल शर्मा ने हजार रुपये रंगदारी जमा कराई है तो गुड़गांव से अंकित माथुर समेत तीन लोगों ने रंगदारी भड़ास को दी है. बिहार के सहरसा से अजय कुमार ने हजार रुपये भड़ास के खाते में जमा कराए हैं. अभी अभी एसएल चौधरी ने सूचित किया है कि उन्होंने भड़ास के खाते में हजार रुपये जमा करा दिए हैं, रंगदारी के.

उपरोक्त नामों के अलावा भी ढेर सारे नाम हैं रंगदारी देने वाले साथियों के, जिन्हें यहां प्रकाशित नहीं कर पा रहा हूं क्योंकि रोजाना की आपाधापी में हजार रुपये देने वाले कई साथियों के नाम को याद नहीं रख पाता और नाम अगर याद रख पाता हं तो उसके बारे में भड़ास पर लिखना भूल जाता हूं कि फलाने फलाने ने इतने इतने पैसे दिए. हां, जब किसी ने मुझे सूचित किया है कि उन्होंने भड़ास के एकाउंट में इतने रुपये जमा करा दिए हैं तो मैंने उन्हें मेल या मोबाइल से शुक्रिया का संदेश जरूर भेजा है.

आर्थिक मदद देने वाले कई साथियों ने अपील की है कि उनका नाम किसी हाल में प्रकाशित नहीं किया जाए. ऐसे ही एक साथी नोएडा के हैं जो एक अखबार के संपादक हैं. उन्होंने पांच हजार रुपये भड़ास के एकाउंट में जमा करा के मुझे सप्रेम सूचित किया और साथ ही अनुरोध भी किया कि किसी हाल में उनका नाम प्रकाशित नहीं किया जाए.

भड़ास आर्थिक मदद या भड़ास रंगदारी या भड़ास रीडरशिप सब्सक्रिप्शन या भड़ास सदस्यता या भड़ास आजीवन सदस्यता या भड़ास फी या भड़ास एसोसिएशन जो भी नाम दे लें, के नाम पर भड़ास को पैसे देने वाले कई साथियों को भड़ास पर नाम प्रकाशित होने पर आपत्ति नहीं है लेकिन जब-तब संकट मेरे साथ हो जाता है कि मैं एक-एक का नाम अलग-अलग प्रकाशित करने के लिए अलग-अलग लिख पाने का मन नहीं बना पाता.  रंगदारी देने वालों की लिस्ट तैयार करने की जहां तक बात है तो इस काम के लिए दिन भर तैयार बैठे रहने जैसी स्थिति मेरे लिए संभव नहीं है.

पिछली बार जो पहली लिस्ट भड़ास रंगदारी देने वालों की प्रकाशित की मैंने, उसमें कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने सूचित तो कर दिया कि वे पैसे देना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने दिया नहीं. तो, अब मैंने तय किया है कि मदद देने वालों का नाम नोट करता जाऊंगा और एक दिन इकट्ठा सबके नाम प्रकाशित कर दूंगा, उसी अंदाज में जैसे कभी रेडियो पर गीतों के लिए फरमाइश के नाम पढ़े जाते थे… झुमरी तलैया से मुन्नी, रीतू, नीतू, संजय, साहिल…. 🙂

अराजकता, उदासी, व्यग्रता, मोहभंग, काम की मारामारी, फोन और मेल की रेलमपेल और इस सबके अलावा बचे थोड़े से वक्त में इत्मीनान से शराबखोरी  व मांस भक्षण के बीच आज इतना ही लिख कह पा रहा हूं कि एसएल चौधरी, अंकित माथुर, अजय कुमार, गोपाल शर्मा जैसे साथियों के साथ-साथ उन सभी साथियों का हृदय से आभारी हूं जो भड़ास को आर्थिक मदद देकर इसे लगातार जिंदा रखने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. मदद देने वाले अगर किसी साथी का नाम न लिख पाया हूं तो कृपया वो अन्यथा ना ले.

और, अगर किसी साथी को लगता है कि उसका भी नाम प्रकाशित होना चाहिए तो प्लीज नीचे कमेंट बाक्स में अपना नाम मोबाइल नंबर व भड़ास एकाउंट में जमा कराई गई रकम लिखकर पोस्ट कर दे, उसे जरूर अलग से प्रकाशित करेंगे. उम्मीद करता हूं कि हजार रुपये रंगदारी भड़ास को देने वालों की संख्या बढ़ेगी क्योंकि भड़ास से फेवर, उम्मीद, मदद तो बहुत लोग चाहते हैं लेकिन भड़ास को फेवर, उम्मीद, मदद गिने चुने लोग ही करते हैं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

‘अंत न होगा यशवंत का, यह खबरों में बना रहेगा’

प्रिय यशवंत, 'भड़ास' में तुम्हरी जेल डायरी पढ़ी. तुम्हारी हिम्मत भी देखी. बहुत कुछ लिखने का कोई मतलब नहीं. तुम्हारे लिए एक ग़ज़ल कही है लेकिन यह उन सबके लिए भी है जो सच की राह पर चलते हैं…

जो भी जितना खरा रहेगा
उससे शातिर डरा  रहेगा
सच बोलो चाहे मर जाओ
सच्चा हर दम डटा रहेगा
लाख कोई तोड़ेगा उसको
सच है तो फिर तना रहेगा
डरते है बुजदिल ही अक्सर
कायर तो बस मरा रहेगा
उठो, चलो हिम्मत ना हांरो
साथ तुम्हारा खुदा रहेगा
यह घमंड न कहलायेगा
सच का सर तो उठा  रहेगा
इक दिन मर जायेंगे झूठे
सच्चा लेकिन बचा रहेगा
अंत न होगा यशवंत का
यह खबरों मे बना रहेगा ..

-गिरीश पंकज

Girish Pankaj

girishpankaj1@gmail.com

समाचार प्‍लस के पत्रकार साहिल को सपा नेता ने दी जान से मारने की धमकी

: शिकायत के बाद भी पुलिस चुप : संत कबीरनगर से से खबर है कि समाचार प्‍लस चैनल के संवाददाता साहिल खान को सपा नेता ने हाथ-पैर तोड़वाने तथा जान से मारने की धमकी दी है. सपा नेता नगर पंचायत हरिहरपुर का चेयरमैन भी रह चुका है. साहिल खान अपने एक साथी पत्रकार के साथ सपा नेता व पूर्व चेयरमैन रवींद्र प्रताप उर्फ पप्‍पू शाही के कार्यकाल में लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए एक शादी घर के अचानक धराशाई हो जाने की घटना को कवरेज करने पहुंचे थे. तभी पप्‍पू शाही ने साहिल खान को फोन पर हाथ-पैर तोड़ने त‍था वापस बचकर न जाने की धमकी दी.

धमकी की घटना से हतप्रभ साहिल ने इसकी लिखित शिकायत पुलिस अधीक्षक से की. परन्‍तु उनकी शिकायत के बाद भी पुलिस ने कोई एक्‍शन नहीं लिया है क्‍योंकि मामला सत्‍ता पक्ष से जुड़ा हुआ है. रवींद्र प्रताप की धमकी के बाद से पत्रकारों में नाराजगी है. उनका कहना है कि धमकी देने वाले सपा नेता के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं हुई तो वे लोग आंदोलन का रास्‍त भी अख्तियार करने से भी पीछे नहीं हटेंगे.

साहिल खान ने इस पूरे घटना क्रम के बारे में बताया कि बीते 27 जनवरी को दोपहर 12 बजे मेरे सहयोगी पत्रकार शक्ति श्रीवास्तव उर्फ़ बाबुल, जो सामना टीवी स्थानीय चैनल के मालिक हैं, के मोबाइल पर संत कबीर नगर जिले के नगर पंचायत हरिहरपुर से फोन आया कि वार्ड नंबर 6 सवापार में लगभग 4 वर्ष पहले पूर्व चेयरमैन तथावर्तमान सभासद रवीन्द्र प्रताप उर्फ़ पप्पू शाही के कार्यकाल लाखों रुपये खर्च कर बनाया गया शादी घर सुबह छह बजे अचानक धराशायी हो गया है. हालांकि इसमें गनीमत यह रही कि इस बिल्डिंग में शादी विवाह का कोई कार्यक्रम नहीं था, अन्‍यथा बड़ी घटना हो सकती थी.

साहिल का कहना है कि सूचना मिलने के बाद वे लोग घटना स्‍थल पर पहुंच गए तथा इसका कवरेज करने लगे. इसके बाद मैंने अपने फोन से सपा नेता रवींद्र प्रताप के मोबाइल पर संपर्क किया तथा इतना पूछा कि ये शादी घर कब तथा कितनी लागत से बना था तो उन्‍होंने गुस्‍से में यह कहकर फोन काट दिया कि मुझे नहीं मालूम. उसके बाद मैं वापस लौटने लगा तो रवींद्र शाही ने अपने मोबाइल से फोन किया तथा गाली देते हुए कहा कि अभी तुमको घेरवाकर तुम्‍हारा हाथ-पैर तोड़वाता हूं. तुम यहां से बचकर वापस नहीं जा पाओगे.

साहिल ने बताया कि इसके बाद हम लोग किसी तरह वापस जिला मुख्‍यालय लौटे. इसके बाद मैंने इस घटना की लिखित शिकायत संतकबीर नगर के पुलिस अधीक्षक रामपाल को दिया. लेकिन अभी इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. क्‍योंकि वो सत्‍ता पक्ष के नेता हैं. जिस तरह सपा के शासन काल में पत्रकार तक को जान से मारने की धमकी मिल रही है, उससे ऐसा लगता है कि प्रदेश में अब कोई भी सु‍रक्षित नहीं है. हालांकि साहिल का कहना है कि इतना सब होने के बाद भी वे डरने वाले नहीं हैं.

सहारा में दुर्गेश उपाध्‍याय से ली गई एसाइनमेंट हेड की जिम्‍मेदारी

: संभालेंगे वेब डिविजन की जिम्‍मेदारी : सहारा से एक और खबर आ रही है कि उपेंद्र राय के खास माने जाने वाले दुर्गेश उपाध्‍याय से एसाइनमेंट हेड की जिम्‍मेदारी ले ली गई है. साथ ही एसाइनमेंट का कांसेप्‍ट भी बदल दिया गया है. उपेंद्र राय के दौर में दुर्गेश उपाध्‍याय वेब डिविजन के संपादक होने के साथ ही एसाइनमेंट हेड की जिम्‍मेदारी भी निभा रहे थे. अब उनके पास से एसाइनमेंट हेड की जिम्‍मेदारी ले ली गई है. इसके लिए सर्कुलर जारी कर दिया गया है. दुर्गेश के पास अब केवल वेब डिविजन की जिम्‍मेदारी रहेगी. फिलहाल एसाइनमेंट की जिम्‍मेदारी दीपिका भान और राजेश कुमार को दी गई है.

इसके साथ ही सहारा में अब एसाइनमेंट के केंद्रीय जिम्‍मेदारी को भी समाप्‍त कर दिया गया है. पिछली बार अपनी वापसी के बाद उपेंद्र राय ने सभी चैनलों के एसाइनमेंट को एक करके सेंट्रल एसाइनमेंट हेड बना दिया था, जिसकी जिम्‍मेदारी दुर्गेश उपाध्‍याय के पास थी. संदीप बाधवा ने अब इसमें बदलाव करते हुए सभी चैनलों के एसाइनमेंट डेस्‍क अलग कर दिए हैं. सभी चैनल के अलग-अलग एसाइनमेंट बना दिए गए हैं. अब सभी चैनलों के एसाइनमेंट की जिम्‍मेदारी चैनल हेड के पास रहेगी. 

माना जा रहा है कि सहारा में अब उपेंद्र राय के नजदीकियों को किनारे लगाने के काम की शुरुआत दुर्गेश उपाध्‍याय से एसाइनमेंट की जिम्‍मेदारी लेने के साथ ही शुरू हो चुकी है. आने वाले दिनों में कुछ और लोगों के किनारे लगाए जाने की संभावना दिखने लगी है. गौरतलब है कि दुर्गेश की गिनती उपेंद्र राय के नजदीकी लोगों में की जाती है. दुर्गेश बीबीसी से भी लंबे समय तक जुड़े रहे हैं. बीबीसी के लिए 26/11 समेत कई महत्‍वपूर्ण घटनाओं को कवर कर चुके हैं. बीबीसी से पहले से सीएनबीसी आवाज, स्‍टार न्‍यूज के साथ भी काम कर चुके हैं.

कुछ ही दिन में सहारा से आउट हुए वाशिन्‍द्र मिश्र

अभी कुछ दिन पहले ही जी न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड को छोड़कर सहारा पहुंचे वाशिन्‍द्र मिश्र की सहारा से विदाई हो गई है. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने ने ही सहारा की स्थितियों से तंग होकर चैनल छोड़ दिया है. हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पा रही है. परन्‍तु विश्‍वसनीय सूत्रों का कहना है कि वाशिन्‍द्र मिश्र यहां से बेसहारा होकर जा चुके हैं. पिछले काफी समय से जी न्‍यूज से सहारा समूह से जुड़ने की चर्चाओं के बीच बड़े अरमानों के साथ वाशिन्‍द्र सहारा के नेशनल चैनल के हेड बनकर पहुंचे थे, पर इतनी जल्‍दी विदाई हो जाएगी शायद इसका अंदाजा उन्‍हें भी नहीं रहा होगा.

सूत्रों का कहना है कि बसपा-सपा के कई नेताओं से नजदीकी रखने वाले वाशिन्‍द्र मिश्र नरेश अग्रवाल की सिफारिश पर सहारा पहुंचे थे. जिन अरमानों को लेकर वाशिन्‍द्र सहारा पहुंचे थे, वे पहले ही दिन से पूरे नहीं हुए. वे ग्रुप हेड बनने का सपना लेकर सहारा पहुंचे थे परन्‍तु उन्‍हें सहारा में लगभग अनजाने से नेशनल न्‍यूज चैनल का हेड बना दिया गया. इस चैनल का डिस्‍ट्रीब्‍यूशन भी बहुत कमजोर है, लिहाजा पहले कदम पर ही वाशिन्‍द्र को झटका लगा. खैर किसी तरह इन्‍होंने सहारा ज्‍वाइन तो कर लिया, परन्‍तु बताया जा रहा है कि इसके बाद इनके सामने मुश्किलें आनी शुरू हो गईं.

सूत्रों का कहना है कि स्‍वतंत्र मिश्रा एंड कंपनी ने वाशिन्‍द्र को काम करने की आजादी नहीं लेने दी. इसकी शिकायत वाशिन्‍द्र ने संदीप बाधवा से करते हुए इस्‍तीफा देने की धमकी दी. बाधवा ने पूरे मामले से सहारा श्री सुब्रत राय को भी अवगत कराया. बताया जा रहा है कि वाशिन्‍द्र मिश्र की धमकी सहाराश्री को भी पसंद नहीं आई. उनकी तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद वाशिन्‍द्र मिश्र के पास इस्‍तीफा देने के अलावा कोई और चारा भी नहीं बचा था. दस दिन भी ठीक से नहीं बीते और वाशिन्‍द्र मिश्र आसमान से गिरकर खजूर में अटक गए. क्‍योंकि जी न्‍यूज में वाशिन्‍द्र मिश्र कहीं ज्‍यादा मजबूत स्थिति में थे, परन्‍तु सहारा ज्‍वाइन करके उन्‍होंने अपने पैर पर ही कुल्‍हाड़ी मार ली.

सूत्रों का कहना है कि वाशिन्‍द्र ने जाने पहले यह भी कहा कि सहारा प्रोफेशनल पत्रकारों के काम करने की जगह नहीं है. गौरतलब है कि इसके पहले पुण्‍य प्रसून बाजपेयी और संजीव श्रीवास्‍तव जैसे पत्रकार भी सहारा से विपरीत परिस्थितियों में जा चुके हैं. हालांकि वाशिन्‍द्र मिश्र के सहारा से हटने के संदर्भ में बात करने के लिए फोन किया गया तो उन्‍होंने मोबाइल पिक नहीं किया.


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हिंदुस्‍तान के पत्रकार शशिकांत पर रेप समेत कई धाराओं में मामला दर्ज

हिंदुस्‍तान, गोरखपुर में कार्यरत शशिकांत जायसवाल पर मेरठ में मामला दर्ज हुआ है. शशिकांत पर एक युवती से शादी के नाम पर झांसा देकर यौन शोषण करने का आरोप है. सिविल लाइंस पुलिस ने शशिकांत के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए, 316, 328, 376 एवं 506 के तहत मामला दर्ज किया है. वह फिलहाल मामले की जांच कर रही है. शशिकांत के खिलाफ एफआईआर मेरठ की रहने वाली स्‍वाति अग्रवाल ने दर्ज कराया है.  

स्‍वाति ने पुलिस को दिए गए शिकायत में लिखा है कि हिंदुस्‍तान, गोरखपुर में सीनियर सब एडिटर शाशिकांत से उसकी जान पहचान फेसबुक के जरिए हुई. कुछ समय बाद शशिकांत ने उससे शादी का प्रस्‍ताव रखा, जिस पर उसने कुछ सोचने समझने के बाद स्‍वीकार कर लिया. इसके बाद शशिकांत ने विधिवत स्‍वाति के साथ शादी कर ली. पर ढाई माह बाद अचानक उसने स्‍वाति को छोड़ दिया. स्‍वाति जब गोरखपुर पुलिस से शिकायत की तो पुलिस ने उसकी मदद करने की बजाय एक लाख रुपये दिलाकर मामला रफा दफा करा दिया.

स्‍वाति इसके बाद इंसाफ के लिए इधर-उधर भटकने के बाद लखनऊ में मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से मिली. अलिखेश यादव के निर्देश के बाद मेरठ पुलिस ने स्‍वाति का मुकदमा दर्ज किया है. स्‍वाति का कहना है कि शशिकांत के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद उन्‍हें कुछ न्‍याय की उम्‍मीद जगी है, पर न्‍याय मिल जाएगा यह कहना बहुत मुश्किल है. क्‍योंकि पुलिस के पास तमाम पत्रकारों के फोन शशिकांत के पक्ष में आ चुके हैं. 


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सरकार के नियंत्रण से बाहर यूपी की नौकरशाही!

बार-बार सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव द्वारा अपनी ही सरकार को आईना दिखाने और नौकरशाही पर उंगली उठाने का प्रभाव अखिलेश सरकार के तौरतरीकों पर दिखने लगा है। अखिलेश सरकार के मंत्रियों के तौर तरीकों और कामकाज की समीक्षा होने लगी है तो नौकरशाही को पुचकारकर लाइन पर लाने की कोशिश कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अब ब्यूरोकेट्रस के साथ ‘भय बिना प्रीत न होय’ के फार्मूले पर चलेंगे जैसे की बसपा राज में होता था। इस बात का अहसास अब अखिलेश की बातों से होने भी लगा है। छह वर्षों के बाद लखनऊ में आयोजित ‘आईएएस वीक’ में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे अखिलेश ने आईएएस के मंच से ही उनकी क्लास ले ली।

उनकी बातों से साफ लग रहा था कि अब वह अपनी सरकार की विश्वसनीयता को बचाये रखने के लिए किसी को भी हद तक जा सकते हैं। आगे वह उत्तर प्रदेश की बेलगाम ब्यूरोक्रेसी और अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को और छूट नहीं देंगे। अखिलेश ने नकारा अधिकारियों को हटाने की पहली कड़ी में अपने चहेते और भारी भरकम विभाग संभाले आईएएस अधिकारी औद्योगिक विकास आयुक्त (आईडीसी) और उर्जा विभाग के प्रमुख सचिव डा. अनिल कुमार गुप्ता और नोयड़ा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजीव सरन को सभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से मुक्त करके यह जता दिया कि उनकी पसंद सिर्फ और सिर्फ काम करने वाले अधिकारी ही हैं, कोई भी अधिकारी बिना कामकाज किये अपने को सत्ता के करीब समझने का दम न भरे।

उक्त दो बड़े अधिकारियों की महत्वपूर्ण पदों पर से विदाई के साथ ही बडे प्रशासनिक फेरबदल की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। माया सरकार में अहम रहे अफसरों को अखिलेश राज में भी अहमियत दिए जाने की सपा कार्यकर्ताओं की शिकायत के बाद आईएएस अफसरों में खलबली है। सभी एक-दूसरे से सवाल कर रहे हैं कि आखिर कौन से नौकरशाह सपाइयों के निशाने पर है? क्या अखिलेश सरकार उन्हें दरकिनार करने जा रही है? आईएएस लॉबी को चिंता इसलिये भी है, क्योंकि राज्य को 111 प्रमोटी आईएएस मिल चुके हैं, जो अपने जौहर दिखाने को बेताब हैं। आईएएस लॉबी हल्कान है कि माया राज कहीं फिर से न दोहराया जाये। उस समय सभी मापदंडों को दरकिनार कर मायावती ने गैर आईएएस शंशाक शेखर को कैबिनेट सचिव बना कर नौकरशाहों पर लाद दिया गया था।

नौकरशाहों की चिंता इस लिये भी उचित लगती है, क्योंकि मुलायम और अखिलेश भी कई बार कह चुके हैं कि उन्हें नौकरशाहों की कमी के कारण बसपा राज के पुराने अफसरों से काम चलाना पड़ रहा है। इसी कारण प्रशासनिक कामकाज में  तेजी नहीं आ पा रही है। जो हालात हैं उससे तो यही लगता है कि मुख्यमंत्री लगभग यह मान कर चल रहे हैं कि माया राज के अफसरों की मानसिकता बदली नहीं जा सकती है। बात समाजवादियों की कि जाये तो सपा कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर नाराजगी है कि मायाराज के नौकरशाहों को सपा सरकार सजा देने के बजाये गले लगाये है। जिन नौकरशाहों पर बसपा के करीबी होने का आरोप लग रहा है उसमें कमराज रिजवी, हिमांशु कुमार, संजय अग्रवाल, आलोक रंजन समेत कई आईएएस अफसर हैं, जिनको पिछली सरकार के साथ-साथ  इस सरकार में भी खासी अहमियत मिली हुई है। वैसे माया के करीबी नौकरशाह आरपी सिंह, अनिल संत, रवींद्र सिंह, बलविंदर कुमार आदि सत्ता बदलते ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जा चुके हैं। पिछले साल दिवाली के मौके पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दरबार में बधाई देने जब मायाराज के खास अफसर पहुंचे तो कानाफूसी का दौर शुरू हो गया था। इन अफसरों में दुर्गाशंकर मिश्र, नेतराम  व नवनीत सहगल प्रमुख थे।

सपा कार्यकर्ताओं की शिकायत के बाद भयभीत नौकरशाह अपने-अपने आकाओं के यहां परिक्रमा कर रहे हैं। यही वजह थी बीते दिनों मुलायम के तेवरों को देखकर कई आईएएस अधिकारियों में सपा महासचिव राम गोपाल यादव से मिलने की होड़ देखी गई। बहरहाल, पीसीएस से आईएएस बने अधिकारी भी जानते हैं कि जल्द या देर-सबेर नौकरशाही में बड़ा बदलाव होना निश्चित है। इसका फायदा सीधे तौर पर पदोन्नति से आईएएस से बने अधिकारियों को ही होगा। इसी लिये वह मलाईदार पदों के लिए जोड़-तोड़ में लग गए है। उनकी नजरें महत्वपूर्ण जिलाधिकारी और कमिशनर के पदों पर है। वैसे, कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण ही सरकार पर दबाव है कि पुलिस महकमें में भी बदलाव किया जाये।

इस समय मायावती के करीबी जो अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं उसमें महेश गुप्ता- आबकारी आयुक्त, प्रमुख सचिव पंचायती राज माजिद अली, सीईओ ग्रेटर नोयडा रमा रमण, प्रमुख सचिव समाज कल्याण सदाकांत, सचिव मानवाधिकार आयोग जितेन्द्र कुमार शामिल हैं, जिनके ऊपर कई आरोप भी लगे हुए हैं। बात एक-एक कर की जाये तो माया राज में पोंटी चड्ढा को फायदा पहुंचाने वाली आबकारी नीति बनाने वाले आबकारी आयुक्त महेश गुप्ता सपा सरकार में भी अपने पद पर विराजमान हैं। इतना ही नहीं अखिलेश सरकार ने भी उन्हीं की बनाई नीति को जारी रखने का फैसला किया है। माजिद अली प्रमुख सचिव पंचायती राज हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट घेटाले के दौरान परिवहन विभाग के प्रमुख सचिव थे। शुरुआती झटकों के बाद सपा सरकार में भी पैठ बना ली। कुछ समय के लिए सहकारिता विभाग भेजे गये। अभी भी वह प्रमुख सचिव पंचायती राज है। रमा रमण, सीईओ ग्रेटर नोएडा ने भी माया राज में खूब नाम कमाया था जब मोहिन्दर सिंह नोएडा व ग्रेटर नोएडा के अध्यक्ष थे तो रमा रमण ग्रेटर नोएडा के सीईओ थे। नई सरकार ने मोहिन्दर सिंह को हटाकर सामान्य प्रशासन भेज दिया, लेकिन रमा रमण इसी पद पर बरकरार हैं। आईएएस सदाकांत, प्रमुख सचिव समाज कल्याण को बलविंदर कुमार के पिछले साल केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने पर मायावती ने सदाकांत को खाद्य एवं रसद विभाग दिया था। बाद में यह विभाग उनसे ले लिया और बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग दे दिया। सपा सरकार में भी समाज कल्याण व बाल विकास एवं पुष्टाहार जैसे अहम विभाग उनके अंडर में हैं। आईएएस जितेन्द्र कुमार, सचिव मानवाधिकार आयोग पर बसपा काल में परिवहन विभाग में रहते हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट का ठेका मनपसंद कंपनी को देने में भूमिका पर सवाल उठे थे। माया राज में ही सचिव माध्यमिक शिक्षा रहते हुए स्कूलों के भवन निर्माण में लैकफेड घोटाले की  आंच भी उन तक पहुंची थी। इसके बावजूद सपा सरकार ने इन्हें सचिव  चिकित्सा विभाग बनाया, लेकिन आलोचना के बाद सचिव मानवाधिकार आयोग की जिम्मेदारी दे दी।

बहरहाल, सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने जिस समय अधिकारियों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किये थे वह टाइमिंग के हिसाब से काफी महत्वपूर्ण रहा। उसी समय नौकरशाह छह वर्षों के बाद आईएएस वीक मनाने जा रहे थे और मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम में विशेष रूप से आमंत्रित किये गये थे। इस मौके को सीएम और आईएएस लॉबी दोनों अपने हितों के लिए भुनाना चाहते थे। आईएएस वीक में मुख्यमंत्री को अपनी भड़ास निकालने का पहले मौका मिला। उन्होंने बिना लागलपेट के अपनी बात रखी और कहा कि राज्य सरकार की योजनाओं एवं नीतियों का लाभ जनता तक पहुंचाने के लिए अधिकारी पूरी ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा से काम करें। गरीबों एवं किसानों को लाभ पहुंचाना राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। प्रदेश में उद्योग स्थापना की व्यापक सम्भावनाओं का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि अनेक बड़े उद्यमी यहां निवेश के इच्छुक हैं। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए हमें राज्य में निवेश के लिए माहौल बनाने हेतु तत्परता से काम करना होगा।

उन्होंने आईएएस लॉबी को आईना दिखाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश कैडर के आई.ए.एस. अधिकारी देश के ऊंचे पदों तक प्रोन्नति पाते रहे हैं। अधिकारी सरकार का अभिन्न अंग हैं। इसलिए सरकार की योजनाओं को लागू करने तथा जनता को लाभ पहुंचाने का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व अधिकारियों का ही है। पूर्व में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने कई महत्वपूर्ण फैसले लेकर देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण काम किए हैं। इस परम्परा को कायम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जनता, जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ अधिकारियों पर भी काफी भरोसा करती है। इसलिए अधिकारियों को जनता की समस्याओं के समाधान के लिए संवेदनशीलता से काम करना चाहिए। हम सभी जनता की सेवा के लिए ही हैं। विकास के लिए कानून व्यवस्था का ठीक रहना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए प्रदेश सरकार ने कानून व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिये। मुख्यमंत्री ने नाकारा नौकरशाहों के खिलाफ कार्रवाई तो काम करने वालों को पूरा सम्मान देने की बात कही। आईएएस वीक के पहले दिन मुख्यमंत्री ने नौकरशाहों को नसीहत दी तो दूसरे दिन ब्यूरोक्रेट्स अपने भीतर के जयचंदों की तलाश करते दिखे। नौकरशाही ने अपने हिसाब से सरकार का विश्वास दिलाने की कोशिश भी कि उनकी वजह से सरकार की छवि छूमिल नहीं होगी। देखना यह है कि यह नसीहतें और वायदे कितने कारगर साबित होंगे।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

रवि प्रकाश के लेख ने रचा इतिहास, इसे पढ़ने वाले 30 लोग करेंगे देहदान

लिक्खाड़ों और कट-पेस्टरों के लिए कभी हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक, कवि-कथाकार राजेन्द्र कुमार ने ये लाइनें लिखी थीं- हम जो लिखते हैं, दवातों को लहू देते हैं/कौन कहता है लिखने को बस कलम काफी है… कट-पेस्टरों के लिए लेखन हंसी-मजाक हो सकता है लेकिन गंभीरता से लिखने वालों के लिए यह किसी तपस्या या अपनी जान निकाल देने जैसा होता है। ऐसे लोगों की जा कलम चलती है तो हजारों-लाखों को प्रेरणा देती है, उनकी जिंदगियां बदलती है और एक इतिहास भी रचती है।

ऐसे ही एक लेखक थे कमलेश्वर। हिन्दी साहित्य के पुरोधा व कालजयी कृति ‘कितने पाकिस्तान’ लिखने वाले कमलेश्वर ने एक बार दैनिक हिन्दुस्तान में एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने मंदिरों-मठों के पुजारियों-मठाधीशों से अपील की कि अगर वे दान एक बड़ा हिस्सा जनहित में दान कर दें तो इस देश की बहुत-सी समस्याएं हल हो जाएं। इस लेख का असर यह हुआ कि दक्षिण भारत के एक पुजारी ने वास्तव में बड़ी संपत्ति दान कर दी। मीडिया में इसकी खूब चर्चा भी हुई। कमलेश्वर अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन हाल ही में युवा पत्रकार रवि प्रकाश मौर्य के एक लेख ने इस कारनामे को फिर से दुहराया है। 

जनसंदेश टाइम्स इलाहाबाद में वरिष्‍ठ पद कार्यरत रवि प्रकाश मौर्य ने कुछ दिन पहले जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पेज पर एक लेख लिखा था- ‘दाह संस्कार बनाम देहदान का पुण्य’। लेख छपने के बाद ही लोगों में इसका असर दिखने लगा और लोग देहदान का संकल्प लेने लगे। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि देहदान के लिए संकल्प पत्र भरवाने वाली संस्था ‘सद्धम्म देहदान अभियान’ के पास फार्म तक कम पड़ गए। जानकारी के अनुसार अब तक 30 से अधिक लोग देहदान का संकल्प ले चुके हैं। रवि प्रकाश मौर्य इससे पूर्व दैनिक जागरण में कार्यरत थे और उस समय चर्चा में आ गए थे जब मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश के खिलाफ जागरण द्वारा चलाए गए हस्ताक्षर अभियान का खुल्लमखुल्ला विरोध किया। इससे पूर्व ‘रवि’ संभव पत्रिका, संग्रह टाइम्स व शब्‍दार्थ मैगजीन का सम्पादन कर चुके हैं। 2003 में उनकी किताब ‘सप्त शिखरों से साक्षात्कार’ भी प्रकाशित हो चुकी है। नीचे पढ़े जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित रवि प्रकाश मौर्य का लेख। रवि से संपर्क 8953400308 के जरिए किया जा सकता है।


दाह संस्कार बनाम देहदान का पुण्य

देश में किसी हादसे, बीमारी या फिर स्वाभाविक कारण से हर रोज न जाने कितने लोग मरते हैं। इन सा घटनाओं में मृतक के परिजनों-करीबियों में कम-ज्यादा या बहुत अधिक शोक व्याप्त होना भी एक सामान्य बात है लेकिन कुछ दिन पूर्व घटी एक घटना ने मेरे मन को झकझोर दिया। आस्था ग्रुप एवं फ्रेस्को के सीएमडी आरआर मौर्य के युवा पुत्र संजय मौर्य (29) की मुंबई में मौत हो गई। आरआर मौर्य ने अपने पूरे परिवार के साथ चिकित्सीय अनुसंधान के लिए देहदान करने का संकल्प लिया था। ऐसे समय में जब जान से प्यारे बेटे की मौत के बाद उनके दुख का पारावार नहीं था, वह अपने बेटे की देह को दान करने के बारे में सोच रहे थे ताकि चिकित्सा जगत की तरक्की में उनके बेटे की मृत देह काम आ सके। जिंदगी के सबसे भारी दुख के बीच उनका ऐसा सोचना उन्हें विशेष व्यक्ति बनाता है। इसके बाद सधम्म देहदान अभियान के तहत संजय मौर्य की मृत देह पूरे रीति-रिवाज के साथ इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गई। इससे पूर्व इसी तरह कॉलेज को हरिहर प्रसाद कुशवाहा की देह दान की जा चुकी थी। वह इस शहर के पहले देहदानी थे। इसके बाद बौद्ध कम्यून (इंटरनेशनल) के प्रयास से एक महीने के अंदर करीब 200 लोगों ने देहदान का संकल्प ले लिया। यह शायद पूरे देश में एक रिकॉर्ड होगा। इस घटना ने मुझे यह सोचने के लिए मजबूर किया अब समय आ गया है कि हमें दाह संस्कार के नफा-नुकसान और देहदान के पुण्य के बारे में बात करनी चाहिए।

देखा जाये तो देहदान कोई नई बात नहीं है। यह पुरातन काल से है। विश्व का प्रथम देहदानी महर्षि दधीचि को माना जाता है जिन्होंने मानव कल्याण के लिए अपनी देह दान कर दी थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवासुर संग्राम में असुरों के राजा वृत्रासुर ने राजा इंद्र को पराजित कर जा उन्हें स्वर्ग से निष्कासित कर दिया तो भगवान विष्णु के बताए रास्ते के अनुसार देवताओं ने दधीचि से देहदान और अस्थिदान की अभ्‍यर्थना की। दधीचि ने देवताओं के राजा उस इंद्र को भी अपनी देह दान में दे दी, जिसने एक बार उनकी तपस्या की शक्ति से भयभीत होकर उनका गला तक काट दिया था। हालांकि अश्विनी कुमारों की चतुराई से वह पुन: जीवित हो उठे थे। यह कथा यह बताने के लिए पर्याप्त है कि देहदान कितना पुण्य कार्य है। वर्तमान में देहदान का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि और भी बढ़ा है क्योंकि इसके जरिए देश को और तरक्की की राह पर ले जाया जा सकता है। दधीचि के बाद 1932 में चिन्तक जेरेम बोन्हॉम ने चिकित्सा विज्ञान की उन्नति के लिए मरणोपरांत अपनी देह दान कर इस परंपरा को फिर से जीवित किया। भारत में मरणोपरांत देहदान करने वाले प्रथम व्यक्ति थे महाराष्ट्र के पूना में शिक्षक पाण्डुरंग आप्टे।

वर्तमान देखा जाए तो ब्रिटिशवासी देहदान का सासे अधिक महत्व समझते हैं। इंग्लैंड में हर वर्ष 800 से अधिक लोग मेडिकल शोध के लिए देहदान करते हैं। धीरे-धीरे यह परंपरा आ हमारे यहां भी आगे बढ़ रही है। देश के तमाम हिस्सों से जब-तब यह खबरें आती रहती हैं कि अमुक ने अपनी देह या नेत्र दान कर दी। कुछ उसमें प्रसिद्ध शख्सियतें होती हैं तो कुछ बिल्‍कुल आम व्यक्ति। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री व माकपा नेता ज्योति बसु ने भी मौत से पहले अपनी देहदान का संकल्प लिया था। उनकी इच्छा के अनुरूप उनका शव सरकारी एसएसकेएम अस्पताल को सौंप दिया गया। करीब चार माह पूर्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज में ऑफिसर रह चुकी स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने भी कानपुर मेडिकल कॉलेज को अपनी देह व नेत्र दान कर दिए। स्त्री अधिकारों की चैम्पियन व जनता की डॉक्टर कही जाने वाली कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी का यह कदम अन्य लोगों के लिए एक प्रेरणा ही है। इसी तरह ‘रामायण’ धारावाहिक में लक्ष्मण का रोल अदा करने वाले अभिनेता सुनील लहरी के पिता एवं भोपाल के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. शिखरचन्द्र लहरी ने भी चिकित्सा जगत के लिए अपनी देह दान कर दी। उन्होंने दस साल पूर्व देहदान का संकल्प लिया था और उनके निधन के बाद उनकी इच्छा सुनील लहरी सहित परिजनों ने पूरी कर दी।

अब बात करते हैं दाह संस्कार व उनके नफा-नुकसान के बारे में। हर देश और संस्कृति में अलग-अलग तरीके से दाह संस्कार किया जाता है। कुछ धर्मों में मानव की मृत्यु के बाद शव को दफनाया जाता है तो कुछ धर्मों में शव को जलाने की परंपरा है। इनमें से दाह संस्कार के कई नियम पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। उदाहरणस्वरूप, शव को जलाने पर प्रतिदिन लाखों क्विंटल लकड़ी नष्ट हो जाती है। साथ ही घी, हवन सामग्री भी इसमें स्वाहा हो जाती है। आधुनिक तरीका विद्युत शवदाह गृह है जहां बहुत अधिक तापक्रम में शवों को खाक कर दिया जाता है जाकि कुछ लोग शव को सीधे गंगा में प्रवाहित कर देते हैं। शवदाह गृहों की चिमनी से निकलने वाला बदबूदार धुआं आसपास के कई कस्‍बों का जीना तक मुश्किल कर देता है। यही नहीं, इसके बाद ‘पवित्र राख’ को पवित्र स्थलों या नदियों में छोड़ने की भी परंपरा है जिससे नदियां प्रदूषित होती हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन डाई आक्साइड की बड़ी मात्रा नि:सृत होती है जो प्रदूषण का एक बड़ा कारक है।

इसके उलट कुछ धर्मों के लोग मानव हित के लिहाज से शवों का निपटारा दूसरे तरीके से करते हैं। शव को दफनाने से जमीन की उत्पादन शक्ति बढ़ती है। इन दिनों अमेरिका में शवों के द्रवीय निस्तारण का तरीका खूब चर्चित है। इसके अंतर्गत पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड द्रव में हल्के तापक्रम पर शव को द्रव और दबाव के सहारे विघटन के लिए छोड़ दिया जाता है। शव द्रव में पूरी तरह घुल जाता है और पर्यावरण के लिए हानिकारक भी नहीं रहता। बाद में इसका निस्तारण निरापद तरीके से कर दिया जाता है। अमेरिका में हरित शव निस्तारण की पद्धति भी चलन में है, जिसमें शव को जैव विघटनीय डब्‍बों में जमीन के अन्दर पूरी तरह कुदरती अवयवों में तब्‍दील होने के लिए छोड़ दिया जाता है। प्रोमेसा नाम की स्वीडिश कम्पनी ने फ्रीज ड्राइंग विधि ईजाद की है जिसमें लिक्विड नाइट्रोजन में शरीर से द्रव का शोषण कर लिया जाता है और शरीर पाउडर में तदील हो जाता है। फिर इसे जमीन के भीतर गहरे दबा दिया जाता है। ऐसे स्थानों पर स्मृति-वृक्ष उगाया जा सकता है। दाह संस्कार के इन तमाम तरीकों के बाद आप स्वयं सोचिए कि कौन-सा रास्ता अपनाना ज्यादा बेहतर है- लोक कल्याण के लिए देहदान कर पुण्य कमाना या सिर्फ शव के लिए निपटारे के लिए सोचना। गंभीरता से सोचें तो देहदान एक मायने में स्मृति वृक्ष से श्रेष्ठ तरीका है। आइये हम सब मरने से पूर्व इस पर एक बार अवश्य विचार करें क्योंकि एक दिन सबको मरना ही है।

विवेकानंद का कानपुर तबादला, केतन वैद्य बने पॉलिटिकल एडवाइजर

अमर उजाला, गोरखपुर से खबर है कि विवेकानंद त्रिपाठी का तबादला कानपुर के लिए कर दिया गया है. वे यहां पर डीएनई के पद पर कार्यरत थे. संभावना है कि एक फरवरी को विवेकानंद कानपुर में अपनी जिम्‍मेदारी संभाल लेंगे. वे लम्‍बे समय से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. कुछ समय पहले ही उन्‍हें पश्चिमी यूपी से गोरखपुर भेजा गया था. संभावना है कि फरवरी माह में अमर उजाला के ज्‍यादातर यूनिटों में फेरबदल होंगे.

मुंबई से खबर है कि केतन वैद्य ने यूएस कांसुलेट से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर मीडिया एडवाइजर के पद पर कार्यरत थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी यूएस एम्‍बेसी में पॉलिटिकल एडवाइजर के रूप में शुरू की है. केतन इसके पहले एनडीटीवी, आजतक और स्‍टार न्‍यूज को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

महराजगंज प्रशासन का कारनामा : बना डाला विदेशी का अधिवास प्रमाण पत्र

महराजगंज। यह देखिये महराजगंज प्रशासन का कारनामा जो एक नेपाली नागरिक का अधिवास प्रमाण पत्र जारी कर दिया। जब यह मामला खुला तो जनपद में खलबली मच गयी। जनपद के नौतनवा तहसील के उपजिलाधिकारी, लेखपाल व कानूनगो की रिपोर्ट पर पड़ोसी मुल्क नेपाल के एक नागरिक का अधिवास प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया, जिसके बारे में खुफिया विभाग के उच्चाधिकारियों को मौखिक रूप से अवगत करा दिया गया है। अधिवास प्रमाण पत्र जारी कराने में हल्का लेखपाल की भूमिका संदिग्ध बतायी जा रही है।

समाजसेवी नरसिंह पाण्डेय ने उपजिलाधिकारी नौतनवा को एक पत्र देकर पूरे प्रकरण की जॉच कर दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने एवं अधिवास प्रमाण पत्र तत्काल प्रभाव से निरस्त करने करने की मांग की है। मालूम हो कि पड़ोसी मुल्क नेपाल के भारतीय सीमा से सटे बेलहिया निवासी आबिद खां पुत्र स्व. जमील ने नौतनवा तहसील कर्मियों की मिली भगत से पहले ही जुगौली गॉव सभा से मतदाता पहचान पत्र तो बनवा ही लिया था, उसने पुनः नौतनवा तहसील से अधिवास प्रमाण पत्र भी बनवा लिया है। यह मामला तब प्रकाश में आया जब नौतनवा में तैनात एलआईयू के सब इंसपेक्टर द्वारा उससे पासपोर्ट बनवाने के लिये फार्म जॉच की। जॉच के बाद सब इंसपेक्टर ने इस मामले की जानकारी पहले ही उच्चाधिकारियों को मौखिक रूप से दे दी।

मामला प्रकाश में आते ही तहसील कर्मियों एवं अधिकारियों में हड़कम्प मच गया। लेखपाल ओमप्रकाश लाल श्रीवास्तव एवं कानूनगो रमेश लाल श्रीवास्तव द्वारा दिये गये रिपोर्ट के आधार पर बीते 01. 01. 2013 को उपजिलाधिकारी नौतनवा के हस्ताक्षर से आबिद खान को अधिवास प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया है। बताते चलें कि ओमप्रकाश लाल श्रीवास्तव का नौतनवा तहसील का पूरा कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है। जिन्दा व्यक्ति को मृत्यु घोषित करना तथा फर्जी आंकड़े प्रस्तुत करके तमाम लोगों का अधिवास बनाना इनके बांये हाथ का खेल है। यह सालों तक अपने इसी कारनामे के कारण उच्चाधिकरियों द्वारा निलंबित भी किये जा चुके हैं तथा इनका वेतन भी कुछ दिनों तक बाधित किया जा चुका है। बावजूद इसके ये अपने रसूख और पैसे के बल पर नौतनवा तहसील में विगत 15 वर्षों से सेवा कर रहे हैं। विदेशी नागरिक के अधिवास बनाने में भी हल्का लेखपाल ओमप्रकाश लाल और कानूनगो रमेश लाल की भूमिका भी काफी संदिग्ध है। इस प्रकरण पर जब प्रभारी जिलाधिकारी डा. वेदपति मिश्रा को बताया गया तब उन्होंने कहा यह मामला उनके संज्ञान में नहीं था। अब मामला संज्ञान में आ गया है। दोषियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाएगी।

महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

बाड़मेर में मिले 60 जिंदा बम, शहर में अघोषित कर्फ्यू के हालात

बाड़मेर। बाड़मेर में एक साथ 60 बम मिलने से शहर भर में सनसनी फ़ैल गई है, लोग भयाक्रांत हैं और प्रशासन खौफ खाए है कि कहीं थोड़ी सी लापरवाही शहर को श्मशान ना बना दे। यही नहीं एक एक बम की मारक क्षमता ढाई किलोमीटर का इलाका है तो प्रभाव 8 किलोमीटर तक हो सकता हैं। सेना के इस खुलासे से ही डर बढ़ गया है। बाड़मेर में लगातार बम मिलने से शहर भर में सनसनी फ़ैल गई है। कुछ दिन पूर्व ही बाड़मेर शहर स्थित बार्डर होमगार्ड परिसर में आधा दर्जन बम मिले थे। उसका भय मिटा ही नहीं कि फिर से इसी जगह एक साथ साठ जिन्दा और बम मिल गये हैं।

सबसे गम्भीर बात तो यह है कि एक बम सात से आठ किलोमीटर तक अपना प्रभाव डाल सकता है और ढाई किलोमीटर तक का क्षेत्र तो इस के कारण पूरा का पूरा नष्ट हो सकता है और कोई भी इसकी जद में आने के बाद नहीं बच सकता है। इसके कारण हादसे के भय से ही लोग आतंकित हो गये। अगर थोड़ी सी लापरवाही से बम एक साथ फट जाते तो बाड़मेर में बड़ा हादसा इतिहास में शामिल हो जाता। दरअसल अब हम आपको बताते हैं कि कैसे बाड़मेर में यह भयानक मामला सामने आया है। बाड़मेर के बार्डर होमगार्ड में परिसर में कुछ दिन पहले स्टेडियम निर्माण का काम हो रहा था, इस दरमियान बाड़मेर के इस इलाके में काम कर रहे मजदूरों को धातु की चीज उनके फावड़े के नीचे आने से काम रोकना पड़ा। रेत हटा कर उन्होंने जब यह बमनुमा वस्तु देखी तो वो डर गये और बार्डर होमगार्ड के अधिकारियों को उन्होंने इस घटना के सम्बन्ध में जानकारी दी।

इस के बारे में तुरंत ही पुलिस को सूचित करके मामले की जानकारी दी गई। पुलिस मौके पर पहुंच कर मामले को देखने को बाद इस घटना के सम्बन्ध में सेना को पत्र लिखा और बम निस्तारण के लिए टीम भेजने का आग्रह किया। सात दिनों के बाद सेना का बम निरोधक दस्ता 30 जनवरी यानी बुधवार दोपहर के बाद बाड़मेर के इस घटनास्थल पर पहुंचा और इलाके में जहां बम मिले थे, वहां की खुदाई करवाई। इस खुदाई ने सबके होश उड़ा दिए। क्यूंकि इस जगह ने एक साथ 1 या 2 ,3, 4  या  …10…20….30… नहीं बल्कि साठ से सत्तर बम उगले हैं। घटना ने सभी को इसलिए भी चौका दिया क्यूंकि ज्यादातर बम जिन्दा थे। मतलब अगर ये फटते तो कइयों को मौत की नींद सुला सकते थे।

सेना के बम निरोधक दस्ते के अधिकारियों के अनुसार ये हाई एक्स्प्लोजिव बारूद का भयानक खतरनाक असलाह था और इसका प्रभाव करीब 8 किलोमीटर के इलाके में हो सकता था। यही नहीं ढाई किलोमीटर के इलाके में इसके फटने से कोई बचता भी नहीं। इस भयंकर बम मिलने की घटना से बाड़मेर के लोग अनहोनी की आशंका से भयभीत हैं तो पुलिस प्रशासन जल्द इसके निस्तारण के लिए चिंतित है। सेना के अधिकारियों के भी बम मिलने की घटना से होश फाख्ता हैं। बाड़मेर में कई दिनों से बम मिलने की घटना के चर्चे हैं, लेकिन ये चर्चे बुधवार शाम के बाद चिंता में बदल गये हैं। आसपास के क्षेत्र रहवासी इलाकों में शामिल हैं। बार्डर होमगार्ड परिसर की बाउंड्री खत्म होने के बाद ही इस इलाके में सैकड़ों परिवारों की बस्ती शुरू हो जाती हैं। ऐसे में पुलिस और प्रशासन भी इसके कारण खासी चिंता में है क्यूंकि एक साथ बम इतनी भारी संख्या मिल जाने के कारण लोग चिंता में डूबे हैं कि कहीं इस इलाके में और भी बम तो नहीं दबे हुए हैं।

जिला पुलिस अधीक्षक राहुल बारहठ, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नरेंद्र मीणा और पुलिस उपाधीक्षक नाजिम अली खान समेत पुलिस और सेना के कई अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और घटनास्थल का मौका मुआयना कर इस इलाके में आम जनता के प्रवेश पर पूर्णतया प्रतिबन्ध लगा दिया है। साथ ही साथ सेना और पुलिस ने सारे बमों को इसी परिसर में जेसीबी मशीन द्वारा गड्ढा खोद करके गड्ढे में रखवाया गया हैं ताकि कोई इन बमों तक नहीं पहुंच पाए। साथ ही जिला पुलिस अधीक्षक राहुल बारहठ के मुताबिक़ इसको गम्भीरता से लिया जा रहा हैं और बम निस्तारण के लिए भी कार्यवाही शुरू करवाई गई है। बाड़मेर में बम मिलने की घटना के बाद शहर में लोग भयभीत हैं साथ ही साथ पुलिस भी इस को लेकर काफी चिंता में हैं कि कहीं ऐसा कोई हादसा ना हो जाए जो परेशानी का कारण बन जाए।

बाड़मेर से दुर्गसिंह राजपुरोहित की रिपोर्ट.

फरियादियों से नहीं मिलते महराजगंज के पुलिस अधीक्षक!

महराजगंज। जहां अखिलेश सरकार में गुंडों के हौसले बढ़ रहे हैं वहीं नौकरशाहों का मिजाज भी बदला हुआ है। कोई घटना घट जाय पर महाराजगंज के अधिकारियों के कानों पर जूं तक नही रेंगता। ऐसे ही हालात हैं महाराजगंज के पुलिस अधीक्षक लक्ष्मीनारायण श्रीवास्तव की, नाम के अनुसार जब कुछ मिलता है तभी लक्ष्मीनरायण सुनते हैं। दूर दराज नौतनवां तहसील के कुनसेरवां गॉव के एक फरियादी अमित जायसवाल एवं सिसवां ब्‍लाक के फेकू गुप्ता की जमीनों पर एक बाहुबली व्यक्ति ने कब्जा कर लिया था।

दोनों लोग अपनी फरियाद लेकर थाने पहुंचे तो थानेदार महोदय दोनों को थाने से भगा दिया। इसके बाद ये दोनों लोग अपनी फरियाद लेकर जिला मुख्‍यालय पहुंचे तथा कप्‍तान साहब से मिलने पहुंच गए। पता चला कप्तान महोदय अपने बंगले पर आराम कर रहे हैं, आज नहीं आयेंगे। वहीं दूसरे अपर पुलिस अधीक्षक छुट्टी पर हैं। जब दोनों व्यक्ति बंगले पर मिलने गये तो आरक्षी ने बताया कि साहब 6 बजे से मिलते हैं। जरा गौर कीजिए इस ठंडक में इतने दूर से आये व्यक्ति जायेंगे कैसे? क्‍या इसका ज्ञान पुलिस अधीक्षक महोदय को नहीं है? वैसे बताया जाता है कि कप्तान महोदय से मिलना किसी आम आदमी के लिए इतना आसान नहीं है। वे अक्‍सर 12 बजे दिन में कार्यालय आते हैं और 2 बजे चले जाते हैं। पुनः आवास पर 6 बजे बैठते हैं और 7 बजे उठ जाते हैं। बाकी समय आराम फरमाते हैं। जब कोई थानेदार मिलने को जाता है तब तुरन्त ही उसको कमरे में बुला लिया जाता है और काफी समय भी दिया जाता है क्योंकि भैया लक्ष्मी की बात है!

महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

शहीदी दिवस पर नेताजी के सहयोगी निजामुद्दीन को कुलपति ने किया सम्मानित

आज़मगढ़। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुन्दर लाल ने शहीदी दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा आयोजित सम्मान समारोह मे आजाद हिन्द फ़ौज के कर्नल निजामुद्दीन को उनके गाँव ढकवा मे सम्मान पत्र, मेडल और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर कुलपति प्रो सुन्दर लाल ने कहा कि आज मैं अपने को भाग्यशाली समझता हूँ कि नेता जी से जुड़े व्यक्ति के साथ बैठने और संवाद करने का मौका मिला। आज का दिन देश के प्रति समर्पित लोगों को याद करने का दिन हैं। सुभाष चन्द्र बोस और उनसे जुड़े लोगों को मन से चाहने वालों की संख्या हमारे देश मे कम नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि आज निजामुद्दीन जैसे लोगों की देन से ही हम अपने को स्वतंत्र कहते हैं। इन्होंने जिस समर्पण के साथ देश की सेवा की वह अमूल्य है। विश्वविद्यालय परिसर मे नेता जी मूर्ति स्थापित कर उनको याद किया है और छात्रों को उनके व्यक्तित्व से जोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने एक ऐसी योजना बनाई है, जिसमें 1857 के शहीदों को नमन किया जायेगा। जल्द ही परिसर के मार्गों का नाम गुमनाम शहीदों के नाम से जाना जायेगा।

सम्मानित होने के पश्चात् निजामुद्दीन ने कहा कि अगर नेता जी होते तो देश का बंटवारा नहीं होता। आज सोचता हूँ कि क्या खोया क्या पाया पता नहीं। उन्होंने कहा कि पता चलता हैं कि आज लोग काम के लिए घूस मांगते हैं। कितना दुखद है इसलिए आजादी नहीं मिली थी। इसके बाद उनकी आंखें नम हो गई। रविन्द्र राय ने कहा कि निजामुद्दीन हमारे लिए प्रेरणा श्रोत हैं और जनपद के लिए गर्व हैं। उन्होंने कहा कि कागजों की लड़ाई में भले उनको पेंशन न मिली हो लेकिन उनकी गाथा इस देश की माटी में छिपी है।

सम्मान समारोह के पहले कुलपति निजामुद्दीन के घर जाकर मिले। उनके पुत्र अकरम ने अपने पिता की बातों को बताया। सम्मान समारोह में कुलपति सुन्दर लाल ने सम्मान पत्र, मेडल और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। पूर्वांचल परिसर शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार, कार्यक्रम समन्यवयक डॉ. हसीन खान, अध्यक्ष जनसंपर्क डॉ. मनोज मिश्र साथ रहे। राष्ट्रीय सेवा योजना की स्वयं सेविकाओं ने स्वागत गीत एवं देश भक्ति गानों की प्रस्तुति की। इस अवसर पर डॉ. दुर्गा अस्थाना, डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र, डॉ. दिग्विजय सिंह राठौर, मन्नान, सल्लू, दिवाकर सिंह, धर्मेन्द्र श्रीवास्तव, अमरेन्द्र सिंह, विकास वर्मा, शैलेश यादव, ध्रुव मिश्र, अनिल चतुर्वेदी, रमेश सिंह, खुर्रम नोमानी समेत तमाम स्थानीय लोग मौजूद रहे।

कुंभ मेला से लापता संन्यासी का 29 दिन बाद भी सुराग नहीं लगा

: बदइंतजामी को लेकर परिपूर्णानंद सरस्वती कर रहे अनशन : इलाहाबाद। कुंभ नगरी से रहस्यमय दशा में गायब दंडी स्वामी परिपूर्णानंद सरस्वती को 29 दिन बाद भी पुलिस खोज नहीं सकी। इस मामले में पुलिस का रवैया बेहद गैरजिम्मेदाराना बना हुआ है। पीपुल फॉर पीपुल सोसायटी और यूथ फॉर पीस संगठन के कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर लापता दंडी स्वामी को खोजने की मांग की गई है। कहने को प्रयाग के महाकुंभ मेला में हाईटेक सुविधाओं से लैस पुलिस लगाई गई है, पर इस मामले में वह फिसड्डी ही साबित हो रही है। मेला क्षेत्र और उसके आसपास लापता दंडी संन्यासी की फोटो जगह-जगह चस्पा कर पुलिस ने चुप्पी साध रखी है।

कुंभ मेला शुरू होने के पहले जमीन आवंटन को लेकर मेला क्षेत्र में शंकर चतुष्‍पद विवाद शुरू हो गया। विवाद ने उस समय तूल पकड़ लिया जब मेला प्रशासन पर मनमानी का आरोप लगाते हुए दंडी स्वामी परिपूर्णानंद सरस्वती ने मेला क्षेत्र में सेक्टर दस के पास अनशन शुरू कर दिया। दंडी स्वामी के अनशन करने से मेला प्रशासन में खलबली मच गई। दो जनवरी को कुंभमेला में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आगमन का कार्यक्रम तय हो गया। कुंभ मेला में तैयारी देखने आ रहे मुख्यमंत्री और तैयारी में हावी अव्यवस्था को लेकर दंडी स्वामी का अनशन। इसे लेकर अफसरों के हाथ-पांव फूल गए। हालांकि मुख्यमंत्री का आगमन ऐन मौके पर कैंसिल हो गया। उधर, एक दिन पहले ही एक जनवरी को तड़के ही अनशन पर बैठे स्वामी परिपूर्णानंद लापता हो गए। हंगामा होने पर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली। उनकी तलाश में तेज तर्रार पुलिस अफसरों को लगाया गया। पर दंडी स्वामी का पता अभी तक नहीं चल सका। दंडी स्वामी परिपूर्णानंद को आकाश खा गया या आसमान निगल गया। उनका कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है।  

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

नक्षत्र न्‍यूज से बिहार हेड आलोक पुंज का इस्‍तीफा

नक्षत्र न्‍यूज से खबर है कि बिहार हेड के रूप में कार्यरत आलोक पुंज ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे लगभग साल भर पहले ही नक्षत्र न्‍यूज से जुड़े थे. वे आस्‍था से इस्‍तीफा देकर नक्षत्र न्‍यूज से जुड़े थे. आलोक दिल्‍ली में आस्‍था को अपनी सेवाएं देने के पहले उत्‍तरी बिहार में जी न्‍यूज से जुड़े हुए थे. उनके करियर की शुरुआत जी न्‍यूज से ही हुई थी. वे सन्‍मार्ग अखबार को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

बताया जा रहा है कि चैनल ने बिहार में तमाम जिला संवाददाताओं को पिछले एक साल से भुगतान नहीं किया है. बावजूद इसके आलोक पुंज के हेड रहने के दौरान वे लोग चैनल को रोजाना खबरें भेजते रहे. प्रबंधन ने जब आलोक पुंज के कई बार कहने के बाद संवाददाताओं का भुगतना नहीं किया तो उन्‍होंने इस्‍तीफा देना ही बेहतर समझा. साथ ही यह भी खबर है कि चैनल फरवरी महीने से बिहार में फ्रेंचाइजी के साथ मिलकर काम करेगी. दूसरी तरफ आलोक भी अपनी पूरी टीम के साथ नए ठिकाने की तलाश कर रहे हैं.

दैनिक भास्‍कर 21 फरवरी को लांच करेगा हल्‍द्वानी एडिशन!

हल्‍द्वानी से खबर आ रही ही है कि भास्‍कर समूह अब यहां भी अपने विस्‍तार की शुरुआत करने जा रहा है. हालांकि अभी अखबार की लांचिंग छोटे पैमाने पर किए जाने की तैयारी की जा रही है. सूत्रों का कहना है कि दैकिन भास्‍कर 21 फरवरी से अपना हल्‍द्वानी एडिशन लांच करने जा रहा है. इसके लिए भास्‍कर ने हल्‍द्वानी आवास विकास में अपना कार्यालय भी शुरू कर दिया है. हालांकि इस अखबार का प्रकाशन अभी हल्‍द्वानी से नहीं होगा, अखबार नोएडा से प्रकाशित होकर कुमाऊं आएगा.

सूत्रों का कहना है कि दैनिक भास्‍कर ने सात-आठ लोगों की टीम हल्‍द्वानी में भेजा है, जो दूसरे अखबारों के पत्रकारों से संपर्क करके उन्‍हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि अभी अनिश्चितता की स्थिति होने के चलते पत्रकार जमे जमाए बैनर से आने में हिचक रहे हैं. दैनिक भास्‍कर के लोग एजेंटों से भी मुलाकात कर उन्‍हें नोएडा से आने वाली कॉपियां दे रहे हैं. 21 फरवरी को लांचिंग के लिए वे लोग विज्ञापन भी लेने लगे हैं.

कंपनी सूत्रों का कहना है कि दैनिक भास्‍कर समूह ने रुद्रपुर में जमीन ली है. वो यहीं पर यूनिट स्‍थापित करके रुद्रपुर से कुमाऊं, बरेली व यूपी के आसपास के शहरों को कवर करने की सोच रहा है. कंपनी की योजना इस साल अक्‍टूबर तक रुद्रपुर में यूनिट स्‍थापित करने की है. देहरादून में पेपर छापने के लिए राष्‍ट्रीय सहारा से भी बातचीत चल रही है. अगर राष्‍ट्रीय सहारा से बातचीत फाइनल हो जाती है तो भास्‍कर प्रबंधन अपना देहरादून एडिशन भी लांच कर सकता है. भास्‍कर के उत्‍तराखंड में आने की खबर से अमर उजाला, जागरण और हिंदुस्‍तान में खलबली मच गई है.

लॉ कालेज में नकल का कवरेज कर रहे मीडियाकर्मियों पर हमला

बांदा में डॉ. बीआर अंबेडकर विधि महाविद्यालय में प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा में फोटो खींचने पहुंचे मीडिया कर्मियों पर छात्रों ने हमला कर दिया। कैमरा तोड़ने के साथ ही मीडियाकर्मियों से मारपीट भी  की गई। कई मीडियाकर्मियों को चोटें आई हैं। हमला किए जाने के विरोध में मीडियाकर्मी कालेज के गेट पर धरने पर बैठ गए हैं। दूसरी तरफ कालेज के निदेशक का कहना है कि दो मीडियाकर्मी बिना अनुमति के बाउंड्री फांद कर कालेज के अंदर घुसे तथा कक्ष निरीक्षक के साथ अभद्रता भी किया। 

महाविद्यालय में प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा सुबह साढ़े नौ बजे से शुरू हुई। 11 बजे के लगभग मीडिया कर्मी आशीष सागर व कुछ अन्य लोग परीक्षा कवरेज के लिए पहुंचे। बताया जा रहा है कि कुछ कमरों में छात्र खुलेआम नकल कर रहे थे। कालेज के मुख्य गेट पर ताला लगा हुआ था। कई प्रतिष्ठित लोग भी एलएलबी में दाखिला लिए थे, परन्‍तु उनकी जगह दूसरे लोग बैठकर परीक्षा दे रहे थे। इसी का कवरेज आशीष और उनके साथ आए लोग करने लगे।

नकल करने की फोटो खींचते तथा कवरेज करते देख कथित छात्र भड़क उठे। मीडियाकर्मियों को घेरकर उनका कैमरा छीनकर उसे क्षतिग्रस्‍त कर दिया गया। आशीष सागर का कहना है कि इस घटना में उनका 50 हजार से अधिक का नुकसान हुआ है। विद्यालय प्रशासन ने पोल खुलने की डर से छात्रों को ऐसा करने के लिए उकसाया है। दूसरी तरफ विद्यालय के निदेशक भोला तिवारी का कहना है कि आशीष सागर व सूर्यप्रकाश तिवारी बाउंड्री कूदकर बिना केंद्र अध्यक्ष की अनुमति के परीक्षा कक्ष में घुसकर फोटो खींचने लगे। कक्ष निरीक्षक ने मना किया तो जाति सूचक शब्द से गाली गलौज किया। साथ ही पचास हजार रुपये की मांग करते हुए कहा कि पैसे नहीं दिए तो धरना देकर महाविद्यालय बंद करवा देंगे। 

चैनल का रिपोर्टर छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ्तार

मेरठ पुलिस ने छेड़छाड़ के आरोप में एक पत्रकार को गिरफ्तार किया है। वो खुद को एक न्यूज चैनल को रिपोर्टर बता रहा था। पत्रकारिता की आड़ में वह पुलिस वालों को भी धमका रहा था। पुलिस ने छेड़छाड़ की धाराओं में चालान कर उसे थाने से ही जमानत पर रिहा दिया। बताया जा रहा है कि पुलिस को टीपी नगर में देह व्‍यापार की सूचनाएं मिली थी। इसके बाद एसओ टीपी नगर ने मंडी चौकी इंचार्ज अनूप सिंह को दबिश देने के लिए नई बस्‍ती भेजा।

अनूप ने सूचना के आधार पर जब एक जगह छापेमारी की तो एक युवक, जिसका नाम सोनू बताया जा रहा है, आपत्तिजनक हालत में एक युवती के साथ पकड़ा गया। पुलिस दोनों को पकड़कर चौकी पर ले आई। चौकी पहुंचते ही युवक ने खुद को एक न्‍यूज चैनल का रिपोर्टर बताते हुए हंगामा शुरू कर दिया। उसने पुलिसवालों को भी देख लेने की धमकी दी। पुलिस ने युवती से पूछताछ करने के बाद उसे खतौली भिजवा दिया। पत्रकार सोनू को थाने ले आई। यहां पर पुलिस ने उसका चालान 294 में कर के उसे थाने से ही छोड़ दिया।

झारखंड में खबर छपने से नाराज माओवादियों ने पत्रकार को दी धमकी

लातेहार : विरोध में छपी खबर से बिफरे माओवादियों ने गारू के पत्रकार को अपहरण करने धमकी दी। साथ ही माओवादियों ने पत्रकार को खबर नहीं लिखने की चेतावनी दी। माओवादी अपने महिला दस्ते के गिरफ्तार नक्‍सली साथी रेखा के खुलासे पर आधारित खबर लिखने से नाराज हैं। रेखा ने पुलिस को बयान दिया था कि माओवादी गांवों से नाबालिग लड़कियों को उठा कर ले जाते हैं तथा अपने साथ रखते हैं। उनका यौन शोषण किए जाने के अलावा उनसे कई और काम लिए जाते हैं। इसके बाद उन्हें प्रशिक्षित कर महिला दस्ते में शामिल किया जाता हैं।

इसी आधार पर लिखी गई खबर से नाराज माओवादी मंगलवार की शाम लातेहार के गारू प्रखंड के महुआडाबर गांव में पत्रकार आलोक कुमार के घर पहुंच गए। आलोक की मां से पत्रकार के बारे में पूछताछ करने लगे। इसी दौरान खबर संकलन के बाद आलोक अपने घर पहुंचे, तभी माओवादियों ने उन्‍हें पकड़ लिया। आलोक के हाथ पैर रस्‍सी से बांध दिए गए। आलोक की मां, पत्नी और नौ माह की बच्ची के साथ पत्रकार को भी अपने साथ लेते गए। कुछ दूर ले जाने के बाद पत्रकार से विरोध में समाचार छापने के बारे में तमाम तरह की पूछताछ करने लगे।

आलोक ने कहना है कि उसने माओवादियों को बताया कि यह खबर उसने नहीं लिखी है तो इस पर माओवादी उक्‍त खबर लिखनेवाले पत्रकार को वहां बुलाने की बात कहने लगे। ऐसा नहीं करने पर गोली मारने की धमकी दी गई। आलोक ने उक्‍त पत्रकार को बुलाने में अपनी असमर्थता जतायी। इतने में वहां आसपास के तमाम ग्रामीण भी जुट गए। ग्रामीणों ने पत्रकार आलोक को ईमानदार तथा अच्‍छा व्‍यक्ति बताते हुए माओवादियों से उसे तथा उसके परिवार को छोड़ देने का आग्रह करने लगे। ग्रामीणों के कहने के बाद माओवादियों ने पत्रकार तथा उसके परिवार को छोड़ दिया, साथ ही उसे पत्रकारिता छोड़ने या उनके विरोध में समाचार नहीं छापने की चेतावनी भी दी।

आजतक की पत्रकार सौम्‍या विश्‍वनाथन का हत्‍यारोपी पुलिस रिमांड पर

तिहाड़ जेल से फिरौती का रैकेट चलाने के मामले में गिरफ्तार अमित शुक्ला को तीन दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है। तीसहजारी कोर्ट के मुख्य महानगर दंडाधिकारी विद्या प्रकाश के समक्ष पुलिस ने खुलासा किया कि पत्रकार सौम्या विश्वनाथन हत्याकांड मामले में गिरफ्तार शुक्ला ही जेल से फिरौती की रकम मांगता था। शुक्ला पत्रकार की हत्या करने के मामले में तिहाड़ जेल में बंद था।

पुलिस ने अदालत को बताया कि अमित शुक्ला व मामले में पकड़े गए एक अन्य आरोपी अरुण कुमार से आमने-सामने बैठाकर पूछताछ करनी है। जिसके लिए आरोपी का रिमांड पर लिया जाना जरूरी है। जिसके बाद पुलिस की अपील को मंजूर करते हुए कोर्ट ने आरोपी को रिमांड पर भेज दिया।

पुलिस ने कोर्ट में बताया कि आरोपी अरुण कुमार तिहाड़ जेल की डिस्पेंसरी में कम्पाउंडर था और शुक्ला की फिरौती की गतिविधियों को अंजाम देने में सहायता करता था। इतना ही नहीं मामले के अन्य आरोपियों की भी पहचान की जा रही है।

गौरतलब है कि वर्ष 2008 से सौम्या हत्या मामले में जेल में बंद अमित शुक्ला के खिलाफ अदालत ने पूर्व में पेशी वारट जारी किया था। जिसके बाद उसे बुधवार को अदालत में पेश किया गया। पुलिस ने अदालत को बताया कि उन्होंने गुप्त सूचना के आधार पर दो मोबाइल नंबर की कॉल रिकार्ड करनी शुरू की, जिसके बाद रैकेट का खुलासा हुआ।

पुलिस ने बताया कि जांच के दौरान पता चला कि जेल नंबर तीन में बंद शुक्ला ने एक वैशाली निवासी राजेंद्र को फोन करके एक लाख रुपये मांगे थे। वहीं दूसरा नंबर अरुण प्रयोग कर रहा था और दोनों आपस में भी बातचीत कर रहे थे। (जागरण)

कांडा की कंपनी के कसीनो वाले जहाज को गोवा सरकार करेगी नीलाम

पणजी : हरियाणा के पूर्व मंत्री गोपाल कांडा की कंपनी के कसीनो (जुआघर) वाले जहाज को अगर जल्दी ही मंडोवी नदी से स्थानांतरित नहीं किया गया तो गोवा सरकार उसे नीलाम कर देगी। इस जहाज के लाइसेंस की अवधि खत्म हो चुकी है। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने आज विधानसभा को यह जानकारी दी। सदन को बताया गया कि गोल्डन ग्लोब होटल्स प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व वाले जहाज एमवी लीला को राज्य सरकार एक लावारिस जहाज मानकर अपने अधिकार में ले लेगी।

पर्रिकर ने कहा, हम पर्यटन कानून के तहत इस जहाज को अपने अधिकार में लेंगे अैर इसे नीलाम कर देंगे, क्योंकि इसके लाइसेंस की अवधि खत्म हो चुकी है। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार पहले ही इस जहाज को एक कंपनी से दूसरी कंपनी को स्थानांतरित करने का अधिकार हासिल कर चुकी है। उन्होंने कहा, अगर यह जहाज किसी दूसरी कंपनी को बेच भी दिया जाता है तो भी राज्य सरकार इसे जुआघर चलाने का लाइसेंस नहीं देगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के कुल छह जुआघरों में से दो (कांडा का एक जुआघर भी शामिल) जुआघर बंद हो चुके हैं, क्योंकि उन्होंने शुल्क का भुगतान नहीं किया। उन्होंने कहा, हम इन दोनों जुआघरों के बदले किसी और जुआघर को चलाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। इसका मतलब यह है कि अब राज्य में सिर्फ चार ही जुआघर होंगे। (एजेंसी)

”टीवी एंकर देश के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा”

हमारे जो टीवी एंकर हैं वो लोकतंत्र के सबसे बड़ा ख़तरा बनते जा रहे हैं. क्यों कि लोगों को भड़काते है और उनका सत्य से कोई लेना देना नहीं है. ख़ास तौर पर एक-दो वो टीवी एंकर जिनकी टीआरपी सबसे ज़्यादा है. यह एंकर हर नौजवान एंकर को यह बुरा सबक सिखा रहे हैं कि आप शिष्टता को एक तरफ छोड़िये ज़ोर ज़ोर से चीखिये. सवाल ऐसे कीजिये जैसे मुजरिम खड़ा है अपने कठघरे में. सामने वाले के बारे में मत सोचिये कि उसकी नज़र में उसका खुद का कोई सम्मान होगा. आपके टीआरपी रेटिंग उठ जायेंगे.

यह सिखा रहे हैं कि शहद बटोरने वाली मधुमक्खी की तरह हर दिन आगे बढ़ जाओ. एक दिन शिंदे साहब का नाम लेकर चीखो, दूसरे दिन पाकिस्तान का नाम लेकर चीखो, उसके बाद आशीष नंदी का नाम लेकर. आपके टीआरपी बढ़ते जायंगे और आपको आपकी बात के लिए कोई जिम्मेवार नहीं ठहराएगा. यह हालाँकि बहुत अफ़सोस की बात है लेकिन हमारे लोकतंत्र का हिस्सा है. आप कितना भी उनको कह लीजिये कि पूरी बात दिखाना लेकिन जैसे ही टीवी वालों की स्टोरी बन जाती हैं झूठ शुरू हो जाता है. वो टीवी में नीचे जो टिकर चलता है उसमें आपके शब्दों को तोड़ मरोड़ कर लिख दिया जाएगा और उसके बाद कोई याद नहीं रखेगा कि आपने दरअसल कहा क्या था. मैं खुद इसका दो चार बार शिकार हो चुका हूँ.

कम से कम दो ऐसे टीवी एंकर हैं जो मुझे अपने प्रोग्राम में नहीं बुलाते क्योंकि मैं उनका स्क्रीन पर खंडन करता हूँ. वो अगर मुझसे बदतमीजी से पेश आते हैं तो मैं भी जानवर बन जाता हूँ. मैं भी इनके प्रोग्राम में नहीं जाना चाहता. एक दो टीवी चैनलों में इतना ज़्यादा कट्टरपन है कि क्या कहें. इन एंकर महोदय ने और मैंने दोनों ने आपस में यह तय कर लिया है कि मेरी इनके प्रोग्राम में कोई जगह नहीं है. वो मुझे नहीं बुलाते दस दूसरे चैनल बुलाते हैं और यह भी कोई ज़रूरी नहीं है कि रोज़ टीवी पर दिखना है.

और दूसरा इन टीवी चैनलों का दृष्टीकोण बहुत ही सीमित है. मिसाल के तौर पर मैं तमिलनाडु में अपने चुनाव क्षेत्र में हूँ एक तमिल टीवी चैनल को छोड़ कर कोई ऐसा नहीं है कि तीन सौ किलोमीटर अपनी ओबी वैन को भेजे. टीवी वाले मुझसे रोज़ फ़ोन कर के पूछते हैं कि आप दिल्ली कब आ रहे हैं. मैं तो तमिलनाडु में छुट्टी मना रहा हूँ पूरे चार दिन से टीवी पर नहीं आया. टीवी पर दिखने वाले राजनीतिज्ञों से के बारे में क्या कहूँ. कायर बनना है तो कोई भी कायर बन सकता है और इसमें राजनीतिज्ञ भी जुड़े हुए हैं.

दरअसल राजनीति में उतरने के लिए बहुत ही हिम्मत की ज़रुरत है. एक दिन आप जीतते हैं मंत्री होते हैं, दूसरे दिन आप हार जाते हैं. कभी समझ ही नहीं आता कि जिताया क्यों था और हराया क्यों. जब जीते थे तब भी वही आदमी थे वैसे ही काम करते थे और हार गए तब भी वही आदमी थे. और यही अनिश्चितता बहुत सारे नेताओं में दिखती हैं जब वो टीवी पर होते हैं. वैसे 70-80 फीसदी नेताओं के साथ यह संकट नहीं है क्योंकि उन्हें कोई टीवी पर बुलाता ही नहीं है.

जिन बचे हुए लोगों को बुलाया जाता है उनमे से कुछ अपने दृष्टीकोण पर हिम्मत के साथ कायम नहीं रह पाते. मैं तो अपने साथियों से यही कहूंगा कि कहो वो जो कहना है मत घबराओ. मैं मिसाल देता हूँ दिग्विजय सिंह की जो चाहते हैं कहते हैं बाकी चाहे जो चिल्लाता रहे. मैं उनसे सहमत हूँ या नहीं यह बात महत्वपूर्ण नहीं लेकिन मिसाल के तौर पर जो बटला हाउस के मुद्दे पर उन्हें कहना था वो उन्होंने कहा और जिसको जो मानना था उसने माना.

रही बात आशीष नंदी विवाद की जहाँ दलित और पिछड़े समाज से आने वाले कई बुद्धीजीवी उनके साथ खड़े दिखे जबकि नेता ज़्यादा असहिष्णु लग रहे हैं तो मैं बस यही कहूंगा कि हमें हर पांच साल में वोट मांगने जनता के बीच में जाना पड़ता है बुद्धिजीवियों को तो कोई इस तरह का संकट नहीं है. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात और है. मैं इस तरह के विवादों को छोटे समूहों के हंगामे को असहिष्णुता के तौर पर या लोकतंत्र के खतरे के तौर पर नहीं देखता. मैं मानता हूँ कि यह इस बात का सबूत हैं कि हमारा लोकतंत्र अधिक व्यापक हो रहा है.

अब चाहे मेरे जैसे राजनेता हों या आशीष नंदी जैसे बुद्धीजीवी सबको सार्वजनिक जगहों पर बोलते वक़्त अपने शब्दों पर ध्यान रखना होगा क्योंकि वो लोग, वो समूह जो सदियों से लोकतंत्र के कमरे के बाहर थे वो अन्दर आने के लिए धक्के मार रहे हैं और अपनी बात को सुनाने की कोशिश कर रहे हैं यह अच्छा है बुरा नहीं.

राज्‍यसभा सदस्‍य मणिशंकर अय्यर की यह रिपोर्ट बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्‍त से बातचीत पर आधारित है.

प्रेस की आजादी के मामले में भारत की स्थिति और खराब, 140 वें नम्‍बर पर पहुंचा

प्रेस की आजादी के मामले में 179 देशों की सूची में और नीचे गिरकर भारत 140वें स्थान पर पहुंच गया है. वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत वर्ष 2002 के मुकाबले नौ स्थान नीचे गिरकर 140वें नंबर पर पहुंच गया और चिंतकों का कहना है कि यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के हिसाब से शोचनीय हालत है. रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स ने वर्ष 2013 के लिए वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में कहा है कि एशिया में, पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा के मामलों में कार्रवाई नहीं करने की बढ़ती प्रवृति तथा इंटरनेट सेंसरशिप के चलते भारत इस पायदान पर 2002 के बाद से सर्वाधिक नीचे पहुंच गया है.

इसमें कहा गया है कि चीन (173वां) में कोई सुधार नहीं दिखता. इसकी जेलों में अभी भी बहुत से पत्रकार बंद हैं तथा इंटरनेट सेंसरशिप के लगातार बने रहने से सूचना तक पहुंच में एक बडी बाधा बनी हुई है. पिछले वर्ष जारी इस सूची में प्रेस की आजादी के लिहाज से तीन यूरोपीय देश फिनलैंड, नीदरलैंड और नार्वे शीर्ष पर थे जबकि सूची में सबसे नीचे तुर्कमेनिस्तान, उत्तर कोरिया तथा इरिट्रिया हैं. ये तीनों देश पिछले तीन साल से लगातार इसी स्थान पर बने हुए हैं.

रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स के महासचिव क्रिस्टोफ देलोयरे ने कहा कि तानाशाही शासन में समाचार प्रदाता तथा उनके परिवारों को कड़े परिणाम भुगतने पड़ते हैं लेकिन लोकतंत्र में पत्रकारों को मीडिया के आर्थिक संकट और हितों के टकराव के बीच सामंजस्य बिठाना पड़ता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व के सबसे बड़े लेकतंत्र भारत में प्रशासन वेब सेंसरशिप पर जोर दे रहा है तथा अधिक कड़े प्रतिबंध लगा रहा है. इसके साथ ही पत्रकारों के खिलाफ हिंसा के मामलों में कोई सजा नहीं दी जाती तथा कश्मीर और छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्र अलग थलग पड़ रहे हैं.

इसमें आगे कहा गया है कि बांग्लादेश में भी बहुत अधिक बेहतर हालात नहीं हैं. वहां पत्रकारों को अक्सर पुलिस हिंसा का शिकार होना पड़ता है. मीडिया के दुश्मनों को छूट मिली होती है और कभी कभार ही ऐसा होता है कि ऐसे लोगों को सजा मिलती हो. मीडियाकर्मियों के संरक्षण की कोई सरकारी नीति नहीं होने के कारण पाकिस्तान (159) और नेपाल (118) में पत्रकारों के स्वतंत्र रूप से काम करने की स्थिति लगातार बदतर हो रही है. एक जीवंत मीडिया होने के बावजूद पाकिस्तान पत्रकारों के लिहाज से दुनिया का सर्वाधिक खतरनाक देश बना हुआ है. (समय)

आनंद कौशल, दानिश, रंजीत समेत कई पत्रकार नक्षत्र न्‍यूज से जुड़े

हमार टीवी में लगातार चल रहे उठापटक के बीच चैनल की पूरी टीम ने नक्षत्र न्यूज़ का दामन थाम लिया है। नक्षत्र टीवी ने पटना के आशियाना नगर स्थित रामनगरी मोड़ के पास अपना स्टूडियो स्थापित किया है। फ़रवरी के पहले सप्ताह से चैनल ने बिहार में केबुल नेटवर्क के माध्यम से ऑन एयर होने की पूरी तैयारी कर ली है। शीघ्र ही डीटीएच पर भी चैनल को उपलब्ध कराने का काम प्रगति पर है। बंदी की मार झेल चुके हमार टीवी के दुबारा शुरू होने के बाद भी स्थिति में ख़ास फ़र्क नहीं आया। आख़िर में पूरी टीम ने हमार टीवी को अलविदा कह डाला।

आनंद कौशल नक्षत्र न्यूज़ के वाइस प्रेसिडेंट (आपरेशंस) कम स्टेट हेड बनाए गए हैं। जबकि जाने माने पत्रकार दानिश रिज़वान और रंजीत कुमार को प्रिंसिपल कॉरेस्पॉडेंट बनाया गया है। दानिश इससे पहले बीएजी फिल्म्स को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वो आनंद की टीम के सबसे मज़बूत स्तंभ माने जाते रहे हैं। रंजीत ईटीवी, साधना और देश लाइव में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। जबकि साधना छोड़ कर आए कुमार गौतम को नक्षत्र में वरिष्ठ संवाददाता बनाया गया है। मौर्य टीवी से आए अनुपम कुमार सिन्हा कॉर्डिनेटर की भूमिका में होंगे। भागलपुर की जवाबदेही अब्दुल हसीन को दी गई है जबकि मुज़फ्फरपुर में प्रदीप कुमार को ज़िम्मा सौंपा गया है।

साल 2000 में आनंद कौशल ने प्रिंट मीडिया से अपने कैरियर की शुरुआत की थी, उन्होंने भागलपुर ‘आज’ में सबसे पहले योगदान किया था। भागलपुर में पत्रकारिता की परीक्षा में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले आनंद साहित्य, राजनीति और आर्थिक मुद्दों पर भी ख़ासी पकड़ रखते हैं। आनंद ‘ई.टीवी न्यूज़’, हैदराबाद में आउटपुट हेड भी रहे चुके हैं। 2008 में उन्होंने पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के चैनल हमार टीवी, फोकस टीवी और एनई टीवी में बतौर ‘ईपी कम ब्यूरो चीफ’ ज्वाइन कर लिया था। 2009 में कुछ कारणों से वो हमार से दूर हो कर छुट्टी पर चले गए थे, लेकिन जल्द ही उनकी वापसी कराई गई थी।

नेशनल दुनिया ने आलोक मेहता से पीछा छुड़ाया!

प्रदीप सौरभ के नेशनल दुनिया का संपादक बनने के बाद तय हो गया है कि आलोक मेहता को जाने का संकेत दे दिया गया है. वैसे अपुष्‍ट सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि आलोक मेहता की विदाई कर दी गई है. जिस तरीके से पिछले कुछ समय से नेशनल दुनिया के मालिक शैलेंद्र भदौरिया फ्रंट पर आकर अपनी योजनाओं को घोषित कर रहे थे उससे काफी पहले ही बदलाव की सुगबुगाहट होने लगी थी. जिस तरीके से अखबार की छवि निष्‍पक्ष न रहकर कांग्रेस के मुखपत्र की हो गई थी, उससे भी प्रबंधन आलोक मेहता एंड कंपनी से नाराज चल रहा था.

माना जा रहा है कि इनके अलावा कई कारणों से प्रबंधन आलोक मेहता के परफारमेंस से खुश नहीं था. वैसे भी सेटिंग गेटिंग में माहिर आलोक मेहता शैलेंद्र भदौरिया को लंबे समय तक सेट नहीं कर पाए. मात्र दस महीने में ही प्रबंधन के सामने उनकी पोल खुल गई. बताया जा रहा है कि मोटी तनख्‍वाह लेने के बाद भी अखबार को सर्कुलेशन या रिवेन्‍यू मोर्चे पर सफलता नहीं दिला पाने के चलते शैलेंद्र भदौरिया आलोक मेहता से खुश नहीं चल रहे थे. जबकि उन्‍होंने अपनी तरफ से कहीं पैसे की कमी नहीं होने दी. बावजूद इसके आलोक मेहता एंड कंपनी अखबार को अलग पहचान नहीं दिला पाई.

सूत्रों का कहना है कि इन्‍हीं कारणों के चलते शैलेंद्र भदौरिया ने आलोक मेहता के खास लोगों की सैलरी भी रोक रखी थी. अभी भी उनके खास माने जाने वाले कई लोगों की सैलरी प्रबंधन ने नहीं दी है. माना जा रहा है कि इन लोगों को साफ संकेत है कि अब आप खुद जाइए नहीं तो प्रबंधन आपको निकाल देगा. प्रदीप सौरभ के संपादक बनने की खबर आने के बाद से ही नेशनल दुनिया में आलोक मेहता के खास लोगों में हड़कम्‍प है. पिछली बार तो अपनी रणनीति से आलोक मेहता ने नई दुनिया से अलग होने के बाद भी अपने तमाम चहेतों को बेरोजगार होने से बचा लिया था, पर इस बार हालात बदले नजर आ रहे हैं.

आलोक मेहता का एक रिकार्ड रहा है कि वे जिस भी संस्‍थान से जुड़े उसके ताबूत में कील ही साबित हुए. हिंदुस्‍तान, आउटलुक, नईदुनिया और अब नेशनल दुनिया इस बात का गवाह है. वैसे भी आलोक मेहता नेशनल दुनिया को नईदुनिया की छाया से बाहर नहीं निकाल पाए. यह अखबार भी नईदुनिया का डमी साबित हुआ और जिस तरीके से उनकी टीम ने नईदुनिया को बरबाद कर दिया, कुछ वैसा ही वे नेशनल दुनिया के साथ कर पाते प्रबंधन ने अपने लिए नए रास्‍ते तलाश लिए. आलोक मेहता से भी ज्‍यादा परेशानी उनके नजदीकी होने का तमगा पा चुके लोगों को होने लगी है. क्‍योंकि पिछली बार तो वे लोग नजदीकी होने का फायदा उठाकर नई दुनिया के रास्‍ते नेशनल दुनिया में चले आए, पर इस बार रास्‍ते में कोहरा छाया हुआ है.


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प्रदीप सौरभ बने नेशनल दुनिया के संपादक

आलोक मेहता का विकल्प तलाश रहे हैं शैलेंद्र भदौरिया!

नेशनल दुनिया में छपने वाली झूठी खबरों को शैलेंद्र भदौरिया पढ़ते हैं या नहीं? देखिए एक कटिंग

नेशनल दुनिया का प्रकाशन 30 मार्च से मेरठ से भी : शैलेंद्र भदौरिया

प्रदीप सौरभ बने नेशनल दुनिया के संपादक

नेशनल दुनिया से खबर आ रही है कि वरिष्‍ठ पत्रकार एवं उपन्‍यासकार प्रदीप सौरभ अखबार के साथ जुड़ गए हैं. उन्‍हें अखबार का संपादक बनाया गया है. प्रदीप सौरभ 1 फरवरी से अपना कार्यभार ग्रहण कर लेंगे. प्रदीप सौरभ दिल्ली के चर्चित व बेहतरीन पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. इलाहाबाद के रहने वाले प्रदीप सौरभ करीब 28 वर्षों से हिंदुस्तान अखबार के साथ जुड़े हुए थे. शशि शेखर के प्रधान संपादक बनने के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था.

प्रदीप सौरभ लंबे समय तक हिंदुस्‍तान के नेशनल ब्यूरो में कार्यरत रहे हैं. उन्‍होंने 'तीसरी ताली' एवं 'मुन्‍नी मोबाइल' समेत कई उपन्‍यास भी लिखे हैं. प्रदीप सौरभ को देश-विदेश में कई सम्‍मान प्राप्‍त हो चुका है. अब प्रदीप सौरभ के नेशनल दुनिया से जुड़ने के बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि आलोक मेहता का दौर अब थमने वाला है. अखबार की दिन प्रतिदिन बिगड़ती स्थिति को देखते हुए पहले से ही कयास लगाया जा रहा था कि प्रबंधन आलोक मेहता का विकल्‍प तलाश रहा है. हालांकि प्रदीप सौरभ ने संपादक के पद पर ज्‍वाइन किया है जबकि आलोक मेहता प्रधान संपादक हैं, लेकिन माना जा रहा है कि प्रबंधन ने उनसे किनारा करने के लिए ही प्रदीप सौरभ को अपने साथ जोड़ा है.


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एनडीए का डीएनए बदलने की फिराक में कांग्रेस

नरेंद्र मोदी के मामले में कांग्रेस एनडीए का डीएनए बदलने की फिराक में है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पीएम पद के लिए अपनी हवा बनाने में कामयाब हो गए हैं। लेकिन अच्छे अच्छों की हवा निकालने में माहिर कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति तैयार कर ली है। वह सीधे तो मोदी पर प्रहार नहीं करेगी, लेकिन एनडीए के साथियों की सांसों में जहर घोलकर बीजेपी को बहुत परेशान जरूर करेगी। कांग्रेस की कोशिश है कि कैसे भी करके एनडीए के सहयोगियों को अपने हितों की याद दिलाकर माहौल की रफ्तार को रोका जाए। बीजेपी के साथी दलों के सरोकारों की समझ को बढ़ाया जाए। एनडीए इसी से कमजोर होगा।

लोकसभा चुनाव में अभी डेढ़ साल बाकी है। जो लोग इस आस में बैठे हैं कि चुनाव वक्त से पहले होंगे, अपनी नजर में वे कोई बहुत समझदार सोच के स्वामी नहीं हैं। कांग्रेस इतनी बेवकूफ नहीं हैं, जो रात ढलने से पहले ही अपनी चलती दुकान बंद करके घर बैठ जाए। ऐसा कोई नहीं करता। जो करता है, वो भरता है। अपने अटलजी को ही देख लीजिए, इंडिया शाइनिंग की चकाचौंध में आकर फील गुड के फैक्टर में वक्त से कुछ पहले ही चुनाव मैदान में उतर गए थे। लेकिन मैदान से सीधे घर गए, जो आज तक घर से बाहर नहीं निकले। लेकिन फिर भी बीजेपी में इस बार भी वक्त से बहुत पहले से ही हलचल बहुत तेज है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वक्त से बहुत पहले दावेदारी के केंद्र में आने से कई बार जो सहज नुकसान संभव है, उसकी भरपाई लगभग असंभव हुआ करती है। पर, मोदी तो असंभव में भी संभव की तलाश के लिए माहिर माने जाते हैं। शायद यही कारण है कि वे अभी से तैयार हैं। और यशवंत सिन्हा के बाद अब पार्टी के निलंबित नेता राम जेठमलानी ने भी फिर एक बार नए सिरे से मोदी राग आलापना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस जेडीयू के जरिये एनडीए के डीएनए को बदलने के मौके तलाश रही है। माहौल का मामला देखें, तो लगता है कि बीजेपी में अकेले मोदी ही राजनीतिक रूप से बहुत सक्षम हैं। बाकी कोई नहीं। पर, कांग्रेस में तो ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो पूरे देश में, हर वर्ग और हर समाज में राजनीतिक रूप से मोदी से कई गुना ज्यादा ताकतवर हैं। जबकि मोदी की मुश्किल यह है कि वे सिर्फ और सिर्फ हिंदू मानसिकता के लोगों में भी फिलहाल तो पूर्णरूप से स्वीकार्य नहीं हैं। प्रवीण तोगड़िया तो डंडा लेकर मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। कांग्रेस माहौल देख रही है। वक्त हाथ में आते ही वह मोदी की सारे माहौल का मटियामेट कर देगी। कांग्रेस चाहती है कि बयानबाजी से दूर रहकर मौका देखा जाए। कांग्रेस सीधे मोदी का नाम नहीं लेगी, लेकिन वक्त आने पर जेडीयू पर उसका हमला बढ़ेगा। वह जेडीयू को धर्मनिरपेक्षता की याद दिलाई जाएगी। एनडीए में दरार के बाद जेडीयू कांग्रेस के साथ रहे या भाड़ में जाए, फायदा कांग्रेस को ही मिलेगा। अपनी खबर है कि हैं कि मोदी की तरफ बीजेपी के कदम बढ़ते ही कांग्रेस अपना दांव चलेगी। खुद को सीधे मोदी पर केंद्रित करने और राहुल गांधी को उनसे भिड़ाने के बजाय कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा उठाकर चुनाव से पहले ही एनडीए में बीजेपी को अलग-थलग करने की कोशिश करेगी।

शिवसेना ने वैसे भी अपनी ओर से पीएम के मामले में मोदी की बजाय श्रीमती सुषमा स्वराज का नाम आगे कर दिया है। हमेशा भावनाओं की राजनीति करनेवाली शिवसेना के पास जवाब में तर्क यह है कि दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने भी सुषमा को प्रधानमंत्री के योग्य बताया था। पार्टी फिलहाल तो साहेब के उसी सपने पर कायम है, बाद में बदल भी सकती है, राजनीति में हमेशा कुछ भी बहुत तय नहीं होता। जेडीयू को वैसे भी मोदी के नाम पर शुरू से ही एतराज रहा है। वैसे, नीतीश कुमार यह जानते हैं कि वे अभी इतने बड़े नहीं हुए हैं कि देश उनको पीएम के मामले में गंभीरता से ले। लेकिन मोदी विरोध के जरिए अपने बिहार के अल्पसंख्यकों के दिलों को जीतकर फिर बिहार पर राज करने ने की उनकी मंशा हैं। उधर, एनडीए के संयोजक शरद यादव ने सिर्फ इतना सा, कि – गठबंधन बहुत मुश्किल से बनते हैं, कहकर बीजेपी को लगभग डरा सा दिया है। कांग्रेस इस माहौल के बढ़ने का मौका देख रही है और मुश्किल यह है कि बीजेपी को भी यह सब समझ में भी आ रहा है। लेकिन करे तो क्या करे।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

जम्‍मू में स्‍टेट टाइम्‍स की मुहिम रंग लाई, 26 जनवरी को नहीं छपे अखबार

राष्ट्रीय पर्वों (15 अगस्त व 26 जनवरी) में जहाँ देश के लगभग सभी अख़बार के दफ्तरों में अवकाश होता है फलस्वरूप अगले दिन (16 अगस्त व 27 जनवरी) को उनका प्रकाशन नहीं होता है, परन्तु जम्मू के स्थानीय समाचार-पत्रों ने लगभग 15 वर्ष पहले इस प्रथा को समाप्त कर राष्ट्रीय पर्वों पर भी नियमित रूप से अपना प्रकाशन करना आरम्भ कर दिया था.

पिछले वर्ष STATE TIMES ने राष्ट्रीय पर्वों पर अवकाश का समर्थन करते हुए 15 अगस्त की छुट्टी घोषित कर 16 अगस्त को समाचार-पत्र का प्रकाशन नहीं करने की घोषणा कर दी थी. जम्मू-कश्मीर प्रोविंस वेंडर्स एसोसिएसन ने STATE TIMES के निर्णय का स्वागत करते हुए अन्य सभी स्थानीय समाचार-पत्रों से लिखित अनुरोध कर राष्ट्रीय पर्वों पर अवकाश की मांग की थी. जिससे अनेक समाचार-पत्रों ने STATE TIMES का अनुसरण कर अपना प्रकाशन बंद रखा था, परन्तु DAILY EXCELSIOR व कुछ अन्य अख़बारों ने राष्ट्रीय पर्वों की महत्ता को नकारते हुए छुट्टी करने से इनकार कर दिया था.

परन्तु इस बार 26 जनवरी को जम्मू-कश्मीर प्रोविंस वेंडर्स एसोसिएशन ने पुनः लिखित अनुरोध कर राष्ट्रीय पर्वों पर अवकाश की मांग कर कोई भी अख़बार बाँटने से इनकार कर दिया फलस्वरूप DAILY EXCELSIOR सहित उन सभी अख़बारों ने भी अपना प्रकाशन नहीं किया जो पहले इस अवकाश से सहमत नहीं थे. वेंडर्स एसोसिएसन के प्रधान आनंद शर्मा (काके) ने 15 वर्ष पहले की प्रथा को बहाल होने पर ख़ुशी जताई तथा जम्मू-कश्मीर के सभी वेंडर्स की ओर से STATE TIMES को इस मुहिम की सराहना करते हुए बधाई दी है.

स्‍टार प्‍लस को हटाकर नम्‍बर एक बना जी टीवी

इंटरटेनमेंट चैनलों का चौथे सप्‍ताह का टैम रेटिंग जारी हो गया है. 20 से 26 जनवरी के लिए जारी हुए आंकड़े में जी टीवी ने बाजी मारी है. सीएस4 प्‍लस, एचएसएम मार्केट दोनों श्रेणियों में जी टीवी ने अपना डंका बजाया है. जी टीवी ने जी सिने अवार्ड एवं अन्‍य कई प्रोग्रामों की बदौलत स्‍टार प्‍लस को एक नम्‍बर से हटाकर खुद अपना कब्‍जा जमा लिया है. जबकि कलर्स और सोनी टीवी क्रमश: तीसरे और चौथे स्‍थान पर हैं.

जी टीवी 237 जीआरपी साथ पहले स्‍थान पर है. पिछले सप्‍ताह जी टीवी की जीआरपी 215 थी. स्‍टार प्‍लस 228 जीआरपी के साथ दूसरे स्‍थान पर है, जबकि पिछले सप्‍ताह स्‍टार प्‍लस 241 जीआरपी के साथ पहले स्‍थान पर था. कलर्स चैनल 204 जीआरपी के साथ तीसरे स्‍थान पर है जबकि पिछले सप्‍ताह कलर्स की जीआरपी 210 थी. चौथे नम्‍बर पर सोनी टीवी है, जिसकी जीआरपी 203 है, जो कलर्स से मात्र एक अंक कम है. इस सप्‍ताह इस चैनल ने अपने जीआरपी अंकों में अच्‍छी खासी बढ़ोत्‍तरी की है. पिछले सप्‍ताह सोनी टीवी का जीआरपी 187 था. सब टीवी 151 जीआरपी के साथ पांचवें स्‍थान पर तथा लाइफ ओके चैनल 120 जीआरपी के साथ छठे स्‍थान पर काबिज है.  

IRS 2012 Q3 : टॉप टेन भाषायी अखबारों में सात ने खोए अपने पाठक

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2012 के तीसरे तिमाही में प्राप्‍त आंकड़े भाषायी अखबारों के लिए उत्‍साहजनक नहीं हैं. क्षेत्रीय भाषाओं के टॉप टेन अखबारों में सात अखबारों ने अपने पाठक खोए वहीं मात्र तीन अखबारों की पाठक संख्‍या में बढ़ोत्‍तरी देखने को मिली. तीसरी तिमाही में मात्र एक बदलाव के अलावा कोई बड़ा बदलाव नहीं देखने को मिला. दैनिक थांती ने लोकमत को दूसरे स्‍थान से हटाकर अपना कब्‍जा जमा लिया.

भारत के नम्‍बर एक भाषायी दैनिक और मलयालम भाषा में प्रकाशित होने वाले मलयाला मनोरमा ने पिछले दो तिमाही में लगातार अपने पाठक खोए, परन्‍तु तीसरी तिमाही में उसने न केवल इस ट्रेंड पर रोक लगाया बल्कि अपने साथ 42000 नए पाठक भी जोड़े. अब उसके पाठकों की संख्‍या 97.52 लाख हो गई है, जो पिछली तिमाही में 97.10 लाख थी. 

तमिल भाषा के अखबार दैनिक थांती ने भी इस बार बढ़त हासिल करते हुए लोकमत को दूसरे पोजिशन से हटकर तीसरे नम्‍बर पर कर दिया. हालांकि इस बदलाव के बावजूद थांती को 14000 पाठकों को नुकसान हुआ है. थांती की पाठक संख्‍या इस तिमाही में 74.17 लाख रह गई है, जबकि दूसरी तिमाही में इस अखबार के पास 74.31 लाख पाठक थे. 

मराठी दैनिक लोकमत को बड़ा झटका लगा है. 2012 की तीसरी तिमाही में उसने अपने सबसे ज्‍यादा 98000 पाठकों को खोए हैं. इसी कारण लोकमत दूसरे स्‍थान से लुढ़ककर तीसरे स्‍थान पर पहुंच गया है. इस तिमाही में इसके पाठकों की संख्‍या 75.07 लाख से घटकर 74.09 लाख हो गई है.

चौथे नम्‍बर पर मलयालम दैनिक मातृभूमि का कब्‍जा बरकरार है. हालांकि मातृभूमि को भी इस तिमाही में 78000 पाठकों का नुकसान हुआ है. मातृभूमि की पाठक संख्‍या इस तिमाही में 64.15 लाख तक पहुंच गई है, जो इसके पहले वाले तिमाही में 64.93 लाख थी.

तेलगू दैनिक इनाडु ने पांचवें स्‍थान पर अपनी पकड़ मजबूत की है. मलयाला मनोरमा के बाद इनाडु दूसरा अखबार है जिसने अपने पाठक संख्‍या में वृद्धि दर्ज की है. इनाडु ने अपने साथ 32000 नए पाठक जोड़े हैं. पिछले तिमाही में इनाडु के पास 59.25 लाख पाठक थे, जो इस बार बढ़कर 59.57 लाख हो गए हैं.

छठवें स्‍थान पर मौजूद बंगाली दैनिक आनंद बाजार पत्रिका लगातार चौथे तिमाही में अपने पाठक खोए हैं. 2012 के तीसरे तिमाही में आनंद बाजार पत्रिका को 71000 पाठकों का नुकसान हुआ है. उसके पाठकों की संख्‍या दूसरे तिमाही के 59.70 लाख से घटकर इस तिमाही में 58.59 लाख रह गई है.  

सातवें नम्‍बर मौजूद तेलगू दैनिक साक्षी तीसरा भाषायी अखबार है, जिसे इस अवधि में अपने साथ नए पाठक जोड़ने में सफलता मिली है. साक्षी ने 2012 की तीसरी तिमाही में 37000 नए पाठकों को अपने साथ जोड़ा है. साक्षी की पाठक संख्‍या अब 53.43 लाख हो गई है, जो पिछले तिमाही में 53.06 लाख थी.

गुजराती भाषा का गुजरात समाचार आठवें स्‍थान पर मौजूद है. गुजरात समाचार ने लगातार दूसरे तिमाही में अपने पाठक खोए हैं. 2012 की तीसरी तिमाही में गुजरात समाचार के पाठकों की संख्‍या घटकर 51.53 लाख पहुंच गई है, जो पिछले तिमाही में 52.05 लाख थी.

तमिल दैनिक दिनाकरन को भी नुकसान हुआ है. दिनाकरन ने इस तिमाही में 87000 पाठकों का नुकसान हुआ है. इस तमिल दैनिक की पाठक संख्‍या 49.99 लाख से घटकर इस तिमाही में 49.12 लाख तक पहुंच गई है. इस अखबार ने पिछली तिमाही में भी अपने पाठक खोए थे.

मराठी दैनिक साकाल को भी इस बार पाठकों का नुकसान हुआ है. इस मराठी अखबार को इस तिमाही में 34000 पाठकों का नुकसान उठाना पड़ा है. साकाल की पाठक संख्‍या पिछले तिमाही में 44.37 लाख थी, जो इस तिमाही में घटर 44.03 लाख तक पहुंच गई है.

आरटीआई एक्टिविस्‍ट श्रीचंद जैन को बिजली चोरी में एक साल की सजा

नई दिल्ली : बिजली मुद्दों पर जनहित याचिका यानी पीआईएल दाखिल कर, मीडिया में सुर्खियां बटोरने वाले श्रीचंद जैन खुद बिजली चोरी मामले में फंस गए हैं। कड़कडड़ूमा स्थित बिजली की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें 11.5 किलोवॉट बिजली की चोरी करने का दोषी करार दिया है। कोर्ट ने उन्हें एक साल की कैद की सजा सुनाई है। साथ ही उन पर सिविल लायबिलिटी के तौर पर 3. 62 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। वह औद्योगिक कार्यों के लिए बिजली की चोरी करते पकड़े गए थे।

श्रीचंद जैन मीडिया के लिए एक जाना-पहचाना चेहरा हैं और बिजली कंपनियों के खिलाफ पीआईएल दाखिल कर मीडिया में सुर्खिया बटोरते रहे हैं। जैन के खिलाफ टिप्पणी करते हुए स्पेशल कोर्ट ने कहा है कि अभियुक्त को बिना किसी वैध कारण के, औद्योगिक उद्देश्यों के लिए बिजली की चोरी करते पकड़ा गया था। कोर्ट की नजर में अभियुक्त द्वारा किया गया बिजली चोरी एक गंभीर अपराध है। अभियुक्त को एक साल कैद की सजा सुनाता हूं। कोर्ट ने आगे कहा कि अभियुक्त पर, सिविल लायबिलिटी के तौर पर, 3. 62 लाख रूपये का जुर्माना भी लगाया गया है। कोर्ट के मुताबिक- अपील/ रिवीजन आदि की अवधि समाप्त होने के बाद, शिकायतकर्ता कंपनी इस राशि को वसूलने के लिए स्वतंत्र है।

गौरतलब है कि 18 मार्च, 2006 को बीवाईपीएल एन्फोर्समेंट टीम ने श्रीचंद जैन, पुत्र सूरज भान जैन, निवासी 174, न्यू सूर्यकिरण अपार्टमेंट, प्लॉट नंबर 65, आईपी एक्सटेंशन द्वारा चलाई जा रही फैक्टरी पर छापा मारा था। यह फैक्टरी जवाहर नगर में स्थित थी। बीवाईपीएल एन्फोर्समेंट टीम को सूचना मिली थी कि ट्रॉलियां बनाने वाली इस फैक्टरी में बिजली का कोई मीटर नहीं है। टीम ने जब जांच की तो सूचना सही निकली। उसके बाद एन्फोर्समेंट टीम ने श्रीचंद जैन की फैक्टरी पर छापा मारा, जहां 11. 5 किलोवॉट की बिजली चोरी पकड़ में आई। एन्फोर्समेंट टीम ने कैमरे में रेकॉर्ड किया कि फैक्टरी के पास बिजली का कोई मीटर नहीं था और वहां बीवाईपीएल के डिस्‍ट्रीब्‍यूशन बॉक्स में तार जोड़कर बिजली की सीधी सप्लाई ली जा रही थी।

छापेमारी के बाद बीवाईपीएल एन्फोर्समेंट टीम ने, इलेक्ट्रीसिटी एक्ट के प्रावधानों के तहत, श्रीचंद जैन को 4. 53 लाख रूपये का जुर्माना किया। लेकिन आरोपी ने जुर्माने की रकम का भुगतान नहीं किया। उसके बाद मामले को बिजली की स्पेशल कोर्ट में ले जाया गया। अब स्पेशल कोर्ट ने आरोपी को एक साल की जेल और 3.62 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। (पंजाब केसरी)

उप्र श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, शाहजहांपुर के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने ली शपथ

शाहजहांपुर -"हमारा संगठन पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए सदैव संघर्षरत रहा है और रहेगा"। यह उद्गार उप्र श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के प्रांतीय अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने शाहजहांपुर इकाई के शपथ ग्रहण समारोह में व्यक्त किए। श्री सिद्दीकी ने कहा कि जिला स्तर से लेकर हर स्तर तक पत्रकारों के लिए उनकी यूनियन ने सरकार से भी कई बार विभिन्न मांगों को लेकर संघर्ष किया और उसके सार्थक परिणाम भी निकले।

उन्होंने कहा कि पत्रकारों को राज्य कर्मचारियों की तरह चिकित्सा सुविधा शासन द्वारा उपलब्ध है। इसके लिए कुछ समय पूर्व सूचना विभाग द्वारा चिकित्सा कार्ड जारी किए जाते थे। जो कुछ समय के लिए बंद हो गए थे। ऐसे में पत्रकार संगठन जिला सूचना अधिकारी से अपने चिकित्सा कार्ड बनवाने के लिए प्रयास करें। प्रांतीय अध्यक्ष ने कहा कि पत्रकारों के नि:शुल्क दुर्घटना बीमा की व्यवस्था है। इसके लिए संगठनों को प्रयास करने की आवश्यकता है। शाहजहांपुर जिला इकाई द्वारा अपने सदस्यों का निशुल्क दो लाख का दुर्घटना बीमा कराए जाने पर बधाई दी।

संगठन के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्यामबाबू ने कहा कि वह पूरे भारत में जाते हैं तथा विभिन्न प्रांतों में पत्रकारों अलग-अलग समस्याओं से अवगत भी होते हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग प्रांतों में पत्रकारों को अलग-अलग तरह की सुविधाएं दी गई हैं। उनका प्रयास है कि सभी प्रांतों में पत्रकारों को एक जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इसके लिए उनका संगठन प्रयासरत है। इस अवसर पर स्पष्ट आवाज के स्थानीय संपादक एसएन सिंह ने शाहजहांपुर की टीम को बधाई दी।

इस अवसर पर प्रांतीय अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने शाहजहांपुर इकाई के अध्यक्ष प्रेम शंकर गंगवार, वरिष्ठ उपाध्यक्ष कमल सिंह, महामंत्री अमित कुमार गुप्ता, उपाध्यक्ष विनय पांडेय, कोषाध्यक्ष जगेंद्र सिंह, संगठन मंत्री शिवकुमार, मंत्री संजय श्रीवास्तव, मीडिया प्रभारी अनुज गुप्ता, सांस्कृतिक सचिव संकल्प अग्निहोत्री व अनूप गुप्ता, प्रचार मंत्री चंद्रमणि गुप्ता, विधि सलाहकार अभिषेक गुप्ता, सदस्य मनोज कुमार, नीरज बाजपेई, मुनीष कुमार आर्या, अंकित जौहर, अभिनय गुप्ता, रामविलास सक्सेना, सौरभ गुप्ता को शपथ दिलाई।

शपथ ग्रहण से पूर्व मुख्य अतिथि श्री सिद्दीकी ने मां सरस्वती के चित्र के समझ दीप प्रज्वलित व पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यकम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री सिद्दीकी, विशिष्ठ अतिथि श्यामबाबू व आमंत्रित अतिथि एसएन सिंह का वैच व माल्यार्पण कर पत्रकारों ने स्वागत किया। इस दौरान बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए। अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर व शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। इस अवसर संगठन के संरक्षक शरद कुमार सिंह, योगेश गुप्ता, संचालक कुलदीप दीपक, कार्यक्रम के अध्यक्ष सुनील अग्निहोत्री को प्रतीक चिन्ह भेट कर व माल्यार्पण कर पत्रकारों ने सम्मानित किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नवगठित जिला इकाई के अध्यक्ष प्रेम शंकर गंगवार ने कहा कि पत्रकारों के इस संगठन और अधिक मजबूत बनाकर एक मिसाल पेश की जाएगी। उन्होंने यह भी आशा जताई कि आने वाले समय में वह पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब की भी स्थापना कराएंगे। श्री गंगवार ने कहा कि पत्रकारिता दिवस पर वह संगठन के सहयोग से कुछ नया कार्यक्रम कराएंगे, जो स्वयं में अनूठा होगा।

संगठन के प्रांतीय नेताओं के आगमन पर हरदोई रोड कनेंग फार्म पर संगठन के पदाधिकारियों एवं पत्रकारों ने फूल मालाएं पहनाकर स्वागत किया। इसके बाद श्री सिद्दीकी ने खिरनीबाग में यूनियन के जिला कार्यालय का फीता काटकर उद्घाटन किया। कार्यक्रम में सरस्वती वंदना प्रस्तुत करने वाली चारू गुप्ता व सत्यमेव जयते के युगल गीत प्रस्तुत करने वाले देवराज वर्मा व ऋषभ सिंह को मुख्य अतिथि द्वारा सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में नगर पालिका चेयरमैन तनवीर खां, महिला जिला अस्पताल के सीएमएस डा. डीके सोनकर, तिलहर प्रेस क्लब के दयाशंकर शर्मा, मनोज प्रबल, सुरेंद्र सिंघल, अनुराग मिश्रा, वीनूभान सिंह, राजकिशोर, प्रेस क्लब महामंत्री सरदार शर्मा, डा. सुरेश मिश्रा, मो. सलीम खां, अवनीश मिश्रा, सचिन अग्निहोत्री, एमआइ खान, डा. आफताब अख्तर, इम्तियाज अली खां, प्रेम प्रकाश गुप्ता, इरफान ह्यूमन, नरेंद्र त्यागी, विनय गुप्ता, हेमंत डे, अशोक गुप्ता, हामिद फरीदी, सत्येंद्र सिंह शैली, मनीष गुप्ता, विनीत शुक्ला, ओमप्रकाश, विक्की साहू, नेहा दुबे, रोहित यादव, शिशांत शुक्ला, अभिषेक सिंह, जैपाल यादव, अनुज शर्मा, रजत श्रीवास्तव, आदर्श मिश्रा, सुयश सिन्हा, अमरदीप रस्तोगी, राकेश कश्यप, जिला सूचना कार्यालय के महेंद्र यादव, अनिल सैम्युअल, ओमकार व गया प्रसाद आदि सैकड़ों मीडियाकर्मी मौजूद रहे।

सोशल मीडिया के पॉवर को समझने में सरकार नाकाम : कपिल सिब्‍बल

केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने स्वीकार किया कि सरकार अभी भी सोशल मीडिया के मामले में कमजोर है. उन्होंने कहा, ‘यह एक नया माध्यम है जो तेजी से बढ़ रहा है. हमें नहीं पता की इसके साथ कैसे पेश आया जाए.’ उन्होंने कहा, ‘हमें सोशल मीडिया के पॉवर को समझना होगा. कोई भी सरकार के पास इसके पॉवर की पूरी जानकारी नहीं है और ना ही वो ये जानती है कि इसके साथ कितना संबंध रखा जाए. हालांकि सरकार को इसका उपयोग आवाम को और शक्तिशाली बनाने में करना चाहिए ना कि कमजोर करने में.’ कपिल सिब्बल टाउन हॉल में हेडलाइंस टुडे के कार्यक्रम ‘राइट टू बी हर्ड’ के दौरान युवाओं को संबोधित कर रहे थे.

हानिरहित ट्विट पर भी मनमानी गिरफ्तारी वाले सेक्शन 66 ए और आईटी एक्ट के लगातार दुरुपयोग किए जाने पर आलोचना का सामना कर रही सरकार की ओर से बोलते हुए सिब्बल ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई गैरकानूनी है जो स्वीकार्य नहीं है. उन्होंने इसके शीघ्र समाधान का वादा भी किया. उन्होंने कहा, ‘ट्विटर पर सभी को अपनी बातें रखने का हक है. आपको आलोचना करने का अधिकार है और मैं यह वादा करता हूं कि हमारी सरकार आपको परेशान नहीं करेगी. मैं आपको अपना मोबाइन नंबर दूंगा आप उसपर एसएमएस भेज सकते हैं.’

हालांकि सिब्बल ने यह भी कहा, ‘अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं है कि आप किसी फर्जी अकाउंट से ट्विट करें. अगर सरकार पारदर्शिता अपनाती है तो ट्विट करने वालों को भी ऐसा ही करना होगा. इससे इंटरनेट पर अपमानजनक टिप्पणी और आपराधिक ट्रैफिक पर रोक लगेगी.’ इसके साथ ही सिब्बल ने कहा कि सरकार को जबरदस्ती पहचान बताने के कानून को भी संशोधित करना होगा. (आजतक)

IRS 2012 Q3 : हरिभूमि ने रचा इतिहास, छत्‍तीसगढ़ में दिग्गजों को पछाड़ बना नंबर वन

कार्पोरेट और मल्टीएडीशन के शोर के बीच हरिभूमि ने सबको पीछे छोड़ते हुए कामयाबी का कीर्तिमान रचा है। दैनिक भास्कर, पत्रिका, नई दुनिया, नवभारत जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में हरिभूमि बना है नंबर वन। यह प्रगति तब हुई है जब पत्रिका छत्तीसगढ़ पहुंचा और नई दुनिया जागरण की झोली में जाने के बाद रीलांच किया गया। IRS 2012 की रिपोर्ट के अनुसार 9 लाख 26 हजार पाठक संख्या के साथ हरिभूमि छत्तीसगढ़ राज्य का सर्वाधिक पाठक संख्या वाला अखबार बन गया है।

हरिभूमि रायपुर संस्करण ने 53 हजार पाठकों की वृद्धि के साथ, 5 लाख 88 हजार की रिकार्ड औसत पाठक संख्या दर्ज की है। हरिभूमि का बिलासपुर संस्करण लगातार नवमी बार अन्य अखबारों को पीछे छोड़ता हुआ 3 लाख 38 हजार पाठक संख्या के साथ पहले नंबर पर काबिज है। छत्तीसगढ़ राज्य में हरिभूमि की औसत पाठक संख्या नवभारत से 2 लाख 76 हजार, नई दुनिया से 5 लाख 84 हजार एवं पत्रिका से 7 लाख 16 हजार अधिक है।

छत्तीसगढ़ राज्य में हरिभूमि के शहरी पाठकों एवं महिला पाठकों की संख्या सर्वाधिक है। हरिभूमि के 5 लाख 73 हजार शहरी पाठक हैं जबकि भास्कर के शहरी पाठक 5 लाख 11 हजार हैं एवं नवभारत के शहरी पाठक 2 लाख 95 हजार हैं। हरिभूमि की 2 लाख 45 हजार महिला पाठक हैं जबकि भास्कर की महिला पाठक 2 लाख 15 हजार हैं एवं नवभारत की महिला पाठक 1 लाख 09 हजार हैं। हरिभूमि ने अपने पाठकों के भरोसे को कायम रखते हुए हमेशा जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है जिसकी वजह से पाठकों ने अपना अपार स्नेह प्रदान करते हुए इसे प्रदेश का सर्वाधिक पसंदीदा अखबार बनाया है।

छत्तीसगढ़ राज्य में 9 लाख 26 हजार पाठक, मध्य प्रदेश में 2 लाख 08 हजार पाठक और हरियाणा में 2 लाख 29 हजार पाठकों के अटूट विश्वास पर हरिभूमि खरा उतरा है। आई.आर.एस. 2012 की तृतीय तिमाही रिपोर्ट में हरिभूमि नई ऊंचाई की ओर अग्रसर है। जहां बिलासपुर संस्करण के 3 लाख 38 हजार पाठक हरिभूमि पर भरोसा करते हैं वहीं नवभारत के पाठकों की संख्या 2 लाख 44 हजार है जो कि हरिभूमि की पाठक संख्या से 94 हजार कम है। बिलासपुर संस्करण में दैल्ल छत्तीसगढ़ राज्य में 9 लाख 26 हजार पाठक संख्या के साथ प्रथम पायदान पर 13 लाख 77 हजार पाठक संख्या के साथ देश के शीर्ष हिन्दी समाचार पत्रों में कायम 53 हजार पाठकों की वृद्धि के साथ हरिभूमि रायपुर संस्करण की 5 लाख 88 हजार की रिकार्ड औसत पाठक संख्या छत्तीसगढ़ राज्य में हरिभूमि के सर्वाधिक शहरी पाठक, 5 लाख 73 हजार, महिला पाठक 2 लाख 45 हजार, हरिभूमि बिलासपुर संस्करण, दैनिक भास्कर से 53 हजार और नवभारत से 94 हजार पाठक आगे दैनिक भास्कर के पाठकों की संख्या 2 लाख 85 हजार है जो कि हरिभूमि से 53 हजार कम है।

आई.आर.एस. 2012 क्‍यू3 सर्वे के मुताबिक हरिभूमि रायपुर संस्करण को 5 लाख 88 हजार पाठक पढ़ते हैं यह संख्या नवभारत, नई दुनिया एवं पत्रिका से कहीं अधिक है। हरिभूमि रायपुर संस्करण नए रिकार्ड बना रहा है। रायपुर शहर में हरिभूमि की पाठक संख्या 1 लाख 02 हजार है जबकि नवभारत की 70 हजार एवं नई दुनिया की पाठक संख्या मात्र 40 हजार है। दुर्ग-भिलाई में 1 लाख 21 हजार पाठकों का भरोसा हरिभूमि पर है। वहीं नवभारत को 58 हजार एवं नई दुनिया को 56 हजार पाठक संख्या हासिल है जिस तरह से पाठकों का भरोसा हरिभूमि पर बढ़ रहा है उस भरोसे एवं विश्वास को कायम रखते हुए अपनी उत्कृष्ट एवं निर्भीक पत्रकारिता के दम पर ही हरिभूमि लगातार नए सोपान की ओर अग्रसर है। (हरिभूमि)

IRS 2012 Q3 : 1.98 करोड़ पाठकों के साथ ‘दैनिक भास्कर ग्रुप’ देश का सबसे बड़ा समाचार पत्र समूह

जयपुर : दैनिक भास्कर जयपुर में 10.52 लाख पाठकों के साथ फिर सबसे आगे है। यह तादाद प्रतिद्वंद्वी अखबार से 34 फीसदी ज्यादा है। राजस्थान के शहरी क्षेत्रों में पढ़ा जाने वाला सबसे बड़ा अखबार भी यही है। प्रदेश के किसी भी शहर में 10 लाख से अधिक पाठक संख्या वाला दैनिक भास्कर एकमात्र अखबार है। पाठकों का यह समर्थन बताता है कि अखबार की ओर से दी जाने वाली खबरें, विश्लेषण और फीचर उनकी जिंदगी को प्रभावित कर रही हैं।

यह नतीजे इंडियन रीडरशिप सर्वे (आईआरएस) के एवरेज इश्यू रीडरशिप (एआईआर) के हैं। सर्वे वर्ष 2012 की तीसरी तिमाही का है। 1.98 करोड़ पाठकों के साथ ‘दैनिक भास्कर ग्रुप’ देश का सबसे बड़ा समाचार पत्र समूह बन गया है। समूह के 13 राज्यों में चार भाषाओं में 65 संस्करण हैं। तीन महीने में समूह ने दो लाख नए पाठक जोड़े हैं। भास्कर ने 46.33 लाख पाठकों के साथ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सभी जगह अपना दबदबा बरकरार रखा है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रायपुर, दुर्ग और भिलाई शहरों में भास्कर शीर्ष पर बना हुआ है। अहमदाबाद में ‘दिव्य भास्कर’ 29 फीसदी ज्यादा पाठकों के साथ सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है। यह शहर का एकमात्र गुजराती अखबार है, जिसकी पाठक संख्या 10 लाख से अधिक है। (भास्‍कर)

IRS 2012 Q3 : राजस्‍थान में पत्रिका नम्‍बर वन, एमपी में भी तेज बढ़त

मुम्बई। भारतीय पाठक सर्वेक्षण (आईआरएस) की मुम्बई में जारी ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक पत्रिका समूह की कुल पाठक संख्या एक करोड़ 98 लाख 62 हजार हो गई है। अपनी विश्वसनीय खबरों के लिए देशभर में पहचान रखने वाले राजस्थान पत्रिका को इस रिपोर्ट में एक बार फिर राजस्थान का सिरमौर घोषित किया गया है। मध्यप्रदेश में भी पत्रिका ने करीब 33 हजार कुल नए पाठक जोड़े हैं। अन्य सभी प्रमुख अखबारों की पाठक संख्या में इस अवधि में गिरावट आई है। राजस्थान पत्रिका ने इस अवघि में 62 हजार औसत पाठक जोड़े हैं जो देश के दस शीर्ष अखबारों में सर्वाधिक बढ़त है।

पत्रिका समूह ने जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा व बीकानेर समेत शहरी क्षेत्रों में 58.49 लाख कुल पाठकों के साथ अपना शीर्ष स्थान बनाए रखा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पत्रिका ने पहले से ही बढ़त ले रखी है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट (जनवरी-जून 2012) के हिसाब से जयपुर शहर में राजस्थान पत्रिका नम्बर 1 अखबार है। प्रदेश के कुल हिन्दी पाठकों में से लगभग 82 प्रतिशत पत्रिका समूह के अखबार पढ़ते हैं। जोधपुर संस्करण में तो प्रतिस्पर्द्धी से पत्रिका 3.58 लाख औसत पाठक संख्या ज्यादा है। इसी तरह कोटा संस्करण में पत्रिका के 2.18 लाख औसत पाठक संख्या ज्यादा है। इस रिपोर्ट के अनुसार पत्रिका का रेडियो स्टेशन 95 एफएम तड़का जयपुर और कोटा शहरों में नम्बर 1 रेडियो स्टेशन घोषित किया गया है।

मध्यप्रदेश में तेज रफ्तार

करीब पौने पांच वर्ष पूर्व भोपाल से पहला संस्करण शुरू कर मप्र पर छाए पत्रिका ने 2012 की तीसरी तिमाही में प्रदेश में करीब 33 हजार नए कुल पाठक जोड़े हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में 6.32 लाख कुल पाठकों के रूप में धमाकेदार उपस्थिति दी है। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में पाठक संख्या के ये आंशिक आंकड़े ही हैं। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में अल्प समय में ही पत्रिका को पाठकों का जो स्नेह मिला है वह पाठकों का पत्रिका की निर्भीक लेखनी पर भरोसा दर्शाता है। वहां पत्रिका ने हर मुद्दे पर जनता की आवाज उठाई तथा पीडितों को राहत दिलाने का काम किया।

पत्रिका के प्रति पाठकों के रूझान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसी तिमाही में वहां दैनिक जागरण के 43 हजार, नई दुनिया के 98 हजार, नवभारत के 60 हजार, दैनिक भास्कर के 1.03 लाख तथा राज एक्सप्रेस के 80 हजार कुल पाठक संख्या में गिरावट आई है। कुल 3 लाख 84 हजार पाठकों ने इन अखबारों से मुंह मोड़ा है। कलम की पैनी धार और सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ पाठकों के विश्वास से पत्रिका ने यह उपलब्धि हासिल की है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (जनवरी-जून 2012) के आंकड़ों के अनुसार पत्रिका समूह देश के दूसरे सबसे बड़े हिन्दी दैनिक अखबार समूह के रूप में उभर कर आया है।

एकाधिकार ध्वस्त

आईआरएस के इस सर्वे की विशेष बात यह है कि पत्रिका ने मध्यप्रदेश में अभी तक छाए एकाधिकार को जबर्दस्त तरीके से ध्वस्त कर दिया। उल्लेखनीय है कि ऑडिट ब्यूरो आफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट (जनवरी-जून 2012) के अनुसार पत्रिका भोपाल व इन्दौर जैसे प्रमुख शहरों में नम्बर वन है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि कितनी तेजी से मध्य प्रदेश के पाठक पुराने अखबार से नाता तोड़ कर पत्रिका से जुड़ रहे हैं। पाठकों के स्नेह और विश्वास के दम पर अर्जित यह सफलता हम अपने पाठकों को ही समर्पित करते हैं। (पत्रिका)

IRS 2012 Q3 : अमर उजाला की श्रेष्ठता बरकरार, पाठक तीन करोड़ के पार

अपनी श्रेष्ठता को बरकरार रखते हुए अमर उजाला की बढ़त का सिलसिला जारी है। अखबार उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में नंबर वन के स्थान पर बरकरार है। आईआरएस 2012 की तीसरी तिमाही के लिए जारी कुल पाठक संख्या (टीआर) आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में अमर उजाला के पाठकों की संख्या देश भर में तीन करोड़ एक लाख से ऊपर हो गई है।

यूपी-उत्तराखंड में कुल पाठक संख्या बढ़त के साथ 2 करोड़ 71 लाख पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश में अखबार का शानदार प्रदर्शन जारी है। खास बात यह है कि यूपी में 60 हजार रुपये से एक लाख रुपये (पुरुष) मासिक आय वर्ग में (एआईआर) अमर उजाला प्रथम स्थान पर है।

कॉम्पैक्ट यूपी में नंबर-1

अमर उजाला के कॉम्पैक्ट अखबार को यूपी में बेहद पसंद किया जा रहा है। अपने खास आकार का यह अखबार अमर उजाला कॉम्पैक्ट आईआरएस 2012 की तीसरी तिमाही में अच्छी बढ़त दर्ज करते हुए 26 लाख से अधिक पाठकों के साथ प्रदेश में नंबर वन है। उल्लेखनीय है कि कॉम्पैक्ट का प्रकाशन यूपी के छह प्रमुख नगरों से होता है। (अमर उजाला)

IRS 2012 Q3 : प्रभात खबर लगातार सबसे तेज बढ़ता अखबार

: बिहार में जबरदस्त बढ़त, एक साल में 129 फीसदी औसत पाठक बढ़े : प्रभात खबर पाठक संख्या के मामले में देश के शीर्ष 10 हिंदी अखबारों में लगातार सबसे तेज वृद्धि दर्ज करने वाला अखबार बना हुआ है. 2012 की तीसरी तिमाही के लिए आइआरएस पाठक सर्वेक्षण (आइआरएस 2012 – क्यू 3) के नतीजों के मुताबिक प्रभात खबर ने पिछली तिमाही के मुकाबले एवरेज इशू पाठक संख्या में 5.34 फीसदी और कुल पाठक संख्या में 3.52 फीसदी की मजबूत बढ़त दर्ज की है. एवरेज इशू पाठक संख्या के मामले में शीर्ष दस अखबारों में से आठ अखबार एक फीसदी की वृद्धि भी नहीं दर्ज कर पाये.

कुल पाठक संख्या में तो प्रभात खबर को छोड़ कर कोई भी अखबार एक फीसदी तक भी नहीं पहुंचा. शीर्ष दस की सूची में सातवें स्थान पर मजबूती से खड़ा प्रभात खबर छठे स्थान की ओर तेजी से अग्रसर है. 2011 की तीसरी तिमाही के मुकाबले प्रभात खबर ने इस तिमाही में अपनी कुल पाठक संख्या में 30 फीसदी और एवरेज इशू पाठक संख्या में 34 फीसदी की ऊंची छलांग लगायी है.

बिहार में प्रभात खबर ने एवरेज इशू पाठक संख्या में 13.9 फीसदी की बढ़त हासिल की है जबकि हिंदुस्तान की एवरेज इशू पाठक संख्या में गिरावट आयी है और दैनिक जागरण मामूली बढ़त ही दर्ज कर पाया है. पटना शहर में प्रभात खबर के एवरेज इशू पाठकों में 7.89 फीसदी की वृद्धि हुई है. यहां हिंदुस्तान की एवरेज इशू पाठक संख्या में 1.68 फीसदी की कमी और दैनिक जागरण की एवरेज इशू पाठक संख्या में 4.88 फीसदी की कमी आयी है. मिथिला क्षेत्र (मुजफ्फरपुर प्रसार क्षेत्र) में एवरेज इशू पाठक संख्या में प्रभात खबर ने 21.72 फीसदी की जबरदस्त बढ़त दर्ज की है. यहां दैनिक जागरण ने 4.37 फीसदी की कमी दर्ज की और हिंदुस्तान अति मामूली बढ़त ही दर्ज कर पाया. मगध क्षेत्र (गया प्रसार क्षेत्र) की एवरेज इशू पाठक संख्या में प्रभात खबर की वृद्धि दर 15.87 फीसदी रही, जबकि हिंदुस्तान ने यहां 3.13 फीसदी की कमी दर्ज की है.

पिछले एक साल में बिहार में एवरेज इशू पाठक संख्या 129 फीसदी बढ़ी है. पटना शहर में 2011 की तीसरी तिमाही के मुकाबले 2012 की तीसरी तिमाही में एवरेज इशू पाठक संख्या 27 फीसदी, मिथिला में 201 फीसदी, भोजपुर में 43 फीसदी और मगध में 118 फीसदी बढ़ी है. इस अवधि में हिंदुस्तान में एवरेज इशू पाठक संख्या में दो फीसदी की कमी आयी है. कुल पाठक संख्या के मामले में भी प्रभात खबर बिहार में सबसे तेज बढ़ने वाला अखबार बना हुआ है. इसने कुल पाठक संख्या में 9.42 फीसदी की मजबूत बढ़त दर्ज की है जबकि दैनिक जागरण की कुल पाठक संख्या 0.8 फीसदी कम हुई. हिंदुस्तान नाम मात्र की बढ़त दर्ज कर पाया.

पटना में हिंदुस्तान और दैनिक जागरण की कुल पाठक संख्या में जहां गिरावट आयी है, वहीं प्रभात खबर ने 3.26 फीसदी की बढ़त दर्ज की है. मिथिला में प्रभात खबर की वृद्धि दर प्रतिद्वंद्वी दोनों अखबारों के दोगुने से भी ज्यादा रही.

प्रभात खबर की कुल पाठक संख्या में यहां 13.75 फीसदी की वृद्धि हुई है. भोजपुर में प्रभात खबर की कुल पाठक संख्या में वृद्धि दर 21.52 फीसदी रही. जबकि हिंदुस्तान 6.56 और दैनिक जागरण 4.11 फीसदी दर्ज कर पाया. मगध में हिंदुस्तान व दैनिक जागरण की कुल पाठक संख्या में जहां क्रमश: 7.8 व 9.04 फीसदी की कमी आयी. पिछले एक साल में प्रभात खबर की बिहार में कुल पाठक संख्या 89 फीसदी बढ़ी है. पटना शहर में 2011 की तीसरी तिमाही के मुकाबले 2012 की तीसरी तिमाही में कुल पाठक संख्या 25 फीसदी, मिथिला में 171 फीसदी, भोजपुर में 113 फीसदी और मगध में 36 फीसदी बढ़ी है.

झारखंड में प्रभात खबर रांची, जमशेदपुर और धनबाद (धनराज) में सबसे ज्यादा पढ़ा जानेवाला अखबार बना हुआ है. 2011 की तीसरी तिमाही के मुकाबले 2012 की तीसरी तिमाही में प्रभात खबर ने धनबाद में एवरेज इशू पाठक संख्या 12 फीसदी बढ़ायी है और जमशेदपुर में कुल पाठक संख्या आठ फीसदी बढ़ी है. इस अवधि के दौरान बंगाल में भी प्रभात खबर ने कुल पाठक संख्या में वृद्धि दर्ज की है. यदि बिहार और झारखंड को मिला दिया जाये तो 2011 की तीसरी तिमाही के मुकाबले 2012 की तीसरी तिमाही में प्रभात खबर की एवरेज इशू पाठक संख्या 36 फीसदी और कुल पाठक संख्या 32 फीसदी बढ़ी है.

रेडियो ‘धूम’ रांची में नंबर एक

आइआरएस की तीसरी तिमाही के सर्वेक्षण के मुताबिक प्रभात खबर समूह का रेडियो धूम रांची में श्रोताओं की पसंद के मामले में लगातार नंबर एक पर बना हुआ है. रांची में दो लाख 15 हजार श्रोताओं ने रेडियो धूम को अपनी पहली पसंद बनाया है. रांची और जमशेदपुर दोनों केंद्रों को मिला कर झारखंड में नौ लाख 33 हजार श्रोता रेडियो धूम को सुनते हैं और श्रोताओं की पसंद के मामले में झारखंड में दूसरे स्थान पर काबिज है. (प्रभात खबर)

IRS 2012 Q3 : 5.6 करोड़ पाठकों के साथ जागरण 24वीं बार नम्‍बर वन

नई दिल्ली। 'दैनिक जागरण' ने 5.6 करोड़ सुधी पाठकों के साथ लगातार 24वीं बार देश के नंबर वन समाचार पत्र का दर्जा प्राप्त कर नया कीर्तिमान बनाया है। वर्ष 2012 की तीसरी तिमाही में दैनिक जागरण ने 45 हजार नए पाठक जोड़े हैं। इंडियन रीडरशिप सर्वे 2012 के तीसरी तिमाही के नतीजों के मुताबिक दैनिक जागरण के पाठकों की संख्या अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी समाचार पत्र के मुकाबले 1.7 करोड़ अधिक है।

देश के तीन शीर्ष अखबारों में दैनिक जागरण की पाठक संख्या हर तरह से सबसे ज्यादा बढ़ी है। पाठकों की संख्या प्रतिशत के लिहाज से भी बढ़ी है और संख्या के लिहाज से भी पहली तिमाही के मुकाबले अधिक रही है। पूरे देश में पाठकों ने इस तिमाही में दैनिक जागरण को हाथों हाथ लिया। दैनिक जागरण को कंज्यूमर सुपरब्रांड और बिजनेस सुपरब्रांड का दर्जा मिल चुका है। इतना ही नहीं, बीबीसी-रायटर के स्वतंत्र सर्वे में इसे प्रिंट मीडिया में खबरों का सबसे विश्वसनीय स्रोत माना गया है। कंपनी ने अन्य क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन किया है। जागरण समूह के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के पाठकों को मिला देने पर इनकी संख्या 6.9 करोड़ है, जो भारत में सर्वाधिक है। (जागरण)

IRS 2012 Q3 : दूसरे नंबर पर और मजबूत हुआ ‘हिन्दुस्तान’

देश के तेजी से बढ़ते अखबार ‘हिन्दुस्तान’ की कुल पाठक संख्या अब बढ़कर 3.90 करोड़ हो गई है। नवीनतम इंडियन रीडरशिप सर्वे (आईआरएस क्यू3-2012) के मुताबिक, ‘हिन्दुस्तान’ ने देश के अग्रणी अखबारों में अपने दूसरे स्थान को और मजबूत किया है। वहीं, ‘हिन्दुस्तान’ के निकटतम प्रतिद्वंद्वी दैनिक भास्कर को इसी अवधि में पाठक संख्या के मामले में नुकसान हुआ है और इस समय इसकी पाठक संख्या 3.51 करोड़ है। सर्वे के मुताबिक ‘हिन्दुस्तान’ और दैनिक भास्कर के बीच कुल पाठक संख्या का अंतर बढ़कर 38 लाख हो गया है।

‘हिन्दुस्तान’ ने पिछले तीन साल में निरंतर पाठक संख्या में इजाफा दर्ज किया है। ‘हिन्दुस्तान’ की पाठक संख्या आईआरएस के पिछले 16 दौर में आगे बढ़ी है। पाठक संख्या में तेज वृद्धि अखबार द्वारा पिछले तीन साल में शुरू किए गए विस्तार अभियान के बूते हासिल की गई है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अब ‘हिन्दुस्तान’ की कुल पाठक संख्या 1.56 करोड़ तथा औसत अंक पाठक संख्या 45 लाख हो गई है। ‘हिन्दुस्तान’ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्य का इकलौता ऐसा अखबार है जिसने पिछले एक साल के दौरान वृद्धि दर्ज की है और अब इन राज्यों की कुल पाठक संख्या में इसकी 36% की तगड़ी हिस्सदारी है। मुश्किल आर्थिक हालात के बावजूद हिन्दुस्तान राज्य के सभी प्रमुख शहरों में तेज वृद्धि दर्ज करा रहा है, जबकि ज्यादातर शहरों में इसके प्रतियोगियों के पाठक घटे हैं। (हिंदुस्‍तान)

प्रेस फोटोग्राफर मदन साहू समेत कई पर फायरिंग करने वाला सुरक्षा अधिकारी गिरफ्तार

जमशेदपुर में बर्मामाइंस थाना अंतर्गत टाटा स्टील यार्ड गेट के पास बीते 24 दिसंबर को कंपनी सुरक्षाकर्मियों द्वारा की गई फायरिंग मामले के आरोपी टाटा स्टील के सुरक्षा अधिकारी एसपी सिंह को पुलिस ने मंगलवार को कोर्ट में पेश किया. कोर्ट ने उन्‍हें न्‍यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. उल्‍लेखनीय है कि ऑक्‍शन यार्ड गेट पर बवाल होने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने फायरिंग कर दी थी, जिसमें कई मजदूरों के साथ एक प्रेस फोटोग्राफर मदन साहू भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

मदन साहू के बयान पर पुलिस ने टाटा स्‍टील के सुरक्षा अधिकारी समेत कई लोगों पर मामला दर्ज किया था. इस बीच मदन साहू को इलाज के लिए चेन्‍नई भेज दिया गया था. इसके पहले गेट पर फायरिंग के मामले में एक सुरक्षाकर्मी महेंद्र सिंह को भी आरोपी बनाया गया है. महेंद्र ने अग्रिम जमानत की याचिका दायर की है, जिस पर पांच फरवरी को सुनवाई होगी. इस बीच पुलिस ने सुरक्षा अधिकारी एसपी सिंह को टाटा मुख्‍य अस्‍पताल से हिरासत में ले लिया, जो हाथ में चोट लगने के बाद अपना इलाज करा रहे थे.

जौनपुर में पत्रकार आशीष सहित उनके पिता-भाई पर मुकदमा दर्ज

: न्‍यायालय के आदेश पर पंजीकृत हुआ मामला : जौनपुर। जौनपुर न्यायालय एसीजेएम तृतीय के आदेश पर थाना बदलापुर पुलिस ने ग्राम पुरानी बाजार निवासी कथित पत्रकार आशीष पांडेय सहित उनके पिता अवनीश कुमार पांडेय भाई राजेन्द्र प्रसाद पांडेय पर आईपीसी की धारा 419, 420, 323, 504, 506 सहित हरिजन बनाम सवर्ण का मुकदमा पंजीकृत किया है। घटना 10 अगस्त 2009 की है। ग्राम हकारपुर निवासी सर्वजीत पुत्र रामकरन के मुताबिक उसे सफाईकर्मी के पद पर नौकरी दिलाने का झांसा देकर आशीष, उसके पिता व भाई ने उससे दस हजार रुपया लिया था। 

सर्वजीत ने बताया कि इन लोगों ने नौकरी लगने के बाद के बाद शेष धनराशि चालीस हजार देने की बात कही। पर इन लोगों ने नौकरी दिलाने के नाम पर सर्वजीत को वर्षों दौड़ाया। नौकरी न मिलने की आहट पाते ही सर्वजीत ने अपने दस हजार रुपयों की वापसी की मांग आशीष पांडेय तथा उनके पिता व भाई से करने लगा। दर्ज मुकदमे के मुताबिक पांडेय परिवार ने चार माह पूर्व पैसा लौटाने की बात करते हुए उसे घर बुलाया। निश्चित समय पर जब सर्वजीत आशीष पांडेय के घर रुपया लेने पहुंचा तो सुनियोजित षणयंत्र के मुताबिक लोगों ने उससे मारपीट करने के बाद जातिसूचक शब्द से अपमानित करते हुए दरवाजे से भगा दिया।

पीडित सर्वजीत ने इस बात की लिखित तहरीर पुलिस को सौंपते हुए मुकदमा पंजीकृत करने की मांग की, परन्‍तु पुलिस ने आशीष के दबाव में मुकदमा दर्ज नहीं किया। अंत में थक हारकर सर्वजीत ने न्‍यायालय की शरण ली। न्‍यायालय ने पूरा मामला सुनने के बाद पुलिस को उपरोक्‍त धाराओं में मामला पंजीकृत करने का आदेश दिया है। पीडि़त का यह भी आरोप है कि पांडेय परिवार भोले भाले लोगों को बरगलाकर उनका शोषण भी करता है।

देश में तेजी से बढ़ रहा है रीजनल चैनलों का बाजार

देश में रीजनल यानी क्षेत्रीय भाषा के टीवी चैनलों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। इस सेग्मेंट में कारोबारी संभावनाएं और अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करने के लिए रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क हिन्दी भाषी राज्यों में चैनल विस्तार की योजना बना रहा है।

रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड के बिजनेस हेड (लैंग्वेज टीवी) सुनील कुमारन ने बिजनेस भास्कर को बताया कि रीजनल टीवी चैनल का बाजार यानी क्षेत्रीय टीवी चैनलों का बाजार पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है, जिसमें कई मीडिया हाउस पहले से मौजूद हैं। हम इस बढ़ते बाजार में अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाने के लिए अगले कुछ महीनों में हिन्दी भाषी क्षेत्रों में विस्तार करने की योजना बना रहे हैं। हम अगले कुछ महीनों में नए बाजारों में प्रवेश की योजना पर कार्य भी कर रहे हैं। हमने हाल ही में बिहार और झारखंड में बिग मैजिक की शुरुआत की है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब में हम पहले से मौजूद हैं।

उन्होंने बताया कि हम क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट को अपने कार्यक्रमों में प्रयोग कर रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक दर्शकों को अपने साथ जोड़ सकें। साथ ही गृहणियों और युवाओं के लिए विशेष प्रोग्राम पेश कर रहे हैं। जैसे हाउस वाइफ के लिए 'बिग मेम साहब' टेलेंट शो और 'बिग फेम' शो मुख्य हैं जिनकी शुरुआत हाल में की गई है। डिजिटाइजेशन शुरू होने के बाद टीवी देखने का अनुभव काफी बदला है, जिसका फायदा रीजनल टीवी चैनलों को  हो रहा है।

उनके मुताबिक कुछ वर्ष पहले क्षेत्रीय भाषा के चैनल या प्रोग्राम लोकल केबल नेटवर्क द्वारा दिए जाते रहे हैं, जिसकी गुणवत्ता और रचनात्मकता काफी खराब हुआ करती थी। लेकिन इस बाजार में कई कंपनियों के प्रवेश के बाद कंटेंट और प्रोग्राम की गुणवत्ता अच्छी हुई है। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत में क्षेत्रीय टीवी चैनल की गुणवत्ता और बाजार काफी अच्छा है। हम इसी की तर्ज पर हिन्दी भाषी क्षेत्र के टीवी चैनलों के बाजार को बढ़ाने पर कार्य कर रहे हैं। इस बाजार में अधिक से अधिक कंपनियों का प्रवेश प्रतियोगिता के साथ बाजार को बढ़ाव भी देगा, जिससे विज्ञापनदाता भी इस ओर रुख करेंगे।

हाल में ही विज्ञापनदाताओं का आकर्षण बढ़ा है। मौजूदा समय में मुख्य कंपनियां दूसरे और तीसरे और कस्बाई क्षेत्रों के ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए क्षेत्रीय भाषा के चैनल को विज्ञापन देने के लिए चुन रही हैं। उन्होंने कहा कि वे कारोबार को मजबूत करने और हिस्सेदारी बढ़ाने पर फोकस कर रहे हैं। हमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब से दर्शकों का काफी अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। हमें उम्मीद है कि बिहार और झारखंड से भी अच्छा प्रतिसाद और कारोबार देखने को मिलेगा। उनके एंटरटेनमेंट चैनल अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में हैं।

जहां हम अपने भारतीय दर्शकों को सभी प्रकार के प्रोग्राम का स्वाद दे रहे हैं। बता दें कि श्री अधिकारी ब्रदर्स का रीजनल टीवी चैनल 'दबंग' उत्तर प्रदेश और बिहार में मौजूद है। जानकारों का कहना है कि आनेवाले दिनों में क्षेत्रीय भाषा के चैनलों में प्रतियोगिता तेज हो सकती है। (बिजनेस भास्‍कर)

न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में कर्मचारियों को मिला इंक्रीमेंट

मंदी और घाटे वाली पत्रकारिता के इस दौर में न्यूज़ एक्सप्रेस में पत्रकार खुश हैं. प्रबंधन ने चैनल के कर्मियों को इंक्रीमेंट एवं प्रमोशन दिया है. न्यूज़ एक्सप्रेस के नोएडा दफ्तर में 28 जनवरी को इस बाबत ज्‍यादातर कर्मचारियों को लेटर दे दिए गए हैं. सभी की सैलरी एक जनवरी से बढ़ा हुआ माना जाएगा. सैलरी बढ़ने के बाद सभी पत्रकारों के अंदर खुशी है. न्यूज़ एक्सप्रेस में दो साल में पहली बार तनख्वाह में बढ़ोतरी की गई है.

लांचिंग के बाद से किसी भी तरह का प्रमोशन या इंक्रीमेंट नहीं हुआ था. इससे पहले दिवाली के मौके पर पहली बार ही बोनस भी बांटा गया था.  प्रबंधन ने सैलरी बढ़ाने का फैसला चैनल के सुधरते कंटेंट और रेवेन्यू में लगातार हो रहे इजाफे को देखते हुए लिया है. लेकिन माना जा रहा है कि इंक्रीमेंट एवं प्रमोशन का असल क्रेडिट चैनल हेड निशांत चतुर्वेदी को है, जो प्रबंधन को कर्मचारी हित में समझाने में सफल रहे.

माना जा रहा है कि न्यूज एक्सप्रेस प्रबंधन ने अपने लोगों के हौसले को बढ़ाने के लिए स्ट्रेटजिकली सैलरी बढ़ाने का दांव खेला है. वैसे पिछले दो साल से इस चैनल में सेलरी नहीं बढ़ने से लोगों में काफी रोष था. तमाम लोग दूसरे चैनलों में भी अपना आशियाना ढूंढ रहे थे, लेकिन इंक्रीमेंट के बाद न्यूज़ एक्सप्रेस टीवी कर्मियों में खुशी का माहौल है. सैलरी बढ़ाये जाने के बाद संपादकीय लोगों ने मीटिंग करके प्रबंधन के लोगों को धन्यवाद भी दिया.

ब्रांड ट्रस्‍ट रिपोर्ट में आजतक बना सबसे विश्‍वसनीय ब्रांड

ब्रांड ट्रस्ट रिपोर्ट 2013 की मीडिया श्रेणी में आजतक को देश का सबसे विश्वसनीय ब्रांड बताया गया है. इस रिपोर्ट को तैयार करने में साल भर से ज्यादा का समय लगा है. देश के 16 शहरों से इक्कट्ठे किये गए आंकड़ों के हवाले से इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है और लोगों ने एक बार फिर आजतक पर अपना भरोसा बनाए रखा है. आजतक की इस बादशाहत पर ट्रस्ट के सीईओ को भी कोई आश्‍चर्य नहीं हुआ.

अगले साल से इस सर्वे को और व्यापक तौर पर कराने की तैयारी की जा रही है. इस सर्वे के दौरान इंटरव्यू को कई बार क्रॉस चेक किया जाता है और जवाबों को 61 कसौटियों पर तौला जाता है. जिसमें सभी लोग सैलरी वाले होते हैं और उनकी उम्र 21 से 50 साल के बीच ही होती है. इस रिपोर्ट की खासियत ये है कि इस रिपोर्ट की मदद से कंपनियां अपनी खामियों और ताकतों को पहचान सकती हैं. (आजतक)

‘रायल बुलेटिन’ अखबार को पत्रकारों, प्रबंधकों, आपरेटरों की जरूरत

कई शहरों से प्रकाशित 'रायल बुलेटिन' अखबार को पत्रकारों, प्रबंधकों, आपरेटरों आदि की जरूरत है. 'रायल बुलेटिन' का आफिस नोएडा सेक्टर 26 में है. अखबार को कई जिलों में ब्यूरो प्रमुखों की भी जरूरत है. नीचे रायल बुलेटिन के विज्ञापन का प्रकाशन किया जा रहा है. इच्चुक लोग अप्लाई कर सकते हैं.

वीरेन डंगवाल की एंजियोप्लास्टी हुई, परसों घर लौटेंगे

मशहूर कवि और अमर उजाला के निदेशक वीरेन डंगवाल की दिल्ली के एस्कोर्ट हास्पिटल में एंजियोप्लास्टी की गई. करीब घंटे भर तक चली एंजियोप्लस्टी के तहत दो स्टेन डाले गए. सब कुछ बेहद कामयाब रहा. सर्जरी टीम का नेतृत्व जाने-माने कार्डियोलाजिस्ट डा. अशोक सेठ ने किया. उनके साथ करीब चार डाक्टरों की टीम थी. वीरेन डंगवाल कल तक आईसीयू में रहेंगे और संभवतः परसों दिल्ली में अपने पुत्र के घर चले जाएंगे.

वीरेन डंगवालसर्जरी के समय दिल्ली के एस्कोर्ट हास्पिटल में वीरेन डंगवाल के परिजन व शुभचिंतक मौजूद रहे. देश भर से उनके स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए लोगों ने शुभकामना संदेश भेजे हैं.

ज्ञात हो कि वीरेन डंगवाल की तबीयत उस समय खराब हो गई थी जब वह दिल्ली से फ्लाइट से रायपुर पहुंचे और वहां रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन रायगढ़ गए जहां उन्हें एक कवि गोष्ठी में शिरकत करना था. रायपुर से ही उन्हें सीने में दर्द व घबराहट सी महसूस हो रही थी लेकिन उन्होंने इसे इगनोर किया और रायगढ़ में उनकी तबीयत जब काफी बिगड़ गई तब उन्हें रायगढ़ स्थित जिंदल-एस्कोर्ट हास्पिटल में भर्ती कराया गया. कुछ दिनों तक वहां इलाज के बाद उन्हें रायगढ़ से फ्लाइट से डाक्टरों की देखरेख में दिल्ली स्थित एस्कोर्ट हास्पिटल लाया गया. यहां गहन जांच-पड़ताल के बाद उनकी एंजियोप्लास्टी करने का फैसला लिया गया.

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राहुल गांधी से याराना के कारण राज्यसभा जा सकते हैं शाहरुख खान!

फ़िल्मी सफलता ने शाहरुख का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. वे हर बात को अपने मुसलमान होने से जोड़ने के आदी हो चुके हैं. चाहे उनके मकान '' मन्नत '' के नवीनीकरण का मामला हो या फिल्म स्वदेश के प्रदर्शन का या फिर अमेरिकी विमानतलों पर दो – दो बार हुई उनकी नंगाझोरी या तलाशी या फिर लम्बी पूछताछ का. उनके मकान ''मन्नत'' के अनधिकृत हिस्से पर वृहन मुंबई नगर पालिका की कार्यवाही का सवाल हो या पडौसी दिलीप कुमार को होने वाली असुविधा का उन्होंने बहुत अकड दिखाई थी. भला हो राहुल गांधी का जिन्होंने ये मामले सुलटवाये.

फिल्म स्वदेश की रिलीज के समय भी उन्होंने शिवसेना और उसके प्रमुख स्व.बाला साहब ठाकरे को खूब तेवर दिखाये थे और बाद में पिछले दरवाजे से अंततः समझौते पर उतर आये थे. खुले आम सिगरेट पीने में वह अपनी शान समझते हैं और मना करने पर तौहीन. दो वर्ष पूर्व वे क्रिकेट ग्राउंड पर अपने बच्चों को मुद्दा बनाकर सिक्योरिटी गार्ड से भी वे उलझ पड़े थे. बाद में उससे भी माफ़ी मांगकर पिंड छुडा पाये थे.

अमिताभ बच्चन से भी वे बहुत खार खाते हैं और कई बार उनसे अकारण उलझ चुके हैं. अमिताभ के तब के अनन्य मित्र अमरसिंह के धमकाने के बाद ही शाहरुख की अकल ठिकाने आई थी. मोटी रकम लेकर शादियों में शोहदों की तरह नाचने वाले शाहरुख को शायद ही कोई ठीक कर सकता है. एक फिल्म निर्माता करण जौहर है जो उन्हें थोड़ी समझाइश दे सकते हैं , लेकिन सुना है उनसे भी कुछ खटपट चल रही है .

हर बात को विवाद बनाना और फिर उसमें अपनी पब्लिसिटी खोजना कुछ लोगों का शगल होता है. शाहरुख उसी ज़मात में आते हैं. लोकप्रिय होकर भी भारत में स्वयं को असुरक्षित या दोयम दर्जे का नागरिक कहकर उन्हें क्या लाभ होने वाला है यह तो वे ही जाने लेकिन इस बहाने अपने लिए मुफ्त की सुरक्षा हासिल करने का हकदार उन्होंने खुद को जरूर बना लिया है. एक कयास यह भी है लगाया जा रहा है कि करियर के ढलान और पीठ दर्द के कारण शाहरुख खान राहुल गांधी से याराना के चलते राजनीति में पोजीशन या राज्यसभा में अपनी सीट आने वाले दिनों में पक्की करवा सकते हैं.

Devendra Surjan के फेसबुक वॉल से.

दारू पीकर महिला पत्रकार को छेड़ने वाले बीएसएफ जवान की पिटाई

नई दिल्ली: कोलकाता में सोमवार शाम एक महिला पत्रकार से छेड़खानी का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि यह हरकत बीएसएफ के एक जवान ने की, जो नशे में धुत था। इसके दो और साथी भी वहां मौजूद थे। बीएसएफ के जवान ने जब बदतमीजी शुरू की तो महिला ने मदद के लिए आवाज लगाई और देखते ही देखते काफी लोग वहां आ गए।

एक जवान को छोड़ बाकी दो वहां से फरार हो गए। इसके बाद लोगों ने आरोपी जवान की जमकर धुनाई कर दी। हंगामा इतना बढ़ गया कि पुलिस को लोगों पर लाठीचार्ज करना पड़ा और तब जाकर जवान को भीड़ के चंगुल से बचाया गया। पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया है।

पत्रकार हत्या मामले में नेपाली प्रधानमंत्री भट्टाराई सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश

एक पत्रकार की हत्या की जांच में कथित रूप से दखल देने पर अवमानना के मामले मे नेपाली प्रधानमंत्री सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश हुए. नेपाल में 2004 में एक पत्रकार की संदिग्ध माओवादियों के हाथों हत्या की जांच में कथित रूप से दखल देने के मामले में प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई ने दावा किया कि उन्होंने जांच को रोकने की कोशिश नहीं की थी. शीर्ष अदालत ने उनसे सफाई मांगी थी जिसके बाद भट्टाराई ने कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो अवमानना के मुकदमे की वजह बनता हो.

अदालत में सोमवार को अपना जवाब दाखिल करते हुए प्रधानमंत्री ने दावा किया कि रेडियो पत्रकार देकेंद्र थापा की हत्या की जांच को रोकने के लिए उन्होंने कोई भी निर्देश जारी नहीं किए. हत्याकांड के सिलसिले में माओवादी कॉडरों को गिरफ्तार किया. हालांकि उन्होंने कहा कि युद्ध के समय के मामलों को नियमित न्याय प्रणाली के तहत निपटाना व्यापक शांति समझौते की भावनाओं के विपरीत होगा जोकि छह साल पहले माओवादियों और सरकार के बीच दस्तखत किया गया था.

पश्चिमी नेपाल के दायलेख जिले में थापा की हत्या के सिलसिले में 18 जनवरी को जारी समन के जवाब में प्रधानमंत्री शीर्ष अदालत के समक्ष पेश हुए. वकील कमल प्रसाद इतानी और पत्रकार संतोष नेउपाने के लगाए आरोपों का सामना करने के लिए अदालत ने भट्टाराई और एटॉर्नी जनरल मुक्ति प्रधान को पेश होने का निर्देश दिया था. इतानी और नेउपाने ने आरोप लगया था कि दोनों ने स्थानीय अधिकारियों को हत्याकांड की जांच रोकने का आदेश दिया.

शीर्ष अदालत ने जिला अधिकारियों को मामले की जांच जारी रखने का भी आदेश दिया. प्रधानमंत्री का सुप्रीम कोर्ट में पेश होना नेपाल के न्यायिक इतिहास में दुर्लभ मौका है. वकील दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि यह बहुत दुर्लभ है कि प्रधानमंत्री अवमानना के मामले में अदालत में पेश हुए. अदालत ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया है.

दीपक चौरसिया, राणा यशवंत का इम्तहान 14 फरवरी से होगा शुरू

जी हां. दीपक चौरसिया की परीक्षा 14 फरवरी से शुरू होने वाली है. इस दिन इंडिया न्यूज नेशनल चैनल रीलांच किया जाएगा. दीपक के लिए अपने जीवन व करियर का सबसे बड़ा इम्तहान है यह. उन्होंने अपना अच्छा खासा करियर दांव पर लगाकर पैसे की खातिर इंडिया न्यूज का दामन थाम लिया. हालांकि आजकल करियर का दूसरा नाम पैसा ही है, और इंडिया न्यूज में दीपक को भरपूर पैसा मिला है, साथ ही मालिकाना हक भी उन्हें मिला है.

देखना है कि वे अपने बल व दमखम पर इंडिया न्यूज को टाप फाइव चैनलों में ले जा पाते हैं या फिर आखिरी पायदान के चैनलों में ही इसे चलाएंगे. इंडिया न्यूज का इतिहास रहा है कि यहां जो भी इसे सुधारने आया, वो खुद सुधर गया और चलता बना. दीपक चौरसिया ने राणा यशवंत को ग्रुप मैनेजिंग एडिटर बनाकर उनके कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी डाल दी है.

विनोद शर्मा और कार्तिक शर्मा के आईटीवी नेटवर्क के नेशनल चैनल इंडिया न्यूज़ की 14 फरवरी को रीलांचिंग हो रही है. रीलांचिंग के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां चल रही हैं. टीम के प्रशिक्षण से लेकर डिस्ट्रीब्यूशन को बेहतर बनाने तक के काम को अंजाम दिया जा रहा है. जनकपुरी स्थित होटल हिल्टन में पूरे ग्रुप के सभी मीडिया माध्यमों के लोगों को बुलाकर आगे का विजन रखा गया और उन्हें ट्रेंड किया गया.

इसमें न्यूज़एक्स के एडिटर जहांगीर पोचा समेत कई लोगों ने भाषण दिया और ग्रुप को आगे बढ़ाने को लेकर प्लानिंग व इंप्लीमेंटेशन के लेवल की जानकारी दी. इस ग्रुप के पास 'इंडिया न्यूज़' नेशनल के अलावा इंडिया न्यूज़ हरियाणा, इंडिया न्यूज़ राजस्थान, इंडिया न्यूज़ बिहार- झारखंड, इंडिया न्यूज़ उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड, इंडिया न्यूज मध्य प्रदेश- छत्तीसगढ़ और अंग्रेजी समाचार चैनल न्यूज एक्स है. इस समूह का हिन्दी अखबार आज समाज और अंग्रेजी अखबार द संडे गार्जियन है.

IRS 2012 Q3 : Top 10 Hindi dailies : प्रभात खबर ने सबसे ज्यादा पाठक बनाए

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2012 की तीसरी तिमाही के टाप टेन हिंदी अखबारों के नतीजों पर नजर डालें तो जो चीज तुरंत नोट करने लायक समझ में आती है वो ये कि प्रभात खबर ने सबसे ज्यादा पाठक बनाए हैं. जाने-माने पत्रकार हरिवंश के संपादकत्व और प्रबंधन की तरफ से केके गोयनका के नेतृत्व में निकल रहे इस अखबार ने दैनिक जागरण, दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर जैसे बड़े अखबारों के साथ जंग लड़कर न सिर्फ खुद को आगे रखा बल्कि पाठकों में सबसे ज्यादा लोकप्रियता व पकड़ बनाए रखने में कामयाबी हासिल की.

आंकड़ों की किताब ने भी प्रभात खबर की लोकप्रियता और आम आदमी में पकड़ की पुष्टि की है. टाप टेन हिंदी अखबारों में प्रभात खबर सातवें स्थान पर है. टाप टेन हिंदी अखबारों में अन्य अखबारों की बात करें तो वरीयता क्रम में कोई बदलाव नहीं आया है. टाप टेन हिंदी अखबारों में से सात अखबारों ने एवरेज इश्यू रीडरशिप (एआईआर) में वृद्धि हासिल की है. टाप टेन में राजस्थान पत्रिका पांचवें स्थान पर है जबकि इसी समूह का अखबार पत्रिका नवें स्थान पर है.

तो कह सकते हैं कि टाप टेन में एक ही समूह का पांचवें व नवें स्थान पर कब्जा है. इसी तरह दैनिक जागरण नंबर एक पर है तो इसी ग्रुप ने नई दुनिया को खरीद लिया है, जो नंबर दस पर है. राजस्थान पत्रिका का एआईआर बढ़ा है जबकि पत्रिका का घटा है. इसी तरह दैनिक जागरण का एआईआर बढ़ा है जबकि नई दुनिया का घटा है. सबसे ज्यादा नुकसान अमर उजाला को हुआ है. आंकड़ों की जुबानी आईआरएस 2012 Q3 की कहानी इस प्रकार है….

दैनिक जागरण नंबर एक

India’s No. 1 Hindi daily, Dainik Jagran, added 45,000 readers in the third quarter of IRS 2012 after adding 17,000 readers in the previous quarter. The daily has recorded an AIR of 1,64,74,000 in IRS Q3 2012 compared with 1,64,29,000 in IRS Q2 2012 and 1,64,12,000 in IRS Q1 2012. Dainik Jagran had 1,64,10,000 readers in IRS Q4 2011 and 1,64,58,000 readers in IRS Q3 2011. Thus it has added 16,000 readers over the year.

दैनिक भास्कर नंबर दो

At No. 2, Dainik Bhaskar has shown some recovery after losing readership in the last two quarters. The daily has added 43,000 readers and recorded an AIR of 1,44,91,000 in IRS Q3 2012 against 1,44,48,000 in the previous quarter, 1,45,53,000 in IRS Q1 2012 and 1,46,02,000 in IRS Q4 2011.

हिंदुस्तान नंबर तीन

Hindustan continues to be the third largest read Hindi daily on the back of consistent growth over the past several quarters. It has added 37,000 readers in IRS Q3 2012 to record an AIR of 1,22,42,000 compared with 1,22,05,000 in the previous quarter, 1,21,57,000 in IRS Q1 2012 and 1,20,45,000 in IRS Q4 2011.

अमर उजाला नंबर चार

The fourth largest Hindi daily, Amar Ujala, has lost 72,000 readers in the third quarter of IRS 2012. The daily has recorded an AIR of 85.36 lakh in IRS Q3 2012 against 86.08 lakh in IRS Q2 2012, 86.93 lakh in IRS Q1 2012 and 88.42 lakh in IRS Q4 2011.

राजस्थान पत्रिका नंबर पांच

At No. 5, Rajasthan Patrika has shown some recovery in the current survey. It has recorded an AIR of 68.18 lakh in IRS Q3 20132 compared with 67.56 lakh in the previous quarter, 68.07 lakh in IRS Q1 2012 and 68.47 lakh in IRS Q4 2011.

पंजाब केसरी नंबर छह

Punjab Kesri has also added 17,000 readers to take its AIR to 33.64 lakh in IRS Q3 2012 against 33.47 lakh in the previous quarter, 33.86 lakh in RS Q1 2012 and 33.30 lakh in IRS Q4 2011.

प्रभात खबर नंबर सात

Prabhat Khabar continues to register high growth remaining at No. 7. The daily has added maximum readers among Hindi dailies in IRS Q3 2012. By adding 1.40 lakh readers in the current survey, it has recorded an AIR of 27.61 lakh against 26.21 lakh in the previous quarter, 24.37 lakh in IRS Q1 2012 and 21.87 lakh in IRS Q4 2012.

नवभारत टाइम्स नंबर आठ

At No. 8, Navbharat Times has registered growth in its readership in the third quarter of IRS 2012. The daily has added 55,000 readers and recorded an AIR of 26.39 lakh in IRS Q3 2012 compared with 25.84 lakh in IRS Q2 2012, 25.88 lakh in IRS Q1 2012 and 25.73 lakh in IRS Q4 2012.

पत्रिका नंबर नौ

Patrika’s growth momentum has come to a halt in the third quarter of IRS 2012. The daily has lost 21,000 readers and recorded an AIR of 20.51 lakh against 20.72 lakh in the previous quarter, 19.46 lakh in IRS Q1 2012 and 17.87 lakh in IRS Q4 2011.

नई दुनिया नंबर दस

At No. 10, Nai Dunia has lost a few readers. It has recorded an AIR of 15.53 lakh against 15.69 lakh in IRS Q2 2012, 16.88 lakh in IRS Q1 2012 and 16.49 lakh in IRS Q4 2011.

IRS 2012 Q3 : Top 10 Publications में अंग्रेजी का सिर्फ एक अखबार

देश के टाप देन सबसे बड़े पब्लिकेशन्स में अंग्रेजी का सिर्फ एक अखबार है. वह है टाइम्स आफ इंडिया. बाकी सारे अखबार हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं के हैं. इससे पता चलता है कि यह देश भले ही अंग्रेजीदां लोग चला रहे हों लेकिन देश की जनता को अपनी भाषा में पढ़ना, सुनना और समझना पसंद है. तब भी दुर्भाग्य देखिए की रीडरशिप सर्वे के आंकड़े अंग्रेजी में ही जारी किए जाते हैं. टाप टेन पब्लिकेशन्स में नंबर वन पर है दैनिक जागरण अखबार. दसवें नंबर पर है मातृभूमि अखबार. टाइम्स आफ इंडिया छठें नंबर पर है. आईआरएस 2012 क्वार्टर तीन यानि तीसरी तिमाही में इन टाप टेन अखबारों का पूरा हाल इस प्रकार है-

दैनिक जागरण नंबर एक

Among all the top 10 publications Dainik Jagran continues to be the No. 1 publication of the country, with an AIR of 1.65 crore an increase of 45,000 readers since Q2, 2013. The Hindi daily is also the second biggest gainer among the top 10 publications of the country.

दैनिक भास्कर नंबर दो

The No.2 position is also taken by a Hindi publication, Dainik Bhaskar, with an AIR of 1.45 crore – 1983 readers less than Dainik Jagran. The Hindi newspaper has also registered a growth of 43,000 AIR, making it the third biggest gainer in the list.

हिंदुस्तान नंबर तीन

At No. 3 is last quarter's biggest gainer, Hindustan, with an AIR of 1.2 crore. While the Hindi daily had registered an increase of 48,000 readers last quarter, this time it has added 37,000 AIR.

मलयाला मनोरमा नंबर चार

The Malayalam newspaper, Malayala Manorama, stands at No.4 spot with an AIR of 97 lakh, an increase of 42,000 readers since the last quarter. Incidentally, the daily had recorded the sharpest fall among the top 10 publications last quarter – a decrease of 165,000 readers.

अमर उजाला नंबर पांच

Amar Ujala is at No. 5, with an AIR 85 lakh – a fall of 72,000 readers this time. The daily had also registered de-growth of 85,000 readers last time.

टाइम्स आफ इंडिया नंबर छह

The Times of India takes the No. 6 position, with an AIR of 76 lakh this quarter. The English daily has maintained its position in the top 10 list. However, unlike last quarter, where it had registered a marginal decline of 9,000 readers, this time the publication has added 10,000 readers, putting it at no loss, no gain.

डेली थांती नंबर सात

The only Tamil daily to feature in the top 10 publications, Daily Thanthi takes up the No. 7 spot. The daily has an AIR of 74 lakh this quarter. Though the daily has lost readers in this quarter it has moved one rank up.

लोकमत नंबर आठ

Pushed down by Daily Thanthi , Lokmat, is at No. 8, with an AIR of 74 lakh – 14,000 readers more than Daily Thanthi. While the daily had recorded a growth of 22,000 in AIR, the Marathi publication is the biggest loser this time – a fall of 98,000 in AIR.

राजस्थान पत्रिका नंबर नौ

No. 9 position is taken up by Rajasthan Patrika with an AIR of 68 lakh. The Hindi publication is also the biggest gainer this quarter, a gain of 62,000 readers. However, last quarter the daily had lost 51,000 readers.

मातृभूमि नंबर दस

Mathrubhumi is at No. 10 spot, with an AIR of 64 lakh, registering a decline of 78,000 readers this time. The daily continues its losing spree and is the second biggest loser in this quarter. The Malayalam publication had lost more than lakh readers last quarter.


IRS 2012 Q3

IRS 2012 Q3 : Top Ten English Dailes : द हिंदू ने सबसे ज्यादा पाठक जोड़े

अंग्रेजी अखबारों के लिए आईआरएस 2012 की तीसरी तिमाही शानदार रही. टाप टेन अंग्रेजी अखबारों में सात अखबारों ने एआईआर (एवरेज इश्यू रीडरशिप) में वृद्धि की है. द हिंदू अखबारों ने सबसे ज्यादा पाठक बनाए हैं. टाप टेन अखबारों के क्रम में कोई बदलाव नहीं हुआ है. टाप टेन अंग्रेजी अखबारों में में तीसरे पायदान का अखबार द हिंदू ने दूसरी तिमाही के मुकाबले तीसरी तिमाही में 50,000 नए पाठक जोड़े हैं. द हिंदू का ताजा एआईआर 22.58 लाख है. पिछली तिमाही में 22.08 लाख एआईआर था. पिछली तिमाही (Q2) में द हिंदू को 25,000 पाठकों का नुकसान उठाना पड़ा था. Top Ten English Dailes के लिए IRS 2012 Q3 का हिसाब-किताब अंग्रेजी में इस प्रकार है….

India’s largest English daily, The Times of India, has recovered its previous quarter’s loss by adding 10,000 readers in the third quarter of IRS 2012. It has recorded an AIR of 76.53 lakh in this survey compared with 76.43 lakh in the previous quarter, 76.52 lakh in IRS Q1 2012 and 76.16 lakh in IRS Q4 2011.

The No. 2 English daily, Hindustan Times, has also added 19,000 readers in IRS Q3 2012 recording an AIR of 37.86 lakh compared with 37.67 lakh in IRS Q2 2012 and 38.05 lakh in IRS Q1 2012. HT had lost 35,000 readers in IRS Q2 2012 but had added 14,000 readers in IRS Q1 2012 and 58,000 readers in IRS Q4 2012.

The No. 3 English daily, The Hindu, has added the maximum readers in the third quarter. The daily has added 50,000 readers in IRS Q3 2012 after losing 25,000 readers in IRS Q2 2012 and 7,000 readers in IRS Q1 2012. Its current AIR stands at 22.58 lakh compared with 22.08 lakh in the previous quarter.

The Telegraph, from ABP Group, has again registered a decline. By losing 21,000 readers in the current survey, the daily has recorded and AIR of 12.54 lakh against 12.75 lakh in IRS Q2 2012, 12.92 lakh in IRS Q1 2011, 12.73 lakh in IRS Q4 2011 and 12.66 lakh in IRS Q3 2011.

Deccan Chronicle has grown in this quarter by adding 13,000 readers. It has recorded an AIR of 10.51 lakh in IRS Q3 2012 against 10.38 lakh in IRS Q2 2012, 10.27 lakh in IRS Q1 2012, 10.34 in IRS Q4 2011 and 10.94 lakh in IRS Q3 2011.

DNA follows Deccan Chronicle and continued on the growth path this quarter. The daily has registered an AIR of 9.62 lakh in IRS Q3 2012 compared with 9.30 lakh in IRS Q2 2012, 9.09 lakh in IRS Q1 2012 and 8.97 lakh in IRS Q4 2011. DNA had 8.63 lakh readers in IRS Q3 2011 and 8.24 lakh readers in IRS Q2 2011.

Mumbai Mirror, from the TOI stable, also added 12,000 readers this quarter. Its current AIR stands at 8.07 lakh in IRS Q3 2012 compared with 7.95 lakh in Q2, 7.77 lakh in Q1 2012 and 8.03 in IRS Q4 2011.

The Economic Times continues to be the No. 8 newspaper despite losing 36,000 readers in the current survey. Its current AIR stands at 7.53 lakh against 7.89 lakh in Q2, 7.92 lakh in Q1 2012, 7.9 lakh in Q4 2011 and 8.12 lakh in IRS Q3 2011.

The New Indian Express has witnessed a slight decline again. The daily has recorded an AIR of 6.64 lakh in IRS Q3 2012 compared with 6.67 lakh in the previous quarter and 6.78 lakh in Q1 2012. TNIE had 6.37 lakh readers in IRS Q4 2011, 5.93 lakh readers in IRS Q3 2011 and 5.59 lakh in IRS Q2 2011.

The Tribune has added a few readers for the third consecutive round of IRS. The daily has added 13,000 readers to take its AIR at 6.53 lakh compared with 6.40 lakh in the previous quarter and 6.24 lakh in IRS Q1 2012. The Tribune had 5.85 lakh readers in IRS Q4 2011, 5.99 lakh readers in IRS Q3 2011 and 5.67 lakh in IRS Q2 2011.


IRS 2012 Q3

IRS 2012 Q3 : टाप टेन अखबारों में ‘अमर उजाला’ को नुकसान, ‘राजस्थान पत्रिका’ सबसे तेज

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2012 तीसरी तिमाही (IRS 2012 Q3) के नतीजे आ गए हैं. मीडिया रिसर्च काउंसिल ने सर्वे के आंकड़े जारी कर दिए हैं. इंडियन रीडरशिप सर्वे 2012 की तीसरी तिमाही के डाटा के अनुसार अमर उजाला की पाठक संख्या में कमी आई है. शीर्ष तीन अखबारों जागरण, भास्कर और हिंदुस्तान के पाठक बढ़े हैं. दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और हिन्दुस्तान समाचारपत्रों के पाठकों में 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. दूसरी तरफ, अमर उजाला, डेली तांती, लोकमत और मातृभूमि के पाठकों की संख्या में कमी आई है.

टाप 10 प्रकाशनों में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, मलायाला मनोरमा, द टाइम्स ऑफ इंडिया और राजस्थान पत्रिका के एवरेज इश्यू रीडरशिप की संख्या में मामूली वृद्धि हुई है. टाप 10 पत्रिकाओं में से 7 पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या में कमी दर्ज की गई है. हिन्दी पत्रिका सामान्य ज्ञान दर्पण, मेरी सहेली औऱ बंगाली मैगजीन कर्मक्षेत्र मात्र तीन मैगजीन हैं जिनके पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है.

IRS 2012 Q3 में Dainik Jagran का AIR 16,474,000 है. कुल 45,000 नए पाठक जोड़े हैं. Dainik Bhaskar की बात करें तो इसकी AIR 14,491,000 है. पिछली तिमाही में यह AIR 14,448,000 Le. भास्कर ने इस बार कुल 43,000 नए पाठक जोड़े हैं. Hindustan ने इस तिमाही में 37,000 नए पाठक बनाए हैं.

हिंदुस्तान का AIR अब 12,242,000 है. Malayala Manorama का AIR 9,752,000 है. पिछली तिमाही यानि Q2 में मलयाला मनोरमा का एआईआर 9,710,000 था. Amar Ujala की बात करें तो इसने अबकी 72,000 पाठक खोए हैं. IRS 2012 Q3 में इसे नुकसान मिला है और इस अखबार का AIR गिरकर 8,536,000 पर पहुंच गया है.

राजस्थान पत्रिका को रीडरशिप में सबसे ज्यादा ग्रोथ मिली है. तीसरी तिमाही में इस अखबार का AIR अब 6,818,000 हो चुका है. अंग्रेजी अखबारों की बात करें तो The Times of India एकमात्र ऐसा अखबार है जिसने पाठक संख्या बढ़ाने में कामयाबी हासिल की है. इस तिमाही टीओआई ने 10,000 नए पाठक जोड़े हैं. इस अखबार का AIR अब 7,653,000 हो चुका है.


IRS 2012 Q3

विजय राय सहारा मीडिया में फिर वापस आने की जोड़तोड़ में जुटे!

: कानाफूसी : चर्चा है कि विजय राय सहारा मीडिया में वापसी के लिए खूब प्रयास कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक वे जल्द वापस आ सकते हैं. हालांकि विजय राय की सहारा से विदाई उनका फोटो समेत विज्ञापन छापकर की गई थी जिसमें उन पर कई तरह की गड़बड़ियों के कारण सहारा से निकालने की बात कही गई लेकिन सहारा का इतिहास है कि यहां कई लोग विज्ञापन छापकर निकाले जाने के बाद वापस ले लिए गए. तो संभव है कि विजय राय की वापसी हो जाए.

सूत्रों के मुताबिक जिन गड़बड़ियों के नाम पर विजय राय को सहारा से निकाला गया, उन गड़बड़ियों के बारे में विजय राय ने सहारा प्रबंधन को यह जानकारी दी है कि वे सब उपेंद्र राय के इशारे पर उन्होंने किया था और जो भी सहारा में बॉस होता है, उसका आदेश मानना उनका कर्तव्य था. विजय राय सहारा प्रबंधन को यह समझाने में जुटे हैं कि अगर उपेंद्र राय को सहारा समूह से बाहर नहीं किया गया और उन्हें बाहर किए जाने का फोटो समेत विज्ञापन नहीं प्रकाशित कराया गया तो सहारा समूह का बहुत नुकसान हो सकता है.

फिलहाल सहारा प्रबंधन विजय राय की बातों के आकलन में जुटा हुआ है. देखना है कि आगे विजय राय और उपेंद्र राय की किस्मत किस रास्ते पर प्रस्थान करती है. एक जमाने में उपेंद्र राय और विजय राय काफी खास हुआ करते थे. उपेंद्र राय मीडिया हेड थे तो नंबर दो पर थे विजय राय, एसएनबी हेड बनकर. लेकिन बाद में दोनों ऐसी खटकी कि विजय राय को बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले वाले अंदाज में सहारा से बाहर निकलना पड़ा.

आलोक मेहता का विकल्प तलाश रहे हैं शैलेंद्र भदौरिया!

: कानाफूसी : यह चर्चा बहुत तेज है कि नेशनल दुनिया के नए प्रधान संपादक की खोज शुरू हो चुकी है. नेशनल दुनिया अखबार के मालिक शैलेंद्र भदौरिया अब फ्रंट फुट पर आकर खेलने लगे हैं. उन्होंने आलोक मेहता एंड कंपनी को किनारे लगाने के लिए रणनीतिक तरीके से काम शुरू कर दिया है. सबसे पहले तो उन्होंने खुद 26 जनवरी को अपना बयान अपने अखबार में छपवा कर और मेरठ एडिशन की लांचिंग की घोषणा कर इन खबरों को विराम दे दिया कि नेशनल दुनिया अखबार बंद होने वाला है.

उन्होंने अपना इरादा जता दिया है कि अखबार बंद नहीं होने वाला है, बल्कि यह चलेगा और दमखम के साथ चलेगा, नए-नए एडिशन्स के साथ चलेगा. साथ ही उन्होंने यह संदेश भी दे दिया है आलोक मेहता को कि अब उनका दौर खत्म हो चुका है. अगर ऐसा न हो ता तो विस्तार के बारे में संपादकीय खुद आलोक मेहता लिखते क्योंकि नेशनल दुनिया को आलोक मेहता का पर्याय माना गया था. शैलेंद्र भदौरिया ने खुद सामने आकर आलोक मेहता के आभामंडल को खत्म करने का पूरा इंतजाम कर दिया है.

भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि एक हिंदी बिजनेस डेली के संपादक रह चुके और उसके पहले अंग्रेजी अखबारों में काम कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ शैलेंद्र भदौरिया की कई राउंड बैठक हो चुकी है. कुछ अन्य बड़े पत्रकारों के साथ भी भदौरिया ने मीटिंग की है. जल्द ही किसी का नाम फाइनल किया जा सकता है और समय आने पर नए प्रधान संपादक की घोषणा की जा सकती है. इऩ संकेतों-सूचनाओं को आलोक मेहता एंड उनकी टीम भांप रही है, इसी कारण माना जा रहा है कि आलोक मेहता भी जल्द ही किसी नए प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने और नेशनल दुनिया से इस्तीफे की घोषणा कर सकते हैं. ये सब बातें फिलहाल चर्चा के दौर में है. कहीं से कोई आथेंटिक कनफर्मेशन नहीं है. लेकिन जानकारों का कहना है कि नेशनल दुनिया में अंदरखाने बड़ा बदलाव लाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

नेशनल दुनिया में छपने वाली झूठी खबरों को शैलेंद्र भदौरिया पढ़ते हैं या नहीं? देखिए एक कटिंग

जो लोग पाठकों की स्मृति को कमजोर मानते हैं या खुलेआम अपने पाठकों की आंख में धूल झोंकने को अपना अधिकार मानते हैं उनमें से एक आलोक मेहता भी हैं. आलोक महेता और उनके लोग किस तरीके की एजेंडा पत्रकारिता करते हैं और अनाप-शनाप खबरें छापते हैं, इससे हर कोई वाकिफ है. पर शर्मनाक स्थिति तब पैदा होती है जब अपने ही झूठ को सच साबित करने के लिए ये लोग फिर से एक बड़ा झूठ बोल देते हैं.

पता नहीं नेशनल दुनिया के मालिक शैलेंद्र भदौरिया अपना खुद का अखबार पढ़ते हैं या नहीं, लेकिन जो कुछ मुट्ठी भर लोग नेशनल दुनिया को पढ़ते हैं वे इस अखबार के झूठे तेवर व झूठी खबरों से खूब वाकिफ हैं. ऐसे ही एक पाठक ने भड़ास4मीडिया के पास नेशनल दुनिया की दो खबरों को एक साथ चिपका कर भेजा है. इन दोनों खबरों की सिर्फ हेडिंग को पढ़ लीजिए, खबरों के गोरखधंधे का पता चल जाएगा. नीचे है वो कटिंग…

नेशनल दुनिया का प्रकाशन 30 मार्च से मेरठ से भी : शैलेंद्र भदौरिया

नेशनल दुनिया हिंदी अखबार के 26 जनवरी के अंक में इस अखबार के मालिक शैलेंद्र भदौरिया का भाषण छपा है. भाषण में उन्होंने ढेर सारी घोषणाएं की हैं. प्रताप यूनिवर्सिटी वाले शैलेंद्र भदौरिया ने जानकारी दी है कि वे 30 मार्च से मेरठ से नेशनल दुनिया का प्रकाशन शुरू करने वाले हैं. 30 मार्च से ही नेशनल दुनिया का दिल्ली कार्यालय नोएडा के सेक्टर 11 में शिफ्ट हो जाएगा. भदौरिया का पूरा लेक्चर नेशनल दुनिया अखबार के पेज नंबर एक पर छपा है.

ऐसा पहली बार हुआ है कि अखबार के मालिक की फोटो के साथ उनका लेक्चर व फ्यूचर प्लान अखबार के पेज नंबर एक पर छपा हो. इससे एक संकेत तो यही मिलता है कि शैलेंद्र भदौरिया ने नेशनल दुनिया को चलाने का बीड़ा अपने कंधों पर ले लिया है और अपने अखबार के कथित गणमान्य और महान पत्रकारों को किनारे करना शुरू कर दिया है. नेशनल दुनिया अखबार में छपे भदौरिया के भाषण की कटिंग नीचे दे रहे हैं, पढ़ने के लिए कटिंग पर क्लिक कर दें…

प्रमोद महाजन को रिश्वत देते हुए पकड़े गए थे मुकेश अंबानी

श्री मुकेश अंबानी

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड

मेकर्स चैम्बर्स – IV, नरीमन पाइंट

मुंबई – 400021

श्री मुकेश अंबानी जी, अभी हाल ही में आपने देश के सभी टी.वी. चैनलों को मानहानि का नोटिस भेजा है। इनका जुर्म यह है कि इन्होंने 31 अक्टूबर, 2012 और 9 नवम्बर, 2012 को मेरी और प्रशांत भूषण की प्रेस कांफ्रेंस का सीधा प्रसारण किया था। हमने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में देश के लोगों को बताया था कि किस तरह से आपने गैरकानूनी तरीके से सरकार पर दबाव डालकर गैस के दाम बढ़वाए।

हमने लोगों को यह भी बताया कि आपके, आपके साथियों के और आपकी कंपनियों के स्विस बैंक में खाते हैं जिनमें कालाधन जमा किया गया था। हमारे इस खुलासे का कई टी.वी. चैनलों ने सीध प्रसारण किया। आपने इन सभी टी.वी. चैनलों को मानहानि का नोटिस भेजा है।

मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मेरी और प्रशांत भूषण की कही गई बातों से यदि आपकी मानहानि हुई है तो इसके सबसे बड़े दोषी तो मैं और प्रशांत भूषण हैं। नोटिस भेजना ही था तो आपको हमें भेजना चाहिए था। टी.वी. चैनलों ने तो केवल उसका प्रसारण ही किया था। फिर भी आपने हमें नोटिस न भेजकर टी.वी. चैनलों को नोटिस भेजा है। इससे जाहिर है कि आपका मकसद केवल टी.वी. चैनलों पर दबाव बनाने का है।

देश की जनता आपसे कुछ सीधे सवाल पूछना चाहती है। भारत सरकार को स्विस बैंको में खातेदारों की जो लिस्ट मिली है, क्या ये सच नहीं है कि आपका, आपके रिश्तेदारों का, आपके दोस्तों का और आपकी कंपनियों का उनमें नाम है? क्या यह सच नहीं है कि इस लिस्ट में आपके नाम पर सौ करोड़ रुपये जमा दिखाए गए हैं? क्या ये सच नहीं है कि आपने इस पैसे पर टैक्स जमा कर दिया है? इससे यह साबित होता है कि आपने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। कानून के मुताबिक अब आप पर मुकदमा चलना चाहिए और यदि टैक्स की चोरी साबित होती है तो आपको जेल होनी चाहिए।

लेकिन ऐसा नहीं होगा। क्यों? क्योंकि सरकार आपसे डरती है। आपने खुद ही कहा है कि कांग्रेस पार्टी तो आपकी दुकान है। आपने सच ही कहा था। मीडिया में छपी कुछ खबरों के मुताबिक सोनिया गाँधी जी आपके निजी हवाई जहाज से यात्रा करती हैं। लोगों का मानना है कि श्री जयपाल रेड्डी का मंत्रालय भी आप ही के दबाव में बदला गया था।

केवल कांग्रेस ही क्यों? भाजपा और अन्य पार्टियां भी आपकी दुकान हैं। पहले तो आडवाणी जी स्विस बैंकों के खातों के बारे में खूब आवाज़ उठाते थे लेकिन जब से आपके खाते निकलकर सामने आए तो सारी भाजपा बिल्कुल चुप हो गई। आपके खातों के बारे में भाजपा ने संसद में एक शब्द भी नहीं बोला। ऐसा लगता है कि सभी पार्टियां आपसे डरती हैं। सभी नेता आपसे डरते हैं। लेकिन इस देश की जनता आपसे नहीं डरती। सारी पार्टियां आपकी दुकान हो सकती हैं। लेकिन भारत आपकी दुकान नहीं है। भारत हमारा है, इस देश के लोगों का है। आप अपने पैसे से पार्टियों को खरीद सकते हैं, नेताओं को खरीद सकते हैं लेकिन भारत को हम बिकने नहीं देंगे।

आपका कहना है कि हमारे द्वारा कही गई बातों का सीधा प्रसारण करने से टी.वी. चैनलों ने आपकी मानहानि की। आप सोचकर देखिए कि आपकी मानहानि मैंने, प्रशांत भूषण और टी.वी. चैनलों ने की है या आपने अपनी मानहानि खुद अपने कर्मों से की है?

1. 2002 में आपने सरकार से ''फुल मोबिलिटी'' लेने के लिए प्रमोद महाजन को रिश्वत दी। 55 रुपये प्रति शेयर के भाव वाले एक करोड़ शेयर आपने प्रमोद महाजन को 1 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से दे दिए। ये तो सीधी रिश्वत थी। जब आप पकड़े गए तो आपने शेयर वापस ले लिए। मामला अभी कोर्ट में है। क्या ऐसा करने से आपकी मानहानि नहीं हुई?

2. आपने अपना बहुमंजिला मकान 'वक्फ' के ज़मीन पर बनाया है। इस ज़मीन पर अनाथालय बनना था। गरीब और अनाथ मुस्लिम बच्चों के हक को छीना है आपने। क्या ऐसा करने से आपकी मानहानि नहीं हुई?

3. सन 2000 में आपको देश के गैस के कुछ कुएं दिए गए। आपकी जिम्मेदारी थी कि आप इसमें से गैस निकाल कर भारत सरकार को दें। गैस हमारी थी, इस देश के लोगों की। हम उस गैस के मालिक हैं। आपकी हैसियत केवल एक ठेकेदार की थी। आपको गैस के कुएं केवल गैस निकालने के लिए दिए गए थे। लेकिन आप चतुराई से मालिक बन बैठें। सरकार को आपने गैस 'बेचनी' चालू कर दी। सरकार पर दबाव डालकर आपने गैस के दाम बढ़ाने चालू कर दिए। चूंकि कांग्रेस आपकी दुकान है तो कांग्रेस पार्टी हमेशा आपकी दादागिरी के सामने झुकती नज़र आई। अकसर आपके दबाव में कांग्रेस गैस के दाम बढ़ाती गई और देश के लोग हाहाकार करते रहे। आपकी वजह से बिजली, खाद और रसोईगैस महंगी होती गई। लेकिन जब पानी सर से ऊपर हो गया तो श्री जयपाल रेडडी जी ने आपका विरोध् किया। उस समय श्री जयपाल रेडडी देश के तेल मंत्री थे। उन्होंने आपके दबाव में न आकर गैस के दाम और बढ़ाने से मना कर दिया। आपने श्री जयपाल रेडडी जी का ही तबादला करा दिया। आपकी हरकतों की वजह से देश में कई वस्तुएं महंगी हो रही हैं और जनता कराह रही है। क्या यह सब हरकतें आपको शोभा देती हैं? क्या इन हरकतों से आपकी मानहानि नहीं होती?

इस किस्म के आपके बेइमानी के कामों की लिस्ट बहुत लंबी है। इस देश के अधिकतर व्यवसायी, कारोबारी, उद्योगपति ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। लेकिन आज की व्यवस्था उन्हें बेइमानी करने पर मजबूर करती है। पर आपके जैसे उद्योगपति जब खुलेआम व्यवस्था का दुरुपयोग अपने फायदे के लिए करते हैं तो इससे सारे उद्योग और व्यवसाय पर काला धब्बा लगता है।

एक तरफ आप हैं, आपके पास पैसा है। दूसरी तरफ इस देश की जनता है। जनता अब जाग गई है। जनता के अंदर जुनून है। इतिहास गवाह है कि जब-जब पैसे और जुनून के बीच लड़ाई हुई है तो हमेशा जुनून जीता है। मेरा आपसे निवेदन है कि देश के मीडिया को धमकाने की कोशिश न करें। मीडिया में चंद लोग ऐसे हो सकते हैं जिन्होंने खुद गलत काम किए हों। ऐसे मीडियाकर्मी शायद आपके दबाव में आ जाएं। लेकिन आज भी अधिकांश पत्रकार देश के लिए काम करते हैं। वो आपके दबाव में नहीं आने वाले। इतिहास गवाह है कि जब-जब देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका चरमराती नज़र आई तो, ऐसे ही पत्रकारों ने लोकतंत्र को जिंदा रखा। कुछ ऐसे मीडिया घराने हैं जिनमें सीधे या परोक्ष रूप से आपका पैसा लगा है। हो सकता है ऐसे घराने आपके दबाव में आ जाएं, पर इन घरानों में काम करने वाले पत्रकार आपके दबाव में नहीं आने वाले।

आपका क्या सपना है? क्या आप बेइमानी से दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति बनना चाहते हैं? मान लीजिए आप इस देश की सारी दौलत के मालिक बन जाए। क्या इससे आपको खुशी मिलेगी? खुशी अधिक से अधिक धन अर्जित करने से नहीं मिलती। बल्कि त्याग करने से मिलती है। आज आप एक ऐसे मुकाम पर खड़े हैं कि यदि आप बेइमानी से व्यवसाय करना छोड़ दें और अपनी सारी दौलत देश के लोगों के विकास में लगा दें तो यह देश आपको कभी नहीं भूलेगा।

अरविंद केजरीवाल


English Translation of the letter….

Dear Mr Mukesh Ambani

You have recently sent a defamation notice to a number of TV channels. Their “crime” is that they aired the press conference held on the 31st October 2012 and 9th November 2012, by Prashant Bhushan and me, live. In our press conference, we presented before the country how you had illegally pressurized the government into increasing gas prices. We also told the country that your associates and your companies have accounts in Swiss banks where black money had been stashed away. Many TV channels aired our expose live. All these TV channels have now received defamation notices from you.

I find it quite perplexing. If you felt that you have been defamed by what Prashant Bhushan and I said, then we are the real culprits and, if you had to send a defamation notice, it should have been to us. The TV channels merely broadcast what we said. Despite this, instead of sending us the defamation notice, you have sent it to the TV channels. It is evident that your sole purpose of sending this notice was to steamroll the TV channels into subservience.

The people of India want to ask you some straight questions:

· Is it not true that the list of those who have accounts in Swiss Banks, as received by the Government of India, includes your name and the names of your relatives, your friends and your companies?

· Is it not true that a balance of Rs. 100 crores is shown against your name in this list?

· Is it not true that you have paid the tax on this amount after this list was received by the Government?

If the above is true, as we suspect it is, it proves that you have admitted your guilt. As per the law of the land, you should be tried and, if the charge of tax evasion is proved, you should be sent to
jail. However, this would never happen. Why? Because the Government of India is intimidated by you. You have been reported as saying that the Congress Party has been bought by you – it is your dukaan, to be precise. You are right. according to some media reports, Mrs. Sonia Gandhi sometimes travels by your personal aircraft. People believe that Mr. Jaipal Reddy’s ministry was also changed because of your influence.

Why only the Congress? Even BJP and many other parties are in your pocket. Earlier, Mr. Advani used to make a lot of noise about Swiss Bank accounts, but since your accounts have been exposed, BJP has suddenly gone quiet. BJP has not mentioned a single word in the Parliament about your accounts.

It appears that almost all parties are afraid of you. Most leaders are scared of you, too. However, the citizens of this country are not scared of you. All parties could be your dukaan but India is not up for sale. India is ours, it belongs to the people of this country. You can purchase political parties and political leaders with your money but we will not let India be sold.

You say that the TV channels have tainted your reputation by airing our press conference live. That's wrong. I would urge you to answer this question honestly – Did Prashant Bhushan, myself and the TV Channels defame you or did you defame yourself through your own misdeeds?

1. In 2002, you gave 1 Crore shares with a market price of Rs. 55 per share to Mr. Pramod Mahajan at just Rs. 1 per share. This was a straight bribe to get “Full Mobility”. When you were caught, you took back the shares. Presently, the matter is In court. Didn't you defame yourself by doing this?

2. You have made your multistoreyed residence on Wakf land. This land had been set aside for an orphanage. You have stolen the right of poor and orphaned Muslim children. Didn't you defame yourself by doing this?

3. A few gas wells belonging to the Country were allotted to you in 2000. You were supposed to extract gas and give it to the government. The gas belongs to us, the people of India. We are the owners of this gas. You were only a contractor appointed to extract the gas. However, cleverly you became the owner of the gas. You started "selling" the gas to the government.

Because the Congress is in your pocket, it always bowed before your bullying. The Congress kept increasing the price of gas under your pressure and the nation kept wailing. Because of you, the prices of electricity, fertilizer and cooking gas kept rising. When it crossed all limits, Mr. Jaipal Reddy opposed you. He was the Minister for Oil and Gas at that time. You got Mr. Jaipal Reddy transferred. Because of you many things have become increasingly expensive in India and the people are groaning under the load of these high prices. Do these shenanigans suit you? Do such acts not defame you?

The list of such illegal acts done by you is quite long.

The majority of the traders, businessmen and industrialists want to do their work honestly. But the system forces them into wrongdoings. But when a businessman like you brazenly subverts the system for his personal benefit, the entire industry and business world gets a bad name.

You are on one side with immense wealth. On the other side are the people of this country. The people have now awakened. Fire is raging in their heart. History is witness that whenever there has been a clash between money and such rage, the rage has won.

Kindly do not try to intimidate the media of this country. There may be some mediamen who may have done wrong things themselves. Such media-persons may succumb to your pressure. However, the majority of media persons keep the interest of the Country at heart even today. They are not going to capitulate so easily. History is witness that whenever the judiciary, bureaucracy and legislature crumbled, it is the honest fourth pillar, comprising such media-persons that kept democracy alive.

You have invested in some media houses directly or indirectly. It is possible that these media houses do your bidding. However, the journalists working for such media houses will not barter their integrity so easily.

What is your dream? Do you want to become the world's richest person through dishonesty? Suppose you became the owner of all the wealth in this country. Would that make you happy? Happiness does not increase by accumulating more and more wealth. Happiness comes with sacrifice. If you stopped doing business dishonestly and contributed your wealth for the development of the nation, this country will remember you with pride forever.

With regards,

Arvind Kejriwal

महिला पत्रकार के साथ अबकी बीएसएफ जवान ने छेड़छाड़ की

जब महिला पत्रकार ही सुरक्षित नहीं हैं तो आम महिलाओं की स्थिति क्या होगी, इसे खुद ब खुद समझा जा सकता है. नोएडा में एक महिला मीडियाकर्मी के साथ डाक्टर ने छेड़छाड़ की थी. महिला मीडियाकर्मी ने हिम्मत दिखाई और पुलिस को सूचित किया जिसके कारण डाक्टर को गिरफ्तार किया जा सका. ऐसा ही कारनामा कोलकाता में हुआ है. यहां बीएसएफ के जवान ने महिला पत्रकार के साथ छेड़छाड़ की है. इस बारे में टाइम्स आफ इंडिया में विस्तार से खबर प्रकाशित हुई है, जो इस प्रकार है….

Journalist molested by BSF jawans at Kolkata crossing

KOLKATA: A woman journalist was allegedly molested by three BSF jawans in uniform at the crowded Shyambazar crossing on Monday evening. Passersby nabbed and beat up one of the suspects, while the other two escaped.

Locals staged a half-hour road blockade accusing the police of shielding the jawans and helping them get away. The police lathicharged the protesters, triggering chaos at the busy traffic crossing.

The girl, who works with a news channel, had gone to a restaurant with a friend. They had barely stepped out, around 7.30pm, when three BSF jawans made lewd comments at her, says the complaint. One of them was brazen enough to touch her and "tried to sexually assault her", she says.

"I was shocked. The jawans were in uniform yet completely drunk. One of them lunged at me. I could not imagine that such a thing could happen in a place like Shyambazar crossing, where there were hundreds of people,"she said.

The journalist screamed for help and a crowd quickly gathered. People waiting at a nearby bus stop rushed out and surrounded the men in uniform.

The trio tried to flee but the girl chased one of them down. "I ran after him and grabbed him near a police kiosk. Locals helped me overpower him and we handed him to the police," she said.


नोएडा में महिला मीडियाकर्मी को छेड़ने वाला पतंजलि का डाक्टर गिरफ्तार

घनश्याम पटेल खबर भारती के इंदौर ब्यूरो चीफ, रजत और अजीत का भास्कर से इस्तीफा

इंदौर शहर के पत्रकार घनश्याम पटेल ने 28 जनवरी को खबर भारती चैनल में बतौर ब्यूरो चीफ ज्वाइन कर लिया है. वे करीब 12 बरस तक जी न्यूज़ के इंदौर-उज्जैन ब्यूरो चीफ रहे हैं. वरिष्ठता के चलते ही जी न्यूज़ के लिए उन्होंने गुजरात में आये ऐतिहासिक भूकंप को कवर किया था. उनके जी न्यूज़ के कार्यकाल में अनेक ऐसी ख़बरें सबसे पहले उनहोंने भेजी और बाद में दूसरे चैनलों पर आई.

भास्कर डाट काम से सूचना है कि यहां से दो लोगों ने इस्तीफा दे दिया है. इनके नाम हैं रजत अभिनव और अजीत झा. भास्कर डाट काम से लोगों के इस्तीफे का सिलसिला लगातार जारी है.

रवींद्र शाह की पहली पुण्यतिथि पर म्यूजिकल श्रद्धांजलि देने की तैयारी

रवींद्र शाह की पहली पुण्यतिथि के मौके पर इंदौर में म्यूजिकल श्रद्धांजलि देने की तैयारी की गई है. पिछले साल 20 फरवरी को रवींद्र शाह का निधन एक सड़क दुर्घटना के दौरान हो गया था. रवींद्र शाह संगीत के बहुत बड़े प्रेमी थी. इसी कारण उनके चाहने-जानने वालों ने उनकी याद में संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया है. इस बारे में एक मेल फारवर्ड कर सभी को सूचित किया जा रहा है. अगर आप तक मेल न पहुंची हो तो नीचे दिए गए संदेश को पढ़ें और प्रोग्राम के लिए खुद को निमंत्रित महसूस करें…

Dear Friends,

During Last 12 months we missed every day Ravindra Shah ji…He left us on 20th Feb 2012. We all together share our feelings each other on 20th Feb 2013 at Ravindralay Indore. He was very fond of music, so we shall pay a musical tribute also from 06:00pm onwards. We all shall be there.

Please may contact with out any hesitation any time regarding this program.

Thank you

Rajendra Chauhan
09827023451

Rajeev
09968329365


रवींद्र शाह Ravindra Shah

रीलांच हुआ नमस्‍ते बरेली, पाक्षिक के रूप में होगा प्रकाशन

बरेली से खबर है कि दैनिक जागरण के पूर्व सीजीएम चंद्रकांत त्रिपाठी के अखबार नमस्‍ते बरेली रीलांच किया गया है. अखबार की रीलांचिंग 26 जनवरी को की गई. अब इसे दैनिक की बजाय 16 पेज का पाक्षिक अखबार बना दिया गया है.  गौरतलब है कि कुछ समय पहले चंद्रकांत त्रिपाठी ने अपने मध्‍याह्न अखबार नमस्‍ते बरेली का प्रकाशन धूमधाम से किया था, परन्‍तु जनवार्ता के सरदार कमलजीत सिंह से विवाद हो जाने के बाद इसे बंद कर दिया गया था.

अब सारे विवाद सुलझाने के बाद सीकेटी ने इसका प्रकाशन पाक्षिक के रूप में किया है. वे अखबार के संपादक हैं, जबकि अखबार का कार्यकारी संपादक डा. राजेश शर्मा को बनाया गया है. फहीम करार ने एनई के रूप में ज्‍वाइन किया है. यासीन अंसारी को अखबार का मार्केटिंग मैनेजर बनाया गया है. समाचार संपादक फहीम का कहना है कि अब इस अखबार में न्‍यूज की बजाय व्‍यूज को प्रमुखता दी जाएगी. साथ ही हम पॉजिटिव पत्रकारिता जरिए विकास को महत्‍व देने का प्रयास करेंगे.

मालिक के कमीनेपन के कारण तीन महीने से भिखारी की जिंदगी जी रहा हूं

भड़ास वाले यशवंत जी नमस्कार, मैं न्यूज इलेवन में काम करनेवाला एक मामूली कर्मचारी हूं, मन लगाकर काम करता हूं कि महीने के अंत में पैसा मिलेगा, लेकिन इस कंपनी के मालिक के कमीनेपन के कारण तीन महीने से भिखारी की जिंदगी जी रहा हूं। आपसे निवेदन है कि आप मेरे नीचे लिखे पत्र को प्रकाशित करें और चैनल की स्थिति से लोगों को अवगत करायें, ताकि कोई दूसरा अरुप का शिकार न हो पाये, मेरे जैसे कई कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिल रही, लेकिन इस पत्र के प्रकाशन के बाद तसल्ली जरुर मिलेगी।

एक पीड़ित पत्रकार न्यूज इलेवन का

पत्र

न्यूज़ इलेवन की हालत खराब, कर्मचारियों में आक्रोश चरम पर, कभी भी गिर सकता है शटर

अगर आप झारखंड की राजधानी रांची से चलने वाले क्षेत्रीय समाचार चैनल न्यूज इलेवन से जुड़ने की सोच रहे हैं तो सावधान हो जाइये। चैनल की हालत बेहद खराब है और बेचारे कर्मचारी उधार में अपनी जिंदगी काट रहे हैं। हालात ये है कि तीन महीने से कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली है, सैलरी के नाम पर मिल रहा है तो सिर्फ आश्वासन। पहले एक महीने की सैलरी बकाया थी, फिर दो महीने की और अब हैट्रिक पूरी कर ली है कंपनी के मालिक अरुप चटर्जी ने कर्मचारियों की सैलरी पचाने में।

अरुप के तानाशाह रवैये के आगे कंपनी के सो कॉल्ड अधिकारियों की भी एक नहीं चलती, सब अपने पद के लिए ही लड़ते नजर आते हैं, और उनके बीच फूट का फायदा अरुप उठा रहा है। जनवरी 2013 का हाल बताये तो कर्मचारियों को नवंबर 2012 की ही सैलरी मिली है, वो भी गिने-चुने लोगों को, काम रोकने पर अरुप वैसे कर्मचारियों को सैलरी देता है जो महीने भर खट मरकर 6-8 हजार कमाते हैं, ताकि अरुप का काम न रुके और चैनल चलता रहे। लेकिन इस बार कर्मचारियों ने कमर कस ली है। रिपोर्टर पहले से ही काम नहीं कर रहे हैं और अब बाकी कर्मचारी भी एक साथ हैं। सिर्फ सिटी रिपोर्टर ही नहीं जिले भर के रिपोर्टर भी अब हड़ताल पर उतर आये हैं। बार-बार चेक बाउंस होने से कर्मचारी परेशान हैं।

विज्ञापन का भी बुरा हाल है, कहा तो ये जा रहा है कि रवीन्द्र सहाय के जाने के बाद कंपनी की हालत और खराब हो गयी है, नये छोकरों पर विज्ञापन का जिम्मा है। 26 जनवरी की बात करें तो सिर्फ 70 हजार की कमाई की है कंपनी ने। यहां पिछले 11 महीनों से तीन महीने पर एक बार सैलरी मिल रही है, यानी जिसने अक्टूबर में ज्वाइन किया है उन्हें जनवरी में सैलरी मिलने की आस है। उपर से अरुप कर्मचारियों को धमकी दे रहा है कि मौर्या खाली हो गया, साधना खाली हो गया, मैन पावर की कमी नहीं है, अब आप ही बताइये जो इतने लोगों को पहले से पैसा नहीं दे रहा है वो नये लोगों को क्या देगा, वैसे भी नये ज्वाइन करने वालों का खाता तो तीन महीने बाद ही खुलेगा।

इसी बहाने तीन महीने तक चैनल तो चलेगा ही। तो सोचिये मत अगर आप तीन महीने में एक बार सैलरी लेने के योग्य हैं तो चले आइये न्यूज इलेवन में, स्वागत है आपका, पर इस गुमान में मत रहियेगा कि आप पत्रकारिता कर रहे हैं। खबर ये भी है कि चैनल से एक साथ करीब 20-25 लोग सामूहिक इस्तीफा देने वाले हैं।

भड़ास को mktkumar11@gmail.com मेल आईडी से प्राप्त मेल पर आधारित.

भ्रष्‍टाचार उजागर करने वाले, कलेक्‍टर की नजरों में नक्‍सलवादी

प्रिय पत्रकार साथी, हाल ही में बड़वानी कलेक्‍टर का सरकार का लिख पत्र सार्वजनिक हुआ है जिसमें उसने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे लोगों को नक्‍सलवाद से जोड़ने का प्रयास किया है। मजेदार बात है कि पुलिस ने इससे इंकार किया है। इसी संदर्भ में जागृत दलित आदिवासी संगठन की प्रेस विज्ञप्ति संलग्‍न है। इस संबंध में अधिक जानकारी हेतु संगठन के कार्यकर्ता हरसिंह जमरे, वालसिंह सस्तिया, माधुरी बहन आदि से madhuri.jads@gmail.com या 9179753640 संपर्क करें।

सधन्‍यवाद

रेहमत

प्रेस विज्ञप्ति

बडवानी जिले में ‘मनरेगा’ के भारी भ्रष्‍टाचार को उजागर करने के बदले में हमारे ‘जागृत आदिवासी दलित संगठन’ को कलेक्‍टर मनगढंत रूप से नक्‍सलवादी करार करने की कोशिश कर रहे हैं। अब तक जिले के तीन विकासखंडों में हुई उच्‍च-स्‍तरीय सरकारी जांच से जाहिर हुए करीब डेढ सौ करोड रुपयों के घोटाले पर लीपापोती करने की गरज से कलेक्‍टर श्रीमन शुक्‍ला ने उच्‍च अधिकारियों को इस आशय का पत्र लिखा है। ‘संगठन’ कलेक्‍टर को खुली चुनौती देता है कि वे अपने आरोपों को सबूत सहित सार्वजनिक करें।

हमारे संगठन को घेरने  की हडबडी में कलेक्‍टर इस मसले पर पुलिस की राय लेना भी भूल गए। अखबारों के मुताबिक पुलिस मानती है कि बडवानी में नक्‍सलवादी नहीं है। ‘संगठन’ राज्‍य शासन से मांग करता है कि वह ऐसी मनगढंत और झूठी जानकारी देने के अपराधी कलेक्‍टर श्रीमन शुक्‍ला को तत्‍काल निलंबित कर कार्रवाई करे।   

‘जागृत आदिवासी दलित संगठन’ इस आधारहीन, फूहड और गैर-जिम्‍मेदार पत्र लिखने के आरोप में कलेक्‍टर श्रीमन शुक्‍ला के खिलाफ अदालत में प्रकरण दायर करेगा। उल्‍लेखनीय है कि रोजगार गारंटी कानून बनाने में सक्रिय भागीदारी के अलावा ‘जागृत आदिवासी दलित संगठन’ की पहल पर बडवानी जिले को बेरोजगारी भत्‍ता प्राप्‍त करने वाले देश के पहले जिले का खिताब मिल चुका है।

संगठन की भ्रष्‍टाचार विरोधी मुहीम के चलते जिला प्रशासन संगठन के खिलाफ इस तरह के हथकंडे इस्‍तेमाल कर रहा है। स्‍थानीय छुटभइए नेताओं से मिलकर प्रशासन ने पिछले दिनों ‘संगठन’ के कार्यकर्ताओं पर जिला-बदर की कार्रवाई भी की थी, लेकिन इस हरकत के गैर-कानूनी होने और संगठन के आंदोलन के दबाव में बेशर्मी से इसे वापस लेना पडा था।

पिछले दिनों संगठन से जुडे आदिवासी मजदूरों ने महीनों और कहीं-कहीं तो सालों से लंबित मजदूरी के भुगतान के लिए जिला पंचायत और कलेक्‍टर से शिकायतें की थीं। बाद में कई बार धरना-आंदोलन करने के बाद भी संतोषप्रद जबाव न मिलने पर भूखे मजदूरों ने कलेक्‍टर से जिले में ‘मनरेगा’ का हिसाब-किताब मांगा था। कानूनी प्रावधानों के तहत हिसाब मांगने पर जिला प्रशासन ने टालमटोल की। इस पर ‘संगठन’ ने राज्‍य और केंद्र की सरकारों को लिखा था। जबाव में राज्‍य और केंद्र सरकारों ने अपने-अपने स्‍तर पर उच्‍च-स्‍तरीय जांच शुरू की। नतीजे में अब तक की जांच में जिले के कुल तीन विकासखंडों में करीब 150 करोड रुपयों का घोटाला पाया गया है। राज्‍य के करीब सौ अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा की जा रही यह जांच अब भी जारी है और ‘संगठन’ को इसमें करीब 350 करोड रुपयों का घोटाला उजागर होने आशंका है।

मजदूरी के भुगतान में देरी के कारण भूख और बदहाली भुगतते आदिवासी मजदूरों के खिलाफ जिला प्रशासन और कलेक्‍टर की घटिया और गैर-कानूनी हरकत से नेताओं और प्रशासन की मिलीभगत साफ हो गई है। जिले के आदिवासी मजदूरों के प्रति अपनी संवैधानिक जिम्‍मेदारी निभाने के बजाए कलेक्‍टर श्रीमन शुक्‍ला भ्रष्‍टाचारियों को बचाने में लगे हैं। इस हरकत की निंदा करते हुए ‘जागृत आदिवासी दलित संगठन’ कलेक्‍टर से सार्वजनिक माफी मांगने की मांग करता है। 

‘जागृत आदिवासी दलित संगठन’ को नक्‍सलवादी घाषित करने की हडबडी में कलेक्‍टर ने अपने पत्र में महाराष्‍ट्र में संगठन पर प्रकरण दायर होने की झूठी और मनगढंत जानकारी दी है। सचाई है कि हमारे संगठन का महाराष्‍ट्र में कोई काम नहीं है और न ही वहां किसी कार्यकर्ता पर कोई प्रकरण दायर किया गया है।

‘जागृत आदिवासी दलित संगठन’ कलेक्‍टर के दुर्भावनापूर्ण प्रयासों से डरने वाला नहीं है। वह भयभीत हुए बिना भ्रष्‍टाचार और अन्‍याय के खिलाफ अपना शांतिपूर्ण और संवैधानिक आंदोलन जारी रखेगा।

हरसिंह जमरे

माधुरी

राजस्‍थान में महारानी के लिए मुखौटे की तलाश

राजस्थान में बीजेपी नए अध्यक्ष के लिए मशक्कत कर रही है। कहा तो यही जा रहा है कि ऐसा अध्यक्ष चाहिए, जो अगले विधानसभा चुनाव में न केवल कांग्रेस के सर पर सवार हो सके। बल्कि बीजेपी को भी सत्ता के करीब लाने में सक्षम हो। पर, सच यह है कि राजस्थान में बीजेपी को कोई अध्यक्ष – वध्यक्ष नहीं चाहिए। असल तलाश मुखौटे की है। मुखौटा, जो, महारानी साहिबा श्रीमती वसुंधरा राजे की उंगलियों की कठपुतली और हुकुम का ताबेदार हो। वरना, अध्यक्ष के रूप में अरुण चतुर्वेदी क्या बुरे हैं। बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं। ईमानदार है, सक्षम हैं और अपेक्षाकृत जवान भी। बहुत अच्छे से पार्टी को चला रहे हैं। और अपने कई पार्टी पूर्वजों के मुकाबले बीजेपी को कई गुना ज्यादा जोरदार शक्ल बख्शने में भी सफल रहे हैं।

हां, बस इतना जरूर है कि वे किसी के गुलाम की तरह काम नहीं कर सकते, हां में हां नहीं मिलाते और गलत काम में सहभागी नहीं हो सकते। यही वजह है कि राजस्थान की सत्ता पर एक बार फिर काबिज होने को तैयार खड़ी वसुंधरा राजे हर हाल में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपने किसी चंगू का चेहरा देखना चाहती हैं। क्योंकि एक तो वे पहले ही राजस्थान में बीजेपी के अगले सीएम के रूप में अपने आप को स्थापित कर चुकी हैं। दूसरा, वे मानकर चल रही है कि सूबे की बीजेपी का सरदार उन्हीं का होगा, तभी वे सत्ता की सीढ़ियों की तरफ सर्र से सरक सकेंगी। वरना मामला मुश्किल है। पिछली बार की तरह।

ओम प्रकाश माथुर कई बार राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष थे। उनके अध्यक्षीय आचरण की वजह से वसुंधरा राजे अपनी मनमानी करने में असफल रहीं और झगड़े में सत्ता की सीढ़ियों से फिसलकर पांच साल के लिए घर बैठने को मजबूर हुईं। इस बार वे कोई कमी नहीं छोड़ना चाहतीं, सो पार्टी पर अध्यक्ष बदलने के लिए दबाव डाल रही हैं। इसीलिए राजस्थान में बीजेपी अपने अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी की जगह किसी नए अध्यक्ष की नहीं, बल्कि महारानी के मुखौटे पर मंथन कर रही है। अपना मानना है कि एक बेहतरीन कार्यकाल देनेवाले अध्यक्ष को हटाकर महारानी के कुछ भी मिलनेवाला नहीं है।

राजनीति बहुत अजीब किस्म की उलझनों का गजब मायाजाल है। फिर राजनीति अगर राजस्थान की हो, उस पर भी बीजेपी की हो, तो उलझनें और मुश्किल हो जाती हैं। पहली उलझन यह है कि जब कोई बड़ा नेता किसी एक नेता का समर्थन करता हैं, उसे आगे लाता हैं और उसे ताकत बख्शता हैं, तो बाकी बहुत सारे पुराने साथी भी उससे नाराज हो जाते हैं। फिर यहां तो अरुण चतुर्वेदी को हटाकर किसी को बैठाना है। सो, डबल संकट है। राजनीति में खेमे होते हैं, उन खेमों में भी खेमेबाजी होती है। सो, वसुंधरा खेमे से जो मुखिया बनेगा, उसके विरोध में भी खड़े होनेवालों की वसुंधरा खेमे में ही कमी नहीं होगी। फिर अरुण चतुर्वेदी भी कोई कम ताकतवर नहीं है। उनके समर्थक और उनके लोग नाराज होंगे, वह अलग। लेकिन महारानी फिर भी माथा मार रही है। कैसे भी करके अपने आदमी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहती है।

राष्ट्रीय स्तर पर राजनाथ सिंह नए मुखिया हैं। वे जैसा चाहेंगे, करेंगे। हो सकता है, महारानी के चंगू को राजस्थान बीजेपी के मुखिया पद पर बिठाने का फैसला कर लें। मुश्किलें फिर भी कम होनेवाली नहीं हैं। ओम प्रकाश माथुर फिलहाल भले ही साथ हैं, पर उनकी याददाश्त अभी इतनी कमजोर नहीं हुई हैं कि वसुंधरा के दिए घाव भूल गए हों। घनश्याम तिवाड़ी के घनघोर तेवर देखने लायक हैं। वृद्ध होते जा रहे ललित किशोर चतुर्वेदी की अदाएं भी कोई कम खरतनाक नहीं हैं। गजब के नेता गुलाबचंद कटारिया वार पर वार कर रहे हैं। जसवंत सिंह ने वसुंधरा के खिलाफ जो सीधे-सीधे मोर्चा खोल रखा था, वह उन्होंने अभी भी पूरी तरह बंद नहीं किया है। सो, अपना मानना है कि अरुण चतुर्वेदी को हटाने का एक और राजनीतिक पाप करने के बजाय महारानी साहिबा को मैदान संभालना चाहिए। चुनाव सर पर हैं और अशोक गहलोत कोई कमजोर मुख्यमंत्री नहीं है।

लेखक निरंजन परिहार वरिष्‍ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्‍लेषक हैं.

‘Yes, we spent money on paid news ads’

: Confessions by politicians to EC belie claims of innocence by top newspapers : The political class is more honest than the media when it comes to ‘paid news’ during elections, judging by the fact that several poll candidates have owned up to this corrupt practice. At least, after the Election Commission and the Press Council of India shot off notices to them and held inquiries into the matter.

They have acknowledged guilt by belatedly adding their “news” buying expenses to their election statement of accounts. Some candidates have accepted in writing that they bought what are now called, somewhat oxymoronically, “Paid News Advertisements.” But not a single one of the newspapers they say they gave their money to has accepted any wrongdoing. These are not just any papers. In readership terms, they include three top-ranked dailies.

In some cases, the battles are still on, involving both the politicians and newspapers concerned. On January 15, the EC found that Madhya Pradesh Cabinet Minister Narottam Mishra “failed to lodge his accounts of his election expenses in the manner prescribed by law.” He faces possible disqualification.

The EC’s notice to Dr. Mishra concerns 42 news items on him during the November 2008 state elections. These, it pointed out, “read more like election advertisement(s) in favour of you alone rather than (as) news reports.” The EC names four newspapers in its notice: Dainik Bhaskar, Nai Duniya, Aacharan and Dainik Datia Prakash. Dainik Bhaskar is the second most-read daily in the country.

Less than a month earlier, the Press Council of India held quite a few dailies guilty of doing much the same thing during the 2010 Bihar assembly polls. These include Dainik Jagran, the newspaper with the highest readership in the country. The others are Dainik Hindustan, Hindustan Times, Dainik Aaj and Purvanchal Ki Raahi. Also, Rashtriya Sahara, Udyog Vyapar Times and Prabhat Khabhar.

In many cases, the route to exposure followed the pattern set in the classic case of the former Congress Chief Minister of Maharashtra, Ashok Chavan. His 2009 poll campaign for the State legislature drew scores of full pages of “news.” Not a single one of those pages ever mentioned the name of Madhav Kinhalkar, his rival for the Bhokar seat. In a 2009-10 investigation into paid news, The Hindu found a hagiographical article on Mr. Chavan appear word for word in three major rival publications. In two of them, on the same day, in all of them under different by-lines (The Hindu, Nov. 30, 2009).

The 2010 Bihar polls saw a similar pattern. This time, though, one paper came up with a truly novel defence. Same story in different papers? That’s not paid news, argues Udyog Vyapar Times. It submits that other newspapers “hack their computer site and publish the same news.” So what might look like paid news, contends Udyog Vyapar Times, is merely the outcome of desperate rivals hacking into the internal network of this Aligarh-based daily to steal their national exclusives.

How did the candidates issued ‘Paid News’ notices for the Bihar polls by the EC react? All but one seem to have accepted their guilt. According to the EC, they did so by simply adding “the expenditure included by them on account of these ‘news’ in their accounts of election expenses.” In fact, the District Election Officer of Muzaffarpur in Bihar stated flatly that the dailies had carried “news for payment.” He even had letters from the candidates owning up to buying “news.”

The Press Council of India, acting on the matter referred to it by the EC, issued show cause notices to Dainik Jagran, Dainik Hindustan, Hindustan Times et al, between July and September 2011. On December 21, 2012, the PCI, on the basis of its own inquiry committee’s report, got tough. Of the high-profile line-up, only Prabhat Khabhar escaped “the highest penalty” of the Press Council — censure — under Section 14 (1) of the Press Council Act of 1978.

This was the only case where the paper and the candidate both firmly denied the charge. (In all the other cases, the candidates accepted they had purchased “news”.) And Prabhat Khabar’s own record — it has strongly campaigned against paid news — added weight to its defence. The paper offered to apologise if the EC produced proof of any such aberration. It was “cautioned for the future.”

All the other dailies denied the charges, too. But, as the PCI’s inquiry committee puts it, “in all these cases, the candidate in question admitted before the Election Commission of India that he paid for the impugned material.” These dailies were found “guilty of having carried news reports that were in fact self-promotion material provided by the candidate in the fray,” and so faced the highest penalty of censure.

So quite a few politicians seem willing to confess to their paid news sins. They face penalties, too. Just 16 months ago, the EC disqualified Umlesh Yadav, then sitting MLA from Bisauli in Uttar Pradesh, for a period of three years for failing to provide a “true and correct account” of her election expenses. She had skipped any mention of her spending on advertisements dressed up as news during her 2007 poll campaign. She was the first legislator ever to bite the dust on grounds of excessive expenditure (and paid news). Dr. Mishra, Health Minister in the BJP government of Madhya Pradesh, now faces charges of the kind that got her disqualified.

Ashok Chavan case

Oddly enough, the Ashok Chavan case, which triggered off a spate of such cases, is itself bogged down in both the EC and the Supreme Court. The case of former Jharkhand Chief Minister Madhu Koda is likewise held up in the courts. Judicial delays could have a serious and possibly adverse impact in the fight against Paid News in the 2014 general election.

But what action do habitual offenders in the media face? The Paid News Committee constituted by the Election Commission has concluded that those 42 “news items” involving Dr. Mishra “appear to be advertisements in the garb of news” and fall “within the definition of ‘Paid News’.” The Press Council defines Paid News as “any news or analysis appearing in any media (print or electronic) for a price in cash or kind as consideration.” A Press Council team appointed by PCI Chairperson Justice Katju found last month that Paid News had been rampant in Gujarat during the State polls there in December 2012.

So what happens where media outlets concerned are found guilty? Where the “highest penalty” is censure and that draws not even an apology? Of course, Paid News is not only about elections, though that’s where it does greatest damage to the greatest number. It is an everyday activity in much of the media. The cloying coverage that powerful corporations get routinely reeks of it. You can see it in some completely corporate “sporting” events or “partnerships.” Governments, too, buy पी. साईंनाथ“news” sometimes. You can see it at work in Davos, too. Who funds journalists and channels from India at that World Economic Forum event each year is worth looking at. But that’s another story. Watch this space.

जाने-माने पत्रकार P. Sainath का लिखा यह समाचार द हिंदू में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है. पी. साईंनाथ से संपर्क sainath.p@thehindu.co.in के जरिए किया जा सकता है.

पद्म पुरस्‍कार विवादों पर हाईकोर्ट में रिट याचिका

पद्म पुरस्कारों में उठते तमाम विवादों के दृष्टिगत सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में एक रिट याचिका दायर किया है. उन्होंने प्रार्थना की है कि गृह मंत्रालय एवं प्रधानमंत्री कार्यालय को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए राष्ट्रीय चयन समिति का गठन और मात्रात्मक एवं गुणात्मक रूप से स्पष्ट अर्हता निर्धारित करने हेतु निर्देशित किया जाये. उन्होंने यह भी प्रार्थना की है कि पद्म पुरस्कारों के प्रोफोर्मा में धर्म और जाति (एससी/एसटी/ओबीसी/सामान्य) का जिक्र हटाया जाये. 

एनआरआई संत चटवाल से ले कर राजेश खन्ना को विलम्ब से ये पुरस्कार दिये जाने जैसे तमाम विवादों का उल्लेख करते हुए ठाकुर ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में बहुत सारे निर्देश बालाजी राघवन/ एसपी आनंद बनाम भारत सरकार (1996 (1) एससीसी 361) के अपने निर्णय में दिये थे, जिनमें लोक सभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके प्रतिनिधि, लोक सभा में विपक्ष के नेता आदि की समिति बनाया जाना शामिल था, पर इन सुझावों को दरकिनार किया गया जिसके कारण लगातार विवाद और शिकायतें आती रहती हैं. यह प्रकरण 30 जनवरी 2013 को जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस वी के दीक्षित की बेंच के सामने सुना जाएगा.

पढि़ए.. कैसे मीडिया में लड़कों के साथ होता है भेदभाव?

अक्सर कहा जाता है कि भारत में महिलाओं एवं लड़कियों के साथ भेदभाव होता है। लेकिन यर्थाथ में जो होता है वो बिल्कुल अलग होता है, भेदभाव के शिकार अक्सर लड़के होते हैं। आज विष्णु गुप्त से इसी पर बात हो रही थी कि किस तरह से मीडिया में सुंदर दिखने वाली उन लड़कियों को रख लिया जाता है जिन्हें कुछ नहीं आता है। मेरे पास भी कई उदाहरण हैं। एक उदाहरण खुद एक लड़की ने बताया था। एक मीडिया स्कूल में उसके साथ पढ़ने वाले एक लड़के ने अपने किसी जानने वाले के रेफरेंस से एक प्रमुख हिन्दी चैनल में वरिष्ठ पद पर काम करने वाले पत्रकार से मिलने का समय मांगा था।

उन्होंने मिलने का समय दे दिया। जब वह लड़का उनसे मिलने चैनल के नोएडा स्थित मुख्यालय जाने लगा तो उसने उस लड़की को भी बताया कि चाहे तो वह भी चल सकती है और अपना बायोडाटा उस चैनल में दे सकती है। वे दोनों जब चैनल के मुख्यालय के पास पहुंचे तब लड़के ने फोन करके उक्त पत्रकार को बताया कि वह चैनल दफ्तर आ चुका है। उक्त पत्रकार ने कहा कि वे इस समय आफिस में नहीं हैं, इसलिये बाद में आ जाये। जब दोनों लौटने लगे तभी लड़की ने उक्त पत्रकार का नम्बर उस लड़के से ले लिया और उसने भी सोचा कि कि उक्त पत्रकार से फोन पर बात करके मिलने का समय मांग ले। जब उस लड़की ने फोन किया तो पत्रकार ने सहर्ष जवाब दिया कि वह अपने आफिस में ही हैं और वह कभी भी मिल सकती है। वह लड़की उसी समय पत्रकार से मिली और उसे नौकरी पर भी रख लिया लेकिन उस लड़के को इतनी ग्लानि हुयी कि उसने मीडिया में नहीं आने की कसम खा ली।

चैनल और पत्रकार का नाम जानबूझ कर नहीं बता रहा हूं। हालांकि कुछ साल बाद उस लड़की ने भी मीडिया को छोड़ दिया। यह एक उदाहरण है कि किस तरह से मीडिया में लड़कों के साथ भेदभाव होता है। ऐसा केवल मीडिया में ही नहीं और भी क्षेत्रों में होता है….चैनलों में नौकरी और प्रमोशन का पैमाने केवल सुंदरता और अच्छी आवाज होती है, भेले ​ही उसके दिमाग में भूसा भरा हो।

लेखक विनोद विप्‍लव वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा न्‍यूज एजेंसी एएनआई के साथ जुड़े हुए हैं.

इनक्लूसिव मीडिया फेलोशिप के लिए छह राज्‍यों के आठ पत्रकार चयनित

हिन्दी और अंग्रेजी भाषा के आठ पत्रकारों का चयन विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) द्वारा दी जाने वाली इनक्लूसिव मीडिया फेलोशिप के लिए हुआ है। चयनित पत्रकार देश के छह राज्यों से हैं। खोजी और सार्थक पत्रकारिता की श्रेष्ठ परंपरा का निर्वाह करते हुए चयनित फैलो ग्रामीण समुदाय की चिन्ताओं और समस्याओं को जन-सामान्य के बीच लाने और उस दिशा में नीतिगत हस्तक्षेप की जमीन तैयार करने के लिए, उनके बीच कुछ समय बितायेंगे।

फेलोशिप के अभ्यर्थियों का चयन एक निर्णायक-मंडल ने किया जिसके सदस्य थे- श्री कृष्णा प्रसाद (एडीटर इन चीफ, आऊटलुक), श्री अरविन्द मोहन, (पूर्व वरिष्ठ / कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान और अमर उजाला), श्री गिरीश निकम (वरिष्ठ संपादक और एंकर, राज्यसभा टीवी), डा. सुमन सहाय (कन्वीनर, जीन कंपेन और सामाजिक कार्यकर्ता) तथा श्री परंजय गुहाठाकुर्ता (वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और टीवी एंकर)। निर्णायक-मंडल ने लंबी चर्चा और गहन चयन-प्रक्रिया से गुजरकर सर्व-सम्मति से इनक्लूसिव मीडिया फेलोशिप-2013 के लिए आठ अभ्यर्थियों का चयन किया जिनके नाम हैं :

1. श्री पुष्यमित्र, पंचायतनामा, प्रभात खबर, रांची झारखंड (बिहार के खगडिया जिले में बाढ़-प्रभावित गांवों में विस्थापन और न्याय के मसले पर केंद्रित अध्ययन)

2. सुश्री रश्मि कुमारी शर्मा, दैनिक जागरण, रांची, झारखंड (झारखंड की आदिवासी महिलाओं के आप्रवास, जीविका और खेती के मसले पर केंद्रित अध्ययन)

3. श्री बाबूलाल नागा, राजस्थान पत्रिका, जयपुर, राजस्थान (राजस्थान के बारां जिले के खैरुआ और सहरिया जनजाति के बीच भुखमरी और कुपोषण पर केंद्रित अध्ययन)

4. श्री शंकर सिंह भाटिया, हिन्दुस्तान, देहरादून, उत्तराखंड (मध्य हिमालयी जिले रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में खेतिहर अर्थव्यवस्था के संकट, जीविका और पलायन की समस्या पर केंद्रित अध्ययन) 

5. श्री विवियन फर्नान्डिस, सीएनएन-आईबीएन, दिल्ली (गुजरात के आदिवासी विकास मॉडल की आलोचनात्मक समीक्षा तथा बहुराष्ट्रीय निगमों और खाद्यनिगम के बरक्स किसानों के मोलतोल कर पाने की शक्ति पर केंद्रित अध्ययन)

6. श्री बिश्वजीत बनर्जी, पॉयनियर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश (इन्सेफ्लाइटिस के विरुद्ध निर्धन-जन के संघर्ष तथा पूर्वी उत्तरप्रदेश में बच्चों के पुनर्वास पर केंद्रित अध्ययन)

7. सुश्री मनीषा भल्ला, आऊटलुक, हिन्दी, दिल्ली (हरियाणा और पश्चिम उत्तरप्रदेश के खाप-पंचायतों के वर्चस्व वाले जिलों में अगम्यागमन, बलात्कार, लिंगानुपात और ऑनर-कीलिंग के मसले पर केंद्रित अध्ययन)

8. श्री प्रवीण मालवीय, पत्रिका, भोपाल, मध्यप्रदेश (नर्मदा के जलडमरुमध्य सरीखे भू-भाग के बाढ़ प्रभावित गांवों में खेतिहर भूमि के अधिकार तथा वहां जारी आपत्तिजनक सरकारी नीति पर केंद्रित अध्ययन)

फेलोशिप के लिए अभ्यर्थियों के नामों का चयन बहुत कठिन था क्योंकि प्रासंगिक, सुचिन्तित और सुगढ़ आवेदन बड़ी संख्या में आये। निर्णायक-मंडल को अपने निर्णय के पक्ष में राय बनाने के लिए प्रत्येक प्रस्ताव, प्रस्तुत स्टोरी आयडिया, सिफारिशी पत्र, कथा के प्रकाशन के अनुमति-पत्र, प्रकाशित रचनाओं के भेजे गए नमूनों तथा अभ्यर्थियों के अन्य विवरणों को कई-कई दफे देखना पड़ा ताकि बहुत से अभ्यर्थियों को हासिल समान अंकों के बीच किसी एक या दूसरे के पक्ष में निर्णय लिया जा सके। अभ्यर्थियों का अंतिम रुप से चयन मुख्य तौर पर भेजे गए प्रस्ताव की प्रासंगिकता, स्पष्टता, विचारों के नयेपन, प्रकाशन के लिए चुने गए माध्यम की पहुंच, प्रस्तुत प्रस्ताव के प्रति आग्रह और लगन तथा लेखन और अभिव्यक्ति-कौशल को आधार बनाकर किया गया।

बहरहाल, निर्णायक-मंडल के सदस्यों ने चयन-प्रक्रिया के तहत अंतिम निर्णय पर पहुंचने में अपनी पत्रकारीय सूझ और विशेषाधिकार का भी उपयोग किया। निर्णायक-मंडल का मानना था कि अन्य बहुत से प्रस्ताव चयन के मुस्तहक थे लेकिन फेलोशिप की सीमित संख्या के कारण प्रतिस्पर्धा बहुत कठिन हो गई। इनक्लूसिव मीडिया फेलोशिप देने का उद्देश्य मीडियाकर्मियों को इस विशाल देश के ग्रामीण-समुदाय से गहराई से जुड़ने का अवसर प्रदान करना है ताकि वे ग्रामीण-संकट पर अपनी विशेष समझ बना सकें, ग्रामीण-समुदाय की समस्याओं को करीब से देखें और उनपर लिखें तथा कालक्रम मे भारत के ग्रामीण-संकट के किसी खास पहलू पर विशेषज्ञता को प्राप्त करें।

इनक्लूसिव मीडिया परियोजना का एक मुख्य उद्देश्य मुख्यधारा की मीडिया में ग्रामीण भारत के बहुमुखी संकट की समझ को धारदार बनाना और उसकी कवरेज को बढ़ाना है। इस साल तीन फेलोशिप जीन कंपेन / सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सहयोग से दिये जा रहे हैं। इसका उद्देश्य भुखमरी / कुपोषण के मसले को उजागर करना और जमीनी स्तर पर सकारात्मक पहलकदमी और नवाचार के जरिए इस समस्या का उन्मूलन करना है। फैलोशिप के नियम-कायदों की जानकारी im4change.org पर उपलब्ध है।

इनक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज परियोजना के तहत भारत के ग्रामीण संकट से संबंधित विचारों, सूचनाओं और विकल्पों का एक वेब-संसाधन आधारित भंडारघर im4change.org के नाम से चलाया जाता है। इसमें 30 से ज्यादा गहन-गंभीर बैकग्राऊंडर और 20000 से ज्यादा वेबलिंक मौजूद हैं। इन्कूलिसिव मीडिया फॉर चेंज परियोजना के तहत मीडिया-रिसर्च और पंचायत तथा विकेंद्रित नियोजन के जरिए सकारात्मक हस्तक्षेप पर केंद्रित कार्यशालाओं के आयोजन का भी काम होता है।

प्रेस विज्ञप्ति

माओवादी समर्थकों की धमकी के बाद जान बचाकर भागे 22 पत्रकार

काठमांडू:  नेपाल के एक मीडिया अधिकार समूह ने कहा है कि देश के पश्चितोत्तर हिस्से में प्रधानमंत्री की राजनीतिक पार्टी के समर्थकों की ओर से धमकी मिलने के कारण 22 पत्रकारों को एक कस्बे से भागना पड़ा है। ‘फैडरेशन ऑफ नेपालीज जर्नलिस्ट’ के जगत नपाल ने कहा कि सुरखेत शहर के निकट दैलेख कस्बे से बीते सप्ताह पत्रकारों को भागना पड़ा क्योंकि सीपीएन-माओवादी के समर्थकों से उन्हें धमकी मिली थी।

प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई इस पार्टी के उप नेता हैं। ये पत्रकार नेपाल में गृहयुद्ध के दौरान एक पत्रकार की हत्या के मामले की जांच प्रधानमंत्री की ओर से कथित तौर पर रोके जाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। (बीबीसी)

ईरान में छह महिला समेत 13 पत्रकार हिरासत में

ईरान में फ़ारसी भाषा के विदेशी मीडिया संगठनों के साथ सहयोग करने के आरोप में कम से कम तेरह पत्रकारों को हिरासत में लिया गया है. इनमें सात पुरुष और छह महिला पत्रकार शामिल हैं जो अलग-अलग मीडिया संगठनों के लिए काम करते हैं. ख़बरों में कहा गया है कि उन्हें रविवार को हिरासत में लिया गया था. ईरान बीबीसी की फ़ारसी सेवा और अमरीका की वॉयस ऑफ अमरीका को शत्रु संगठन के तौर पर देखता है.

लेकिन ईरान के संस्कृति मंत्री का कहना है कि इन लोगों को पत्रकार होने की वजह से नहीं, बल्कि सुरक्षा संबंधी आरोपों की वजह से हिरासत में लिया गया है. बीते हफ्ते, बीबीसी ने ईरान के अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि वह लंदन स्थित बीबीसी फ़ारसी सेवा के कर्मचारियों को धमका रहे हैं. ईरान में रहने वाले बीबीसी पत्रकारों के परिवार के सदस्यों को खुफिया सेवाओं के अधिकारी पूछताछ के लिए बुलाते रहे हैं.

इतना ही नहीं, पत्रकारों के नाम से फ़र्ज़ी वेबसाइट और फेसबुक एकाउंट बनाए गए हैं और उन पर यौन दुर्व्यवहार समेत कई तरह के अभियोग लगाए जाते रहे हैं. वहीं ईरान का कहना है कि बीबीसी, राष्ट्रपति मेहमूद अहमदीनेजाद के साल 2009 में विवादित दोबारा चुनाव के बाद अशांति को बढ़ावा देता रहा है. बीबीसी की फ़ारसी सेवा उन लोगों के वीडियो और साक्षात्कार प्रसारित करती रही है जो सुरक्षाबलों के हाथों हुई मौतों और मनमाने तरीके से गिरफ़्तारी का दास्तां बयां करते हैं.

ईरान ने अपने नागरिकों को चेतावनी दी है कि यदि वे बीबीसी की फ़ारसी सेवा या वॉयस ऑफ अमरीका के साथ काम करते पाए गए, तो उन पर कड़ा जुर्माना लगाया जाएगा. संवाददाताओं का कहना है कि देश में इस साल जून में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और इन गिरफ्तारियों को मीडिया पर नियंत्रण बढ़ाने के उपायों के तौर पर देखा जा रहा है. (बीबीसी)

सेक्‍स स्‍कैंडल उजागर करने वाले खोजी पत्रकार पर गिरी पुलिस की गाज

बीजिंग। चीन में सरकार अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाती है। इसके पहले भी कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। सत्ताधारी पार्टी के नेता का सेक्स स्कैंडल इंटरनेट पर सार्वजनिक करने वाले खोजी पत्रकार को चीनी पुलिस ने सोमवार को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने धमकी दी अगर उसने अपने पास रखे अन्य वीडियो टेप पुलिस के हवाले नहीं किये तो उस पर सुबूतों को छिपाने का मुकदमा दर्ज किया जाएगा।

जाऊ रुईफेंग का नाम का यह खोजी पत्रकार पीपुल सुपरविजन नेट नाम की एक व्हीसलब्लोइंग संस्था चलाता है। रुईफेंग ने पिछले साल सत्ताधारी पार्टी के चोंगकिंग प्रांत प्रमुख लेई जेंगफू का सेक्स वीडियो इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिया था जिससे सरकार की काफी किरकरी हुई थी। सोशल साइट्स पर इस वीडियो के फैलने के तुरंत बाद लेई को पार्टी से निकाल दिया गया था। इस मामले के बाद रुईफेंग ने कहा था कि उसके पास अन्य कई अधिकारियों के भी सेक्स टेप हैं। भविष्य में वह उन्हें सार्वजनिक कर सकता है। इस वजह से पुलिस रविवार रात को को रुईफेंग के घर गई और उसे गिरफ्तार कर लिया। रुईफेंग के वकील ने बताया कि पुलिस ने उससे दूसरे वीडियो टेप मांगे।

वकील ने बताया कि रुईफेंग को यह अधिकार है कि वह अपने स्रोत किसी को न बताये। हांलाकि सोमवार सुबह रुईफेंग को पुलिस ने छोड़ दिया। मालूम हो कि निष्कासित नेता बो शिलाई का तगड़ा जनाधार होने की वजह से चोंगकिंग प्रांत सत्ताधारी पार्टी के लिए अत्यधिक संवेदनशील है। बो शिलाई को पार्टी से भ्रष्टाचार के आरोप में बाहर निकाला गया था। सत्ताधारी पार्टी ने भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अपना वही पुराना राग अलापा है। लोगों में आए दिन उजागर होने वाली ऐसी घटनाओं से आक्रोश है। लोग ऐसी घटनाओं से परेशान हैं। (एजेंसी)

राखी बख्शी ने इस्तीफा नहीं दिया बल्कि उन्हें टर्मिनेट किया गया, ये है प्रमाण

लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की मीडिया एडवाइजर राखी बख्शी ने मीडिया एडवाइजर पद से खुद इस्तीफा दिया या उन्हें टर्मिनेटड किया गया, इसको लेकर कायम भ्रम की स्थिति अब खत्म हो गई है. भड़ास4मीडिया के पास वो टर्मिनेशन लेटर है जिसमें कहा गया है कि राखी बख्शी को मीडिया एडवाइजर पद से लोकसभा अध्यक्ष 31 दिसंबर 2012 की शाम से टर्मिनेट मानती हैं.

लोकसभा सचिवालय के डिप्टी सेक्रेट्री यूसी भारद्वाज के हस्ताक्षर से जारी टर्मिनेशन लेटर में राखी बख्शी को ये भी कहा गया है कि वे सभी सरकारी – कार्यालयी संपत्ति को तुरंत हैंडओवर करें और सचिवालय से नो डिमांड सर्टिफिकेट लें. इससे पहले राखी बख्शी की तरफ से खुद ये दावा किया गया था कि उन्होंने अपनी तरफ से इस्तीफा दिया और वे नए प्रोजेक्ट पर काम करने जा रही हैं.

उन्होंने ये बात तब कही जब भड़ास पर उनसे संबंधित खबर छपी थी कि वे लोकसभा अध्यक्ष के मीडिया एडवाइजर पद से हटा दी गई हैं और ऐसा कदम उनके खिलाफ कई तरह की शिकायतें मिलने के कारण लोकसभा अध्यक्ष ने उठाया. भड़ास लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के साथ राखी बख्शी (फाइल फोटो)पर प्रकाशित इस खबर पर राखी बख्शी को आपत्ति थी और उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि उन्होंने खुद इस्तीफा दिया है और उन पर कोई आरोप नहीं था.

राखी के स्पष्टीकरण पर भरोसा करते हुए उनकी कही गई बातों के आधार पर भड़ास पर छपी खबर को मोडीफाई कर दिया गया और उसे वैसा बना दिया गया जैसा राखी बख्शी ने बताया क्योंकि कोई प्रमाण न होने के कारण उन्हीं की बात पर भरोसा करना पड़ेगा जिनके बारे में खबर है.

लेकिन अब सच्चाई सामने आ गई है और राखी बख्शी का झूठ भी सामने आ चुका है. सूत्रों का कहना है कि राखी बख्शी पर कई तरह के आरोप हैं और कई आरोपों की निजी जांच खुद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कराया, उसके बाद ही उन्होंने राखी बख्शी को टर्मिनेट करने का फैसला लिया. टर्मिनेशन लेटर नीचे दिया जा रहा है…

सूत्रों का कहना है कि राखी बख्शी के मसले को लेकर कई लोग सक्रिय हैं और उनके कारनामों की सूची बनाई जा रही है और प्रमाण इकट्ठे किए जा रहे हैं. राखी बख्शी भी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अपनी स्थिति फिर से मजबूत बनाने में लगी हुई हैं और कई प्रभावशाली लोगों के संपर्क में हैं.  देखना है कि इस प्रकरण में आगे क्या मोड़ आता है.

चर्चा है कि अगर जल्द ही राखी बख्शी ने कार्यलयी सामान व सरकारी संपत्ति को हैंडओवर नहीं किया तो उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जा सकता है. इस बाबत लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय से मौखिक आदेश संबंधित अधिकारियों को दिया जा चुका है. राखी बख्शी के टर्मिनेशन की सूचना को सार्वजनिक करने की तैयारी की गई है जिसके तहत आदेश की प्रति को लोकसभा की वेबसाइट पर जल्द ही डाला जा सकता है.


 

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/660/media-world/rakhi-bakshi-with-lok-sabha-speaker-meira-kumar.html


मीरा कुमार के साथ राखी बख्शी का वीडियो देखने के लिए उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक कर दें.

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नहीं लांच हो पाया अल्फा ग्रुप का न्यूज चैनल ‘नेशन टुडे’

26 जनवरी के दिन अल्फा ग्रुप के नेशनल न्यूज चैनल 'नेशन टुडे' को लांच करने की घोषणा सच साबित नहीं हुई. बताया जाता है कि चैनल की क्वालिटी सही न होने और फिनिशिंग टच न दिए जाने के कारण लांचिंग को टाल दिया गया. अब मध्य फरवरी में यह चैनल लांच होगा. चैनल के एडिटर इन चीफ शैलेश हैं जो आजतक में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर रह चुके हैं. शैलेश पर इस चैनल को खड़ा कर ले जाने की बड़ी जिम्मेदारी है जिसके कारण वह हर कदम फूंक फूंक कर रख रहे हैं. उन्होंने 'नेशन टुडे' को सफलता दिलाने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है.

उधर, चैनल से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि 26 जनवरी को चैनल की साफ्ट लांचिंग हो चुकी है लेकिन इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है. 26 जनवरी के दिन चैनल को टेस्ट सिग्नल पर डाल दिया गया है. फरवरी मध्य में लांचिंग की घोषणा इसलिए की गई है ताकि तब तक चैनल चलाने में आ रही गड़बड़ियों को दुरुस्त किया जा सके और ठीक से ट्रायल हो जाए.

विनीत मित्तल की गिरफ्तारी पूर्व एमएलसी राकेश से धोखाधड़ी करने के कारण हुई

: धोखाधड़ी के मामले में कोर्ट से था वारंट : मोहनलालगंज पुलिस ने पकड़ा, कोतवाली में प्रदर्शन : लखनऊ : मोहनलालगंज पुलिस ने धोखाधड़ी के एक मामले में रायबरेली रोड स्थित लखनऊ कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट के फाउंडर चेयरमैन विनीत मित्तल को गिरफ्तार कर लिया। इंस्पेक्टर मोहनलालगंज योगेंद्र सिंह के मुताबिक धोखाधड़ी के मामले में सीओ मोहनलालगंज ने विनीत मित्तल व अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। विनीत के खिलाफ कोर्ट ने गैरजमानती वारंट जारी किया था।

विनीत मित्तल

पुलिस के मुताबिक एक निजी कंपनी में उच्च अधिकारी रह चुके विनीत मित्तल ने रायबरेली निवासी पूर्व एमएलसी राजा राकेश प्रताप सिंह से रायबरेली रोड स्थित शिवगढ़ रिजार्ट व उससे जुड़ी करीब 10 एकड़ भूमि 29 वर्षो के लिए लीज पर कुछ शर्तो के आधार पर ली थी। आरोप है कि विनीत मित्तल ने पूर्व एमएलसी के फर्जी डिजिटल दस्तखत बनाकर व फर्जी दस्तावेजों की मदद से यह भूमि हड़पने का प्रयास किया और यहां लखनऊ कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट खोल दिया। इस संबंध में पूर्व एमएलसी की ओर से मोहनलालगंज कोतवाली में धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

पुलिस ने जांच के बाद विनीत मित्तल व उनके वकील दिलीप दीक्षित के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। इसी मामले में कोर्ट ने विनीत मित्तल के खिलाफ वारंट जारी किया था। पुलिस ने सर्विलांस व एसओजी टीम की मदद से रविवार को आरोपी विनीत को फत्तेखेड़ा गांव से गिरफ्तार कर लिया।

बताया गया कि विनीत मित्तल व उनके साथियों ने एआइसीटीइ तथा फॉर्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया से फर्जी दस्तावेजों की मदद से कॉलेज की मान्यता हासिल की थी। बताया गया कि फर्जी मान्यता मामले में सीबीआइ ने जांच की थी तथा विनीत उनकी पत्‍‌नी अर्चना मित्तल व अन्य आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। बाद में कॉलेज की मान्यता रद कर दी गई थी। रविवार को पूर्व एमएलसी के समर्थकों व कॉलेज के छात्रों ने मोहनलालगंज कोतवाली में विनीत के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन भी किया।

उपरोक्त खबर दैनिक जागरण में प्रकाशित हुई है. वहीं से साभार.


विनीत मित्तल की हिस्ट्री जानने के लिए यहां क्लिक करें- सहारा समूह के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर रहे विनीत मित्तल की कहानी

Hinduja group signed a deal to acquire Belgian media company Alfacam

Davos : Hinduja group signed a deal to acquire Belgian media company Alfacam, which provides TV facilities and services to broadcasters and production houses, for an amount to be disclosed later.  Alfacam is known for its broadcasting vehicles for filming and broadcasting of sports and entertainment events.

The acquisition was announced on the sidelines of the WEF Annual Meet by Gopichand Hinduja and Prakash Hinduja, as also Flemish Minister- President Kris Peeters. The deal is supported by Flemish government and details of the acquisition, including price,  would be announced after completion of all terms and conditions

साभार : पीटीआई

I&B Ministry issues notice to PTC for airing ads on gurdwara polls

Chandigarh : The Union Ministry of Information and Broadcasting has issued a showcause notice to PTC news channel, following allegations of the channel airing advertisements canvassing for votes in favour of a particular political party in connection Delhi Sikh Gurudwara Management Committee. These advertisements were reportedly aired on January 26 — a day after the campaigning for the elections had ended.

The channel has been asked to explain why action should not be taken against PTC for the violating the model code of conduct. In case the channel fails to reply within three days, action will be initiated against the channel.

The showcause notice stated that the Directorate of Gurudwara Election, New Delhi, wrote to the channel informing them that the campaign period for the elections had come to an end at 5 pm on January 25. "It was further stated that the continued running of advertisements by PTC on 26.1.2013, exhorting voters to vote in favour of a particular political party/candidate, is a violation of the model code of conduct as well as Section 126 of the Representation of People Act-1951," the notice added.

The notice further said that despite this memo, the channel carried advertisements continuously from 5 am till midnight on January 26. "The advertisements showed messages from prominent political figures of a particular political persuasion, appealing to voters to vote in favour of a particular political party," the showcause notice added.

The channel's CEO, Rabindra Narayan, however, told PTI that they had not violated any rule and had already "responded satisfactorily" to a memo they had earlier received from the Directorate of Gurudwara Election of the Delhi government.

"We had earlier received a memo from the Directorate of Gurudwara Election, a copy of which was sent to the I&B Ministry also. We have already replied satisfactorily to the memo and will also reply to ministry," Narayan said.
इंडियन एक्सप्रेस से साभार.

नोएडा में महिला मीडियाकर्मी को छेड़ने वाला पतंजलि का डाक्टर गिरफ्तार

नोएडा : उत्तरप्रदेश के नोएडा में रामदेव की पतंजलि आयुर्वेदिक क्लीनिक के एक चिकित्सक के खिलाफ छेड़खानी के आरोप लगाए जाने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। नोएडा पुलिस के अनुसार पीड़िता एक मीडियाकर्मी है और उसने अशोक भदौरिया नाम के चिकित्सक के खिलाफ सेक्टर 32 स्थित क्लिनिक में छेड़खानी करने की प्राथमिकी दर्ज कराई है।

छेड़खानी की कथित घटना के बाद महिला ने क्लिनिक से भागकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने चिकित्सक को गिरफ्तार कर लिया और मामले की जांच कर रही है। पतंजलि क्लीनिक से संपर्क किए जाने पर उन्होंने मामले की जानकारी नहीं होने और इसकी जांच करने की बात कही। साथ ही उन्होंने यह पुष्टि करने से भी इंकार कर दिया कि यह चिकित्सक उनके यहां कार्यरत है या नहीं।

मूलत: आगरा निवासी अशोक भदौरिया बीएएमएस डॉक्टर है। वह सेक्टर-26 स्थित जयपुरिया प्लाजा के एक क्लीनिक में काम करता है। सेक्टर-12 की रहने वाली एक मीडियाकर्मी युवती इस क्लीनिक में पिछले कई महीनों से इलाज करा रही थी। शनिवार को जब वह क्लीनिक पहुंची, तो अशोक जांच के बहाने उसे क्लीनिक के अंदर ले गया और छेड़खानी शुरू कर दी। जब युवती ने मना किया, तब भी नहीं माना। किसी तरह डॉक्टर से छूटकर वह बाहर निकली और पुलिस को फोन कर जानकारी दी। पुलिस की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और आरोपी डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया। एसपी सिटी योगेश सिंह का कहना है कि युवती की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर पुलिस ने आरोपी डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की जांच की जा रही है।

‘पत्रकारिता के नटवरलाल’ सरीखी एक कहानी ये भी

Priy Yashwant Bhai Ji, Jai Ram ji ki. Bhadas khub achha nikal raha hai. Din ki shuruvat chay aur bhadas se hi hoti hai. Ek story bhej raha hu. Dekh lijiye. 100% satya hai. Agar pasand Aa jaye to chhap dijiye. Badi meharbani hogi. Agar apne amulya samay me se iska link bhej denge to ham ye mail kai logo ko forward kar denge. Aur na bhi bhejenge to koi bat nahi. Ham bhadas din me 5 bar padhte hai. -Apka ek Gumnam pathak

हाल में भड़ास पर ''पत्रकारिता के नटवरलाल'' शीर्षक से नरेंद्र वर्मा जी की पुस्तक का अंश पढ़ने को मिला। इसी श्रेणी की एक सत्य कथा यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। मैंने किसी सज्जन का नाम नहीं लिखा है। इसलिए इसे व्यक्तिगत आक्षेप न मानें। लेकिन जिन लोगों ने यह कांड किया है उनके लिए यह आईना है। हम तो वैसे भी पत्रकार नहीं हैं, बस कभी-कभार थोड़ा पढ़-लिख लेते हैं। हां, अपने कुछ दोस्त पत्रकारिता में जरूर हैं। उनमें से ही एक महाशय हैं। यूं तो बेचारे बड़े गुणी हैं लेकिन बहुत परेशान भी हैं।

नरेंद्र जी की कहानी में किन्हीं मेनका और विश्वामित्र टाइप लोगों का जिक्र हुआ है। सो हमारा भी फर्ज बनता ही है कि एक मेनका का परिचय आपसे करा दें। यह अलग बात है कि इस कथा में विश्वामित्रों की ठीक-ठीक संख्या का हमें भी पता नहीं। हमारे मित्र बताते हैं कि उनकी संख्या सात से ऊपर है तो एक सज्जन बताते हैं कि यह आंशिक सत्य है। टाइम के हिसाब से यह आंकड़ा कम-बेसी होता रहा है। अब इसमें मेनका ज्यादा दोषी है या विश्वामित्र, यह तो भगवान ही जानें, लेकिन जिस तरह से पत्रकारिता में नटवरलालों की कमी नहीं है, उसी प्रकार से मेनका तथा विश्वामित्र भी अवतरित होते रहते हैं।

यह किस्सा है एक नामी अखबार का, लेकिन आज कल कुछ दुर्दिन चल रहे हैं। हमारी कथा के मेनका और विश्वामित्र यहीं से जुड़े हैं। एक विश्वामित्र घाघ किस्म के कुटिल प्राणी हैं जिनका काम अखबार के लिए बिजनस का जुगाड़ करना है। ये ऑफिस में जब आते हैं तो इतनी ज्ञान की बातें करते हैं कि आपको इन पर श्रद्धा हो जाए और उसी वक्त नारियल फोड़ने का मन करे, लेकिन ये भी मेनका के चक्कर में आ गए और अब लोगों की श्रद्धा जाती रही। इस बीच इन्होंने ज्ञान की बातें बंद कर दीं।

दूसरे विश्वामित्र डिजाइनिंग से हैं। यह विश्वामित्र अच्छा पेज बना लेता है लेकिन मेनका ने यह कहकर उसका ईमान बिगाड़ दिया कि हम अपना डिवीजन अलग काहे नहीं बना लेते? अब तो बिजनेस वाले बाबू भी अपने साथ हैं! रात को रोज ही बात होती है। ये विश्वामित्र भी षड्यंत्र में शामिल हो गए। दूसरा 15 साल से सिर्फ कंपोजिंग कर रहा है और आज भी यही कर रहा है। उसका कहना है कि आगे भी यही करता रहेगा।

अब मेनका के बारे में सुनिए। शुरुआत में एक अंग्रेजी अखबार से जुड़ी लेकिन वहां एक से एक कर्मकांडी बैठे थे। सो हिंदी का रुख किया। यहां संपादक को सैट कर मैग्जीन में जगह बना ली। कुछ साल बीते। मेनका ने भी अपना कुनबा बना लिया। एक से भले तीन। इस बीच संपादक को दूसरी जगह से मौका मिला और वे चलते बने। ऑफिस में लोक-दिखावे के लिए रोने-धोने का कार्यक्रम हुआ, लेकिन मेनका के मन में लड्डू फूट रहे थे कि अब पांचों अंगुलियां घी में और सर कड़ाही में। बिजनस बाबू को कहकर कुछ दिन के लिए संपादक बनी। बताते चलें कि मेनका को पत्रकारिता में सिर्फ दो ही विद्या में महारत हासिल है – Translation और षड्यंत्र। सो दोनों ही विद्याओं का खूब प्रयोग हुआ।

मैग्जीन में गुटबंदी बढ़ गई और कवर स्टोरी के नाम पर नेट से मारे गए मैटर को ट्रांसलेट कर चेपा गया। इससे पाठक बोर हो गया। नतीजा यह निकला कि ज्यों-ज्यों मैग्जीन में गुटबंदी और Translation बढ़ते गए त्यों-त्यों circulation नीचे आता गया। अब तक एमडी की भी आंखें खुल गईं। बिजनस बाबू को फटकारा कि ऑफिस आकर कभी-कभी कुछ काम भी कर लिया करो। लिहाजा नए संपादक की खोज शुरू हुई। नए संपादक आए और उन्होंने कार्यभार संभाला। इन महाशय पर भी मेनका ने जादू चलाना चाहा लेकिन नहीं चलना था सो नहीं चला। लिहाजा षड्यंत्र अनिवार्य था। दिल्ली, नोएडा के बड़े वकीलों के दरबार में मत्था टेकने लगे। लेकिन बात बन नहीं रही थी।

इधर नए संपादक बाबू काफी षड्यंत्रों के बावजूद और मजबूत हो रहे थे। इसलिए मेनका ने बिजनस बाबू की ओर पांसा फेंका – ग्रप में मैग्जीन की कोई कमी तो है नहीं। अगर आप मुझे अमुक मैग्जीन की संपादक मुकर्रर करवा दें तो बड़ी मेहरबानी हो। बिजनस बाबू मान गए। अब नई मैग्जीन की बारी थी। मेनका के साथ उसका पूरा कुनबा नई मैग्जीन में चला गया। एक बार फिर से Translation और षड्यंत्रों का मौसम शुरू हुआ। इस मौसम ने कई लोगों की नौकरियों का भक्षण किया। कोई पांचेक महीने बीते होंगे कि एमडी ने बिजनेस बाबू को फिर फटकारा – यार, तुम काहे हमारी बात पर ध्यान नहीं देते। तुम्हारी इस रासलीला की वजह से हमारा बंटाधार हो रहा है। मेनका की पेशी हुई। इस बार एमडी ने किसी का लिहाज नहीं किया। बोले – मैग्जीन का ग्राफ रसातल में चला गया। अगर मार्केट में मुफ्त में बांटो तो भी कोई नहीं लेगा। इसलिए बंद करो ये रासलीला और सब अपने-अपने घर जाओ।

इस हुक्म से मेनका और पूरे कुनबे के तोते उड़ गए। कुछ दिन बहुत भारी बीते लेकिन मेनका और बिजनस बाबू ने हार नहीं मानी। एक दिन जब एमडी अच्छे मूड में थे तो दोनों ने मिलकर पटा लिया। अब मेनका और उसका पूरा कुनबा अखबार में आ गया। खबर है कि मेनका के लिए ही बिजनस बाबू ने पेज बढ़वा दिए ताकि संपादक टाइप किसी पद के हिसाब से ये अपना काम करती रहें। ये अलग बात है कि इस पेज का भी वही हश्र होता दिख रहा है जो पहले हो चुका है। इतिहास कभी-कभी अपने आप को दोहरा भी लेता है। जैसे हर युग में मेनका और विश्वामित्र की कथा दोहराई जाती है। हालांकि दोनों की संख्या युग के हिसाब से कम-बेसी होती रहती है।

यह कहानी भड़ास के पास एक मेल के जरिए आई है जिसमें लेखक ने अपना नाम और मेल आईडी न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

माधवकांत उर्फ मार्तंडपुरी बने महामंडलेश्वर

पत्रकारिता-जगत से संन्यास-जगत में दाखिल होने वाले माधवकांत मिश्र अब महामंडेलश्वर स्वामी मार्तण्ड पुरी महाराज बन गये हैं। उन्हें श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के शिविर में शुक्रवार को महामंडलेश्वर पद से विभूषित किया गया। निर्वाण पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर विश्वदेवानंद जी के सानिध्य में आयोजित भव्य समारोह में मार्तण्ड पुरी जी का विधि-विधान से पट्टाभिषेक किया गया। इस मौके पर भारी तादाद में मौजूद महामंडलेश्वरों, श्री महंतों, आचायरे और संत महापुरुषों ने उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।

तीर्थराज प्रयाग के दारागंज में जन्मे माधवकांत मिश्र के पिताश्री स्वर्गीय जयदेव मिश्र स्वयं शाक्त परम्परा के प्रसिद्ध साधक थे। माधवकांत को बचपन से ही परमपूज्य देवरहा बाबा, सच्चा बाबा, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी सहित अनेक संत-महापुरुषों का सानिध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने पत्रकारिता का जीवन भी प्रयाग के हिन्दी दैनिक भारत से वर्ष 1968 से प्रारम्भ किया और ˜सूर्या इंडिया पत्रिका, स्वतंत्र भारत ,राष्ट्रीय सहारा, कुबेर टाइम्स, विश्व मानव, ,पाटलिपुत्र टाइम्स, सहित अनेक पत्र- पत्रिकाओं के संस्थापक एवं सम्पादक रहे।

भारत का प्रथम अध्यात्मिक चैनल आस्था माधवकांत मिश्र ने ही प्रारम्भ किया और प्रज्ञा , सनातन, और दिशा, चैनलों के भी संस्थापक रहे। कई साल पहले उन्होंने पहली बार पूरे देश में साक्षात शिव स्वरूप रुद्राक्ष के पौधे का रोपण प्रारम्भ किया। लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड ने इस अभियान को दर्ज किया और वर्ष 2013 के नेशनल रिकार्ड होल्डर के रूप में इनका नाम दर्ज किया। वह पिछले साल 29 अक्टूबर को कनखल, हरिद्वार में श्री यंत्र मंदिर में आचार्य महामंडलेश्वर विश्वदेवानंद जी से दीक्षा ग्रहण संन्यासी हो गये और अपना जीवन सनातन सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनके साथ शुक्रवार को स्वामी जयकिशन गिरि महाराज को भी महामंडलेश्वर पद से विभूषित किया गया।

समकालीन रंगमंच पत्रिका का जयपुर में अशोक वाजपेयी ने किया लोकार्पण

जयपुर। राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर में चल रहे साहित्य उत्सव के दौरान रंगमंच पर आधारित पत्रिका समकालीन रंगमंच का भी शहर में संस्था रंगशीर्ष के सहयोग से लोकार्पण हुआ। पत्रिका का विमोचन प्रख्यात साहित्यकार और चिंतक डॉ. अशोक वाजपेयी ने किया। पिंक सिटी प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में रंगमंच की आवाज़ बनने का मिशन लिए इस पत्रिका और रंगकर्मियों के साथ साथ समाज के बीच ऐसी पत्रिका की आवश्यक्ता और रंगमंच के वर्तमान परिदृश्य को लेकर एक परिचर्चा भी हुई।

इस परिचर्चा और समारोह में अशोक वाजपेयी के अलावा जयपुर के वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद श्री राजाराम भादू, राजस्थान के वरिष्ठ रंगकर्मी श्री अशोक राही, इप्टा जयपुर के युवा थिएटर निर्देशक श्री संजय विद्रोही ने भी हिस्सा लिया। कार्यक्रम में स्वागत उद्बोधन देते हुए पत्रिका के सम्पादक राजेश चंद्र ने उस पीड़ा और संघर्ष के बारे में बात की, जिससे हिंदी का एक आम रंगकर्मी गुज़रता है। राजेश चंद्र ने कहा कि उस घनीभूत पीड़ा और संघर्ष की भावना से ही इस पत्रिका का जन्म हुआ है, जिसे आगे ले जाना रंगकर्मियों के साथ साथ रंगमंच के दर्शकों के हाथ भी है।

राजेश चंद्र ने पत्रिका की ज़रूरत के बारे में कहा कि ये हिंदी की पहली ग़ैर संस्थानिक पत्रिका है, और ये ही इसकी आवश्यक्ता है। मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए डॉ. अशोक वाजपेयी ने रंगकर्म को सबसे अनोखी कला बताते हुए, दर्शक और रंगकर्मी के सम्बंधों के धागों को पिरो दिया। डॉ. वाजपेयी ने रंगकर्मियों और रंगमंच की दुर्दशा के लिए सरकारी तंत्र के साथ साथ राजनैतिक नेतृत्व को भी दोषी ठहराते हुए, इस पत्रिका को अपनी शुभकामनाएं दीं और रंगमंच के आने वाले भविष्य के लिए दिल्ली के बाहर विकेंद्रित नाट्य समूहों की ज़िम्मेदारी को अहम बताया।

कार्यक्रम में उपस्थित सभी वक्ताओं ने समकालीन रंगमंच के उज्ज्वल भविष्य के लिए सकरात्मक कामनाएं की और पत्रिका के लिए अमूल्य सुझाव भी दिए। लोकार्पण के कार्यक्रम का संचालन युवा पत्रकार मयंक सक्सेना ने किया और धन्यवाद ज्ञापन रंगशीर्ष संस्था की ओर से किया गया। 

प्रेस विज्ञप्ति

ईटीवी के 11 साल : बाजारवाद में पूरा बाजारू हो गया ये चैनल

संपादक, भडास फार मीडिया से आग्रह है कि इसे बिना नाम के ही छापें, अन्य़था लेखक के पेट में लात पड़ते देर नहीं लगेगी। बात मैं ईटीवी के बारे में बताने जा रहा हूं। इस चैनल के 11 साल पूरे हो चुके हैं, 27 जनवरी के दिन। खुद को रीजनल चैनलों का सरताज कहने वाला ईटीवी न्यूज चैनल पैसा कमाने की होड़ में इस कदर आगे बढ़ चुका है कि उसे ये तक ख्याल नही है कि वो न्यूज चैनल है या विज्ञापन चैनल?

खासकर ईटीवी यू पी/उत्तराखण्ड  तो लगता पूरा का पूरा विज्ञापन चैनल हो गया है। इस चैनल पर इन दिनों जब देखों विज्ञापन ही नजर आ रहे हैं। ये सही है कि चैनल चलाने के लिए पैसा चाहिए और पैसा विज्ञापनों से ही आता है। बावजूद इसके ई टी वी के यू पी/ यू के चैनल के हाल ये ही कि यहां आधे घंटे के न्यूज बुलेटिन में खबरों को मात्र दस मिनट का समय दिया जा रहा है। जबकि दो तहाई समय विज्ञापनों की भेंट चढ़ रहा है।

चैनल की इस आर्थिक भूख से सबसे ज्यादा वो दर्शक खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। जिन्होनें 11 सालों तक इस चैलन पर विश्वास किया । न्यूज की दुनियां में 11 सालों का सफर तय करने वाले ई टी वी यू पी/यू के चैनल को खबरों के लिए जाना जाता है। यहीं वजह है कि अपना यू पी हो या फिर अपना उत्तराखण्ड दोनों बुलेटिन को देखने के लिए दर्शक अपना सबकुछ छोड़कर बैठ जाते है। लेकिन खबरों के नाम पर इन दिनों उन्हें जमकर विज्ञापन दिखाये जा रहा है।

उत्तराखण्ड की बहुगुणा सरकार के विज्ञापनों ने तो हद कर रखी है। चैनल के हर बुलेटिन में 15 मिनट उन्हीं के कारनामों के विज्ञापन चलते हैं। बहुगुणा की सरकार जनता की नजरों में तो नही चढ़ती दिखाई दे रही है। लेकिन कोई ई टी वी के विज्ञापनों पर यकीन कर ले तो, लगेगा ये राज्य विजय बुहुगुणा के एक साल से भी कम के कार्यकाल में जैसे स्वर्ग बन गया है। जबकि हकीकत एकदम जुदा है। आई वी मंत्रालय की गाइड लाइन कहती है कि एक घंटे में किसी भी चैनल में मात्र 12 मिनट के विज्ञापन दिखाये जा सकते हैं। लेकिन ई टी वी यू पी/ यू के ने तो हद कर दी है। आधे में ही यहां बीस मिनट के विज्ञापन चलाया जा रहे हैं। लेकिन कोई देखने वाला नही है।

रामो जी राव के दौरान इस चैनल ने जो नाम कमाया उसे अब पूरी तरह बेचा जा रहा है। अगर आलम ये ही रहा तो, कुछ दिनों में दर्शक तो इस चैनल से किनारा कर ही लेगें। जिसका नतीजा ये होगा कि भविष्य में इसे विज्ञापन मिलना तक बंद हो जायेगें। खबरों और विज्ञापन का जरूरी तालमेल ही दर्शक पंसद करते हैं। पहले इस चैलन में सिर्फ और सिर्फ खबरें होती थी। लेकिन मात्र की ही खबरे देखने को मिल रही है। ये छल है उन दर्शकों के साथ जो इस चैनल पर विश्वास करते हैं। 11 साल पूरा करने पर चैनल कहता है कि “ बाजारवाद के दौर में उसने खुद को बचाये रखा है” जबकि सच ये है कि बाजारवाद के इस दौर में ये चैनल पूरा का पूरा बाजारू हो चला है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

स्ट्रिंगर पर शोध कर रहे हैं उज्जवल कुमार, कुछ मामले इन्हें बताएं

उज्जवल कुमार ने भड़ास4मीडिया को मेल करके सूचित किया है कि वे स्ट्रिंगरों पर शोध कर रहे हैं. उन्हें केस स्टडी के लिए कुछ मामले चाहिए. स्ट्रिंगर के दुख-दर्द के प्रकरण चाहिए. अगर कोई स्ट्रिंगर साथी चाहता हो कि उज्जवल की मदद करे तो नीचे दिए गए उनके नंबर या मेल आईडी पर उनसे संपर्क कर सकता है. उज्जवल कुमार ने अपने मेल में जो लिखा है, वह इस प्रकार है-

सर को प्रणाम

मैं इन दिनों स्ट्रिंगर पर शोध कर रहा हूं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से एम.फिल. के तहत यह शोध कर रहा हूं। आपसे आग्रह है कि मुझे इससे संबंधित किसी भी तरह की जानकारी यदि आपके पास हो, तो मुझे मेल कर दें। इसके अतिरिक्त यदि किसी स्ट्रिंगर की विशेष पीड़ा या उनकी निजी पारिवारिक उलझनें, हों तो मुझे मेल करें। मैं इसे केस स्टडी के तौर इस्तेमाल करूंगा। 

आपका

उज्ज्वल

09372191119

ujjwal121@gmail.com

गोंडा के वरिष्ठ पत्रकार केसी महंथ का निधन

गोंडा के वरिष्ठ पत्रकार केसी महंथ नहीं रहे। उनके जाने से उनके घर के लोग दुखी होंगे। शहर वाले भी कुछ देर के लिए, पर अफ़सोस, यह ख़बर की दुनिया की बड़ी ख़बर नहीं। क्यों? क्या महज इसलिए कि केसी महंथ ने ज़िंदगी भर बड़े दांव नहीं खेले, वो सितारा बनने के लिए ज़रूरी कवायदों में शामिल नहीं रहे? पर महंथ जी, आप हमारे लिए बेहद ज़रूरी थे. आपके होते हुए उस शहर में एक गांव बचा हुआ नज़र आता था… आपको याद करते हुए कुछ लिखा है – आपको ही नज़र कर रहा हूं…

किसी गांव सा था वो, शहर में गुज़र गया

चण्डीदत्त शुक्ल

गूगल पर केसी महंथ के बारे में कुछ तलाश रहा हूं। यह जानते हुए कि कुछ नहीं मिलेगा। एक भी रिजल्ट नहीं। वैसे, ये बेहद बेशर्मी, आलस्य और अपनी जड़ों से कट जाने वाली हरकत है। पर क्य़ा कहूं। ऐसा ही है। हो सकता है, कल को ये दिन भी आए कि लोग अपने मां-बाप के बारे में भी गूगल पर इन्फो तलाशने लगें। हम अपनी मिट्टी ऐसे ही भूलते जा रहे हैं। आज सुबह ही खबर मिली कि महंथ जी नहीं रहे। वो मां-बाप तो नहीं पर पता नहीं क्या-क्या थे। गोंडा में रहते हुए, जब पत्रकारिता की एबीसीडी पढ़नी चाही तो एक वही थे, जिन्होंने शुरू-शुरू में आतंक नहीं दिखाया। यह नहीं कहा था कि पत्रकार कोई तोप होते हैं, या ये कि तू चीज ही क्या है? इतने ही सीधे-सादे, सच्चे, घर-दुआर वाले प्राणी थे महंथ जी। इतने अपने कि उन्हें `थे' लिखते हुए भी तकलीफ हो रही है… पर वही महंथ साहब, अब नहीं हैं, और जब उन पर कुछ लिखने को मन कचोट रहा है तो कुछ भी याद नहीं आ रहा… न उनका जन्म, न कोई सेलेब्रिटी इन्फो। इस तरह का साधारण क्या होना कि दिखावे की दुनिया में आपके बारे में इन्फॉर्मेशन ही न मिले? कुछ तो जलवे बिखेरते, एमपी-एमएलए-मिनिस्टर-चीफ मिनिस्टर पटाते, अवार्ड-शेवार्ड हासिल करते, बंगला एलाट करवाते…। ख़ैर, महंथ साहब चले गए। गोंडा कचहरी में आपकी गुमटी के पास पुराने बूढ़े मुंशी जी तो फिर बैठेंगे और शायद कोई आपका जूनियर गद्दी संभाले, मुकदमे की पेशियां अटेंड करे, लेकिन खांटी गंवई वाली आपकी मुस्कान कहां मिलेगी?

गोंडा शहर की कुछ पुरानी-धुंधली शामें याद आ रही हैं। सिविल लाइंस में पुराने, पीले रंग का मुरझाया सा एक बड़ा बंगला। उसमें एक कमरा, जिसकी खिड़कियों से छनकर सुबह की रोशनी सकुचाते हुए अंदर आती थी और मेज़ के सामने सीधे-सधे हुए सादगी के साथ बैठे महंथ साहब। सरिता मैगज़ीन में छपे अपने लेखों और कहानियों के बारे में, बेहद विनम्रता से बताते। कोई डींग नहीं, मक्कारी नहीं, कहीं-कोई बड़प्पन नहीं। फैज़ाबाद के जनमोर्चा अखबार के ज़िला गोंडा में सर्वेसर्वा पत्रकार थे। अरसे तक रहे।

लोग इज्ज़त करते थे उनकी। सिर्फ दिखाने के लिए नहीं। दिल से छलक उठने वाली इज्जत।

याद आता है, एक शाम कहने लगे थे – चण्डीदत्त! मक्कारी से हासिल की दौलत नहीं रुकती। ऐसी शोहरत भी नहीं टिकती। उनकी इस बात का मैंने कितना सबक लिया, क्या कहूं पर यह बात तो याद है। आज महंथ जी चले गए हैं, लेकिन उनसे फ्री में मिली पत्रकारिता की ट्रेनिंग एकदम पक्की है, जीवंत है, कभी नहीं छूटेगी। वे नहीं हैं पर वो मिट्टी बाकी है, जो फीचर राइटिंग का वज़ूद बताती है। इन दिनों पढ़ता हूं, किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम की कवरेज लिखते हुए पत्रकारों का फ़ेवरिट वाक्य होता है — और उन्होंने मंत्रमुग्ध कर दिया… या फिर — और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे मौकों पर महंथ जी की कलम से निकले शब्द चौंका देते हैं। वे लिखते थे, तो उनमें अफसाने होते थे, हमारा समय, उसकी चुनौतियां, गांव-देहात की लोक परंपरा और गीत तक। वे कटकर नहीं रचते थे, शब्द उनके साथी थे। क्योंकि उन्होंने समय जिया था। जाना था कि संबंध क्या होते हैं, क्या होती है मोहल्ले की, शहर की और हमारे कसबों की ज़िंदगी। परंपराओं की तरह होते हैं कुछ चेहरे। कुछ एहसास, कभी नहीं मरते। आप भी याद आते रहेंगे महंथ साहब। आख़िरी सलाम!

Chandi Dutt Shukla के फेसबुक वॉल से.

कलयुग की द्रौपदी का ‘चीरहरण’, कल रात प्राइम टाइम में देखें

कलयुग की द्रौपदी का चीरहरण, कल रात प्राइम टाइम में देखें। बुलेट न्यूज चैनल पर कार्यक्रम का विज्ञापन चल रहा था। चलो अच्छा है, इलेक्ट्रानिक मीडिया ने किसी ज्वलंत मुद्दे पर ध्यान लगाया है। नहीं तो टीआरपी के रेलमपेल में 'नरक के सातवें द्वार पर हमारा कैमरा टीम पहुंचा', 'किस हिरोईन की नवजात बच्ची की शक्ल पहली बार दिखी', 'किसने छींका' और 'किसमें-किसमें कट्टी हुई' ही दिखाते थे। अब जाके बच्चू अग्नि सत्य के वसीभूत हुए है।

कलयुग में द्रौपदी का चीरहरण कई-कई जगहों पर हुआ। कहीं बस में, कहीं खेत में तो कहीं बाजार के बीच। एक एपिसोड में दुःशासन भीड़ भरे चौराहे पर द्रौपदी का चीरहरण करने लगा। द्रौपदी विलाप कर रही थी और चैनल के कैमरा वाले उसके डाकूमेंटेशन में व्यस्त थे। वहां उपस्थित कुछ रोड-साइड दरबारी ठहाके लगाते हुए मोबाईल से चीरहरण का एम एम एस बनाने में जुटे रहे। इनकी प्रसन्नता अपार थी।

चीरहरण के बाद दुःशासन ने गर्व से बोला- 'मैं बन गया अब बलात्कारी'। यह सुन खुशी से सभी हॅंसने लगे। उनमे से एक दुर्योधन ने बोला- गीत संगीत शुरू किया जाय। हनी सिंह का गाना 'मैं हूं बलात्कारी' बजने लगा। दरबारी उठ कर डांस करने लगे। कार्यक्रम खत्म हुआ सभी वाह-वाह करते हुए सभा से बाहर निकले।

बाहर चिन्तित मुद्रा में भगवान श्रीकृष्ण खड़े थे। सबने पूछा भगवन, आप ये पाप खड़े-खडे़ कैसे देखते रहे? अपनी चरखी से साड़ी की अम्बार क्यों नहीं लगा दी? श्रीकृष्ण को कोई जबाब सूझे इससे पहले ही दूर खड़े रामबर्गीयजी ने आवाज दिया- 'वो साड़ी में थोड़ी ही थी'।

तभी सफेद धोती खुटियाये हुए बंगाली बाबू तपाक से बोले- 'प्रोभु! इस्त्री लोग डेटेड-पेंटेड हो गिया तो दुःशासन जइसा भालोमानुष का किया गोलती है'।

'हॉं भगवन', भीष्म पितामह जैसी उजली दाढ़ी वाले धवल वस्त्र धारण किये दिव्य बापू बोले- 'द्रौपदी अगर गिड़गिड़ायी होती और दुःशासन को धर्म भाई बना लेती तो वह कदापि ऐसा न करता'।

राजस्थानी पगड़ी पहने हुए एक वीर पुरूष ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा- 'ये जनानिया फैंन्सी ड्रेस पहनने लगी हैं। इससे हम मर्दों का रक्त दूषित होता जा रहा है। बेचारा दुःशासन क्या करें।' उनके हां में हां मिलाकर एक भोपाली सज्जन ने अपना मुंह खोला- 'बिल्कुल, आप ने सही बोला, अब पानी सिर के ऊपर चला गया है, मैं चला जीन्स और शर्ट की होली जलाने।'

भीड़ में खड़े एक मौलाना साहब से भी अब चुप नहीं रहा गया। लेकिन कोलाहल के बीच उनकी बात ठीक से सुनाई नहीं दी। पर टीवी के मजलिस में बैठे विवेचक महोदय की पैनी नजर से वे बच नही पाये। उन्होंने फैसला सुनाया- 'यह छद्म सेक्युलरवाद नहीं, असली धर्मनिरपेक्षता है। धर्म की रक्षा के लिए मुल्ला और पण्डित एक ही स्वर में बोल रहे हैं'।

तभी ऊंचे भवन के बरामदे में खड़े केशरिया अंगवस्त्र और घनी मूंछों वाले एक गुरूघंटाल की आवाज गूंजी- 'यह पश्चिमी सभ्यता की देन है'। श्रीकृष्ण की ओर मुखातिब हो वे बोले- 'भगवन, आप इस पातक इंडिया के देहली में कैसे आ पहुंचे, जाकर भारत के इन्द्रप्रस्थ में देखिये, वहां यह सब कुछ नहीं होता।'

असमंजस की स्थिति में इधर-उधर झांकते हुए श्रीभगवन् ने धीरे से बोला- 'वत्स, मैने सुना है….'

गुरूघंटाल उनकी बात को काटते हुए दहाड़ उठें- 'अगर एैसा है, वह भारत नहीं इंडिया है'।

इस बीच सहयाद्री की घाटी से एक तीखी आवाज सुनाई दी- जय मराठा! ये सभी दुःशासन बिहार के हैं। गौतम बुद्ध के जमाने से ही उनका धर्म व्यभिचार है। उन्होंने ही हमारे अम्बेडकर का भी धर्म भ्रष्ट कर दिया था।

शोर के बीच एक पतला दुबला व्यक्ति छत्तीसगढ़ी बोली में विलाप करने लगा- त्राहिमाम, त्राहिमाम! आजकल स्त्रीओं का ग्रह नक्षत्र ही खराब है। दुःशासन का कोई दोष नहीं। ना ईश्वर से कोई चूक हुई।

यह सब सुन भगवान श्रीकृष्ण ने सिर पकड़ लिया। मन ही मन उन्होंने बोला- चलता हूं, धर्मक्षेत्र-कुरूक्षेत्र की ओर।

कुरूक्षेत्र के एक गांव में चौपाल में बैठे लोग हुक्का-चीलम पीते हुए दिल्ली की घटनाओं पर बात कर रहे थे। तभी चौधरी साहब की गाड़ी वहां आकर रूकी। वे एकदम से बोलने लगे- औरतों के चाउमीन खाने पर तुरन्त रोक लगनी चाहिये। यही उन्हें चरित्रहीन बनाता है। क्या मर्दों से बराबरी करना जरूरी है।

श्रीकृष्णजी बोल उठे- राधे-राधे, न मुझे इंडिया चाहिये, न भारत। मैं चला बैकुंठ की ओर।

इस व्यंग्य के जन्मदाता हैं प्रवीन कुमार सिंह. उनसे 09968599320 पर संपर्क कर सकते हैं.

कहां गायब हो गई संसद?

छब्बीस  जनवरी का सूरज जब रायसीना हिल्स के पीछे डूब रहा था, तभी एक न्यूज़ चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ चलनी शुरू हुई…..संसद गायब…..सरकार खामोश….दिल्ली पुलिस को कुछ पता नहीं…..सरकार एवं मुख्य विपक्षी दल बीजेपी का प्रतिक्रिया देने से इंकार। एक के बाद एक सारे चैनलों पर इसी तरह की सुर्खियाँ छा गईँ। पूरे देश में हंगामा मच गया।

ख़बर सनसनीखेज़ थी। कुछ ही दिन पहले यमुना पर बने एक पुल के चोरी होने के बाद से राजधानी वैसे ही सन्न थी। ये दूसरी बड़ी घटना थी जिसमें कोई विशाल सरकारी संपत्ति इस तरह से गायब हुई थी। पहले तो उन्हें लगा कि न्यूज़ चैनल आदतन दर्शकों को मूर्ख बनाकर टीआरपी हासिल करने के लिए चमत्कार वगैरा की कहानी दिखा रहे होंगे। लेकिन जब सारे चैनलों पर यही ख़बर छा गई तो लोग स्तब्ध रह गए।

सभी चैनलों के रिपोर्टर ओबी वैन के साथ वहाँ पहुँच गए जहाँ कभी संसद हुआ करती थी और दनादन लाइव देने लगे। कैमरा पैन करके दिखाने लगे कि जहां अब सफ़ाचट मैदान दिख रहा है, वहीं पहले संसद हुआ करती थी। संसद के इतिहास वर्तमान के बारे में ज्ञान दे रहे थे और कयास लगा रहे थे कि ये ज़रूर पाकिस्तान की हरकत होगी, क्योंकि वह पहले भी अपने आतंकवादियों से संसद उड़ाने की कोशिश करवा चुका है।

शोर मचने लगा तो लोग मंत्रियों  और नेताओं को घेरने लगे। आख़िरकार वित्त मंत्री ने देर रात ऐलान किया कि वे कल संसद में इस बाबत बयान देंगे। चैनल पर बैठे चर्चाकार अटकलें लगाने में जुट गए कि आख़िरकार वित्तमंत्री क्या जवाब दे सकते हैं और जब संसद ही नदारद है तो वे बयान देंगे कहाँ? कुछ वीरता पुरस्कार प्राप्त मेहमानों ने युद्धघोष के अंदाज़ में कहा कि ये समय बयान देने का नहीं कार्रवाई करने का है। पाकिस्तान को बता देने का है कि हम अपने लोकतंत्र पर किसी तरह का हमला बर्दाश्त नहीं करेंगे और हर हाल में अपनी संसद लेकर रहेंगे।

पूरा देश बेसब्री से अगले दिन का इंतज़ार करने लगा। चैनलों ने मल्टी कैम सेटअप लगा दिए और अपने सारे रिपोर्टर को इस घटना के कवरेज के लिए तैनात कर दिया।

सुबह सात बजे से ही आसपास संसदस्थल पर गतिविधियाँ शुरू हुईं। टैंट वालों ने वहाँ कुर्सियाँ बिछानी शुरू कर दीं। एक घंटे बाद वहाँ सांसदों जुटने लगे। दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की कार्रवाई ठीक ग्यारह बजे शुरू हुई। वित्तमंत्री ने लिखा हुआ भाषण पढ़ना शुरू किया- माननीय अध्यक्ष महोदया, आप तो जानती ही हैं कि देश गंभीर आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। हमारा वित्तीय घाटा बहुत बढ़ गया है, विकास दर काफी नीचे आ गई है। मुद्रास्फीति की दर दो अंकों में पहुँच गई है। लिहाज़ा अर्थव्यवस्था को नियंत्रण में लाने के लिए बड़े आर्थिक सुधार की ज़रूरत थी। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने संसद का डिस्इनवेस्टमेंट यानी विनिवेश कर दिया है। हमने भारत की प्रभुसत्ता को ध्यान में रखते हुए विदेशी कंपनियों को केवल उन्चास फ़ीसदी शेयर बेचे हैं। बाक़ी के इक्यावन फ़ीसदी भारतीय कंपनियों ने खरीदे हैं।

वित्तमंत्री इतना ही बोल पाए थे कि कम्युनिस्ट पार्टी के एक नेता ने रौद्र रूप दिखाते हुए कहा कि सरकार का ये फैसला अलोकतांत्रिक है, उसने विपक्षी दलों से इस बारे में सलाह-मशवरा नहीं किया है। हमें विश्वास में नहीं लिया गया।

इसका जवाब वाणिज्य मंत्री ने दिया-सरकार  हमेशा लोकतंत्र का सम्मान करती आई है इसलिए आपका ये आरोप निराधार है। अव्वल  तो हमारी चुनी हुई सरकार  है और इस नाते देश हित में  फैसला लेने का हमें लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त है। दूसरे, हमने मुख्य विपक्षी दल से न केवल सलाह मशवरा किया बल्कि उसके सहयोगी दलों तक से सहमति प्राप्त करने के बाद विनिवेश किया है। रही बात आपको विश्वास में लेने की तो आप लोगों का तो स्वयं ही लोकतंत्र में विश्वास नहीं है, आप तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को उलटकर साम्यवाद लाना चाहते हैं इसलिए आपसे चर्चा करने का भी कोई फ़ायदा नहीं था।

शोर-शराबे  के बीच प्रधानमंत्री ने कहा-अध्यक्ष  महोदया, इस विनिवेश से हमें अच्छी-खासी धनराशि प्राप्त  हुई है और हमें लगता है कि हमारा देश आर्थिक संकट से उबर जाएगा। मैं आपके माध्यम से सदन को बताना  चाहता हूँ कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने मुझे इस क्रांतिकारी कदम के लिए बधाई दी है। यही नहीं, विश्व बैंक और मुद्रा कोष ने यहाँ तक कहा है कि सरकार द्वारा किए जा रहे आर्थिक सुधारों से वे खुश हैं और भारत को अतिरिक्त कर्ज़ देने की व्यवस्था करेंगे। उनके इस बयान पर तालियाँ बजने लगीं।

एक कम्युनिस्ट सांसद ने गुस्से में आकर वित्तमंत्री के हाथों से परचा छीन लिया। कैमरा उसकी तरफ घूमा तो परचे में यूनाईटेड स्टेट ऑफ अमेरिका की मुहर की झलक दिखलाई पड़ी।  इस बीच मार्शल आ गए और उसे पकड़ कर ले गए। दूसरे नाराज़ कम्युनिस्ट नेता भी उठकर वहाँ  से चले गए। वातावरण फिर से शांतिपूर्ण और उल्लासमय हो गया।

थोड़ी ही देर में ख़बर आई कि मुंबई  का संवेदी शेयर सूचकांक तीस  हज़ार की मनोवैज्ञानिक सीमा लाँघ गया है। मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस के शेयरों के दाम सबसे ज़्यादा चढ़े, क्योंकि सबसे ज़्यादा शेयर उसी ने खरीदे थे। कार्पोरेट जगत और मध्यवर्ग टैक्सों में रियायत और ब्याज़ दरों में कमी की उम्मीद से हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा।

पाकिस्तान से ख़बर आई कि उसने वाशिंगटन से भेदभाव की शिकायत की है और माँग की है कि उसे भी भारत की ही तरह संसद के विनिवेश का पैकेज मिलना चाहिए। ओबामा ने फोन करके उसे आश्वस्त किया है कि वह आतंकवाद ख़त्म करने में यदि अमेरिका के निर्देशों को आँख मूँदकर मानता रहे तो उसे सेना आदि के विनिवेश का अतिरिक्त फ़ायदा भी दिय़ा जाएगा।

लाल-पीले न्यूज़ चैनलों में सरकार  के इस क्रांतिकारी क़दम की आशा एवं उत्साह से भरी  व्याख्याएं शुरू हो गई। वीर  पुरूष अब संसद वापस लेने के बजाय दलील दे रहे थे कि पाकिस्तान  को भारत की तरह लाभ हरगिज  नहीं मिलना चाहिए।

अगले दिन गुलाबी और रंग-बिरंगे अख़बारों में सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा पसरी हुई थी।

उपरोक्त व्यंग्य के सृजक मुकेश कुमार  हैं जो वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई न्यूज चैनलों के एडिटर इन चीफ रहे हैं.

मैं भीष्म प्रतिज्ञा करता हूं कि फिर कभी किसी महिला की मदद नहीं करूंगा

कुछ दिनों पहले मैंने सब टीवी पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ देखा। उस समय इसका प्रमुख पात्र जेठालाल एक अजीब उलझन में फंसा हुआ था। घटना के अनुसार, एक बार वह घूमने के लिए किसी पहाड़ी स्थल पर जाता है। वहां एक फिल्म की शूटिंग होती है, जिसमें जेठालाल दूल्हे का रोल कर बैठता है, क्योंकि उसे अभिनय का बेहद शौक है। कई साल बाद फिल्म की वह दुल्हन गुलाबो मुंबई आकर जेठालाल से पत्नी होने का अपना हक मांगने लगती है और फिल्मी शादी को असली शादी बताती है।

शहर का महिला मुक्ति मोर्चा बिना यह जांच किए कि गुलाबो सच बोल रही है या झूठ, तुरंत उसकी मदद करने हाजिर हो जाता है और नारे लगाता है कि जेठालाल और सभी पुरुष घटिया, शोषक, अत्याचारी और बेकार हैं। मोर्चे की वकील ज्वाला देवी के लिए किसी का पुरुष होना ही पर्याप्त है, फिर वह उसे अदालत में ऐसा सबक सिखाती है कि पूरी जिंदगी नहीं भूलता।

खैर.. यह तो सिर्फ एक कहानी थी जिसमें मेहता साहब की कलम के कमाल से जेठालाल बेगुनाह साबित हो जाता है। इस धारावाहिक ने मुझे यह सोचने के लिए विवष कर दिया कि क्या सभी पुरुष वास्तव में ही घटिया, अत्याचारी, बलात्कारी, ढोंगी, निर्दयी होते हैं? क्या सभी महिलाएं हमेशा सही, सत्यवादी, पीड़िता, निर्दोष होती हैं? माफ कीजिए, यह सिर्फ मेरा चिंतन है, कोई प्रामाणिक मत या अंतिम सत्य नहीं। हो सकता है कि आप इन बातों से पूरी तरह असहमत हों और आप चाहें तो मुझे पिछड़ा हुआ, मूर्ख, अज्ञानी, नीच, पागल आदि उपनामों से नवाज सकते हैं।

हाल में दिल्ली में हुए बलात्कार कांड के बाद तो हालात और भी बदल गए हैं। लोग बलात्कारियों के लिए तुरंत मृत्यु दंड की मांग करने लगे हैं। मेरा भी मानना है कि जिसने भी किसी के साथ ऐसा क्रूर कृत्य किया है, उसे तो मृत्यु दंड अवश्य मिलना चाहिए, लेकिन जरूरी है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो। अन्यथा किसी निर्दोष को भी बलि का बकरा बनाया जा सकता है। इसका ताजातरीन उदाहरण चंडीगढ़ की एक घटना है, जिसमें लड़की ने सिर्फ पुरानी दुश्मनी निकालने के लिए बलात्कार का नाटक रचा। मैं यह कतई नहीं कह रहा हूं कि हर मामले में ऐसा ही होता, लेकिन कई मामलों में ऐसा भी हो सकता है। लगभग ऐसी ही एक घटना मेरे जीवन में घटित हो चुकी है।

यह बात मेरे पत्रकारिता में आने से पहले की है। हमारी एक रिश्तेदार महिला शाम को घर आई। उसके पति की कुछ दिनों पहले मृत्यु हो चुकी थी। वह रो रही थी और जिंदगी में मिले दुखों के बारे में मेरी मां को बता रही थी। साथ ही अपने देवर, पड़ोसी और बड़े बेटे की करतूतों का भंडाफोड़ कर रही थी, जो उसे अपने ही घर में रहने नहीं देते थे और आए दिन मार-पीट करते थे। मां ने उस महिला को कुछ दिन हमारे साथ रहने को कहा और खाने-पीने का पूरा इंतजाम किया। उन्हीं दिनों मैंने बिजली विभाग के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में वाद दायर किया था, जिसमें विभाग को माफी मांगनी पड़ी।

मेरी मां ने कहा कि इस दुखिया नारी को भी अपना हक मिल सके, क्या इसके लिए तुम कुछ कर सकते हो? मैंने उसकी पूरी व्यथा सुनी और महिला आयोग तथा मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा। पत्र मैंने लिखा और उस महिला को पढ़ाकर उसके हस्ताक्षर करा लिए। कुछ दिनों बाद वह अपने पीहर चली गई। एक दिन गांव में हड़कंप मच गया। आयोग के कई जांचकर्ता और पुलिसकर्मी उस महिला के घर आए। मामले की तहकीकात की, लेकिन यह सुनकर मेरे पैरों की जमीन खिसक गई कि अब वह महिला मुझ पर ही यह आरोप लगा रही थी कि मैंने अपनी ही मर्जी से यह चिट्ठी लिख दी और उस महिला के घर में सब कुशल-मंगल है तथा उसके घर में किसी से कोई झगड़ा-बखेड़ा नहीं है!

यह मेरे लिए उल्टे नमाज गले पड़ी वाली बात थी। उस समय मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि हे ईश्वर! बस इस बार बचा ले। तेरे पैदल चलकर खाटू श्यामजी आऊंगा। और भीष्म प्रतिज्ञा करता हूं कि फिर कभी किसी महिला की मदद नहीं करूंगा। शायद उस इलाके के पुलिसकर्मी समझदार थे, अन्यथा पूरी रात थाने में बैठाकर मेरी वो दुर्गति करते कि मैं किसी को चिट्ठी लिखने लायक नहीं रहता और पत्रकार बंधु अखबारों में मेरी फोटो छापते तथा मुझे क्रूर, षड्यंत्रकारी, शोषक, बलात्कारी, नारी का अत्याचारी और न जाने क्या-क्या प्रमाणित कर देते।

एक पुलिसकर्मी ने चिट्ठी का बारीकी से निरीक्षण किया और उस महिला से पूछा- क्या तुम पढ़ना जानती हो? उसने हां में जवाब दिया। उसके हस्ताक्षर का मिलान किया गया और पूछताछ की। जल्द ही तस्वीर साफ हो गई कि वह चिट्ठी उसी महिला ने लिखवाई थी। बतौर प्रमाण उसके हस्ताक्षर थे। उसे कड़ी फटकार लगाई गई। मैं बेकसूर साबित हुआ और मैंने राहत की सांस ली तथा भविष्य में कभी किसी महिला की मदद न करने का संकल्प लिया। आज वह महिला उन्हीं लोगों के साथ बड़े मजे से रह रही है, जिनको कभी वह फांसी के फंदे पर देखना चाहती थी।

मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा हूं कि सब महिलाएं ऐसी हैं। नहीं, बिल्कुल नहीं। लेकिन इस घटना ने मेरी आंखें खोल दीं और जो व्यक्ति एक बार ऐसी स्थिति का सामना कर लेता है, वह फिर कभी ऐसे झंझट में फंसना नहीं चाहेगा। मेरा मानना है कि कई पुरुष अत्याचारी, षड्यंत्रकारी, झूठे और धोखेबाज होते हैं, लेकिन मौजूदा दौर में यह बुराई उन तक ही सीमित नहीं है। इसलिए किसी को इसी आधार पर दोषी नहीं मानना चाहिए कि वह व्यक्ति पुरुष है और किसी को इसी आधार पर निर्दोष नहीं मानना चाहिए कि वह महिला है। लेकिन हमारा मीडिया और समाज इसी सोच से ग्रस्त है।

गलतियों का सारा ठीकरा हमेषा पुरुषों के सर ही फोड़ा जाता है, भले ही कोई निर्दोष इसमें फंसे। जबकि यह घटना का मात्र एक पहलू है। कभी अपने कैमरे दूसरी ओर भी घुमाइए। यकीन कीजिए, उतनी ही गड़बड़ियां उधर भी मिलेंगी। अभी इंदौर के एक जाने-माने पत्रकार ने कहा था कि बलात्कार करने वालों में महिलाएं भी होती हैं, तो उस पर विवाद हुआ और लोगों ने सहज ही उस पर विष्वास नहीं किया, परंतु उन्हीं दिनों नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर खबर आई कि दक्षिण भारत में एक महिला एक किशोर के साथ कई महीनों से बलात्कार कर रही थी।

न जाने हमारा मीडिया, हमारा समाज इस बात को कब समझेगा कि अपराधी सिर्फ एक अपराधी है। उसे महिला या पुरुष के लैंस से देखना बंद करें। किसी एक के प्रति नरमी और दूसरे के प्रति अत्यधिक कड़ाई सही नहीं है। किसी को महिला या पुरुष होने के आधार पर ही दोषी-निर्दोष साबित करने की परम्परा बंद कीजिए। क्योंकि मीडिया का यह रवैया किसी बेगुनाह जेठालाल के लिए फांसी का फंदा बना सकता है। जेठालाल की तो किस्मत अच्छी थी जो मेहता साहब ने उसे बचा लिया। वरना हर किसी को तारक मेहता जैसा तारणहार नहीं मिल पाता!!


किन्हीं राजीव ने यह सब लिखकर भेजा है और उन्होंने अपना पूरा नाम और मेल आईडी प्रकाशित न करने का अनुरोध किया है. राजीव ने मेल के साथ यह भी लिखकर भेजा है- ''आदरणीय यशवंत जी, सप्रेम नमस्कार। मेरे एक मित्र ने आपकी वेबसाइट के बारे में बताया। वेबसाइट अच्छी लगी। मीडिया सबकी खबर लेता है लेकिन आप तो खबरियों की भी खबर ले रहे हैं। ईमेल के माध्यम से एक घटना लिखकर भेज रहा हूं। कृपया अवलोकन कीजिए। आशा है वेबसाइट पर प्रकाशित होगी। कृपया मेरा नाम प्रकाशित न करें। धन्यवाद।''

सहारा के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके विनीत मित्तल लखनऊ में गिरफ्तार

लखनऊ से खबर आ रही है कि मोहनलालगंज इलाके से विनीत मित्तल को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. विनीत मित्तल सहारा समूह में एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हुआ करते थे लेकिन सुब्रत राय से उनकी ऐसी खटकी कि न सिर्फ उन्हें बर्खास्त कर दिया गया बल्कि उनके खिलाफ कई मुकदमें भी दर्ज करा दिए गए थे. उन्हीं मुकदमों के सिलसिले में पुलिस ने मित्तल को अरेस्ट किया है.

यूपी में सपा की सरकार है और सुब्रत राय की सपा सुप्रीमो से नजदीकी सभी जानते हैं, इसलिए माना जा रहा है कि पुलिस को स्पेशल टास्क दिया गया था कि विनीत मित्तल को हर हाल में अरेस्ट किया जाए. कुछ लोग स्वतंत्र मिश्रा को भी जिम्मेदार मान रहे हैं जो सुब्रत राय की नजरों में अपना नंबर बढ़ाने के लिए विनीत मित्तल को अरेस्ट कराने की कोशिश में लगे थे और अंततः सफल हुए.

ताजी सूचना ये है कि विनीत मित्तल को सहारा के प्रकरण या मुकदमें में नहीं बल्कि किसी एमएलसी के फार्म हाउस पर कब्जा करने व अन्य हरकतों को लेकर दर्ज एफआईआर के कारण गिरफ्तार किया गया है.

विनीत मित्तल को लेकर भड़ास पर पहले तीन खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें नीचे दिया जा रहा है..


सहारा इंडिया परिवार के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर विनीत मित्तल बर्खास्त

Saturday, 04 June 2011

सहारा समूह में उलटफेर का दौर जारी है. अनिल अब्राहम और स्वतंत्र मिश्रा के बाद विनीत मित्तल पर भी गाज गिरा दी गई है. विनीत मित्तल सहारा में एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के पद पर कार्यरत थे. इन पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे हैं. सहारा ने विनीत मित्तल को समूह से बाहर किए जाने की सूचना राष्ट्रीय सहारा अखबार में पहले पन्ने पर विज्ञापन प्रकाशित करके की है.

इस विज्ञापन में विनीत मित्तल के तस्वीर को भी चस्पा किया गया है. विज्ञापन में कहा गया है कि विनीत मित्तल ने संस्था के खिलाफ जो काम किए और जो वित्तीय हेराफेरी की है, इससे प्रमाण व सुबूत मिल चुके हैं और जांच में यह सब सही पाया गया है, इसी कारण उनको निकाला जा रहा है. विज्ञापन में यह भी लिखा गया है कि पहले भी विनीत पर आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे हैं पर वे संदेह का लाभ लेकर बच जाते थे. पर इस बार उनके खिलाफ लगे आरोप सच पाए गए इसलिए उन्हें बर्खास्त किया जा रहा है. एमसीसी चीफ विनीत्त मित्तल को बाहर किए जाने के बाद चर्चा है कि सुब्रत राय ने एक नई कोर टीम बनाई है जिसके चीफ कोई सौरभ चक्रवर्ती बनाए गए हैं. ये कोर टीम पूरे सहारा ग्रुप के सभी विभागों यहां तक कि मीडिया को भी नियंत्रित करेगा और सीधे सुब्रत राय को रिपोर्ट करेगा.

पहले ये व्यवस्था विनीत्त मित्तल के नेतृत्व में एमसीसी करती थी. ये वही विनीत्त मित्तल हैं जिनके खिलाफ ईडी और सीबीआई एक इंस्टीट्यूट के मामले में पहले से जांच कर रही है. विनीत्त मित्तल अभी तक सबसे मजबूत माने जाते रहे हैं. सहारा के अंदर एमसीसी हमेशा से प्रभावशाली भूमिका में रही है. सारे विभाग अपनी रिपोर्ट एमसीसी के जरिए ही भेजता है और एक तरह से सुब्रत राय सहारा का पूरा कामकाज एमसीसी के जरिए ही देखते आए हैं. लेकिन ताजा घटनाक्रम ने सहारा की आंतरिक कलई खोल दी है.

सहारा में आंतरिक तानाबाना बदला जा रहा है. कल शाम को ही इस तरह का एक सर्कुलर नोएडा कैंपस में टांगा गया है. पिछले एक साल में ये पहला मौका है जब सहारा के मालिक सुब्रत राय को इस तरह का सर्कुलर टांगना पड़ा है. विनीत मित्तल के निकाले जाने के कई निहितार्थ बताए जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि कुछ और बड़े लोगों का विकेट गिर सकता है या उनके पर-कद कतरे जा सकते हैं.


विनीत मित्तल की संपत्ति पर सहारा वालों ने जबरन कब्जा किया

Thursday, 09 June 2011 20:23 B4M भड़ास4मीडिया – हलचल

: न्याय के लिए कोर्ट गए विनीत मित्तल : अदालत ने सहारा वालों के खिलाफ तुरंत आपराधिक मामला दर्ज करने के आदेश दिए और जांच कर रिपोर्ट पेश करने को कहा : सहारा के मीडिया मैनेजर मामले को दबाने में जुट गए : सहारा समूह से एक बड़ी खबर आ रही है. विनीत मित्तल को एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पद से हटाए जाने के बाद ताजी सूचना है कि विनीत मित्तल को सहारा समूह के लोगों ने लखनऊ के सहारा शहर में बंधक बना लिया था और उनसे उनकी संपत्ति लिखवा ली थी.

इस बाबत विनीत मित्तल ने शिकायत कोर्ट में करते हुए न्याय की गुहार लगाई है. सूत्रों के मुताबिक कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए लखनऊ के एसएसपी को तुरंत सहारा के वरिष्ठों के खिलाफ रिपोर्ट लिखे जाने के आदेश दिए और मामले की जांच कर तय समय में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए. सूत्रों के मुताबिक कोर्ट ने इस प्रकरण को आपराधिक करार दिया है. विनीत मित्तल की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि उनकी सारी संपत्ति सहारा के लोगों ने बंधक बनाकर जबरन लिखवा ली है. कोर्ट ने इसे गंभीर मामला बताते हुए हर हाल में दोषियों का पता लगाने का निर्देश दिया है.

उधर, कोर्ट के आदेश से घबराए सहारा के मीडिया मैनेजर हर अखबार और न्यूज चैनल के आफिस में फोन कर इस संकट की घड़ी में सहारा के साथ खड़े होने की अपील कर रहे हैं. चर्चा है कि सहारा समूह के वरिष्ठों ने विनीत मित्तल द्वारा संपत्ति इकट्ठा किए जाने को सहारा में रहते हुए और सहारा के सिस्टम का दुरुपयोग करने का नतीजा माना है और इसी कारण उनकी संपत्ति को जब्त करने का फैसला लिया. हालांकि ऐसा करना कानूनन गलत है पर सहारा में परंपरा है कि वहां जब किसी को हटाया जाता है तो उसे काफी बेइज्जत व परेशान कर दिया जाता है. विनीत मित्तल के अदालत जाने से यह माना जा रहा है कि सहारा के खिलाफ नया मोर्चा खुल गया है और अगर पुलिस ने निष्पक्ष तरीके से जांच कर रिपोर्ट दे दी तो सहारा के कई वरिष्ठों की गर्दन फंस सकती है.


विनीत मित्तल ने अगर चोरी की है तो उन्हें चोर नहीं तो क्या कहेंगे

Saturday, 11 June 2011 17:04 B4M भड़ास4मीडिया – हलचल

: भड़ास को भड़ास ही रहने दें, इसे गन्दी उल्टी न बनाएं : भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित खबर ''विनीत मित्तल की संपत्ति पर सहारा वालों ने जबरन कब्जा किया'' त्रुटियों और पूर्वाग्रहों से संक्रमित है। विद्वानों का कहना है कि झूठ ही सिर्फ झूठ नहीं होता, आधा सच भी झूठ ही होता है। और अगर आधा सच और आधा झूठ मिले तो झूठ की पराकाष्ठा पाप में होती है।

एक पत्रकार अगर अज्ञानता से ग्रसित है तो उसका लेख न केवल पत्रकारिता के लिए बल्कि समाज के लिए भी एक दोष है। मैं स्वयं अपने मुख से यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैंने सहारा में कभी काम तो नहीं किया मगर उसका प्रशंसक अवश्य हूं। और अभी तक ऐसा कोई कारण मुझे नहीं नज़र आया जो मेरे इस दृष्टिकोण को बदले। सर्वप्रथम यह खबर कि अदालत ने सहारा के लिए तुरन्त मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं और जांच पर तुरन्त रिपोर्ट पेश करने को कहा है, सरासर झूठी हैं। और माननीय न्यायालय के आदेश को बिना पढ़े ही मनगढ़न्त तरीके से पेश किया गया है।

यहां मैं उच्च न्यायालय का आदेश जो कि वेबसाईट पर भी आसानी से उपलब्ध है उसका अनुवाद कर रहा हूं। माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ की माननीय न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह एवं माननीय न्यायमूर्ति राजीव शर्मा जी की डबल बेंच ने विनीत मित्तल बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के केस की सुनवाई करते हुए एस.एस.पी. लखनऊ को निर्देशित किया कि वे मामले को देखें और कानून के अनुरूप तर्कसंगत आदेश पारित करके वादी के रिप्रजेंटेशन को दो हफ्तों में निस्तारित करें। साथ ही यह आदेश भी दिया कि यदि जरूरी लगे तो अभियोग पंजीकृत करने हेतु सम्बन्धित थाने में प्रेषित करें।

अब सुनिये आपका आलेख क्या कहता है? विनीत मित्तल ने कोर्ट में शिकायत करते हुए न्याय की गुहार लगाई है। ‘सूत्रों’ के मुताबिक कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए लखनऊ के एसएसपी को तुरंत सहारा के वरिष्ठों के खिलाफ रिपोर्ट लिखे जाने के आदेश दिए और मामले की जांच कर तय समय में रिपोर्ट देने के निर्देश दिये। सूत्रों के मुताबिक कोर्ट ने इस प्रकरण को आपराधिक करार दिया। पाठक खुद देख सकते हैं कि न्यायालय के आदेश और लेखक के सूत्रों के कथन में क्या अन्तर है।

इनका यह ‘सूत्र’ किस चण्डूखाने का प्राणी है? मैं समझता हूं पाठकों के सामने दूध का दूध, और पानी का पानी अब तक हो चुका होगा जबकि भड़ास के ज्यादातर पाठक पत्रकार हैं, हम जानते हैं कि ‘सूत्र’ एवं ‘विश्वसनीय सूत्र’ किस मानसिकता की उपज हैं और किन स्थितियों में इस शब्द का दुरुपयोग किया जाता है। इस तरह के गैर जिम्मेदाराना लेख भड़ास की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहते हैं। अपनी व्यक्तिगत खुंदक, निराशा और खीझ को पत्रकारिता का जामा न पहनाएं। किसी ने अगर चोरी की है तो वह चोर ही कहलायेगा। और अगर सहारा वालों ने विनीत मित्तल को चोटी पर बिठाया और उन सज्जन ने विश्वासघात किया तो यह निन्दनीय है। मेरी समझ से इससे पहले कि सहारा उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही करे, विनीत मित्तल ने अपने को सुरक्षित करने के लिए यह युक्ति ईजाद की है तो इसे उसी संगत में देखना चाहिए।

निवेदन है कि भड़ास जो शुरू में पत्रकारों को रचनाशील एवं प्रगतिशील बनाने का और आपस में जोड़ने का अवसर प्रदान करता था उसे हताश निठल्लेबाजी का जमघट न बनायें। भड़ास को भड़ास ही रहने दें इसे गन्दी उल्टी न बनाएं। इसमें विनीत मित्तल जो कटघरे में खड़े हैं उनका पक्ष नमक मसाले के साथ तो नज़र आता है मगर न न्यायालय का सच और न जिसके घर में चोरी हुई है उसका पक्ष।

(उपरोक्त टिप्पणी को भड़ास4मीडिया के पास debsbose@gmail.com मेल आईडी से भेजा गया है. टिप्पणी का प्रकाशन इसलिए किया गया है ताकि संबंधित मसले पर दूसरे पक्ष के विचार-तर्क-तथ्य को सबके सामने लाया जा सके.)

बीकानेर में प्रेस क्लब का गठन, श्याम मारू अध्यक्ष बने

बीकानेर। गणतंत्र दिवस पर बीकानेर में प्रेस क्‍लब का गठन किया गया। एडहॉक कमेटी के वरिष्‍ठ सदस्‍य केके गौड ने प्रेस क्‍लब की कार्यकारिणी की घोषणा की। बीकानेर प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष पद पर श्‍याम मारू, महासचिव पद पर अपर्णेश गोस्‍वामी और कोषाध्‍यक्ष पद पर बीजी बिस्‍सा को सर्वसम्‍मति से मनोनीत किया गया। साथ ही नीरज जोशी व ह‍रीश बी शर्मा को वरिष्‍ठ उपाध्‍यक्ष, भवानी जोशी व रवि बिश्‍नोई को उपाध्‍यक्ष, जयनारायण बिस्‍सा व कमल कान्‍त शर्मा को संयुक्‍त सचिव तथा राकेश आचार्य को कार्यालय सचिव बनाया गया।

इसके अलावा सुरेश बोडा, विमल छंगाणी, मोहम्‍मद अली पठान, राजेश रतन व्‍यास, बृजमोहन आचार्य, मुजीबुर्रहमान, विक्रम जगरवाल, राजेन्‍द्र सेन, रमेश बिस्‍सा, संजय जोशी, मुकेश पुनिया को कार्यकारिणी सदस्‍य के रूप में शामिल किया गया। बैठक में मौजूद सभी सदस्‍यों ने संरक्षक मण्‍डल का प्रस्‍ताव पारित कर भवानी शंकर शर्मा, अभय प्रकाश भटनागर, के के गौड, मधु आचार्य, उमेश सक्‍सेना,, अशोक माथुर, संतोष जैन, हरिओम गर्ग, लूणकरन छाजेड, हनुमान चारण, व मोहन शर्मा को संरक्षक बनाया। बीकानेर प्रेस क्‍लब के नव मनोनीत अध्‍यक्ष श्‍याम मारू ने बैठक के दौरान आवेदन स्‍क्रूटनिंग कमेटी, अनुशासन कमेटी, आयोजन कमेटी, सदस्‍यता अभियान कमेटी गठित की गई। क्‍लब का सदस्‍यता अभियान तीस जनवरी से शुरू किया जाएगा।

राजस्थान के चैनल एचबीसी में फिर गहराया सेलरी संकट

राजस्थान से प्रसारित प्रादेशिक चैनल एचबीसी में एक बार फिर से स्ट्रिंगरों के वेतन का संकट आ गया है. जबसे यह चैनल लांच हुआ है तभी से यह चैनल स्ट्रिंगरो की सेलरी को लेकर कुचर्चा में रहा है. अभी भी तीन तीन महीने तक सेलरी के लिए स्ट्रिंगरों को मुंह ताकना पड़ रहा है.

खबरों के लिए दिन ब दिन स्ट्रिंगरो पर 'ऊपर'  से लगातार दबाव बनाया जा रहा है. कभी डे प्लान तो कभी विशेष स्टोरी के नाम पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है लेकिन ऐसे में यदि कोई स्ट्रिंगर सेलरी के बारे में बात करता है तो उसे प्यार से पुचकार कर टरका दिया जाता है. इस बार की यदि बात करें तो पिछले चार महीने से स्ट्रिंगरों की सेलरी रुकी हुई है. बार-बार आ रही इस समस्या से परेशान होकर कई स्ट्रिंगर अब दुसरे चैनलों के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

एक स्ट्रिंगर द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

गणतंत्र दिवस पर चैनलों ने छुट्टी खत्म की, फिर दोगुनी तनख्वाह पर गिराई गाज

26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस देश के तीन राष्ट्रीय अवकाशों में से एक है और संस्थान चाहे सरकारी हो या निजी, सभी में इस दिन छुट्टी रखना जरूरी होता है। अगर अत्यावश्यक सेवाओं जैसे अस्पताल, अग्निशमन, पुलिस आदि में इस दिन छुट्टी नहीं दी गयी तो उन संस्थानों में काम करने वाले कर्मियों को कंपन्सेट्री ऑफ यानी बदले में अवकाश देने का प्रावधान है। पहले अखबारों के जमाने में तो तीनों दिन अखबार नहीं छपते थे, लेकिन धीरे-धीरे खबरिया टीवी चैनलों का जमाना आया।

पहले इनमें भी राष्ट्रीय अवकाश के दिन के ज्यादातर बुलेटिन प्रोग्रामिंग टीम के हवाले रहते थे जो पहले ही तैयार कर लिये जाते थे। यही कारण रहता था कि न्यूज़ टीम से गिनती के लोग ही बुलाए जाते थे जिन्हें बाद में वैकल्पिक छुट्टी दे दी जाती थी, लेकिन इनदिनों गलाकाट प्रतियोगिता के युग में किसी भी न्यूज चैनल में वैसी ही उपस्थिति रहती है जैसी आम दिनों में। आजतक समेत कई बड़े चैनलों में आज भी सामान्य उपस्थिति रही।

खास बात ये है कि टीवी टुडे ने आज आने वाले मीडियाकर्मियों को कोई कंपन्सेट्री लीव नहीं देने का फैसला किया है। सरकारी नियमों के मुताबिक तो राष्ट्रीय अवकाश के दिन एसेंशियल सर्विस में काम करने वालों को दोगुनी तनख्वाह के साथ वैकल्पिक अवकाश देने का प्रावधान है, लेकिन जब नियमों पर 'सबसे तेज' नजर रखने वाले ही उनकी धज्जियां उड़ाने में जुटे हों तो क्या किया जाए?

पत्रकार धीरज भारद्वाज की रिपोर्ट.

भोपाल से पत्रिका ‘राइजिंग बुंदेलखंड’ लांच, ‘फेम इंडिया’ को चाहिए पत्रकार

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाके को आधार बनाकर मासिक पत्रिका 'राइजिंग बुंदेलखंड' शुरू की गई है। इस पत्रिका में बुंदेलखंड की जन समस्याओं को उजागर किया जायेगा। भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में मध्य प्रदेश महिला आयोज की अध्यक्ष उपमा राय, प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष शोभा ओझा, टी वी पत्रकार श्वेता सिंह और बुंदेलखंड की प्रसिद्ध गुलाबी गैंग की महिलाओं ने पत्रिका का विमोचन किया।

40 रंगीन पेज वाली इस पत्रिका में बुंदेलखंड की सभी जनसमस्याओं वाली ख़बरों के साथ ही राष्ट्रीय ख़बरें प्रकाशित की गई हैं। पहले अंक में ही 'बाँध तले सूखा' जैसी इन्वेस्टिंग स्टोरी दी गई है। इस पत्रिका के मालिक रजा दुबे, संपादक रजनीश दुबे और कार्यकारी संपादक सचिन चौधरी हैं।

प्रेस विज्ञप्ति


नोएडा : 'फेम इंडिया' पत्रिका अपने नये कलेवर में आने को तैयार है। इसने बिहार में मंत्रियों की रैंकिंग के लिये सर्वे शुरू भी कर दिया है। पत्रिका की योजना कुछ और राज्यों पर भी ध्यान केंद्रित करने की है। इधर नोएडा ऑफिस में भी पत्रिका के डेस्क को नये सिरे से गठित करने की तैयारी है। फेम इंडिया में फिलहाल हिन्दी कॉपी डेस्क और रिपोर्टिंग के लिये कुछ पत्रकारों की तलाश है। भाषा और बीट पर पकड़ रखने वाले पत्रकार career@famegroup.co पर अपना आवेदन भेज सकते हैं।

प्रेस विज्ञप्ति

वाराणसी पत्रकारपुरम् विकास समिति का गठन, विधायक ने दिए पांच लाख रुपये

काशी पत्रकार संघ के रवैये और उदासीनता से खफा बनारस के पत्रकारों ने पत्रकारपुरम् के विकास हेतु 26 जनवरी के दिन वाराणसी पत्रकारपुरम् विकास समिति का गठन किया है. इसका संयोजक दैनिक जागरण के पत्रकार राकेश चतुर्वेदी को बनाया गया है. समिति में धर्मेन्द्र सिंह, विकास पाठक, विनोद बागी, हरिवंश तिवारी, रामात्मा, अजय राय, चेतन उपाध्याय, अरविन्द उपाध्याय, सुभाष सिंह, यशवंत सिंह, डॉ. दयानंद, जितेंद्र श्रीवास्तव, गिरीश दूबे, सुरेश प्रताप, संजय सिंह, हिमांशु उपाध्याय समेत दर्जनों पत्रकार शामिल हैं.

पत्रकारों के रहने के लिए बने पत्रकारपुरम् का विकास कार्य कराने के लिए गठित इस समिति को बनारस के एक विधायक रविंद्र जायसवाल ने पत्रकार कालोनी के विद्युतीकरण के लिये 5 लाख रुपये देने की घोषणा की. पत्रकारपुरम् विकास समिति के गठन के कार्यक्रम का शुभारंभ डीएम सौरभ बाबू और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के परियोजना निदेशक एम.एल. शर्मा ने किया. कवि तारकेश्वर मिश्रा (राही) ने अपने गीतों के जरिए जनजागरण किया. कार्यक्रम का संचालन धर्मेन्द्र सिंह ने किया.

उदय कुमार का संपादक के रूप में जाने लगा नाम, भूपेश उपाध्याय का इस्तीफा

देवप्रिय अवस्थी यानि डीपी अवस्थी का नाम अमर उजाला, नोएडा की प्रिंटलाइन से हट गया है. उनकी जगह अब उदय कुमार का नाम संपादक के रूप में जाने लगा है. उदय कुमार का हाल में ही नोएडा तबादला किया गया है. वे इससे पहले चंडीगढ़ में बतौर नार्थ हेड कई वर्षों से अमर उजाला का काम देख रहे थे.

एक अन्य खबर के मुताबिक अमर उजाला, देहरादून में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत भूपेश उपाध्याय ने इस्तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि वे दैनिक हिंदुस्तान, मेरठ के साथ नई पारी शुरू कर सकते हैं.

आज तक की पत्रकार श्वेता सिंह का भोपाल में हुआ सम्मान

भोपाल। अपोलो मीडिया सोल्यूशन द्वारा 64वें गणतंत्र दिवस के मौके पर ''दामिनी के नाम शहीदों को प्रणाम'' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, महिला आयोग की अध्यक्ष उपमा राय और विशिष्ट अतिथि महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शोभा ओझा मौजूद रहे।

कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन से किया गया। नारी सशक्तीकरण पर आयोजित एक नाटक का मंचन किया गया। इसके बाद नारी शक्ति के तौर पर आज तक चैनल की पत्रकार श्वेता सिंह , गुलाबी गैंग की महिलाओं और फिल्म अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी का सम्मान किया गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने वाली मध्य प्रदेश की महिला खिलाड़ी आशा रोका (बॉक्सर), नारी रक्षा के लिए जागृति मंच और एक बच्ची का अपहरण होने से बचाने के लिये पप्पू अहिरवार को नारी रक्षा अवार्ड से सम्मानित किया गया। वहीँ झारखण्ड में नक्सली हिंसा में शहीद जवान चम्पालाल के परिजनों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि बाबुलाल गौर ने कहा कि गणतंत्र के मौके पर ऐसा कार्यक्रम समाज को नई दिशा देता है। उपमा राय ने कहा कि महिलाओं की रक्षा के लिए मध्य प्रदेश सरकार तमाम प्रयास कर रही है लेकिन समाज को खुद जागरूक होना होगा। शोभा ओझा ने कहा कि देश भर में बलात्कार की घटनाएँ हो रही हैं। इस मुद्दे पर वाकई कुछ सकारात्मक कदम उठाने होंगे।

इस मौके पर पत्रकार श्वेता सिंह ने कहा कि गणतंत्र पर वैसे तो देश में कई कार्यक्रम होते हैं लेकिन नारी और शहीदों को यह सम्मान वाकई अदभुत है। गुलाबी गैंग की कमांडर सुमन ने कहा कि उनके संगठन की महिला सदस्यों के जैसे हर महिला को मजबूत होना होगा ताकि वे हर मुश्किल का सामना कर सकें। इस मौके पर आयोजन समिति के राजा दुबे और सुशिल अग्रवाल ने कार्यक्रम के मकसद पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे आयोजन लगातार होते रहेंगे। कार्यक्रम आयोजक सचिन चौधरी ने सबका आभार व्यक्त किया। संचालन मोनिका तिवारी ने किया। इस मौके पर बिनिराज मोदी, सुधीर सोनी, सत्येन्द्र जैन, आजाद जैन, राजेश सोनी सुशिल चौबे समेत बड़ी संख्या मजे लोग मौजूद रहे। 

प्रेस विज्ञप्ति

उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में भगवान भरोसे है आम जन की ज़िंदगी

सभी नागरिकों को बेहतर चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना जनपक्षधरता का बुनियादी सरोकार है। एक लोक कल्याणकारी सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी। अच्छा स्वास्थ्य हासिल करना हरेक नागरिक का बुनियादी हक है। शिक्षा, चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं समाज की उन्नति और विकास का पैमाना होती है। पर नवोदित राज्य उत्तराखण्ड के संदर्भ में ये बातें अर्थहीन है। उत्तरप्रदेश से अलग होते ही हिमालय की इस तलहटी को स्वर्ग बना देने के सपनों और दावों की कोख से जन्मा उत्तराखण्ड राज्य अपने नागरिकों को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सहूलियते मुहैय्या कराने में भी बुरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। प्रदेश की सार्वजनिक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था दिन-ब-दिन पंगु होती जा रही है। विकास के तमाम खोखले दावों के बीच उत्तराखण्ड सरकार चुपके से अपने बुनियादी दायित्वों से मुंह मोड़कर जाने-अनजाने चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार के हवाले करने पर आमदा है।

अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड ने किसी भी क्षेत्र में काबिल-ए-जिक्र तरक्की नहीं की है। कई क्षेत्रों में इस इलाके की हालत आज के मुकाबले उत्तर प्रदेश में रहते कहीं बेहतर थी। उत्तराखण्ड की चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं इसकी जिन्दा मिशाल है। यहॉ की स्वास्थ्य सेवाओं का हाल उत्तर प्रदेश के जमाने से भी बदतर हो गया है। प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं तात्कालिक सेवाओं के बूते चल रही है।

आज उत्तराखण्ड डॉक्टर और खास तौर पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की जबरदस्त कमी से जूझ रहा है। हालॅाकि उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते हुए भी डॉक्टरों की तैनातगी के मामले में उत्तराखण्ड की स्थिति बेहतर नहीं थी। पर राज्य बनने के बाद स्थिति सुधरने के बजाय और बदतर हो गयी है। राज्य निर्माण के दौरान यानी वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड में विभिन्न ग्रेड के डॉक्टरों के करीब सत्रह सौ पद स्वीकृत थे। इनमें करीब पचास फीसदी डॉक्टर तैनात थे। राज्य बनने के बाद अब राज्य में विभिन्न ग्रेड के डॉक्टरों के पद करीब चौबीस सौ तीस के आस-पास हो गये है। इसके सापेक्ष मौजूदा वक्त में यहॉ महज करीब चौतीस फीसदी डॉक्टर तैनात है। जबकि डॉक्टरों के छियासठ प्रतिशत पद खाली है। राज्य में मरीजों का ईलाज करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर भले ही नहीं हो। स्वास्थ्य महकमें में अफसरों के पदों में जबरदस्त ईजाफा अवश्य हुआ है। राज्य बनते वक्त यहॉ एक महानिदेशक, दो निदेशक और नौ अपर निदेशक थे। अब एक महानिदेशक, छः निदेशक, छत्तीस अपर निदेशक और एक सौ अट्ठावन संयुक्त निदेशक हो गये है।

उत्तराखण्ड में विशेषज्ञ डाक्टरों का जबरदस्त अकाल हो गया है। यहॉ विशेषज्ञ संवर्ग के वरिष्ठ श्रेणी चिकित्सा अधिकारियों के 189 पद मंजूर है, जिसमें में 131 खाली है। विशेषज्ञ सवंर्ग के ग्रेड-ए के 320 पदों में से 253 पद खाली है। जबकि विशेषज्ञ संवर्ग के चिकित्सा अधिकारियों के मंजूर 700 पदों में से 656 पद रिक्त है। सामान्य संवर्ग के वरिष्ठ श्रेणी चिकित्सा अधिकारियों के 207 में से 149 पद खाली है। चिकित्सा अधिकारी ग्रेड-ए के 346 में से 149 और चिकित्सा अधिकारी के 467 में से 37 पद खाली है। प्रदेश में 121 आर्युवेदिक डाक्टर संविदा में राजकीय एलौपैथिक अस्पतालों में काम कर रहे है। 142 डाक्टर संविदा पर रखे गये है।

राज्य के नगरीय और देहाती इलाकों में चिकित्सा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का ढॉचा पूरी तरह चरमरा गया है। उत्तराखण्ड में राजकीय एलौपैथिक डिस्पेंसरी, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, जिला पुरूष और महिला चिकित्सालय, बेस अस्पताल, संयुक्त चिकित्सालय, ग्रामीण महिला चिकित्सालय, क्षय रोग आश्रम, टी.बी. अस्पताल और टी.बी. क्लीनकों समेत कुल 758 अस्पताल हैं। इनमें विभिन्न संवर्ग के 2196 डाक्टरों के पद मंजूर है। जिनमें करीब बत्तीस फीसदी यानी 719 डाक्टर तैनात है। बाकी अड़सठ प्रतिशत यानी 1477 पद खाली है।

नैनीताल जिले में सभी किस्म के अस्पतालों की संख्या 66 है। इनके लिए 252 डाक्टरों के पद मंजूर है, तैनात है सिर्फ 85 डाक्टर। बाकी 167 पद खाली है। अल्मोडा़ जिले में सभी प्रकार के 77 अस्पताल हैं, जिनके लिए डाक्टरों के 219 पद स्वीकृत है। तैनात है सिर्फ 60 डाक्टर। बाकी 159 पद खाली है। पिथौरागढ़ में विभिन्न श्रेणी के 66 अस्पताल है, इन अस्पतालों में होने चाहिए 158 डाक्टर पर है सिर्फ छियालिस। बाकी 112 पद खाली है। हरिद्वार जिले के 48 अस्पतालों में 161 डाक्टर तैनात होने चाहिए थे, पर यहॉ नियुक्त है सिर्फ 59 डाक्टर। 102 पद खाली है। टिहरी में विभिन्न श्रेणी के 72 चिकित्सालयों में 171 डाक्टर होने चाहिए थे, है सिर्फ 34 डाक्टर। 137 पद खाली है। पौडी़ गढ़वाल जिले के 119 अस्पतालों के लिए 254 डाक्टरों के पद मंजूर है। कार्यरत है सिर्फ 63 डाक्टर। 191 पद रिक्त है। रूद्रप्रयाग जिले में विभिन्न श्रेणी के 41 चिकिसालयों के डाक्टरों के 92 पद स्वीकृत है। तैनात है सिर्फ 16 डाक्टर। बाकी 76 पद खाली है।

उत्तरकाशी जिले के 40 स्वास्थ्य केन्द्र और अस्पतालों के लिए डाक्टरों के 113 पद मंजूर है। यहॉ 38 डाक्टर तैनात है। बाकी 75 पद खाली है। यही हाल चमोली जिले का है। यहॉ विभिन्न श्रेणी के 47 सरकारी अस्पताल है, जिनमें डाक्टरों के 147 पद स्वीकृत है। पर तैनात है सिर्फ 28 डाक्टर। 119 पद खाली है। देहरादून जिले में विभिन्न श्रेणी के सरकारी चिकित्सालयों के तादाद 78 है। जिनके वास्ते 311 डाक्टरों के पद स्वीकृत है। लेकिन काम कर रहे है 163 डाक्टर। 148 पद खाली है। उद्यमसिंहनगर जिले में विभिन्न श्रेणी के अस्पतालों की संख्या 50 है। यहॉ 148 डाक्टरों के पद मंजूर है। 75 डाक्टर कार्यरत है। 73 पद खाली है। चंपावत जिले में विभिन्न श्रेणी के 23 अस्पताल है। इनके लिए डाक्टरों के 92 पद स्वीकृत है। काम कर रहे हे महज 25 डाक्टर। 67 पद खाली है। जबकि बागेश्वर जिले के विभिन्न श्रेणी के 31 अस्पतालों के लिए स्वीकृत डाक्टरों के 78 पदों में 51 पद खाली है। जिले में सिर्फ 27 डाक्टर तैनात है।

राज्य में दॉतों के डाक्टरों का भी कमोवेश यही हाल है वरिष्ठ दंत शल्यक के छः पद मंजूर है। ये सभी खाली है। सामान्य ग्रेड के दंत शल्यकों के मंजूर 70 पदों में से एक दर्जन पद खाली है। इन खाली पदों के सापेक्ष सात दंत शल्यक संविदा में रखे गये है। उत्तराखण्ड में डाक्टरों के दो कैडर बनाये गये है। सामान्य कैडर और विशेषज्ञ कैडर। यहॉ सामान्य कैडर के डाक्टरों के 1139 पद मंजूर है। जिनमें से 66.5 फीसदी यानी 758 डाक्टर तैनात है। 380 पद रिक्त है। जबकि विशेषज्ञ संवर्ग के मंजूर 1291 पदों में से सिर्फ 23 फीसदी यानी 309 डाक्टर कार्यरत है। 982 पद रिक्त है। यहॉ सर्जन, फिजीशियन, नाक-कान, स्त्री एवं बाल रोग विशेषज्ञ डाक्टरों की बेहद कमी है।

यहां तैनात विशेषज्ञ डाक्टरों में से ज्यादातर डाक्टर अलग राज्य बनते वक्त उत्तराखण्ड के हिस्से आये थे। इनमें से करीब ढाई-तीन दर्जन डाक्टर हर साल रिटायर हो जा रहे है। उसी क्रम में साल दर साल विशेषज्ञ डाक्टरों की संख्या भी घटती चली जा रही है। आने वाले सात-आठ सालों में मौजूदा वक्त में यहॉ तैनात तकरीबन सभी विशेषज्ञ डाक्टर रिटायर हो जायेगें। हालत यह हो गई है कि राज्य के जिलों और यहॉ तैनात सर्जनों की संख्या तकरीबन बराबर है। अगर तत्काल नये सर्जन नियुक्त नहीं हुए, आने वाले एक-दो साल में कई जिला अस्पतालों के आपरेशन थियेटरों में ताले लगने की भी नौबत आ सकती है।

राज्य बनने के इन बारह सालों में स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढॉचे में भी बडा़ बदलाव नहीं आया है। राज्य बनते समय सन् 2000 में यहॉ 33 बडे़ अस्पताल, 23 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 63 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, 172 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, ग्रामीण क्षेत्रो में 322 राजकीय एैलोपैथिक चिकित्सालय और 37 ग्रामीण महिला चिकित्सालय थे। दस सालों के बाद आज राज्य में 37 बडे़ चिकित्सालय है। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बढ़कर 55 हो गये है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र घटकर 42 रह गये है। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या 208 हो गयी है। जबकि ग्रामीण महिला चिकित्सालयों की संख्या घटकर 23 रह गयी है। ग्रामीण क्षेत्रों के एैलोपैथिक चिकित्सालयों की संख्या उतनी ही है।

राज्य के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे ज्यादा दरकार है। क्योंकि इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कोई वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद नहीं है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं का सारा दारोमदार सरकारी अस्पतालों पर ही टिका है। अफसोस पहाड़ी इलाकों मंे ही डॉक्टरों की सबसे ज्यादा कमी है। दिलचस्प बात यह है कि उत्तराखण्ड के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए भले ही डॉक्टर नहीं हो, लेकिन इन दस सालों में दवाओं का बजट करीब तीन सौ गुना जरूर बढ़ गया है।

उत्तराखण्ड के सियासी नेतृत्व की अदूरदर्शिता और पहाड़ की बुनियादी जन समस्याओं के प्रति घोर लापरवाही के चलते अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड के लोगों को हरेक क्षेत्र में नुकसान उठाना पडा़ है। संयुक्त उत्तर प्रदेश में रहते मेडिकल में सीमान्त क्षेत्र के लिए तीन प्रतिशत और उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाकों के मूल निवासियों के लिए तीन फीसदी सीटों का कोटा तय था। इस कोटे के तहत राज्य के पहाड़ी इलाकों के मूल निवासियों को मेडिकल में हर साल छियालीस सीटें हासिल हो जाती थी। इनमें से कम से कम आधे से ज्यादा लोगों को मेडिकल के स्नातकोत्तर कोर्सों में दाखिला मिल जाता था।

नतीजन पहाड़ के दूरस्थ इलाकों को हर साल करीब दो दर्जन से ज्यादा विशेषज्ञ डाक्टर मिल जाया करते थे। तब जिला अस्पताल तो दूर अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में भी विशेषज्ञ डाक्टर तैनात रहा करते थे। अलग राज्य बनने के बाद यह कोटा खत्म हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने पॉच साल तक उत्तराखण्ड को हर साल तेरह डिप्लोमाधारी विशेषज्ञ डाक्टर देने का वादा किया है। 2014 के बाद उत्तर प्रदेश से भी डिप्लोमाधारी विशेषज्ञ डाक्टर मिलने बंद हो जाएंगें। राज्य सरकार के मेडिकल कॉलेजों से निकले डाक्टर भी पहाड़ में नौकरी करने को राजी नहीं है। सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी के 2006-07 बैच के सिर्फ एक दर्जन डॉक्टर उत्तराखण्ड के स्वास्थ्य महकमे में संविदा के आधार पर काम कर रहे है।

प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारी दावें जो भी हो, पर जमीनी हकीकत यह है कि पहाड़ के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र आज भी चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरस रहे है। पहाड़ी क्षेत्रों की लचर स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे ज्यादा खामियाजा ग्रामीण इलाकों के बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को उठाना पड़ रहा है। डॉक्टरों के अभाव में उत्तराखण्ड के ज्यादातर बडे़ सरकारी अस्पताल महज रेफरल अस्पताल बनकर रह गये है। ईलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में आने वाले ज्यादातर रोगियों को बाहर के अस्पतालों को रेफर कर दिया जा रहा है। नतीजन प्राईवेट अस्पताल और नर्सिंग होम जमकर चॉदी काट रहे है। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होमों में दिन-प्रतिदिन बढ़ती लाचार रोगियों की भीड़ सरकारी दॉवों की हकीकत बयान कर रही है। अफसोस की बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं समेत राज्य के विकास से जुडे़ दूसरे बुनियादी मुद्दे किसी भी सियासी पार्टी के एजेन्ड़े में शामिल नहीं है।

नैनीताल से प्रयाग पांडे की रिपोर्ट.

हिंदुस्तान, देहरादून में स्ट्रिंगर को सीनियर रिपोर्टर बना दिया गया

हिंदुस्तान के देहरादून एडिशन से खबर है कि स्ट्रिंगर विमल पुरवाल को तहसील से उठाकर राजधानी में सीनियर रिपोर्टर बना दिया गया. संपादक गिरीश गुरूरानी के इस फैसले का हिंदुस्तान के कई रिपोर्टरों ने विरोध किया है और प्रबंधन से शिकायत दर्ज कराई है. सूत्रों का कहना है कि देहरादून में उषा रावत, अंशुल दांगी कई साल से स्ट्रिंगर हैं और पैसा भी 5 हज़ार से ज्यादा नहीं मिल रहा लेकिन संपादक ने अचानक विमल पुरवाल को सीनियर रिपोर्टर बना दिया और उषा रावत व अंशुल दांगी की अनदेखी कर दी.

तीन साल पुराने स्ट्रिंगर को स्टाफर न बनाकर सीधे सीनियर रिपोर्टर बनाना चर्चा का विषय बना हुआ है. देहरादून हिंदुस्तान में मनीस भट्ट, सुकांत ममगाईं, घनश्याम, शैलेन्द्र सेमवाल के अलावा कई और लोग अभी भी कार्यालय संवाददाता बने हुए हैं. आरोप है कि गुरूनानी अपने खास लोगों को बढ़ावा दे रहे हैं. भास्कर उप्रेती जैसे रिपोर्टर को डेस्क पर बैठाया गया है और शिमला से सुनील डोभाल को रूड़की का चार्ज दे दिया गया. हरिद्वर में अजय यादव ने गुरूरानी से परेशान होकर नौकरी छोड़ दी. सूत्रों के मुताबिक संपादक से खफा होकर कई लोग दूसरे अखबारों का दरवाजा खटखटा रहे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

समाजशास्त्री नंदी का हंगामे से विचलित होकर सफाई देना उचित नहीं लगता

: विचारों के गणतंत्र की सच्चाई! : प्रख्यात समाज शास्त्री आशीष नंदी ने जयपुर साहित्य सम्मेलन के रिपब्लिक आफ आइडियाज अर्थात ‘‘विचारों का गणतंत्र’’ नामक सत्र में बोल रहे थे। दलितों व पिछड़ों को सबसे ज्यादा भ्रष्ट तो बताया ही, साथ ही पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए यह भी कहा कि वहां भ्रष्टाचार सबसे कम इसलिए है क्योंकि वहां पिछले 100 साल में दलितों व पिछड़ों को सत्ता के नजदीक आने का मौका ही नहीं मिला। नंदी के यह बयान देते ही हंगामा मच गया।

सबसे पहले मंच पर उन्हीं के साथ बैठे पत्रकार आशुतोष ने उनके कथन से अपना विरोध दर्ज कराया। उसके बाद तो यह बयान मंच और जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल परिसर की सीमाएं लांघ कर राजनीतिक हल्कों में जा पहुंचा। राजस्थान के मीणा एवं जाट जातियों के कुछ नेता तो जेएलएफ परिसर तक आ पहुंचे। अनहोनी की आशंका को देखते हुए सम्मेलन परिसर में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी। मामला बिगड़ता देख सम्मेलन के आयोजकों ने शाम होते-होते आशीष नंदी को अपने बयान पर सफाई पेश करने के लिए राजी कर लिया। इसके लिए बुलाए गए संवाददाता सम्मेलन में आकर नंदी ने कहा कि उनके बयान का वह अर्थ नहीं था, जो समझा गया।

वह कहना चाहते थे कि अमीर लोगों के पास और अमीर होने के कई तरीके होते हैं, इन तरीकों से किया गया भ्रष्टाचार आसानी से छुप जाता है। जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग द्वारा की गई छोटी सी भी गलती बड़ी आसानी से लोगों के सामने आ जाती है। इसके बावजूद ये नेता संतुष्ट नहीं हुए। जिसके फलस्वरूप आशीष नंदी के खिलाफ जयपुर के अशोक नगर थाने में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। क्या यह है विचारों का गणतंत्र?

श्री नंदी आलोचक और समाजशास्त्री हैं, लेकिन भ्रष्टाचार को किसी जाति से जोड़ा जाना सर्वथा गलत है। बात चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य में कही गई हो, यह बयान हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं है। सच्चाई की तह तक जाने की बजाय सीधे-सीधे नंदी को घेरकर बयान बदलवाकर लीपापोती कराना ही वैचारिक गणतंत्र है।सारा घटनाक्रम सबके सामने है।

समाजशास्त्री आशीष नंदी के दो टूक बयान की तह में जाया जाये यानी उसके मर्म को समझा जाये तो स्पष्ट है कि अज्ञानता और संस्कारहीनता ही प्रदूषित आचरण  (भ्रष्टाचार) की बुनियाद है। ज्ञान की पहली सीढ़ी जिज्ञासा  और संस्कार का प्रथम सोपान सत्यनिष्ठा है। अज्ञानता और असंस्कार सवर्णों में भी है, और ज्ञान-संस्कार एससी, एसटी व ओसीबी में, किन्तु उनकी गिनती बहुत कम है, लिहाजा बाहुल्य के अनुसार सवर्ण सदाचारी हैं। यह वैचारिक चिंतन रहा होगा समाजशास्त्री नंदी का।

इस सच्चाई को व्यवहार में देखें, तो छात्रवृत्ति और आरक्षण गैरसवर्णो को अपाहिज बनाने वाली बैशाखी हैं। यहीं से शुरू हो जाता है भ्रष्टाचार। क्योंकि महत्वाकांक्षी सवर्ण आरक्षण का विकल्प रिश्वत देकर निकाल लेते हैं। आरक्षण अथवा रिश्वत देकर पद-प्रतिष्ठा पाते हैं, वे जनसामान्य की दृष्टि में विश्वास पात्र नहीं हो पाते क्योंकि अज्ञानता व संस्कारहीनताजन्य ‘भ्रष्ट-आचरण’ को जनभावना की उपेक्षा का शिकार बना देती है, जिसका परिणाम यह है कि बस्ता, कापी-किताबें, मिड-डे-मील, बजीफा व फीस माफी के बावजूद अभिभावक भार्री आिथक बोझ वहनकर प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चों को दाखिला कराता है, यही स्थिति सरकारी अस्पतालों की तुलना में प्राइवेट चिकित्सालयों की है। समाजशास्त्र के मूल-तत्व की अभिव्यक्ति में समाजशास्त्री नंदी का हंगामे से विचलित होकर अनापेक्षित सफाई देना उचित नहीं लगता।

देवेश शास्त्री का विश्लेषण.

किसी से प्रेम कर बैठे तो ये न सोचना कि अब उसी से शादी करनी पड़ेगी

दो दिन पहले पुणे से मेरी दोस्‍त अनु आई थी। हम दोनों अलग-अलग शरीरों में जैसे एक-दूसरे की कार्बन कॉपी हैं। हमारे दिल-दिमाग एक, हमारे सपने एक, यहां तक कि हमारी लड़ाइयां और हमारी गालियां भी एक। लेकिन अभी मैं अनु नहीं, उसके पापा के बारे में कुछ बताना चाहती हूं। वो एक गर्ल्‍स इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल हैं और हरियाणा के एक गांव में रहते हैं। पता है, वो अपनी दोनों बेटियों से, अपने स्‍कूल और अपने गांव की लड़कियों से क्‍या कहते हैं –

1- अपने बापू से दहेज न मांग। उनसे आधा खेत मांग। आधा खेत भाई का तो आधा तेरा। अब कौन हल चलाना है। अब तो ट्रैक्‍टर से खेत जोतने हैं और लड़की भी ट्रैक्‍टर चला सकती है। अपना खेत खुद जोत और अपनी रोटी खुद कमा। अपना घर खुद बना।

2- भाई को राखी न बांध, न उससे पैसे ले। किसी से अपनी रक्षा करवाने की जरूरत नहीं। तू अपनी रक्षा खुद कर।

3- अपनी मर्जी से प्रेम कर, अपनी मर्जी से शादी कर। तेरा साथी कोई और नहीं ढूंढेगा। तू अपना साथी खुद ढूंढ।

4- तूने ससुराल नहीं जाना। न ही लड़के को घर जमाई बनाना है। दो लोग शादी करके अपना नया घर बनाओ।

5- प्रेम करने में कोई बुराई नहीं। प्रेम हो जाए तो किसी डर में न जीना। मेरी बच्‍ची, अगर प्रेम करने से लड़के का कुछ नहीं बिगड़ा तो तेरा भी कुछ नहीं बिगड़ा। किसी से प्रेम कर बैठे तो ये न सोचना कि अब उसी से शादी करनी पड़ेगी। वो अच्‍छा न लगे, तो उसे छोड़कर आगे बढ़ जाना।

6- घर से बाहर निकल, दुनिया देख। तू बाहर निकलकर मर भी जाएगी तो मुझे अफसोस नहीं होगा। लेकिन अगर तू दुनिया से डरकर इसलिए घर में बैठी रहेगी कि तू लड़की है, तो मुझे बहुत अफसोस होगा।

7- मेरे घर की इज्‍जत तेरे कंधों पर नहीं है। तू मेरी इज्‍जत नहीं, इसलिए इज्‍जत का ख्‍याल न करना। तू मेरा प्‍यार है, मेरा गुरूर है, अपना ख्‍याल करना।

ये अनु के पापा हैं। वो न कॉमरेड हैं, न कोई राजनीतिक चिंतक, विचारक। स्‍कूल में पढ़ाने और आज भी अपने खेत जोतने वाले एक साधारण इंसान। यह उनकी सहज बुद्धि से उपजी बातें हैं।

आप समझ रहे हैं न पढ़े-लिखे, शहरी, सो कॉल्‍ड मॉडर्न पापा लोगों, जो बेटे को प्रॉपर्टी देते हैं और बेटी को अपनी जाति में ढूढकर ससुराल।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

‘इंडिया टीवी के सुधीर पांडेय के भीतर का बाभन जाग गया’

एक महान किस्म के टीवी कर्मचारी हैं. इण्डिया टीवी में काम करते हैं. अब साब काम क्या करते होंगे, जादू टोना ही दिखाया जाता है उसपे. कल रात में आशीष नंदी प्रकरण पर उनके भीतर का बाभन जाग गया. भीतर छुपा संघ भी. नाम है सुधीर पाण्डेय. दिलीप मंडल जी के वाल पर कुछ व्यक्तिगत टीका टिपण्णी की शुरुआत की उन्होंने. जैसा कि संघियों की आदत में शुमार है. उसके बाद जनाब ने एक लम्बा सा नोट लिखा मेरे बारे में. स्क्रिप्ट बिलकुल इण्डिया टीवी जैसी, 'ये देखिये, ये बिल्ली है' 'ये देखिये अब ये बिल्ली रंग बदलती है'…

मतलब यूँ कि हर बात झूठी. उनको लगा कि होगा कोई लंजू पंजू किस्म का. हिन्दू हिन्दू / मुसलमान मुसलमान करके इसको माफ़ी मांगने पर मजबूर कर देंगे. बाकी दोस्तों को भड़का लेंगे. क्या बिगाड़ लेगा. तो भइय्या भगवान् कसम, ऐसा सबक सिखाये हैं कि ऐसी सुबह उनके जीवन में पहले कभी ना आई होगी. चूँकि हम सब इस बात में यकीन रखते हैं कि जो संघी और बजरंगी हैं वो सनातनी नहीं बल्कि कट्टर साम्प्रदयिक हैं, इसलिए हमने उनको उन्हीं के अंदाज़ में समझा दिया, हमारे रणछोर मिसिर चाचा ने हमसे दो सौ साल पहले कहा था, अनस बाबू, अच्छे से अच्छा रहिये, बुरे से बुरा. अब वो नोट उन्होंने हटा दिया है या इंविसिबल कर दिया है.

युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट Mohammad Anas के फेसबुक वॉल से.


इसके जवाब में सुधीर पांडेय ने जो कुछ लिखा है, वो इस प्रकार है….

mujhe bahut surprise hai ki mera paksha jane bina kaise mere bare mei kuch bhi chaap diya gaya… cum se cum mujhe ek phone karke mera paksh janna chahiye tha… aur mai uplabdh bhi asani se ho jata…uske baad dono ki baat ko balance karte likha jata toh behtar hota…khair mudde par aata hoon…har allegation ka point by point answer…

1- anas ji ke sare aarop niradhar hain kyunki dilip ji se jo behas unki wall par hui woh mai chunauti deta hoon ki anas yahan par ek ek shabdh publish karein…agar maine kuch galat likha hota toh mai khule aam inhe yeh karne ki chaunauti na deta… accha hoga puri behas publish ki jaye…taki logo ko anas ji ka jooth pata chale…maine likha tha ki sarkari naukari mei musalman bhai cum hain kyunki unka shekshik sthar piche hain…. yeh likhe se mai sampradiyak ho jata hoon…toh sabse bade communal sacchar sahab hain…

2- mai sanghi hoon iska koi praman kya anas ji ke pass hain… pichle kayi dino se jab bhi mai inka facebook par virodh karta hoon toh yeh mujhe sanghi karar de dete hain… mai aajtak ni samaj paya ki mai bina kisi sangthan se jude uska sadasya kaise ban gaya… mai dusari chaunauti deta hoon ki anas ji yeh saboot dey ki mai sanghi hoon… ek vakya bhi bataye ki maine kahi sangh ka paksh liya ho…aur agar nahi kar sakte toh phir apni mansikta par kabu paye… virodh karne wala har shaksh kisi dal sangthan se juda ho yeh zaruri nahi hai…

3- jis post ko delete karne ki baat anas ji ne kahi hai us post par maine inse kuch sawal kiya tha… aur badle mei anas ji ne baddhi baddhi galyian likhi… mai inhe teesri chaunauti deta hoon ki yeh delete post ka snap shot bhi paste karein…mujhe ek paise ka darr nahi… asliyat logo ke samne hogi…maine kya likha tha aur uspar inhone kya jawab diya…

4- facebook meri personal space hai…isme meri sanstha ka naam lena bahut bada ochapan hai… mai individual hone ke nate social site par behas karta hoon… jaise baki log karte hain… toh kya mai iska adhikar nahi rakhta…agar rakhta hoon… toh logo ko is tucchi manskita ko bhi samajna chahiye…jo tark na hone par ghar sansthan par utar aate hain…

5- aap sabhi meri facebook wall par amantrit hain…aaye aur dekhe ki maine har paksh ke khilaf kitna likha hai…khula amantran hai…kynki jisne chori ki hoti hai woh kuch chipata hai

YEH SAB ANAS MAHODAY NE CHEAP PUBLICITY KE LIYE KIYA HAI… AGAR UNKI BAATON MEI DUM HAI TOH DILIP JI KE BEHAS AUR DELETE POST KA SNAP SHOT POOR KA POORA… I REPEAT… AS IT IS… YAHAN CHAAP DEY… USKE BAAD MUJHE KUCH KEHNE KI ZARURAT NAHI PADEGI.. MERA EK EK SHABDH SACH HAI…AUR YEH POST CHAPNE KE BAAD SAMNE AA JAYEGA…

Sudhir kumar Pandey

sudhir3008@yahoo.co.in

बिहार में एसपी स्तर का अफसर पैसों के लिए इस कदर हुआ हुआ बर्बर

: डीजीपी साहब! इस बर्बरता को क्या कहेंगे आप? : राज्य के पुलिस प्रमुख पुलिसकर्मियों को जितना पुलिस फ्रेन्डली होने का पाठ पढ़ा रहे हैं उनकी पुलिस उतनी ही ‘अनफ्रेन्डली’ होती जा रही है। ताजा उदाहरण शेखपुरा के बरबीघा का है। शेखपुरा एसपी बाबु राम के निर्देश पर बरबीघा पुलिस ने 24 जनवरी को बरबीघा थाना के तेईपर मोहल्ले से एक पच्चीस वर्षीय युवक मुकेश उर्फ छोटी को अवैध शराब बिक्री में संलिप्ता के कथित आरोप में गिरफ्तार कर लिया। मुकेश को एसपी आवास ले जाया गया जहां उसे छोड़ने के एवज में भारी राशि की मांग की गई।

जब मुकेश ने किसी तरह के शराब व्यवसाय में अपनी संलिप्तता होने से इनकार करते हुए नजराना देने से मना कर दिया तो एसपी के निर्देश पर उसके गुप्तांगों सहित शरीर के अन्य हिस्सों पर इतनी पिटाई की गई जिससे वह वहीं बेहोश हो गया। बाद में पुलिसकर्मियों ने उसे थाने लाया जहां उसकी हालत सुधरने के बजाए बिगड़ती चली गई। उसकी हालत बिगड़ती देख पुलिस ने 25 जनवरी को उसे चुपके पटना के पीएमसीएच में दाखिल कराया जहां आंत के आपरेशन के बाद भी आसीयू में भर्ती मुकेश की हालत नाजुक बनी हुई है। उसकी हालत नाजुक देख पुलिस वालों ने उसके परिजनों को खबर दी। घटना की खबर पाकर पीएमसीएच पहुंचा मुकेश का भाई रीतेश अपने भाई की हालत देख फूट पड़ा। जब एसपी स्तर के अधिकारी ही पैसों के लिए इस तरह की बर्बरतर पर उतर आएं तो कनीय अधिकारियों से क्या अपेक्षा की जा सकती है।

पत्रकार Vinayak Vijeta के फेसबुक वॉल से.

बलात्कारी पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजने की घोषणा

Himanshu Kumar : छत्तीसगढ़ के एक और बलात्कारी पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजने की घोषणा करी गई है. इस बलात्कारी पुलिस अधिकारी का नाम है एसआरपी कल्लूरी. लेधा नामक एक आदिवासी महिला के साथ कल्लूरी और उसके सिपाहियों ने एक माह तक बलात्कार किया था. कल्लूरी साहब ने लेधा के गुप्तांगों में मिर्चें भर दी थीं. लेधा ने जिला जज के सामने अपने बयान में यह सब दर्ज करवाया था. लेकिन कल्लूरी ने पीड़ित महिला लेधा और उसके परिवार पर दबाव बनाना शुरू किया तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उस बलात्कार के मामले को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में ले गये.

पुलिस अधिकारी कल्लूरी ने पीड़ित महिला के परिवार का अपहरण कर लिया. पीड़ित महिला लेधा ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में कहा कि मैं बलात्कार का अपना केस वापिस लेना चाहती हूं. हाई कोर्ट के जज ने पूछ कि तुम केस क्यों वापिस लेना चाहती हो लेधा? लेधा ने हाथ जोड़ कर रोते रोते कहा- आप मुझ से यह मत पूछिए. जज साहब ने मामला ख़ारिज कर दिया. अब भारत राष्ट्र बलात्कार करने वाले उन कल्लूरी साहब को सम्मान दे रहा है.

सभी देश प्रेमी सज्जनों से प्रार्थना है कि वे लेधा के विरुद्ध और कल्लूरी साहब के सम्मान में अपना सिर फख्र से ऊंचा कर लें. और हां, आदिवासी महिला लेधा की लड़ाई में उसका साथ देने वाले वकील और सामाजिक कार्यकर्ता श्री अमरनाथ पाण्डेय के ऊपर तेरह फर्जी मामले बना दिये हैं. अमरनाथ पाण्डेय साहब के छोटे भाई को हत्या के एक फर्जी मामले में फंसा कर उम्र कैद भी करवा दी गई है. कुछ समय पहले तक लेधा एक चाय की दूकान पर बर्तन मांजती थी. आजकल लेधा का पता ही नहीं चल रहा है.

अरे छोड़िये भी लेधा को. इस देश को लेधा की नहीं, कल्लूरी साहब की ज़रूरत है. कल्लोरी साहब के दम पर ही ज़मीने छीनी जा सकती हैं. ज़मीने छीन कर ही अमीर उस पर अपने उद्योग लगा सकते हैं.  आपको और आपके बच्चों को उन्ही उद्योगों में नौकरी मिलेगी, तभी आप शोपिंग माल में जा सकते हैं, कार खरीद सकते हैं, ऐश कर सकते हैं.

देखिये कल्लूरी साहब आपके लिये वहाँ कितनी मेहनत कर रहे हैं. लेधा से आपको क्या मिलेगा? चिल्ला चिल्ला कर अपना मूंह दुखाओगे बस. चिदम्बरम, मोदी, अंकित गर्ग और कल्लूरी इस देश के विकास के नए और सफल प्रयोग हैं. क्या फायदा भगत सिंह गांधी अम्बेडकर की और समता समाजवाद और न्याय की बकवास करने की? विश्वशक्ति भारत के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आप सब को बधाइयां.

हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

कमर मटकाने और क्रिकेट खेलने वालों को क्यों मिलता है पदम भूषण और पदम श्री जैसे पुरस्कार?

बी.पी. गौतम :  इत्ती बात तो समझ आ गई कि पत्रकारिता से रोटी के साथ पुरस्कार भी नहीं मिलना है, जबकि कमर मटका कर बड्डा आदमी बनने के साथ पदम् भूषण और पदम् श्री की उपाधि आसानी से मिल सकती है … देखो न, फिल्म फेयर अवार्ड की तरह ही फिल्म वालों ने पदम् भूषण और पदम् श्री झटक लिए … कमर मटकाना महान काम है, क्रिकेट खेलना महान काम है, कपड़े सिलना भी महान काम है और पचास से अधिक लड़कियों का संग करने के बाद मर जाना भी महान काम है … अरे कोई है, जो मुझे कमर मटकाना सिखा दे…

पत्रकार बीपी गौतम के फेसबुक वॉल से.

पत्रकार इरफान शेख की किताब ‘राहुल- एक करिश्मा’ का शिंदे ने किया विमोचन

दिल्ली : केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार ने ''राहुल-एक करिश्मा'' नामक पुस्तक का विमोचन करते हुए राहुल गांधी की तारीफ की। वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद इरफान शेख की पुस्तक के विमोचन के मौके पर गृहमंत्री शिंदे ने कहा कि राहुल गांधी से बड़ी उम्मीदें हैं, वे एक नयी सोच को दिशा देंगे और युवाओं को राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ेंगे।

इस पुस्तक में लेखक मो इरफान शेख ने दावा किया है कि दामिनी निर्भय मामले ने राहुल गांधी को बहुत विचलित किया और कांग्रेस संगठन की जिम्मेदारी लेने के पीछे इस घटना का बहुत बड़ा हाथ है। इरफान के मुताबिक जब देश के युवा आंदोलन कर रहे थे तो राहुल लगातार घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए थे और यही वजह है कि उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी से रात को जा कर बात की और राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी उठाने का फैसला लिया। राहुल गांधी पर लिखी गई इस पुस्तक के हिंदी के अलावा उर्दू संस्करण का भी शिंदे ने विमोचन किया।
 

सहरसा में कोसी क्षेत्र के साहित्यकारों का समागम : प्रसंग- ‘क्रांति गाथा’ का लोकार्पण

: साहित्य का धर्म बड़ा व्यापक है : दामिनी का कलंक इस संसार पर लगता रहेगा, हमारा काम इसे रोकना है : फुकियामा ने कहा था विचार का अंत नहीं हुआ है : जिसमें सृजन की चेतना है वही साहित्यकार है : 23 जनवरी को सहरसा विधि महाविधालय में डा. जी. पी. शर्मा रचित काव्य ग्रंथ ’क्रांति गाथा’ का लोकार्पण करते हुए  डा. रमेन्द्र कु. यादव ’रवि’ (पूर्व सांसद व संस्थापक कुलपति भू.ना.मं. विश्ववि. मधेपुरा )  ने कहा कि विगत चालीस वर्षों में ‘क्रांति गाथा’ जैसी पुस्तक पढ़ने का पहली बार मौका मिला, 1857 से 1947 तक के भारतीय मुक्तिा संघर्ष के इतिहास को काव्यात्मक शैली में पिरोकर कवि डा. जी. पी. शर्मा ने भारतीय जनमानस का बड़ा उपकार किया है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा धर्म साहित्य का सृजन है, जिसमें सृजन की चेतना है वही साहित्यकार है। हम युग को बदलते हैं युगधर्म बदलते हैं। हम क्र्रांति को पालते हैं क्रांति का प्रचार प्रसार करते हैं।

इतिहासकार एवं वरिष्ठ कवि हरिशंकर श्रीवास्तव ’शलभ’ ने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास के प्रमाणिक वृतांतों को बड़ी निष्ठा और परिश्रम से सुंदर, सरल, सुबोध एवं सार्थक काव्यमयी वाणी देकर कवि ने गाथा काव्य परंपरा को आगे बढ़ाने का सारस्वत प्रयास किया है। प्रो. आचार्य धीरज ने कहा कि बदलाव हुआ है क्रांति नहीं! विचार का भावात्मक रूप ही साहित्य है.. वस्तुतः विचार का अंत नहीं हुआ है जैसा कि सोवियत संघ के विघटन पर फ्रेंसिस फुकियामा ने कहा था।

साहित्यिक पत्रिका ‘क्षणदा’ के संपादक सुबोध कुमार सुधाकर ने कहा कि देश और काल के अनुरूप परिभाषाएँ तथा मान्यताएँ बदलती रहती है। वत्र्तमान साहित्य में जब गद्यमय साहित्य सरस कविता हो सकती है, हाइकु विधा साहित्य की कोटि में आ सकती है तो डा0 शर्मा का यह काव्य ग्रन्थ ‘क्रांति गाथा’ शास्त्रीय मतान्यताओं से  किंचित हट कर भी महाकाव्यत्व को क्यो नहीं प्राप्त कर सकता ! निःसंकोच ‘क्रांति गाथा’ की गणना महाकाव्यों की कोटि में की जा सकती है।

स्नात्कोत्तर केन्द्र के प्रो. सी पी सिंह ने इतिहास और साहित्य के संबन्धों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इतिहास साहित्य से भी लिया जाता है..। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार डा. रमेश चंद्र वर्मा एवं संचालन प्रो. अरविन्द ‘नीरज’ ने किया। समारोह के अन्य वक्ता कथाकार ध्रुव तांती, डा. भूपेन्द्र ना. यादव ‘मधेपुरी,’ सहरसा के वर्तमान विधायक आलोक रंजन, प्रो. विनय चैधरी, प्रो. रतनदीप, अरविन्द श्रीवास्तव, मुख्तार आलम एवं मुर्तजा नरियारवी आदि थे। सहरसा में अर्सा वाद ऐसे आयोजन की बुद्धिजीवियों ने सराहना की।

भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाले मुलायम का अखिलेश से बेहतरी की उम्मीद करना बेमानी है

सैफई में पिता ने पुत्र से कहा- तुम्हारा राज ख़राब चल रहा है, कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है… यह सुनकर सबको लगा एक पिता का शायद पुत्र पर स्नेह है इस कारण सुधारने की कोशिश में लगा है. पर जब अगले 15 दिन में ही यह बात पिता ने बार-बार दोहरानी शुरू कर दी, तो लोगों को लगा कि शायद मामला कुछ गड़बड़ है. लोगों ने कयास लगाने शुरू कर दिए कि पिता ने पुत्र को गद्दी तो सौंप दी, पर अब शायद उन्हें कुछ अधूरा-अधूरा सा लग रहा है.

पिता ने 1989 में जब पहली बार गद्दी संभाली थी, तब पिताजी आम आदमी से जुड़े 'नेताजी' थे. पिताजी कई बार गद्दी पर बैठे. लोगो के बहुत लाडले थे. लेकिन बाद में वो सिर्फ नाम के ही नेताजी रह गए. जनता से कुछ कटते से चले गए. जनता को लगा हमारे नेताजी को ठाकुर साहब ने ख़राब कर दिया. पर अब तो ठाकुर साहब भी चले गए. बेटे ने ज़बरदस्त मेहनत करके फिर सत्ता भी पा ली है. न किसी का दबाव है, न कोई गठबंधन का डर. फिर भी अगर कुछ गलत चल रहा है तो दोषी कौन है?

पुरानी कहावत है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से आये. आज नेता जी को लग रहा है कि सब गड़बड़ चल रहा है तो जिम्मेदार कौन है? अगर आज यह कहा जा रहा है कि प्रदेश में अफसरों की इमेज ख़राब हो गयी है तो उसका भी कारण कौन है? बात 1995-96 की है,तब कुछ ईमानदार माने जाने वाले अफसरों ने खुद घर में सफाई की शुरुआत की. प्रभात चतुर्वेदी, विजय शंकर पाण्डेय, अनंत कुमार सिंह जैसे अफसरों ने एक मुहिम चलायी कि कैडर में जो सबसे ज्यादा बेईमान अफसर हो, उन्हें वोट के जरिये छांटा जाए. उस समय तय हुआ था कि कम से कम 100 अफसर जिन्हें बेईमान कहें, उनके नाम सार्वजानिक कर दिए जाए. उस समय किसी को 100 वोट तो नहीं मिले थे फिर भी सबसे ज्यादा वोट वालों अखंड प्रताप सिंह, नीरा यादव और ब्रिजेन्द्र यादव के नाम सार्वजानिक कर दिए गए थे.

उस समय इस मतदान को लेकर काफी चर्चा भी हुई थी, पर लुकी छिपी बात जनता के बीच आ गयी थी. कुछ दिन बाद नेताजी प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अखंड प्रताप सिंह और नीरा यादव को मुख्य सचिव बना दिया. काफी बवाल भी मचा पर नेताजी ठहरे नेताजी. अपनों को मौका दिया. जनता में सन्देश चला गया कि यहाँ नियुक्ति का पैमाना क्या है और अफसरों में भी. फिर तो प्रदेश में चाहे सपा की सरकार रही हो या बसपा की, दोनों ने अफसरों की क़ाबलियत नहीं, उनकी समर्पण सेवा को ही वरीयता दी. जिसका असर ऐसा हुआ कि लुटेरों ने लूट की और अच्छे अफसरों ने किनारे रहने या प्रदेश से बाहर रहने में ही भलाई समझी.

इस बार पिता ने सोचा कि ढलती उम्र है, पुत्र को अपने सामने ही स्थापित कर दे. पुत्र ने मेहनत भी जबरदस्त की थी, तो संगी साथियों के विरोध के बावजूद भी पुत्र का राजतिलक करा दिया गया.  हमने तब लिखा था कि 'चक्रव्यूह में फंस गया है अभिमन्यु'. समय गुजरा तो लगा कि ऐसा ही हो रहा है. कभी छोटे चाचा नाराज हो जाते हैं तो कभी खान चाचा. पिता और खान चाचा ने तो कभी सूबे का राजा माना ही नहीं, उनकी नजर में अब भी घर का टीपू ही है. उम्र का एक दौर होता है जब बचपन के नाम भी चिढाने लगते हैं. वो कुछ करना चाहता है, पर कुछ बड़े उसे बचपन के नाम के साथ ही लपेटे रखना चाहते हैं, बड़ा होने ही नहीं देना चाहते.

यहाँ तो स्थिति और भी नाजुक बनी कि बेटे की टीम में कौन सेनापति होंगे, इसका फैसला करने का अधिकार भी बड़ों ने अपने पास ही रख लिया और जब रिजल्ट की बात आई तो पूछ रहे हैं कि बताओ क्या हुआ? बेटे का राजतिलक हुआ तो सूबे के सबसे बड़े अफसर के तौर पर जावेद उस्मानी का बेहतरीन नाम सामने आया. लोगों को लगा, नए खून के साथ निजाम भी अच्छा होगा. जावेद उस्मानी के नाम ने लोगों को यकीं भी दिलाया कि इस बार सचमुच अच्छा होगा. दूसरे महत्वपूर्ण पद पुलिस के मुखिया के पद पर चुनाव आयोग ने अतुल को नियुक्त किया था. कई दिन चर्चा चली कि अतुल को ही बनाये रखा जायेगा. अतुल भी ईमानदार अफसरों में शामिल हैं. लोगो का विश्वास मजबूत हुआ.

राजनीति में कहा जाता है कि वक्त पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है. पर बेटे ने ऐसे में जब चुनाव होता है, हर आदमी का महत्व होता है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हर तरह से मजबूत माने जाने वाले डीपी यादव को साथ लेने से साफ़ इंकार करके अपनी एक शानदार इमेज भी बना ली थी. ऐसे में लग रहा था कि इस बार बदला-बदला सा निजाम होगा. नौजवान खून है. अच्छी टीम लाकर कुछ अच्छा ही करेगा. अचानक पुलिस मुखिया के पद पर अम्बरीश चंद्र शर्मा की नियुक्ति हो जाती है. उनकी एकमात्र खास क़ाबलियत यह है कि वो नेताजी के बहुत नजदीक हैं.

मुख्यमंत्री के अपने सचिवालय और आसपास में अनीता सिंह, पंधारी यादव, जुहैर बिन सगीर, अनिल कुमार गुप्ता जैसे वो ही लोग नियुक्त हुए जिनकी नेताजी के प्रति निष्ठा मानी जाती है. नोयडा जैसे महत्वपूर्ण जिले में भी राकेश बहादुर और संजीव सरन जैसे उन अफसरों की तैनाती की गयी, जो सीबीआई की जांच में फँसे हुए हैं. अनिल कुमार गुप्ता को तो एक साथ ही सारे प्रदेश की जिम्मेदारी दे दी गयी, मानो प्रदेश में उनके अलावा कोई अफसर ही नहीं रह गया हो. हालत यहाँ तक ख़राब हुई कि नियुक्ति सचिव राजीव कुमार को नीरा यादव के साथ अदालत से सजा तक हो गयी और नोयडा के अफसरों को हटाने के लिए अदालत तक को आदेश देना पड़ा.

आज नौजवान सरकार चुनावी वायदे तो तेजी से पूरे कर रही है, फिर भी आम जनता में विश्वास नहीं बना पा रही है. कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर नजर आ रही है. अपराध बढ़ रहे हैं. बिजली की स्थिति ऐसी कि शहर भी गाँव से लगने लगे हैं. अफसरशाही निरंकुश हो रही है. पार्टी के नेता बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम-घूमकर लूट मचाये हुए हैं. पिता-पुत्र के रोज़ कहने पर भी समझ नहीं रहे हैं. ऐसा हो रहा है तो क्या केवल वो ही दोषी है जो जुम्मे-जुम्मे 8 दिन से कुर्सी पर बैठा है, और वो भी बंदिशों के साथ. घर का मालिक तू, पर कोठी-कुठले के हाथ मत लगाना, टीम बनाकर दो आप और कहो -मैच जीतो, तो ऐसा तो धोनी भी नहीं कर सकता. जब नाम के अलावा सब कुछ आपका, फिर अभिमन्यु का चक्रव्यूह में क्या हश्र होगा,  यह पूछने की जरूरत है?

हिंदी दैनिक 'रायल बुलेटिन' के संपादक अनिल रायल का विश्लेषण.

‘ADAAB TV’ Launched in Mumbai

Mumbai's 1st Digital Broadband Urdu TV Channel "Adaab TV" has been launched in Mumbai. The launch has chosen Pious and auspicious occasion of Eid-e-Milad-un-Nabi and our Republic Day to launch its services. A Press Conference was organised to announce the Launch of the channel the pre-eve of Eid-e-Milad-un-Nabi on the 24th January 2013, at Mumbai Marathi Patrakar Sangh, Azad Maidan, Fort, Mumbai.

The Media Conference was addressed and attended by the Promoters and Associates of the Channel along-with Celebrities from Film, Literature and Business world.

Advocate Ghulam Abbas Kazmi, Channel's CEO- Sayed Asif Jah, Lyricist- A. M. Turaz, Channel's Creative Director & Film maker- Shuja Ali and Film Director- Musawwir Jalil addressed the present Media. Nizamuddin Rayeen- President Mumbai Congress Minority Cell and Senior Journalist Abdul Sami Bubere also spoke to the gathering at this event.

ADAAB TV's Test run has started on Digicable's channel frequency number 883. The Channel will soon be available live on Web & Mobile space. Plz watch our channel and send your suggestions and feedbacks.

प्रेस रिलीज

स्ट्रिंगर बनाने के नाम पर उगाही में लिप्त है साधना न्यूज!

भोपाल : अगर आप यह सोच कर साधना न्यूज़ में अपना बायोडाटा बतौर स्ट्रिंगर काम करने के लिए इस पते info@sadhnanews.net पर भेज रहे हैं और यह सोच रहे हैं कि आप एक अच्छी पत्रकारिता कर सकते हैं, या आपको न्यूज़, स्टोरी के बदले में साधना न्यूज़ आप को भुगतान देगा तो आप बिलकुल गलत सोचते हैं. अगर आप को साधना न्यूज़ चैनल में काम करना है तो तैयार हो जाइए अपनी जेब ढीली करने के लिए है.

जी हां, भ्रष्टाचार की जड़ें पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी गहरी पैठ जमाने लगी हैं. साधना न्यूज़ के इस फ़ोन नंबर 0091-07554097809 से कॉल करके उन लोगों से 50000 /- की डिमांड की जा रही है जो बतौर स्ट्रिंगर साधना न्यूज़ में काम करना चाहते हैं.

अपने आप को साधना न्यूज़ चैनल भोपाल से विपणन विभाग का कर्मचारी बताने वाला अजय श्रीवास्तव उन लोगों को 0091-07554097809 फ़ोन करके पहले यह पूछता है कि आप कहां के लिए काम करना चाहते हो? फिर सवाल होता है कि आप के पास कौन कैमरा है? अगर आपके पास कैमरा है तो आप को 50000/- जमा कराने होंगे.

हद तो तब हो जाती है जब उम्मीदवारों की पत्रकारिता का अनुभव, प्रतिभा और अध्ययन को ताक पर रख कर यह सारा खेल खेला जा रहा है. जब एक उम्मीदवार पत्रकार ने यह पुछा कि 50000/- किस बात के हैं? तो साधना न्यूज़ चैनल भोपाल से  विपणन विभाग का कर्मचारी बताने वाला अजय श्रीवास्तव गुस्से में भड़क गया और बोलने लगा कि तुमको क्या लगता है, यह पैसा मैं ले रहा हूं? यह पैसा चैनल में जमा होगा. फिर बोलने लगा कि लगता है मीडिया में काम करना नहीं आता है? यह पैसा विज्ञापनों का है जो तुमको देना होगा और हर माह राशि बढेगी वो भी तुमको ही देनी होगी. न्यूज़, स्टोरी का कोई भी भुगतान नहीं होगा.

जब उम्मीदवार पत्रकार ने प्रमुख संपादक से बात करने की बात कही तो डर के मारे फ़ोन ही काट दिया. अब सवाल यह आता है कि अपने आप को  साधना न्यूज़ चैनल भोपाल से विपणन विभाग का कर्मचारी बताने वाला अजय श्रीवास्तव उन लोगों को  0091-07554097809 से फ़ोन कर यह पैसा बटोरने का जो गोरखधन्दा कर रहा है, जिससे पत्रकारिता और साधना न्यूज़ दोनों का नाम बदमाम हो रहा है, क्या यह भ्रष्टाचार का एक रूप नहीं है? स्ट्रिंगर के नाम से बायोडाटा मांगे जा रहे हैं और काम पत्रकारिता के नाम पर विपणन का दिया जा रहा है. अगर कोई स्ट्रिंगर इस बात के लिए राज़ी हो भी जाता है कि वो इन नियम का पालन करेगा लेकिन अगर हर माह विज्ञापन नहीं दे सका तो? ज़ाहिर है कि न्यूज़ चैनल द्वारा विज्ञापन का दबाव बढेगा तो कहीं कोई स्ट्रिंगर दबाव के चलते कोई क्राइम न कर बैठे? फिर इसका ज़िम्मेदार कौन होगा? अजय श्रीवास्तव जैसे लोग या साधना न्यूज़ चैनल?

उल्लेखनीय है कि हाल ही में भड़ास पर विज्ञापन छपा जिसमें कहा गया कि स्ट्रिंगर की आवश्यकता है, इच्छुक लोग info@sadhnanews.net पर मेल करें. स्ट्रिंगर की आवश्यकता के नाम पर बायो डाटा मांगे गए फिर मेल भेजने वालों को 0091-07554097809 नंबर से फोन कर पचास हजार रुपये जमा कराने को कहा गया. अगर आप साधना न्यूज़ चैनल में बतौर स्ट्रिंगर काम करना चाहते हैं तो कृपया बायो डाटा भेजने से पहले ज़रा सोच लें कि आप को बतौर स्ट्रिंगर काम करना है या बतौर विपणन कार्यकारी?

मध्य प्रदेश के सिहोर से युवा पत्रकार आमिर खान की रिपोर्ट. आमिर से संपर्क mastaamirkhan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

एनडीटीवी इंडिया का एक एडिटर कई आरोपों के घेरे में!

प्रिय यशवंत जी, मुझे आपकी वेबसाइट के बारे में अपने एक पत्रकार मित्र के ज़रिए जानकारी मिली। दो-तीन दिन आपके पोर्टल को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि मैं आपके साथ एक खबर को शेयर कर सकता हूँ। खबर को पढ़ने के बाद ये आप पर निर्भर करता है कि आप उस खबर को अपनी वेबसाइट पर जगह देंगे या नहीं। खबर NDTV INDIA न्यूज़ चैनल के एक एडिटर के बारे में है।

NDTV INDIA के इस एडिटर का नाम xyz है और वो फिलहाल xyz ब्यूरो में तैनात हैं। इन महोदय ने तीन सालों में नाजायज तरीकों जैसे वसूली, हवाला से अथाह पैसे कमाएं हैं। मैंने उनकी कारगुजारियों का पूरा ब्योरा चैनल के कर्ता-धर्ता जैसे प्रन्नॉय रॉय, राधिका रॉय, विक्रम चंद्रा और नारायण राव तक ई-मेल के ज़रिये पहुचायी। सभी आरोपों के लिए circumstantial evidence भी मुहैया कराया। मैंने पहला मेल नवम्बर के पहले हफ्ते में किया, दूसरा दिसंबर के पहले हफ्ते में भेज और तीसरा मेल जनवरी के तीसरे हफ्ते में भेजा।

मुझे उनके HR Head का एक जवाब भी दिसम्बर महीने के तीसरे हफ्ते में आया। इस मेल में मुझसे evidence माँगा गया। HR HEAD के इस मेल को मैं हाल ही में पढ़ पाया जिसके बाद मैं evidence जुटाने में लग गया हूँ। मैं अबतक समझ रहा था कि मैंने उन्हें जानकारी देकर अपना काम कर लिया। लेकिन अब उनके हिस्से का काम भी मुझे ही करना है। NDTV के HR Head के मेल पढ़ कर लगा कि वो फिलहाल internal investigation करने के मूड में नहीं है।

मैंने उन्हें ये मेल्स जी-जिंदल मामला सामने आने से पहले लिखा था। न्यूज़ चैनलों को हमेश self-regulation की बात करते सुना है लेकिन पहल करते कभी नहीं देखा है। अगर NDTV चाहे तो मेरे किसी भी point को उठाकर जांच कर सकती है। सच खुद ही सामने आ जायेगा। लेकिन शायद कंपनी evidence के बिना कोई कदम नहीं उठाएगी। खैर, मुझे xyz जी के खिलाफ सबूत जमा करने में ज्यादा टाइम नहीं लगेगा।

एक शख्स के पास xyz जी का एक वीडियो भी है जिसमें वो मोल-भाव करते हुए साफ़ देखे और सुने जा सकते हैं। लेकिन उस शख्स को मैं फिलहाल locate नहीं कर पा रहा हूँ। लेकिन इतना साफ़ है कि जब भी मुझे वो वीडियो मिलेगा मैं उसको आपसे और Broadcast Editors' Association (BEA) से शेयर करूँगा, NDTV को नहीं दूंगा।

मैं आपको इस मेल के साथ दो attachment भेज रहा हूँ जिसमें NDTV के साथ मेरा communication है। मैंने मेल में चैनल के मालिकों को बताया है कि कैसे बिना लोन लिए xyz जी xyz जैसे महंगे शहर में कई मकानों के मालिक है। नेताओं, बिल्डर, और बिजनेसमैन से उनका कैसा nexus है। NDTV में कैसे वो पैसे लेकर खबर रोकते, चलते हैं। कहा ये भी जाता है कि जो भी उनके scheme of things के लिए खतरा बनता दिखता है उसे वो NDTV की मंदी की छंटनी के दौरान बाहर का रास्ता दिखवा देते हैं।

यशवंत जी, आशा करता हूँ कि आप मेरे इस मेल को गंभीरता के साथ पढ़ेंगे और अपने पोर्टल में जगह देंगे। मैं फिलहाल अपनी पूरी पहचान नहीं मुहैय्या कर रहा हूँ लेकिन जल्द ही evidence के साथ मैं Delhi में आपसे मुलाक़ात करूंगा।

आपका प्रशंसक

KR


मेल के साथ कोई प्रमाण न होने के कारण, सिर्फ आरोप होने के कारण, जिन सज्जन पर आरोप लगा है, उनका नाम और उनके शहर का नाम हटा दिया गया है ताकि उनकी पहचान उजागर न हो और बेवजह उनकी मानहानि न हो. उम्मीद करते हैं कि मेल भेजने वाले सज्जन प्रमाण भी मुहैया कराएंगे ताकि आरोपों की सच्चाई सामने आ सके, अन्यथा उपरोक्त सारी बातें बकवास मानी जाएंगी. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

इस कदर मिर्च-मसाला लगाकर खबरें क्यों छापता है दैनिक भास्कर?

चंडीगढ से लड़की का अपहरण कर गैंगरेप के मामले में दैनिक भास्‍कर के बठिंडा एडिशन की खूब छीछालेदर हो रही है। विरोधी अखबारों से खुद को अव्‍वल साबित करने के चक्‍कर में बठिंडा भास्‍कर ने गैंगरेप की कहानी रचने वाली युवती के मामले में इतनी सनसनी खड़ी कर दी कि अब वे खुद मुंह छुपाते फिर रहे हैं। किसी भी छोटे मामले को बढा–चढाकर छापने में भास्कर पहले भी सवालों के कटघरे में रहा है। लेकिन अब बिल्‍कूल फर्जी कहानी को इमोशनल तरीके से अखबार बेचने के चक्‍कर में इतना सनसनीखेज बनाने पर भास्‍कर का बाजार में खूब मजाक उड़ रहा है।

सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जिस पत्रकार ने खबर प्रकाशित की है, वह तो क्राइम रिपोर्टिंग में उतना परिपक्‍व नहीं लेकिन सिटी इंचार्ज से लेकर डीएनई और संपादक ने भी आसानी से सनसनी क्रिएट करने की परमिशन कैसे दे दी। बताया जा रहा है कि दूसरे अखबारों को कमतर साबित करने के चक्‍कर में अखबार ने इसे दिल्‍ली में हुई गैंगरेप की घटना से जोडकर इतना सनसनी बना दिया। इससे बडी बेवकूफाना हरकत क्‍या होगी कि जिसे अखबार चश्‍मदीद छाप रहा है वह लडकी से शारीरिक संबंध बनाने वाला और इस साजिश में बराबर का साथी है। बताया जा रहा है कि इस घटना के बाद दूसरे पञकार भी भास्‍कर का खूब मजाक उडा रहे हैं। वह खूब चटकारे ले रहे हैं कि जिस लडकी ने अपनी मर्जी से अपना रेप करवाया वह एक इंजेक्‍शन से कैसे डर सकती है।

सवाल उठ रहा है कि  क्या हो गया है आज की पत्रकारिता को..कहने को बडे़-बडे़ अक्षरों में लिख रहे है इनवेस्टीगेट रिपोटिर्ग और छाप रहे है झूठी और सनसनीखेज खबरें.. अब सुनो दैनिक भास्कर की तरफ से बलात्कार को लेकर छापी एक खबर की सच्चाई। खबर में पत्रकार महोदय ने अपनी जांच पड़ताल के सभी घोड़े दौड़ाने और देर रात तक कवरेज करने का दावा जताया है। अब खबर भी बड़ी तान कर लगी है। दैनिक भास्कर में 21 जनवरी को छपी खबर की हेडिंग है- अस्पताल में इंजेक्शन देख चीखती थी दुष्कर्म पीड़िता….

इस खबर को पढ़कर लगता है जैसे पत्रकार महोदय के सामने सब कुछ घटित हुआ हो..खबर को दिल्ली रेप कांड की तरह सनसनीखेज बनाने के लिए दिल्ली कांड के कुछ सीन भी इस खबर के लिए जबरदस्ती चोरी कर जोड़ दिए गए है। पत्रकार की खबर को मिर्च मसाला से भरपूर करने के लिए पत्रकार के साथ उसके वरिष्ठ लोगों ने भी खासी मेहनत की है। अस्पताल के स्टाफ का जाली बयान, लड़की की आंखों में झठे आंसू को असली आंसू बनाकर पेश करने के साथ कई ऐसे संवाद किए गए जो बेवजह खबर को सनसनीखेज बनाने के लिए डाले गए लगते है। इस खबर पर शायद पाठक भी पहले की तरह विशवास कर लेते लेकिन सोमवार को आईजी ने पत्रकारों के सामने इस कहानी से परदा हटाकर झूठ और सच्च को अलग कर दिया।

अखबार ने जिस रोहताश कुमार को चश्मदीद गवाह बनाकर पेश किया है वही तथाकथित रेपकांड का मास्टर माइंड निकला है। यह पूरी कहानी अवैध संबंधों से जुडी थी जिसमें लड़की ने पहले किए अपराध को छुपाने के लिए पूरी साजिश अपने दोस्तो के साथ रची थी। इसमें जिन लोगों को आरोपी बता रही थी उन्होंने ही उसके खिलाफ 307 के मामले में केस दायर करवाया था।

फिलहाल इस घटना में जो भी घटा उस पर हम नहीं जाते लेकिन इसमें दैनिक भास्कर जैसा अखबार लीड बनाने के चक्कर में इस तरह की सनसनी फैलाकर गैरजिममेवारा व्यवहार करता है तो यह चिंता का विषय है। देश में बलात्कार जैसे संवेदनशील मामले को लेकर जहां हर तरफ बहस चल रही है वही मीडिया के एक हिस्से में बिना जांच पड़ताल के खबरों को सनसनी बनाकर पेश करने की होड़ लगी है जो समाज के साथ पाठकों के लिए चिंता का विषय बन रहा है। इसमें पत्रकार के साथ वरिष्ठ लोगों को भी चिंतन की जरुरत है जो पत्रकार के कहने मात्र में विश्वास कर इस तरह की खबरों में मिर्च मशाला डालकर पेश कर देते हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर किसी को उपरोक्त तथ्यों-बातों-आरोपों पर कोई आपत्ति हो तो नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए अपनी बात रख सकता है.

रवींद्र रंजन की पुस्तक ‘द ग्रेट मीडिया स‌र्कस’ के कुछ रोचक अंश

"तमाशा स‌र्कस के पुराने चीफ की वापसी होने वाली है। वापसी का ऎलान हो चुका है। स‌र्कस के स‌भी छोटे-बड़े कलाकारों को इत्तिला कर दिया गया है। इस खबर स‌े स‌र्कस में मिला-जुला माहौल है। स‌र्कस के पुराने कलाकार खुश हैं। उन्हें इस चीफ की आदत पड़ चुकी है। जब तक चीफ की डांट नहीं खाते पेट ही नहीं भरता। चीफ की डांट खाने के बाद ही वह अच्छा खेल दिखा पाते हैं। लिहाजा उनका खुश होना लाजिमी है। चीफ की इस 'वाइल्ड कार्ड एंट्री' स‌े कुछ कलाकार परेशान भी हैं। ये वो कलाकार हैं, जिनके हाथ-पैर चीफ का नाम स‌ुनते ही कांपने लगते हैं। वह ये स‌ोचकर परेशान हैं कि अब पुराना वाला चीफ हर वक्त रिंग में होगा। जब-तब हंटर फटकारेगा। स‌र्कस में खौफ का माहौल बनाएगा। "

"चीफ ने आते ही हाथ-पांव मारने शुरू कर दिए हैं। इतने दिनों तक खाली बैठे-बैठ जंग लग गया था। इस बार पहले स‌े ज्यादा चुनौतियां हैं। पुराना हिसाब-किताब अब काम नहीं आएगा। दोबारा खुद को स‌ाबित करना होगा। आज स‌र्कस जहां पर है, उससे आगे ले जाना होगा। दिखाना होगा कि नकल के अलावा भी उसे कुछ आता है। वह स‌िर्फ दूसरे स‌र्कसों के शो कॉपी नहीं करता। उसके पास भी आइडिये भी होते हैं।"

"पहले कलाकार ढूंढे नहीं मिलते थे। अब एक ढूंढो हजार मिलते हैं। कम पैसे में भी काम करने को तैयार रहते हैं। इससे स‌र्कस के मालिकान खुश हैं। उन्होंने अपनी कार्यशैली बदल दी है। अब मेहनताना नहीं बढ़ेगा। कलाकार भी कम रखे जाएंगे। काम भी ज्यादा लिया जाएगा। जो ज्यादा पैसा मांगेगा उसे नौकरी ही नहीं मिलेगी। कम पैसे वालों स‌े काम चलाया जाएगा। कुछ नहीं आता होगा तो स‌ीख जाएगा। आर्ट अब 'स‌ीखने' की चीज हो गई है। वह जमाना गया जब खून में आर्ट होती थी। रगों में कला बहती थी। कलाकार जन्मजात होते थे। अब ना तो ऎसे फनकार रहे और ना ही फन के कद्रदान।"

ये कुछ अंश हैं प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली स‌े प्रकाशित पुस्तक 'द ग्रेट मीडिया स‌र्कस' के। लेखक 'रवींद्र रंजन' हैं. मीडिया की हकीकत स‌े एक अलग ही अंदाज में रूबरू कराने वाली ये पुस्तक इसी महीने के आखिर तक आपके हाथों में होगी। रवींद्र रंजन से उनके ईमेल ravindraranjan@hotmail.com और उनके फोन नंबर 9873908854 पर स‌ंपर्क किया जा स‌कता है।

अनुप्रिया पटेल ने पीएम और सीएम को पत्र लिखकर शहीद परिवारों का पक्ष रखा

शहीद बाबूलाल के परिवार के आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री अखिलेख यादव आज शहीद के गांव पहुंचे… शहीद परिवार को सम्मान और आर्थिक मदद देने की मांग को लेकर आन्दोलन करने वाली अपना दल की राष्ट्रीय महासचिव और विधायक अनुप्रिया पटेल ने पीएम और सीएम को पत्र लिखकर शहीद परिवारों का पक्ष रखा है… अनुप्रिया ने इलाहाबाद में पीसी कर ये पत्र प्रेस को जारी किया है…

माननीय मुख्यमंत्री जी,

उत्तर प्रदेश सरकार

सादर अभिवादन

माननीय, आप प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। विश्वास किया जाता है कि नीतियां और उन्हें लागू किये जाने वाले हर फैसले आपकी आखिरी सहमति से ही पुष्ट होते हैं। इसी आधार पर एक उम्मीद लिए आपको पत्र लिख रही हूं । पत्र का उद्देश्य है उस भेदभाव की तरफ आपका ध्यान आकृष्ट कराना जिसे देश की तरफ से तो महसूस किया जा रहा है, लेकिन शासन-प्रशासन की तरफ से भी महसूस किया जा रहा है, ऐसा बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ता।

महोदय, आपका ध्यान उस जांबाज सी.आर.पी.एफ़ जवान की शहादत और शहादत के बाद उसके परिवार की मदद के स्तर पर प्रशासनिक पहल की गैरमौजूदगी की तरफ दिलाना चाहती हूं, जिसके शव को नक्सलवादियों द्वारा बम की तरह या बम की सहायक एक्सेसरीज की तरह इस्तेमाल किया गया। इलाहाबाद के रहने वाले शहीद जवान का नाम है, बाबूलाल पटेल और जिसकी विधवा तीन महीने की गर्भवती है।

शहीद परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए शहीद जवान के घर न तो किसी राजनेता की आमद हुई और न ही उस फोर्स के उच्चतम अधिकारियों ने वहां जाना मुनासिब समझा, जिस फोर्स के बाबूलाल पटेल एक जांबाज़ सैनिक थे। महोदय, शहीद की पत्नी और पिता को सम्मान की मांग करते हुए अनशन पर बैठना पड़ा। तब जाकर उनके परिवार को आर्थिक मदद मिलने की शुरूआत हुई और संवेदना व्यक्त करने शासन-प्रशासन के लोग पहुंचे।

भारत-पाकिस्तान की बाघा सीमा पर शहीद हुए हेमराज सिंह और सुधाकर सिंह के घर न सिर्फ राजनेताओं की बाढ़ आयी, बल्कि आप स्वयं भी वहां पहुंचे। जनरल विक्रम सिंह भी उनके घर पधारे। इससे उन शहीद सैनिकों के परिवार के मनोबल बढ़े और हर तरफ से मिली मदद की बड़ी राशि से उनके परिवार के भविष्य सुरक्षित भी हुए। हालांकि हेमराज के परिवार को भी सम्मान के लिए अनशन पर बैठना पड़ा। फिर भी ये कदम निश्चित रूप से इत्मिनान देते हैं। मगर देश के नाम अपने आपको कुर्बान करने वाले शहीद बाबूलाल पटेल के परिवार को जिस तरह से अकेला छोड़ दिया गया है, उससे न सिर्फ ये परिवार हताश हुआ है, बल्कि सेना में जाने को आकुल व्याकुल नौजवानों और उनके परिवार वालों में भी हतोत्साहन पैदा कर रहा है। ये हतोत्साहन भविष्य के सैनिक पैदा करने में तो रोड़ा बनेगा ही, शासन-प्रशासन के दोहरे रवैया से उपजे रोष को भी बढायेगा।

महोदय, आम लोगों की भावनाओं में ये सवाल बार-बार आते हैं कि क्या सैनिकों की शहादत के मूल्य भी अलग अलग होते हैं ? राजनीतिक फायदे नुकसान के तराजू पर क्या शहादत को भी तौला जाता है ? क्या हर जायज मदद पाने के लिए धरना-प्रदर्शन और राजनीतिक आंदोलन ही एक मात्र समाधान हैं ? महोदय, दरअसल सेना और आंतरिक सुरक्षा बलों के जवानों के लिए जो सेवा शर्तें हैं, उन्हीं में ये अंतर अंतर्निहित है। इससे न सिर्फ बाबूलाल पटेल जैसे शहीदों की शहादत अपमानित होती है बल्कि शहादत को लेकर चलती आम लोगों की सोच पर करारा प्रहार भी होता है।

मुख्यमंत्री जी, आपसे निवेदन है कि सबसे पहले शहीद बाबूलाल पटेल के परिवार को ज्यादा से ज्यादा आर्थिक मदद देकर उन्हें आर्थिक रूप से सुरक्षित किया जाए। बाबूलाल पटेल के परिवार को भी उतनी ही आर्थिक मदद दी जाए जितनी सरहद पर शहीद हुए हेमराज सिंह और सुधाकर सिंह के परिवार जनों को मिली है। ताकि शहीद की विधवा के गर्भ में पल रहा बच्चा जब समझने बूझने लायक बने तो अपने देश पर उसे भी ये सोचकर गर्व हो कि देश का जितना उसके पिता ने ख्याल रखा, देश ने भी उतना ही उसके पिता के परिवार का ध्यान रखा। जब वो बच्चा अपने दोस्तों के साथ पिता की शहादत की चर्चा करे तब अपने पिता की शहादत पर उसके भीतर वितृष्णा पैदा नहीं हो, बल्कि उसके साथ उसके दोस्तों के बीच देश की सेवा में क़ुर्बान होने की प्रेरणा मिले।

ऐसी मानसिकता और स्थितियां पैदा हो, इसके लिए जरूरी है कि आंतरिक सुरक्षा में शहीद होने वाले सभी जवानों के परिजनों को उतनी ही आर्थिक मदद और सम्मान मिले, जितनी सरहद पर शहीद होने वाले जवानों के परिजनों को मिलती है। क्योंकि दोनों ने देश की सुरक्षा के लिए ही अपने प्राणों की आहूति दी है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते मैं आपसे मांग करती हूं कि आप ये सुनिश्चित कराने के लिए जरूरी कदम उठाएंगे कि आगे से सेना और आंतरिक सुरक्षा में लगे जवानों की शहादत में भेद नहीं किया जाएगा। दोनों की शहादत को एक माना जाएगा। साथ ही आप ये भी सुनिश्चित करेंगे कि आगे से शहीदों के परिजनों को सम्मान और मदद के लिए आवाज नहीं उठानी पड़ेगी।

इसी विश्वास के साथ

अनुप्रिया सिंह पटेल

राष्ट्रीय महासचिव, अपना दल

विधायक, उत्तर प्रदेश विधानसभा

स्ट्रिंगरों के पेट पर एएनआई की लात!

देहरादून। देश भर में इलेक्‍ट्रानिक चैनलों के स्टिंगरों के पेट पर एएनआई न्यूज एजेन्सी लात मारती हुई दिख रही है, जिसके कारण कई इलेक्‍ट्रानिक चैनलों के स्ट्रिंगर पत्रकार चौराहे पर खड़े होने की हालात में जा पहुंचे हैं। पिछले दो महीने से इलेक्‍ट्रानिक चैनलों के स्ट्रिंगरों से चैनल द्वारा कोई खबर नहीं ली जा रही। खबर नहीं लिए जाने से चैनल स्ट्रिंगरों को पेमेंट भी नहीं कर रहे हैं, जिससे उनके परिवार पर आर्थिक संकट के बादल मंडराते हुए नजर आ रहे हैं।

पिछले काफी समय से देशभर के इलेक्‍ट्रानिक चैनलों में एएनआई न्यूज एजेन्सी द्वारा ही खबरें दी जा रही हैं, जिससे चैनल में काम करने वाले पत्रकारों पर आर्थिक संकट के बादल मंडरा गए हैं। देहरादून में न्‍यूज चैनलों में काम करने वाले कई पत्रकारों का कहना है कि पिछले दो महीने से संस्थान उनकी कोई भी खबर नहीं ले रहा है, जबकि चैनलों पर देहरादून की कई खबरें एएनआई न्यूज एजेन्सी के सौजन्‍य से लगातार चल रही हैं। ऐसे में उनकी खबरों को लिए जाने के एवज में मिलने वाली धनराशि नहीं मिल पा रही है। उनका आर्थिक स्थिति बदतर हो रही है।
 
देहरादून के सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में इन दिनो कई इलेक्‍ट्रानिक चैनलों के स्ट्रिंगर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं, जबकि एएनआई एजेन्सी के कर्मचारी रोजाना कई समाचारों को भेजते हुए नजर आ रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इलेक्‍ट्रानिक चैनलों की माली हालत गड़बड़ा गई है, जो वह एजेन्सी से कम दामों पर खबरों को खरीद रहे हैं, जबकि उनके रिपोर्टरो को उन्हीं खबरों की एवज में ज्यादा धनराशि देनी होगी। वर्तमान में इलेक्‍ट्रानिक चैनलों में हो रहे परिवर्तन के कारण कई स्ट्रिंगरों को बाहर का रास्ता दिखाने की कसरत भी पूरी की जा चुकी है।

देहरादून से नारायण की रिपोर्ट.
 

We are not virgin and we feel proud to not to be

Manisha Pandey : कल्पना कीजिए, आज से 50-100 साल बाद इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में हिंदुस्तानी समाज में महिलाओं की स्थिति का इतिहास लिखा जा रहा है और जानकारी के स्रोत के तौर पर फेसबुक अपडेट्स और कमेंट्स उपलब्ध हैं। तो इतिहासकार सौ साल बाद आज के समय के बारे में क्या लिखेंगे…

1- जब विकसित समाजों में नारीवादी आंदोलन, चिंतन और विचार एक उम्र जी चुका था, तब तक हिंदुस्तान में महिलाओं को महज इतना कहने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी कि वर्जिनिटी उनके लिए एक पुरानी, पिछड़ी, सामंती और मर्दवादी अवधारणा है और स्त्रियां उसे रिजेक्टस करना चाहती हैं।

2- बहुसंख्यक हिंदुस्तान 21वीं सदी में भी काफी सामंती, रूढि़वादी और पुरातनपंथी था क्योंकि कुछ महिलाओं के 19वीं सदी में फ्रांस की महिलाओं द्वारा जारी Manifesto of the 343 Sluts की तर्ज पर ये घोषणा करने पर कि "We are not virgin and we feel proud to not to be" 21वीं सदी के अधिकांश पुरुषों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। लोग 21वीं सदी में भी रामायण, राम-सीता और प्राचीन धर्मग्रंथों के उदाहरण दिया करते थे।

3- हिंदुस्तान 21वीं सदी में भी काफी जातिवादी और जातीय श्रेष्ठता के अहंकार में जीने वाला मुल्क था, क्योंकि वर्जिनिटी को नकारने वाली लड़कियों के ऊंची जाति से ताल्लुक रखने की स्थिति में उन्हें जबर्दस्त‍ उलाहना दी जाती थी। हालांकि जाति में विश्‍वास न करने के मामले में उन स्‍त्रीवादियों का स्‍टैंड बिलकुल साफ था।

4- 21वीं सदी के हिंदुस्‍तान में सिनेमा में लड़कियां काफी कम कपड़े पहनती थीं, स्‍वीमिंग पूल में डांस करती थीं, लेकिन वर्जिनिटी को तब भी बचाकर ही रखती थीं।

5- वर्जिनिटी का संबंध और महत्‍व सिर्फ स्त्रियों से ही जुड़ा था क्‍योंकि मर्दों के अरमान पूरे करने के लिए सस्‍ते चकलाघरों से लेकर महंगी कॉल गर्ल्‍स तक सब बहुतायत में उपलब्‍ध थे और उस पर किसी को कोई नैतिक आपत्ति भी नहीं थी। इन्‍हें खत्‍म करने के लिए उस दौर में हुए किसी आंदोलन का कोई संकेत फेसबुक पर नहीं मिलता।

6- लेकिन अच्‍छे, शरीफ घरों की लड़कियों के वर्जिन न होने का दावा करने पर इसे नंगापन और बेशर्मी कहकर पुरुष फेसबुक पर बवाल मचाने लगते थे।

7- मार्क जुकेरबर्ग का यह प्‍लेटफॉर्म 21वीं सदी में स्‍त्री मुक्ति के विचारों को फैलाने के लिए एक बड़े प्‍लेटफॉर्म के रूप में उभरा।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

कई न्यूज चैनलों ने राजनाथ सिंह को ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे दिया

Rajen Todariya : राजनाथ सिंह का उत्तराखंड से पुराना नाता है। उन्होंने ही मुजफ्फरनगर कांड के खलनायक और तत्कालीन जिलाधिकारी को अपना प्रमुख सचिव बनाकर प्रतिष्ठित किया। उनके पुत्र को भाजपा सरकार ने देहरादून में करोड़ों की सरकारी जमीन दी। उनके पुत्र की कंपनी पर आरोप है कि वह मीटर घोटाले से लेकर कुंभ घोटाले तक में लिप्त है। कांग्रेस सरकार में दम हो तो वह इन आरोपों की जांच कराए और सच जनता के सामने लाए। इसके बावजूद कई न्यूज चैनलों ने राजनाथ सिंह को ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे दिया।

Arvind K Singh :  नयी बोतल में पुरानी शराब… दिल्ली की राजनीति में घमासान है…ताज बदल रहे हैं…बीजेपी को अब राजनाथ सिंह संभालेंगे….शिवसेना को उद्धव ठाकरे और कांग्रेस को तो राहुल गांधी ही संभालेंगे…इस बात की नीतिगत फैसला हो जाने के बाद आज से उस पर अमल भी शुरू हो गया है….लेकिन इन चेहरों को देखें तो इनमें नया क्या है..नया एक चीज हो सकती है कि ये अपने पुराने अनुभवों से सबक लेते हुए संगठन को दिशा दें और आम लोगों का दुख दर्द दूर करने की कोशिश करें…लेकिन ऐसा सोचने का समय इनको तब मिलेगा जब ये चारणों से दूर रहे…लोकतंत्र के नए राजाओं महाराजाओं की तरह काम न करें…ये क्या करेंगे नया यह तो सबके सामने आएगा ही…कहते हैं कि किसी को नया जिम्मा मिले तो कुछ समय दिया जाये…दे दीजिए इनको भी कमसे कम छह महीने का समय इस बीच में देखेंगे कि क्या करते हैं ये…

Samar Anarya : ये समझ आया कि आडवाणी साहब संघ से बेईज्जत होने के बाद से ही बदला लेने के लिए गड-करी खाना चाहते थे। पर ये नहीं समझ आया कि आखिर करी पकाने में सफल हो जाने के बाद उन्होंने राजनाथ सिंह को क्यों खिला दी?

Gyasu Shaikh पर आडवाणी जी का सच गडकरी जी के लिए तो यही है की 'मैं न खाऊँ पर तुझे भी न खाने दूँ …'

Priyamvad Ajaat उन्होंने नहीं खिलाई…आडवाणी जी तो अंत अंत तक सुषमा के नाम पर अड़े रहे लेकिन उनकी डाल गली नहीं और गर्मागर्म करी का रायता फ़ैल गया|

Shambhunath Shukla : कांग्रेस का चिंतन शिविर समाप्त होते ही भाजपा ने भी अपना चिंतन-मनन कर डाला और गडकरी की जगह राजनाथ सिंह को अध्यक्ष पद सौंप दिया। यानी एक तरफ राहुल होंगे तो दूसरी तरफ राजनाथ। २०१४ के चुनाव में अपने-अपने लड़ाके और अपने-अपने तीर। इनमें से हर कोई हम्माम में कपड़े पहले भी उतार चुका है और पिद्दी साबित हुए हैं। दरअसल नेता न इधर हैं न उधर। क्या होगा इस तरह बार-बार फिसड्डी साबित हो चुके योद्धाओं से।

Anita Gautam : भाजपा के अध्यक्ष क्या बदले मीडिया तो ऐसे जश्न मनाते दिखा रही है मानों 2014 का लोक सभा चुनाव ही जीत लिया हो । कहीं भाजपा को फिर से 'शाइनिंग इंडिया' न दिखने लगे इस भ्रम में !

Abhishek Srivastava : राजनाथ सिंह धीरे-धीरे भाजपा के नरसिंहराव बनते जा रहे हैं। सेकुलरवाद के हमले से बचने के लिए (मोदी के कारण) और यूपी में अपनी खोई ज़मीन वापस पाने के लिए (कल्‍याण सिंह की वापसी) भाजपा साल भर बाद अगर पीएम पद के लिए राजनाथ का नाम उछाल दे, तो आश्‍चर्य नहीं होगा। (सबक: चुप रहना सबसे बड़ा गुण है।)

फेसबुक से.

उस झूठे और करप्ट आईजी की फर्जी प्रेस रिलीज को किसी पत्रकार ने नहीं छापा

Himanshu Kumar : जब हम दंतेवाड़ा में काम करते थे तब एक बार वहाँ एक आई जी साहब की नियुक्ति हुई. एक बार उन्होंने पत्रकारों को अपने आफिस में बुलाया. अपने एक पत्रकार मित्र के साथ मैं भी वहाँ चला गया. आईजी साहब के कार्यालय में एक आदिवासी लड़का जिसकी उम्र करीब सोलह साल की होगी और साथ में एक आदिवासी लड़की जिसकी उम्र करीब पन्द्रह की रही होगी, सहमे हुए बैठे थे. दोनों ने नक्सलियों वाली एकदम नई हरी वर्दी पहनी हुई थी. मुझे शक हुआ कि जंगल से आने वाले नक्सली के पास एकदम नए साफ़ कपडे कहाँ से आये?

आईजी साहब ने सभी पत्रकारों से इन दोनों का परिचय करवाया और बताया कि ये लड़का लड़की दोनों खूंखार नक्सली कमांडर हैं और इन्होंने आज ही पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है. आत्म समर्पण के बाद इन्होंने दंतेश्वरी माता के मंदिर में शपथ ली है कि ये लोग अब से कभी देशद्रोहियों का साथ नहीं देंगे.

इसके बाद आईजी साहब ने एक लिखा हुआ प्रेस स्टेटमेंट सभी को बाँट दिया. आईजी साहब ने कहा कि इन दोनों पूर्व नक्सलियों की सुरक्षा के लिहाज़ से पत्रकारों को इनसे कुछ पूछने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. और अब आप लोग जा सकते हैं. उन्होंने सभी पत्रकारों से कहा कि इस खबर को प्रमुखता से छापा जाए. सभी पत्रकार उठ कर बाहर आने लगे. मैंने कहा कि एक मिनट रुकिए. सब खड़े रहे. मैंने कहा साहब मुझे बस एक बात पूछनी है. आईजी साहब ने कुछ क्षण सोचा और फिर उन्होंने मुझे बस एक बात पूछने की इजाजत दे दी. मैंने बस्तर की आदिवासी बोली में पूछा 'इव घिसिड मीकिन बेनूर इत्तौर' अर्थात यह कपडे तुम्हें किसने दिये? लड़का तो घबरा गया पर लड़की ने भोलेपन से आईजी साहब की तरफ आँखें घुमा कर कहाँ 'वेर साहब इत्तौर' अर्थात इस साहब ने दी. मैंने कहा बस साहब मुझे अब और कुछ नहीं पूछना है. इसके बाद हम सभी लोग आईजी साहब के आफिस से बाहर आ गये .

दंतेवाड़ा के किसी पत्रकार को तो गोंडी आती नहीं थी. मैंने बाहर आकर सभी पत्रकारों से कहा कि भाइयों इन तथाकथित आत्मसमर्पित नक्सलियों का तो कहना है कि यह वर्दी तो उन्हें पुलिस ने बनवा कर पहनाई है. इसलिए पुलिस के दावे पर कैसे विश्वास किया जाय? इसके बाद किसी भी पत्रकार ने आत्मसमर्पण वाली वह खबर नहीं छापी.

बाद में वो आईजी साहब भ्रष्टाचार के मामले में काफी चर्चित हुए. निलम्बित भी हुए. उनके बारे में कहा जाता था कि वह अक्सर नकली आत्मसमर्पण करवाते थे, और सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिये जो पैसा भेजती थी वह आई जी साहब हड़प लेते थे. शुभ्रांशु चौधरी ने अभी अपनी नई किताब 'उसका नाम वासु था' में इन्ही आई जी साहब की ईमानदारी के कसीदे काढे हैं और अपने एक काल्पनिक नक्सली पात्र के मूंह से आईजी साहब की ईमानदारी की प्रशंसा करवाई है.

मुझे ठीक से तो नहीं पता की शुभ्रांशु ने आईजी साहब को अपने काल्पनिक नक्सली पात्र से क्यों क्लीन चिट दिलवाई है. लेकिन परिस्थिगत साक्ष्य यह कहते हैं की चूंकि शुभ्रांशु ने यह किताब भोपाल में बैठ कर लिखी थी. और यह वाले आई जी साहब भी भोपाल में ही रहते हैं. किताब लिखते समय अपने तथ्यों को क्रोस चेक करने के लिए शुभ्रांशु को उनके पास जाना पड़ता होगा. इस दोस्ती क्या फायदा आई जी साहब ने उठा लिया. शुभ्रांशु को भी इसमें क्या नुकसान होना था. दो वाक्य लिखने में कौन से हाथ दुखे जाते हैं.

इस किताब में एक जगह लेखक ने लिखा है की सिंगारम गाँव में जो उन्नीस आदिवासी मरे गए थे वे निर्दोष आदिवासी नहीं थे क्योंकि उनमे से सीते नामकी लडकी तो हत्याकांड के मुख्य आरोपी एसपीओ मडकम मुद्राज की पूर्व सहायक थी और यह मद्कम मुद्राज पहले नक्सली था और उस हत्या के समय सीते दरअसल आदिवासियों की मीटिंग कर रही थी .

इस हत्याकांड का मुकदमा हम लोग अभी भी छत्तीसगढ़ के हाई कोर्ट में लड़ रहे हैं . असल में एसपीओ मडकं मुद्राज और उसके साथियों ने गाँव पर हमला बोल कर उन्नीस आदिवासियों को मार डाला था। मरे गए आदिवासियों में चार लडकियां भी थीं .चारों लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया गया था. यहाँ शुभ्रांशु कहना चाहते हैं की देखो मार डाली गयी वह लडकी निर्दोष नहीं थी क्योंकि वह तो नक्सलियों की मीटिंग कर रही थी .इस प्रकार का लेखन तो दंतेवाडा के सस्ते पत्रकार भी एसपी से पैसे खाकर नहीं करते परन्तु शुभ्रांशु ने इस किताब के द्वारा सरकार की सारी क्रूर हरकतों को सही ठहराने की भी शरारत पूर्ण कोशिश की है.

इसी प्रकार से एक अन्य जगह पर लेखक ने लिखा है कि गांधीवादी लोगों ने (वह गांधीवादी मैं ही हूँ ) सलवा जुडूम द्वारा जला दिये गये नेन्द्रा नामक गाँव को दोबारा बसाया था . वहां का पूर्व सरपच तमैय्या असल में पहले नक्सलियों के साथ मिल कर एर्राबोर बाज़ार लूटने की वारदात में शामिल था , और इसलिए वह डेढ़ साल जेल में भी रहा . लेखक के अनुसार यह बात तमैय्या ने लेखक को कभी नहीं बताई हांलाकि वह उसके गाँव में उसके साथ कई दिन तक रहा .

हम नेन्द्रा गाँव के आदिवासियों को आंध्र प्रदेश और बस्तर के जंगलों से वापिस लाये थे और दोबारा उनके गाँव में बसाया था. और हमने सरकार को चुनौती दी थी कि अगर सरकार इन आदिवासियों को मारना चाहती है तो सरकार को पहले हमारी हत्या करनी पड़ेगी . सब जानते हैं की नेन्द्रा गाँव में आदिवासियों को सलवा जुडूम और सरकार के ज़ुल्मों से बचाने के लिए किये गए हमारे मानव कवच के प्रयोग से सरकार की कितनी थू थू हुई थी. इसलिए शुभ्रांशु इस किताब के माध्यम से यह कहने की कोशिश करना चाह रहे हैं की देखो गांधीवादी लोग भी असल में नक्सलियों की रक्षा कर रहे थे. इस तरह की मनगढ़ंत बातों से किसको फायदा होगा सभी जानते है.

इस किताब के द्वारा दरअसल शुभ्रांशु ने सरकार के मूंह पर लगे सारे कीचड़ को धोने की कोशिश करी है . और उन सारे लोगों की विश्वसनीयता पर कीचड उछाला है जिनसे सरकार को परेशानी हो रही है . उदहारण के लिये इस किताब में बिनायक सेन के बारे में जो भी लिखा गया है वह तो हूँ- बहु पुलिस की कहानी है. और यह कहानी तो रोज़ छत्तीसगढ़ के अखबारों में छपती थी . इसको जानने के लिये किसी नक्सली से मिलने की ज़रूरत थोड़े ही है . यह कहानी तो रायपुर को कोई भी पुलिस वाला एक डोसा खाकर आपको आराम से सुना देता. जहां तक नक्सलियों का सवाल है हमने भी नक्सली देखे हैं . लेकिन कोई भी नक्सली कभी अपने साथ करने वाले लोगों की सूची किसी पत्रकार को नहीं देता .लेकिन शुभ्रांशु की किताब तो कमाल है, उसमे नक्सली खुद हवाई जहाज में बैठ कर दिल्ली आकर रेस्टोरेन्ट में बैठ कर डोसा खाते हुए अपने साथियों की लिस्ट दिल्ली में रहने वाले शुभ्रांशु नामक एक पत्रकार को बताते हैं .

दूसरी एक समझने वाली बात. शुभ्रांशु सीजी नेट नामक एक इंटरनेट ग्रूप चलाते हैं . उस ग्रूप पर शुभ्रांशु की मदद से बिनायक सेन की रिहाई के लिये ज़ोरदार अभियान चलाया गया. अगर शुभ्रांशु को बिनायक के जेल जाते ही पता चल गया था कि बिनायक नक्सलियों के पत्रवाहक (कूरियर) हैं तो उसी समय शुभ्रांशु को उस अभियान से अपने सी जी नेट को अलग कर लेना चाहिये था .लेकिन अब जाकर शुभ्रांशु चौधरी का ह्रदय परिवर्तन कैसे हो गया? छत्तीसगढ़ में सब जानते हैं कि आजकल शुभ्रांशु चौधरी जी रमन सिंह के साथ मंच साझा करने लगे हैं और अब अचानक शुभ्रांशु को ख्याल आया है कि अरे मुझे तो एक नक्सली ने यह कहा था कि बिनायक सेन तो हमारे कूरियर हैं. और छात्तिसगढ़ में काम कर रहे गांधीवादी भी दरअसल नक्सलियों की रक्षा करने में लगे थे.

इस सब को लिखने से ना तो बस्तर की जनता का फायदा होगा. ना देश में नक्सलवाद को समझना चाह रहे लोगों को इस से कोई नई जानकारी मिलेगी. हाँ पुलिस और छत्तीसगढ़ सरकार के कई मूर्खतापूर्ण दावे जो वह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बारे में करती थी कि यह लोग तो नक्सलियों के लिये काम करते हैं उन्हें सच साबित करने की नाकाम कोशिश इस किताब में की गयी है.

हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

माखनलाल पत्रकारिता विवि में सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में प्रवेश शुरू, इस सत्र से ‘फिल्म पत्रकारिता’ भी

भोपाल : माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय द्वारा संचालित सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्रारम्भ हो गया है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में आवेदन करने की अंतिम तिथि 31 जनवरी 2013 निर्धारित की गई है। विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक सत्र 2012-13 में वैब संचार, वीडियो प्रोडक्‍शन, पर्यावरण संचार, भारतीय संचार परम्पराएँ, योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार तथा फिल्म पत्रकारिता जैसे विषयों में सांध्यकालीन पी.जी. डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। इस वर्ष फिल्म पत्रकारिता का नया पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। पाठ्यक्रम विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के साथ-साथ नौकरीपेशा व्यक्तियों, सेवानिवृत्त लोगों, सैन्य अधिकारियों तथा गृहिणियों के लिए भी उपलब्ध होंगे।

विश्वविद्यालय द्वारा छः सम्भावनाओं से भरे क्षेत्रों में सांध्यकालीन पी.जी.डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। विश्वविद्यालय का सांध्यकालीन वैब संचार पाठ्यक्रम अखबारों के ऑनलाईन संस्करण, वैब पोर्टल, वैब रेडियो एवं वैब टेलीविजन जैसे क्षेत्रों के लिए कुशलकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है। वीडियो कार्यक्रम के निर्माण सम्बन्धी तकनीकी एवं सृजनात्मक पक्ष के साथ स्टुडियो एवं आउटडोर शूटिंग, नॉनलीनियर सम्पादन, डिजिटल उपकरणों के संचालन आदि के सम्बन्ध में कुशल संचारकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से वीडियो प्रोडक्शन का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। पर्यावरण आज समाज में ज्वलंत विषय है। पर्यावरण के विविध पक्षों की जानकारी प्रदान करने एवं इस क्षेत्र के लिए विशेष लेखन-कौशल विकसित करने के उद्देश्य से पर्यावरण संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। योग, स्वास्थ्य और आध्यात्म के क्षेत्र में व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने तथा इस क्षेत्र के लिए कुशल कार्यकर्ता को तैयार करने के उद्देश्य से योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। भारतीय दर्शन एवं प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों में मौजूद संचार के विभिन्न स्वरूपों की शिक्षा एवं वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में उनके सार्थक उपयोग की दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय संचार परम्पराओं में सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। इस वर्ष सिनेमा के विविध क्षेत्रों में रिपोर्टिंग, फिल्म समीक्षा एवं फिल्म लेखन की दृष्टि से फिल्म पत्रकारिता का नया पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिये 15 स्थान निर्धारित किये गये हैं।

पाठ्यक्रमों में प्रवेश स्नातक परीक्षा में प्राप्त अंकों की मेरिट के आधार पर दिया जायेगा। पाठ्यक्रमों की अवधि एक वर्ष है। प्रत्येक पाठ्यक्रम का शुल्क 10,000 रुपये रखा गया है जो विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित किश्तों में देय होगा। प्रवेश हेतु विवरणिका एवं आवेदन पत्र विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर में 150/- रुपये (अ.ज./अ.ज.जा. के लिए 100/- रुपये) जमा कर प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.mcu.ac.in से विवरणिका एवं आवेदन पत्र डाउनलोड कर निर्धारित राशि के डी.डी. के साथ आवेदन जमा किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए टेलीफोन नम्बर 0755-2553523 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

प्रेस विज्ञप्ति

हरिभूमि का रायगढ़ एडिशन जल्द लांच होगा, अमर उजाला का युवान कल होगा रीलांच

राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हरिभूमि’ छत्तीसगढ़ में अपना विस्तार करते हुए रायगढ़ एडिशन जून में लॉन्च करने वाला है. इसको लेकर संस्थान में तैयारियां जारी है. यह जानकारी हरिभूमि के मैनेजिंग एडिटर डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने दी. उनका कहना है कि वे इस एडिशन के माध्यम से झारखंड और उड़ीसा के हिंदी पाठकों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेंगे. उड़ीसा में हिंदी अखबार की कमी है, हम उस कमी को पूरा करेंगे. छत्तीसगढ़ में पहले से अखबार का रायपुर एडिशन प्रकाशित हो रहा है. अखबार की योजना वर्ष 2012 में मध्यप्रदेश के भोपाल और ग्वालियर एडिशन लॉन्च करने की थी जो कि लांच नहीं हो पाया.

उधर, अमर उजाला समूह अपने साप्ताहिक अखबार युवान को कल यानि 26 जनवरी के दिन रीलॉन्च कर रहा है. साप्ताहिक अखबार युवान स्कूली बच्चों के बीच पिछले दो वर्षों में खासा पसंद किया जा रहा है. प्रबंधन अखबार को नये कलेवर और नये तेवर के साथ फिर से मार्केट में लाने जा रहा है. प्रबंधन की योजना युवान का और विस्तार करने की है. युवान