‘प्रयुक्ति’ के संवेदनहीन मालिक संपथ की कुछ कहानियां पढ़िए

Mukund Mitr : प्रयुक्ति के संवेदनहीन संपथ की पढ़िए कहानियां… 1- सन्तोष कुमार पांडेय का किस्सा यह लड़का करोलबाग से नोएडा ऑफिस डी 33 सेक्टर 2 आने के बाद बतौर पियून भर्ती किया गया। इस गरीब लड़के का करीब 16 हज़ार रुपये बकाया है। इसने सम्पथ के कुत्ते की टट्टी तक उठाई है। इसने पैसा नहीं दिया। मकान मालिक ने इसके घर पर ताला बंद कर दिया। Continue reading

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और अब बंद हो चुके ‘प्रयुक्ति’ अखबार के संपादक मुकुंद भी हुए बागी! पढ़ें उनकी भड़ास

Mukund Mitr : पत्रकारिता… जी हां। दुनिया का सबसे अच्छा करियर। मगर अधिकांश अखबारी घरानों और नए नवेलो ने इसे शोषण की कब्रगाह में तबदील कर दिया है। दोस्तों, मैं बहुत जल्द 80 के दशक से अब तक की पत्रकारिता पर बहुत जल्द यहीं पर लिखूंगा… बहीखाता… Continue reading

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नोएडा पुलिस से डरा ‘प्रयुक्ति’ का मालिक संपत सेलरी देने को हुआ मजबूर

बार-बार ठिकाने बदल कर अखबार निकालने वाला प्रयुक्ति का मालिक संपत गत मंगलवार को नोएडा के सेक्टर-20 थाने में लाया गया। इससे पहले उसे दो घंटे सेक्टर-15 की गोल चक्कर चौकी में पुलिस ने बैठाए रखा। लगातार लेट हो रही सेलरी के चलते नौकरी छोड़कर जा चुके कर्मचारियों का पैसा तो फंसा ही हुआ है, संस्थान में डटे चमचे पत्रकारों को भी समय पर पैसा नहीं मिल रहा। जिन लोगों को चेक दिए हैं, वह घड़ाधड़ बाउंस हो रहे हैं। कुछ लोगों को तो अभी संपत ने चेक भी नहीं दिए हैं। Continue reading

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‘प्रयुक्ति’ अखबार बंद, फंसी मीडियाकर्मियों की सेलरी

चमचे पत्रकार अब भी कर रहे अखबार बंद होने का खंडन… मार्च में दिल्ली से नोएडा शिफ्ट हुआ प्रयुक्ति अखबार लंबे समय से चली आ रही पैसे की तंगी की वजह से छपना बंद हो गया है। 17 सितंबर के बाद से प्रयुक्ति अखबार बाजार में आना बंद हो गया है। इसके चलते संस्थान में काम करने वाले कई मीडियाकर्मियों की दो से तीन माह की सेलरी फंस गई है। सेलरी में लगातार हो रही देरी की वजह से यहां काम करने वाले मीडियाकर्मियों ने अखबार के मालिक संपत से काम करने से मना कर दिया था। उसी दिन से अखबार छपना बंद हो गया है। Continue reading

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‘प्रयुक्ति’ अखबार वित्तीय संकट से घिरा, नौकरी छोड़ रहे मीडियाकर्मी, लग सकता है ताला!

कर्मचारियों द्वारा किए गए मुकदमों के कारण कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते संपत.

प्रयुक्ति अखबार में आर्थिक संकट और कर्मचारियों का शोषण लगातार जारी है। संस्थान में कार्यरत कर्मचारी अपनी परेशानी किसी से कह नहीं सकते, क्योंकि उनकी सेलरी रोक दी जाएगी। काम छोड़ने के बावजूद एक महिला कर्मचारी का फुल एंड फाइनल अभी तक नहीं किया गया है। Continue reading

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प्रयुक्ति जैसे दिशाहीन अखबार का एक साल से निकलना चौंकाने वाला सच है!

पत्रकारिता की दुर्दशा देख रोना आता है… खास तौर से हिंदी पत्रकारिता का हाल बेहद बुरा है। बात कर रहा हूं प्रिंट मीडिया की। इलेक्ट्रानिक पर बात करना तो समय जाया करना है। हाल बुरा है..कुछ सरकार के कारण, कुछ अखबार मालिकों के कारण, कुछ तथाकथित संपादकों के कारण और कुछ इस प्रोफेशन में घुस आए ऐसे लोगों के कारण जिन्हें इस पेशे के तय मानदंडों से कुछ लेना-देना नहीं है। उन्हें मतलब है तो सिर्फ नेताओं और अधिकारियों के साथ तस्वीरें खिंचाने, उन तस्वीरों को छापने और फिर उसे दिखा कर राजनीतिक गलियारों में घुस अपना स्वार्थ साधने व अपनी दुकानदारी चलाने से।

यकीन नहीं आता तो इसका जीता जागता उदाहरण है राजधानी दिल्ली से प्रकाशित होने वाला दैनिक अखबार प्रयुक्ति। सच, सोच और समाधान के टैग के साथ पाठकों के प्रति प्रतिबद्धता का ढ़िढोरा पीटने वाले इस समाचारपत्र के 18 मई, 2017 के अंक में मुख्य पृष्ठ पर एक भी खबर नहीं है। है तो सिर्फ अपना बखान…नेताओं के साथ समाचारपत्र के समूह संपादक की फोटो और उनके जन्मदिन की सूचना। अब आपही बताइए कि इन चीजों से आम पाठक का क्या लेना देना है। अखबार ने एक वर्ष पूरे किए, बहुत अच्छी बात है। समूह संपादक का जन्मदिन है, ठीक है, लेकिन खबर कहां है।

यदि किसी पाठक ने 17 मई को यह अखबार 3 रुपए में खरीदा होगा तो क्या यह पढ़ने के लिए कि संपादक का जन्मदिन कब है। क्या यह पाठकों के साथ विश्वासघात नहीं है? अखबार की कथनी और करनी में फर्क देखिए। अखबार छापता है कि हर खबर रही आपकी… लेकिन पेज 1 और 6 व 7 पर एक भी खबर नहीं है। अखबार लिखता है कि पत्रकारिता के पावन यज्ञ…यज्ञ क्या है समूह संपादक का गुणगान। दावा है कि अखबार ने पूरे साल पत्रकारिता के प्रतिमान गढ़े….कौन से प्रतिमान? गाल बजा दिया और गढ़ लिए प्रतिमान। ऐसे ही लोगों ने पत्रकारिता की मां बहन एक कर रखी है। ऐसे ही अखबार की वजह से पत्रकारों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। न नेता भाव देता है और न ही अधिकारी इज्जत।

अखबार ने अफसोस जाहिर किया है कि प्रयुक्ति शब्दकोश से मुक्त नहीं हो पाया। और इसका ठीकरा आज की शैक्षणिक व्यवस्था पर यह कहते हुए फोड़ दिया है कि शैक्षणिक व्यवस्था ने जैसे पत्रकार पैदा किए हमने उसी से काम चलाया। यानी पूरे पत्रकार बिरादरी को कठघरे में खड़ा कर दिया। क्या बेशर्मी है…वहां काम करने वाले कई पत्रकारों व उनकी काबिलियत को मैं जानता हूं। कई तो राष्ट्रीय समाचारपत्र में महत्वपूर्ण पदों पर रह कर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं। प्रतियुक्ति जैसे घटिया अखबार (जो न तो कहीं दिखता है और न बिकता है) में मजबूरी में काम कर रहे हैं। दिल भरा पड़ा है लेकिन कुछ बोल नहीं सकते क्योंकि नौकरी चली जाएगी…। टैग लाइन सच, सोच और समाधान पर वहीं काम करने वाले लोग बाहर आ कर मजाक उड़ाते हैं। कहते हैं कौन सा सच है…सोच से तो दूर दूर का वास्ता नहीं और समाधान काहे का..।

प्रयुक्ति जैसे दिशाहीन अखबार का एक साल से निकलना चौंकाने वाला सच है। आखिर क्यों निकल रहा है यह अखबार? आड़े तिरछे तरीके से। प्रयोग के नाम पर क्या स्वस्थ्य पत्रकारिता की घज्जियां उड़ाने की अनुमति किसी को मिलनी चाहिए। ऱाष्ट्रीय अखबार की एक गरिमा होती है जिसे चूर चूर कर रख दिया है प्रयुक्ति ने। अजीबो गरीब हेडिंग…कमजोर कंटेंट, बीमार खबरों का चयन, रसहीन प्रस्तुति..। कहीं भी कुछ भी छाप दो। क्या कहा जाए..कभी मौका लगे तो 3 रुपए खर्च कर अखबार खरीद पढ़िएगा…या फिर कहीं दिख जाए (यदि) तो पढ़िएगा…। हकीकत समझ आ जाएगी। समूह संपादक ने एक साल के सफर का मूल्यांकन मांगा था…ईमानदारी से दिया है। संपादक को अच्छा लगे या बुरा मेरी बला से …वैसे लगेगा तो बुरा ही। पर परवाह किसे है।

‘प्रयुक्ति’ में कार्यरत एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. लेखक ने अपने नाम-पहचान को गोपनीय रखने का आग्रह किया है.

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‘प्रयुक्ति’ अखबार के मैनेजमेंट पर कई आरोप लगा महिला पत्रकार ने कहा गुडबॉय, पढ़ें इस्तीफानामा

The Chairman
Prayukti
21 B/9, Rohtak Road, Opp LIC Building,
Karol Bagh, New Delhi-110005

Sir

With a profound feeling, i, Ms Deepti Angrish, am confessing that coerced by the callous, inhuman, insensitive, merciless and intolerant behavior of the head and the team prayukti, i am taking the decision of leaving the publication. Despite of my hard work and loyalty towards the publication, i was humiliated at each and every moment, at each and every work of mine. This kind of torturous behavior started after the couple of days of my joining, which i ignored and kept working honestly and diligently. Following are the few instances (although there are actually numerous) which i can recall:

1. Despite of long durations of working from 12:00 Noon till 8 or 9 or 10 PM everyday including Sundays, i was termed as lazy and good for nothing. The exact words were “popular hone se ya sahityakar hone se kuchh nahi hota, prayukti mein talent bolta hai. Magazine ke log lazy hote hain par ye daily newspaper hai…” If this had been the case, then why after looking on my Facebook pages i was invited to join prayukti, the time when i was already working with some other publication or why it was not pointed out immediately after 15 days of my joining? I write small articles and that too not very often but the ones who call themselves  as ‘sahityakars’ are working as proof readers only.

I pointed out n number of times the reasons for the delays but they were ignored smartly. My reasons were: lack of sense of responsibility, disinterest from the work, lack of time management amongst the team members. Even if the matter/content of pages were given to the page designers within or before the mentioned time, they used to overlook them and used to work on them with their last priority. On one day (7.10.2016 Friday) when there was a delay by me in giving the matter to them by half an hour, then Mr Sampat Kumar Surppagari was informed telephonically about this, on which i was highly humiliated. The very next day (8.10.2016 Saturday) when i gave the current and next day matters to them much before the time, the pages were not ready but the designers were ready with their lame excuses and Mr Sampat Kumar Surppagari kept mum on the matter. This might be the excuse for not giving the extra penny to a worker who is asked to work like a laborer without any complaints.

Also as i could understand, you have no consideration for the safety of your female staff that used to leave in the late evening/night hours. Either my family used to pick me up at that time or i used to go by cabs by paying heavy charges in those odd hours. In reality, who is responsible for these delays and mismanagements?

2. In continuation of the above point, i would also like to point out that the male members here do not have manners to talk to a lady. In one of the instances, Mr Ashok Priyadarshi screamed on me and said “bakwas mat karo”, and on putting this in front of the panel comprising of the head, i was given a look as if i were a culprit. Again my vision says, the one who created these misunderstandings between me and Mr Ashok Priyadarshi and other colleagues was none other than the management itself.

3. The feature work has always been like a football, the lucky one gets it and the rest others are forced to regret on their failure of pleasing the boss. To make Mr Ashok Priyadarshi feel low (which i realized after my joining), i was appointed as the feature editor and Ms Priya was already being used as a pawn. And now it was my turn, so Ms Rajni Sharma entered into the field. Is’nt this a political game of management which is not letting feature team work as a team?? Is this the “divide and rule” policy?

4. On August15th, 2016, the launch of the prayukti in paper edition was done in Andhra Bhawan, Delhi.To make me feel low, i was not given any kind of recognition at all although the cleverly clicked pictures would say a different story.

5. A sweet tradition of celebrating everyone’s birthday is followed here. But for me it turned out to be bitter although i gave sweets to everyone on that very day (August 21st, 2016). For no clear reasons, a birthday cake (which was bought on the same day) was cut but on the next day at 9:00 PM when most of the staff had left! To be a tradition followed, thereafter, a gift is given by the head but it slipped out of their memory in my case. This shows the enjoyment one gets in humiliating others! Let me say it again…the cleverly clicked pictures would say a different story!

6. In every Saturday official meeting, i was harassed and humiliated about my work and my way of working. I was told different set of rules and different duties used to be allotted to me there but everything used to change drastically after stepping out of the conference room. On October 8th 2016, i was asked to proof read and edit the erroneous pages of the Sunday supplement (October 9th 2016) of which i was strictly told Ms Rajni Sharma was incharge and so i should not intervene. I did that dedicatedly but again the head’s discreditable conduct embarrassed me in front of everyone. I wasmockingly and sarcastically told, “Why you did it when i had asked you not to intervene?” My dedication is well reflected in this Sunday’s issue which has no comparisons with the erroneous last Sunday’s supplement issue (October 2nd, 2016) (You must have got the negative feedbacks!). If supplement pages are compared to the daily pages, then it should be noted the content is so weak that it hardly catches the reader’s eye.

From your recent post on official Facebook page (October 9th 2016), i came to know Ms Meenakshi has been handling page 12 of the main issue since a few days. But only on October 8th 2016, i was given this information and till 7.10.2016, i was handling everything of Page 12. Also the responsibilities of other pages and other duties, i continued to do them till 10:00 PM of October 8th 2016. Ms Meenakshi and her designers’ team also bossed me and said to proof read and edit that page on that very day!

So i was always kept confused and was treated like a doormat on which you and anyone can put any blame and walk away easily! Still i used to carry on with a fresh spirit thinking that one fine day things would change….

7. Also, i had never taken any leave in my stay here. But when i took it for two days (28-29thSeptember, 2016) and informed my unexpected and unavoidable reason on the same day on the official Facebook page, i had to face the inhumane and torturous behavior of the panel when i joined. Although, on the same day, an insensitive comment saying “aapne jaane se pehle kisse puchha” was put by Mr Mukund Mitr. I would like to ask the head that what a casual leaves mean.

8. In other instance, when on August 28th 2016, i lost my Access card in the evening, i realized this immediately and started asking my colleagues, housekeeping people, peons and sweepers there. I reported it to Mr R P Rao and then to Mr Sampat Kumar Surppagari. After 2-3 days, i was tagged as an irresponsible on the official Facebook page and therein, was informed to collect it from the Accounts Department on the deposit of fine of Rs 500. The person from housekeeping who was fired with no reason clearly told me that the card was given by someone from desk team to Mr R P Rao on the same day itself! I didn’t utter a word but watched their behavior. If i realized the loss on the same moment, then can i be tagged as irresponsible and if yes, then the latent reason for this was that i wasn’t given any seat, system or cubicle and so had to vacate the seat if the person concerned came! I never complained about the seat as i always believed in working irrespective of designations, tags and cubicles. Moreover, when i asked the Access card back from the authorities and deduct the fine amount from my salary, i got the ambiguous and enigmatic answer that they needed to ask the head whether it is to be returned or not!!

9. Its good to perform the religious rituals but being religious and being human are two different things!! God loves those people who love His people….

10. I tried my best and always gave my best to prayukti. My strong vision and thoughts adorned the feature pages! With my efforts, hard work and of course “popularity”, i connected many well-established people in this new venture of “ours”. I selflessly worked as if prayukti was my own baby and so i even used to forget my lunch hours many a times. Even after reaching home in the late hours of evening, i dedicatedly and religiously used to work for it till late night (that left only 3—4 sleeping hours). A few night hours and morning hours were the only hours in which i used to hurriedly do the required routine work for my home and then around 12:00 noon, again the bonded routine of prayukti used to start. My dedication and responsible behavior is well illustrated by the fact that that i have already done the advance work for the coming Monday, Tuesday, Wednesday and Saturday (10-12th October, 2016 & 15th October, 2016) and submitted on Saturday (8th October, 2016) itself.

11. Also, the payment to freelancers who worked on my goodwill to make prayukti worth its name was never made till date!! The fake resolutions on the same were made in the official meetings.

12.  The seniors, who flatter you on your face or do sugar coated talks with you to save their jobs, have a different face on your back. At your back they address you with some other unpleasant names. Real people are those who respect you even at your back!

I am very confident and proud to say that no one can beat me in my work, be it supplement incharge’s or designers’! The quality of the product is incomparable to what it was before my joining. But in such kind of insensitive and torturous environment what kind of perfection is expected from any human being? To err is human….but different rules for error committing humans too! For me, on my one spelling mistake that got published, i was charged with a fine and a receipt of Rs 500 was handed over to me. This rule was made for the very first time and existed only for me! To forgive is divine…..so the head was acting divine to all the other error committing humans. Let me remind in the editorial page no. 7 of 11th August 2016 issue, highly designated editors skipped a big error and intentionally didn’t bring in the notice when it already got published that the name of chairman, SAMPAT was written as SANTAP. Or was this a very small mistake of big designated people which shouldn’t be bothered about and overlooked?

The theme of prayukti is “SACH, SOCH AUR SAMADHAN” which I am sorry to say is not at all reflected in your behavior.  You could not tolerate SACH, stopped the SOCH of your employees and there is no SAMADHAN to it!! These should not have been words, but should have been seen in your action. The feature pages of Prayukti have grown up in my parentship and now since the new caretaker has been appointed, parents are of no use!! So before a well-crafted melodrama ends, i would like to say, “in order to free myself from the mental slavery of yours, to regain my confidence and to feel again what life is, i am breaking these invisible shackles.”

You are requested to clear all my dues including my salary from 1.10.2016 till 8.10.2016 and the money of Provident Fund of employees and credit in my ICICI bank account as soon as possible.

All the best
An Honest and Loyal employee
Ms Deepti Angrish

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‘संपत जी, आपसे पुन: अपनी जून माह की सेलरी और अपना पीएफ क्लीयर करने का आग्रह करता हूं’

Sachin Choudhary : श्रीमान संपत कुमार सुरप्पागारी (चेयरमैन प्रयुक्तिा हिंदी दैनिक) जी, अखबार लॉन्च करने के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं। अखबार सालों-साल चले और नित नई उंचाइयों को छुए। सर व्यस्त कार्यक्रम होने से चलते शायद आप भूूल गए होंगे इसलिए मैं आपको एक बार याद दिलाना चाहता हूं। जिस दिन (20 जून 2016) मैं त्याग पत्र देने प्रयुक्ति कायार्लाय आया था उस दिन आपने मुझे कहा था कि सचिन तुम्हारे 1500 रुपए पिछले महीने के बकाया और इस माह की सैलरी मैं आपके खाते में एक जुलाई को डलवा दूंगा, लेकिन सर ऐसा हुआ नहीं।

लगभग दो माह बीत जाने के बाद आज मैं आपसे पुन: अपनी जून माह की सैलरी और अपना पीएफ क्लीयर करने का आग्रह करता हूं। आपने पीएफ के लिए कहा था की कंपनी दो माह बाद पीएफ क्लीयर करती है। सर मैं आशा करता हूं कि आप मेरी सैलरी और मेरा पीएफ क्लीयर कर देंगे और मेरी पोस्ट का जवाब देंगे।

सचिन चौधरी
पूर्व वरिष्ठ उपसंपादक
हिंदी दैनिक प्रयुक्ति
नई दिल्ली

‘प्रयुक्ति’ अखबार में काम कर चुके पत्रकार सचिन चौधरी की एफबी वॉल से. इस स्टेटस पर स्थानीय संपादक मुकुंद का आया जवाब और उनके जवाब का सचिन द्वारा दिया गया प्रति जवाब इस प्रकार है…

Mukund Mitr सचिन, आपकी पोस्ट पढ़ी। आपने ड्यूज के संदर्भ में लिखा है। ऐसा क्यों हुआ, यह आपको मालूम है, आपने वो स्थितियां साफ नहीं कीं। आप अचानक छुट्टी पर गए थे। जब आप नहीं लौटे तो सहयोगियों ने आपको फोन किया। आपने उनसे कहा कि आपकी पत्नी बीमार हैं। इसके बाद आप दफ्तर नहीं आए और अचानक एक दिन (आपने अपनी पोस्ट में तारीख का उल्लेख किया है।) इस्तीफा देने आए। आपकी चेयरमैन सर से मुलाकात भी हुई। आपने उनसे बातचीत में स्वीकार किया कि आपकी पत्नी की तबियत खराब नहीं थी। आपने झूठ बोलकर छुट्टी ली। यह भी कि आपने अपनी छुट्टी पर स्वीकृति नहीं कराई। दूसरा आप यह कहते रहे कि आपका हिंदुस्तान में हो गया है। बहरहाल हमें इससे मतलब नहीं है कि आपका कहां हुआ है। आपने लांचिंग की तैयारी के समय बेवजह झूठा बहाना बनाकर छुट्टी ली, यह बिलकुल गलत तरीका है। यह कोई भी मैनजमेंट हो, स्वीकार नहीं कर सकता। दूसरा आपका रवैया कुछ सीनियर्स के साथ अच्छा नहीं रहा। मुझे आपकी पोस्ट पढ़कर पीड़ा हुई है। पीड़ा इसलिए कि आपने यहां आने के लिए मेरे दोस्त श्री अरुण खरे जी से एप्रोच करी थी। आपको याद होगा, आपका इंटरव्यू मैंने ही लिया था और मैंने करा भी दिया था। आपने ज्वाइन करने के बाद ही कुछ अनावश्यक टिप्पणियां वरिष्ठ साथियों के साथ शुरू कर दी थीं। फिर भी मैनजमेंट ने आपको बर्दाश्त किया। मैंनजमेंट ने आपको नहीं हटाया। आप खुद अलग हुए हैं। नियमतः आपको एक माह का नोटिस देना चाहिए था, वो आपने नहीं दिया, तो किस हैसियत से ड्यूज क्लीयर करने की बात कर रहे हैं।
-मुकुंद
स्थानीय संपादक
प्रयुक्ति

Sachin Choudhary : सम्मानीय मुकुंद जी, स्थानीय संपादक, मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि संस्थान मुझे नहीं बल्कि आपको बर्दाश्त कर रहा है। जिससे आप और प्रयुक्ति का पूरा स्टाफ भलीभांति जानता है। जब आपको बर्दाश्त करने की सारी हदें पार हो गई थी तब आपको भरी मिटिंग में ‘सेटअप’ कहकर आपसे इतिश्री कर ली गई थी। आप कहते हैं कि संस्थान ने मुझे बर्दाश्त किया। आपकी वजह से ही बाथरूम में ताला जड़ा गया था, जिससे पूरे स्टाफ को काफी परेशानी हुई और आप कहते हैं की संस्थान मुझे बर्दाश्त कर रहा है। आफिस में आपकी स्वरों की ध्वनि इतनी तेज होती है कि एडमिन से लेकर रिपोर्टर तक आपसे परेशान है और आप कहते हैं कि संस्थान ने मुझे बर्दाश्त किया। अगर सैलरी से आपके दस रुपए बाकि रह जाते हैं तो आप शाम तक 10 बार ही अपने पैसे मांग लेते हैं और मुझे दो माह बाद पैसे मांगने पर नसीहत दे रहे हैं। अब बताओ संस्थान ने मुझे झेला या आपको झेल रहा है। रही काम की बात तो तो इसी संस्थान में मुझे अच्छे काम के लिए एवार्ड दिया गया था जिसकी गवाह उपरोक्त तस्वीर है।

पूरे मामले को जानने के लिए इसे भी पढ़ें….

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कैसे-कैसे मीडिया संस्थान और मीडिया में नौकरी की ये कैसी शर्तें?

यह कोई प्रयुक्ति पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी है जो अपने सेवा करार में बताती है कि कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के तहत पंजीकृत है। यह लोगों को नौकरी पर रखती है तो उनसे “सेवा करार” करती है। इसमें यह नहीं बताया गया है कि सेवा के बदले क्या दिया जाएगा पर यह प्रमुखता से लिखा है कि बांड की तारीख एक साल (12 महीने) नौकरी जरूर करूंगा। यही नहीं, इसमें यह भी लिखा है कि अगर बांड पर दस्तखत करने वाला ऐसा नहीं कर पाया तो उसे एक लाख रुपए बतौर पेनल्टी देना होगा।

अभी और सुनिए, इसके लिए कोई दस्तावेज नहीं दिए जाएंगे। वैसे तो ऐसी कंपनी में काम करने के रिलीज लेटर और अनुभव प्रमाणपत्र का क्या मतलब होगा पर कंपनी ने खुल्लम खुल्ला यह एलान कर रखा है कि अगर आपने एक साल नौकरी नहीं की तो कोई सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा। कंपनी की मनमानी और एकतरफा सोच इतनी ही नहीं है। कंपनी अपने यहां सेवा देने वालों से यह भी लिखवा लेती है कि वह कंपनी या कंपनी के अधिकारियों को किसी भी ढंग से बदनाम नहीं करेगा और अगर ऐसा कुछ किया गया तो यह भी सेवा शर्तों का उल्लंघन होगा। इन शर्तों पर नौकरी करने वाले लोगों को कंपनी से कुछ शिकायत थी जिसकी सूचना Bhadas4Media.com पर प्रकाशित हुई तो कंपनी ने अपनी इन सेवा शर्तों को सार्वजनिक किया जैसे इनकी कोई कानूनी अहमियत हो। और इसी आधार पर कंपनी ने बताया है कि उसने किसे किस कारण से नौकरी से निकाल दिया। आइए, एक नजर उसपर भी डालें…

”…As per the story you mentioned some names for whom we didn’t paid dues…let me talk about it Mr Varun Aryan took Laptop from the Company & 5,000 rupees from employee fund till the date he didn’t returned his assets though we cleared his dues with single paisa..”

कंपनी दावा कर रही है कि 5,000 रुपए और लैपटॉप ‘सेवक’ के पास होने के बावजूद उसके बकाया का भुगतान कर दिया गया। जो पहली नजर में ही अविश्वसनीय प्रतीत हो रहा है। अंग्रेजी इतनी शानदार है कि कंपनी की ओर से दावा करने वाले की योग्यता का खुलासा हो जा रहा है और समझ में आ रहा है कि कोई भी समझदार आदमी ऐसी बातें नहीं करेगा। फिर भी यह एक रजिस्टर्ड कंपनी है।

”…Then Coming to Mr Rajshekhar Mishra, is the one who is not ready to respect the boss more over not ready to work till edition gets finalised what is the use ?? we said him to get lost & he was with us for more days on his wish and we cleared all his dues, let us send the copy to you…”

कंपनी खुद ही कह रही है, we said him to get lost इसके बावजूद कर्मचारी अपनी इच्छा से ज्यादा समय तक बना रहा फिर भी हमने पैसे दिए। भइया कंपनी चला रहे हो या खैरात बांट रहे हो?

Now Turn Mr Sachin Choudhary, when we are ready to launch he took leave by saying his wife is ill & when we terminated him he is saying my wife is not ill and I said lie, then when we terminate one person how can we clear his dues, moreover he is having his one year employment bond with us.

पत्नी बीमार थी तो नौकरी से निकाल दिया। अब वह कह है कि मैंने झूठ बोला। पत्नी की बीमारी नौकरी छुड़ा देगी तो बचाने के लि झूठ बोलना ही पड़ेगा। क्या चाहते हो – नौकरी छोड़ दे। तो यही बोलो। पत्नी बीमार होने का उपयोग करोगे तो कर्मचारी बेचारा क्या करे?

Last but not the least Mr Sajjan Choudhary, same with him, when he signed one year bond & all of sudden he told he is resigning then management took time to approve his resignation and its not even a month, then how come you say that we are spoiling their career. They spoiled our PRAYUKTI CAREER without any knowledge.

और कर्मचारी के इस्तीफा देने से कंपनी का कैरियर चौपट हो गया।

Last but not the least, last time we are warning before publishing try to know the facts, and delete that news immediately if not I will publish about your deeds in my paper & at the same time I will proceed with legal actions. I don’t spare wrong things when we are right.

और अंत में खिलाफ खबर छापने वाले को अंतिम चेतावनी। कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ अपने अखबार में छापने की धमकी। भाई जान कह रहे हैं कि हम गलत चीज को नहीं छोड़ते जब हम ठीक हों। समझ में आए तो मुझे भी बताइए कहना क्या चाह रहे हैं। सड़क पर निपटेंगे या अदालत में? मूल खबर पढ़ना चाहें तो लिंक ये रहा : https://www.bhadas4media.com/print/10520-pryukti-letter

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संजय जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन / टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके एफबी वॉल से लिया गया है.


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