पत्रकार विनय सिंह को टोटल टीवी ने दी बड़ी ज़िम्मेदारी

टोटल टीवी ने पत्रकार विनय सिंह को छत्तीसगढ़ ब्यूरो की जिम्मेदारी दी है। खबर है कि टोटल टीवी छत्तीसगढ़ का भी रीजनल चैनल शुरू  करने का मन बना रहा है। फिलहाल टोटल टीवी दिल्ली- एनसीआर समेत हरियाणा की खबरों को लेकर अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। विनय सिंह पिछले सात सालों से टोटल टीवी के लिए दिल्ली और हरियाणा की खबरें कवर कर रहे थे। इसके बाद बाद संस्थान ने अब उनको छत्तीसगढ़ ब्यूरो हेड बनाकर रायपुर भेजा है।

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छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की आड़ में कैसा खेल, बिना वेतन जिलों में काम कर रहे पत्रकार

चैनल की माइक आईडी की लग रही बोली, वसूली और धमकी का चल रहा खेल, अनशन-शिकायतों का लगा अंबार, सोशल नेटवर्क का बेजोड़ इस्तेमाल, पीएमओ तक हो रही शिकायत

2016 का साल बीत चला। अगर आपका यह साल खराब बीता हो। तो आप नए साल की बेहतरी के लिए कई तरीकों का इजाद करेंगे। इन तरीकों में चैनल की माइक आईडी सबसे बेहतर और कारगर उपाय है। आप माइक आईडी लीजिए और आप हो गए पावरफुल। चाहे आपको पत्रकारिता के मापदंड मालूम हो या नहीं। इस माइक आईडी के साथ वाट्सग्रुप, फेसबुक, ट्वीटर जैसे सोशल नेटवर्क आपके पास हथियार हैं। इन सबके बावजूद आपको और पावरफुल होना है तो आप सामाजिक कार्यकर्ता, भ्रस्टाचार उन्मूलन संगठन, मानवाधिकार संगठन से अपना नाता जोड़ लें। समाज के लिए आप कुछ करें या ना करें। लेकिन आप अपने एशो-आराम के लिए तमाम वो उपाय करेंगे जिससे आपकी जिंदगी लग्जरी हो जाए। कुछ इसी तरह का रास्ता इन दिनों छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की आर में चल रहा है। कोई आवाज उठाता है। तो उसको मिलती है धमकी। रूसवाई। अपमान। मानसिक प्रताड़ना। शिकायतों का अंबार। ऊँची पहुँच की धौंस। और क्या न क्या।

ऐसे बहुत सारे मामलों का अंबार है। नक्सल प्रभावित इस राज्य में। ठीक है। आप मुद्दों को उठाओ, उसकी गहराई तक पहुँचो। जो माध्यम है। उन माध्यमों के जरिए पीड़ितों को हक दिलाओ न कि अपनी रोटी सेंको। पैसा बनाओ। लग्जरी जीवन-यापन करो। कुल मिलाकर आप जिस पर दलाली का आरोप लगाते नजर आते हो। वो खुद अपना गिरबां देख लें। वो क्या कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला का खरसिया का क्षेत्र। जहां 2015 में एक वैष्णव परिवार काफी सुर्खियों में रहा। एफआईआर हुआ। जेल की सलाखों के बीच पहुँचा परिवार। कई सारी अफवाहें भी आई। इन अफवाहों में जून 2015 में एक रायगढ़ जिला जेल में खरसिया के वैष्णव दंपत्ति के अनशन की खबर भी थी। जो सिर्फ और सिर्फ अफवाह निकली थी। अजाक पुलिस ने एक पुराने मामले मेंं खरसिया निवासी भूपेंद्र किशोर वैष्णव एवं उसकी पत्नी आरती वैष्णव को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के पूर्व वैष्णव दंपत्ति खरसिया एसडीएम आफिस के बाहर आमरण अनशन पर बैठे हुए थे। ऐसे में, उनकी गिरफ्तार व जेल दाखिले की पुलिसिया कार्रवाई के बाद भी जेल अंदर उनके अनशन की खबर फैलाई जा रही थी। जिसे जेल प्रशासन ने खारिज किया था।

2015 का साल जैसे-तैसे इस परिवार के लिए बीता। 2016 की शुरूआत में श्री मां प्रकाशन कंपनी के तहत साधना न्यूज के लिए आरती वैष्णव ने 25 हजार रूपए चेक एवं 25 हजार चेक के जरिए अपनी नियुक्ति पत्र ले ली। जिस व्यक्ति ने इस नियुक्ति की मध्यस्थता की। उसने 10 हजार रूपए का कमीशन भी लिया। आरती वैष्णव ने साल में चैनल के लिए विज्ञापन भी किया। एक स्कूल में धमकी-चमकी का मामला भी आया। ऐसी शिकायतों की अंबार लग गई। लेकिन चूंकि चैनल दो कंपनियों की आपसी द्वंद में फंसा था। ऐसे में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले पर किसी की नजर नहीं गई। श्री मां प्रकाशन से साधना न्यूज का एग्रीमेंट खत्म हुआ। लेकिन संस्थान ने पिछली कंपनी द्वारा नियुक्त किसी भी व्यक्ति को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया।

आरती वैष्णव साधना न्यूज रायगढ़ के लिए नियुक्त थी। लेकिन वो अपने पति को संस्थान से जुड़ने के लिए दबाव बनाती रही। जिस पर प्रबंधन ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसी बीच खरसिया के कुनकुनी जमीन घोटाला सुर्खियों में आया। इसको लेकर आरती वैष्णव ने संस्थान प्रमुख को खबरों को हो रही अपडेट में कोई जानकारी नहीं दी। इसके अलावाा आरती वैष्णव तो संस्थान के लिए नियुक्त थी। लेकिन काम करते नजर आते थे भूपेन्द्र वैष्णव। कुनकुनी जमीन घोटाला में शिकायतों का दौर शुरू हो चुका। जो गलत है। वो गलत है। पीएमओ तक यह मामला पहुँचा है। आरती वैष्णव से बात करने की कोशिश की तो पहले उन्होंने फोन नहीं उठाया। और बाद में जिस फोन से रिकार्डिंग होती है, उससे फोन कर स्टेट हेड पर ही उलटा आरोप जड़ दिया गया। फिलहाल इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। पुलिस में शिकायत हो चुकी है। आरती वैष्णव सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मानवाधिकार एवं भ्रष्टाचार उन्मूलन संगठन में छत्तीसगढ़ प्रदेश महासचिव नियुक्त हैं। राष्ट्रीय नागरिक सुरक्षा मंच मानवाधिकार की जन सूचना अधिकारी भी है। इस लेख के साथ ऑडियो भी है। कुछ वॉटसअप क्लिप भी हैं। इस लेख की अगली किस्त का इंतजार कीजिए जिसमें कुछ अहम कड़ियां और भी सामने आने वाली हैं।

लेखक आरके गाँधी साधना न्यूज में बतौर स्टेट हेड नियुक्त हैं। संपर्क : gandhirajeevrohan@gmail.com

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हरिभूमि ने फ्रंट पेज पर प्रकाशित किया अखबार अभिकर्ता का स्मृति शेष

रायपुर। प्रिंट मीडिया के इतिहास में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है जब अखबार के एक मामूली एजेंट के निधन की खबर व स्मृति शेष में एक लंबा आलेख किसी समाचार पत्र ने मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। छह दशक से रायपुर में पाठक और समाचार पत्र का सेतु रहे वरिष्ठ अभिकर्ता रामप्रसाद यादव का 21 सितंबर को आकस्मिक हृदयघात से निधन हो गया। उनके निधन की खबर छत्तीसगढ़ के अन्य अखबारों ने एक छोटी सी न्यूज के रूप में प्रकाशित की। वहीं हरिभूमि के प्रबंध संपादक डा. हिमांशु द्विवेदी ने रामप्रसाद यादव की स्मृति में एक अग्रलेख लिखा जो हरिभूमि के फ्रंट पेज पर प्रकाशित हुआ। रामप्रसाद यादव रायपुर के पांच दशक की पत्रकारिता और उसके बदलावों के साक्षी थे। उनकी स्मृति में लिखा डा. हिमांशु द्विवेदी का आलेख….

 नींव का पत्थर धसक गया

स्मृति शेष

डा. हिमांशु द्विवेदी

सर!, यादव जी नहीं रहे। सांयकाल अपने साथी अनिल गहलावत का यह संदेश जब मोबाइल पर मिला तो सहज प्रतिक्रिया थी कौन यादव जी? जवाब सुनते ही मस्तिष्क मानो सुन्न-सा हो गया। जुबां मानो लड़खड़ा-सी गई। दो हफ्ते पहले ही तो मुझसे मिलकर गए थे। शारीरिक और मानसिक रूप से जिस कदर स्वस्थ्य थे, उसे देखते अगले दस-बीस साल तक भी उनके ऐसे ही हमारे बीच बने रहने की उम्मीद पर किसी को आश्चर्य नहीं होता। लेकिन, सच यही है कि छत्तीसगढ़ के समाचार पत्र जगत का ‘नींव का पत्थर’ आज धसक गया। छह दशक से रायपुर में पाठक और समाचार पत्र का सेतु रहे वरिष्ठ अभिकर्ता रामप्रसाद यादव अब हमारे बीच नहीं रहे। आज प्रात: 11 बजे उनको हुए आकस्मिक ह्रदयघात ने इस कर्मठ और समर्पित योगी को हमारे जीवन से अलग कर दिया।

वो कोई बड़े नेता नहीं थे। और न वह कोई उच्च अधिकारी थे। वह अरबों-खरबों के स्वामी, उद्योगपति या लाखों लोगों की आस्थाओं के केंद्र संत-महात्मा भी नहीं थे। वह एक निहायत ही आम आदमी थे। फिर भी यह कलम आज उनके स्मृति लेखन को बेताब है तो इसकी वजह उनका कर्तव्यनिष्ठ और नेक इरादे का बहुत ऊंचा इंसान होना था। उन्होंने सांसारिक दुनिया में रहते हुए तपस्वी सा आचार-व्यवहार रखा था। यादव जी से मेरा डेढ़ दशक पुराना नाता रहा। हरिभूमि के रायपुर संस्करण के प्रकाशन की प्रक्रिया के दौरान ही मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई। मुलाकात की वजह स्पष्ट ही थी।

वह राजधानी के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित समाचार पत्र विक्रेता थे, लिहाजा ‘अखबार कैसे बेचा जाए?’ यह उनसे समझना था। लेकिन उस मुलाकात ने तो कुछ और ही मोड़ ले लिया था। ‘कैसे बेचा जाए’ की जगह ‘कैसा निकाला जाए’ पर चर्चा सिमट गई। उनका ज्ञान इतनाअपरिमित था कि लिंकन की टिप्पणी जनता का, जनता  के लिए और जनता के द्वारा यकायक साकार होते दिखाई दी। अखबार जनता का, जनता के लिए निकलना चाहिए, यह उनका सूत्र वाक्य था। समाचार पत्र कैसा होना चाहिए? इस संबंध में उनके विचार स्पष्ट ही नहीं बेहद तार्किक थे। इतने तार्किक कि तमाम अनुभवी संपादक भी उनकी तुलना में शिष्यवत महसूस हो। उनके बालों में सफेदी धूप के कारण नहीं अनुभव के कारण है, यह उनकी बातचीत में स्पष्ट नजर आ रहा था।

वे रायपुर के पांच दशक की पत्रकारिता और उसके बदलावों के साक्षी थे। उन्होंने इस दौरान न जाने कितने ही संस्थानों को बनते और बिगड़ते देखा। तमाम चीजें इस दौरान बदलीं। बदलाव में रायपुर का कस्बे से शहर और शहर से राजधानी में बदलाव तक शामिल था। लोगों का जीने का तरीका बदला, अखबारों के छपने का तरीका बदला। नेताओं के जीने का नजरिया बदला। पाठकों के पढ़ने का अंदाज बदला। अखबारों का छपने और बिकने का भी अंदाज तक बदला। तरीका नहीं बदला था तो बस यादव जी की सोच और काम का तरीका नहीं बदला था। आंधी बांह की शर्ट और पैंट पहने यादव जी तड़के चार बजे से भी पहले मुस्तैदी के साथ समाचार पत्र वितरण स्थल पर साठ साल तक मौजूद रहे। जब उनके बच्चे उपलब्धियों के शीर्ष पर भी पहुंच गए तब भी उन्होंने अपने हाथों से अखबार गिनना नहीं छोड़ा। जनवरी-दिसंबंर की ठंड हो या जुलाई-अगस्त की मूसलाधार बरसात, उन्होंने अपना काम कभी किसी और के भरोसे नहीं छोड़ा। वह ऐसे समाचार पत्र विक्रेता थे जो क्या बेच रहे हैं, इसको भी बखूबी जानते समझते थे।

हर समाचार पत्र को वह महज पढ़ते ही नहीं थे बल्कि उसकी बखूबी मीमांसा भी करते थे। किस अखबार नवीस की कलम में कितना दम है, यह उन्हें बखूबी पता था। स्वर्गीय रम्मू श्रीवास्तव जी की राजनीतिक रिपोर्टिंग के तो वे बेहद कायल थे। अखबारों की जब वह समीक्षा करते तो लगता था मानो प्रबुद्ध समीक्षक से आपका संवाद हो रहा है। कर्मठता और ईमानदारी के साथ-साथ वह बेहद साफ और भावुक मन के भी स्वामी थे। वह तमाम समाचार पत्रों के विक्रय का काम पूरी ईमानदारी से देखते थे, लेकिन आखिरी क्षण तक उनका ‘नवभारत’ से विशेष लगाव रहा। उसकी वजह उनका इस अखबार से शुरूआती जुड़ाव रहा। इस लगाव को उन्होंने कभी छिपाया भी नहीं। अपने साथियों के प्रति प्रेम, पाठकों के प्रति समर्पण और समाचार पत्र संस्थानों के साथ ईमानदारी उनका मूल स्वभाव रहा।

यही कारण था कि किसी समाचार पत्र के साथ उनका लेन-देन को लेकर कभी विवाद नहीं रहा। अपने उपभोक्ता के प्रति उनका दायित्वबोध गजब का था। चाहे जैसा भी मौसम क्यों न हो, वह पाठकों के पास उसका अखबार सुबह की चाय की प्याली के साथ उपलब्ध कराने के लिए सदैव तत्पर रहे। इसीलिए वह खुद वितरण स्थल पर सुबह चार बजे से पहले हमेशा उपलब्ध रहे। इसी का नतीजा था कि उनके हॉकर कभी विलंब से आने और देर से अखबार बांटने का साहस नहीं जुटा सके। यदि कभी कोई अखबार छपकर ही विलंब से वितरण स्थल पर पहुंचता तो वह उसी शाम प्रबंधन से अपनी नाराजगी से अवगत कराने में गुरेज नहीं करते थे।

अपनी बात विनम्रता और दृढ़ता से रखने में उनका कोई सानी नहीं था। उन्हें उनकी बात से तनिक भी हिलाना कठिन था। लेकिन वह बातचीत के दौरान इतने विनम्र बने रहते थे कि उन पर  नाराज भी नहीं हुआ जा सकता था। लिहाजा नतीजा हमेशा उन्हीं के पक्ष में रहता था। अखबार उनकी रगों में बहता था। आर्थिक दृष्टि से विगत दो दशक से यह व्यवसाय करते रहने का उनके पास कोई कारण नहीं था, लेकिन फिर यह इससे जुड़े हुए थे। इसकी एक मात्र वजह अखबार का उनके जीवन का आधार होना था।

चौहत्तर वर्ष की उम्र में भी उनकी सक्रियता चौबीस साल के युवा को शर्मिंदा कर देने वाली बनी रही। ऐसे कर्मशील व्यक्तित्व का अवसान अखबार जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उनका निधन स्वयं मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। सच कहूं तो आज मैंने अपना मार्गदर्शक खो दिया। ऐसे कर्मयोगी को हरिभूमि परिवार का शत-शत नमन..।

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राजकुमार ग्वालानी चैनल इंडिया के प्रबंध संपादक बने, हरिभूमि से दिया इस्तीफा

राजधानी रायपुर से प्रकाशित सांध्य दैनिक चैनल इंडिया में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार ग्वालानी ने प्रबंध संपादक के रूप में अपनी नई पारी की शुरुआत की है। इससे पहले वे दैनिक हरिभूमि रायपुर में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में पिछले सात सालों से काम कर रहे थे। 

ग्वालानी ने 15 साल तक दैनिक देशबंधु रायपुर में काम किया है। यहां पर वे तीन साल तक समाचार संपादक भी रहे। रायपुर में ग्वालानी पिछले 25 सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं। सबसे पहले दैनिक अमृत संदेश रायपुर में 1990 से 1992 तक सिटी रिपोर्टर के साथ खेल संपादक के रूप में काम किया।

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हर बार नया अर्थ देते हैं उद्भ्रांत – जयप्रकाश मानस

विद्वान समीक्षक और लेखक डॉ. सुशील त्रिवेदी ने अपने प्रमुख समीक्षात्मक आलेख में कहा कि उद्भ्रांत हमारे समय के श्वेत-श्याम को पौराणिक मिथकों और प्रतीकों में कहने वाले बहुआयामी कवि हैं और उनकी कविताएँ भी इतनी बहुआयामी कि हर बार नया अर्थ देती हैं । प्रसंग था – रायपुर में संपन्न हिंदी के वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत का एकल कविता पाठ, समीक्षा गोष्ठी और सम्मान समारोह ।

काव्यपाठ करते कवि उद्भ्रांत

जयप्रकाश मानस ने उपस्थित कवि पाठकों से उनकी सभी कृतियों से परिचय देते हुए कहा कि उद्भ्रांत निराला की परंपरा में एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें सभी काव्य के सभी अनुशासनों में विपुल और विलक्षण लिखने का गौरव हासिल है, वे किसी भी अकादमी प्राप्त कवि से कमतर नहीं ।

साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य गिरीश पंकज के अनुसार भारतीय काव्य परंपरा में उद्भ्रांत की कविता और कविता पाठ दोनों सभ्रांत हैं । वे बेहत्तर पाठ करने वाले ऐसे कवि हैं जो अर्थ को अपनी आंगिक भूमिका, आरोह-अवरोह और भावगत गति से बड़ी सहजता से श्रोता के समक्ष खोल-खोल देते हैं ।

सुपरिचित आलोचक प्रो. राजेन्द्र मिश्र ने उद्भ्रांत को मनुष्य की पीड़ा, यातना का कवि मानते हुए जब कविता और पाठक के संबंधों का प्रश्न उठाया तो उसे वरिष्ठ कथाकार तेजिन्दर ने नकारते हए सोशल मीडिया और नये ज़माने के नयी प्रविधियों से आ रहे नये पाठकों की प्रबल संभावनाओं से परिचय दिलाते हुए कहा – ”मैं उद्भ्रांत उर्फ़ रमांकात शर्माजी का व्यक्तिगत मुरीद हूँ । उन्होंने जैसे लिखा है वैसे ही जीया है । उनकी कविताओं को मैने निजी जीवन में भी महसूसा है ।”

विशिष्ट अतिथि और राज्य सभा सांसद डॉ. भूषण लाल जांगड़े ने पाठकीयता के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा मुझ जैसे कम साहित्यिक रूचि वाला राजनीतिज्ञ को भी जब उद्भ्रांत की कविता सुनकर अच्छा लगा तो यह चिंता की बात नहीं है ।

कवयित्री जया जादवानी के अनुसार उद्भ्रांत की कविताएँ जैसे नमक, सीता रसोई, ईंट आदि आम आदमी से जोड़नेवाली कविताएँ हैं जिनका रेंज़ बहुत है और वे बहुत दूर तक जाती हैं ।

इससे पहले एकल पाठ में उद्भ्रांत ने अपनी लगभग 30 बहुचर्चित कविताओँ का रम्य-पाठ किया, जिस पर उपस्थित श्रोत्राओं और कवियों ने अपने-अपने विचार रखे । कवि से प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. जे. आर. सोनी और डॉ. सीमा श्रीवास्तव ने अपनी जिज्ञासा रखी जिस पर उद्भ्रांत ने सारगर्भित जवाब दिया ।

आयोजन में उद्भ्रांत की दो कृतियों – हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘त्रेता’ और नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘उद्भ्रांत:श्रेष्ठ कहानियाँ’ का विमोचन दो पाठक क्रमशः राजेश गनोदवाले और श्रीमती सीमा राठी के हाथों संपन्न हुआ जिसमें हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल जी ने उनका हौसला बढ़ाया । इस मौक़े पर वैभव प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संतोष श्रीवास्तव सम के संग्रह वे सौदागर का विमोचन भी उद्भ्रांत और अन्य अतिथियों के हाथों संपन्न हुआ ।

समापन हुआ छत्तीसगढ़ की प्रमुख साहित्यिक संगठनों वृंदावन लायब्रेरी पाठक मंच, सृजनगाथा डॉट कॉम, छत्तीसगढ़ राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वैभव प्रकाशन, छत्तीसगढ़ मित्र, सद्भावना दर्पण, नाचा थियेटर, पत्रिका मुक्तिबोध, सृजन-सम्मान, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, गुरुघासीदास साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, दैनिक भारत भास्कर, मिनी माता फाउंडेशन आदि द्वारा श्री उद्भ्रांत के आत्मीय सम्मान से ।

श्री उद्भ्रांत के सम्मान में युवा कलाकार प्रगति रथ ने गिटार पर एक संगीत प्रस्तुत की जिसे सभी ने सराहा । धन्यवाद ज्ञापन दिया डॉ. सुधीर शर्मा ने और संचालन किया वृंदावन लायब्रेरी पाठक मंच के संयोजक अजय अवस्थी ने । इस आयोजन में युवा कवि प्रवीण गोधेजा और संदीप तिवारी का उल्लेखनीय सहयोग रहा ।

इस महत्वपूर्ण आयोजन में रायपुर के अलावा कांकेर, दुर्ग और राजनांदगाँव के रचनाकार एवं पाठकगण उपस्थित थे।

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पत्रकारों के खिलाफ बेखौफ होते जा रहे वर्दी वाले गुंडे, फोटो जर्नलिस्ट को थाने लेजाकर पीटा

जगदलपुर : रायपुर से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के फोटो जर्नलिस्ट अमन दीप ओमी से सोमवार रात 11 बजे पुलिस ने मारपीट की तथा थाने में बैठा दिया। वह पुलिस द्वारा एक बुजुर्ग ड्राइवर की पिटाई करने के दौरान तस्वीर ले रहा था। रात में हाता मैदान के पास एक ट्रक व कार चालक के मध्य ओवर टेक करने को लेकर हुए विवाद के बाद बोधघाट व कोतवाली टाउन मोबाइल वहां पहुंची थी। पुलिसकर्मी बुजुर्ग ड्राइवर पर शराब पीने की बात कहते मारपीट कर रहे थे। इसी दौरान फोटो जर्नलिस्ट अमनदीप वहां पहुंचे और तस्वीरें ले रहे थे। इस दौरान वहां मौजूद एक उप निरीक्षक ने उनसे गाली-गलौज कर मारपीट की। इसके बाद उसे कोतवाली थाने में लाकर बिठा दिया गया। थाने के भीतर एक प्रधान आरक्षक ने उसे बेल्ट से मारा। वहां मौजूद एएसआई साहू ने धक्कामुक्की की। 

घटना की सूचना मिलने पर पत्रकारों के विरोध व्यक्त करने पर उसे छोड़ा गया। मंगलवार को काफी संख्या में पत्रकारों के साथ पहुंच घटना की लिखित शिकायत टीआई कोतवाली आशीष वासनीक को दी गई है। टीआई ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है। पत्रकारों ने मामले में दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ अपराध पंजीबद्ध किए जाने की मांग करते कहा है कि पत्रकारों की हत्या व उनसे मारपीट की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

पुलिस इस प्रकार का कृत्य कर जनता से दूरी बढ़ा रही है। ज्ञात हो कि जहां दुनिया के तमाम विकसित देशों में फे्रंडली पुलिसिंग की अवधारणा पर पुलिस चल रही है। वहीं भारतीय पुलिस आज भी ‘वर्दी वाला गुंडा’ के इमेज से उबरती नजर नहीं आ रही है। पुलिसकर्मियों के द्वारा कभी बस अड्डे में खड़े शिक्षक की पिटाई कर दबंगई दिखाई जाती है तो कहीं महिला से मारपीट की जाती है। जान जोखिम में डालकर नक्सली चंगुल से पुलिस कर्मियों को रिहा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मीडियाकर्मियों के साथ हिंसक व अमानवीय व्यवहार दुर्भाग्यजनक है। 

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ऐसी ही करतूतों के कारण मीडिया को कहा जाता है प्रेस्टीट्यूट

प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए राज्य सरकार ने कलेक्टर को नोटिस दिया और राज्य सरकार को खुश करने के लिए एक अखबार ने अमित कटारिया के खिलाफ पत्नी को जिन्दल का पायलट बनाने की खबर छाप दी। और खूब प्रमुखता से रंग-रोगन व फोटो के साथ छापी गई। अखबार लिखता है- ‘सलमान स्टाइल में प्रधानमंत्री की अगवानी करने के बाद सुर्खियों में आए जगदलपुर कलक्टर अमित कटारिया के बारे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।’

सवाल यह उठता है कि अखबार की खबर के अनुसार अमित कटारिया दोषी हैं तो यह खबर पहले क्यों नहीं छपी थी। मैं अमित कटारिया को नहीं जानता और ना इस बात की चर्चा कर रहा हूं कि खबर किस अखबार में छपी है – मुद्दा सिर्फ यह है 2011 की खबर छापकर अखबार क्या बताना और कहना चाहता है। यही नहीं – “पुरस्कार तो नहीं पायलट की नौकरी” शीर्षक से एक बॉक्स भी है। इस बॉक्स और शीर्षक से अखबार ने अपनी ही खबर को शक के घेरे में डाल दिया है। और यह पैंतरा आज का नहीं, बहुत पुराना है। अगर मुकदमा हो जाए तो अखबार यह दलील देगा कि हमने तो सवाल उठाया था, शंका जताई थी। 

दूसरी ओर, पाठकों ने इस कटिंग को जहां-तहां खूब चिपकाया। जनता यह नहीं पूछती है कि यह खबर अचानक अब क्यों। कटारिया ने अगर विमान उड़ा सकने वाली अपनी पत्नी को जिन्दल के यहां नौकरी दिला ही दी तो यह कोई अपराध नहीं है और अगर है तो खबर अब तक क्यों नहीं छपी। इसीलिए ना कि अमित कटारिया एक दंबग अफसर हैं और पहले डर लग रहा था। अब जब राज्य सरकार ने उन्हें नोटिस जारी कर दिया है और इसके लिए राज्य सरकार की थू-थू हो रही है तो चले आए सहारा बनकर। कुछ नहीं तो राज्य सरकार का विज्ञापन मिलता रहे। 

एक सज्जन बता रहे थे कि राज्य सरकार के खिलाफ (छत्तीसगढ़ नहीं) एक खबर छपी तो विज्ञापन बंद हो गए। बगैर किसी घोषणा सूचना के। मामला निपटने तक कुछ करोड़ के विज्ञापन छूट चुके थे क्योंकि अखबार तो रोज छपना ही था। अब यह अखबार की मजबूरी है और इस मजबूरी का फायदा राज्य सरकार तो उठाती ही है। अखबारे वाले भी झुकने के लिए कहने पर रेंगने तो तैयार रहते हैं। इसमें सही गलत कुछ नहीं होता सिर्फ अपना फायदा देखा जाता है।

संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से 

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स्वामी विवेकानंद के रायपुर में डेढ़ वर्ष

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ इस बात का गौरव अनुभव करता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां डेढ़ वर्ष से अधिक का समय व्यतीत किया. हालांकि जिस कालखंड में उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय व्यतीत किये तब वे स्वामी विवेकानंद नहीं थे बल्कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त थे जो अपने परिवार के साथ रायपुर आये थे. यहां रहते हुये उनके भीतर जो संस्कार उत्पन्न हुये और उनके ज्ञान का लोहा माना गया जिसने बाद में उन्हें स्वामी विवेकानंद के रूप में संसार में प्रतिष्ठापित किया. यह हम सबके लिये गौरव की बात है. 1877 ई. में लगभग 14 वर्ष की आयु में कलकत्ता से रायपुर के लिये आना था तब आज की तरह सीधी रेललाईन सेवा उपलब्ध नहीं थी और तब छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य भी नहीं था. छत्तीसगढ़ तब मध्यप्रदेश का एक विशिष्ट अंचल था जिसके कारण मध्यप्रदेश की विशिष्ट पहचान हुआ करती थी. उस समय रेलगाड़ी कलकत्ता से इलाहाबाद, जबलपुर, भुसावल होते हुए बम्बई जाती थी। उधर नागपुर भुसावल से जुड़ा हुआ था, तब नागपुर से इटारसी होकर दिल्ली जाने वाली रेललाइन भी नहीं बनी थी। नरेन्द्रनाथ जिन्हें बाद में संसार ने एक आलौकिक युवा के रूप में जाना और वे हमेशा के लिये स्वामी विवेकानंद हो गये, कि स्मृति हमारे लिये धरोहर है. ऐसे महान व्यक्तित्व का किशोरावस्था में समय गुजारना इतिहास की दूष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है. 

नरेन्द्रनाथ की यह रायपुर-यात्रा इसलिए भी विशेष महत्वपूर्ण हो जाती है कि इस यात्रा में उन्हें अपने जीवन में पहली भाव-समाधि का अनुभव हुआ था। वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में उनके गुजारे हुये दिनों का उल्लेख करते हुये उनके कुछ जीवनीकारों ने लिखा है कि नरेन्द्र एवं उनके घर के लोग नागपुर से बैलगाड़ी द्वारा रायपुर गये, पर नरेन्द्र को इस यात्रा में जो एक अलौकिक अनुभव हुआ, वह संकेत करता है कि वे लोग जबलपुर से ही बैलगाड़ी द्वारा मण्डला, कवर्धा होकर रायपुर गये हों। उनके कथनानुसार, इस यात्रा में उन्हें पन्द्रह दिनों से भी अधिक का समय लगा था। उस समय पथ की शोभा अत्यन्त मनोरम थी। रास्ते के दोनों किनारों पर पत्तों और फूलों से लदे हुए हरे हरे सघन वनवृक्ष होते। भले ही नरेन्द्र नाथ को इस यात्रा में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, तथापि, उनके ही शब्दों में- ‘वनस्थली का अपूर्व सौन्दर्य देखकर वह क्लेश मुझे क्लेश ही नहीं प्रतीत होता था। अयाचित होकर भी जिन्होंने पृथ्वी को इस अनुपम वेशभूषा के द्वारा सजा रखा है, उनकी असीम शक्ति और अनन्त प्रेम का पहले-पहल साक्षात परिचय पाकर मेरा हृदय मुग्ध हो गया था।’ उन्होंने बताया था -‘वन के बीच से जाते हुए उस समय जो कुछ मैंने देखा या अनुभव किया, वह स्मृतिपटल पर सदैव के लिए दृढ़ रूप से अंकित हो गया है। विशेष रूप से एक दिन की बात उल्लेखनीय है। उस दिन हम उन्नत शिखर विन्ध्यपर्वत के निम्न भाग की राह से जा रहे थे। मार्ग के दोनों ओर बीहड़ पहाड़ की चोटियां आकाश को चूमती हुई खड़ी थीं। तरह तरह की वृक्ष-लताएं, फल और फूलों के भार से लदी हुई, पर्वतपृष्ठ को अपूर्व शोभा प्रदान कर रही थीं। अपनी मधुर कलरव से मस्त दिशाओं को गुंजाते हुए रंग-बिरंगे पक्षी कुंज कुंज में घूम रहे थे, या फिर कभी-कभी आहार की खोज में भूमि पर उतर रहे थे। इन दृश्यों को देखते हुए मैं मन में अपूर्व शान्ति का अनुभव कर रहा था। धीर मन्थर गति से चलती हुई बैलगाडिय़ां एक ऐसे स्थान पर आ पहुंची, जहां पहाड़ की दो चोटियां मानों प्रेमवश आकृष्ट हो आपस में स्पर्श कर रही हैं। उस समय उन श्रृंगों का विशेष रूप से निरीक्षण करते हुए मैंने देखा कि पासवाले एक पहाड़ में नीचे से लेकर चोटी तक एक बड़ा भारी सुराख है और उस रिक्त स्थान को पूर्ण कर मधुमक्खियों के युग-युगान्तर के परिश्रम के प्रमाणस्वरूप एक प्रकाण्ड मधुचक्र लटक रहा है। उस समय विस्मय में मग्न होकर उस मक्षिकाराज्य के आदि एवं अन्त की बातें सोचते-सोचते मन तीनों जगत के नियन्ता ईश्वर की अनन्त उपलब्धि में इस प्रकार डूब गया कि थोड़ी देर के लिए मेरा सम्पूर्ण बाह्य ज्ञान लुप्त हो गया। कितनी देर तक इस भाव में मग्न होकर मैं बैलगाड़ी में पड़ा रहा, याद नहीं। जब पुन: होश में आया, तो देखा कि उस स्थान को छोड़ काफी दूर आगे बढ़ गया हूं। बैलगाड़ी में मैं अकेला ही था, इसलिए यह बात और कोई न जान सका।’ इस बात का विस्तार से उल्लेख श्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग, तृतीय खण्ड, द्वितीय संस्करण, नागपुर, पृष्ठ67-68 पर हुआ है.

रायपुर में अच्छा विद्यालय नहीं था। इसलिए नरेन्द्रनाथ पिता से ही पढ़ा करते थे। यह शिक्षा केवल किताबी नहीं थी। पुत्र की बुद्धि के विकास के लिए पिता अनेक विषयों की चर्चा करते। यहां तक कि पुत्र के साथ तर्क में भी प्रवृत्त हो जाते और क्षेत्र विशेष में अपनी हार स्वीकार करने में कुण्ठित न होते। उन दिनों विश्वनाथ बाबू के घर में अनेक विद्वानों और बुद्धिमानों का समागम हुआ करता तथा विविध सांस्कृतिक विषयों पर चर्चाएं चला करतीं। नरेन्द्र नाथ बड़े ध्यान से सब कुछ सुना करते और अवसर पाकर किसी विषय पर अपना मन्तव्य भी प्रकाशित कर देते। उनकी बुद्धिमता तथा ज्ञान को देखकर बड़े-बूढ़े चमत्कृत हो उठते, इसलिए कोई भी उन्हें छोटा समझ उनकी अवहेलना नहीं करता था। एक दिन ऐसी ही चर्चा के दौरान नरेन्द्र ने बंगला के एक ख्यातनामा लेखक के गद्य-पद्य से अनेक उद्धरण देकर अपने पिता के एक सुपरिचित मित्र को इतना आश्चर्यचकित कर दिया कि वे प्रशंसा करते हुए बोल पड़े- ‘बेटा, किसी न किसी दिन तुम्हारा नाम हम अवश्य सुनेंगे।’ कहना न होगा कि यह मात्र स्नेहसिक्त अत्युक्ति नहीं थी- वह तो एक अत्यन्त सत्य भविष्यवाणी थी। नरेन्द्र नाथ बंग-साहित्य में अपनी चिरस्थायी स्मृति रख गये।

‘युगनायक विवेकानंद’(बंगला), प्रथम खण्ड, कलकत्ता, पृ. 55-57  में उल्लेख मिलता है कि नरेन्द्र में पहले से ही पाकविद्या के प्रति स्वाभाविक रूचि थी। रायपुर में हमेशा अपने परिवार में ही रहने के कारण तथा इस विषय में अपने पिता से सहायता प्राप्त करने तथा उनका अनुकरण करने से वे इस विद्या में और भी पटु हो गये। रायपुर में उन्होंने शतरंज खेलना भी सीख लिया तथा अच्छे खिलाडिय़ों के साथ वे होड़ भी लगा सकते थे। दि लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानन्द, अद्वैत आश्रम, मायावती, भाग 1, पांचवें संस्करण के पृष्ठ  42-43 में यह भी उल्लेख मिलता है कि रायपुर में ही विश्वनाथ बाबू ने नरेन्द्र को संगीत की पहली शिक्षा दी। विश्वनाथ स्वयं इस विद्या में पारंगत थे और उन्होंने इस विषय में नरेन्द्र की अभिरूचि ताड़ ली थी। नरेन्द्र का कण्ठ-स्वर बड़ा ही सुरीला था। वे आगे चलकर एक सिद्धहस्त गायक बने थे, पर उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष भी रायपुर में ही विकसित हुआ।

डेढ़ वर्ष रायपुर में रहकर विश्वनाथ सपरिवार कलकत्ता लौट आये। तब नरेन्द्र का शरीर स्वस्थ, सबल और हृष्ट-पुष्ट हो गया और मन उन्नत। उनमें आत्मविश्वास भी जाग उठा था और वे ज्ञान में भी अपने समवयस्कों की तुलना में बहुत आगे बढ़ गये थे। किन्तु बहुत समय तक नियमित रूप से विद्यालय में न पढऩे के कारण शिक्षकगण उन्हें ऊपर की (प्रवेशिका) कक्षा में भरती नहीं करना चाहते थे। बाद में विशेष अनुमति प्राप्त कर वे विद्यालय की इसी कक्षा में भरती हुए तथा अच्छी तरह से पढ़ाई कर सभी विषयों को थोड़े ही समय में तैयार करके उन्होंने 1879 में परीक्षा दी। यथासमय परीक्षा का परिणाम निकलने पर देखा गया कि वे केवल उत्तीर्ण ही नहीं हुए हैं, प्रत्युत उस वर्ष विद्यालय से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले वे एकमात्र विद्यार्थी हैं। यह सफलता अर्जित कर उन्होंने अपने पिता से उपहार स्वरूप चांदी की एक सुन्दर घड़ी प्राप्त की थी।

प्राप्त संदर्भ में दो उल्लेखनीय घटनाओं का उल्लेख नरेन्द्रनाथ के जीवन का मिलता है. विश्वनाथ ने पुत्र को संगीत के साथ-साथ पौरुष की भी शिक्षा दी थी। एक समय नरेन्द्र नाथ पिता के पास गये और उनसे पूछ बैठे-‘आपने मेरे लिए क्या किया है?’ तुरन्त उत्तर मिला-‘जाओ दर्पण में अपना चेहरा देखो!’ पुत्र ने तुरन्त पिता के कथन का मर्म समझ लिया, वह जान गया कि उसके पिता मनुष्यों में राजा हैं। एक दूसरे समय नरेन्द्र ने अपने पिता से पूछा था कि परिवार में किस प्रकार रहना चाहिए, अच्छी वर्तनी का माप-दण्ड क्या है? इस पर पिता ने उत्तर दिया था-‘कभी आश्चर्य व्यक्त मत करना!’ क्या यह वही सूत्र था, जिसने नरेन्द्र नाथ को विवेकानन्द के रूप में समदर्शी बनाकर, राजाओं के राजप्रासाद और निर्धनों की कुटिया में समान गरिमा के साथ जाने में समर्थ बनाया था।रायपुर में घटी और दो घटनाएं नरेन्द्र नाथ के व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से बड़ी महत्वपूर्ण हैं। साथ ही उपर्युक्त विवरण प्रदर्शित करते हैं कि नरेन्द्र के व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास में रायपुर का कितना बड़ा योगदान रहा है।

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