अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न देने वाले रमेशचंद्र अग्रवाल अपने साथ कुछ न ले जा सके!

देश के प्रसिद्ध समाचार पत्र दैनिक भास्कर को संचालित करने वाली कंपनी डीबी कार्प के चेयरमैन रमेशचंद अग्रवाल कल अहमदाबाद में ईश्वर को प्यारे हुए और खाली हाथ ही दुनिया से चले गए. अपने इतने बड़े साम्राज्य में से कुछ भी अपने साथ न ले जा सके. रमेश चंद्र अग्रवाल ने जीते जी अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर और वेतन न देने की जिद कर रखी थी और दिया भी नहीं. मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. मजीठिया वेज बोर्ड न दिए जाने की सबसे ज्यादा शिकायत दैनिक भास्कर समूह से ही आई है.

हृदयाघात से मरे रमेश चंद्र अग्रवाल को महान बताने और बनाने के लिए दलाल पत्रकारों में होड़ मची हुई है. किसी ने यह लिखने की हिम्मत नहीं जुटाई कि इस शख्स ने अपने समूह के कर्मियों को जबरदस्त शोषण किया और कानून व न्याय की अनदेखी कर आपराधिक कृत्य किया. दैनिक भास्कर समाचार पत्र समूह के खिलाफ सबसे ज्यादा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ ना देने की शिकायत विभिन्न अदालतों में की गयी है जिसकी सुनवाई चल रही है.

बुधवार को अहमदाबाद विमानतल पर रमेश चंद्र अग्रवाल को हृदयाघात हुआ जिसके बाद वहीं एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. बाद में उनका निधन हो गया. रमेश अग्रवाल के निधन पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, रेल मंत्री सुरेश प्रभु आदि ने ट्वीट कर शोक प्रकट किया.

रमेश चंद्र अग्रवाल ने भोपाल विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एम ए किया था. रमेश चंद्र अग्रवाल को अखबार की दुनिया से जुड़े हुए़ 42 साल हो चुके थे. उन्हें 2003, 2006 में इंडिया टुडे मैगजीन द्वारा 50 सबसे शक्तिशाली व्यापारिक घरानों में से एक के मुखिया के बतौर सम्मानित किया गया. 2012 में भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में 95वें स्थान पर रहे.

इसके बावजूद वह अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न देने पर अड़े रहे और इसके लिए कुख्यात हुए. रमेश चंद्र अग्रवाल के इस शोषणकारी रवैये के कारण भास्कर समूह की कई यूनिटों में कर्मियों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया और हड़ताल तक कर दिया था. रमेश चंद्र अग्रवाल के बेटे गिरीश अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल और पवन अग्रवाल उनका बिजनेस पूरी तरह संभाल चुके हैं.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
9322411335

मूल खबर….

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भास्कर ग्रुप के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी

पेशी से कन्नी काटने पर पंजाब की कोर्ट ने ‘आज़ाद सोच’ के दावे वाले अखबार दैनिक भास्कर ग्रुप चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ अंततः नॉन बेलएबल वारंट जारी किए. पंजाब से जल्द रवाना होगा विशेष तामीली टीम. हत्थे चढ़े तो लाकर कोर्ट में पेश किए जाएंगे चेयरमैन रमेश अग्रवाल. एक मासूम आरोपी की पहचान उजागर करने के मामले में कोर्ट ने किया है तलब.

आरोपी रमेश ने राहत के लिए हाइकोर्ट में भी लगा रखी है मामला निरस्त करने की याचिका. पूरा मामला क्या है, इसे जानने के लिए नीचे जय हिंद अखबार में प्रकाशित एक खबर की कटिंग दी जा रही है जिसे पढ़ कर सब समझ सकते हैं….

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भारतीय टीवी न्यूज इंडस्ट्री में बड़ा और नया प्रयोग करने जा रहे हैं दीपक शर्मा समेत दस बड़े पत्रकार

(आजतक न्यूज चैनल को अलविदा कहने के बाद एक नए प्रयोग में जुटे हैं दीपक शर्मा)


भारतीय मीडिया ओवरआल पूंजी की रखैल है, इसीलिए इसे अब कारपोरेट और करप्ट मीडिया कहते हैं. जन सरोकार और सत्ता पर अंकुश के नाम संचालित होने वाली मीडिया असलियत में जन विरोधी और सत्ता के दलाल के रूप में पतित हो जाती है. यही कारण है कि रजत शर्मा हों या अरुण पुरी, अवीक सरकार हों या सुभाष चंद्रा, संजय गुप्ता हों या रमेश चंद्र अग्रवाल, टीओआई वाले जैन बंधु हों या एचटी वाली शोभना भरतिया, ये सब या इनके पिता-दादा देखते ही देखते खाकपति से खरबपति बन गए हैं, क्योंकि इन लोगों ने और इनके पुरखों ने मीडिया को मनी मेकिंग मीडियम में तब्दील कर दिया है. इन लोगों ने अंबानी और अडानी से डील कर लिया. इन लोगों ने सत्ता के सुप्रीम खलनायकों को बचाते हुए उन्हें संरक्षित करना शुरू कर दिया.

इन लोगों ने जनता के हितों को पूंजी, सत्ता और ताकत के आगे नीलाम कर दिया. नतीजा, परिणति, अंततः कुछ ऐसा हुआ कि देश में करप्शन, लूटमार, झूठ, दलाली का बोलबाला हो गया और बेसिक मोरल वैल्यूज खत्म हो गए. इसी सबको लेकर कुछ पत्रकारों ने सोचा कि जनता का कोई ऐसा मीडिया हाउस क्यों न बनाया जाए जो अंबानी और अडानी के लूटमार पर खुलासा तो करे ही, करप्ट और कार्पोरेट मीडिया के खलनायकों के चेहरे को भी सामने लाए. ऐसा सपना बहुतों ने बहुत बार देखा लेकिन कभी इस पर अमल नहीं हो पाया क्योंकि मीडिया को संचालित करने के लिए जिस न्यूनतम पूंजी की जरूरत पड़ती है, वह पू्ंजी लगाए कौन. पर सपने मरते नहीं. दौर बदलता है, तकनीक बदलती है तो सपने देखने के तौर-तरीके और स्वप्नदर्शी भी बदल जाते हैं.

इस बदले और परम बाजारू दौर में अब फिर कुछ अच्छे और सच्चे पत्रकारों के मन में पुराने सपने नए रूप में अंखुवाए हैं. इनने मिलकर एक जनता का मीडिया हाउस बनाने का फैसला लिया है. दस बड़े टीवी और प्रिंट पत्रकारों ने मिलकर जो सपना देखा है, उसे मूर्त रूप देने का काम बहुत तेजी से किया जा रहा है. आजतक न्यूज चैनल से इस्तीफा देने वाले चर्चित पत्रकार दीपक शर्मा इस काम में जोर शोर से लगे हैं. अमिताभ श्रीवास्तव भी इसके हिस्से हैं. एक तरफ चिटफंडियों और बिल्डरों के न्यूज चैनल हैं जो विशुद्ध रूप से सत्ता पर दबाव और दलाली के लिए लांच किए गए हैं तो दूसरी तरफ जनता की मीडिया के नाम पर धन बनाने की मशीन तैयार कर देने वाले मीडिया मालिक हैं. इनके बीच में जो एक बड़ा स्पेश जनपक्षधर मीडिया हाउस का है, वह लगातार खाली ही रहा है.

हां, इस बदले नए दौर में न्यू मीडिया ने काफी हद तक जन मीडिया का रूप धरा है लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं. इन सीमाओं को लांघने का तय किया है दस पत्रकारों ने. एक नेशनल सैटेलाइट न्यूज चैनल जल्द लांच होने जा रहा है. यह चैनल मुनाफे के दर्शन पर आधारित नहीं होगा. यह सहकारिता के मॉडल पर होगा. नो प्राफिट नो लॉस. काम तेजी से चल रहा है. लग रहा है कि मीडिया में भी एक क्रांति की शुरुआत होने वाली है. लग रहा है मीडिया के जरिए मालामाल और दलाल हो चुके लोगों के चेहरों से नकाब खींचने का दौर शुरू होने वाला है. आइए, इस नए प्रयोग का स्वागत करें. आइए, भड़ास के सैटेलाइट वर्जन का स्वागत करें. आइए, बेबाकी और साहस की असली पत्रकारिता का स्वागत करें.

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक हैं. संपर्क: 09999966466


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रमेशचंद्र अग्रवाल के नाम दैनिक भास्कर के एक पाठक का पत्र

मान्यवर, दैनिक भास्कर पत्र समूह के संपादक श्री रमेशचंद्र अग्रवाल का एक पत्र 26 दिेसंबर के अंक मे पूरे पहले पेज पर प्रकाशित हुआ है। इसमें टाइम्स आफ इंडिया को पछाड़ कर भास्कर के सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार बनने का दावा किया गया है। पाठक का दर्द बयान करने वाला अपना पत्र आपको प्रेषित कर रहा हूं, भड़ास पर प्रकाशनार्थ।
सादर।                     
श्रीप्रकाश दीक्षित
एचआईजी-108,गोल्डन वैली हाईटस                                       
आशीर्वाद कालोनी के पीछे ,कोलार रोड,        
भोपाल-462042       

रमेशचंद्र अग्रवाल के नाम एक पाठक का पत्र

मान्यवर, मैं एक वरिष्ठ नागरिक, हिंदी का जागरूक पाठक और जानकार शहरी होने के साथ एक स्वतंत्र पत्रकार भी हूँ. सबसे पहले मेरी बधाई कबूल करें. भास्कर की उपलब्धि इसलिए भी खास है कि पहली बार हिंदी के किसी अख़बार ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया सरीखे अंग्रेजी के दिग्गज अख़बार को चारों खाने चित्त किया है. पर साथ ही यह भी कहने की जुर्रत कर रहा हूँ कि पिछले कुछ सालों से एक पाठक के नाते भास्कर ने मुझे बेहद निराश किया है. मुझे यह कहने की भी अनुमति दें कि भास्कर से पत्रकारिता तो तक़रीबन गायब ही हो गई है, बस बाजार और सिर्फ बाजार ही नजर आता है! जिस पत्रकारिता ने भास्कर और आपको इस मुकाम तक पहुँचाया उसी को आप और आपके काबिल बेटों ने करीब करीब त्याग ही दिया है. जिस हिंदी ने आपको अभूतपूर्व प्रतिष्ठा, बेशुमार दौलत, मिल और मॉल आदि दिए उसके साथ भास्कर कैसा बर्ताव कर रहा है? अंगरेजी का बेहूदा इस्तेमाल कर हिंदी को दोयम दर्जे का बनाने का दुस्साहस किया जा रहा है. मैं यह भी कहना चाहूँगा कि अपराजेय कोई भी नहीं है. कभी राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता में ध्रुव तारे की तरह चमकने वाला नईदुनिया आज कहाँ है? नवभारत तो बाजार से गायब ही हो चुका है. आप कह रहे हैं कि पाठक ही भास्कर की पूंजी और प्राथमिकता है! यदि वाकई में ऐसा है तो ज्वलंत और विवादस्पद मुद्दों पर क्यों संपादकीय लगभग नहीं लिखे जा रहे हैं? दार्शनिक अन्दाज में लिखे जा रहे लम्बे चौड़े संपादकीय पढने और उन्हें समझने का समय किसके पास है? पाठक से सीधे जुड़ने वाले संपादक के नाम पत्र कालम को बंद क्यों कर दिया गया है? कुल मिलकर पाठक ही आपसे कहीं बहुत पीछे छूट गया लगता है! आपके लिए नि:संदेह यह समय सेलेब्रेट करने, गर्व करने और भाव विभोर होने का है लेकिन यह समय आत्मचिंतन करने का भी है. यदि आप आहत हुए हों तो मैं अपने लिखे पर माफ़ी चाहूँगा. इसे मैं दैनिक भास्कर के facebook पेज पर पोस्ट कर चुका हूँ.
श्रीप्रकाश दीक्षित                                                                                                            
एचआईजी-108,गोल्डन वैली हाईटस                                       
आशीर्वाद कालोनी के पीछे ,कोलार रोड,        
भोपाल-462042


रमेश चंद्र अग्रवाल ने क्या लिखा है दैनिक भास्कर में, पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

दैनिक भास्कर देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार

 

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दैनिक भास्कर देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार

प्रिय पाठकों,

भास्कर के लाखों पाठक परिवारों को नमन के साथ, मुझे यह बताते हुए खुशी है कि आपका अपना अखबार दैनिक भास्कर अब देश का सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार हो गया है। समाचार पत्रों की विश्वसनीय संस्था ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (ABC) ने अपनी जनवरी-जून 2014 की रिपोर्ट में यह प्रमाणित किया है कि किसी भी भाषा में निकलने वाले अखबारों में दैनिक भास्कर की प्रसार संख्या देश में सबसे ज्यादा है।

यह गर्व का क्षण भी है और भावुकता का भी। 1958 में भोपाल से शुरू हुई यह यात्रा 1983 में इंदौर और उसके बाद पूरे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पहुंची। 1996 में पहली बार भास्कर ने मध्यप्रदेश से बाहर राजस्थान में अपना कदम रखा जहां उसने जयपुर में पहले ही दिन से सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबार का रिकॉर्ड कायम किया। 2000 में चंडीगढ़, हिमाचल एवं हरियाणा और उसके बाद भास्कर पंजाब पहुंचा। 2003 में भास्कर ने भाषा की सरहदों को पार करते हुए गुजरात में दिव्य भास्कर के नाम से गुजराती अखबार शुरू किया जो आज गुजरात का अग्रणी अखबार है। 2011 में भाषा की सरहदों को आगे बढ़ाते हुए दिव्य मराठी का प्रकाशन मराठी भाषा में महाराष्ट्र से किया गया। इसके साथ ही झारखंड और बिहार में भी दैनिक भास्कर ने हिंदी के संस्करण शुरू किए और इस तरह भास्कर समूह 14 राज्यों में फैल गया। इन सारी सफलताओं और विस्तार के मूल में जिसका सबसे अहम योगदान रहा है वह हैं आप और आपका परिवार, यानी कि हमारे पाठक।

मैंने हमेशा कहा है कि दैनिक भास्कर अपने नाम के मुताबिक सूर्य की तरह सबका है और उसकी हर खबर और विचार पर अधिकार उसके पाठकों का है। इस मौके पर दोहराना चाहता हूं कि हम इस बात को कभी न भूले हैं और न ही कभी भूलेंगे। पाठक हमारी सबसे बड़ी पूंजी और प्राथमिकता है। भरोसा रखिये कि हम न सिर्फ आपकी अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे बल्कि अखबार को लगातार बेहतर बनाते रहेंगे ताकि वह समाज और संसार में आपको एक जागरूक, जानकार और नॉलेज से समृद्ध पाठक के रूप में हमेशा आगे रखे।

दैनिक भास्कर आज एक संपूर्ण मीडिया समूह है। चार भाषाओं (हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेेजी) में इसके 14 राज्यों में 58 संस्करण हैं। माय एफएम के नाम से 17 प्रमुख शहरों में रेडियो स्टेशन हैं। dainikbhaskar.com हिंदी की वेबसाइट के पास 1 करोड़ 20 लाख मंथली यूनिक विजिटर हैं और divyabhaskar.com गुजराती वेबसाइट के 25 लाख यूनिक विजिटर हैं। facebook पर 48 लाख लाइक्स के साथ देशभर की हिंदी न्यूज वेबसाइट्स में इसकी सर्वाधिक पहुंच है। भास्कर परिवार अपने सभी पाठकों, उनके परिजनों, विज्ञापनदाताओं और शुभ चिंतकों को पुन: नमन करता है क्योंकि भास्कर आज जहां है वह आप ही की वजह से है।
पिछले बरस की असीम सुखद यादों और आने वाले वर्ष की अनंत शुभकामनाओं के साथ पुन: धन्यवाद।
 
आपका
रमेशचंद्र अग्रवाल
चेयरमैन, दैनिक भास्कर समूह


(दैनिक भास्कर अखबार में प्रथम पेज पर प्रकाशित विशेष संपादकीय)


दैनिक भास्कर के एक पाठक ने रमेश चंद्र अग्रवाल को क्या समझाया बताया है, जानने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

रमेशचंद्र अग्रवाल के नाम दैनिक भास्कर के एक पाठक का पत्र

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इस संपादक के काले कारनामों से पूरा अजमेर और मीडिया वाकिफ है

: तेरह साल मीडिया में काम करने के बावजूद एक वरिष्ठ साथी ने इतना सा सहयोग नहीं किया : आपके सामने होता तो आपके मुंह पर थूक कर जाता : अभी दो दिन पहले मैंने और मेरे रिश्तेदार अधिकारी ने दो गलती की…मेरे रिश्तेदार को अपनी गलती पर पछतावा होगा या नहीं…ये तो मैं नहीं जानता…लेकिन मुझे मेरी गलती पर कोई पछतावा नहीं…वे रिश्तेदार राजस्थान रोडवेज में अजमेर आगार में आगार प्रबंधक है और जयपुर के एक विधायक के छोटे भाई हैं…दो दिन पहले उनका परिवार जयपुर से अजमेर के लिए अजमेर आगार की बस में बैठकर रवाना हुआ…इसमें उनका निजी परिवार और आश्रित माँ के आलावा शायद एक दो लोग और थे…बस कंडेक्टर ने इस मामले की जानकारी सिन्धी कैंप से अजमेर आगार प्रबंधन को दे दी…

प्रबंधन ने अधिकारी के परिवार का मामला होने का मामला बताकर उन्हें लाने की अनुमति दे दी….रोडवेज में ऐसा आमतौर पर होता है…मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ…बस के ड्राईवर ने चीफ मैनेजर से पुरानी खुन्नस निकालने के लिए अजमेर में एक आप नेता को फोन कर दिया…उसने बीच रास्ते में बस रोक कर हंगामा खड़ा कर दिया…फ़्लाइंग जाँच पहुंची तो 9 में से 5 लोगों के पास रोडवेज  कर्मचारियों को मुफ्त यात्रा के लिए मिलने वाले पास पाए गए…मामला मीडिया तक पहुँच गया…

मुझे बड़े भाई का फोन आया…जानकारी करने पर पता चला अजमेर में राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति उस आप नेता को और उसकी खबरों को कोई तरजीह नहीं देते हैं…लेकिन दैनिक भास्कर में उसकी तगड़ी सेटिंग है….मैंने कुछ समय अजमेर भास्कर में सीनियर रिपोर्टर के तौर पर काम भी किया था….भास्कर में रोडवेज की खबर लिखने वाला रिपोर्टर मेरा मित्र था…लिहाजा मैंने उसे फोन किया तो उसने खबर डेस्क पर चले जाने का हवाला दिया…मैंने पूरे मामले की जानकारी लेकर अजमेर भास्कर के स्थानीय संपादक रमेश अग्रवाल को फोन कर पूरे मामले की हकीकत से अवगत कराया…

मैंने पूरी जिम्मेदारी लेते हुए अग्रवाल साहब से अनुरोध किया कि सर खबर पूरी तरह फर्जी है…अधिकारी के खिलाफ यह षड्यंत्र रचाया गया है…मैंने उन्हें बहुत बड़ा मामला नहीं होने की बात कहकर खबर रोकने का आग्रह किया…संपादक ने कहा खबर कभी रोकी नहीं जाती…मैं उनके तर्क से सहमत हुआ…अख़बार की गरिमा और मेरा पारिवारिक मामला होने का हवाला देकर मैंने उन्हें खबर में सही तथ्य छापने का निवेदन किया…उन्होंने मुझे पूरी मदद के लिए आश्वस्त किया…इस सिलसिले में देर रात तक मेरी उनसे तीन बार फोन पर बात भी हुई…उन्होंने आश्वस्त किया की मैं देख लूँगा, तुम चिंता मत करो…

अगले दिन सुबह खबर छप गई…इनकी एडिटिंग की हालत देखिए रोडवेज के चीफ मैनेजेर को निक नेम में सीएम बुलाते हैं…इन बुद्धी के मारों ने सीएम वसुंधरा राजे लिख दिया…कभी खबर पढ़ते तो एडिट करते ना…खबर जो छपी आपके सामने रख रहा हूँ… आप खुद अंदाजा लगाना…खबर कितनी फर्जी है…जिस तरह ख़बर छपी, बेहद दुख हुआ…तेरह साल मीडिया में काम करने के बावजूद एक वरिष्ठ साथी ने इतना सा सहयोग नहीं किया…जब मुझे और आप सबको पता है इन संस्थानों में खबरों के साथ क्या होता है…जब मैंने उन्हें फोन किया तो बचने के लिए तर्क था…स्टेट हेड का फोन आ गया था…मैंने कहा- सर आप मुझे फोन पर बता देते…मैं स्टेट हेड से बात कर लेता…इस पर उन्होंने मुझ पर अपनी अफसरी झाड़ते हुए कहा…अब क्या तुम मुझे निर्देश दोगे…मैंने भी तपाक से जवाब दे दिया “निर्देश क्या, आपका जूनियर पत्रकार होने और विनम्र अनुरोध करने के बावजूद मेरे साथ जो किया है…अगर अभी मैं आपके सामने होता तो आपके मुंह पर थूक कर जाता”

हो सकता है मैंने गलत किया हो…कुछ लोगों को बुरा भी लगेगा…लेकिन मुझे इसका ना तो कोई मलाल है ना ही कोई रंज…भले ही इसके लिए मुझे कुछ भी भुगतना पड़े…ऐसे घटिया लोगो को सबक सिखाने का यही तरीका है…इस संपादक के काले कारनामों से पूरा अजमेर और मीडिया वाकिफ है…मालिकों के सामने दया का पात्र बनकर ये अजमेर में बरसों से जमा बैठा है…इसने ऑफिस में अपने तीन दलाल पाल रखे हैं और बेचारे जूनियर रिपोर्टरों से रिपोर्टिंग के बजाय खुद के धंधेबाजी के काम करवाते हैं…एक सटोरिये के पैसों से शहर में युवराज रेसीडेंसी में क्या कारनामे किए हैं सबको पता है…हमको आज भी खाने के फाके हैं और साहब की फेक्टरियाँ चल रही हैं…इनके कारनामों पर तो पूरी किताब लिखी जा सकती है…आजकल अपने चेलो से एक प्रेस क्लब बनवाकर खुद अध्यक्ष बनकर बैठे हैं…भास्कर प्रबंधन है कि धृतराष्ट्र बना बैठा है…

खैर, ये पहला मामला नहीं…गालियाँ सुनने के आदी है ये लोग तो…भास्कर में काम करने के दौरान मेरी कई ख़बरें रोकने पर इनने और इनके एक चेले संतोष गुप्ता ने कई बार गलियाँ सुनी थी…आप लोग यह मत समझना कि इसने मेरे कहने पर खबर नहीं रोकी तो में बदला लेने के लिए ऐसे लिख रहा हूँ…सवाल यह है बरसों से मीडिया में होने के बावजूद एक पत्रकार अपने साथी पत्रकार के पारिवारिक मामलों में इतना भी सहयोग नहीं कर सकता तो क्या मतलब इन भड़वों को सर-सर करने का…सुन लेना भड़वों मैंने शान से और पूरी ईमानदारी से पत्रकारिता की है…मैं किसी के बाप से नहीं डरता हूँ…तुम जैसे भांड मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते…मैं तो फ़कीर हूँ…खोने को मेरे पास कुछ नहीं…तुम्हारी तो दलाली की दुकाने है…सोच लेना…जो नेता मुझ से डरते थे तुम लोगों को उनके आगे गिड़गिड़ाते देखा है मैंने…कहो तो नाम भी बता दूं…इस दुनिया में मैं भगवान के बाद सिर्फ श्रीपाल शक्तावत से डरता हूँ…वो पत्रकारिता के असली मर्द हैं…तुम तो दल्ले हो दल्ले (यह शब्द सबके लिए नहीं है…उसके लिए ही है जिनकी मैं बात कर रहा हूँ…अजमेर की पत्रकारिता में कई अच्छे लोग भी हैं)

लेखक कमलेश केशोट राजस्थान में वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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एक नामचीन अखबार के मालिक ने एक महिला को शादी का झांसा देकर दैहिक शोषण किया, फिर निकाल बाहर किया

Sumant Bhattacharya : चौबीस साल की पत्रकारिता में यही पाया कि सत्ता में बैठे ज्यादातर मर्दों के लिए अपनी ताकत और ओहदे का आखिरी मकसद सिर्फ औरत का जिस्म हथियाना ही है।सत्ता के ताकत का अंतिम लक्ष्य। यदि कोई आकर्षक महिला नज़र में उतर गई तो यकीन मानिए, बहुतेरे अधिकारी, मंत्री, सांसद, विधायक, संपादक, प्रोफेसर और सीइओ अपनी पूरी मेघा और समूचे कायनात की ताकत उस महिला को जिस्मानी तौर पर हासिल करने में लगा देगा। यहां रेखांकित कर दूं कि तमाम अच्छे इंसान भी इनमें। लेकिन वो नैतिक तौर पर पस्त समाज के सामने खामोश ही बने रहते हैं।

सुमंत भट्टाचार्य

ना जाने कितने ही वाकयात मैं बेहद करीब से जानता हूं, कितने ही मामलों में ऐसी औरतें सामने भी आईँ, लेकिन समाज और मीडिया उनके साथ खड़ा होना तो दूर, हमदर्दी के दो शब्द बोलने को राजी ना हुआ। यदि मीडिया नपुंसक है तो यह समाज उससे कम नपुंसक नहीं है। दरअसल, देर रात को मित्र Yashwant Singh का न्यूज़पोर्टल Bhadas4media.com पढ़ रहा थ। एक नामचीन अखबार के मालिक ने एक महिला को शादी का झांसा देकर दैहिक शोषण किया., फिर निकाल बाहर किया। और हद तो तब हो गई जब जयपुर में उस महिला ने अपने वकील के साथ प्रेस कांफ्रेंस की तो सारे मीडिया जगत को सांप सूंघ गया। चौतरफा सन्नाटा।

नपुंसक मीडिया का एक नमूना कल आप मेरी इस पोस्ट पर भी देखेंगे, मेरे सारे पत्रकार मित्र इस पोस्ट से कुछ यूं बचकर निकलेंगे, कहीं उनके साफ-सुधरे पांव कीचड़ में ना पड़ जाए। मीडिया पर सवर्णों के कब्जे का नारा उछालने वाले भी कल नपुंसकों की भीड़ में शामिल होंगे..सच नारी के बारे में आखिरी सच द्रोपदी की वही पंक्ति है, “जो सबका होता है, उसका कोई नहीं होता।” लेकिन नारी ही असल कसौटी है..इस सियासत और मर्दों की औकात को जांचने की। बस आप में कूवत होनी चाहिए, और मुझे शक है कि यह कूवत आप में होगी।

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य के फेसबुक वॉल से.

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रमेश चंद्र अग्रवाल के कुकर्मों पर रेप पीड़िता लिख रही हैं किताब, मामले की कोर्ट में सुनवाई 29 अक्टूबर को

शादी का झांसा देकर पहले पति से तलाक दिलाना फिर खुद लगातार बलात्कार करने वाले भास्कर समूह के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के कुकर्मों पर किताब लिखने की तैयारी कर रही है रेप पीड़िता. भड़ास4मीडिया से बातचीत में जयपुर निवासी 45 वर्षीय पीड़िता ने बताया कि रमेश चंद्र अग्रवाल ने जो जो किया, कहा और जिया है, उस वह किताब में लिखेगी. पीड़िता का कहना है कि मीडिया का उसे बिलकुल सपोर्ट नहीं मिल रहा है. कोर्ट में सुनवाई के दौरान ईटीवी से लेकर पत्रिका तक के लोग जाते हैं लेकिन कोई खबर छापता दिखाता नहीं है. साथ ही पूरे मामले में पुलिस प्रशासन का रोल भी नकारात्मक है.

पीड़िता के मुताबिक वह तो बिलकुल सड़क पर आ गई हैं. रमेश चंद्र अग्रवाल के कहने पर उन्होंने अपने पति को तलाक दिया. जब शादी की बारी आई तो रमेश चंद्र अग्रवाल ने उनका इस्तेमाल करके छोड़ दिया. एक समय था जब रमेश चंद्र अग्रवाल कहते थे कि वे किसी भी हालत में साथ नहीं छोड़ेंगे. लेकिन जब उनके बेटों ने उन पर दबाव बनाया तो वे चुप्पी साध कर किनारे हो गए. पीड़िता के मुताबिक उन्होंने कई बार कहा कि उन्हें कोई संपत्ति या संपत्ति में हिस्सा नहीं चाहिए. संपत्ति में हिस्सा न लेने की बात उन्होंने लिखकर देने को भी कहा. लेकिन रमेश चंद्र अग्रवाल अपनी आदत के मुताबिक इज्जत और भावनाओं से खेलकर अलग हो गए और उल्टे आरोप लगा दिया कि महिला ही ब्लैकमेलर है.

पीड़िता ने बताया कि लोअर कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों जगहों पर इसी 29 अक्टूबर को मामले की सुनवाई है. वह किसी भी हालत में यह लड़ाई बंद नहीं करने वाली हैं. उन्होंने बताया कि उन्होंने और उनके वकील ने जयपुर में प्रेस कांफ्रेंस कर पूरे मामले के बारे में मीडिया को बताया लेकिन किसी मीडिया हाउस ने खबर का प्रकाशन नहीं किया. इससे वो निराश हैं लेकिन उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में लोग उनके साथ खड़े होंगे और न्याय की लड़ाई में साथ देंगे. पीड़िता ने साफ कहा कि उनका मकसद न तो कभी किसी को ब्लैकमेल करने का रहा है और न ही धन पाने का. वह तो प्रेम और भावना में बह कर रमेश चंद्र अग्रवाल की बातों पर भरोसा कर बैठीं जिसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है. ऐसे धोखेबाज, कुकर्मी, घटिया इंसान के खिलाफ अपनी लड़ाई वह जारी रखेंगी और दंड दिलाकर ही मानेंगी, भले ही इसके लिए जितना संघर्ष करना पड़े.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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