रवीश को रवीश में उलझाना एक साज़िश है!

Sheeba Aslam Fehmi : जबकि पत्रकारिता पर गहरा नैतिक संकट आया हुआ है और मौजूदा दौर के लिए ज़रूरी हैं रवीश कुमार, तो सत्ता यही चाहेगी की रवीश खुद खबर बन जाएं और सफाई देने में उलझे रहें. लेकिन हमें सतर्क रहना होगा. इस मामले में रवीश खुद बेहद सतर्क हैं. अपने काम में निजी जीवन का कोई पहलू कभी आड़े ना आये इसके लिए उनके कई नियम और त्याग तो मैं भी जानती हूँ.

‘बागों में बहार है’ के लिए रवीश को सज़ा..?

टीवी एंकर रवीश कुमार के भाई पर यौन शोषण का आरोप क्या लगा मानों कुछ गुमनाम पत्रकारों को अपने नाम को सुर्खियों में लाने का मौका मिल गया…रवीश कुमार पर इन पत्रकारों के हमले से मुझे जलन की बू आ रही है…वो इसलिए कि… शायद रवीश के साथ जिन पत्रकारों ने अपना सफर तय किया था उन्हें वक्त के साथ उतनी शोहरत नहीं मिली जितनी उन्होंने ख्वाहिश पाल रखी थी… और रवीश ने रोज नए- नए मकाम हासिल कर अपनी एक अलग पहचान बनाई…

रवीश कुमार सब करने ही लगेगा तो नंगों के बीच बदनाम कब होगा!

प्राइम टाइम को रामजस कॉलेज में बदलना खेल नहीं था -रवीश कुमार- गुरुवार सुबह नौ बजे जब हम मूलचंद फ्लाईओवर से एंड्र्यूज गंज केंद्रीय विद्यालय की तरफ उतर रहे थे, तभी कार की खिड़की से देखा कि थोड़ी दूर एक बुज़ुर्ग अपना नियंत्रण खोते हैं और स्कूटर से गिर जाते हैं। टक्कर कैसे लगी, यह …

आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो क्या अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे?

Abhishek Upadhyay : ये अखबार वाले भी न। ये भी नही समझते एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के प्रताप को। अब कल मैंने जो लिखने से मना किया था। आज वही छाप दिए। दंग हूँ मैं आज का टाइम्स ऑफ़ इंडिया पढ़कर। ये तो खबर छाप दिए है बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष और बिहार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के बेहद करीबी ब्रजेश पांडेय सेक्स स्कैंडेल में फंसे। पद से इस्तीफ़ा दिए। रेप के साथ-साथ पॉस्को (बच्चों का शोषण वाली धारा) भी लगा। हाँ हाँ वही। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय (उफ़ ये आदत), माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के सगे बड़े भाई ब्रजेश पांडेय।

यह हमला रवीश पर नहीं, आलोचना का साहस रखने वाली पत्रकारिता पर है : ओम थानवी

Om Thanvi : आलोचक उनके लिए दुश्मन होता है; ‘दुश्मनी’ निकालने का उनके पास एक ही ज़रिया है कि आलोचक को बदनाम करो, उसका चरित्र हनन करो। भले वे विफल रहें, पर जब-तब अपनी गंदी आदत को आज़माते रहते हैं। उनकी आका भाजपा की वैसे ही रवीश से बौखलाहट भरी खुन्नस है। रवीश कुमार फिर उनके निशाने पर हैं। रवीश के भाई ब्रजेश बिहार में चालीस साल से कांग्रेस की राजनीति करते हैं।

भाई दोषी है तो कोर्ट सजा दे, इसमें मेरी क्या गलती है : रवीश कुमार

बिहार के टीवी पत्रकार संतोष सिंह से बातचीत में रवीश कुमार ने कहा कि अगर भाई दोषी है तो कोर्ट उन्हें सजा दे, इसमें मेरी क्या गलती है. पढ़िए संतोष सिंह की पूरी पोस्ट…

भक्तों की टोली को हुआं हुआं करने दो, रविश का बाल भी बांका न कर सकेंगे शिकारी

Sheeba Aslam Fehmi : बेदाग़ करियर वाले सेक्युलर बुद्धिजीवियों को घेरने के लिए एक ही रास्ता बचा है की यौन शोषण का आरोप लगा दो. जहाँ आरोप लगाने वाले को कुछ साबित नहीं करना पड़ता. अगर वो ख़ुद बेहद्द सतर्क हों तो कोई बात नहीं परिवार के किसी सदस्य पर लगा दो, और भक्तों की टोली हुआं हुआं करती सोशल मीडिया के ज़रिये जान ले लेगी. लेकिन रविश ने बीस साल के बेदाग़, रौशन करियर में घास नहीं छीली है, उन्होंने जो इज़्ज़त, भरोसा और समर्थन हासिल कर लिया है, उसके रहते शिकारी उनका बाल बांका नहीं कर सकेंगे.

रवीश कुमार को बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांग देना चाहिए!

Nitin Thakur : मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा है कि ये सरकार रवीश कुमार को इतनी मोहलत क्यों दे रही है। उन्हें तो बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांगा जाना चाहिए। आखिर किसी पत्रकार के भाई का नाम सेक्स रैकेट चलाने में आए और फिर भी पत्रकार को खुला घूमने दिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है? पहले तो उनके भाई ब्रजेश पांडे ने लहर के खिलाफ जाकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली.. ऊपर से टिकट लेकर विधायकी लड़ने का जुर्म किया.. इसके बाद भी ना ब्रजेश पांडे में राष्ट्रवाद ने उफान मारा और ना ही उन्हें देश के हिंदुओं की कोई फिक्र हुई.. कांग्रेस में ही उपाध्यक्ष का पद लेकर राजनीति जारी रखी।

क्या रवीश के शो की टीआरपी ना आने की वजह से किसी को दस्त लग सकते हैं?

Nitin Thakur : क्या रवीश कुमार के शो की टीआरपी ना आने की वजह से किसी को दस्त लग सकते हैं? जी हां, लग सकते हैं। एक जाने-माने दरबारी विदूषक (विदूषक सम्मानित व्यक्ति होता है, दरबारी विदूषक पेड चाटुकार होता है) का हाजमा खराब हो गया और उसने मीडिया पर अफवाह फैलाने वाली एक वेबसाइट का मल रूपी लिंक अपनी पोस्ट पर विसर्जित कर दिया। कई बार लोग जो खुद नहीं कहना चाहते या लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वो किसी दूसरे के लिखे हुए का लिंक डाल कर बता देते हैं।

रवीश के इस प्राइम टाइम शो को हम सभी पत्रकारों को देखना चाहिए

एनडीटीवी इंडिया पर कल रात नौ बजे प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश कुमार ने पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर एक परिचर्चा आयोजित की. इस शो में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी और प्रकाश के रे के साथ रवीश ने मीडिया और पत्रकार पर जमकर चर्चा की.

बरखा दत्त एनडीटीवी से मुक्त हुईं, देर सबेर रवीश कुमार भी जा सकते हैं!

बरखा दत्त ने 21 साल की नौकरी के बाद एनडीटीवी को अलविदा कह दिया. वह खुद का वेंचर शुरू करेंगी. उधर एनडीटीवी ने भी बयान जारी कर बरखा दत्त के इस्तीफे की वजह बताई है. बरखा दत्त एनडीटीवी में बतौर कंसल्टिंग एडिटर कार्यरत थीं.  आधिकारिक बयान जारी करके एनडीटीवी ने उनके लंबे समय तक चैनल के साथ कार्यकाल की तारीफ की और उनके भविष्य के लिए बधाई दी है.

बरखा दत्त और रवीश कुमार का ईमेल व ट्वीटर एकाउंट हैक

रवीश कुमार ने ईमेल-ट्वीटर एकाउंट हैक किए जाने को लेकर अपने ब्लाग नई सड़क पर एक पोस्ट का प्रकाशन किया है, जो इस प्रकार है…

हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे..

रवीश कुमार

मेरे हमसफ़र दोस्तों….

गुंडों का रवीश कुमार को धमकाना… एबीपी न्यूज-आजतक जैसे चैनलों को पब्लिक का दुःख न दिखना

Virendra Yadav : तीन दिनों से लगातार देख रहा हूँ एनडीटीवी पर. रवीश कुमार अपनी टीम के साथ बैंकों के सामने लगी कतारों, नोटों को लेकर अफरा तफरी और आम जनता की तकलीफों को ग्राऊंड जीरो से प्राईम टाईम रिपोर्ट में पेश कर रहे हैं. हर कहीं दो चार लोग आकर उन्हें धमकाते हुए यह कहते दीखते हैं कि ‘जनता खुश है, सब ठीक है आप गलत रिपोर्ट पेश कर रहे हो’. आज बुलन्दशहर की रिपोर्टिंग के दौरान यही हुआ. उद्विग्न रवीश को एनडीटीवी के दर्शकों से यह कहना पड़ा कि ‘अगर यही सब चलता रहा तो जल्द ही टीवी पर आप सच्चाई नहीं देख पायेंगे’. सच का गला घोंटने की यह दबंगई हिटलर के दौर के उन ‘ब्राउन शर्ट’ दस्तों की याद दिलाती है जो फासीवाद के सफरमैना की भूमिका में थे. सचमुच हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. इन पदचापों को न सुनने की भूल आत्मघाती होगी.

रवीश जैसे पत्रकार का ये हाल है तो बाकी रिपोर्टर्स और स्थानीय पत्रकारों का क्या होता होगा?

Rakesh Srivastava : रवीश को धमकाने का काम प्रायोजित है ऐसा मुझे नहीं लगता। बैंको के बाहर की हर लाईन में बहुत लोग प्रधानमंत्री के इस कदम की सराहना करने वाले भी मिलते हैं, इस सच्‍चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन, यह भी अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है कि मोदी जी के समर्थक टाईप अधिकांश लोग बुली करने टाईप ही क्‍यों होते हैं। दो चार बुली करने वाले दसियों साधारण लोग की आवाज़ को दबा देते हैं। ऐसा सब जगह हो रहा है। इस प्रवृति को एक्‍सपोज कर रवीश ने अच्‍छा किया।

रवीश और उनकी टीम को मुट्ठी भर मोदी भक्त नुमा असामाजिक तत्व धमकाने में जुटे!

Tarun Vyas : मैं रवीश के दीवानों वाली सूची में शामिल नहीं हूं और न होना चाहता हूं। लेकिन रवीश कुमार की पत्रकारिता के अंदाज़ से प्रभावित ज़रूर हूं। रवीश का गुरुवार और शुक्रवार का प्राइम टाइम जिस किसी ने भी देखा मैं उन से दो सवाल पूछना चाहता हूं। क्या बैंकों में लगी कतारें और कतारों में भूखे प्यासे आंसू बहाते लोग झूठे हैं? और क्या नरेंद्र मोदी का रुंधा गला ही देशभक्ति का अंतिम सत्य है ? मेरे सवाल आपको नकारात्मक लग सकते हैं क्योंकि जब दाल 170 रुपए ख़ामोशी के साथ ख़रीदी जा रही हो तो इस तरह के सवालों का कोई मोल नहीं होता।

अर्णब गोस्वामी और रवीश कुमार पत्रकारिता के दो विपरीत छोर हैं : उदय प्रकाश

Uday Prakash : There have been two striking popular and leading poles in TV journalism spirited these days. One in English and the other in Hindi. I’m always skeptical about Hindi as it’s always characterized by the people who represent it, in politics, culture and media. My friends here on Facebook know about my views through my posts time and again. One of the poles, in English was Times Now, anchored by Arnab Goswami and the other, in Hindi is NDTV, with its anchor Ravish Kumar. 

मोदी के ‘जय श्री राम’ कहने का रवीश वैसे ही मज़ाक उड़ाएंगे जैसे वरुण गांधी का मज़ाक बनाया था?

Abhishek Srivastava : हां जी, तो दशहरा बीत गया। एक झंझट खत्‍म हुआ। आइए अब मुहर्रम मनाते हैं, कि दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र के सबसे ऊंचे संवैधानिक पद पर बैठे शख्‍स ने त्‍योहार के बहाने पांच बार ”जय श्रीराम” का नारा लगाया और यह कह कर कि आवाज़ दूर तक पहुंचनी चाहिए, जनता को भी ललकार दिया। ‘अपने’ रवीश कुमार कहां हैं भाई? जब प्रधानजी नारा लगा रहे थे, तब मैं सोच रहा था कि क्‍या रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में वैसे ही उनका मज़ाक उड़ाएंगे जैसे 2009 में पीलीभीत में वरुण गांधी द्वारा चुनावी रैली में यह नारा लगाने पर उन्‍होंने उनका मज़ाक बनाया था?

भांड पत्रकारिता के दौर में देश का मनोबल बढ़ा हुआ है

-रवीश कुमार-

बलों में बल मनोबल ही है। बिन मनोबल सबल दुर्बल। संग मनोबल दुर्बल सबल। मनोबल बग़ैर किसी पारंपरिक और ग़ैर पारंपरिक ऊर्जा के संचालित होता है। मनोबल वह बल है जो मन से बलित होता है। मनोबल व्यक्ति विशेष हो सकता है और परिस्थिति विशेष हो सकता है। बल न भी रहे और मनोबल हो तो आप क्या नहीं कर सकते हैं. ये फार्मूला बेचकर कितने लोगों ने करोड़ों कमा लिये और बहुत से तो गवर्नर बन गए। जब से सर्जिकल स्ट्राइक हुई है तमाम लेखों में यह पंक्ति आ जाती है कि देश का मनोबल बढ़ा है। हमारा मनोबल स्ट्राइल से पहले कितना था और स्ट्राइक के बाद कितना बढ़ा है,इसे कोई बर्नियर स्केल पर नहीं माप सकता है। तराजू पर नहीं तौल सकता है। देश का मनोबल क्या होता है, कैसे बनता है, कैसे बढ़ता है, कैसे घटता है।

संकट होता है तब, जब आप किसी को ‘कल्ट’ बना देते हैं, जैसे रवीश भी कल्ट बना दिये गये हैं!

Sanjeev Chandan : रवीश कुमार को मैं भी पसंद करता हूं, उनकी पत्रकारिता को, उनके गद्य को। उनकी प्रतिबद्धता का भी कायल हूं, और उन्हें किसी भी पक्ष के द्वारा बुली किये जाने का सख्त विरोधी हूं। विरोध गाहे- बगाहे लिखकर भी प्रकट करता रहा हूं। लप्रेक के उनके प्रयोग से बहुत वास्ता न होते हुए भी उनके संग्रह की कुछ कहानियां मुझे बहुत पसंद है- खासकर डा. आंबेडकर की मूर्ति के पास प्रेमी-युगलों के संवाद वाली कहानी।

रवीश के इस प्राइम टाइम को देखने के बाद यशवंत ने क्या लिखा FB पर, आप भी पढ़ें

यशवंत

Yashwant Singh : न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया आपको मानसिक रोगी बना सकते हैं। कल बहुत दिन बाद न्यूज़ चैनल खोला तो अपनी पसंद के अनुरूप ndtv प्राइम टाइम रविश कुमार को देखा। मनोरोग सप्ताह मनाए जाने के दौरान ndtv ने प्राइम टाइम में इसी सब्जेक्ट को चुना। इसी कार्यक्रम में रविश ने बताया कि ताजा शोध के मुताबिक दुनिया भर में न्यूज़ चैनल्स लोगों को मनोरोगी बना रहे हैं।

प्रधानमंत्री को लात मारना या गोली मारना टाइप के अतिरेक से बचना चाहिए : रवीश कुमार

Ravish Kumar : गोली मार देने की बात मुझे नहीं जंची, भले ही यह बात इसलिए कही गई हो कि ठोस तरीके से मैसेज चला जाए. मेरी राय में प्रधानमंत्री को ऐसे अतिरेक से बचना चाहिए था. जिन गौ रक्षकों को वे दो दिन से असामाजिक तत्व, नकली गौ रक्षक, भारत की एकता को तोड़ने वाला मुट्ठी भर समूह बता रहे थे, उनके लिए यह कहना कि मुझे गोली मार दो मगर मेरे दलित भाइयों को मत मारो. जो लोग प्रधानमंत्री की नज़र में कानून और समाज के अपराधी हैं उन्हें हमारे प्रधानंत्री को गोली मारने की इजाज़त कतई नहीं दी जा सकती. इलाहाबाद की परिवर्तन रैली में भी प्रधानमंत्री ने कह दिया था कि मुझे यूपी में एक बार मौका दीजिए, पांच साल में अपने किसी काम के लिए आपका नुकसान कर दिया तो मुझे लात मार कर बाहर कर दीजिएगा.

कश्मीर में मीडिया पर बैन का कोई तुक नहीं बनता : रवीश कुमार

कश्मीर में अख़बार बंद है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आज दूसरा दिन है जब वहाँ किसी को अख़बार नहीं मिला है। राज्य सरकार ने अख़बारों के छपने और वितरण पर रोक लगा दी है। दिल्ली की मीडिया में ख़बरें आई हैं कि कर्फ़्यू के कारण वितरण रोका गया है। छपी हुई प्रतियाँ ज़ब्त कर ली गई हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट भी बंद है। कर्फ़्यू के कई दिन गुज़र जाने के बाद राज्य सरकार को ख़्याल आया कि अख़बारों को बंद किया जाए। क्या कर्फ़्यू में दूध,पानी सब बंद है? मरीज़ों का इलाज भी बंद है? आधुनिक मानव के जीने के लिए भोजन पानी के साथ अख़बार भी चाहिए। सूचना न मिले तो और भी अंधेरा हो जाता है। अफ़वाहें सूचना बन जाती हैं और फिर हालात बिगड़ते ही हैं, मन भी बिगड़ जाते हैं। खटास आ जाती है।

राजस्थान हाईकोर्ट के वकील डॉ. विभूति भूषण शर्मा ने भी दिया रोहित सरदाना के पत्र का जवाब

श्री रोहित सरदाना जी,

जिस तरह से आपने रवीश की चिठ्ठी के जवाब में चिठ्ठी लिखी उससे ये प्रतीत होता है कि रवीश कुमार की चिठ्ठी ने आपके मनो मस्तिष्क में बहुत गहरे से प्रहार किया, आपकी चिठ्ठी पढ़कर ऐसा लगा कि रवीश कुमार की कलम ने आपको नंगा कर दिया और आप तिलमिला उठे। रवीश ने चिठ्ठी लिखी अकबर को और चोट लगी आपको, मामला संदिग्ध है, बहुत कुछ स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है क्योंकि अकबर को लिखी चिठ्ठी केवल अकबर के लिए नहीं बल्कि अकबर जैसों के लिए थी, यद्दपि अकबर जैसों में आप बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून बाजपेई और आशुतोष को रखते हैं लेकिन आपका दर्द बयान करता है कि आपको ऐसा लगा कि जैसे रवीश कुमार ने ये चिठ्ठी आपको लिखी हो।। रवीश जी ने तो पहले विजय माल्या सहित बहुत लोगों को इसी अंदाज में चिट्ठियाँ लिखी है लेकिन तब आपको टीस नहीं हुई। इस चिठ्ठी को पढ़कर आपका दर्द बड़ा बेदर्द निकला।

सॉरी रवीश जी! इस बार आप हास्यास्पद लगे, पत्र से जहालत झांक रही

Prabhat Ranjan : रवीश कुमार का बहुत सम्मान करता हूँ लेकिन अपने खुले पत्र में एम जे अकबर के लिए उन्होंने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है वह आपत्तिजनक है। अकबर बहुत बड़े लेखक पत्रकार रहे हैं। नेहरु पर लिखी उनकी किताब बेहतरीन है। एक बड़े विद्वान का आकलन क्या महज उसकी विचारधारा से होगा? रवीश जी बड़ी मासूमियत से बड़ी भावुकता से लिखते हैं लेकिन उनके इस पत्र में उनकी जहालत भी झाँकती दिखाई देती है। यह पत्र ख़ुद को विक्टिम मोड में रखकर मौक़े पर चौका मारने की कोशिश से अधिक नहीं लगा। मैं हिंदी का एक मामूली लेखक हूँ लेकिन सॉरी रवीश जी इस बार आप हास्यास्पद लगे।

एमजे अकबर के नाम रवीश कुमार और रवीश कुमार के नाम रोहित सरदाना के पत्र की सोशल मीडिया पर खूब चर्चा

पहला पत्र रवीश कुमार का एमजे अकबर के नाम…..

आदरणीय अकबर जी,

प्रणाम,

ईद मुबारक़। आप विदेश राज्य मंत्री बने हैं, वो भी ईद से कम नहीं है। हम सब पत्रकारों को बहुत ख़ुश होना चाहिए कि आप भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता बनने के बाद सांसद बने और फिर मंत्री बने हैं। आपने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। फिर उसके बाद राजनीति से लौट कर सम्पादक भी बने। फिर सम्पादक से प्रवक्ता बने और मंत्री। शायद मैं यह कभी नहीं जान पाऊँगा कि नेता बनकर पत्रकारिता के बारे में क्या सोचते थे और पत्रकार बनकर पेशगत नैतिकता के बारे में क्या सोचते थे? क्या आप कभी इस तरह के नैतिक संकट से गुज़रे हैं? हालाँकि पत्रकारिता में कोई ख़ुदा नहीं होता लेकिन क्या आपको कभी इन संकटों के समय ख़ुदा का ख़ौफ़ होता था?

रवीश कुमार जी, खोटे सिक्के अकेले पुलिस महकमे की टकसाल में ही नहीं ढलते, कुछ आपके पेशे में भी होंगे!

रवीश कुमार की चिट्ठी पढ़ कर यूपी के एक प्रादेशिक पुलिस अधिकारी ने लिखा जवाबी खत… भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश) के अधिकारी द्वारा रवीश के पत्र का समुचित जवाब ये रहा….

रवीश जी के ख़त का उत्तर..

प्रिय रवीश जी,

बीजेपी, सीपीएम और आप : जनता के पैसे से विज्ञापनबाजी में कोई किसी से कम नहीं

Ravish Kumar : बुधवार के रोज़ अख़बारों पर केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन छाये हुए थे। गुरुवार के दिन प्रधानमंत्री मोदी छाये हुए हैं। देश के अलग-अलग राज्यों से निकलने वाले तमाम भाषाओं के अखबारों में ये विज्ञापन छपे हैं। मीडिया के अनेक माध्यमों में कई दिनों से विज्ञापन छपते आ रहे हैं। अखबारों की संख्या और खर्चे का पता लगाना संभव नहीं हो सका, लेकिन 26 मई के दिन मोदी सरकार के दो साल पूरे करने पर ये विज्ञापन छपे हैं। आप से उम्मीद की जाती है कि आप ही के दिए गए पैसे से आपकी ही चुनी हुई सरकार के कामकाज का हिसाब आप ही तक पहुंचाने के इस प्रयास को ख़ाली न जाने दें। सुबह अगर नहीं पढ़ सके तो घर लौटकर पलट कर ज़रूर पढ़ें कि सरकार ने क्या-क्या काम करने का वादा किया है। अगर आप इन विज्ञापनों को ठीक से नहीं पढ़ेंगे तो अपने ही हाथों अपना ही पैसा बर्बाद करेंगे।

माल्या जी, आपके ललका जहाज़ की सीट के पाकेट से मैं लाल रंग वाला ईयर फोन ले आया था : रवीश कुमार

माल्या का भागना, चैनलों का जागना

आनंदप्रिय विजय माल्या जी,

आमतौर पर आदरणीय का प्रयोग होता है लेकिन आपके लिए आनंदप्रिय ठीक है । इसका कत्तई मतलब नहीं कि आप आदरणीय नहीं है । आपके कैलेंडर सराहनीय हो सकते हैं तो आप आदरणीय क्यों नहीं हो सकते हैं ।आपने समाज में मनोरंजन और रसरंजन को प्रतिष्ठित किया है । आप हमारे मुल्क ( भारत नहीं लिख रहा पता नहीं कब कौन सेडिशन लगवा दे) के उदास चेहरों के बीच खिलखिलाने का ब्रांड एंबेसडर हैं । जिसे देखिये वही दुखी है । आपको देखकर लगता था कि एक है जो सबसे सुखी है । इसलिए आपको आनंदप्रिय कहा है । लोकप्रिय तो बहुत मिल जाते हैं।

भविष्य निधि पर टैक्स मोदी सरकार के गले की फांस बनी, सफाई देने के चक्कर में ज्यादा बुरे फंसे

भविष्य निधि के भविष्य को लेकर नौकरीशुदा लोगों का वर्तमान परेशान हो गया है। क्या वित्त मंत्री अपने इस फैसले को वापस लेंगे, ऐसा तो कोई संकेत नहीं है कि नहीं लेंगे। बल्कि सूत्र आधारित जानकारी के अनुसार बीजेपी और सहयोगी दलों के सांसदों के साथ बैठक में उन्होंने उत्सुक सांसदों को कारण समझाने का प्रयास तो किया लेकिन वापसी की मांग को देखते हुए कह गए कि फैसला प्रधानमंत्री लेंगे। तो क्या ये फैसला प्रधानमंत्री का था या वित्त मंत्री ने ये कहना चाहा कि वे अपने इस फैसले पर अड़े रहेंगे। मंगलवार को एक बार फिर से राजस्व सचिव हंसमुख अधिया ने सफाई दी कि पीपीएफ पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।