राजस्थान हाईकोर्ट के वकील डॉ. विभूति भूषण शर्मा ने भी दिया रोहित सरदाना के पत्र का जवाब

श्री रोहित सरदाना जी,

जिस तरह से आपने रवीश की चिठ्ठी के जवाब में चिठ्ठी लिखी उससे ये प्रतीत होता है कि रवीश कुमार की चिठ्ठी ने आपके मनो मस्तिष्क में बहुत गहरे से प्रहार किया, आपकी चिठ्ठी पढ़कर ऐसा लगा कि रवीश कुमार की कलम ने आपको नंगा कर दिया और आप तिलमिला उठे। रवीश ने चिठ्ठी लिखी अकबर को और चोट लगी आपको, मामला संदिग्ध है, बहुत कुछ स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है क्योंकि अकबर को लिखी चिठ्ठी केवल अकबर के लिए नहीं बल्कि अकबर जैसों के लिए थी, यद्दपि अकबर जैसों में आप बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून बाजपेई और आशुतोष को रखते हैं लेकिन आपका दर्द बयान करता है कि आपको ऐसा लगा कि जैसे रवीश कुमार ने ये चिठ्ठी आपको लिखी हो।। रवीश जी ने तो पहले विजय माल्या सहित बहुत लोगों को इसी अंदाज में चिट्ठियाँ लिखी है लेकिन तब आपको टीस नहीं हुई। इस चिठ्ठी को पढ़कर आपका दर्द बड़ा बेदर्द निकला।

“कुछ तो पर्दादारी है”

खैर, कुल मिलाकर रवीश कुमार का उद्देश्य पूरा हो गया। आपने रवीश को चिठ्ठी लिखकर अपने आपको रवीश के मुकाबले का पत्रकार साबित करने का प्रयास किया लेकिन आप जो थे उससे और अधिक बौने साबित हुए। आपकी चिठ्ठी में रवीश द्वारा उठाए गए सवालों का एक भी जवाब नहीं है बल्कि केवल तिलमिलाहट दिखी जैसे किसी व्यक्ति ने किसी की दुम पर पैर रख दिया हो। रवीश कुमार द्वारा उठाए गए सवालों के ऐवज में सवाल पूछना आपकी बचकाना पत्रकारिता को प्रदर्शित करता है।

रवीश कुमार किसे चिठ्ठी लिखें किसे नहीं ये उनका विवेक और उनका विशेषाधिकार है। आपने नरेन्द्र मोदी जी से क्यों नहीं पूछा कि उन्होनें शत्रुघ्न सिन्हा जी जैसे बड़े फिल्म कलाकार को तथा भाजपा के अन्य वरिष्ठ राजनीतिज्ञों को मंत्री क्यों नहीं बनाया जबकि श्रीमती स्मृति ईरानी जी जो नौटंकी की अच्छी कलाकार हैं, कम पढ़ी लिखी हैं, चुनाव हारने के बाद भी अत्यंत महत्वपूर्ण विभाग मानव संसाधन जो कि संपूर्ण भारत की शिक्षा व्यवस्था को तैय करता है का मंत्री क्यों बनाया ? आप श्री मोदी से यह भी पूछ सकते थे कि दुनिया के कथित सबसे बौद्धिक व्यक्ति श्री सुभाष चन्द्रा और स्वघोषित दुनिया के सबसे बड़े हिन्दु सम्राट श्री सुब्रमण्यम स्वामी जिनकी पत्नी रैक्सोना पारसी तथा इकलौती पत्रकार पुत्री श्रीमती सुहाषिनी हैदर जिसने एक मुस्लिम से विवाह किया है, को मंत्री क्यों नहीं बनाया ? आपने श्री मोहन भागवत जी से क्यों नहीं पूछा कि उन्होनें एक ऐसे व्यक्ति को जिसे कोर्ट ने तड़ीपार घोषित किया था को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों बनाया ? आपने श्री अमित शाह साहब से ये क्यों नहीं पूछा कि आपने उत्तर प्रदेश में अपराधिक पृष्टभूमि के नेता श्री मौर्य को  भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष क्यों बनाया। आप वर्तमान सरकार से ये भी पूछ सकते हैं कि “थूक कर चाटने” के मुहावरे का व्यवहार में प्रयोग कैसे होता है।।

खैर, ये आपका विवेक और विशेषाधिकार है कि आप किस से कैसे सवाल पूछें या ना पूछें, इस पर हमें प्रश्न नहीं उठाना चाहिए।

आपको विधि का एक सामान्य सिद्धांत का ज्ञान होना चाहिए कि अपराधिक और नैतिक दायित्व व्यक्तिगत होता है। बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, पुण्य प्रसून बाजपेई या अन्य के किसी कृत्य में आपको नैतिक अपराध दिखाई देते हैं तो उसके लिए रवीश कुमार कैसे जिम्मेदार हैं ? और कौनसा सिद्धांत प्रतिपादित है कि रवीश कुमार अगर एम जे अकबर को चिठ्ठी लिखें तो इन्हें भी लिखें। चलिए रवीश कुमार ने इन्हें नहीं लिखा तो आप लिख देते। आप कुछ सवाल अपने सहयोगी मित्र सुधीर “तिहाड़ी” से भी पूछ लेते। अगर बरखा दत्त जी के किसी कृत्य के लिए रवीश कुमार जिम्मेदार हैं सुधीर “तिहाड़ी” के कृत्य से आप कैसे मुक्त हो सकते हैं?

खैर, इस विषय को भी जाने दो।

रवीश कुमार ने एम जे अकबर को चिठ्ठी इसलिए लिखी की अकबर इतने मौकापरस्त हैं कि वो सत्ता के साथ कभी महाराणा प्रताप बन जाते हैं और कभी अकबर हो जाते हैं दोनों महान शख्सियत थी इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन कोई भी सियार शेर और बाघ की खाल पहन कर शेर या बाघ नहीं हो जाता है बल्कि वो रंगा सियार कहलाता है। मुझे आश्चर्य है कि आप अपने आपको बौद्धिक पत्रकार के रूप मे स्थापित करने का भरसक परन्तु नाकाम प्रयास करते हैं लेकिन आप कभी भी बौद्धिकता के उस स्तर को नहीं छू पाए जहाँ रवीश पंहुच चुके हैं।

आप को राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ तक नहीं पता, राष्ट्रवाद क्या है इसके लिए नागपुर से ग्रसित ब्रेन को किसी बढ़िया डिटर्जेंट से धोकर रविन्द्र नाथ टैगोर और महात्मा गाँधी को निश्छल भाव से पढ़ना। आप सही मायने में आज तक हिन्दु होने के धर्म से भी अनभिज्ञ हैं हिन्दु कैसा होता है हिन्दु को कैसा होना चाहिए के लिए विवेकानन्द और महात्मा गाँधी को पढ़िए। आपको पता होना चाहिए कि कट्टर राष्ट्रवाद कहीं ना कहीं मानवता पर प्रहार करता है। आपकी पत्रकारिता शुद्ध रूप से नागपुर को प्रभावित करने के इर्द-गिर्द घूमती है।

आपकी यह चिठ्ठी आपकी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है क्योंकि किसी व्यक्ति के सवाल उसकी बौद्धिकता का परिचायक होते हैं। रवीश की चिठ्ठी में एम जे अकबर एक प्रतीकात्मक चरित्र है,  रवीश का प्रहार उन सभी अवसरवादी पत्रकारों पर था जो सुविधा और सत्ता के राष्ट्रभक्त होते हैं जो सुविधा और सत्ता के लिए हिन्दुत्व का चोला पहनते हैं और अचानक अकबर से राणा प्रताप हो जाते हैं। याद रखिए व्यक्ति की महानता उसके चरित्र से देखी जाती हैं ना कि उसके नाम और पद से।

मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री के मंत्री एम जे अकबर को रवीश कुमार का इस अंदाज चिठ्ठी लिखना ही रवीश कुमार की बौद्धिकता, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यनिष्ठा का परिचायक है। आप पत्रकारिता के पेशे में तो लेखनी की कला को भी समझने का  बोध रखिए, रवीश कुमार की अकबर को ये चिठ्ठी हर उस पत्रकार के नाम है जो कमोबेश एम जे अकबर की शैली में पत्रकारिता करते हैं तथा सत्ता के साथ रंग बदलते रहते हैं। आप एम जे अकबर की श्रेणी में आते हैं या नहीं ये आप स्वयं आईने के सामने खड़े होकर, हिन्दु हो तो ईश्वर को साक्षी मानकर अपने सच्चे हृदय से पूछ कर तैय करना। आपने तो अपनी माँ को उन गालियों से बचा लिया है जो रवीश कुमार रोजाना विवेकशून्य अतार्किक कुंठित विक्षिप्त अंधभक्तों से सुनते अथवा पढ़ते हैं क्योंकि आप रेप्टिलिया प्रजाति (रीढ़विहीन) में अपनी सुविधा के अनुसार ढ़ल जाते हैं। जब जिंदगी रीढ़ विहीन सिद्धांतों पर विचरण करती है तो बहुत सी सुविधाएँ और सत्ता सुख प्राप्त होते हैं लेकिन जमीर खो जाता है।

खैर, आपको जमीर की जरूरत भी क्या है ? हो सके तो अगली चिठ्ठी सुधीर ‘तिहाड़ी’ और एम जे अकबर को आप भी लिखना और पत्रकारिता के कुछ मूलभूत सिद्धांत सीख लेना।

धारे के मुआफिक बहना तो,
तौहीन ऐ दस्तो बाजू है।।

डा विभूति भूषण शर्मा

एडवोकेट

हाईकोर्ट

राजस्थान

Facebook.com/vibhutibhushansharma

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सॉरी रवीश जी! इस बार आप हास्यास्पद लगे, पत्र से जहालत झांक रही

Prabhat Ranjan : रवीश कुमार का बहुत सम्मान करता हूँ लेकिन अपने खुले पत्र में एम जे अकबर के लिए उन्होंने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है वह आपत्तिजनक है। अकबर बहुत बड़े लेखक पत्रकार रहे हैं। नेहरु पर लिखी उनकी किताब बेहतरीन है। एक बड़े विद्वान का आकलन क्या महज उसकी विचारधारा से होगा? रवीश जी बड़ी मासूमियत से बड़ी भावुकता से लिखते हैं लेकिन उनके इस पत्र में उनकी जहालत भी झाँकती दिखाई देती है। यह पत्र ख़ुद को विक्टिम मोड में रखकर मौक़े पर चौका मारने की कोशिश से अधिक नहीं लगा। मैं हिंदी का एक मामूली लेखक हूँ लेकिन सॉरी रवीश जी इस बार आप हास्यास्पद लगे।

Shashi Bhooshan Dwivedi : मुद्दा रवीश के पत्र का नहीं है। मुद्दा है एम जे अकबर। क्या अकबर साहब अब भी नेहरू पर लिखी जीवनी और उनके विचारों को ओन करते हैं? अगर हां तो उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए और अपनी सरकार के उन लोगों की मुखालफत करनी चाहिए जो नेहरू गांधी को गाली देते हैं। वरना वे “दलाल” ही कहलाएंगे चाहे कांग्रेस के चाहे भाजपा के। Prabhat Ranjan जी के ध्यानार्थ।

Priyankar Paliwal : रवीश का पत्र आत्मदया से भरा हुआ है . एम. जे. अकबर को संबोधित ज़रूर है पर केंद्रित है खुद अपनी व्यथा-कथा पर. पर यह काठ का उल्लू रोहित सरदाना भी साक्षर है और पत्र लिख लेता है यह जानकर अच्छा लगा 🙂

Mahendra Mishra : रवीश और रोहित के बहाने…. रोहित जी, रवीश को लिखे पत्र में आपने खुद को पत्रकार और साथ ही राष्ट्रवादी भी बताया है। यानी राष्ट्रवादी पत्रकार। यह पत्रकारिता की कौन विधा है आजतक मेरी समझ में नहीं आयी। लेकिन पत्रकारिता का सच यही है कि जिस सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी जी शहीद हुए थे। आज वही पत्रकारिता कैराना में कश्मीर ढूंढ रही है। और नहीं मिलने पर कश्मीर बना देने पर उतारू है। और आप इस पत्रकारिता के पक्ष में है। न केवल पक्ष में हैं बल्कि मजबूती से उसके साथ खड़े भी हैं। अब आप खुद ही फैसला कीजिए कि आप कैसी पत्रकारिता कर रहे हैं? ऊपर से राष्ट्रवादी भी बताते हैं। अगर अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलना राष्ट्रवाद है, गरीब जनता के खिलाफ कारपोरेट लूट को बढ़ावा देना राष्ट्रवाद है, अमेरिका के तलवे चाटना राष्ट्रवाद है, सत्ता की सेवा ही अगर राष्ट्रवाद की कसौटी है तो ऐसे राष्ट्रवाद को लानत है। लेकिन सच्चाई यह है कि न तो आप पत्रकार हैं और न ही राष्ट्रवादी बल्कि आप भक्त हैं। जो काम कभी राजे-रजवाड़ों के दौर में चारण और भाट किया करते थे वही आप इस लोकतंत्र के दौर में कर रहे हैं। उनका काम घूम-घूम कर जनता के बीच सत्ता का गुणगान करना था। मौजूदा समय में वही काम आप स्टूडियो में बैठ कर रहे हैं।

दरअसल पत्रकारिता को लेकर काफी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। पत्रकारिता का मूल चरित्र सत्ता विरोधी होता है। यानी चीजों का आलोचनात्कम विश्लेषण। वह तटस्थ भी नहीं होती। व्यापक जनता का पक्ष उसका पक्ष होता है। और कई बार ऐसा भी हो सकता है कि सत्ता के खिलाफ विपक्ष के साथ वह सुर में सुर मिलाते दिखे। ऐसे में उसे विपक्ष का दलाल घोषित करना बेमानी होगा। क्योंकि उस समय दोनों जनता के सवालों पर सरकार की घेरेबंदी कर रहे होते हैं। इससे जनता का ही पक्ष मजबूत होता है। दरअसल पत्रकारिता तीन तरह की होती है। एक मिशनरी, दूसरी नौकरी और तीसरी कारपोरेट। पहला आदर्श की स्थिति है। दूसरी बीच की एक समझौते की। और तीसरी पत्रकारिता है ही नहीं। वह मूलतः दलाली है। चिट्ठी में आपने काफी चीजों को गड्ड-मड्ड कर दिया है। आप ने उन्हीं भक्तों का रास्ता अपनाया है। जो बीजेपी और मोदी के सिलसिले में जब भी कोई आलोचना होती है। तो यह कहते पाए जाते हैं कि तब आप कहां थे। जब ये ये हो रहा था। और फिर इतिहास के कूड़ेदान से तमाम खरपतवार लाकर सामने फेंक देते हैं। और पूरी बहस को ही एक नया मोड़ दे देते हैं। यहां भी आपने वही किया है। बजाय मुद्दे पर केंद्रित करने के कि एम जे अकबर जैसा एक संपादक-पत्रकार जो बीजेपी की नीतियों का धुर-विरोधी रहा है। वह एकाएक उसका प्रवक्ता और सरकार का हिस्सा कैसे बन गया? इसमें यह बहस होती कि क्या कोई अपने विचार से एक झटके में 180 डिग्री पल्टी खा सकता है? ऐसे में उसकी साख का क्या होगा? इससे पत्रकारिता और उसकी विश्वसनीयता को कितनी चोट पहुंचेगी? क्या सत्ता के आगे सारे समझौते जायज हैं? और ऐसे समझौते करने वालों को किस श्रेणी में रखा जाए? क्या सत्ता का अपना कोई सिद्धांत नहीं होता है? विचारधारा और सिंद्धांतविहीन राजनीति कहीं बाझ सत्ता और पत्रकारिता को तो जन्म नहीं दे रही है?

इस मामले में एक पत्रकार का एक सत्ता में शामिल शख्स से सवाल बनता है। अकबर अब पत्रकार नहीं, मंत्री हैं। और सत्ता के साथ हैं। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आया कि अकबर या सत्ता पक्ष से जवाब आने का इंतजार करने की बजाय आप क्यों बीच में कूद पड़े। क्या आपने सत्ता की ठेकेदारी ले रखी है। या मोदी भक्ति इतने हिलोरे मार रही है कि एक आलोचना भी सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। आपने जिन लोगों को खत न लिखने के बारे में रवीश से पूछा है। आइये अब उस पर बात कर लेते हैं। अमूमन तो अभी तक पत्रकारिता के पेश में यही बात थी कि पत्रकारों की जमात सत्ता पक्ष से ही सवाल पूछती रही है। और आपस में एक दूसरे पर टीका टिप्पणी नहीं करती थी। किसी का कुछ गलत दिखने पर भी लोग मौन साध लेते थे। लिहाजा किसी ने कभी भी किसी को खत नहीं लिखा। ऐसे में जो चीज हुई ही नहीं आप उसकी मांग कर रहे हैं। हां इस मामले में जब कुछ लोग पत्रकारिता की सीमा रेखा पार कर खुल कर सत्ता की दलाली और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबते नजर आये। और पानी सिर के ऊपर चढ़ गया। तथा पत्रकारों की दलाली खासो-आम के बीच चर्चा बन गई। तब जरूर उनके खिलाफ लोंगों ने नाम लेकर बोलना शुरू कर दिया।

जैसा कि ऊपर मैंने कहा है कि आपने काफी चीजों को गड्ड-मड्ड कर दिया है। आपने जिन नामों को लिया है उनमें आशुतोष को छोड़कर सब पत्रकारिता की जमात के लोग हैं। बरखा और प्रणव राय को खत लिखने से पहले रवीश को इस्तीफे का खत लिखना पड़ेगा। वह सुधीर चौधरी जैसे एक बदनाम पत्रकार और कारपोरेट के दलाल को पत्र लिख सकते थे, जिसके खिलाफ बोलने से उनकी नौकरी के भी जाने का खतरा नहीं है। लेकिन उन्होंने उनको भी पत्र नहीं लिखा। हां इस मामले में रवीश कुमार व्यक्तिगत स्तर पर कहीं बरखा या फिर प्रणव राय को मदद पहुंचाते या फिर उसमें शामिल दिख रहे होते तब जरूर उन पर सवाल उठता। सुधीर चौधरी भी सुभाष चंद्रा के चैनल में एक कर्मचारी के तौर पर काम कर रहे होते तो किसी को क्या एतराज हो सकता था। लेकिन जब वह उनकी तरफ से उनके व्यवसाय और उससे संबंधित मामलों को निपटाने में जुट गए। तब उन पर अंगुली उठी।

रही आशुतोष की बात। तो एक चीज आप को समझनी होगी। पत्रकारिता अकसर जनता के आंदोलनों के साथ रही है। कई बार ऐसा हुआ है कि पत्रकारों के किसी आंदोलन का समर्थन करते-करते कुछ लोग उसके हिस्से भी बन गए। आशुतोष पर सवाल तब उठता जब अन्ना आंदोलन को छोड़कर वो कांग्रेस के साथ खड़े हो जाते। जिसके खिलाफ पूरा आंदोलन था। अब एक पेशे के लोगों को दूसरे पेशे में जाने से तो नहीं रोका जा सकता है। हां सवाल उठना तब लाजमी है जब संबंधित शख्स सत्ता की लालच में अपने बिल्कुल विरोधी विचार के साथ खड़ा हो जाए। इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ एक्सप्रेस और जनसत्ता विपक्ष की आवाज बन गए थे। इस भूमिका के लिए उनकी तारीफ की जाती है। उन्हें विपक्ष का दलाल नहीं कहा जाता है। और यहां तक कि प्रभाष जोशी जी कांग्रेस के खिलाफ जो आमतौर पर सत्ता पक्ष रही, वीपी सिंह और चंद्रशेखर के ही साथ रहे। इसलिए समय, परिस्थिति और मौके का बड़ा महत्व होता है। सब को एक ही साथ एक तराजू पर तौलना कभी भी उचित नहीं होगा।

Abhishek Srivastava : रवीश कुमार चिट्ठी बहुत लिखते हैं। खुली चिट्ठी। जिसको देखो उसी को लिख देते हैं। हर बार जब पता चलता है कि उन्‍होंने कोई खुला पत्र लिख मारा है, तो अच्‍छा लगता है। सोचता हूं कोई तो है जो चिट्ठी लिख रिया है वरना हर कोई फेसबुक और ट्विटर करता है। ज्‍यादा गंभीर लोग ईमेल कर देते हैं। चिट्ठी लिखने वाला धैर्य और हौसला अब किसके पास रहा। चिट्ठी लिखना एक अच्‍छी बात है। खुली चिट्ठी उससे भी अच्‍छी होती है। जिसके पास पहुंचनी है वहां पहुंचे या नहीं, बाकी सब जान जाते हैं। इससे दो फायदे होते हैं। पहला, लोगों को चिट्ठी लिखने की प्रेरणा मिलती है। दूसरे, आलसी लोग खुद चिट्ठी लिखने के बजाय रवीश कुमार की चिट्ठी को शेयर कर देते हैं इस भाव में कि अरे, मैं भी तो यही कहना चाह रहा था! अच्‍छा हुआ रवीश ने कह दिया। इस तरह बचपन की एक लोकोक्ति चरितार्थ हो जाती है- हर्र लगे न फिटकिरी, रंग चोखा नजर आए। रंग ही तो चोखा चाहिए, वरना हर्र और फिटकिरी किसे भाते हैं। जरा सा फिटकिरी लगते ही पता चला कि चिट्ठीकार फेसबुक से गायब। सबसे ज्‍यादा मौज चिट्ठी शेयर करने वाले की होती है। उसकी खुशी ‘नदी के द्वीप’ में उस रिक्‍शेवाले की प्रातिनिधिक खुशी जैसी होती है जो यह जानकर ही मस्‍त हो जाता है कि उसकी सवारी (जो संयोग से पत्रकार ही था) मेफेयर सिनेमा में मूवी देखने जा रही है। अब मेफेयर किसलिए जाना जाता था, ये बताने की ज़रूरत है क्‍या!

Kashyap Kishor Mishra : प्रिय रवीस जी, पहले तो साफ कर दूँ, कि रवीश की बजाय आपको रवीस लिखने की वजह आपके भीतर बैठे कस्बाई खाँटीपन को सहलाना है, जो आज भी आपकी प्रस्तुति में झलकता है । तो रवीस जी, बात सीधे सीधे मुद्दे की करते हैं, आप अक्सर खत लिखते हैं, बेशक ये खत कागज पर कलम से नहीं कंपूटर पर की बोर्ड की खिटिर पिटिर से छापी करते हों, पर आपको यूँ खत लिखते देख, एक कस्बाई लड़के की खुशबू तैर जाती है, जो अपनी पहचान अपनी परम्परा सीने से बसाए दुनिया की चहल पहल में खोए रहने के बाद भी अपनी कस्बाई पहचान और संस्कृति को रेखांकित करते जी रहा हो।

रवीस जी, आपने अभी एक पत्र लिखा है, जिसमें आपने खुद को दी जा रही गालियों का हवाला देकर, एम. जे. अकबर साहेब से कुछ सवाल पूछे हैं, मुझे ये सवाल बड़े उपयुक्त लगे, यूँ सवाल उठने भी चाहिए, पत्रकारिता के लिए ऐसे सवालों का उठते रहना लाजिम भी है, आपके सवाल आज के दौर में बड़े मानीखेज हैं । पर मुझे थोड़ा भ्रम है, आपनें एक पत्रकार के तौर पर एक दूसरे वरिष्ठ पत्रकार से सवाल पूछे हैं । मुझे नहीं पता मैं खुद आपके सापेक्ष कहाँ खड़ा हूँ पर एक पत्रकार होनें के नाते बड़ी विनम्रता से आपसे कुछ जानना चाहूँगा।

रवीस जी, आपनें डेस्क पर तो काम किया ही होगा । यह एक पत्रकार के शुरुआत की “जीवन घुट्टी” होती है । रवीस जी डेस्क से शुरू खबरें डेस्क से आगे बढ़ती हैं या वहीं दम तोड़ देती हैं, यह हमेशा ही खबरों की गुणवत्ता से तय होना चाहिए, पर ऐसा होता है, क्या ? रवीस जी, बीते पच्चीस वर्षों में मैंने डेस्क पर खबरों का मोल तोल होते देखा है, खबर करने और रोकनें के एवज में लेनदेन का साक्षी रहा हूँ, और यह हर कहीं होता है, कहीं कम कहीं जादा । तो रवीस जी, यह दलाली नहीं है, तो क्या है ? रवीस जी, एक लड़की की वजह से हुए दो लड़कों के झगड़े को, सिर्फ विज्ञापन न देनें की वजह से, एक बड़ा अखबार गैंगवार बना कर शहर की सनसनी में तब्दील कर देता है और दिनदहाड़े एक संस्थान से लड़की के अपहरण की खबर बना देता है, यह पत्रकारिता जगत की ब्लैक-मेलिंग नहीं तो क्या है ? रवीस जी, पत्रकारिता जगत एक दलाली के अड्डे में तब्दील हो चुका है तो पत्रकारों को दलाल कहनें से आपको इतना कष्ट क्यों है?

न, न ! अब आप कुछ चंद लोगों की बात मत करिये, जिनके लिए पत्रकारिता एक मिशन हैं, पत्रकारिता जगत में बहुमत दलालों का है और उन्हीं के आधार पर, जनता अपना फैसला देती है । पर क्या आप जनता की इस राय को छापी करेंगे ? आप अपनी खबरों में, जनता की इस राय को चलाएगें ? नहीं, न ! तो लोग, आपको सोशल मीडिया पर नहीं तो कहाँ गाली देंगे । अब यह मत कहिएगा कि गाली देना गलत बात है, गलत बात दलाली करना भी है, और हाँ ! रवीस जी दलाली बस दलाली होती है वो चाहे समर्थन की दलाली हो, या विरोध की । दलाल दलाल ही होता है।

रवीस जी, आपको पीड़ा होती है कि लोग आपको माँ की गाली देते हैं, आपको दलाल कहते हैं, तो आप अपनी पीड़ा खुली चिठ्ठी में, बड़े बड़े लोगों से सवाल कर के जाहिर कर दिया करते हैं, पर उनकी पीड़ा का क्या जो दिनभर खटकर आधे पेट खा कर अभावों में जीवन जीते आपकी खबरों को देखते हैं वे खबरें जो या तो समर्थन की दलाली होती हैं या विरोध की और उन खबरों पर भरोसा कर वो राय बना लेते हैं । रवीस जी आपकी खबरों से बनाया भरम सच्चाई की खुरदुरी जमीन पर पल भर में चटक जाता है, आपकी दलाली से पटी खबरों से बना सुहाना छाता, जीवन के कड़वे सच को जरा भी झेल नहीं पाता और पल भर में एक आदमी को सच्चाई का आभास हो ही जाता है, तो वो आपके नाम पर फूल बतासे नहीं गालियाँ ही लुटायेगा।

रवीस जी, अब कुछ तकनीकी सवाल पूछना चाहूँगा । क्या आप दिल पर हाथ रख के कह सकते हैं कि एनडीटीवी में एक दम नए नए आए लड़कों से, आपके सीनियर मानवीय करूणा और इज्जत से पेश आते हैं ? रवीस जी जूनियर लड़कों को जलील करनें उन्हें पूरा पैसा न देनें के खिलाफ आपने कभी आवाज बुलंद की ? रवीस जी क्या आपके संस्थान में मजीठिया वेज बोर्ड के प्रावधान लागू हैं ? रवीस जी एनडीटीवी नें विशाखा आयोग की संस्तुतियों पर क्या काम किया है ? क्या एनडीटीवी सबकी मेहनत का उपयुक्त क्रेडिट देता है?

रवीस जी, बस दो चार सवालों का जवाब आपको आपकी सच्चाई से रूबरू कर देगा । एक सच और स्वीकार करें, कृपया बार बार खुद को पत्रकार कहना बंद करें और प्रस्तोता कहना शुरू करें, यह आपके टीवी मीडिया में एक बहुत बड़े वर्ग को उनके भ्रम से निकलने में सहायक होगा। रवीस जी, मैंनें अपना कैरियर एक पत्रकार के तौर पर शुरू किया था और मुझे पैसे की बेहद जरूरत थी, लिहाजा मेरे एक वरिष्ठ नें मुझे सलाह दिया कि मैं पत्रकारिता छोड़ कर चार्टर्ड अकाउंटेंट बन जाऊँ । उन्होंने मुझे समझाया था कि मेरी बड़ी बड़ी पारिवारिक जरूरतें मेरे पत्रकारिय-दायित्व को दूषित कर देंगी । तो रवीस जी, अपनी जरूरतों से मजबूर होकर मैंने अपने मन के काम को छोड़कर जीवन की अलग राह चुन ली, यह काम मेरे मन का नहीं पर कर रहा हूँ और अब जब देखता हूँ कि खबरों के प्रस्तोता और आज के दौर के पत्रकार पत्रकारिता के नाम पर दलाली करते पैसों की चमक में आकंड डूबे हुए हैं, तो गाली मेरे मुँह से भी निकलती है।

रवीस जी, इन बीते पच्चीस सालों के दौरान जिस मिशन को दूषित न करनें के लिए मैं घुट घुट कर “मुर्दा शांति से भरा” घर से काम और काम से घर का जीवन जीता रहा आज जब उसे दलाली से बजबजाते देखता हूँ, तो रवीस जी एक बार दिल पर हाथ रख कर कहिएगा, इस पर मेरे मुँह से गाली नहीं निकलेगी तो क्या निकलेगा? उम्मीद है, यह खत आप-तक पहुँच जायेगा।

सादर,
कश्यप किशोर मिश्र
(पुनश्च : इस खत के संदर्भ में कृपया यह ध्यान रखें कि किसी को भी किसी तरह की गाली देने का मैं कतई समर्थन नहीं करता, मेरे खत के अंतिम पैरा में गाली देने का संदर्भ बस उस कातर भाव से सम्बन्धित है, जिससे एक बेहद असहाय व्यक्ति गुजरता है । मेरे लिए “दलाल” शब्द एक बड़ी, बहुत बड़ी गाली है और यहाँ कृपया इसे इसी संदर्भ में लें।)

Khushdeep Sehgal : अच्छा है पत्रकारिता में खुली चिट्ठियां लिखने का दौर चल पड़ा है… पहले Ravish Kumar NDTV ने MJ Akbar के नाम खुली चिट्ठी लिखी…इसमें रवीश ने हवाला दिया कि अकबर कैसे पत्रकारिता करते करते पहले कांग्रेस के पाले से राजनीति में पहुंचे (अकबर बिहार की किशनगंज लोकसभा सीट से 1989-1991 में सांसद रहे थे)…इसके बाद अकबर राजनीति से दोबारा पत्रकारिता में लौटे…अकबर ने फिर राजनीति की ओर यू-टर्न लिया…लेकिन इस बार उन्होंने बीजेपी की उंगली पकड़ी…पहले राज्यसभा सांसद बने और अब विदेश राज्य मंत्री का ओहदा भी संभाल लिया है…रवीश का खुला खत उनके ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है…इसमें रवीश ने अकबर से इस सवाल पर रौशनी डालने के लिए कहा है कि कौन सा सवाल कब दलाली हो जाता है और कब पत्रकारिता? रवीश ने ये भी कहा है, “अकबर सर, मैं दलाल नहीं हूं…बट डू टेल मी व्हाट शूड आई डू टू बिकम अकबर…।”

अकबर जवाब देंगे या नहीं, कह नहीं सकता… हां, रवीश की तर्ज़ पर ही पत्रकार Rohit Sardana ने अपनी फेसबुक पोस्ट में ज़रूर रवीश के नाम खुला खत लिख डाला है…अपने खत में रोहित ने रवीश से पूछा है कि क्या उन्होंने पत्रकार बरखा दत्त को भी राडिया टेप्स को लेकर ऐसा ही ओपन लेटर लिखा था? अब ये भी हो सकता है कि रोहित के नाम भी कोई और पत्रकार खुला खत लिख डाले…बहरहाल, पत्रकारों का पत्रकारों से ही खुले खतों में सवाल करने का ये नया सिलसिला है…इन्हें पढ़ने से पत्रकारिता के नवांकुरों को इस माध्यम के कुछ स्याह पहलुओं को समझने में ज़रूर मदद मिलेगी, ऐसी उम्मीद कर सकता हूं…

(नोट- रवीश से मैं जीवन में सिर्फ एक बार मिला हूं…वो कुछ मिनटों की ही मुलाकात थी…इसलिए उन्हें जितना जानता हूं उनकी पत्रकारिता या ब्लॉगिंग की वजह से ही जानता हूं…हां, रोहित सरदाना के साथ मैंने ज़रूर 6-7 साल एक ही संस्थान में काम किया है…विचारधारा अलग हो सकती है लेकिन इतना कह सकता हूं कि इंसानी रिश्ते निभाने और दूसरों को सम्मान देने में रोहित बेमिसाल है…)

सौजन्य : फेसबुक

मूल पोस्ट…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एमजे अकबर के नाम रवीश कुमार और रवीश कुमार के नाम रोहित सरदाना के पत्र की सोशल मीडिया पर खूब चर्चा

पहला पत्र रवीश कुमार का एमजे अकबर के नाम…..

आदरणीय अकबर जी,

प्रणाम,

ईद मुबारक़। आप विदेश राज्य मंत्री बने हैं, वो भी ईद से कम नहीं है। हम सब पत्रकारों को बहुत ख़ुश होना चाहिए कि आप भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता बनने के बाद सांसद बने और फिर मंत्री बने हैं। आपने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। फिर उसके बाद राजनीति से लौट कर सम्पादक भी बने। फिर सम्पादक से प्रवक्ता बने और मंत्री। शायद मैं यह कभी नहीं जान पाऊँगा कि नेता बनकर पत्रकारिता के बारे में क्या सोचते थे और पत्रकार बनकर पेशगत नैतिकता के बारे में क्या सोचते थे? क्या आप कभी इस तरह के नैतिक संकट से गुज़रे हैं? हालाँकि पत्रकारिता में कोई ख़ुदा नहीं होता लेकिन क्या आपको कभी इन संकटों के समय ख़ुदा का ख़ौफ़ होता था?

अकबर जी, मैं यह पत्र थोड़ी तल्ख़ी से भी लिख रहा हूँ। मगर उसका कारण आप नहीं है।आप सहारा बन सकते हैं। पिछले तीन साल से मुझे सोशल मीडिया पर दलाल कहा जाता रहा है। जिस राजनीतिक परिवर्तन को आप जैसे महान पत्रकार भारत के लिए महान बताते रहे हैं, हर ख़बर के साथ दलाल और भड़वा कहने की संस्कृति भी इसी परिवर्तन के साथ आई है। यहाँ तक कि मेरी माँ को रंडी लिखा गया और आज कल में भी इस तरह मेरी माँ के बारे में लिखा गया। जो कभी स्कूल नहीं जा सकी और जिन्हें पता भी नहीं है कि एंकर होना क्या होता है, प्राइम टाइम क्या होता है। उन्होंने कभी एनडीटीवी का स्टुडियो तक नहीं देखा है। वो बस इतना ही पूछती है कि ठीक हो न।अख़बार बहुत ग़ौर से पढ़ती है। जब उसे पता चला कि मुझे इस तरह से गालियाँ दी जाती हैं तो घबराहट में कई रात तक सो नहीं पाई।

अकबर जी, आप जब पत्रकारिता से राजनीति में आते थे तो क्या आपको भी लोग दलाल बोलते थे, गाली देते थे, सोशल मीडिया पर मुँह काला करते थे जैसा मेरा करते हैं। ख़ासकर ब्लैक स्क्रीन वाले एपिसोड के बाद से। फिर जब कांग्रेस से पत्रकारिता में आए तो क्या लोग या ख़ासकर विरोधी दल, जिसमें इन दिनों आप हैं, आपके हर लेखन को दस जनपथ या किसी दल की दलाली से जोड़ कर देखते थे? तब आप ख़ुद को किन तर्कों से सहारा मिलता था? क्या आप मुझे वे सारे तर्क दे सकते हैं? मुझे आपका सहारा चाहिए।

मैंने पत्रकारिता में बहुत सी रिपोर्ट ख़राब भी की है। कुछ तो बेहद शर्मनाक थीं। पर तीन साल पहले तक कोई नहीं बोलता था कि मैं दलाल हूँ। माँ बहन की गाली नहीं देता था। अकबर सर, मैं दलाल नहीं हूँ। बट डू टेल मी व्हाट शूड आई डू टू बिकम अकबर। वाजपेयी सरकार में मुरली मनोहर जोशी जी जब मंत्री थे तब शिक्षा के भगवाकरण पर खूब तक़रीरें करता था। तब आपकी पार्टी के दफ्तर में मुझे कोई नफ़रत से बात नहीं करता था। डाक्टर साहब तो इंटरव्यू के बाद चाय भी पिलाते थे और मिठाई भी पूछते थे। कभी यह नहीं कहा कि तुम कांग्रेस के दलाल हो इसलिए ये सब सवाल पूछ रहे हो। उम्र के कारण जोशी जी गुस्साते भी थे लेकिन कभी मना नहीं किया कि इंटरव्यू नहीं दूँगा और न ऐसा संकेत दिया कि सरकार तुमसे चिढ़ती है। बल्कि अगले दिन उनके दफ्तर से ख़बरें उड़ा कर उन्हें फिर से कुरेद देता था।

अब सब बदल गया है। राजनीतिक नियंत्रण की नई संस्कृति आ गई है। हर रिपोर्ट को राजनीतिक पक्षधरता के पैमाने पर कसने वालों की जमात आ गई। यह जमात धुआँधार गाली देने लगी है। गाली देने वाले आपके और हमारे प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाए हुए रहते हैं और कई बार राष्ट्रीय स्वयं संघ से जुड़े प्रतीकों का इस्तमाल करते हैं। इनमें से कई मंत्रियों को फालो करते हैं और कइयों को मंत्री। ये कुछ पत्रकारों को भाजपा विरोधी के रूप में चिन्हित करते हैं और बाकी की वाहवाही करते हैं।

निश्चित रूप से पत्रकारिता में गिरावट आई है। उस दौर में बिल्कुल नहीं आई थी जब आप चुनाव लड़े जीते, फिर हारे और फिर से संपादक बने। वो पत्रकारिता का स्वर्ण काल रहा होगा। जिसे अकबर काल कहा जा सकता है अगर इन गाली देने वालों को बुरा न लगे तो। आजकल भी पत्रकार प्रवक्ता का एक अघोषित विस्तार बन गए है। कुछ घोषित विस्तार बनकर भी पूजनीय हैं। मुझसे तटस्थता की आशा करने वाली गाली देने वालों की जमात इन घोषित प्रतिकारों को कभी दलाल नहीं कहती। हालाँकि अब जवाब में उन्हें भी दलाल और न जाने क्या क्या गाली देने वाली जमात आ गई है। यह वही जमात है जो स्मृति ईरानी को ट्रोल करती है।

आपको विदेश मंत्रालय में सहयोगी के रूप में जनरल वी के सिंह मिलेंगे जिन्होंने पत्रकारों के लिए ‘प्रेस्टिट्यूड’ कहा। उनसे सहमत और समर्थक जमात के लोग हिन्दी में हमें ‘प्रेश्या’ बुलाते हैं। चूँकि मैं एन डी टी वी से जुड़ा हूँ तो N की जगह R लगाकर ‘रंडी टीवी’ बोलते हैं। जिसके कैमरों ने आपकी बातों को भी दुनिया तक पहुँचाया है। क्या आपको लगता है कि पत्रकार स़ख्त सवाल करते हुए किसी दल की दलाली करते हैं? कौन सा सवाल कब दलाली हो जाता है और कब पत्रकारिता इस पर भी कुछ रौशनी डाल सकें तो आप जैसे संपादक से कुछ सीख सकूँगा। युवा पत्रकारों को कह सकूँगा कि रवीश कुमार मत बनना, बनना तो अकबर बनना क्योंकि हो सकता है अब रवीश कुमार भी अकबर बन जाये।

मै थोड़ा भावुक इंसान हूँ । इन हमलों से ज़रूर विचलित हुआ हूँ। तभी तो आपको देख लगा कि यही वो शख्स है जो मुझे सहारा दे सकता है। पिछले तीन साल के दौरान हर रिपोर्ट से पहले ये ख़्याल भी आया कि वही समर्थक जो भारत के सांस्कृतिक उत्थान की आगवानी में तुरही बजा रहे हैं, मुझे दलाल न कह दें और मेरी माँ को रंडी न कह दें। जबकि मेरी माँ ही असली और एकमात्र भारत माता है। माँ का ज़िक्र इसलिए बार बार कह रहा हूँ क्योंकि आपकी पार्टी के लोग ‘एक माँ की भावना’ को सबसे बेहतर समझते हैं। माँ का नाम लेते ही बहस अंतिम दीवार तक पहुँच कर समाप्त हो जाती है।

अकबर जी, मैं यह पत्र बहुत आशा से लिख रहा हूँ । आपका जवाब भावी पत्रकारों के लिए नज़ीर बनेगा। जो इन दिनों दस से पंद्रह लाख की फीस देकर पत्रकारिता पढ़ते हैं। मेरी नज़र में इतना पैसा देकर पत्रकारिता पढ़ने वाली पीढ़ी किसी कबाड़ से कम नहीं लेकिन आपका जवाब उनका मनोबल बढ़ा सकता है।

जब आप राजनीति से लौट कर पत्रकारिता में आते थे तो लिखते वक्त दिल दिमाग़ पर उस राजनीतिक दल या विचारधारा की ख़ैरियत की चिन्ता होती थी? क्या आप तटस्थ रह पाते थे? तटस्थ नहीं होते थे तो उसकी जगह क्या होते थे? जब आप पत्रकारिता से राजनीति में चले जाते थे तो अपने लिखे पर संदेह होता था? कभी लगता था कि किसी इनाम की आशा में ये सब लिखा है? मैं यह समझता हूँ कि हम पत्रकार अपने समय संदर्भ के दबाव में लिख रहे होते हैं और मुमकिन है कि कुछ साल बाद वो ख़ुद को बेकार लगे लेकिन क्या आपके लेखन में कभी राजनीतिक निष्ठा हावी हुई है? क्या निष्ठाओं की अदला बदली करते हुए नैतिक संकटों से मुक्त रहा जा सकता है? आप रह सके हैं?

मैं ट्वीटर के ट्रोल की तरह गुजरात सहित भारत के तमाम दंगों पर लिखे आपके लेख का ज़िकर नहीं करना चाहता। मैं सिर्फ व्यक्तिगत संदर्भ में यह सवाल पूछ रहा हूँ। आपसे पहले भी कई संस्थानों के मालिक राज्य सभा गए। आप तो कांग्रेस से लोकसभा लड़े और बीजेपी से राज्य सभा। कई लोग दूसरे तरीके से राजनीतिक दलों से रिश्ता निभाते रहे। पत्रकारों ने भी यही किया। मुझे ख़ुशी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेसी सरकारों की इस देन को बरक़रार रखा है। भारतीय संस्कृति की आगवानी में तुरही बजाने वालों ने यह भी न देखा कि लोकप्रिय अटल जी ख़ुद पत्रकार थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपने अख़बार वीरअर्जुन पढ़ने का मोह त्याग न सके। कई और उदाहरण आज भी मिल जायेंगे।

मुझे लगा कि अब अगर मुझे कोई दलाल कहेगा या माँ को गाली देगा तो मैं कह सकूँगा कि अगर अकबर महान है तो रवीश कुमार भी महान है। वैसे मैं अभी राजनीति में नहीं आया हूँ। आ गया तो आप मेरे बहुत काम आयेंगे। इसलिए आप यह भी बताइये कि पत्रकारों को क्या करना चाहिए। क्या उन्हें चुनाव लड़कर, मंत्री बनकर फिर से पत्रकार बनना चाहिए। तब क्या वे पत्रकारिता कर पायेंगे? क्या पत्रकार बनते हुए देश सेवा के नाम पर राजनीतिक संभावनाएँ तलाश करती कहनी चाहिए?  ‘यू कैन से सो मेनी थिंग्स ऑन जर्नलिज़्म नॉट वन सर’!

मैं आशा करता हूँ कि तटस्थता की अभिलाषा में गाली देने वाले आपका स्वागत कर रहे होंगे। उन्हें फूल बरसाने भी चाहिए। आपकी योग्यता निःसंदेह है। आप हम सबके हीरो रहे हैं। जो पत्रकारिता को धर्म समझ कर करते रहे मगर यह न देख सके कि आप जैसे लोग धर्म को कर्मकांड समझकर निभाने में लगे हैं। चूँकि आजकल एंकर टीआरपी बताकर अपना महत्व बताते हैं तो मैं शून्य टीआरपी वाला एंकर हूँ। टीआरपी मीटर बताता है कि मुझे कोई नहीं देखता। इस लिहाज़ से चाहें तो आप इस पत्र को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। मगर मंत्री होने के नाते आप भारत के हर नागरिक के प्रति सैंद्धांतिक रूप से जवाबदेह हो जाते हैं।उसी की ख़ैरियत के लिए इतना त्याग करते हैं। इस नाते आप जवाब दे सकते हैं। नंबर वन टी आर पी वाला आपसे नहीं पूछेगा कि ज़ीरो टी आर पी वाले पत्रकार का जवाब एक मंत्री कैसे दे सकता है वो भी विदेश राज्य मंत्री। वन्स एगेन ईद मुबारक सर। दिल से।

आपका अदना,
रवीश कुमार

उपरोक्त पत्र के जवाब में रवीश कुमार के नाम जी न्यूज के रोहित सरदाना का पत्र यूं है….

आदरणीय रविश कुमार जी

नमस्कार

सर, ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, फेस टाइम के दौर में आपने चिट्ठी लिखने की परंपरा को ज़िंदा रखा है उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. हो सकता है कि चिट्ठियां लिखने की वजह ये भी हो कि ट्विटर, फेसबुक पे लोग जवाब दे देते हैं और चिट्ठी का जवाब मिलने की उम्मीद न के बराबर रहती है, इस लिए चिट्ठी लिखने का हौसला बढ़ जाता हो. पर हमेशा की तरह एक बार फिर, आपने कम से कम मुझे तो प्रेरित किया ही है कि एक चिट्ठी मैं भी लिखूं – इस बात से बेपरवाह हो कर – कि इसका जवाब आएगा या नहीं.

ये चिट्ठी लिखने के पहले मैंने आपकी लिखी बहुत सी चिट्ठियां पढ़ीं. अभी अभी बिलकुल. इंटरनेट पर ढूंढ कर. एनडीटीवी की वेबसाइट पर जा कर. आपके ब्लॉग को खंगाल कर. एम जे अकबर को लिखी आपकी हालिया चिट्ठी देखी. पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी देखी. मुख्यमंत्रियों के नाम आपकी चिट्ठी देखी. विजय माल्या के नाम की चिट्ठी देखी. पुलिस वालों के नाम भी आपकी चिट्ठी देखी.

सर लेकिन बहुत ढूंढने पर भी मैं आपकी वरिष्ठ और बेहद पुरानी सहयोगी बरखा दत्त के नाम की खुली चिट्ठी नहीं ढूंढ पाया, जिसमें आपने पूछा होता कि नीरा राडिया के टेप्स में मंत्रियों से काम करा देने की गारंटी लेना अगर दलाली है – तो क्या आपको दलाल कहे जाने के लिए वो ज़िम्मेदारी लेंगी?

बहुत तलाशने के बाद भी मैं आपके किसी ठिकाने पर वरिष्ठ पत्रकार और संपादक रहे आशुतोष जी (जो अब आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं) के नाम आपकी कोई खुली चिट्ठी नहीं ढूंढ पाया, जिसमें आपने पूछा होता कि साल-डेढ़ साल तक स्टूडियो में हॉट-सीट पर बैठ कर , अन्ना के पक्ष में किताब लिखना और फिर उस मेहनत कूपन को पार्टी प्रवक्ता की कुर्सी के बदले रिडीम करा लेना अगर दलाली है – तो क्या आपको दलाल कहे जाने के लिए वो ज़िम्मेदारी लेंगे?

सर मैंने बहुत ढूंढा, लेकिन मैं आपके पत्रों में आशीष खेतान के नाम कोई चिट्ठी नहीं ढूढ पाया, जिसमें आपने पूछा होता कि सवालों में घिरे कई स्टिंग ऑपरेशनों, प्रशांत भूषण जी के बताए पक्षपातपूर्ण टू जी रिपोर्ताजों के बीच निष्पक्ष होने का दावा करते अचानक एक पार्टी का प्रवक्ता हो जाना अगर दलाली है – तो क्या वो आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी शेयर करेंगे?

सर मैं अब भी ढूंढ रहा हूं. लेकिन राजदीप सरदेसाई के नाम आपका कोई पत्र मिल ही नहीं रहा. जिसमें आपने पूछा हो कि 14 साल तक एक ही घटना की एक ही तरफ़ा रिपोर्टिंग और उस घटना के दौरान आए एक पुलिस अफसर की मदद के लिए अदालत की तल्ख टिप्पणियों के बावजूद, वो हाल ही में टीवी चैनल के संपादक होते हुए गोवा में आम आदमी पार्टी की रैली में जिस तरह माहौल टटोल रहे थे, अगर वो दलाली है, तो क्या राजदीप जी आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी लेंगे?

सर मैंने बहुत तलाशा. लेकिन मैं उन सब पत्रकार (पढ़ें रिपोर्टर) दोस्तों के नाम आपकी कोई चिट्ठी नही ढूंढ पाया, जिन्हें दिल्ली सरकार ने ईनाम के तौर पर कॉलेजों की कमेटियों का सम्मानित सदस्य बना दिया. सर जब लोग आ कर कहते हैं कि आपका फलां साथी रसूख वाला है, उससे कह के दिल्ली के कॉलेज में बच्चे का एडमिशन करा दीजिए. आपका मन नहीं करता उनमें से किसी से पूछने का कि क्या वो आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी आपके साथ बांटेंगे?

पत्रकारों का राजनीति में जाना कोई नई बात नहीं है. आप ही की चिट्ठियों को पढ़ के ये बात याद आई. लेकिन पत्रकारों का पत्रकार रहते हुए एक्टिविस्ट हो जाना, और एक्टिविस्ट होते हुए पार्टी के लिए बिछ जाना – ये अन्ना आंदोलन के बाद से ही देखा. लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ़ थी. मैं भी जाता था अपनी 3 साल की बेटी को कंधे पर ले कर. मैं भीड़ में था. आप मंच पर थे. तब लगा था कि क्रांतिकारी पत्रकार ऐसे होते हैं. लेकिन फिर इंटरव्यू में किरण बेदी को दौड़ाते और अरविंद केजरीवाल को सहलाते आपको देखा तो उसी मंच से दिए आपके भाषण याद आ गए.

क्रांतिकारी से याद आया, आपकी चिट्ठियों में प्रसून बाजपेयी जी के नाम भी कोई पत्र नहीं ढूंढ पाया. जिसमें आपने पूछ दिया हो कि इंटरव्यू का कौन सा हिस्सा चलाना है, कौन सा नहीं, ये इंटरव्यू देने वाले से ही मिल के तय करना अगर दलाली है – तो क्या वो आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी लेंगे?

सर गाली तो लोग मुझे भी देते हैं. वही सब जो आपको देते हैं. बल्कि मुझे तो राष्ट्रवादी भी ऐसे कहा जाता है कि जैसे राष्ट्रवादी होना गाली ही हो. और सर साथ साथ आपसे सीखने की नसीहत भी दे जाते हैं. पर क्या सीखूं आपसे ? आदर्शवादी ब्लॉग लिखने के साथ साथ काले धन की जांच के दायरे में फंसे चैनल की मार्केटिंग करना?

सर कभी आपका मन नहीं किया आप प्रणय रॉय जी को एक खुली चिट्ठी लिखें. उनसे पूछें कि तमाम पारिवारिक-राजनीतिक गठजोड़ (इसे रिश्तेदारी भी पढ़ सकते हैं) के बीच – आतंकियों की पैरवी करने की वजह से, देश के टुकड़े करने के नारे लगाने वालों की वकालत करने की वजह से, लगभग हर उस चीज़ की पैरवी करने की वजह से जो देश के बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को आहत करती हो – अगर लोग आपको दलाल कहने लगे हैं तो क्या वो इसकी ज़िम्मेदारी लेंगे?

उम्मीद करता हूं आप मेरे पत्र को अन्यथा नहीं लेंगे. वैसे भी आपकी चिट्ठी की तरह सारे सोशल मीडिया ब्लॉग्स और अखबार मेरे लिखे को हाथों हाथ नहीं लेंगे. लेकिन आपकी राजनीतिक/गैर राजनीतिक सेनाएं इस चिट्ठी के बाद मेरा जीना हराम कर देंगी ये मैं जानता हूं. जिन लोगों का ज़िक्र मेरी चिट्ठी में आया है – वो शायद कभी किसी संस्थान में दोबारा नौकरी भी न पाने दें. पर सर मैं ट्विटर से फिर भी भागूंगा नहीं. न ही आपको ब्लॉक कर दूंगा (मुझे आज ही पता लगा कि आपने मुझे ब्लॉक किया हुआ है, जबकि मेरे आपके बीच ये पहला संवाद है, न ही मैंने कभी आपके लिए कोई ट्वीट किया, नामालूम ये कड़वाहट आपमें क्यों आई होगी, खैर).

सर आप भगवान में नहीं मानते शायद, मैं मानता हूं. और उसी से डरता भी हूं. उसी के डर से मैंने आप जैसे कई बड़े लोगों को देखने के बाद अपने आप को पत्रकार लिखना बंद कर दिया था, मीडियाकर्मी लिखने लगा. बहुत से लोग मिलते हैं जो कहते हैं पहले रवीश बहुत अच्छा लगता था, अब वो भी अपने टीवी की तरह बीमार हो गया है. शायद आप को भी मिलते हों. वो सब संघी या बीजेपी के एजेंट या दलाल नहीं होते होंगे सर. तो सबको चिट्ठियां लिखने के साथ साथ एक बार अपनी नीयत भी टटोल लेनी चाहिए, क्या जाने वो लोग सही ही कहते हों?

आपका अनुज
रोहित

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार जी, खोटे सिक्के अकेले पुलिस महकमे की टकसाल में ही नहीं ढलते, कुछ आपके पेशे में भी होंगे!

रवीश कुमार की चिट्ठी पढ़ कर यूपी के एक प्रादेशिक पुलिस अधिकारी ने लिखा जवाबी खत… भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश) के अधिकारी द्वारा रवीश के पत्र का समुचित जवाब ये रहा….

रवीश जी के ख़त का उत्तर..

प्रिय रवीश जी,

आपका ख़त पढ़ा। उसमें सहमत होने की भी जगह है और संशोधनों की भी। यह आपके पत्र का जबावी हमला कतई नहीं है। उसके समानांतर हमारे मनो-जगत का एक प्रस्तुतीकरण है। मैं यह जबाबी ख़ुतूत किसी प्रतिस्पर्धा के भाव से नहीं लिख रहा हूँ। चूँकि आपने भारतीय पुलिस सेवा और उसमें भी खासकर (उत्तर प्रदेश) को संबोधित किया है, इसलिए एक विनम्रतापूर्ण उत्तर तो बनता है। यूँ भी खतों का सौंदर्य उनके प्रेषण में नहीं उत्तर की प्रतीक्षा में निहित रहता है। जिस तरह मुकुल का ‘मुस्कराता’ चेहरा आपको व्यथित किये हुए है (और जायज़ भी है कि करे), वह हमें भी सोने नहीं दे रहा.. जो आप ‘सोच’ रहे हैं, हम भी वही सोच रहे हैं। आप खुल कर कह दे रहे हैं। हम ‘खुलकर’ कह नहीं सकते। हमारी ‘आचरण नियमावली’ बदलवा दीजिये, फिर हमारे भी तर्क सुन लीजिये। आपको हर सवाल का हम उत्तर नहीं दे सकते। माफ़ कीजियेगा। हर सवाल का जवाब है,पर हमारा बोलना ‘जनहित’ में अनुमन्य नहीं है। कभी इस वर्दी का दर्द सिरहाने रखकर सोइये, सुबह उठेंगे तो पलकें भारी होंगीं। क्या खूब सेवा है जिसकी शुरुआत ‘अधिकारों के निर्बंधन अधिनियम’ से शुरू होती है! क्या खूब सेवा है जिसे न हड़ताल का हक़ है न सार्वजनिक विरोध का.. हमारा मौन भी एक उत्तर है। अज्ञेय ने भी तो कहा था..

“मौन भी अभिव्यंजना है
जितना तुम्हारा सच है, उतना ही कहो”

हमारा सच जटिल है। वह नकारात्मक भी है। इस बात से इनकार नहीं। आप ने सही कहा कि अपने जमीर का इशारा भी समझो। क्या करें? खोटे सिक्के अकेले इसी महकमे की टकसाल में नहीं ढलते। कुछ आपके पेशे में भी होंगे। आपने भी एक ईमानदार और निर्भीक पत्रकार के तौर पर उसे कई बार खुलकर स्वीकारा भी है। चंद खोटे सिक्कों के लिए जिस तरह आपकी पूरी टकसाल जिम्मेदार नहीं, उसी तर्क से हमारी टकसाल जिम्मेदार कैसे हुई?

हम अपने मातहतों की मौत पर कभी चुप नहीं रहे। हाँ सब एक साथ एक ही तरीके से नहीं बोले। कभी फोरम पर कभी बाहर, आवाजें आती रही हैं। बदायूं में काट डाले गए सिपाहियों पर भी बोला गया, और शक्तिमान की मौत पर भी। पर क्या करें, जिस तरह हमें अपनी वेदना व्यक्त करने के लिए कहा गया है, उस तरह कोई सुनता नहीं। अन्य तरीका ‘जनहित’ में अलाउड नहीं। मुक्तिबोध ने कहीं लिखा है कि

“पिस गया वह भीतरी और बाहरी दो कठिन पाटों के बीच
ऐसी ट्रेजेडी है नीच”

मुकुल और संतोष की इस ‘ट्रेजेडी’ को समझिये सर। यही इसी घटना में अगर मुकुल और संतोष ने 24 आदमी ‘कुशलतापूर्वक’ ढेर कर दिए होते, तो आज उन पर 156 (3) में एफआईआर होती। मानवाधिकार आयोग की एक टीम ‘ओन स्पॉट’ इन्क्वायरी के लिए मौके पर रवाना हो चुकी होती। मजिस्ट्रेट की जाँच के आदेश होते। बहस का केंद्र हमारी ‘क्रूरता’ होती। तब निबंध और लेख कुछ और होते।

आपने इशारा किया है कि ’झूठे फंसाए गये नौजवानों के किस्से’ बताते हैं कि भारतीय पुलिस सेवा के खंडहर ढहने लगे हैं। यदि कभी कोई डॉक्टर आपको आपकी बीमारी का इलाज करने के दौरान गलत सुई (इंजेक्शन) लगा दे (जानबूझकर या अज्ञानतावश), तो क्या आप समूचे चिकित्सा जगत को जिम्मेदार मान लेगें? गुजरात का एक खास अधिकारी मेरे निजी मूल्य-जगत से कैसे जुड़ जाता है, यह समझना मुश्किल है।

हमने कब कहा कि हम बदलना नहीं चाहते। एक ख़त इस देश की जनता के भी नाम लिखें कि वो तय करे, उन्हें कैसी पुलिस चाहिए। हम चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हैं कि बदल दो हमें। बदल दो 1861 के एक्ट की वह प्राथमिकता जो कहती है की ‘गुप्त सूचनाओं’ का संग्रह हमारी पहली ड्यूटी है और जन-सेवा सबसे आखिरी। क्यों नहीं जनता अपने जन-प्रतिनिधियों पर पुलिस सुधारों का दबाव बनाती? आपको जानकार हैरानी होगी कि अपने इलाकों के थानेदार तय करने में हम पहले वहां के जाति-समीकरण भी देखते हैं! इसलिए नहीं कि हम अनिवार्यतः जाति-प्रियता में श्रद्धा रखते हैं। इससे उस इलाके की पुलिसिंग आसान हो जाती है। कैसे हो जाती है, यह कभी उस इलाके के थानेदार से एक पत्रकार के तौर पर नहीं, आम आदमी बनकर पूछियेगा। वह खुलकर बताएगा। भारतीय पुलिस सेवा का ‘खंडहर’ यहीं हमारी आपकी आँखों के सामने बना है। कुछ स्तम्भ हमने खुद ढहा लिए, कुछ दूसरों ने मरम्मत नहीं होने दिए।

जिसे खंडहर कहा गया है, उसी खंडहर की ईंटें इस देश की कई भव्य और व्यवस्थित इमारतों की नींव में डाल कर उन्हें खड़ा किया गया है। मुकुल और संतोष की शहादत ने हमें झकझोर दिया है। हम सन्न हैं। मनोबल न हिला हो, ऐसी भी बात नहीं है। पर हम टूटे नहीं हैं। हमें अपनी चुप्पी को शब्द बनाना आता है हमारा एक मूल्य-जगत है। फूको जैसे चिंतक भले ही इसे ‘सत्ता’ के साथ ‘देह’ और ‘दिमाग’ का अनुकूलन कहते हों, पर प्रतिरोध की संस्कृति इधर भी है। हाँ, उसमें ‘आवाज’ की लिमिट है और यह भी कथित व्यवस्था बनाये रखने के लिए किया गया बताया जाता है।

यह सही है कि हम में भी वो कमजोरियां घर कर गयी हैं जो जमीर को पंगु बना देती हैं। One who serves his body, serves what is his, not what he is’ (Plato) जैसी बातों में आस्था बनाये रखने वाले लोग कम हो गए हैं। पर सच मानिए हम लड़ रहे हैं। जीत में आप लोगों की भी मदद आवश्यक है। पुलिस को सिर्फ मसाला मुहैया कराने वाली एजेंसी की नजर से न देखा जाए।

जो निंदा योग्य है उसे खूब गरियाया जाये, पर उसे हमारी ‘सर्विस’ के प्रतिनिधि के तौर पर न माना जाये। हमारी सेवा का प्रतिनिधित्व करने लायक अभी भी बहुत अज्ञात और अल्प-ज्ञात लोग हमारे बीच मौजूद हैं जो न सुधारों के दुकानदार हैं और न आत्म-सम्मान के कारोबारी।

मथुरा में एकाध दिन में कोई नया एस पी सिटी आ जायेगा। फरह थाने को भी नया थानेदार मिल जायेगा। धीरे धीरे लोग सब भूल जाएंगे। धीरे धीरे जवाहर बाग फिर पुरानी रंगत पा लेगा। धीरे धीरे नए पेड़ लगा दिए जायेंगे जो बिना किसी जल्दबाजी के धीरे धीरे उगेंगे। सब कुछ धीरे धीरे होगा। धीरे धीरे न्याय होगा। धीरे धीरे सजा होगी। हमारी समस्या किसी राज्य का कोई एक इंडिविजुअल नहीं है। हमारी समस्या रामवृक्ष भी नहीं है। हमारी समस्या सब कुछ का धीरे धीरे होना है। धीरे धीरे सब कुछ उसी तरह हो जायेगा जो मुकुल और संतोष की मौत से पहले था।

सर्वेशर दयाल सक्सेना ने भी क्या खूब लिखा था-

“…धीरे-धीरे ही घुन लगता है, अनाज मर जाता है।
धीरे-धीरे ही दीमकें सब कुछ चाट जाती हैं।
धीरे-धीरे ही विश्वास खो जाता है, साहस डर जाता है,
संकल्प सो जाता है।

मेरे दोस्तों मैं इस देश का क्या करूँ
जो धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है?
भरी बोतलों के पास खाली गिलास-सा पड़ा हुआ है।
मेरे दोस्तों!
धीरे-धीरे कुछ नहीं होता, सिर्फ मौत होती है।
धीरे धीरे कुछ नहीं आता, सिर्फ मौत आती है
सुनो ढोल की लय धीमी होती जा रही है।
धीरे-धीरे एक क्रान्ति यात्रा, शव-यात्रा में बदलती जा रही है।”

इस ‘धीरे-धीरे’ की गति का उत्तरदायी कौन है। शायद अकेली कोई एक इकाई तो नहीं ही होगी। विश्लेषण आप करें। हमें इसका ‘अधिकार’ नहीं है। जो लिख दिया वह भी जोखिम भरा है। पर मुकुल और संतोष के जोखिम के आगे तो नगण्य ही है। जाते जाते आदत से मजबूर, केदारनाथ अग्रवाल की यह पंक्तियाँ भी कह दूँ जो हमारी पीड़ा पर अक्सर सटीक चिपकती हैं …

‘सबसे आगे हम हैं
पांव दुखाने में
सबसे पीछे हम हैं
पांव पुजाने में
सबसे ऊपर हम हैं
व्योम झुकाने में
सबसे नीचे हम हैं
नींव उठाने में’

मजदूरों के लिखी गयी यह रचना कुछ हमारा भी दर्द कह जाती है। हाँ, मजदूरों को जो बगावत का हक़ लोकतंत्र कहलाता है उसे हमारे यहाँ कुछ और कहा जाता है। इसी अन्तर्संघर्ष में मुकुल और संतोष कब जवाहर बाग में घिर गए,उन्हें पता ही नहीं चला होगा। उन्हें प्रणाम।

उम्मीद है आपको पत्र मिल जायेगा।

धर्मेन्द्र
भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश)

लेखक भारतीय पुलिस सर्विस (उत्तर प्रदेश) के अधिकारी हैं।


रवीश कुमार का भारतीय पुलिस सेवा के नाम एक पत्र इस प्रकार है….

प्रिय भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश),

उम्मीद है मुकुल द्विवेदी की मौत के सन्नाटे का कुछ कुछ हिस्सा आप सभी के आस पास भी पसरा होगा। उनकी यादें रह रहकर आ जा रही होंगी। कोई पुरानी बात याद आ रही होगी, कुछ हाल की बात याद आ रही होगी। ट्रेनिंग के समय अकादमी की चोटी से हैदराबाद देखना याद आ रहा होगा। किसी को मथुरा दर्शन के बाद वहाँ की ख़ातिरदारी याद आती होगी। कुछ आदर्श याद आते होंगे। बहुत सारे समझौते याद आते होंगे।

मैं यह पत्र इसलिए नहीं लिख रहा कि एक पीपीएस अधिकारी मुकुल द्विवेदी की मौत हुई है। मुझे सब इंस्पेक्टर संतोष यादव की मौत का भी उतना ही दुख है। उतना ही दुख ज़ियाउल हक़ की हत्या पर हुआ था। उतना ही दुख तब हुआ था जब मध्य प्रदेश में आईपीएस नरेंद्र कुमार को खनन माफ़िया ने कुचल दिया था। दरअसल कहने के लिए कुछ ख़ास है नहीं लेकिन आपकी चुप्पी के कारण लिखना पड़ रहा है। ग़ैरत और ज़मीर की चुप्पी मुझे परेशान करती है। इसी वजह से लिख रहा हूँ कि आप लोगों को अपने मातहतों की मौत पर चुप होते तो देखा है मगर यक़ीन नहीं हो रहा है कि आप अपने वरिष्ठ, समकक्ष या कनिष्ठ की मौत पर भी चुप रह जायेंगे।

मैं बस महसूस करना चाहता हूँ कि आप लोग इस वक्त क्या सोच रहे हैं। क्या वही सोच रहे हैं जो मैं सोच रहा हूँ? क्या कुछ ऐसा सोच रहे हैं जिससे आपके सोचने से कुछ हो या ऐसा सोच रहे हैं कि क्या किया जा सकता है। जो चल रहा है चलता रहेगा। मैं यह इसलिए पूछ रहा हूँ कि आपके साथी मुकुल द्विवेदी का मुस्कुराता चेहरा मुझे परेशान कर रहा है। मैं उन्हें बिलकुल नहीं जानता था। कभी मिला भी नहीं। लेकिन अपने दोस्तों से उनकी तारीफ सुनकर पूछने का मन कर रहा है कि उनके विभाग के लोग क्या सोचते हैं।

मैंने कभी यूपीएससी की परीक्षा नहीं दी। बहुत अच्छा विद्यार्थी नहीं था इसलिए किसी प्रकार का भ्रम भी नहीं था। जब पढ़ना समझ में आया तब तक मैं जीवन में रटने की आदत से तंग आ गया था। जीएस की उस मोटी किताब को रटने का धीरज नहीं बचा था। इसका मतलब ये नहीं कि लोक जीवन में लोकसेवक की भूमिका को कभी कम समझा हो। आपका काम बहुत अहम है और आज भी लाखों लोग उस मुक़ाम पर पहुँचने का ख़्वाब देखते हैं। दरअसल ख़्वाबों का तआल्लुक़ अवसरों की उपलब्धता से होता है। हमारे देश की जवानियाँ, जिस पर मुझे कभी नाज़ नहीं रहा, नंबर लाने और मुलाज़मत के सपने देखने में ही खप जाती हैं। बाकी हिस्सा वो इस ख़्वाब को देखने की क़ीमत वसूलने में खपा देती हैं जिसे हम दहेज़ से लेकर रिश्वत और राजनीतिक निष्ठा क्या क्या नहीं कहते हैं।

मैं इस वक्त आप लोगों के बीच अपवादस्वरूप अफ़सरों की बात नहीं कर रहा हूं। उस विभाग की बात कर रहा हूँ जो हर राज्य में वर्षों से भरभरा कर गिरता जा रहा है। जो खंडहर हो चुका है। मैं उन खंडहरों में वर्दी और कानून से लैस खूबसूरत नौजवान और वर्दी पहनते ही वृद्ध हो चुके अफ़सरों की बात कर रहा हूँ जिनकी ज़िले में पोस्टिंग होते ही स्वागत में अख़बारों के पन्नों पर गुलाब के फूल बिखेर दिये जाते हैं। जिनके आईपीएस बनने पर हम लोग उनके गाँव घरों तक कैमरा लेकर जाते हैं। शायद आम लोगों के लिए कुछ कर देने का ख़वाब कहीं बचा रह गया है जो आपकी सफलता को लोगों की सफलता बना देता होगा। इसलिए हम हर साल आपके आदर्शों को रिकार्ड करते हैं। हर साल आपको अपने उन आदर्शों को मारते हुए भी देखते हैं।

क्या आप भारतीय पुलिस सेवा नाम के खंडहर को देख पा रहे हैं? क्या आपकी वर्दी कभी खंडहर की दीवारों से चिपकी सफ़ेद पपड़ियों से टकराती है? रंग जाती है? आपके बीच बेहतर, निष्पक्ष और तत्पर पुलिस बनने के ख़्वाब मर गए हैं। इसलिए आपको एसएसपी के उदास दफ्तरों की दीवारों का रंग नहीं दिखता। मुझे आपके ख़्वाबों को मारने वाले का नाम पता है मगर मैं मरने और मारे जाने वालों से पूछना चाहता हूँ। आपके कई साथियों को दिल्ली से लेकर तमाम राज्यों में कमिश्नर बनने के बाद राज्यपाल से लेकर सांसद और आयोगों के सदस्य बनने की चाह में गिरते देखा हूँ। मुझे कोई पहाड़ा न पढ़ाये कि राजनीतिक व्यवस्थाएँ आपको ये इनाम आपके हुनर और अनुभव के बदले देती हैं।

आप सब इस व्यवस्था के अनुसार हो गए हैं जो दरअसल किसी के अनुसार नहीं है। आप सबने हर जगह समर्पण किया है और अब हालत ये हो गई कि आप अपने ग़म का भी इज़हार नहीं कर सकते। गर्मी है इसलिए पता भी नहीं चलता होगा कि वर्दी पसीने से भीगी या दोस्त के ग़म के आँसू से। मुझे कतर्व्य निष्ठा और परायणता का पाठ मत पढ़ाइये। इस निष्ठा का पेड़ा बनाकर आपके बीच के दो चार अफसर खा रहे हैं और बाकी लोग खाने के मौके की तलाश कर रहे हैं।

मामूली घटनाओं से लेकर आतंकवाद के नाम पर झूठे आरोपों में फँसाये गए नौजवानों के किस्से बताते हैं कि भारतीय पुलिस सेवा के खंडहर अब ढहने लगे हैं। दंगों से लेकर बलवों में या तो आप चुप रहे, जाँच अधूरी की और किसी को भी फँसा दिया। आपने देखा होगा कि गुजरात में कितने आईपीएस जेल गए। एक तो जेल से बाहर आकर नृत्य कर रहा था। वो दृश्य बता रहा था कि भारतीय पुलिस सेवा का इक़बाल ध्वस्त हो चुका है। भारतीय पुलिस सेवा की वो तस्वीर फ्रेम कराकर अपने अपने राज्यों के आफिसर्स मेस में लगा दीजिये। पतन में भी आनंद होता है। उस तस्वीर को देख आपको कभी कभी आनंद भी आएगा।

रिबेरो साहब के बारे में पढ़ा था तब से उन्हीं के बारे में और उनका ही लिखा पढ़ रहा हूँ। बाकी भी लिखने वाले आए लेकिन वो आपके नाम पर लिखते लिखते उसकी क़ीमत वसूलने लगे। पुलिस सुधार के नाम पर कुछ लोगों ने दुकान चला रखी है। इस इंतज़ार में कि कब कोई पद मिलेगा। मैं नाम लूं क्या? एक राज्य में बीच चुनावों में आपके बीच के लोगों की जातिगत और धार्मिक निष्ठाओं की कहानी सुन कर सन्न रह गया था। बताऊँ क्या? क्या आपको पता नहीं? अभी ही देखिये कुछ रिटायर लोग मुकुल की मौत के बहाने पुलिस सुधार का सवाल उठाते उठाते सेटिंग में लग गए हैं। ख़ुद जैसे नौकरी में थे तो बहुत सुधार कर गए।

आपकी सीमायें समझता हूँ। यह भी जानता हूँ कि आपके बीच कुछ शानदार लोग हैं। कुछ के बीच आदर्शवाद अब भी बचा है। बस ये पत्र उन्हीं जैसों के लिए लिख रहा हूँ और उन जैसों के लिए भी जो पढ़ कर रूटीन हो जायेंगे। इन बचे खुचे आदर्श और सामान से एक नई इमारत बना लीजिये और फिर से एक लोक विभाग बनिये जिसकी पहचान बस इतनी हो कि कोई पेशेवर और निषप्क्ष होने पर सवाल न उठा सके। अपनी खोई हुई ज़मीन को हासिल कीजिये। अकेले बोलने में डर लगता है तो एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बोलिये।

इसके लिए जरूरी है कि आप पहले मथुरा के ज़िलाधिकारी और एसएसपी से यारी दोस्ती में ही पूछ लीजिये कि आखिर वहाँ ये नौबत क्यों आई। किसके कहने पर हम ऐसे सनकी लोगों को दो से दो हज़ार होने दिये। वे हथियार जमा करते रहे और हम क्यों चुप रहे। क्या मुकुल व्यवस्था और राजनीति के किसी ख़तरनाक मंसूबों के कारण मारा गया? क्या कल हममें से भी कोई मारा जा सकता है? मुकुल क्यों मारा गया? कुछ जवाब उनके होंठों पर देखिये और कुछ उनकी आँखों में ढूंढिये। क्या ये मौत आप सबकी नाकामी का परिणाम है? मथुरा के ज़िलाधिकारी, एसएसपी जब भी मिले, जहाँ भी मिले, आफ़िसर मेस से लेकर हज़रतगंज के आइसक्रीम पार्लर तक, पूछिये। ख़ुद से भी पूछते रहिए।

पता कीजिये कि इस घटना के तार कहाँ तक जाते हैं। नज़र दौड़ाइये कि ऐसी कितनी संभावित घटनाओं के तार यहाँ वहाँ बिखरे हैं। राजनीतिक क़ब्ज़ों से परेशान किसी ग़रीब की ज़मीन वापस दिलाइये। संतोष यादव और मुकुल द्विवेदी के घर जाइये। उनके परिवारों का सामना कीजिये और कहिये कि दरअसल साहब से लेकर अर्दली तक हम अतीत, वर्तमान और भावी सरकारों के समझौतों पर पर्दा डालने के खेल में इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि हम सभी को मरा हुआ मान लिया जाना चाहिए। हम सबको जीते जी मुआवज़ा मिल जाना चाहिए।

नहीं कहने की लाचारी से निकलिये साहब लोग। रिटायर लोग के भरोसे मत रहिए। बोलने की जगह बनाइये। आपकी नौकरी हमारी तरह नहीं है कि दो मिनट में चलता कर दिये गए। हममें से कई फिर भी बहुत कुछ सबके लिए बोल देते हैं। आप सरकारों के इशारों पर हमारे ख़िलाफ़ एफ आई आर करते हैं फिर भी हम बोल देते हैं। राना अय्यूब की गुजरात फाइल्स मँगाई की नहीं। आप कम से कम भारतीय पुलिस सेवा के भारतीय होने का फ़र्ज तो अदा करें। आप हर जगह सरकारों के इशारों पर काम कर रहे हैं। कभी कभी अपने ज़मीर का इशारा भी देख लीजिये।

तबादला और पदोन्नति के बदले इतनी बड़ी क़ीमत मत चुकाइये। हम सही में कुछ राज्यों के राज्यपालों का नाम नहीं जानते हैं। कुछ आयोगों के सदस्यों का नाम नहीं जानते हैं। इन पदों के लिए चुप मत रहिए। सेवा में रहते हुए लड़िये। बोलिये। इन समझौतों के ख़िलाफ़ बोलिये। अपने महकमे की साख के लिए बोलिये कि मथुरा में क्या हुआ, क्यों हुआ। बात कीजिये कि आपके बीच लोग किस किस आधार पर बंट गए हैं। डायरी ही लिखिये कि आपके बीच का कोई ईमानदारी से लड़ रहा था तो आप सब चुप थे। आपने अकेला छोड़ दिया। भारतीय प्रशासनिक सेवा हो या पुलिस सेवा सबकी यही कहानी है।

वरना एक दिन किसी पार्क में जब आप रूलर लेकर वॉक कर रहे होंगे और कहीं मुकुल द्विवेदी टकरा गए तो आप उनका सामना कैसे करेंगे? यार हमने तुम्हारी मौत के बाद भी जैसा चल रहा था वैसा ही चलने दिया। क्या ये जवाब देंगे? क्या यार हमने इसी दिन के लिए पुलिस बनने का सपना देखा था कि हम सब अपने अपने जुगाड़ में लग जायेंगे। मैं मारा जाऊँगा और तुम जीते जीते जी मर जाओगे। कहीं मुकुल ने ये कह दिया तो!

आप सभी की ख़ैरियत चाहने वाला मगर इसके बदले राज्यपाल या सांसद बनने की चाह न रखने वाला रवीश कुमार इस पत्र का लेखक हैं। डाकिया गंगाजल लाने गया है इसलिए मैं इसे अपने ब्लाग कस्बा पर पोस्ट कर रहा हूँ। आमीन!

रवीश कुमार

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बीजेपी, सीपीएम और आप : जनता के पैसे से विज्ञापनबाजी में कोई किसी से कम नहीं

Ravish Kumar : बुधवार के रोज़ अख़बारों पर केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन छाये हुए थे। गुरुवार के दिन प्रधानमंत्री मोदी छाये हुए हैं। देश के अलग-अलग राज्यों से निकलने वाले तमाम भाषाओं के अखबारों में ये विज्ञापन छपे हैं। मीडिया के अनेक माध्यमों में कई दिनों से विज्ञापन छपते आ रहे हैं। अखबारों की संख्या और खर्चे का पता लगाना संभव नहीं हो सका, लेकिन 26 मई के दिन मोदी सरकार के दो साल पूरे करने पर ये विज्ञापन छपे हैं। आप से उम्मीद की जाती है कि आप ही के दिए गए पैसे से आपकी ही चुनी हुई सरकार के कामकाज का हिसाब आप ही तक पहुंचाने के इस प्रयास को ख़ाली न जाने दें। सुबह अगर नहीं पढ़ सके तो घर लौटकर पलट कर ज़रूर पढ़ें कि सरकार ने क्या-क्या काम करने का वादा किया है। अगर आप इन विज्ञापनों को ठीक से नहीं पढ़ेंगे तो अपने ही हाथों अपना ही पैसा बर्बाद करेंगे।

मुझे यकीन है कि एक दिन ऐसा आएगा जब सरकार विज्ञापन देते वक्त उसी पन्ने या होर्डिंग पर उसका खर्च बताएगी जैसे जब केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन का विज्ञापन अंग्रेज़ी के अख़बारों में छपा था तब बीजेपी के नेता आर बालाशंकर ने ट्वीट किया कि सीपीएम कितनी बाज़ारवादी बन गई जिसने पिनारायी के शपथ ग्रहण के मौके पर राष्ट्रीय अखबारों में दो पन्ने का विज्ञापन दिया है। डीएनए अख़बार ने भारतीय जनता पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का बयान छापा है कि ऐसा लगता है कि सीपीएम अपनी विचारधारा से दूर जा रही है। पार्टी उनके कदमों का अनुकरण कर रही है जिनकी आलोचना करती थी।

वैसे मौका था कि आज सीपीएम के नेता जमकर मोदी सरकार के इस विज्ञापन को लेकर हंगामा करते, पर लगता है कि अख़बार वे भी नहीं ठीक से नहीं पढ़ते हैं। कुल मिलाकर मामला इज़ इक्वल टू का है। विज्ञापन सिर्फ विरोधी की सरकार का ग़लत है। अपनी सरकार का नहीं। अगर विरोधी की सरकार हमारी पार्टी के अख़बार में विज्ञापन दे तो ग़लत नहीं है। बंगाल से सीपीएम का एक मुखपत्र अखबार है ‘गणशक्ति’। पार्टी का ही अखबार है। इस अखबार के पहले पन्ने पर मोदी सरकार का विज्ञापन छपा है। कैलाश विजयवर्गीय जी ने ‘गणशक्ति’ का पहला पन्ना देखा होता तो डर ही जाते और कहते कि कहीं सीपीएम अपनी विचारधारा से दूर जाते-जाते उनकी विचारधारा के करीब तो नहीं आ रही है। क्या ऐसा दिन आ सकता है कि बीजेपी के ‘कमल संदेश’ पर सोनिया गांधी का फोटो छप जाए और कांग्रेस के मुखपत्र ‘कांग्रेस संदेश’ पर प्रधानमंत्री मोदी का। ‘कमल संदेश’ और ‘कांग्रेस संदेश’, नाम भी एक समान है दोनों का।

‘सामना’ शिवसेना का अखबार है। इसके संपादकीय के बारे में माना जाता है कि यह पार्टी और पार्टी प्रमुख की राय है। ‘सामना’ में मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर संपादकीय छपा है। इसमें कहा गया है कि मोदी मैजिक नहीं चला। क्षेत्रीय दलों को नहीं हरा पाए। ‘सामना’ ने लिखा है कि मोदी सरकार ने एक के बाद एक योजनाएं शुरू कीं, लेकिन लोगों को कुछ ही योजनाओं के बारे में पता है। पुरानी सरकार भी यही सब योजनाएं अलग नाम से चला रही थी, जो भ्रष्टाचार में फंस कर रह गई।

शायद कहने का यह मतलब है कि इन विज्ञापनों का खास लाभ नहीं हो पा रहा है। मैंने भी आपसे कहा है कि विज्ञापन आपके पैसे से ही छपते हैं इसलिए आप ज़रूर देखें। पढ़ें कि सरकार ने क्या-क्या काम किया है। वैसे मोदी सरकार ने ‘सामना’ अखबार में पहले पन्ने के लिए अपनी सरकार का विज्ञापन दिया है। पहले पन्ने पर मोदी जी नज़र आ रहे हैं। संपादकीय पन्ने पर मोदी जी की आलोचना है।

कांग्रेस ने कहा है कि ये विज्ञापनों की सरकार है। विज्ञापन को लेकर कांग्रेस और बीजेपी अक्सर दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार की घोर आलोचना करते हैं। यह भी सही है कि किसी ने 500 करोड़ से अधिक का बजट नहीं सुना था, इसलिए भी लोगों में नाराज़गी बढ़ी लेकिन क्या किसी को पता है कि केंद्र के इन विज्ञापनों पर कितने खर्च हुए। पता चले तब तो हंगामा हो कि कितना पैसा खर्च हुआ। आम पार्टी पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री केजरीवाल ने जब अपने घर आए अख़बारों के पहले पन्ने पर मोदी ही मोदी देखा तो उन्हें लगा कि इज़ इक्वल टू करने का मौका है। उन्होंने झट से ट्वीट किये और पट से चैनलों पर चल भी गए। ट्विट पर मुख्यमंत्री कहते हैं कि मोदी सरकार दो साल की सालगिरह के कार्यक्रम पर 1000 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च कर रही है। जबकि दिल्ली सरकार के सभी विभागों का सालाना विज्ञापन खर्च 150 करोड़ से भी कम है।

दिक्कत हमारी राजनीति है। प्रतिस्पर्धा के चक्कर में ये दल दलील कम अपना फायदा ज़्यादा देखते हैं, इसलिए ऐसे मसलों में फंस जाते हैं। यह भी तो सोचना होगा कि हमीं पूछते हैं कि सरकार ने क्या किया। तो सरकार कैसे बताएगी। एक तरीका विज्ञापन तो है ही। अब आपको एक किसान की कहानी बताता हूं। नाशिक से किशोर बेलसरे ने एक किसान की कहानी भेजी है। एक रुपये का सिक्का लिए ये किसान आपसे कुछ कहना चाहता है। देवीदास परभणे की ज़िंदगी का गणित अगर आप सुलझा सकते हैं तो प्लीज़ डू समथिंग। देवीदास के पास पुणे के बाज़ार की रसीद है। देवीदास जी 952 किलो प्याज़ बेचने आए थे। बेचकर जब हिसाब किया तो बचा एक रुपया। ऐसा नहीं है कि उन्हें दाम नहीं मिले। 952 किलो प्याज़ बेचकर उन्हें 1523 रुपये 20 पैसे मिले।

कमाई: 1,523.20 रु
ट्रांसपोर्ट: 1,320.00 रु
कमीशन: 91.35 रु
मज़दूरी: 77.55 रु
अन्य : 33.30 रु
कुल बचत: 1.00 रु

दरअसल हुआ यह है कि नाशिक में एशिया के प्याज़ के सबसे बड़े थोक बाज़ार में अप्रैल से दाम गिरकर एक-तिहाई रह गए हैं। किसानों का कहना है कि 100 किलो प्याज़ के लिए हमें 400 से 450 रुपये मिले हैं। जबकि उन्हें 1100 से 1200 रुपये मिलने चाहिए। इस साल प्याज़ की बंपर फसल हुई है इसलिए भी दाम गिरे हैं। हर साल ये कहीं न कहीं होता है। कभी आलू के किसान बंपर फसल के फेर में फंसते हैं तो कभी प्याज़ तो कभी किसी और चीज़ के किसान। अब किसान सरकार से प्रति क्विंटल पर 300 से 400 रुपये की सब्सिडी मांग रहे हैं।

अगर महीनों की मेहनत पर किसान के हाथ में एक रुपया बचेगा तो समझिये कि हालत कितनी ख़राब है। हम कृषि मंत्रालय की कृषि लागत और मूल्य आयोग की साइट पर गए। यह देखने के लिए कि किस फसल में किसान को लागत की तुलना में कितना मुनाफा होता है। इसकी साइट पर रिपोर्ट तो 2015-16 के हैं लेकिन उनके भीतर लागत और मुनाफे के जो आंकड़े हैं वो 2013-14 के हैं। इससे यह पता नहीं चलता कि नई सरकार के आने के बाद खेती में मुनाफा कितना बढ़ा है। इन आंकड़ों के अनुसार एक हेक्टेयर खेत में किसान ने धान उगाने के लिए 22,645 रुपये लगा दिये। किसान को मिला 24,151 रुपये यानी मुनाफा हुआ 1,506 रुपये। क्या किसान का इससे काम चलेगा। वो कर्ज लेता है तो उसका ब्याज भी होता होगा। इस रिपोर्ट के अनुसार धान की खेत में मुनाफा 10 फीसदी रहा, मकई में 12 फीसदी मुनाफा रहा। ज्वार में -.2 फीसदी मुनाफा रहा। बाजरा में -3 फीसदी मुनाफा। मूंग की खेती 6 का मुनाफा रहा।

आंकड़ों को खोजने और पढ़ने में काफी सावधानी की ज़रूरत होती है। फिर भी जब सरकार का ज़ोर आंकड़ों पर इतना रहता है तो कृषि मंत्रालय के इस आयोग को हर साल का ब्योरा देना चाहिए। कृषि मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार 2014-15 में धान का खरीद मूल्य 1,360 रुपये क्विटंल था, जिसे मोदी सरकार ने 15-16 में बढ़ाकर 1410 रुपये प्रति क्विंटल किया है। क्या 50 रुपये की इस वृद्धि से किसानों को लागत का 50 फीसदी मुनाफा मिला। क्या वे लागत भी वसूल पा रहे हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने वादा किया था सरकार बनने पर किसानों को लागत मूल्य के अलावा 50 प्रतिशत मुनाफा मिलेगा। हमने ये वादा इसलिए याद दिलाया क्योंकि प्रधानमंत्री जी ने गुरुवार को सहारनपुर में मुझे ऐसा ही करने के लिए कहा है। क्या पता इससे किसानों का भला हो जाए और फिर किसानों का भला होगा तो प्रधानमंत्री को भी वाहवाही मिलेगी।

एनडीटीवी वाले रवीश कुमार के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

माल्या जी, आपके ललका जहाज़ की सीट के पाकेट से मैं लाल रंग वाला ईयर फोन ले आया था : रवीश कुमार

माल्या का भागना, चैनलों का जागना

आनंदप्रिय विजय माल्या जी,

आमतौर पर आदरणीय का प्रयोग होता है लेकिन आपके लिए आनंदप्रिय ठीक है । इसका कत्तई मतलब नहीं कि आप आदरणीय नहीं है । आपके कैलेंडर सराहनीय हो सकते हैं तो आप आदरणीय क्यों नहीं हो सकते हैं ।आपने समाज में मनोरंजन और रसरंजन को प्रतिष्ठित किया है । आप हमारे मुल्क ( भारत नहीं लिख रहा पता नहीं कब कौन सेडिशन लगवा दे) के उदास चेहरों के बीच खिलखिलाने का ब्रांड एंबेसडर हैं । जिसे देखिये वही दुखी है । आपको देखकर लगता था कि एक है जो सबसे सुखी है । इसलिए आपको आनंदप्रिय कहा है । लोकप्रिय तो बहुत मिल जाते हैं।

न्यूज़ चैनलों से पता चला कि आप भारत से भाग गए हैं । उन्हें पता था कि आप कबके परदेसी हो चुके हैं फिर भी वे दिन भर आपको पुकारते रहे । चैनलों को बता कर जाते तो वे भी आपके पीछे भागने आ जाते । इस मामले में ललित मोदी जी बेहतर हैं । कितने पत्रकारों को उनके पीछे भागने का मौका मिला । उस लिहाज़ से आपने भागने की क्रिया को बदनाम किया है । आप अकेले ही भागे।

मेरे ख़्याल से आपने भागकर अच्छा किया । आपने अपने पीछे रंगीन तस्वीरों की जो विरासत छोड़ी है उसके कारण आपकी कमी कभी नहीं खलेगी । हम क़र्ज़दारों को बैंकों ने कितना सताया है । मकान मिला नहीं लेकिन ई एम आई वसूले जा रहे हैं । बैंकों ने किसानों को कितना सताया है । आप गैंग आफ वासेपुर के फैज़ल हैं । आपने सबका बदला लिया है । मैं कहता भी था कि फैज़ल सबका बदला लेगा । आपने कुछ भी गलत नहीं किया । जब सारी दुनिया क़र्ज़ लेकर ऐश कर रही है । मकान कार ख़रीद रही है तो आप क्यों न जहाज़ ख़रीदें । ऐश करें।

आपने विदेश जाकर भागने की परंपरा को समृद्ध किया है । क्वात्रोकी और ललित मोदी के बाद बहुत दिनों से कोई भागा नहीं था । लग रहा था कि इस मुल्क में भागने वाले ही नहीं रहे । सरकार और संस्थाओं में ऐसे लोग अब भी हैं जो भागने वाले को जाने देते हैं । दाऊद को भगाने को लेकर इस देश के चैनलों पर पुराना फुटेज ही चलता रहता है । आप चले क्या गए चैनल आपकी हर तस्वीर पर मर मिटने लगे हैं । जब से मुझे पता चला कि आप चले गए हैं तब से मैं सबको समझा रहा हूँ कि भाई आपके लेवल का कोई थाना नहीं है इस देश में । ज़्यादातर थानों की लोकेशन बहुत ख़राब है।

आपने भाग कर आने वाले विदेशी निवेशकों का हौसला बढ़ाया है । मेरा मानना है कि आप भाग कर नहीं बल्कि चलकर गए हैं । पासपोर्ट वीजा सब दिखाते हुए । आपने जाने का नियम नहीं तोड़ा है । अगर कोई आपको पकड़ने के नियम का पालन न करें तो इसमें आपकी क्या ग़लती है ।  क्या आपके भागने पर कोई पाबंदी थी ? शायद नहीं । क्या पाबंदी लग सकती थी ? कैसे लगती । जब क्वात्रोकी ललित मोदी जा सकते हैं तो क्या आपका हक नहीं बनता । सोचिये आपको नहीं जाने दिया जाता तो कितनी ग़लत परंपरा बन जाती।

विजय सर, किंगफिशर के उन कर्मचारियों की चिंता मत कीजिये जिनके टीडीएस का पैसा कट गया और अब आयकर विभाग उन्हे खोज रहा है । वे लोग कहीं भाग नहीं पा रहे हैं । बैंक वाले ग्रुप बनाकर कभी कर्नाटक भाग रहे हैं तो कभी सुप्रीम कोर्ट ।आप हैं कि अकेले भागे । संसद में भी आपको लेकर भागा भागी हुई । आप भी ललित मोदी जी की तरह अपनी पार्टी का सीडी चैनलों को दे दीजिये । जिसमें कांग्रेस और बीजेपी के नेता भारत की ग़रीबी से तंग आकर आपके पास भाग आए हों । सुना है आपने पत्रकारों का भी खूब मनोरंजन कराया है । आपका ट्वीट पढ़ा कि आपने मीडिया के कई लोगों का आदर सत्कार किया है । काश मैं आपकी सूची में होता । आपके ललका जहाज़ की सीट के पाकेट से मैं लाल रंग वाला ईयर फोन ले आया था । हम तो उसी मे ख़ुश थे।

आप जहाँ भी हैं स्वस्थ रहें । आपको लेकर कांग्रेस बीजेपी के बीच बहस हो रही है । कोई असली बात नहीं बता रहा। दोनों बासी भात खाने खिलाने में माहिर हैं । एकाध एंकर भी लगे हुए हैं । ललित मोदी को नहीं ला सके तो आपको कैसे लायेंगे । इसलिए आप भागिये । भागना जितना ग्लैमरस हुआ है, उतना कभी नहीं हुआ । भागते भागते ललित जी से मुलाक़ात हो जाए तो नमस्कार कहियेगा । हम राजनीति के इस खेल को कभी नहीं जान पायेंगे । सब आपके पीछे भागेंगे और आप हमें पीछे छोड़ कहीं और के लिए भागेंगे।

मेरी दुआ है कि आप कामयाब हों । आप इस देश के लाखों करोड़ों छोटे-मोटे क़र्ज़दारों की उम्मीद हैं । आपकी सफलता उन्हें लोन न देने के लिए प्रेरित करेगी । लोन के जितने भी पैसे बचे हैं आप जमकर ख़र्च कीजिये । घूमिये फिरिये और नई तस्वीरें ट्वीट कर दीजिये । बाकी चैनलों की चिन्ता मत कीजिये । टीवी तो है ही ग़रीब विरोधी । अब वो आपका भी विरोधी हो गया है । आपने जिन उद्योगपतियों के नाम लिये हैं कि उन्होंने आपसे ज़्यादा क़र्ज़ लिये हैं उन पर कांग्रेस बीजेपी और चैनल चुप ही रहेंगे । औकात नहीं है उनकी । सो डियर माल्या आप घूमिये फिरिये । टीवी मत देखिये । चिल्ल सर।

आपका

नहीं भाग सकने वाला रवीश कुमार

एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग ‘कस्बा’ से साभार.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भविष्य निधि पर टैक्स मोदी सरकार के गले की फांस बनी, सफाई देने के चक्कर में ज्यादा बुरे फंसे

भविष्य निधि के भविष्य को लेकर नौकरीशुदा लोगों का वर्तमान परेशान हो गया है। क्या वित्त मंत्री अपने इस फैसले को वापस लेंगे, ऐसा तो कोई संकेत नहीं है कि नहीं लेंगे। बल्कि सूत्र आधारित जानकारी के अनुसार बीजेपी और सहयोगी दलों के सांसदों के साथ बैठक में उन्होंने उत्सुक सांसदों को कारण समझाने का प्रयास तो किया लेकिन वापसी की मांग को देखते हुए कह गए कि फैसला प्रधानमंत्री लेंगे। तो क्या ये फैसला प्रधानमंत्री का था या वित्त मंत्री ने ये कहना चाहा कि वे अपने इस फैसले पर अड़े रहेंगे। मंगलवार को एक बार फिर से राजस्व सचिव हंसमुख अधिया ने सफाई दी कि पीपीएफ पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।

इस सफाई से भ्रम ही फैल गया कि ये रोल बैक है या स्पष्टीकरण। क्या बजट में पीपीएफ के बारे में कुछ नहीं कहा गया था। यही बात राजस्व सचिव ने बजट के बाद वित्त मंत्री के साथ जब प्रेस के समक्ष प्रस्तुत हुए तब क्यों नहीं बताई, जबकि उन्होंने सिर्फ इसी पर विस्तार से बताते हुए कहा था, ‘मैं एनपीएस, ईपीएफ और अन्य योजनाओं को एक समान किये जाने पर बात करना चाहता हूं। तीन तरह के प्लान हैं। पहला सुपर एनुएशन फंड स्कीम। दूसरा प्रोविडेंट फंड स्कीम जिसमें ईपीएफ भी शामिल है। तीसरा है एनपीएस।’

लेकिन चौबीस घंटे से भी कम समय में राजस्व सचिव बताने लगे कि इस योजना में पीपीएफ शामिल नहीं हैं। राजस्व सचिव ने यह भी बताया था कि अब नियोक्ता यानी नौकरी देने वाले कर्मचारी के ईपीएफ में डेढ़ लाख से ज़्यादा नहीं देंगे। ईपीएफ में नियोक्ता का योगदान डेढ़ लाख तक सीमित कर दिया है। यह भी साफ किया था कि 1 अप्रैल 2016 से पहले की जमा राशि पर नया नियम लागू नहीं होगा। राजस्व सचिव ने यह भी कहा और उन्होंने यह बात सोमवार को भी कही थी कि EPF उन कर्मचारियों के लिए बना था, जिनकी आमदनी महीने की 15,000 रुपये थी। बाद में इसमें निजी कंपनियों के योगदान को भी शामिल कर लिया गया, जिनकी सैलरी 15,000 रुपये हैं उन्हें पैसा निकालते वक्त टैक्स नहीं देना होगा।

सवाल है कि 15,000 पाने वाले की सैलरी बढ़ गई तो क्या होगा। ज़ाहिर है बढ़ेगी ही। कहीं ऐसा तो नहीं कि समझाने के चक्कर में अफसरों ने मामला उलझा ही दिया है। आज सरकार ने जो प्रेस रिलीज जारी की है, उसमें भी 15,000 वाली बात है। वैसे पीएफ सैलरी के हिसाब से नहीं बेसिक के हिसाब से लगता है। कितने लोग ऐसे हैं जो ईम्पलाई प्रोविडेंट फंड आर्गेनाइज़ेशन ईपीएफओ के सदस्य हैं। प्रेस रिलीज में कहा गया है कि EPFO के क़रीब 3.7 करोड़ सदस्यों में से क़रीब 3 करोड़ ऐसे ही सदस्य हैं…। यानी करीब 3 करोड़ सदस्य 15,000 वेतन पाने वाले हैं। जिन्हें पैसा निकालते वक्त टैक्स नहीं देना पड़ेगा। EPFO में निजी क्षेत्र के करीब 60 लाख सदस्य ऐसे हैं जिनकी तनख्वाह ज़्यादा है। इस वर्ग के लोगों को अब टैक्स देना पड़ेगा।

EPFO के सदस्यों को लेकर दो तरह के आंकड़े हैं। प्रेस रिलीज में कहा गया है कि 3.7 करोड़ सदस्य हैं। सूत्र बताते हैं कि सदस्यों की संख्या 6 करोड़ से ज्यादा है जिनकी केवाईसी संस्था के पास है। ‘इकोनोमिक टाइम्स’ ने पांच करोड़ से ज़्यादा सदस्य बताये हैं। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ अखबार के अनुसार सदस्यों की संख्या करीब छह करोड़ है। अब अखबारों की संख्या ज़्यादा है या सरकार की संख्या कम, इसकी जानकारी के लिए आरटीआई का सहारा लेना पड़ेगा या कोई सांसद संसद में यह सवाल पूछ ले। बजट में और बाद में राजस्व सचिव ने यह कहा था कि ईपीएफओ और पीपीएफ से जो साठ फीसदी हिस्सा है उसे सुपर एन्युइटी स्कीम में लगा देने पर कोई टैक्स नहीं लगेगा लेकिन जब पेंशन मिलने लगेगा तो उस पर टैक्स लगेगा। प्रेस रिलीज में कहा गया है कि जब इस 60 फीसदी पैसे को एन्युइटी में रखा जाएगा तो कोई टैक्स नहीं लगेगा और तब आपका पूरा फंड टैक्स फ्री हो जाएगा।

पहले कहा गया कि सुपर एन्युईटी में डालने के बाद जो पेंशन के रूप में जो राशि मिलेगी उस पर टैक्स लगेगा। अब कहा जा रहा है कि राशि पर टैक्स नहीं लगेगा। अब आप एक और बात समझिये। सरकार कहती है कि साठ फीसदी हिस्सा अगर सुपर एन्युइटी में नहीं लगाएंगे तो ही टैक्स देना होगा। अगर बीमा पॉलिसी खरीद लेंगे तो नहीं देना होगा। सरकार बीमा कंपनियों के लिए कर्मचारियों पर टैक्स लगा रही है या हमारे भले के लिए। नौकरी के दौरान कर्मचारी जिन बीमा पालिसी को पांच-दस हज़ार के प्रीमियम में खरीदते रहते हैं उसी की एक पॉलिसी हम रिटायर होने के बाद लाखों रुपये देकर खरीदेंगे। अगर किसी ने पहले से ही ऐसा प्लान ले रखा हो तो वो दोबारा क्यों खरीदेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बदलाव के ज़रिये इंश्योरेंस सेक्टर का खजाना भरा जा रहा है। सरकार क्यों तय करेगी कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पैसे को हमें कहां देना है। वो विकल्प दे, कानूनी रूप से मजबूर न करें। अगर सरकार आपके पेंशन को लेकर इतनी ही चिन्तित है तो ईपीएफओ में ही पेंशन का हिस्सा है, उसे ही क्यों नहीं बड़ा कर देती है।

आप जानते हैं कि ईपीएफओ के तीन हिस्से होते हैं। बेसिक का 12 फीसदी आप देते हैं, इतना ही कंपनी देती है। कंपनी के 12 फीसदी में से 3.67 फीसदी पेंशन में चला जाता है, जो आपको मिलता है, लेकिन यह राशि बहुत कम होती है। अगर सरकार का इरादा पेंशन बढ़ाना है तो साठ फीसदी पैसे को बाज़ार में लाने की बजाय ईपीएफओ के पेंशन फंड में ही क्यों नहीं डाल देती। सरकार ने बीमा कंपनियों के जिस सुपर एन्युईटी प्लान के लिए हमारी गाढ़ी कमाई पर जो टैक्स लगाया है क्या हम उसके बारे में जानते हैं, उनकी क्या शर्तें होंगी, उनके क्या प्रावधान होंगे। क्या आप जानते हैं। राजस्व सचिव, प्रेस रिलीज और वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा के बयान में कहा गया है कि पीपीएफ से पैसा निकालने पर किसी तरह का टैक्स नहीं लगेगा, लेकिन क्या इसका एलान सरकार बजट पास कराते वक्त करेगी।

अब आपको एनपीएस की मौजूदा शर्त के बारे में बताता हूं। एनपीएस के बुकलेट में लिखा है कि जब आप साठ साल के होंगे तो आपको अपनी कुल जमा पेंशन राशि का कम से कम 40 फीसदी एन्युइटी प्लान में लगाना होगा। अगर साठ साल से पहले निकालेंगे तो 80 फीसदी एन्युइटी प्लान में लगाना होगा। चालीस फीसदी तो पहले से ही है। तो क्या सरकार ने एन्युइटी में पैसा लगाने का एनपीएस का कोटा 40 से 60 फीसदी कर दिया है। सुपर एन्यूइटी प्लान समझने के लिए आपको बता दें। एन्युइटी का मतलब आप एक बार पैसा डाल दें और उसे वृत्ति के आधार पर यानी महीने या साल के आधार पर मिल सकता है, तन्ख्वाह की तरह। बहुत सारी कंपनियां एन्युइटी प्लान ला रही हैं लेकिन भारतीय जीवन बीमा निगम की दो पॉलिसी हैं। जीवन अक्षय 6 और जीवन निधि। वित्त मंत्री जयंत सिन्हा ने विस्तार से बताते हुए कहा कि टैक्स आपको इसलिए देना पड़ेगा क्योंकि हमारी कोशिश है कि अगर हम आपको इतना बड़ा टैक्स ब्रेक दे रहे हैं…अगर आप रिटायरमेंट इनकम का प्रयोग नहीं करते हैं तो आपको टैक्स देना पड़ेगा… जब फाइनेंस बिल में हम लोगों ने ये प्रस्ताव लाया तो बहुत से सुझाव आए… हम लोग उस पर विचार कर रहे हैं… बदलाव करेंगे जो उचित होगा… मगर आज ये लागू होगा…

यानी ये फैसला लागू होगा। वैसे हमने उनका पूरा बयान नहीं पढ़ा है। हम यह भी समझने का प्रयास करेंगे कि अगर कंपनी का हिस्सा जो पहले 12 फीसदी होता था उसे डेढ़ लाख रुपये तक सीमित करने से लाभ किसको होगा, नुकसान किसको होगा। तो क्या वाकई नया बदलाव 70 लाख लोगों से ही संबंधित है, तो क्या जानना दिलचस्प नहीं होगा कि इन 70 लाख लोगों से सरकार को कितना टैक्स मिल जाएगा। इस फैसले का विरोध करने वाले कहते हैं कि सैलरी पर टैक्स तो सब देते ही हैं। ईपीएफओ पर टैक्स लेने का मतलब है दोबारा टैक्स देना। वैसे भी ब्याज़ दर कभी 12 फीसदी थी जो आठ से साढ़े आठ के बीच रहती है। क्या इसे कमी नहीं मानी जाए।

ब्याज को लेकर भी कई तरह के बयान आए। बजट में कहा गया कि साठ फीसदी हिस्से पर टैक्स लगेगा। फिर कहा गया कि उस साठ फीसदी में जो ब्याज का हिस्सा होगा उस पर टैक्स लगेगा। वैसे ब्याज की राशि भी कम नहीं होती। उस पर भी टैक्स लगने से आपको लाखों रुपये देने होंगे। 1952 से ईपीएफओ की योजना चल रही है। 2016 में सरकार इस नतीजे पर कैसे पहुंची कि इसकी निकासी के साठ फीसदी हिस्से पर टैक्स लगाना चाहिए या इसे बीमा सेक्टर की तरफ धकेल देना चाहिए। एक जानकारी और हाथ लगी है। हम ईपीएफओ की साइट पर गए थे। वहां 25 फरवरी का एक नोटिफिकेशन मिला जिसके अनुसार सरकार ने बजट से पहले एक बड़ा बदलाव कर दिया है। पहले 55 साल की उम्र होते ही कर्मचारी कभी भी पैसा निकाल सकता था, यानी 55 साल वाले को नौकरी छूटने के बाद दो महीने का इंतज़ार नहीं करना होता था। नए नोटिफिकेशन में दो महीने के इंतज़ार की छूट अब 58 साल पर दी गई है। 55 साल से पहले जब कर्मचारी पैसा निकालता था तो अपना और कंपनी का हिस्सा निकाल सकता था। दोनों पर मिलने वाला ब्याज भी निकाल सकता था लेकिन नए नोटिफिकेशन के अनुसार 58 साल से पहले पैसा निकालेंगे तो कर्मचारी को अपना हिस्सा और उस मिले ब्याज में से ही पैसा मिलेगा। कंपनी या नियोक्ता का हिस्सा और उस पर मिला ब्याज 58 साल के बाद मिलेगा। अगर आप ईपीएफ के पैसे के भरोसे हैं तो आप कम से कम इन बातों को तो जान ही लीजिए। सरकार ईपीएफ के पैसे पर प्रतिबंध से लेकर निवेश की शर्तें क्यों थोप रही है।

जाने माने जर्नलिस्ट रवीश कुमार के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इस साल के सबसे ताकतवर लोगों की TOP 100 की लिस्ट में पत्रकार रवीश कुमार और अरनब गोस्वामी भी शामिल

नई दिल्ली : साल 2016 के 100 सबसे ताकतवर भारतीयों की लिस्ट जारी करते हुए इंडियन एक्सप्रेस ने जो सूची जारी की है उसमें पत्रकार रवीश कुमार का भी नाम शामिल है. सूची में राजनीति, खेल, सिनेमा, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर से इस सूची में टॉप पर हैं. इस लिस्ट में पत्रकारों को भी शामिल किया गया है जिसमें रवीश कुमार और अरनब गोस्वामी का नाम भी मौजूद है.

लिस्ट में मौजूद अन्य नेताओं में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल के नाम भी ऊपर हैं. खेल जगत से जुड़े विराट कोहली और सानिया मिर्जा भी इस सूची में जगह बनाने में सफल रही हैं.  आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत दूसरे पायदान पर हैं. टीवी एंकर अरनब गोस्वामी और रवीश कुमार भी सबसे ताकतवर भारतीयों की सूची में शामिल हैं. इंडियन एक्सप्रेस की ”100 मोस्ट पावरफुल इंडियंस 2016” की इस सूची में एक भी कवि, लेखक, पेंटर या कला जगत से जुड़ा नाम नहीं है. लिस्ट में प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के महासचिव एम लक्ष्मण राव उर्फ गणपति, बीजेपी के महासचिव राम माधव, पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती, आरएसएस के संयुक्त महासचिव कृष्ण गोपाल, बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी और जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा प्रमुख हैं. करीब 50 राजनेता, 19 उद्योगपति, आधे दर्जन से अधिक ब्यूरोक्रेट, छह खिलाड़ी, छह मीडियापर्सन इंडियन एक्सप्रेस की लिस्ट में शामिल हैं.

लिस्ट में उद्योगपतियों में सबसे ऊपर मुकेश अंबानी हैं. उनके बाद टाटा ग्रुप के चेयरमैन सायरस पी मिस्त्री हैं. गौतम अडानी भी इस सूची में शामिल हैं. भारतीय सेना अध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह 61वें नंबर पर हैं. न्यायपालिका से जुड़े लोगों में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जेएस केहर, सीनियर एडवोकेट फाली एस नरीमन और सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण लिस्ट में शामिल हैं. खिलाड़ियों में सबसे ऊपर विराट कोहली, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा और महेंद्र सिंह धोनी हैं. बॉलीवुड सेलेब्रिटीज में आमिर खान सबसे ऊपर हैं. सूची में करण जौहर, सलमान खान, दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान और प्रियंका शामिल हैं. लिस्ट में केवल 16 महिलाओं को जगह मिली है. मोदी मंत्रिमंडल के 11 सदस्य इस लिस्ट में शामिल हैं. केंद्रीय मंत्रियों के अलावा उनके करीबी माने जाने वाले कई ब्यूरोक्रेट और कारोबारियों को भी सूची में शामिल किया गया है.

पढ़िए, नंबर एक पर मौजूद नरेंद्र मोदी के बारे में क्या लिखा गया है :

Rank 1: Narendra Modi, 65, Prime Minister of India

Rank in 2015: 1

Why: Because despite the storm around him — the intolerance debate, the defeat in Bihar, the Rohith Vemula suicide, the JNU crisis — he remains the unchallenged No 1. Under Modi, the PMO has become the epicentre of all important, and some not-so-important, decisions, with the ministries often being bypassed. A floundering economy and the continuing debate over the government’s Hindutva agenda have put a question mark over his leadership style, with the man, who is often criticised for speaking too much, maintaining a stoic silence over key issues. But so far, his opponents have been unable to find an answer to Modi’s popularity.

Power Punch: The surprising decision to fly in to meet Pakistan Prime Minister Nawaz Sharif for lunch on his way back from Afghanistan.

What Next: The coming Budget and the elections will be a test of his politics and his economics.

By the way: Modi likes his bhakhri and khichdi even at 7, RCR.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार भी वही कर रहे हैं जो दूसरे लोग, दल या पत्रकार कर रहे हैं

अपने हालिया विदेशी दौरे वाले लेख में स्वयं को स्टार एंकर कहने वाले एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार कमोबेश वही कर रहे हैं जो दूसरे लोग, दूसरे दल या दूसरे पत्रकार कर रहे हैं। पक्षपात, विरोधाभास, मामलों को जरूरत से ज्यादा तूल देने, मुद्दों के मनमाने चुनाव, किसी पर मनमाना ठप्पा लगाने, निरर्थक बहसों आदि के मामले में वे किसी भी तरह दूसरे कुछ पत्रकारों से अलग नहीं हैं। आप मानें या न मानें, लेकिन निम्नलिखित बातों पर एक बार विचार करके जरूर देखें।

अति
जिस प्रकार कुछ समूहों  ने जेएनयू में देशविरोधी नारों के बाद विरोधियों को देशद्रोही कहने में अति कर दी है, उसी प्रकार रवीश कुमार ने भी 19 फरवरी की रात अपने चैनल के स्क्रीन को काला करके अति कर दी। निशाना जरूर उनके ही पत्रकार साथी थे, लेकिन वास्तव में रवीश ने यही बताने की कोशिश की कि देश में आपातकाल आ गया है। स्वयं रवीश के समर्थन में पत्रकारों ने लिखा है कि उनके इस प्रस्तुतीकरण ने आपातकाल की याद दिला दी। यानी खुद रवीश के समर्थक कह रहे हैं कि आपातकाल आया तो नहीं है, लेकिन रवीश कुमार ने इसकी याद दिला दी। यह अति नहीं तो और क्या है? क्या देश में आपातकाल आ गया है?  क्या केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और कोर्ट परिसर में कुछ उन्मादियों के कानून हाथ में लेने भर से देश में आपातकाल आ गया है? जी नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कोई भी तटस्थ विचारों वाला व्यक्ति आपातकाल या अघोषित आपातकाल की बात से सहमत नहीं हो सकता।

ठप्पा
जिस प्रकार कुछ समूहों ने देश विरोधी नारों के बहाने पूरे जेएनयू को निशाने पर ले लिया, उसी प्रकार रवीश कुमार ने पटियाला हाउस कोर्ट मारपीट मामले और कुछ लोगों की निरर्थक बयानबाजी (विरोधियों को देशद्रोही बताने वाली) के बहाने देश के उन सभी लोगों को लपेट लिया जो जेएनयू में देशविरोधी नारों से दुखी हैं और इस मामले में कार्रवाई चाहते हैं। रवीश कुमार जेएनयू में देशविरोधी नारों से दुखी सभी लोगों पर यह ठप्पा लगाने की कोशिश करते दिखे कि वे सभी जरूर भाजपाई या आरएसएस के सदस्य या समर्थक ही होंगे। उन्होंने जेएनयू पर किए गए अपने कार्यक्रमों में कहने की कोशिश की कि देशभक्ति कोरी भावुकता है और लोग भावुक न हों। जेएनयू वाले तो अपने ऊपर लगे आरोपों से भावुक हो जाएं, दुखी हो जाएं, रोष प्रकट करें, जेएनयू के किसी छात्र को कोई अॉटोवाला बैठाने से इनकार कर दे (यह सच होगा, इसमें भी संदेह है) तो रवीश कुमार भावुक हो जाएं, लेकिन देशविरोधी नारों को सुनकर देश के लोगों को भावुक होने की जरूरत नहीं है। देश की सीमाओं पर तैनात जवानों को भावुक होने की जरूरत नहीं है। रवीश ने 2104 के लोकसभा चुनावों में भी यही किया था और भाजपा या नरेंद्र मोदी को वोट देने वाले सभी लोगों को भाजपाई, आरएसएस या सांप्रदायिकता के खाने में डाल दिया था, जबकि हकीकत यह थी कि भाजपा, आरएसएस के घेरे के बाहर से मिले अतिरिक्त वोटों के बिना मोदी को इतनी बड़ी जीत मिलना असंभव था।

तूल
सबसे पहले तो यह हुआ कि रवीश कुमार या उनके चैनल ने जेएनयू में देशविरोधी नारों पर ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने या उनके चैनल ने इसकी खास रिपोर्टिंग भी नहीं की। लेकिन इसके बावजूद भी जब मामला गरमा गया तो रवीश का आरोप है कि कुछ चैनल वालों ने इस मामले को तूल दे दिया। उनका आरोप है कि कुछ चैनल वाले लोगों को देशभक्ति के नाम पर भावुक बना रहे हैं और मामले को तूल दे रहे हैं। लेकिन रवीश याद करें कि दादरी कांड या हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले में स्वयं वह क्या कर रहे थे?

कैसे वे अखलाक की हत्या के बाद (नेशनल चैनलों में शायद सबसे पहले वही वहां पहुंचे थे) गांव में घूम-घूमकर और हत्या वाले कमरे में कैमरा चलवाकर सनसनी फैला रहे थे। कैसे उन्होंने इस मामले को तूल दिया और इस रूप में तूल दिया कि जिस राज्य में हत्या हुई, वहां का मुख्यमंत्री तो मजे ले रहा था, जबकि देश का प्रधानमंत्री आरोप झेल रहा था।

यह मामले को तूल देने का ही असर था कि कुछ साहित्यकार भावुक हुए और उन्होंने अपने पुरस्कार वापस कर डाले। जिस प्रकार दादरी में उन्मादी भीड़ ने बिना कुछ सोचे-समझे अखलाक पर अपना फैसला सुना दिया, उसी प्रकार कुछ साहित्यकारों ने मोदी सरकार पर अपना फैसला सुना दिया।

रोहित वेमुला मामले में भी रवीश ने यही किया। उन्होंने इसे अपने अनुकूल दलों की तरह ही दलित उत्पीड़न से जोड़ दिया। उन्होंने लगातार कई दिन तक इस विषय पर मूल मुद्दे से अलग हटकर कार्यक्रम किए और विरोधियों को घेरने की पुरजोर कोशिश की।

रवीश कुमार और उनके समर्थक कहेंगे कि रवीश तो अपना पत्रकार धर्म निभा रहे थे। वे पीड़ित पक्ष की तरफ खड़े थे। बिल्कुल सही बात है। उनका स्टैंड बिल्कुल सही था, लेकिन तूल देना और मुद्दे से भटकने का काम तो उन्होंने भी दिया। सनसनी तो उन्होंने भी फैलाई, बेवजह का फैलाव तो उन्होंने भी किया। ऐसे में यदि कोई दूसरा पत्रकार जेएनयू कैंपस में देशविरोधी नारों  के बाद यह तय करता है कि मुझे एक स्टैंड लेना चाहिए और देशविरोधी नारों के विरोध में खड़ा होना चाहिए। इसके साथ ही देश के लोगों को बताना चाहिए, बल्कि बार-बार बताना चाहिए कि जेएनयू में कुछ मुट्ठीभर लोग पिछले कुछ वर्षों से क्या कर रहे हैं तो इसमें क्या गलत है? जहां तक तूल देने की बात है तो जैसे रवीश कुमार आरोपियों का वर्ग (भाजपा, कांग्रेस या अन्य पार्टियां) देखकर मामले को तूल देते हैं या दबाते (मालदा, बंगाल में बम, केरल में भाजपाई की हत्या जैसे मामले) हैं, उसी प्रकार दूसरे पत्रकार भी कर रहे हैं।

जहां तक कन्हैया को न्याय मिलने की बात है तो दोनों ही पक्ष धैर्य नहीं दिखा पा रहे हैं। कुछ चैनल कन्हैया को पहले ही देशद्रोही साबित करने पर तुले हैं तो रवीश और कुछ अन्य उसे क्लीनचिट देने में जुटे हैं। जब कानूनविद भी कह रहे हैं कि इस प्रकार का देशद्रोह का आरोप अदालत में नहीं टिक पाएगा तो रवीश कुमार का कन्हैया को क्लीनचिट देने का प्रयास करना कहां तक उचित है। कन्हैया के समर्थक कह रहे हैं कि सुबूत दिखाओ। अरे भाई सुबूत तो अदालत के सामने दिखाए जाते हैं, इसलिए हमें धैर्य रखना चाहिए। कन्हैया के खिलाफ सुबूत होगा तो उसे सजा होगी और सुबूत नहीं होगा तो वह हीरो बनकर बाहर आएगा, यह निश्चित है।

विरोधाभास
कुछ समय पहले रवीश कुमार ने एक लेख में लिखा कि टीवी से रिपोर्टर और खबरें न जानें कहां गायब हो गई हैं। लेकिन इस लेख के उलट स्वयं उनके चैनल में रात आठ से दस बजे तक खबर नाम की कोई चीज नहीं दिखाई देती। केवल बहस दिखाई देती है और उसमें भी विरोधी ही उनके निशाने पर होते हैं। यही काम तो दूसरे पत्रकार कर रहे हैं, फिर रवीश कहां अलग हुए।  इतना ही नहीं एनडीटीवी पर तो यह भी होता है कि रवीश के साथी जिस विषय पर आठ से नौ बजे तक बहस करते हैं, अक्सर रवीश भी उसी विषय पर नौ से दस बजे तक बहस करते हैं। वे दो घंटे तक विषय भी नहीं बदलते, हां मेहमान जरूर बदले होते हैं। ऐसे में खबर के न दिखाई देने का रोना रवीश कुमार का विरोधाभास नहीं है तो क्या है।

कुछ महीने पहले रवीश कुमार “पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ..” जैसा कुछ जुमला लेकर आए थे। इसमें वह कहते थे कि जिस किसी भी पार्टी या नेता पर कोई  आरोप लगता है तो वह अपने कृत्य के बचाव में सामने वाले के पुराने या दूसरे कुकृत्य गिनाने लगता है। लेकिन विडंबना देखिए कि स्वयं रवीश भी इसी रास्ते पर जब-तब चलते देखे जाते हैं। हालिया जेएनयू प्रकरण में वे कम्युनिस्ट पार्टी और देशविरोधी नारे लगाने वालों की तरह ही बचाव में ठीक वैसा ही तर्क दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि भाजपा जब कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने में असहज नहीं है तो जेयूनयू में देशविरोधी नारों पर हंगामा क्यों? वे कह रहे हैं कि जब कश्मीर में रोजाना देशविरोधी नारे लग रहे हैं तो जेएनयू के नारों पर हंगामा क्यों?  सवाल यह है कि क्या देशविरोधी नारों का गलत होना केवल भाजपा या आरएसएस से जुड़ा है? क्या देशविरोधी नारों से केवल भाजपा या आरएसएस को ही एतराज है? क्या इनसे इतर लोगों को देशविरोधी नारों से दुख नहीं पहुंचा है। यदि भाजपा कश्मीर में कुछ गलत कर रही है तो क्या भाजपा से इतर लोग भी जेएनयू में देशविरोधी नारों पर आपत्ति न जताएं? यदि कश्मीर में देशविरोधी नारे लगते हैं तो क्या देश के बाकी हिस्से में भी देशविरोधी नारे जायज ठहराए जा सकते हैं? क्या रवीश कुमार नहीं जानते हैं कि कश्मीर की स्थिति देश के बाकी हिस्सों से अलग है?

सत्ता विरोध
पत्रकारिता की दृष्टि से हमेशा ही उसे बढ़िया पत्रकार, अखबार या चैनल माना जाता है जो सत्ता के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखता है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि कोई पत्रकार, अखबार या चैनल इसके लिए सत्ताओं में से किसी एक का चुनाव करता है तो फिर उसका दोगलापन छिपा नहीं रह पाता है। जिले या राज्य के पत्रकार के सामने तो एक ही सत्ता सामने होती है, इसलिए उसका एक सत्ता को चुनना या निशाना बनाना  स्वाभाविक होता है, लेकिन दिल्ली में बैठे राष्ट्रीय अखबारों, चैनलों और पत्रकारों के सामने पूरे देश में कई सत्ताएं होती हैं। ऐसे में यदि वे विरोध करने के लिए किसी एक सत्ता का चुनाव करते हैं और बाकी सत्ताओं को छोड़ देते हैं तो उनकी कथित जुझारू पत्रकारिता की पोल खुल जाती है। ऐसे में उनका सत्ता विरोध निजी खुन्नस ही ज्यादा नजर आता है। अगर आप निष्पक्षता का दावा करते हैं और अगर आपका सत्ता के प्रति आलोचनात्मक रवैया है तो हर प्रकार की सत्ता के प्रति होना चाहिए। यह नहीं होना चाहिए कि मोदी के प्रति तो आप आलोचनात्मक रवैया रखें, लेकिन नीतीश कुमार या ममता बनर्जी के प्रति नरम हो जाएं।

बिहार चुनाव में रवीश कुमार ने लोकसभा चुनाव की ही तरह रैलियों की रिपोर्टिंग से चुनाव की शुरुआत की। वहां उन्हें बोलना पड़ा कि भाषण कला और भीड़ की दृष्टि से मोदी बीस पड़ रहे हैं। इस पर रवीश ने पैंतरा बदला। उन्होंने रैली कवर करना छोड़कर बदलते बिहार पर रिपोर्टिंग शुरू कर दी। यह परोक्ष रूप से नीतीश कुमार का समर्थन करना ही था। बदलते बिहार वाली रिपोर्टिंग लोगों को यह बताने का प्रयास थी कि भले ही कोई बिहार को पिछड़ा कह रहा हो, जंगलराज की बात कर रहा हो, लेकिन बिहार तो बहुत तरक्की कर गया है। जाहिर है जब तरक्की कर गया है तो यह काम नीतीश कुमार ने ही किया है। जाहिर है यह नीतीश ने ही किया था, लेकिन चुनाव के वक्त यह कहना रवीश का निरा पक्षपात था। स्वयं नीतीश की रैलियों में रवीश के कार्यक्रम के आधार पर जिक्र होता था कि बिहार में कैसे लड़कियां बेखौफ साइकिल दौड़ा रही हैं।

दरअसल सकारात्मकता और नकारात्मकता के साथ दिलचस्प पहलू यह है कि यदि आप सकारात्मकता खोजने चलते हैं तो वह आपको भारी नकारात्मकता के बीच भी दिख ही जाएगी। इसी तरह यदि आप नकारात्मकता खोजने चलेंगे तो भारी सकारात्मकता के बीच आपको नकारात्मकता भी मिल ही जाएगी। 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त रवीश कुमार ने मोदी की गुजरात सत्ता में नकारात्मकता खोजना तय किया, जबकि 2105 के बिहार चुनाव में उन्होंने नीतीश की बिहार सत्ता में सकारात्मकता खोजना तय किया। यह उनका चुनाव था, इसमें हम कुछ नहीं कर सकते, पर यह जरूर कह सकते हैं कि जब सत्ता के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखना है तो फिर ऐसा दोहरापन क्यों?

बंगाल के मालदा कांड पर हमने रवीश कुमार का एक भी कार्यक्रम नहीं देखा। बंगाल में रह-रहकर घरों में हो रहे बम विस्फोटों पर हमने रवीश कुमार को बंगाल भागते नहीं देखा। केरल में कम्युनिस्टों द्वारा विरोधियों की श्रृंखलाबद्ध हत्याओं पर हमने रवीश का कोई कार्यक्रम नहीं देखा। केरल के मुख्यमंत्री के खिलाफ इतना बड़ा मामला हो गया, हमने रवीश कुमार का कोई कार्यक्रम इस पर नहीं देखा। बेंगलुरू कैसे आईटी हब के साथ-साथ रेपिस्टों और गुंडों का हब बन गया है, इस पर हमने रवीश का कोई कार्यक्रम नहीं देखा। केजरीवाल के विज्ञापनों या उनके मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर हमने रवीश का कोई कार्यक्रम नहीं देखा। बिहार में बढ़ रहे अपराधों पर हमने उनका कोई कार्यक्रम नहीं देखा। लोगों को बड़ी खुशी होती यदि जिन मुद्दों (कश्मीरी पंडित आदि) पर जी न्यूज या अन्य चैनल कथित सांप्रदायिक या राष्ट्रवादी रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उन्हीं मुद्दों पर रवीश कुमार या उनका चैनल तथ्यपरक और सही रिपोर्टिंग करके दिखाता।

ये मुद्दे छोटे नहीं हैं। ये सभी विभिन्न राज्यों की सत्ताओं से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, सत्ताओं को हिलाने वाले मुद्दे हैं, लेकिन रवीश की मर्जी, हम कौन होते हैं उनसे कार्यक्रम करवाने वाले, लेकिन ऐसे ही अपने हिसाब से मुद्दे चुनने का काम बाकी पत्रकार भी तो कर रहे हैं। कमोबेश यही रवीश भी कर रहे हैं तो फिर वह कहां से अलग हुए?

राजनीति की जानकारी या राजनीति में दखल रखने वालों की बातें छोड़िए, सामान्य व्यक्ति भी टीवी देखते समय यह जान जाता है कि कौन सा टीवी चैनल किस पक्ष में है। स्वयं अपनी पत्नी का उदाहरण देता हूं। पत्नी की राजनीति में रुचि नहीं है, लेकिन खबरें देखने के दौरान वह बड़े सहज भाव से मुझसे दो-तीन बार पूछ चुकी है कि

“ये मोदी के समर्थक (रजत शर्मा) हैं क्या?”

और यह भी कि

“इनको (रवीश कुमार) मोदी से चिढ़ है क्या?”

इससे पता चलता है कि सब अपने-अपने हिसाब से पत्रकारिता कर रहे हैं। कुछ चैनल सत्ता के नजदीक हैं तो कुछ विरोध में। एनडीटीवी और ज्यादा आक्रामक दिखने की कोशिश संभवतः इसलिए कर रहा है कि यदि उसके खिलाफ वित्तीय अनियमितता के मामले में कोई कार्रवाई होती है तो यह दिखाया जा सके कि चूंकि हम सरकार के खिलाफ खबरें दिखा रहे थे, इसलिए सरकार ने मीडिया का गला घोंटने का प्रयास किया है। और इसलिए भी कि इस प्रकार के संभावित आरोप से बचने के लिए सरकार कार्रवाई ही न करे।

लव कुमार सिंह
पत्रकार और लेखक
मकान नंबर 45, सैक्टर 1
शास्त्रीनगर
मेरठ-250004

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश ने जो कमाया है वह गालियों से बहुत आगे की चीज है

Sanjaya Kumar Singh :  मुझे नहीं लगता कि कोई मालिक एंकर अपने चैनल पर ऐसा लिख-बोल पाएगा। लेकिन रवीश कुमार ने कल कर दिखाया। इसके लिए खुद को बनाना पड़ता है। एक कद हासिल करना पड़ता है और यह कद पुरस्कारों या सस्ती लोकप्रियता के साथ नहीं मिल सकता है। मोटी तनख्वाह के साथ तो नहीं ही मिलेगा। तय आपको करना है कि क्या चाहिए। लगे रहिए भक्ति में या फिर पैसे ही कमा लीजिए। रवीश ने जो कमाया है वह गालियों से बहुत आगे की चीज है। गाली देने वाले क्या जानें। रवीश कुमार को नहीं देखने वालों के पास दर्शक के रूप में रवीश का जवाब तो नहीं ही होगा।

Jyotika Patteson : रवीश, आप वाकई एक बेमिसाल पत्रकार हैं. हर रोज इन डिबेट शो से हम सब ऊब चुके हैं. सच है, कभी कभी एंकर इस तरह से चीखते हैं जैसे अभी ये इन सबको सजा ही दे देंगे. पत्रकार अपना काम भूल कर प्रवक्ता से न्यायी बन चुके हैं. शायद यही वजह है आज बहुत से लोग समाचारों से बेजार हो रहे हैं.. आपका ये शो वाकई काबिले तारीफ है…. जिन लोगों ने कल रात ये शो नही देखा वो इस लिंक को जरूर देखें : Ravish Prime Time Show

प्रकाश कुकरेती : कल जिसने भी रविश कुमार का प्राइम टाइम देखा होगा, सबने उसको अपने अपने नजरिये से देखा होगा. पहली बार किसी चैनल ने दूसरे चैनलों की खबर ली, भारत की मीडिया में यह पहली बार हुआ कि एक चैनल ने दूसरे चैनलों को आईना दिखाया. नहीं तो अब तक सब चैनल अंदरखाने एक दूसरे का समर्थन करते थे. इण्डिया टीवी में एक महिला एंकर ने उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या की कोशिश की, मगर किसी भी चैनल पर यह खबर नहीं चली. नोएडा में आईबीएन7 से रातोंरात दर्जनों पत्रकार बाहर कर दिए, गए मगर किसी चैनल ने इसे खबर नहीं बनाया. जी न्यूज के 100 करोड़ी तिहाड़ी रिटर्न सुधीर चौधरी ने उमा खुराना नाम की एक महिला का फर्जी स्टिंग चलाया, पर किसी चैनल पर कोई खबर नहीं चली. यहाँ तक कि 100 करोड़ की दलाली की खबर भी किसी चैनल ने उस तरह नहीं दिखाई जिस तरह दिखानी चाहिए थी. मेरे हिसाब से कल एक पत्रकार ने मोदिया हो रहे मीडिया को आईना दिखाने का काम किया. इसका स्वागत किया जाना चाहिए. पर एक बात समझ में नहीं आई कि संघी और भाजपाई ही इस प्राइम टाइम का सबसे ज्यादा विरोध क्यों कर रहे हैं. शायद मोदिया की पोल पट्टी खुल जाने के डर से? मेरा उन सबसे यही कहना है जो रविश प्रोग्राम के अंत मैं कहते हैं, तब जब आखिरी एक मिनट के लिए स्क्रीन चमकती है और रवीश दिखाई देते हैं, यह कहते हैं- ”रात बहुत हो गई है, अब सो जाइए, धन्यवाद.”

पत्रकार संजय कुमार सिंह, ज्योतिका पैटरसन और प्रकाश कुकरेती के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तब रवीश कुमार की आत्मा नहीं जागी थी?

Sarjana Sharama : रवीश कुमार अच्छे पत्रकार है माना जा सकता है। लेकिन निरपेक्ष भाव से या बिना किसी का पक्ष लिए पत्रकारिता करते हैं ये नहीं माना जा सकता। उनकी अंतरआत्मा भी कुछ सिलेक्टिव मुद्दों पर जागती है। अब देखिए ना काला पर्दा दिखा कर वो इमंरजेंसी जैसा माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं जिसको एक वर्ग हाथों हाथ ले रहा है।

लेकिन मेरा सवाल ये है कि अंतरआत्मा में डबल सिम लगा है क्या। जब उनके चैनल का नाम 2 G SPECTRUM में खूब उछला दलाली की ऑडियो टेप वायरल हुई। उनके चैनल की QUEEN किसी को मंत्री बनवाने की वकालत कर रही थीं और नीरा राडिया और यूपीए मंत्रियों से जोड़ तोड़ कर रही थी तब रवीश कुमार की आत्मा नहीं जागी थी? पत्रकारिता के मूल्यों का ऐसा पतन देख कर उन्हें ग्लानि नहीं हुई क्या? उन्होंने नौकरी से इस्तीफा क्यों नहीं दिया? कैसे देते लाखों रूपए महीना की नौकरी कैसे छोड़ी जा सकती है जब तक चैनल में है तब तक ही कथा बांच सकते हैं।

रवीश कुमार दोहरे मापदंड मत अपनाओ… नैतिकता और मुद्दों की बात करते हो तो हर मुद्दे को सही और गलत के तराजू पर तोलो। वैसे तुम्हें माफ भी किया जा सकता है क्योंकि मालिक तुम्हारा घनघोर वामपंथी है और जिसका नमक खाओगे उसका नमक का हक अदा करोगे. औऱ, कांग्रेस ने तुम्हारे भाई को बिहार विधानसभा में टिकट दिया था। चलो कोई बात नहीं, सब देख कर चलना पड़ता है। अपना नफा नुकसान पहले, बाकी सब बाद में। मौका अच्छा है। वाहवाही बटोर लो।

पत्रकार सर्जना शर्मा के फेसबुक वाल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बिना प्रणव राय की मर्जी के रवीश कुमार एनडीटीवी में सांस भी ले सकते हैं?

: सच यह है कि रवीश कुमार भी दलाल पथ के यात्री हैं : ब्लैक स्क्रीन प्रोग्राम कर के रवीश कुमार कुछ मित्रों की राय में हीरो बन गए हैं। लेकिन क्या सचमुच? एक मशहूर कविता के रंग में जो डूब कर कहूं तो क्या थे रवीश और क्या हो गए हैं, क्या होंगे अभी! बाक़ी तो सब ठीक है लेकिन रवीश ने जो गंवाया है, उसका भी कोई हिसाब है क्या? रवीश कुमार के कार्यक्रम के स्लोगन को ही जो उधार ले कर कहूं कि सच यह है कि ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है! कि देश और देशभक्ति को मज़ाक में तब्दील कर दिया गया है। बहस का विषय बना दिया गया है। जैसे कोई चुराया हुआ बच्चा हो देशभक्ति कि पूछा जाए असली मां कौन?  रवीश कुमार एंड कंपनी को शर्म आनी चाहिए।

आपको क्या लगता है कि बिना प्रणव राय की मर्जी के रवीश कुमार एनडीटीवी में सांस भी ले सकते हैं?  एक समय था कि इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी का बड़ा बोलबाला था। उनकी न्यूज़ स्टोरी बड़ा हंगामा काटती रहती थीं। बाद के दिनों में वह जब इंडियन एक्सप्रेस से कुछ विवाद के बाद अलग हुए तो एक इंटरव्यू में डींग मारते हुए कह गए कि मैं अपनी स्टोरी के लिए कहीं जाता नहीं था, स्टोरी मेरी मेज़ पर चल कर आ जाती थी। रामनाथ गोयनका से पूछा गया अरुण शौरी की इस डींग के बारे में तो गोयनका ने जवाब दिया कि अरुण शौरी यह बात तो सच बोल रहा है क्योंकि उसे सारी स्टोरी तो मैं ही भेजता था, बस वह अपने नाम से छाप लेता था। अब अरुण शौरी चुप थे।

लगभग हर मीडिया संस्थान में कोई कितना बड़ा तोप क्यों न हो उस की हैसियत रामनाथ गोयनका के आगे अरुण शौरी जैसी ही होती है। बड़े-बड़े मीडिया मालिकान ख़बरों के मामले में एडीटर और एंकर को डांट कर डिक्टेट करते हैं। हालत यह है कि कोई कितना बड़ा तोप एडीटर भी नगर निगम के एक मामूली बाबू के ख़िलाफ़ ख़बर छापने की हिमाकत नहीं कर सकता अगर मालिकान के हित वहां टकरा गए हैं। विनोद मेहता जब पायनियर के चीफ़ एडीटर थे तब उन्हें एलएम थापर ने दिल्ली नगर निगम के एक बाबू के ख़िलाफ़ ख़बर छापने के लिए रोक दिया था। सोचिए कि कहां थापर, कहां नगर निगम का बाबू और कहां विनोद मेहता जैसा एडीटर! लेकिन यह बात विनोद मेहता ने मुझे ख़ुद बताई थी। तब मैं भी पायनियर के सहयोगी प्रकाशन स्वतंत्र भारत में था। मैं इंडियन एक्सप्रेस के सहयोगी प्रकाशन जनसत्ता में भी प्रभाष जोशी के समय में रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस, जनसत्ता के भी तमाम सारे ऐसे वाकये हैं मेरे पास। पायनियर आदि के भी। पर यहां बात अभी क्रांतिकारी बाबू रवीश कुमार की हो रही है तो यह सब फिर कभी और।

अभी तो रवीश कुमार पर। वह भी बहुत थोड़ा सा। विस्तार से फिर कभी। रवीश कुमार प्रणव राय के पिंजरे के वह तोता हैं जो उन के ही एजेंडे पर बोलते और चलते हैं। इस बात को इस तरह से भी कह सकते हैं कि प्रणव राय निर्देशक हैं और रवीश कुमार उनके अभिनेता। प्रणव राय इन दिनों फेरा और मनी लांड्रिंग जैसे देशद्रोही आरोपों से दो चार हैं। आप यह भी भूल रहे हैं कि प्रणव राय ने नीरा राडिया के राडार पर सवार रहने वाली बरखा दत्त जैसे दलाल पत्रकारों का रोल माडल तैयार कर उन्हें पद्मश्री से भी सुशोभित करवाया है। अब वह दो साल से रवीश कुमार नाम का एक अभिनेता तैयार कर उपस्थित किए हुए हैं। ताकि मनी लांड्रिंग और फेरा से निपटने में यह हथियार कुछ काम कर जाए।

रवीश कुमार ब्राह्मण हैं पर उनकी दलित छवि पेंट करना भी प्रणव राय की स्कीम है। रवीश दलित और मुस्लिम कांस्टिच्वेन्सी को जिस तरह बीते कुछ समय से एकतरफा ढंग से एड्रेस कर रहे हैं उससे रवीश कुमार पर ही नहीं मीडिया पर भी सवाल उठ गए हैं। रवीश ही क्यों रजत शर्मा, राजदीप सरदेसाई, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया आदि ने अब कैमरे पर रहने का, मीडिया में रहने का अधिकार खो दिया है, अगर मीडिया शब्द थोड़ा बहुत शेष रह गया हो तो। सच यह है कि यह सारे लोग मीडिया के नाम पर राजनीतिक दलाली की दुकान खोल कर बैठे हैं। इन सबकी राजनीतिक और व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं अब किसी से छुपी नहीं रह गई हैं। यह लोग अब गिरोहबंद अपराधियों की तरह काम कर रहे हैं। कब किस को उठाना है, किस को गिराना है मदारी की तरह यह लोग लगे हुए हैं। ख़ास कर प्रणव राय जितना साफ सुथरे दीखते हैं, उतना हैं नहीं।

अव्वल तो यह सारे न्यूज चैनल लाइसेंस न्यूज चैनल का लिए हुए हैं लेकिन न्यूज के अलावा सारा काम कर रहे हैं। चौबीस घंटे न्यूज दिखाना एक खर्चीला और श्रम साध्य काम है। इस लिए यह चैनल भडुआगिरी पर आमादा हैं।  दिन के चार-चार घंटे मनोरंजन दिखाते हैं। रात में भूत प्रेत, अपराध कथाएं दिखाते हैं। धारावाहिकों और सिनेमा के प्रायोजित कार्यक्रम , धर्म ज्योतिष के पाखंडी बाबाओं की दुकानें सजाते हैं। और प्राइम टाइम में अंध भक्ति से लबालब  विचार और बहस दिखाते हैं। देश का माहौल बनाते-बिगाड़ते हैं। और यहीं प्रणव राय जैसे शातिर, रजत शर्मा जैसे साइलेंट आपरेटर अपना आपरेशन शुरू कर देते हैं। फिर रवीश कुमार जैसे जहर में डूबे अभिनेता, राजदीप सरदेसाई जैसे अतिवादी, सुधीर चौधरी जैसे ब्लैकमेलर, अभिज्ञान प्रकाश जैसे डफर, दीपक चौरसिया जैसे दलाल, चीख़-चीख़ कर बोलने वाले अहंकारी अर्नब गोस्वामी जैसे बेअदब लोग सब के ड्राईंग रूम, बेड रूम में घुस कर मीठा और धीमा जहर परोसने लगते हैं।

लेकिन सरकार इतनी निकम्मी और डरपोक है कि मीडिया के नाम पर इस कमीनगी के बारे में पूछ भी नहीं सकती। कि अगर आप ने साईकिल बनाने का लाईसेंस लिया है तो जहाज कैसे बना रहे हैं?  ट्यूब बनाने का लाईसेंस लिया है तो टायर कैसे बना रहे हैं। दूसरे, अब यह स्टैब्लिश फैक्ट है कि सिनेमा और मीडिया खुले आम नंबर दो का पैसा नंबर एक का बनाने के धंधे में लगे हुए हैं । तीसरे ज़्यादातर मीडिया मालिक या उनके पार्टनर या तो बिल्डर हैं या चिट फंड के कारोबारी हैं। इनकी रीढ़ कमज़ोर है। लेकिन सरकार तो बेरीढ़ है । जो इन से एक फार्मल सवाल भी कर पाने की हैसियत नहीं रखती।  सरकार की इसी कमज़ोरी का लाभ ले कर यह मीडिया पैसा कमाने के लिए देशद्रोह और समाजद्रोह पर आमादा है। रवीश कुमार जैसे लोग इस समाजद्रोह के खलनायक और वाहक हैं । लेकिन उन की तसवीर नायक की तरह पेश की जा रही है। रवीश कुमार इमरजेंसी जैसा माहौल बता रहे हैं। पहले असहिष्णुता बताते रहे थे। असहिष्णुता और इमरजेंसी उन्होंने देखी नहीं है। देखे होते तो मीडिया में थूक नहीं निकलता, बोलना तो बहुत दूर की बात है। हमने देखा है इमरजेंसी का वह काला चेहरा। वह दिन भी देखा है जब खुशवंत सिंह जैसा बड़ा लेखक और उतना ही बड़ा संजय गांधी का पिट्ठू पत्रकार इलस्ट्रटेटेड वीकली में कैसे तो विरोध के बिगुल बजा बैठा था। अपनी सुविधा, अपना पॉलिटिकल कमिटमेंट नहीं, मीडिया की आत्मा को देखा था। रवीश जैसे लोग क्या देखेंगे अब? इंडियन एक्सप्रेस ने संपादकीय पेज को ख़ाली छोड़ दिया था। खैर वह सब और उस का विस्तार भी अभी यहां मौजू नहीं है।

बैंक लोन के रूप में आठ लाख करोड़ रुपए कार्पोरेट कंपनियां पी गई हैं। सरकार कान में तेल डाले सो रही है। किसानों की आत्म हत्या, मंहगाई, बेरोजगारी, कार्पोरेट की बेतहाशा लूट पर रवीश जैसे लोगों की, मीडिया की आंख बंद क्यों है। मीडिया इंडस्ट्री में लोगों से पांच हज़ार दो हज़ार रुपए महीने पर भी कैसे काम लिया जा रहा है? नीरा राडिया के राडार पर इसी एनडीटीवी की बरखा दत्त ने टू जी स्पेक्ट्रम में कितना घी पिया, है रवीश कुमार के पास हिसाब? कोयला घोटाला भी वह इतनी जल्दी क्यों भूल गए हैं। रवीश किस के कहे पर कांग्रेस और आप की मिली जुली सरकार बनाने की दलाली भरी मीटिंग अपने घर पर निरंतर करवाते रहे? बताएंगे वह? रवीश के बड़े भाई को बिहार विधान सभा में कांग्रेस का टिकट क्या उनकी सिफ़ारिश पर ही नहीं दिया गया था? अब वह इस भाजपा विरोधी लहर में भी हार गए यह अलग बात है। लेकिन इन सवालों पर रवीश कुमार ख़ामोश हैं। उन के सवाल चुप हैं।

अब ताज़ा-ताज़ा गरमा-गरम जलेबी वह जे एन यू में लगे देशद्रोही नारों पर छान रहे हैं। जनमत का मजाक उड़ा रहे हैं। देश को मूर्ख बना रहे हैं। हां, रवीश के सवाल जातीय और मज़हबी घृणा फैलाने में ज़रूर सुलगते रहते हैं। कौन जाति हो? उन का यह सवाल अब बदबू मारते हुए उनकी पहचान में शुमार हैं। जैसे वह अभी तक पूछते रहे हैं कि कौन जाति हो? इन दिनों पूछ रहे हैं, देशभक्त हो? गोया पूछ रहे हों तुम भी चोर हो? दोहरे मापदंड अपनाने वाले पत्रकार नहीं, दलाल होते हैं। माफ़ कीजिए रवीश कुमार आप अब अपनी पहचान दलाल पत्रकार के रूप में बना चुके हैं। दलाली सिर्फ़ पैसे की ही नहीं होती, दलाली राजनीतिक प्रतिबद्धता की भी होती है। सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया जैसे लोग पैसे की दलाली के साथ राजनीतिक दलाली भी कर रहे हैं। आप राजनीतिक दलाली के साथ-साथ अपने एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय की चंपूगिरी भी कर रहे हैं। और जो नहीं कर रहे हैं तो बता दीजिए न अपनी विष बुझी हंसी के साथ किसी दिन कि प्रणव राय और प्रकाश करात रिश्ते में साढ़ू  लगते हैं। हैS हैS ऊ अपनी राधिका भाभी हैं न, ऊ वृंदा करात बहन जी की बहन हैं। हैS हैS, हम भी क्या करें?

सच यह है कि जो काम, जो राजनीतिक दलाली बड़ी संजीदगी और सहजता से बिना लाऊड हुए रजत शर्मा इंडिया टीवी में कर रहे हैं, जो काम आज तक पर राजदीप सरदेसाई कर रहे हैं, जो काम ज़ी न्यूज़ में सुधीर चौधरी, इण्डिया न्यूज़ में दीपक चौरसिया आदि-आदि कर रहे हैं, ठीक वही काम, वही राजनीतिक दलाली प्रणव राय की निगहबानी में रवीश कुमार जहरीले ढंग से बहुत लाऊड ढंग से एनडीटीवी में कर रहे हैं। हैं यह सभी ही राजीव शुक्ला वाले दलाल पथ पर। किसी में कोई फर्क नहीं है। है तो बस डिग्री का ही।

निर्मम सच यह है कि रवीश कुमार भी दलाल पथ के यात्री हैं। अंतिम सत्य यही है। आप बना लीजिए उन्हें अपना हीरो, हम तो अब हरगिज़ नहीं मानते। अलग बात है कि हमारे भी कभी बहुत प्रिय थे रवीश कुमार तब जब वह रवीश की रिपोर्ट पेश करते थे। सच हिट तो सिस्टम को वह तब करते थे। क्या तो डार्लिंग रिपोर्टर थे तब वह। अफ़सोस कि अब क्या हो गए हैं! कि अपनी नौकरी की अय्यासी में, अपनी राजनीतिक दलाली में वह देशभक्त शब्द की तौहीन करते हुए पूछते हैं देशभक्ति होती क्या है? आप तय करेंगे? आदि-आदि। जैसे कुछ राजनीतिज्ञ बड़ी हिकारत से पूछते फिर रहे हैं कि यह देशभक्ति का सर्टिफिकेट क्या होता है?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अपने ब्लैक प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश लगातार क्या बोलते रहे, यहां पढ़िए

आप सबको पता ही है कि हमारा टीवी बीमार हो गया है। पूरी दुनिया में टीवी में टीबी हो गया है। हम सब बीमार हैं। मैं किसी दूसरे को बीमार बताकर खुद को डॉक्टर नहीं कह रहा। बीमार मैं भी हूं। पहले हम बीमार हुए अब आप हो रहे हैं। आपमें से कोई न कोई रोज़ हमें मारने पीटने और ज़िंदा जला देने का पत्र लिखता रहता है। उसके भीतर का ज़हर कहीं हमारे भीतर से तो नहीं पहुंच रहा। मैं डॉक्टर नहीं हूं। मैं तो ख़ुद ही बीमार हूं। मेरा टीवी भी बीमार है। डिबेट के नाम पर हर दिन का यह शोर शराबा आपकी आंखों में उजाला लाता है या अंधेरा कर देता है। आप शायद सोचते तो होंगे।

डिबेट से जवाबदेही तय होती है। लेकिन जवाबदेही के नाम पर अब निशानदेही हो रही है। टारगेट किया जा रहा है। इस डिबेट का आगमन हुआ था मुद्दों पर समझ साफ करने के लिए। लेकिन जल्दी ही डिबेट जनमत की मौत का खेल बन गया। जनमत एक मत का नाम नहीं है। जनमत में कई मत होते हैं। मगर यह डिबेट टीवी जनमत की वेरायटी को मार रहा है। एक जनमत का राज कायम करने में जुट गया है। जिन एंकरों और प्रवक्ताओं की अभिव्यक्ति की कोई सीमा नहीं है वो इस आज़ादी की सीमा तय करना चाहते हैं। कई बार ये सवाल खुद से और आपसे करना चाहिए कि हम क्या दिखा रहे हैं और आप क्यों देखते हैं। आप कहेंगे आप जो दिखाते हैं हम देखते हैं और हम कहते हैं आप जो देखते हैं वो हम दिखाते हैं। इसी में कोई नंबर वन है तो कोई मेरे जैसा नंबर टेन। कोई टॉप है तो कोई मेरे जैसा फेल। अगर टीआरपी हमारी मंज़िल है तो इसके हमसफ़र आप क्यों हैं। क्या टीआरपी आपकी भी मंज़िल है।

इसलिए हम आपको टीवी की उस अंधेरी दुनिया में ले जाना चाहते हैं जहां आप तन्हा उस शोर को सुन सकें। समझ सकें। उसकी उम्मीदों, ख़ौफ़ को जी सकें जो हम एंकरों की जमात रोज़ पैदा करती है। आप इस चीख को पहचानिये। इस चिल्लाहट को समझिये। इसलिए मैं आपको अंधेरे में ले आया हूं। कोई तकनीकि ख़राबी नहीं है। आपका सिग्नल बिल्कुल ठीक है। ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है। हमने जानबूझ कर ये अंधेरा किया है। समझिये आपके ड्राईंग रूम की बत्ती बुझा दी है और मैं अंधेरे के उस एकांत में सिर्फ आपसे बात कर रहा हूं। मुझे पता है आज के बाद भी मैं वही करूंगा जो कर रहा हूं। कुछ नहीं बदलेगा, न मैं बदल सकता हूं। मैं यानी हम एंकर। तमाम एंकरों में एक मैं। हम एंकर चिल्लाने लगे हैं। धमकाने लगे हैं। जब हम बोलते हैं तो हमारी नसों में ख़ून दौड़ने लगता है। हमें देखते देखते आपकी रग़ों का ख़ून गरम होने लगा है। धारणाओं के बीच जंग है। सूचनाएं कहीं नहीं हैं। हैं भी तो बहुत कम हैं।

हमारा काम तरह तरह से सोचने में आपकी मदद करना है। जो सत्ता में है उससे सबसे अधिक सख़्त सवाल पूछना है। हमारा काम ललकारना नहीं है। फटकारना नहीं है। दुत्कारना नहीं है। उकसाना नहीं है। धमकाना नहीं है। पूछना है। अंत अंत तक पूछना है। इस प्रक्रिया में हम कई बार ग़लतियां कर जाते हैं। आप माफ भी कर देते हैं। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि हम ग़लतियां नहीं कर रहे हैं। हम जानबूझ कर ऐसा कर रहे हैं। इसलिए हम आपको इस अंधेरी दुनिया में ले आए हैं। आप हमारी आवाज़ को सुनिये। हमारे पूछने के तरीकों में फर्क कीजिए। परेशान और हताश कौन नहीं है। सबके भीतर की हताशा को हम हवा देने लगे तो आपके भीतर भी गरम आंधी चलने लगेगी। जो एक दिन आपको भी जला देगी।

जेएनयू की घटना को जिस तरह से टीवी चैनलों में कवर किया गया है उसे आप अपने अपने दल की पसंद की हिसाब से मत देखिये। उसे आप समाज और संतुलित समझ की प्रक्रिया के हिसाब से देखिये। क्या आप घर में इसी तरह से चिल्ला कर अपनी पत्नी से बात करते हैं। क्या आपके पिता इसी तरह से आपकी मां पर चीखते हैं। क्या आपने अपनी बहनों पर इसी तरह से चीखा है। ऐसा क्यों हैं कि एंकरों का चीखना बिल्कुल ऐसा ही लगता है। प्रवक्ता भी एंकरों की तरह धमका रहे हैं। सवाल कहीं छूट जाता है। जवाब की किसी को परवाह नहीं होती। मारो मारो, पकड़ो पकड़ो की आवाज़ आने लगती है। एक दो बार मैं भी गुस्साया हूं। चीखा हूं और चिल्लाया हूं। रात भर नींद नहीं आई। तनाव से आंखें तनी रही। अक्सर सोचता हूं कि हमारी बिरादरी के लोग कैसे चीख लेते हैं। चिल्ला लेते हैं। अगर चीखने चिल्लाने से जवाबदेही तय होती तो रोज़ प्रधानमंत्री को चीखना चाहिए। रोज़ सेनाध्यक्ष को टीवी पर आकर चीखना चाहिए। हर किसी को हर किसी पर चीखना चाहिए। क्या टीवी को हम इतनी छूट देंगे कि वो हमें बताने की जगह धमकाने लगे। हममें से कुछ को छांट कर भीड़ बनाने लगे और उस भीड़ को ललकारने लगे कि जाओ उसे खींच कर मार दो। वो गद्दार है। देशद्रोही है। एंकर क्या है। जो भीड़ को उकसाता हो, भीड़ बनाता हो वो क्या है। पूरी दुनिया में चीखने वाले एंकरों की पूछ बढ़ती जा रही है। आपको लगता है कि आपके बदले चीख कर वो ठीक कर रहा है। दरअसल वो ठीक नहीं कर रहा है।

कई प्रवक्ता गाली देते हैं। मार देने की बात करते हैं। गोली मार देने की बात करते हैं। ये इसलिए करते हैं कि आप डर जाएं। आप बिना सवाल किये उनसे सहमत हो जाएं। हमारा टीवी अब आए दिन करने लगा है। एंकर रोज़ भाषण झाड़ रहे हैं। जैसे मैं आज झाड़ रहा हूं। वो देशभक्ति के प्रवक्ता हो गए हैं। हर बात को देशभक्ति और गद्दारी के चश्मे से देखा जा रहा है। सैनिकों की शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है। उनके बलिदान के नाम पर किसी को भी गद्दार ठहराया जा रहा है। इसी देश में जंतर मंतर पर सैनिकों के कपड़े फाड़ दिये गए। उनके मेडल खींचे गए। उन सैनिकों में भी कोई युद्ध में घायल है। किसी ने अपने शरीर का हिस्सा गंवाया है। कौन जाता है उनके आंसू पोंछने।

शहादत सर्वोच्च है लेकिन क्या शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल भी सर्वोच्च है। कश्मीर में रोज़ाना भारत विरोधी नारे लगते हैं। आज के इंडियन एक्सप्रेस में किसी पुलिस अधिकारी ने कहा है कि हम रोज़ गिरफ्तार करने लगें तो कितनों को गिरफ्तार करेंगे। बताना चाहिए कि कश्मीर में पिछले एक साल में पीडीपी बीजेपी सरकार ने क्या भारत विरोधी नारे लगाने वालों को गिरफ्तार किया है। हां तो उनकी संख्या क्या है। वहां तो आए दिन कोई पाकिस्तान के झंडे दिखा देता है, कोई आतंकवादी संगठन आईएस के भी।

कश्मीर की समस्या का भारत के अन्य हिस्सों में रह रहे मुसलमानों से क्या लेना देना है। कोई लेना देना नहीं है। कश्मीर की समस्या इस्लाम की समस्या नहीं है। कश्मीर की समस्या की अपनी जटिलता है। उसे सरकारों पर छोड़ देना चाहिए। पीडीपी अफज़ल गुरु को शहीद मानती है। पीडीपी ने अभी तक नहीं कहा कि अफज़ल गुरु वही है जो बीजेपी कहती है यानी आतंकवादी है। इसके बाद भी बीजेपी पीडीपी को अपनी सरकार का मुखिया चुनती है। यह भी दुखद है कि इस बेहतरीन राजनीतिक प्रयोग को जेएनयू में कुछ छात्रों को आतंकवादी बताने के नाम पर कमतर बताया जा रहा है। बीजेपी ने कश्मीर में जो किया वो एक शानदार राजनीतिक प्रयोग है। इतिहास प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए अच्छी जगह देगा। हां उसके लिए बीजेपी ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों को कुछ समय के लिए छोड़ा उसे लेकर सवाल होते रहेंगे। अफज़ल गुरु अगर जेएनयू में आतंकवादी है तो श्रीनगर में क्या है। इन सब जटिल मसलों को हम हां या ना कि शक्ल में बहस करेंगे तो तर्कशील समाज नहीं रह जाएंगे। एक भीड़ बन कर रह जाएंगे। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है!

बहरहाल अब जब चैनलों की दुनिया में हर नियम धाराशायी हो गए हैं। पहले हमें सिखाया गया था कि जो भड़काने की बात करे, उकसाने की बात करे, सामाजिक द्वेष की बात करे उसका बयान न दिखाना है न छापना है। अब क्या करेंगे जब एंकर ही इस तरह की बात कर रहे हैं। प्रवक्ताओं को कुछ भी बोलने की छूट दे रहे हैं। कन्हैया के भाषण के वीडियो को चैनलों ने खतरनाक तरीके से चलाया। बिना जांच किये कि कौन सा वीडियो सही उसे चलाया गया।

अब टीवी टुडे और एबीपी चैनल ने बताया है कि वीडियो फर्ज़ी हैं। कुछ वीडियों में कांट छांट है तो किसी में ऊपर से नारों को थोपा गया है। अगर वीडियो में इतना अंतर है तो यह जांच का विषय है। इसके पहले तक कैसे हम सबको नतीजे पर पहुंचने के लिए मजबूर किया गया। गली गली में जेएनयू के विरोध में नारे लगाए गए। छात्रों को आतंकवादी और देशद्रोही कहा गया।

क्या अब कोई चैनल उन वीडियो की जवाबदेही लेगा। क्या अब हम एंकर उतने ही घंटे चीख चीख कर बतायेंगे कि वीडियो सही नहीं थे। विवादित थे। किसी में कन्हैया गरीबी से, सामंतवाद से आज़ादी की बात कर रहा है तो किसी ने यह काट कर दिखाया कि वो सिर्फ आज़ादी की बात कर रहा है। तो क्या आज़ादी की बात करना कैसे मान लिया गया कि वो भारत से आज़ादी की बात कर रहा है। हमारे सहयोगी मनीष आज कन्हैया के घर गए थे। इतना ग़रीब परिवार है कि उनके पास पत्रकारों को चाय पिलाने की हैसियत नहीं है। उन्हें मुश्किल में देख मनीष कुमार वापस चले गए। इस ग़रीबी को झेलने वाला कोई छात्र नेता अगर ग़रीबी से आज़ादी की बात नहीं करेगा तो क्या उद्योगपतियों की गोद में बैठे हमारे राजनेता करेंगे।

कन्हैया कुमार की तस्वीरों को बदल-बदल कर चलाया गया ताकि लोग उसे एक आतंकवादी और गद्दार के रूप में देख सकें। एक तस्वीर में वो भाषण दे रहा है तो उसी तस्वीर में पीछे भारत का कटा छंटा झंडा जोड़ दिया गया है। फोटोशॉप तकनीक से आजकल खूब होता है। यह कितना ख़तरनाक है। सोशल मीडिया पर कौन लोग समूह बनाकर इसे हवा दे रहे थे। कौन लोग सबूत और गवाही से पहले ओमर ख़ालिद को आतंकवादी गद्दार बताने लगे। उसे भी भागना नहीं चाहिए था। सामने आकर बताना चाहिए था कि उसने क्या भाषण दिया और क्यों दिया। कन्हैया और ख़ालिद में यही अंतर है पर शायद जिस तरह से भीड़ कन्हैया के प्रति उदार है ख़ालिद को यह छूट नहीं मिलती। फिर भी अगर ख़ालिद ने ऐसा कुछ कहा तो उसे सामना करना चाहिए था। हालत यह है कि खालिद को आतंकवादी बताने के पोस्टर जगह जगह लगा दिये गए हैं। अब अगर उसका वीडियो फर्ज़ी निकल गया तो क्या होगा। क्या वीडियो के सत्यापन का इंतज़ार नहीं किया जाना चाहिए।

इसीलिए हमने आज इस स्क्रीन को काला कर दिया है। हम आज आपको तरह तरह की आवाज़ सुनायेंगे। हो सकता है आपमें से कुछ लोग चैनल बदल कर चले जायेंगे। यह भी तो हो सकता है कि आपमें से कुछ लोग अंत अंत तक उन आवाज़ों को सुनेंगे जो हफ्ते से आपके भीतर घर कर गई है। पहले हम आपको अलग अलग चैनलों के स्टुडियो में जो बातें कहीं गईं वो सुनाना चाहते हैं। नाम और पहचान में मेरी दिलचस्पी नहीं है क्योंकि हो सकता है ऐसा मैंने भी किया हो। ऐसा मुझसे भी हो जाए। पत्रकार तो पत्रकार, प्रवक्ताओं ने जिस तरह एंकरों पर धावा बोला है वो भी कम भयानक नहीं है। कहीं पत्रकार धावा बोल रहे थे, कहीं प्रवक्ता। लेकिन पत्रकारों ने देशभक्ति के नाम पर गद्दारों की जो परिभाषा तय की है वो बेहद खतरनाक है।

मेरा मकसद सिर्फ आपको सचेत करना है। आप सुनिये। ग़ौर से सुनिये। महसूस कीजिए कि इन्हें सुनते हुए आपका ख़ून कब ख़ौलता है। कब आप उत्तेजित हो जाते हैं। यह भी ध्यान रखिये कि अभी तक कोई भी तथ्य साबित नहीं हुआ है। जैसा कि दो चैनलों ने बताया है कि वीडियो के कई संस्करण हैं। इसलिए इसके आधार पर तुरंत कोई निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। आपके स्क्रीन पर यह अंधेरा पत्रकारिता का पश्चाताप है। जिसमें हम सब शामिल है। हम फिर से बता दें कि आप मुझे देख नहीं पा रहे हैं। कोई तकनीकि खराबी नहीं है। ये आवाज़ आपके ज़हन तक पहुंचाने की कोशिश भर है। कि हम सुन सकें कि हम क्या बोलते हैं। कैसे बोलते हैं और बोलने से क्या होता है।

रवीश कुमार


इस शो के वीडियो को देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

Ravish Prime Time Show

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश ने घनघोर अन्धकार भरे समय में पत्रकारिता की गिरती साख बचा लिया

Priyabhanshu Ranjan : आज Primetime देखते हुए सोच रहा था कि पूरी NDTV और खासकर रवीश कुमार ने जिस तरह न्यूज़ चैनलों, कुछ दोयम दर्जे के पत्रकारों, समाज में रह रही दंगाइयों की भीड़ और मोदी सरकार को expose किया है, क्या इससे उन्हें कोई खतरा नहीं होगा ! मुझे पूरा अंदेशा है कि रवीश और NDTV का कोई भी पत्रकार अब मोदी सरकार और उनके कट्टर समर्थकों को फूटी आंख नहीं सुहा रहा होगा। लिहाज़ा, उन्हें पत्रकारिता तो ऐसी ही जारी रखनी चाहिए…लेकिन अपनी सुरक्षा को लेकर भी चौकसी बरतनी चाहिए….क्योंकि रवीश सुधीर चौधरी जैसे ‘भक्त’ पत्रकार नहीं हैं, जिन्हें मोदी सरकार सरकारी सुरक्षा मुहैया करा दे।

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल : दोस्तों, विलक्षण था कल रात का प्राइम टाइम! हमारे समय को, हमारे मीडिया को दर्पण दिखाता हुआ एक ऐसा कार्यक्रम जो हर सोचने समझने वाले, हर संवेदनशील इंसान को हिला गया. हमारी, मतलब हममें से बहुतों की राजनीतिक प्रतिबद्धताएं हो सकती हैं. लेकिन उनके बावज़ूद यह सोचा जाना चाहिए कि हम किस तरफ़ बढ़ रहे हैं? कहां को जाता है यह रास्ता? ग़ौर कीजिए, यह कार्यक्रम किसी राजनीतिक दल को लक्षित नहीं था. यह मुखातिब था रवीश Ravish Kumar की खुद की बिरादरी से. और ऐसा करने का साहस भला कितने लोग दिखा पाते हैं? अगर आप इसे नहीं देख सके, तो थोड़ा वक़्त निकाल कर अब देख लीजिए.

आशीष सागर :  ‘उबास है हर दिल में और आदमी बेपर्दा है, जरा देखो तो रिश्तो में कितनी गर्दा है!’ शायद बीती रात इस देश का लोकतंत्र हिल गया हो! इस पहल को उस भीड़ पर मै तमाचा मानता हूँ इस सवाल के साथ कि वास्तव में मीडिया क्या है? इस प्राइम टाइम ने बतला दिया कि सच में हम नंगे हो चुके है! …बस ये आवाज सुनो इसलिए सुनो कि हम सब कहाँ जा रहे है! बधाई रवीश कुमार।

Prem Chand Gandhi : इस घनघोर अन्धकार भरे समय में आखिरकार पत्रकारिता और मीडिया की गिरती हुई साख को रवीश कुमार ने बचा ही लिया। कलम आज उनकी जय बोल।

Hemant Kumar Joshi : Everytime you think journalism is dead…Ravish comes for the rescue…. proud of him…,and proud on you also for timely and appropriate expression.

Subhash Ranade : टीवी पत्रकारिता के इतिहास का अविस्मरणीय शो। इमरजेंसी लगने पर राजेंद्र माथुर द्वारा सम्पादकीय स्तम्भ खाली छोड़ने की घटना याद आई। रवीश को सलाम…।

Rohit Tiwari : कुछ वर्षों पहले सर्वोच्च न्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश लाहोटी जी इंदौर प्रेस क्लब के न्यौते पर आये थे। चूंकि पद पर थे इसलिये कह दिया की सवाल नहीं होंगे, सिर्फ अपनी बात कहेंगे। लगभग 10 साल पहले वे कह गए थे की मीडिया ट्रायल बहुत बहुत ज्यादा खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में पनप रहा है। इस पर तत्काल लगाम कसने के लिए कदम उठाना होंगे। अफ़सोस सरकारें कुछ नहीं कर पाई। और तो और, वर्तमान सरकार तो बहुत हद तक इसी ट्रायल की premature baby है।

स्रोत : फेसबुक

 


रवीश कुमार के जिस प्राइम टाइम शो की बात की जा रही है, उसे अभी आनलाइन देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

Ravish Prime Time Show

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्राइम टाईम अंधेरे का सदमा… इस समय इस प्राइम टाइम की सख़्त जरूरत थी

Preety Choudhari : मैंने आदत के तौर पर टीवी देखना दस बारह साल पहले ही छोड़ दिया था ,यानि रवीश कुमार जब से अपने ब्लाग पर टी वी नहीं देखने की सलाह दे रहे हैं उससे बहुत पहले ही. मैं अच्छी तरह जानती थी कि मैं टीवी क्यों नहीं देखती …रवीश कुमार ने पत्रकारिता की इस कालिमा को पेश कर अपने ज़मीर को थोड़ा सुकून बख़्शा है या उसे और किकरत्व्यविमूढ़ कर दिया है पता नहीं पर इतना ज़रूर है कि इस समय इस प्राइम टाइम की सख़्त जरूरत थी.

Kashyap Kishor Mishra : प्राइम टाईम अँधेरे का सदमा… लखनऊ में एक महिला का बलात्कार हुआ था और उसकी तस्वीरें मीडिया में वायरल थीं, उस तस्वीर को देखकर मै दहल उठा था, मै कई दिन शॉक स्टेट में रहा, पर खूब सारे लोगों नें उस तस्वीर को सभ्यता के प्रतिकूल माना और उसे दिखाए जाने से परहेज की बात की। चार दिनों पहले, लखनऊ में ही, मुख्यमंत्री निवास से सटे इलाके में एक बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर फेंकी लाश बरामद हुई, इस खबर नें हमें झकझोर दिया, मेरी पत्नी इतना डर गई कि उसने बिटिया के ट्यूशन जाने पर रोक लगा दी, क्योंकि वहाँ वह अकेले जाती थी।

लखनऊ में कहीं भी जाईये, भिखारी बच्चों के गिरोह आपको घेर लेते हैं, कई बार सुबह आठ बजे के करीब वेव सिनेमा हाल के बाहर खड़े होकर मैं खामोशी से उनकी गतिविधियों का जायजा लेता हूँ, कई बार इन लड़कों में एकाध लड़के ऐसे भी नजर आ जाते हैं, जो कुछ वक्त बाद भिखारी भले लगे, पर उस वक्त धंधे में एकदम नए लगते हैं, ये बच्चे कहाँ से आते हैं, कौन हैं वो लोग जो दिल्ली से पहले गाज़ियाबाद और छोटे छोटे स्टेशनों पर सुबह सुबह इन बच्चों को रुमाल में कुछ भींगा कर बेचते हैं, जिसे ये बच्चे नौजवान औरते खरीद कर लम्बी लम्बी साँस भीतर तक खींच कर सूँघते हैं।

राह चलते कहीं भी, कभी भी मेरी नज़र घूमती है और कुछ न कुछ ऐसा जरूर दीख जाता है, जो मुझे सदमा पहुँचाने का पर्याय होता है, इस मुल्क में कदम कदम पर दुःख दुर्भाग्य भूख भेदभाव ताड़ना और ऐसे ही भावों से भरी तस्वीरें सजीव तैरती रहती है। कल रवीश कुमार नें अपने स्लॉट में नौ बजे टीवी पर कुछ भी दिखानें के बजाय सिर्फ अंधेरा दिखाया, यह लिखते हुए, कि यह अंधेरा ही आज की सच्चाई है। इस अंधेरी तस्वीर को देखकर बहुत से लोग हिल गए, खूब सारे लोग सदमे में हैं।

मैं हैरत में हूँ! वाकई हैरत में हूँ! उन सभी भाई बहनों से मेरा विनम्र आग्रह है, एक बार अपने दिल को टटोलकर देखिए, क्या यह अंधेरा आपके आस पास पसरे अँधेरे से जादा घना है? क्या कभी कभार भी आपने अपने चारो तरफ एक मनुष्य की तरह निगाहें डाल कर देखा है? क्या आप अपने चारो तरफ की सच्ची तस्वीरों से सदमे में आए हैं? अपने दिल को टटोलिएगा, जबाब भी आपको खुद को देना है, यदि रोज रोज अपने परिवेश की सच्चाई से आपको सदमा नहीं होता, तो जितना झूठा रवीश कुमार का प्राइम टाईम अंधेरा था उतना ही झूठा उससे हिलोर मार रहा आपके भीतर का सदमा है। आपका दिन शुभ हो!

प्रीति चौधरी और कश्यप किशोर मिश्र के फेसबुक वॉल से.

रवीश कुमार के जिस अंधेरे वाले प्राइम टाइम शो की बात हो रही है, उसे आनलाइन देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=shZf-NrSbu0


मूल पोस्ट :

भारतीय टीवी पत्रकारिता के फील्ड में एनडीटीवी और रवीश कुमार ने इतिहास रच दिया

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भारतीय टीवी पत्रकारिता के फील्ड में एनडीटीवी और रवीश कुमार ने इतिहास रच दिया

Shambhunath Shukla : मैने चैनल नहीं बदला रवीश जी। आज की मीडिया की हकीकत को नए और अभिनव अंदाज से दिखाने के लिए Ravish Kumar आपको बधाई और शुक्रिया। शायद विजुअल पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा प्रयोग पहली बार हुआ। इसके पहले एक बार 27 जून 1975 को कई अखबारों ने अपने पेज काले ही छोड़ दिए थे।

Amitaabh Srivastava : शानदार। बेजोड़। काबिले तारीफ है एनडीटीवी इंडिया का ये अनूठा प्रयोग। बड़ा हौसला चाहिये आज के शोरगुल, चीख चिल्लाहट,गाली गलौज वाले माहौल में इस तरह भीड़ से अलग खड़ा होने के लिए। ये आत्मचिंतन मीडिया, खास तौर पर टीवी चैनलों के लिए इस वक्त बहुत ज़रूरी है। बधाई रवीश और उनकी टीम को, संस्थान के प्रबंधन को भी इस पहल के लिए।

Sanjaya Kumar Singh : रवीश कुमार ने आज एनडीटीवी के प्राइम टाइम में वही किया जो वकीलों ने कन्हैया और पत्रकारों के साथ किया। अमूमन गुस्से में पत्रकार-चित्रकार और कलाकार में अंतर नहीं रह जाता है पर रवीश ने पत्रकार रहते हुए खूब धोया – पीटा। और रोने भी नहीं दिया। बोलने लायक भी नहीं छोड़ा। बगैर तस्वीर वाले स्क्रीन की पीछे से मुझे बार-बार आवाज सुनाई दे रही थी – मारना नहीं है, नहीं तो मार देता। गजब। बधाई रवीश। ये ऐसे समझें ना समझें चोट तो ऐसी लगी है कि भुला नहीं पाएंगे। इन्हें ऐसे ही मारते रहना है।

Mayank Saxena : आज का रवीश कुमार का शो देखने के बाद, आपके अंदर ज़रा भी इंसानियत और शर्म बची हो तो ठीक है…वर्ना क्या है…हर दौर में लोगों ने ये किया भी है और मारे भी गए हैं…रवीश, काश हम कभी कर पाते…जो आप कर रहे हैं…शर्मिंदा लोगों की ओर से आपको सलाम है…

Ambrish Kumar : एनडीटीवी पर रवीश कुमार ने नई और रचनात्मक बहस छेड़ी है. स्क्रीन ब्लैक है. टीवी पर चिल्लाने वाले देशभक्त एंकरों की आवाज से मुकाबिल है. ठीक है कुछ तो मोर्चा खुले इस देश का पर्याय बन गए एंकरों को लेकर जो एकल खंडपीठ की तरह बर्ताव करता है. वाकई यह गलाफाड़ आवाज में पत्रकारिता करना क्या है, बताता है.

Om Thanvi : टीवी चैनलों ने जेएनयू की आग भड़काई, उसे हवा दी। भाजपा/सरकार को कई पापों से आँख चुराने का सामान मिल गया। क्या यह किसी मिलीभगत में खड़ा हुआ षडयंत्र था। क्या चैनल राजनीतिक प्रोपगैंडा का मोहरा बन रहे हैं? पता नहीं सचाई क्या है, पर टीवी चैनलों ने ही बाद में घालमेल वाले उन वीडियो टुकड़ों की पोल खोली है जिनके सहारे जेएनयू को घेरने की कोशिश की गई। आज एनडीटीवी-इंडिया पर रवीश कुमार ने अपने कार्यक्रम का परदा प्रतिरोध और क्षोभ में काला कर दिया। सिर्फ आवाज से विरोध और तिरस्कार का स्वर बुलंद किया। अंत में चेहरा सामने आया तो रुआंसा था। इमरजेंसी की टीस मेरे जेहन में फिर उभर आई। पत्रकारों के संगठन क्या कर रहे हैं? एनबीए, एडिटर्स गिल्ड क्या शुतुरमुर्ग हो गए? फरजी वीडियो दिखाने वालों ने झट से उन्हें दिखाना बंद कर दिया था, जब उनकी पोल टीवी पर ही खुल गई। लेकिन अगर वे किसी षड़यंत्र में खुद शरीक नहीं थे, या किसी झांसे में आ गए थे, तो इसकी सफाई उन्होंने पेश क्यों नहीं की, खेद क्यों प्रकट नहीं किया? … दाल में बहुत काला है।

Shashi Bhooshan Dwivedi : आज रवीश का प्राइम टाइम तो आपातकाल की याद दिला रहा है। सब कुछ काला है। अद्भुत है। मैं इन दिनों आमतौर पर देख नहीं पाता। टाइमिंग के कारण। आज देख रहा हूँ।

Sheeba : Ravish achieved newer heights today on NDTV INDIA PRIME TIME. Wish somebody show this episode of Prime Time to Deepak Chaurasia, Arnob, Sardana etc. It was a numbing experience. The best use of the medium.

रवीश कुमार के जिस प्राइम टाइम शो की बात की जा रही है, उसे अभी आनलाइन देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

Ravish Prime Time Show

स्रोत : फेसबुक

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार‬ निष्पक्षता का चोला पहने अपना comfort zone सुनिश्चित कर लेते हैं

Shikha : कथित रूप से “गैर राजनैतिक” चोला पहने लोग सबसे शातिर होते हैंl किसी की राजनीति साफ़ हो तो भले ही वह कितना भी बड़ा विरोधी क्यों न हो उससे उतनी समस्या नहीं होती क्योंकि उसके प्रति साफ़ नजरिया बनाया जा सकता हैl पर निष्पक्षता का चोला पहने लोग अपना comfort zone सुनिश्चित कर लेते हैं ताकि घटनाक्रमों से दूर रहकर निष्क्रियता का बहाना ढूंढ सकेंl ‎रवीश कुमार‬ ऐसे ही पत्रकार हैंl इनके “निष्पक्ष” चश्मे से abvp के गुंडों द्वारा सिद्धार्थ वरदराजन के साथ की गई बदमाशी और jnu में रामदेव के आने का छात्रों द्वारा किया गया विरोध, दोनों एक समान घटनाएं हैं और उसी “निष्पक्ष” नम्बर वाले चश्मे से रविश बड़ी चतुराई से बिना कारणों और तथ्यों की पड़ताल किए दोनों घटनाओं को “बराबर निंदनीय” बताकर निकल लेते हैंl

ये “निष्पक्षता” भी बड़ी मजेदार चीज़ है, अपने सामजिक उत्तरदायित्वों से मुंह मोड़कर निष्क्रिय पड़े रहते हुए कमेंटरी करने की सुविधा यही निष्पक्षता देती हैl वरना माइक पर किसी कार्यक्रम में रवीश द्वारा ये दुखड़ा रोना कि दुनिया भ्रष्ट है, कॉर्पोरेट पत्रकारिता भ्रष्ट है, और इस व्यवस्था को एक “लाइलाज” मर्ज़ बताकर मजबूरी और निष्क्रियता भरी “इमानदारी” का चोला पहनना भी पत्रकारों के लिए एक विकल्प हो सकता है तो दूसरी ओर अपना पक्ष तय करना और उस पक्ष के प्रति अपनी जिम्मेदारी तय करके गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों की तरह कलम को जनता का हथियार बनाना भी एक विकल्प हो सकता हैl बाकी तीसरा विकल्प भी है, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया, रजत शर्मा की तरह सत्ता की हार्डकोर दलाली करने वाला या फिर बरखा, अर्नब, राजदीप जैसे लिबरल जीव जंतुओं की तरह सॉफ्ट कोर दलाली का भी रास्ता है पर उनके लिए यह पोस्ट नहीं है।

भाकपा माले लिबरेशन से जुड़ीं कामरेड शिखा के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नभाटा डिजिटल के संपादक ने रवीश कुमार पर छापे गए घटिया जोक को हटाया और अफसोस जताया

नवभारत टाइम्स की आनलाइन विंग में एक से एक बुद्धिमान लोग आ गए लगता है. इनने हिट्स के चक्कर में जाने माने पत्रकार रवीश कुमार के उपर इतना घटिया चुटकुला बनाकर छाप दिया कि इसे जो भी पत्रकार पढ़ता, सन्न रह जाता. पत्रकारों की गरिमा से खिलवाड़ करने वाला यह चुटकुला जब रवीश कुमार के संज्ञान में आया तो उन्होंने इस पर एक ब्लाग पोस्ट लिखकर नभाटा वालों को आइना दिखाया. इसी के बाद नभाटा आनलाइन के एडिटर को सदबुद्धि आई और उन्होंने चुटकुला हटाकर अफसोस जताया. साथ ही इस बारे में पोर्टल पर प्रकाशित भी किया.

मूल पोस्ट>

नवभारत टाइम्स ने रवीश कुमार पर बनाया घटिया चुटकुला, पढ़िए रवीश की प्रतिक्रिया

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार को एक टीवी पत्रकार की सलाह

Khushdeep Sehgal : भाई रवीश कुमार को पूर्व क्षमायाचना के साथ बिना मांगे सलाह… वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को सोशल मीडिया पर एक विशेष विचारधारा के लोग हड़का रहे है, अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं…ऐसा करके वो अपनी दूषित मानसिकता का परिचय दे रहे हैं,,,उनसे सुधरने की किसी तरह की उम्मीद करना बेमानी है…लेकिन समझ नहीं आ रहा कि रवीश क्यों उनकी बात पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं…ऐसे लोगों की पूरी तरह अनदेखी करना ही श्रेयस्कर है…इन्हें ज़रा सा भी तूल दो तो इनका उद्देश्य हल हो जाता है..

ऐसे ही मुद्दे पर मुझे शाहरुख़ ख़ान की ओर से एक हालिया इंटरव्यू में कही बात बहुत पसंद आई थी…शाहरुख़ की हर फिल्म रिलीज़ होने से ठीक पहले उनकी देशभक्ति को लेकर सवाल उठाए जाते हैं…शाहरुख़ से पूछा गया था कि आप इन लोगों को जवाब क्यों नहीं देते…शाहरुख़ ने कहा था कि मैं हर बार क्या जवाब दूं…कि मैं बहुत बड़ा देशभक्त हूं…शाहरुख़ ने कहा कि इतने बरस इंडस्ट्री में रहते उन्होंने ऐसी बातों के बीच जीना सीख लिया है…शाहरुख़ ने एक और बहुत अहम बात कही…उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात कह सकता है…सोशल मीडिया का मतलब ही यही है…शाहरुख़ ने कहा कि जब मैं खुद सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता हूं तो दूसरों को कैसे कुछ कह सकता हूं… शाहरुख़ ने साथ ही कहा कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है…भारत में अच्छे लोगों की और अच्छे काम की कद्र करने वालों की संख्या बहुत है..

इस मामले में वैसे भी रवीश कुमार को सलाह देने वाला मैं कौन होता हूं…उन्हें पूरा अधिकार है कि वो जैसे चाहे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें…जिस मुद्दे पर चाहें, जिसे चाहें जवाब दें…मेरा अनुरोध बस इतना है कि रवीश कुमार जैसों की इस देश को खास तौर पर पत्रकारिता को बहुत ज़रूरत है..वो ऐसे सिरफिरों की हरकतों पर अपनी ऊर्जा बिल्कुल ना खपाएं…बस अपना काम वैसे ही करते जाएं, जैसे कि अब तक करते आए हैं…ये बुलबुले वक्त वक्त पर उठते रहेंगे और साथ ही अपना वजूद खोते रहेंगे…फिर कहूंगा, इन्हें ज़रा सी भी भाव देने का मतलब यही है कि कितने कमजर्फ होते हैं यह गुब्बारे जो चंद साँसों में फूल जाते हैं…

सादर,
खुशदीप

टीवी जर्नलिस्ट और ब्लागर खुशदीप सहगल के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश ने गाली देने वाले से पूछा- क्या तुम ऐसे सवाल अपनी मां से कर लेते हो?

अरविंद, आपने पूछा है कि क्या मेरी मां चाचा के साथ सोई थी। क्या तुम ऐसे सवाल अपनी मां से कर लेते हो?  किस घर्मग्रंथ से तुमने ऐसे सवालों की प्रेरणा पाई है मेरे मित्र। मेरी मां देवी हो या न हो, वो मां है इसीलिए मेरी नज़र कभी उसके सामने उठ भी नहीं सकती। वैसे भी मेरी मां तो भारत माता है। दोस्त मैं माफी चाहता हूं। मैं अपनी भारत माता से ये सवाल नहीं कर सकता। वैसे तुम लोगों की हिन्दी भी बहुत ख़राब है। आप जिस विचारधारा के गुप्त गुंडे हैं, आप भारत माता का अपमान कर सकते हैं लेकिन मैं नहीं कर सकता क्योंकि इससे तो उन शहीदों का अपमान हो जाएगा जिन्होंने भारत माता के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। गुप्त गुंडे इसलिए कहा कि आप ये ट्वीट न तो अपनी बहन को दिखा सकते हैं, न अपनी मां को या पत्नी को। ज़ाहिर है आप कभी सामने नहीं आएंगे। आप अपने पिता को भी नहीं दिखा सकते।

मित्र पता है मुझे लगता है कि कोई तुम्हें ब्लैक मेल कर रहा है। अभी तुमसे मुझे गाली दिलवा रहा है। एक दिन वो तुमसे कहेगा कि अब तुम अपनी मां को गाली दो नहीं तो पूरी दुनिया को बता देगा कि तुम्हीं हो जिसने रवीश कुमार की मां को गाली दी थी। ये जिस भी आई डी से, जिस भी संगठन के आई टी सेल से तुमने ये गाली लिखी है वो उसके रिकार्ड में है। वहां कोई सी सी टी वी कैमरा भी होगा। इसलिए मुझे तुम्हारी चिन्ता हो रही है। क्योंकि मुझे पता है कि तुम जब मेरी मां से मिलोगे तो तुरंत पांव छू लोगे। हम और तुम जिस धर्म परंपरा से आते हैं उसमें इतना तो सीख ही लेते हैं। मैं भी तुम्हारी मां के पैर ही छुऊंगा। वैसे मेरी मां रोज़ तुलसी की पूजा करती है। साल में अनगिनत व्रत रखती है। सूरज को जल चढ़ाती है। मैं उसे तीर्थ यात्राओं पर भी ले जाता हूं। तुम्हारी मां भी यही करती होगी। नहीं भी करती होंगी तो कोई बात नहीं। ईश्वर तो दिल में होता है। पर हम तो पत्थर को भी भगवान मानते हैं और तुम इतने पत्थर हो गए कि मेरी मां को क्या क्या कह गए। कोई बात नहीं। मैं तुम्हारे भीतर मौजूद वैचारिक पत्थर को भगवान मानता हूं। उसे पूजना चाहूंगा। जल चढ़ाना चाहूंगा। मैं अपनी मां से कहूंगा कि अरविंद अच्छा लड़का है। उसे अपना ही बेटा समझ कर माफ कर देना। मैंने कहां और कब हिन्दुओं के खिलाफ ज़हर उगला है एक प्रमाण तो दे दो। इस तरह की बातें लिखकर, व्हाट्स अप पर फैला कर आप हिन्दू धर्म को उसी तरह बदनाम कर रहे हैं जिस तरह आतंक की राह पर जाकर, आईसीस की तरफ जाकर कई लोग इस्लाम को बदनाम कर चुके हैं। माल्दा में जिन गुंडों ने यह हरकत की है उन्होंने कोई शान नहीं बढ़ाई है। मैं उस घटना पर भी लिखूंगा। मैं तुम्हारे लिए लिखूंगा क्योंकि मुझे पता है कि तुम दादरी की हकीकत के लिए कितने बेचैन थे। तुमने इखलाक के हत्यारों को सज़ा दिलवाने के लिए कैसे दिन रात एक कर दी थी।

इस तरह के कई मैसेज आए हैं । जिनके हिसाब से मैं पठानकोट हमले की रिपोर्टिंग कर रहा हूं। आप सब जानते हैं कि मैं छुट्टी पर हूं। मैं कैसे आतंकवादियों की मदद के लिए संवेदनशील सूचनाएं दे सकता हूं। इस तरह के अफवाह व्हाट्स अप पर फैला रहे हैं। असलियत यह है कि किसी भी चैनल ने लाइव रिपोर्टिंग नहीं की है। मैंने पठानकोट आपरेशन को असफल साबित करने का कोई प्रयास नहीं किया है। कई लोग कह रहे हैं कि असफल ही है। सेना के भी लोग कह रहे हैं। क्या सवाल उठाने वाले पूर्व सैनिक अधिकारी भी आतंकवादियों की मदद कर रहे हैं।

इस मैसेज के हिसाब से मैंने कहा है कि सैनिक कार्रवाई में मारे गए लोगों को आतंकवादी कहना गलत है। हद है। जब मैं छुट्टी पर हूं तो कब कह दी ऐसी बात। और मैं आतंकवादी को क्यों न आतंकवादी कहूंगा। वैसे प्रधानमंत्री ने मानवता के दुश्मन कहा है। इंडिया युनाइटेड नाम से भेजे गए इस मैसेज में कहा गया है कि मैंने ऐसा कह कर शहीदों का अपमान कर दिया है।

इसे भी पढ़ें>

नवभारत टाइम्स ने रवीश कुमार पर बनाया घटिया चुटकुला, पढ़िए रवीश की प्रतिक्रिया

क्या आपको भी व्हाट्स अप पर मुझे लेकर अफवाहें, लतीफे और गालियों वाले मैसेज मिल रहे हैं। क्या आपने इन गालियों को भेजने वाले की राजनीतिक और वैचारिक सोच के बारे में पता किया है ? अगर आप महिला हैं, लड़की हैं तो ऐसे गाली देने वालों से सावधान रहिएगा। इनकी प्रोफाइल नकली हो सकती है मगर कोई लिखने वाला तो होगा ही। किसी जगह से जुड़ा होगा। इनकी सोच नकली नहीं है। आपकी आज़ादी पर हमला न हो इसलिए आप लड़कियों के लिए ये पोस्ट लिखा है।

असहमतियाँ हो सकती हैं लेकिन गालियों और धमकियों की प्रवृत्ति दिन ब दिन घिनौनी होती जा रही है । इन्हें नोटिस में लाना जरूरी है । मुझसे असहमत होने वाले भी जान सकेंगे कि इस तरह सीमा पार कर जाने के बारे में उन्होंने भी नहीं सोचा होगा। मैं इन्हें भाव नहीं देता लेकिन हमारी राजनीति और समाज में असहमति के इस रूप को लेकर हम इतने सहज कैसे होते जा रहे हैं । इस बीमारी को रोकिये । कोई हमारे लोकतंत्र को बीमार कर रहा है।

मित्रों, हम किसके लिए सनक रहे हैं। क्या इस देश में बहुत सारे अच्छे और सस्ते अस्पताल बन गए हैं, क्या सरकारी स्कूलो की हालत इतनी बेहतर हो गई है वहां एडमिशन के लिए लोग मार कर रहे हैं, क्या सबको नौकरी मिल गई है। क्या दवाएं सस्ती हो गईं हैं, क्या सबके पेंशन का इंतज़ाम हो गया है, । प्लीज आई टी सेल में बर्बाद हो रहे हमारे नौजवानों को बचा लीजिए । इन लड़कों का कोई क़सूर नहीं है । कोई इन्हें अपने हित में जला रहा है । मैंने उन्हें बचाने के लिए लिखा है । अपनी माँ के लिए नहीं, भारत मां के बेटों के लिए लिखा है । जय माँ भारती, जय हिन्द ।

जाने माने पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

इसे भी पढ़ें>

गाली देने वाले को रवीश ने समझाया- ….इसलिए कभी किसी को रंडी मत कहना

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

गाली देने वाले को रवीश ने यूं समझाया


मैं भारत माता की संतान हूं। अगर मेरी मां भारत माता नहीं है तो फिर कोई भारत माता नहीं है। फिर कोई मां पूजे जाने के लायक नहीं है। मैंने हमेशा भारत माता को अपनी माता समझा है और अपनी मां में भारत माता देखी है। क्या हम सभी सौ फीसदी माँ भारती की औलाद नहीं हैं? सवाल मेरी मां का भी नहीं है। सवाल उन तमाम मांओं का है जिनके आगे बड़े बड़े नेता देवी कह कह कर गिड़गिड़ाते हैं और बाद में अपने वैचारिक समर्थकों से उन्हीं देवियो को किसी न किसी बहाने गाली पड़वाते हैं। गाली देने वाले की प्रोफाइल गलत हो सकती है मगर नकली नाम के पीछे किसी असली आदमी ने ही तो लिखा होगा। उसकी कुछ सोच होगी। वो किसी संगठन के लिए काम करता होगा। उसकी भलाई चाहता होगा। क्या उस संगठन में मांओं की यही इज़्ज़त है। अगर आप इस प्रवृत्ति को अब भी नहीं समझे और सतर्क नहीं हुए तो बहुत देर हो जाएगी। आखिर कौन लोग हैं जो पिछले कुछ दिनों धड़ाधड़ गालियां दिये जा रहे हैं। Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नवभारत टाइम्स ने रवीश कुमार पर बनाया घटिया चुटकुला, पढ़िए रवीश की प्रतिक्रिया

नवभारत टाइम्स ने मुझे लेकर लतीफा छाप दिया। यह लतीफा कितना ख़तरनाक है। आप पढ़ेंगे तो डर जायेंगे। पत्रकार को ऐसे डराया जाएगा तो एक बात याद रखियेगा। इस डर का नुकसान आपको होगा। नवभारत टाइम्स को ऐसा नहीं करना चाहिए था। मेरे नाम से हिट्स चाहिए तो ले लीजिए लेकिन समाज में ऐसी सोच मत डालिये जो एक दिन आपके पत्रकारों को भी खा जाएगी।

यह लतीफा नहीं है बल्कि उस सोच को सामाजिक स्वीकृति दिलाने का प्रयास है जो एक दिन सवाल करने वालों के साथ होते देखना चाहती है ताकि सत्ता में उसकी मौज पर कोई सवाल न करे। लिंक दे रहा हूं और पोस्ट भी कर रहा हूं। आखिर वो कौन बीमार रहा होगा जिसने मेरे नाम से लतीफे की रचना की होगी और हैशटैग रवीश कुमार लिखा होगा ताकि कभी भी मेरे नाम से सर्च करने पर ये लतीफा मिले। http://nbt.in/hkPQUY

रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा पर प्रकाशित एक पोस्ट का एक अंश.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ छुट्टी नहीं लेना अपराध माना जाता है : रवीश कुमार

मुझे नहीं पता था कि प्राइम टाइम की एंकरिंग से मेरी ज़िंदगी इतनी बदल जाएगी कि मेरी ग़ैरहाजिरी भी चिन्ता और अफवाह का कारण बन जाएगी । रात के नौ बजते ही मैसेज आने लगते हैं और दिन भर फोन कि कहाँ हैं । क्या NDTV ने आपको हटा दिया है, क्या आपने NDTV छोड़ दी है ? क्या सरकार के दबाव में आप एंकरिंग नहीं कर रहे हैं ? हमें आपकी चिन्ता हो रही है । आप सही तो बोल रहे हैं न कि छुट्टी पर हैं। हम आपके साथ हैं। आप हमारी आवाज़ हैं । अगर आपको साइड लाइन किया जा रहा है तो साफ साफ बोलिये।

एंकर हटायें जाते हैं, कंपनियाँ छोड़ जाते हैं और अज्ञात दबावों की भूमिका होती है, इस दुनिया में ये सब हो चुका है। मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है। मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ छुट्टी नहीं लेना अपराध माना जाता है। आपको छुट्टी लेनी पड़ती है। मुझे अच्छा तो लगा और चाहूँगा कि इस अनिश्चित दुनिया में मेरी खोज ख़बर लेते रहे। आप सौ पचास लोगों का प्यार टी आर पी की दौड़ में प्राइम टाइम को नंबर वन तो नहीं बना सका लेकिन मेरा दिल भर देता है! ये पंक्ति तो मज़ाक़ के लिए थी मगर आपकी चिन्ता से सर झुक जाता है और आँखें भर आती हैं। पूछते रहियेगा। टीवी की पत्रकारिता भले ही बंदरकारिता हो गई है लेकिन हैरान हूँ कि इस समाज में कुछ लोग अभी भी पत्रकार की राह जोहते हैं। तब भी जब मैं मुख्य रूप से दिल्ली के आस पास ही पेशेवर जीवन काट देने वाला पत्रकार रहा हूँ।

फिर भी हर फोन और मैसेज का जवाब देते मेरी छुट्टी की छुट्टी हो गई । इतनी खोजाई होने लगी है कि नौ बजते ही अपराध बोध धरने लगता है कि क्या करें, आफिस चले जाएँ। बचपन में जैसे लगता था कि पिताजी घर आ गए होंगे, शाम होने से पहले घर पहुँच ही जाना है। वरना दरवाज़े पर ही द्वारपूजा का बंदोबस्त हो जाएगा! चलो छोड़ो छुट्टी, प्राइम टाइम ही कर लेते हैं।

कई चैनलों के संपादक अपने कार्यक्रमों की रेटिंग का बखान सोशल मीडिया में करते हैं तो उसमें तो मेरा शो आख़िरी पायदान के नीचे भी नज़र नहीं आता। लगता है जितने लोग देखते हैं, मुझे फोन और मैसेज करने वाले भी उतने ही होंगे! हमारे चैनल के प्रबंध संपादक व्यक्तिगत रूप से मुझे प्राइम टाइम की रेटिंग नहीं बताते हैं। लिहाज़ा हम भी पता नहीं करते कि पिछले हफ्ते की रेटिंग क्या रही। कई चैनल अपने नंबर वन होने का विज्ञापन भी चलाते हैं, उनमें भी खोजा लेकिन हम होंगे तब तो दिखेंगे!

तो आप NDTV को इस बात का श्रेय तो दीजिये कि आज के हालात में मुझे चार साल से प्राइम टाइम करने दिया जा रहा है। क्या ये सब वो चैनल कर सकते हैं जो अपनी रेटिंग का विज्ञापन भी दिखाते हैं और पत्रकारिता करने का ढोल भी पीटते हैं? क्या वे रेटिंग न आने पर अपने पत्रकारिता वाले उस शो को जारी रखेंगे जहाँ कल वो भूत प्रेत चलाया करते थे और जहाँ मालूम नहीं कल क्या चलने लगेगा। क्या वे सारे चैनल इस बात का विज्ञापन चला सकते हैं कि रेटिंग नहीं आई तो भी हम चलायेंगे। प्राइम टाइम भी कभी बंद हो सकता है लेकिन क्या कोई चैनल बिना रेटिंग के दावे के चार साल चलायेगा?

अब आप ठीक से सोचिये। रेटिंग से गायब रहने वाले शो का एंकर नहीं दिख रहा, और ये सबको दिख रहा है! अगर मेरा यह हाल है तो कई वर्षों से लेकर कई हफ़्तों से नंबर वन रहने वाले शो के एंकर जब छुट्टी पर जाते होंगे तो क्या होता होगा? शहर में सन्नाटा छा जाता होगा, उनके दफ्तर के लैंडलाइन घनघनाते लगते होंगे। लोग तो उनके लोकेशन पर पहुँच जाते होंगे कि भाई या बहन तुम चलो वापस स्टुडियो, हमसे खाना नहीं खाया जा रहा है। क्या पता इसीलिए उन्हें छुट्टी ही न मिलती हो। क्या पता वे इस डर से छुट्टी न ले पाते हों कि उनके बिना चैनल न बंद हो जाए। मैं यह सब सोच कर डर गया। अच्छा हुआ मैं उन नंबर वन शो का एंकर नहीं हूँ। उन पर कितना दबाव रहता होगा। हर ब्रेकिंग न्यूज में वही सब नज़र आते हैं।

आप अगर हिन्दी पत्रकारिता का नाश करने वालों की टोली का सामाजिक विश्लेषण करेंगे तो उन सभी में कम से कम एक गुण तो समान पायेंगे ही। ज्यादातर छुट्टी को अपराध मानते होंगे। कई लोगों को यह बीमारी परंपरा से भी मिली है। हिन्दी का आदमी जब छुट्टी पर जाता है तो दिल पर भारी बोझ लेकर जाता है। ठीक है कि उसके पास पैसे कम होते हैं मगर छुट्टी का अपराध बोध इतना गहरा होता है कि वो कम पैसे वाले पर्यटन का भी जोखिम नहीं उठाता। गोआ जाकर भी ऐसे संकोच में तस्वीर खींचायेगा जैसे मंदिर गया हो। दफ्तर ही नहीं उस पर घर परिवार का भी दबाव रहता है। अब चैनलों में चोटी के लोग विदेश यात्राओं पर चले जाते हैं मगर सबकी ऐसी हालत नहीं है। ज्यादातर बॉस की लंदन या प्राग वाली तस्वीर पर लाइक करके ही ख़ुश हो लेते हैं और ख़ुशामद भी हो जाती है। दूसरे चैनलों के कई सहयोगी रोते मिलते हैं कि कई दिन से काम कर रहे हैं। एक वीकली ऑफ़ नहीं मिला है। मैं सबका दर्द समझता हूँ।

अब हो सकता है सभी चैनलों में छुट्टी को लेकर उदारता आ गई हो । वर्ना वहाँ काम करने वाले इतने ख़ुश कैसे नज़र आते !  मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ शुरू से ही छुट्टी अधिकार है। आपको लेनी ही है। प्राइम टाइम का एंकर होकर भी पहले ट्रेन का टिकट काटता हूँ फिर दफ्तर को तारीख बता देता हूँ । कोई दूसरा एंकर नहीं होता है तो थोड़ा बहुत एडजस्टमेंट कर लेते हैं लेकिन सबको छुट्टी ऐसे ही मिलती है । ज़रा सी तबीयत ख़राब होने पर घर भेज दिया जाता है । चाहे वो एंकर हो या वो डेस्क पर हो । मैं भी उतनी ही छुट्टी लेता हूँ जितने के लिए अधिकृत हूँ। बाकी आप लोग पूछ पूछ कर ऐसा कर देते हैं जैसे मैं साल में छह महीना काम ही नहीं करता ।

रात की एंकरिंग एक मुश्किल काम है। बच्चों के पालन पोषण का सारा भार एंकर की पत्नी पर आता है । शायद एंकराओं के पति सारी ज़िम्मेदारी संभाल लेते होंगे । सुबह स्कूल छोड़कर आप उस भार की भरपाई नहीं कर सकते । प्राइम टाइम की एंकरिंग पारिवारिक तनाव पैदा करने वाली होती है । इसलिए प्राइम टाइम के एंकर को हर तीन महीने के बाद एक हफ्ते का ब्रेक मिलना चाहिए । सालाना छुट्टी के अलावा ! हा हा । ज्यादा मांग लिया ? मैं इन सवालों पर सोचता हूँ । जब बच्चे ठीक से पढ़ेंगे लिखेंगे नहीं, थोड़ा पत्नी के साथ शाम की चाय ही न पीये और घर के काम में हाथ न बंटाये तो स्त्री पुरुष बराबरी के आप अपराधी हो जाते हैं । न्यूज में वैसे ही आदतें बिगड़ जाती हैं । घर में भी दिन भर आप मेल चेक करते रहते हैं कि कौन सी खबर हुई, किसका कबाड़ बयान आया । जो लोग बिना छुट्टी काम करने और दिन भर दफ्तर में रहने का दंभ भरते हैं वो बीमार हैं । इनके घर की कहानी बहुत ही दुखद होगी । ये खाक बेहतर समाज बनायेंगे ।

इसलिए कोई एंकर अगर तीन चार महीने से छुट्टी पर न गया हो तो उसे फोन कीजिये । उसके दफ्तर फोन कीजिये कि क्या बात है ये बहुत दिनों से छुट्टी पर नहीं गया है । उसके संपादक से कहिये कि ठीक है हम उसे बहुत पसंद करते हैं मगर यह कई साल से देर रात तक स्टुडियो में रहता है, इसके घर में तो सब ठीक है न या इसके घर में भी कुछ न बोलने वाली कोई समझौतावादी समझदार बीबी है ? आप उसकी खुशी के लिए उसकी छुट्टी की मांग कीजिये । वैसे सारे एंकर जाते ही होंगे छुट्टी पर । नंबर वन आने वाले लोगों की क्षमता हम जैसों से अलग होती है । वो दुनिया का हर काम बेहतर ढंग से कर लेते हैं । उनमें असुरक्षा की भावना भी होती होगी कि कहीं उनके छुट्टी पर चले जाने के बाद कोई दूसरा न बेहतर तरीके से कर दे !

ट्रेन में भी ज्यादातर लोगों ने ऐसे धरा जैसे मैं पकड़ लिया गया हो । अच्छा रवीश जी, तभी कहे कि आप दिख क्यों नहीं रहे । छुट्टी मना रहे हैं । मेरे सहित पूरा परिवार छिपने लगता था । फिर सबकुछ सामान्य ही हो जाता था । चौदह तारीख से आ जाऊँगा । आप लोग खोज खबर रखिये लेकिन ज्यादा हल्ला मत कीजिये नहीं तो मेरी छुट्टी की हालत भी CISF CRPF के जवानों वाली हो जाएगी । जब भी एयरपोर्ट पर टकराते है , उदासी भरे स्वर में कहने लगते हैं कि हमारी व्यथा दिखाइये न । दिक्कत है कि लोकतंत्र में उन्हें कैमरे पर बोलने की इजाज़त नहीं है । वही जब देश के लिए जान देकर शहीद हो जायेंगे तो सारा देश रोएगा । क्यों न थोड़ी चिन्ता उनके जीते जी भी कर ली जाए । क्यों न पत्रकारों की छुट्टी को सामाजिक स्वीकृति मिले । देखिये तो अंग्रेजी के लोग कितनी ठसक से छुट्टी मनाते हैं ।

नोट : हिन्दी के युवा पत्रकारों, पत्रकारिता के नाम पर तुम्हारी जवानी का शोषण किया जाता है। कम पगार और ज्यादा काम। सिस्टम ही ऐसा है। इसे मैं भी नहीं बदल सकता दोस्त। शायद तुम भी नहीं। पत्रकारिता के बड़े सवाल का संबंध तुमसे है ही नहीं। इसलिए लोड मत लो। मैंने शुरू में गलती की। जोखिम उठाकर ठीक से पर्यटन नहीं किया। जवानी भी बीत गई। पत्रकारिता का भी कुछ नहीं हुआ। कहीं मेरा ही कुछ न हो जाए। बस आप जैसे पूछने वाले रहेंगे तो कुछ नहीं होगा। प्यार पर भरोसा करना चाहिए।

जाने माने पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार को कैसी लगी फिल्म ‘वज़ीर’, पढ़िए…

क्रूर क्रूरतम होता जा रहा है । कमज़ोर को ही चुनौती है कि वो साहस दिखाये । क्रूरता को झेलते हुए मुस्कुराये । सत्ता और उसके नियम क्रूरता के प्रसार के लिए हैं । कमज़ोर सिर्फ उनकी चालों से शह की उम्मीद में मात खाता जा रहा है । हम जड़ होते जा रहे हैं । यथार्थ को समझते समझते हमने यथार्थ की वर्चुअल रियालिटी बना डाली है । दुनिया अगर ख़ुशगवार है तो वह सिर्फ विज्ञापनों में है । क्रूरता रोज बढ़ती जा रही है । उसका एक एकांत होता है । जहाँ कुछ लोग उसकी भेंट चढ़ते रहते हैं । हम इस दुनिया से क्रूरता कम नहीं कर सके।

कश्मीर का अतीत जितना क्रूर रहा है उतना ही उसका वर्तमान भी । कश्मीर के बाहर मूर्खों की एक बड़ी फौज है जो उसकी जटिलता को तोड़ मरोड़ कर उसका वोटास्वादन करना चाहती है । जैसा आप किसी मिठाई का रसास्वादन करते हैं वैसे ही नेता वोट के लिए आपकी भावनाओं का जब जलपान करता है तो मैं उसे वोटास्वादन कहता हूँ । अनगिनत रायों और नारों के बीच हिन्दू और मुसलमान कश्मीरियों के ज़ख़्म दुधारी तलवार से रोज़ कुरेदे जाते हैं।

दूध माँगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर माँगोगे तो चीर देंगे टाइप के ट्रकीय राष्ट्रवाद के आगे कश्मीर के ज़ख़्मों को समझने के लिए हमें हर तरह की सीमाओं से आजाद भी होना होगा । हमारे फ़िल्मकार कश्मीर के उन ज़ख़्मों से सहज होने लगे हैं ।  उनसे संवाद करने लगे हैं । पंडित ओमकारनाथ धर और दानिश अली और सरताज का किरदार एक ऐसे किस्से को रचते हैं जो हमें कश्मीर को लेकर रोज रोज बनाए जा रहे ‘ नैरेटिव’ वृतांत से निकाल लाती है । हमारे कई निर्देशक कश्मीर को लेकर जोखिम उठाने लगे हैं । समाज भी नए नज़रिये का इंतज़ार कर रहा है।

विधू विनोद चोपड़ा कश्मीर ने कश्मीरी पंडितों के दर्द को उन्होंने अनुपमखेरीय राष्ट्रवाद से अलग समझा है । उनकी परिपक्वता क़ाबिले तारीफ है । वज़ीर की कहानी टार्च की तरह कश्मीर के मौजूदा राजनीतिक यथार्थ पर रौशनी डालती है । जब पीडीपी और बीजेपी मिल सकते हैं तो ओमकारनाथ धर और दानिश क्यों नहीं । कश्मीर पर बन रही फ़िल्मों में रोज़ा ही हल्की साबित हो रही है जबकि पहली होने का श्रेय उसे हमेशा यादगार बनाए रखेगा । कश्मीर पर बनी लक्ष्य, लम्हा, दिल से, हैदर की परंपरा से समृद्ध होती हुई फ़िल्म वज़ीर आपको एक नया रास्ता दिखाती है।

यह फ़िल्म एक बार और प्रयास करती है कि माडिया के ज़रिये क़िस्सों को गढ़ना कितना आसान है । जनहित में ज़रूरी है कि मीडिया और विज्ञापन के ज़रिये गढ़े जा रहे क़िस्सों पर सँभल कर यक़ीन किया जाए । वज़ीर हमारी आँखे खोलने का प्रयास करती है । बताती है कि कोई कितनी आसानी से छल कर सत्ता तक पहुँच जाता है और राष्ट्रवाद का लंगोट और टोपी धारण कर लेता है।

मैं फ़िल्म की कहानी नहीं लिखना चाहता । फ़िल्म देखते हुए मुझ पर जो बीत रही थी वही लिख रहा हूँ । फ़रहान अख़्तर शानदार अभिनेता हैं । अभिनय की प्रति उनकी निष्ठा उनके अभिनय से ज़्यादा प्रभावित करती है । क़ाबिल तो वे है हीं । अमिताभ की आवाज़ ने वज़ीर के क़िस्से को बड़ा आसमान दिया है । अमिताभ जीवन के इस मोड़ पर अपने स्टारडम से आज़ाद हो गए हैं । ब्लैक की तरह वज़ीर उनकी जिंदगी की उपलब्धि है । पीकू तो चार चाँद के समान है।

वज़ीर निजी जिंदगी के ज़ख़्मी क़िस्सों के सहारे शतरंज की बिसात पर कश्मीर की गिरहों को खोलती है । हम सब प्यादे हैं । पता नहीं हममें से कब कौन हाथी निकल आए और उसका दिमाग़ ख़राब हो जाए । वज़ीर में बहुत सारा दर्द है और बहुत सारा जीवन । यह फ़िल्म दानिश और ओमकारनाथ धर के ज़रिये कहना चाहती है कि दर्द के इतने दास्तानों के बीच हम इससे लड़ सकते हैं । हम उसे मार सकते हैं जिसने हम दोनों को मारा है । वज़ीर में आतंकवाद है लेकिन यह हिन्दू बनाम मुसलमान के रूप में नहीं है।

यही वज़ीर है । यही नज़ीर है । इस साल की एक अच्छी फ़िल्म । अच्छी फ़िल्म एक लाउंड्री की तरह होती है । पूरी फ़िल्म के दौरान आपकी धुलाई होती है और अंत में आप पहले से बेहतर होकर निकलते हैं । वज़ीर देखने जाइयेगा । आपकी अंतरात्माओं की वाशिंग हो जाएगी । आप उस दर्द को जीते हुए उससे पार पाने के साहस को जुटा सकेंगे । जिसे हमारे कश्मीरी पंडित और कश्मीरी मुसलमान रोज़ जीते हैं । जिनके बच्चे आतंकवाद की राह पर चले गए और जिनसे उनका कश्मीर हमेशा के लिए छूट गया और अपने ही देश में शरणार्थी हो गए । उन्हें सही में एक वज़ीर का इंतज़ार है । वो कोई और नहीं । हमारी आपकी अंतरात्मा है । उसकी आवाज़ सुनिये लेकिन पहले वज़ीर देख आइये।

जाने माने पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

खुद को और बरखा दत्त को सोशल मीडिया पर गाली देने वाले को रवीश कुमार ने अपनी कलम के जरिए दिखाया आइना

आपकी गाली और मेरा वो असहाय अंग

कुछ ही तो वाक्य हैं बाज़ार में
जिन्हें तल कर
जिनसे छन कर
वही बात हर बार निकलती है
बालकनी के बाहर लगी रस्सी पर
जहाँ सूखता है पजामा और तकिये का खोल
वहीं कहीं बीच में वही बात लटकती है
जिन्हें तल कर
जिनसे छनकर
वही बात हर बार निकलती है
बातों से घेर कर मारने के लिए
बातों की सेना बनाई गई है
बात के सामने बात खड़ी है
बात के समर्थक हैं और बात के विरोधी
हर बात को उसी बात पर लाने के लिए
कुछ ही तो वाक्य हैं बाज़ार में
जिन्हें तल कर
जिनसे छनकर
वही बात हर बात निकलती है
लोग कम हैं और बातें भी कम हैं
कहे को ही कहा जा रहा है
सुने को ही सुनाया जा रहा है
एक ही बात को बार बार खटाया जा रहा है
रगड़ खाते खाते बात अब बात के बल पड़ने लगे हैं
शोर का सन्नाटा है, तमाचे को तमंचा बताने लगे है
अंदाज़ के नाम पर नज़रअंदाज़ हो रहे हैं हम सब
कुछ ही तो वाक्य है बाज़ार में
जिन्हें तल कर
जिनसे छनकर
वही बात हर बार निकलती है ।
बात हमारे बेहूदा होने के प्रमाण हैं
वात रोग से ग्रस्त है, बाबासीर हो गया है बातों को
बकैती अब ठाकुरों की नई लठैती है
कथा से दंतकथा में बदलने की किटकिटाहट है
चुप रहिए, फिर से उसी बात के आने की आहट है।

अब भाषण सुनिये मित्रों, मैं इन दिनों लंबी छुट्टी पर हूँ । लेकिन उन्हें छुट्टी नहीं मिली जो सोशल मीडिया पर इस न्यूज उस न्यूज के बहाने हमारी अग्निपरीक्षा लेने के लिए आतुर रहते हैं । मुझे खुशी है कि जो लोग वर्षों तमाम चैनलों पर भूत प्रेत से लेकर वहशीपना फैला गए वो आज समादरित हैं । उनसे पत्रकारिता की शान है । वैसे तब भी वही समादरित रहे और आगे भी वही रहेंगे । लोग उन्हीं को देख रहे हैं । वो कब किसी खबर के गुमनाम पहलू को छूकर सोना बन जाते हैं, यह चमत्कार मुझे प्रेरित करने लगा है।

हमें गाली देने वालों को जो तृप्ति मिलती है उससे मुझे खुशी होती है । कम से कम मैं उनके किसी कम तो आता हूँ । अगर किसी को गाली देना संस्कार है तो इसकी प्रतिष्ठा के लिए मैं लड़ने के लिए तैयार हूँ । इसीलिए गाली का एक नमूना लगा दिया । कविता पहले लिखी जा चुकी थी । वर्ना  ये किसी भदेस गाली के सम्मान में लिखी गई कविता हो सकती थी । पहली है या नहीं, पता नहीं । फिर भी मैंने गाली को कविता से पहले रखा है । गाली को साहित्यिक सम्मान भी मैं ही दिलाऊँगा।

जो मित्र मेरे एक खास अंग को तोड़ कर पीओके भेजना चाहते हैं कम से कम अख़बार तो पढ़ लेते । पीओके से जो आ जाते हैं उन्हें तो मारने में चार दिन लग जाते हैं, लिहाज़ा हमारे अंगों को क्षति पहुँचाकर पीओके भेजने वाले मित्र अगर नवाज़ भाई जान से इजाज़त ले ले तो अच्छा रहेगा । कहीं क्षतिग्रस्त अंगों को लेकर सीमा पर इंतज़ार न करना पड़ जाए और उनसे मल न टपकने लगे !  टूटे अंग को डायपर में ले जाइयेगा।

अरे बंधु इतनी घृणा क्यों करते हैं । आपसे गाली देने के अलावा कुछ और नहीं हो पा रहा है तो नवीन कार्यों के चयन में भी मदद कर सकता हूँ । मैं स्वयं और उस अंग की तरफ से भी माफी माँगता हूँ जिसे आप तोड़ देना चाहते हैं । हालाँकि मेरे बाकी अंग स्वार्थी साबित हुए । वे ख़ुश हैं कि बच गए । मैं आपके सामने शीश झुका निवेदन करना चाहता हूँ । आप उस अंग को न सिर्फ मेरे शरीर से, जो सिर्फ भारत को प्यार करता है, अलग करना चाहते हैं  बल्कि मेरी मातृभूमि से भी जुदा करना चाहते हैं । प्लीज डोंट डू दिस टू माई… । आप तो एक सहनशील  मज़हब से आते हैं । वही मेरा धर्म है । इसलिए आप तोड़े जाने के बाद मेरे उस अंग को उस अधिकृत क्षेत्र में न भेजें जो अखंड भारत के अधिकृत नहीं है।

अब तो मुस्कुरा दो यार। गाली और धमकी आपने दी और माफी मैं मांग रहा हूँ । इसलिए कि कोई आपके मेरे धर्म पर असहिष्णुता के आरोप न लगा दे । ट्वीटर पर आपकी इस धमकी भरी गाली ने मुझे कितना साहित्यिक बना दिया । अगर मैं आपके ग़ुस्से का कारण बना हूँ तो अफ़सोस हो रहा है । आशा है आप माफ कर देंगे और वो नहीं तोड़ेंगे जो तोड़ना चाहते हैं।

जाने माने टीवी जर्नलिस्ट और एंकर रवीश कुमार के ब्लाग से साभार.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार हर महीने दस हजार रुपये की किताबें खरीदकर पढ़ जाते हैं!

Shukla SN : रवीश कुमार: भीड़ में एक चेहरा! मीडिया में आया हर पत्रकार रवीश जैसी चकाचौंध चाहता है, ग्लैमर चाहता है पर रवीश बनना आसान नहीं है. उन जैसे सरोकार तलाशने होंगे और उन सरोकारों के लिए एकेडिमक्स यानी अनवरत पढ़ाई जरूरी है. रवीश बताते हैं कि साहित्य या फिक्शन की बजाय वह इकोनामिक्स और सोशियोलाजी तथा साइसं पढ़ते हैं और इन्हीं विषयों की किताबें खरीदते हैं. उनकी किताब खरीद का बजट कोई दस हजार रुपये महीना है.

रवीश ने बिजली वाली स्टोरी करने के लिए बिजली के बारे में ही नहीं पढ़ा बल्कि इसके लिए बिजली से बनते-बिगड़ते अर्थशास्त्र को जानने के लिए उन्होंने अमेरिका से पांच हजार रुपये की एक किताब मंगवाई. इसी तरह कचरे पर अरबनाइजेशन पर वे निरंतर पुस्तकें पढ़ते रहते हैं. यह जरूरी भी है सरोकार का टारगेट समझना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक उस सरोकार से होने वाले विकास को समझना. विकास एक द्विअर्थी शब्द है जिसका प्रतिक्रियावादी और प्रगतिकामी अलग-अलग अर्थ बताते हैं. एक विकास नरेंद्र मोदी का है तो दूसरा नीतीश कुमार का, अखिलेश यादव का और मायावती का. पर प्रश्न वही है कि आप किस तरह के सरोकारों के साथ खड़े हैं. (‘शुक्रवार’ मैग्जीन के अगले अंक में मेरे लेख “रवीश के सामाजिक सरोकार” से)”

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उस लड़की ने इंडिया टुडे टीवी की डिप्टी एडिटर प्रीति चौधरी से पलट कर पूछ लिया- आप जहां से आईं हैं, वो महिलाओं के लिए सुरक्षित है?

Vineet Kumar : इंडिया टुडे टेलीविजन की डिप्टी एडिटर प्रीति चौधरी ने अपनी खास रिपोर्ट हाफ बिहार में सतरह-अठारह साल की एक लड़की से सवाल किया- आपको लगता है कि बिहार लड़कियों के लिए सुरक्षित जगह है? जाहिर है प्रीति चौधरी का सवाल करने का अंदाज ऑथिरिटेरियन था जैसा कि आमतौर पर टीवी के पत्रकार ठसक से पूछते हैं. हालांकि प्रीति चौधरी के इस शो की विजुअल्स और कैमरा वर्क पर गौर करें तो फ्रेम दर फ्रेम रवीश कुमार के शो ये जो हमारा बिहार है से मिलाने की कोशिश है.

जिस तरह रवीश के शो में पीछे से किसी फिल्मी गाना बजता रहता है, उनकी खुद की कैब से शीशे के नीचे ड्राइवर की श्रद्धा-सामग्री के तौर पर देवी-देवता की प्लास्टिक की मूर्ति झूलती रहती है, वो सबकुछ ठीक वैसा ही. प्रीति चौधरी खुद भी रवीश का अंदाज अपनाने की नाकाम कोशिश कर रही थीं. तभी इस सवाल के बाद लड़की ने हां या न में उत्तर देने के बजाय पलटकर सवाल किया- आप जहां से आई हैं, वो महिलाओं के लिए सुरक्षित है? बिहार महिलाओं के लिए दिल्ली से ज्यादा सुरक्षित है.

उस वक्त तो प्रीति चौधरी को कुछ बोलते न बना..बस इतना कहकर आगे बढ़ गईं- थोड़ा तो ज्यादा सुरक्षित है. जब मैं इस शो को देख रहा था बल्कि इन दिनों टेलीविजन एंकर्स,रिपोर्टर्स से जिस अंदाज में लोगों को बात करते स्क्रीन पर देखता हूं, साफ झलक जाता है कि वो अब इन्हें ऑथिरिटी नहीं मानते. आमतौर पर रिपोर्टर्स उनकी समझ को अंडरस्टीमेट करने की कोशिश करते हैं, उन्हें एहसास करा देते हैं कि आप जैसी समझ रखते हैं, मामला वैसा है ही. टीवी के आंतक, फैनडम और दूसरी तरफ दर्शकों का इस आत्मविश्वास से अपनी बात रखना कम से कम जनतांत्रिक प्रक्रिया के लिए सुखद है. मुझे नहीं पता, ये बदलाव कहां से आ रहे हैं.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ये बात बर्दाश्त नहीं की जा सकती कि हम मेहनत से, बिना किसी से प्रभावित हुए काम करें और आप हमें दलाल बताएं : रवीश कुमार

Vineet Kumar : मैं तो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को सुझाव देना चाहता हूं कि आप ये बिल्कुल स्पष्ट कर दो कि कौन बीजेपी का पत्रकार है, उसके लिए काम कर रहा है, कौन कांग्रेस के लिए या किसी दूसरी पार्टी के लिए. सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा. कम से कम लोगों के सामने चीजें स्पष्ट तो होंगी… लेकिन ये बात बर्दाश्त नहीं की जा सकती कि हम मेहनत से, बिना किसी से प्रभावित हुए काम करें और आप हमें दलाल बताएं.

ये सवाल आप मुझसे या पत्रकार समुदाय से मत कीजिए कि भारत में पत्रकारिता का क्या भविष्य है? ये सवाल समाज से किया जाना चाहिए कि आखिर आप किस तरह का पत्रकार चाहते हैं? इस पेशे में लोग आते हैं, शुरू-शुरू में सवाल करते हैं, असहमति जताते हैं लेकिन आखिर तक आते-आते या तो उनकी रीढ़ तोड़ दी जाती है, इसी सिस्टम के कल-पुर्जे हो जाते हैं और सब कुछ पहले की ही तरह बरकरार रहता है, कुछ भी बदलता नहीं. रही बात राजनीतिक पार्टियों की तो जो सत्ता से बाहर हैं, वो हर बात में सरकार की तरफ सवाल तो जरूर उछाल देते हैं लेकिन लोगों के बीच जाकर काम नहीं करते.. आखिर ड्राइंगरूम से बैठकर बयान जारी करते रहने से कितना-कुछ बदल सकेगा?

पूरा इंटरव्यू इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं: The Ravish Kumar interview: ‘Our lazy liberal class was always opportunistic’

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ सकते हैं>>

मैं इन दिनों घोर अंतर्द्वन्द से गुज़र रहा हूँ, भीतर से बेचैन हूँ : रवीश कुमार

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मैं इन दिनों घोर अंतर्द्वन्द से गुज़र रहा हूँ, भीतर से बेचैन हूँ : रवीश कुमार

इक छोटी सी इल्तज़ा है आपसे

दोस्तों

मैं सोशल मीडिया से किसी के डर के कारण नहीं गया हूँ। मैं ऐसा न अपने साथ कर सकता हूँ और न आपके साथ। यह बात दिमाग़ से निकाल दीजिये कि चार लोग हैंडल बनाकर इधर उधर टैग कर कुछ लिख देंगे तो मैं डर जाऊँगा। मैं सिर्फ इसी बात को लेकर डरा रहता हूँ कि मुझसे कोई ग़लती न हो जाए और हो भी गई तो जान नहीं देने वाला। कुछ लोग और समूह हैं जो मुझसे डरते हैं। मेरी किसी रिपोर्ट या लिखावट से इतना डर जाते हैं कि इन्हें लगता है कि कहीं दुनिया ने उस पर यक़ीन कर लिया तो क्या होगा। ऐसा न हो सकता है और न किसी पत्रकार को यह मुगालता पालना चाहिए। पर उनका दाँव बहुत ज्यादा है इसलिए वे डर कर मुझे डराने के नाम पर अनाप शनाप लिखते हैं। तो उस तरफ डरपोकों की फौज है जो दिन रात अफवाह फैला रही है। ट्वीटर और फेसबुक पर नक़ली पेज बनाकर सांप्रदायिक किस्म के भी अफवाह फैलाये जा रहे हैं।

मुझे डराने के नाम पर कुल ख़ानदान का पता करने लगे हैं। मुझे अब हँसी भी नहीं आती। मेरे कुल खानदान में हर तरह के लोग मिल ही जायेंगे जैसे उनके कुल खानदान में हैं। मैं खुद के लिए जवाबदेह हूँ। मुझे लेकर कुछ नहीं मिला तो लोग गाँव तक पहुँच गए हैं। मेरी जाति का भी पता करते हैं।  मैं फिलहाल जानबूझ कर नहीं लिख रहा। वो ज़िद्दी तो मैं भी ज़िद्दी। लिखूँगा लेकिन अपने वक्त और मन के हिसाब से। बस देख रहा हूँ कि वे कहाँ तक जा सकते हैं। चोरों की बारात है। कानाफूसी से डराने चले है। सुना है और पता चला है से बात नहीं बनेगी उनकी। मैं लिखना नहीं चाहता कि वे कितना डरे हुए हैं। ल्युटियन दिल्ली के चाटुकारों को आजकल मुझे लेकर गुदगुदी हो रही है। होने दीजिये। आकाओं के दरबार से लौटकर लिखने की आदत है तो वो मेरे लिख देने से जाएगी नहीं। इंतज़ार कर रहा हूँ कि वे कितना लिख सकते हैं। जब दंगाई इस समाज में सर झुका कर नहीं घूमता तो मैं डर कर छिपने से रहा।

सोशल मीडिया पर मेरे बारे में तरह तरह के अभियान चल रहे हैं। आप लोग मुझे एस एम एस कर रहे हैं। गाँवों में भी नौजवान स्मार्ट फोन पर दिखा देते हैं कि ये आपके समर्थन में अभियान चल रहा है और आप पत्रकारिता मत छोड़िये। फिर विरोध में अभियान चलने लगता है। मुझे उनकी चिन्ता नहीं है  लेकिन आप चाहने वालों की चिन्ता है। बिल्कुल मत सोचिये कि किसी ने डरा दिया और मैं चला गया। मेरे बारे में न तो लिखने की जरूरत है न किसी प्रकार का टेम्प्लेट बनाकर व्हाट्स अप पर घुमाने की। ऐसा मत कीजिये। इससे सारा मक़सद फ़ेल हो जाएगा। आप मेरे समर्थन में बिल्कुल मत लिखिये। हाँ ये जो प्रवृत्ति है उसके बारे में लिखिये लेकिन ध्यान रहे कि आप बिल्कुल वैसा न करें जैसा करने वालों के विरोध में आपको लिखना है। ऑनलाइन गुंडागर्दी से लड़िये। अपने भीतर की उस निष्ठा से लड़िये जिसके कारण आप या हम चुप हो जाते हैं।

मुझे अकेला छोड़ दीजिये। अकेला चलने का आदी रहा हूँ। मैं पत्रकारिता छोड़ कर नहीं जा रहा। हाँ यह सही है कि मैं इनदिनों घोर अंतर्द्वन्द से गुज़र रहा हूँ। भीतर से बेचैन हूँ। भावुक आदमी हूँ तो थोड़ा जल्दी असर हो जाता है और देर तक रहता है। सबके जीवन में ऐसा क्षण आता है। मुझे मन नहीं लगता अब इस पेशे में। नेताओं से मिलकर पत्रकार ही पत्रकार का भीतरघात कर रहे हैं। कई कई दिनों तक अख़बार भी नहीं पढ़ता। चैनल नहीं देखता।शायद यह वक़्ती बेचैनी हो सकती है। काम की थकान भी हो सकती है और निरर्थकता भी। रात रात भर नींद नहीं आती। कभी दो बजे रात को उठ कर लिखने लगता हूँ तो कभी रात भर पढ़ते रह जाता हूँ। मेरे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।

मेरी परेशानी सिर्फ उन चिरकुटों के गरियाने से नहीं है। कुछ और है। रोज़ कोशिश करता हूँ इस उदासी से उबरने की। रोज अपने आप से लड़ रहा हूँ। बहुत देर तक गहरी नींद सोना चाहता हूँ मगर जल्दी जाग जाता हूँ। लगता है दिमाग़ में मच्छर भनभना रहा है। मैं भयंकर जद्दोजहद से गुज़र रहा हूँ। चूँकि आप मुझे लेकर चिन्तित हैं तो लिख रहा हूँ। ये लड़ाई मेरे भीतर की भी है लेकिन सिर्फ अपने आप को लेकर नहीं है। आपके लिखने या हौसला बढ़ाने से कुछ समय के लिए फ़र्क तो पड़ता है मगर थोड़ी ही देर में उसी मनस्थिति में पहुँच जाता हूँ। रास्ता मुझी को खोजना है। मुझे अकेला छोड़ दीजिये।

पत्रकारिता के अलावा कुछ आता भी नहीं।आता तो वाक़ई चला गया होता।यह पेशा घटिया हो गया है। इसमें कोई शक नहीं। पर मैं कुछ और कर नहीं सकता। आता भी नहीं है। उन लोगों का अनादर नहीं कर रहा जो अभी भी खुद को बचाकर लिख रहे है। लोगों के बीच जा रहे हैं। पर आपको यह भी जानना चाहिए कि अज्ञात शक्तियां लिखने वालों को डरा रही हैं।अख़बार ख़रीदते समय और चैनल देखते समय आप इस बात की चिन्ता जरूर करें। जो अख़बार लेते हैं उसे बीच बीच में बंद भी किया कीजिये। एकदम से गुलाम की तरह किसी का पाठक और दर्शक मत बनिये। चैनलों के साथ भी यही कीजिये। मेरे साथ भी। नागरिक समूह बनाकर चाटुकारिता करने वाले अखबारों या चैनलों को अपने मोहल्ले में कुछ समय के लिए बंद करवाइये लेकिन ज़ोर ज़बरदस्ती से नहीं। आपसी चर्चा और सहमति से। पत्रकारिता को लेकर छोटे छोटे नागरिक सत्याग्रहों की जरूरत है।

इसके बाद भी आपके लिए नई नई कहानियाँ खोजने में लगा रहता हूँ।फ़र्क ये है कि उन कहानियों तक ख़ुद को खींच कर ले जाता हूँ।पहले अपने आप चला जाता था। आपने अभी तक मुझे बहुत प्यार दिया है। इसका कुछ कुछ अहसास हो रहा है। कभी मेरे लिखने बोलने से ठेस पहुँची हो तो माफ कीजियेगा। ग़ुस्से में बोल देता हूँ। लिखते समय यह भी ख़्याल आ रहा है कि मैं हूँ कौन जो अपील जैसा लिख रहा हूँ। खुद पे हँसी भी आ रही है।

मैं सोशल मीडिया पर भी आ जाऊँगा। यह कह कर गया भी नहीं था कि कभी नहीं आऊँगा। मैं अच्छा दामाद हूँ। ससुराल में रूठता नहीं हूँ। इसलिए आपको मनाने की ज़रूरत नहीं है। मैं चाहता ही हूँ अकेला चलना। किसी एकांत से आपको देखना और किसी एकांत में अपने भीतर झाँकना। कुछ कमज़ोरियाँ हैं। कुछ बेचैनियां हैं। कुछ मजबूरियाँ भी हैं। काश मैं थोड़ा सख़्त होता। दोस्त ठीक ही कहते हैं यार तुम नाज़ुक बहुत हो। पर क्या नाज़ुक होना अच्छा नहीं ! मैं कस्बा पर तो लिख ही रहा हूँ वहाँ भी लिखूँगा जहाँ आप चाहते हैं। बस ये सब समर्थन वाला फार्वर्ड करना बंद कर दीजिये। गाली और ताली, एक फूल दो माली। छोटी सी इल्तज़ा लंबी हो गई इसके लिए माफी।

आपका

रवीश कुमार

एनडीटीवी से जुड़े चर्चित टीवी जर्नलिस्ट रवीश कुमार के ब्लाग नई सड़क से साभार.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिदी न्यूज चैनलों में बस रवीश और एनडीटीवी ही उम्मीद हैं!

Naveen Sinha : रविश का चुनाव के समय बिहार जाना और बिहार को नए नजरिये से देखना। ndtv‬ पर रविश का ‘ये जो बिहार है’ एक बार पुनः उनको अलग कर रहा है भीड़ से। बिहार की लडकियों की साइकिल शक्ति को एक नए रूप में आज दुनिया को रविश ने दिखाया। कार्यक्रम के बीच एक जगह उन्होंने अंग्रेजी की बड़ी जोरदार वकालत की जो एक बिहारी के रूप में शायद उनके भी संघर्ष के दिनों का दर्द रहा होगा।

टीवी पत्रकारिता आने के बाद समाचार के मायने ही बदल गए हैं। समाचार पत्रों के अन्दर समाचार के अलावा सामजिक मुद्दों पर लेखों का घोर अभाव होता है। मुझे याद है आज से एक दशक पहले तक ‘हिंदुस्तान’ में रविवासरीय में एक उम्दा मुद्दे को लिया जाता था। रोज की सम्पादकीय और उस पृष्ट पर आने वाले लेख बहुत मजबूत होते थे। इन्डिया टुडे के बहुत सामाजिक मुद्दे पर लेख होते थे जो अब नदारद रहते हैं। टीवी के दौर में सब कुछ अच्छा लगने लगा। पत्रकार खासकर हिंदी के अपनी खादी की कुरता वाली छवि से कोट पैंट पर आ गए और समाचार के नाम पर जान लेने वाली हरकत करने लगे। आज 8 बजे ibn7 पर इस दशक का सबसे बड़ा न्यूज़ दिखाने का दावा किया गया और दिखाया क्या गया, एक मामूली इंटरव्यू। पाकिस्तान के पूर्ब विदेश मंत्री का। पूरा समाचार खासकर हिंदी मीडिया बहुत बड़े प्रश्न चिन्ह के साथ खड़ी है। क्या वो वही दिखा, सुना या पढ़वा रहे हैं जो आम आदमी या एक नागरिक चाहता है? या जबरदस्ती आम को खास का खुराक दिया जा रहा है।

पूरी की पूरी मीडिया लुटियन के 10 km के दायरे में आके सिमट गयी है। राष्ट्रीय का मतलब दिल्ली हो कर रह गया है। जब तक कोई किसान जंतर मंतर पर मरेगा नहीं मीडिया को महाराष्ट्र का किसान याद आएगा नहीं। करोलबाग में लड़की की हत्या सबको दिखती है, पूरे देश में लडकियों के बारे में किसी को कुछ नहीं पता। सारे न्यूज़ चैनल के मीडिया स्कूल खुल गए हैं और पत्रकारिता के नाम पर ये सब भी नॉएडा ग्रेटर नॉएडा के कॉलेज जैसे शिक्षित बेरोजगार पैदा कर रहे हैं।

पत्रकारिता पूरी तरह बिक चुकी है। बिहार के प्रभात खबर के हरिवंश जो नितीश की तारीफ करते थकते नहीं थे और नितीश उनको बिज्ञापन देते, आज वो राज्य सभा में हैं, नितीश की पार्टी के प्रवक्ता हैं, फिर भी संपादक हैं। पंजाब केसरी के लोग बीजेपी से सीधे जुड़े हैं। कई संपादक अपने अजेंडे को जबरदस्ती लागू करने लगते हैं। इसका उदाहरण है जब प्रभु चावला को इंडिया टुडे से भगाया गया और दिलीप मंडल को प्रभार दिया गया। उन्होंने अपनी दलित छवि चमकाने के चक्कर में उजुल फुजूल छापना शुरू किया। फिर एम जे अकबर आये और बीजेपी में चले गए। कभी हिंदी की सबसे अच्छी समाचार पत्रिका आज पता नहीं क्या छापती है। वही जाने।

टीवी का तो पूरा ही बुरा हाल है। समाचार के नाम पर सिर्फ राजनीती। वो भी खुल के किसी दल विशेष के लिए। ndtv की जरूर तारीफ कुछ हद तक करनी होगी कि इसके एंकर और संवाददाता जरूर कुल मिला कर बाकी सबसे अच्छे हैं। इनके मालिक उनको जरूर उतना छूट देते हैं समाचार के लिए ताकि ये कुछ सही चीजें दिखा पायें। रविश जरूर आगे हैं अपने लोगो में लेकिन रविश के पीछे भी ndtv के कुछ और लोग जरूर हैं जो आने वाले वक्त में रविश बनने की काबिलियत रखते हैं। बीबीसी हिंदी एक समय में जान थी हिंदी बेल्ट की लेकिन उनके आंतरिक कारणों से अब वो सिर्फ दिखावा मात्र है। लोग अच्छे है उसमें लेकिन आम जन से ये बीबीसी संस्था दूर जा चुकी है।

फेसबुक पर सक्रिय नवीन सिन्हा के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढें>>

सलाम रवीश कुमार, बिहार के सामाजिक परिवर्तन की कहानी देश के सामने रखने के लिए

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: