न्यूज़ चैनल आपकी चेतनाओं की हत्या करने के प्रोजेक्ट हैं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : 2010 के साल से ही न्यूज़ चैनलों को लेकर मन उचट गया था। तभी से कह रहा हूँ कि टीवी कम देखिये। कई बार ये भी कहा कि मत देखिये मगर लगा कि ऐसा कहना अति हो जाएगा इसिलए कम देखने की बात करने लगा। मैंने इतना अमल तो किया है कि न के बराबर देखता हूँ। बहुत साल पहले कस्बा पर ही डिबेट टीवी को लेकर एक लेख लिखा था ‘जनमत की मौत’।

मैं टीवी में रहते हुए टीवी से बहुत दूर जा चुका हूँ। जब कभी समीक्षा करना होती है तभी देखता हूँ वरना जब मेरा कार्यक्रम भी चल रहा होता है तो वो भी नहीं देखता। पांच छह अपवादों को छोड़ दीजिये तो कई सालों से अपने कार्यक्रम को भी कभी शेयर नहीं किया। कुछ लोगोँ को व्यक्तिगत रुप से लिंक ज़रूर भेजता हूँ । अगर ठीक ठीक कहूं तो पूरे महीने में कोई दो दिन आधे एक घंटे के लिए देखता हूँ। आफिस में चारों तरफ टीवी है तो दिख जाता है।

मेरी बातों और करनी में ये सब थोड़े बहुत अंतर्विरोध हैं मगर इसके बाद भी ये कहना चाहता हूँ कि न्यूज़ चैनल मत देखिये। ये वाक़ई आपकी चेतनाओं की हत्या करने के प्रोजेक्ट हैं। क्या आप ख़ुद से कभी नहीं पूछेंगे कि क्या देख रहे हैं और क्यों देख रहे हैं? न्यूज चैनल भले आज गोदी मीडिया हो गए हैं मगर जब ये पूरी तरह गोदी नहीं थे तब भी उतने ही ख़राब थे।

आप एक दो उदाहरणों से न्यूज़ चैनलों की प्रासंगिकता साबित करते रहिए लेकिन काफी सोच विचार के बाद मैं यह पोस्ट कर रहा हूँ। जिनके घर में बच्चे हैं वहाँ कनेक्शन कटवाना आसान नहीं है। मगर आप न्यूज चैनल के कनेक्शन तो कटवा ही सकते हैं या देखना छोड़ सकते हैं।

यह कोई मामूली जोखिम नहीं है। इस तरह की बातें करने से इस क्षेत्र में अपनी संभावनाओं पर कुल्हाड़ी ही मार रहा हूँ। नौकरी किसे नहीं चाहिए। मुझे भी चाहिए। फिर भी जो बात दिमाग़ में जम गई है उसे नहीं कहना भी ख़ुद के साथ बुरा करना है। मैं इस वक्त जो महसूस कर रहा हूँ वो आपसे कहना चाहता हूँ। बाकी आप मालिक हैं ।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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लोग मुझ पर हंस रहे हैं कि अब तुम्हारी नौकरी चली जाएगी : रवीश कुमार

Ravish Kumar : यूपी के शिक्षामित्रों सुनिये मेरी भी बात… सुबह से यूपी के शिक्षा मित्रों ने मेरे फोन पर धावा बोल दिया है। मेरा एक तरीका है। जब अभियान चलाकर दबाव बनाने की कोशिश होती है तो मैं दो तीन महीने रूक जाता हूँ। स्टोरी नहीं करता। मैं समझता हूं आपकी पीड़ा और परेशानी। कुछ साथियों के आत्महत्या करने की ह्रदयविदारक ख़बर देखी है। विचलित भी हूँ। सोच भी रहा था कि कुछ करता हूँ।

अकेला आदमी हूं विषय को पढ़ने समझने में न्यूज की डेडलाइन जैसी पात्रता ख़त्म हो जाती है फिर भी ध्यान में था ही। बात ये है कि किस हक से फोन पर धावा बोला गया? क्या मुझे शिक्षा मित्रों ने सांसद चुना है? विधायक चुना है? जिनको चुना है उनसे क्यों नहीं पूछते पहले। मैंने तो नहीं देखा इनमें से कभी किसी को मेरे लिए बोलते हुए। बल्कि ज़्यादातर गाली ही देते होंगे या जब गालियों से मुझे धमका कर चुप कराया जा रहा था तब चुप रहते होंगे। इस तरह से आप जनता ने ही पहले इस लोकतंत्र को कमज़ोर किया। सरकार से पूछने पर जब आप मुझे कमज़ोर करेंगे तो जब आप सरकार से पूछेंगे तो आपको कोई कमजोर कैसे नहीं करेगा।

पूरा जीवन लगाकर मैं यही कहता रहा कि सरकार चुनने के बाद मतदाता बन जाइये। किसी चिरकुट का फैन मत बनिये। न पत्रकार का न नेता का। आप किसी नेता का फैन बनकर खुद का विलय सरकार और विचारधारा में करेंगे तो जनता नहीं रह जाएंगे। आपका जनता के रूप में सरकार पर प्रभाव और दबाव ख़त्म हो जाता है। जैसे ही आप सरकार के समक्ष खड़े होंगे, आपको अल्पसंख्यक बना दिया जाएगा। अल्पसंख्यक होना धर्म से मुसलमान या सिख होना नहीं है। यह प्रक्रिया है उस आवाज़ को कुचलने की, जो अपनी मांग को लेकर सरकार के सामने खड़ी होती है।

बार-बार कहा मगर आप या आप जैसे लोग नहीं माने।गाय बकरी को लेकर जनता तेज़ी से जनता होने की अपनी पहचान छोड़ कर पार्टी विचारधारा में समाहित होती चली गई। जनता अल्पसंख्यक बनती चली गई । इसी के लिए अब विचारधारा की सरकार का मॉडल चलाया जा रहा है। पार्टी और सरकार की विचारधारा एक हो गई है। इस मॉडल में जनता के पास विचारधारा से अलग होने का अवसर नहीं रहता। गुजरात में जब पटेल समाज को पुलिस ने पीटा तो बाकी जनता इसलिए चुप रही कि विचारधारा की सरकार कमज़ोर न हो जाए। पटेल के पैसे और समर्थन से भाजपा ने राज ज़रूर किया मगर वे पुलिस से इसलिए पीट गए क्योंकि वे जनता नहीं रहे। वो पीटने के बाद भी विचारधारा में ही रहेंगे। जैसे ही आप मेजारिटी की ताकत कायम करते हैं, माइनॉरिटी बन जाते हैं।

इसलिए सूरत के कपड़ा व्यापारियों का आंदोलन बड़ी संख्या के बाद भी संघर्ष का मनोरंजन बन गया और बेअसर रहा। वो विरोध की जगह भजन करने लगे। सविनय अवज्ञा की जगह अनुनय-विनय करने लगे। आप समझते हैं कि हिंदू हिंदुत्व के लिए गोलबंद हो रहे हैं लेकिन असलीयत में आप जनता होने की पहचान खो रहे हैं। जब जनता अपनी हैसियत खो देती है तो सरकार को अथॉरिटेरियन बनने की छूट मिल जाती है। सेवक सेवक बोल कर सरकार मास्टर हो जाती है। पिछले तमाम आंदोलन और आवाज़ की यही हालत हुई है। सूरत के कपड़ा व्यापारी हों या मंदसौर के किसान या यूपी के शिक्षा मित्र। सब लड़कर थक गए मगर मिला कुछ नहीं।

मेरे पास कोई सीएमओ पीएमओ नहीं है।

अकेले ही आपके फोन उठाता हूँ, रोज़ बीस पत्रों के जवाब देता हूं और इतने ही पत्र पढ़ता हूँ। गोदी मीडिया का विज्ञापन भकोस कर आपने मुझे और सवाल पूछने की पंरपरा को कमज़ोर होने दिया। जब आपकी बारी आई तो कोई मीडिया आपके लिए नहीं है। यह कैसा समाज है कि लोग मुझ पर हंस रहे हैं कि अब तुम्हारी नौकरी चली जाएगी? आप क्यों तब चुप रहते हैं?

मैं आपके मसले को समझने में लगा हूँ। मैं ही उम्मीद हूँ, कहकर मेरा भावनात्मक शोषण न करें। मुझे आपकी पीड़ा का अहसास है। जो बात कह रहा हूँ पहले समझिये। अगर आप वाक़ई एक लाख हैं तो सड़क पर आकर दिखाइये। लड़िए। हिन्दू मुस्लिम टापिक पर लड़ लड़ कर आपने समाज को पगला दिया है, उसे ठीक कीजिए। मुझे फोन करने से कुछ नहीं होगा।

आपकी उम्मीद,

रवीश कुमार

एनडीटीवी से जुड़े एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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अमित शाह की संपत्ति और मीडिया का भय

Ravish Kumar : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की संपत्ति में तीन सौ फ़ीसदी की वृद्धि की ख़बर छपी। ऐसी ख़बरें रूटीन के तौर पर लगभग हर उम्मीदवार की छपती हैं जैसे आपराधिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि की ख़बरें छपती हैं। कुछ मीडिया ने अमित शाह की ख़बर नहीं छापकर और कुछ ने छापने के बाद ख़बर हटा कर अच्छा किया। डर है तो डर का भी स्वागत किया जाना चाहिए। इससे समर्थकों को भी राहत पहुँचती है वरना प्रेस की आज़ादी और निर्भीकता का लोड उठाना पड़ता। जो लोग चुप हैं उनका भी स्वागत किया जाना चाहिए। बेकार जोखिम उठाने से कोई लाभ नहीं।

हम सब इसी तरह से डर का डर दिखाकर डराते रहें तो एक दिन डर का राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का डरवाद सफ़लतापूर्वक क़ायम हो जाएगा। मुझे आपत्ति सिर्फ एक बात से है। कहीं इस ख़बर पर पर्दा डालने के लिए धर्मनिरपेक्षता का इस्तमाल तो नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं हुआ तो चिंता की बात नही वरना बिहार में फिर शपथ ग्रहण समारोह होने लग जाएगा।

मुझे लगता है कि बीजेपी और अमित शाह को बदनाम करने के लिए दो अख़बारों ने इस ख़बर को छापकर हटाया है। कई बार जायज़ कारणों से भी संपत्ति बढ़ती है। इसका जवाब यही है कि ये ख़बर बीजेपी के नेता ख़ुद ट्वीट कर दें। अपनी वेबसाइट पर लगा दें। ट्रेंड करा दें। मेरा भरोसा करें, संपत्ति में तीन सौ से लेकर हज़ार फीसदी वृद्धि की ख़बरों से जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता है। रूटीन की ख़बर है ये। करोड़पतियों के पास अपनी कार नहीं होती और वे पर्यावरण की रक्षा के लिए महँगी कार से ही चलते नज़र आते हैं, साइकिल से नहीं!

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी ने 70 कर्मचारियों को निकाला, रवीश कुमार ने चुप्पी साधी

हर मसले पर मुखर राय रखने वाले पत्रकार रवीश कुमार अपने संस्थान एनडीटीवी के घपलों-घोटालों और छंटनी पर चुप्पी साध जाते हैं. ताजी सूचना के मुताबिक एनडीटीवी ने अपने यहां से छह दर्जन से ज्यादा मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. इनमें से ज्यादातर तकनीकी कर्मी हैं. करीब 35 तो कैमरामैन ही हैं. बाकी टेक्निकल स्टाफ है. वे कैमरामैन में जो पहले एडिटोलियल टीम के सदस्य थे, अब एचआर ने उन्हें टेक्निकल स्टाफ में कर दिया है.

ये सभी ग्रुप के अंग्रेजी हिंदी व अन्य चैनलों में काम करते थे. संपादकीय विभाग के अन्य लोगों पर भी गाज गिर सकती है. सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं क्या रवीश कुमार भी इस छंटनी के मसले पर कुछ बोलेंगे… क्या वे इस मामले में मुंह खोलेंगे. उल्लेखनीय है कि सीबीआई रेड पड़ने पर एनडीटीवी के पक्ष में तमाम बुद्धिजीवी खड़े हो गए थे. अब एनडीटीवी से 70 लोग निकाले गए हैं तो इनके परिवारों के पक्ष में कोई दो लाइन लिखने के लिए आगे आने वाला नहीं है.

आउटलुक मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार एनडीटीवी प्रबंधन ने अपने यहां से 70 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ज्ञात हो कि पिछले कुछ दिनों से एनडीटीवी ने MoJo यानि मोबाइल जर्नलिज्म शुरू किया है. इसके बाद ही माना जा रहा था कि कैमरामैन निकाल दिए जाएंगे. मोजो जर्नलिज्म के प्रयोग के बाद अब रिपोर्टर के साथ कैमरामैन नहीं जाता है. रिपोर्टर खुद मोबाइल से वीडियो बनाता है. एनडीटीवी भी कहता है कि वह मोजो यानी मोबाइल बेस जर्नलिज्म की ओर बढ़ रहा है.

इस छंटनी को लेकर फेसबुक पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं :

राजीव राय : एनडीटीवी से तकरीबन 60 लोगों को बाहर निकाल दिया गया है. उम्मीद है Ravish Kumar जी! इसपर भी कोई ब्लॉग या पोस्ट लिखेंगे और अपने साथी पत्रकारों के लिए ठीक वैसे ही आवाज़ बुलंद करेंगे जैसे अपने मालिक प्रणाॅय राॅय के लिए किया था.
Mayank Saxena : 6 महीने पहले ही जब एनडीटीवी ने अपने रिपोर्टर्स को मोबाइल दे कर उससे स्टोरी और लाइव करने को कहा था…तभी मुझे लग गया था कि छंटनियां होने वाली हैं…कैमरापर्सन्स ही सबसे ज़्यादा होंगे, मेरे हिसाब से इन 70 लोगों में…
Rajat Amarnath : NDTV ने सफेद हाथियों की सैलरी कम करने की जगह अपने करीब100 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला किया है (ज्यादातर टैक्निकल स्टाफ है). इस मौके पर एक प्राइम टाईम तो बनता है- “जुबां पे सच,दिल में इंडिया… NDTV इंडिया”
Ajay Prakash : एनडीटीवी ने की 70 कर्मचारियों की छंटनी… देखना होगा कि कौन से नेता और बुद्धिजीवी बाहर किये जाने वाले लोगों के समर्थन में आकर जंतर—मंतर पर प्रदर्शन करते हैं.

इस बीच, एनडीटीवी समूह ने एक बयान जारी कर कहा है- ‘दुनियाभर के अन्य न्यूज ब्रॉडकास्टर की तरह एनडीटीवी भी मोबाइल जर्नलिज्म पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने न्यूज रूम और रिसोर्सेज का पुनर्गठन कर रही है। एनडीटीवी ने हमेशा प्रारंभिक स्तर पर ही नई टेक्नोलॉजी को ग्रहण किया है और हम (एनडीटीवी) देश का पहला नेटवर्क है, जिसने मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर खबरों को शूट करने के लिए अपने पत्रकारों को प्रशिक्षित किया है। यह सिर्फ कॉस्ट-कटिंग नहीं है, बल्कि यह निश्चित रूप से हमारे लिए किसी भी अन्य बिजनेस की तरह या यूं कहें कि ऑपरेशंस का महत्वपूर्ण फैक्टर है।”

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न्यूज़ एंकर हमारे समय का थानेदार है, गुंडा है और बाहुबली है : रवीश कुमार

एक ऐसे वक्त में जब राजनीति तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर रही है, सहनशीलता को कुचल रही है, अपमान का संस्कार स्थापित कर रही है, उसी वक्त में ख़ुद को सम्मानित होते देखना उस घड़ी को देखना है जो अभी भी टिक-टिक करती है। दशकों पहले दीवारों पर टिक टिक करने वाली घड़ियां ख़ामोश हो गई। हमने आहट से वक्त को पहचानना छोड़ दिया। इसलिए पता नहीं चलता कि कब कौन सा वक्त बगल में आकर बैठ गया है। हम सब आंधियों के उपभोक्ता है। लोग अब आंधियों से मुकाबला नहीं करते हैं। उनका उपभोग करते हैं। आंधियां बैरोमीटर हैं, जिससे पता चलता है कि सिस्टम और समाज में यथास्थिति बरकरार है। …

(दोनों तस्वीरें कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने अपने मोबाइल से उतारीं, इसलिए फोटो श्रेय उन्हीं को.)

असली डिग्री बनाम फ़र्ज़ी डिग्री के इस दौर में थर्ड डिग्री नए नए रूपों में वापस आ गई है। न्यूज़ एकंर हमारे समय का थानेदार है। टीवी की हर शाम एक लॉक अप की शाम है। एंकर हाजत में लोगों को बंद कर धुलाई करता है। एंकर हमारे समय का गुंडा है। बाहुबली है। हुज़ूर के ख़िलाफ़ बोलने वाला बाग़ी है। हुज़ूर ही धर्म हैं, हुज़ूर ही राष्ट्र हैं, हुज़ूर ही विकास हैं। प्राइम टाइम के लॉक अप में विपक्ष होना अपराध है। विकल्प होना घोर अपराध है। तथ्य होना दुराचार है। सत्य होना पाप है। इसके बाद भी आप सभी ने एक न्यूज़ एंकर को पहले पुरस्कार के लिए चुना है यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया में (पुरस्कार देने का) जोखिम उठाने वाले अब भी बचे हुए हैं। हम आपके आभारी हैं। …

गांधीवादी, अंबेडकरवादी, समाजवादी और वामपंथी। आंधियां जब भी आती हैं तब इन्हीं के पेड़ जड़ से क्यों उखड़ जाते हैं। बोन्साई का बाग़ीचा बनने से बचिये। आप सभी के राजनीतिक दलों को छोड़कर बाहर आने से राजनीतिक दलों का ज़्यादा पतन हुआ है। वहां परिवारवाद हावी हुआ है। वहां कोरपोरेटवाद हावी हुआ है। उनमें सांप्रदायिकता स लड़ने की शक्ति न पहले थी न अब है। फिर उनके लिए अफसोस क्यों हैं। अगर ख़ुद के लिए है तो सभी को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। मैंने राजनीति को कभी अपना रास्ता नहीं माना लेकिन जो लोग इस रास्ते पर आते हैं उनसे यही कहता हूं कि राजनीतिक दलों की तरफ लौटिये। सेमिनारों और सम्मेलनों से बाहर निकलना चाहिए। सेमिनार अकादमिक विमर्श की जगह है। राजनीतिक विकल्प की जगह नहीं है। राजनीतिक दलों में फिर से प्रवेश का आंदोलन होना चाहिए। …

न्यूज़ रूम रिपोर्टरों से ख़ाली हैं। न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट में अच्छे पत्रकारों को भर्ती करने की जंग छिड़ी है जो वाशिंगटन के तहखानों से सरकार के ख़िलाफ़ ख़बरों को खोज लाएं। मैं न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट की बदमाशियों से भी अवगत हूं, लेकिन उसी ख़राबे में यह भी देखने को मिल रहा है। भारत के न्यूज़ रूम में पत्रकार विदा हो रहे हैं। सूचना की आमद के रास्ते बंद है। ज़ाहिर है धारणा ही हमारे समय की सबसे बड़ी सूचना है। एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त है। वो पत्रकार नहीं है। सरकार का सेल्समैन है। .. प्रेस रिलीज तो पहले भी छाप रहे थे। फर्क यही आया है कि अब छाप ही नहीं रहे हैं बल्कि गा भी रहे हैं। यह कोई मुंबई वाला ही कर सकता है। चाटुकारिता का भी इंडियन आइडल होना चाहिए। पत्रकारों को बुलाना चाहिए कि कौन किस हुकूमत के बारे में सबसे बढ़िया गा सकता है। …

न्यूज़ चैनल और अख़बार राजनीतिक दल की नई शाखाएं हैं। एंकर किसी राजनीतिक दल में उसके महासचिव से ज़्यादा प्रभावशाली है। राजनीतिक विकल्प बनाने के लिए इन नए राजनीतिक दलों से भी लड़ना पड़ेगा। नहीं लड़ सकते तो कोई बात नहीं। जनता की भी ऐसी ट्रेनिंग हो गई है कि कई लोग कहने आ जाते हैं कि आप सवाल क्यों करते हैं। स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और स्याही से लिखने वाले प्रोपेगैंडा कर रहे हैं। पत्रकारिता का वर्तमान प्रोपेगैंडा का वर्तमान है। …

नैयर सम्मान से सम्मानित किए जाने के दौरान एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार द्वारा दिए गए वक्तव्य का कुछ अंश.

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एक लाख रुपये वाला ‘कुलदीप नैयर सम्मान’ पत्रकार रवीश कुमार को देने की घोषणा

Om Thanvi : भाषाई पत्रकारिता के लिए स्थापित पहला कुलदीप नैयर सम्मान संजीदा पत्रकार रवीश कुमार को दिया जाएगा। प्रेस क्लब, दिल्ली में इसकी घोषणा आज सम्मान समिति के अध्यक्ष आशीष नंदी ने की। इस मौक़े पर कुलदीप नैयर भी मौजूद थे। सम्मान में प्रशस्ति के साथ एक लाख रुपए की राशि दी जाएगी।

सम्मान का आयोजन गांधी शांति प्रतिष्ठान के तत्वावधान में हुआ है। प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने बताया कि यह सम्मान हर वर्ष दिया जाएगा। सुपात्र का निर्णय सात सदस्यों की समिति करेगी। रवीश कुमार को हार्दिक बधाई।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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इंडिया टीवी के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के नाम खुला ख़त…

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी


प्रिय अभिषेक उपाध्याय

बीते एक हफ्ते में आपने फेसबुक पर जो कुंठा ज़ाहिर की है, उससे अब घिन आने लगी है। सुना है आपने खाना-पीना छोड़ दिया है। खुद को संभालिये, आप ‘वो’ नहीं बन सकते इस सच को जितनी जल्दी स्वीकार लेंगे आपको आराम हो जाएगा। लकीर को मिटाकर बड़ा नहीं बन सकते आप, आपको बड़ी लकीर खींचना सीखना होगा, अपने सीनियर्स से सीखिये उन पर कीचड़ मत उछालिये। हालांकि इस मामले में आपकी चुस्ती देखकर मुझे अच्छा भी लग रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे ‘स्वर्ग की सीढ़ियां’, ‘नाग-नागिन का डांस’ और ‘क्या एलियंस गाय का दूध पीते हैं’ जैसी स्टोरीज़ में अब आपकी दिलचस्पी कम हो गई है। ये अच्छा संकेत है, मुबारकबाद।

आपकी हालिया पोस्ट पढ़कर महसूस हो रहा है जैसे पत्रकारिता की दुनिया में एक नए नारीवादी पत्रकार ने जन्म लिया है, जो महिला के एक आरोप भर से इतना आहत है कि खाना पीना छोड़ दिया है, सड़क पर बदहवास होकर दाएं-बाएं भाग रहा है, लेकिन फिर मैं ये सोचकर उदास हो जाता हूं कि काश ये क्रांति की ज्वाला थोड़ा पहले जल गई होती तो उस दोपहर आपको प्रेस क्लब में आपके आका रजत शर्मा के लिए किसी बाउंसर की तरह बर्ताव करते न देखता, जिन पर और जिनकी पत्नी पर इंडिया टीवी की एंकर ने गंभीर आरोप लगाए थे।

आरोप भी वही थे जो अब आपको ना काबिले बर्दाश्त लग रहे हैं। वो एंकर मेरी सहकर्मी भी रह चुकी हैं इसलिए मैं समझता हूं कि वो किस पीड़ा से गुज़री थीं जब उन्होंने फेसबुक पर अपना सुसाइड नोट लगाया था। इंडिया टीवी पर तब उस ख़बर के न चलने पर आपने छाती नहीं पीटी थी। काश आपका नारीवाद तब अपने मालिक के नमक का हक अदा करने न गया होता तो कितना अच्छा होता, वैसे मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं आप नारीवाद के झंडाबरदार के तौर पर अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं तो कराइये लेकिन उससे पहले अपने अंदर के जातिवाद के मैल को साफ कीजिए। आपकी हालिया पोस्ट में आप रवीश कुमार को ये कहकर टारगेट कर रहे हैं कि वो रवीश पांडेय है तो पांडेय क्यों नहीं लगाते? पढ़ाई-लिखाई सब बेच खाई है क्या? ये भी कोई गुनाह है?

मेरा दरख्वास्त है आपसे कि फैज़, दुष्यंत कुमार और बाबा नागर्जुन का नाम बार-बार लेने से परहेज़ कीजिए उनकी आत्माएं तड़पती होंगी। ओम थान्वी जैसे वरिष्ठ पत्रकार के शरीर का मज़ाक उड़ाते हुए उन्हें थुलथुल थान्वी लिखते हुए आपको शर्म आई होगी या नहीं, इस पर अलग से बात की जा सकती है लेकिन हां, कभी अकेले में आइने के सामने खड़े होकर खुद से पूछिएगा कि जिस पत्रकारिता के उसूलों की फिक्र में आप दुबले हुए जा रहे हैं वो तब कहां गए थे जब क़मर वहीद नकवी साहब ने आपके संस्थान से इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि आप प्रधानमंत्री का पेड इंटरव्यू चला रहे थे? तब वो मशालें कहां छुपा दी थी आपने जिन्हें अब झाड़-पोंछ कर सुलगा रहे हैं।

मैं मानता हूं आपके लिए नौकरी बड़ी चीज़ है, घर-परिवार की ज़िम्मेदारी है, मकान की किश्तें हैं, बच्चों की स्कूल फीस है लेकिन फिर भी आपको इतनी हिम्मत तो दिखानी चाहिए थी कि एक बार अपने मालिक से पूछते “सर, आपको ‘कला और साहित्य’ में पद्म भूषण तो मिला है लेकिन कला-साहित्य में आपका क्या योगदान है?” मानता हूं डर लगता होगा आपको, लेकिन सारी दिलेरी सिर्फ अपनी कुंठा निकालने के लिए दिखाना ग़लत है, धोखेबाज़ी है। आपकी घटिया और दो कोड़ी की फूहड़ कविताएं अक्सर फेसबुक पर देखते हुए नज़रअंदाज़ करता था लेकिन अब आप पोस्ट से भी गंदगी फैला रहे हैं इसलिए लिखना पड़ा। उम्मीद है आप खाना-पीना वापस खाना शुरू कर देंगे, इतनी नाराज़गी ठीक नहीं है।

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

विभिन्न टीवी चैनलों में काम कर चुके जमशेद कमर सिद्दीक़ी फिलहाल ‘गाँव कनेक्शन’ में स्पेशल कॉरसपोंडेट हैं। वो रेड एफएम के लिए कहानियां भी लिखते हैं। इनसे jamshed@gaonconnection.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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रवीश को रवीश में उलझाना एक साज़िश है!

Sheeba Aslam Fehmi : जबकि पत्रकारिता पर गहरा नैतिक संकट आया हुआ है और मौजूदा दौर के लिए ज़रूरी हैं रवीश कुमार, तो सत्ता यही चाहेगी की रवीश खुद खबर बन जाएं और सफाई देने में उलझे रहें. लेकिन हमें सतर्क रहना होगा. इस मामले में रवीश खुद बेहद सतर्क हैं. अपने काम में निजी जीवन का कोई पहलू कभी आड़े ना आये इसके लिए उनके कई नियम और त्याग तो मैं भी जानती हूँ.

बिहार चुनाव के दौरान जब क़रीबी रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे थे तो वो उनके क्षेत्र के आस-पास भी नहीं फटके. हालाँकि बिहार कवर कर रहे थे लेकिन राजनैतिक रिपोर्टिंग की ही नहीं जिससे कोई ये न कहे की अमुक पार्टी की तरफ झुकाव रहा या दुराव रहा. भाभी बुरा भी मान गयीं हों लेकिन नहीं गए.

ऐसा ही एक और निषेध जो उन्होंने खुद पर लगा रखा है वो ये की सिफारिश का फ़ोन कभी नहीं करेंगे, सिर्फ क्रिटिकल मरीज़ के लिए ही अब तक फ़ोन घुमाया है वरना कोई कितना भी सगा हो या मित्रवत हो, सिफारिशी फ़ोन नहीं करेंगे.

किसी ऐसी शादी में शरीक नहीं होंगे जिसमे दहेज़ का आदान-प्रदान हो चाहें परिवार में ही क्यों न हो.

और हाँ बेटी के एडमिशन के समय पेरेंट्स के बतौर दोनों पति-पत्नी ने एक नयी भाषा सीखने में कितनी मेहनत की ये बात भी यहाँ बताने लायक़ है. रसूख या सेलिब्रिटी स्टेटस का इस्तेमाल नहीं किया, नियम के तहत सभी मरहले तय किये.

इसके अलावा ईमानदार और बेलाग पत्रकारिता के जो नुकसान सगे संबंधी झेल रहे हैं, उनके उलाहने अलग है. दोनों तरफ से पिस कर ये शख्स संयम बनाये हुए है.

इनके एक सीनियर सहकर्मी ने पिछले हफ्ते ही एक निजी बातचीत में कहा की रवीश अकेले दम पर हिंदी चैनल खींच रहे हैं अब, प्राइम टाइम के अलावा किसी कार्यक्रम में जान नहीं बची है. सिर्फ वही हैं जो मेहनत करते हैं जबकि इतने सीनियर हैं.

रवीश की पत्रकारिता तो लाजवाब है ही लेकिन निजी जीवन में भी इज़्ज़त करने लायक़ इंसान हैं ये.

सोशल एक्टिविस्ट शीबा असलम फ़हमी की एफबी वॉल से.

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‘बागों में बहार है’ के लिए रवीश को सज़ा..?

टीवी एंकर रवीश कुमार के भाई पर यौन शोषण का आरोप क्या लगा मानों कुछ गुमनाम पत्रकारों को अपने नाम को सुर्खियों में लाने का मौका मिल गया…रवीश कुमार पर इन पत्रकारों के हमले से मुझे जलन की बू आ रही है…वो इसलिए कि… शायद रवीश के साथ जिन पत्रकारों ने अपना सफर तय किया था उन्हें वक्त के साथ उतनी शोहरत नहीं मिली जितनी उन्होंने ख्वाहिश पाल रखी थी… और रवीश ने रोज नए- नए मकाम हासिल कर अपनी एक अलग पहचान बनाई…

मैं ना तो रवीश का समर्थक हूं और ना ही आपका आलोचक,,,लेकिन मियां कुछ छुठभैय्ये पत्रकार तो मानों रवीश के पीछे एसे पड़ गए हैं जैसे दोषी रवीश हो उसका भाई नहीं….एक वो इंडिया टीवी वाले दीन दययाल उपाध्याय,,औहो माफ किजिएगा अभिषेक उपाध्याय जी… आप तो उसके पीछे एसे पड़ गए जैसे रवीश ने आपका बचपन में मेमना (बकरी का बच्चा) खोल लिया हो,,अरे अभिषेक भाई रामायण में कुभंकरण जब राम के हाथों मरने जा रहा था उसने कहा था की भाई भाई की भुजा (हाथ) होता है…लेकिन कोई अपना पेट कैसे नंगा करके दिखा दे…

मैं पूछना चाहता हूं उन पत्रकारों से जो पानी पी पी कर रवीश को कोस रहे हैं कि… अगर उनका भाई- बाप या रिश्तेदार कुछ गलत करता है,,,तो वो उतनी सच्चाई से उस खबर को दिखाएंगे जितनी ईमानदारी से रवीश पर निशाना साध रहे हैं….हां… संपादक की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन अगर रवीश के भाई ने कुछ गलत किया है तो उसकी सजा उसे कानून देगा,, इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं कि अगर किसी पत्रकार का भाई कहीं चोरी करता पकड़ा जाए तो पत्रकार भी चोर बन जाए,,,अब क्या… भाई की गलती ‘जिसे अभी साबित करना भी बाकी है’ की सजा रवीश को दी जाए… आप ये कह रहे हो? या फिर नैतिकता के आधार पर रवीश पत्रकारिता छोड़ दें ? क्या यही आपकी नैतिकता है…?

भई ऐसा है…अगर नैतिकता की बात की जाए तो पहले उस नैतिकता की तरफ भी झांक लें, जो कम-से-कम आप में भी नहीं दिखाई दे रही है…और अगर इसे गलत माना जाए तो फिर उनका क्या… जो पिछले कुछ महीनों ‘या फिर साल भी कह सकते हैं’ से  पत्रकारिता के सारे उसूलों को दरकिनार कर अपने फायदे का सौदा कर रहे हैं। आप समझदार हैं मेरा इशारा अच्छी तरह समझ गए होंगे…धन्यवाद 

राजेश कुमार
एंकर
चैनल वन न्यूज
rajesh.targotra@gmail.com

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रवीश कुमार सब करने ही लगेगा तो नंगों के बीच बदनाम कब होगा!

प्राइम टाइम को रामजस कॉलेज में बदलना खेल नहीं था

-रवीश कुमार-

गुरुवार सुबह नौ बजे जब हम मूलचंद फ्लाईओवर से एंड्र्यूज गंज केंद्रीय विद्यालय की तरफ उतर रहे थे, तभी कार की खिड़की से देखा कि थोड़ी दूर एक बुज़ुर्ग अपना नियंत्रण खोते हैं और स्कूटर से गिर जाते हैं। टक्कर कैसे लगी, यह तो नहीं देखा, मगर काफी तेज़ थी। वे सर के बल गिरते हैं और तभी ठीक पास से एक कार गुज़रती है। देखने से लगा कि कार ने सर कुचल दिया। मगर ऐसा नहीं हुआ। उनकी मदद के लिए वही कार सबसे पहले रूकती है। पल भर में वहाँ भीड़ बन जाती है और मेरी कार को रुकने के लिए जगह नहीं बनती है। काफी आगे जाकर हम रूकते हैं और दौड़ कर घटनास्थल की तरफ आते हैं।

टीवी वाला हूँ। हर समय टाइम के फ्रेम में रहता हूं। रामजस कॉलेज पर शो रिकार्डिंग करनी थी, एक दिमाग़ इसमें उलझा था कि इन सबमें उलझा तो शो के लिए टाइम नहीं मिलेगा। वापस चलते हैं, यहाँ लोग हैं वो अस्पताल ले जायेंगे। तब तक महसूस हुआ कि लोग देरी कर रहे हैं। सबने बुज़ुर्ग को घेर तो लिया था मगर पुलिस को किसी ने फोन नहीं किया। एंबुलेंस को फोन किसी ने नहीं किया। घायल के आसपास भीड़ बड़ी होती जा रही थी।

मुझे अपना टाइम छोड़ गोल्डन टाइम का ख़्याल आया। अगर आधे घंटे से कम समय के भीतर अस्पताल पहुँचा दिया जाए तो जान बच सकती है। बस अब मैं अपने ड्राईवर को पुकारने लगा। भीड़ के कारण गाड़ी काफी दूर थी। वो गाड़ी को बैक भी नहीं कर सकता था। हम इन्हें अस्पताल लेकर चलते हैं। देर मत कीजिये। उठाइये और कार तक ले चलिए। मैं मेडिकल कारण से उठा नहीं सकता था। दिमाग़ रास्ता खोज रहा था कि इतना भारी शरीर कार तक कैसे ले जायेंगे। तभी एक सैंट्रो कार जगह बनाती हुई वहाँ रूकती है। महिला चालक उतरती हैं। किसी तरह उन्हें कार में लादा गया और मैंने उन्हें ज़ोर से कहा कि मूलचंद अस्पताल ही ले जाना है। यही पास में है।

तब तक कार और बाइक की भीड़ इतनी बढ़ गई कि रास्ता बंद। अगर लोग भीड़ न बनाते तो मैडम अपनी कार ग़लत साइड से चलाकर दो मिनट के भीतर अस्पताल पहुँचा सकती थीं। उन्हें यू टर्न लेकर वापस जाना पड़ा। अब इस आपाधापी में उनसे एक ग़लती होने से रह गई। वे वापस मूलचंद फ्लाईओवर पर चढ़ने वाली थीं मगर मेरे ड्राइवर ने मना किया कि अभी मैं खुद किसी को लेकर इस रास्ते से अस्पताल गया था। मैडम ने उसकी बात मान ली वर्ना अस्पताल ले जाने में बीस मिनट लग जाते क्योंकि बहुत आगे जाकर यू ट्रर्न लेकर आना पड़ता। सबक है कि ऐसे मामलों में रास्ते को लेकर सजग रहें।

मगर मैंने वही ग़लती की जो मेरे ड्राईवर ने मैडम को नहीं करने दिया। मैं पीछे से अपनी कार चलाकर पहले अपनी पत्नी को छोड़ा और फिर अस्पताल आया। इसमें दस मिनट का समय लगा मगर एक अच्छी बात हुई। गोल्डन समय में अस्पताल पहुँचाने के कारण घायल की जान बच गई। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में डाक्टरों ने शांति से उन्हें भरती कर लिया। मुस्कुराते हुए एक सरदार जी डाक्टर मिले। बताया कि काफी चोट हैं मगर ठीक हैं। सब मुस्तैदी से लगे थे मुझे तो लगा था कि वे नहीं बचेंगे मगर बिस्तर पर अवाक लेटे थे। दर्द से क़राह रहे थे लेकिन जान बच गई थी। उनके ही फोन से बेटे अमित भाटिया को बता दिया कि आपके पिताजी ठीक लग रहे हैं मगर उनका एक्सीडेंट हुआ है। वे नोएडा से रवाना हुए तो कहा कि सावधानी से आइयेगा। हड़बड़ी में आपके साथ न कुछ हो जाए।

इस घटना के बारे में इसलिए लिखा क्योंकि हम कई ग़लतियाँ करते हैं। किसी की दुर्घटना हो तो तमाशा देखने के लिए कभी न रूकें। इरादा करके रूकें कि पल भर में अस्पताल पहुँचा देना है। बाकी लोग रूक कर आगे पीछे भीड़ न बनायें। इससे घायल को काफी नुक़सान हो सकता है। बाइक चलाते हैं तो ज़रा तमीज़ से चलायें। याद रखें कि आप सबसे कम सुरक्षित हैं। कई बार मन करता है कि बाइकर्स का वीडियो बनाकर उनके घर भेज दूँ। हेल्मेट अच्छा पहनें। मैंने साफ साफ देखा था कि वे सर के बल गिरे थे। जब किसी ने उनका हेल्मेट लाकर दिया तो उसमें कुछ नहीं हुआ था। उनकी जान बचने में हेल्मेट का बहुत बड़ा योगदान रहा होगा।

पुलिस और एंबुलेंस को फोन करें। मैंने देखा कि किसी ने नहीं किया है। सौ नंबर पर फोन किया। फोन उठाने वाले ने काफी अच्छे से बात की और पल भर में पुलिस के फोलो अप फोन आने लगे। किसी ने मुझे पुलिसिया अंदाज़ में नहीं पूछा। दोस्त की तरह अच्छे से बात कर रहे थे।

इन सबमें एंबुलेंस वाले का फोन तब आया जब मैं पत्नी को छोड़ अस्पताल के लिए लौट रहा था। तब तक गोल्डन टाइम का अच्छा ख़ासा हिस्सा निकल चुका था। दिल्ली के जाम में एंबुलेंस कितनी जल्दी आएगा, इसका हिसाब लगाना चाहिए। ये फैसला आपको घटनास्थल पर करना होगा। अदालत कहती है कि आप घायल को अस्पताल पहुँचायें। आपसे पुलिस कुछ नहीं पूछेगी। हममें से किसी से नहीं पूछा। तो आप इस पहलू से बेख़ौफ़ किसी की भी मदद कीजिये । अस्पताल तक ले जाने वाली महिला भी डाक्टर थीं। जल्दी में हम नाम पूछना भूल गए मगर यह क्या कम है कि दिल्ली में लोग मदद के लिए रूकते हैं।

इन सब बातों को लिखने का एक मक़सद है। ताकि पढ़कर उन तमाम ग़लतियों को जान सकें जो अक्सर सभी दुर्घटनास्थल के आसपास करते हैं। वहाँ रूकने वाले सभी लोग बुरी नीयत से नहीं रूकते होंगे। मगर सब अच्छी नीयत के साथ अपराधबोध से भी रूकते हैं कि मदद के लिए नहीं रूकें। चार पाँच लोग रूक गए तो बाकी को आगे बढ़ जाना चाहिए मगर चार पाँच वहीं रुकें जो मदद करना चाहते हों। दिल्ली की सड़क कारों से भर गई है। इसमें न पुलिस समय से आ सकती है न एंबुलेंस।

ख़ैर भाटिया जी बच गए। मेरे समय का भयंकर नुक़सान हुआ। उसी दिन कोर्ट फिल्म के एक्टर वीरा साथीदार जी मिलने आए थे। कोर्ट एक शानदार फिल्म है। उनसे काफी कुछ बात करनी थी मगर दो चार लाइन की मुलाकात के बाद मैंने हाथ खड़े कर दिये कि आपको जाना होगा। मैं उन्हें सुन रहा था और अपनी स्क्रिप्ट लिख मिटा रहा था। फिर लगा कि नहीं होगा तो साथीदार जी से माफी मांग ली कि सर नहीं बात कर सकता। मुझे शो के लिए लिखना है। रिसर्च करना है। एक घंटे में रिकार्डिंग है।

मैंने इतने महान कलाकार और लोगों के लिए लड़ने वाले को इतनी सहजता और विनम्रता से जाते नहीं देखा। वे किसी आदिवासी महिला के इंसाफ़ के लिए आए थे जिसे पहले पुलिस अगवा करके ले गई फ़िर जो लोग महिला को बचाने के लिए आगे गए उन्हें ही पुलिस ने महिला के अगवा करने के आरोप में बंद कर दिया। कहानी भी सुनाई और लिखकर दिया भी। दो मिनट इस पर भी बात हो गई कि आप आदिवासी महिला के लिए दिल्ली आ गए मगर कोई पत्रकार दिल्ली से वहाँ नहीं जाएगा। क्योंकि सबको सरकार के प्रमुख की सेवा करनी है। फ़र्ज़ी फ़र्ज़ी एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने होते हैं। भयानक कहानी थी वो। आदिवासी महिलाएँ शायद भारत माता की कैटेगरी की नहीं हैं वर्ना इस कहानी को लेकर आंदोलन हो रहे होते। अब सब तो रवीश कुमार नहीं करेगा न। सब करने ही लगेगा तो नंगों के बीच बदनाम कब होगा। मीडिया का विकल्प बने फेसबुक के एक्टिविस्ट क्या करेंगे। मेरी जाति खोजने के अलावा भी तो कुछ कर सकते हैं।

बहरहाल, अब जब प्राइम टाइम को रामजस कालेज बनाने की तरफ मुड़ा तो घड़ी ने हाथ खड़े कर दिये। सारा समयनिकल चुका था। दो दो बार रिकार्डिंग का टारगेट मिस कर गया। इसी अफ़रातफ़री में शो का फार्मेट भी सोच रहा था, बात कर रहा था और लिख रहा था। कुछ याद आ रहा था, कुछ भूल रहा था। की बोर्ड पर उँगलियाँ राकेट की तरह भाग रही थीं। प्रिया इधर से कुछ बता रही थी तो उधर से कुछ। फुटेज देख रही थी तो किसी से बात कर रही थी। दो बजे और चार बजे की रिकार्डिंग की डेडलाइन मिस करने के कारण स्टुडियो की बुकिंग हाथ से चली गई। कोई स्टुडियो ख़ाली नहीं था।

इस बीच स्क्रिप्ट लिख लिया। कोई पंद्रह मिनट भी नहीं लगा होगा स्क्रिप्ट लिखने में। सुशील महापात्रा भाग भाग कर लोगों का इंटरव्यू ले आया। दो लोगों की रिकार्डिंग नहीं मिली क्योंकि जाम में फँसने के कारण सुशील उन तक नहीं पहुँच सका। इससे शो की टाइमिंग ख़राब हो गई। फिर पूरी स्क्रीप्ट पलट दी। ताकि बाद में आने वाली चीज़ें बाद में जोड़ी जा सकें। तभी ख़्याल आया कि विक्रमादित्य से व्हाट्स अप पर रिकार्डिंग मँगा लेते हैं।रोहिणी पहुँचना संभव नहीं है। साँस अटक गई थी। क्योंकि साढ़े चार बजे के लिए जहाँ कैमरा तैयार था वो हाथ से चला गया। वहाँ किसी और शो की रिकार्डिंग शुरू हो चुकी थी। अब लगा कि रामजस कॉलेज नहीं हो पाएगा।

तभी पाँच बजे हमारी प्रोड्यूसर को एक तरकीब सूझी। स्पोर्ट्स एंकर अफशां को दूसरे चैनल के स्टुडियो में भेज दिया और उनकी जगह मैं अपने स्टुडियो में। सब भयंकर तनाव में। मुझे बीस मिनट का ही समय मिला। एक ही डायरेक्टर अफशां को भी डायरेक्ट कर रहा था और मेरी रिकार्डिंग भी। समझिये एक डायरेक्टर एक ही समय में दो फ़िल्में डायरेक्ट कर रहा हो। हम साथ साथ ग्राफिक्स एनिमेशन की कमियों को भी ठीक कर रहे थे। जो लिखा था वो उसी भाव से पढ़ना भी था।

पढ़ ही रहा था कि किसी ने बताया कि सुमंगला दामोदरन आफिस आ रही हैं। वो आकर अपनी रिकार्डिंग देंगी और छह मिनट का कर लेंगे। चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई। यही कि अब शो हो जाएगा। वरना शो में कुछ और रिपोर्ट शामिल करनी पड़ जाती तब पूरा शो रामजस कॉलेज नहीं बन पाता। इस भागीदौड़ी में बहुत सी बातें भूल गया। कई वीडियो देख भी नहीं पाया। शायद उनका बेहतर इस्तमाल हो सकता था।

सुबह नौ बजे से साढ़े पाँच बजे तक हम बेख़ुदी के आलम में रहे। पता ही नहीं चला कि हमने क्या किया। मैं अपने शो के बारे में कम बात करता हूँ। बहुत कम याद रखता हूँ। काम साधारण ही होते हैं और मैं यूँ ही चलते चलते करके घर निकल जाता हूँ। इस बार लिख रहा हूँ ताकि आपको पता चले कि प्राइम टाइम को रामजस कालेज बना देने की कल्पना तरकीब से नहीं आती है। ज़िद और जुनून से आती है। एक फिल्मी संवाद है। दिल पर मत लीजियेगा। “कह देना कि छेनू आया था।” यही मैं हूँ। हारूँगा भी तो हुकूमत की ताकत से। ये क्या कम बड़ी बात है कि हुकूमत की साँस फूल जाती है।वो अफवाहों की फौज से मुझसे लड़ती है। दारोग़ाओं की फौज से लड़ती है। मेरी बातों और सवालों को सुनकर उसके होश उड़े रहते हैं। उसके समर्थक बेहोश हो जाते हैं। बाकी मार तो मच्छर भी दिया जाता है दुनिया में। मेरी हार होगी तो यही मेरी जीत होगी। जीत जाऊंगा तो उनकी हार होगी ही होगी।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो क्या अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे?

Abhishek Upadhyay : ये अखबार वाले भी न। ये भी नही समझते एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के प्रताप को। अब कल मैंने जो लिखने से मना किया था। आज वही छाप दिए। दंग हूँ मैं आज का टाइम्स ऑफ़ इंडिया पढ़कर। ये तो खबर छाप दिए है बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष और बिहार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के बेहद करीबी ब्रजेश पांडेय सेक्स स्कैंडेल में फंसे। पद से इस्तीफ़ा दिए। रेप के साथ-साथ पॉस्को (बच्चों का शोषण वाली धारा) भी लगा। हाँ हाँ वही। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय (उफ़ ये आदत), माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के सगे बड़े भाई ब्रजेश पांडेय।

अरे टाइम्स ऑफ़ इंडिया वालों, तुम्हारी मति मारी गई है। अभी रवीश कुमार ने इस मामले में चुप्पी तोड़ी नही और तुम ख़बर छाप दिए। अरे रवीश कुमार चुप हैं, इसका मतलब कि वो दलित लड़की झूठी है। मतलब कि वो साजिश कर रही है। जो आरोप लगा दी है। और बिहार पुलिस की सीबीसीआईडी भी वाकई में पगलाए गई है जो अपनी जांच में प्रथम दृष्टया आरोप सही पाय रही है। सुन लो, ऐ दुनिया वालों, सूली पर टांग दो ऐसी दलित लड़कियों को जो रवीश कुमार के भाई पर। जो रवीश कुमार के परिवार पर। कोई आरोप लगा दें। अब बताओ इतनी बड़ी बात हुई है। बिहार कांग्रेस का प्रदेश उपाध्यक्ष दलित बच्ची के यौन शोषण में फंसा है। सेक्स रैकेट का मामला अलग है। पॉस्को अलग लगा है। बिहार पुलिस तलाश रही है। वो फरार अलग है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया से लेकर आजतक चैनल तक। सब अब तक इस ख़बर पर आए चुके हैं। छाप रहे हैं। दिखाए रहे हैं। पर रवीश पांडेय…. उफ़…. रवीश कुमार चुप हैं। अरे, भाई लोगों कोई तो वजह होगी। समझो इस बात को।

झूठी होगी वो दलित की बिटिया। नही तो अभी तक कोट टाई पहनकर शमशेर, बाबा नागार्जुन और गोरख पांडेय की एक दुई क्रांतिकारी कविता पढ़ते हुए रवीश कुमार आ गए होते 2जी में फंसी एनडीटीवी की स्क्रीन पर। और चीख चीखकर अपने भाई ब्रजेश पांडेय से सवाल कर रहे होते। धोय रहे होते पटना पुलिस को। कि ऐसी कौन सी जगह छुप गया है ब्रजेश पांडेय कि अब तक उसे गिरफ्तार भी न कर पाय रही है। सुन लो ए दलित लड़कियों! जब तक रवीश कुमार से नैतिकता का सर्टिफिकेट न मिल जाए, तुम सब अनैतिक हो। झूठी हो। साज़िश करने वाली हो। सुधारो अपने आप को। माफ़ी मांगो तुरन्त। ब्रजेश पांडेय से। रवीश पांडेय से। माफ़ कीजियेगा, रवीश कुमार से।

कल से ही रवीश पांडेय के भक्त हमको गालियां दिए पड़े हैं। पूछ रहे हैं कि तुम इंडिया टीवी से हो। जलते होगे एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय से। अरे मोरे भाई, हम इलाहाबाद से हैं। इलाहाबादी हैं। इसी यूनिवर्सिटी का लहू बहता है हमारी धमनियों में। हम न जलते हैं। न डरते हैं। न किसी नाम से आतंकित होते हैं। न किसी पद से प्रभावित होते हैं। हम तो बस सिविल लाइन्स के सुभाष चौराहे पर एक कुल्हड़ वाली चाय पकड़कर बैठ जाते हैं, वहीं की फुटपाथों पर। पाश को पढ़ते हुए। पाश को गाते हुए –

“हमारे लहू को आदत है
मौसम नहीं देखता, महफ़िल नहीं देखता
ज़िन्दगी के जश्न शुरू कर लेता है
सूली के गीत छेड़ लेता है
शब्द हैं की पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं
लहू है की तब भी गाता है।”
जय हिंद

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चलो आज सीधा सीधा लिख मारते हैं। सुनो वामपंथ की लंपट औलादों। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय का भाई ब्रजेश पांडे बलात्कार और सेक्स रैकेट में फंसा है। तो लड़की का चरित्र बताए रहे हो। ये समझा रहे हो कि ओरिजिनल एफआईआर में उसका नाम नही था। बाद में सामने आया। तुमने आसाराम के बेटे नारायण साई का नाम सुना है। वो जिस मामले में साल 2013 में गिरफ्तार हुआ। वो साल 2002 से 2005 के बीच का मामला था। न यक़ीन हो तो सूरत की पीड़ित महिला के आरोप की एफआईआर निकलवा कर देख लो। पूरे 8 साल बाद की शिकायत थी। फिर भी हुई गिरफ्तारी। नारायण साईं आज भी जेल में है। सूरत की। वो भी राजनीति में दिलचस्पी रखता है। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, अरे हाँ भाई, रवीश कुमार के भाई ब्रजेश पांडे की तरह। चुनाव भी लड़ चुका है। फिर भी मुझे उससे कोई सहानुभूति नही। ऐसे 1000 उदाहरण हैं। गिनवाऊंगा तो बगैर क्लोरोफॉर्म सुंघाए बेहोश हो जाओगे।

किसी वामपंथ के जले हुए बुरादे पर बलात्कार का आरोप लगेगा तो मानक बदल जाएंगे तुम्हारे। तब लड़की का चरित्र बताने की औकात पर उतर आओगे। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, हाँ हाँ वही, ‘बागों में बहार’ वाले रवीश कुमार, के सगे बड़े भाई बृजेश पांडे पर बलात्कार और सेक्स रैकेट का संगीन आरोप लगा है। वो भी एक नाबालिग दलित लड़की ने लगाया है। तो तुम उस दलित लड़की के चरित्र का सर्टिफिकेट जारी किए दे रहे हो। कि वो चरित्रहीन है। रवीश पांडे का भाई मजबूरी में कुर्सी छोड़ने से पहले। बिहार कांग्रेस का प्रदेश उपाध्यक्ष था। तुम तो खा गए होते अभी तक, अगर ऐसे ही कोई बीएसपी का प्रदेश उपाध्यक्ष फंसा होता। कोई समाजवादी पार्टी। या फिर कांग्रेस का ही ऐसा नेता फंसा होता। बशर्ते वो तुम्हारी बिरादरी के ही किसी कॉमरेड का भाई न होता। और बीजेपी का फंस जाता तो फिर तो तुम्हारे थुलथुल थानवी जी ‘हम्मा-हम्मा’ गाते हुए अब ले शकीरा वाला डांस शुरू कर दिए होते। लिख लिखकर, पन्ने के पन्ने। स्याही के मुंह से कालिख का आखिरी निवाला तक छीन लिए होते। अमां, कौन सी प्रयोगशाला में तैयार होता है खालिस दोगलेपन का ये दीन ईमान। थोड़ा हमे भी बताए देओ।

ऐसे ही खुर्शीद अनवर का केस हुआ था। साहब पर नार्थ-ईस्ट की एक लड़की से बलात्कार का आरोप था। अनवर साहब जेएनयू के निवासी थे। फिर क्या था। रुसी वोदका के कांच में धंसे सारे के सारे वामपंथी। उस बेचारी नार्थ ईस्ट की लड़की की इज्ज़त आबरू का कीमा बनाने पर उतर आए थे। एक से बढ़कर एक बड़े नाम। स्वनाम धन्य वामपंथी। बड़ी-बड़ी स्त्री अधिकार समर्थक वामपंथी महिलाएं। सब मिलकर उस बेचारी लड़की पर पिल पड़े थे। वो स्टोरी मैंने की थी। बड़े गर्व के साथ लिख रहा हूँ। उस केस में पुलिस की एफआईआर थी। लड़की की शिकायत थी। मेरे पास पीड़िता का इंटरव्यू था। राष्ट्रीय महिला आयोग की चिट्ठी थी। आरोपी खुर्शीद अनवर के अपने ही एनजीओ की कई महिला पदाधिकारियों की उनके खिलाफ इसी मामले में लिखी ईमेल थी। ये सब हमने चलाया। खुर्शीद का वो इंटरव्यू भी जिसमें वो सीधी चुनौती दे रहे थे कि पीड़ित लड़की में दम हो तो सामने आए। शिकायत करे। वो सामना करेंगे। लड़की आगे आई। शिकायत भी की। पर खुर्शीद अनवर सामना करने के बजाए छत से कूद गए।

भाई साहब, ये पूरी की पूरी वामपंथी लॉबी जान लेने पर आमादा हो गई। कई वामपंथी वोदका में डूबे पत्रकार ‘केजीबी’ की मार्फत पीछे लगा दिए गए। जेएनयू को राष्ट्रीय शोक में डूबो दिया गया। शोर इतना बढ़ा कि दिल्ली पुलिस की एक स्पेशल टीम नार्थ ईस्ट रवाना की गई। ये केंद्र में यूपीए के दिन थे। वरना तो पूरी की पूरी सरकार हिला दी जाती। मैं आज भी उस नार्थ ईस्ट की लड़की की हिम्मत की दाद देता हूँ। तमाम धमकियां और बर्बाद कर देने की वामपंथी चेतावनियों को नज़रंदाज़ करती हुई वो दिल्ली पुलिस की टीम के साथ मजिस्ट्रेट के आगे पहुंची और सेक्शन 164 crpc के तहत कलमबंद बयान दर्ज कराया कि खुर्शीद अनवर ने उसके साथ न सिर्फ रेप किया, उसे sodomise भी किया। एक झटके में सारे वामपंथी मेढ़क बिलों में घुस गए। हालांकि टर्र टर्र अभी तक जारी है। उस बिना बाप की लड़की की आंखो में जो धन्यवाद का भाव देखा वो आज भी धमनियों में शक्ति बनकर दौड़ता है। इस हद तक कमीनापन देख चुका हूँ इंसानियत के इन वामपंथी बलात्कारियों का।

और हाँ। डिबेट का रुख काहे ज़बरदस्ती मोड़ रहे हो? ये कह कौन रहा है कि एनडीटीवी वाले रवीश पांडे इस बात से दोषी हो जाते हैं कि सगा बड़ा भाई बलात्कार और सेक्स रैकेट के आरोप में फंसा है? कौन कह रहा है ई? हाँ। ज़बरदस्ती बात का रुख मोड़ रहे हो ताकि मुद्दे से ध्यान हट जाए। मुद्दा ये कि दोहरा चरित्र काहे दिखाए रहे हो अब? आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे। और कोई गैर हुआ तो चला चलाकर स्क्रीन काली कर दोगे?

सुनो, बड़ी बात लिखने जा रहा हूँ अब। अपने भाई के ख़िलाफ़ ई सब चलाने का साहस बड़े बड़ों में न होता है। सब जानते हैं। बात सिर्फ इतनी है कि ये जो नैतिकता का रामनामी ओढ़कर सन्त बने बैठे हो, इसे अब उतार दो। तीन घण्टे पूरे होय चुके हैं। पिक्चर ओवर हो गई है। अब ई मेकअप उतार दो। नही तो किसी रोज़ चेहरे में केमिकल रिएक्शन होय जाएगा।

और हाँ, मेरी वॉल पर आए के चिल्ल-पों करने वाले रवीश पांडे के चेलों, सुनो। हम किसी ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी पत्रकार से कहीं ज़्यादा इज़्ज़त ज़िले के स्ट्रिंगर की करते हैं। जो दिन रात कड़ी धूप में पसीना बहाकर, धूल धक्का खाकर टीवी चैनल में खबर पहुंचाता है। इस देश के टीवी चैनलों का 70 फीसदी कंटेंट ऐसे ही गुमनाम स्ट्रिंगरों के भरोसे चलता है। न यक़ीन हो तो सर्वे कराए के देख लो। तुम जैसे ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी इन्हीं की उगाई खेती पर लच्छेदार भाषा की कटाई करके चले आते हो और बदले में वाह-वाही लूटकर अपने-अपने एयर कंडिशन्ड बंगलों में दफ़न हो जाते हो। तुम हमे न समझाओ सेलिब्रिटी का मतलब। हम अभी अभी अपने चैनल के इलाहाबादी सेलिब्रिटी से मिलकर लौटे हैं।

इंडिया टीवी में कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

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यह हमला रवीश पर नहीं, आलोचना का साहस रखने वाली पत्रकारिता पर है : ओम थानवी

Om Thanvi : आलोचक उनके लिए दुश्मन होता है; ‘दुश्मनी’ निकालने का उनके पास एक ही ज़रिया है कि आलोचक को बदनाम करो, उसका चरित्र हनन करो। भले वे विफल रहें, पर जब-तब अपनी गंदी आदत को आज़माते रहते हैं। उनकी आका भाजपा की वैसे ही रवीश से बौखलाहट भरी खुन्नस है। रवीश कुमार फिर उनके निशाने पर हैं। रवीश के भाई ब्रजेश बिहार में चालीस साल से कांग्रेस की राजनीति करते हैं।

एक नाबालिग़ लड़की ने एक ऑटोमोबाइल व्यापारी निखिल और उसके दोस्त संजीत के ख़िलाफ़ यौन शोषण का आरोप लगाया। लड़की के पिता भी कांग्रेसी नेता हैं और बिहार सरकार में मंत्री रहे हैं। एक महीने बाद उसने, सीआइडी की जाँच में, ब्रजेश पांडेय का भी नाम “छेड़छाड़” बताकर लिया और एसआइटी को बताया कि जब उसने अपने दोस्तों से बात की तो उन्होंने कहा कि “लगता है” ये सब लोग एक सैक्स रैकेट चलाते हैं। ग़ौर करने की बात यह भी है कि केस दर्ज़ होने के बाद वहाँ के अख़बारों में अनेक ख़बरें छपीं (भाजपाई जागरण में चार बार), लेकिन ब्रजेश पांडे किसी ख़बर में नहीं थे क्योंकि मूल शिकायत में उनका नाम नहीं था।

भले ही ब्रजेश का नाम शिकायतकर्ता ने एफ़आइआर दर्ज़ करवाते वक़्त नहीं लिया गया, न वीडियो रेकार्डिंग में उनका नाम लिया, न ही मजिस्ट्रेट के सामने नाम लिया; फिर भी अगर आगे जाकर एसआइटी के समक्ष छेड़छाड़ और दोस्तों के हवाले से सैक्स-रैकेट चलाने जैसा संगीन आरोप लगाया है तो उसकी जाँच होनी चाहिए, पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए और असली गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सज़ा होनी चाहिए।

लेकिन महज़ आरोपों के बीच सोशल मीडिया पर रवीश कुमार पर कीचड़ उछालना क्या ज़ाहिर करता है? निश्चय ही अपने आप में यह निहायत अन्याय भरा काम है। आरोप उछले रिश्तेदार पर और निशाने पर हों रवीश कुमार? इसलिए कि उनकी काली स्क्रीन कुछ लोगों के काले कारनामों को सामने लाती रहती है?

ज़ाहिर है, यह हमला रवीश पर नहीं, इस दौर में भी आलोचना का साहस रखने वाली पत्रकारिता पर है। पहले एनडीटीवी पर “बैन” का सीधा सरकारी हमला हो चुका है। अब चेले-चौंपटे फिर सक्रिय हैं। इन ओछी हरकतों में उन्हें सफलता नहीं मिलती, पर लगता है अपनी कोशिशों में ख़ुश ज़रूर हो लेते हैं। अजीब लोग हैं।

इस प्रसंग में अभी मैंने बिहार के एक पत्रकार Santosh Singh की लिखी पोस्ट फ़ेसबुक पर देखी है। दाद देनी चाहिए कि उन्होंने तहक़ीक़ात की, थाने तक जाकर आरोपों के ब्योरे जानने की कोशिश की। उन्होंने जो लिखा, उसका अंश इस तरह है:

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“मैंने सोचा पहले सच्चाई जान लिया जाये (इसलिए) पूरा कागजात कोर्ट ने निकलवाया …

22-12-2016 को एसीएसटी थाने में एफआईआर दर्ज होता है जिसमें निखिल प्रियदर्शी उनके पिता और भाई पर छेड़छाड़ करने और पिता और भाई से शिकायत करने पर हरिजन कह कर गाली देने से सम्बन्धित एफआईएर दर्ज करायी गयी। इस एफआईआर में कही भी रेप करने की बात नही कही गयी है …इसमें ब्रजेश पांडेय के नाम का जिक्र भी नही है …

24-12-2016 को पीड़िता का बयान कोर्ट में होता है धारा 164 के तहत। इसमें पीड़िता शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप निखिल प्रियदर्शी पर लगाती है। ये बयान जज साहब को बंद कमरे में दी है। इस बयान में भी ब्रजेश पांडेय का कही भी जिक्र नही है …

30–12–2016 को यह केस सीआईडी ने अपने जिम्मे ले लिया। इससे पहले पीड़िता ने पुलिस के सामने घटना क्रम को लेकर कई बार बयान दिया लेकिन उसमें भी ब्रजेश पांडेय का नाम नही बतायी।।

31-12-2016 से सीआईडी अपने तरीके से अनुसंधान करना शुरु किया और इसके जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया। इस जांच के क्रम में पीड़िता ने एक माह बाद कहा कि एक पार्टी में ब्रजेश पांडेय मिले थे, उन्होने मेरे साथ छेड़छाड़ किया। फेसबुक पर देखा ये निखिल के फ्रेंड लिस्ट में हैं। इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो।

पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है। पहली बार उन्होनें ब्रजेश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया, निखिल का अवारागर्दी की चर्चा खुब किया है। उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई। और इस बार उसकी गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ, जिसमें उन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी, निखिल ने पीड़िता को कोल्डड्रिंक पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे …
मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है। लेकिन उसने ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है, ऐसा बयान नही दिया है।

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मामला जो हो, जाँच जिधर चले मैं फिर कहूँगा कि रवीश जैसे ज़िम्मेदार और संजीदा पत्रकार को इसमें बदनाम करने की कोशिश न सिर्फ़ दूर की कौड़ी (वहाँ कौड़ी भी नहीं) है, बल्कि सिरफिरे लोगों का सुनियोजित कीचड़-उछाल षड्यंत्र मात्र है। ऐसे बेपेंदे के अभियान चार दिन में अपनी मौत ख़ुद मर जाते हैं।

जाने माने पत्रकार ओम थानवी की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Urmilesh Urmil इस मामले में बेवजह रवीश को निशाना बनाने का क्या औचित्य है? अगर कहीं किसी के परिजन पर कोई आरोप लगा है तो कानून की प्रक्रिया के तहत जांच होगी। इसमें सैकड़ों किमी दूर रहने वाले उक्त व्यक्ति के परिवार के एक पत्रकार-एंकर का भला क्या कसूर कि कुछ शरारती तत्व कीचड़ उछालने की कोशिश कर रहे हैं! इस दुष्प्रचार अभियान की जितनी निंदा की जाय, कम है।

Qamrul Hasan Siddiqui Urmilesh ji आदाब। बहुत अफ़सोस होता है ये सब पढ़ कर और देख कर। क्या देश में अब आप निष्पक्ष पत्रकारिता भी नहीं कर सकते। क्या एक पार्टी और विचार धरा की चाटुकारिता ही पत्रकारिता का मतलब रह गया है। पिछले 1 महीने से मैं रवीश के प्रोग्राम देख रहा हूँ। वो पैनापन बिलकुल नहीं दिख रहा है। तनाव और थकान साफ नज़र आ रहा है। हालांकि मैं इस छेत्र में नहीं हूँ फिर भी राजनीती को मैंने भी इमरजेंसी के समय से फॉलो किया है जब मैं इलाहाबाद से बीएससी कर रहा था। उस समय भी माहोल बहुत खराब था। मगर आज तो सोशल मीडिया और टीवी के कारण हर बात बहुत जल्दी फैलती है। इसी का फायदा ये तथा कथित देश भक्त उठा रहे हैं। और जो इनसे सहमत नहीं होता उनके ऊपर ये हुक्का पानी लेकर चढ़ दौड़ते है।

Chandra Prakash Pandey यह एक दलित महिला के शारीरिक उत्पीड़न का मामला है,, जिसमें एक दबंग सवर्ण पर आरोप लगा है,, इस पर रवीश बाबू का एक प्राइम टाइम तो जरूर बनता है, इससे उनकी निष्पक्षता ही साबित होगी और वह शक के दायरे में भी नहीं होंगे,,

Urmilesh Urmil Qamrul Hasan Siddiqui साहब, अपने मुल्क में स्वतंत्र और वस्तुपरक पत्रकारिता करना बहुत कठिन और जोखिम भरा काम है। तभी तो हम प्रेस फ्रीडम के मामले में 2016 के ताजा सूचकांक में 180 देशों की सूची में 133 वें नंबर पर हैं।

Om Thanvi मुख्य आरोप (बलात्कार का) जिस रईसज़ादे निखिल और उसके मित्र पर है, उसे परे रख आप उस व्यक्ति को ही आरोपी मान लें जिस पर अनुचित रूप से छूने का आरोप है (वह भी बेशक आपराधिक काम है) तो इसे आपका दुराग्रह न मानें तो क्या मानें? हो सकता है आपकी कोई रार हो, पर पीड़िता से आपको कोई सहानुभूति नहीं, वरना उन रईसज़ादों को आड़ न देते।

Chandra Prakash Pandey Om Thanvi यह एक दलित महिला के सम्मान की बात है,, कृपया इसे हल्के में न लें,, इस बारे मे श्रीमान रवीश जी को एक प्राइम टाइम कर दूध का दूध और पानी का पानी कर देना चाहिए,, और अपने भाई पर दलित महिला द्वारा लगाये कथित आरोपों को गलत सिद्ध कर देना चाहिए,,

Ashutosh Tripathi ग़लत सिद्ध करने का काम वक़ील का है और वो भी कोर्ट मे। न्यूज़ स्टूडियो कोर्ट नही है। अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली मे ससुराल के झगड़े के हवाले से एक विधायक को जेल मे डाल दिया गया था। बाद मे पुलिस की किरकिरी हुयी और छूट गये।…See more

Chandra Prakash Pandey Ashutosh Tripathi अभी तक तो हम देख रहे थे कि रवीश बाबू न्यूज़ रूम में ही कोर्ट लगाते थे,, अब इसमें भी एक प्राइम टाइम तो बनता है,, बड़े भाई

Ashutosh Tripathi रवीश पर न्यूज़ रूम मे कोर्ट लगाने का इल्ज़ाम तो नही लगा सकते। उनके पैनल मे तो विषय विशेषज्ञ ही रहते है, पार्टियों के वक़ील नही।

Subir Khanna इससे ये तो पता चला की आप जैसे पत्रकारों की पत्रकारिता किस तरह 10 जनपथ की गुलाम है. रविश विधान सभा चुनाव में अपने भाई का प्रचार करने गए थे उन्हें अब सामने आकर माफ़ी मांगना चाहिए. अब आपको जाँच और कानून याद आ रहा है पहले तो सिर्फ आरोपो पर स्टूडियो में बैठ कर खूब चिल्लाते थे……..

Om Thanvi दलित बच्ची की न्याय दिलाना है तो उन बलात्कार के दो आरोपियों का नाम लो, जो आप अब तक नहीं ले रहे। आप तीसरे छेड़खानी के आरोपी के भी भाई के पीछे टहल रहे हैं। यह दलित बच्ची को न्याय दिलाना नहीं है, मुख्य आरोपियों से ध्यान भटकाना है। झूठ गढ़ना और फैलाना भी एक मानसिक बीमारी है।

Chandra Prakash Pandey Om Thanvi जी दलित महिला ने एक आरोप लगाया है,, जिसका संज्ञान पुलिस/न्यायालय ने लिया है,, जिस व्यक्ति का नाम आया है वह बिहार कांग्रेस का उपाध्यक्ष है,, अब यह कोई सामान्य घटना नहीं है,, हो सकता है कांग्रेस की सरकार के चलते पुलिस प्राथमिकी में यह बात दबा दी गई हो,, यह जाँच का विषय है,, इसे सिरे से नकार देना या झूठा कह देना एक दलित महिला के प्रति अन्याय होगा,, रवीश NDTV को इसे प्राइम टाइम का विषय बनाना चाहिए,, बाकी आप वरिष्ठ हैं और गरिष्ठ भी,, चाहें तो इस बात को हज़म भी कर सकते हैं,,

Ratan Pandit इस प्रकरण में सवर्णों का दलित प्रेम देखते ही बन रहा है कारन गंगा मइया जाने

Om Thanvi आपको कुछ पता नहीं है, मैं जवाब देता हूँ तो फिर कुछ लिख देते हैं। वह महिला नहीं है, नाबालिग़ बच्ची है। प्राथमिकी कांग्रेस सरकार के चलते दबा दी गई होगी? कांग्रेस की सरकार बिहार में कितने वर्ष पहले थी पहले मालूम कर लीजिए। मामला तीन महीने पहले का है। और प्राथमिकी पढ़ भी लीजिए, उसमें दो ही नाम हैं, व्यापारी निखिल और संजीत का। नेता का नाम नहीं है। जिनका है उनके ख़िलाफ़ एक शब्द आपके मुँह से नहीं टपकता है।

Abhay Saxena शायद कुछ लोग रवीश कुमार को टीवी एंकर /पत्रकार नही बल्कि मंत्री या किसी पार्टी का अध्यक्ष समझ रहे हैं जो उनके भाई पर लगे आरोप पर सफाई देने को कह रहे हैं ! रवीश के भाई के तथाकथित अपराध के लिये रवीश पर आरोप लगाना कुछ ऐसा ही है जैसे किसी की महानता की तारीफ इस तरह की जाये कि “इतनी बड़ी पोस्ट मे हैं पर इनके भाई छोटा सा धंधा कर रहे हैं”। प्राइम टाइम की बहुत डिमांड हो रही है ! ISI certified ध्रुव सक्सेना के “DNA” की कोई फरमाइश नही कर रहा है!

Om Thanvi बेतुकी “डिमांड” है। न सिर न पैर।

Rakesh Singh सक्सेना जी ध्रुव सक्सेना के पीछे राबिया नाम की महिला का नाम आ रहा है। क्या आप नही जानना चाहेंगे कि कही बड़े भाई के पीछे छोटे का तो हाथ नही ?

Chandra Prakash Pandey एक प्राइम टाइम तो बनता है,, दलित महिला के शारीरिक उत्पीड़न का मामला है,, और पत्रकारिता का तक़ाज़ा भी है,, वैसे उन्होंने कैराना, धूलागढ, केरल, बंगाल में हो रही आरएसएस के स्वंसेवकों की दर्जनों हत्याओं, पर भी चर्चा नहीं करी,, ये उनका चैनल है उनके मालिक का विशेषाधिकार है क्या दिखायें और क्या छिपायें,, MSM भी एक धंधा है और धंधा प्राफिट के लिए किया जाता है,, फिर उसमें नैतिकता की बात करना बेमानी है,, बेतुकी है,,

Somu Anand Om सर . प्रणाम । आप बार-बार निखिल प्रियदर्शी और संजीत के नाम लिए जाने की बात करते हैं। सही है, नाम लिया जाना चाहिये लेकिन नाम उनका भी लिया जाना चाहिए जो सार्वजानिक मंचों से नैतिकता की दुहाई देते रहे हैं । हमने कभी निखिल प्रियदर्शी या संजीत को महिला कल्याण की बात करते नहीं सुना (हालांकि इसका अर्थ यह नही की उन्हें दुष्कर्म करने की आजादी है) लेकिन ब्रजेश बाबु को सुना है, इसीलिए उनका नाम तो आएगा ही और दूसरे किसी आरोपी से ज्यादा आएगा। हो सकता है कि आपको सोशल मीडिया पर हो रही बहस सड़कछाप लगे लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ता और पत्रकारिता के साझेदारी से किसी आरोपी को बचाने की कोशिश को नाकाम यही सोशल मीडिया करती है।

Prabhat Ranjan आज इन्डियन एक्सप्रेस ने ब्रजेश पांडे की खबर को पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा है. आप जिस तरह से लिख रहे हैं बताने की कोशिश कर रहे हैं बात उतनी एकतरफा नहीं है.

Om Thanvi एक्सप्रेस की ख़बर में एक भी बात ऐसी नहीं है, जो मैंने नहीं लिखी। यह ख़बर भी पुलिस के हवाले से यही कहती है कि एफ़आइआए दो महीने पहले दर्ज हुई थी, पर ब्रजेश पांडेय का नाम तीन हफ़्ते पहले एसआइटी के सामने लिया गया, कि निखिल ने बलात्कार किया (जो आरोप एफ़आइआर में भी था), पांडेय ने अनुचित ढंग से छुआ (जो आरोप एफ़आइआर में नहीं था)। … मैंने साफ़ लिखा है कि क़ानून अपना काम करे, पीड़िता को न्याय मिले, अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा – मगर इसमें रवीश को क्यों घसीटा जा रहा है? … आपको मेरी बात में इकतरफ़ा क्या लगा, ज़रा स्पष्ट कीजिए।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर, एकतरफा इसलिए क्योंकि न्याय की लड़ाई लड़ने वाले रवीश कुमार को इस के बारे में भी बोलना चाहिए. आप लोगों के लिखने से लगता है जैसे वह कोई मसीहा हो. वैसे जिस संतोष सिंह का आप हवाला दे रहे हैं वह बिहार चुनाव के समय रवीश कुमार के साथ अपनी फोटो लगाकर यह भी लिख चुका है कि वह उनका कितना बड़ा फैन है. इसलिए मैंने एकतरफ़ा कहा. अपनी बात को पुष्ट करने के लिए आप जिन तथ्यों का सहारा लेता हैं उससे ही यह जाहिर हो जाता है कि आप क्या कहना चाह रहे हैं.

Sarvapriya Sangwan आपके घर में जिस-जिस पर जो मुकदमा चलता है, आप लेख लिखते हैं उस पर?

Prabhat Ranjan Sarvapriya Sangwan जी, जब चलेगा और मेरा नाम आएगा तो लिखूँगा। दुर्भाग्य से अभी तक चला नहीं है। ना मैं इतनी बड़ी शख़्सियत हूँ

Sarvapriya Sangwan क्यों बड़ी शख़्सियत पर ही ये ज़िम्मेदारी है? खोजने चलेंगे तो एक ऐसा घर भी ऐसा नहीं मिलेगा जिन पर मुक़दमे ना चल रहे हों। ज़िन्दगी बहुत लंबी है, भगवान ना करे कि आपके परिवार पर या आप पर कोई कीचड उछले लेकिन हुआ तो आप ज़रूर टीवी पर चलवाइयेगा।

Om Thanvi आपका तर्क इतना हास्यास्पद है कि साथी हैं इसलिए जवाब देता हूँ, वरना इसके योग्य नहीं। आरोप भाई पर, जवाब उनके परिजन देंगे? कितने परिजन देंगे? कल आप कहेंगे वे सज़ा भी भुगतें! यह तो संघ वाले अभी से कर रहे हैं, कि उन्हें विवाद में घसीट रहे हैं। वही काम आप करें अच्छा नहीं लगता।

Urmilesh Urmil मुझे भी प्रभात रंजन जैसे समझदार व्यक्ति और सक्रिय रचनाकर्मी की टिप्पणी पर अचरज हो रहा है!

Prabhat Ranjan Urmilesh Urmil सर मुझे थानवी जी पर आश्चर्य हो रहा है. जिस तरह से उन्होंने संतोष सिंह की बात को साझा किया. संतोष सिंह के बारे में वे जानते कितना हैं? भारत की राजनीति में परिवारवाद की बात बार बार तंज़ में उठाने वाले पत्रकार का परिवारवाद नहीं है यह(रवीश के सन्दर्भ में)? थानवी जी ने लिखा है कि ब्रजेश जी 40 साल से राजनीति कर रहे हैं. ब्रजेश जी की उम्र क्या है? सर यह जनतांत्रिक मंच है अगर कोई एकतरफा बात करेगा तो दूसरा भी सवाल उठाएगा ही न. मैं आपका और थानवी जी दोनों का बहुत सम्मान करता हूँ लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि रवीश जी का भी करूं. उनकी पत्रकारिता का बहुत बड़ा संबल उनका नैतिक होना रहा है. जिसके कारण मैं भी उनका बेहद प्रशंसक था लेकिन इस पूरे प्रकरण से उनकी वह नैतिक छवि दरक रही है. आप एक झटके में सबसे अलग नहीं हो सकते. बिहार में तो भाजपा की सरकार भी नहीं है फिर कौन ब्रजेश जी को फंसा रहा है. पंक्तियों के बीच में भी बहुत सारी पंक्तियाँ होती हैं सर

Sarvapriya Sangwan ब्रजेश पांडेय को कौन फंसा रहा है या नहीं फंसा रहा है, वो तो जांच के बाद सामने आ जायेगा। क्योंकि जांच चल ही रही है। वो अपने पद से इस्तीफा भी दे चुके हैं। लेकिन रवीश कुमार को आप फंसा रहे हैं। राजनीति के परिवारवाद को समझते हैं आप? इस जवाब से लगता है कि आप सिर्फ उत्तेजना में किसी भी तरह रवीश को गुनहगार साबित करना चाहते हैं। इस चक्कर में आप ज़रूर अतार्किक दिख रहे हैं। मुझे भी बहुत हैरानी हुई। लेकिन ठीक है, ऐसे किसी वक़्त में ही व्यक्ति का स्टैंड पता चलता है। आपके कुछ कहने से उनकी नैतिकता या उनका ‘ब्रैंड’ एक पॉइंट भी कम नहीं होगा।

Prabhat Ranjan Sarvapriya Sangwan जी, मैं क्षमा चाहता हूँ लेकिन जिस तरह से थानवी जी ने संतोष सिंह नामक बिहार के पत्रकार के हवाले से लिखा मुझे उससे दुःख हुआ. उनको उसके बारे में जानना चाहिए था पहले. यह भी नैतिकता का तकाज़ा होता है

Om Thanvi संतोष सिंह को जानने की क्या ज़रूरत? पत्रकार हैं और एफआइआर और अब तक की जाँच के दस्तावेज़ ले आए यही अहम बात है। इसी से स्पष्ट हुआ कि मूल शिकायत में ब्रजेश कहीं थे ही नहीं। रेकार्ड हुए बयान में भी नहीं। फिर, रवीश ख़ुद इस मामले में हैं कहाँ? यही तो बात है। मुख्य आरोपी का आप नाम तक नहीं लेते। बस रवीश और उनके भाई। आपकी गाँठ भी वहीं लगी है जहाँ संघ/भाजपा वालों की है। उन्हें तो कोई हिसाब चुकाना होगा, आपको?

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर, मुझे क्या हिसाब चुकाना है. लेकिन यह एक नैतिक सवाल है जो मैं बार बार उठाऊंगा क्योंकि रवीश जी पत्रकारिता की धुरी नैतिकता रही है. उनके ऊपर किसी तरह का सवाल नहीं उठा रहा हूँ. उनके उस नैतिक बल पर सवाल उठा रहा हूँ जिसके कारण उनकी आवाज में हम जैसे कमजोर अपनी आवाज को महसूस करते रहे हैं.

Sarvapriya Sangwan प्रभात जी, संतोष सिंह रवीश के फैन हो सकते हैं लेकिन उन्होंने केस से जुड़े तथ्यों का ज़िक्र किया है। अगर आपको शक़ है तो आप भी तो पता करवा सकते हैं कि ऐसा है या नहीं। अगर वो तथ्य गलत हैं तब आप भी बोलिये, मैं भी बोलूंगी। बाकी जब जांच चल ही रही है और उसको किसी तरह प्रभावित नहीं किया जा रहा तो ज़बरदस्ती अपने घरवालों के लिए मुसीबत कोई क्यों बढ़ाएगा। आप अपने वकील से परामर्श लेंगे, उसकी बात मानेंगे या यहाँ सोशल मीडिया पर शुरू हो जायेंगे? मतलब एक तरीके की बात करिये सब पहलू सोच कर। रवीश कुमार पर तो कोई आरोप है ही नहीं। ज़बरदस्ती आरोप क्यों? लिखेंगे तो कहा जायेगा कि वो बचाव कर रहे हैं, मीडिया का सहारा लेकर प्रभावित कर रहे हैं। नहीं लिख रहे हैं तो आप लोग उन्हें और परेशान कर रहे हैं। अपने ऊपर लेकर सोचिये पहले।

Prabhat Ranjan Sarvapriyaजी, संतोष सिंह की विश्वसनीयता के ऊपर मुझे संदेह है. बाकी थानवी जी यही बात अगर इन्डियन एक्सप्रेस के हवाले से लिखते तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होती. आपसे फिर माफ़ी.मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी. मैं भी उनका बड़ा प्रशंसक हूँ. अब नहीं लिखूंगा

Rakesh Rk दिल्ली में काम कर रहे रवीश कुमार को बिहार में रह रहे और कार्यरत उनके भाई के मामले में घसीटना ऐसा ही है जैसा आजकल दहेज विरोधी क़ानून का सहारा लेकर कुछ महिलायें अपने पति, सास-ससुर, ननद, देवर सहित ससुराल पक्ष के उन सभी सम्बन्धियों को नाप देती हैं जो वहाँ से सैंकड़ों मील दूर रहते हैं| अगर रवीश अपने नाम और रुतबे का फायदा उठाकर अपने भाई के पक्ष में जांच को प्रभावित कर रहे हैं जैसे कभी दिल्ली में एक कश्मीरी मूल की दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ राही लड़की के रेप में आरोपी युवक के आईपीएस पिता कर रहे थे तब तो उन पर उंगली उठाना सही भी हो सकता है| रवीश के भाई के मामले में यदि कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति उन्हें बचाते हुए शिकायतकर्ता युवती को डरा धमका रहा है तब तो रवीश पर इस केस के बारे में कुछ लिखने बोलने या कार्यक्रम करने का दबाव आता है, वैसे क्यों आएगा? देश में रोजाना हजारों शिकायतें होती होंगी पुलिस में क्या रवीश कुमार सबकी रिपोर्टिंग करते फिरेंगे? उनके विरोधियों को तफसील से और बारीकी से जांच करके उन्हें वहाँ पकड़ना चाहिए जहां वे अपने भाई के खिलाफ जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हों| बाकी उन्हें इस घटना से जो दुख पहुंचा होगा उस दुख को वे लिख कर सबसे साझा करें न करें यह उन पर एक सभी समाज को छोड़ देना चाहिए| अभी तक तो उनकी नैतिकता पर इस केस की छवि का कोई वाजिब दबाव है नहीं|

Om Thanvi संतोष सिंह के पास जो दस्तावेज़ हैं, उनकी विश्वसनीयता मायने रखती है। वे मैंने देखे हैं, तभी लिखा। वे प्रामाणिक हैं। उन्हें लगा देता, पर पीड़िता का नाम उजागर नहीं होना चाहिए।

Prabhat Ranjan Om Thanvi आज इन्डियन एक्सप्रेस में भी उसी तरह की खबर थी सर. आपको प्रमाणिक स्रोत का इस्तेमाल करना चाहिए था. ऐसे स्रोत का नहीं जिसको आप जानते ही न हों. किसी मामले में किसका नाम कब आ जाये यह तो जांच से पता चलता है. शीना बोरा काण्ड में बहुत बाद में पीटर मुखर्जी का नाम आया और बाद में वे ही मुख्य अभियुक्त निकले. ब्रजेश पांडे का नाम लेकर उस लड़की ने कोई गंभीर आरोप नहीं लगाये हैं, बलात्कार का तो नहीं ही लगाया है. लेकिन लड़की नाबालिग है, दलित है. यह मामला बहुत संवेदनशील है. आप से हम बहुत उम्मीद रखते हैं. ऐसे नहीं कि किसी कशिश न्यूज के पत्रकार को आप सबसे विश्वसनीय मान लें.

Bawari Sudipti हिंदी पब्लिक स्फीयर में एक ‘रविश सिंड्रोम’ है। जाने किस-किस की कुंठा को तुष्टि मिल रही है।

Prabhat Ranjan सच कह रही हैं मैं बहुत कुंठित हूँ।

Bawari Sudipti आपका नाम मैंने नहीं लिया, बेवजह मुझे अपनी कुंठा में न घसीटें

Prabhat Ranjan जी ठीक है माफ़ी आपसे।

Om Thanvi तो आप हमें पत्रकारिता भी सिखाने लगे! बंधु, एक्सप्रेस की ख़बर आज छपी है, कल आधी रात की पोस्ट के लिए एक्सप्रेस सपने में आता क्या? दूसरी बात, संतोष सिंह ने मूल एफआइआर और अन्य दस्तावेज़ दिए, उन्हें उद्धृत भी किया। मेरे लिए वह प्रामाणिक स्रोत था। आप आज एक्सप्रेस पढ़कर जागे हैं, मैं कल टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के बाद दस्तावेज़ पाने में जुटा था। पोस्ट सुबह लिख दी थी, दस्तावेज़ रात को मिले।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर जो मैं जानना चाहता था आपने वह बता दिया। संतोष रवीश जी का भक्त है। उसने इस मामले में अतिरिक्त मेहनत की।

Om Thanvi अच्छा किया। इससे संतोष सिंह के प्रति मन में आदर अनुभव हुआ।

Prabhat Ranjan सर दो बातें हैं एक तरफ़ आप यह कह रहे हैं कि पाण्डे जी निर्दोष हैं दूसरी तरफ़ यह भी कि रवीश का इस मामले से कोई लेना देना नहीं। पाण्डे जी के प्रति आपकी यह अतिरिक्त सहानुभूति क्यों है?

Purnanand Singh डूबते को तिनके का सहारा।। जिन कुंठाग्रस्त लोगों को रविश और उनकी पत्रकारिता से नफ़रत है,आज उनके भाई पर लगे आरोप से ही मोर बन कर नाचने लगे हैं।। मानसिक दिवालियेपन का इससे अच्छा उदाहरण और क्या मिलेगा।।

Sanjaya Kumar Singh अगर रवीश के मामले में संतोष सिंह की खबर पर यकीन नहीं किया जाए तो इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर भी नहीं करना चाहिए। कुल मुद्दा यह है कि रवीश के भाई राजनीति में हैं, उनपर राजनीतिक मामला है उन्होंने राजनीतिक कार्रवाई की, इस्तीफा दे दिया। भाजपा में लोग इतना भी नहीं करते। जहां तक रवीश के इसपर लिखने-बोलने की बात है – यह एनडीटीवी की संपादकीय नीति का मामला होगा कि कर्मचारी अपने रिश्तेदार के बारे में खुद क्या करे, स्पष्टीकरण वही दे या क्यों दे आदि। रवीश को इसपर ब्लॉग लिखना चाहिए। उसके हिसाब से अभी देर नहीं हुई है। पांडे जी निर्दोष हैं यह कोई नहीं कह रहा। उनपर जो मामला है वह कितना बड़ा है यह तय होना है।

Himanshu Luthra इतनी बढ़िया बहस फेसबुक पे बहुत ही काम पड़ने को मिलती है।। salute to all of you.. अगर फेसबुक का इस तरह से उपयोग किया जाये तो सच में ये main stream media को कोसों पीछे छोड़ देगा।।।

Om Thanvi पांडेय जी निर्दोष हैं, यह मैंने कहा? ऐसी बेसिरपैर की बहस ही फ़ेसबुक को सड़कछाप बनाती है और मैं इससे जब-तब हट जाना चाहता हूँ। आप इतना साफ़ झूठ कैसे बोल सकते हैं? मैंने तो कल ही लिखा है। आज भी सब सामने रखा है। ज़रा वह पंक्ति निकाल कर बताइए जहाँ मैंने किसी को भी दोषी या निर्दोष ठहराया हो। यह मेरा काम नहीं है, अदालत का है। शब्द मुझ पर थोपिए मत।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर अब आपने सड़क छाप कहा है तो सादर बहस से हटता हूँ। लेकिन दो बात फिर – मैंने आपसे हमेशा दो सवाल पूछे आपने सुविधानुसार एक जवाब दिया। ऊपर मैंने एक विरोधाभास की तरफ़ इशारा किया था। आपने जवाब में एक सवाल किया। दूसरी बात सिर्फ़ ऊपर किए गए एक सवाल की याद दिलाता हूँ- मैंने पूछा था पाण्डे जी अगर 40 साल से राजनीति कर रहे हैं तो उनकी उम्र कितनी है? इस सवाल का जवाब भी आप टाल गए थे। आपको मेरे जैसे सड़क छाप के लिए इतना समय व्यर्थ करना पड़ा इसके लिए माफ़ी।

Om Thanvi मेरा दायित्व नहीं है कि मैं हर सवाल का जवाब दूँ। पर आपको क्या स्पष्ट नहीं करना चाहिए आपने कहाँ पढ़ लिया कि मैंने कहा है पाण्डे जी निर्दोष हैं? बिना सोचे बिना आधार कुछ भी बोल देना क्या ज़ाहिर करता है? एक संगीन आरोप (कि आरोपी को निर्दोष बता दिया) हवा में मढ़ देना बेवक़ूफ़ाना है। अब जवाब देते क्यों नहीं बनता? जवाब कोई हो नहीं सकता क्योंकि मैंने कभी किसी आरोपी को निर्दोष बताया नहीं। न मेरा काम है न बता सकता हूँ।

Mohammad Hasan Omji मुझे नहीं लगता कि आपका तारकिक विशलेसन रंजन जैसे धीढ़ पत्रकारों को कोई समझ दें पायेगा. कोयला कितना ही द्दोया, पोता या जलाया जाये यूँ ही रहेगा, धुन्वा देगा या राख बनेगा. निचले स्तर के पत्रकार लगते हैं. रवीश जी से इर्षा रखते हैं. आपका support अहम बात है. आपसे बहस में निखार आया.

Prabhat Ranjan Om Thanvi सबकी भाषा ठीक करने वाले सर आपने संतोष सिंह की भाषा को कैसे बर्दाश्त किया। वह हर दूसरा शब्द अशुद्ध लिखता है। आप ग़लत बयानी करेंगे और कोई पूछेगा तो कहेंगे हर सवाल का जवाब देना आपका दायित्व नहीं है। जिस ब्रजेश पांडे के बारे में आपने लिखा कि वे 40 साल से राजनीति में हैं आप पहले उनकी असलियत पता कीजिए वे कब राजनीति में आए और कैसे इतनी जल्दी प्रदेश कोंग्रेस के उपाध्यक्ष बन गए।

Om Thanvi जब तथ्य देखने हों तब भाषा की त्रुटियां बीनने वाला मूल मुद्दे से आँख चुराने वाला या उस पर परदा डालने का ख़्वाहिशमंद ही होगा। 40 मुद्दा नहीं है। फिर भी ग़लत है तो पहले आप इसे साबित करें। आपके हर आरोप में मूल मुद्दे को भटकाने की कोशिश है, मैं इसमें आपको सहयोग नहीं करूँगा। और हाँ, आपने अब तक नहीं बताया कि मैंने पांडेय को निर्दोष कब बताया? अगर इतना संगीन आरोप आपने मुझ पर हवा में लगा डाला तो मान लीजिए, 40-50 आड़ में मत दुबकिए।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर आपने निर्दोष सीधे सीधे नहीं कहा लेकिन पाण्डे जी के मामले में एफआईआर की प्रति मँगाकर इस मामले पर आनन फ़ानन में लिखने का क्या आशय था? आप समझ नहीं पाए संतोष की वह एफआईआर की प्रति बहुत लोगों के पास थी। मेरे पास भी थी। जो ज़ाहिर है जानकी पुल के लिए किसी और स्रोत से आई थी। अब मैं विराम देता हूँ। आपका आदर करता रहा हूँ इसलिए दुःख हुआ। सादर

Rakesh Rk ऐसा लगता है हिन्दी जानने समझने वाले भी फेसबुक जैसे माध्यम पर या तो मन के आक्रोश के कारण या जल्दबाजी के कारण सरल हिन्दी में लिखे का सही अर्थ नहीं निकाल पाते| ऊपर एक टिप्पणी में लिखा गया ” ऐसी बेसिरपैर की बहस ही फ़ेसबुक को सड़कछाप बनाती है ” उसे इस तर्क बहस में एक सज्जन ने ऐसे पढ़ा कि उन्हें सड़कछाप कहा गया है| 🙂

Nitin Thakur रवीश कुमार के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो रिश्तेदारों पर लगे इल्ज़ामों के दम पर ही राजनीति शुरू कर दी गई। जैसे केजरीवाल के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो विधायकों को ही औने-पौने मामलों में फंसाया जाने लगा था। ये एक रणनीति है और इसे एक पक्ष हमेशा दूसरे के खिलाफ अपनाता ही है। ब्रजेश दोषी हैं या नहीं ये तो मामला ही अलग है और वैसे भी रवीश के विरोधियों को इसमें दिलचस्पी है भी नहीं।

Pankaj Chaturvedi जो निहाल चंद पर मुंह में दही जमा कर बैठे है। वे ऐसे झूठ गढ़ने में संजीदा हैं

Nitin Thakur कच्छ में भी आला भाजपा नेताओं पर लड़कियां सप्लाई करने का मामला है। अब तक उस पर भी ऱाष्ट्रीय नेताओँ का बयान नहीं आया है।

Chandra Prakash Pandey यह तर्क अच्छा है,, जब तक निहालचंद पर मुकम्मल कार्यवाही न हो जाये,, तब तक सभी महिला उत्पीड़न व बलात्कार के केस मुल्तवी कर देने चाहिए

Pankaj Chaturvedi Chandra Prakash Pandey भगवन किसने कहा कि गायत्री प्रजापति को पकड़ कर जेल मत भेजो लेकिन सूप तो सूप, छलनी भी बोले जिसमे ९५६ छेद

Chandra Prakash Pandey Pankaj Chaturvedi प्रभु आपने स्वयं लिखा है कि यह झूठ गढ़ा गया है,, फिर आगे कोई जाँच की बात ही बेमानी है,,

Pankaj Chaturvedi Chandra Prakash Pandey गयात्री प्रजापति वाला मसला अलग अहि, हाँ जांच तो होनी चाहिए सच की और झूठ कि लेकिन उससे पहले रवीश कुमार को उसमें लपेटने वाले निहाल चंद पर चुप क्यों हैं

Chandra Prakash Pandey Pankaj Chaturvedi आपने लिख ही दिया कि रवीश का मामला झूठा है फिर कैसी जाँच और कौन सी जाँच ,, हाँ दलित महिला पर झूठा केस करने पर उसपर मुक़दमा दर्ज होना चाहिए,, और जाँच होनी चाहिए,,

Nitin Thakur ब्रजेश की जांच हो.. रवीश का ट्रायल क्यों हो पांडे जी?

DrVibhuti Bhushan Sharma ये तो होना ही था, इसमें कैसा आश्चर्य! रवीश कुमार ने सच्चाई कही, बुराई को आईना दिखाया तो भुगतना ही होगा।।  फासीवादी ताकतों से भला क्या उम्मीद की जा सकती है। ये लोग महान षड्यंत्रकारी हैं।  शुक्र है आरोप रवीश के भाई पर ही लगे, आश्चर्य तो इस बात पर होना चाहिए कि अभी तक रवीश क्यों बचे हुए हैं?
“भारत में अगर रहना है। ।
मोदी मोदी कहना है।।”
मोदी की आलोचना करने वालों के लिए पाकिस्तान अथवा जेल भेजा जाएगा।।
चयन आपको करना है।
मोदी सरकार में मोदी की आलोचना एक अपराध है और अपराध करोगे तो भुगतोगे।
आप सब लोगों ने बहुत सालों तक आलोचना करने का आनंद उठाया है ये अब नहीं चलेगा। अब अगर सच्ची आलोचना भी की तो धरे जाओगे। देश यूँ ही नहीं चलता।।
मोदी जी की और स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता जग जाहिर नहीं की जाएगी। चाहे वो सफेद झूठ कहें। भाजपा के नेता चाहे गंभीर आरोपों में लिप्त हों सब न्यायालय द्वारा बरी कर दिए गए या कर दिए जाएगें। चाहे उन्हें तड़ीपार का तमगा मिला हो। इसे कहते हैं सत्ता चलाना।।
“सत्ता की ताकत तुम क्या जानो रवीश बाबू।।”
लेकिन रवीश भाई चिंता मत कीजिए, हम इस भयावह दौर मे भी आपके साथ हैं।
“रात भर का है मेहमाँ अंधेरा।
किसके रोके रूका है सवेरा।।”

Dhirendrapratap Dhir आज तक का रिकॉर्ड गवाह है कि इस राष्ट्रवादी गिरोह ने जो भी कीचड दूसरों पर उछाला है, वह इसी के मुंह पर आ कर गिरा है. इनसे हम इतर आचरण की उम्मीद कर भी नहीं सकते इस लिए रवीशजी से यही कहेंगे कि मन ख़राब न करें और अपने नागरिक-अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिकार करें और अपना कार्य पूर्ववत करें लोग अब पहले की तरह जड़ नहीं हैं और वे जवाब देंगे.

Kishor Joshi बिल्कुल सर, इस मामले में रवीश को निशाना बनाने का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन माफ कीजिएगा सर, यहां आपका डबल स्टैंर्डड साफ नजर आता है। आपकी और थान्वी सर (ट्वीट भी) की कई ऐसी पोस्ट हैं, जहां आप कोई भी छोटी से छोटी हो या बड़ी से बड़ी घटना हो तो उसके लिए इनडायरेक्ट वे में सीधे-सीधे मोदी या संघ को जिम्मेदार भी ठहरा देते हैं, भले ही वह देश के किसी भी हिस्से में घटित हुई हो, तब आप ये नहीं कहते कि पीएम या अन्य को इस मामले में निशाना बनाने का क्या औचित्य है?

Yogesh Nagar इस भक्ति काल में ‘सबसे बड़े कुमार’ ने भी ऐसे भक्त जुटा लिये हैं जो सेक्स रैकेट के भी जस्टिफिकेशन खोज ला रहे हैं। यह पत्रकारिता का चरमोत्कर्ष है। (भारी शर्मिंदगी)

Pankaj Pathak आपको भी पता चल गया गुजरात वाला मामला?

Om Thanvi आप सेक्स रैकेट लिखने से पहले कथित या आरोप शब्द तक नहीं लिखते, यह है आप कि न्याय-बुद्धि। और रिश्तेदार पर आरोप पर पत्रकार को निशाना बनाना चाहते हैं मगर ख़ुद एक बलात्कार के आरोपी निहालचंद को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शोभित करते हैं? शर्म तुमको मगर नहीं आती…

विक्की शरण सर ये तारिक फत्तेह के भक्त हैं।

Yogesh Nagar हाँ सही बात लेकिन क्या ये खबर उक्त ब्लेक स्क्रीन वाले कुमार साहब उसी निष्पक्षता के साथ दिखाएंगे? जिस निष्पक्षता का वे दम्भ भरते है यहाँ सवाल ये है justification को लेकर… और आप मेरे कॉमेंट को तुरंत बीजेपी के साथ जोड़ रहे है बगैर किसी आधार के यह है आपकी न्यायिक बुद्धि,यह आपकी कैसी निष्पक्षता है जो एक पत्रकार को लेकर की गयी मेरी टिप्पणी पर निहालचंद का udharan देने लगे?

Pankaj Pathak Yogesh Nagar जी, कितने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मीडिया में जगह मिलते देखा है आपने? एक राजनीतिक हितों से आरोप लगाने वाले मामले को बेवज़ह तूल सिर्फ इसलिये मिल रहा है क्योंकि Ravish Kumar ने निष्पक्ष पत्रिकारिता करते हुए सत्ता पक्ष को अक्सर कटघरे में ही खड़ा किया है, चाहे वो 2014 से पहले का काल हो या बाद का। है किसी और पत्रकार में इतना दम?

Om Thanvi Yogesh Nagar क्योंकि आप उसी जमात के साथ जा खड़े हुए हैं।

Yogesh Nagar बिलकुल देखा है,दादरी मामला राष्ट्रीय मामला था? लेकिन बंगाल मामला लोकल मामला था कुमार जी की नज़र में ज़ी न्यूज़ के पत्रकार पर fir हुई,जागरण के पत्रकार की up में गिरफ़्तारी हुई तब मिडिया का गला नही घोटा गया यह है उनकी निष्पक्षत! थानवी जी मेरे आपके इतर राय रखते ही मैं कैसे उसी जमात में शामिल हुआ? आप तब कहते जब मैं बीजेपी इत्यादि का नाम लेता मैंने भक्तिकाल शब्द का प्रयोग किया जो निष्पक्षता की ओर इशारा करता है

Santosh Singh योगेश जी आप सही कह रहे है हमारी तो ये आदत में सुमार है राजा हरिशचन्द्र कि कहानी याद है ना राम सीता और धोबी याद है ना

Rajendra Kulashri पूरी पोस्ट में किसी न किसी बहाने से बृजेशकुमार साहब को बेगुनाह साबित करने की को़शिस है।

Om Thanvi रवीश के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया में चलाए गए कुत्सित अभियान की बात है; आरोप की बात जाँच एजेंसियाँ जानें या अदालत।

Rakesh Rk रवीश कुमार के परम्परागत विरोधी जैसे चाहे ऑनलाइन मुहीम चलायें उनके खिलाफ परन्तु वास्तविकता में तो उनके भाई का मामला बिहार की लोकल पुलिस और कोर्ट देख रहे होंगे, और वहाँ जद यू और राजद का शासन है| उन्हें तो रवीश कुमार से व्यक्तिगत रंजिश नहीं होनी चाहिए| वे तो न्याय की सही तसवीर सामने ला ही सकते हैं|

Shubham Upadhyay फ़िल्म द राइज़ ऑफ़ ईविल में अंत में हिटलर के पागलपन के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार को गोली मार दी जाती है । ये दौर भयावह है । नितीश बाबू की शराबबंदी टाइप हो गया । करे कोई और भुगते कोई और

Anil Chaurasia जो जो लोग साहेब और उनकी पार्टी की आलोचना करेंगे वो वो इन लोगों की गैंग के शिकार होंगे इसमें अचरज की कोई बात नहीं , रवीश भी इनके लिए अनोखी बात नहीं.  इनकी इस प्रवृत्ति का परदा फाश होना ज़रूरी है.

Vinod Kumar Singh सर आप से पूर्ण सहमति। आशा है कि कम से कम बुद्धिजीवी वर्ग सिर्फ आरोपों पर नहीं बल्कि पूर्ण जाँच के बाद दोषी सिद्ध होने पर ही कोई अभियान चलायेगा । रवीश कुमार पर कोई आरोप भी नहीं लगा है। अगर उनके भाई सेक्स रैकेट चलाते हैं तो भी इस बहाने रवीश कुमार का चरित्र हनन सर्वथा अनुचित है। हाँ आरएसएस – भाजपा जैसे संगठन और काग्रेस के बीच इतना विभेद सर्वथा वाँक्षनीय है बौद्धिकता की मर्यादा की रक्षा के लिये।

इसे भी पढ़ें….

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भाई दोषी है तो कोर्ट सजा दे, इसमें मेरी क्या गलती है : रवीश कुमार

बिहार के टीवी पत्रकार संतोष सिंह से बातचीत में रवीश कुमार ने कहा कि अगर भाई दोषी है तो कोर्ट उन्हें सजा दे, इसमें मेरी क्या गलती है. पढ़िए संतोष सिंह की पूरी पोस्ट…

Santosh Singh : मतभेद होना चाहिए और किसी भी समाज में मतभेद ना हो तो समझिए वो समाज मर चुका है लेकिन मतभेद मनभेद में बदल जाये तो समझिए वो समाज अपना नैतिक मूल्य खो रहा है और फिर उसके बाद ही उस समाज का पतन शुरू हो जाता है…. जी हां, बात रवीश कुमार की कर रहे हैं. वही रवीश कुमार जो अक्सर बीजेपी और नरेन्द्र मोदी की खिंचाई करते रहते हैं.. आप इनके विचार से असहमत हों लेकिन असहमति का ये मतलब तो नहीं होनी चाहिए कि उनके चरित्र पर सवाल खड़ा करें, उन्हें गाली दें, उन्हें देशद्रोही तक कह दें….. और, इससे भी बात नहीं बने तो उनका खामियाजा उनके परिवार को भुगतना पड़ जाये… अंधेरगर्दी वाली स्थिति है क्या?

रवीश कुमार से हमारे रिश्ते हैं, जगजाहिर है, मैंने उसे कभी छुपाया भी नहीं…

कल कांग्रेस के ही एक नेता जो हमारे फेसबुक से जुड़े हुए हैं प्रवीण मिश्रा, ये एनएसयूआई के बड़े लीडर हैं, ने मेरे चैट बाक्स में ‘रवीश कुमार के भाई सेक्स का धंधा कराते हैं’ इससे जुड़े कई लिंक और टाइम्स आफ इंडिया अखबार का लिंक भेजा, साथ ही मुझसे कहा कि ये खबर क्यों नहीं चल रही है… क्यों मीडिया वाले खामोश हैं… मुझे बहुत गुस्सा आया… मैंने कहा- टाइम्स आफ इंडिया क्या है, कोई साक्ष्य हो तो दीजिए… देखिए कैसे खबर चलती है… खैर उसके बाद वो भाग खड़े हुए…

ब्रजेश पांडेय को मैं तो ना जानता हूं और ना ही पहले कभी इनसे मुलाकात हुई है… मैंने सीधे रवीश जी को फोन किया… क्या ये सही है… उन्होंने बस इतना ही कहा- मेरी क्या गलती है जो मेरे साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है… भाई दोषी है तो कोर्ट सजा दे… बातचीत के दौरान वे उदास और निराश थे… खैर, मैंने सोचा पहले सच्चाई जान लिया जाये…

22-12-2016 को एसीएसटी थाने में एफआईआर दर्ज होता है जिसमें निखिल प्रियदर्शी उनके पिता और भाई पर छेड़छाड़ करने और पिता और भाई से शिकायत करने पर हरिजन कह कर गाली देने से सम्बन्धित एफआईएर दर्ज करायी गयी इस एफआईआर में कही भी रेफ करने कि बात नही कही गयी है..इसमें ब्रजेश पांडेय के नाम का जिक्र भी नही है,,,

24-12-2016 को पीड़िता का बयान कोर्ट में होता है धारा 164 के तहत इसमें पीड़िता ने शादी का झासा देकर रेप करने का आरोप निखिल प्रियदर्शी पर लगाती है ये बयान जज साहब को बंद कमरे में दी है इस बयान में भी ब्रेजश पांडेय का कही भी जिक्र नही है,,,,दो दिन में ही छेड़छाड़ रेफ में बदल गया

30–12–2016 को यह केस सीआईडी ने अपने जिम्मे ले लिया इससे पहले पीड़िता ने पुलिस के सामने घटना क्रम को लेकर कई बार बयान दिया लेकिन उसमें भी ब्रजेश पांडेय का नाम नही बतायी।।

31-12-2016 से सीआईडी अपने तरीके से अनुसंधान करना शुरु किया और इसके जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया जांच के क्रम में पीड़िता ने एक माह बाद बतायी कि एक पार्टी में ब्रेजश पांडेय मिले थे उन्होने मेरे साथ छेड़छाड़ किया… फेसबुक पर देखा तो ये निखिल के फ्रेंड लिस्ट में हैं इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो…. पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है पहली बार उन्होनें ब्रेजश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया निखिल का अवारागर्दी कि चर्चा खुब किया है उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई और इस बार उसके गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ जिसमें इन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी निखिल ने पीड़िता को कोल्डडिग्स पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे… मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है लेकिन उसमें ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है ऐसा बयान नही दिया है…

वैसे इस मामले में बहुत कुछ ऐसा है जिसका खुलासा कर दिया जाये तो पूरा खेल एक्सपोज हो जायेगा लेकिन इससे कही ना कही निखिल को लाभ मिल जायेगा जो पीड़िता के साथ न्याय नहीं होगा…

पुलिस का अनुसंधान अभी तक यही तक पहुंचा है वैसे मेडिकल रिपोर्ट भी …..बहुत कुछ बया कर रहा है छोड़िए आप बताये क्या इसी आधार पर ब्रजेश पांडेय को दोषी मान लिया जाये फांसी चढा दिया जाये क्यों कि यूपी चुनाव के बाद ब्रजेश बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते थे इसलिए इन्हें फांसी चढा दिया जाये कि ये रवीश के भाई है… वैसे आपके पास कुछ जानकारी हो तो जरुर दिजिए क्यों कि अगर सच में सैक्स रैकेट चलाते हैं तो फिर कड़ी सजा मिलनी चाहिए।।

बिहार के टीवी पत्रकार संतोष सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें…

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भक्तों की टोली को हुआं हुआं करने दो, रविश का बाल भी बांका न कर सकेंगे शिकारी

Sheeba Aslam Fehmi : बेदाग़ करियर वाले सेक्युलर बुद्धिजीवियों को घेरने के लिए एक ही रास्ता बचा है की यौन शोषण का आरोप लगा दो. जहाँ आरोप लगाने वाले को कुछ साबित नहीं करना पड़ता. अगर वो ख़ुद बेहद्द सतर्क हों तो कोई बात नहीं परिवार के किसी सदस्य पर लगा दो, और भक्तों की टोली हुआं हुआं करती सोशल मीडिया के ज़रिये जान ले लेगी. लेकिन रविश ने बीस साल के बेदाग़, रौशन करियर में घास नहीं छीली है, उन्होंने जो इज़्ज़त, भरोसा और समर्थन हासिल कर लिया है, उसके रहते शिकारी उनका बाल बांका नहीं कर सकेंगे.

Priyabhanshu Ranjan : आजकल एक बड़े पत्रकार सुबह उठकर मुंह भी तब धोते हैं जब NDTV वाले रवीश कुमार को जी भर के गाली दे लेते हैं….उन पर एकदम सड़ा हुआ कीचड़ उछाल देते हैं। खैर, ये पत्रकार महोदय वही हैं जिनकी बेवकूफाना रिपोर्टिंग ने एक शख्स को खुदकुशी के लिए मजबूर कर दिया था। इस चिरकुट पत्रकार ने तथ्यों की जांच किए बिना उस पर बलात्कार का आरोप होने की खबर चलवा दी थी, जिससे आहत होकर ‘आरोपी’ ने खुदकुशी कर ली। कायदे से इस ‘डफर’ को IPC की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने की सजा होनी चाहिए थी, लेकिन ये रवीश पर कीचड़ उछालता फिर रहा है। वो भी रवीश के बड़े भाई के बहाने। इनके कुकर्मों की फेहरिस्त लंबी है। लिखने बैठ जाऊं तो सुबह से शाम हो जाए।

Syed Salman Simrihwin : इंडिया टीवी के एक पत्रकार हैं… Abhishek Upadhyay..क्या लिखते हैं..तेज़ाबी तेवर, रोशनाई रोने लगे..स्याही सिसकने लगे..कमाल के कलमकार हैं..गज़ब की बमबारी करते हैं शब्दों से..पढ़ा मैंने, बम-बारूद, तोप, गोले, मिज़ाइल, टैंक, और फाइटर प्लेन्स सारे अल्फाज़ी अमले शामिल होते हैं इनकी लेखनी के कुरुक्षेत्र में..इस बार उनकी भिड़ंत हो गई ‘एनडीटीवी’ वाले रविश बाबू से..भिड़ंत नहीं..बल्कि भड़ास कहिये..इसलिए भड़ास भी भड़ासी जज़्बात को पहचान गया…तुरंत पन्ने पर चिपका मारा…खबर छप गई..टांय-टूंयी, ठांय-ठुंई, धड़ाम-धुडिम उपाध्याय जी ने शब्दों की मिशिनगन से इतनी गोलियां दागी..इतनी गोलियां दागी…कि कई भिखारी खोखा चुनकर अडानी के अब्बा बन गए..और बाक़ी शब्दों की शक्ल में मरे कारतूस को बीन के बड़के राष्ट्रवादी पत्रकार बन गए..सौ सालों से शांत बैठा ज्वालामुखी अचानक फट गया…दहकते शब्द, लावा की शक्ल में सब कुछ राख करने को आतुर थे..लेकिन भगवान भला करे रविश का..उन्हें इस हमले में खरोंच तक न आई..अब जान लीजिए रविश का बड़का गुनाह…उनके बड़के भाई के ऊपर रेप के आरोप लगे हैं…बस इतना पता चलते ही…उपाध्याय जी हनुमान हो गए…रावणरुपी रविश के पाप को भस्म करने के लिए..पूरी लंका को आग लगा दी..एक बार में इतने ज़हर उगल डाले…की कोबरा भी शर्म से पानी मांगता फिर रहा है…मगर उपाध्याय जी की तीसरी आंख उस वक़्त नहीं खुली जब…कुछ महीने पहले उन्ही के संस्थान इंडिया टीवी में एक फीमेल एंकर ने, चैनल मालिक रजत शर्मा सहित चैनल के कई लोगों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था..और चैनल के दफ्तर में ही आत्म हत्या करने की कोशिश की थी…तब आरोप भाई/रिश्तेदार पर भी नहीं..बल्कि सीधे सीधे उपाध्याय जी के मालिक पर था..तब उपाध्याय जी के सभी हथियारों में जंग लग गए थे..कलम की रोशनाई सूख गई थी..इत्तेफाकन तब चाइनीज़ सामान का अपने इधर बहिष्कार चल रहा था..इसलिए स्मार्ट फोन का इस्तेमाल भी नहीं कर सके उपाध्याय जी…लैपटॉप भी उनका खराब पड़ा था..दिल्ली में ठंढ भी इतनी थी की दलदली से हांथ में कंपकपी छूट रही थी..उपाध्याय जी बिच्छू नहीं, फिर भी डंक ज़बरदस्त मारते हैं..हमें इनके डंक’ की कद्र करनी चाहिए..इन्हें सच लिखना बहुत प्रिय है…झूठ लिखने से इनकी उंगली ऐंठने लगती है..ईमानदार लेखनी इनकी सबसे बड़ी पूंजी है…इसीलिए ओढ़ने-बिछाने में भी ईमानदारी को ही वरीयता देते हैं…हालांकि मालिक के खिलाफ जब बम पटकने की बात आती है…तो ये ईमानदारी को बनियान से ज़्यादा महत्व नहीं देते..तब उपाध्याय जी कहते हैं..कि एक बनियान दो दिन पहनना मुश्किल है..बदबू करने लगता है..कभी कभी ईमानदारी भी बदबूदार बनियान की तरह होता है..इसलिए जितनी देर ईमानदारी को पहनोगे उतनी देर आसपास में बदबू फैलेगी…अब तो हमने भी सीख लिया है..जहां अवसर हो वहां ईमानदारी की रामनामी चादर ओढ़ लेनी चाहिए..गज़ब की सोच है उपाध्याय भइया की..उनकी सोच को साक्षात प्रणाम..हम सब को मिलकर प्रात: स्मरणीय उपाध्याय जी की दीर्घायु की कामना करनी चाहिए…ताकि गंगू तेली जैसे लोग खोखे चुन-चुन कर राजा भोज बन सकें।

सौजन्य : फेसबुक

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रवीश कुमार को बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांग देना चाहिए!

Nitin Thakur : मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा है कि ये सरकार रवीश कुमार को इतनी मोहलत क्यों दे रही है। उन्हें तो बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांगा जाना चाहिए। आखिर किसी पत्रकार के भाई का नाम सेक्स रैकेट चलाने में आए और फिर भी पत्रकार को खुला घूमने दिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है? पहले तो उनके भाई ब्रजेश पांडे ने लहर के खिलाफ जाकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली.. ऊपर से टिकट लेकर विधायकी लड़ने का जुर्म किया.. इसके बाद भी ना ब्रजेश पांडे में राष्ट्रवाद ने उफान मारा और ना ही उन्हें देश के हिंदुओं की कोई फिक्र हुई.. कांग्रेस में ही उपाध्यक्ष का पद लेकर राजनीति जारी रखी।

किसी पत्रकार का भाई राजनीति करे ये भले गैर कानूनी ना हो लेकिन पत्रकार की नौकरी के लिए मुफीद नहीं। इससे पत्रकार पर ठप्पा लगना तय है, भले वो ज़िंदगी भर उसी पार्टी की लेनी देनी करता रहा हो। पत्रकार के रिश्तेदारों को ठेकेदारी भी नहीं करनी चाहिए और ना ही ऊंची नौकरी में जाना चाहिए.. हो ना हो ज़रूर पत्रकार ही ठेके दिलवा रहा होगा.. और वो ही नौकरी की भी सिफारिश कर रहा होगा। इस सबके बाद अगर पत्रकार का कोई दूर या पास का रिश्तेदार किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए.. फिर चाहे वो छोटा हो या बड़ा तो भी ये पत्रकार की ही गलती है।

आखिर उसके घर के सभी लोग संस्कारी क्यों नहीं हैं ? क्या हक है किसी ऐसे आदमी को पत्रकारिता करने का जिसके घरबार-परिवार में किसी का नाम किसी कानूनी मामले में आ जाए? इस देश में बिज़नेस, सरकारी नौकरी और राजनीति भले किसी नैतिक दबाव से मुक्त हो कर की जा सकते हों लेकिन पत्रकारिता करने के नियम बेहद कड़े हैं और मई 2014 के बाद तो ये और भी मुश्किल हो गए हैं। खैर, नया फैशन ये है कि जो पत्रकार आपके रुझान के मुफीद ना पड़ता हो और लड़कीबाज़ी से लेकर कमीशनखोरी तक के इल्ज़ाम उस पर ना टिकते हों तो फिर पत्रकार के रिश्तेदारों का कंधा सीधा कीजिए और उस पर बंदूक रखकर पत्रकार को गोली मार दीजिए।

यहां टीवी पर फिरौती लेते पत्रकार देखे गए हैं.. नकली स्टिंग चलाकर चैनल बैन करवा डालने वाले पत्रकार देखे गए हैं.. और ना जाने कहां-कहां क्या-क्या करनेवाले पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान भी देखे गए हैं (लिस्ट बनानी शुरू करूं तो वो भी शर्मसार होंगे जो कल अपनी पोस्टों में नैतिक ज्ञान बघार रहे थे.. उनके संस्थानों में लड़कियों के साथ क्या कुछ होता रहा है इन करतूतों की अधिक जानकारी के लिए Yashwant भाई का भड़ास पढ़ा जा सकता है)। इस देश ने फिरौती वसूलने के बाद कई साल तक अपनी इमेज मेकिंग के लिए अति राष्ट्रवादी और धार्मिक उन्माद फैलानेवाली पत्रकारिता करनेवालों को माफ किया है पर मैं देश की जनता से मांग करता हूं कि ऐसे पत्रकार को माफ ना किया जाए जिसका भाई अपने प्रदेश में मर चुकी एक पार्टी से राजनीति तो करता ही है, साथ में उस पर किसी नेता की ही बेटी आरोप लगा दे। वैसे मामला और निशाना दोनों समझनेवाले सब समझ रहे हैं लेकिन दिक्कत दो तरह के लोगों के साथ है। एक तो वो हैं जो किसी भी हाल में महिलावादी या दलितवादी दिखने को मजबूर हैं ( वजह वो ही जानें) और दूसरे वो जिन्हें मामले में दिलचस्पी कम बल्कि पत्रकार के चीर हरण में आनंद ज़्यादा आ रहा है (वजह सबको पता है)।

किसी को डिफेंड करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन रवीश को करूंगा। उन्हें इसलिए नहीं करूंगा कि मैं उनका कोई फैन-वैन हूं बल्कि इसलिए करूंगा क्योंकि एजेंडेबाज़ी का ये खेल यहीं नहीं थमनेवाला। अगर रवीश कुमार को गिराए जाने में कायमाबी मिल गई तो फिर इस्टेब्लिशमेंट के सामने खड़ा हर पत्रकार इसी रणनीति से गिराया जाएगा। अपने यारों,दोस्तों, रिश्तेदारों के कारनामों से अपना चरित्र जज होने से बचाने के लिए हर छोटे- बड़े पत्रकार को करियर की शुरूआत में ही अखबार में विज्ञापन निकलवाना पड़ेगा। उसमें पत्रकार घोषित करेगा कि, ”आज और अभी से मैं अपने सभी नाते-रिश्तेदारों से सारे संबंध खत्म कर रहा हूं। इनके किए-अनकिए के ज़िम्मेदार यही होंगे, मैं नहीं। मेरी निष्ठाओं को इनकी करतूतों पर ना परखा जाए।” ये घोषणा भले इस मुल्क के नेताओं को करने के लिए मजबूर ना होना पड़े.. नौकरशाहों से ना कराई जाएं लेकिन पत्रकारों से ज़रूर करवाएं.. आखिर देश के सारे फैसले वो ही तो लेेते हैं और आपकी ज़िंदगी के ना जाने कितने फैसले पत्रकार ही प्रभावित कर रहे हैं! पत्रकार ना हों तो देश आज ही चांद पर कॉलोनी बना ले। आपके खातों में 15 लाख भी आ जाएँ। समाजवाद का सपना ये पत्रकार प्रजाति ही रोक कर खड़ी है।

अब अंत में एक और बात.. लड़की ने आरोप लगाए हैं तो उसकी एफआईआर भी दर्ज हुई.. तुरंत कार्रवाई करते हुए मामला सीआईडी के हाथों में दिया गया। एसआईटी ने जांच करते हुए लड़की के आरोपों को सही भी पाया। नीतीश कुमार की पुलिस की तारीफ होनी चाहिए। इतनी जल्दी कार्रवाई गुजरात के कच्छ में नहीं हुई जहां पर एक लड़की ने बीजेपी के कई आला नेताओँ पर लड़कियां सप्लाई करने का आरोप लगाया था और बाकायदा अपनी वीडियो क्लिप के साथ सामने आई थी। उसने रैकेट के बारे में सबूत भी दिए थे। यहां मसला और ही कुछ है।

लड़की ने 22 दिसंबर को एफआईआर में एक लड़के निखिल, उसके पिता और भाई का नाम डलवाया। भाई पर जातिसूचक गाली देने के आरोप भी लगाए।याद रहे कि आरोप छेड़छाड़ के थे, रेप के नहीं। यहां तक ब्रजेश पांडे कहानी में नहीं हैं। खैर, पुलिस एक हद तक दबाव डालकर अक्सर एफआईआर हल्की करा देती है इसलिए बाद में मजिस्ट्रेट के सामने अकेले में बयान लिए जाते हैं और वही आखिरी माने भी जाते हैं। दो दिन बाद कोर्ट में यही लड़की धारा 164 के तहत बयान देती है और निखिल नाम के मुख्य अभियुक्त पर शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप लगाती है। यहां भी ब्रजेश पांडे का नाम कहीं नहीं है। 30 दिसंबर को सीआईडी ने मामला हाथ में लिया मगर पीड़िता ने बार-बार बयान देने के बावजूद ब्रजेश पांडे का नाम नहीं लिया। सीआईडी ने जो एसआईटी बनाई उसकी जांच में एक महीने के बाद लड़की ने एक पार्टी में ब्रजेश पांडे से मिलने और छेड़छाड़ के इल्ज़ाम लगाए।

बिहार के टीवी पत्रकार Santosh Singh ने मामले की तफ्तीश की है। सारे कागज़ निकलवाए और मामले की प्रक्रिया देखी। उन्होंने फेसबुक पर ही सारी जानकारी तारीख के हिसाब से दी है और ये भी लिखा है कि पीड़िता ने ब्रजेश पांडे को फेसबुक पर देखा कि ये निखिल की फ्रेंड लिस्ट में हैं। पीड़िता का कहना है कि इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो। पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है। पहली बार उन्होनें ब्रजेश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया, निखिल की अवारागर्दी की चर्चा खूब की। उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई। और इस बार उसकी गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ, जिसमें उन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी, निखिल ने पीड़िता को कोल्डड्रिंक पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे …मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है। लेकिन उसने ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है, ऐसा बयान नही दिया।

वैसे मैंने भी शिकायतकर्ता लड़की के आरोप सुने हैं। पत्रकार ने पूछा कि सैक्स रैकेट चलाने वाली बात कैसे कह सकती हैं तो उसने कहा कि चूंकि निखिल ने मुझे ब्रजेश के साथ दिल्ली जाने को कहा था तो मुझे उससे लगता है। लड़की ने जो पत्रकार से कहा उससे ये भी मालूम चलता है कि वो निखिल से शादी करना चाहती थी और जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तब वो उसके पिता से मिलने पहुंची थी। वैसे लड़की की पहचान नहीं खोलनी चाहिए लेकिन अब चूंकि वो खुद मीडिया में इंटरव्यू दे रही है और बीजेपी नेताओं ने काफी हद तक पहचान खोल दी है तो इतना तो जान ही लीजिए कि उसका बैकग्राउंड कमज़ोर कतई नहीं है, अच्छा खासा पॉलिटिकल है तो संभावनाएं और आशंकाएं खूब हैं। बहरहाल लड़की का मीडिया ट्रायल करना गलत है, भले वो खुद मीडिया तक आई है.. लेकिन उतना ही गलत उस पत्रकार का मीडिया ट्रायल भी है जो खुद इसमें कहीं से शामिल नहीं। हां, अगर किसी को मज़ा ही रवीश कुमार को फंसाने में आ रहा हो तो बात अलग है। केजरीवाल को काबू करने के सिलसिले में जब केंद्र उनके खिलाफ कुछ ना ढूंढ सका तो विधायकों को जिस बेशर्मी से औने-पौने मामलों में जेल भेजा गया वो सबके सामने है.. ये अलग बात है कि ऐसे ही मामलों में फंसे होने के बावजूद ना स्मृति ईरानी को छेड़ा गया और ना ही निहालचंद को।

सोशल मीडिया के चर्चित और जनपक्षधर लेखक नितिन ठाकुर की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

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क्या रवीश के शो की टीआरपी ना आने की वजह से किसी को दस्त लग सकते हैं?

Nitin Thakur : क्या रवीश कुमार के शो की टीआरपी ना आने की वजह से किसी को दस्त लग सकते हैं? जी हां, लग सकते हैं। एक जाने-माने दरबारी विदूषक (विदूषक सम्मानित व्यक्ति होता है, दरबारी विदूषक पेड चाटुकार होता है) का हाजमा खराब हो गया और उसने मीडिया पर अफवाह फैलाने वाली एक वेबसाइट का मल रूपी लिंक अपनी पोस्ट पर विसर्जित कर दिया। कई बार लोग जो खुद नहीं कहना चाहते या लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वो किसी दूसरे के लिखे हुए का लिंक डाल कर बता देते हैं।

वेबसाइट चुगली कर रही थी कि रवीश के शो की टीआरपी ना आने की वजह से अब चैनल उनके प्रोग्राम का विश्लेषण कर रहा है। हां, वेबसाइट ने ये नहीं बताया कि बाई द वे एनडीटीवी के कौन से प्रोग्राम की टीआरपी आ रही है। टीआरपी के आधार पर तो पूरा चैनल ही विश्लेषण के दायरे में है, लेकिन लिखनेवाले की शैली से पता लग रहा है कि उसका इंटरेस्ट लिखने में कम बल्कि रवीश के खिलाफ प्रचार में ज़्यादा है। आखिर कोई रवीश कुमार के नाम के आगे ब्रैकेट में पांडे यूं ही तो नहीं लिख देगा। ये बात और है कि पूरे लेख में लेखक बेचारा रवीश के नाम की स्पैलिंग तक ठीक लिखने में भटक रहा है मगर जाति का ज़िक्र करना उसे बहुत ज़रूरी लगा (और इस तरह के कच्चे लेख को छापना दरबारी विदूषक को भी ज़रूरी लगा)।

आगे बता दूं कि ‘रवीश कुमार के शो की टीआरपी नहीं आ रही’ ये बताते हुए लेखक को इस बात का ज़िक्र करना बहुत आवश्यक लगा कि रवीश के भाई को बिहार में कांग्रेस से टिकट मिला था। इन दोनों बातों का आपस में कनेक्शन सिर्फ वो लोग ही जोड़ सकते हैं जिन्हें शो और उसके कंटेंट से ज़्यादा रवीश की जाति और उनके भाई के चुनाव में रुचि है। मुझे शो और उसके एंकर से सवाल करने पर कोई आपत्ति नहीं है, वो खूब करें लेकिन लेख की भाषा और खबर से इतर अफवाहें फैलाने से मुझे एक खास किस्म की सोच वालों के जलने की बू आ रही है। वैसे भी रवीश कुमार के प्रति इनकी झल्लाहट और उसकी वजह किसी से छिपी नहीं। एक बात मैं लेख लिखनेवाले अद्भुत प्राणी से जानना चाहूंगा।

लेख की शुरूआत में उसने लिखा, ‘सरोकार की बात करने वाले एंकर्स भी लाखों की सैलरी पाते हैं ‘, मैं ये नहीं समझ पाया कि लाखों की सैलरी पाने में सरोकार कहां से बाधक बन गए? एंकर चोरी कर रहा है, डाका डाल रहा है या अपराध कर रहा है? संस्थान ने एंकर के साथ कॉन्ट्रैक्ट किया और सैलरी दी, इसमें ये सरोकार किस ढंग से बिखर गए? जब अफवाह फैलाते लेख लिखने से सरोकारों को चोट नहीं पहुंच रही तो किसी इंसान को मेहनत का ठीक मेहनताना मिलने से सरोकारों की कौन सी हत्या हो रही है? तुम क्या चाहते हो कि पत्रकार ज़िंदगी भर झोला ही उठाए फिरे?

एंकर क्या हर पत्रकार को लाखों में सैलरी मिलनी चाहिए, ताकि उसे घर चलाने के लिए कोई झूठ बोलने वाली वेबसाइट ना चलानी पड़े और उस पर हिट्स के लिए किसी दरबारी विदूषक से फेसबुक पर लिंक शेयर की गुज़ारिश ना करनी पड़े। वैसे ‘सूत्रों’ के मुताबिक इस अफवाह फैलानेवाली वेबसाइट का लिंक शेयर करनेवाले दरबारी विदूषक महोदय को भी लाखों में सैलरी मिलती है और उसके सरोकार झूठ फैलाने वाले लिंक डालने के बावजूद बरकरार हैं।

सोशल मीडिया के चर्चित राइटर नितिन ठाकुर की एफबी पोस्ट.

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रवीश के इस प्राइम टाइम शो को हम सभी पत्रकारों को देखना चाहिए

एनडीटीवी इंडिया पर कल रात नौ बजे प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश कुमार ने पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर एक परिचर्चा आयोजित की. इस शो में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी और प्रकाश के रे के साथ रवीश ने मीडिया और पत्रकार पर जमकर चर्चा की.

आजकल भारत में जब सत्ता परस्त रिपोर्टिंग को ही पत्रकारिता माना जाने लगा है और सरकार पर सवाल करने वालों को संदेह की नजर से देखा जाता है, रवीश का यह शो हम सभी को एक बार फिर से पत्रकारिता की मूल भावना, मूल आत्मा की तरफ ले जाने का काम किया है और अपने भीतर झांकने को प्रेरित किया है. यह चर्चित प्राइम टाइम डिबेट देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=eDUADSnA7so

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर क्या कहते हैं, पढ़िए….

Nitin Thakur : रवीश कुमार अकेले हैं जो टीआरपी को ताक पर रख दर्शक और पाठक को भी ऑन एयर और ऑन मंच लताड़ सकते हैं। इसके लिए जो चाहिए उसे ‘ईमान’ कहते हैं। ये सुविधा हर किसी को नहीं मिलती। इसे हासिल करना पड़ता है मेहनत करके।

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बरखा दत्त एनडीटीवी से मुक्त हुईं, देर सबेर रवीश कुमार भी जा सकते हैं!

बरखा दत्त ने 21 साल की नौकरी के बाद एनडीटीवी को अलविदा कह दिया. वह खुद का वेंचर शुरू करेंगी. उधर एनडीटीवी ने भी बयान जारी कर बरखा दत्त के इस्तीफे की वजह बताई है. बरखा दत्त एनडीटीवी में बतौर कंसल्टिंग एडिटर कार्यरत थीं.  आधिकारिक बयान जारी करके एनडीटीवी ने उनके लंबे समय तक चैनल के साथ कार्यकाल की तारीफ की और उनके भविष्य के लिए बधाई दी है.

बयान में कहा गया है, ‘साल 1995 में कॉलेज से पास होने के बाद बरखा दत्त ने सीधे एनडीटीवी ज्वाइन कर लिया था. अब शानदार 21 साल बिताने के बाद बरखा ने अपील की कि वे नए अवसर की तलाश करना चाहती हैं और खुद के वेंचर पर काम करना चाहती हैं. एनडीटीवी के साथ कार्यकाल में उन्होंने काफी ग्रोथ कीं और भारत के साथ-साथ दुनिया के कई हिस्सों में एक मशहूर हुईं और कई अवार्ड जीतें. हमें विश्वास है कि बरखा और ज्यादा से ज्यादा ग्रोथ करें और एनडीटीवी उनके भविष्य के लिए उन्हें बधाई देता है.’

बरखा दत्त के इस्तीफा दिए जाने के बाद वे टि्वटर पर ट्रेंड करने लगी. लोगों ने सोशल मीडिया पर बरखा दत्त पर निशाना साधा. कई लोगों ने उन्हें ‘पाकिस्तान पत्रकार’ तक करार दे दिया. वहीं कईयों ने उनके नए वेंचर को लेकर कयास लगाए. इससे पहले टाइम्स नाउ के एडिटर-इन-चीफ के पद से अरनब गोस्वामी ने इस्तीफा दिया और रिपब्लिक नाम से नया वेंचर शुरू कर दिया है. अरनब के इस्तीफा देने पर वे भी टि्वटर पर ट्रेंड करने लगे थे. ज्ञात हो कि बरखा दत्त का नाम विवादित नीरा राडिया टेप में भी आया था.

उधर, कुछ जानकार लोगों का कहना है कि एनडीटीवी से एक के बाद एक बड़े नामों का विदाई यूं ही नहीं है. प्रणय राय द्वारा चिदंबरम के साथ मिलकर 2जी स्कैम का धन विदेशों में ले जाकर और चैनल खोलकर ब्लैक से ह्वाइट करने के मामले की फाइल नरेंद्र मोदी की टेबल पर पड़ी हुई है. प्रणय राय और चिदंबरम द्वारा किए गए घोटाले को उजागर आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने किया था जिसके बाद चिदंबरम और प्रणय राय ने अपने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उनका भरपूर उत्पीड़न किया था.

अब नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद उस मामले की फाइल कार्रवाई के लिए उनकी टेबल पर रखी हुई है. बताया जा रहा है कि एनडीटीवी के खिलाफ सीधे एक्शन लेकर इस चैनल को शहीद का दर्जा देने से बचते हुए मोदी सरकार एक-एक स्टेप रख रही है. इसी क्रम में उन चेहरों को चैनल से विदा करने को कहा गया है जो लगातार नरेंद्र मोदी के निशाने पर रहे हैं. बरखा दत्त के बाद रवीश कुमार जा सकते हैं, देर सबेर में. चैनल में शीर्ष लेवल पर किसी को निकाले जाने की बजाय उनके साथ बैठकर उनकी सहमति से स्मूथ एक्जिट किया जाता है ताकि दोनों तरफ की इज्जत बची रहे.

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बरखा दत्त और रवीश कुमार का ईमेल व ट्वीटर एकाउंट हैक

रवीश कुमार ने ईमेल-ट्वीटर एकाउंट हैक किए जाने को लेकर अपने ब्लाग नई सड़क पर एक पोस्ट का प्रकाशन किया है, जो इस प्रकार है…

हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे..

रवीश कुमार

मेरे हमसफ़र दोस्तों….

किसी को मेरे ईमेल और फोन में क्या दिलचस्पी हो सकती है वो हैक करने की योजना बनाएगा। शनिवार की मध्यरात्रि मेरी वरिष्ठ सहयोगी बरखा दत्त का ईमेल हैक कर लिया गया। उनका ट्वीटर अकाउंट भी हैक हुआ। उसके कुछ देर बाद मेरा ट्वीटर अकाउंट हैक कर लिया गया। उससे अनाप शनाप बातें लिखीं गईं। जब मैंने एक साल से ट्वीट करना बंद कर दिया है तब भी उसका इतना ख़ौफ़ है कि कुछ उत्पाति नियमित रूप से गालियां देते रहते हैं। ये सब करने में काफी मेहनत लगती है। एक पूरा ढांचा खड़ा किया जाता होगा जिसके अपने ख़र्चे भी होते होंगे। ढाई साल की इनकी मेहनत बेकार गई है मगर उस डर का क्या करें जो मेरा नाम सुनते ही इनके दिलों दिमाग़ में कंपकपी पैदा कर देता है। ज़रूर कोई बड़ा आदमी कांपता होगा फिर वो किसी किराये के आदमी को कहता होगा कि देखता नहीं मैं कांप रहा हूं। जल्दी जाकर उसके ट्वीटर हैंडल पर गाली दो। दोस्तों, जो अकाउंट हैक हुआ है उस पर मेरा लिखा तो कम है, उन्हीं की बदज़ुबान और बदख़्याल बातें वहां हैं। मैं चाहता हूं कि वे मुझसे न डरें बल्कि मेरा लिखा हुआ पढ़ें।

मेरी निजता भंग हुई है। मेरा भी ईमेल हैक हुआ है। बरखा दत्त की भी निजता भंग हुई है। मैं सिर्फ रवीश कुमार नहीं हूं। एक पत्रकार भी हूं। कोई हमारे ईमेल में दिलचस्पी क्यों ले रहा है। क्या हमें डराने के लिए? आप बिल्कुल ग़लत समझ रहे हैं। ये आपको याद दिलाया जा रहा है कि जब हम इन लोगों के साथ ऐसा कर सकते हैं तो आपके साथ क्या करेंगे याद रखना। पत्रकारों को जो भी ताकतें डराती हैं दरअसल वो जनता को डराती हैं। अगर हमारी निजता और स्वतंत्रता का सवाल आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है तो याद रखियेगा एक दिन आपकी भी बारी आने वाली है। जिस लोकतंत्र में डर बैठ जाए या डरने को व्यापक मंज़ूरी मिलने लगे वो एक दिन ढह जाएगा। आपका फर्ज़ बनता है कि इसके ख़िलाफ़ बोलिये। डरपोकों की बारात बन गई है जो किसी मुख्यालयों के पीछे के कमरे में बैठकर ये सब काम करते हैं। अभी तो पता नहीं है कि किसकी हरकत है। जब राहुल गांधी के बारे में ठोस रूप से पता नहीं चल सका तो हम लोगों को कौन पूछ रहा है। आख़िर वो कौन लोग हैं, उन्हें किसका समर्थन प्राप्त है जो लगातार हमारे ट्वीटर अकाउंट पर आकर गालियां बकते हैं। अफवाहें फैलाते हैं। आपको बिल्कुल पता करना चाहिए कि क्या यह काम कोई राजनीतिक पार्टी करती है। ऐसा काम करने वाले क्या किसी राजनीतिक दल के समर्थक हैं। पता कीजिए वर्ना आपका ही पता नहीं चलेगा।

आप सोचिये कि आपका पासवर्ड कोई चुरा ले। आपके ईमेल में जाकर ताक झांक करे तो क्या आपको ठीक लगेगा। क्या आप ऐसी साइबर और राजनीतिक संस्कृति चाहेंगे? आपका जवाब हां में होगा तो एक दिन आपके साथ भी यही होगा। हैकरों ने बता दिया है कि भारत साइबर सुरक्षा के मामले में कमज़ोर है। हैकिंग पूरी दुनिया में होती है लेकिन यहां की पुलिस भी इसके तार को जोड़ने में अक्षम रहती है। साइबर सुरक्षा के नाम पर अभी तक दो चार चिरकुट किस्म के नेताओं के ख़िलाफ़ लिखने वालों को ही पकड़ सकी है। वो नेता चिरकुट ही होता है जो अपने ख़िलाफ़ लिखी गई बातों के लिए किसी को अरेस्ट कराता है या अरेस्ट करने की संस्कृति को मौन सहमति देता है। जब हम लोगों के अकाउंट हैक किये जा सकते है तो ज़रूरत है कि लोगों को बेहतर तरीके साइबर सुरक्षा के मामले में जागरूक किया जाए। गांव देहात के लोगों के साथ ऐसा हुआ तो उन पर क्या बीतेगी। हमारा तो लिखा हुआ लुटा है, अगर ग़रीब जनता की कमाई लुट गई तो मीडिया ही नहीं जाएगा। ज़्यादा से ज्यादा किसी रद्दी अख़बार के कोने में छप जाएगा जिसके पहले पन्ने पर सरकार का ज़रूरत से ज़्यादा गुणगान छपा होगा।

मैं ढाई साल से इस आनलाइन सियासी गुंडागर्दी के बारे में लिख रहा हूं। आख़िर वे कितने नकारे हो सकते हैं जो किसी का ईमेल हैक होने पर खुशी ज़ाहिर कर रहे हैं। क्या अब हमारी राजनीति और फोकटिया नेता ऐसे ही समर्थकों के दम पर घुड़की मारेंगे। ये जिस भी दल के समर्थक या सहयोगी है उसके नेताओं को चाहिए कि अपने इन बीमार सपोर्टरों को डाक्टर के पास ले जाएं। इनकी ठीक से क्लास भी लें कि ये ढाई साल से मेरे पीछे मेहनत कर रहे हैं और कुछ न कर पाये। अगर किसी नेता को दिक्कत है तो ख़द से बोले न, ठाकुर की फौज बनाकर क्यों ये सब काम हो रहा है। अगर इतना ही डर हो गया है तो छोड़ देंगे। लिखा तो है कि अब छोड़ दूंगा। ऐश कीजिए। चौराहे पर चार हीरो खड़ा करके ये सब काम करने वाले इतिहास के दौर में हमेशा से रहे हैं। इसलिए भारतीय साहित्य संस्कृति में चौराहा बदमाश लंपटों के अड्डों के रूप में जाना जाता है। हमारी भोजपुरी में कहते है कि लफुआ ह, दिन भर चौक पर रहेला। ज़ाहिर है अकाउंट हैक होने पर इन जश्न मनाने वाले लोगों के बारे में सोच कर मन उदास हुआ है।ये घर से तो निकलते होंगे मां बाप को बता कर कि देश के काम में लगे नेताओं का काम करने जा रहे हैं। लेकिन वहां पहुंच कर ये गाली गलौज का काम करते हैं। आई टी सेल गुंडो का अड्डा है। दो चार शरीफों को रखकर बाकी काम यही सब होता है। लड़कियां ऐसे लड़कों से सतर्क रहें। इनसे दोस्ती तो दूर परिचय तक मत रखना। वो लोग भी बीमार हैं जो ऐसे लोगों का समर्थन करते हैं।

तो दो बाते हैं। एक तो किसी का भी अकाउंट हैक हो सकता है। हैक करने वाला अक्सर दूर देश में भी बैठा हो सकता है। आई टी सेल इस तरह का काम करने वालों को ठेका भी दे सकता है. आपको ताज़िंदगी मालूम न चलेगा। मैं तो यह भी सोच कर हैरान हूं कि आख़िर वो कौन लोग होंगे जो बरखा दत्त का ईमेल पढ़ना चाहेंगे। मेरा ईमेल पढ़ना चाहेंगे। अगर इतनी ही दिलचस्पी है तो घर आ जाइये। कुछ पुराने कपड़े हैं, धोने के लिए दे देता हूं। जाने दीजिए, समाज में ऐसे लोग हमेशा मिलेंगे लेकिन आप जो खुद को चिंतनशील नागरिक समझते हैं, इस बात को ठीक से समझिये। हमारे बाहने आपको डराया जा रहा है। हमारा क्या है। फिर से नया लिख लेंगे। आप नहीं पढ़ेंगे तो भी लिख लेंगे। हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे। हम लकीर हैं। जहां खींच जाते हैं और जहां खींच देते हैं वहां गहरे निशान पड़ जाते हैं। सदियों तक उसके निशान रहेंगे। मैं किसी के बोलने देने का इंतज़ार नहीं करता हूं। जो बोलना होता है बोल देता हूं। कुलमिलाकर निंदा करते हैं और जो भी भीतर भीतर गुदगुदा रहे हैं उन्हें बता देते हैं कि आप एक बेहद ख़तरनाक दौर में रह रहे हैं। आपके बच्चे इससे भी ख़तरनाक दौर में रहेंगे। पासवर्ड ही नहीं, राजनीतिक निष्ठा भी बदलते रहिए। साइबर और सियासत में सुरक्षित रहने के लिए आप इतना ही कर सकते हैं। इतना कर लीजिए।

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गुंडों का रवीश कुमार को धमकाना… एबीपी न्यूज-आजतक जैसे चैनलों को पब्लिक का दुःख न दिखना

Virendra Yadav : तीन दिनों से लगातार देख रहा हूँ एनडीटीवी पर. रवीश कुमार अपनी टीम के साथ बैंकों के सामने लगी कतारों, नोटों को लेकर अफरा तफरी और आम जनता की तकलीफों को ग्राऊंड जीरो से प्राईम टाईम रिपोर्ट में पेश कर रहे हैं. हर कहीं दो चार लोग आकर उन्हें धमकाते हुए यह कहते दीखते हैं कि ‘जनता खुश है, सब ठीक है आप गलत रिपोर्ट पेश कर रहे हो’. आज बुलन्दशहर की रिपोर्टिंग के दौरान यही हुआ. उद्विग्न रवीश को एनडीटीवी के दर्शकों से यह कहना पड़ा कि ‘अगर यही सब चलता रहा तो जल्द ही टीवी पर आप सच्चाई नहीं देख पायेंगे’. सच का गला घोंटने की यह दबंगई हिटलर के दौर के उन ‘ब्राउन शर्ट’ दस्तों की याद दिलाती है जो फासीवाद के सफरमैना की भूमिका में थे. सचमुच हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. इन पदचापों को न सुनने की भूल आत्मघाती होगी.

शम्भूनाथ शुक्ल : कल प्राइम टाइम में बुलंदशहर की दुर्दशा देख दिल दहल उठा। आम लोग परेशान हैं कोई अफसर, नेता या अमीर नहीं। दिन-दिन भर लाइन लगाते हैं और नंबर आने पर कैश ख़तम। ऊपर से कुछ गुंडे आकर रवीश कुमार को वहां से जाने पर विवश कर देते हैं। ज़ी, एबीपी और आजतक पता नहीं कौन-सी रिपोर्टिंग कर रहे हैं जो उन्हें पब्लिक का दुःख दिखता नहीं।

Sarvapriya Sangwan : इस बीच जब ये खबर आ रही है कि यूपी सरकार ने कल रवीश कुमार की प्राइम टाइम रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए खोड़ा के एसबीआई बैंक में काउंटर बढ़ा दिए और मोबाइल एटीएम का इंतज़ाम किया है तब मैं पिछले दो दिन की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव को लिखने बैठी हूँ। बुधवार को खोड़ा में रवीश कुमार के साथ मैं भी रिपोर्टिंग पर गयी थी। वहां हमने देखा और रवीश ने भी कई बार दोहराया कि जैसे ही कोई नोटबंदी की वजह से आ रही परेशानियों पर कुछ कहता है तो कहीं से एक दबंग आवाज़ आती है कि क्या हो गया परेशानी है तो, मोदी जी ने ठीक किया। लोग अपनी बात फिर से संकोच के साथ शुरू करते हैं कि हां, हम भी साथ हैं लेकिन खाने को पैसे नहीं हैं। कल जब शूट खत्म हुआ तो दो बाइक सवार आये और रवीश से बोले कि आप ही के चैनल पर भीड़ दिख रही है बैंकों के सामने, कुछ और भी दिखाइए। उसका बोलना आरोप जैसा लग रहा था। 93% गाँवों में बैंक ही नहीं है, देश की बैंकिंग सिस्टम की हालत साफ़ नज़र आ रही है और फिर भी पता नहीं कौनसे सुहाने सपने दिखाने की उम्मीद कर रहे हैं ऐसे लोग। क्या मीडिया जनता का माइक नहीं होनी चाहिए? क्या वो सिर्फ सरकार और राजनीतिक दलों को प्रेस कांफ्रेंस दिखाने के लिए है? मैं नहीं जानती कि ऐसे लोग एक न्यूज़ चैनल पर और क्या देखना चाहते हैं। शायद, बागों में बहार, वो भी बेमौसम।

आज बुलंदशहर पहुंचे। जिस बैंक में गए, वो 16 गाँवों में अकेला बैंक था, लोग शिकायत करने लगे। हमारी गाड़ी के पीछे एक गाड़ी खड़ी थी जिस पर वीआईपी का स्टीकर लगा था। लोग अपनी समस्या कह ही रहे थे तभी एक व्यक्ति वहां आया जो पहले से उस भीड़ में नहीं था। उसने रवीश को कहा कि परेशानी है तो क्या हुआ, बॉर्डर से ज़्यादा नहीं है, बॉर्डर पर 80% जाट मरते हैं और मैं भी जाट हूँ। कल आरोप की तरह बात की गयी और आज ये व्यक्ति धमकाने लगा, अपने साथ कुछ लड़कों को लाया था और उनके साथ मिलकर मोदी मोदी चिल्लाने लगा। हम बिगड़ते हालात को देख कर वहां से निकल गए और ये व्यक्ति भी बिना पैसा लिए या बैंक की लाइन में लगे वहां से अपनी स्कूटी पर चला गया।

वक़्त कुछ ऐसा ही है कि जान कोई दे रहा है और उसकी जान की कीमत उसकी जाति के लोग घर बैठे वसूल रहे हैं। बिना कुछ किये। गुंडागर्दी करते हुए आप बता रहे हैं कि जाट हैं तो आप उस जाति की बेइज़्ज़ती ही कर रहे हैं।  फिर हम एक अनाजमंडी पहुंचे, जहाँ लोग यूरिया खरीदने के लिए लाइन लगाये हुए थे, किसी ने बताया कि उसने अभी धान बेचा और नकद मिला जिसमें पुराने 500 और 1000 के नोट हैं लेकिन यूरिया इन पैसों से नहीं मिल रहा। मुझे उन लोगों में पीछे खड़ा हुआ एक 22-23 साल का एक लड़का दिखा जो उस भीड़ से अलग ही लग रहा था। Leather jacket, चश्मा लगाया हुआ था। उसने जाकर किसी को फ़ोन मिलाया, मैं उसे नोट कर रही थी। अचानक उस मंडी का कोई पल्लेदार आया और रवीश के ऊपर चिल्लाने लगा कि आप किसलिए 500 के नोट दिखा रहे हैं, हमने तो दिए नहीं, आप खुद दे रहे हैं।

बिना किसी वजह के इस तरह का हमला औचक था। रवीश को और कैमरामैन को घेरने की कोशिश की, लेकिन वो और टीम के लोग गेट से पैदल बाहर निकल गए, पल्लेदार ने अपने लोगों के साथ मिलकर गेट बंद कर दिया और हमारी गाड़ी अंदर ही रह गयी। कैमरामैन से भी बदसलूकी करने लगे। मैं पहले ही थोड़ा अलग हो गयी थी और एक छोटे गेट से निकल आई। हम कुछ मीटर पैदल चले जब तक गाड़ी बाहर नहीं निकली। हमने पुलिस को बुलाया। वो लड़का जो मंडी में दिखा था, वो अपने साथी के साथ बाइक पर लगातार पीछा कर रहा था। मैं नंबर नोट कर चुकी थी और पुलिस को दे दिया। उसके बाद भी जब हम दिल्ली की तरफ निकले तो एक और वीआईपी स्टीकर वाली गाड़ी ने काफी दूर तक पीछा किया। लग रहा था मानो हम किसी निगरानी में हैं।

मैं फैसला नहीं कर पा रही हूँ कि ग्राउंड रिपोर्टिंग का कोई मतलब अब बचा है या नहीं। मौका ढूँढा जा रहा है कि किसी तरह एक आवाज़ को ख़त्म कर दें किसी भी तरीके से। चाहे ट्विटर पर ट्रेंड करा कर या मार-पीट तक पहुंचा कर। ये जनता नहीं है। जो असल जनता है वो कतारों में खड़ी है, बाकी बाइकों पर धमकी देते घूम रहे हैं। रवीश कुमार ने खोड़ा पर रवीश की रिपोर्ट पहले भी की है, दिल्ली के कई इलाकों में कांग्रेस सरकार के दौरान रिपोर्ट की है, लेकिन तब क्या इसी तरह देश में देशद्रोही साबित करने का ट्रेंड था? अरे नहीं, राजनीतिक दलों के आईटी सेल कहाँ बने थे तब। अगर किसी योजना के लागू होने में दिक्कतें आ रही हैं और लगातार कई दिन से आ रही हैं तो क्या किया जाना चाहिये,एक कीर्तन मंडली बैठा देनी चाहिए चैनल पर जो भजन गाती रहे। काफी ‘कंस्ट्रक्टिव’ होगा देश के लिए।  अच्छी बात के साथ ख़त्म करती हूँ। खोड़ा में आज डीएम, और कई अधिकारी आ गए, 2 मोबाइल एटीएम भी आ गए। आज काफी लोगों को पैसा मिला। बाकी, तुहमतें चंद अपने ज़िम्मे धर चले..जिस लिए आये थे हम, सो कर चले।

सौजन्य : फेसबुक

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रवीश जैसे पत्रकार का ये हाल है तो बाकी रिपोर्टर्स और स्थानीय पत्रकारों का क्या होता होगा?

Rakesh Srivastava : रवीश को धमकाने का काम प्रायोजित है ऐसा मुझे नहीं लगता। बैंको के बाहर की हर लाईन में बहुत लोग प्रधानमंत्री के इस कदम की सराहना करने वाले भी मिलते हैं, इस सच्‍चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन, यह भी अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है कि मोदी जी के समर्थक टाईप अधिकांश लोग बुली करने टाईप ही क्‍यों होते हैं। दो चार बुली करने वाले दसियों साधारण लोग की आवाज़ को दबा देते हैं। ऐसा सब जगह हो रहा है। इस प्रवृति को एक्‍सपोज कर रवीश ने अच्‍छा किया।

Nitin Thakur : एक अपील है। पत्रकारों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए। रवीश कुमार बुलंदशहर जाते हैं तो उनकी गाड़ी के पीछे लगातार एक गाड़ी घूमती है। जहां रिपोर्टिंग के लिए रुकते हैं वहां अचानक से बाइक सवार फोन करके ना जाने किसे-किसे बुलाने लगते हैं…. क्या ये सब पिछली सरकार के शासन में भी हो रहा था? आपको याद हो ना हो लेकिन मैंने तो उस वक्त भी रवीश समेत ना जाने कितने पत्रकारों को सरकार की आलोचना करते हुए ग्राउंड रिपोर्ट भेजते देखा था पर यूं पत्रकारों का पीछा होते देखा-सुना नहीं कभी। सरकारों में बैठी पार्टियां हर काम कानून बनाकर ही नहीं करती बल्कि कुछ काम बिना कानून बनाए भी अंजाम दिए जाते हैं। अगर रवीश जैसे पत्रकार का ये हाल है जिसकी टीवी पर अपनी धमक है तो बाकी रिपोर्टर्स और स्थानीय पत्रकारों का तो क्या ही हाल होता होगा?

इस वक्त आवाम के बड़े तबके को यही समझ नहीं आ रहा कि पत्रकार के हाथ में कोई बंदूक नहीं होती। वो जो दिखा, सुना या बोल रहा है उसे बहस करके या लिखकर आसानी से काउंटर किया ही जा सकता है। ऐसे पत्रकारों की जान पर खतरा बनकर मंडराएंगे तो कोई ये नौकरी नहीं करनेवाला। उतनी ऊंची तन्ख्वाहें, पेंशन और मरने पर सरकारी मुआवज़े नहीं मिलते कि हर कोई जान दे दे। आप अपने हाथों से मीडिया को खत्म कर रहे हैं। वो लाख बुरी हो लेकिन उसे ज़िंदा रखना लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। जैसे राजनीति कितनी ही बुरी हो मगर वो व्यवस्था की आवश्यक बुराई है। सरकार में बैठी पार्टियों को वो चाहे जो भी हों, उन्हें भी अपने भक्तों, प्यादों, मुरीदों वगैरह वगैरह को समझाना चाहिए कि हिंसा बुरी होती है, कम से कम उसके साथ तो बहुत ही बुरी जो अपने हाथ में डंडा तक ना रखकर अनजान जगहों पर जा घुसता है ताकि अपनी नौकरी कर सके और आपका ज्ञानवर्धन अथवा मनोरंजन। (आज के संदर्भों में) शुक्रिया।

Ajay Anand : मेरे पिताजी कहते थे अगर आपको डालडा खाने की आदत लग गई तो शुद्ध देशी घी नहीं पचेगी । यही आज के दौर में पत्रकारिता के साथ लागू होती है; क्योंकि पत्रकारिता के नाम पर हमें चाटुकारिता देखने/पढ़ने की आदत लग गयी गयी है इसलिए रवीश का रिपोर्ट हजम नहीं हो रहा है। लगतार तीनों दिन रवीश को धमकाया जाना अच्छे संकेत नहीं है… कल के प्राइम टाइम का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

प्राइम टाइम : एक तो बैंक कम, ऊपर से इंतज़ाम अधूरे

सौजन्य : फेसबुक

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रवीश और उनकी टीम को मुट्ठी भर मोदी भक्त नुमा असामाजिक तत्व धमकाने में जुटे!

Tarun Vyas : मैं रवीश के दीवानों वाली सूची में शामिल नहीं हूं और न होना चाहता हूं। लेकिन रवीश कुमार की पत्रकारिता के अंदाज़ से प्रभावित ज़रूर हूं। रवीश का गुरुवार और शुक्रवार का प्राइम टाइम जिस किसी ने भी देखा मैं उन से दो सवाल पूछना चाहता हूं। क्या बैंकों में लगी कतारें और कतारों में भूखे प्यासे आंसू बहाते लोग झूठे हैं? और क्या नरेंद्र मोदी का रुंधा गला ही देशभक्ति का अंतिम सत्य है ? मेरे सवाल आपको नकारात्मक लग सकते हैं क्योंकि जब दाल 170 रुपए ख़ामोशी के साथ ख़रीदी जा रही हो तो इस तरह के सवालों का कोई मोल नहीं होता।

लेकिन उसके साथ ही हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जनता से सत्ता है, सत्ता से जनता नहीं है। कोई पत्रकार देश की जनता के दिल दिमाग़ पर बिछाए जा रहे जाल को तोड़कर देश की जनता की सोच को आज़ाद रहने के लिए अगर कुछ प्रयत्न कर रहा है तो वो देशद्रोही कैसे हो सकता है। मौजूदा दौर में रवीश कुमार की पत्रकारिता और ख़ुद रवीश ग़द्दार देशद्रोही और न जाने क्या क्या घटिया आरोप झेल रहे हैं। और सुधीर चौधरी जैसे अपराधी देशभक्ति के मील का पत्थर बनते जा रहे हैं।

बीते दो प्राइम टाइम में कुछ असामाजिक तत्वों ने रवीश को और उनकी टीम को धमकाने का प्रयास किया है। बदतमीज़ी की और रिपोर्टिंग प्लेस से निकल जाने तक की धमकी दे डाली। जहां एक ओर बीजेपी मार्का न्यूज़ चैनल्स और अख़बारों को बैंकों में खड़े लोग दिखना बंद हो गए हैं। 34 लोगों की मौत बदलते देश का नया उदाहरण बन गई हो तो ऐसे हालातों में रवीश कुमार का बैंकों की भीड़ और मर रहे लोगों पर सवाल करना कौनसा अपराध है? क्या हम इसे स्वीकारलें कि अब राजनीतिक दलों के गुंडे पत्रकारों को धमकाएंगे और इस पर भी चुप्पी साधना होगी?

आम जनता भले न समझे मग़र पत्रकारों को तो समझना चाहिए इन हालातों को। आज बीजेपी का सिक्का है कल कांग्रेस का होगा। तो जो पत्रकार बीजेपी की ग़ुलामी कर रहे हैं उनके साथ क्या इस तरह के बर्ताव का ख़तरा नहीं हैं। सत्ता की शरण स्वीकार कर चुके पत्रकारों ने क्या ये मान लिया है इस लोकतंत्र में 2014 का लोकसभा चुनाव आख़री चुनाव था? क्या अब दूसरे दलों की सरकारों का बनना बिगड़ना नहीं होगा? जो अपने अस्तित्व पर हो रहे हमलों पर ख़ामोशी बरती जा रही है। मैं यहां रवीश कुमार की वक़ालत नहीं कर रहा हूं मग़र कुछ ही पत्रकार हैं जो लिख रहे हैं दिखा रहा हैं उनमें रवीश कुमार सबसे आगे नज़र आते हैं। इसलिए हमें ऐसे पत्रकरों को दबाए जाने के लिए आवाज़ उठनी चाहिए।

इस समय हो रहे घटनक्रम यूं ही नहीं हैं। ये आने वाले समय के गहरे अंधेरे की दस्तक है। जिसे न समझने दिया जा रहा है और न ही समझ चुके लोगों को बोलने दिया जा रहा है। जितना हो सके हमें इस ख़तरनाक महौल से बचना चाहिए। हमारे आपके आस पास देशभक्ति का ऐसा आवरण बनाया जा रहा है जिसके विरोध में आप कुछ भी न कह सकें। लेकिन हमें बोलना होगा। देशभक्ति और देशभक्तों के विरुद्ध खड़े होना होगा। क्योंकि ये एक झूठ है जिसका असलियत से कोई वास्ता नहीं। ये सिर्फ़ कुर्सी पर बने रहने के लिए फ़ैलाया जा रहा डर है। जिसका शिकार आज रवीश कुमार जैसे ढेरों लोग हैं।

सत्ता के इस अंधकाल में कुछ भी बोलना ख़तरे से खाली तो नहीं है। लेकिन जो जोखिम उठाकर किसी भी माध्यम से सच को महसूस करा रहे हैं हमें उनके साहस का सम्मान करना होगा। वरना इतिहास हमारा पीछा कर ही रहा है। हालातों को देखिए महसूस कीजिए इंदिरा इज़ इंडिया इंडिया इस इंदिरा आप भूले नहीं होंगे। 1975 से 77 तक की हवाओं का एहसास कराया जा रहा है। बस तरीका थोड़ा अलग है। तब घोषित तानाशाही थी अब अघोषित है।

लेखक तरुण व्यास इंदौर के युवा सोशल मीडिया जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके एफबी वॉल से लिया गया है.

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अर्णब गोस्वामी और रवीश कुमार पत्रकारिता के दो विपरीत छोर हैं : उदय प्रकाश

Uday Prakash : There have been two striking popular and leading poles in TV journalism spirited these days. One in English and the other in Hindi. I’m always skeptical about Hindi as it’s always characterized by the people who represent it, in politics, culture and media. My friends here on Facebook know about my views through my posts time and again. One of the poles, in English was Times Now, anchored by Arnab Goswami and the other, in Hindi is NDTV, with its anchor Ravish Kumar. 

 

The First with commanding monologues, superiority, self-righteousness, provided with Y security by the government, brilliant, eloquent, deafening and the other, always appearing inconsequential, fragile, meek and lesser.

These two belonged to the same, as Baba Saheb Ambedkar had held, Hindu priestly caste, the Brahmins, which will never allow a social change to happen. At the maximum it can act as an agent of ‘political change.’

Here, I’m not going to write a big analytical piece about the contrary roles these two anchors have been playing since last few stormy months this year but friends look at state of affairs of these two as of now.

Arnab Goswami has been made to resign from Times Now and is now trying to start a news industry on his own, after serving ten years in TOI. He is out to test his fortune in commercially competitive media business to make more money and more power. He claims to disrupt existing media news industry with his teammates and to create a private ‘independent’ channel. 

And Ravish Kumar, who just succeeded saving his career and his employer’s profession for his journalistic conscience from getting ‘banned’ for a day by the government, is seen tonight in his most sought-after and hugely watched ‘Prime Time’ talking to desperate, crying mother of Najeeb, a JNU student, missing for the last 24 days. 

Ravish represents the sanity, rationale of India’s plural, liberal, secular and democratic conscience.

Arnab Goswami might prosper becoming more moneyed and more powerful with more securities for his cover.

Geometrical ‘edge line’ between language and caste here appear blurred to me and think it’s individual who is a subject to be certified.

Friends, watch tonight’s Prime Time and see how calm and humane Ravish executes his responsibility as a noncombatant journalist.

Ravish stands with the known tradition of patriotic and sane journalism of India and Arnab Goswami ….an aberration…an anomaly. 

One has demeaned and defamed English. The other, risking his livelihood rescued almost the decomposed and treacherous casteist image of Hindi.

(Let’s celebrate the victory of Freedom of Expression against Censor-shipping and Banning politics, even if it’s a last one.)

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आईं टिप्पणियों में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Amit Kumar : अंग्रेजी, हिंदी के दो एंकरों के आधार पर बहुत विशिष्ट विश्लेषण! हिंदी टेलीविज़न पत्रकारिता का दुःखद पक्ष यह है कि रवीश जैसे एंकर ढूंढे नहीं मिलते। वहीं अंग्रेजी में अर्णव अभी भी बहुत कम हैं, उनके अनुयायी हिंदी एंकर अधिक हैं।

डॉ अरुण बुद्धिहीन : बेजोड़। एक अहंकारी , अभिजात्य एवं सत्ता का दलाल एवं दूसरा साधारण जनता से मिलता जुलता, विनम्र लेकिन पत्रकारिता धर्म का निडरता के साथ निर्वाहक।

Mazhar Kamran : Very well said. This is true in a big way across the entire culture in the country.

Prakash Badal : Rightly said. Ravish kumar and Arnav are true journalists . Thay proved the definition of journalism in their own way. And they win.

Anurag Arya : नायक कोई नहीं होता ,सिर्फ सन्दर्भ सही और गलत होते है. सिद्दांत और सामाजिक सरोकार सही या गलत होते है. कल को रविश कुमार या एन डी टी वी हमारी समझ से किसी सरोकार के खिलाफ नजर आये तो हम आलोचना से हिचकिचाएंगे नहीं ! एक प्रतिबद्ध नागरिक का कोई पक्ष नहीं होता है।

Hasnain Naqvi : Arnab and Ravish: the Poles apart!

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मोदी के ‘जय श्री राम’ कहने का रवीश वैसे ही मज़ाक उड़ाएंगे जैसे वरुण गांधी का मज़ाक बनाया था?

Abhishek Srivastava : हां जी, तो दशहरा बीत गया। एक झंझट खत्‍म हुआ। आइए अब मुहर्रम मनाते हैं, कि दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र के सबसे ऊंचे संवैधानिक पद पर बैठे शख्‍स ने त्‍योहार के बहाने पांच बार ”जय श्रीराम” का नारा लगाया और यह कह कर कि आवाज़ दूर तक पहुंचनी चाहिए, जनता को भी ललकार दिया। ‘अपने’ रवीश कुमार कहां हैं भाई? जब प्रधानजी नारा लगा रहे थे, तब मैं सोच रहा था कि क्‍या रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में वैसे ही उनका मज़ाक उड़ाएंगे जैसे 2009 में पीलीभीत में वरुण गांधी द्वारा चुनावी रैली में यह नारा लगाने पर उन्‍होंने उनका मज़ाक बनाया था?

रवीश ने उस वक्‍त बुलेटिन खोलते ही व्‍यंग्‍य मिश्रित आधी हंसी में ज़ोर से कहा था ”जय श्रीराम” और उपहास किया था कि आज के ज़माने में कोई ऐसा नारा लगाए तो उस पर क्‍यों न हंसा जाए! आज वे चुप रहे। वे आदमी-आदमी का फ़र्क जो समझते हैं। लो भाई, ज़माना बदल गया। अब हंसो! ज़ोर से हंसो! रावण की तरह हंसो! इतना हंसो कि तर जाओ, हंसो और मर जाओ! या हुसैन…!!!

Anita Choudaary : रावण दहन के बहाने ही सही, जय श्री राम के हुंकार के साथ “साहेब” आखिर राम की शरण में आ ही गए… जे हुयी न बात, लेकिन आते-आते 12 साल 4 महीने और 15 दिन लग गए.. चलो कोई नहीं भले देर आये हो साहेब मगर दुरस्त जरूर आना .. अब तो बस इंतज़ार है, रामराज्य आएगा या रावण और सुपर्णनखा का जंगल राज्य कायम रहेगा.. वैसे एक बात गाँठ बाँध ली साहेब “बहुत कठिन है डगर ….., “सर्जिकल स्ट्राइक” भी काम न आया तो लग जाएगी ….

Om Thanvi : पांच रोज़ पहले प्रधानमंत्री ने अपने ही लोगों से कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानबाज़ी न करें। आज लखनऊ में अपने स्वागत में “प्रतिशोधक” के रूप में लगे पोस्टरों के बीच उन्होंने जिस तरह आतंकवाद के हवाले से राम और रावण के संघर्ष का ज़िक्र किया, जिस अन्दाज़ में “युद्ध” शब्द का एकाधिक बार प्रयोग किया, गदा उठाई, तीर चलाया, सुदर्शन चक्र थामा – उसे देख क्या अब भी किसी को शक़ होगा कि सेना की बहादुरी को भाजपा नेता अपने नेता की बहादुरी का नमूना बनाकर उत्तर प्रदेश चुनाव में इस्तेमाल करने वाले हैं। विजयादशमी के दिन प्रधानमंत्री का लखनऊ जाना अपने आप में इस योजना का हिस्सा ज़ाहिर होता है। अजीबोग़रीब ही है कि “प्रतिशोधकों” वाले पोस्टरों पर भाजपा नेताओं के ढेर चेहरे मंडित थे, पर एक भी सैनिक उनमें कहीं नहीं था।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, अनीता चौधरी और ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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भांड पत्रकारिता के दौर में देश का मनोबल बढ़ा हुआ है

-रवीश कुमार-

बलों में बल मनोबल ही है। बिन मनोबल सबल दुर्बल। संग मनोबल दुर्बल सबल। मनोबल बग़ैर किसी पारंपरिक और ग़ैर पारंपरिक ऊर्जा के संचालित होता है। मनोबल वह बल है जो मन से बलित होता है। मनोबल व्यक्ति विशेष हो सकता है और परिस्थिति विशेष हो सकता है। बल न भी रहे और मनोबल हो तो आप क्या नहीं कर सकते हैं. ये फार्मूला बेचकर कितने लोगों ने करोड़ों कमा लिये और बहुत से तो गवर्नर बन गए। जब से सर्जिकल स्ट्राइक हुई है तमाम लेखों में यह पंक्ति आ जाती है कि देश का मनोबल बढ़ा है। हमारा मनोबल स्ट्राइल से पहले कितना था और स्ट्राइक के बाद कितना बढ़ा है,इसे कोई बर्नियर स्केल पर नहीं माप सकता है। तराजू पर नहीं तौल सकता है। देश का मनोबल क्या होता है, कैसे बनता है, कैसे बढ़ता है, कैसे घटता है।

स्ट्राइक से पहले बताया जा रहा था कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है,क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, विदेशी निवेश के अरबों गिनाये जा रहे थे, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, दुनिया में पहली बार भारत का नाम हुआ था, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, इतने शौचालय बन गए, सस्ते में मंगल ग्रह पहुंच गए, रेल बजट भी समाप्त हो गया, योजना आयोग नीति आयोग बन गया, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा। मनोबल कितना होता है कि इन सबसे भी पूरा नहीं बढ़ता है। हम कैसे मान लें कि सेना के सर्जिकल स्ट्राइक से मनोबल पूरी तरह बढ़ गया है। अब और बढ़ाने की गुज़ाइश नहीं है। देश का मनोबल एक चीज़ से बढ़ता है या कई चीज़ों से बढ़ता है। एक बार में बढ़ता है या हमेशा बढ़ाते रहने की ज़रूरत होती है। इन सब पर बात होनी चाहिए। मनोबल को लेकर अलबल नहीं होना चाहिए।

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश का मनोबल बढ़ा हुआ बताने वाले तमाम लेखकों के ढाई साल पुराने पोस्ट देखिये। उनके जोश और उदंडता से तो नहीं लगेगा कि मनोबल की कोई कमी है। सोशल मीडिया पर गाली देने वालों का कितना मनोबल बढ़ा हुआ है। वो लगातार महिला पत्रकारों को भी तरह तरह से चित्रित कर रहे हैं। उनका कोई बाल बांका नहीं कर पा रहा है। फिर हम कैसे मान लें कि देश का मनोबल बढ़ा हुआ नहीं था। ये देश का मनोबल कहीं किसी दल का मनोबल तो नहीं है। 80 फीसदी गौ रक्षकों को फर्ज़ी बताने के बाद भी मनोबल नहीं घटा। रामलीला में नवाज़ुद्दीन को मारीच बनने से रोकने वालों का मनोबल क्या सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से बढ़ा हुआ है या पहले से ही उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। क्या इसलिए मनोबल बढ़ा है कि नवाज़ को रामलीला से निकाल देंगे। हत्या के आरोप में बंद नौजवान की दुखद मौत पर क्या लिखा जाए। लेकिन उसे तिरंगे से लिपटाना क्या ये भी बढ़े हुए मनोबल का प्रमाण है।

सरकार परस्ती करने वाले चैनलों का मनोबल तो पहले से ही बढ़ा हुआ था। आपको कब लग रहा था कि उनमें मनोबल की कमी है। कुछ डर गए तो सुरक्षा बल भी प्रदान कर दिया गया। जिनसे सरकार को डर लगता है उन्हें खुला छोड़ दिया गया। क्या किसी मनोबल की कमी के कारण दर्शक पाठक पत्रकारिता के इस पतन को स्वीकार कर रहे है। इतिहास उन्हें कभी न कभी अपराधी ठहरायेगा। वक्त इंसाफ करेगा कि जब पत्रकारिता सरकार की भांड हो रही थी तब इस देश के लोग चुपचाप पसंद कर रहे थे क्योंकि उनका मनोबल इतना बढ़ गया था कि वे अपनी पसंद की सरकार और पत्रकारिता की स्वायत्तता में फर्क नहीं कर सके। वे चैनलों को ही सरकार समझ बैठे थे। कहना मत कि वक्त पर नहीं बताया। इसी कस्बा पर दस साल से लिख रहा हूं। चैनल ग़ुलाम हो गए हैं। हम मिट चुके हैं। हम मिटा दिए गए हैं।

जब जनता ही साथ नहीं है तो पत्रकार क्या करे। बेहतर है अख़बार के उस कागज़ पर जूता रगड़ दिया जाए जिस पर लिखकर हम कमाते हैं। उसे न तो पत्रकारिता की ज़रूरत है न पत्रकार की। एक भांड चाहिए,सो हज़ारों भांड दे दो उसे। ठूंस दो इस देश के दर्शकों के मुंह में भांड। दर्शकों और पाठकों की ऐसी डरपोक बिरादरी हमने नहीं देखी। इन्हें पता नहीं चल रहा है कि हम पत्रकारों की नौकरी की गर्दन दबा कर लाखों करोड़ों को ग़ुलाम बनाया जा रहा है। मेरे देश की जनता ये मत करो। हमारी स्वतंत्रता के लिए आवाज़ तो उठाओ। हमारी कमर तोड़ दी गई है। हमीं कितना तपे आपके लिए। आप रात को भांडगिरी का नाच देखिये और हम नैतिकता का इम्तहान दे। कौन से सवाल वहां होते हैं जो आप रातों को जागकर देखते हैं। सुबह दफ्तर में इस भांडगिरी की बात करते हैं। खुजली है तो जालिम लोशन लगाइये। टीवी के डिबेट से और पत्रकारिता की भांडगिरी से मत ठीक कीजिए। आपके सवालों को ठिकाने लगाकर आपको चुप कराया जा रहा है और आप खुश हैं कि मनोबल बढ़ गया है।

फिर कौन कहता है कि मनोबल गिरा हुआ था। फिर कैसे मान ले कि मनोबल बढ़ा हुआ है। जब देश का मनोबल बढ़ा था तब लुधियाना के किसान जसवंत का मनोबल क्यों नहीं बढ़ा। क्यों वह पांच साल के बेटे को बांहों में भर कर नहर में कूद गया। तब तो सर्जिकल स्ट्राइक हो गई थी। क्या फिर भी उसका जीने का मनोबल नहीं बढ़ा। क्या तब भी उसे यकीन नहीं हुआ कि वह भी एक दिन भारत से भाग सकता है। जब भारत की सरकार माल्या को सात महीने से वतन नहीं ला सकी तो दस लाख वाले कर्ज़े के किसान को भारत लाने के लिए करोड़ों खर्च कभी कर सकती है। कभी नहीं करेगी। काश जसवंत माल्या होता। अपने जिगर के टुकड़े को सीने से दबाये नहर में नहीं कूदता। लंदन भाग जाता। जसंवत की मौत पर पंजाब की चुप्पी बताती है कि वाकई उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। उन्हें अब जसवंत जैसे किसानों की हालत से फर्क नहीं पड़ता है। लोगों को मनोबल मिल गया है। कोई बताये कि कर्ज़ से दबे किसानों का भी मनोबल बढ़ा होगा क्या। हम इस पंजाब को नहीं जानते। हम इस पंजाबीयत को नहीं जानना चाहते। लंदन कनाडा की चाकरी करते करते, हमारा वो जाबांज़ पंजाब ख़त्म हो गया है। आप कहते हैं देश का मनोबल बढ़ा हुआ है।

मान लीजिए मनोबल बढ़ा है। ये भी तो बताइये कि इस बढ़े हुए मनोबल का हम क्या करने वाले हैं। यूपी चुनाव में इस्तमाल करेंगे या कुछ निर्यात भी करेंगे। दुनिया के कई देशो में भी मनोबल घटा हुआ होगा। हम मनोबल निर्यात कर उनका हौसला तो बढ़ा सकते हैं। क्या हम मनोबल के सहारे पांच साल में बेरोज़गारी के उच्चतम स्तर पर पहुंचने का कार्यकाल और दस साल बढ़ा सकते हैं। क्या हमारे युवा इस बढ़े हुए मनोबल के सहारे और दस साल घर नहीं बैठ सकते हैं। क्या उत्तराखंड के उस दलित परिवार का भी मनोबल बढ़ा होगा जिसके बेटे की गरदन एक मास्टर ने काट दी। सिर्फ इस बात के लिए कि उसने चक्की छू दी। वो भी ठीक उसी दौरान जब सेना की कार्रवाई के कारण देश का मनोबल बढ़ा हुआ था।

सर्जिकल स्ट्राइक से जब देश का मनोबल बढ़ा हुआ है तब फिर यज्ञ कराने की ज़रूरत क्यों है। क्या देश का मनोबल बढ़ाने वाली सेना का मनोबल घट गया है। क्या सेना को भी यज्ञ की ज़रूरत पड़ गई। हर साल बारिश न होने पर यज्ञ की ख़बरें चलती हैं। टीवी चैनलों पर। किसी मैच से पहले यज्ञ होने लगता है। बारिश नहीं होती है। टीम हार जाती है। ये कौन से यज्ञ हैं जो होते हैं मगर होता कुछ नहीं है। देश का मनोबल बढ़ा है। मनोबल के नाम पर राजनीतिक उत्पात बढ़ा है। पदों पर बैठे लोगों की शालीनता रोज़ धूल चाट रही है। आप बयान में कुछ और सुनते हैं। होते हुए कुछ और देखते हैं। आप देखेंगे कैसे जब कोई सवाल करेगा तब न। आप पत्रकार से क्यों पूछते हो। उनसे पूछो जिन्हें आप वोट देते हैं। उनसे पूछिये कि आपके राज में प्रेस की स्वतंत्रता क्यों ख़त्म हो गई। पत्रकार क्यों भांड हो गया। क्या पत्रकारों का चैनलों का भांड होना मनोबल का बढ़ना है। मुबारक हो आप सभी को। आपका मनोबल बढ़ चुका है। बलों में इस बल का जश्न मनाइये। हम भी मनाते हैं। एलान कीजिए। बर्तन ख़ाली हैं। गर्दन में फांसी हैं। फ़िक्र नहीं है हमको। हमारा मनोबल बढ़ा हुआ है।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी के जाने माने एंकर और पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग कस्बा से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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संकट होता है तब, जब आप किसी को ‘कल्ट’ बना देते हैं, जैसे रवीश भी कल्ट बना दिये गये हैं!

Sanjeev Chandan : रवीश कुमार को मैं भी पसंद करता हूं, उनकी पत्रकारिता को, उनके गद्य को। उनकी प्रतिबद्धता का भी कायल हूं, और उन्हें किसी भी पक्ष के द्वारा बुली किये जाने का सख्त विरोधी हूं। विरोध गाहे- बगाहे लिखकर भी प्रकट करता रहा हूं। लप्रेक के उनके प्रयोग से बहुत वास्ता न होते हुए भी उनके संग्रह की कुछ कहानियां मुझे बहुत पसंद है- खासकर डा. आंबेडकर की मूर्ति के पास प्रेमी-युगलों के संवाद वाली कहानी।

मेरे ख्याल से दो- एक बार तो जरूर मिला होउंगा, तब, जब वे स्टार नहीं हुए थे- एक बार संभवत: जेएनयू में, एक बार दफ्तर में। कई बार फोन या एसएमएस से संपर्क भी रहा- कुछ- एक दफा उन्होंने हिंदी विश्वविद्यालय में हमारे संघर्ष को कवर भी कराया। पिछली बार मावलंकर हॉल में ‘प्रतिरोध’ कार्यक्रम में देखा उन्हें विनीत कुमार के साथ, बगल से गुजरा, लेकिन या तो किसी जल्दी के कारण या सहज उत्सुकता न होने के कारण मैं उनकी ओर न बढ़ पाया। यह ठीक वैसा ही था, जैसे कल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर विनोद दुआ के साथ आगे- पीछे स्कलेटर पर चढ़ने के बावजूद टोकने की उत्सुकता न होना।

संकट है, संकट होता है तब, जब आप किसी को ‘ कल्ट’ बना देते हैं। रवीश भी कल्ट बना दिये गये हैं, बन जाने का चुनाव शायद ही उनका हो। इसके पहले भी नामवर सिंह के साथ आपने यही किया था। नुकसान आपके सामने है- प्रगतिशील नामवर का सबकुछ आपको झेलना है। ऐसा क्या महान हो गया जब रवीश ने Swarn Kanta के बारे में लिखा! आप कनेक्शन तलाशने लगे। स्वर्णकांता डिजर्ब करती हैं। जिस मुद्दे ने उन्हें रवीश के ब्लाग ‘कस्बा‘ में लिखने का विषय बनाया, उस मुद्दे पर स्वर्णकांता खुद बीबीसी में बोल चुकी थीं- वे खुदमुख्तार हैं और प्रतिभाशाली भी। रवीश ने हिंदी की लड़कियों के रूप में उन्हें चिह्नित कर लिखा , मैं समझ नहीं पाया कि वे किस ऑडियंस को ऐड्रेस कर रहे थे।

खैर, रवीश का लिखना ठीक वैसा ही है, जैसा हिंदी या अन्य भाषाओं के दूसरे पत्रकारों का लिखना- हां प्रतिबद्धता का दायरा बड़ा है। लेकिन उनके लिखने ने स्वर्णकांता को परेशान भी कर डाला, एक पोस्ट लिखने को विवश । ऐसा क्यों होता है- ऐसा इसलिए कि आप स्क्रीन बौद्धिकता, स्क्रीन ऐक्टिविज्म से आक्रांत है। अन्यथा बीबीसी में अपनी बात कहकर स्वर्णकांता पहले ही लाखो ऑडियंस तक पहुंच चुकी थीं। स्वर्णकांता बीबीसी में लिखने के पहले भी स्वर्णकांता थीं,उसके बाद भी और ‘कस्बा’ का विषय बनने के बाद भी वे स्वर्णकांता हैं। बहुत हद तक अब वे मुक्ता ( उनका पहला नाम, जिससे अविनाश दास ने प्यार किया था) भी नहीं रहीं- वे स्वर्णकांता हैं।

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट संजीव चंदन की एफबी वॉल से.

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रवीश के इस प्राइम टाइम को देखने के बाद यशवंत ने क्या लिखा FB पर, आप भी पढ़ें

यशवंत

Yashwant Singh : न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया आपको मानसिक रोगी बना सकते हैं। कल बहुत दिन बाद न्यूज़ चैनल खोला तो अपनी पसंद के अनुरूप ndtv प्राइम टाइम रविश कुमार को देखा। मनोरोग सप्ताह मनाए जाने के दौरान ndtv ने प्राइम टाइम में इसी सब्जेक्ट को चुना। इसी कार्यक्रम में रविश ने बताया कि ताजा शोध के मुताबिक दुनिया भर में न्यूज़ चैनल्स लोगों को मनोरोगी बना रहे हैं।

यही हाल सोशल मीडिया का है। कल का ndtv prime time show आपने मिस किया है तो उसका वीडियो ढूंढ कर ज़रूर देखें। न ढूंढ पाएं तो इस लिंक https://goo.gl/JHyjk3 पर क्लिक करें. इस उन्मादी दौर और दौड़ में अगर आप खुद का धैर्य खोता देख रहे हैं तो कुछ दिन टीवी मोबाइल को अलविदा कह मेरे पास आ जाएं। दोनों भाई गले मिल रोएंगे-गाएंगे।

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अतिवादियों से बच के रहें। खासकर राजनीतिक। जो लोग दिन भर सिर्फ मोदी या केजरी या राहुल या संघ या कम्युनिस्ट या पाकिस्तान या चीन या हिन्दू या मुसलमान विरोधी पोस्ट लिखते रहते हैं, ये भी मनोरोगी हैं। इनसे दूर रहें। इन्हें unfriend करें। ये आपको जबरन मनोरोगी बना रहे हैं।

आपके न चाहते हुए भी आप इनके मनोरोग के वर्तुल में खींचे जा रहे हैं। ये जो उगलते हैं, लगातार, धारा प्रवाह, एक ही सुर में, न चाहते हुए भी आप इन्हें सुनते पढ़ते हैं और चुपचाप इनकी वैचारिक विकृति को कन्सीव करते जाते हैं। ऐसा लगतार होने से आप तटस्थ नहीं रख पाते खुद को और कुछ न कुछ लिख बोल देते हैं।

इस तरह आप अनजाने में ही मनोरोगियों के एक अंतहीन युद्ध / विकार के शिकार लोगों के गैंग के सदस्य बन जाते हैं। बहुत मुश्किल है सहज मनुष्य बने रहना। बड़ा आसान है मनोरोगी बन जाना। ये दौर ऐसा है दोस्तों। आओ, प्रेम करें, हंसें, गाएं। एक पल का जीवन है, यूँ न गवाएं।

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मेरे प्यारे मित्र और आकाशवाड़ी के जाने माने एनाउंसर Ashok Anurag जी द्वारा सृजित इन 2 लाइनों पर गौर फरमाएं और पसंद आए तो कमेंट बॉक्स में वाह करें…

अजनबी शहर में जाने कौन था पहचान वाला,
जिस तरफ़ से गुज़रा, पत्थर बेशुमार चले।

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और आखिर में एक चुटकुला…

संता शराब पीते पीते रोने लगा…..

बंता : क्या हुआ… रो क्यूं रहे हो?

संता : यार जिस लड़की को भूलने के लिए पी रहा था, उसका नाम याद नहीं आ रहा.

उपरोक्त चारों स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vinod Sirohi मई 2014 से टीवी नहीं देखा है और न्यूज़ पेपर भी 2 महीने से पढ़ने शुरू किए हैं क्यूंकि उसकी आवश्यकता नौकरी के हिसाब से हो गयी है| दोनों ही दुनिया में उन्माद भर रहे हैं| मनोरोगी तो बना चुके हैं| इस प्रकार दिखाते हैं कि किसी देश के एक व्यक्ति का ब्यान मानो उस पूरे देश का बयान है और सोच है| किसी जाति या धर्म के एक व्यक्ति का कथन पूरे धर्म की सोच हो| आज जावेद मियांदाद का कुछ बयान प्रमुखता से छपा है| आप छाप भी रहे हो और आलोचना भी कर रहे हो| इससे अच्छा है छापिए ही मत| बेहूदी बातों पर क्यों ध्यान देते हो| न गलत बोलो न गलत पर ध्यान दो| अब तो मुख्यतः उकसाना, उलझाना, बहलाना, गरमाना काम है। समझाना, बतलाना, सुनाना बंद है| कोई चिंतन या मनन नहीं| राहत की बात है कि नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा समाचारों से दूर हो रहा है| काम में बिजी लोगों को फालतू लफड़ों की फुर्सत नहीं है। अभी यहां लोग फुर्सत में हैं|

Anil Dwivedi : भाई Yashwant Singh को अभी पढ़ा , उनके विचारो से सहमति रखते हुए आप सबसे गुज़ारिश है कि कट्टरता के मनोरोग से बचें! ये मनोरोग आपको उन्मादी, आक्रामक, असहिष्णु, जिद्दी और आत्ममुग्ध बना देगा। इसलिए तुरंत ही अतिवादी कांग्रेसी, भाजपाई, आपिये, समाजवादी, हिंदूवादी, राष्ट्रवादी, मुस्लिमवादी से मुक्ति पाइये , तुरंत रिमूव करे ऐसे लोगो को , आइये प्यार बाँटें और मनोरोग से मुक्ति पाएं.

Madan Tiwary : दारु की व्यवस्था कीजिये, आ जाते है. वैसे तो अब बिहार ही छोड़ने का मूड कर रहा है. मर रहा है स्टेट. पहले भी कुछ नहीं था. अब तो सब कुछ ख़त्म हो गया. रात में आप नेचरुल प्लेस पर जा नहीं सकते. पहाड़, नदी किनारे टहल नहीं सकते. सड़क किनारे सन्नाटे में बैठ नहीं सकते।

Ghanshyam Dubey : मैंने भी कल उसी अड्डे पर देखा। पागलपन और उन्मादी माहौल मे सकरातमक बातों की ओर ध्यान खींचा जा सकता है। NDTV यह करता रहा है।

आशीष सागर : मैंने पिछले दो साल से न्यूज़ चैनल देखना बंद कर रखा है और सोशल मीडिया में सिर्फ फेसबुक ही

Deepak Tamrakar : सही कहा सर. जल्द तैयारी करते हैं दिल्ली की तरफ.

Yogesh Garg : इन मनोरोगियों पर एक कैम्पेन चलाया जाए

Journalist Atul : बिल्कुल भैया…और कल मैं भी ऐसे ही दो तीन मनोरोगियों का शिकार हो गया था और सुबह 2:50 तक एक अतार्किक औचित्यहीन युद्ध करता रहा..

Yashwant Singh : पिछले कुछ हफ्ते से सोशल मीडिया का हाल बहुत बुरा हो चला है। कम से कम समय इस पर रहें। अगल बगल घूमें, मस्त रहें।

Journalist Atul : जैसा आपका आदेश.

Prashant Mishra : कई दिन बाद इस “लीहो लीहो” के दौर में सही लिखे हैं.. सही बात है जी… मनोरोगी… खतरनाक टैम चल रहा जी…

Vijay Prakash Ray : मनोरोगी का इलाज है सर लेकिन नमोरोगी का नहीं।

Siddharth Pandya गुर्बत और जहालत की जब शादी होती है….तो उनका बच्चा पैदा होता है जिसे कहते है जज्बातियत…दोनो देशो मे यह लोग बडी तादाद मे पाये जाते हैं. बाकी आपकी बात सोला आने सच है.

DrMandhata Singh यशवंतजी यह उन लोगों पर लागू होता है जो पहले से ही रोगी होते हैं। आपको कोई एडिक्ट बना सकता है। जिनके जीवन में संघर्ष नहीं, कोई अनुशासन नहीं, कोई लक्ष्य नहीं ऐसे बैठे ठाले खुद को नाकारा बना रहे लोग तो किसी भी बात के शिकार हो सकते हैं। हां इन दशा में कोमल मन वाले बच्चों को बचाने की जिम्मेदारी हमारी आपकी है।

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प्रधानमंत्री को लात मारना या गोली मारना टाइप के अतिरेक से बचना चाहिए : रवीश कुमार

Ravish Kumar : गोली मार देने की बात मुझे नहीं जंची, भले ही यह बात इसलिए कही गई हो कि ठोस तरीके से मैसेज चला जाए. मेरी राय में प्रधानमंत्री को ऐसे अतिरेक से बचना चाहिए था. जिन गौ रक्षकों को वे दो दिन से असामाजिक तत्व, नकली गौ रक्षक, भारत की एकता को तोड़ने वाला मुट्ठी भर समूह बता रहे थे, उनके लिए यह कहना कि मुझे गोली मार दो मगर मेरे दलित भाइयों को मत मारो. जो लोग प्रधानमंत्री की नज़र में कानून और समाज के अपराधी हैं उन्हें हमारे प्रधानंत्री को गोली मारने की इजाज़त कतई नहीं दी जा सकती. इलाहाबाद की परिवर्तन रैली में भी प्रधानमंत्री ने कह दिया था कि मुझे यूपी में एक बार मौका दीजिए, पांच साल में अपने किसी काम के लिए आपका नुकसान कर दिया तो मुझे लात मार कर बाहर कर दीजिएगा.

प्रधानमंत्री को लात मारना या गोली मारना टाइप के अतिरेक से बचना ही चाहिए. जिस समस्या पर वे बोल रहे थे उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी उनकी तो बनती ही है, क्योंकि कई घटनाएं उनके या उनकी पार्टी की शासित राज्यों में हुई हैं. मगर ऐसा नहीं है कि दलितों पर हिंसा की घटना दूसरे दलों की सरकारों में नहीं हुई है. दलितों पर अत्याचार की घटना वहां भी हो रही है या हुई है जहां बीजेपी की सरकार नहीं है. लेकिन देश के प्रधानमंत्री के नाते या कई राज्यों में सरकार चलाने वाली बीजेपी के सर्वोच्च नेता होने के नाते वे यह चेतावनी पहले भी दे सकते थे. न देने के कारण कई लोगों में संदेश गया कि इन गौ रक्षकों को बीजेपी की सरकारों का संरक्षण प्राप्त है, संघ और संघ के संगठनों का समर्थन प्राप्त है. इसलिए इनके खिलाफ बीजेपी शासित सरकारों ने भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की मगर यह भी सही है गैर बीजेपी सरकारों ने भी इन गौ रक्षकों को वैसी ही छूट दी. उन्होंने ने भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. वे भी लाचार नज़र आए. इसलिए प्रधानमंत्री इस समस्या को संबोधित करें, न कि इसके बहाने ख़ुद को.

पर प्रधानमंत्री के दूसरे रूप को देखना है तो आप जीएसटी पर दिए गए उनके भाषण को सुन सकते हैं. एक टेक्निकल विषय को वे कितनी सरलता से सदन में बोल गए. सरलता से भी और उदारता से भी. अगर वित्त मंत्री को बुरा न लगे तो वे प्रधानमंत्री से ये कला सीख सकते हैं कि जीएसटी पर जनता से कैसे संवाद किया जा सकता है. लेकिन क्या बात है कि जीएसटी पर सरलता और उदारता से बोलने वाले प्रधानमंत्री के गौ रक्षकों पर दिए बयान को विपक्ष ने उस तरह स्वागत नहीं किया जिस तरह पाकिस्तान में राजनाथ सिंह के भाषण का किया. पहली आलोचना यह हुई कि पहला कि उन्होंने सिर्फ दलितों के बारे में कहा, मुसलमानों के बारे में नहीं जबकि इस हिंसा के शिकार वे भी हो रहे हैं. दूसरी आलोचना यह हो रही है कि उन्होंने बहुत देर से बोला. लेकिन क्या आलोचक यह नहीं देख पा रहे हैं कि उनके इस बयान से एक झटके में इन गौ रक्षकों की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक मान्यता समाप्त हो गई है. अभी तक ये जब भी स्क्रीन या सड़क पर अवतरित होते थे तो किसी विचारधारा और सरकार के संरक्षण में पलने वाले असामाजिक तत्व लगते थे. प्रधानमंत्री ने इनके असामाजित तत्व होने की पुष्टि कर दी है. पहले भी कुछ लोग इन गौ रक्षकों की हरकतों को भारत के लोकतंत्र का ख़तरा बता रहे थे, फर्क ये था कि तब सोशल मीडिया के उत्पाती समर्थक इन्हें सरकार विरोधी चश्मे से देख रहे थे, भारत को बदनाम करने वाले तत्व के रूप में देख रहे थे.

प्रधानमंत्री यही बात पहले कह देते तो हमारे गुजरात के ऊना में चार दलित युवकों को अर्धनग्न कर पीटने का साहस कोई दल नहीं कर पाता. मध्य प्रदेश के रेलवे स्टेशन पर एक गरीब महिला को उतार कर उसे मारा नहीं जाता. मारने के बाद उसे गिरफ्तार करने की हिम्मत न होती. न ही हरियाणा में उस व्यक्ति को गौ रक्षक ट्रक से उतार कर गोबर और मूत्र पिला पाते. दादरी के अख़लाक़ की हत्या न होती और उसके बाद कुतर्कों की राजनीति न होती. कम से कम प्रधानमंत्री उस वक्त तो रोक ही सकते थे जब बिहार के चुनावों में बीजेपी के पोस्टरों पर गाय की तस्वीर छप रही थी. ऐसे भड़काऊ पोस्टरों के बारे में ही चुनाव आयोग ने केंद्र से स्पष्ट अधिकार मांगे हैं ताकि इन पर पाबंदी लगाई जा सके.

ये नकली गौ रक्षक कौन हैं. ये किस विचारधारा के राजनीतिक आश्रम में पलते बढ़ते हैं. सच बात ये है कि ये तब भी थे जब बीजेपी की सरकार केंद्र या कई राज्यों में नहीं थी. हो सकता है कि इनका उत्पात दो साल में ज्यादा बढ़ गया हो. जब केंद्र के मंत्री और बीजेपी के नेता गौ रक्षा के नाम पर उन्हीं तेवरों में बयान देने लगें तो क्या असमाजिक कार्य करने वाले गौ रक्षक, दोनों एक ही भाषा में बात करते नज़र नहीं आए. प्रधानमंत्री और संघ ने राज्य सरकारों को यह कह कर खुला संदेश दे दिया है कि इन सबका बायोडेटा तैयार हो और सख्त कार्रवाई की जाए. उनके बयान का यह सबसे मज़बूत पक्ष है वे उन्हीं राज्य सरकारों को कार्रवाई के लिए कह रहे हैं जिन पर शह देने के आरोप हैं. देखते हैं किस राज्य में कार्रवाई होती है. मध्य प्रदेश में या हरियाणा में या यूपी बिहार या बंगाल में. प्रधानमंत्री के बयान से गौ रक्षक मचल गए हैं, आरएसएस ने भी रविवार रात बयान जारी कर प्रधानमंत्री के बयान का समर्थन कर दिया. आरएसएस ने भी कहा है कि समाज के कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा गौ रक्षा के नाम पर कुछ स्थानों पर कानून अपने हाथ में लेकर एवं हिंसा फैलाकर समाज का सौहार्द दूषित करने के प्रयास किये जा रहे हैं. इससे गौ रक्षा और गौ सेवा के पवित्र कार्य के प्रति हिंसा फैलाकर समाज का सौहार्द दूषित करने के प्रयास किये जा रहे हैं. आरएसएस देशवासियों से आह्वान करता है कि गौ रक्षा के नाम पर कुछ मुट्ठी भर अवसरवादी लोगों के ऐसे निंदनीय प्रयासों को, गौ रक्षा के पवित्र कार्य में लगे देशवासियों से ना जोड़ें और उनका असली चेहरा सामने लायें.

चप्चे चप्पे पर अपने संगठन और शाखा की मौजूदगी का दावा करने वाले संघ को भी लोगों से अपील करनी पड़ रही है कि वे ऐसे लोगों का असली चेहरा सामने लायें. ये अपील अपने स्वयंसवेकों से करनी थी कि आप पता कर बीजेपी सरकारों के मंत्रियों को सूचना दें और कार्रवाई करवायें. लेकिन संघ का एक और बयान है, दूसरा बयान क्यों जारी करना पड़ा ये तो हम नहीं बता सकते लेकिन उसमें काफी कुछ बदला बदला सा लगा. कहा गया कि वर्तमान समय में देश के विभिन्न स्थानों पर अनुसूचित जाति के बंधुओं पर अत्याचार एवं उत्पीड़न की हो रही घटनाओं की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कड़े शब्दों में घोर निंदा करता है. कानून अपने हाथ में लेकर अपने ही समाज के बंधुओं को प्रताड़ित करना यह केवल अन्याय ही नहीं, अमानवीयता को भी प्रकट करता है.

क्या अनुसूचित जाति जोड़ने के लिए सोमवार को बयान जारी हुआ. पर दोनों ही बयान में मुसलमानों का कोई ज़िक्र नहीं आया. इसके अलावा संघ कुछ बैलेंस भी करता नज़र आया. प्रधानमंत्री ने सत्तर अस्सी फीसदी गौ रक्षकों को असमाजिक तत्व कहा है. संघ के बयान में कुछ मुट्ठी भर गौ रक्षकों की बात कही गई है. जब गौ रक्षकों के अत्याचार पर राज्यसभा में चर्चा हुई तब विरोधी दल के सांसदों के अलावा मायावती ने साफ-साफ कहा था कि गौरक्षा के नाम पर पहले पूरे देश के अंदर मुसलमान के साथ उत्पीड़न किया गया, युवक के साथ किया गया और अब मध्य प्रदेश में जहां बीजेपी की सरकार है, वहां पर महिलाओं को सरेआम पीटा गया, पुलिस तमाशा देखती रही, भीड़ तमाशा देखती रही. इस संबंध में सरकार क्या कहना चाहेगी?

प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा कि गायों को प्लास्टिक खिलवाना बंद कर दिया जाए तो वही सबसे बड़ी गौ रक्षा होगी. उन्हें अपनी पार्टी की सरकारों को भी अलग से निर्देश देना चाहिए था कि क्योंकि मध्य प्रदेश और राजस्थान ने गाय से संबधित विभाग की स्थापना की है. इसके बाद भी राजस्थान पत्रिका की इस खबर के मुताबिक राजस्थान के जयपुर के हिंगोनिया गौ शाला में पिछले तीन साल में 27,000 गायें मर गईं. हम अपनी तरफ से इस रिपोर्ट की पुष्टि नहीं कर सकते फिर भी यह संख्या इतनी बड़ी है कि गौ शालाओं के भीतर की कुव्यवस्था पर ईमानदार नज़र की मांग करती है. बीमारी के कारण गायों की मौत होती है लेकिन भूख से एक भी गाय मरी है तो यह दर्दनाक है. संघ को भी उन सच्चे गौ रक्षकों से पूछना चाहिए था कि वे गायों की रक्षा करते करते कहां निकल गए हैं कि गौ शालाओं में गायें मर रही हैं. गायें जब गौ शालाओं में सुरक्षित नहीं है तो कहां हैं. यह सवाल सिर्फ राजस्थान से ही नहीं बल्कि बिहार और बंगाल से भी पूछा जाना चाहिए कि उनके यहां की गौ शालाओं की क्या स्थिति है.

एनडीटीवी में कार्यरत चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मीडिया के जरिए जनता के साथ क्या खेल खेला जा रहा है, बता रहे हैं रवीश कुमार

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शिवपाल ने सपा कार्यकर्ताओं के अपराधीकरण की पुष्टि कर दी तो नरेंद्र मोदी ने गौ रक्षकों को असमाजिक मान लिया!

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कश्मीर में मीडिया पर बैन का कोई तुक नहीं बनता : रवीश कुमार

कश्मीर में अख़बार बंद है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आज दूसरा दिन है जब वहाँ किसी को अख़बार नहीं मिला है। राज्य सरकार ने अख़बारों के छपने और वितरण पर रोक लगा दी है। दिल्ली की मीडिया में ख़बरें आई हैं कि कर्फ़्यू के कारण वितरण रोका गया है। छपी हुई प्रतियाँ ज़ब्त कर ली गई हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट भी बंद है। कर्फ़्यू के कई दिन गुज़र जाने के बाद राज्य सरकार को ख़्याल आया कि अख़बारों को बंद किया जाए। क्या कर्फ़्यू में दूध,पानी सब बंद है? मरीज़ों का इलाज भी बंद है? आधुनिक मानव के जीने के लिए भोजन पानी के साथ अख़बार भी चाहिए। सूचना न मिले तो और भी अंधेरा हो जाता है। अफ़वाहें सूचना बन जाती हैं और फिर हालात बिगड़ते ही हैं, मन भी बिगड़ जाते हैं। खटास आ जाती है।

वहाँ पहले भी हालात के बिगड़ने पर अखबारों के छपने पर रोक लगती रही है। पर पहले के नाम पर कब तक आज वही सब होता रहेगा। क्या वहाँ आतंकवाद अख़बारों के कारण फैला था? क्या बुरहान वहाँ की मीडिया की देन है? क्या मौजूदा हालात के लिए स्थानीय मीडिया ही ज़िम्मेदार है? क्या वहाँ समस्या के कारण को ढूँढ लिया गया है? उन्हीं अख़बारों से ही तो ख़बर आई थी कि अनंतनाग तीर्थयात्रा मार्ग में स्थानीय मुस्लिमों ने कर्फ़्यू तोड़ कर यात्रियों की मदद की। यह भी ख़बर आई कि मुस्लिमों ने अपने पड़ोसी कश्मीरी पंडित की माँ के जनाज़े को कंधा दिया है। यह भी खबर आई कि कई कश्मीरी पंडित फिर से भाग आए हैं। सुरक्षाबलों की ज़्यादतियों को भी अख़बार छाप रहे थे। लोगों और सेना दोनों के पक्ष छप रहे थे। इन खबरों से लोग वहाँ की विविधता को देख पा रहे थे। अख़बारों पर पाबंदी लगाकर कश्मीर और शेष भारत के लोगों से यह मौका छिन लिया गया है।

कश्मीर के अख़बारों को कश्मीर के लिए बंद किया गया है या शेष भारत के लिए? पहले भी वहाँ ऐसा तनावपूर्ण माहौल रहा है लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार लोग कश्मीर की ख़बरों के बारे में गहराई से रूचि ले रहे थे। कश्मीर की वेबसाइट की ख़बरें पढ़ी जा रही थीं और साझा हो रही थीं दावे से तो नहीं कह सकता लेकिन पहली बार लगा कि कश्मीर की मीडिया की ख़बरें शेष भारत तक पहुँच रही हैं। दिल्ली से चलने वाली कई वेबसाइट पर कश्मीर की मीडिया और दिल्ली की मीडिया के कवरेज का तुलनात्मक अध्ययन हो रहा था। कश्मीर समाचार पत्रों के नाम भारत में जाने जा रहे थे। उनके संपादक तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों में आकर बोलने लगे।

इससे दोनों जगहों के पाठकों के बीच एक बेहतर समझ बन रही थी। संवाद बन रहा था। कश्मीर की जटिलता से भागने वाले मेरे जैसे पाठकों के पास भी तुलनात्मक अध्ययन का ज़रिया उपलब्ध था। कश्मीर के लोगों को भी लगा होगा कि उनकी बात कही जा रही है। लिखी जा रही है। अख़बार बंद करने से यह संदेश जाएगा कि स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर है और सरकार वहाँ के लोगों से संवाद नहीं करना चाहती है। आख़िर सरकार अपना पक्ष किन माध्यमों के ज़रिये लोगों के बीच रखेगी।

मुझे समझ नहीं आ रहा कि कश्मीरी मीडिया की ख़बरों में ऐसा क्या था जो वहाँ के लोग नहीं जानते हैं और जो वहाँ से बाहर के लोग नहीं जानते हैं? क्या उबलता कश्मीर लिख देने से हालात में उबाल आ जाता है? अगर ये सही है और ये अतिसंवेदनशील सूचना नहीं है तो इसे छपने में क्या दिक्कत है? अगर कश्मीर मीडिया कथित रूप से प्रोपेगैंडा कर रहा था तो क्या हम आश्वस्त है कि दिल्ली का मीडिया ये काम नहीं कर रहा होगा? क्या यही भाव दिल्ली की मीडिया की ख़बरों और संपादकीय लेखों में नहीं है? फ़र्ज़ी ख़बरों के सहारे कैराना को कश्मीर बताकर कौन किसे उबाल रहा था इस पर भी वक्त निकाल कर सोचना चाहिए।

कश्मीर के कई हलकों से आवाज़ आई कि दिल्ली का कुछ मीडिया झूठी बातों को प्रचारित कर माहौल बिगाड़ रहा है।युवा आई ए एस अधिकारियों से लेकर शेष भारत के तमाम लोग दिल्ली की मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं कि कुछ एंकर ऐसे बावले हो गए हैं जिनके कारण हालात और ख़राब हो सकते हैं। आई ए एस शाह फ़ैसल ने साफ साफ नाम लेकर लिखा कि कौन कौन से चैनल हैं जो अफवाह फैला रहे हैं। एक अधिकारी ने तो बकायदा नाम लेकर लिखा है कि एक चैनल माहौल बिगाड़ रहा है।मैं नहीं कहता कि इस आधार पर चैनल के बारे में कोई फ़ैसला कर ही लेना चाहिए लेकिन इस पर चुप्पी भी बता रही है कि कौन किस तरफ है। अगर सरकार की चिन्ता माहौल न बिगड़ने देने की है तो क्या उसने वहाँ के लोगों को आश्वस्त किया है कि वह दिल्ली मीडिया के कुछ तत्वों की भी पड़ताल करेगी। अव्वल तो यह काम सरकार का है नहीं फिर भी उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि उस पर पक्षपात का आरोप न लगे।

बैन का कोई तुक नहीं बनता। न यहाँ न वहाँ । एक अंतर और दिखा। कश्मीर का मीडिया कश्मीर से बात कर रहा था और दिल्ली का मीडिया कश्मीर के बहाने उत्तर भारत में फैले उन्हीं पुरानी धारणाओं को भड़का रहा था जो ट्रकों पर लिखे होते हैं। दूध माँगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर माँगोगे तो चीर देंगे। लेकिन पाबंदी कश्मीर की मीडिया पर लगा दी गई। इससे तो हम कहीं नहीं पहुँचेंगे। ट्रक तो ओवरलोडिंग के जुर्माने से बचने के लिए चुंगी पर रिश्वत देकर निकल जाएगा और हमें दे जाएगा दो टकिया राष्ट्रवाद। जैसे कश्मीर का सवाल दूध भात का सवाल हो।

हर दूसरा विशेषज्ञ लिख रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों को कश्मीर के लोगों से बात करनी चाहिए तो फिर वहाँ के अख़बारों को कश्मीर की और कश्मीर से बात करने की सज़ा क्यों दी गई? वहाँ के अख़बार वहाँ के लोगों से ही तो बात कर रहे थे। सामान्य पाठक कैसे जानेगा कि वहाँ क्या हो रहा है। वहाँ के लोगों में भी भरोसा बनता कि उनकी बातें शेष भारत तक पहुँच रही हैं और लोग उनके बारे में बात कर रहे हैं। हिंसा के रास्ते से कश्मीर को लौटाने के लिए सब यही तो कहते हैं कि बातचीत होती रहे। थोड़े दिनों बाद सारे डाक्टर अपनी पर्ची पर यही लिखेंगे कि सरकार बात करे।

इस वक्त सरकार का काम अख़बार कर रहे हैं। वहाँ के लोगों से वहाँ की बात कर रहे हैं। इससे एक संवाद क़ायम होता है। सही और विविध सूचनाएँ लोगों में आत्मविश्वास पैदा करती हैं। लोकतंत्र के प्रति इस विश्वास को ज़िदा रखती हैं कि बोला-सुना जा रहा है। प्रेस पर पाबंदी है और प्रेस चुप है। हम सबको चुप रहना अब सहज लगता है। उस सोशल मीडिया में भी चुप्पी है जो बिना बुलाए लोकतंत्र के बारात में नाचने आ गया है कि हमीं अब इसके अभिभावक हैं। वह भी चुप है। बोलने की पाबंदी के ख़िलाफ़ सबको बोलना चाहिए। वाजपेयी जी के शब्दों में यह अच्छी बात नहीं है।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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