पटेल की मूर्ति के बहाने आदिवासियों का दमन

आदिवासी, किसान बहुल गांव केवाडिया में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्‍टूबर को नर्मदा तट पर लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 138वीं जयंती के मौके पर विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा ’स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का शिलान्यास करते हुए गर्व से घोषणा की थी कि भारत को श्रेष्ठ बनाने के लिए एकता की शक्ति से जोड़ने का यह अभियान नर्मदा के तट पर एक नई ऐतिहासिक घटना है. वे एक तरफ तो ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ के निर्माण के उनके सपने को साकार करने के लिए सभी का सहयोग, समर्थन और मार्गदर्शन की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं के अधिकारियों द्वारा परियोजना के कारण हो रहे विस्‍थापितों के पुर्नवास के लिए आवाज उठाने वाले आदिवासियों और गैर-आदिवासी किसानों को उनके ही घरों में नजरबंद कर दिया जा रहा है. देशभर से लोहा मांगकर सरदार की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने का दावा करनेवाले मोदी किसी को यह नहीं बता रहे हैं कि वास्तव में इस प्रतिमा के बहाने वे सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाना चाहते हैं और बांध के आस पास पर्यटन विकास के काम के लिए पर्यटन कारीडोर को विकसित करना चाहते हैं.
 
'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी': लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची यह प्रतिमा नर्मदा नदी के बीचों-बीच स्थापित की जा रही है. इसके बेस में स्मारक सहित कई अन्य निर्माण भी किया जाएगा. सरकार के दावे के अनुसार यह मूर्ति अमेरिका की ‘स्टैचू ऑफ लिबर्टी’ से लगभग दोगुनी ऊंची होगी, जो विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति होने का तमगा हासिल करेगी. नदी के बीचों-बीच स्थित इस मूर्ति के पास जाने के लिए जलमार्ग भी बनाया जाएगा. मोदी सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार सरदार पटेल के इस लौह भवन की जो कल्पना की गई है उसमें सरदार की मूर्ति के भीतर 500 फुट पर एक डेक का निर्माण किया जाएगा. बिल्कुल एफिल टॉवर की तर्ज पर. इस डेक तक पहुंचने के लिए सरदार के लौह भवन के भीतर तेज लिफ्ट लगाई जाएंगी और एक वक्त में यहां 200 लोग एकसाथ मौजूद रहकर 12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले विशाल सरदार सरोवर जलाशय का नजारा देख सकेंगे. पहले चरण में तीन साल के भीतर इस भवन के आसपास थीम पार्क, होटल, रेस्टोरेण्ट, अंडरवाटर अम्यूजमेन्ट पार्क जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को साकार किया जाना है. दूसरे चरण में भरुच तक नर्मदा तट का विकास के साथ सड़क, रेल यातायात सहित पर्यटन के अन्य आधारभूत ढांचे का विकास किया जाएगा. इन स्‍थानों पर शिक्षा और अनुसंधान केन्द्र के साथ नॉलेज सिटी, गरुणेश्वर से भाड़भूत तक पर्यटन कारीडोर आदि विकसित किया जाना है. 7 अक्टूबर 2010 को सरकार के दस वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति ‘स्टैचू ऑफ युनिटी’ के निर्माण की घोषणा की थी. ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' नर्मदा बांध के अंदर साधू टापू क्षेत्र में राज्य सरकार की 2500 करोड़ की लागत से आकार लेने वाली है. जबकि वियर-कम-काज-वे योजना 300 करोड़ की है. मूर्ति का निर्माण कार्य आगामी 26 जनवरी से शुरू होने जा रहा है. मुख्य बांध से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर वियर-कम-काज-वे बनाने की शुरुआत हो चुकी है.
 
किसानों के बहाने: गौरतलब है कि नर्मदा घाटी में बांध की योजना 1946 में बनी थी (सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड के अनुसार इस बांध का स्वप्न सरदार वल्लभ भाई पटेल ने ही देखा था). गुजरात के जिस गोरा गांव में इस बांध की नींव रखी गई थी उसकी मूल ऊचाईं 49.8 मीटर निर्धारित की गई थी. उस वक्त जिन चार बांधों को तत्काल प्राथमिकता के आधार पर बनाने का निर्णय लिया गया था वे पानी के प्यासे इलाके थे. गुजरात का भरुच जिला उसमें से एक था, जहां नर्मदा नहर पर बांध बनाकर किसानों के लिए पानी देने की योजना बनाई गई थी. लेकिन किसानों को पानी देने की यह योजना बिजली पैदा करने की योजना में तब्दील कर दी गई.
 
बांध की ऊंचाई बढ़ाने की साजिश: आज नर्मदा नदी के जिस नर्मदा बांध के कारण सरदार सरोवर का निर्माण हुआ है, उस सरोवर पर बनने वाली प्रस्तावित मूर्ति को एकता की बुनियाद बताया जा रहा है, असलियत यह है कि लगातार बढ़ती बिजली की भूख ने इस बांध को बंटवारे का बांध बना दिया है. नर्मदा बचाओ आंदोलन इस पूरे परिवर्तन का साक्षी है. उसी नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख मेधा पाटकर ने सरदार की सबसे ऊंची प्रतिमा पर अपनी जो पहली प्रतिक्रिया दी है उसमें साफ कहा है कि सरदार की सबसे ऊंची प्रतिमा के बहाने असल में बांध की ऊंचाई बढ़ाने की साजिश रची जा रही है जिसके कारण एक बार फिर बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी अपने घरों से दरबदर हो जाएंगे. बांध की ऊंचाई इसके मूल 49.8 मीटर से ऊंचा उठते उठते अब 122 मीटर तक पहुंच चुकी है. अब सरदार की सबसे ऊंची प्रतिमा की आड़ में इस बांध की ऊंचाई 138 मीटर ले जाने की योजना है ताकि पीने के पानी की सप्लाई बढ़ाई जा सके और बिजली की पैदावार भी.
 
सरकार को ऊचाई बढ़ाने का एक वाजिब कारण इसी साल अगस्त में यह मिल गया कि नर्मदा में बाढ़ से नर्मदा घाटी में करीब 70 हजार लोगों को विस्थापित होना पड़ा था. यानी, अब जरूरत इस बात की है बांध की ऊंचाई को जल्द से जल्द वहां पहुंचा दी जाए जहां तक न पानी भरे और न बाढ़ के कारण लोगों को विस्थापित करना पड़े. लेकिन क्या यह विस्थापन सिर्फ बांध में पानी बढ़ जाने के कारण ही होगा? पानी तो आज भरेगा कल उतर जाएगा, इसलिए जो आज विस्थापित होंगे वे कल फिर से अपनी जमीन पर स्थापित हो जाएंगे. लेकिन स्थाई रूप से बांध का स्तर ऊपर उठाया गया तो आस पास के और 70 गांवों के लोग सदा सर्वदा के लिए विस्थापित हो जाएंगे, मोदी की सरकार यह बात नहीं बता रही है. शायद इसीलिए सबसे ऊंची प्रतिमा के भूमिपूजन समारोह में आस पास के गांवों में इसी डर से लोगों को नजरबंद किया गया कि कहीं वे विरोध का नारा लगाते हुए एकता के इस नये इतिहास के खिलाफ विद्रोह का बिगुल न बजा दें.
 
मूर्ति निर्माण को लेकर बवाल: दरअसल, विरोध कर रहे लोगों के अग्रणियों को कलेक्टर कार्यालय में तलब किया गया था, जहां कलेक्टर राकेश शंकर की मौजूदगी में सरदार सरोवर नर्मदा निगम के आला अधिकारियों के साथ बंद कमरे में बैठक हुई थी. राजपीपला नर्मदा जिले का मुख्यालय है. अगस्त में हुई इस बैठक के बारे में अधिकारियों ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया था. बैठक में नर्मदा निगम के सीजीएम जेसी चूडास्मा, ज्वाइंट कमिश्नर एमडी पटेल भी मौजूद थे. उल्लेखनीय है कि गत जुलाई माह में मूर्ति निर्माण को लेकर काफी बवाल मचा था. दरअसल नर्मदा जिले के केवडिया, कोठी, गोरा, वागडिया, लीमडी एवं नवागाम नामक गांवों के लोग इन योजनाओं का विरोध कर रहे थे. इनकी दलील थी कि सरदार सरोवर नर्मदा बांध योजना में गई उनकी जमीन का लाभ उन्हें अभी तक नहीं मिला है. इसके बाद से ही नर्मदा जिला प्रशासन ग्रामीणों की नाराजगी दूर करने के प्रयास में लगा था. बड़ोदरा की पत्रकार कालोनी में रहनेवाले रोहित प्रजापति और तृप्ति शाह के साथ सरदार सरोवर बांध पर बन रहे स्टैच्यू आफ यूनिटी के करीब के सात गांवों में प्रमुख लोगों को उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया. बहरहाल, जिन किसानों, आदिवासियों के लिए सरदार ने आंदोलन किया था, और सीमित बांध का सपना देखा था, उनका दमन ही एकमात्र ऐसा पहलू नहीं है जो मोदी सरकार की ओर से साकार किया जा रहा है.
 
मूर्ति निर्माण और राजनीति: अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना से मोदी सरकार एक तीर से कई शिकार कर रही है. एक तरफ जहां इतिहास का पुनर्पाठ करवाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ कुछ विदेशी कंपनियों (खासकर अमेरिकी कंपनी टर्नर कन्ट्रक्शन) को उपकृत भी किया जा रहा है. गुजरात सरकार की ओर से 30 नवंबर तक टर्नर कंस्ट्रक्शन को स्टैचू आफ यूनिटी का ठेका मिलना तय माना जा रहा है जो आस्‍ट्रेलिया की मीनहार्ट्ज और अमेरिका की ही माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स के साथ मिलकर इस परियोजना पर काम शुरू करेगी. प्रोजेक्ट की हकीकत यह कि सरदार पटेल की आकृतिवाली एक साठ मंजिला इमारत बनाई जा रही है जिसकी ऊंचाई 182 मीटर होगी. अमेरिका की टर्नर कन्सट्रक्शन और माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स भवन निर्माण की कंपनियां हैं जिन्होंने पूरी दुनिया में भवन निर्माण का जाल खड़ा कर रखा है. इन कंपनियों में जहां टर्नर कंस्ट्रक्शन मुख्य निर्माण कंपनी है वही मीनहार्ट्ज तथा माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स डिजाइन और आर्किटेक्ट फर्म हैं.
 
मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में गठित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट ने परियोजना के बारे में अपनी वेबसाइट पर जो आधिकारिक जानकारी मुहैया कराई है उसके अनुसार यह मूर्ति तकनीकी तौर पर यह एक 182 मीटर (597 फुट) ऊंची इमारत होगी जिसमें अंदर पहुंचकर कोई भी व्यक्ति विस्तृत सरदार सरोवर का नजारा देख सकता है. इस इमारत की शक्ल एक इंसान जैसी होगी जो सरदार वल्लभ भाई पटेल होंगे. जाहिर है मोदी सरकार राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक सरदार पटेल की प्रतिमा के बहाने सरदार सरोवर के आस पास एक पर्यटन केन्द्र विकसित कर रही है. मोदी व्यापार और कारोबार को राष्ट्रीय अस्मिता के रूप में पेश करके गुजरात में पर्यटन कारीडोर विकसित करने की आधारशिला रख रहे हैं. टेण्डर में घोषित 2 हजार, 60 करोड़ की इस मूल परियोजना के प्रचार के लिए 3 करोड़ का अलग से टेण्डर निकाला गया है जिसका इस्तेमाल परियोजना के पूरा होने से पहले इस मनोरंजन पार्क को दुनियाभर में डिजिटल मीडिया के जरिए प्रचारित करना है. अगर यह परियोजना मनोरंजक पार्क के रूप में प्रचारित की जाती तो शायद देश और दुनिया के लिए सरदार पटेल का यह विशाल लौह भवन इतना चर्चा का विषय नहीं बन पाता. बहरहाल, उन्‍होंने जैसे चाहा, वैसे आनेवाले इतिहास की व्याख्या कर दी और दुनिया उस ‘सरदार के सपनों का सौदागर’ को मोदीनामा मान जोर शोर से प्रचार कर रही है.
 
                               अमरेन्द्र कुमार आर्य पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क press.amarendra@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.
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अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी

दुनिया भर में महिलाओं की स्थिति को देखकर आज राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त द्वारा लिखी गई कविता “अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी” याद आ गयी. कितनी प्रासंगिक लगती है ये कविता आज भी. जिस समय लिखी गयी थी उस समय की बात तो समझ में आती है कि उस समय की स्थितियां ऐसी रही होंगी. पर अगर आज भी ये उतनी प्रासंगिक है तो सवाल बन जाती है. एक ऐसा सवाल जो आज खड़ा हो गया है. आखिर महिलाओं कि स्थिति में कब सुधार होगा, क्या महिलाएं निकट भविष्य में भी बाबा आदम के जमाने में जीती रहेंगी? और भी न जाने कितने ही सवाल है महिलाओं से जुड़े जो यहाँ खड़े हो जाते हैं. निरंतर विकास के नए सोपानों को छूती दुनिया में महिलाओं कि स्थिति आज भी उतनी ही दयनीय है जितनी आज से दो सौ-तीन सौ साल पहले थी जो बड़ी विडम्बना की बात है.

हाल ही में महिलाओं की स्थिति के बाबत अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘वूमेन्स रीजनल नेटवर्क’ (डब्लूआरएन) द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट यह दर्शाती है कि आज भी महिलाएं वही जीवन जी रही है जैसा वह पिछले बहुत से सालों से जीती आ रही हैं. यह रिपोर्ट तो यही प्रदर्शित करती है. इस संस्था ने भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कॉन्फ्लिक्ट जोन (संघर्ष वाले क्षेत्रों) में निवास करने वाली महिलाओं की स्थिति का सैन्यीकरण, सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे तीन महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर आंकलन किया और पाया कि महिलाओं कि स्थिति कितनी दयनीय है. आज महिलाएं हवा में उड़ने लगी हैं, पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं, पुरुषों की बराबरी कर चुकी हैं, हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. फिर हर वर्ष आने वाली रिपोर्ट यह क्यों नही दर्शाती? ये एक बड़ा सवाल है ज़मीनी हकीकत कुछ और है ये रिपोर्ट हमें साफ़ तौर पर यह दर्शाती हैं. सरकार कहने को कुछ भी कहती रहे, मामला सरकार की नज़रों में रहते हुए भी नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. भारत में ही नहीं दुनिया भर में ऐसा ही है.     

इस रिपोर्ट के लिए किये गए शोध में भारत के जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा और उड़ीसा राज्यों की महिलाओं, अफगानिस्तान के काबुल, बल्क, बामयान, फरयाब, हेरात, कांधार, नांगरहर और कुंडुज इलाकों की महिलाओं, और पाकिस्तान के स्वात और बलूचिस्तान को शामिल किया गया है. इस शोध से जुड़े प्रतिनिधियों ने कहा कि तीनों देशों में महिलाओं के साथ सैन्य बलों द्वारा बलात्कार, मारपीट और प्रताड़ित करने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है. शोध से जुड़ी अफगानिस्तान की ‘जज नजला अयूबी’ का कहना है कि अफगानिस्तान में महिलाओं को जानवरों के समान आँका जाता है. इस्लामिक देश होने और शरीयत लागू होने के कारण महिलाओं को पति की इजाजत के बगैर घर से बाहर निकलने या बुर्का न पहनने जैसी छोटी-छोटी बातों पर मौत के घाट उतार दिया जाता है. पाकिस्तान में भी कुछ ऐसा ही हाल है. पाकिस्तान में मलाला तो मात्र एक उदाहरण है वहां न जाने कितनी ही युवतियां अपनी जान से हाथ धो चुकी हैं. जिन्होंने ने भी महिलाओं की शिक्षा व अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की है उसे मौत के घाट उतार दिया गया है. इसी बाबत अगर भारत पर नज़र डालें तो त्रिपुरा में हालात इतने खराब और बदतर हैं कि सैनिक जब चाहे किसी महिला को उठा ले जाते हैं, उसके साथ बलात्कार करते हैं. महिलाओं का शोषण करते हैं, और विडम्बना तो ये है कि इन घटनाओं का जिक्र ना तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली मीडिया करती है और ना ही स्थानीय पुलिस पीड़ितों की कुछ मदद करती है।

अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों इन घटनाओं को तवज्जो नहीं दी जाती है, क्या साबुन और परफ्यूम के कुछ ज्यादा एड है मीडिया के पास? ऐसा भी नहीं है कि मीडिया अपना काम नहीं करती पर जब इतनी महत्त्वपूर्ण घटनाएं जिनपर तुरंत कोई फैसला लेना चाहिए, रह जाती हैं और दम तोड़ देती हैं मायूसी में, क्यों इस मुद्दे को लेकर एक बड़ी बहस नहीं की जाती? बस एक सुर्खी के बाद मानो खबर का अस्तित्व ही मिट जाता है, गायब हो जाती हैं ये खबरें एक बार सामने आने के बाद, तब लगता है कि क्या हमारी मीडिया भी इन छिपे मुद्दों को नहीं उठाना चाहती? इनको सबके सामने लाना नहीं चाहती? अब असल कारण का पता चलना तो बड़ा मुश्किल हो गया है.

महिलाओं से जुड़ा हर मुद्दा आज विभिन्न मुद्दों को पीछे छोड़ चुका है. अगर हम भारत में महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा और अत्याचार की बात करें तो कोई ऐसा राज्य नहीं होगा जहां महिलाएं प्रताड़ित न होती हों. उन पर विभिन्न मान्यताएं न थोपी जाती हों, पहले तो महिलाएं अपने घरों से बाहर सुरक्षित नहीं थीं परन्तु आज तो महिलाएं अपने घरों में अपने परिवार की छाया में भी सुरक्षित नहीं हैं. आये दिन खबरों में पढ़ने को मिलता है कि आज एक पिता ने अपनी बेटी के साथ दुष्कर्म किया, आज एक भाई ने बहन के साथ, आज एक जीजा ने साली के साथ, आज एक ससुर ने बहू के साथ, और भी न जाने क्या क्या सुनने में आता है. रिश्ते तार-तार हो रहे हैं. क्या कहें इसे मानसिकताओं का बदलना या हवस का परवान चढ़ना?

अगर भारत में पिछले कुछ सालों में दुष्कर्म के आंकड़ों पर गौर करें तो चौंकना सम्भव है क्योंकि पिछले कुछ सालों में आंकड़ें केवल बढ़े हैं. 2011 में जहाँ महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों की संख्या 228650 थी, वहीं 2012 में यह संख्या बढ़कर 244276 हो गयी, वहीं जहां 2011 में 19 फीसदी अपराध सामने आये थे, 2012 में 42 फीसदी का आंकड़ा पार हो गया. अगर राज्यों में इन अपराधों पर नजर डालें तो असम में 89.5 फीसदी, आन्ध्र प्रदेश में 40.5 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 20.7 फीसदी, दिल्ली में 14.2 फीसदी एवं बेंगलुरू और कोलकाता में क्रमशः 6.2 और 5.7 फीसदी अपराध सामने आये, जबकि 2012 में ही मध्य प्रदेश में सबसे अधिक दुष्कर्म 3425 और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा उत्पीड़न के मामले सामने आए हैं, जिसमें दहेज के लिए हत्या के 27.3 फीसदी, 2244 मामले सामने आये, इनके बाद अगर हरियाणा की बात करें तो आंकड़े बेहद ही चिंताजनक हैं.

अब अगर ऐसे ही अपराधों का बढ़ना निरंतर जारी रहा तो अंदाजा लगा लीजिये, क्या हालात होंगे आने वाले समय में? और क्या होगी महिलाओं की स्थिति दुनियाभर के देशों में? अब चुप रहने से काम चलने वाला नहीं है. कुछ करना होगा, कदम आगे की ओर बढ़ाना होगा. वरना हालात तो और भी बदतर होने वाले हैं. प्रकाश की एक किरण तब सामने आयी थी जब निर्भया फण्ड की घोषणा की गयी थी पर एक साल बीतने वाला है, न जाने क्या हुआ उस फण्ड का? शायद सारी योजना ही ठण्डे बस्ते में चली गई, और हम हैं कि आज तक चुप ही हैं और शायद आगे भी ऐसे ही मूकदर्शक बनकर जीते रहेंगे.

               लेखक अश्विनी कुमार एक निजी कंपनी में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं. वे विभिन्न पत्र-                    पत्रिकाओं में लेखन का कार्य भी करते हैं. उनसे संपर्क ashwanikumar332@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

प्रधान संपादक का वेतन अपने सहायक से कम!

शंभूनाथ शुक्ल : गणेश शंकर विद्यार्थी ने आज से सौ साल पहले प्रताप अखबार निकाला था। पहले वह साप्ताहिक था फिर डेली हुआ। विद्यार्थी जी उसके संस्थापक संपादक थे। प्रताप निकालने के लिए धन का जुगाड़ नारायण दास अरोड़ा समेत कई नामी गिरामी लोगों ने किया था। जिसमें तारा अग्रवाल भी शरीक थीं। बाद में प्रताप डेली हो गया। विद्यार्थी जी उस समय कांग्रेस के गरम दल के नेता थे और क्रांतिकारियों को भी मदद करते रहते थे।

खुद भगत सिंह ने इसी प्रताप अखबार में काम किया था। चंद्रशेखर आजाद भी विद्यार्थी जी के यहां रुकते थे। इसलिए विद्यार्थी जी आगरा के मशहूर अखबार सैनिक से कृष्णदत्त पालीवाल को अपने यहां अपना सहायक बनाकर लाए। पालीवाल जी संपादक और विद्यार्थी जी उसी प्रताप के प्रधान संपादक। एक दिन पालीवाल जी को पता चला कि विद्यार्थी जी प्रताप से मेहनताने के रूप में जो पैसा ले रहे हैं वह पालीवाल जी के वेतन से पचास रुपये कम है। मालूम हो कि विद्यार्थी जी प्रधान संपादक के रूप में सिर्फ ३०० रुपये लेते थे और कृष्णदत्त पालीवाल जी को वे ३५० रुपये देते थे।

पालीवाल जी लडऩे पहुंच गए कि यह कौन सा न्याय है आप प्रधान संपादक हैं और मुझसे कम वेतन ले रहे हैं। विद्यार्थी जी ने उन्हें समझाया कि देखो भई पालीवाल जी आपको मैं आगरा से लाया हूं। यह आपका अपना शहर नहीं है पर मेरा तो अपना शहर है सो मेरे खर्चे कम इसलिए मेरा वेतन कम। अब जरा आज कोई संपादक अपने ठीक नीचे के संपादक से अपने वेतन की तुलना करे तो पता चलेगा कि नीचे वाले का वेतन प्रधान को मिलने वाले वेतन से कई गुना कम है।

(वरिष्ठ पत्रकार श्री विजयकिशोर मानव ने यह किस्सा दिवंगत पत्रकार श्री सत्यदेव शर्मा के मुख से सुना था।)

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

आईबीएन7 वालों ने ‘अमित शाह महिला जासूसी’ प्रकरण की जो खबर वेबसाइट से हटा दी, उसे यहां पढ़ें

मोदी, अंबानी, सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन7, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष… इन सभी के बीच रिश्तों में जो 'आपसी समझदारी' को लेकर खबरें, जानकारियां, आलेख, विश्लेषण पिछले दिनों सोशल मीडिया व कुछ अन्य मीडिया माध्यमों के जरिए सामने आई, उसके अब पुख्ता होने के दिन आ गए हैं. किन्हीं 'साहेब' के कहने पर अमित शाह ने किसी युवती के पीछे पुलिस वालों को लगा दिया, उससे संबंधित कोबरा पोस्ट और गुलेल डाट काम द्वारा जारी आडियो टेप पर खबर को पहले तो आईबीएन7 की वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया लेकिन जाने क्यों उसे हटा दिया गया. लेकिन युवा पत्रकार मयंक सक्सेना ने रिमूव की गई खबर को गूगल द्वारा प्रदान की गई तकनीक (web cache) से दुबारा हासिल कर फेसबुक पर प्रकाशित कर दिया है. उस खबर को नीचे पढ़ें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

‘साहब’ के कहने पर अमित शाह ने महिला के पीछे छोड़े जासूस!

आईबीएन-7 | Nov 15, 2013 at 06:49pm

नई दिल्ली। न्यूज पोर्टल कोबरा पोस्ट और गुलेल ने गुजरात के राज-काज के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा किया है। दिल्ली में हुई एक प्रेस कांफ्रेंस में गुजरात के पूर्व गृहराज्यमंत्री अमित शाह और आईपीएस अफसर जी.एल.सिंघला की टेलीफोन पर हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग पेश की गई। वेबसाइट का आरोप है कि ये टैपिंग गैरकानूनी है। लेकिन इससे पता चलता है कि अमित शाह ने सिंघला को एक लड़की की चौबीस घंटे निगरानी का आदेश दिया ताकि किसी साहेब को उसके बारे में पल-पल की जानकारी दी जा सके। अमित शाह से बातचीत की ये रिकॉर्डिंग खुद सिंघला ने सीबीआई को सौंपी है। कांग्रेस ने इस मामले की गहराई से जांच की मांग की है। वहीं बीजेपी ने पूरे मसले पर चुप्पी साध ली है।

न्यूज पोर्टल कोबरा पोस्ट और गुलेल ने शुक्रवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में गुजरात के पूर्व गृहराज्यमंत्री अमित शाह और अहमदाबाद में एटीएस के एसपी बतौर तैनात रहे जीएल सिंघला के बीच 4 अगस्त 2009 और 6 सितंबर 2009 के बीच हुई बातचीत की ऑडियो रिकार्डिंग पेश की। इसमें अमित शाह, सिंघला को एक लड़की के पल-पल की खबर लेने का निर्देश दे रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि ऐसा साहेब चाहते हैं। यही नहीं, अमित शाह ने भावनगर के तत्कालीन निगमायुक्त प्रदीप शर्मा की निगरानी करने का भी आदेश दिया था।

गौरतलब है कि आईपीएस अफसर सिंघला, इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी हैं। वे जेल में थे और उन्हें हाल ही में बेल मिली है। उन्होंने अमित शाह के साथ हुई बातचीत की ये रिकॉर्डिंग खुद की थी। ऐसी 267 रिकॉर्डिंग हैं जो उन्होंने 9 जुलाई 2013 को सीबीआई को सौंपी हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस खुलासे को बेहद गंभीर बताते हुए इसे नागरिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।

जाहिर है, कांग्रेस को मौका मिल गया है। वो चाहती है कि मामले की गंभीरता से जांच हो। पार्टी प्रवक्ता मीम अफजल कहते हैं कि अभी मैंने सुना कि मोदी जी कह रहे थे कि कांग्रेस मेरी जासूसी करा रही है। अब पता चला कि वो किसी लड़की की जासूसी करा रहे हैं। इस मामले को सीबीआई को गंभीरता से लेना चाहिए। ये देखना चाहिए कि लड़की की किसलिए जासूसी करा रहे हैं।

वहीं, बीजेपी इस खुलासे के बाद बैकफुट पर है। उससे जवाब देते नहीं बन रहा है। अनंत कुमार से जब ये सवाल पूछा कि इस तरह की बात सामने आई है तो अनंत कुमार सवाल टालते हुए चले गए। पार्टी के किसी नेता या प्रवक्ता ने अब तक इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया या ट्वीट नहीं किया है।

चुनाव प्रचार की गहमा-गहमी के बीच हुए इस खुलासे से नया हंगामा खड़ा होना तय है। इसमें शक नहीं कि अमित शाह नरेंद्र मोदी के सबसे करीबी माने जाते हैं यानी नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए विरोधियों को नया हथियार मिल गया है। देखना है कि इस हथियार में कितनी धार और इसका ये कितना मारक असर करेगा।


गूगल न्यूज पर भी आईबीएन7 की खबर का शीर्षक दिखाई देता रहा, लेकिन जब शीर्षक पर क्लिक कर कोई खबर पढ़ने  के लिए आगे बढ़ता तो वहां संबंधित खबर का लिंक खुलने की जगह आईबीएन7 की वेबसाइट का होम पेज खुल जाता… जाहिर है, खबर लगाने के बाद उसे न सिर्फ रिमूव किया गया बल्कि यह पूरा प्रयास किया गया है कि इस प्रकरण से संबंधित कोई खबर आईबीएन7 की वेबसाइट पर न रह जाए… देखें गूगल न्यूज का स्क्रीनशॉट…


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अमित शाह, साहेब, आईपीएस, महिला, जासूसी… (सुनें टेप)

अमित शाह, साहेब, आईपीएस, महिला, जासूसी… (सुनें टेप)

गुजरात के गृह राज्य मंत्री रह चुके और इन दिनों यूपी में बीजेपी के चुनाव प्रभारी के रूप में सक्रिय अमित शाह पर कोबरा पोस्ट और गुलेल डाट काम ने एक आडियो टेप जारी कर आरोप लगाया है कि गुजरात का गृह राज्य मंत्री रहते हुए अमित शाह ने सीनियर पुलिस अधिकारियों से एक ऐसी युवती का पीछा करवाया जो न तो किसी केस में आरोपी थी और न ही कानून व्यवस्था के लिए किसी प्रकार का खतरा थी. उस लड़की का पीछा सिर्फ इसलिए करवाया गया क्योंकि अमित शाह के 'साहेब' ऐसा चाहते थे.

अमित शाह के यह 'साहेब' कौन थे? 'साहेब' क्यों उस लड़की में इतनी दिलचस्पी दिखा रहे थे? इसको लेकर लोग तरह तरह के कयास लगा रहे हैं. आडियो टेपों से पता चलता है कि 'साहेब' के कहने पर अमित शाह पुलिस अफसरों के जरिए मॉल से लेकर जहाज तक उस लड़की का लगातार पीछा करवा रहे थे. एक बार तो अमित शाह ने यहां तक आदेश दिया कि अगर वह लड़की मुंबई जाती है तो उसे किसी हालत में मुंबई न जाने दिया जाए.

दरअसल इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ कांड में जेल जा चुके और इन दिनों जमानत पर छूटे आईपीएस अधिकारी जी. एल. सिंहल ने सीबीआई को बहुत सारे ऑडियो टेप दिए हैं. उन्हीं में से ये कुछ आडियो टेप हैं जिन्हें कोबरा पोस्ट और गुलेल डाट काम ने जारी किया है. टेप से पता चलता है कि अमित शाह के निर्देश पर गुजरात पुलिस की तीन शाखाओं (राज्य इंटेलिजेंस ब्यूरो, क्राइम ब्रांच और एटीएस) के अधिकारियों ने मिलकर बेंगलुरु की एक लड़की का अवैध ढंग से पीछा करवाया. उस लड़की के माता-पिता अहमदाबाद में रहते थे.

कोबरा पोस्ट के मुताबिक अमित शाह ने आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा का फोन भी टैप करने का निर्देश अपने पुलिस अफसरों को दिया था क्योंकि 'साहेब' को शक था कि प्रदीप शर्मा उस लड़की से मिलने वाले हैं. अमित शाह यह आदेश भी देते हैं कि प्रदीप शर्मा को पुलिस अधिकारी वंजारा से भी ज्यादा समय के लिए अंदर कर दो.  बाद में प्रदीप शर्मा को करप्शन के आरोपों में गिरफ्तार भी किया गया था. इन टेपों के आने से बहुत पहले प्रदीप शर्मा ने मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि गुजरात सरकार उन्हें भ्रष्टाचार के झूठे मामलों में फंसा रही है और इसकी वजह है मोदी का एक महिला से संबंध. कोबरा पोस्ट और गुलेल डाट काम की तरफ से जारी कई आडियो टेप को एक ही जगह कंपाइल फार्मेट में सुनें जिसमें अमित शाह अपने एक पुलिस अधिकारी जीएल सिंहल को आदेश पर आदेश दे रहे हैं…


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आईबीएन7 वालों ने 'अमित शाह महिला जासूसी' प्रकरण की जो खबर अपनी वेबसाइट से हटा दी, उसे यहां पढ़ें

क्या आरएसएस एक इस्लामी चैनल लांच करने जा रहा है?

Wasim Akram Tyagi : सावधान क्रूसेडी चालू आहो… खबर मिली है कि आरएसएस एक इस्लामी चैनल लांच करने जा रहा है जिसके द्वारा इस्लाम को लोगों तक पहुंचाया जायेगा। गौरतलब है कि संघ परिवार (मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जिसकी स्थापना संघ के प्रचारक इंद्रेश कुमार ने की थी ) पहले से ही मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने के लिये काम कर रहा है। संघ परिवार टीवी चैनल के साथ साथ उर्दू अखबार और एक एफएम रेडियो चैनल भी लांच करने जा रहा है। अगले महीने मुंबई में होने वाली मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सम्मेलन में इसको अमली जामा पहनाया जा सकता है।

सवाल उठता है कि कल तर इस्लाम और मुसलमानों को पानी पी – पी कर कौसने आज उसका प्रचार करने के लिये अचानक तैयार नहीं हुऐ हैं। बल्कि इसके पीछे गहरी साजिशें छिपी हुई हैं। वे इस्लाम को लोगों में इस तरह प्रचारित करेंगे जिससे लोगों में खासकर मुसलमानों में जातियों में विभाजित हो जाये, जैसे कादियानी, वहाबी, अहमदी, इत्यादी। जैसे विश्व में हो रहा है अमेरिका और इजरायल से वित्त पोषित होता है, अलशबाब जैसे वहाबी संगठन को जिसने नैरोबी में धमाके किये थे जिसमें सैंकड़ों मासूम लोगों की जानें पल भर में चली गई थी।

ऐसा ही कारनामा भारत में आरएसएस जैसा फांसीवादी संगठन अंजाम देता आया है। और जब इसकी शहीद हेमंत करकरे ने पोल खोली तो अब इन्होंने नया शिगूफा अपनाया है। इस तरह के काम करने के लिये। जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी बची रहे। इस मानसिकता को समझना होगा। कल बहुसंख्यक समाज को अल्पसंख्यक खासतौर से मुस्लिम समाज के प्रति भड़काने वाले, इतिहास से तोड़ मरोड़ करने वाले, लालकिले, ताजमहल, कुतुबमीनार को प्राचीन मंदिर बताने वाले आज इस्लाम का प्रचार करने के लिये अखबार और चैनल लांच करने जा रहे हैं।

आखिर इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे? इसे समझना हम सबकी जिम्मेदारी है । जिस संगठन की स्थापना का उद्देश्य ही देश में अफरातफरी फैलाना हो, लोगों को धार्मिक आधार पर भड़काना हो, जिसके कार्यकर्ता की पहली पसंद वह शख्स हो जो पांच हजार लोगों के कत्ल का जिम्मेदार है, वह संगठन आखिर इतना नरम कैसे हो गया? खबर में जो बात कही गई है उसमें एक बात यह भी है कि सोशल नेटवर्किंग साईटों पर भी इसका प्रचार किया जायेगा।

इससे जाहिर होता है कि इन साईटों पर जो संघी फौज है उसने उन बातों को देखा हो जिसमें मुसलमानों की ओर से शिकायत रहती है कि मीडिया उन्हें इसलिये प्रताड़ित करता है कि उनके पास अपना मीडिया नहीं है। इसलिये मुसलमानों का भी कोई मीडिया हाऊस होना चाहिये जिससे सच को सामने लाया जा सके। संघ ने उसी जरूरत को पूरा करने के लिये इस ओर कदम बढ़ाया है वर्ना क्या कारण है कि कल तक जो समाज उसे फूटी आंख नहीं भाता था उसकी अचानक इतनी फिक्र सताने लगी। इस लिये इस नरम क्रूसेडी को समझना होगा।

युवा पत्रकार वसीम अकरम त्यागी के फेसबुक वॉल से.

पुण्य प्रसून जी ने सचिन को देश के लिए रोटी से बड़ा कर दिया…

Mayank Saxena :  आप में से कई लोगों को आलू बहुत पसंद होगा…कई लोगों को पनीर…कई लोगों को मुर्गा…कईयों को बकरा…कुछ को करेला भी पसंद होगा…कुछ को लौकी भी…आप बड़े चाव से ये खाते होंगे…आपका मेज़बान या घरवाले इसका ध्यान भी रखते होंगे…

लेकिन अगर कभी हफ्ते-10 दिन या महीने भर आपको लगातार एक ही चीज़ खिलाई जाए…ये कह कर कि आपको तो ये पसंद है…आप ज़रा ख़ुद ही बताइए कि आप कब तक लगातार ये खा पाएंगे…आप या तो भाग जाएंगे…या आपका आपके उस पसंदीदा भोजन से मोहभंग हो जाएगा…या फिर आप का हो सकता है उस शख्स से ही मोहभंग हो जाए…ये भी हो सकता है कि वो शख्स अगर इतना सम्माननीय न हो, तो आपके हाथ पिट भी जाए…

मेरे प्यारे और अब तक थोड़ा आदरणीय बचे Aaj Tak, News24, IBN7, india tv, ABP News के सम्पादकों… आप अपनी समझदारी से बाज़ आएं..दर्शक मूर्ख नहीं है…अगर होता तो भी बोर हो जाता…इतना क्रिकेट न दिखाएं कि लोग मैच देखना भी बंद कर दें…इस देश में बहुत कुछ हो रहा है…और ख़बरें भी हैं…आप की चालाकी दरअसल उतनी चालाक नहीं है…लोग सब समझते हैं…

आपको लगता है कि आपकी टीआरपी आ रही है…आप से बड़ा मासूम कौन होगा, जिसे ये ही नहीं दिखा कि न्यूज़ चैनल का व्यू्अर परसेंटेज टोटल टीवी के बाज़ार में कहां आ खड़ा हुआ है…आपको लगता है कि आप बहुत अच्छा कर रहे हैं…अगर इतना अच्छा कर रहे होते तो मालिक का बंधुआ बन कर सब कुछ देखते जाने…जी सर जी सर करने…और कारपोरेट समेत राजनेताओं की दलाली की ज़रूरत ही क्या पड़ती…

(आज का स्टेटस समर्पित है महान श्री पुण्य प्रसून जी, जिन्होंने सचिन को देश के लिए रोटी से बड़ा कर दिया…आदरणीय आशुतोष जी के लिए, जो अम्बानी और मोदी के बंधुआ हो गए…और सभी के लिए जो टाटा के प्लांट में गैस लीक को हींगोली खा कर पाद गए…)

तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.


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कल आजतक पर पुण्य प्रसून समझा रहे थे कि…

‘आलमी सहारा उर्दू’ का नाम ‘आलमी समय’ हुआ, सनम तसदुक बने जम्मू-कश्मीर के ब्यूरो चीफ

'आलमी सहारा उर्दू' चैनल का नाम बदलने के बाद इसको 'आलमी समय' के नाम से जाना जा रहा है. चैनल को उर्दू सेगमेंट में बेहतर चैनल बनाने की कवायद शरू कर दी गई है. जम्मू कश्मीर ब्यूरो के लिए कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार सनम तसदुक को जिम्मेदारी दी गई है.

सहारा में सीनियर रहने और काफी समय से जुड़े होने के साथ साथ काबिल माने जाने वाले सनम को प्रबंधन ने काफी दिनों बाद बड़ी जिम्मेदारी दी है. सनम को जम्मू कश्मीर के आधे घंटे के रीजनल न्यूज़ की ज़िम्मेवारी दी गई है. इसके लिए जम्मू कश्मीर के सभी बड़े जिलों में स्ट्रिंगर्स रखे जा रहे हैं. सनम 'समय' चैनल में रिपोर्टर के पद पे 1998 से काम कर रहे हैं. इससे पहले सनम दूरदर्शन न्यूज़ के अलावा कई अन्य चैनलों और शो के साथ भी काम कर चुके हैं.

भड़ास तक अपनी बात पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com का सहारा ले सकते हैं.

जागरण पूर्वी दिल्ली प्रमुख राजीव अग्रवाल हटाए गए, कई और पर गिरेजी गाज

विष्णु प्रकाश त्रिपाठी के पूरी तरह से पावर में आने के बाद दैनिक जागरण, एनसीआर में नए दौर की शुरुआत हो गई है. अखबार में नई उमंग और ताजगी आ गई है. वे पूरी तरह से प्रोफेशनल तरीके से काम कर रहे हैं. अखबार में खबर के नाम पर धंधा करने वालों पर गाज गिर रही है. सबसे पहली गाज दिल्ली प्रमुख कविलाश मिश्रा पर गिरी थी. उनके बाद अब पूर्वी दिल्ली के चीफ राजीव अग्रवाल से भी इस्तीफा ले लिया गया है.

राजीव अग्रवाल पर कई तरह के आरोप लगते आ रहे थे. पूर्वी दिल्ली कार्यालय में कई तेजतर्रार रिपोर्टर हुआ करते थे, लेकिन राजीव ने सबको बाहर करवा दिया था. दरअसल उस वक्त कविलाश का बोलबाला हुआ करता था, क्योंकि वह निशिकांत के साले जो ठहरे. अब दैनिक जागरण में काफी सफाई की जा रही है. विष्णु प्रकाश त्रिपाठी के निशाने पर कई और लोग हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर उपरोक्त तथ्यों में कोई कमी-बेसी हो तो भड़ास तक सूचना bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

महुआ न्यूज से कई सूचनाएं : नवीन जिंदल, किशोर मालवीय, अरविंद कुमार पांडेय से संबंधित

महुआ न्यूज से कई खबरें हैं. पहली चर्चा तो ये है कि किशोर मालवीय फिर से संपादक के रूप में महुआ से जुड़ गए हैं. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है. दूसरी खबर झारखण्ड से. पता चला है कि महुआ न्यूज चैनल के स्टेट ब्यूरो हेड अरविन्द कुमार पाण्डेय अब इस चैनल के साथ नहीं हैं. इनकी जगह चैनल के सीनियर रिपोर्टर पंकज भूषण पाठक को यह जिम्मेवारी सौंपी गयी है. प्रबंधन ने पंकज भूषण पाठक को स्टेट ब्यूरो हेड बनाया है.

एक उड़ती उड़ती खबर है कि नवीन जिंदल का मतंग सिंह के ग्रुप से मोहभंग हो गया है और कई तरह के विवादों को देखते हुए वो वहां से अपना पैसा निकाल कर महुआ न्यूज में लगाने की सोच रहे हैं. बताया जा रहा है कि उनकी महुआ के मालिकों से एक राउंड बैठक हो गई है. पर आधिकारिक रूप से कोई कुछ भी बोलने से बच रहा है.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

सरकार मजीठिया वेज बोर्ड के पक्ष में पर प्रबंधन कर रहा विरोध

पत्रकारों और समाचार कर्मचारियों के वेतन रिवीजन के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने के लिए सरकार तो इसके पक्ष में है लेकिन मीडिया मालिकों का समूह इसे लागू करने का विरोध कर रहा है. जबकि सरकार ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट में इसको लागू करने के पक्ष में अपने विचार स्पष्ट कर चुकी है. ये बातें श्रम राज्य मंत्री कोडिकुन्निल सुरेश ने पत्रकारों से बातचीत में कही. 
 
श्रम राज्य मंत्री सुरेश से पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि "सरकार पत्रकार समुदाय के पक्ष में है और पहले ही सुप्रीम कोर्ट में इसे लागू करने के पक्ष में दलील दे चुकी है कि हम इस मामले में जल्द फैसला चाहते हैं लेकिन मालिक इसे लागू किये जाने पर आपत्ति कर रहे हैं." अदालत से बाहर निपटारे के बारे में जब उनसे पूछा गया कि क्या अदालत से बाहर कोई समझौता हो सकता है तो उन्होंने कहा कि "नियोक्ता इसमें सहयोग नहीं कर रहे हैं."

शिवानी पांडेय की छायाचित्र प्रदर्शनी का कल मनीष तिवारी करेंगे उद्घाटन

ट्रैवेल राइटर और फोटोग्राफर शिवानी पांडेय की प्रदर्शनी लाइफ….. सा रे गा मा का का उद्घाटन कल केन्द्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी करेंगे. उद्घाटन कल 16 नवम्बर को शाम पांच बजे इंडिया हैबीबेट सेंटर के पामकोर्ट में आयोजित किया गया है. प्रदर्शनी का आयोजन 16 से 19 नवम्बर तक चलेगी. इस अवसर पर देश के सुदूर हिस्सों में काम करने वाले कलाकारों को राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर लाने और उनकी कला को संरक्षित करने वाली वेबसाइट www.kalaok.com का उद्घाटन भी किया जायेगा. इस कार्यक्रम में भारत में श्रीलंका के उच्चायुक्त प्रसाद करियावासम, ग्लोबल मार्च अगेन्स्ट चाइल्ड लेबर के कैलाश सत्यार्थी और एनडीटीवी के कार्यकारी सम्पादक रवीश कुमार अतिथि के तौर पर मौजूद रहेंगे.
 
शिवानी पांडेय के चित्रों की प्रदर्शनी बीती गर्मियों में अमेरिका में भी आयोजित की जा चुकी है. दिल्ली की रहने वाली शिवानी ट्रैवेल राइटर और फोटोग्राफर हैं. वे कई अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं के लिए काम करती हैं लेकिन उनकी दिल्चस्पी भारत के ग्रामीण समाज और खासकर आदिवासियों में है. प्रकृति से उनका गहरा लगाव है अतः उनके चित्रों में फूलों का निखार, पहाड़ों का सौन्दर्य और यात्रा रोमांच भी दिखता है. वहीं kalaok.com एक आनलाइन प्लेटफार्म है जो देश के दूर दराज के हिस्सों में बैठे कलाकारों और शिल्पकारों की कृतियों को वेबसाइट पर फोटो, वीडियो और आलेख के माध्यम से दुनिया के सामने रखती है.
 
शिवानी ने प्रबंधन की पढ़ाई की है लेकिन फोटोग्राफी और कला के प्रति आकर्षण ने उन्हें ट्रैवेल राइटर बना दिया. वह कई अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर महिलाओं और बाल विकास से जुड़े कार्य भी कर रही हैं.
 
 

एसओ द्वारा पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज पर एफआइआर से मना, क्या एसएसपी कार्यवाही करेंगे?

थानाध्यक्ष गोमतीनगर, लखनऊ ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज के विरुद्ध दो विधि स्नातकों द्वारा अपने पद और स्थिति का पूर्णतया नाजायज़ फायदा उठाते हुए यौन उत्पीडन करने के आरोपों के सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रार्थनापत्र पर एफआइआर दर्ज काटने से मना कर दिया. उन्होंने मात्र शिकायती प्रार्थनापत्र रसीद संख्या 28310 दिया.
 
अतः अब डॉ ठाकुर ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर धारा 154(3) सीआरपीसी के तहत एफआइआर दर्ज करने और सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य में हाल में दिए गए निर्णय का घोर उल्लंघन करते हुए एफआइआर दर्ज नहीं करने के सम्बन्ध में एसओ गोमतीनगर पर कार्यवाही किये जाने की मांग की है.
 
एफआइआर के अनुसार एक सामाजिक कार्यकर्ता और नेशनल ला यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही विधि छात्रा की माँ के रूप में वह यह अपना दायित्व समझती हैं कि ऐसे गंदे लोगों के इन घिनौने कृत्यों के सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज कराएं ताकि इसमें आगे कानूनी कार्यवाही हो सके.
 
नीचे डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा एफआइआर तथा एसएसपी को दिये पत्र की कॉपी दी जा रही है.
 
सेवा में,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
जनपद लखनऊ, 
उत्तर प्रदेश 
विषय- धारा 154(3) सीआरपीसी में एफआइआर दर्ज करने हेतु   
महोदय,
कृपया निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या- NT/SC/Judge/01 दिनांक-15/11/2013 द्वारा कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा पिछले साल 24/12/2012 को दिल्ली के एक होटल के कमरे में दुराचार करने तथा आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा से एक अवकाश प्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाये जाने के परिप्रेक्ष्य में इन्हें अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य होने के नाते एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, लखनऊ को प्रार्थनापत्र दिया था. मैंने मा० सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013 के आवश्यक अंशों को प्रस्तुत करते हुए उसके अनुक्रम में तत्काल एफआइआर दर्ज कर इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने हेतु निवेदन किया था. 
 
थानाध्यक्ष गोमतीनगर द्वारा इस सम्बन्ध में मा० सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद एफआइआर दर्ज नहीं किया गया और मात्र “उत्तर प्रदेश पुलिस प्राप्ति रसीद शिकायती प्रार्थनापत्र” क्रम संख्या 28310 मुझे दे दिया जो स्पष्टतया मा० सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है. 
 
अतः मैं यह पत्र आपके सम्मुख धारा 154(3) सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत थानाध्यक्ष गोमतीनगर को प्रस्तुत प्रार्थनापत्र की प्रति (संलग्नक तथा रसीद सहित) इस अनुरोध से प्रेषित कर रही हूँ कि कृपया तत्काल विधि के अनुसार इस सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज करा कर अग्रिम कार्यवाही कराया जाना सुनिश्चित करें. साथ ही मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त आदेश का उल्लंघन करने के सम्बन्ध में थानाध्यक्ष गोमतीनगर के विरुद्ध कार्यवाही किया जाना भी सुनिश्चित करें. 
पत्र संख्या- NT/SC/Judge/02 
दिनांक-15/11/2013
 
भवदीय,                                                                                                                   (डॉ नूतन ठाकुर) 
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ 
94155-34525
 
सेवा में,
थानाध्यक्ष,
थाना गोमतीनगर,
लखनऊ, उत्तर प्रदेश 
विषय- मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य में पारित निर्णय के आलोक में पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध यौन उत्पीडन का एफआइआर दर्ज करने हेतु   
 
महोदय,
कृपया निवेदन है कि दिनांक 06/11/2013 को जर्नल ऑफ इंडियन ला एंड सोसायटी के वेबसाईट पर Through my Looking Glass नामक एक लेख छपा (http://jilsblognujs.wordpress.com/2013/11/06/through-my-looking-glass/) जो इसी साल कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा लिखा गया था. कालांतर में दिनांक 11/11/2013 को यह लेख लीगली इंडिया नामक एक अन्य वेबसाईट तथा अन्य समाचारों के माध्यम से पूरे देश में प्रसारित हुआ.
 
इस लेख के अनुसार इस युवा महिला विधि इंटर्न के साथ हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज ने पिछले साल दिसंबर में एक होटल के कमरे में उस समय दुराचार किया जब राजधानी सामूहिक दुष्कर्म की घटना से जूझ रही थी. जज पर यह आरोप लगने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की कमेटी का गठन भी कर दिया है. लेख के अनुसार वह दिल्ली में उस समय यूनिवर्सिटी के अंतिम वर्ष के शीतकालीन अवकाश के दौरान में इंटर्न थी और अंतिम सेमेस्टर के दौरान अत्यधिक प्रतिष्ठित, हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सुप्रीम कोर्ट के जज के तहत काम कर रही थी. लेख में स्पष्ट लिखा है- “मेरी कथित कर्मठता के पुरस्कार के रूप में मुझे यौन उत्पीड़न (शारीरिक नुकसान नहीं मगर हनन करने वाले) से एक वृद्ध व्यक्ति ने पुरस्कृत किया, जो मेरे दादा की उम्र का था. मैं उस पीडादायक विवरण का जिक्र नहीं करूंगी लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि कमरे से बाहर निकलने के काफी बाद तक मेरी स्मृति में वह अनुभव रहा और वास्तव में आज भी है.” सुश्री स्टेला ने "लीगली इंडिया" वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में पुनः आरोप लगाया कि दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज ने होटल के कमरे में उसके साथ दुराचार किया और इस घटना का कोई अन्य गवाह भी नहीं है. इस महिला ने अपने मूल लेख में हादसे में इस घटना की तारीख का जिक्र नहीं किया, लेकिन वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह पिछले साल 24 दिसंबर को हुआ था. 
इसके अतिरिक्त आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा ने एक अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है. फेसबुक पर प्रस्तुत इस टिप्पणी को लीगली इंडिया वेबसाईट ने प्रस्तुत किया है, यद्यपि लीगली इंडिया में दोनों रिपोर्ट लिखने वाले कियान गैन्ज़ ने इस दूसरी विधि छात्रा का नाम नहीं लिखा है. लीगली इंडिया के अनुसार- “she was “at the receiving end of unsolicited sexual advance more than once”. Both the interns knew each other, the report claimed.” (अर्थात यह छात्रा कई बार अवांछनीय यौन शोषण की शिकार हुई. ये दोनों विधि छात्रा एक दुसरे को जानती भी हैं). 
 
मैं इस सम्बन्ध में आवश्यक अभिलेख साक्ष्य हेतु संलग्न कर रही हूँ. साथ ही चूँकि ये सीधे-सीधे अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य हैं अतः सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु यह प्रार्थनापत्र प्रस्तुत कर रही हूँ. मैं यह एफआइआर एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में ही नहीं एक विधि की छात्रा तनया की माँ के रूप में भी प्रस्तुत करना अपना आवश्यक फर्ज और उत्तरदायित्व समझती हूँ जो इन्हीं बच्चियों की तरह एक नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही है और इन्हीं की तरह कई स्थानों पर इंटर्न बनेगी, क्योंकि मैं इन दोनों बच्चियों में अपनी बेटी तनया को देखती हूँ और मुझे इस बात से ही रौंगटे खड़े हो जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त जज छोटी बच्चियों के साथ इस प्रकार की अत्यंत घिनौनी हरकत कर रहे हैं और कार्यवाही के नाम पर एफआइआर दर्ज कर उन पूर्व जजों को सलाखों के पीछे करने के बजाय मात्र जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है. 
 
जैसा कि क़ानून का नियन है, जांच अपनी जगह होती रहेगी लेकिन इन दोनों मामलों के सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किया जाना अत्यंत आवश्यक है और मैं, एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में यह प्रार्थनापत्र तत्काल एस सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किये जाने हेतु प्रस्तुत कर रही हूँ. 
 
चूँकि ये दोनों घटनास्थल आपके थाना क्षेत्र के नहीं हैं, अतः साथ ही यह भी निवेदन करती हूँ कि इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने की कृपा करें. 
 
अंतिम बात मैं यह कहना चाहूंगी कि आप अवगत होंगे कि मा० सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013 में यह स्पष्ट कर दिया है कि अब प्रत्येक थाने को प्रत्येक संज्ञेय अपराध में एफआइआर आवश्यक रूप से तत्काल पंजीकृत किया जाना आवश्यक है और ऐसा नहीं करने पर संबधित थानाध्यक्ष व्यक्तिगत रूप से कार्यवाही किये जाने के हकदार होंगे. मैं सुलभ सन्दर्भ हेतु इस निर्णय के आवश्यक भाग को भी संलग्न कर रही हूँ. 
 
तदनुसार कृपया उक्त प्रार्थनापत्र और संलग्न अभिलेखों के आधार पर तत्काल उचित धाराओं में दोषी अभियुक्तों के विरुद्ध एफआइआर दर्ज कर अग्रिम विवेचना एवं आवश्यक कार्यवाही कराये जाने की कृपा करें. 
पत्र संख्या- NT/SC/Judge/01
दिनांक-15/11/2013
 
भवदीय,                                                                                                                    
(डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ 
94155-34525
 
 

राजनीतिक प्रदूषण के बावजूद टक्कर कांग्रेस-भाजपा में ही

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सामने हैं और राजनेता राजनीतिक भाषणबाजी के प्रदूषण की लपेट में मतदाता को गुमराह करने में पीछे नहीं हैं। किसी भी जनतान्त्रिक शासन व्यवस्था में चुनाव लोकतंत्र का वो पावन पर्व होता है, जिसमें जनता को अपने पिछले चुने हुए प्रतिनिधियों से पांच वर्ष के कार्यकाल का लेखाजोखा पूछने का एक संवैधानिक अवसर होता है, जबकि अगले पांच वर्ष के लिये अपने क्षेत्र की जरूरतों और अपने क्षेत्र की समस्याओं के निदान के लिये जनप्रतिनिधि चुनने का अवसर होता है। लेकिन इस बार के इन पांच राज्यों के चुनावों पर राष्ट्रीय दलों की आपसी बयानबाजी का प्रदूषण इतना प्रभावी होता जा रहा है कि असल मुद्दे और जनता की लोकतान्त्रिक इच्छाएं गौण होती जा रही हैं। जनता क्या चाहती है, इस बात से किसी भी दल को कोई मतलब नहीं है। हाँ हर कोई सामने वाले को खुद से अधिक निकम्मा सिद्ध करने का भरसक प्रयास करने में जरूर लगा हुआ है, जिसके लिये झूठ का भी जमकर उपयोग किया जा रहा है। तथ्यों को तोड़ा और मरोड़ा भी जा रहा है।
 
ऐसे हालात में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रादेशिक मुद्दों को चुनावी पटल से पूरी तरह से नकारने वाले राजनैतिक दल मतदाता को नासमझ और बेवकूफ समझने की बड़ी भारी भूल कर रहे हैं। यही नहीं मतदाता को बेवकूफ बनाने के लिये जहाँ एक ओर सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है, वहीं दूसरी और इलेक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया को खरीदकर पेड न्यूज दिखाई एवं प्रकाशित करवाई जा रही हैं।
 
बनावटी सर्वे करवाकर जनता में इस बात का नाटकीय वातावरण बनाया जा रहा है कि अब तक जो कुछ भी हुआ वो सब बकवास है और अब जो कुछ होने वाला है, उसके लिये भारतीय राजनीति में एक महामानव का अवतार हो चुका है, जो चुटकी बजाते ही सब कुछ ठीक कर देने वाला है। इसलिये आसाराम की भांति उस महामानव को मतदाता को अपना मत ही नहीं आस्था भी और सब कुछ समर्पित कर देने का समय आ गया है।
 
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बहाने 2014 में प्रस्तावित लोकसभा चुनावों की अभी से तैयारी शुरू की जा रही है। बल्कि ये कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि सत्ता से बाहर बैठे प्रतिपक्ष के लिये पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की परवाह करने से कहीं अधिक नयी दिल्ली की कुर्सी की तैयारी अधिक की जा रही है। इस बात की किसी को परवाह नहीं है कि यदि दो बड़े राजनैतिक दलों में से जिस किसी को भी पांच विधानसभा चुनावों में जनता निरस्त करेगी, वह तो धराशायी हो ही जाना है। यदि फिर भी वो खुद को धराशायी नहीं भी मानता है तो 2014 में उसे सब कुछ स्पष्ट हो जाना है। 
 
इस प्रकार के हालातों से निपटने के लिये राजनेताओं का एक मात्र यही ध्येय है कि किसी भी प्रकार से जनता का असल मुद्दों से ध्यान हटाया जाये, जनता को भटकाया जाये और चुनावों के दौरान जनता की भावनाओं को भड़काकर येनकेन प्रकारेण अपने-अपने पक्ष में मतदान करने का प्रयास किया जाये।
 
जबकि इसके विपरीत भारत की जनता जो सब कुछ जानती है और समय आने पर हथौड़े की चोट मारने से नहीं चूकती है। जनता देख रही है कि उद्योगपतियों को छूट प्रदान करने के लिये, अफसरों को मोटी-मोटी तनख्वाह और सुविधाएं देने के लिये और राजनेताओं के ऐशोआराम के लिये मंहगाई की कोई परवाह नहीं है। जनता पर लगातार करों की मार पड़ रही है और जीवन रक्षक जरूरत के सामानों की लगातार कीमतें बढने दी जा रही हैं। जमाखोरों पर कोई लगाम नहीं है। बिचौलियों की चांदी हो रही है। हर क्षेत्र में दलालों का साम्राज्य है। प्रशासन में अन्दर तक भ्रष्टाचार है। जिसका माकूल जवाब आने वाले समय में जनता सभी सत्ताधारी दलों को देने जा रही है।
 
वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने वाली, लोकसभा को नहीं चलने देने में माहिर और सत्ता सुख के लिये बेसब्र भाजपा का परम्परागत मतदाता आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को इस बात का जवाब देने जा रहा है कि दो सदस्यों से नयी दिल्ली की कुर्सी तक जिन तीन मुद्दों के बल पर भाजपा की प्रगति हुई वे तीन मुद्दे अर्थात्-राममन्दिर, समान नागरिक संहिता और कश्मीर अब कहां पर हैं? आज मतदाता के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा बदल गया है? यदि हाँ तो फिर भाजपा को सत्ता में लाने से क्या हासिल होने वाला है? इस बात पर भी मतदाता गम्भीरता से विचार कर रहा है।
 
जहाँ तक पांच राज्यों की विधानसभाओं में चुनावी संघर्ष की बात है तो आमने-सामने की टक्कर तो भाजपा और कांग्रेस में ही मानी जा रही है। यद्यपि दिल्ली में आम आदमी पार्टी ताल ठोक रही है। राजस्थान में राष्ट्रीय जनता पार्टी और म.प्र. एवं राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी भी सदा की भांति अपनी उपस्थिति फिर से दर्ज कराने को बेताब हैं।
 
दिल्ली में आम आदमी पार्टी निम्न तबके के लोगों को बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाती रही है, लेकिन कुछ ही समय में इस पार्टी और इस पार्टी के सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल की हकीकत जनता के सामने आ चुकी है। वैसे आम आदमी पार्टी का संविधान उठाकर देखेंगे तो पायेंगे कि इस पार्टी के संविधान में आम आदमी का जिक्र तो बार-बार किया गया है, लेकिन जहाँ कहीं भी आम आदमी को पार्टी के मंच पर प्रतिनिधित्व प्रदान करने का जिक्र आया है तो उसमें आम आदमी को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के बजाय इस बात की पुख्ता व्यवस्था की गयी है कि आम आदमी और दबे कुचले वर्ग को किसी भी सूरत में आम आदमी पार्टी की नीतियों के निर्धारण में निर्णायक भूमिका नहीं होगी। इससे इस बात का प्राथमिक तौर पर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आम आदमी के नाम पर बनायी गयी पार्टी का भविष्य क्या होगा।
 
जहाँ तक राजस्थान में पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी का हिन्दीकरण करके इसे राष्ट्रीय जनता पार्टी के रूप में प्रचारित करने वाले आदिवासी नेता और पूर्व जनसंघी डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की पत्नी गोलमा देवी मीणा के नेतृत्व में प्रदेश के सभी क्षेत्रों में हुंकार भरने और किसान-आदिवासी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की बात करने का सवाल है, तो आम जनता इस प्रकार की बातों को कोई भाव नहीं दे रही है। ये बात अलग है कि आम आदमी पार्टी और नेशनल पीपुल्स पार्टी अनेक सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही नुकसान पहुंचाने का काम जरूर बखूबी करने वाली है। चुनाव बाद जहाँ 'आप' के केजरीवाल की ओर से किसी को समर्थन नहीं दिये जाने की बात पर 'आप' पार्टी के मतादाताओं को विश्‍वास है, वहीं राजस्थान में डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के अन्धभक्त मतदाता भी इस बात को खुलकर स्वीकार कर रहे हैं कि अगली राजस्थान सरकार डॉ. मीणा के समर्थन के बिना नहीं बन सकेगी और फिर खूब मोलभाव करने का मौका मिलेगा।
 
बसपा के इतिहास पर नजर डालें तो म.प्र. और राजस्थान में बसपा के टिकट पर जीतकर आने वाले विधायक चुनाव के बाद हर बार अपनी पार्टी बदलते रहे हैं। उनका चुनाव जीतने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती से मोहभंग हो जाता रहा है और वे सत्ता का सुख भोगने को बेताब होते रहे हैं। इस इतिहास से इस बार मतदाता को इस बात का अहसास हो चुका है कि यदि बसपा के प्रत्याशी को चुनाव जिताया तो ये बात तय है कि वो निश्‍चित रूप से सत्ता के करीब पहुंचने वाली पार्टी का दामन थामेगा। इसलिये इस बार बसपा की स्थिति बहुत अच्छी रहेगी इस बात की बहुत कम उम्मीद की जा सकती है। पिछले परिणामों को दोहराने की अपेक्षा करना भी उचित नहीं लगता है। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही असल टक्कर होने वाली है।
 
लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ होम्योपैथ डॉक्टर, संपादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) से जुड़े हुए हैं.

क्या दर्शको के साथ न्यूज़ चैनल धोखा नहीं कर रहे हैं?

आप खुद देखिये लगभग सभी समाचार चैनल स्पीड न्यूज़, शतक न्यूज़ ,न्यूज़ सेंचुरी जैसे बुलेटन में पच्चीस से तीस खबरों को सौ खबरें बनाकर पेश कर रहे हैं जबकि दावा शीर्षक में सौ खबरों का बड़े जोर शोर से किया जा रहा है. ये खबरें देखने वालों के साथ धोखा नहीं तो क्या है? 
 
समझ नहीं आता कि मीडिया को लोकतंत्र का पहरेदार और चौथा खम्भा कहने वाला बुद्धिजीवी संपादक मंडल बुलेटिन के इस गिरते स्तर पर क्यों खामोश है? शायद इसलिए कि उनसे सवाल पूछने का साहस कोई नहीं दिखाता या फिर प्रबंधन सिस्टम में मुंह नहीं खोल पा रहे? आज किसी चैनल के पास एसआईटी टीम नहीं हैं और एएनआई के आ जाने से रिपोर्टरों की संख्या भी दिनोंदिन घटती जा रही है. कम खर्चे पर एएनआई से, बीस पच्चीस खबरें उठा कर उनका शतक बुलेटिन बनाकर खबरें दर्शको के आगे रख देने से दर्शक ठगा सा महसूस करता है. दर्शक क्या करे, मजबूर है यही देखने को. लेकिन क्या कर रहे हैं न्यूज़ चैनल वाले, चैनल में मोटी तनख्वाह लेने वाला सम्पादक इस पर नजर क्यों नहीं रखता? क्या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह खबरों की गुणवत्ता बनाये? और तो और आखिर क्यों एनटीआरए नज़र नहीं रखता?
 
न्यूज़ चैनल अपनी गिरती टीआरपी के लिए खुद दोषी हैं, दर्शक खबरें चाहता है लेकिन खबरें खो सी गयी हैं. शाम होते ही खबर कि जगह बहस ने लेनी शुरू कर दी है. रिपोर्टर पैदल हो गए है, खबर के लिए सोच खतम होती जा रही है. कॉस्ट कटिंग के नाम पर, अपने फायदे के लिए चैनल प्रबंधन रोज  गाज गिरा रहा है, न्यूज़ चैनल्स में छंटनी का दौर दो साल से यथावत जारी है. बड़ा सवाल ये भी है कि नई पीढ़ी जो इस लाइन में आना चाहती है वो दो राहे पर खड़ी हो गयी है. 
 
बरहाल खबरों में खबरे दब गयी है, दर्शक निराश है और हैरान भी कि किस तरह के बुलेटिन ऊसके सामने दिखाए जा रहे हैं जिनका कोई सर पैर नहीं है. लेकिन उसके हाथ में कुछ नहीं है. लेकिन अब दर्शक का दम घुट रहा है और धीरे-धीरे भड़ास निकलना शुरू हो गई है.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं और एनडीटीवी से जुड़े हुए हैं.

पटना में जागरण भी ढाई रुपये का, अब क्या करे प्रभात खबर?

Gyaneshwar : जागरण भी सस्‍ता… हिन्‍दुस्‍तान के बाद दैनिक जागरण, पटना ने भी अखबार सस्‍ता कर दिया है। पटना में दैनिक जागरण आज शुक्रवार से ढाई रुपये में मिलने लगा है। परेशानी प्रभात खबर के सामने है। पहले से हिन्‍दुस्‍तान-दैनिक जागरण से कम तीन रुपये का आमंत्रण मूल्‍य था। अब क्‍या करे प्रभात खबर।

आज का 'प्रभात खबर' भी तीन रुपये का ही है। आगे कम तो करना ही होगा। लेकिन, बड़ी चुनौती आ रहे दैनिक भास्‍कर के समक्ष भी खड़ी हो गई है। हिन्‍दुस्‍तान और दैनिक जागरण ने पहले से कीमत कम कर भास्‍कर की आजमाई तकनीक पर हथौड़ा मारा है। अब कुछ और ही करना होगा पटना के मार्केट में स्‍थापित होने को।

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर के फेसबुक वॉल से.


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छह साल की विस्फोट यात्रा और बौने लोगों के बीच बड़ा होने का दर्द

Sanjay Tiwari : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के ब्लाग पर अचानक आज यह फोटो मिल गई। वे भी अक्सर मेरा अतीत कुरेदते हैं। कुछ लोग अक्सर मेरा अतीत जानना चाहते हैं। यह मेरा अतीत है। तीन साल पुराना। आनलाइन दुनिया में कुछ कर लेने के बाद बहुत कुछ कमा लिया होगा। फटी शर्ट। वह भी दो तीन साल पुरानी। यही कमाई थी और यही प्राप्ति। हालात बहुत बदल गये हों ऐसा नहीं है। लेकिन वह शर्ट जरूर बदल गई है।

अब तीन साल बाद अक्सर यह सोचता हूं कि मैने किसके लिए अपने आपको बर्बाद कर लिया? क्या उनके लिए जो बेईमानी और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबकर ईमानदारी का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं? कमोबेश छह साल की विस्फोट यात्रा में एक से एक लोगों से मुलाकात हुई है। बौने लोगों के बीच बड़ा होने का दर्द बड़ा गहरा होता है।

संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से. संजय विस्फोट डाट काम के संस्थापक और संचालक हैं.

हरतोष सिंह बल का ट्वीट पढ़ कर अफसोस नहीं हुआ बल्कि अच्छा लगा

Vineet Kumar : 2 जी स्पेक्ट्रम के दौरान हरतोष सिंह बल को गौर से पढ़ना शुरू किया तो फिर एक भी स्टोरी नहीं छूटी. इनके बहाने ओपन मैगजीन के प्रति खास किस्म का लगाव हो गया. अब जब उनकी ये ट्वीट पढ़ी तो अफसोस नहीं हुआ बल्कि अच्छा लगा कि सब खत्म नहीं हो गया है.

इस मीडिया मंडी में कुछ नहीं तो ऐसे बाट भी थोड़े बचे हैं जो सबको एक ही तराजू से तौल नहीं सकते. इतना भी नहीं बचेगा तो मीडियाकर्मी दुपट्टे, पेटीकोट, ब्लाउज की चुनरी प्रिंट रगने थोड़े ही आया है. हां ये है कि इस प्रकरण से ओपन और कायदे से खुल गया..टायर-ट्यूब का धंधा करनेवाले आज न कल तो ये काम करते ही.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


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बात-बात पर मेरा रोना और शंभूजी का यूं ही छेड़ना : संजय सिन्हा

शंभूनाथ शुक्ल : संजय सिन्हा आज तक न्यूज चैनल के बड़े पत्रकार हैं। जनसत्ता के दिनों में वे साथ काम करने आए। तब वो जिस तरह के परिवार से आए थे, ऐसे परिवार तब भी हिंदी में दुर्लभ थे। उनके पिता बिहार बिजली बोर्ड के निदेशक, उनके चाचा का अपना शिपिंग का मुंबई में कारोबार, उनके मामा मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक और उनके दादा को राय बहादुर का खिताब मिला था, जो अंग्रेजों के वक्त में कानपुर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे। एक ऐसे परिवार से आया लड़का, जिसकी खुद की शिक्षा विदेशों से हुई हो हिंदी में काम करने लगे, तो अटपटा तो लगता ही था।

संजय सिन्हा तब भी एक सितारा थे और आज भी। पर यही संजय सिन्हा जब इस नाचीज को याद करें तो अच्छा लगता है। संजय सिन्हा आज भी अपना बाल हठ नहीं भूल पाए। जब वे मेरे सहकर्मी थे तब मैं उन्हें मित्र, पुत्र और गुरु भी मानता था। आज भी संकट में फंसता हूं तो संजय सिन्हा से ही राय मांगता हूं। और आप लोग अब तक तो जान ही गए होंगे कि मैं संकट में फंसता नहीं बल्कि संकट न्यौतता रहता हूं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.


Sanjay Sinha : किसी भी व्यक्ति के बारे में क्षणांश को ही आप विस्तार मान लें तो आदमी को समझने में चूक हो जाती है। और 1988 में शंभूनाथ शुक्ल सेे मेरी मुलाकात में ये चूक मुझसे हो सकती थी, अगर क्षणांश को ही मैंने संपूर्ण मान लिया होता। उन्होंने मेरी ढेर सारी सहेलियों को एकबार रेह़ड़ कहा था, जिन्हें मैं आईआईएमसी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन) से महीने भर की ट्रेनिंग पर जनसत्ता ले आया था। क्योंकि मुझे आईआईएमसी में एडमिशन से पहले ही जनसत्ता में नौकरी मिल गई थी इसलिए अपने बैच की ढेर सारी लड़कियों को ट्रेनिंग दिलाने का जिम्मा मैंने उठाया था।

शंभूनाथ शुक्ल जिन्हें आगे मैं शंभूजी के नाम से संबोधित करूंगा, ने मजाक या दुलार में उन लड़कियों को रेहड़ कहा था। लड़कियां मेरी दोस्त थीं, इसलिए मुझे बुरा लगना ही था। उस क्षणिक भावुकता में मैं चला गया था जनसत्ता के स्थानीय संपादक बनवारी (जी) के पास। बनवारी की चर्चा मैं चाहूं तो अलग से कर सकता हूं और शायद कभी आगे करूंगा भी, लेकिन अभी बस उतना ही जितने की दरकार है। बनवारी ने मुझे अपने पास बिठाया और बहुत नपे तुले अंदाज में समझाया कि आंखों के लेंस पर अगर भावनाओं की गर्द जमा हो जाए तो सत्य, सत्य नहीं रह जाता। उन्होंने ये भी कहा कि तुम हफ्ता भर और शंभूजी के साथ काम करो, फिर बताना।

हफ्ता बीत गया। मैंने इस एक हफ्ते में महसूस किया कि किसी को जानने के लिए सचमुच भावना भरे लेंस उतार देने चाहिए। मैंने लेंस उतार कर शंभूजी के साथ तालमेल बिठाना शुरु किया, और यकीन मानिए इस हफ्ते भर में शंभूजी बदल गए, मैं बदल गया या सत्य को परखने का नजरिया बदल गया।

तीन बेटियों के पिता शंभूजी ने एकदिन मुझसे कहा कि तुम मेरे पुत्र के समान हो, और मैंने मजाक में कहा कि ऐसे में तीन-तीन बेटियों के दहेज का जुगाड़ तो मुझे ही करना होगा। शंभूजी हंसते हुए कहते, और उसके बाद जो बचेगा वो तो तुम्हारा ही होगा। अब एक पत्रकार के पास तीन-तीन बेटियों के ब्याहने के बाद बचना क्या है, मैं उन्हें अक्सर छेड़ता। लेकिन शंभूजी विचलित नहीं होते। वो उन लोगों में शुमार हैं, जो सफर को मंजिल मानते हैं। इसलिए जिंदगी भर फक्कड़ी करते हुए भी आज शंभूजी से ज्यादा खुश और मस्त कोई पत्रकार मुझे नजर नहीं आता। वो पत्रकार भी नहीं जिन्होंने शंभूजी के साथ शायद कभी लुंगी तक साझे में खरीदी होगी, और हो सकता है कि आज उनके ड्राइवर की आर्थिक हैसियत भी शंभूजी से ज्यादा हो। कहने का मतलब बस इतना ही कि शंभूजी कुछ हजार रुपयों की नौकरी में खाते रहे और हमे खिलाते रहे। थोड़ी बहुत कमाई की भी वो सोच पाए होते तो यकीनन कमसे कम दिल्ली में दो कमरे का फ्लैट तो होता ही, ना कि गाजियाबाद में। खैर मेरा कद छोटा है ऐसी बातें कहने और करने के लिए।

हां, तो शंभूजी के लिए ये संभव था कि वो दो-दो संजयों को एक साथ साधे हुए चलते रहे- जिनके बारे में उन्होंने खुद लिखा है कि प्रभाष जोशी कहा करते थे कि आप सिंह बंधुओं को अपने साथ लेकर चल रहे हैं। ये सच है कि शंभूजी के नहीं होने पर हम दोनों संजय अक्सर ऐसा वैसा बवाल काट सकते थे जिसकी सफाई देते-देते वो बेचारे परेशान हो जाते होंगे। ऐसी ही एक कड़ी में एकबार मैंने और संजय सिंह ने पटना के जनसत्ता संवाददाता सुरेंद्र किशोर से कुछ ऐसा कह दिया था कि प्रभाष जोशी को दिल्ली के सुंदरनगर वाले एक्सप्रेस गेस्टहाउस में बैठक बुलानी पड़ी थी। बैठक में हम दोनों संजयों को नया खलीफा कहा गया था, और तुर्रा ये कि हम दोनों संजय सीना चौड़ा करके वहीं खाना खाए और वापसी भी हमने प्रभाष जोशी की फिएट एन ई कार में की।

खैर, इन बातों का लेखा-जोखा कभी जनसत्ता पुराण में होगा। अभी तो शंभूजी की बात।

अमिताभ बच्चन के रूप में मुझे मां पहले ही मिल गई थी, संजय सिंह के रूप में बड़ा भाई मिल ही चुका था अब पिता के रूप में शंभूजी साथ थे। लेकिन इस पिता के साथ मेरे रिश्ते अजीब से थे। कभी रूठना कभी मनाना। बात-बात पर मेरा रोना और शंभूजी का यूं ही छेड़ना। बहुत से दिन कटते चले गए। और एकदिन मैं जनसत्ता छोड़कर ज़ी न्यूज़ चला गया। शंभूजी चंडीगढ़ में जनसत्ता के संपादक बन कर चले गए। एकदिन मेरा और संजय सिंह का परिवार शंभूजी से मिलने चंडीगढ़ पहुंच गया। शंभूजी ने खूब खातिर की। और एकदिन हमने कहा शंभूजी कहीं बटेर खाने को मिल जाए तो मजा आ जाए। और विश्वास कीजिए….उसी शाम पता नहीं कहां से शंभूजी ने पतीला भर पका हुआ बटेर हमारे होटल में भिजवा दिया। हम छक कर बटेर खाए और बहुत सारा जो बच गया उसे अगले दिन लेकर दिल्ली भी चले आए।

यही शंभूजी जब चंडीगढ़ से कोलकाता जनसत्ता के स्थानीय संपादक बन कर गए तो दो बार उनसे मिलने मैं कोलकाता गया। मजेदार बात ये है कि शंभूजी से मिलने एक बार तो मैं शंभूजी के साथ ही गया, दूसरी बार अकेला। शंभूजी मुझे लेने एयरपोर्ट आए थे। मुझे याद है कि उसके अगले दिन कोलकाता बंद की अपील ममता बैनर्जी ने की थी। शंभूजी मुझे घर में आराम करने को कह कर खुद दफ्तर चले गए थे। मैं काफी देर तक सोता रहा, और जब जागा तो हैरान रह गया। शंभूजी अपने हाथों से मेरे लिए गोभी की सब्जी और चावल बनाकर दफ्तर गए थे। मैं पूरा खाना खा गया, शायद उनका हिस्सा भी। फिर मैंने वहीं टीवी पर शाहरुख खान की फिल्म डर देखी और उसके बारे में सोचता रहा। सोचता रहा शाहरुख से 1988 में हुई अपनी मुलाकात के बारे में…इस पर भी बात करेंगे लेकिन आगे। अभी तो पूरा शहर बंद था। सारे होटल बंद थे। शंभूजी रात में आए तो मेरी तबीयत जरा खराब थी। मैं लेटा हुआ था। शंभूजी ने आते ही कहा, " यार पूरा शहर बंद है। चलो फिर भी कहीं खाने की तलाश करते हैं।" दफ्तर की कार उनके पास थी, ड्राइवर था। मुझे कार में पीछे लिटा कर शंभूजी खुद आगे बैठे और पूरा कोलकाता हमने छान मारा। शायद कहीं कुछ जुगाड़ हुआ था, और अगली सुबह मैं दिल्ली के लिए उड़ चुका था।

दो दिनों बाद मुझे अमेरिका जाना था, मैं अमेरिका चला गया। लेकिन शंभूजी के संपर्क में रहा। कई बार शंभूजी मुझसे राय मांगते। मुझे जो सूझता कह देता, और ऐसे ही अपने किसी साथी से कोई धोखा खाने के बाद शंभूजी ने मुझसे पूछा था कि अब क्या किया जाना चाहिए? मैंने मेल पर उन्हें लिखा था- धोखा देने से धोखा खाना बेहतर होता है। धोखा खाने में तो आपका जरा सा नुकसान हो सकता है, लेकिन धोखा देने पर आपकी आत्मा मर जारी है। शंभूजी ने इस लाइन को बार बार दुहराते हुए मुझसे मेल पर कहा था, यार जिसने मुझे धोखा दिया है आज तुम्हारे कहने पर मैं उसे माफ कर देता हूं।

लेकिन मुझे पता है कि शंभूजी न जाने कितनी बार धोखा खाते रहे हैं और धोखा देने वालों को माफ करते रहे हैं, मेरे कहने के पहले भी और बाद में भी। और जो ये सब कर पाता है वही सुख की नींद सोता है, जब मन होता है लोटा कंबल लेकर हिमालय पर जा सकता है, और बेखौफ हो कर कौरवों की विक्रमी सेना से लोहा ले सकता है। हिमालय के शिखर से भी ज्वालामुखी का उद्रेक कर सकता है – उम्र के 59वें बसंत पर भी।

आजतक में कार्यरत संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.


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एक हैं संजय सिन्हा, आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं

अरविंद केजरीवाल से असहमति

Vineet Kumar :  अरविंद केजरीवालजी, माफ कीजिएगा..अब आपके विज्ञापनों की शक्ल में आत्मश्लाघा से घिन आने लगी है. आप अपनी तारीफ में इतना कुछ कैसे बोल लेते हैं, हम दिन-रात आपको इस तरह एफ एम में बोलते सुनते हैं तो कभी-कभी तो हंसी आती है लेकिन ज्यादातर बात पर झुंझलाहट होती है कि माध्यम के स्तर पर आप भी वही सब कर रहे हैं जिसके लिए कांग्रेस और बीजेपी शुरू से बदनाम रही है.

मैं आपके विज्ञापनों और प्रोमोशनल एक्टिविटी को मतदाता की हैसियत से नहीं, एक मीडिया छात्र के नाते देख-समझ रहा हूं और महसूस करता हूं कि आपने इस स्तर पर इसका बेहद ही घटिया और बेहूदा इस्तेमाल किया है. एक नई राजनीतिक पार्टी जब अस्तित्व में आती है और वो भी आपकी जैसी जो भ्रष्टाचार मुक्त परिवेश की बात करती है तो उसे सिर्फ राजनीतिक स्तर पर सुधार करना नहीं होता बल्कि उन तमाम मोर्चे पर अलग और बेहतर करना होता है जिसका सीधा संबंध लोगों से है. एफ एम रेडियो अच्छा है या बुरा ये अलग मसला है लेकिन पब्लिक स्फीयर का जरुरी हिस्सा तो है ही जिसे कि आपके खुद की तारीफ में लिथड़े विज्ञापन कबाड़ा करने में बाकी दोनों पार्टियों की ही तरह असर कर रहे हैं.

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Vineet Kumar : अरविंद केजरीवालजी, बेगूसराय के एक शख्स ने आम आदमी पार्टी को 11000 रुपये और उनकी तरह न जाने कितने लोगों ने अपने खर्चे से काटकर पैसे इसलिए नहीं दिए कि आप अपनी तारीफ में लाखों रुपये के विज्ञापन पर एफ एम रेडियों में फूंक दें. ऐसे दानकर्ताओं पर ओपन पत्रिका ने ताजा अंक में स्टोरी भी की है. वो बिना इन विज्ञापनों के भी जानते रहे हैं कि आप कुछ अलग और बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. बेगुसराय में तो आपका बिल्कुल भी जनाधार नहीं है और नहीं दिल्ली चुनाव में वहां का मतदाता वोट करने जा रहे हैं, फिर भी आपके काम और पार्टी को लेकर लोगों के बीच एक भावनात्मक माहौल तो बना ही है जिसे कि एफ एम रेडियो पर आपके आत्मश्लाघा प्रलाप डैमेज कर रहे हैं.

वो श्रोता जो आपकी पार्टी का हिस्सा नहीं है, कार्यकर्ता नहीं है और चीजों को तटस्थ ढंग से देख रहा है, यकीन मानिए एक समय के बाद इरिटेट हो जा रहा है. बहुत ही सीधा सवाल है..अगर चुवान जीतने के लिए पानी की तरह इन विज्ञापनों पर पैसे बहाना जरुरी है तब तो शराब, तमाशे पर भी पैसे लुटाना उतना ही जरुरी है..कल को बने रहने के लिए ये भी करेंगे और तब उसके तर्क आपके पास होंगे.. अभी तक मैं माध्यम के हिसाब से जितना देख पा रहा हूं, आप और आपकी पार्टी कांग्रेस और बीजेपी से किसी भी स्तर पर अलग और कम नहीं है. अब किसी भी पार्टी की दो तरह से व्याख्या होनी चाहिए- माध्यमों में आप, कांग्रेस और बीजेपी और पब्लिक स्फीयर में आप,कांग्रेस और बीजेपी..पहले मोर्चे पर सब बराबर हैं. मेरी दिलचस्पी आम आदमी पार्टी के चुनावी विज्ञापनों के खर्चे को जानने में जरुर रहेगी कि आपने उस मीडिया पर कितने पैसे फूंक दिए जिसे कि कल तक आप कार्पोरेट और कांग्रेस की कठपुतली बताते रहे हैं.

Vineet Kumar : नमस्कार, मैं अरविंद केजरी….वाल आए कि इससे पहले रेडियो सिटी से शिफ्ट होकर बिग 92.7 एफ एम पर शिफ्ट होता हूं..वहां कांग्रेस के विज्ञापन कुछ इस तरह से कि अगर कांग्रेस नहीं सत्ता में होती तो पूरी दिल्ली अस्तबल, बूचड़खाना या ऐसी ही कुछ होती लेकिन वो दिल्ली नहीं होती जिसमे हम जी रहे हैं..वहां से उकताकर भागा तो फीवर पर बीजेपी की फेकू सीरिज. हद है यार. आपलोग तो माध्यमों पर कौन सा विज्ञापन, कितना विज्ञापन आएगा वक्त-वेवक्त नियम झोंकते रहते हो, कभी गौर किया है..आपलोगों ने. दिनभर में जितने विज्ञापन कंडोम, डियो,रियल एस्टेट के नहीं आते, उससे कहीं ज्यादा आपकी पार्टी और आपके विज्ञापन आते हैं. आप साबित क्या करना चाहते हैं..क्या दिल्ली के मतदाता विज्ञापनों के आतंक से आपको वोट देगी. बैक टू बैक पार्टियों के विज्ञापन कुछ इस तरह से आते हैं जैसे आपलोग आपस में शटल खेल रहे हो और अगर गौर से न सुनें तो पता ही नहीं चलती रानी झांसी, भगत सिंह, तांत्या टोपे की जीवनी प्रसारित हो रही है या कांग्रेस,बीजेपी या आप का विज्ञापन.. विज्ञापनों के इस अतिरेक को मैं दिल्ली के मतदाताओं के प्रति अपमान के रुप में लेता हूं. आपको उनकी बौद्धिक क्षमता पर यकीन करना चाहिए..ऐेसा थोड़े ही होता है कि मार ठेले जा रहे हो..हम बैल थोड़े ही हैं कि अभी सब निगलते चले जाएं और बाद में इत्मिनान से जुगाली करते रहेंगे.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


Sanjaya Kumar Singh : अरविन्द केजरीवाल के यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि मैं इनकम टैक्स कमिशनर था, चाहता तो करोड़ों कमा सकता था। एक तो सभी इनकम टैक्स कमिश्नर "चाहकर" करोड़ों नहीं कमा सकते हैं। जो कमाते हैं वो गलत करते हैं और जेल जाने का खतरा रहता है। तब वो नहीं कह सकते कि सरकार चोरी करने के लिए उन्हें परेशान कर रही है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने इनकम टैक्स की नौकरी छोड़ दी तो इसीलिए कि उन्हें पैसे नहीं चाहिए थे। उन्हें मुख्यमंत्री बनना था, राजनीति करनी थी – तो नौकरी छोड़नी ही पड़ती। चुनाव लड़ने से पहले लाभ के पद छोड़ने ही पड़ते हैं, नौकरी में रहकर चंदा लेने की संभावना भी ठीक नहीं होती है। और आप करोड़ों कमा ही रहे हो, ऐसे नहीं वैसे। मुझे लगता है आप आयकर कमिशनर रहकर कमा ही नहीं सकते थे। आप ऐसे कमा सकते थे – कमा रहे हैं। किसी पर कोई अहसान नहीं है। लाभ यह है कि जांच की बात हो तो आप आरोप लगा दें कि सरकार आपके पीछे पड़ गई है। रही बात आप के अकाउंट की तो अकाउंट सबका होता है। सत्यम का भी था, ऑडिट भी होता था।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर आईं कुछ टिप्पणियां यूं हैं…

    Nomad's Hermitage कोई अहसान नहीं किया यदि पैसे नहीं कमाये। न कमाकर उसको जीवन उपलब्धि बनताकर चुनाव लड़कर सत्ता भोगनें की कवायद तो और बड़ी सोची समझी बेईंमानी है।
 
    Kishore Kumar यह हुआ – सबकी खबर ले, सबको खबर दे। बेहतरीन विश्लेषण। पता नहीं आपकी इस टिप्पणी के बाद केजरीवाल जी की क्या प्रतिक्रिया होगी। शायद वह चुप ही रहना बेहतर समझें।

    शंभूनाथ शुक्ल waah!!! यह दावा तो कोई भी कर सकता है। चाहता तो मैं भी करोड़ों कमा लेता। ईमानदारी से जीने का मतलब यह कतई नहीं कि जीवन भर आप बस यही रोते रहें कि देखो मैने कमाई नहीं की। अगर अब आपके पास करोड़ों का चंदा आ रहा है तो हिसाब-किताब से परहेज क्यों?
 
    Sanjaya Kumar Singh शंभू जी मुद्दा हिसाब-किताब का नहीं है। यह सोची समझी योजना है, बड़ा खेल करने की। यह वैसे ही हुआ कि कोई ईमानदारी से नौकरी करे औऱ रिटायरमेंट के बाद कहे कि अब मुझे राज्यपाल बना दो। मैं ईमानदार था। सवाल है कि आपको किससे क्या मांगना है। जनता से कुर्सी मांगनी है तो ईमानदारी का ढिंढोरा पीटना होगा, अपनी पार्टी की सरकार से लाभ का पद लेना है तो इसके बिना भी हो जाएगा। लेकिन है तो दोनों बेईमानी ही। या सशर्त ईमानदारी।
 
    Sridevi Kumar Profound thoughts…..Impartial too!
 
    Shashank Dwivedi संजय जी ,केजरीवाल तो शुरू से ही अपनी फंडिंग और हिसाब -किताब देने को तैयार थे और तैयार है ..वो तो सभी पार्टियों को आर टी आई के दायरे में लाने के बिल पर भी सहमत थे लेकिन कांग्रेस ने वो होने नहीं दिया ..केजरीवाल तो फिर भी अपना हिसाब दे देंगे लेकिन क्या कांग्रेस में औकात है अपनी चुनाव फंडिंग सार्वजनिक करने का ?कांग्रेस का हिसाब कौन देगा ..आप पार्टी में है और वो ईमानदारी से कर भी रही है …रही बात सरकार के पीछे पड़ने की वो तो पड़ी ही है जब ये लोग लता मंगेशकर को भारत रत्न लौटाने की बात कर सकते है सिर्फ मोदी की तारीफ़ पर तो केजरीवाल को तो जानबूझकर परेशान कर ही सकते है …कुलमिलाकर इन महाभ्रष्ट कांग्रेसियों से तो केजरीवाल लाख गुना अच्छा है …

    Brajbhushan Prasad सहानुभूति बटोरने का नया तरीका हैं ।

    Sanjaya Kumar Singh Shashank Dwivedi जी मुद्दा अच्छे और बुरे होने का नहीं है और ना ही हिसाब देने का। खुद को ईमानदार और दूसरों को बेईमान कहने का है। मुझे इस बात का मतलब नहीं समझ में आता कि मैं चाहता तो कमा लेता। ये तो कोई भी कह सकता है कि तस्करी करके, नशा बेचकर या ऐसे ही किसी कमाऊ धंधे से मैं कमा सकता था पर मैंने नहीं कमाया है इसलिए मुख्यमंत्री बना दो। और दूसरे क्या अंबानी और नंदन नीलकेणी को आप इसलिए मुख्यमंत्री नहीं बनने देंगे कि उन्होंने करोड़ों कमा लिए हैं। क्या मतलब है इस कमाने और नहीं कमाने का।
 
    सिद्धार्थ विमल जी, बिलकुल सही फरमाया आपने. अभी तो अरविन्द जी ने आभासी सत्ता का सुख देखते -दिखाते हुए रैलियों, पूँछ दबे धनकुबेरों और अनिवासी भारतियों का फंड मैनेज करने के ही नए कीर्तीमान स्थापित किये हैं. अभी तो वो वास्तविक सत्ता से कोसों दूर हैं तब ये जलवे हैं.
 
    Madan Tiwary वैसे तो राजनितिक दलो मे सीआईए के एजेंट पहले भी रहते थे परन्तु यह पहली बार हुआ है कि सीआइए ने बजाप्ता एक राजनीतिक दल पैदा कर दिया। खुजलीवाल को पता है फ़ोर्ड क्या है, नारायन मूर्ति ने फ़ोर्ड की कमेटी मे रहकर कितनी मदद पहुंचाई। देश के लिये आतंकियो से बडा खतरा खुजलीवाल है, यह व्यक्ति बाते बडी-बडी करता है लेकिन पारदर्शिता के नाम पर जब इससे मात्र यह कहा जाता है कि अपनि संस्था कबीर के खर्चो से कौन कौन सा काम किया उसका भौतिक सत्यापन करने दो तो इसे सांप सुंघ जाता है। मेरी नजर मे एक क्षण के लिये अंग्रेजो का शासन मंजूर है खुजलीवाल का नही।
 
    Madan Tiwary Shashank Dwivedi जी किसको पट्टी पढा रहे हैं ? मैने साल भर पहले इमेल भेजा था , मुझे कबीर के कार्यो का भौतिक सत्या[पन करने दो, जवाब आया जल्द आपके मेल का जवाब दिया जायेगा। आजतक नही दिया। आप मुझे कबीर के कार्यो का भौतिक सत्यापन करने की अनुमति दिलवा दे। जिवन भर खुजलीवाल और आपका चपरासी वह भी बिना वेतन का रहकर काम करुंगा। यथार्थ बोले, सच बोले।
 
    Abhishek Kumar बेहतरीन विश्लेषण, बेबाक़

    सिद्धार्थ विमल अरविन्द जी मूल्यों के प्रति भ्रस्ट हैं. सबसे पहले इन्होने स्वम्भू मुख्यमंत्री बन कर नागरिकों के बुनियादी हक़ "मताधिकार" द्वारा चुनने के मूल्य की हत्या की. फर्जी खुद के गढ़े एग्जिट पोल के इश्तेहार से दिल्ली को पाट देना इसी भ्रष्ट तरकीब का एक हिस्सा हैं. परिणाम तो दूर …चुनावों से बहुत पहले ही रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण समारोह में नागरिकों को निमंत्रण बांटना , लाल बत्ती के बहिष्कार जैसे नौटंकियों का सहारा लेना तो तानाशाहीपूर्ण चरित्र के अभूतपूर्व उदाहरण हैं. ऊपर से तुर्रा ये कि यह सब करने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ नागरिकों के ऊपर बहुत बड़ा एहसान किया और अब सब को इसके बोझ तले दब जाना चाहिए. आर्थिक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ जन प्रतिनिधि भी अरविन्द जी के भ्रष्ट आचरण और लोकतान्त्रिक मूल्यों की कसाईगिरी के सामने छोटा पड़ जायेगा.

    Mohit Khan बहुत बढ़िया। ज़बरदस्त लिखा आपने। आने वाले समय में जनता खुद देखेगी कि केजरीवाल हकीकत में क्या चीज़ है। बस कुछ ही दिनों की बात है पर्दा उठने ही वाला है।
 
    Susil Kumar Well said. I think he wants to make billions $$$$ so why limit himself on millions
 
    Ratish Kumar Singh Kuch log apne aap ko is tarah imandaar batate hain, jaise unke alawa sab baimaan hon.
   
    Syed Najeeb Ashraf Sanjay Kumar Singh: Sir Ji Maafi chahta hoo per aap is puri behas se lagta hai kafi dur hai !! Pahlu baat ki AK seedhe IRS ki naukri chor ke CM ki daur main nahi aa gaye !! Aap ko shayed pata honga ki unhone kam se kam 10 saal Parivartan ke tehat Delhi ki jhuggi jhopri main bahut kaam kiya !! RTI per unke kaam ke liye Magsesay award bhi mila tha And Magsesay ko Asia ka Noble Prize kaha jata tha !! And I don't think ki koi admi 10 saal pahle se itna sab kuch plan kar sakta !! Itna plan to sirf RG hi kar sakte hai.. So aap ki ye baat sarasar ghalat hai actually !! Dusri baat jab woh ye kahte hai main IRS main tha and and kuch nahi kamaya iska matlab te hota hai ki main abhi tak Imaandar tha so age bhi rahunga !! So agar kisi ka clean track record hai to use batane main koi problem nahi honi chahiye., Jab aap kahte hai ki Crores kama rahi hai to yaha per 2 hi baat hongi ya to aap ilzam laga rahe hai. know this is not the case, assuming good for yo hoo ya phir aap ko pata nahi hai !! Woh pahle din se ek ek paise ka record dene ko tayyar hai !! aap unki webiste per jao and aap ko khud samajah main a jayenga !! tajjub hai ek party 20 Crore main 70 seats per election larne ki baat karti hai and aap logo ko isse bhi pareshani hai !! jabki BJP and Congress main ek ek seat per itna kharcha hota hai !! And they are always ready to any investiigation !! And you know I have donated 3 times to them !! So I did lots and lot of research on this !! So I will try to help you on all question helpfully !!
     
    सिद्धार्थ विमल मैग्सेसे पुरस्कार देने वालों से पूछ कर ही नागरिकों को अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए सैयद नज़ीब अशरफ जी ?

    Syed Najeeb Ashraf Sidharth Vimal: Aap pura time lijiye and meri baat ko phir se parhiyenga !! And then maine jis baat ke jawab main kaha hai woh bhi parhiyenge. rest I can't help !!
 
    Sanjaya Kumar Singh सैयद नजीब अशरफ – करोड़ों कमाने से मेरा मतलब करोड़ों के चंदे से है। और हिसाब सब का रखा जाता है। चंदा लिया और दिया इसी बिना पर जाता है। वरना लोग पूजा घरों की दान पेटियों में डाल आते हैं। हिसाब सत्यम का भी रखा जाता था, ऑडिट भी होता था और दुनिया जानती है कि खुलासा हिसाब रखने और रखवाने वाले ने ही किया था। एनजीओ को लोग जितना दान देते हैं उससे बहुत कम किसी गरीब को कर्ज नहीं मिलता क्यों। सब हिसाब का ही तो खेल है।
   
    सिद्धार्थ विमल जो रखा जाये वो हिसाब है. जो बेहिसाब है उसका क्या? सीधी कलाकारी है जिसमें अरविन्द जी माहिर लगते हैं.

    Susil Kumar My only point is AK should have tried first at lower level to prove himself before trying to get big plum. I don't see him different than Rahul Gandhi…straight trying for big ….
 
    Om Prakash great- अकाउंट सबका होता है। सत्यम का भी था, ऑडिट भी होता था।

हम लोग बारूद के ढेर पर बैठे हैं, जमशेदपुर कभी भी दूसरा भोपाल बन जाएगा!

Mayank Saxena : चलिए मान लीजिए टाटा का बयान ही सच है…जमशेदपुर प्लांट में हुए धमाके में किसी की जान नहीं गई, सिर्फ 5 लोग घायल हैं…लेकिन ये भी सच है कि इसी प्लांट में 2008 में इस प्लांट में हुए हादसे में एक कर्मचारी की जान भी गई थी… क्या ये साफ नहीं है कि इस प्लांट में सुरक्षा को लेकर लापरवाही हो रही है…ऑफ द रेकॉर्ड जमशेदपुर के एक साथी पत्रकार की मानें तो "हम लोग बारूद के ढेर पर बैठे हैं…कभी भी जमशेदपुर दूसरा भोपाल बन जाएगा…"

अब सवाल ये है कि क्या 1 दर्जन लोगों का टाटा के प्लांट में घायल हो जाना ख़बर नहीं है…अच्छा मान लीजिए सिर्फ रतन टाटा को खरोंच भी आ जाती इस प्लांट में…तो ख़बर थी या नहीं…क्या आने वाले ख़तरे का अंदेशा भी ख़बर नहीं है…फिर 2012 में धरती के अंत की 2000 साल पुरानी भविष्यवाणी ख़बर कैसे थी…

क्या हो गया आप को प्रभाष जोशी के शिष्यों…एस पी सिंह के चेलों…माथुर साहब के मानस पुत्रों…आप लोग काहे नहीं मुद्दे को ख़बर बना रहे हैं…जन सरोकारों के प्रतिनिधि साहबों…'डंके की चोट पर' चीखने…'मुद्दों' की छाती पर 'दस्तक' देने वालों…प्राइम टाइमियों…सम्पादकों…प्रबंध सम्पादकों…जनता की आवाज़ों…अरे कहां सम्पादकीयों के माननीयों…

सब चुप हैं…अगली बार जब ये किसी मंच पर खड़े होकर प्रभाष जोशी के साथ अपनी प्रगाढ़ता और एस पी सिंह की महानता के संस्मरण बखान रहे हों…तो इनके मुंह पर हूट कर के चले आइएगा…ये इसी लायक हैं…या शायद इसके भी नहीं…

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Mayank Saxena : थोड़ी देर पहले टाटा स्टील के जमशेदपुर कारखाने में धमाके की ख़बर आई…हम ने ख़बर को साझा किया…ख़बर कुछ वेबसाइटों और फेसबुक-ट्विटर पर सक्रिय कुछ साथियों के माध्यम से आई…लेकिन ख़बर को मुख्यधारा के मीडिया पर लगातार अंडरप्ले किया जाता रहा…टाटा की ओर से आधिकारिक बयान में कह डाला गया कि सिर्फ 12-15 लोग घायल हुए हैं… लेकिन अभी जब हम दोबारा उन वेब पेजेस पर गए, तो हम ने पाया कि वो पेज ही लुप्त हो गए हैं…और उनकी जगह दूसरी ख़बर डाल दी गई है…तमाम वेबसाइट्स से ख़बर अचानक गायब हो जाने और मेन स्ट्रीम मीडिया के इसे बिल्कुल तूल न देने के पीछे की वजह क्या हो सकती है पता नहीं…लेकिन विश्वस्त सूत्रों की मानें तो ये बड़ा हादसा है…और इसे दबाने के लिए काफी दबाव है…

प्रखर पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

पाणिनी आनंद की आजी का निधन

Panini Anand : आज मेरी आजी (पिता की मां) का हमारे पैतृक गांव- परसदेपुर, रायबरेली में देहांत हो गया. वो 106 बरस की थीं. उनका जाना एक सदी का खामोश हो जाना है. मुझे उनका विशेष स्नेह हमेशा मिला क्योंकि बचपन से पूजा-पाठ और कर्मकांड में विशेष ध्यान रहता था मेरा. मेरे कान में सोने की जो पहली बाली पड़ी वो आजी ने ही बनवाई थी. मेरे बढ़े बालों और दाढ़ी को देखकर वो आखिर तक यह समझती रहीं कि मैं महंत ही बनूंगा. उनको समझा नहीं पाया कभी कि इंसान बनना सबसे मुश्किल काम है. लड़कों के लिए जो स्नेह उनके मन में था, लड़कियों के लिए नहीं रहा. न मेरी मां के प्रति, जो कि एक ब्राह्मण परिवार में आई क्षत्रिय महिला हैं. नाती परनाती, पोते-परपोते खिलाते चली गईं.

अंतिम दिन अकेलेपन और अपनों की उपेक्षा में बीते. जो ब्राह्मणी की नाड़ी से पैदा हुए थे, उन्होंने अपनी ही मां की सेवा को भार समझा. हम तो ख़ैर ठकुराइन के पेट से पैदा हुए इसलिए हमें कुछ करने नहीं दिया गया. मेरे पिता समाजवादी थे और विद्रोही भी. ब्राह्मणों के मठ के सारे नियम तोड़ना उनको मज़ा देता था. फिर भी, मां का प्यार सबसे ज़्यादा मेरे पिता के प्रति ही रहा. वो जबतक रहे, उनकी मां महारानी की तरह रहीं. मजाल है कि वो कुछ कहें और वैसा न हो. फिर मेरे पिताजी नहीं रहे तो उनकी मां का वो स्थान भी जाता रहा. आजी जिस घाट आई थीं, उसी घाट गईं. डलमऊ की दक्षिणायनी गंगा के तीरे ही मेरे बाबा की चिता शांत हुई. वहीं 1999 में मेरे पिता का शरीर वापस प्रकृति में विलीन हुआ. आज उसी घाट आजी भी जा रही हैं. इसी गंगा के तीरे ही कल्पवास के दौरान मेरे पिता को जन्म दिया था उन्होंने. अपने पैतृक परिवार से जिस एक कड़ी ने मुझे जोड़े रखा, वो आज टूट गई. आजी का जाना कष्टकर है. आज दिल्ली काट रही है. चाह कर भी नहीं पहुंच सकता तुरंत वहां, जहां पीढ़ियां मुक्त होती आई हैं हमारी. उन्हें अंतिम प्रणाम.

आउटलुक अंग्रेजी मैग्जीन में कार्यरत पत्रकार पाणिनी आनंद के फेसबुक वॉल से.

लखनऊ की शान और इन गरीबों की जान

Anil Singh : यह लोकतंत्र है या सरकार की टेढ़ी नाक!…लखनऊ की रात लगातार सर्द होती जा रही है. देर शाम जब आफिस से निकला हूं तो ठंडी हवाएं नसों में बहती हुई प्रतीत होने लगती हैं. बगल से निकलती कोई सनसनाती कार हवाओं को रूह तक पैबस्‍त कर देती है. विधानसभा के गुंदब को देखकर लोकतंत्र जिंदा होने का एहसास तो होता है, लेकिन ठंड पर इस एहसास का कोई असर नहीं पड़ता.

पर चंद मीटर आगे चलने के बाद ही ठंड सिहरन में बदलने लगती है. ठंडी हवाएं फिसलकर आत्‍मा के भीतर तक समाती हुई सी लगने लगती हैं. बेधड़क. इंसान और जानवर होने के बीच का फर्क भी हर सेकेंड के साथ खतम होता चला जाता है. आजादी के साढ़े छह दशक. फिर भी इंसान और जानवर के बीच फर्क की महीन लकीर नहीं खिंच सकी है. अजीब सा विरोधाभास यूपी विधानसभा की देहरी से कुछ दूर बाहर ही एक दूसरे को मुंह चिढ़ाता नजर आता है.

हजरतगंज जीपीओ के फुटपाथ पर जिंदगी की मुश्किलें फटी चादरों और ठंड से ठिठुरते बदन में दिखती है तो सड़क के दूसरी तरह गुलजार जिंदगी नजर आता है. इस तरफ दूसरे के शरीर से लिपटकर गर्मी पाने की असफल कोशिशें दिखती हैं तो दूसरी तरफ दुधिया रौशनी में जिंदगी का रंगीन और परेशानियों से बेखबर नजारा दिखता है. पूरे प्रदेश के लिए तरक्‍की की तस्‍वीर बनाने वाले विधानसभा के साए में ही दोनों नजारे दिखते हैं, लेकिन उस दनदनाती सड़क से हों हों करती गुजरने वाली नीली-लाल-पीली बत्‍ती लगी गाडि़यों के शीशे से जीपीओ का फुटपाथ नजर नहीं आता, ठीक वैसे ही जैसे विधानसभा की देहरी में पहुंचने वाले लोगों को गरीब.

कभी कभी तो सड़कों के आवारा कुत्‍ते भी फुटपाथ पर पसरे इंसानों के चादरों के आसपास पसरे नजर आते हैं. अब पता नहीं वो गर्मी लेने आते हैं या गर्मी देने आते हैं, लेकिन यहां संवेदनशीलता को वो चरम पैमाना दिखता है, जो लोकतंत्र की देहरी से गायब हो चुका है. सरकार की नाक के नीचे हरजतंगज ही क्‍या लखनऊ की कई फुटपाथें गरीबों के आशियाने के रूप में गर्मी तो गर्मी सर्दी की रात में भी गुलजार रहती है. डीएम आवास के सामने भी फुटपाथ का नजारा यहां से कुछ अलग नहीं होता है. यह सब सरकार की नाक के नीचे ही है, पर शायद सरकार की नाक सीधी नहीं है.

लखनऊ की तमाम फुटपाथों पर बाहर से कमाने के लिए आए रिक्‍शेवाले, फेरी वाले, खोमचे वाले, ठेले वाले इन्‍हीं की तरह कई और वाले एक एक पैसे को बचाने के लिए खुद को हर रोज सर्द रातों की आगोश में तड़पने के लिए छोड़ देते हैं ताकि उनके परिवार के लोगों के हिस्‍से रोटी की कुछ गर्मी तो आ सके. अफसोस की मैं इनको देखकर खुद को भी नकारा मान लेता हूं. चाहता हूं कि कुछ करूं, पर समझ नहीं आता कि इनके लिए क्‍या किया जा सकता है. सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं, पर हमे कुछ तो करना चाहिए. कुछ शुरुआत तो होनी चाहिए. कोई तो बताए कैसे हम इन्‍हें भी इंसान होने का एहसास करा सकें. कोई बताए तो. प्‍लीज.

लेखक अनिल सिंह दैनिक जागरण समेत कई अखबारों में काम कर चुके हैं. भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में बतौर स्टेट रिपोर्टर काम कर रहे हैं.

कल आजतक पर पुण्य प्रसून समझा रहे थे कि…

Zafar Irshad : कसम खायी थी कि सचिन पर कुछ नहीं लिखेंगे..न ही किसी कि पोस्ट पर कमेंट करेंगे, लेकिन कल रात 10 बजे आज तक न्यूज़ चैनल पर सचिन और देश की साख देख कर लिखने पर मजबूर होना पड़ा..आधे घंटे में पुण्य प्रसून जी यह समझाते रहे कि पिछले 24 साल में जो देश की साख बनी है, वो सचिन की वजह से बनी है, वरना तो देश के नेताओं ने तो देश को गर्त में धकेल दिया था… दुनिया में हम आज जो मुंह दिखाने लायक है, वो सचिन की वजह से है…

मेरे यह बातें कुछ हज़म नहीं हुई… माना कि क्रिकेट में सचिन का योगदान है, लेकिन 24 सालों में देश में और कुछ नहीं हुआ, ज़रा मानना मुश्किल है.. देश परमाणु संपन्न राष्ट्र बना क्या सचिन कि वजह से.?. आज हम कंप्यूटर और इंटरनेट और कई मामलों में कई देशों से कहीं आगे है, हमारे देश के इंजीनियर डॉक्टर पूरी दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे है, क्या वो भी सचिन की वजह से हैं.?.. आज हम खेती में नयी तकनीक विकसित कर रहे है, देश में जगह जगह विकास की झड़ी लगी है, हमारे वैज्ञानिक मंगल गृह पर अपना झंडा फैरा रहे है, वो भी क्या सचिन की वजह से..?..भाइ लोगों, सचिन आपके लिए भगवान होंगे…लेकिन पूरे देश के लिए कतई नहीं…

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Zafar Irshad : कुछ चैनल के एंकर तो आज भगवान के जाने पर ऐसे न्यूज़ पढ़ रहे थे, जैसे अब बस वो रो ही देंगे… ऐसा लगता है की आज भगवान रिटायर नहीं हुए है, बल्कि वो चल बसे है…एक चैनल तो यह गाना बजा रहा था " रो रहा हूँ मैं जा रहे थे तुम " क्या अहमकाना अंदाज़ है…सभी चैनल एक ही रंग में रंगे हैं, कोई बिना भारत रत्न मिले भारत रत्न कह कर पुकार रहा है, कोई कांबली कि बेसुरी आवाज़ में अलविदाई गीत सुना रहा है…दिल चाह रहा था टीवी तोड़ दू बहुत ज़्यादा हो गया…भाई कल सहवाग–ज़हीर–हरभजन जैसे क्रिकेटरों को बोर्ड ने बाहर का रास्ता दिखा दिया…कोई चैनल नहीं बोला, क्या इन खिलाडियों का क्रिकेट में कोई योगदान नहीं है…अरे यार मैं आप लोगो के क्रिकेट के भगवान के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है हद होती है…

पीटीआई, कानपुर में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.

टाटा इस्पात कारखाने में गैस रिसने की खबर कॉरपोरेट मीडिया ने रोक दी?

Sanjaya Kumar Singh : जमशेदपुर स्थित टाटा के इस्पात कारखाने में गैस रिसने की खबर मुख्य मीडिया (मुख्य रूप से टेलीविजन। अखबार तो सुबह आएंगे) पर नहीं दिखने से सोशल मीडिया में यह आशंका जताई जा रही है कि कॉरपोरेट मीडिया ने खबर रोक दी। पता नहीं सच्चाई क्या है। पर मैं यह जानता हूं कि जमशेदपुर छोटा शहर है, रांची से कोई सवा सौ किलोमीटर और कोलकाता से 250 किलोमीटर दूर।

रांची से सड़क मार्ग से चार घंटे में और कोलकाता से ट्रेन से इतने ही समय में पहुंचा जा सकता है। कोलकाता से ट्रेन गिनती की है और सड़क मार्ग से ज्यादा समय लगेगा। इस महत्त्वपूर्ण खबर को स्थानीय स्ट्रिंगर्स ने अगर चैनलों को मुफ्त में नहीं भेजा तो क्या इसे कॉरपोरेट घरानों का सेंसर कहना ज्यादती नहीं है? बगैर सुविधाओं के स्ट्रिंगर के भरोसे रहने वाले मेन मीडिया की पोल ऐसे ही मौकों पर खुलेगी उसे कॉरपोरेट सेंसर कहकर बेईमान मीडिया को नहीं बचाया जाना चाहिए। वेज बोर्ड नहीं लागू करने वाले मीडिया संस्थान स्ट्रिंगर को कब पूछेंगे।

Masaud Akhtar प्लांट से टाटा मेमोरियल अस्पताल की दूरी तीन किलोमीटर है और इस बीच में दो और अस्पताल भी हैं लेकिन सभी घायलों को टाटा के ही अस्पताल में ले जाया गया, जबकि उन्हें ले जाने में ४५ मिनट का समय भी लगा. फिर एक बार जिया टीवी पर इसका न्यूज़ आ चुका था और बाद में हटा लिया गया..

Harpal Singh Thapar Sanjay ji bahut had tak sambhaavna hai censorship hui ho. JSR me rahnewaale to sab dekh hi rahe hain par media we sab choot gaya

Roy Tapan Bharati कॉरपोरेट के घरानों मीडिया कैसे बिक चुका है संजयजी ने इसका ताजा उदाहरण दिया है। अधिकतर नामी-गिरामी टीवी चैनलों में बड़े उदयमियों का शेयर जो है।

Sanjaya Kumar Singh किसी लोकल अखबार की खबर पेस्ट कर सकें तो सबों को डीटेल मिल जाएगा। टीवी या किसी साइट पर खबर आने के बाद हटा लिए जाने का मतलब है खबर गलत थी, देने वाले के पास सबूत नहीं था आदि। ऊपर मसूद अख्तर कह रहे हैं तीन सरकारी अस्पताल और जमशेदपुर में सरकारी असप्ताल — मैं जानता हूं। इसलिए आप ही कुछ बता सकते हैं।

Roy Tapan Bharati Source – Prabhat Khabar, Jamshedpur……………………….टाटा स्टील में फटी गैस टंकी, कई घायल

सीएम ने मामले में मांगी रिपोर्ट
सायरस मिस्त्री ने ली घटना की जानकारी
एमडी नरेंद्रन मुंबई से लौटे घायलों से मिले

कंपनी ने जारी किया बयान, कहा

चार कर्मचारियों की स्थिति गंभीरत्नदर्जनों कर्मचारी आये गैस की चपेट मेंत्नजांच टीम गठित

गैस होल्डर (टंकी) फटने का जुगसलाई बर्मामाइंस, साकची व बिष्टुपुर में दिखा असर

मच गयी भगदड., कंपनी परिसर खाली कराया गया

अगर आग नहीं लगी होती, तो गैस से शहर के लोगों को भी हो सकता था नुकसान

टाटा स्टील के कई विभागों में उत्पादन ठप, करोड.ों का नुकसान

चीफ फैक्ट्री इंस्पेक्टर ने की जांच, घटना को माना गंभीर

टाटा स्टील में गाड.ियों की इंट्री शुक्रवार सुबह तक बंदसीएम ने मामले में मांगी रिपोर्ट

सायरस मिस्त्री ने ली घटना की जानकारी

एमडी नरेंद्रन मुंबई से लौटे घायलों से मिले11 घायल, एक गंभीर

टाटा स्टील कॉरपोरेट अफेयर्स एंड कम्युनिकेशन के हेड प्रप्रभात शर्मा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी है कि दोपहर साढे. तीन बजे टाटा स्टील के भीतर एक गैस होल्डर में हुए विस्फोट से कुल 11 लोग घायल हुए हैं, जिनमें से एक की हालत गंभीर है. घायलों का इलाज टीएमएच में चल रहा है. टाटा स्टील ने बताया कि विस्फोट से आग लग गयी और गैस लीकेज हुआ, जिसके बाद सभी मजदूरों को सुरक्षित निकाल लिया गया. अब प्लांट से गैस लीकेज का कोई खतरा नहीं है.वरीय संवाददाता, जमशेदपुर

टाटा स्टील प्लांट में गुरुवार को एलडी गैस होल्डर (गैस से भरी टंकी) फट जाने से 20 से अधिक मजदूर घायल हो गये. घायलों में चार की हालत गंभीर है, जिनका इलाज टीएमएच में चल रहा है. 17 से ज्यादा लोगों का सामान्य इलाज चल रहा है. ब्लास्ट के बाद उडे. लोहे के टुकड.ों की चपेट में आये लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. गंभीर रूप से घायलों में इक्वीपमेंट मेंटेनेंस के कर्मचारी भोला सिकदर की स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर बतायी जा रही है. इनके अलावा फ्यूल मैनेजमेंट के कर्मचारी सीताराम, भावनाथ झा और प्रेमजीत कुमार को भी गंभीर चोट लगी है. घटना गुरुवार अपराह्न् 3.30 बजे हुई.

ये हैं घायल

राजेश नायक, नारायण पाटिल, दिनेश चौहान, परमजीत चौहान, भोला सिकदर, ज्वाला प्रसाद, प्रेमजीत, श्यामलाल मुर्मू, सीताराम, सरोज कुमार, भावनाथ झा

ये हैं गंभीर

फ्यूल मैनेजमेंट के कर्मी सीताराम, भावनाथ झा और प्रेमजीत कुमारक्या है गैस होल्डर

Sanjaya Kumar Singh ये हुई ना बात। घायलों से पूरी सहानुभूति के बाद भी ऐसी खबर तो नहीं ही है कि रांची या कोलकाता से ओबी वैन, रिपोर्टर भेजे जाते। मीडिया के बिके होने के बाद भी जो खबर थी जैसी थी वैसा ट्रीटमेंट मिला है। हमेशा मीडिया पर खबरें छिपाने दबाने का आरोप लगता है जो सही नहीं भी होता है। मैं डेस्क पर होता तो वहां के स्ट्रिंगर से विशेष खबर मंगाकर लगा देता वह वह वहीं के एडिशन में जाता। और अगर मैं दिल्ली के एडिशन में होता, मेरे पास खबर ही नहीं होती तो मैं कुछ नहीं कर सकता था। जो अखबारों की कार्य शैली जानते हैं – सहमत होंगे।

Sushila Ganesh ham yahan local me rahkar sirf relatives se sune hain.. local news me bhi halki fulki..

Harpal Singh Thapar Main aapse sahmat hun Sanjaya Ji. Company ne ghayalon k sath bur a nahi kiya. Lekin aesi laparwahi hui kyun WO b tab jab 2008 me aesi durghatna inke yahan ho chili hai. Haan media me baat aa kar hat gai ye ajeeb hai. Waise b national media (e channels) chote Shahron ki khabaron ko kahan tavajjo dete hain? Khabar to hoti hai dilli air Mumbai kind bas. Ham apne gharon me baithe Sara din dilli me kya kya hula yahi dekhte rahte hain. Shayad media kit nazron me chote shahron ka koi wajood hi nahi ya shayad apne a as paas k reportes rakhne she zyada inki haisiyat nahi.

Sanjaya Kumar Singh सही बात है। सभी शहरों में रिपोर्टर रखने और पूरी व्यवस्था करने में भारी खर्च है। 24 घंटे कुछ दिखाने के लिए चाहिए सो अलग। तो जो रिपोर्टर और सुविधाएं जहां हैं उनका पूरा उपयोग किया जाता है। दिल्ली में जरा सी बारिश हो जाए, हमलोगों को पता भी नहीं होता फोन आन…See More

Harpal Singh Thapar Wah kya udahran diya hai aapne. Bilkul durust farmaya.

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

‘न्यूज नेशन’ ने एनडीटीवी और आईबीएन7 को पछाड़ा

शैलेश देर आये लेकिन दुरुस्त आए. 'न्यूज नेशन' ने टैम वालों की टीआरपी सब्सक्राइव की तो पता चला कि यह चैनल तो एनडीटीवी और आईबीएन7 जैसे चैनलों को पछाड़ चुका है. अब इसके निशाने पर न्यूज24 है. उधर, दीपक चौरसिया के नेतृत्व में इंडिया न्यूज सतत नंबर चार पर कायम है. कह सकते हैं कि इस साल हिंदी न्यूज चैनलों की दुनिया में टीआरपी के मामले में दो लोगों ने धमाल मचा रखा है और वो हैं दीपक चौरसिया और शैलेष. दोनों ही आजतक में रह चुके हैं.

उधर, इंडिया टीवी नंबर तीन पर कायम है. रजत शर्मा ने खुद चैनल की कामन को संभाल लिया है और पूरे चैनल को न्यूज की तरफ शिफ्ट कर रहे हैं. पहले से बनी बनाई इमेज को तोड़ने की कवायद जारी है पर इसका असर बहुत जल्दी नहीं दिखने वाला क्योंकि चैनल की जो छवि पहले बन चुकी है, उसे तोड़ने में वक्त लगेगा. हां, लेकिन जो ट्रेंड शुरू किया है इंडिया टीवी ने उसके आधार पर कहा जा सकता है कि देर सबेर यह चैनल आजतक और एबीपी न्यूज को गंभीर चुनौती देगा. न्यूज नेशन के जोरदार इंट्री के कारण टाप 10 से लाइव इंडिया बाहर हो चुका है. 45वें हफ्ते की टीआरपी इस प्रकार है…

WK 45 2013, (0600-2400)

Tg CS 15+, HSM

Aaj Tak 17.5 up 0.2
ABP News 14.1 up 0.4
India TV 11.6 dn 2.0
ZN 9.6 up 0.2
India news 9.4 same
News 24 8.2 up 0.2
News Nation 7.4 up 0.2
NDTV 6.4 up 0.4
IBN 6.0 dn 0.4
Samay 4.6 up 0.4


इसके पहले यानि 44वें सप्ताह की टीआरपी में इंडिया न्यूज और जी न्यूज लगभग बराबर की स्थिति में दिख रहे हैं… न्यूज नेशन पिछले हफ्ते भी आईबीएन7 और एनडीटीवी से उपर था… देखें…

WK 44 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM

Aaj Tak 17.3 up 1.5
ABP News 13.7 up 1.0
India TV 13.5 up 0.6
India news 9.4 dn 0.9
ZN 9.4 dn 0.2
News 24 8.0 dn 1.0
News Nation 7.2 up 0.1
IBN 6.4 up 0.1
NDTV 6.0 up 0.2
Samay 4.2 dn 1.4
 

वाराणसी में मानवाधिकार कार्यकर्ता को पहले पिटवाया फिर चौकी से भी भगा दिया

वाराणसी में मानवाधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता को पहले पुलिस चौकी के सामने पिटवाया और जब वह कम्प्लेन लिखाने चौकी में गया तो वहां से भी चौकी इंचार्ज ने गाली देकर भगा दिया. घटना कल रात 10:40 की है जब अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता चेग्वेवारा रघुवंशी अपने निजी कार्य से घर वापस आ रहे थे तो पाण्डेयपुर पुलिस चौकी के पास लोगों की भीड़ देखकर अपनी मोटरसाइकिल धीमी कर लिए तभी चौकी इंचार्ज मुकेश बाबू ने उन्हें रोककर पूछा कि कहां से आ रहे हो. वे कुछ जवाब देते इतने में ही मुंह पर गमछा बांधे हुए एक व्यक्ति ने पीछे से आकर उनके गाल पर थप्पड़ जड़ दिया और कहा कि वकील व मानवाधिकार कार्यकर्ता हो तो तुम्हारी इतनी हिम्मत कि पुलिस के खिलाफ लिखोगे, मारकर जेल में डाल दूंगा, वहीं पड़े रहोगे और ये कहते हुए भाग गया.
 
पुलिस चौकी और चौकी इंचार्ज के सामने ये घटना घटी लेकिन मारपीट करने वाले व्यक्ति को रोकने या पकड़ने की बात तो छोड़िए जब पीड़ित ने चौकी में जाकर प्रभारी से घटना की शिकायत लिखकर कार्रवाई करने को कहा तो चौकी इंचार्ज ने पीड़ित को गालियां देते हुए चौकी से भगा दिया और कहा कि जाओ घर जाओ तुम्हें जल्द ही पता चल जायेगा. इससे साफ पता चलता है कि उक्त घटना चौकी प्रभारी की शह में हुई है.
 
 
मानवाधिकार कार्यकर्ता ने चौकी इंचार्ज के द्वारा किये गये इस उत्पीड़न के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में गुहार लगाई है. चेग्वेवारा रघुवंशी ने आयोग से चौकी इंचार्ज के द्वारा उन्हें अकारण रोककर मारपीट तथा प्रताड़ित किये जाने की घटना की जांच करके चौकी इंचार्ज पर कार्यवाही किये जाने की अपील की है.

चलती गाड़ी से फेंककर जलगांव के पत्रकार की निर्मम हत्या

महारा्ष्ट्र। जलगांव जिले के चालीसगांव के युवा पत्रकार नरेश सोनार की कल दोपहर दादर-अमृतसर चलती गाड़ी से बाहर फेककर निर्मम हत्या कर दी गयी. सोनार मायके गई अपनी पत्नी को लाने रावेर जा रहे थे. गाड़ी में कुछ असामाजिक तत्वों के साथ उनका झगडा हुआ. यह झगडा इतना बढ़ गया कि बरहानपुर रेलवे स्टेशन के पास गुंडो ने उन्हें चलती गाड़ी के बाहर फेंक दिया. जिनकी वजह से उन्हें गहरी चोटें आईं और घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गई. 
 
चिंता की बात यह कि, जब नरेश जब इन गुंडों से लड़ रहे थे तब डिब्बे का एक भी यात्री उनकी मदद के लिए सामने नहीं आया. यहां रेलवे प्रशासन की लापरवाही का भी मामला आया है. बरहानपुर के पहले स्टेशन पर नरेश ने स्टेशन मास्टर आर.के.सिंह को गुंडों द्वार परेशान किये जाने की जानकारी दी थी. लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की जिस वजह से एक उम्दा पत्रकार अपनी जान गवां बैठा. अगर रेलवे प्रशासन समय रहते उनकी शिकायत पर ध्यान दे देता तो उनकी जान बच जाती. बाद में तीनों बदमाशों जकिरुद्दीन रतिमुद्दीन खान, मिराज खान, मकबूल खान (रासाबदा, ताजिबांदा-उत्तरप्रदेश के रहने वाले) को कब्जे में ले लिया गया है.
 
इस वारदात पर महाराष्ट्र के पत्रकार जगत में काफी आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है. पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती के अध्यक्ष एस.एम.देशमुख ने इस घटना की निंदा करते हुए सरकार पर पत्रकारों को संरक्षण देने मे पूर्णतः असफल होने का आरोप लगाया है. देशमुख ने कहा कि इस वारदात के बाद तो सरकार को अपना रवैया बदलना चाहिए और जल्द से जल्द राज्य में पत्रकार सुरक्षा कानून लाना चाहिए.
 
इसी बीच महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर बढ़ते हमले के विरोध में समूचे महाराष्ट्र में कल का (16 नवम्बर) राष्ट्रीय पत्रकार दिवस निषेध दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है. कल पत्रकार अपने हाथ ब्लैक रिबन लगाकर काम करेंगे एव पत्रकार दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित सभी सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार करेंगे
 

भड़ास पर भाजपा का विज्ञापन : फेसबुक पर बवाल (पार्ट पांच)

Sanjay Kumar Singh :  पश्यंति शुक्ल ने जो सवाल उठाए हैं वो निराधार और यूं ही खारिज कर दिए जाने योग्य नहीं हैं और विरोध की अथवा प्रतिकूल आवाज को न दबाया जाना चाहिए और न नजरअंदाज किया जाना चाहिए। आपने राय मांगी है तो वह इस प्रकार है –

1. यशवंत अपनी साइट पर बीजेपी का प्रचार नहीं कर रहे हैं बल्कि बीजेपी को प्रचार करने दे रहे हैं. जिसके लिए उन्हें पैसे मिल रहे हैं और ये पैसे साइट को चलाते रहने के लिए फिलहाल जरूरी हैं। अगर यशवंत इसके पैसे नहीं लेते तो यशवंत प्रचार कर रहे होते। अगर यशवंत बीजेपी के प्रचार का पैसा दें (कहीं और छपवाने के लिए या अपने यहां मुफ्त में छापें), किसी सुविधा के लिए या पूर्व के किसी लाभ अथवा भविष्य के लाभ के लिए तो वह पेड होगा। स्थिति ऐसी नहीं है।

2. ये तो देखने का नजरिया है, बीजेपी भड़ास को ऐड दे रही है क्योंकि भड़ास के पाठकों के पास पहुंचने का उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। भड़ास ले रहा क्योंकि उसे अपना काम करते रहने के लिए इन पैसों की जरूरत है।

3. चुनाव का समय पैसे कमाकर (सही ढंग से) पांच साल भड़ास निकालते रहने के लिए निश्चित हो जाने का भी समय है। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर सभी दलों के खिलाफ आग उगलने से सभी दल विज्ञापन देने लगें तो सबों से लेने में भी बुराई नहीं है। ये देने वाले का सिरदर्द है कि उसे लाभ मिलेगा कि नहीं।

4. एक पार्टी का ऐड न मिल पाने की कीमत ज़रा बीट रिपोर्टर से पूछो… इसकी कोई कीमत नहीं हो सकती। मंजूर हो तो नौकरी करे नहीं तो छोड़ दे। कायदे से ऐड लेने का काम रिपोर्टर का है ही नहीं।

5. अगर यशवंत की नीयत में खोट हो तो वह कुछ ही दिन में मालूम हो जाता, मैं इंतजार करके सुनिश्चित हो लेना पसंद करता। यह तो साफ ही था कि टोकने का मतलब होगा विज्ञापन हट जाएगा।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय से कार्यरत रहे और इन दिनों अनुवाद का काम संगठित तौर पर कर रहे संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


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‘खबर फास्ट’ से इस्तीफा देकर ‘राष्ट्र खबर’ से जुड़े नीरज सेठी

पिछले काफी समय से लॉचिंग की जद्दोजहद में जुटा रोहतक से संचालित न्यूज़ चैनल ख़बर फास्ट को एक और झटका लगा है..चैनल से प्रोड्यूसर और एंकर नीरज सेठी ने इस्तीफा दे दिया है..नीरज ने अपनी नई पारी फरीदाबाद से लांच होने जा रहे राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल राष्ट्र ख़बर से शुरू की है.. प्रबंधन ने उन्हें चैनल में आउटपुट हेड और सीनियर एंकर की जिम्मेदारी सौंपी है.. साथ ही नीरज के कंधों पर चैनल को आन एयर करवाने की भी जिम्मेदारी है.. ख़बर फास्ट से पहले नीरज विज़न वर्ल्ड और सी न्यूज़ में आउटपुट डेस्क पर अहम जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.

सूचना है कि चैनल वन से 4 लोगों को बिना किसी कारण के निकाला गया है… इन चारों के नाम नहीं पता चल सके हैं…

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आनंद शर्मा पर निशाना साधते हुए दैनिक जागरण, मैनपुरी के ब्यूरो चीफ अनिल मिश्रा ने दिया इस्तीफा

दैनिक जागरण, मैनपुरी में लम्बे समय से ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत अनिल मिश्रा ने अपना इस्तीफ़ा प्रबंधन को सौंप दिया है. यूँ तो पहले भी एक बार अनिल मिश्रा को मैनपुरी ब्यूरो से हटाने की कवायद दैनिक जागरण आगरा के समाचार संपादक आनंद शर्मा द्वारा की जा चुकी थी किन्तु अपनी मजबूत राजनीतिक पैठ के कारण अनिल मिश्रा समाचार संपादक को पटखनी दे अपनी कुर्सी पर जमे रहे.

एक ब्यूरो चीफ के हाथों मुँहकी खाने के बाद शुरू हुआ समाचार संपादक द्वारा ब्यूरोचीफ को विभिन्न तरीकों से प्रताड़ित किये जाने का सिलसिला और आखिरकार लगभग सालभर चली जद्दोजहद के बाद ब्यूरोचीफ ने अपना इस्तीफ़ा सौंप ही दिया. अपना इस्तीफ़ा देने की घोषणा उन्होंने फेसबुक पर की. उन्होंने खुद को समाचार संपादक द्वारा परेशान किये जाने की ओर इशारा करते हुए जो लिखा है, वो इस प्रकार है…

मैंने दैनिक जागरण क्यों छोड़ा..

जागरण से मुक्त होने की पोस्ट मैंने डाली, मेरे अधिकांश मित्र परेशान हो गये । जागरण ने गत वर्ष ही मुझे रिटायर कर दिया था । एक वर्ष का कार्यकाल बढ़ा परन्तु मैंने महसूस कि कि मेरी ज़िन्दगी के यही ३६५ दिन मेरे लिये सबसे ख़राब रहे । आप सभी जानते है कि मैनपुरी मेरे कार्यभार गृहण करने के बाद जागरण कितनी तेज़ी से आगे बढ़ा । परन्तु हमारे नवीन समाचार संपादक जब आये तो यह बीड़ा उठा कि जागरण किसी क़ीमत पर समर्पित व्यक्ति काम न कर पाये । मैंने विज्ञापन प्रसार एवं सभी क्षेत्र में जागरण नं० 1 बनाए रखा । ईमानदारी और स्वाभिमान को सदा आगे रख कर मैंने कार्य किया । मैंने पत्रकारिता के माध्यम से अपार लोकप्रियता हासिल की । सभी राजनैतिक पार्टियों ने मेरा भरपूर साथ दिया । मैं सभी का आभारी रहँूगा और प्रयास करुँगा कि आप लोगों के बीच रहकर जीवन की इस पारी को भी खेलूँ ।

अनिल मिश्रा
मैनपुरी

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सहारा समूह भारी आर्थिक संकट में, सहारा मीडिया को बेचने की तैयारी!

सहारा समूह से खबर है कि यह ग्रुप भारी आर्थिक संकट में आने के कारण अब सहारा मीडिया को बेचने की तैयारी में है. सूत्रों के मुताबिक सहारा मीडिया से परमानेंट और भारी सेलरी वालों की छंटनी की जा रही है. खासकर चैनलों में अब ज्यादातर नए व लो सेलरी वालों को कांट्रैक्ट पर रखा जाएगा. कवायद ये है कि चैनल लाभ में दिखें. चैनलों के नाम में से सहारा हटाकर सिर्फ समय कर दिया गया है ताकि ये दूसरी कंपनी दिखे और इसका सहारा से कोई नाता न लगे. इस कारण इन चैनलों का विक्रय मूल्य बढ़ जाएगा.

पच्चीस हजार करोड़ रुपये की देनदारी का जो मामला है, उसे निपटाने के लिए सहारा को काफी नगद पैसों की जरूरत है. एक जमाने में सहारा ने अपनी एयरलाइंस बेच दी थी क्योंकि उसे पैसों की जरूरत थी. उसी तरह कहा जा रहा है कि मीडिया को भी बेचा जाएगा या फिर इसमें किसी दूसरी कंपनी को शेयर देकर निवेश कराया जाएगा. सहारा मीडिया में रोजाना इस्तीफे लिए जा रहे हैं. पूरे ग्रुप में हाहाकार मचा हुआ है. सहारा का महाराष्ट्र मुंबई चैनल बंद होने की चर्चाएं हैं. अब जब यह तय हो गया है कि देर सबेर सहारा से ज्यादातर लोगों की छंटनी होनी है और घाटे के मीडिया माध्यमों पर गाज गिरनी है तो सहारा के कुछ निकाले गए कर्मचारी एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन और हड़ताल की तैयारी कर रहे हैं. (कानाफूसी)

कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होती है. कृपया इन पर यकीन करने से पहले अपने स्रोतों से तथ्यों की पड़ताल कर लें. अगर आप भड़ास तक कोई सूचना पहुंचाना चाहते हैं तो आप bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

आजतक से अरुण सिंह और हरीश शर्मा का इस्तीफा, जी न्यूज गए

आजतक न्यूज चैनल की स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम (एसआईटी) में कार्यरत रहे दो तेजतर्रार खोजी पत्रकारों ने इस्तीफा दे दिया है. इनके नाम हैं हरीश शर्मा और अरुण सिंह. दोनों प्रिंसिपल करेस्पांडेंट के पद पर कार्यरत थे. ये दोनों ही जी न्यूज में स्पेशल करेस्पांडेंट बनकर जा रहे हैं और ये एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी को रिपोर्ट करेंगे.

हरीश शर्मा आजतक में पिछले छह साल से कार्यरत थे. वे कोबरा पोस्ट में भी कर चुके हैं. अरुण सिंह आजतक के साथ करीब नौ वर्षों से थे. इन दोनों ने आजतक के एसआईटी हेड दीपक शर्मा की अगुवाई में कई बड़े स्टिंग आपरेशनों को अंजाम दिया जिनमें कुछ प्रमुख हैं: आपरेशन हे राम, आपरेशन दंगा, आपरेशन ब्लैक, आपरेशन धृतराष्ट्र, आपरेशन चक दे आदि. सलमान खुर्शीद के खिलाफ स्टिंग आपरेशन भी इन्हीं दोनों पत्रकारों ने किया था.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

टीवी टुडे ग्रुप से राहुल कंवल के जाने की खबर निराधार

राहुल कंवल के टीवी टुडे ग्रुप से जाने की चर्चाएं निराधार हैं. यह कहना है का राहुल कंवल के कुछ करीबियों का. भड़ास4मीडिया से बात करते हुए राहुल कंवल के एक करीबी ने बताया कि राहुल कंवल टीवी टुडे ग्रुप से कहीं नहीं जा रहे. वे पूरी निष्ठा और लगन के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं और आगे भी करेंगे. उनके इंडिया टीवी ज्वाइन करने संबंधी भड़ास पर प्रकाशित गासिप तथ्यों से परे है.

राहुल की टीवी टुडे प्रबंधन या किसी अन्य से कोई शिकायत या विवाद नहीं है. जो कुछ भी राहुल कंवल के बारे में लिखा जा रहा है, वह मनगढ़ंत और अफवाह है.

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अनूप गैरोला ‘समाचार प्लस’ चैनल के साथ जुड़े

देहरादून से खबर है कि अनूप गैरोला ने नई पारी की शुरुआत 'समाचार प्लस' न्यूज चैनल के साथ की है. गैरोला श्रमजीवी पत्रकार यूनियन उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष हैं. पिछले दिनों उनसे राष्ट्रीय सहारा, देहरादून प्रबंधन ने इस्तीफा ले लिया था. अनूप गैरोला लंबे समय से मीडिया में सक्रिय हैं कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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चुनावी फंडिंग का झमेला

चुनावी फंडिंग यानी राजनीतिक चंदा जिसको लेकर दशकों से सियासी हल्कों में बहस चली आ रही है। राजनीतिक दल इस प्रकरण में एक-दूसरे पर जमकर कीचड़ भी उछालते रहे हैं। ये तथ्य भी सामने आए हैं कि तमाम औद्योगिक घराने प्रमुख राजनीतिक दलों को गुपचुप ढंग से भारी भरकम चुनावी फंड देते हैं। अक्सर ये फंड ‘ब्लैक मनी’ के रूप में दिया जाता है। 
 
संसद के भीतर और बाहर ये आरोप लगते रहे हैं कि सत्ता और विपक्ष के ‘माननीय’ इस फंड को अपनी झोली में ज्यादा से ज्यादा बटोरने के लिए वो तमाम धतकर्म करते हैं, जो उन्हें कतई नहीं करने चाहिए। कांग्रेस और भाजपा दो बड़े राष्ट्रीय दल हैं। इनके बीच तो अक्सर चुनावी फंड को लेकर कहासुनी होती ही रहती है। ताजा विवाद दिल्ली का है। चार अन्य राज्यों के साथ यहां भी विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। नया राजनीतिक दल, आम आदमी पार्टी (आप) पहली बार दिल्ली के चुनावी मैदान में उतरा है। इसको मिले चुनावी चंदे को लेकर एक नया राजनीतिक बखेड़ा शुरू हुआ है। 
 
पिछले महीनों में अन्ना आंदोलन के चलते देशभर के युवाओं में एक ‘क्रांति’ जैसी हवा चल पड़ी थी। इसके चलते यूपीए सरकार भी महीनों तक भारी दबाव में रही है। अन्ना हजारे और उनके साथियों ने अपने आंदोलन में चुनावी फंडिंग को भी एक बड़ा मुद्दा बनाया था। यही कहा कि राजनीतिक चंदे के बहाने ही पूरी सियासी व्यवस्था में भ्रष्टाचार का कोढ़ फैल रहा है। अन्ना के आंदोलन से ही अरविंद केजरीवाल निकले हैं। इन्होंने राजनीतिक व्यवस्था की नई डगर बनाने के लिए ‘आप’ का गठन किया है। इनकी पार्टी अपना पहला चुनावी प्रयोग दिल्ली विधानसभा से कर रही है। 
 
पहले प्रयास में ही ‘आप’ के चुनावी नगाड़े ने अपनी धूम मचा दी है। चर्चा यही हो रही है कि इस चुनाव में कहीं ‘आप’, भाजपा और कांग्रेस का पूरा चुनावी खेल न बिगाड़ दे। क्योंकि, इस पार्टी के साथ हजारों युवाओं की टोलियां जुट गई हैं। इस पार्टी के कार्यकर्ता ‘अन्ना टोपी’ लगाकर मैदान में नजर आते हैं। ये उत्साही कार्यकर्ता सबको बताते हैं कि कैसे भाजपा और कांग्रेस जैसे दलों ने लूट का राज बना दिया है? ऐेसे में, जरूरी है कि व्यवस्था में बदलाव के लिए इन दलों को चुनाव में सबक सिखा दिया जाए। 
 
कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकारों को शायद पहले यही अनुमान रहा होगा कि चुनाव में बगैर संसाधनों वाली यह पार्टी उनके मुकाबले कहीं टिक नहीं पाएगी। लेकिन, चुनाव अभियान शुरू होते ही ‘आप’ ने पोस्टरों से लेकर रैलियों तक में बढ़चढ़ कर होड़ लेनी शुरू कर दी है। इससे दोनों दलों के रणनीतिकारों की बेचैनी बढ़ी है। माना जा रहा है कि इसी बेचैनी के चलते ही ‘आप’ को किसी न किसी कानूनी झमेले में फंसाने की कोशिशें तेज हुई हैं। अरविंद केजरीवाल कहते भी हैं कि जानबूझकर उनकी पार्टी को विदेशी फंडिंग के नाम पर उलझाया जा रहा है। जबकि, उनकी पार्टी चुनावी चंदे के मामले में पूरी पारदर्शिता से काम कर रही है। वे लोग किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। लेकिन, यह भी चाहते हैं कि भाजपा और कांग्रेस भी अपने चुनावी चंदे का खुलासा देश के सामने करें। 
 
पिछले दिनों केंद्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे ने ‘आप’ की विदेश फंडिंग के मामले में जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने बताया है कि इस पार्टी को जो फंड मिला है, उसमें विदेशों से प्राप्त धन के नियमन का उल्लंघन किया गया है। इसी मामले की जांच कराई जा रही है। ‘आप’ के राष्ट्रीय सचिव पंकज गुप्ता का दावा है कि उनकी पार्टी को ऐसे भारतीय प्रवासियों से ही धन मिला है, जिनके पास भारतीय पासपोर्ट हैं। ऐसे में, इन्हें महज तकनीकी रूप से ही विदेशी कहा जा सकता है। ‘आप’ ने अपनी वेबसाइट पर भी ब्यौरा दिया है कि इस श्रेणी के लोगों ने अब तक करीब 6 करोड़ रुपए की सहायता दी है। जबकि, कुल मिलाकर पार्टी गठन के बाद अब तक करीब 19 करोड़ रुपए का फंड मिला है। ये फंड करीब 63 हजार लोगों ने दिया है। इनका भी ब्यौरा वेबसाइट पर डाल दिया गया है। केजरीवाल कहते हैं कि इतनी पारदर्शिता के बाद भी कांग्रेस और भाजपा के लोग ‘आप’ पर गलत फंडिंग का सवाल उठा रहे हैं। जबकि, चुनावी फंडिंग के मामले में इन दोनों के दामन दागों से ही भरे हैं। 
 
अरविंद केजरीवाल के लोगों ने चुनावी अभियान में फंडिंग के विवाद को भी एक मुद्दा बना दिया है। इस पार्टी के कार्यकर्ता अब जगह-जगह जाकर यह बता रहे हैं कि कैसे-कैसे बड़े औद्योगिक घरानों से अरबों रुपए की ‘ब्लैक मनी’ चुनावी चंदे के नाम पर ली जाती है? इसीलिए संसद से लेकर विधानसभाओं तक अमीरों के पक्ष में कानून बनते रहते हैं। जनवरी महीने में एक गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका डालकर भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक चंदे की जांच कराने की मांग की है। इसमें कहा गया है कि गैर-कानूनी ढंग से कांग्रेस ने ब्रिटेन की ‘वेदांता’ कंपनी से करोड़ों रुपए का चुनावी फंड लिया है। जबकि, नियमानुसार कोई राजनीतिक दल किसी विदेशी कंपनी से इस तरह का धन नहीं ले सकता। ऐसा करने पर उसकी चुनावी मान्यता रद्द की जा सकती है। अब इस मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में अगले साल जनवरी में होनी तय हुई है। 
हाल में, भाजपा में शामिल हुए चर्चित नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने दावा किया है कि ‘आप’ ने अमेरिका सहित कई देशों के लोगों से धन लिया है। इनमें से कई का भारतीय मूल से कोई संबंध नहीं है। इनमें से कुछ मामलों के उनके पास पक्के सबूत हैं। समय आने पर वे इनका खुलासा करेंगे। केजरीवाल कहते हैं कि वे स्वामी जैसे नेताओं की चुनौती स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन, यह भी चाहते हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के चुनावी फंडों की जांच भी की जाए ताकि, देश को जमीनी हकीकत का पता चल जाए। 
 
पिछले दिनों गैर-सरकारी संगठन ‘एडीआर’ और ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ की एक रिपोर्ट जारी हुई थी। इसमें बताया गया था कि 2004-12 के बीच कांग्रेस को चंदे के रूप में 2365 करोड़ रुपए मिले हैं। जबकि, इसमें से 1951 करोड़ रुपए चंदा देने वालों का कोई ब्यौरा पार्टी ने नहीं दिया है। इस तरह से कांग्रेस के राजनीतिक फंड में 82.5 प्रतिशत धन अज्ञात स्रोतों से मिला है। इसी अवधि में भाजपा को भी 1304 करोड़ रुपए की रकम मिली है। लेकिन, पार्टी ने इसमें से 952 करोड़ रुपए का चंदा देने वालों का ब्यौरा नहीं दिया है। इस तरह से अलग ‘चाल-चरित्र-चिंतन’ का दावा करने वाली भाजपा को भी 73 प्रतिशत राजनीतिक फंड अज्ञात स्रोतों से मिला है। लगभग यही हाल प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का भी रहा है। इसी तरह बसपा ने अपने मिले फंड में 61.8 प्रतिशत रकम के स्रोतों का खुलासा नहीं किया है। जबकि, एनसीपी ने अपने चंदे के 91.58 प्रतिशत रकम देने वालों का कोई ब्यौरा नहीं दिया है। इस मामले में केंद्रीय सूचना आयोग ने एक महत्वपूर्ण पहल की थी। इसी साल जून में सभी छह राष्ट्रीय दलों के लिए यह व्यवस्था की थी कि इन्हें सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत लाया जाए। ताकि, जनता यह जान सके कि इनके पास कहां से धन आ रहा है और कहां जा रहा है? लेकिन, इस मामले में सभी दलों ने एकजुटता दिखाते हुए इसका विरोध किया है। हैरान करने वाली बात यह है कि राजनीति में पारदर्शिता की दुहाई देने वाले तमाम दलों का राजनीतिक रुख भी इस मामले में अलग नहीं रहा। वे भी नहीं चाहते कि राष्ट्रीय दल आरटीआई कानून के दायरे में आ जाएं। आखिर, इन दलों को आरटीआई से इतना डर क्यों लगता है?
 
       लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

संजीव समीर को मिला झारखंड मीडिया फेलोशिप

कोडरमा, झारखंड। जिले के वरीय पत्रकार संजीव समीर को 'झारखंड मीडिया फेलोशिप' अवार्ड मिला है. संजीव को ये फेलोशिप 'झारखंड की गायब होती बेटियां ' विषय पर शोध के लिए दी गयी. राज्य सरकार के द्वारा दिये जाने वाले इस फेलोशिप के तहत 50 हजार रूपये की राशि मिलती है. संजीव समीर पिछले दो दशक से कोडरमा जिले में पत्रकारिता कर रहे हैं. कई चर्चित रिपोर्ट के अलावा उनकी कवितायें और रचनायें भी विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. 
 
फेलाशिप के अपने विषय के बारे में संजीव ने कहा कि झारखंड की बेटियां गायब हो रही हैं, साल दर साल नौकरी और शादी के नाम पर बाहर जाती हैं तो लौटकर नहीं आती हैं. पिछले एक दशक में तीन लाख से अधिक बेटियों का यहां से पलायन हुआ. झारखंड के कई जिलों से नौकरी के नाम पर यहां की बहन बेटियों को दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता और अन्य बडे शहरों में ले जाया जाता है. 
 
झारखंड से दूसरे प्रदेशों में चौका-बर्तन कर परिवार का भरण-पोषण करने हर साल 30 से 35 हजार बेटियां यहां से बाहर जा रही हैं. इनमें से ज्यादातर शारीरिक और मानसिक शोषण का शिकार होती हैं. वहीं कोडरमा, गिरिडीह और चतरा जिले के कई गांव ऐसे हैं जहां की लडकियों को शादी के नाम पर ब्याह करके ले जाया गया पर बाद में उनकी क्या स्थिति है, यह पता नहीं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों से लोग आते हैं और लड़कियों को ब्याहकर ले जाते हैं। संजीव ने अध्ययन में पाया कि सालों बाद न तो इन बहन बेटियों का कुछ पता चलता है और न ही उनकी दशा पर कोई ध्यान देता है.
 

रूबी सरकार और हिमांशु शेखर मिश्र माजा कोयने सोशल जर्नलिस्ट अवार्ड से सम्मानित

गांधी मेमोरियल म्यूजियम एवं सेंटर फॉर एक्सपीरियंसिंग सोशियो कल्चरल इंटरऐक्शन (सीईएससीआई) के संयुक्त तत्वावधान में मुदुरै (तमिलनाडु) में पिछले दिनों माजा कोयने 2013 अवार्ड सम्मान समारोह आयोजित किया गया. माजा कोयने सोशल जर्नलिस्ट अवार्ड एनडीटीवी, नई दिल्ली के हिमांशु शेखर मिश्र और भोपाल की वरिष्ठ पत्रकार रूबी सरकार को प्रदान किया गया. 
 
रूबी सरकार को यह सम्मान मुख्यधारा से अलग आदिवासी और दलित समुदायों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति तथा उनकी रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित समुदाय के संघर्षों को अपने लेखन के माध्यम से उजागर करने के लिए प्रदान किया गया. रूबी सरकार के लेखनी से सरकार का ध्यान इन समुदायों की समस्याओं की ओर गया और मध्यप्रदेश सरकार ने उन समस्याओं के निराकरण के लिए समुचित प्रयास किये. एनडीटीवी के हिमांशु शेखर मिश्र को अक्टूबर 2012 की अहिंसात्मक जनसत्याग्रह पदयात्रा देश के निरंतर कवरेज के लिए यह अवार्ड प्रदान किया गया. श्री मिश्र ने देश के कोने-कोने से आये 50 हजार आंदोलनकारियों की समस्याओं को लोगों तक पहुंचाया.
 
 
अण्डमान के फिल्म निर्माता नरेशचंद्र लाल को गांधी के विचारों को फिल्म के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने और कदम स्वयंसेवी संस्था, जबलपुर को पर्यावरण संरक्षण के लिए माजा कोयने सोशल एक्टिविस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया. माजा कोयने पीस अवार्ड कोलंबिया के ऑरक्यूडिया परेज़ (55) और मारिया लिगिया (75) को प्रदान किया गया. इनके प्रतिनिधि के रूप में नतालिया राड्रीग्वेज ने यह पुरस्कार ग्रहण किया. इन दोनों को यह पुरस्कार गांधी जी के अहिंसात्मक आंदोलन के जरिये मुख्यधारा से अलग समुदायों के गैर कानूनी ढंग से वहां की सरकार और बड़े कंपनियों द्वारा जबरन उनकी भूमि अधिग्रहण को रोकने के लिए प्रदान किया गया. 35 वर्षीय नतालिया भी इस आंदोलन से जुड़ी हैं.
 
सीईएससीआई स्विटज़रलैण्ड की अध्यक्ष मारग्रेट ल्यूगेन टोबलर और महात्मा गांधी केनेडियन फाउण्डेशन फॉर वर्ल्ड पीस की अध्यक्ष रेवा जोशी ने संयुक्त रूप से सभी विजेताओं को शॉल, प्रशस्ति पत्र और नगद राशि प्रदान कर सम्मानित किया. सम्मान पत्र का वाचन सीईएससीआई के सचिव राजगोपाल पीवी ने किया. इस अवसर पर देशभर से गांधी के विचारों को आगे ले जाने वाली अनेक संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित थे. 
 
माजा कोयने स्विटजरलैण्ड की रहने वाली एक स्कालर और बहुत अच्छी फोटोग्राफर थीं. उन्हें भारत में फोटो जर्नलिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में याद किया जाता है. माजा गांधीजी के अहिंसात्मक आंदोलन से प्रभावित होकर एकता परिषद से जुड़कर सामाजिक बदलाव के लिए काम करने लगी. माजा ने वर्ष 1996 में राजगोपाल पीवी के साथ मिलकर सीईएससीआई की स्थापना की थी. वर्ष 1999 में कैंसर से उनका निधन हो गया था. तब से उनकी याद में हर वर्ष यह पुरस्कार दिया जाता है.

अविनाश कुमार की ‘आई विटनेस न्यूज’ के साथ नई पारी

अविनाश कुमार ने खबरें अभी तक को बाय-बाय कहते हुए आई विटनेस न्यूज के साथ नई पारी शुरु की है. यहां उन्होंने बतौर स्पेशल न्यूज करेसपोंडेंट कम एंकर ज्वाइन किया है. उन्हें प्राइम टाइम की भी जिम्मेदारी दी गई है. खबरे अभी तक में अविनाश यही जिम्मेदारी निभा रहे थे. 
 
चर्चा है कि खबरें अभी तक में हालात बहुत खराब है. चैनल संपादक के बगैर ही चल रहा है और टीम पूरी तरह अलग-थलग पड़ गयी है.
 
भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

रैपिड मेट्रो के ट्रायल में क्‍यों जुट गई मीडियाकर्मियों की इतनी भीड़?

गुडग़ांव : लंगर व भंडारा में आप ने लोगों की भारी भीड़ लगी तो देखी होगी, लेकिन गिफ्ट के लिए शायद ही कहीं भीड़ देखी होगी? पर यह नजारा पत्रकारों ने दिखाया। मामला कहीं और का नहीं बल्कि गुडग़ांव का है। बीते बुधवार को रैपिड मेट्रो को मीडिया के सामने ट्रायल के लिए ट्रैक पर दौड़ाया गया। इस के लिए गुडग़ांव व दिल्ली के मीडियावालों को बुलाया गया।

यह दूसरा मौका था जब रैपिड मेट्रो के लिए मीडिया कर्मियों को बुलाया गया था, क्यों कि इसके एक महीने पहले भी पत्रकारों को बुलाया गया था और उस समय सभी मीडिया कर्मियों को टैब गिफ्ट के रूप में दिया गया था। उस समय बहुत कम पत्रकार पहुंचे थे, उसके बावजूद नहीं पहुंचने वाले पत्रकारों ने भी हांथ-पांव मारकर टैबलेट का गिफ्ट ले ही लिया था।

जब दोबारा जब रैपिड मेट्रो के परिचालन को लेकर मीडिया को बुलाया तो वहां गिफ्ट की लालच में बिन बुलाए मीडिया के सैकड़ों से ज्‍यादा मेहमान पहुंच गए। मीडिया कर्मियों की संख्या इतनी ज्‍यादा थी कि रैपिड मेट्रो के चारो कोच भर गए। कई बड़े समूहों के तो आधा दर्जन से ज्‍यादा पत्रकार पहुंच गए।

हैरानगी तो तब हुई जब छुट्टी पर चल रहे एक बड़े अखबार के प्रमुख भी टैब के चक्कर में रैपिड मेट्रो में अचानक पहुंच गए। इस आयोजन में ऐसा कोई भी न्‍यूज पेपर या चैनल नहीं था, जिसके पत्रकार और फोटोग्राफर नहीं आए हों। जाहिर था कि सारे पत्रकार, कैमरामैन और फोटोग्राफर गिफ्ट के लालच में पहुंचे थे, लेकिन इन लोगों को निराशा तब हाथ लगी जब टैब की उम्‍मीद में पहुंचे लोगों को नाश्‍ता कराकर और प्रेस नोट देकर विदा कर दिया गया। (कानाफूसी)

चंदौली में हाइवे पर पत्रकार से लूट का प्रयास

चंदौली जिले में एक पत्रकार के साथ लूट का प्रयास किया गया। परन्‍तु पत्रकार की हिम्‍मत से लुटेरे अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। घटना चंदौली जिले के अलीनगर थाना क्षेत्र की है, जहां एनएच 2 पर स्थित चौपाल सागर के समीप दो बाइक पर सवार चार हथियारबंद लुटेरों ने वाराणसी से चंदौली की तरफ वापस घर लौट रहे पायनियर संवाददाता अश्वनी सिंह उर्फ़ पिन्टू की बाइक रोक ली तथा उनको मारपीटकर उनसे लूट का प्रयास भी करने लगे। पिंटू सिंह किसी प्रकार शोर मचाते हुवे वहां से भागने लगे, तभी लोगों को अपनी ओर आता देख लुटेरे भी उन्हें छोड़ कर वहां से भाग निकले। पीड़ित पत्रकार ने मोबाइल से पुलिस को सूचना दी। पुलिस घटना स्थल पर पहुंचकर मामले की छानबीन में जुट गयी है।

पीड़ित पत्रकार ने बताया कि वे वाराणसी से लौट रहे थे तभी हाइवे पर चौपाल सागर से कुछ पहले ही दो बाइक सवारों ने उनके सामने दोनों बाइक की हेडलाइट जलाकर उन्हें रुकने का इशारा किया। परन्तु उन्‍होंने उनके इशारे की अनदेखी कर दूसरे साइड से आगे बढ़ गए। इस पर दोनों बाइक पर सवार चार लोगों ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। करीब दो ढाई किलोमीटर तक पीछा करने के बाद लुटेरों ने ओवरटेक कर उन्हें रोक लिया और उन्हें बाइक से नीचे गिरा कर गाली गलौज व मारपीट शुरू कर दी। लुटेरों ने जैसे ही अपने असलहे निकालने शुरू किये अश्वनी शोर मचाते हुए भागे और पास में खड़ी दो ट्रकों के पीछे जाकर बचाओ बचाओ चिल्लाना शुरू कर दिया।

अश्‍वनी के अनुसार शोर सुनकर लोग घरों से निकलकर बाहर आने लगे। साथ ही हाइवे से गुजर रहे कई ट्रक चालकों ने भी अपने ट्रकों को रोक कर लुटेरों की तरफ बढ़ने लगे। कई लोगों को पास आता देखकर चारों लुटेरे अपनी दोनों बाइकों पर सवार होकर भाग निकले। अश्वनी सिंह ने अपने मोबाइल से चंदौली के कोतवाल अजय श्रीवास्तव को अपने साथ हुई घटना की पूरी जानकारी दी। सूचना मिलने पर कोतवाल आनन-फानन में घटनास्थल पर पहुंच गए तथा पूरे मामले की जानकारी ली। उन्‍होंने पीडि़त पत्रकार द्वारा बताये गए हुलिया के आधार पर दबिश देने शुरू कर दी है। हालांकि देर रात तक किसी बदमाश के पकड़े जाने की सूचना नहीं थी।

भूटान जाने वाले यूपी के 56 पत्रकारों ने की सीएम से मुलाकात

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पड़ोसी देशों, विशेष रूप से हिमालय क्षेत्र के देशों से बेहतर और मजबूत सम्बन्ध बनाए रखने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि हम अपना मित्र बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी देश नहीं। इसलिए हर स्तर पर पड़ोसी देशों से अच्छे रिश्ते बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकार और पत्रकारिता से लोकतंत्र को मजबूती मिली है। उन्होंने पत्रकारों को हर सम्भव सहयोग देने का भरोसा भी दिलाया।

मुख्यमंत्री गुरुवार को अपने सरकारी आवास पर राष्ट्रीय श्रमजीवी पत्रकार यूनियन (आई.एफ.डब्ल्यू.जे.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री के. विक्रम राव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के एक डेलीगेशन से मुलाकात कर रहे थे। राष्ट्रीय स्तर पर 105 सदस्यों का यह डेलीगेशन एक सप्ताह के लिए सद्भावना मिशन पर भूटान देश की यात्रा पर जा रहा है, जिसमें 56 पत्रकार उत्तर प्रदेश से
शामिल हैं। उन्होंने आई.एफ.डब्ल्यू.जे. के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की यात्राओं का आयोजन अन्य देशों के लिए भी किया जाना चाहिए। इससे दोतरफा संवाद, सद्भाव एवं एक-दूसरे को जानने एवं समझने का मौका मिलता है। इस मौके पर उन्होंने उ0प्र0 श्रमजीवी पत्रकार यूनियन द्वारा प्रकाशित मीडिया डायरेक्ट्री का विमोचन भी किया।

पड़ोसी देश भूटान के नागरिकों में खुशहाली के स्तर की चर्चा करते हुए श्री यादव ने कहा कि खुशहाली के इंडेक्स में भूटान राष्ट्र दुनिया में सबसे आगे है। उन्होंने कहा कि इस यात्रा से भूटान की स्थानीय संस्कृति, खान-पान, रीति-रिवाज एवं भौगोलिक क्षेत्रों की जानकारी मिलेगी। उन्होंने कहा कि वापस लौटने पर डेलीगेशन के सदस्यों से उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में भूटान में हो रहे विकास कार्यों की तुलनात्मक जानकारी भी प्राप्त होगी। भूटान द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादित की जा रही विद्वुत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को अतिरिक्त विद्युत की आपूर्ति करके भूटान अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रहा है। उन्होंने पड़ोसी देश नेपाल में जल विद्युत उत्पादन की अपार सम्भावनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि नेपाल भी भूटान की तरह विद्युत उत्पादन का निर्यात कर सकता है।

श्री यादव ने देश की सीमाओं, मुख्य रूप से चीन से लगने वाली सीमा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे देश की सीमाएं काफी असुरक्षित हैं। उन्होंने जर्मनी का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे कई देशों की सीमाएं मिलती हैं, लेकिन यह देश इतना ताकतवर है कि किसी देश को इसकी सीमा का अतिक्रमण करने की हिम्मत नहीं पड़ती। जबकि हमारे देश से लगी चीन की सीमा से कई बार लोग आकर सुरक्षित वापस भी चले जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। इसीलिए आदरणीय नेताजी चीन से सर्वाधिक खतरे की बात करते हैं। उन्होंने पड़ोसी देशों से बेहतर सम्बन्ध बनाने पर बल देते हुए कहा कि यूरोपियन देशों ने अपनी आर्थिक एवं सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक संगठन बनाया और उसका लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

इस अवसर पर के. विक्रम राव ने भूटान जाने वाले सद्भावना मिशन के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए कहा कि डा. राम मनोहर लोहिया की हिमालय पालिसी आज के दौर में भी तर्क संगत एवं सामयिक है। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार की यात्रा पड़ोसी देश बर्मा, बांग्लादेश एवं श्रीलंका के लिए भी आयोजित की जाएगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में सार्क देशों के पत्रकारों का एक सम्मेलन आयोजित करने की सम्भावना पर भी विचार किया जा रहा है।  

इससे पूर्व यू.पी. वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने अपने सम्बोधन में राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे सहयोग की सराहना की और आशा व्यक्त की कि आगे भी इस प्रकार के कार्यक्रमों में सहयोग मिलता रहेगा। कार्यक्रम में समाज कल्याण मंत्री अवधेश प्रसाद, सचिव मुख्यमंत्री आलोक कुमार, निदेशक सूचना प्रभात मित्तल, उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी, सचिव सिद्धार्थ कलहंस सहित श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के पदाधिकारी एवं विभिन्न जनपदों से डेलीगेशन में जाने वाले सदस्य उपस्थित थे।

जाने-माने बाल साहित्यकार और संपादक हरिकृष्ण देवसरे का निधन

पत्रिका पराग के पूर्व संपादक हरिकृष्‍ण देवसरे का आज गाजियाबाद के इंदिरापुरम में निधन हो गया है. वे के एक अस्पताल में भर्ती थे. हिंदी के जाने-माने बाल साहित्‍यकार और संपादक थे. उनकी सैकड़ों किताबें छप चुकी हैं. वे हिंदी साहित्‍य अकादमी का बाल साहित्‍य पुरस्‍कार भी पा चुके हैं. उनके निधन पर साहित्य और पत्रकारिता जगत के कई लोगों ने शोक व्यक्त किया है.

वे 75 वर्ष के थे. उनका जन्म 9 मार्च 1938 को हुआ था. देवसरे मूलतः मध्य प्रदेश के नागोड के रहने वाले थे. देवसरे के नाम कई ख्याति है. वे पराग मैग्जीन के करीब दस साल एडिटर रहे. उन्हें दर्जनों एवार्ड, सम्मान और प्रशस्ति पत्र मिले. कई किताबों का अनुवाद किया. उनके पीछे परिवार में उनकी पत्नी, दो बेटे, एक पुत्री और पांच पोते-पोतियां हैं.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

‘न्यूज नेशन’ के साथ चंद्रभान और पीनाज की नई पारी

चंद्रभान सोलंकी ने आज तक को अलविदा कहने के बाद न्यूज नेशन चैनल के साथ नई पारी की शुरुआत की है. चंद्रभान को आजतक के आउटपुट की इवनिंग शिफ्ट से हटा दिया गया था जिससे वे नाराज थे. न्यूज नेशन में चंद्रभान को आउटपुट में सेकंड मैन बनाया गया है.

दिल्ली आज तक और तेज की एंकर पीनाज त्यागी ने भी न्यूज नेशन के साथ नई पारी की शुरुआत की है.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

पंद्रह लाख लेकर चुपचाप चले जाने से इनकार करने पर ओपन मैग्जीन के पोलिटिकल एडिटर किए गए बर्खास्त

ओपन मैगजीन के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल ने पंद्रह लाख रुपये चुपचाप चले जाने के बदला बर्खास्तगी को ज्यादा पसंद किया. जब उन्हें टर्मिनेशन का लेटर दिया गया तो उन्होंने प्रबंधन के मुंह पर इस्तीफा दे मारा. हरतोष सिंह बल ओपन मैग्जीन के मैनेजमेंट से नाराज चल रहे थे.

बल ने अपने इस्तीफे के बारे में सोशल मीडिया पर खुलासा किया है. उन्होंने ट्विटर पर जो कुछ अंग्रेजी में लिखा है, उसका

हरतोष सिंह बल
हरतोष सिंह बल
आशय ये है… 15 लाख रुपये लेकर चुपचाप यहां से चले जाने से इनकार करने के बाद मैनेजमेंट ने मुझे आज बर्खास्तगी का नोटिस थमा दिया. एक महीने से चुपचाप चले जाने की बात हो रही थी. यह निर्णय संजीव गोयनका ने मुझ पर थोपा. इसके लिए उन्होंने कोई कारण नहीं बताया.

ज्ञात हो कि आरपी गोयनका और संजीव गोयनका इस मैग्जीन के मालिक हैं. माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के खिलाफ जोरदार लेख छपने के बाद प्रबंधन किन्हीं दबावों में आ गया था.

हरतोष सिंह बल के कुछ ट्वीट देखें…

Hartosh Singh Bal

decided to follow the trend of making journalistic announcements on twitter

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Received termination notice from Open today after I refused Rs 15 lakh to move on quietly. Last story I wrote was http://www.openthemagazine.com/article/voices/the-hero-and-the-prince

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Offer culmination of month-long attempts to get me to leave without fuss. Decision imposed by owner Sanjiv Goenka. No reasons cited

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हरतोष सिंह बल से इस्तीफे को लेकर बातचीत न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित हुई है, पढ़ने के लिए क्लिक करें… A Conversation With: Former Political Editor of Open Magazine Hartosh Singh Bal
 

शिक्षिका सोनी सोरी और पत्रकार लिंगाराम जेल से रिहा, देखें शुरुआती तस्वीरें

सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी और पत्रकार लिंगाराम को जमानत पर रिहा करने का जो आदेश दिया था, उस पर अमल करते हुए और औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद आज दोनों को जगदलपुर जेल से रिहा कर दिया गया. रिहाई के बाद सोनी सोरी को संवाददाताओं ने घेर लिया और सवालों की बौछार कर दी. पत्रकार लिंगाराम भी खुद को आजाद पाकर काफी खुश महसूस कर रहे थे.

फोटो सौजन्य से रवीश राज परमार

ज्ञात हो कि न्यायमूर्ति सुरिन्दर सिंह निज्जर और न्यायमूर्ति एफएम इब्राहीम कलीफुल्ला की सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने सोरी और लिंगाराम को जमानत पर रिहा करने का आदेश देने के साथ ही उन्हें इस मामले की जांच पूरी होने तक छत्तीसगढ़ राज्य में नहीं रहने का भी निर्देश दिया.

छत्तीसगढ़ सरकार के वकील अतुल झा ने दोनों की जमानत अर्जी का विरोध किया लेकिन न्यायालय ने कहा कि यदि किसी अन्य मामले में वे अभियुक्त नहीं हों तो उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाये. इन दोनों ने छत्तीसगढ उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी. उच्च न्यायालय ने आठ जुलाई को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी.


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भास्कर के पटना आने के पहले ही हिंदुस्तान ने चार रुपये का अखबार ढाई रुपये में कर दिया

Gyaneshwar : दैनिक भास्‍कर अभी पटना आया नहीं है। कुछ समय और लगेगा। लेकिन इसके पहले ही भास्‍कर इफेक्‍ट दिखने लगा है। बिहार के सबसे बड़े अखबार 'हिन्‍दुस्‍तान' ने स्‍कीम और बुकिंग में फंसने की जगह पहले ही कवर प्राइस कम कर दिया है।

आज से पटना के पाठकों को 4 रुपये का अखबार 2.50 रुपये में मिलने लगा है। मतलब 75 रुपये में महीना। प्राइस वार शुरू। देखना है, दैनिक जागरण और प्रभात खबर अब क्‍या करता है। भास्‍कर को भी नई मिसाइल तैयार रखनी होगी। झारखंड की तरह आसान नहीं है बिहार का बाजार।

बिहार के कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके पत्रकार ज्ञानेश्वर के फेसबुक वॉल से.

दिग्विजय गुट से मप्र कांग्रेस फिर भंवर में

मध्यप्रदेश कांग्रेस में इन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रहा. 10 वर्षों के दिग्विजयी शासन को प्रदेश की आम जनता याद करना नहीं चाहती उस पर से दिग्विजय गुट के नेता कांग्रेस की बुरी गत करने से बाज नहीं आ रहे. यूं तो प्रदेश में दिग्विजय सिंह का गुट बहुत बड़ा माना जाता है किन्तु प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और उज्जैन सांसद प्रेमचंद गुड्डू दिग्विजय सिंह के ख़ास सिपहसालारों की भूमिका निभा रहे हैं. हाल ही में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र कांग्रेस में हुए टिकट वितरण के चलते विरोध के स्वर अधिक मुखरता से सामने आए हैं और सभी में कमोबेश खलनायक की पदवी भूरिया और गुड्डू को दी जा रही है जो सीधे-सीधे दिग्विजय सिंह के पठ्ठे हैं. यानि दिग्विजय सिंह की शह से दोनों ही नेता प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर करने की नीति पर काम कर रहे हैं. 
 
2003 में प्रदेश की सत्ता से बेदखल हुए दिग्विजय सिंह ने 10 वर्षों तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने की कसम तो खा ली थी किन्तु सर्वेसर्वा होने का कथित नशा उन्हें वास्तव में राजनीति से दूर नहीं कर पाया. इसलिए ठाकुर दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक गुरु स्व. अर्जुन सिंह की भांति खुद को चाणक्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए अपने सिपहसालारों द्वारा प्रदेश कांग्रेस को बंधक बनाते हुए उसे नेस्तनाबूत करने की ठान ली. यह ठीक वैसा ही है जैसे हम नहीं तो कोई नहीं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण के फॉर्मूले से इतर प्रदेश के सभी बड़े नेताओं ने अपने समर्थकों को टिकट बंटवाए. यहां तक तो ठीक है. सभी बड़े नेता चाहते हैं कि अपने समर्थकों को अधिक से अधिक टिकट दिलवाए जाएं ताकि उनका खुद का राजनीतिक कद भी ऊंचा हो किन्तु भूरिया और गुड्डू ने जिस तरह टिकट वितरण में हस्तक्षेप किया और अपने पसंदीदा समर्थक को टिकट दिलाए, उससे कांग्रेस में बागी उम्मीदवारों की संख्या में भी इजाफा हुआ. भूरिया अपनी भतीजी कलावती भूरिया को बागी बनने से नहीं रोक पाए तो गुड्डू ने महिदपुर से कांग्रेस विधायक और वर्तमान प्रत्याशी कल्पना परुलेकर के खिलाफ अपने खास समर्थक दिनेश जैन बोस को बागी बनवा दिया. 
 
भूरिया की राजनीतिक मजबूरियों को आप और हम अच्छी तरह पहचानते हैं इसलिए इस बार भूरिया को माफ करते हुए गुड्डू की कारस्तानियों पर प्रकाश डालते हैं. उज्जैन लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली हर विधानसभा में गुड्डू ने जमकर बागियों को उकसाने का काम किया है और जहां बागी कांग्रेस आलाकमान के आगे झुके, वहां गुड्डू ने कमजोर प्रत्याशी को टिकट दिलवाकर बाकी कसर पूरी कर दी. गुड्डू को लेकर सबसे बड़ा आरोप खुद उन्हीं की पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता नूरी खान ने लगाया है. नूरी खान का कहना है कि गुड्डू उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में भाजपा से हाथ मिलाकर कांग्रेस को कमजोर करने का काम कर रहे हैं. यह इससे भी साबित होता है कि उज्जैन में हुए नगर निगम चुनाव के वक़्त भी गुड्डू ने महापौर पद के लिए भाजपा प्रत्याशी रामेश्वर अखंड के मुकाबले अपेक्षाकृत कमजोर दीपक मेहरे को कांग्रेस प्रत्याशी बनवाया और जब नगर निगम चुनाव परिणाम घोषित हुए तो रामेश्वर अखंड करीब 48 हज़ार से अधिक वोटों से जीते. ऐसा नहीं है कि उज्जैन में कांग्रेस के पास मजबूत चेहरा नहीं था, किन्तु गुड्डू की ज़िद के चलते उज्जैन नगर निगम कांग्रेस के हाथ से जाता रहा. फिर गुड्डू को इस तिकड़मबाजी में दिग्विजय सिंह का साथ न मिला हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. 
 
खैर, उज्जैन नगर निगम चुनाव को भूल भी जाएं तो उज्जैन उत्तर और उज्जैन दक्षिण विधानसभा सीटों पर भी गुड्डू की ही चली है और इसमें दिग्विजय सिंह की मूक सहमति से इंकार नहीं है. 2008 में कांग्रेस से बागी होकर लड़े जयसिंह दरबार को एक बार पुनः उज्जैन दक्षिण से कांग्रेस उम्मीदवार घोषित किया गया है. अव्वल तो दरबार का प्रत्याशी बनना राहुल फॉर्मूले से मेल नहीं खाता, ऊपर से दरबार ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी योगेश शर्मा 'चुन्नू' की जमानत जब्त करवाने में महती भूमिका निभाई थी. वहीं उज्जैन उत्तर से गुड्डू ने अपने ख़ास समर्थक विक्की यादव को टिकट दिलवाकर एक तरह से सीट भाजपा को तोहफे में दे दी है. विक्की यादव को उज्जैन दक्षिण के मतदाता तो क्या, खुद उनके मोहल्ले के वाशिंदे भी ठीक ढंग से नहीं पहचानते. पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष विक्की यादव की राजनीतिक उड़ान अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि उन्हें विधानसभा का टिकट मिल गया. अब आप खुद भी अंदाजा लगा सकते हैं कि विक्की उज्जैन दक्षिण से कितना चौंकाते हैं. 
 
इन सबके इतर सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने जिस तरह आलोट विधानसभा क्षेत्र से खुद के बेटे अजीत बौरासी का टिकट करवाया, उससे आलाकमान तक नाराज है. ऐसी सूचनाएं हैं कि आलोट में पूर्व में प्रस्तावित सोनिया गांधी की सभा रद्द हो चुकी है और उज्जैन उत्तर-दक्षिण को मिलाकर होने वाली राहुल गांधी की सभा भी विंध्य क्षेत्र को मिल गई है. गुड्डू लाख दुहाइयां दें कि उन्होंने पार्टीलाइन से हटकर कोई गलत काम नहीं किया मगर मीडिया की सक्रियता ने गुड्डू की चालबाजी को उजागर कर दिया है. यहां गौर करना होगा कि उज्जैन उत्तर-दक्षिण में दिग्विजय सिंह की सभा का कार्यक्रम बन चुका है और ऐसा अनुमान है कि गुड्डू अब दिग्विजय सिंह को आलोट भी ले जा सकते हैं. चूंकि गुड्डू ने अपने किए से पार्टी के तमाम बड़े नेताओं को रुष्ट किया है इसलिए न तो कोई नेता गुड्डू समर्थित उम्मीदवारों के क्षेत्र में सभा करना चाहता है और न ही इन बड़े नेताओं के समर्थक गुड्डू समर्थित उम्मीदवारों के क्षेत्र में प्रचार करना चाहते हैं. कुल मिलाकर गुड्डू के विरोध में पूरी पार्टी एकजुट नज़र आ रही है. नूरी खान ने तो बाकायदा गुड्डू से खुद की जान को खतरा तक बता दिया है और गुड्डू के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए उनका डर स्वाभाविक भी है. 
 
गुड्डू का विधानसभा चुनाव के बाद हाशिये पर जाना तय है क्योंकि उनके समर्थित उम्मीदवारों में जीतने का माद्दा ही नहीं है और रही-सही कसर गुड्डू से नाराज कांग्रेसी कर ही देंगे. गुड्डू निशाने पर हैं पर अब तो इंतजार है दिग्विजय सिंह के दांव का क्यूंकि गुड्डू जब-जब मुसीबत में पड़े हैं, दिग्विजय सिंह ने ही उनकी डूबती नैया पार लगाई है.
 
लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम पत्रकार हैं.

वीरेन डंगवाल की रेडियोथिरेपी का दौर पूरा, कल बरेली जाएंगे

Yashwant Singh : कैंसर से जूझ रहे Virendra Dangwal जी की रेडियोथिरेपी का दौर खत्म हुआ. कल वो रेल पकड़ कर दिल्ली से बरेली चले जाएंगे. कुल 28 दिन तक यह चक्कर चला. उनकी हालत के बारे में खुद उन्हीं के शब्दों में : ''गाल और गर्दन झुलसे हुए हैं. हंसुली की खाल उधड़ रही है. जीभ पर छाले तो पहले से ही पड़े हुए थे. शायद से सब दो हफ्ते में ठीक हो''

हम सभी प्रार्थना करते हैं, उम्मीद करते हैं कि वीरेन दा जल्द से जल्द सारे दुखों, कष्टों से मुक्ति पाकर पहले की तरह बिंदास हो जाएंगे… बरेली की हवा उन्हें फिर से मस्तमौला बना दे, यही कामना है…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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Hindu right’s hand in glove with the English media

A lot of people might be surprised to know that the principal sponsor of the two topmost prime-time shows on English television ie The Newshour hosted by Arnab Goswami on Times Now and India @ 9 hosted by Rajdeep Sardesai on CNN-IBN is one single entity ie Amity University. The interesting thing over here is that this is the same university which was founded by Mr Ashok Chauhan and he continues till date as the President of Amity Group of Institutions. 
 
Besides being a successful educationist, Mr Chauhan is also involved in Indian politics as he is the chairperson of the Vishwa Hindu Parishad’s European Central Committee. VHP is an orthodox religio-political organization which is a part of the Sangh Parivar and an ally of the BJP. In the past, it led the highly divisive Ram Janmabhoomi Movement which brought about a significant change in the direction of Indian politics.
 
The fact that two leading shows capable of opinion-building are being sponsored by a university being controlled by a VHP man, speaks volumes of the nexus between the Hindu Right of India and the electronic English media industry. But still the Hindutva brigade would overlook this tie-up and accuse the English electronic media of being a stooge of the ‘Khan-gress’ ie Congress, the former title being a mockery of Congress’s supposed Muslim appeasement policies which keep angering the Sangh Parivar and which has forced them to take up the job of saving ‘Bharat’.
 
We are all aware of how monumental an influence sponsors have on editorial policy and content. Very often they call the shots and gag or censor what ought to be gagged or censored because of the kind of inconvenience associated with it. However, the Hindutva brigade would conveniently overlook all these inconvenient truths and paint all channels, specifically English channels, with the same brush of being either ‘pseudo-secular’ or ‘sickular’.  
 
The internet and the social media is flooded with volatile, abusive and hateful comments of the Internet Hindus, for those who consider this statement to be blasphemous, please realize that an internet Hindu is quite different from a Hindu or a pious Hindu in the classical sense of the term. The pervert brazenness of the internet Hindu is something which I’ve not only been personally subjected to on various blogs and comments of mine on the internet but have also witnessed it professionally during my month-long internship with the online division of the Indian Express. During this month-long affair, I worked upon several stories (running into hundreds) but the most successful story which I worked upon was the one relating to the introduction of two child policy for Rohingya Muslims in Myanmar.  (http://www.indianexpress.com/news/myanmar-introduces-child-limit-for-rohingya-muslims/1120532/)  
 
The kind of ecstasy which these internet Hindus showed towards this highly racist story (evident from 1.5k likes which it garnered, which by the way no story of mine ever came close to) just shows how deeply these people hate Muslims and approve of the idea of their state-sponsored subjugation. In one of his articles titled ‘Who’s the real Hindu?’ (http://www.hindustantimes.com/News-Feed/ColumnsKaranThapar/Who-s-the-real-Hindu/Article1-334832.aspx) published as a part of his widely read column, ‘The Sunday Sentiments’, Karan Thapar wrote about the need for Hindus to challenge the kind of fanaticism which was being propagated by organizations like the Vishwa Hindu Parishad. Just like the Muslim community world over is under pressure to condemn each and every act of shameless Islamist terror, the most recent being the gruesome murder of a British soldier on the streets of London, it is high time that liberal Hindus on the social media reject the kind of mad frenzy which is being pushed forth by Internet Hindus through their ideology of Hindutva extremism.  
 
In my personal opinion, the Hindu intellectuals have been far more vocal of their condemnation of Hindutva extremism than Muslim intellectuals are of Islamist extremism but I am waiting to see the same kind of wisdom dawn upon the laymen of these religious communities who as of now are being supportive of vicious political campaigns and puritanical forms of faith, the latter employing more specifically to young Muslims.  
 
Saif Ahmad Khan is presently a student of journalism at the University of Delhi.

इम्वा अवार्ड-2014 की तैयारी शुरू, नाम आमंत्रित

इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन(IMWA) ने वर्ष 2013 की तरह वर्ष 2014 के इम्वा (IMWA) अवार्ड दिये जाने की तैयारी शुरू कर दी है. इम्वा अवार्ड से देश के उन पत्रकार साथियों को सम्मानित किया जाता है जिन्होंने पत्रकारिता का नाम रोशन किया हो और साथ ही समाज के हित में अपना योगदान भी दिया हो.
इसके अतिरिक्त इम्वा अवार्ड-2014 समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले समाज सेवकों को भी देकर उन्हें सम्मानित किया जायेगा, जिन्होंने समाज में कोई ऐसा काम किया हो जिससे लोगों को प्रेरणा मिले. आप ऐसे पत्रकार और समाज सेवकों को जानते हैं तो आप 31 दिसम्बर 2013 तक उनकी जानकारी imwa.press@gmail.com या rnishaana@gmail.com पर भेजें. इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन की चयन कमेटी के द्वारा चुने जाने पर उन्हें इम्वा अवार्ड- 2014 से सम्मानित किया जायेगा. अधिक जानकारी के लिए 09899387457 पर संपर्क कर सकते हैं.
 
राजीव निशाना
 
अध्यक्ष
इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन
 
प्रेस विज्ञप्ति

भड़ास पर भाजपा का विज्ञापन : फेसबुक पर बवाल (पार्ट चार)

शंभूनाथ शुक्ल : इसी दिल्ली में भी एक आदमी है Yashwant Singh जो वह लड़ाई लड़ रहा है जिसे बड़े-बड़े धुरंधर और तीसमार खाँ पत्रकार भी नहीं लड़ पाते। बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश करने वाले, अत्याचारों की पोल खोलने वाले पत्रकार अपनी पगार तक नहीं मांग पाते। यह आदमी उन लोगों की भी लड़ाई लड़ रहा है बिना किसी से कुछ मांगे। अपनी धुन का पक्का। लेकिन पत्रकार तो किसी के भी साथी नहीं होते। आज किसी ने एक पोस्ट फेसबुक पर लिख डाली कि कामरेड की बात करने से क्या होता है अपने पोर्टल पर छापते तो आप भी भाजपा के विज्ञापन हो।

जरा कोई बताएगा कि अगर आप कोई अखबार निकाल रहे हो, भले वह आनलाइन हो या प्रिंट या विजुअल, आप किसी विज्ञापन को किस आधार पर रोक सकते हो? क्या भाजपा गैरकानूनी पार्टी है? क्या चुनाव आयोग ने भाजपा को प्रतिबंधित कर दिया है तो भाई उसका विज्ञापन कैसे रोका जा सकता है। मैं अपने कार्यकाल में विज्ञापन को लेकर बहुत सतर्क रहा और विज्ञापन के प्रबंधक या महाप्रबंधक सब मुझे कोई भी राजनीतिक विज्ञापन दिखाकर ही छापते रहे हैं, मैंने कभी भी किसी पार्टी का विज्ञापन अथवा खबर नहीं रोकी। हमारी राजनैतिक विचारधारा अलग हो सकती है पर भैया अखबार हमारे घर की खेती नहीं है। अखबार के लिए हम पब्लिक के प्रति जिम्मेदार होते हैं। हम कोई खबर या विज्ञापन रोककर पब्लिक के अधिकार का हनन करते हैं और यह अलोकतांत्रिक है।

    Yashwant Singh अरे सर इन दिनों चौतरफा घिरा हुआ हूं.. दिल्ली और मुंबई से साइबर क्राइम की दी जांचों को झेल रहा हूं.. वो तो भला हो Madan Tiwary का जो जवाब देने में कानूनी भाषा व भाषण तैयार कर दे रहे हैं.. बिलकुल फ्री में… और, हां आज तो लखनऊ की एक महिला पत्रकार के पति ने वो गालियां सुनाईं की क्या कहूं… जबकि उनकी पत्नी का वर्जन प्रकाशित कर दिया था.. पर जब लिया लुकाठा हाथ तो कभी कभी लाठी अपने पर भी पड़ती ही रहती है… और, यही आनंद है… ये सब न हो तो भड़ास चलाना बेहद नीरस काम होगा
 
    शंभूनाथ शुक्ल इसके बिना भी क्या जीना। जब एक मकसद है तो फिर क्या दबना। इस रास्ते में साथी भी मिलेंगे और दुश्मन भी।

   Roy Tapan Bharati यशवंत सिंह जी के साहस को सलाम, दिल से या मित्र मंडली में कई बार किया मगर सामने मिलने पर कुछ न कह सका। संकोची स्वभाव के कारण। मीडिया कंपनियां थियेटर जैसी हैं जहां रोज नौटंकी हो रही है…दूसरो की नौटंकी पर तो नजर है मगर अपनी नौटंकी छुपाने के लिए रोज तिकड़में भिड़ाई जाती हैं…मगरमच्छ जैसे मीडिया मालिकों से लोहा लेते हुए भड़ास वेबसाइट के जरिए श्रमजीवी पत्रकारों का साथ देना आसान नहीं है। एक बार यशवंत जी की वेबसाइट के लिए दिल खोलकर लिखूंगा..शायद कुछ की धड़कनें बढ़ जाएं…इंतजार कीजिए…

Sanjaya Kumar Singh आपने सही कहा। मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी है। हम अखबार निकालते हैं या पोर्टल चलाते हैं किसी के भी खिलाफ धुंआधार लिख रहे हैं, तथ्य हैं तो वह मुकदमा नहीं कर सकता, उसकी बात हम नहीं छाप रहे – वह क्या करेगा। विज्ञापन देगा अब आप कहो विज्ञापन भी नहीं छापूंगा – यह तो अनैतिक हो गया। तमाम ऐसे उदाहरण मिलेंगे जब किसी अखबार में छपी खबर के खिलाफ उसी अखबार में या दूसरे में भी विज्ञापन छपवाकर दूसरा पक्ष अपनी बात कहता है। आप चाहते हो कि मुझे तो लिखने बोलने की पूरी आजादी मिले। दूसरे के पास अखबार नहीं है तो तो सिर्फ सुने। यह कैसे संभव है कि आपकी आजादी के लिए दूसरे के मुंह पर पट्टी बांध दी जाए। अगर यशवंत भाजपा के खिलाफ लिखते हैं और भाजपा का पक्ष नहीं छापते (जो उनका संपादकीय अधिकार है) तो भाजपा अदालत जा सकती है वह उसका कानूनी अधिकार है पर विज्ञापन छपवाकर अगर वह अपनी बात कहना चाहती है तो यशंवत या कोई भी उसे कैसे रोक सकता है (लेवल प्लेइंग फील्ड भी कोई जरूरत होती है) और वैसे भी विज्ञापन छापने के लिए तो कई दूसरे लार टपकाते रहते हैं तो यशंवत उनकी सेवा में अपना विज्ञापन भी छोड़ दें। हद है अपेक्षा करने की भी, तर्क और दलील के उपयोग करने की भी।

Sandeep Verma विज्ञापन रोक कर पब्लिक के अधिकार का हनन कैसे हो गया ..कुछ समझा नही . विज्ञापन की औकात तो अनपढ़ पाठक तक समझता है . विज्ञापन मजबूरी हो सकता है ,मगर जनता या विज्ञापन दाता ला अधिकार तो नही .
 
Sandeep Verma विज्ञापन पर आपत्ति जताना समझदारी की बात बिलकुल नही है . इमानदारी की लिखी एक लाईन भी फुल-पेज विज्ञापन के असर को जीरो बना सकती है ..बशर्ते लाईन लिखी भी जाए .
 
Shravan Kumar Shukla Bakwas hai…. usme saf advt likha hai.. aur jo akhbaro men ad chhapte hain to klya unhe sarkari mukhpatra maan liya jaae? aisa jo sochte hain.. wah faltu ke log hain.. mujhe nahi lagta aise logon ki aapatti ko tool dena chahie…
 
Rajiv Ranjan katai nahi
 
Ravindra Ranjan बिल्कुल नहीं
 
Vikas Kumar As a reader i will say….u have very less advertisement…u should have more..nothing wrong in it….
 
Madan Tiwary अखबार या पोर्टल के संपादक की विचारधारा उसके संपादकीय मे झलकती है। आप चाहे सहमत हो या न हो, आप दुसरे के विचारो को भी लिखते है क्योंकि मामला निष्पक्षता का है। अखबार कोई परचा नही है, हां कुछ दल विशेष अपना अखबार निकालते है लेकिन मैं उसे अखबार नही मानता । रही विग्यापन की बात तो जबतक विग्यापन हमारे यहां बने पीबी एक्ट और ड्रग एंड मैज्क रिमेडी एक्ट के तहत गलत नहि है, उसे छापने को गलत नही कहा जा साकता। किसी चमत्कारि ताबिज, दवा वगैरह का विग्यापन गलत है। दिक्कत यह है कि साम्यवादी और भाजपावादी दोनो असहिश्णु है। किसी भी चीज की अति पर चले३ जाते है और सोमनाथ जैसे व्यक्ति को पार्टी से निकाल देते है क्योकि वह संविधान और देश की जनता का विश्वास तोडने से इंकार कर देते है। जो व्यक्ति आपका भाजपा का विग्यापन छापने के कारण आलोचना कर रहे हो उन बंधू से कहे कि पहले अपने परिवार, रिश्तेदार मे से उन लोगो से संबंध तोड ले जो भाजपा समर्थक है।
 
Amit Ahluwalia सर विज्ञापन के विषय में एक निवेदन तो है – समाचारपत्र खासतौर पर प्रिन्ट मीडिया उस पर भी हिन्दी के अखबारो में तमाम तांत्रिक मौलाना अधोरी आदि के ढेरो विज्ञापन छपते है और कर्इ मर्तबा उसी अखबार में सामने के पूष्ठ पर खबर होती है कि फलाने फर्जी ढोंगी तांत्रिक ने जाल में फसा कर बलात्कार किया , बच्चे की बलि देने का कुकृत्य कराया और भी कर्इ प्रकार की ठगी आदि के समाचार होते है।
यह विरोधाभास क्यो ? यह कैसी मजबूरी है ?
 
Pashyanti Shukla इस बहस को मैने उठाया…सही या गलत नहीं कह सकती लेकिन.. ये मुद्दा कुछ होता ही नहीं अगर यशवंत जी केवल एक वो पत्रकार होते जो हर मुद्दे पर अपनी बुलंद आवाज़ उठाते रहे हैं…

और मुद्दा अभी भी नहीं है सिर्फ एक विचार है…. जो इसलिए बना क्योंकि य़शवंत जी का लेखन अब कई बार स्वतंत्र नहीं लगता बल्कि आम आदमी पार्टी के प्रति उनका झुकाव उनके लेखन में साफ नज़र आता है जो कि एक पत्रकार के PROFESSION को कतई सूट नहीं करता…
और मुद्दा तब बनता है जब इस लेखन के लिए वो केवल अपनी पर्सनल फेसबुक वॉल का ही नहीं बल्कि भड़ास के प्लेटफार्म का भी इस्तेमाल करते हैं…

मेरा झुकाव भाजपा की ओर है लेकिन ये किसी को तब पता नहीं लगा जब मै सीधे मीडिया से जुडी थी..

Babu Ram हमने प्रजातान्त्रिक व्यवस्था अंगीकार की है इसमें सबको अपने विचार प्रकट करने की संवैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है .भाजपा अपना द्रस्तिकोंन रखती है इसमें विचारो की स्वंत्रता व्यक्त होती है .यह विवाद का बिषय नही है .

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.


पूरी बहस को समझने-जानने के लिए यहां क्लिक करें: bjp advt bhadas

भड़ास पर भाजपा का विज्ञापन : फेसबुक पर बवाल (पार्ट तीन)

Yashwant Singh : मैं कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और मित्रों से जानना चाहूंगा कि क्या किसी पोर्टल पर अगर भाजपा का चुनावी विज्ञापन चल रहा है तो इससे वो पोर्टल और उसका एडिटर विचारधारा के लेवल पर भाजपाई मान लिया जाएगा? आप सभी की प्रतिक्रिया का इंतजार है..

    Sanjay Sharma No..
 
     Yashwant Singh आप दोनों Haseen Rahmani, Pashyanti Shukla ने सवाल खड़े किए हैं.. मैं चाहूंगा कि इस पर बात ठीक से हो… आप दोनों अपनी बात यहां रखिए ताकि इस बहस को बड़े फलक पर ले जाया जा सके…
 
    Yashwant Singh यस या नो की बजाय Sanjay Sharma जी, थोड़े विस्तार से रोशनी डालें..
 
    Sanjay Sharma विज्ञापन से किसी भी संस्थान की विचारधारा का कोई मतलब नहीं ..
   
    Yashwant Singh कोई भी वाम-दक्षिण-मध्य विचार का साथी यहां बात रख सकता है…
    
    Ashendra Singh यशवंत भाई , व्यापार का विचारधारा से कोई सम्बन्ध नहीं है. पोर्टल तो अब व्यापर का एक ज़रिया बन गए हैं ]
     
    Vijay Yadav भाई , जो व्यक्ति इस तरह का सवाल उठा रहा हो , जरा उससे पूछिए कि , तमाम राजनीतिक दलो का विज्ञापन दिखाने वाले चैनल राजनीतिक हो गए है। किसी विज्ञापन को विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
    
    Manoj Chhabra sir showing advertisement is normal thing with any media, but presenting advertisement in disguise of news that too all around day 24×7, Hazam nahi hota
     
    Ajeet Verma main bahut warisht mathadeesh to nahi par mitrawat kah raha hoon ki content aur vigyapan alag alag -item hain jo functionally inter dependable hain. ideology se advertismement ka sambandh nahi asthapit kiya ja sakta. Par lagatar ek he paksh ka vigyapan prakishit karne se kisi khaas party ka sympathiser hone ka aarop lag sakta hai.
 
    Pankaj Chaturvedi विज्ञापन अलग बात हे और उसकी सामग्री अलग — कई बार पांचजन्य में सरकारी विज्ञापन छापते हें , हाँ यदि विज्ञापन में मिले धन से प्रभावित हो कर खबरे हो तो फिर भास्कर और उस पोर्टल में भेद नहीं हे
   
    Amardeep Srivastav nahe.
    
    Ravindra Bharti hahahhaa
     
    Yashwant Singh Ashendra Singh जी, हिंदी पोर्टल अभी लाभ का सौदा नहीं बने हैं… इसलिए इसका संचालन अभी कष्टकारी काम है.. बहस अभी पोर्टल व व्यापार का नहीं बल्कि विज्ञापन प्रकाशन से पोर्टल के विचारधारा के प्रभावित होने को लेकर है…
     
    Siddharth Kalhans बिलकुल चल सकता है विज्ञापन। शिलाजीत का मिले तो वो भी चलाओं भाई। आखिर कहां से चलेगी साइट। आपकी रंगदारी मांगने से कब तक चल पाएगी। वो तो चखने का भी जुगाड़ नही कर सकती
     
    Manoj Chhabra advertisement is purely a commercial activity, but hidden ads( in form of news )or surrogate advertising is not ethical.
     
    Abdul Noor Shibli main aisa nahin manta. advt to kisi ka koi bhi laga sakta hai
     
    Pradeep Sharma व्यापार से बिचार का क्या सम्बन्ध कोई मुझे ये तो बताए भाई दोनों अलग अलग है ।
     
    Sanjaya Kumar Singh नहीं, बिल्कुल नहीं. जो माने सो …..। एडिटर तो लिखेगा, करेगा उससे उसकी विचारधारा मालूम होगी। एडिटर की विचारधारा भाजपाई या कांग्रेसी नहीं होती – दब्बू, डरपोक, चमचा आदि उसके लिए ज्यादा उपयुक्त हैं
     
    Pashyanti Shukla Yashwant Singh मैने तो बस ऐसे ही सवाल उठाया था…. लेकिन मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लगता as we cn not ignore the financial aspects. इस बात को दो तरीके से देख सकते हैं –
    1- जैसे हमने देखी और लोग देख रहे हैं कि केजरीवाल का गुणगान करने वाले और मोदी देश के प्रॅधानमंत्री न बने और अगर ऐसा हो तो ये देश का सौभाग्य हो ये बताने वाले यशवंत भाई खुद की वेबसाइट पर बीजेपी का प्रचार कर रहै हैं…माफ कीजिएगा प्रचार तो प्रचार ही है चाहें विज्ञापन के ज़रिए हो या पेड मीडिया के ज़रिए..
    2- लेकिन दूसरा पहलू भी तो है जिस पर हममें से बहुत कम का ध्यान ही शायद गया होगा..
    कि बिना इस बात से डरे या सोचे कि अगर मै बीजेपी या कांग्रेस के खिलाफ आग उगलूंगा तो मुझे इन पार्टियों का विज्ञापन नहीं मिलेगा यशवंत जी इनके खिलाफ लिखते रहे हैं और शायद आगे भी लिखते रहेंगे….
    और वो उस समय जब मीडिया के पास इन विज्ञापनों के ज़रिए पैसा कमाने का सबसे बेहतरीन समय है चुनाव…
    एक पार्टी का ad न मिल पाने की कीमत ज़रा बीट रिपोर्टर से पूछो…
    और यहां भड़ास पर बीजेपी एड दे रही है..वो भी तब जब उसका सर्वेसर्वा हमेशा उनके ही खिलाफ आग उगलता रहा है
     
    शंभूनाथ शुक्ल Yashwant Singh: विज्ञापन छापने अथवा नहीं छापने या नहीं प्रसारित करने के अपने कुछ नैतिक मूल्य और कानून हैं। अगर उस विज्ञापन से समाज में कोई विध्वंसक माहौल नहीं बन रहा या समाज में घृणा नहीं फैल रही तो उसे छापना या दिखाना गलत नहीं है। किसी पार्टी के प्रचार से संबंधित विज्ञापन रोकने का संपादक को कोई अधिकार नहीं है। आप निजी तौर पर किसी भी विचारधारा या राजनैतिक दल से जुड़े हो सकते हैं पर खबर में आप यह प्रतिबद्धता नहीं दिखा सकते। यहां तक कि पार्टी पेपर भी। यह अलग बात है कि अपने संपादकीय में आप अपनी विचारधारा के मुताबिक अपने विचार रखें।
   
    Kuldeep Singh Sisodia Agreed with shambhunath shukla sir
    
    Ashendra Singh विज्ञापन फ्री में कहाँ प्रकाशित होता है.., संपादक जब से प्रबंध संपादक बने हैं तब से सम्पादकीय लिखने के जिम्मेदारी भी ८००० रूपए पाने वाले स्टाफ पर आ गयी hai.
     
    Shailendra Mishra विज्ञापन अलग चीज़ है । उसका विचारधारा से ज़्यादा सम्बंध नही ।
     
    Mayank Saxena ये बात शायद परसों की ही है, मैंने ये विज्ञापन देखा…देखते ही सोचा कि देखो एक-आध दिन में इस पर कोई कुछ बोलेगा…साथ बैठे एक मित्र ने कहा भी…देखो बीजेपी का विज्ञापन है…मोदी का भी फोटो है रमन सिंह के साथ…मैंने पलट कर तुरंत कहा…भाई सहब बगल में ओपेन मैगज़ीन वाली एंटी मोदी ख़बर भी है…और जब मोदी के खिलाफ स्टिंग करने वाली तहलका में बीजेपी का विज्ञापन छपता है…या आउटलुक में स्पॉटलाइट फीचर चलता है…तब क्यों आप सब रेवेन्यू मॉडल का रोना रोते हैं…प्रो मोदी स्टोरी छापने और बीजेपी का विज्ञापन लेने में बड़ा अंतर है…सबसे बड़ी बात ये कि यहां साफ लिखा था ADVT तमाम टीवी चैनल जबदिन भर पैसा लेकर मोदी की रैली का लाइव करते हैं वो तो साफ पेड न्यूज़ है…जहां ADVT लिखा भी नहीं है…दूरदर्शन भी सारे दलों का विज्ञापन चलाता है…कानून भी ये कहता है…बाकी हां, संभवतः विज्ञापन छत्तीसगढ़ सरकार का है…अब बीजेपी का ब्रांड लोगो मोदी हैं, तो वो तो छपेंगे ही…
    हां, जिनको ज़्यादा आपत्ति है, वो उस विज्ञापन शुल्क के बराबर का पैसा दे दें…विज्ञापन हटा दिया जाएगा…और हर माह देते भी रहें…मतलब मदद करने कोई आगे नहीं आएगा…ख़ुद लोग कारपोरेट की नौकरी करते रहेंगे…और गाली खूब देंगे….
    हां, सीपीएम या एम एल भी विज्ञापन दे तो यशवंत भाई छापिएगा ज़रूर (अगर दें तो)
 
    Naveen Naveen Bilkul nahi …lekin bigyapan pata chalna chahiye alag se wo webisite ke content ka part na dikhe or usase bhi jyada wanha agar website ke add ki rate list ka link kanhi aas pass de di jaye to bahut acchi bat
   
    Kuldeep Singh Sisodia Vigyapan prasarit karne se koi vishesh party ka samarthak nahi kaha ja sakta …. jaise kirane ki dukaan lagane wala her shaksh baniya nahi ho sakta
     
    Alka Bhartiya गर विचारधारा अलग हैं तो उस पार्टी से जुदा विज्ञापन प्रसारित करना सिद्धांत तो सही नहीं… जैसी विचारधारा से इतर पोर्टल का एडिटर हैं तो उस विचार धारा को पैसे के खातिर प्रमोट भी कर रहा हैं तो ऐसे में पढ़ने वाले क्या समझे, इसे भी क्लियर करें.. फिर तो किस स्टेटमेंट की सहयता से एडिटर महाशय का कर्तव्य हैं विचार क्लियर करना
     
    Masaud Akhtar व्यर्थ का प्रलाप है ये…… लोग और कुछ नहीं तो कह पाए तो अब यही उनके हाथ लगा …. इससे अपनी ऊर्जा व्यर्थ करना ही पूरी तरह व्यर्थ है. इन बातों पर ध्यान देना ही बंद करें
    
    Anurag Mishra विज्ञापन का मसला अपनी जगह पर है और ख़बरों का मसला अपनी जगह पर है विज्ञापन से किसी भी संपादक या न्यूज पोर्टल की विचारधारा को नहीं आंका जा सकता। लेकिन Yashwant Sir एक बात कहना चाहूंग कि जिसने भी अपने पोर्टल का पेज डावनलोड करके लगाया है उसने भी कुछ गलत नहीं किया उसने वही किया जो वो आज के दौर में वो देख रहा है। आज के समय में अमूमन ये देखा जाता है कि मिडिया संसथान उस संसथान के खिलाफ खबर नहीं लिखते जहाँ से उन्हें विज्ञापन मिल रहा हो भले ही वो संस्थान कितना ही गलत क्यों न कर रहा हो, अलबत्ता वो उन्हें छिपाने और बचाने का काम करते है। इसलिए एक बहस इस विषय पर भी होनी चाहिए की आखिर मीडिया में ऐसी प्रवृत्ति फ़ैल क्यों रही है ? वरना ऐसे आरोप तो मीडिया संस्थान और उसके संपादको पर लगते रहेंगे।
     
    Prabhakar Kumar Rai tab to akhbar me bhi advt nahi chhape aur tv par bhi nahi chalna chahiye …. ye to bhada mjak hai…
     
    Pushya Mitra भाई, जिन्हें परेशानी हो वे कांग्रेस का ला दें, मामला बैलेंस हो जायेगा…

    Shams 'Adnan' Alavi No…

    Vinay Maurya Yashwant भईया विज्ञापन तो पोर्टल /एडिटर के आय का स्रोत होता उससे किसी की विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जा सकता ।

    Bhupender Singh apke uppar aarop laga kya?? kal dekha tha bhadas par bjp ke add.

    Nizam Patel nahin. .. hargiz nahin.. lekin khatakta hai

   Madan Arora wah

   शक्ति प्रताप सिंह विशेन Agar ad "Al-Khangress" ka ho to "secular certificate" pakka…!!!

    Sunil Bajpai कोई कुछ भी माने लेकिन विचारधारा तभी बदली जा सकती है, जब प्रमाण और सटीक तर्क से उसे मन स्वीकार करे। किसी भी तरह के आरोपों या फिर लोगों के कहने की चिंता इस लिए भी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि जो समाज हमें नये जूते दे नहीं सकता, फिर हम इस बात की चिंता क्यों करें कि फटे जूते पहने देखकर लोग हमें क्या कहेंगे?
कहते हैं तो कह जाने दो,
अंतर्मन से बह जाने दो।
निन्दा रस है मार्ग प्रदर्शक
खुद पीओ, पीते जाने दो

       Anita Gautam विज्ञापन शुद्ध व्यवसाय है, इसका किसी के विचार और विचारधारा से कोई लेना देना नहीं हमारी समझ से यशवंत जी।

     Pervaiz Alam NO.

     Sant Kaushik no no no no

      Anil Singh विचारधारा को इन हरामखोरों के अंदर डालिए.. इन्‍हें जब आप मुश्किल में होते हैं.. तब विचारधारा की मदद करने की आवश्‍यकता समझ में नहीं आती.. लेकिन जब विज्ञापन दिखा तो इनको विचारधारा याद आ गई… अपने साले घर में दुबके रहते हैं जरूरत पर.. किसी की मदद करने नहीं आते लेकिन जब दिखता है कि दो पैसे मिल रहे हैं तो विचारधारा को आगे कर देते हैं… कुत्‍तों को भौंकने दीजिए.. ये साले हमेशा से भौंकते रहे हैं और भौकते रहेंगे..

     Dhananjay Singh ये नादानों वाले सवाल आप क्यों ले बैठे पार्टनर ?प्रधानमंत्री कैंडिडेट घोषित होने के बहुत पहले से ही गुजरात के मुख्यमंत्री कहाँ गए, किससे मिले, क्या बोले चल रहा था वो भी बगैर 'Advt' लिखे. बाकी देश में कितने और मुख्यमंत्री भी हैं, ये कम्पटीशन देने वाले बताएं.

    Sanjaya Kumar Singh भाजपाइयों को लक्ष्य करके कोई विज्ञापन देना हो तो पांचजन्य सबसे अच्छा रहेगा। अब अगर कांग्रेस या कोई कांग्रेसी उसमें विज्ञापन दे (उसके पैसे दे) तो पांचजन्य की विचारधारा बदल जाएगी , पैसे देने वाले की या कांग्रेसी की – वाकई बकवास आरोप है। अनिल सिंह ने भड़ास निकालने वाली शैली में लिख दिया है पर बात वही सही है।

    Rishiraj Rahi dhandha hai usse kaise samjhota hota

   Vinod Bhardwaj विज्ञापन पोर्टल को दिया जा रहा हो या किसी अखबार/चैनल को इसका ये मतलब तो कतई नहीं निकाला जा सकता कि उसका संचालक भी उससे इत्तेफाक रखता है या फिर उस पक्ष विशेष की विचारधारा से प्रेरित/प्रभावित है| वैसे भी जब Advt. शब्द का प्रयोग कर स्थिति स्पष्ट कर दी गयी हो तो ऐसे में यहाँ बहस का कोई मुद्दा बनता ही नहीं है| पोर्टल/अखबार/न्यूज चैनलों के सञ्चालन के लिए आवश्यकता होती है धन की और इसे पूरा करने का मुख्य स्त्रोत होते हैं विज्ञापन|

Kamaluddin Siddiqui katayee nahin !

Shailendra Kumar Nimbalkar This is business

Pradeep Upadhyay Bilkul Naheen
 
Ramesh Sarraf kyon?
 
Santosh Manav NO NEVER
 
Ram Dayal Rajpurohit हाँ कोंग्रेस तो मान ही लेगी
 
Prem Arora bjp ka kar rahe ho ya modi ji ka yeh depend karta hai agar modi ji ka hai to theek hi hai prantu agar BJP ka hai to modi hai hi
 
Jagdish Yadav kuchh to behude kahenge , unka kam hai kahna
 
Arun Singh nahi , kadapi nahi ..
 
Devang Rathore नहीं भाई जी!
 
Rajiv Srivastava विज्ञापनपोर्टल को चलाने के लिए बिजनेस का हिस्सा है इसे पोर्टल की विचारधारा से जोड़ना ठीक नही है।
 
Shravan Kumar Shukla Bakwas hai…. usme saf advt likha hai.. aur jo akhbaro men ad chhapte hain to klya unhe sarkari mukhpatra maan liya jaae? aisa jo sochte hain.. wah faltu ke log hain.. mujhe nahi lagta aise logon ki aapatti ko tool dena chahie…
 
Samir Gupteshwar Singh सवाल निष्पक्षता का है अगर पोर्टल निष्पक्षता के साथ सभी तरह के विषय उठा रहा है बिना भेदभाव के सभी तरह के समाचार दे रहा है तो कोई भी विज्ञापन दिखा सकता है जो राष्ट्र व समाज के खिलाफ न हो किंतु पोर्टल एक ही विचारधारा का पोषक हो और विज्ञापन दूसरी विचारधारा का दिखाए तो वह अवसरवादी ढोंगी व पाखंडी है ।
 
Kripa Krishna छपे विज्ञापन और छापने वाले की विचारधारा का आपसी स्‍वस्‍थ सम्‍बन्‍ध सिर्फ व्‍यावसायिक होता है…..
 
Sanjaya Kumar Singh समीर गुप्तेश्वर सिंह जी – विज्ञापन तो पैसे लेकर ही चलाए जाएंगे और पैसे देने वाला यूं ही नहीं देगा। उसे लाभ मिलेगा तभी वह खर्च करेगा। ऐसे में लेने वाले को कहां कुछ तय करना है। अनैतिक, अश्लील, आदि की बात अलग है।
 
Gopal Rai bilkul nahi,vigyapan aur vichardhara ka apas me koi mel nahi
 
Ankit Muttrija सर,वैसे तो तमाम वरिष्ठ पत्रकारों,विद्वानों ने अपने विचार रख दिए हैं।लेकिन,मैं अपनी बात लिखूं तो मेरे मतानुसार विज्ञापन एक अलग मसला हैं।आप विज्ञापन खींच-खींच कर ख़बरों को भी प्रभावित होने दें तो ये ग़लत होगा लेकिन विज्ञापन का असर आपकी ख़बरों पर न पड़े तब तो ये कहीं से भी अनुचित नहीं लगता।छत्तिसगढ़ के एक अख़बार ने मुख्यमंत्री रमन सिंह से दिवाली पर कुछ उपहार लेने से इनकार कर दिया था जिसके बाद विज्ञापन बंद तो बंद बल्कि राज्य सरकार की तरफ़ से कोई मंत्री अख़बार से बात करने को राज़ी नहीं हुआ।देखते ही देखते अख़बार बंद करने की नौबत आन पड़ी।यहां,विज्ञापन लेने के बाद भी निष्पक्षता बरकरार हैं तो इससें बेहतर क्या हो सकता हैं भला।
 
Imran Zaheer नहीं
 
Ashok Chaudhary ये किसी जमाने में हुआ करता था कि विज्ञापन लेते हुए खबरों में निष्‍पक्ष रहा जाय। अब यह नहीं होता। इसके काफी कटु अनुभव अखबार में नौकरी करते हुए हुआ है। आज के दौर में विज्ञापनदाता उम्‍मीद करता है कि खबरें भी उसके पक्ष में लिखी जाय। या फिर विरोध में तो कतई न लिखी जाय। इसलिए यदि अखबार का तेवर बनाए रखना है तो ऐसे विज्ञापनों से बचना ही ठीक होगा।
 
Madan Tiwary अखबार या पोर्टल के संपादक की विचारधारा उसके संपादकीय मे झलकती है। आप चाहे सहमत हो या न हो, आप दुसरे के विचारो को भी लिखते है क्योंकि मामला निष्पक्षता का है। अखबार कोई परचा नही है, हां कुछ दल विशेष अपना अखबार निकालते है लेकिन मैं उसे अखबार नही मानता । रही विग्यापन की बात तो जबतक विग्यापन हमारे यहां बने पीबी एक्ट और ड्रग एंड मैज्क रिमेडी एक्ट के तहत गलत नहि है, उसे छापने को गलत नही कहा जा साकता। किसी चमत्कारि ताबिज, दवा वगैरह का विग्यापन गलत है। दिक्कत यह है कि साम्यवादी और भाजपावादी दोनो असहिश्णु है। किसी भी चीज की अति पर चले३ जाते है और सोमनाथ जैसे व्यक्ति को पार्टी से निकाल देते है क्योकि वह संविधान और देश की जनता का विश्वास तोडने से इंकार कर देते है। जो व्यक्ति आपका भाजपा का विग्यापन छापने के कारण आलोचना कर रहे हो उन बंधू से कहे कि पहले अपने परिवार, रिश्तेदार मे से उन लोगो से संबंध तोड ले जो भाजपा समर्थक है।
 
Madan Tiwary Haseen Rahmani Pashyanti Shukla आप दोनो का लिखा पढकर के हंसी आई। भाइ आप किस विचारधारा के समर्थक है मुझे नही पता लेकिन भाजपा के विग्यापन पर रोक की मांग करने वाले या आपति करने वालो को मैं हिटलर की श्रेणी मे रखता हूं और फ़ासिस्ट मानसिकता का व्यक्ति मानता हूं। एक छोटा सा निवेदन है , जितना लिखे कम से कम उसका आधा समय पढने पर भी दे ( कामिक्स नही ) तो आप दोनो के लिये बेहतर होगा। आपदोनो का कमेंट देखकर मुझे स्टेला जेम्स के ब्लाग का वह कथन याद आ गया जो उसने गांधी जी को कोट करते हुये लिखा है, " मै जोरदार तर्क दे सकता हूं लेकिन मेरे पास सभी तर्को से जोरदार कुछ है, अनुभव। " आप दोनो की उम्र कम है सिखे । मैं किसी की विचारधारा से सहमत नही हूं तो क्या मित्रता तोड लूंगा ? मैं वकील हूं तो क्या उसका केस लडना छोड दूंगा ?
 
Harish Bhardwaj Mere khyal se kisi vigyapan ka sampadak ki vichardhara se koi lene dena nahi hota, Vigyapan alag cheej hai-samachar alag. han ye jarur hona chahia ki vigyapan samacharnuma na ho!
 
Kamal Sharma नहीं।
 
Rajesh Ranjan Bilkul nahi
 
Smita Mishra mere khyal se LTTE ka vigyapan mile to wo bhi le lena chahiye…
 
Chandra Shekhar Shaastri ऐसी सोच वाले लोग संकीर्ण विचारधारा से ग्रस्त हैं, जो किसी पार्टी के विज्ञापन पर समाचार स्रोत को ही उसका अंग मान लें। यदि यह किसी अन्य पार्टी का होता तो शायद ऐसा कम होता क्योंकि छद्मनिरपेक्षता का कीड़ा काटता बहुत तेज है….
 
Sunil Verma jiske yahan congress ka vigyapan hoga to us par congressi ka thappa lagega
 
Arun Pratap no,idealogoly differnt this is marketing
 
Nitin Mukesh Sinha koi galat nahi..add le rahe rishwat to nai..nai lege to salary kaha se di jayegi..
 
Mukesh Kejariwal मैं न वरिष्ठ पत्रकार हूं और न उस तरह से आपका मित्र होने का दवा कर सकता हूं। मगर चुप रहने की बजाय कहना चाहूंगा- कतई नहीं…
 
Mohammad Anas No…
 
Asar Ahmed No., not necessarily……only client
 
Deepak Sharma Not at all because thats what advt is meant for
 
Pradumn Kaushik nhi…….
 
Ravi Prakash मुझे तो नहीं लगता। विज्ञापन, कंटेंट और व्यक्तिगत विचारधारा तीनों का अलग-अलग अस्तित्व हैं।
 
Pashyanti Shukla इस बहस को मैने उठाया…सही या गलत नहीं कह सकती लेकिन..
ये मुद्दा कुछ होता ही नहीं अगर यशवंत जी केवल एक वो पत्रकार होते जो हर मुद्दे पर अपनी बुलंद आवाज़ उठाते रहे हैं…

और मुद्दा अभी भी नहीं है सिर्फ एक विचार है…. जो इसलिए बना क्योंकि य़शवंत जी का लेखन अब कई बार स्वतंत्र नहीं लगता बल्कि आम आदमी पार्टी के प्रति उनका झुकाव उनके लेखन में साफ नज़र आता है जो कि एक पत्रकार के PROFESSION को कतई सूट नहीं करता…
और मुद्दा तब बनता है जब इस लेखन के लिए वो केवल अपनी पर्सनल फेसबुक वॉल का ही नहीं बल्कि भड़ास के प्लेटफार्म का भी इस्तेमाल करते हैं…

मेरा झुकाव भाजपा की ओर है लेकिन ये किसी को तब पता नहीं लगा जब मै सीधेमीडिया से जुडी थी.
 
Shubhabrata Sengupta इस लिहाज से … हर चैनेल जो आशाराम की बुराई करता हो वो मिशनरी का चैनेल होना चाहिए….
 
Jitendra Choubey Hargiz nahi..
 
Sanjaya Kumar Singh यशवंत आप का समर्थन करते हैं यह घोषित है, उसके सदस्य भी बन चुके हैं। समस्या तब होती जब वे आप के खिलाफ न लिखें, न छापें या आप के खिलाफ लिखने – बोलने वाले मेरे जैसे लोगों का ब्रेन वाश करने की कोशिश करें। एक पत्रकार की अपनी राय तो होगी ही, निष्पक्ष होना चाहिए पर होना कितना मुश्किल है यह भी समझना चाहिए. समस्या तब होती है जब लोग बताते नहीं है। या अपनी लाइन को ही ठीक बतातेत हैं। तमाम बड़े संपादकों की लाइन औऱ झुकाव स्पष्ट है। कई पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। यहां भी यशवंत आप का सदस्य होने के बावजूद भाजपा का विज्ञापन चला रहे थे।

Haresh Shingala सब कोइ व्यकती या मीडीया के लोग मौका मीलने पर "नीराराडीया" का रोल अदा कर ही देते हे..
 
Shitanshu Pati Tripathi no……….
 
Pankaj Mishra congras ke mutabik yes

Masaud Akhtar यह तो वही बात हो गयी कि आप नशेड़ी हैं क्योंकि आपकी दवा की दूकान है और ड्रग बेचते हैं…
और जहां तक बात निष्पक्षता की है तो इसका कहीं अस्तित्व ही नहीं है. आपकी अपनी कोई राय होगी ही … निष्पक्षता सिर्फ इसी अर्थ में हो सकती है कि आप कितने पारदर्शी अपने विचारों व खबरों के साथ हैं. और जिसे सच समझते हैं उसे सच कहने का हौसला रखते हैं और इसपर अभीतक तो मैंने आपको खरा ही पाया है … आगरा आपके वेब पोर्टल की जो भी विज्ञापन नीति है उसके खिलाफ जाकर यदि कोई विज्ञापन दिखाते या न दिखाने का फैसला लेते हैं तब वो गलत होगा …. अगर आपके विज्ञापन नीति में किसी राजनीतिक पार्टी के विज्ञापन पर प्रतिबन्ध नहीं है तो आप किसी भी पार्टी व व्यक्ति का विज्ञापन दिखाने के लिए स्वतंत्र हैं और इसपर सवाल उठाना अधकचरापन या दूषित मानसिकता ही हो सकता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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भड़ास पर भाजपा का विज्ञापन : फेसबुक पर बवाल (पार्ट दो)

Haseen Rahmani : देखो भाई… कॉमरेड होना अलग बात है और एक वेबसाइट चलाना एक अलग बात…. और ये जो दिमाग में जनसरोकारी की बाते भरी पड़ी उसे निकाल दो. 2014 तक। एक साल तक अच्छा मौका है। लूट लो जितना चाहो…चुनाव के बाद करेंगे झण्डा बुलंद. खूब चिल्लाएंगे.. शेम शेम, डाउन डाउन …. पूंजीवाद के खिलाफ… राष्ट्रवाद के खिलाफ..

   Yashwant Singh जिन साथियों राष्ट्रवादियों भाजपाइयों संघियों कम्युनिस्टों को विज्ञापन और विचार के बीच का फर्क नहीं पता, उनसे बहस करना बेकार… उन्हें उनके मेंटल लेवल का संज्ञान लेकर दूर से ही करना चाहिए प्रणाम… हां, जो भी ऐसी बहस उठा रहे हैं, उनकी बात को मैं अपने वॉल पर सम्मान के साथ जगह दे रहा हूं ताकि उनकी 'मंशा' पूरी हो जाए… जय हो..
 
    Haseen Rahmani Yashwant जी 'विज्ञापन और विचार के बीच का फर्क' आप ही बता दीजिए, हम मूर्खो के लिए सहूलियत रहेगी…
 
    Yashwant Singh हसीन रहमानी भाई… कुछ काम खुद भी करिए… कब तक बैसाखियों के सहारे चलेंगे … मैं इतना भर आपको समझा सकता हूं कि कोई भी अखबार या चैनल या वेबसाइट, विज्ञापन किसी भी पोलिटिकल पार्टी या आइडियोलाजी का चला सकता है… और इस विज्ञापन चलाने से उसके अपने विचार, विजन, तेवर पर कोई फरक नहीं पड़ता. विज्ञापन एक अलग डिपार्टमेंट होता है और कंटेंट अलग. दोनों में घालमेल नहीं होना चाहिए, यही पत्रकारिता की नैतिकता है.
   
    Haseen Rahmani खैर यह सचमुच मूर्खो के लिए बड़ी जानकारी है..और आप जैसे धंधेबाजों के लिए एक तर्क भी जिनके लिए विज्ञापन का श्रोत उनकी प्रतिबद्धता को प्रभावित नहीं करता…
     
    Yashwant Singh Haseen Rahmani साहब शुक्रिया. सही पहचाना. अपन धंधेबाज हैं. क्योंकि जो कोई भी अपना काम यानि अपना धंधा करता है, वह धंधेबाज ही तो हुआ… रही बात प्रतिबद्धता की तो इसको साबित करने के लिए बोलने बताने की जरूरत नहीं पड़ती, यह कर्म से दिखना पता चलना चाहिए… वैसे, ये सवाल सिर्फ आपने ही नहीं उठाया है, एक भाजपा समर्थक महिला साथी ने भी उठाया है…
 
    Haseen Rahmani वह तो दिखाई पड़ ही रहा है…(इमेज प्रस्तुत स्टेटस के साथ संलग्न है)

    Yashwant Singh हां तो भाई उसी को देखते रहिए… 🙂
 
    Haseen Rahmani मुस्कराइएं कि आप भाजपाई हैं और पत्रकारिता में है…

    Yashwant Singh जी, आपका फतवा कुबूल है साहेब.. देखें, मुस्करा रहा हूं 🙂
 
    Haseen Rahmani आप के इस 'फतवा' शब्द ने तो तोगड़िया की याद दिला दी। और आप को इस पर तीन बार नहीं हजार बार मुस्कराने की जरूरत है। मुस्कराते हो, लेकिन बकौल गालिब शर्म तुमको मगर नहीं आती…

    Yashwant Singh Haseen Rahmani साहब, बेशर्मों से काहे बहस करते हो भाई.. और, जब किसी के भाजपाई होने का सर्टिफिकेट जारी करोगे तो इसे और क्या कहा जाएगा.. फतवा ही तो.. बाकी, तोगड़िया के बारे में आपको ज्यादा पता होगा, मुझे नहीं क्योंकि मैं उनका ध्यान नहीं रखता जो ध्यान रखने लायक लोग नहीं हैं… और, ग़ालिब शब्द लिखते हुए ग के नीचे नुक्ता लगा लेते तो चचा ग़ालिब का पूरा सम्मान हो जाता…
 
    Yashwant Singh साथ ही, किसी का मुस्कराना और रोना, आपके हाथ में नहीं इसलिए जबरदस्ती कट्टरपंथी पना इस क्षेत्र में भी काहे दिखाते हो… जिसे मुस्कराना होगा वो मुस्कराएगा ही, बेहद विपरीत हालात के बावजूद… वो आप न रोक सकोगे…
   
    Haseen Rahmani बेशर्मी बरकरार है. वैसे आजकल नुक्ता चलता नहीं है फिर भी नुक्ताचीनी की आदत गई नहीं…विपरीत हालात में मुस्कराते रहिए और मुस्कराते हुए भाजपाइयो से विज्ञापन जुटाते रहिए..धंधे का यही उसूल है..
   
    Yashwant Singh आजकल नुक्ता कहां चलता है साहेब… आजकल तो फतवा गिरी और कट्टरपंथी पना चलता है… चलाते रहिए… अपन लोगों के यहां अगर भाजपाइयों क्या, संघियों और मुस्लिम कट्टरपंथियों के भी विज्ञापन चलकर अपने पैरों से आएंगे तो छपेंगे, बशर्ते वो लोकतांत्रिक मर्यादा के दायरे में हों और विज्ञापन में कोई ऐसी चीज न हो जो गैरकानूनी व असंवैधानिक हो… ये पहले भी करते रहे हैं, आज भी करेंगे और आगे भी करेंगे… आप बशर्मी से बहसियाते रहिए…
 
    Haseen Rahmani हार गया साहिब…लग रहा है मोदी को लाकर ही मानोगे… मार ही डालोगे
 
    Yashwant Singh अरे नहीं साहब, हम काहें मोदी को लाकर रहेंगे… हमारा तो विचार स्पष्ट है… लेकिन मोदी के चुनावी विज्ञापन लगाने को कहे जाएंगे तो हम इससे इनकार नहीं करेंगे क्योंकि फिर कह रहा हूं कि विचार और विज्ञापन दोनों अलग चीजें हैं.. विज्ञापन के कारण किसी मीडिया माध्यम के अपने विचार तेवर सरोकार प्रभावित या नष्ट नहीं होते… अन्यथा अगर ऐसा होता तो अभी तक सारे भाजपाई अखबार कांग्रेसी हो चुके होते और सारे कांग्रेसी अखबार भाजपाई… क्योंकि दोनों तरह के अखबार दोनों ही पार्टिोयं के विज्ञापन छापते हैं… पर आप से बहस मैं क्यों कर रहा हूं क्योंकि आपने तो फतवा जारी कर दिया है … सो, आप कहते रहिए कि भड़ास भाजपाई हो गया और यशवंत प्रखर राष्ट्रवादी… 🙂
 
    Haseen Rahmani भड़ास भाजपाई हो गया और यशवंत प्रखर राष्ट्रवादी… (स्माइली लगाने की जरूरत नहीं थी)
 
    DrBhupendra Singh वैसे फतवा शब्द सुनकर तोगङिया से पहले निकृष्ट मौलवीयों की याद आती है… नहीं ?
 
    Haseen Rahmani आज के बाद मुझे फतवा शब्द सुनकर निकृष्ट DrBhupendra Singh की ही याद आयेगी…
 
    DrBhupendra Singh चलिये इसी बहाने आपकी यादो में शामिल हो गये….  
 
    Yashwant Singh आप स्माइली हटाकर ही लिखिए, फैलाइए और मन में रखिए… मुझे कोई फरक नहीं पड़ता..
 
    DrBhupendra Singh बस प्यार बरकरार रखिये सपनो में भी आयेंगे… वन्दे मातरम्….
   
    Yashwant Singh अरे डाक्टर भूपेंद्र जी… आप काहें परेशान हो रहे हैं.. सपना बस सपना ही रह जाएगा भाई… यथार्थ के धरातल पर रहिए…
 
    शशांक शेखर Hahaha विज्ञापनों से परहेज है इन सबको…खैर जो जोन चीज़ देखना चाहता है वही दिखाई देगा….
 
    DrBhupendra Singh लो जी मै धरातल पर लौट आया 🙂

भाजपा विरोधी हसीन रहमानी के फेसबुक वॉल से.


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भड़ास पर भाजपा का विज्ञापन : फेसबुक पर बवाल (पार्ट एक)

Pashyanti Shukla : माफ कीजिएगा Yashwant Singh जी… लेकिन आपकी वेबसाइट http://bhadas4media.com/ पर छपा बीजेपी का ये AD कुछ हज़म नहीं हुआ… अब इसे हम क्या समझें….. यकीन नहीं होता कि मोदी सत्ता में नहीं आयेंगे..और उनका न आना देश का परम सौभाग्य होगा ऐसी भविष्यवाणी करने वाले ये आप ही हैं….


   आशीष सागर दीक्षित Media market
     
    Yashwant Singh शुक्ला जी, इत्ती सी बात न जाना… कि किसी पार्टी का विज्ञापन चलाने से किसी के निजी विचार कैसे बदल सकते हैं… ??? खैर, इस मसले पर बहस नहीं क्योंकि भड़ास पर कोई विज्ञापन छपवा रहा है तो हम विज्ञापन की विचारधारा नहीं देखते. विज्ञापन विज्ञापन होता है.. और, मेरे जो विचार हैं सो मेरे विचार हैं…
     
    शिवानन्द द्विवेदी सहर Yashwant Singh जी । फिर अगर कोई अखबार या चैनल विज्ञापन में निर्मल बाबा को दिखाए तो इसे चैनल की विचारधारा कैसे मान ली जाय ।

    Yashwant Singh सहर जी. निर्मल बाबा का ये किसी बाबा का अगर विज्ञापन दिखाया जा रहा है तो कोई गलत बात नहीं है… निर्मल बाबा मुद्दा तब बने थे जब उनके विज्ञापन को न्यूज की तरह दिखाया जा रहा था… बिना प्रायोजित शो लिखे, बिना एडीवीटी लिखे, बिना डिसक्लेमर लगाए…
 
    शिवानन्द द्विवेदी सहर अब बहस दुसरी तरफ जाएगी । विराम देता हूँ ।

    Yashwant Singh सहर भाई, कह डालिए मन की बात.. बात तो होनी ही चाहिए…
 
    Ankit Sharma Yashwant Singh………..प्रणाम सर हम भी मौजूद है यहां
 
    Pashyanti Shukla Yashwant Singh no hard feelings…. U r awsm in so mny wys…..i appreciate ur skill to put ur thoughts so strongly……

भाजपा समर्थक पश्यंती शुक्ला के फेसबुक वॉल से.


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महाराष्ट्र में निषेध दिवस के रूप में मनाया जाएगा पत्रकारिता दिवस

16 नवम्बर को मनाया जा रहा राष्ट्रीय पत्रकार दिवस महाराष्ट्र में निषेध दिवस के तौर पर मनाने का फैसला लिया गया है. इस दिन के उपलक्ष्य में संपन्न हो रहे सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार करने और ब्लैक रिबन लगाकर काम करने का फैसला लिया गया है. पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति के निमंत्रक एस.एम.देशमुख ने मराठी पत्रकार परिषद के औरंगाबाद अधिवेशन में ही यह ऐलान किया था. महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर हो रहे हमलों के विरोध में ये फैसला लिया गया है.
 
महाराष्ट्र में प्रेस प्रोटेक्शन ऐक्ट की मांग को लेकर पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति पिछले पांच साल से आंदोलन कर रही है. लेकिन मुख्यमंत्री सिर्फ आश्वासन देते आ रहे हैं. पत्रकार की पेंशन योजना की भी मांग है लेकिन सरकार ध्यान नहीं दे रही. इसके विरोध में 16 नवम्बर का राष्ट्रीय पत्रकार दिवस निषेध दिवस के तौर मनाने की अपील देशमुख ने की है.
 
पूना जिला मराठी पत्रकार संघ के आज संपन्न हुई बैठक में जिले में पत्रकार दिवस ब्लैक डे के तौर पर मनाने का फैसला लिया गया है. जिले में सभी पत्रकार ब्लैक रिबन लगाकर काम करेंगे. बैठक को अध्यक्ष शरद पाबले, परिषद के उपाध्यक्ष सुभाष भारद्वाज, कार्याध्यक्ष बापू गोरे, पूना शहर अध्यक्ष राजेंद्र कापसे समित अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे. रायगड, बीड, अकोला, जलगांव समित अन्य शहरों मे भी 16 नवम्बर को निषेध दिन मनाया जा रहा है.

माखनलाल पत्रकारिता विवि के कैम्पस में खुला भाजपा कार्यालय

ये तस्वीर किसी भाजपा कार्यालय की नहीं हालांकि इस पर भाजयुमो कार्यालय लिखा जरूर है मगर असल में ये माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्विद्यालय का नोएडा कैंपस है, जहां पर पत्रकारिता के गुर सिखाये जाते हैं. उन्हें नारद से लेकर प्रभाष जोशी तक को पढ़ाया जाया जाता है. संचार और प्रोपेगेंडा, प्रसार, विज्ञापन यानी हर वो विषय जो पत्रकारिता से संबंधित है, पढ़ाया जाता है. कैंपस के प्रथम तल पर बड़ी सी लाइब्रेरी है जिसमें जनसत्ता से लेकर पाचंजन्य तक इंडियन एक्स्प्रेस से लेकर ऑब्जर्वर तक समाचार पत्र आते हैं. मैंने पढ़ाई के दौरान इच्छा जाहिर की थी कि उर्दू अखबार, रोजनामा सहारा, और हिंदी मैग्जीन कान्ति को भी कैंपस की लाईब्रेरी में मंगाना चाहिये लेकिन इसको यह कहकर टाल दिया गया था कि कल को कोई बंगाली या फिर कन्नड छात्र यहां पर अपनी भाषा के अखबार मंगाने के लिये भी आवेदन कर सकता है. हालांकि उर्दू अखबार तो कैंपस में नहीं आ पाया लेकिन कान्ति जरूर आना शुरु हो गई थी.
 
आज उधर से गुजर रहा था सोचा अपने प्रिय गुरु जी सूर्य प्रकाश, बीर सिंह निगम, और क्लर्क देवदत्त शर्मा से मुलाकात करता चलूं. मैं अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आज वहां पहली बार गया था. शर्मा जी से गुफ्तगू हो रही थी, बातों-बातों में मैं कहने लगा पिछले डेढ़ सालों में काफी कुछ बदल गया है. कैंपस की गाड़ी खड़ी करने के लिये गैराज भी बन गया है. पता चला कि ये गैराज नहीं है यह पहले कैंटीन हुआ करती थी लेकिन अब ये भाजयुमो का कार्यालय है. मैं चौंका कुछ छात्र और प्रोफेसर ही संघ और भाजपा का राग अलापा करते थे मगर कार्यालय नहीं हुआ करता था. लेकिन अब तो बाकायदा कार्यालय बनाकर यह साबित कर दिया गया कि माखनलाल विवि केवल संघ के लिये कैडर तैयार करने का काम कर रहा. जाहिर है किसी नेता का तो सिर्फ एक क्षेत्र विशेष तक ही प्रभाव रहता है मगर पत्रकार का लिखा हुआ तो दुनिया भर में फैल जाता है. जब रोज सुबह बिहार के सीवान से, झारखंड के धनबाद, बंगाल के नागपाड़ा, यूपी के गोरखपुर से स्टूडेंट उस कॉलेज में पढ़ने के लिये आयेगा जिसमें भाजपा का प्रचार, प्रसार किया जाता हो वह भविष्य में क्या गुल खिलायेगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. क्या वह भविष्य में संघी पत्रकार, बलदेव भाई शर्मा, एस शंकर, आदी की जगह नहीं लेगा ?
 
मुझे आपत्ति भाजपा के कार्यालय पर नहीं है बल्कि आपत्ति इस बात पर है कि ज्ञान के मंदिर में राजनीति के राक्षस को क्यों खड़ा किया गया? भाजपा की सोच से कोई हो जो वाकिफ ना हो. एक विशेष समुदाय के खिलाफ इसके नेता किस तरह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और किन शब्दों का इस्तेमाल उस समुदाय के संबोधन के लिये करते हैं वह आये दिन समाचार माध्यमों से पता चलता रहता है. ऐसे में इस कैंपस में भाजपा का कार्यालय होना माखनलाल विवि के कुलपति को सवालों के दायरे में लाकर खड़ा करता है और इस कैंपस से निकलने वाले छात्रों की निष्पक्ष पत्रकारिता पर भी सवालिया निशान लगाता है. अगर शिवराज सरकार ने हाल फिलहाल में कोई ऐसा कानून बना डाला है कि पार्टी कार्यालय कैंपस में भी होगा तो फिर एक पार्टी का ही कार्यालय क्यों खुलवाया गया। बाकी पार्टियों के कार्यालयों के लिये भी जमीन और हॉल का इंतजाम क्यों नहीं किया गया? और उन छात्रों को जिनकी सोच भाजपा की विचारधारा से अलग है उनको कैंपस से बाहर क्यों नहीं किया गया.
 
छींकने की बीमारी तक के इलाज का विज्ञापन अखबारों में देने वाली सरकार ने यह विज्ञापन क्यों नहीं जारी किया कि अब माखनलाल पत्रकारिता विवि में भाजपा की विचारधारा को भी कोर्स के रूप में शामिल किया गया है और जो बच्चा इस पाठयक्रम को नहीं पढ़ेगा उसे कैंपस से बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा या यह कोई नई तकनीक ईजाद की है युवाओं को ब्रेन वॉश करने की. इसका जवाब तो कैंपस के जिम्मेदारों, और ईमानदारी और सुशासन का ढोल पीटने वाले भाजपाइयों, और इसके संघी प्राध्यापकों जो माखनलाल में कार्यरत हैं उन्हें देना ही होगा. कि तुम यहां पर मोटी मोटी फीस वसूल कर छात्रों को पत्रकार बना रहे हो या भाजपा और संघ परिवार के कैडर तैयार कर रहे हो?
 
लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार और मीडिया एक्टिविस्ट हैं.

श्रीकांत अस्थाना का नोएडा तबादला, सुभाष बने नए एडिटर, वकुल अग्रवाल ने जागरण छोड़ा

मेरठ से खबर है कि नेशनल दुनिया अखबार के रेजीडेंट एडिटर श्रीकान्त अस्थाना का ट्रांसफर नोएडा हो गया है. उनकी जगह मेरठ में सुभाष को नया एडिटर बनाकर भेजा गया है. सुभाष सिंह की नेशनल दुनिया जयपुर की लांचिंग कराने में प्रमुख भूमिका रही है. पिछले दस दिनों से मेरठ और वेस्ट यूपी एडिसन को समझ रहे सुभाष सिंह ने 10 नवम्बर को मेरठ एडिशन का चार्ज संभाल लिया. श्रीकांत अस्थाना ने मेरठ आफिस का चार्ज सौंपने के बाद उन्हें अपनी टीम से मिलवाया.

उधर, दैनिक जागरण में पिछले कई वर्षों से कार्यरत नॅशनल प्रोडक्ट सेल्स टीम के सदस्य रह चुके और वर्तमान समय में दैनिक जागरण हल्द्वानी में कार्यरत वकुल अग्रवाल ने आज अखबारी दुनिया को अलविदा कह दिया. विगत शनिवार को उन्होंने अपना त्यागपत्र दिया है. वर्तमान समय में वो नोटिस पीरियड पर कार्य कर रहे हैं. सुनने में आया है कि वो कंपनी द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों से असंतुष्ट थे जिसके कारण उन्होंने इतना बड़ा फैसला लिया.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

न्यूज चैनलों को केंद्र सरकार की तरफ से जारी एडवाइजरी के खिलाफ पीआईएल (पढ़ें एडवाइजरी)

: मामला पीएम और मोदी की तुलना खा : लखनऊ : सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने प्रधान मंत्री को अन्य राजनैतिक नेताओं से तुलना किये जाने पर न्यूज़ चैनलों को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा उनके लाइसेंस निरस्त किये जाने की धमकी भरे ऐडवाइजरी के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर किया है.

याचिका के अनुसार मंत्रालय ने केबल टेलीविज़न नेटवर्क (रेगुलेशन) एक्ट 1995 की धारा 20 के अंतर्गत न्यूज़ चैनलों को उनका लाइसेंस निरस्त करने की 21 अक्टूबर 2013 की ऐडवाइजरी  मात्र इसलिए जारी की क्योंकि इन चैनलों ने स्वतंत्रता दिवस पर दोनों नेताओं के भाषणों को तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत कर दिया था जो सरकार को अनुचित और बुरा लगा गया.


मात्र एक राजनैतिक नेता को पीएम से तुलना करने पर जारी इस ऐडवाइजरी को सरकार द्वारा मीडिया की स्वतंत्रता को दबाने वाला तानाशाही कदम बताते हुए डॉ ठाकुर ने लोकतंत्र तत्काल व्यापक जनहित में इसे निरस्त किये जाने की माग की है.

न्यूज एडिटर से बदतमीजी करने वाले सब एडिटर ने माफी मांगी

खबर है कि पंजाब केसरी के जिस न्यूज एडिटर संदीप मिश्रा से सब एडिटर ललित मोहन ने बदतमीजी की थी, उनसे बुधवार को माफी मांगी. ललित ने पूरे स्टाफ के सामने संदीप के पैर छुए और गाली देने पर माफी मांगी. पंजाब केसरी के मालिक अविनाश चोपड़ा मंगलवार को शहर से बाहर थे. बुधवार को वो वापस लौटे तो उन्हें सारे मामले की जानकारी दी गई.

बताया जाता है कि उन्होंने ललित को बुलाकर अपने सीनियर से बदतमीजी करने को लेकर डांटा और माफी मांगने को कहा अन्यथा कड़े एक्शन के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी. बाद में संदीप द्वारा ललित के खिलाफ को एक्शन न किए जाने की बात कहने पर ललित से माफी मंगवाया गया. ललित पर आर्थिक दंड लगाकर पांच दिनों के लिए फोर्स लीव पर भेज दिया गया है.

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जींद में 16 नवंबर को पत्रकार मनायेंगे विरोध दिवस

जींद, हरियाणा। आगामी 16 नवंबर को जिले के सभी पत्रकारों द्वारा विरोध दिवस मनाया जाएगा। इसमें सभी पत्रकार स्थानीय लघु सचिवालय परिसर में सुबह 11 बजे दो घंटे का सांकेतिक धरना देंगे। धरने के बाद अपनी मांगों का ज्ञापन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नाम उपायुक्त राजीव रतन को सौंपा जाएगा। जींद में पत्रकारों की हुई एक बैठक मेंये फैसला लिया गया।
 
इस ज्ञापन में प्रमुख रुप से मीडिया प्रोटेक्शन एक्ट बनाना, पत्रकारों पर हमले को संगीन अपराधों में शामिल करना, मीडिया आयोग बनाने, हर वर्ष पत्रकारों को दिए जाने वाले राज्य स्तरीय अवार्ड को हर वर्ष देना, राज्य में टोल टैक्स में पत्रकारों को छूट देना, एक्रीडेशन प्रणाली को सरल करना, हर जिले में मीडिया सेंटर बनाना, स्कूल स्तर पर पत्रकारिता विषय को लागू करवाना, पत्रकारों को वकीलों की तर्ज पर हुडा में कोटा देना, राजस्थान सरकार की तर्ज पर पेंशन तथा प्लाट देना, पत्रकारों के लिए 5 लाख रुपए की हेल्थ पॉलिसी लागू करना, मीडिया पर लगाए जा रहे अंकुश को बंद करना आदि मांगें शामिल हैं।
 
बैठक में प्रमुख रुप से जसमेर मलिक, अशोक छाबड़ा, सुरेंद्र कुमार, रमेश सिंगरोहा, सोनू ग्रोवर, सुनील मराठा, राकेश पानू, रवि हसीजा, जोगेंद्र दूहन, सतीश जागलान, संदीप पौडिय़ा, नरेंद्र कुंडू, कुलदीप सिंह, रोहताश भोला, दिनेश शर्मा, सन्नी मग्गू, जितेंद्र अहलावत, ऋषि मेहंदीरत्ता, सुशील कुमार समेत लगभग सभी पत्रकार मौजूद थे।
 

जादूगोड़ा के पूर्व थाना प्रभारी दाडेल की मुश्किलें और बढ़ीं

डीआईजी एवं सीआईडी की जांच रिपोर्ट में दोषी पाए जाने के बाद, जादूगोड़ा थाना के पूर्व थाना प्रभारी नयन सुख दाडेल की मुश्किलें और बढ़ गयी है. पूर्व थाना प्रभारी नयन सुख दाडेल, जादूगोड़ा थाना के छोटा बाबू सुशिल डांगा, सिपाही संजय राम एवं मौभण्डार थाना के छोटा बाबू सीताराम सिंह पर जादूगोड़ा थाना में धारा 307/326/325/147/149/42/379/363/387/34 के तहत मामला दर्ज हो गया है. इन सभी पर जादूगोड़ा निवाषी संतोष कुमार अग्रवाल ने घाटशिला न्यायालय में शिकायत दर्ज कराई थी. 
 
थाने में मामला दर्ज होने के बाद जमशेदपुर चेंबर के अध्यक्ष मोहनलाल एवं अन्य ने थाना प्रभारी एवं अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी एवं बर्खास्तगी की मांग की है. उन्होंने कहा की इस संबंध में मुख्यमंत्री सहित सभी वरीय अधिकारियों को पत्र लिखा जाएगा. वहीँ झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएसन के अध्यक्ष संजीव दिवेदी ने कहा कि नयन सुख दाडेल को तत्काल पुलिस विभाग से बर्खास्त कर देना चाहिए और गिरफ्तार कर लेना चाहिए क्योंकि वे जनहित के लायक आदमी नहीं हैं, डीआईजी एवं सीआईडी के जांच रिपोर्ट में भी वे दोषी पाए गए हैं. 
 
नयन सुख दा़डेल के प्रकोप का शिकार बने संतोष अग्रवाल ने कहा कि उन्होंने अपने आँखों से दाडेल एवं उनकी टीम की हैवानियत को बर्दास्त किया है. सुशिल डांगा ने चाकू से उनके हाथ की नस काट दी थी जिसके कारण उन्हें चार दिन टाटा मुख्य अस्पताल में इलाज़ कराना पड़ा. भगवान की कृपा से उनकी जान बच गयी. आगे उन्होंने कहा कि सुशिल डांगा एवं संजय राम को जादूगोड़ा थाना से तत्काल हटा दिया जाना चहिए क्योंकि वे जादूगोड़ा थाना में रहते हुए जांच को प्रभावित कर सकते हैं.
 

 

महाराष्ट्र के हदगाव में पत्रकार के उपर हमला

महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर हो रहे हमले रूकने का नाम नहीं ले रहे हैं. दो दिन पहले नांदेड जिले के हदगाव में गावकरी के संवाददाता शिवाजी देशमुख पर जानलेवा हमला हुआ. अपने काम से लौट रहे शिवाजी को चार गुंडों ने पकड़ लिया और उनकी मारा पीटा. उन्हें चाकू से मारने की कोशिश की गयी लेकिन वार मोटरसाईकल पर लगने से शिवाजी बाल-बाल बच गये. तब तक स्थानीय लोग मदद के लिए दौड़ पड़े. लोगों को आता देखकर बदमाश भाग निकले. पता चला है कि एक शुगर फैक्टरी के कार्यक्रम में किसानो को नहीं बुलाने के खिलाफ खबर देने से इलाके के कुछ राजनेता नाराज थे. इसी कारण यह हमला किया गया. 
 
जब शिवाजी कम्प्लेन करने पुलिस स्टेशन गये तो इंस्पेक्टर राजा टेहेरे ने उनकी कम्प्लेन लेने से इन्कार किया. नांदेड के पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति के निमंत्रक केशव पाटील के एसपी से बात करने के बाद शिवाजी की कम्प्लेन ली गयी. लेकिन दूसरे दिन हमलावारों ने शिवाजी पर ही दुर्व्यवहार की तकरीर दी तथा उन पर चोरी का इल्जाम भी लगाया. इस फर्जी तकरीर से संतप्त हदगाववासियों ने पत्रकार के समर्थन में हदगाव बंद करके अपना क्रोध प्रकट किया. पत्रकार पर हमला होने के बाद शहरवासियों द्वारा शहरबंद करके हमले का विरोध करने की यह पहली घटना थी. लोगों के गुस्से को भांपकर पुलिस ने दो हमलावरों को गिरफ्तार किया है. 
 
इस हमले का महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती के अध्यक्ष एस.एम. देशमुख ने कड़े शब्दों में आलोचना की है. महाराष्ट्र में पिछले तीन साल में हुआ यह 313 वां हमला है. हमले बढते जाने के बावजूद भी सरकार कुछ नहीं कर रही है. इसके विरोध मे 9 दिसम्बर से नागपुर मे शुरू हो रहे महाराष्ट्र विधान सभा के अधिवेशनकाल मे आंदोलन करने का निर्णय पत्रकार हमला विरोधी समिति ने किया है. इस बीच जिस पीआई ने शिवाजी की तकरीर लेने से इन्कार किया था वह पीआई दस हजार की रिश्वत लेते हुए एन्टी करप्शन के शिकंजे में फंस गया. उसे अरेस्ट कर लिया गया है.

मैंने शर्मा जी की बात गांठ बांध ली और धार्मिक विषयों से तौबा कर ली

लेखन के पहले दौर में ही मुझे काफिर बना दिया गया था। एक लेख सरिता में लिखा था और एक पांचजन्य में लिखा था। कानपुर में इन दोनो लेखों पर बवाल हो गया। प्रदर्शन भी हुआ और अखबारों की प्रतियां भी जलाई गईं। यहां तक तो ठीक रहा मगर एक सांसद ने यह मामला लोकसभा में उठा दिया तो सरकार को लगा कि वास्तव में मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस लगी है।
 
इधर यह सब हो रहा था और उधर बिरादरी का एक खेमा जो मेरा विरोधी था इस खेमे में अधिकतर करखनदार थे जो बिरादरी पर अपना वचर्स्व चाहते थे इधर मेरी ओर बिरादरी का आम आदमी था। ये लेख उन के पल्ले पड़ गए तो उन्होने नमक मिर्च लगा कर मेरे खिलाफ फतवा ले लिया जिसमें मुझे काफिर करार दे दिया गया। उन लोगों ने यह फतवा भारी संख्या में हिंदी और उर्दू में छपवा कर जहां भी मेरे संपर्क थे उन सभी जगह भिजवा दिया ताकि मैं बिरादरी में अपनी गतिविधियां न चला सकूं। मगर इस फतवे का मेरी और मेरे समर्थकों की सेहत पर कोई असर नही पड़ा। हमारी सामाजिक गतिविधियां जारी रहीं। कारण यह था कि इन लोगों के जो भी विरोधी थे वे सब मेरे पास एकजुट हो गए.
 
उधर मामला सरकार के पास भी था तो पता नहीं किन किन विभागों के लोग मेरे पास आने लगे और कुरेद कुरेद कर पूछने लगे कि मैंने किस के कहने पर यह सब लिखा है। इन मेंकई अपने को सीआईडी का बताते तो कुछ एलआईयू का बताते तब मुझे इन बातों का पता नहीं था सो बहुत डर रहा था किसी से मदद भी नही मांग सकता था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। अपने लिखे पर पछता रहा था मगर जो छप गया उसे कैसे मिटाया जा सकता था। बिरादरी वालों से तो निपट लेता मगर सरकरी अमले से कैसे निपटा जाए यह समझ नहीं आ रहा था। कोई एक सरकारी सज्जन आए और मुझसे कहा कि मैं अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से कहूं। यह एक और नया तमाशा हो जाता। एक समस्या यह भी थी कि जेब में पैसा भी नहीं था। परिवार के लोग भी परेशान थे। घर पर रोजाना नए नए लोग आ रहे थे। हां कुछ जनसंघी और आर्य समाज के लोग मेरी बड़ी आव भगत करते थे मगर किसी प्रकार की सहायता वे भी नहीं कर पा रहे थे। मुख्य समस्या सरकारी अमले की थी उनका प्रयास यही था कि मैं किसी का नाम ले कर बता दूं कि उस के इशारे पर मैं ने लिखा था मगर ऐसा कुछ भी नहीं था तो उन्हें बताता क्या।
 
एक शर्मा जी थे, दादरी के ही रहने वाले थे। इंटर कालेज में वह संस्कृत पढाते थे। शर्मा जी को सीबीआई में नौकरी मिल गई तो वे कालेज छोड़ कर चले गए। एक दिन उन का बुलावा आया तो उन से घर पर मिला। शर्मा जी तब सीबीआई में डिप्टी डायरेक्टर थे। हुआ यह था कि मेरी फाइल शर्मा जी के पास इस आशय के लिए आई थी कि क्या धार्मिक भावनाओं को आहत करने का मामला बनता है। शर्मा जी ने बताया कि मामला गंभीर है फाइल मेरे पास आई तो मैंने तुम्हारा नाम देख कर इसे अपने पास ही रख लिया। शर्मा जी ने कहा कि अभी तुम्हारा कैरियर आरंभ भी नहीं हुआ और तुम ने यह बवाल कर दिया अगर फंस गए तो तुम्हारा पूरा परिवार बर्बाद हो जाएगा। ये अखबार वाले भी तुम्हारी मदद नही कर पाएंगे क्योंकि ये अपने बचाव में लग जाएंगे। मैं बहुत घबरा गया तो शर्मा जी ने कहा अब मामला मेरे पास है तो चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अगर मेरी मानो तो धार्मिक मामलों पर कलम चलानी बंद कर दो सामाजिक मामलों पर लिखो, तुम अच्छा लिखते हो। अब क्या होगा मैंने पूछा तो शर्मा जी ने कहा कि अब कुछ नहीं होगा मामला शांत हो जाएगा। मेरी रिपोर्ट पर ही आगे कुछ हो सकता है और मैं नहीं चाहूंगा कि मेरा कोई शिष्य संकट में फंसे। अब तुम निश्चिंत होकर जाओ और इस तरह के मामलों में टांग मत फंसाना।
 
शर्मा जी की बात में दम था क्योंकि मेरे पास न तो पैसा था और घर की हालत भी बहुत अच्छी नहीं थी। बिरादरी वाले पहले ही पीछे पड़े थे सो मैंने शर्मा जी की बात गांठ बांध ली और धार्मिक विषयों से तौबा कर ली। शर्मा जी अब इस संसार में नही हैं मगर उन्होने मुझ पर जो उपकार किया वह मैं नहीं भुला सकता ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। अगर शर्मा जी सहायता न करते तो पता नही मेरा क्या हाल होता।
 

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

 
 
 
 
 

विपक्ष के बाद अब सत्ताधीशों के निशाने पर सीबीआई

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इधर लगातार चर्चा में बना हुआ है। आम तौर पर राजनीतिक कारणों से इसकी ज्यादा चर्चा विपक्ष करता रहा है। मुख्य विपक्षी दल, भाजपा का नेतृत्व लंबे समय से कहता आया है कि सीबीआई अब ‘कांग्रेस जांच ब्यूरो’ की तरह काम कर रही है। क्योंकि, कांग्रेस का नेतृत्व अपनी सुविधा की राजनीति करने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल बड़ी बेशर्मी से करने लगा है। सीबीआई के तौर-तरीकों पर कई बार अदालतों ने तीखी नाराजगी जाहिर की है।
 
मई महीने में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने कोयला घोटाले जांच प्रकरण में सीबीआई की भूमिका पर टिप्पणी की थी कि जांच एजेंसी पिंजड़े में बंद ‘तोते’ की तरह वही बोलती नजर आती है, जो कि उसका मालिक (सरकार) चाहता है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद सीबीआई को लेकर एक लंबी बहस जारी रही है। यह अलग बात है कि कोयला घोटाला जांच प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय की तमाम फटकार के बावजूद अब सीबीआई ने कड़ा रुख अपना लिया है। उसका रुख इतना कड़ा हो गया है कि कोयला घोटाले की जांच का दायरा प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच चुका है। सीबीआई का यह हौसला अब केंद्रीय सत्ता में बैठे राजनीतिक आकाओं को काफी नागवार गुजरने लगा है। ऐेसे में, शांत स्वभाव वाले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी अब थोड़ा-थोड़ा गुस्सा आ गया है। उन्होंने सीबीआई को दो टूक शब्दों में हिदायत भी दे डाली है। राजनीतिक हल्कों में इस हिदायत के अलग-अलग निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। 
 
प्रधानमंत्री के बाद केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने कल इसी सेमिनार में कह दिया है कि अच्छा यही रहेगा कि सीबीआई के अधिकारी महत्वपूर्ण मामलों की जांच-पड़ताल का काम और लगन से करें। ये लोग नीतियों के बदलाव के पचड़े में ज्यादा न पड़ें। क्योंकि, यह देखना सीबीआई का काम नहीं है। वित्तमंत्री ने सीबीआई के कामकाज पर प्रधानमंत्री की तरह अपनी नाराजगी दर्ज कराई। लेकिन, उन्होंने कई मामलों में इस केंद्रीय जांच एजेंसी की जमकर वाहवाही भी कर दी। सीबीआई का गठन केंद्र सरकार ने 1963 में एक प्रशासनिक आदेश से किया था। इस जांच एजेंसी ने भ्रष्टाचार के कई अहम मामलों में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, लंबे समय से इसकी विश्वसनीयता को लेकर तमाम विवाद खड़े होते रहे हैं। आरोप यही लगता है कि यह केंद्रीय एजेंसी सरकार के आकाओं के इशारे पर ही नाचती है। इन्हीं आकाओं के इशारे पर कई बार विपक्षियों पर राजनीतिक कारणों से शिकंजा कसा जाता है। ऐसे मौकों पर सीबीआई सिर्फ एक ‘हथियार’ बन जाती है। 
 
पिछले दिनों गुवाहाटी (असम) उच्च न्यायालय की एक पीठ ने सीबीआई के गठन को ही असंवैधानिक करार किया है। इससे राजनीतिक हल्कों में खासी सनसनी फैली। एक याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस आधार पर सीबीआई के गठन को गैर-कानूनी करार किया क्योंकि, इसका गठन सरकार ने महज एक प्रशासनिक आदेश से किया था। इसके लिए कैबिनेट या संसद की कोई मंजूरी नहीं ली गई। सीबीआई अपना जांच कार्य ‘दिल्ली पुलिस स्टेब्लिस्मेंट एक्ट-1946’ के तहत आज भी करती है। इसी को आधार बना कर गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने फैसला दिया। इस निर्णय के बाद कई महत्वपूर्ण मामलों में आरोपी पक्ष ने ये दलीलें देनी शुरू कर दी थीं कि जब सीबीआई का गठन ही वैधानिक नहीं है, तो उसकी जांच के आधार पर उन्हें कैसे आरोपों के कठघरे में खड़ा किया गया है? इस तरह की कानूनी अफरा-तफरी की चुनौती खड़ी हुई, तो सरकार ने आनन-फानन इस आदेश को चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करा दी। 
 
छुट्टी वाले दिन मुख्य न्यायाधीश के घर अदालत लगी। विशेष सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायलय ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी है। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की अगली सुनवाई 6 दिसंबर को होनी है। सरकार की पहल पर भले सीबीआई को फौरी तौर पर राहत मिल गई हो, लेकिन इस प्रकरण से उसके कामकाज को लेकर तमाम हल्कों में जेर-ए-बहस खासी तेज हो गई है। सीबीआई गठन के 50 साल पूरे हुए हैं। ऐसे में, इसके स्वर्ण जयंती समारोह के मौके पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार भी आयोजित किया गया। इसका उद्घाटन करते हुए सोमवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सीबीआई के कामकाज के बारे में कई खरी-खरी टिप्पणियां कर डालीं। उन्होंने यहां तक कह डाला कि सरकार के नीतिगत मामलों में यह जांच एजेंसी सीधे हस्तक्षेप करने की कोशिश न करे। उसे अपने काम-काज की लक्ष्मण रेखा का ध्यान जरूर रखना चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि सरकारी कामकाज के दौरान किसी से कोई चूक होती है, तो उसे भ्रष्टाचार का मामला नहीं मान लेना चाहिए। बगैर, सबूतों के किसी अधिकारी के खिलाफ सीबीआई को घेरेबंदी की नीति से बाज आना चाहिए। 
 
राजनीतिक हल्कों में यही माना जा रहा है कि जिस तरह से सीबीआई ने पिछले दिनों कोयला घोटाले की जांच के मामले में अपना दायरा पीएमओ तक बढ़ा लिया है, इससे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह खुश नहीं हैं। दरअसल, 2006-09 के दौरान कोयला मंत्रालय का प्रभार प्रधानमंत्री के पास ही था। पिछले वर्षों में यह खुलासा हुआ है कि इसी कार्यकाल में कोयला ब्लॉक आवंटन में बड़े स्तर पर गोलमाल हुआ है। महालेखाकार एवं नियंत्रक (कैग) की रिपोर्ट में तो कहा गया कि इस घोटाले में 1.86 लाख करोड़ रुपए की धांधली हुई है। जब, ‘कैग’ ने इतनी बड़ी धांधली का जिक्र किया, तो राजनीतिक हल्कों में इसे ‘2जी स्पेक्ट्रम’ घोटाले से भी बड़ा करार किया गया। उल्लेखनीय है कि इस घोटाले में सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री भी शक के घेरे में रहे हैं। विपक्ष ने इनकी भूमिका पर तमाम आरोप लगाए हैं। यह कहा गया है कि कांग्रेस नेतृत्व ने अवैध ढंग से कोयला ब्लॉक आवंटन करके अरबों रुपए की उगाही कर ली है। 
सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में इस घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है। अदालत के निर्देश के बावजूद सीबीआई ने पड़ताल की ‘स्टेटस’ रिपोर्ट केंद्र सरकार के मंत्रियों से साझा कर ली थी। इस मामले में पहले तो सीबीआई निदेशक ने झूठ बोला था। यही कहा था कि अदालत में दाखिल करने के पहले इस रिपोर्ट को किसी को नहीं दिखाया गया। लेकिन, इसी बीच मीडिया में यह खुलासा हो गया था कि अदालत में रिपोर्ट दाखिल करने के पहले इसे सीबीआई निदेशक, तत्कालीन कानून मंत्री अश्विनी कुमार के पास ले गए थे। इतना ही नहीं उन्होंने पीएमओ के अधिकारियों से परामर्श करने के बाद इसमें कुछ फेर-बदल भी कराए थे। इस खुलासे के बाद अदालत ने नाराज होकर इस प्रकरण में सीबीआई निदेशक से शपथ पत्र मांग लिया था। अदालत का रुख बेहद कड़ा हुआ, तो सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा ने यह स्वीकार कर लिया कि उन्होंने रिपोर्ट का मसौदा कानून मंत्री को दिखाया था। इसमें उन्होंने कुछ संशोधन भी कराए थे। जब यह सच्चाई सामने आई, तो अदालत ने सीबीआई को फटकार लगाई थी और कानून मंत्री के रवैए के प्रति भी घोर नाराजगी जताई थी। इसी के चलते कानून मंत्री अश्विनी कुमार को सरकार से इस्तीफा देना पड़ा था। 
 
इस प्रकरण को लेकर संसद से लेकर सड़क तक मनमोहन सरकार की लंबे समय तक किरकिरी भी हुई थी। ‘तोते’ वाली अदालती टिप्पणी के चलते सीबीआई ने भी लंबी फजीहत झेली है। कोयला प्रकरण के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के जज सीबीआई अधिकारियों से बराबर कह रहे हैं कि जब उनकी निगरानी में वे लोग जांच कर रहे हैं, तो निर्भय होकर जांच करें। चूंकि, 2006-09 के दौरान ही कोयला ब्लॉक आवंटन में ज्यादा गड़बड़ियां हुई हैं, ऐसे में सीबीआई ने जांच के दायरे में पीएमओ को भी ले लिया है। जांच दल ने पीएमओ से कोयला आवंटन की कई फाइलें तलब कर ली हैं। ‘हिंडाल्को ग्रुप’ को ओडिशा में तलवीर कोयला ब्लॉक का आवंटन किया गया था। आरोप है कि यह फैसला पीएमओ के दबाव में आनन-फानन किया गया। इस दौर में कोयला मंत्रालय के सचिव पीसी पारेख थे। सीबीआई ने अब इस रिटायर अधिकारी को भी मामले में आरोपी बनाया है। 
 
सीबीआई ने कहा है कि कोयला सचिव रहते हुए पारेख ने ऐसी नीतियां जानबूझकर बनाईं, जिससे ‘हिंडाल्को ग्रुप’ को अपात्र होते हुए भी कोयला ब्लॉक मिल गया। इस मामले में कानूनी पारदर्शिता नहीं बरती गई। पारेख ने अपनी सफाई में यही कहा है कि सीबीआई को नीतिगत मामलों में सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। इनके पास इसके कोई सबूत नहीं हैं कि उन्होंने इस मामले में कोई भ्रष्टाचार किया है। फिर भी, उन्हें आरोपी बनाया गया है। दरअसल, पारेख के कामकाज के बहाने सीबीआई जांच की आंच सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच रही है। ऐसे में, सीबीआई पीएमओ के निशाने पर भी आ गई है। कोयला घोटाले के इसी प्रकरण में जाने-माने उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला को भी लपेट लिया गया है। पारेख और बिड़ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से सरकार की नाराजगी सीबीआई निदेशक के खिलाफ भी बढ़ने लगी है। 
 
दरअसल, सरकार की मुश्किल यह है कि घोटाले में कुमार मंगलम बिड़ला का नाम आने से उद्योग जगत की बड़ी लॉबी तुनक गई है। इस लॉबी ने सरकार पर दबाव बनाया है और कहा है कि यदि सीबीआई ने इस तरह से उद्योगपतियों को महज शक के आधार पर फंसाना शुरू किया, तो यहां कौन अपनी बड़ी पूंजी का निवेश करना चाहेगा? कोशिश की जा रही है कि किसी तरह से कुमार मंगलम बिड़ला का नाम इस मामले से हटा लिया जाए। लेकिन, मुश्किल यह है कि अब सीबीआई भी सरकार से ज्यादा दब नहीं रही है। उसकी एक मजबूरी भी है कि वह इस मामले में सीधे सर्वोच्च न्यायालय के लिए जवाबदेह है। 
राजनीतिक हल्कों में सीबीआई के कामकाज को लेकर प्रधानमंत्री की नाराजगी को अगले लोकसभा की चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा ने अपना ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी को बनाया है। वे देशभर में बड़ी भीड़ वाली जोरदार रैलियां कर रहे हैं। मोदी की मुहिम से कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती अचानक बढ़ गई है। सरकारी हल्कों में इस आशय की बहस तेज हुई है कि कहीं अगले चुनाव में मोदी के नेतृत्व में ही सरकार न बन जाए? क्योंकि, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन सरकार काफी बदनाम हो चुकी है। राजनीतिक तौर पर भी मोदी के मुकाबले मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का राजनीतिक करिश्मा कुछ शिथिल माना जा रहा है। यह अलग बात है कि 2002 के गुजरात दंगे मोदी को लगातार परेशान कर रहे हैं। क्योंकि, उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद मुस्लिम समाज में मोदी की स्वीकार्यता नहीं हो पा रही है। फिर भी, कांग्रेस की डावांडोल स्थिति को लेकर नौकरशाही भी अवसरवादी मूड में है। माना जा रहा है कि इसी स्थिति के चलते सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा भी कांग्रेस के हुक्मरानों के दबाव में आने को तैयार नहीं हैं। 
 
सीबीआई के कामकाज को लेकर तमाम राजनीतिक विवाद उठते रहे हैं। भाजपा नेतृत्व लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व केंद्र में समर्थन लेने के लिए सपा और बसपा जैसे दलों पर सीबीआई के जरिए दबाव बनवाता आया है। क्योंकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह और बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ सीबीआई आय से ज्यादा संपत्ति के मामलों की जांच करती आई है। इसी के चलते लंबे समय तक दोनों नेताओं को काबू में रखा गया है। यह अलग बात है कि अब सीबीआई ने इन मामलों में दोनों नेताओं को ‘क्लीनचिट’ दे दी है। इस बीच सीबीआई निदेशक ने भी दबाव बनाया है कि जांच एजेंसी को पूरी तौर पर स्वायत्ता मिलनी चाहिए। ताकि, एजेंसी बगैर दबाव के काम कर सके। उन्होंने माना है कि मौजूदा व्यवस्था में सीबीआई पर राजसत्ता का कुछ न कुछ दबाव रहता है, क्योंकि अभी तक सीबीआई सरकार की प्रशासनिक मशीनरी का ही एक हिस्सा है। सीबीआई निदेशक ने कह दिया है कि जब तक इसे कानूनी स्वायत्ता नहीं मिलेगी, तब तक खांटी निष्पक्षता से काम करना मुश्किल है। इस पर प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक नाराज माने जा रहे हैं। वित्तमंत्री ने तो साफ कर दिया है कि नीतिगत मामले को देखना सरकार का काम है। फिलहाल, सीबीआई की जो प्रशासनिक व्यवस्था है, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है। 
 
          लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

शुक्ला जी, यहां पीए सिर्फ समूह संपादक को ही मिलता है

अपने पास टेबल कुर्सी कभी नहीं रही पर लिखता बहुत था। एक काठ की बकसिया के ऊपर कागज रखता और चालू हो जाता। रोजाना एक या दो लेख तो लिखता ही। फिर जब संपादक हो गया तो स्टेनो मिल गया और कलम बंद। बोला और लिखा दिया। कंप्यूटर का युग आया तो उसके की बोर्ड को चलाना तक नहीं सीखा आखिर अपने पास पीए जो था। लेकिन जब चंडीगढ़, कोलकाता और कानपुर में संपादकी करने के बाद दोबारा दिल्ली आया तब पीए नहीं दिया गया। मैने तब के अपने समूह संपादक श्री शशिशेखर से कहा कि मुझे पीए दिया जाए वर्ना मैं लिखूंगा कहां से? उन्होंने कहा कि शुक्ला जी, यहां पीए सिर्फ समूह संपादक को ही मिलता है। देखिए किसी भी अन्य संपादक के पास नहीं है।

तब वहां मेरे अलावा श्री Govind Singh संपादक थे। वे कंप्यूटर के की बोर्ड पर काम कर लेते थे। मैने उनसे कहा कि गोविंद जी मुझे भी सिखा दीजिए। उन्होंने मुझे एक कागज पर बना हुआ की बोर्ड दे दिया जिसे मैने अपने डेस्कटॉप पर चिपका दिया और तीसरे ही दिन उनको खुद टाइप किया हुआ लेख दे दिया। रेमिंग्टन पर टाइप करने में मैं निष्णात हो गया। और इसके बाद तो धुंआधार चालू हो गया।

लेकिन आज Chandra Gaurav सुबह-सुबह घर आए और बोले सर आप इतना लिखते हैं तो सीधे यूनीकोड में लिखा करिए इससे जो आप चाणक्य में लिखकर कनवर्ट करते हैं उसका झंझट खत्म और फिर सीधे फेसबुक पर टाइप करिए। मैने कहा ठीक तुम मुझे सिखा दो। गौरव मुझे फोनेटिक के फोंट दे गए हैं तथा मेरे लैपटॉप को भी उसके अनुरूप कर दिया है। तो मित्रों मेरे कहने का आशय यह कि अब मैं फेसबुक पर इतना तेज लिख सकूंगा कि वैसे ही लोग मुझसे दुखी हैं अब और दुखी हो जाएंगे। हमारे मित्र Sanjaya Kumar Singh कहते हैं कि शंभू जी लोग तो बैल को आमंत्रित करते हैं आप तो सीधे-सीधे सांड़ों को लाल कपड़ा दिखा देते हो। अब जो होगा सो देखा जाएगा।

पर आप इतना समझ लो कि समझने और सीखने की मेरी क्षमता इतनी जबर्दस्त है कि मैने 53 साल में बाइक चलानी सीखी और 57 में कार चलाना। इतनी तेज चला लेता हूं कि शायद ही यमुना एक्सप्रेस वे पर मेरे से आगे कोई निकल पाता हो। सीखने की कोई उम्र नहीं होती और उत्साह जीवन में कभी मरता नहीं है। जिसका उत्साह मर गया वो समझो वो मरा हुआ ही पैदा हुआ।

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता, अमर उजाला समेत कई अखबारों में संपादक रहे शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

राडिया टैप केस : सुप्रीम कोर्ट के जज और ओपेन मैग्जीन के वकील के बीच वाकयुद्ध

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कल केंद्र और सीबीआई से उस अपील पर जवाब मांगा, जिसमें सरकार को गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) के निष्कर्षों पर कार्रवाई करने का आदेश देने की मांग की गई है। एसएफआईओ ने नीरा राडिया के टेप प्रकरण की जांच के बाद कुछ कारोबारी लेनदेन में गंभीर अनियमितताएं पाई हैं। न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति वी गोपाल गौड़ा की पीठ ने टाटा समूह के पूर्व प्रमुख रतन टाटा से भी एक सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।

टाटा ने राडिया के टैप्स की बातचीत सार्वजनिक न करने के लिए अपील दायर की थी। आदेश जारी करने के बाद मामला राडिया की बातचीत के टेप से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई के लिए 2 दिसंबर तक स्थगित कर दिया गया। इस पर ओपेन मैगजीन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने सुनवाई स्थगित किए जाने को लेकर कड़ी आपत्ति जताई।

धवन ने कहा कि न्यायालय को आज ही सुनवाई करनी चाहिए और टाटा की याचिका के खिलाफ पत्रिका की ओर से उन्हें दलील देने की अनुमति दी जानी चाहिए। लेकिन न्यायालय ने उनका यह अनुरोध ठुकरा दिया। इससे उद्वेलित धवन ने कहा यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं ऐसे समय में यह नहीं करना चाहता, जब न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो रहे हैं, लेकिन मुझे कहना पड़ रहा है कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आगे कहा कि आप मुझे अपील पर जवाब देने का मौका नहीं दे रहे हैं। यह अत्यंत मनमाना है।
   
धवन के तर्कों पर आपत्ति जताते हुए न्यायमूर्ति सिंघवी ने खुद को मामले से अलग कर लिया और कहा कि मामले को अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर पब्लिक इन्टरेस्ट लिटिगेशन ने अपनी अर्जी में जांच अधिकारी द्वारा एसएफआईओ के निदेशक को लिखे गए कथित पत्र का संदर्भ दिया है। साथ ही कहा गया है कि कथित गंभीर कॉरपोरेट जालसाजी कि जो मामले सामने आये हैं उनकी जांच की जरूरत है।
   
अनुरोध में यह भी कहा गया है कि शुरू में कंपनियों के पंजीयक (रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज-आरओसी) ने जांच की थी, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने एसएफआईओ को जांच के आदेश दिए थे। इसमें कहा गया है इन सभी की व्यापक जांच की गई और कई माह पहले भारत सरकार से शीर्ष कारपोरेटों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।
   
गैर सरकारी संगठन का आरोप था कि ये मामले उच्चतम न्यायालय द्वारा तय उन मुद्दों से अलग हैं जिनकी सीबीआई जांच के आदेश दिए गए हैं। आवेदन में कहा गया है कि इस तरह यह स्पष्ट है कि नीरा राडिया के टेलीफोन टैप करने से सामने आये तथ्यों की जांच को प्रभावित करने का प्रयास हो रहा है, ताकि ताकि शीर्ष कॉरपोरेट समूहों को बचाया जा सके।

 

अमर उजाला में इंक्रीमेंट : लखनऊ वालों पर मेहरबानी से बाकी यूनिटों के कर्मी नाराज

अमर उजाला में इंक्रीमेंट बंट गया है। वरिष्ठ उप संपादक से लेकर न्यूज एडिटर तक को। अमर उजाला उत्तर प्रदेश में तो स्टेट हेट इंदु शेखर पंचोली की ही चली है। उन्होंने लखनऊ यूनिट में 10 से 15 प्रतिशत इंक्रीमेंट करवाया है जबकि अन्य यूनिटों में दो से चार प्रतिशत ही इंक्रीमेंट मिला है। इस दोहरे व्यवहार से अमर उजाला के संपादतीय में उथल-पुथल की नौबत है। कई लोग इधर-उधर मुंह मार रहे हैं।

बनारस यूनिट में कई लोग दूसरे अखबारों के संपर्क में हैं। इंक्रीमेंट में दोहरे व्यवहार से कई लोग यह कहते फिर रहे हैं कि उन्हें लखनऊ के बजाय दूसरी यूनिट में रखा तो कंपनी ने। फिर उनके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों हो रहा है? क्या लखनऊ में महंगाई है और दूसरी जगह नहीं? इस संबंध में कई लोगों ने अमर उजाला के कर्ताधर्ता राहुल माहेश्वरी को चिट्ठी भी भेजी है।

एक पत्रकार की ओर से भेजी गई मेल पर आधारित. भड़ास तक आप भी अपनी बात पहुंचाएं, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

‘खबरें अभी तक’ से मीडियाकर्मियों के जाने का क्रम जारी

'खबरें अभी तक' नामक रीजनल चैनल से सूचना है कि यहां से मीडियाकर्मियों के जाने का सिलसिला लगातार जारी है. एसोसिएट प्रोड्यूसर अमित और एंकर रिपोर्टर अविनाश के चैनल छोड़ जाने के बाद एसाइनमेंट पर कार्यरत मुकेश मंडल ने भी इस्तीफा दे दिया. सीनियर एंकर सुंदर सोलंकी चैनल से आफ एयर हैं और वो आफिस नहीं आ रही हैं. उनके भी चैनल छोड़ने की खबर है. एंकर अनामिका पांडेय के भी जाने की चर्चाएं हैं.

बताया जाता है कि यहां दो साल में इनक्रीमेंट नहीं हुआ है. सिर्फ दो दो हजार रुपये बढ़ा दिया गया. जो बासेज बैठे हुए हैं, वे अपनी ही सेलरी-इनक्रीमेंट में लगे हुए हैं. विनोद मेहता के जाने के बाद आनंद हुड्डा आए थे पर वे भी चले गए. इनपुट और आउटपुट हेड ही चैनल का काम देख रहे हैं. 'खबरें अभी तक' चैनल 'समस्त भारतीय पार्टी' के सुदेश अग्रवाल का है और सारा कामधाम उनकी बहन के नाम से संचालित होता है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर भड़ास तक आपको अपनी कोई बात पहुंचानी है तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

वायस आफ लखनऊ में छंटनी व फेरबदल, अवंतिका और अश्विनी कुमार की नई पारी

वायस आफ लखनऊ अखबार से खबर है कि यहां प्रिंसिपल करेस्पांडेंट जयदीप भल्ला का ट्रांसफर कर उन्हें हेड आफिस से अटैच कर दिया गया है. साथ ही न्यूज एडिटर आलोक मेहरोत्रा, डीएनई एसपी सिंह, मीनाक्षी निगम और चेतन शुक्ला के बारे में जानकारी मिली है कि इनसे इस्तीफा ले लिया गया है.

इन सूचनाओं की आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हो पाई है. हालांकि मीनाक्षी निगम ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने न तो इस्तीफा दिया है और न ही उनकी छंटनी की गई है. वे अवकाश पर हैं. उनके बारे में जो भी चर्चाएं उड़ रही हैं, वो निराधार है.

बताया जाता है कि छंटनी से आफिस में काफी रोष है. साथ ही एडिटर पीएन मिश्रा के रवैये से भी मीडियाकर्मी नाराज हैं. संपादक पर आरोप है कि उन्होंने अपने चहेतों लोगों की सेलरी में इजाफा कराया है.

साधना न्यूज से सूचना है कि अवंतिका ने साधना न्यूज में बतौर क्रिएटिव हेड ज्वाइन किया है. वे कोबरा पोस्ट के अलावा कई बड़े चैनलों के साथ काम कर चुकी हैं.

अश्विनी कुमार ने दैनिक भास्कर, भटिंडा से इस्तीफा देकर नई पारी की शुरुआत दैनिक जागरण, लुधियाना के साथ सीनियर सब एडिटर के रूप में की है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

हरियाणा के पत्रकार संगठन ने प्रेस दिवस को रोष दिवस के रूप में मनाने की अपील की

सिरसा। हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष बलजीत सिंह ने प्रदेश भर के पत्रकारों से आहवान किया है कि 16 नवंबर (प्रेस दिवस) को रोष दिवस के रूप में मनाया जाए। ह्यूज नेता बलजीत सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री पिछले लंबे समय से पत्रकारों की मांगों पर गौर करने का कोरा आश्वासन देते आ रहे हैं, लेकिन जब अमली जामा पहनाने की बात आती है तो अपने अधिकारियों पर छोड़ देते है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में लगातार हो रहे पत्रकारों पर हमले सरकार की नाकामी का प्रतीक हैं, इसलिए सरकार को मीडिया प्रोटैक्शन एक्ट बनाना चाहिए और पत्रकार पर हमले को संज्ञेय अपराध घोषित करना चाहिए।

लंबे समय से मीडिया आयोग बनाने की मांग पर भी मुख्यमंत्री चुप्पी साधे हुए हैं। बलजीत सिंह ने कहा कि हर वर्ष पत्रकारों को अवार्ड देने की घोषणा की गई थी। लेकिन पिछले 9 सालों में केवल एक बार ही अवार्ड दिए गए है। और तो और इन अवार्डों में मुख्यमंत्री महोदय के भाई स्वर्गीय राजेन्द्र हुड्डा के नाम पर भी अवार्ड था। मगर मुख्यमंत्री तो अपने भाई के नाम को भी भूल गए हैं।

पत्रकार नेता बलजीत सिंह ने अपनी मांगों को पुन: दोहराते हुए कहा कि पत्रकारों को अन्य राज्यों की तरह टोल टैक्स से छूट दी जाए, एक्रीडेशन प्रणाली सरल की जाए, हर जिले में मीडिया सेंटर बनाए जाएं और प्रदेश में पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। बलजीत सिंह ने कहा कि हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने यह निर्णय लिया है कि 16 नवंबर प्रैस दिवस को रोष दिवस के रूप में मनाया जाए और उस दिन रोषस्वरूप बैठकें आयोजित कर सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किए जाए और उपायुक्त के माध्यम से अपने मांग पत्र सरकार तक भेजे जाएं।

प्रेस विज्ञप्ति

वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व भाजपा सांसद दीनानाथ मिश्र का निधन

भाजपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य और लेखक दीनानाथ मिश्र का बुधवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वह 76 वर्ष के थे. वह पिछले कुछ समय से बीमार थे और उन्हें हाल में एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. मिश्र वर्ष 1998 से 2004 तक सांसद रहे थे. उन्होंने अपना करियर पत्रकार के तौर पर शुरू किया था और वह वर्ष 1971 से 1974 तक आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक रहे थे. बाद में वह नवभारत टाइम्स के संपादक भी रहे.

वह मूलत: बिहार के गया के रहने वाले थे. वह वर्ष 1967 में अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गये थे. उनके परिवार में पत्नी, बेटा और तीन बेटियां हैं.उनकी मौत पर शोक जताते हुए भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि यह उनके लिए निजी क्षति है.

राजनाथ सिंह ने कहा कि एक सांसद के तौर पर दीनानाथ मिश्र ने ईमानदारी और मेहनती लोक सेवक के तौर पर जनता की सेवा की. अपनी अंतिम सांस तक, उन्होंने अपनी लेखनी से पत्रकारिता को नई ऊर्जा प्रदान की. उन्होंने कहा कि मिश्र एक विचारक, बुद्धिजीवी और समर्पित पार्टी कार्यकर्ता थे.

‘ए-वन तहलका’ नामक क्षेत्रीय चैनल पर से हरियाणा सरकार ने पाबंदी हटाई

पंचकूला : हरियाणा के क्षेत्रीय चैनल ए-वन तहलका हरियाणा से सरकारी पाबंदी हट गई है। प्रदेश के केबल आपरेटरों ने दोबारा इस चैनल का प्रसारण शुरू कर दिया है। दस नवम्बर की गोहाना रैली की समीक्षा से नाराज प्रदेश सरकार ने पुलिस तंत्र के जरिए इस चैनल का प्रसारण बंद करवा दिया था। हालांकि सरकार और चैनल प्रबंधन के बीच किन मुद्दों पर सहमति बनी है, यह ज्ञात नहीं हो पाया है। अब यह तो प्रबंधन और सरकार के नुमाइंदे ही बेहतर बता सकते हैं कि जब दोनों पक्ष बातचीत के लिए बैठे तो किन-किन मुद्दों पर विस्तार से चर्चाएं हुई। सवाल यह भी है कि क्या चैनल दोबारा उसी धार से समाचारों का प्रसारण और विश्लेषण करेगा,जैसा पहले करता था या फिर धार कुछ कम रहेगी।

हरियाणा कांग्रेस की दस नवंबर को गोहाना में शक्ति रैली हुई थी। इस रैली को मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। यही वजह रही कि प्रदेश का पूरा सरकारी तंत्र रैली को कामयाब करने में जुट गया था। ऐसे में कहीं पर भी कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही थी। दिल्ली और चंडीगढ़ तक के सो काल्ड संपादकों और पत्रकारों को हैलीकाप्टर से रैली में लाया गया। इसलिए अगर कोई मीडिया संस्थान रैली की कामयाब पर सवाल उठाए तो गुस्सा आना लाजिमी है। गुस्सा आया भी और उसका यह असर रहा कि दस तारीख से ही लगभग पूरे प्रदेश भर में पुलिस तंत्र के जरिए केबल आपरेटरों से चैनल को बंद करने के लिए कह दिया गया। बस फिर क्या था पूरे प्रदेश में चैनल का ब्लैकआउट हो गया। इसके बाद चैनल प्रबंधन दोबारा से चैनल का प्रसारण शुरू करवाने की प्रक्रिया में जुट गया था। सरकार के नजदीकी और आला अधिकारियों से संपर्क साधा गया और अंततः बात बन ही गई।

दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क: 09991680040

आई विटनेस न्यूज से संजय द्विवेदी गए, विनोद मेहता के आने की चर्चाएं

गुड़गांव : वरिष्ठ पत्रकार संजय द्विवेदी ने आई विटनेस न्यूज को टाटा-बाय बाय कर दिया है। वे इस चैनल में बतौर संपादकीय प्रमुख कार्य कर रहे थे। यह चैनल हरियाणा के कांग्रेसी विधायक रघुबीर सिंह कादियान का है। द्विवेदी के जाने के बाद एक बार फिर विनोद मेहता के आने की चर्चाएं चल पड़ी हैं। मेहता ने चार माह पहले ही 'खबरें अभी तक' चैनल से विदाई ली है।

आई विटनेज न्यूज चैनल का प्रसारण अभी मार्केट में शुरू नहीं हो पाया है। शुरू होने से पहले ही इस चैनल में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। दरअसल प्रबंधन का कुछ ज्यादा ही दखल है। इस वजह से मीडियाकर्मियों के लिए यहां सही माहौल नहीं है। कई माह पहले जगमोहन फुटेला जा चुके हैं। अब संजय द्विवेदी की बारी है। फुटेला तो कई तरह के आरोप लगाकर चैनल से बाहर हुए थे। उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर यह तक लिख दिया था कि मीडियाकर्मियों से संपादकीय कार्य के अलावा अन्य कार्य भी करवाया जाता है। इस बार संजय द्विवेदी के चैनल छोड़ने की क्या वजह रही, यह ज्ञात नहीं हो पाया है। पर द्विवेदी के जाने के बाद मीडिया बाजार में यह चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं कि जल्द ही विनोद मेहता इस चैनल की कमान संभाल लेंगे।

गुड़गांव से दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क: 09991680040

राहुल कंवल भी इंडिया टीवी जाने की तैयारी में!

टीवी टुडे ग्रुप में बहुत तेज चर्चा है कि राहुल कंवल भी अब इंडिया टीवी जाने की तैयारी में हैं. पिछले कुछ समय से राहुल कंवल लगभग पैदल की स्थिति में हैं. उनसे हेडलाइंस टुडे का कामकाज ले लिया गया है. वो हेडलाइंस टुडे जिसके बारे में कहा जाता है कि वो आज जहां भी है, राहुल कंवल की बदौलत है. कहा जा रहा है कि इंडिया टीवी वाले अंग्रेजी चैनल भी लाने की तैयारी में हैं. संभवतः उसके लिए राहुल कंवल का नाम फाइनल किया गया है.

राहुल चौधरी पहले ही इंडिया टीवी जा चुके हैं. संदीप सोनवलकर, बालकृष्ण, शमशेर सिंह समेत कई लोग इंडिया टीवी की राह पर हैं. हालांकि बालकृष्ण के बारे में चर्चा  है कि वे न्यूज नेशन जा रहे हैं. टीवी टुडे ग्रुप से लगातार लोगों के आने जाने का सिलसिला चल रहा है. जबसे आफिस नोएडा फिल्म सिटी शिफ्ट हुआ है तबसे करीब दो सौ लोग निकाले जा चुके हैं और करीब सौ लोगों ने खुद इस्तीफा दिया है. देखना है कि बदलाव की यह प्रक्रिया आजतक समेत ग्रुप के अन्य चैनलों को फायदा पहुंचाती है या नुकसान. हालांकि कहने वाले कह रहे हैं कि जिस तरह से रजत शर्मा इंडिया टीवी को फिर से न्यूज के ट्रैक पर लेकर जा रहे हैं उससे आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती आजतक को मिलने जा रही है.


उपरोक्त खबर पर राहुल कंवल के कुछ करीबियों ने भड़ास4मीडिया को फोन कर वस्तुस्थिति की जानकारी दी, जो यूं है…

टीवी टुडे ग्रुप से राहुल कंवल के जाने की खबर निराधार

राहुल कंवल के टीवी टुडे ग्रुप से जाने की चर्चाएं निराधार हैं. यह कहना है का राहुल कंवल के कुछ करीबियों का. भड़ास4मीडिया से बात करते हुए राहुल कंवल के एक करीबी ने बताया कि राहुल कंवल टीवी टुडे ग्रुप से कहीं नहीं जा रहे. वे पूरी निष्ठा और लगन के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं और आगे भी करेंगे. उनके इंडिया टीवी ज्वाइन करने संबंधी भड़ास पर प्रकाशित गासिप तथ्यों से परे है. राहुल की टीवी टुडे प्रबंधन या किसी अन्य से कोई शिकायत या विवाद नहीं है. जो कुछ भी राहुल कंवल के बारे में लिखा जा रहा है, वह मनगढ़ंत और अफवाह है.


भड़ास तक अपनी बात आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अमर उजाला कानपुर में न्यूज एडिटर बने संजय त्यागी, आजतक मुंबई से अमित त्यागी का इस्तीफा

दो सूचनाएं हैं. एक कानपुर से और दूसरी मुंबई से. कानपुर में अमर उजाला अखबार में संजय त्यागी ने न्यूज एडिटर के पद पर ज्वाइन कर लिया है. संजय दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण समेत कई अखबारों में और कई प्रदेशों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

मुंबई से खबर है कि आजतक के एसोसिएट प्रोड्यूसर अमित त्यागी ने इस्तीफा दे दिया है. चर्चा है कि अमित त्यागी नई पारी की शुरुआत स्टार प्लस चैनल में बतौर एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर करने जा रहे हैं. अमित त्यागी 13 वर्षों से मुंबई इंटरटेनमेंट मीडिया के जाने-पहचाने नाम हैं. वे टाइम्स नाऊ, एएनआई, जूम, स्टार न्यूज के साथ काम कर चुके हैं. अमित ने आजतक के बेहद लोकप्रिय शो 'सास बहू और बेटियां' को बनाया और निखारा.

मुंबई से अमित त्यागी टीवी टुडे के सभी चैनल्स के लिए टीवी का इनपुट देख रहे थे. आजतक मुंबई से पिछले छह महीने में दसियों लोग इस्तीफा दे चुके हैं. कहा जा रहा है कि दिल्ली में आजतक आफिस में चल रही उठापटक का असर मुंबई पर भी हो रहा है. आने वाले दिनों में कई और लोग आजतक मुंबई को अलविदा कह सकते हैं.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

हिंदुस्तान का पौड़ी कार्यालय लावारिस, प्रभारी लंबी छुट्टी पर

हिन्दुस्तान जिला मुख्यालय पौड़ी कार्यालय लावारिस हो गया है. इसके कामचलाऊ प्रभारी लंबी छुट्टी पर हैं. पौड़ी सहित धुमाकोट,लैसडौन, सतपुली, थलीसैण, बीरोंखाल की खबरों को एडिट करने के लिए पौड़ी के कामचलाऊ प्रभारी की जगह ऐसा आदमी काम कर रहा है जो कि पिछले पांच माह पहले ही पत्रकारिता के काम में आया है.

इतना जरूर है कि पौड़ी जिले में सुदूरवर्ती स्थानों पर ऐसे संवाददाता भी हैं जो कि अपनी लेखनी के लिए जाने जाते हैं, यहां तक कि ये संवाददाता फ्रन्ट पेज आल एडिशन भी छपते रहते हैं. मंडल व जिला मुख्यालय का यह मोडम कार्यालय पिछले तीन दिनों से लावारिस सा हो गया है. बताया जा रहा है कि इसके प्रभारी लंबी छुट्टी पर गए हैं लेकिन देहरादून कार्यालय ने इतने महत्वपूर्ण सेंटर पर किसी को नहीं भेजा, यह बात अपने आप में आश्चर्यजनक है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आजतक वाले दीपक शर्मा से उस दलाल पत्रकार ने क्या कहा….!

Deepak Sharma : सेर हैं तो सवा सेर भी हैं… राजनीति किसी मनमोहन, मोदी या मुलायम से नहीं चलती …..पत्रकारिता किसी अर्नब किसी बरखा से नहीं चलती… कहीं हुंकार भरता कोई केजरीवाल है, कहीं भड़ास निकालता कोई यशवंत और कहीं… पर कतरता कोई अनस भी है इस व्यवस्था में. जब ये हारने लगते हैं तो कोई जेठमलानी, कोई भूषण अदालत में उतर आता है… और जब अदालतें रुकती-सरकती हैं तो पीछे से कोई CAG कोई CBI में ही मर्द निकलकर झूठ के पांव पकड़ लेता है.

मित्रों सेर है तो सवा सेर भी है दुनिया में. कोई खुद पर गुमान ना करे क्यूंकि सबकी काट है. मंच पर चढ़कर अपने कुर्ते की आस्तीनें वो लोग चढ़ाते हैं जिन्हें अपनी ही आस्तीनों में सांप दिखते है. जिन्हें दूसरों की आस्तीने दिखती ही नहीं वो क्या बताएंगे इस देश को?.

मित्रों गुमान तो इंदिरा गाँधी का भी नहीं रहा था …उन्हें भी कोई जार्ज, कोई वाजपेई, कोई जेपी मिल गए थे. गुमान नस्ली वाडिया और जेआरडी टाटा का भी नहीं रहा.. उन्हें भी कफ परेड की सुनहरी गलियों में कोई धीरूभाई मिल गए थे. गुमान सत्ता से बड़े होते उन पत्रकारों का भी नहीं रहा जिन्हें किसी राडिया का आडियो टेप मिल गया.

मित्रों मैंने ये सच्चाई इसलिए लिखी क्यूंकि सत्ता के एक बड़े दलाल पत्रकार आज मुझसे कह रहे थे कि सरकार के मुखालिफ अब जो भी आया तो उसे निपटा दिया जायेगा…. वो चाहे सीबीआई का कोई अफसर हो या कोई पत्रकार या फिर पीआईएल करने वाला कोई व्याकुल कार्यकर्ता.

मित्रों डराने, धमकाने वाले ये दलाल जान ले कि सच के सीने में छुरी उतारने से सच मरता नही और बड़ा हो जाता है.

एक शेर अर्ज है बरेली के महबूब शायर वसीम भाई का.

खुली छतों के दिये कब के बुझ गए होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

मीडिया से आजम खां ने की बदसुलूकी, सम्मेलन से मीडिया वालों को बाहर निकाला

लखनऊ : अपनी तुनकमिजाजी और विवादों के कारण चर्चाओं में रहने वाले नगरीय विकास मंत्री आजम खां अब मीडिया से बदसुलूकी से भी बाज नहीं आ रहे। मंगलवार को उन्होंने लखनऊ के इन्दिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित प्रदेश भर के निकाय अध्यक्षों के सम्मेलन में मीडियाकर्मियों को बाहर करवा दिया। हालांकि, बाद में उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और मीडियाकर्मियों को सम्मान के साथ अंदर आने की अनुमति दे दी गई।

अखिलेश सरकार में पहली बार प्रदेश भर के निकाय अध्यक्ष एक साथ जुटे हैं। सम्मेलन के आयोजकों की ओर से मीडिया को बाकायदा लिखित में न्यौता दिया गया था। लेकिन, सुबह जब आजम खां सम्मेलन में पहुंचे तो उन्होंने हुकुम दिया कि सम्मेलन से खबरनवीसों को बाहर कर दिया जाए। आजम का कहना था कि वे तो इतने बुरे हैं कि उनकी हर बात खबर हो जाती है, लिहाजा यह ठीक रहेगा कि मीडिया से दूर ही रहा जाए। इस पर कार्यक्रम कवर करने गए मीडियाकर्मी बाहर आ गए। थोड़ी देर बाद आजम को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने मीडियाकर्मियों को अंदर आने की मंजूरी दे दी।
 

महिला पत्रकार ने शरद यादव की बोलती की बंद (देखें वीडियो)

बहुत सही जवाब दिया महिला पत्रकार ने.. शरद यादव की बोलती कर दी बंद.. ये महिला पत्रकार कौन हैं, मुझे नाम तो नहीं पता लेकिन ये जो भी हैं, बधाई के काबिल हैं… ऐसी ही आवाज, तेवर, विजन व खनक की जरूरत है… मध्य प्रदेश में डिंडोरी के बोंदर गांव में चुनावी सभा के बाद जब शरद यादव गाड़ी पर बैठकर चलने को हुए तो पत्रकारों ने उनसे बातचीत शुरू कर दी.

जाने किस बात पर शरद यादव बोल पड़े कि मीडिया में तो बेरोजगार लोग आते हैं. तब महिला पत्रकार ने कहा कि राजनीति में कैसे लोग आते हैं और आप राजनीति में क्यों आए? इस पर शरद यादव बोले कि वे देश सेवा के लिए आए हैं. महिला पत्रकार ने कहा कि मीडिया में हम सब जनता की आवाज उठाने के लिए आए हैं और आप हमें कह रहे हैं कि बेरोजगार लोग मीडिया में आते हैं जबकि खुद को बता रहे हैं कि सेवा करने राजनीति में आए हैं. इस पर शरद यादव की बोलती बंद सी हो गई… देखें वीडियो…. क्लिक करें

http://www.youtube.com/watch?v=eJMWDzPx1c0

जन टीवी राजस्थान में रिपोर्टरों को छः महीने से वेतन नहीं

यशवंत जी नमस्कार, भड़ास पर महुआ प्रबन्धन द्वारा कर्मचारियों के शोषण की खबर पढ़ी जिसे आपने प्रमुखता से उठाया था. ये हाल केवल महुआ का ही नहीं बल्कि सभी चैनलों का लगभग यही हाल है. मैं राजस्थान के एक चैनल जन टीवी में रिपोर्टर हूं. ये चैनल राजस्थान का है लेकिन इसमें चार पांच बुलेटिन बिहार और झारखंड के चलते हैं जिनमें बिहार और झारखंड के कुल मिलाकर 64 रिपोर्टर हैं. छः महीने से हम लोगों को एक भी पैसा ना तो वेतन मिला है ना ही किसी त्यौहार पर ही कोई राशि दी गयी है. ये चैनल जिस कंपनी का है वो जयपुर में कैम्पयू काम कम्पनी की सिस्टर कंसर्न है और पूरे बिहार झरखंड में ये सरकारी स्कूलो में कम्प्यूटर लगाती है और जयपुर में एक इजीनियरिंग कालेज भी चलाती है.
 
बिहार और झारखंड के किसी भी रिपोर्टर को पिछले जून माह से एक भी पैसा वेतन नहीं मिला है. इस बीच दुर्गापूजा और दीपावली जैसे बड़े त्यौहार आकर चले गये और उसमें भी हम लोगों को एक पैसा नहीं दिया गया. आप ही सोचिये कि हम लोगों की क्या स्थिति होगी. जैसे ही त्यौहारों का टाइम आता है बिहार और झारखण्ड ब्यूरो चीफ भूपेन्द्र दूबे बहाना बनाकर जयपुर स्थित मुख्यालय जाकर बैठ जाते हैं और कहते हैं कि एमडी से वेतन के लिए बात हो रही है. जबकि सच्चाई ये है कि सारा स्टाफ और ब्यूरो चीफ खुद अपना वेतन ले लेते हैं बस बिहार और झारखंड के रिपोर्टरों को ही भुगतान नहीं किया जा रहा है.
 
दुर्गापूजा और दशहरा इसी बहानेबाजी में बीतने के बाद हम लोग इस उम्मीद में थे कि दीपावली में तो हम लोगों को वेतन मिल ही जायेगा लेकिन अब तो दीपावली और छठ भी बीत गयी है और अभी भी वेतन मिलने की कोई सम्भावना नहीं दिख रही है. ब्यूरो चीफ फिर जयपुर जाकर बैठ गये हैं. छः महीने हो गये हैं और हम लोग बिना पैसों के काम किये जा रहे हैं. यशवंत जी प्लीज, आप हम लोगों के मुद्दे को प्रमुखता से उठायें और आगे रखें ताकि हम लोगों को न्याय मिल सके. पिछले छः महीने से एक भी पैसा ना मिलने से हम लोगों की हालत बहुत खराब हो चुकी है. आपसे बड़ी उम्मीद है. आप हमारी भी खबर प्रमुखता से रखें. 
 
एक पत्रकार द्वारा भेजा गया मेल

बिहार में शिक्षक भर्ती में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा

मोतिहारी: पूर्वी चंपारण में वर्ष 06-08 में हुए शिक्षक नियोजन में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े की खबर है. इसका खुलासा आरटीआई से मिली जानकारी से हुआ है. जिसके तहत हिन्दुस्तान दैनिक में खबर प्रकाशित होते ही डीपीओ, स्थापना भूषण कुमार के द्वारा संदिग्ध 26 शिक्षकों के वेतन पर रोक लगा दी गई. इनके साथ ही शिक्षा विभाग के निदेशक, पटना के निर्देश पर जिले के सभी 27 प्रखंडों के नियोजित शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की जांच की कवायद शुरु हो गई है.
 
 
इस विभागीय पहल से जिले के वैसे हजारों लोगों में न्याय की उम्मीद जगी है. जो कभी शिक्षक अभ्यर्थियों की कतार में शामिल थे. फिर भी, मेधा होने के बावजूद जाली प्रमाण पत्र वालों से पिछड़ कर रह गए. लेकिन यह जांच निष्पक्ष तरीके से होगी भी या नहीं इसको लेकर संदेह बना हुआ है. माफिया तंत्र के हावी होने के कारण शिक्षा विभाग भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा हुआ है. पहले भी दो बार प्रमाण पत्रों को जांच के लिए मंगाया गया था. पर जिले में ही मामला सलट लिया गया.
 
सूत्रों की मानें तो शिक्षकों की बहाली में विभागीय कर्मियों की मिलीभगत से एक रैकेट बना रेवड़ियों की तरह फर्जी प्रमाण पत्र बांटे गए थे. चोरी से लाए गए एक ही सादे प्रमाण पत्र व अंक पत्र की कापी करा सैकड़ों अभ्यर्थियों को नियोजित किया गया. इनमें अधिकांश के प्रमाण पत्र यूपी के सारनाथ, वाराणसी, देवरिया व गोरखपुर आदि कालेजों और इलाहाबाद बोर्ड से जारी बताए गए हैं. किसी-किसी के तो इंटर व स्नातक तक के प्रमाण पत्र जाली हैं. जिसको 'ककहरा' का 'क' लिखने नहीं आता वह भी मास्टर बन बैठा है. इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार जैसे पिछड़े प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की क्या स्थिति है. लेकिन विडंबना ही है कि इसकी जांच सही तरीके से नहीं कराई जाती. बताया जाता है कि इनकी बहाली कराने वाले रैकेट के माध्यम से संबंधित कालेजों व शिक्षा विभाग को मैनेज कर मामले को दबा दिया जाता है. इसके लिए फर्जी शिक्षकों से मोटी रकम की उगाही की जाती है.
 
पहले भी जिले के 83 फर्जी शिक्षकों को निलंबित किया गया था. लेकिन बावजूद इसके वे काम करते हुए वेतन उठा रहे हैं. ऐसे में यदि जिले के तमाम प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया संगठित हो मिशन की तरह इसके बारे में रिपोर्टिंग करें तो सकारात्मक परिणाम मिल सकता है.
 
मोतिहारी से एक पत्रकार की रिपोर्ट

क्या ‘आधार’ का कुछ आधार था?

कुछ समय पहले तक यानी सर्वोच्च न्यायालय का महत्त्वपूर्ण आदेश आने  से पहले पूरे देश में आधार कार्ड को लेकर बड़ी उथल  पुथल मची। कहा गया कि आधार कार्ड हर सरकारी कार्य  के लिए जरुरी है। मामले  मे सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप  करने तक युआईडी (आधार कार्ड) को लेकर सरकार का रवैया  अजीबोगरीब बना हुआ था, संसद में सरकार कुछ कह रही थी, मीडिया के सामने कुछ और न्यायालय में कुछ और, सरकार ऐसा क्यूँ कर रही थी यह तो आज भी एक पहेली है। जिसका जवाब न जनता को मिला और न ही मीडिया कुछ तलाश कर पायी। बस सवाल, सवाल और सवाल।
 
वहीँ सरकार  से जब पूछा गया कि यूआईडी का खूफिया विभाग या काउंटर इंटेलीजेन्स से कोई रिश्ता है तो सरकार ने चुप्पी साधे रखी। सरकार यहीं से सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई, आखिर सरकार आधार को लेकर रहस्यात्मक मुद्रा में क्यों थी? और सरकार एवं यूआईडीआईए ने विदेशी कंपनियों के साथ हुए समझौते को कई सालों तक छिपा कर क्यों रखा?
 
हालांकि सरकार की इस योजना पर सर्वोच्च न्यायालय ने पानी फेर दिया है। पर फिर भी यह योजना  अपने पीछे कई बड़े और महत्त्वपूर्ण सवाल छोड़ गयी है। इतने सारे पहचान प्रमाण पत्र होने के बाद भी आधार कार्ड की क्या जरुरत पड़ी, यह आज भी हर किसी के लिए सवाल है। कह सकते हैं कि सरकार द्वारा बोझ पर और बोझ लादा जा रहा था।
 
अगर सरकारी योजनाओं और नीतियों की बात करें तो उसका फायदा जनता को मिल ही रहा था, फिर आधार की क्या आवश्यकता पड़ी? क्या सरकार आम जनता को आधार के माध्यम से बेवकूफ बना रही थी, और अगर ऐसा नहीं था तो 50 हजार करोड़ की लागत वाली इस परियोजना को व्यवहार में लाने से पहले लोकसभा में विधेयक पेश कर स्वीकृति क्यों नहीं ली गयी। जाहिर है इतनी बड़ी परियोजना का मकसद महज सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े लोगों को लाभ पहुंचाना था और कुछ नहीं। विडम्बना तो यह है कि 18 हजार करोड़ रुपये खर्च करके अब तक केवल 22 करोड़ आधार पहचान पत्र ही बनाए गए हैं, कुल जनसंख्या का लगभग 21 फीसदी। महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में तो इस कार्ड को लोककल्याणकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य कर दिया गया था।      
 
सरकार आधार को लेकर क्या करना चाहती थी यह तो अब तक साफ़ नहीं हो पाया है, पर एक बात साफ़ है कि सरकार की नीयत साफ़ नहीं थी। जिन तीन कम्पनियों (असेंचर, महिंद्रा सत्यम मोर्फो, और एल-1 आइडेन्टिटी सोलुशन कम्पनी) को आधार कार्ड बनाने का काम सौंपा गया था। उसमे से एल-1 आइडेन्टिटी सोलुशन के टॉप प्रबंधन में वो लोग हैं जिनका सम्बन्ध कहीं न कहीं अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैनिक संगठनो से है. यह अमरीका की सबसे बड़ी डिफेंस कम्पनियों में से एक है जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रोनिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है। अमेरिका के सैनिक विभाग और स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कम्पनी के पास हैं। इन तीन कंपनियों में से किसी एक का सम्बन्ध विभिन्न विभागों से रहा है जिनमें आर्मी टेक्नोलोजी साइंस बोर्ड, आर्मी नॅशनल साइंस सेंटर एडवाइजरी बोर्ड और ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी जैसे संगठनों से हैं। यहाँ एक बेहद जरुरी सवाल खड़ा हो जाता हैं कि आखिर सरकार इन कम्पनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारी देकर क्या करना चाहती है? क्या सरकार यह चाहती थी कि पूरे तंत्र पर इनका कब्जा हो जाए?
 
साफ तौर  पर देखा जाए तो इस कार्ड को बनाने में हाई लेवल बायोमैट्रिक और इन्फोर्मशन टेक्नोलोजी का इस्तेमाल किया जाता है, क्या इससे नागरिकों की प्राइवेसी का हनन नहीं होता? क्या उनके द्वारा दिए गए आंकड़े सार्वजनिक नहीं होते? और हमारे देश के विकास पर इसका विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता? पर हमारी सरकार शायद इन सबसे अनभिज्ञ थी, तभी तो ऐसा काम करने जा रही थी। पर विकसित देशों को इसका गलत परिणाम दिखने लगा था, तभी तो उन्होंने इसका विरोध किया। देश की आतंरिक सुरक्षा बनी रहे, इसलिए जर्मनी, अमरीका और हंगरी ने अपने कदम पीछे खींच लिये। इंग्लैण्ड में आधार की यही योजना आठ सालों तक चली, पर समय रहते ही सरकार ने कदम उठाया और 800 मिलियन पौंड बचा लिए, जिन्हें विकास के दूसरे कार्यों में लगाया जा सकेगा।
 
आपको याद होगा महात्मा गाँधी ने अपना पहला सत्याग्रह, 22 अगस्त 1906 में किया था, तब दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने भी ऐसा ही एक क़ानून जारी किया था। जिसका नाम था एशियाटिक लॉ अमेंडमेंट, इसके तहत ट्रांसवाल इलाके के सारे भारतीयों को रजिस्ट्रार ऑफिस जाकर परिचय पत्र बनवाने के लिए अपने फिंगर प्रिंट्स देने थे, सरकार की ओर से इस पत्र को हमेशा अपने पास रखने की हिदायत भी दी और न रखने पर सजा भी तय कर गयी थी। गांधी जी को यह बात नहीं भा रही थी, उन्होंने इसका बड़े पैमाने पर विरोध किया और इस क़ानून को 'काले कानून' की संज्ञा दी। उसी गाँधी के देश में बन रहा था एक और "काला क़ानून", सोचिये अगर आज बापू होते तो क्या करते?
 
आधार एक ऐसी योजना कही जा सकती है, जिसका व्यवहार में आना किसी भी रूप में देश की सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि इसके बनाये जाने के कानून इतने सरल हैं कि अब तक लाखों अवैध घुसपैठिए भी देश का नागरिक होने की वैधता हासिल कर चुके हैं। दरअसल अगर इसके बनाये जाने पर नज़र डालें तो पता चलता है कि किसी भी व्यक्ति के पास पतें ठिकाने की कोर्इ भी मामूली पहचान है या वह किसी राजपत्रित अधिकारी से लिखवाकर देता है कि वह उसे जानता है, तो महज इस आधार पर आधार कार्ड जारी कर दिया जाता है। तो अंदाजा लगा लीजिये की हमारे देश में एक ही पते पर कितने लोगों का पंजीकरण है। अब यहाँ यह भी सवाल उठता है, कि इतनी बड़ी योजना जिसे सरकार अपनी सभी नीतियों से जोड़ने की बात कर रही थी, को बनाए जाने के लिए इतने सरल नियम?
 
दरअसल आधार योजना की शुरूआत अमेरिका में आतंकवादियों पर नकेल कसने के लिए हुर्इ थी।  2001 में हुए आतंकी हमले के बाद खुफिया एजेंसियों को छूट दे दी गर्इ कि वे इसके माध्यम से संदिग्ध लोगों की पैरवी करें। वह भी केवल ऐसी 20 फीसदी आबादी की, जो अमेरिका में प्रवासी हैं और जिनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं। परन्तु हमारे देश में देखिये यहां इस योजना को पूरी आबादी पर लागू किया जा रहा है। इससे साफ़ हो जाता है कि देश का वह गरीब संदिग्ध है, जिसे रोटी के लाले पड़े हैं। अर्थात हम और आप सरकार की नज़रों में संदिग्ध हैं।
 
हालांकि इस योजना का विरोध विभिन्न गैर सरकारी संगठन कर रहे थे यहाँ तक कि पी चिदंबरम ने गृहमंत्री रहते इस योजना का पुरजोर विरोध करते हुए इसे खतरनाक आतंकवादियों को भारतीय पहचान मिल जाने का आधार बताया था। लेकिन वित्तमंत्री बनते ही उनका सुर बदल गया और उन्होंने इस योजना को जरुरी बताना शुरू कर दिया। महज आधार संख्या की सुविधा नागरिक के सशक्तीकरण का बड़ा उपाय अथवा आधार नहीं बन सकता। यदि ऐसा संभव हुआ होता तो मतदाता पहचान पत्र मतदाता के सशक्तीकरण और चुनाव सुधार की दिशा में बड़ा कारण बनकर पेश आ गया होता। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 23 सितम्बर 2013 को केंद्र सरकार द्वारा आधार योजना को स्वैच्छिक बताने के बाद एक महत्त्वपूर्ण फैसला लेते हुए कहा कि कार्ड नहीं होने की स्थिति में देश के किसी भी नागरिक को परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह एक स्वैच्छिक योजना है। जस्टिस बीएस चैहान की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी अवैध विस्थापित को आधार कार्ड नहीं जारी किया जाना चाहिए। आधार कार्ड के बिना किसी भी कर्मचारी को वेतन व भत्ते नहीं मिलेंगे के तर्ज को ख़ारिज करते हुए अदालत ने कहा कि प्राधिकरण आधार कार्ड नहीं होने की स्थिति में नागरिक को किसी सेवा या लाभ से वंचित नहीं किया जाएगा।
 
            लेखक अश्विनी कुमार एक निजी कंपनी में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं. वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का कार्य भी करते हैं. उनसे संपर्क ashwanikumar332@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.
 

चुनावी सियासत हुई तेज: मोदी और कांग्रेस के बीच चलने लगे जहरबुझे तीर

चार राज्यों में विधानसभा चुनावों की राजनीतिक गहमा-गहमी ने जोर पकड़ा है। छत्तीसगढ़ में तो पहले चरण का मतदान कल हो भी गया। माओवादियों की तमाम चुनौतियों के बावजूद बस्तर इलाके में 60 प्रतिशत से ऊपर मतदान हो गया। इसको लेकर कहा जा रहा है कि बैलेट, बुलेट पर भारी पड़ा। तमाम धमकियों को ठेंगा दिखाकर स्थानीय आदिवासियों ने मतदान करने का जज्बा दिखाया है। इस अद्भुत साहस की सबको मिलकर सराहना करनी चाहिए। लेकिन, जान हथेली पर लेकर वोट डालने की हिम्मत दिखाने वालों को मिलकर सलाम करने की बजाए, भाजपा और कांग्रेस में इसका खुद श्रेय लेने की होड़ लग गई है। 
 
भाजपा के नेताओं ने दावा करना शुरू किया है कि उनकी सरकार के पुख्ता प्रबंधन के चलते ही स्थानीय मतदाता गोलीबारी के बीच भी मतदान करते रहे। जबकि, कांग्रेसियों ने अलाप लगाया है कि केंद्र सरकार ने यहां चुनाव के लिए करीब 1 लाख केंद्रीय सुरक्षा बल लगाए थे। इसी के चलते इतने बड़े पैमाने पर मतदान हो पाया है। हौसला स्थानीय आदिवासियों ने दिखाया, लेकिन इसकी वाहवाही लूटने के लिए राजनीतिक बेशर्मी शुरू हो गई है। इस बीच भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के नेताओं के बीच जुबानी जंग भी तेज होने लगी है। एक-दूसरे के खिलाफ तीर-तुक्के ‘मिसाइलों’ की तरह छोड़े जा रहे हैं। 
 
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की एक चुनावी रैली में मोदी की तरफ कटाक्ष किया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा के कुछ नेता तो अब इतिहास-भूगोल को भी तोड़-मरोड़ कर पेश करने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि पटना की रैली में मोदी ने देश का गौरवशाली इतिहास बताने के चक्कर में कुछ तथ्यात्मक गलतियां की थीं। इनको लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी को अज्ञानी साबित करने की कोशिश की। इस मामले को लेकर कांग्रेसी नेता भी तीखे कटाक्ष करते रहे हैं। इसी संदर्भ में मनमोहन सिंह ने भी मोदी पर निशाना साध लिया। अपने तेज-तर्रार तेवरों के लिए चर्चित हो चुके मोदी ने खेड़ा (गुजरात) के एक कार्यक्रम में जमकर पलटवार किया। उन्होंने प्रधानमंत्री से सवाल किया कि 26 सितंबर 1932 में वे जिस गांव में पीएम जी पैदा हुए थे, उस दौर में यह इलाका हिंदुस्तान में था। लेकिन, अब पाकिस्तान का हिस्सा है। आप देश को बताइए कि किन लोगों की राजनीति के चलते देश का यह भूगोल बदला?
 
मोदी ने सवाल किया कि स्वतंत्रता के आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान करने वाले पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल को उनकी मृत्यु के 41 साल बाद ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया, ऐसा क्यों? जबकि, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी को उनके जीवनकाल में ही यह सम्मान दे दिया गया। आखिर, कांग्रेस को यह भी बताना पड़ेगा कि यह किस किस्म का इंसाफ है? मोदी ने यह भी सवाल उठाया कि संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को आजादी के 33 सालों बाद ‘भारत रत्न’ से क्यों नवाजा गया? इतिहास के साथ क्या यह छल कांग्रेस ने नहीं किया? यहां तक कि आजादी के आंदोलन के नायक रहे ‘लाल-बाल-पाल’ (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक व विपिन चंद्र पाल) को किसने भुलाने की कोशिश की? यदि आजादी के आंदोलन के इन नायकों को भाजपा सम्मान देना चाहती है, तो कांग्रेस को क्यों अखर रहा है? 
 
केंद्रीय कानून मंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि कई मौकों पर देश को पता चल गया है कि भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ मोदी कितने अधकचरे ज्ञान वाले हैं? उन्हें तो इतिहास-भूगोल की तमाम ऐसी जानकारियां भी सही-सही नहीं हैं, जो कि हाईस्कूल में पढ़ने वाले किसी छात्र को हो जाती हैं। सिब्बल ने कहा है कि मोदी को देश के सामने बताना चाहिए कि शिक्षा, आर्थिक व विदेश नीति के प्रमुख मामलों में उनका क्या खास राजनीतिक दृष्टिकोण है? यदि वे इन मुद्दों पर देश को कुछ खुलकर बताएं, तो जनता अच्छी तरह समझ लेगी कि ‘भाजपा के पीएम’ सचमुच में कितने ज्ञानी हैं? सिब्बल के इस कटाक्ष को लेकर भाजपा के कई नेताओं ने आक्रामक निशानेबाजी शुरू कर दी है। 
 
उल्लेखनीय है कि मोदी इन दिनों देश के विभिन्न हिस्सों में जोरदार रैलियां करते घूम रहे हैं। उनका खास जोर चुनावी राज्यों पर है। चूंकि, विधानसभा के ये चुनाव लोकसभा चुनाव के महज चंद महीने पहले हो रहे हैं। इसीलिए, ये चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच खास प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गए हैं। मोदी के सिपहसालार दावा कर रहे हैं कि इन चारों राज्यों में भाजपा, कांग्रेस को चुनावी शिकस्त देने जा रही है। 8 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने हैं। इसके बाद देश की चुनावी तस्वीर बदली नजर आएगी। कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफजल कहते हैं कि किसी दल के नेता ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ देखना चाहते हैं, तो भला उन्हें कौन रोक सकता है? उनका सवाल है कि आखिर, मोदी जैसे नेता के हाथ में देश की एकता कैसे कायम रह सकती है? क्योंकि, ये महाशय खुद पिछले दिनों ‘रायटर’ से एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि वे हिंदू राष्ट्रवादी नेता हैं। इस पर उन्हें गर्व है। भला, इस तरह की संकीर्ण सोच वाला शख्स सभी को साथ लेकर कैसे चल सकता है?
 
भाजपा नेतृत्व इस दौर में नरेंद्र मोदी की छवि को संवारने के अभियान में जुट गया है। इसी रणनीति के तहत पार्टी के कई नेता मीडिया से लेकर उन नेताओं की खबर लेते हैं, जो कि मोदी को गुजरात दंगों के हवाले से ‘दंगाई पुरुष’ साबित करने की कोशिश करते हैं। 6 नवंबर को अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार ‘द हिंदू’ में वरिष्ठ पत्रकार एन. राम का एक लेख छपा था। इसमें उन्होंने लिखा था कि कैसे 2002 के दंगों से मोदी मुक्त नहीं हो सकते? उन्हें क्यों देश का एक वर्ग तमाम सफाई के बावजूद सेक्यूलर नेता के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता? इन धारदार तर्कों से शायद भाजपा का नेतृत्व काफी आहत हुआ है। ऐसे में, इसी अखबार में कल एक लेख भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर का छपा है। इसमें उन्होंने मोदी के मुकाबले कांग्रेसियों को ज्यादा बड़ा दंगाई साबित करने की कोशिश की है।
 
जावड़ेकर ने सवाल किया है कि 2002 के गुजरात दंगों की बहुत बात की जाती है। लेकिन, ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि 1969 में कांग्रेसी सरकार के दौरान अहमदाबाद में भयानक दंगे हुए थे। इनमें करीब 1500 मुसलमान मारे गए थे। इसी तरह कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ही 1987 में भागलपुर (बिहार) में हुए दंगों में करीब 1000 मुसलमान मारे गए थे। 1984 में सिख विरोधी दंगों में 8000 से ज्यादा सिखों का नरसंहार हुआ। इस कुकृत्य में तो मुख्य हिस्सेदारी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की थी। कांग्रेसियों को ये तथ्य क्यों नहीं याद आ रहे? जावड़ेकर ने अपने इस लेख में इस बात का भी उल्लेख किया है कि 2002 में गुजरात दंगों के दौरान पुलिस और सेना ने दंगाइयों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की थी। इसी के चलते 170 दंगाई सुरक्षाबलों के हाथ मारे गए थे। जबकि, सिख विरोधी दंगों में तो उनकी जानकारी के मुताबिक पुलिस के हाथों एक भी दंगाई नहीं मारा गया। ऐसे में, किस मुंह से यह आरोप लगाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने दंगाइयों को गुजरात में खुली छूट दी थी? 
 
भाजपा प्रवक्ता ने यह भी तर्क दिया है कि कांग्रेस के लोग और कुछ बुद्धिजीवी अपने पूर्वाग्रहों के चलते मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने की कोशिश करते रहते हैं। जबकि, सच्चाई यह है कि गुजरात में मुस्लिम आबादी महज 10 प्रतिशत के आसपास है। लेकिन, इस राज्य में पुलिस के अंदर मुसलमानों की भागीदारी करीब 12 प्रतिशत है। जबकि, पश्चिम बंगाल में जहां मुस्लिम आबादी करीब 25 प्रतिशत है, वहां पर सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी महज 3 प्रतिशत है। जबकि, इस राज्य में 35 सालों तक वाम मोर्चा की सरकार रही है। इस समय भी खांटी सेक्यूलर तेवरों वाली तृणमूल कांग्रेस का राज है। ऐसे में, सवाल है कि मुसलमानों के साथ नाइंसाफी कहां हो रही है? यह सोचने का विषय है। 
 
पिछले दिनों नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ की एक रैली में लोगों को अगाह किया था कि वे कांग्रेस के ‘खूनी पंजे’ से सावधान रहें। यदि इसके साये से बचना है, तो भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल का बटन दबा दें। मोदी की इस टिप्पणी की शिकायत कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव आयोग में की है। जबकि, इसके पहले राहुल गांधी की एक बहुचर्चित ‘आईएसआई’ वाली टिप्पणी पर भाजपा ने ऐतराज जताया था। उसने भी इसकी शिकायत चुनाव आयोग में की थी। अब इन दोनों मामलों पर आयोग ने अपनी कार्रवाई शुरू की है। इस बीच कांग्रेस के अंदर यह बहस भी तेज हुई है कि मोदी, पार्टी के लिए कितनी बड़ी राजनीतिक चुनौती हैं? जून में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था। शुरुआती दौर में कांग्रेस ने यही रणनीति बनाई थी कि मोदी को ज्यादा भाव न दिया जाए। यही जताया जाए कि कांग्रेस उन्हें अपने लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं मानती। क्योंकि, पार्टी उन्हें महज क्षेत्रीय नेता मानती है। इसी रणनीति के तहत शुरुआती दौर में मोदी के उठाए गए सवालों का जवाब कांग्रेस अपने गुजरात के नेताओं से दिलाती थी। लेकिन, यह रणनीति मोदी के बढ़ते राजनीतिक तूफान के आगे टिक नहीं पाई है, तो कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने अब सामूहिक रूप से मोदी की खबर लेनी शुरू की है। लेकिन, इस बात को लेकर अभी बहस जारी है कि वाकई में मोदी, कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बने हैं या नहीं? पिछले दिनों केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने गोवा के एक समारोह में कह दिया कि नरेंद्र मोदी कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। वे इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन, कल केंद्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे के सुर-ताल इस प्रकरण में एकदम बदले नजर आए। उन्होंने मीडिया से यह तक कह डाला कि वे मानते हैं कि मोदी, कांग्रेस के लिए कतई चुनौती नहीं हैं। उन्होंने चिदंबरम की टिप्पणी के बारे में तो चुप्पी साधी। लेकिन, यह जरूर जोड़ा कि वे जो कुछ कह रहे हैं, यही पार्टी की आधिकारिक लाइन है। बहरहाल, इस चुनावी दौर में जेर-ए-बहस का मुख्य मुद्दा मोदी के आसपास घूमने लगा है। दोनों दल एक-दूसरे की जमकर खबर लेने के चक्कर में शब्दों की मर्यादा का पालन करना भी जरूरी नहीं समझ रहे।
 
         लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है

मोदी-बीजेपी के करीब होने संबंधी मेल व खबरों का कुमार केतकर ने खंडन किया

दिव्य मराठी के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर ने उस मेल को फर्जी बताया है जिसमें कहा गया है कि वे मोदी और भाजपा के करीब हो गए हैं. उन्होंने बताया है कि वे मोदी से मिले लेकिन भाजपा के करीब जाने या भाजपा ज्वाइन करने के लिए नहीं बल्कि दिव्य भास्कर में प्रकाशित एक भ्रामक खबर को लेकर खेद प्रकट करने के लिए. किसी ने जब कुमार केतकर को मेल करके भाजपा-मोदी से नजदीकी संबंधी मेल व खबरों के बारे में पूछा तो केतकर ने जो जवाब दिया वो यूं है…

''It seems you thought I would be angry by reading the news of my meeting with Modi, but I didn't. Bhagvadgita has taught me to ignore such things and Sonia ji always went ahead by merely ignoring such propaganda. Actually I denied meeting Modi, because altogether different conclusion has been drawn from our visit. I met Modi to tender apology on behalf of Divya Bhaskar group for misleading news published in Divya Bhaskar regarding Modi's statement related to Patel's funeral. Also being hard-core journalist I always appreciate Modi's developmental model, his leadership qualities, his speedy governance. But it doesn't mean that I can ignore Godhra violence and carnage of Muslims in Gujarat. Courtesy demanded that you circulate my response to all.''

आजतक में अंदरखाने काफी कुछ उठापटक, शम्स दंडित, अमिताभ कहेंगे गुडबॉय

खबर है कि आज तक क्राइम टीम के हेड पद से शम्स ताहिर खान को हटाकर प्रोग्रामिंग टीम में भेज दिया गया है. उनकी रिपोर्टिंग प्रोग्रामिंग टीम हेड संजय सिन्हा को होगी. शम्स की जगह सुप्रितम बेनर्जी को क्राइम टीम का हेड बना दिया गया है. बताया जाता है कि शम्स को दाउद व सट्टेबाजी की एक खबर एबीपी न्यूज पर ब्रेक हो जाने का दंड दिया गया है.

आजतक से ये भी खबर है कि एसआईटी टीम को खत्म कर दिया गया है. इस टीम के सदस्य अरुण सिंह, हरीश शर्मा जा चुके हैं. अब सिर्फ दीपक शर्मा ही यहां बचे हुए हैं. धीरेन्द्र पुंडीर पहले ही जा चुके हैं. अमिताभ श्रीवास्तव के भी आजतक से विदा होने की चर्चाएं हैं. बताया जाता है कि अमिताभ श्रीवास्तव इंडिया टीवी जा सकते हैं.

नंदगोपाल राजन ने इंडियन एक्सप्रेस में एडिटोरियल हेड (डिजिटल) के पद पर ज्वाइन किया है. राजन इंडिया टुडे में कार्यरत थे. वे बिजनेस टुडे और इंडिया टुडे गजेट्स व गिज्मो के एसोसिएट एडिटर थे. राजन ने ट्वीट के जरिए सूचित किया है कि वे फिर से इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप से जुड़ गए हैं.

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रामगोपाल यादव को ऐसा महसूस हो रहा है कि न्यूज चैनल और अखबार वाले बिक गए हैं!

फीरोजाबाद : मीडिया को भ्रष्ट करने में बड़ा योगदान देने वाले नेताओं की भी तीसरी आंख कभी कभी खुल जाया करती है और वे दिव्य वचन बोल दिया करते हैं. अब देखिए न रामगोपाल यादव को. उनको अचानक ये लगने लगा है कि न्यूज चैनल वाले और अखबार वाले बिक गए हैं. सपा महासचिव प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने देश भर के अखबारों और न्यूज चैनलों के खास दल के हाथों ‘बिक’ जाने का आरोप लगाया. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे फिलहाल चुनाव तक इन्हें पढ़ना और देखना छोड़ दें.

यह बात उन्होंने समाजवादी पार्टी के फीरोजाबाद के जिला कार्यालय पर मंगलवार को आयोजित कई योजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण समारोह में कही। अपने भाषण में रामगोपाल यादव ने सीधे मीडिया पर हमला बोला. कहा कि चैनलों और अखबारों को पांच से दस हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं. इसलिए इन दिनों एक ही खबर चलती है, एक ही चेहरा दिखाया जाता है.

उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया लेकिन उनका इशारा भाजपा और इसके प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तरफ था. उन्होंने कार्यकर्ताओं को सुझाव दिया कि यदि टीवी देखना ही है तो वह कोई मनोरंजन चैनल देख सकते हैं. सपा महासचिव ने यह भी कहा कि भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को देश टूटने की चिंता नहीं है.  मोदी को लोग इसलिए देखने आते हैं ताकि पहचान सकें कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए हजारों लोगों का कत्लेआम कराने वाला व्यक्ति आखिर कौन है. भाजपा और कांग्रेस मात्र पांच राज्यों की सत्ता में हैं। इसमें शक नहीं कि केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी.

भास्कर, जयपुर व चंडीगढ़ आफिस से दिलीप, नरेंद्र व भारत का इस्तीफा

दैनिक भास्कर के अलग-अलग आफिसों से कई लोगों के इस्तीफे की सूचना है. जयपुर कार्यालय में कार्यरत उपसंपादक दिलीप शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है. वो अब खुद की पत्रिका संचालित करेंगे. सूचना के अनुसार दिलीप ने हाल ही में अपनी नयी मासिक पत्रिका "राहें.. सफलता की" के प्रथम अंक का विमोचन कराया था. विमोचन के ठीक बाद उन्होंने स्थानीय संपादक लक्ष्मी प्रसाद पन्त और प्रादेशिक प्रभारी शक्ति सिंह से मिलकर पत्रिका का प्रकाशन करने की बात बताते हुए अपना इस्तीफा दे दिया. उल्लेखनीय है की वर्ष 2008 से भास्कर में कार्यरत दिलीप वर्तमान में टोंक प्रभारी के रूप में काम कर रहे थे. दैनिक भास्कर से पूर्व उन्होंने पंजाब केसरी में काम किया था.

उधर, दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ से नरेंद्र और भारत भूषण ने इस्तीफा दे दिया है. ये दोनों दैनिक ट्रिब्यून से जुड़ गए हैं. चंडीगढ़ से ही एक अन्य खबर के मुताबिक आज समाज से विवेक शर्मा और रवि अटवाल का इस्तीफा हो गया है. विवेक दैनिक ट्रिब्यून गए हैं और रवि अटवाल अमर उजाला.  

पत्रिका रायपुर में कार्यरत नीरज तिवारी ने इस्तीफा दे दिया है. वे अमर उजाला, मेरठ चीफ सब एडिटर के रूप में पहुंचे हैं. इकोनामिक टाइम्स हिंदी दिल्ली से आशुतोष गु्प्ता ने इस्तीफा देकर पत्रिका रायपुर का दामन थामा है.

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आजतक से बालकृष्ण व प्रतीक त्रिवेदी और एनडीटीवी डाट काम से धर्मेंद्र का इस्तीफा

टीवी टुडे ग्रुप के न्यूज चैनलों से सूचना है कि बालाकृष्ण और प्रतीक त्रिवेदी ने इस्तीफा दे दिया है. प्रतीक त्रिवेदी दिल्ली आज तक में कार्यरत थे. प्रतीक त्रिवेदी इंडिया टीवी से जुड़ गए हैं. प्रतीक त्रिवेदी को इंडिया टीवी के चुनावी डिसकशन शो ‘घमासान लाइव’ को होस्ट करने की जिम्मेदारी दी गई है.

बालाकृष्ण आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत हैं. नेशनल ब्यूरो की टीम के हिस्से बालकृष्ण उर्फ बाला ने इस्तीफे का नोटिस मैनेजमेंट को थमा दिया है. उनके भी इंडिया टीवी जाने की संभावना है. इसके पहले संदीप सोनवलकर और शमशेर सिंह समेत कई लोग आजतक छोड़कर इंडिया टीवी का दामन थाम चुके हैं.

उधर, इंडिया टीवी में बीजेपी बीट देखने वाले हिमांशु को एसआईटी में भेज दिया गया है.

इस बीच, KHABAR.NDTV.COM में पिछले पांच सालों से सीनियर सब एडिटर के पद पर काम करने के बाद धर्मेंद्र कुमार ने 12/11/2013 को अपना त्याग पत्र संपादक विवेक रस्तोगी को सौंप दिया है. धर्मेंद्र कुमार का त्याग पत्र स्वीकार करते हुए संपादक ने उन्हें एक महीने का नोटिस टाईम दिया है. नोटिस टाईम खत्म होने के साथ ही धर्मेंद्र कुमार NDTV छोड़ देंगे.

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‘जय हिंद’ कहता हुए वो शराबी चश्मा लगाए मेट्रो पर सवार होकर ड्यूटी बजाने निकल गया

'तमंचे पर डिस्को..' बज रहा था लेकिन मंदिर के बगल में लुढके पड़े शराबी के पैर बिलकुल नहीं हिल रहे थे… उसके मुंह को सूंघते हुए दो कुत्ते थोड़े आगे थोड़े पीछे हो रहे थे, जाने भय में, या 'स्टॉफ' के सदस्य को देखकर अपनी सक्रियता-सलामी शो करने के वास्ते या मन ही मन कोई नुसरत फतेह अली मार्का लंबा आलाप ''…पड़े ही रहने दो चौखट पर..'' लेने में आई मजबूरन लंबी हिलडुल को सहेजने में… तभी रात दस बजे के बाद नशे में उन्मुक्त दिल्ली को सैल्यूट मारती एक तेज रफ्तार कार हाई वाल्यूम म्यूजिक '''…दिल तू ही बता…'' अपनी सभी खुली खड़कियों से थ्रो करते पूरी मार्केट पूरी रोड को दनदनाते आई गई हो गई…

थाने के सामने रोड किनारे बुढ़िया इत्मीनान से चूल्हे पर रोटियां सेंक-पलट रही थी… अगल-बगल छोटे छोटे ग्रुप में सिपाही, एएसआई, दरोगा अलग-अलग क्लाइंट्स को डील कर रहे थे, गलबहियां से लेकर हमप्याला, हमनिवाला हो रहे थे… वो सब्जी वाले ने अपनी दुकान का शटर गिरा लिया और भीतर ही दारू के दौर शुरू हो गए… एक कार रुकी थी और कुछ बोतलें निकलीं, बस… शटर बंद… आलू-प्याज लेने आया एक बैचलर खटखटाता रहा, अंदर से आवाज आती रही… अब बंद… कल खुलेगी… ठेके पर भीड़… जाओ, लाओ.. एक पव्वा और… नहीं भइया… अद्धा से कम नहीं… पूरी रात बाकी है..

लुढ़के पड़े शराबी को दूसरा थोड़े होश वाला शराबी रिक्शे वाले के सहयोग से लाद कर ले गया.. कुत्ते अब गली की बजाय सड़क पर मोर्चाबंदी के लिए चहलकदमी करने लगे.. कारों की संख्या कम हुई लेकिन जो आती-जाती रहीं, उनमें स्पीड ज्यादा दिखी.. बुढ़िया अपने प्लास्टिक से तैयार कैंप में घुसकर सो गई… थाने के सामने केवल एक संतरी बचा, रुटीन की ड्यूटी देते हुए बेहद उदास मुद्रा में.. सब्जीवाले दुकान की शटर खुलने बंद होने की आवाज फिर आई और कार निकल गई.. ठेके वीरान हो गए… कुछ एक शराबी कांख में कुछ दबाए इधर उधर हिलडुल हो रहे थे और अंधेरे में बैठने छिपने का जतन करते हुए गिलास पानी पव्वा की आवाजें निकाल रहे थे… कुछ घंटे बाद एक आटो वाले ने थाने के सामने पार्क के करीब के झाड़ियों में एक युवक को उतारकर पीटा, लूटा और चलता बना… चीखने चिल्लाने की आवाजें खूब आई पर किसी ने सुनी नहीं.. शायद बुढ़िया के कान तक पहुंची लेकिन उसके हाथ में पावर नहीं था… जिनके पास पावर था वे दिन भर कार-बाइक रोक कर कागज पत्तर देखने में एनर्जी खर्चते रहते हैं सो कानून के आराम का वक्त था.. कुत्ते सब देख कर भी भोंक नहीं रहे थे… शायद कोई सेटिंग हो…

एक नया आटो आया और उसमें से कुछ लोग पोस्टर गोंद लेकर निकले और चिपकाने लगे… नेताओं को चेहरे और वोट देने की अपील… एक शराबी पड़ा पड़ा देखता रहा, गरियाता रहा, बड़बड़ाता रहा… मंदिर से भजन की आवाज आने लगी थी… शराबी उंघने लगा था… कुत्ते सोने लगे थे… पोस्टर चिपक चुके थे.. लुट चुके युवक के कराहने की आवाज बंद हो चुकी थी… बुढ़िया सड़क किनारे के नाले पर निपटने बैठ गई थी… दिल्ली मौन थी… सड़कें लगभग वीरान… ऐसे ही वक्त उस शराबी ने तय किया कि उसे इतनी ही खामोशी पसंद है, बस इत्ती-सी चीजों, ऐसी ही स्थितियों में जीना पसंद है… सो वह अगले दिन ट्रेन पकड़ेगा और अपने गांव-कस्बे लौट जाएगा, हरामखोरों की दिल्ली की ऐसी की तैसी…

अगली सुबह थाना मंदिर ठेका दुकान सड़क कुत्ते सिपाही बुढ़िया सब कहीं खो-से गए क्योंकि घरों से रेला निकल चुका था सड़कों पर और भारी भीड़ में कौन किसी एक शक्ल, भावना, सिंबल को पहचान कर पकड़ कर बैठता… बड़ी बड़ी हांय हांय करती बसें, मेट्रो ट्रेन, आटो, कारें, रिक्शे, ये, वो, जाने क्या क्या के बीच आदमी खो गया.. शब्द खो गए.. भावनाएं खो गई… आवाज खो गए… उस शराबी को फिर शाम, अंधेरा, शराब, संगीत, सड़क का इंतजार है जहां कोई न हो… सिर्फ वो हो और हों बस कुछ एक अलग-अलग किस्म की चीजें.. ताकि विविधता में एकता और एकता में विविधता दिखे… 'जय हिंद' कहता हुए वो शराबी चश्मा लगाए मेट्रो पर सवार होकर ड्यूटी बजाने निकल गया था… यही सब सोचता बूझता गुनगुनाता… और, उसने घर परिवार की मजबूरियों के कारण दिल्ली छोड़ने का इरादा मुल्तवी कर दिया था… लेकिन वो रात में फिर तलाशेगा अपना गांव, अपने लोग, खामोशी, संगीत, मुक्ति…. फिलहाल तो कल रात के कुछ अनजाने चोट, घाव उसे मीठा मीठा दर्द दे रहे थे…

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

लॉ ग्रेजुएट छात्रा ने सुप्रीम कोर्ट जज पर लगाया यौन उत्पीड़न का आरोप, जांच समिति गठित

सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज पर कानून की स्नातक एक छात्रा ने अपने साथ यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम ने इस मामले की जांच के लिए जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांट कमेटी का गठन किया है ताकि मामले की सच्चाई सामने आ सके. जांच कमेटी में जस्टिस रंजना पी देसाई तथा एचएल दत्तू भी हैं.

जांच कमेटी गठित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस संस्था का प्रमुख होने के नाते मैं बहुत चिन्तित हूं तथा ये जानना चाहता हूं कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है. उल्लेखनीय है कि कानून की छात्रा ने 'जनरल ऑफ इंडियन ला एण्ड सोसाइटी' के अपने ब्लाग में पिछले हफ्ते लिखा कि…

"पिछले साल दिसम्बर में जब पूरा भारत महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आक्रोशित हो प्रदर्शन कर रहा था, तब मैं उन प्रदर्शनों में नहीं गयी क्योंकि मैं एक बेहद सम्मानित जज, जो हाल ही में रिटायर हुए, के साथ जुड़कर इंटर्न के रूप में काम कर रही थी. इस लगन का परिणाम ये निकला कि मुझे एक ऐसे व्यक्ति, जो मेरे दादा की उम्र का था, ने मेरा यौन उत्पीड़न किया. हालांकि मैं इसके डिटेल में नहीं जाना चाहूंगी लेकिन ये कहूंगी कि कमरे से निकलने के बाद भी मेरे साथ उसकी बुरी यादें थीं और अब भी हैं.''

अब ये छात्रा एक गैरसरकारी संस्था की वकील है. इस मामले को इतने दिनों बाद सार्वजनिक करने पर युवती का कहना है कि ''मेरा उन जज, जो हाल में ही रिटायर हुए हैं, के शानदार करियर पर दाग लगाने पर कोई इरादा नहीं है. लेकिन मेरे साथ जो हुआ उसके घाव आज भी मैं सह रही हूं और आगे भी सहती रहूंगी. लेकिन प्रार्थना करूंगी कि आगे किसी भी लड़की के साथ ऐसा ना हो.''

छात्रा ने अपने ब्लाग पर जो कुछ लिखा है, वो इस प्रकार है…

Through my Looking Glass

Posted on November 6, 2013

by Stella James

Sometimes the most difficult things to write about are also the most essential. I feel this is especially true when many people, much more scholarly than oneself, have already said and written a lot around the issue, and yet your own experience does not seem to fit into the wide net that they’ve cast. Gandhi once said “I have something far more powerful than arguments, namely, experience”. And it is from these words that I derive what I consider the ‘value’ of this piece – not my experience per se, but from what I feel that my experience can tell us about much discussed issues in the country today.

Last December was momentous for the feminist movement in the country – almost an entire population seemed to rise up spontaneously against the violence on women, and the injustices of a seemingly apathetic government. In the strange irony of situations that our world is replete with, the protests were the backdrop of my own experience. In Delhi at that time, interning during the winter vacations of my final year in University, I dodged police barricades and fatigue to go to the assistance of a highly reputed, recently retired Supreme Court judge whom I was working under during my penultimate semester. For my supposed diligence, I was rewarded with sexual assault (not physically injurious, but nevertheless violating) from a man old enough to be my grandfather. I won’t go into the gory details, but suffice it to say that long after I’d left the room, the memory remained, in fact, still remains, with me.

So what bothered me about this incident? As a conditioned member of the society, I had quickly “gotten over” the incident. But was that what worried me: that I had accepted what was essentially an ‘unacceptable’ situation. The more I thought about it, the more I realized that the crux of my unease lay in my inability to find a frame in which to talk, or even think, about my experience. While the incident affected me deeply, I felt little anger and almost no rancour towards the man; instead I was shocked and hurt that someone I respected so much would do something like this. My strongest reaction really, was overwhelming sadness. But this sort of response was new to me. That I could understand his actions and forgive him for them, or that I could continue to think of him as an essentially ‘good’ person, seemed a naïve position that were completely at odds with what I had come to accept was the “right” reaction to such incidents.

This emotional response was also completely at odds with the powerful feelings of righteous anger that the protestors in Delhi displayed. I am not trying to say that anger at the violence that women face is not a just or true response, but the polarization of women’s rights debates in India along with their intense emotionality, left me feeling that my only options were to either strongly condemn the judge or to betray my feminist principles. Perhaps this confusion came out of an inadequate understanding of feminist literature, but if so, isn’t then my skewed perception a failing of feminism itself? If the shared experiences of women cannot be easily understood through a feminist lens, then clearly there is a cognitive vacuum that feminism fails to fill. Feminists talk of the guilt a woman faces when sexually harassed, like it is her fault. I felt a similar guilt, except, my guilt wasn’t at being assaulted, but at not reacting more strongly than I did. The very perspective that was meant to help me make sense of my experiences as a woman was the one that obscured the resolution of the problem in my own mind, presumably an effect that feminism does not desire. And if not a result of feminist theory itself, the form that it has taken in India, especially after recent incidents of sexual assault, strengthened the feeling of “If you’re not with us, you’re against us” in a fight that I feel I can no longer take sides in.

All the talk during that time was of stricter punishment, of baying for the blood of “creepy” men. Five years of law school had taught me to look to the law for all solutions – even where I knew that the law was hopelessly inadequate – and my reluctance to wage a legal battle against the judge left me feeling cowardly. On reflection though, I cannot help but wonder why I should have felt that way. As mentioned earlier, I bore, and still bear, no real ill-will towards the man, and had no desire to put his life’s work and reputation in question. On the other hand, I felt I had a responsibility to ensure that other young girls were not put in a similar situation. But I have been unable to find a solution that allows that. Despite the heated public debates, despite a vast army of feminist vigilantes, despite new criminal laws and sexual harassment laws, I have not found closure. The lack of such an alternative led to my facing a crippling sense of intellectual and moral helplessness.

The incident is now a while behind me, and they say time heals all wounds. But during the most difficult emotional times, what helped me most was the ‘insensitivity’ of a close friend whose light-hearted mocking allowed me to laugh at an incident (and a man) that had caused me so much pain. Allowing myself to feel more than just anger at a man who violated me, something that I had never done before, is liberating! So, I want to ask you to think of one thing alone – when dealing with sexual violence, can we allow ourselves to embrace feelings beyond or besides anger, and to accept the complexity of emotions that we face when dealing with any traumatic experience?

(साभार- jilsblognujs)

Samruddha Jeevan के फर्जीवाड़े पर SEBI की रोक से संबंधित खबर PTI ने की जारी

मीडिया क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सक्रिय हो रहे 'समृद्ध जीवन' समूह की कंपनियों द्वारा जनता को लालच देकर बड़े पैमाने पर अवैश निवेश स्कीमों में पैसे लगवाने के प्रकरण में सेबी ने जो रोक का आदेश दिया है, उससे संबंधित खबर समाचार एजेंसी पीटीआई उर्फ प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया की तरफ से जारी की गई है.

ये अलग बात है कि इस खबर को कुछ एक अखबारों को छोड़कर किसी भी मीडिया ग्रुप ने एंटरटेन नहीं किया. ऐसी खबरें जो सीधे तौर पर जनता के हित से जुड़ी हैं और उनको लुटने से बचाने के लिए प्रकाशन की मांग करती हैं, उन्हें मीडिया हाउस जाने किस प्रलोभन में नहीं छापते, दिखाते. मराठी के कुछ अखबार, अंग्रेजी के कुछ अखबारों को छोड़ दें तो 'समृद्ध जीवन' के फर्जीवाड़े से संबंधित खबरों और सेबी द्वारा इस पर रोक लगाने के आदेश को सभी ने ब्लैकआउट किया. नीचे वो खबर दे रहे हैं जिसे पीटीआई ने रिलीज की है….

Sebi cracks whip on new 'cattle and goat farms' scheme

PTI

MUMBAI: In a fresh crackdown on fraudulent investment schemes promising huge returns from 'cattle and goat farms', Sebi barred their operators from raising funds from such schemes and began further proceedings. The company Samruddha Jeevan Foods India Ltd as well as its promoters and directors have also been asked to submit full details of assets owned by them through investor money and not to divert any funds or dispose any properties.

The crackdown against Samruddha group follows actions by the capital markets watchdog against similar schemes launched by at least two other entities HBN Dairies and Beetal Livestock, which were found to be raising money through unauthorised schemes with returns linked to 'cattle and ghee investments' and 'goat-rearing business', respectively.

Asking Samruddha and its three directors to reply within 15 days, Sebi said in an order that it began investigating the case after receipt of complaints about the company agents promising "more than 12 per cent fixed returns and other unusual returns on investments in cattle and goat farms".

Subsequently, Sebi had sought details from the company, which submitted that it was engaged in the business of "trading in livestock and other allied products, the consideration for which is received either in installments or one-time (payment) at the option of the buyer".

Meanwhile, Sebi also received a reference from the Economic Offences Cell, CID Panaji (Goa) regarding an inquiry into activities of Samruddha, wherein it was found to be operating a cumulative investment scheme with the concept of livestock buying, rearing and paying the returns.

Besides, a CBI investigation also found that the company had a livestock of only 16,876 as against a total of 6,48,406 customers, which indicated that it was not buying cattle against every deposit made by the investors.

Sebi probe further found that the company was collecting money from the public in order to carry out the business of "purchase and rearing of goats/buffaloes' and also of sheep farming. Under its various schemes, the company was offering to double the money in five and half years, while also promising an amount equivalent to 1.5 times of the contract value as 'accidental death help'.

Its financial statements showed that 'advance from customers' in fiscal year 2011-12 stood at over Rs 331 crore, at over Rs 163 crore in 2010-11 and Rs 36 crore in 2009-10.

It spent over Rs 56 crore towards 'advertisement and sales promotion (including commission)' in 2011-12, Rs 39.5 crore in 2010-11 and Rs 22 crore in 2009-10.

There were also several fund transfers between group companies and Sebi's probe found that the company was running illegitimate collective investment schemes.

"The protection of interest of investors is the first and foremost mandate of Sebi and therefore, steps have to be taken in the instant matter to ensure that only legitimate schemes are carried on by Samruddha Jeevan Foods India Ltd and no investors are defrauded," Sebi said in its order.


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Samruddh jeevan Fraud


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समृद्ध जीवन परिवार के खिलाफ सीबीआई जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे, गोवा से भी आई शिकायत

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समृद्ध जीवन परिवार की कई कंपनियां जनता को भरमाकर पैसे उगाहने के खेल में लिप्त हैं और इसके जरिए अरबों का साम्राज्य खड़ा कर चुकी हैं. इन कंपनियों के खिलाफ देश के कई हिस्सों से शिकायतें मिली हैं और कई एजेंसियां इसकी जांच कर रही हैं. पणजी (गोवा) में सीआईडी की इकानामिक आफेंसेज सेल की तरफ से सेबी को एक रिफरेंस पत्र भेजा गया है. इसमें कहा गया है कि यहां कंपनी जनता को कई तरह के लालच देकर पैसे लगवा रही है.

समृद्ध जीवन परिवार के खिलाफ सीबीआई ने भी जांच की है. ये कंपनी जनता से भेड़, बकरी, भैंस आदि जानवरों की फार्मिंग कराने के नाम पर पैसे तो ले रही है पर वे ये पशु नहीं खरीद रही. कंपनी ने 6,48,406 कस्टमर्स से पैसे लिए लेकिन कंपनी के पास सिर्फ 16,876 के लिए ही लाइव स्टाक है. मतलब साफ है कि कंपनी प्रत्येक निवेश के लिए पशु नहीं खरीद रही.

कंपनी के वित्तीय दस्तावेज बताते हैं कि योजनाओं के नाम पर जनता से 331 करोड़ रुपये की रकम एडवांस में ली गई है, वित्तीय वर्ष 2011-12 के दौरान. वित्तीय वर्ष 2010-2011 में यह रकम 163 करोड़ रुपये और 2009-10 में रकम 36 करोड़ रही. कंपनी ने दिखाया है कि उसने विज्ञापन और सेल्स प्रमोशन में वर्ष 2011-12 में 56 करोड़ रुपये खर्च किए. इसी मद में वर्ष 2010-2011 में 39.5 करोड़ और 2009-2010 में 22 करोड़ रुपये व्यय किए.

समृद्ध जीवन परिवार की कंपनियों के बीच बड़े पैमाने पर पैसे के ट्रांसफर हुए हैं. सेबी की जांच में पता चला है कि यह कंपनी अवैध निवेश योजना संचालित कर रही है. सेबी के मुताबिक उसका पहला मकसद निवेशकों के हित की सुरक्षा है. इसी के तहत सेबी ने समृद्ध जीवन की निवेश योजनाओं पर रोक लगाते हुए जनता से लिए गए पैसे को इधर-उधर न करने के आदेश दिए हैं.

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Samruddh jeevan Fraud

‘समृद्ध जीवन’ और इसके मालिकों महेश मोतेवार व अन्य से पंद्रह दिनों में सेबी ने जवाब मांगा

लाइव इंडिया न्यूज चैनल, अखबार, मैग्जीन संचालित करने वाले समृद्ध जीवन के पैसे उगाहने के फ्रॉड पर रोक लगाने के बाद सेबी ने इस कंपनी और इसके मालिकों महेश मोतेवार, वैशाली मोतेवार, घनश्याम जस भाई पटेल से पंद्रह दिनों के भीतर जवाब मांगा है. इस कंपनी के खिलाफ सेबी को शिकायत मिली थी कि ये पशु और बकरी फार्म्स के नाम पर निवेश योजना के तहत जनता से बारह प्रतिशत से ज्यादा फिक्स्ड रिटर्न का प्रलोभन देकर पैसे उगाह रहे हैं.

इस कंपनी के एजेंट घूम-घूम कर बड़े पैमाने पर निवेश करा रहे हैं. कंपनी बकरी, बैंस, भेड़ फार्मिंग के नाम पर लोगों को पैसा लगाने व पांच-साढ़े पांच साल में डबल करने का छलावा देकर पैसा बटोर रही है.

मूल खबर…

'लाइव इंडिया' संचालित करने वाले 'समृद्ध जीवन' समूह पर जनता से पैसे उगाहने पर सेबी ने लगाई रोक


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‘लाइव इंडिया’ संचालित करने वाले ‘समृद्ध जीवन’ समूह पर जनता से पैसे उगाहने पर सेबी ने लगाई रोक

खबर है कि मार्केट रेगुलेटर 'सेबी' (सेक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया) ने 'लाइव इंडिया' नामक न्यूज चैनल, अखबार आदि संचालित करने वाले समूह 'समृद्ध जीवन परिवार' की कंपनी ''समृद्ध जीवन फूड्स'' और इसके निदेशकों को बाजार, जनता और निवेशकों से पैसे उगाहने पर रोक लगा दी है. सेबी की तरफ से निर्देश जारी  किया गया है कि 'समृद्ध जीवन' किसी भी तरह की योजना के जरिए जनता से पैसे नहीं लेगी. साथ ही जनता से उठाए गए पैसे व इस पैसे से बनाई गई किसी भी संपत्ति के क्रम-विक्रय या हस्तांतरण पर भी रोक लगा दी गई है.

सेबी की तरफ से इसके सदस्य एस रमन ने समृद्ध जीवन फूड्स इंडिया लिमिटेड और इसके निदेशकों महेश मोटेवार, वैशाली मोटेवार और घनश्याम जसभाई पटेल को ये निर्देश जारी किए और कहा कि कंपनी व इसके निदेशक अब कोई नई स्कीम लांच ना करें और पुरानी स्कीमों से भी पैसे न लें. सेबी के मुताबिक समृद्ध जीवन फूड्स की जांच के दौरान प्राथमिक तौर पर पाया गया है कि यह कंपनी और इसके निदेशक ''कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम्स'' के जरिए फंड मोबलाइजिंग एक्टिविटी में इनवाल्व हैं.

ज्ञात हो कि ये वही चिटफंड कंपनी है जो हाल के दिनों में मीडिया क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सक्रिय हुई है. इस कंपनी ने लाइव इंडिया न्यूज चैनल, मी मराठी न्यूज चैनल को खरीदा है और इसे संचालित कर रही है. साथ ही लाइव इंडिया मैग्जीन, लाइव इंडिया अखबार की शुरुआत की है. इस कंपनी ने अपने मीडिया वेंचर में देश के कई बड़े पत्रकारों को जोड़ा है. माना जा रहा है कि कंपनी को देर-सबेर उन्हीं स्थितियों से दो-चार होना है जिससे इस समय सहारा समूह सहित कई चिटफंड कंपनियां जूझ रही हैं.

नीचे सेबी का आदेश है, जिसे साफ-साफ पढ़ने के लिए तस्वीर के उपर ही क्लिक कर दें. उसके नीचे सकाल मराठी अखबार में इस बारे में प्रकाशित खबर है…

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आखिर टीवी में खबरों का टोटा क्यों है?

खबर के लिए मैं कभी किसी एक माध्यम पर निर्भर नहीं होता. जब-जैसी जरूरत होती है, उस चीज का सहारा ले लेता हूं. इंटरनेट, टीवी, रेडियो, अखबार, सोशल मीडिया और मित्रगण. ऐसा भी नहीं है कि इनमें से कोई एक चीज किसी दिन ना देखूं-सुनूं तो खाना हजम नहीं होगा, बेचैनी बढ़ जाएगी, बीपी बढ़ जाएगा.
 
मैं इस बात से भी इत्तेफाक नहीं रखता कि अगर अखबार नहीं आए/मिले तो टीवी के लिए खबरों का टोटा पड़ जाएगा. अगर ये बात है तो क्या यह मान लिया जाए कि अखबार में सुपर रिपोर्टर्स रहते हैं और टीवी में कमतर रिपोर्टर. नहीं, ऐसा नहीं है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आपने अपने खबरों के संचयन का कैसा तरीका अपनाया हुआ है. अगर आपने निर्भरता अखबार पर बढ़ाई है तो ये आपकी समस्या है. वरना टीवी चैनल्स के पास रिपोर्टर्स और स्ट्रिंगर्स का जो लंबा चौड़ा देशव्यापी नेटवर्क होता है, वह तो अच्छे-अच्छे बड़े अखबारों के पास भी नहीं होता. हर प्रमुख राज्य में एक ब्यूरो चीफ और उसके साथ उस राज्य में ही रिपोर्टर्स-स्ट्रिंगर्स की एक पूरी सेना. तब अंदाजा लगा लीजिए कि भारत में कितने राज्य हैं और ये नेटवर्क कितना बड़ा होगा. और अखबार की तरह टीवी में भी स्ट्रिंगर्स को बंधा-बंधाया पैसा देने की परंपरा नहीं है. अगर भूले-भटके कभी स्टोरी चल गई तो उसका पैसा मिल जाता है. लेकिन स्ट्रिंगर अपने इलाके में उस चैनल (या यूं कहें कि कई चैनल्स) का संवाददाता बनकर साल भर घूमता है. खबरें शूट करके भेजता भी है. ये अलग बात है कि उचित मार्गदर्शन के अभाव में और टीआरपी की रेस के कारण उसकी भेजी ज्यादातर खबरें एसाइनमेंट डेस्क कूड़े के डिब्बे में डाल देता है. हर टीवी चैनल में यही होता है. हिन्दी का हो या अंग्रेजी का या किसी और भाषा का. और फिर कहा जाता है कि टीवी में खबरों के लाले पड़ गए हैं. आखिर कैसे भइया?
 
तो जरुरत अखबारों पर निर्भरता बनाने-बताने की बजाय अपना सिस्टम सुधारने की है. टीवी के अगर कुछ रिपोर्टर आरामतलब या यूं कहें कि खबर उठाऊ टाइप हो गए हैं, तो इसे कौन ठीक करेगा? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? आप न्यूज मीटिंग में अखबार के रिपोर्टर से बात करिए और टीवी के रिपोर्टर से. अखबार का रिपोर्टर जहां आपको तीन-चार स्टोरी आइडिया बताएगा, वहीं टीवी का रिपोर्टर एक या ज्यादा से ज्यादा दो आइडियाज. ये ठीक है कि दोनों माध्यम अलग हैं और दोनों में खबरों के चयन-प्रकाशन-प्रसारण के अलग नियम होते हैं, तरीका होता है, पर ये तो हो ही सकता है कि जो पत्रकार जिस विधा में काम कर रहा है, वह उसकी जरूरतों के अनुसार स्टोरी आइडिया ढूंढे और बताए. और अगर विधा का बहाना बनाकर आप अपनी कमजोरी छुपाते हैं तो फिर अखबार से स्टोरी उठाकर उसे टीवी के लायक आप कैसे बना लेते हैं? ये भी बताना होगा.
 
सच ये है कि टीवी में न्यूज गैदरिंग का वही पुराना चला-चलाया ढर्रा आज तक चल रहा है. कुछ एजेंसी से ले लो, कुछ अखबार देख के उठा लो और एकाध स्टोरी अपना टीवी वाला रिपोर्टर तो बता ही देगा. अगर ये भी कम पड़ गया तो इंटरनेट पर कोई तड़क-भड़क, सांप-बिच्छू, भूत-प्रेत, रहस्य-रोमांच वाली स्टोरी खोज लो. फिर यू ट्यूब से उससे मिलते-जुलते विजुअल निकालो और पैकेजिंग करके स्टोरी या आधे घंटे का शो बना दो. मेरे ख्याल से ज्यादातर चैनलों में यही हो रहा है. सच तो ये है कि न्यूज गैदरिंग और कंटेंट प्लानिंग पर यहां नए सिरे से सोचने की जरूरत है. और ये तभी होगा जब आपकी प्राथमिकतायें तय होंगी. खबरों को लेकर क्या दृष्टिकोण अपनाना है, कैसी खबरें लेनी है या चलानी है, ये गाइडलाइंस क्लियर हों. फिलहाल तो ये दिखता है कि एक दफा हार्ड न्यूज और सरोकारी खबर की बात टीम से कह दी जाती है और अगले ही पल चैनल का एजेंडा बदल जाता है. जब दूसरे चैनल हजार टन सोना ढूंढ़ने निकलते हैं तो फिर क्या दूध और क्या पानी. सब बराबर. फिर सारे एजेंडे एक तरफ और टीआरपी वाली खबर सब पर भारी. यानी खजाना ही चलेगा, बाकी स्टोरीज गईं तेल लेने. एसाइनमेंट और रिपोर्टर्स की सारी मेहनत बेकार. वो भी हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं कि जब स्टोरी चलनी ही नहीं है तो फिर काहे कोई सिर फोड़े.
 
लेकिन अखबार में ऐसा नहीं है. अगर खबर मंगाई जाती है या भेजी जाती है तो यथासंभव उसे तवज्जो दी जाती है. अगर स्टोरी में टाइम वैल्यू है तो उसे स्टोरी बैंक में डाल दिया जाता है और जरूरत पड़ी तो नए सिरे से डेवलप कराकर स्टोरी छापी जाती है. रिपोर्टर्स की मेहनत बेकार नहीं जाती वहां पर. उनका हौसला इतना नहीं तोड़ा जाता, जितना टीवी में तोड़ा जाता है. जब 1000 टन खजाना चलेगा तो फिर डिस्कशन भी उसी पर होगा, स्टोरी भी उसी से संबंधित जाएगी. तब आपके नैशनल-मेट्रो-स्टेट ब्यूरो स्लीपिंग में चले जाएंगे. हां, अगर कुछ ब्रेकिंग हो गया तो थोड़ी देर के लिए उस खबर पर जाएंगे और फिर पुराने ढर्रे-आलाप पर लौट आएंगे.
 
सो टीवी में जब खबरों के चयन-संचयन-प्रसारण और उसकी योजना का ये हाल होगा तो खजाने वाली या उसके जैसी स्टोरी नहीं होने पर आपके यहां खबरों का टोटा तो होगा ही. इसके लिए आप लोग ही जिम्मेदार हुए ना. वरना यदि रोज प्राथमिकता के अनुसार खबर मंगाने और उसे चलाने का ढर्रा बना दिया जाए तो टीवी माध्यम के हिसाब से ही (visual के साथ) खबरों का टोटा या कंगाली कैसे होगी? इतना विशाल देश है और पल-पल यहां कई खबरें जन्म ले रही हैं. ऐसे में अखबार के बिना खबरों के आकाल की बात मेरे गले नहीं उतरती. हां, ये जरूर है कि टीवी वालों को आरामतलबी की आदत हो गई है, दूसरों की मेहनत टीपने की लत पड़ गई है (अखबार से खबर उठाकर उसे लीपपोत के पेश कर दो) और ये उनके वर्क कल्चर में शामिल हो गया है, तो खबरों का टोटा उनको जरूर होगा. और ये वर्क कल्चर ऐसा है, जो हर सीनियर अपने जूनियर को सिखाता जा रहा है, पीढ़ी दर पीढ़ी. कि बेटा, ज्यादा दिमाग मत लड़ाओ. ऐसे प्लान करो और बॉस को खबरें परोस दो. चल गया चैनल.
 
तो अखबार की ही तरह टीवी में जरूरत है लांग टर्म प्लानिंग की. अरे खबरें इतनी है कि आप चला नहीं पाओगे. 24 घंटे कम पड़ जाएंगे आपको. बस जरूरत है मजबूत इच्छाशक्ति की और ढर्रा बदलने के हिम्मत की. जब टीवी इस देश में शुरु हुआ तो किसी ना किसी ने बैठकर इसके लिए न्यूज गैदर का तरीका बनाया होगा ना. तो इतना समय बदल गया, जरूरतें बदल गईं, दर्शकों के टेस्ट बदल गए, मार्केट का डाइनेमिक्स बदल गया, फिर खबरों के संकलन का तरीका लगभग पहले जैसा ही क्यों, क्यों वही पुराना ढर्रा? लगभग सारे चैनलों में. अपनी जरूरत के हिसाब से अपना खुद का तरीका डेवलप करिए ना. नया वर्क कल्चर बनाइए ना. अगर ये बन जाए तो शायद टीवी की खबरों में भी कुछ ताजगी आए. रिपोर्टर्स का हौसला बढ़े और फिर खबरों का टोटा ना रहे. कितना अच्छा हो हर चैनल पर हर तरह की खबर. सबके अपने-अपने एक्सक्लूसिव. अखबार के भी अपने एक्सक्लूसिव. फिर टीवी और अखबार एक-दूसरे से खबरें ले और डेवलप करे. यानी खबरों का पूरा बम्बार्डमेंट. जनता की जय-जय. सबका दुख सुना जाएगा, सबसे हिसाब लिया जाएगा. यही तो है लोकतंत्र का असली मतलब और मीडिया के चौथे खंभे होने की सार्थकता.
 

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. नदीम से संपर्क 085 05 843431 के जरिए किया जा सकता है.


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बनर्जी होंगे यूपी के नये डीजीपी

जैसा अब तक होता आया है कि प्रदेश के डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी का चयन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने ही किया है। अगर यही परंपरा जारी रही तो आनंद लाल बनर्जी यूपी के नये डीजीपी बनने जा रहे हैं। बस यह तय होना बाकी है कि मौजूदा डीजीपी देवराज नागर को उनके रिटायरमेंट के बचे हुए दो महीने गुजारने दिये जायें या फिर जल्दी ही श्री बनर्जी की तैनाती कर दी जाये। पूरी नौकरशाही में इस बात की चर्चा है कि चुनावी साल में अगला डीजीपी कौन होगा।
 
बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था समाजवादी पार्टी की सरकार के लिए सबसे ज्यादा मुसीबत का सबब बनी हुई है। कोशिशों के बाद भी कानून व्यवस्था संभलने का नाम ही नहीं ले रही है। आम जनमानस में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति को लेकर बेहद नाराजगी है। सरकार चाह कर भी इन स्थितियों में सुधार नहीं ला पा रही है।
 
मुजफ्फरनगर दंगे इस सरकार के माथे पर सबसे बड़ा कलंक साबित हुए। कई महीने बीत गये मगर दंगे काबू में नहीं आये। एक तरफ सरकार दंगा रोक पाने में नाकाम सिद्ध हो रही है तो दूसरी ओर पुलिस के बड़े अफसर गुटबाजी और सरकार को बदनाम करने की रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। सरकार को देर से ही सही मगर पता चला कि जिन अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था अरुण कुमार के भरोसे वह यूपी में रामराज्य स्थापित करने की योजना बनाने में जुटी थी वही अरुण कुमार सरकार की जड़ों में मठ्ठा डालने का काम कर रहे थे। हकीकत पता चलने के बाद हालांकि अरुण कुमार को न सिर्फ पद से हटाया गया बल्कि उन्हें अभी तक वेटिंग में डालकर सरकार उन्हें सबक सिखा रही है।
 
इसके बाद अगली नाराजगी डीजीपी देवराज नागर को लेकर है। अपने पूर्ववर्ती डीजीपी के मुकाबले श्री नागर ईमानदार और सरल स्वभाव के माने जाते हैं मगर यह बात अब साबित हो गयी कि पुलिस महकमे में उनकी पकड़ नहीं बची। मुख्यमंत्री इस बात से भी नाराज हैं कि पिछली बार मुजफ्फरनगर में इतने हंगामे के बावजूद डीजीपी मौके पर नहीं गये जबकि उनसे पहले खुद मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक उस इलाके का दौरा कर आये। नाराजगी के इसी क्रम में प्रमुख सचिव गृह की भी छुट्टी कर दी गयी।
 
सरकार को समझ नहीं आ रहा कि अब मुजफ्फरनगर दंगे किस रणनीति से रोके जायें। चुनाव से पहले लगातार इस तरह घटनायें सरकार की छवि को बेहद नुकसान पहुंचा रहीं हैं। सपा का एक बड़ा धड़ा चाहता है कि तत्काल डीजीपी को भी उनके पद से हटा दिया जाये जिससे यह मैसेज दिया जा सके कि सरकार कानून व्यवस्था के मामले में किसी से कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।
 
डीजीपी के बदले जाने की खबर ने यूपी के कई पुलिस अफसरों की सक्रियता बढ़ा दी। डीजीपी के संभावित दावेदारों ने अपनी-अपनी सक्रियता बढ़ा दी हैं। पिछले पखवाड़े चली चर्चाओं में एके गुप्ता, रंजन द्विवेदी, एएल बनर्जी एवं रिजवान अहमद का नाम सबसे ज्यादा सुनाई दिया। कुछ दिनों पहले तक सबसे मजबूती एके गुप्ता के नाम में दिखाई दे रही थी क्योंकि पुलिस अफसर मानते हैं कि श्री गुप्ता पुलिसिंग का काम बेहतर तरीके से करते हैं। तब यह माना जाता था कि एके गुप्ता ही नये डीजीपी बनाये जायेंगे।
 
एके गुप्ता का नाम फाइनल हो पाता उससे पहले ही प्रमुख सचिव गृह के पद पर अनिल गुप्ता और अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था के पद पर मुकुल गोयल की तैनाती कर दी गयी। यह दोनों वैश्य जाति से ताल्लुक रखते हैं। लिहाजा यह संभव नहीं था कि डीजीपी के पद पर भी किसी वैश्य जाति के अफसर को तैनात किया जाता। लिहाजा एके गुप्ता इस दौड़ से बाहर हो गये।
 
रिजवान अहमद लंबे समय से समाजवादी पार्टी के वफादार अफसरों में रहे हैं। उनकी भी बड़ी इच्छा थी कि वह एक बार प्रदेश के डीजीपी बन जायें। अल्पसंख्यक होने के नाते वह अपनी दावेदारी को और मजबूत समझते हैं और अपने समर्थकों से यह संदेश भिजवाने में पीछे नहीं रहते कि उनकी तैनाती से मुस्लिमों में अच्छा संदेश जायेगा। उनकी इसी रणनीति के तहत पिछले दिनों मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में सवाल उठाया गया कि क्या प्रदेश में अल्पसंख्यक समुदाय से डीजीपी बनाया जायेगा। मगर उनकी तैनाती में दो समस्यायें सामने आ गयीं। पहली तो यह कि उनकी नौकरी के चार माह ही बचे हैं। ऐसे में चार महीने के लिए डीजीपी के पद पर तैनाती किसी भी रूप में सही नहीं ठहराई जा सकती। दूसरा प्रदेश के मुख्य सचिव भी मुस्लिम हैं और इस आधार पर दूसरे सबसे बड़े पद पर भी मुस्लिम अफसर की तैनाती से सरकार बचना चाहती है।
 
पंडित कार्ड के नाम पर रंजन द्विवेदी ने भी अपना नाम आगे चलवाया था। मगर उनका पिछला ट्रैक रिकार्ड बहुत बेहतर नहीं रहा है इस नाते सरकार उनकी तैनाती से बचना चाहती है। साथ ही वह कई सालों तक प्रदेश से गायब भी रहे हैं। इसके अलावा वह सभी दलों से अपना तालमेल बनाकर रखते हैं। जिससे सपा के प्रति उतनी निष्ठा नहीं रह पाती जितनी सपा के नेता चाहते हैं।
 
1979 बैच के एएल बनर्जी ने पिछले कई दिनों से सपा मुखिया की परिक्रमा करके अपनी स्थिति बेहतर बना ली है। बताया जाता है कि जब प्रमुख सचिव गृह अनिल कुमार गुप्ता को बनाने का फैसला लिया गया और वह नेताजी से मिलने पहुंचे उस समय भी एएल बनर्जी वहां मौजूद थे। यही नहीं दीपावली के आसपास उनके सामने ही नेताजी ने डीजीपी देवराज नागर की जमकर क्लास ली। यह बात पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बनी हुई है।
 
श्री बनर्जी इस समय सतर्कता विभाग में निदेशक के पद पर तैनात हैं। उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ाने के साथ ही पिछले दिनों अपने कार्यालय में सभी डीजी तथा एडीजी को चाय पर आमंत्रित किया। लोगों ने इस आयोजन की वजह पूछी तो बताया गया कि सतर्कता विभाग की नई बिल्डिंग बनने के आयोजन में यह चाय पार्टी आयोजित की गयी है। जबकि हकीकत में यह श्री बनर्जी के डीजीपी बनने से पहले सक्रियता का पहला चरण था।
 
सर्तकता विभाग का यह भवन पिछले कुछ दिनों वैसे भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ दिनों पहले इस भवन के उद्घाटन के लिए मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया गया। इसके बाकायदा कार्ड भी छप गये और बंट गये। इसी बीच मुख्यमंत्री को बताया गया कि इस भवन में तो महीनों से विभाग के लोग बैठ रहे हैं अब अगर वह उद्ïघाटन करेंगे तो उनकी फजीहत होगी। लिहाजा ऐन वक्त पर यह उद्घाटन समारोह टाला गया। श्री बनर्जी की चाय पार्टी में गये अफसर यह नहीं समझ पा रहे थे कि जिस भवन का उद्घाटन करने में पहले भी इतना विवाद हो चुका है उस भवन के नाम पर चाय पार्टी क्यों आयोजित की जा रही है।
 
हालांकि श्री बनर्जी के नाम फाइनल होने की चर्चा के बीच अफसरों का एक धड़ा उनके भी विरोध में जुट गया है। यह धड़ा कह रहा है कि श्री बनर्जी का स्वास्थ्य काफी खराब है। मौजूदा दौर में प्रदेश को सक्रिय डीजीपी की जरुरत है। ऐसे में किसी बीमार अफसर को इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। सूत्रों का कहना है कि सपा मुखिया ने लगभग श्री बनर्जी के नाम पर अपनी स्वीकृति दे दी है और संभव है कि रिटायर होने से पहले ही देवराज नागर को उनके पूर्ववर्ती अंबरीश चंद्र शर्मा की तरह हटा दिया जाये क्योंकि सपा के लोग यह कह रहे हैं कि बाद में डीजीपी तैनात होने पर चुनाव आयोग उसे हटा सकता है।
 
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के संपादक हैं.  यह स्टोरी वीकएंड टाइम्स में प्रकाशित हो चुकी है.

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कथाक्रम और शुतुरमुर्गी अदा के मारे लफ़्फ़ाज़ रणबांकुरे

कथाक्रम के दो दिवसीय सम्मेलन में इस बार हिंदी लेखकों की लफ़्फ़ाज़ी के क्या कहने? अजब नज़ारा था। यह जो हिंदी लेखक किसी प्रकाशक से रायल्टी की बात करने के सपने से भी डर जाते हैं, उलटे पैसा दे कर किताब छपवाने के उपक्रम में लगे रहते हैं। संपादकों की इच्छा कहिए डिक्टेशन कहिए अपनी रचना में शीर्षासन कर पूरी करते हैं। तीन सौ या पांच सौ किताब छपने का रोना रोते हैं। गरज यह कि पाठकों से वंचित और कुंठित यह लेखक खुद ही पाद कर खुद ही खुश हो लेते हैं। (दूसरों को इस से दिक्कत हो या बदबू आए, इस से उन को फ़र्क नहीं पड़ता।) ऐसे लेखक भूमंडलीकृत समाज और साहित्य की मशाल विषय पर धुंआंधार लफ़्फ़ाज़ी का धुंआ ऐसे छोड़ रहे थे गोया कोयले वाला इंजन हों। साबित यही हुआ कि जैसी बांझ रचनाएं यह हिंदी लेखक करते हैं, वैसी ही बांझ बहस भी वह करते हैं। कि बताइए दू ठो पाठक बटोर नहीं सकते, चार ठो श्रोता बटोर नहीं सकते और लड़ेंगे भूमंडलीकरण से। आग लगा देंगे समूची व्यवस्था में। 
 
यह सारी लफ़्फ़ाज़ी देख-सुन कर बार-बार पाकिस्तान की याद आती रही। कि जैसे पाकिस्तान अमरीका के दिए गए भीख से पेट भरता है, हथियार भी अमरीका से भीख में लेता है और हिंदुस्तान पर भूंकता रहता है अमरीका के दम पर। और जब अमरीका वहां ड्रोन हमले करता है और वहां के लोगों को जब-तब मारता रहता है तो पाकिस्तान अमरीका पर गुर्राता है कि अब जो कर लिया सो कर लिया, अब जो ड्रोन हमला किया तो ठीक नहीं होगा। और अमरीका फिर जल्दी ही एक और ड्रोन हमला कर देता है। अब तो यह पाकिस्तान का यह भूकना भी लगभग बंद  हो गया है। पर हमारे हिंदी लेखक अभी यह काम जारी रखे हुए हैं। इन की लफ़्फ़ाज़ी में अभी जीवन बाकी है। बताइए कि बाज़ार की सारी सहूलियत भी चाहिए और बाज़ार से युद्ध भी ? वह भी कोरी लफ़्फ़ाज़ी के बूते? 
 
यह कौन सा अंतर्विरोध है हमारे हिंदी लेखकों ? अहंकार में डूबा व्यवहार, सामंतवाद की हदें पार करता हुआ, शालीनता की सारी हदें तोड़ता, कि हिप्पोक्रेसी की सारी आयतें शर्मा-शर्मा जाएं। एक तो रचना नहीं और जो इक्की दुक्की हैं भी बोझिल बौद्धिकता में तरबतर रचनाएं, जिन के दो पन्ने पढ़ना भी किसी सामान्य पाठक के लिए मानसिक उमस का सबब बन जाती हैं लेकिन आप का झंडा ऊंचा रहता है। क्यों कि आप साहित्य के बाज़ार में भले न हों पर एक गिरोह में आप ज़रुर हैं। फ़ासिस्टों का विरोध करते-करते खुद फ़ासिस्ट बन जाते हैं। पर यह फ़ासिज़्म, यह गिरोहबंदी कितने दिन किसी रचना, किसी रचनाकार की आयु तय करती है यह भी हम सब जानते हैं। इसलिए कि गिरोहबंदी में तात्कालिक रुप से झंडा तो ऊंचा दिखता है लेकिन सर्वकालिक बन पाता नहीं।
 
हमारे यह क्रांतिकारी लेखक बात तो ऐसे करते हैं कि समूची व्यवस्था में बस अभी आग लगा देंगे। लेकिन हालत यह है कि उन को आग लगाने के लिए भी ब्रेख्त, नेरुदा, नाज़िम हिकमत आदि की मदद लेनी पड़ती है। यह कभी सोचा क्या हमारे साथियों ने कि क्यों नहीं अभी तक हिंदी में भी एक ब्रेख्त का विकल्प वह रचना के स्तर खड़ा कर पाए। बताइए कि इतने सालों में हिंदी के पास कोई ब्रेख्त, कोई नेरुदा, कोई नाज़िम हिकमत क्यों नहीं हो पाया? इस लिए कि ब्रेख्त या नेरुदा, नाज़िम हिकमत कोरी लफ़्फ़ाज़ी से नहीं बनते। हमारे हिंदी के साथी इस तथ्य से जाने कब तक आंख चुराएंगे? जाने कब जागेंगे? क्या जब हिंदी समूची विदा हो जाएगी तब? तुलसीदास लिख गए हैं कि का वर्षा जब कृषि सुखाने ! लेकिन दिक्कत यह है कि आप तो तुलसीदास को भी लतियाते हैं, गरियाते हैं। विषय कोई भी हो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खंडहर से टकराना हमारे साथियों का प्रिय शगल है।  बात अमरीकी दादागिरी से टकराने की होगी, लेकिन आप को ब्राह्मणवाद के जिन्न से फ़ुर्सत नहीं। क्या तो अमरीका भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था का एक्सटेंशन है। अमरीका और चीन कैसे तो समूची दुनिया के बाज़ार पर काबिज़ हो गए हैं, उद्योग से लगायत भाषा तक पर वह काबिज़ हो चुके हैं पर उन से सीधे टकराने में आप को खतरा है। क्यों कि वह ताकतवर हैं। बताइए कि जिस देश में बड़े-बड़े उद्योगपति खुदरा बाज़ार में भी अपने पांव डाल दें, दाल, सब्ज़ी बेचने लग जाएं, उस देश की किसी भी भाषा का क्या होगा? सोचते हैं हमारे यह क्रांतिकारी साथी? सोचते हैं कभी यह कि मोबाइल, कंप्यूटर से लगायत कार तक कुछ भी अपने देश में क्यों नहीं बनता? जिस देश में उद्योगपति और बिल्डर सरकार खरीद लेते हों, सरकार को गुलाम बना लेते हों, घरेलू नौकर बना लेते हों और आप की सारी क्रांतिकारिता इन के खिलाफ़ खामोश हो। फिर भी आप लड़ेंगे भूमंडलीकरण से। बहुत अच्छा !
 
एक लतीफ़ा याद आता है। आप को भी सुनाए देता हूं। एक मुहल्ले में एक नया परिवार बसा। सब के घर में मिया बीवी में कुछ न कुछ खटपट होती रहती थी। पर उस नए आए सज्जन के घर में बहुत दिन के बाद भी ऐसा कुछ नहीं दिखा तो एक दिन कुछ लोग उस नए आए सज्जन के घर गए। और बात ही बात में पूछ लिया घर के मुखिया से कि आखिर इस का राज़ क्या है? कैसे मैनेज करते हैं आप? जनाब बोले वेरी सिंपिल ! हम लोगों ने आपस में काम बांट लिए हैं। बड़े-बड़े काम मैं देख लेता हूं। छोटे-छोटे काम पत्नी देख लेती हैं। सो कोई झंझट नहीं होती। सिंपल ! कहते हुए जनाब खुद खुश हो लिए। अब लोगों ने पूछा कि ज़रा छोटे काम क्या हैं, और बड़े काम क्या हैं लगे हाथ यह भी बता दीजिए। जनाब बोले कि देखिए घर में क्या खाना पकेगा, क्या कपड़ा आएगा, कहां घूमने जाएंगे, क्या खरीदा जाएगा, कौन आएगा, कौन जाएगा क्या होगा, क्या नहीं होगा आदि-आदि  छोटे-छोटे काम मेरी पत्नी देख लेती हैं। और बाकी बड़े-बड़े काम मैं देख लेता हूं। पूछा गया कि यह बड़े-बड़े काम क्या हैं? जनाब बोले यही कि अमरीका क्या कर रहा है, रुस और चीन में क्या हो रहा है? वियतनाम, जापान आदि में क्या हो रहा है, क्या होना चाहिए आदि-आदि मामले मैं देख लेता हूं। बताते हुए जनाब फिर खुश हुए और बोले कि इस तरह हमारे यहां सब कुछ स्मूथली हो जाता है, कोई खटपट नहीं होती। लोग समझ गए और अपने-अपने घर लौट गए। तो बस अपने हिंदी के क्रांतिकारी लेखक भी यही काम कर रहे हैं। और बड़े-बड़े मसलों को लफ़्फ़ाज़ी के मार्फ़त तय कर रहे हैं रचना में भी और बोलने में भी। रचना जैसे निकृष्ट काम से इन्हें कोई सरोकार ही नहीं । फिर दूसरे छोटे-छोटे मसले भी इन लेखकों ने भ्रष्ट राजनीतिक पार्टियों, कारपोरेट सेक्टरों, बिल्डरों के ज़िम्मे छोड़ दिया है। भूमंडलीकरण, बाज़ार विरोध, अमरीका की दादागिरी, मोदी की सांप्रदायिकता आदि बड़े-बड़े काम खुद संभाल लिए हैं। 
 
कथाक्रम में बड़े कहे जाने वाले एक लेखक पहले दिन जब बोल रहे थे और जाहिर है विषय से भटक कर बोल रहे थे और बहुत खराब बोल रहे थे तो श्रोताओं में बैठे कुछ लेखक बिदकने लगे। तो एक लेखक ने बड़ी शालीनता से भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता की याद दिलाई और कहा कि जैसे तू बोलता है, वैसा ही लिख! तो यह जैसा लिखते हैं, वैसा ही बोल भी रहे हैं ! इस में हैरत किस बात की?  लोग हंसने लगे। इन साथियों के साथ एक दिक्कत यह भी कि वह अपनी पसंद को ही फ़ैसला मान लेते हैं। उन को अगर गुलाब पसंद है तो वह चाहते हैं कि बागीचे में सारे फूल गुलाब के ही हों। गलती से भी कोई दूसरा फूल देखना उन्हें व्यवस्था में आग लगाने की लफ़्फ़ाज़ी पर मज़बूर कर देता है। अजब सनक है। इस का क्या करें? खैर,साहित्य की मशाल की बात जब प्रेमचंद ने की थी तब माहौल वही था, लेखक तब यही कर रहे थे। इस लिए प्रेमचंद ने यह कहा। 
 
गांधी के हिंद स्वराज की याद है? हिंद स्वराज में गांधी ने देश और समाज के तीन दुश्मन बताए हैं। एक रेल, दूसरे डाक्टर और तीसरे वकील । इस के पीछे उन का सुविचारित तर्क था। यह कि रेल लूट का, जमाखोरी का सब से बड़ा औज़ार है। कि कहीं कुछ उत्पादित होता है उसे एक साथ बहुत सारा आप रेल से कहीं दूसरी जगह ले जा सकते हैं। और वहां उस चीज़ का अकाल पड़ सकता है। आप देखिए न कि उड़ीसा से हावड़ा तक एक रेल लाइन है जो बस्तर से गुज़रती है लेकिन वहां बस्तर या आस-पास के लिए एक भी पैसेंजर ट्रेन नहीं है। मालगाड़ियां चलती हैं। तो किस लिए चलती है यह मालगाड़ियां? स्पष्ट है कि अंबानी, टाटा आदि कारपोरेट द्वारा देश के संसाधनों की लूट के कारोबार की सहूलियत के लिए चलती हैं यह मालगाड़ियां। पर देखिए न कि हमारे एक क्रांतिकारी साथी को गांधी और उन का हिंद स्वराज भी बकवास लगा। इस लिए कि उन्हें भगत सिंह को गांधी से बड़ा साबित करना था। वह भूल गए कि भाषण में गांधी को बिना खारिज किए भी वह भगत सिंह को बड़ा कह सकते थे। सच यही है कि गांधी और भगत सिंह दोनों ही बड़े लोग हैं। पर कहा न कि अगर उन्हें गुलाब पसंद है तो बाकी फूलों का कत्ल ज़रुरी है उन के बागीचे में। खैर, गांधी समाज और देश का दूसरा दुश्मन डाक्टर को बताते हैं हिंद स्वराज में। वह कहते हैं कि अगर डाक्टर न हों तो लोग अनाप-शनाप ढंग से रहना-खाना बंद कर देंगे। क्यों कि वह जब जानेंगे कि गड़बड़ी करेंगे खाने-पीने या जीवन में तो कष्ट होगा। और डरेंगे सो गड़बड़ नहीं करेंगे। लेकिन आज वह जानते हैं कि कुछ गड़्बड़ करेंगे खाने-पीने या रहन -सहन में तो डाक्टर है ना ! दवा दे देगा, ठीक हो जाएंगे। और अब देखिए न कि अस्पताल लूट के कितने बड़े अड्डे बन चले हैं। गांधी के हिंद स्वराज में देश और समाज का तीसरा दुश्मन वकील है। ध्यान रहे कि गांधी खुद भी वकील थे। लेकिन गांधी की राय में अगर वकील न होता तो देश में लोग कचहरी नहीं जाते और अंगरेजों का कानून लागू नहीं हो पाता। वकील ही लोगों को कचहरी ले गए और लोगों ने इस बहाने अंगरेजों का कानून स्वीकार लिया। आज भी देखिए न कि वकील अगर न बचाएं देश के अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को तो उन की जगह जेल ही होगी। बच्चा-बच्चा जानता है कि फला हत्यारा है, डकैत है, भ्रष्ट पर अदालतें उन्हें बख्शे रहती हैं तो इन्हीं वकीलों की कुतर्क और भ्रष्ट तरकीबों के बूते। सोचिए कि एक से एक वकील हैं कि एक-एक पेशी के वह तीस-तीस लाख रुपए लेते हैं। तो यह कौन लोग हैं जो इन वकीलों को बिना उफ़्फ़ किए एक-एक पेशी के तीस -तीस लाख देते हैं? और हमारे क्रांतिकारी साथी कहते हैं कि गांधी और उन का हिंद स्वराज बकवास है। खैर यह उन की राय है। उन्हें यह कहने का हक भी है। पर हम बात कर रहे थे प्रेमचंद के साहित्य के मशाल की। तो दोस्तों जो अभी हमने ज़िक्र किया गांधी के हिंद स्वराज में वर्णित तीन दुश्मनों का तो क्या आप जानते हैं कि यह रेल, डाक्टर और वकील को देश और समाज का दुश्मन बताने की अवधारणा किस की है? क्या गांधी की है? हरगिज़ नहीं। यह पूरी की पूरी अवधारणा टालस्टाय की है। सोचिए कि गांधी जैसा बड़ा नेता भी टालस्टाय जैसे लेखक के विचारों पर चलता था। गांधी तो टाल्स्टाय से इतना प्रभावित थे कि जब दक्षिण अफ़्रीका में जो पहला आश्रम बनाया तो उस का नाम भी टाल्स्टाय के नाम पर ही रखा। गांधी रवींद्र नाथ टैगोर से भी बहुत प्रभावित थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधी को महात्मा उपाधि से विभूषित करने वाले टैगोर ही हैं। वह टैगोर ही थे जिन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र बोस को समझाया था कि वह गांधी का विरोध छोड़ दें। और दिलचस्प यह कि सुभाष चंद्र बोस टैगोर की सलाह सहर्ष मान गए थे। तो प्रेमचंद के सामने यह सब घट रहा था तो वह लिख रहे थे कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।
 
और आज का लेखक और आज का साहित्य? राजनीति, कारपोरेट, अफ़सरों और बिल्डरों कि पिछाड़ी धोने में न्यस्त और व्यस्त है। बस कोई पद और पुरस्कार मिल जाए। पिछाड़ी खोलने में भी देरी नहीं लगती। बताइए कि एक टाल्स्टाय थे, टैगोर थे, प्रेमचंद थे और एक आज हम लोग हैं। अपने-अपने अहंकार में व्यस्त-न्यस्त और पस्त! और लड़ने चले हैं भूमंडलीकरण से। 
 
एक कालीचरण स्नेही हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी के आचार्य हैं। कथाक्रम में कहने लगे कि अगर मेरा वश चलता तो भूमंडलीकृत की जगह कमंडलीकृत लिखता और फिर अपने मनपसंद शगल ब्राह्मणवाद के खंडहर से छद्म तलवारबाज़ी पर आ गए। कालीचरण स्नेही जैसे आचार्यों की दिक्कत यह है कि विषय कोई भी हो उन के पास बस एक ही आर्केस्ट्रा होता है, वही बजाने लगते हैं। दलित विमर्श की दुकानदारी का यह बड़ा चटक रंग है। बताइए कि अगर उन के कुतर्क को स्वीकार ही कर लें एक बार तो उस हिसाब से यह सारे विश्ववि्द्यालय तो ब्राह्मणवाद के ही केंद्र हैं। तो आप ब्राह्मणवाद की गोद में क्यों बैठे हैं भाई? उतर क्यों नहीं जाते? कालीचरण ने बीते दिनों हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों का भी हवाला दिया और तंज़ कसा। ठीक बात है। पर जब दलितों की महारानी मायावती ने इसी हिंदी संस्थान की चूलें हिला दी थीं, अट्ठासी से अधिक पुरस्कार रद्द कर दिए थे तब आप के मुंह में क्यों दही जमी रह गई थी? तब एक सांस भी नहीं निकाली किसी क्रांतिकारी लेखक ने भी? किसी दलित विमर्शकार ने तब। स्थिति तो यह थी कि मायावती की डील एक बिल्डर से हो रही थी। हिंदी संस्थान के भवन को गिरा कर वहां एक बहुमंज़िला कांप्लेक्स बनाने के लिए। करोड़ो रुपए की डील थी। सो मायावती तो हिंदी संस्थान बंद करने पर आमादा थीं। अपने कार्यकाल में कई साल तक न वहां निदेशक नियुक्त किया न कार्यकारी अध्यक्ष। वहां के कर्मचारी पसीना-पसीना हो रहे थे। पर यह दलित विमर्शकार और क्रांतिकारी लेखक सब चुप थे। अखबारों तक की यह हैसियत नहीं रह गई थी कि इस बारे में खबर छाप सकें। दलितों की महारानी मायावती का यह आतंक था। मैं ने हार कर तब आर टी आई ऐक्टिविस्ट नूतन ठाकुर से चर्चा की । मेरे निवेदन पर उन्हों ने एक जनहित याचिका दायर की हाईकोर्ट में। हाईकोर्ट के आदेश का भी मायावती ने संज्ञान नहीं लिया। डेढ़-दो साल तक। अंतत: जब नौबत कंटेंप्ट आफ़ कोर्ट की आ गई तब जाते-जाते मायावती ने कार्यकारी अध्यक्ष और निदेशक नियुक्त किया। हिंदी संस्थान के प्राण बचे। अखिलेश सरकार आई तो पुरस्कार सब बहाल हुए। कुछ नए पुरस्कार भी शुरु हुए। पुरस्कार राशि बढ़ी। तो अब कालीचरण स्नेही भी बोलने लगे। लेकिन तब तो बोलती बंद हो गई थी। लेकिन हिंदी लेखकों की एहसानफ़रामोशी देखिए कि सब कुछ हो गया लेकिन एक भी लेखक ने नूतन ठाकुर को एक औपचारिक धन्यवाद भी देना ज़रुरी नहीं समझा आज तक! और देखिए कि अपनी छोटी-छोटी लड़ाइयों से भी कतरा कर शुतुर्मुर्गी अदा के मालिक यह लेखक भूमंडलीकरण से लड़ते रहे दो दिन तक। कोरी लफ़्फ़ाज़ी हांक-हांक कर। अब उन की इस अदा पर कोई कैसे न कुर्बान हो भला?
 
एक पुराना चुनावी वाकया याद आ गया है। १९८५ में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हो रहे थे। तब मैं जनसत्ता, दिल्ली छोड़ कर नया-नया स्वतंत्र भारत, लखनऊ आया था। तत्कालीन सिंचाई मंत्री वीरबहादुर सिंह तब गोरखपुर में पनियरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सर्वेसर्वा जयपुरिया ने मुझे बुलाया और बड़ी शालीनता से कहा कि आप जनसता, दिल्ली से आए हैं, उस तरह की रिपोर्टिंग में वीरबहादुर के खिलाफ़ कुछ मत लिख दीजिएगा। वीरबहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री हैं। तो ज़रा ध्यान रखिएगा। हमारे पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से। खैर मैं गया पनियरा। पनियरा में वीरबहादुर ने विकास के इतने सारे काम कर दिए थे कि पूछिए मत। जहां पुलिया बननी चाहिए थी, वहां भी पुल बना दिया था। दिल्ली, लखनऊ के लिए सीधी बसें थीं। गांव-गांव बिजली के खभे। नहरें, ट्यूबवेल। उस धुर तराई और पिछड़े इलाके में विकास की रोशनी दूर से ही दिख जाती थी। और चुनाव में भी उन के अलावा किसी और का प्रचार कहीं नहीं दिखा। जबकि उम्मीदवार कई थे वहां से। वीरबहादुर सिंह के मुख्य प्रतिद्वंदी थे चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारती क्रांति दल से दयाशंकर दुबे। दुबे जी से मेरी व्यक्तिगत मित्रता भी थी। उन को प्रचार में भी शून्य देख कर मुझे तकलीफ़ हुई। गोरखपुर उन के घर गया। लगातार दो दिन। वह नहीं मिले। जब कि वीरबहादुर सिंह रोज मिल जाते थे। खैर एक दिन एकदम सुबह पहुंचा दयाशंकर दुबे के घर। बताया गया कि हैं। उन के बैठके में मैं बठ गया। थोड़ी देर में वह आए। उन के चेहरे का भाव देख कर मैं समझ गया कि मेरा आना उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगा है। तो भी मेरे पुराने मित्र थे। सो अपनी अकुलाहट नहीं छुपा पाया। और पूछ ही बैठा कि अगर इसी तरह चुनाव लड़ना था तो क्या ज़रुरत थी यह चुनाव लड़ने की भी? बताता चलूं कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दयाशंकर दुबे वीरबहादुर सिंह से बहुत सीनियर थे। और कल्पनाथ राय से भी पहले वह छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके थे। तब छात्र राजनीति का बहुत महत्व था और कि प्रतिष्ठा भी। लेकिन कुछ अहंकार और कुछ गलत फ़ैसलों के चलते दयाशंकर दुबे की यह गति बन गई थी। खैर जब मैं एकाधिक बार उन के इस तरह चुनाव लड़ने की बात पर अपना अफ़सोस ज़ाहिर कर चुका तो वह थोड़ा असहज होते हुए भी कुछ सहज बनने की कोशिश करते हुए बोले कि हुआ क्या कुछ बताओगे भी ! कि बस ऐसे ही डांटते रहोगे ? मैं ने उन्हें बताया कि दो दिन से पनियरा घूम रहा हूं और आप का कहीं नामोनिशान नहीं है। न प्रचार गाडियां हैं, न पोस्टर, न बैनर। एकदम शून्य की स्थिति है। तो वह धीरे से हंसे और बोले कि देखो मैं पनियरा में वीरबहदुरा से क्या चुनाव लड़ूंगा? पनियरा चुनाव में वीरबहुदुरा से मेरा बाजना वैसे ही बाजना है जैसे बाघ से कोई बिलार बाज जाए! तो क्या लड़ना? फिर चुनाव लड़ने की ज़रुरत क्या थी? सुन कर दयाशंकर दुबे बोले, मैं तो दिल्ली गया था गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट मांगने। बड़ा उछल कूद के बाद भी जब गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट नहीं मिला तो घूमते-घामते चौधरी चरण सिंह से जा कर मिला और गोरखपुर शहर से उन की पार्टी का टिकट मांगा तो वह बोले कि गोरखपुर शहर से तो नहीं लेकिन जो पनियरा से लड़ों तो मैं तुम्हें अपना टिकट दे सकता हूं। तुम्हें चुनाव लड़ने का खर्चा, झंडा, पोस्टर, गाड़ी भी दूंगा और खुद आकर एक बढ़िया लेक्चर भी दूंगा। तो मैं मान गया। और लड़ गया। यह सोच कर कि चलो इस में से कुछ आगे का खर्चा भी बचा लूंगा। मैंने कहा कि आप की एक भी गाड़ी दिखी नहीं क्षेत्र में। तो वह बोले कि कैसे दिखेगी? दो गाड़ी मिली है। एक पर खुद चढ़ रहा हूं दूसरी को टैक्सी में चलवा दिया है। कह कर वह फ़िक्क से हंसे। मैंने पूछा, और पोस्टर, बैनर? वह थोड़ा गंभीर हुए पर मुस्कुराए और उठ कर खड़े हो गए। धीरे से बोले, मेरे साथ आओ ! फिर वह भीतर के एक कमरे में ले गए। अजब नज़ारा था। एक कबाड़ी उन के पोस्टर तौल रहा था। उन्हों ने हाथ के इशारे से दिखाया और फिर मुझ से धीरे से बोले, यह रहा पोस्टर ! मैं अवाक रह गया। फिर वह मुझे ले कर बाहर के कमरे में आ गए। मैने पूछा कि यह क्या है? चुनाव के पहले ही पोस्टर तौलवा दे रहे हैं? वह बोले अभी अच्छा भाव मिल जा रहा है। चुनाव बाद तो सभी बेचेंगे और भाव गिर जाएगा। मैंने कहा चिपकवाया क्यों नहीं? वह बोले व्यर्थ में पोस्टर भी जाता, चिपकाने के लिए मज़दूरी देनी पड़ती, लेई बनवानी पड़ती। बड़ा झमेला है। और फिर वीरबहदुरा भी अपना मित्र है, वह भी अपने ढंग से मदद कर रहा है। कह कर वह मुसकुराए। मैं समझ गया। और उनसे विदा ले कर चला आया। बाद के दिनों में जैसा कि जयपुरिया ने कहा था वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री भी बने। और यही दयाशंकर दुबे उनके साथ-साथ घूमते देखे जाते थे। अब सोचिए कि जैसे वीरबहादुर सिंह के साथ दयाशंकर दुबे घूमने लगे थे हमारे हिंदी लेखक भी भूमंडलीकरण के साथ नहीं डोल रहे हैं? हां लेकिन जैसे दयाशंकर दुबे जो एक सच देख रहे थे और कह भी रहे थे बेलाग हो कर कि वीरबहदुरा से बाजना वैसे ही है जैसे किसी बाघ से बिलार बाज जाए! यही काम अपने हिंदी लेखक भी नहीं कर रहे हैं? सच यह है कि मुहावरों से लड़ना भी बड़ा कठिन होता है। हम आज की तारीख में भूमंडलीकरण से लड़ाई में इसी कठिन काम में अपनी ऊर्जा भस्म कर रहे हैं। भूमंडलीकरण अब दुनिया का एक सच है। लफ़्फ़ाज़ी के बूते उस से लड़ना हो नहीं सकता। ज़मीनी तैयारी है नहीं आप के पास। भूमंडलीकरण से लड़ना वैसे ही है आज की तारीख में जैसे पाकिस्तान अमरीका से लड़ रहा है। जैसे मुस्लिम देश अमरीका से लड़ रहे हैं। अमरीका की रोटी, अमरीकी संसाधन, अमरीका का हथियार और ड्रोन हमलों पर बिल्ली की सी गुर्राहट ! गांधी वैसे ही नहीं कहते थे कि साध्य तो पवित्र होने ही चाहिए, साधन भी उतने ही पवित्र होने चाहिए। अमरीकी औज़ारों से, भूमंडलीकरण के औज़ारों से ही आप उस से लड़ेंगे? तो लड़ चुके फिर आप।
 
काशीनाथ सिंह ने कुछ दिन पहले कहा था कि राजनीति में जो हो रहा है, दुर्भाग्य से वैसा ही कुछ साहित्य में भी हो रहा है और आज आलोचना में रचना की बजाय रचनाकार को ध्यान में रखा जाता है। काशीनाथ सिंह ज़मीन से जुड़े रचनाकार हैं। इसलिए साफ देख पाते हैं, साफ लिख पाते हैं और साफ बोल भी पाते हैं। याद कीजिए कि जैसा तू बोलता है वैसा ही लिख! काशी की इस बात में थोड़ा मैं और जोड़ना चाहता हूं कि साहित्य में आज राजनीति की ही तरह जाति भी एक फ़ैक्टर हो चला है। इतना ही नहीं जैसे कांग्रेस, सपा, बसपा आदि पार्टियां अपना निकम्मापन, भ्रष्टाचार आदि छिपाने के लिए एक फर्जी धर्मनिरपेक्षता का तंबू तान कर खड़ी हो जाती हैं ठीक उसी तरह हिंदी पट्टी के लेखक रचना की कमज़ोरी छुपाने के लिए प्रगतिशीलता, विचारधारा आदि का फर्ज़ी खेल शुरु कर देते हैं। दलित विमर्श, ब्राह्मण विमर्श का खाना खींच देते हैं। बात रचना की न हो कर लफ़्फ़ाज़ी विमर्श में बदल देते हैं। ब्रेख्त, नेरुदा, नाज़िम हिकमत का उद्धरण ठोंकने लगते हैं। हिंदी के रचनाकार नहीं याद आते उन्हें।
 
काशीनाथ सिंह ने कथाक्रम में भी भूमंडलीकरण के हस्तक्षेप को ईमानदारी से स्वीकार किया। अपने घर का ही हवाला दिया। अपने बेटे, अपने पोते का हवाला दिया। और बताया कि जैसे बेटा भोजपुरी बोलने से कतराता है, पोता हिंदी बोलने से कतराता है। उन्होंने भूमंडलीकरण की अच्छी चीज़ों को स्वीकार करने पर हामी भी भरी। और कहा कि इतना खराब शब्द भी नहीं है भूमंडलीकरण। काशी ने तो यहां तक कहा कि अगर बाज़ार है तो हम हिंदी लेखकों को भी अपना बाज़ार क्यों नहीं बनाना चाहिए? जया जादवानी ने भी भूमंडलीकरण से अब न बच पाने की बात को स्वीकार किया। प्रांजल धर ने अच्छी सूचनाएं भी परोसीं। जै्से कि वह अपने लिखने में धारदार होते हैं, विषय से नहीं भटकते, बोलने में भी नहीं भटके। महेश कटारे भी विषय पर बने रहे। अखिलेश  भी विषय पर बोले और संतुलित बोले। लेकिन ज़्यादातर लेखक विषय से भटके रहे और अपने मनगढ़ंत निष्कर्षों और विमर्श पर समूची शक्ति और दुराग्रह से डटे रहे। कहूंगा कि पूरी बेशर्मी से। एक विद्वान तो जयनंदन के सम्मान पर बोल रहे थे। तमाम दाएं-बाएं बोल गए पर जयनंदन की किसी एक रचना का नाम नहीं ले पाए। अलबत्ता यह फ़तवा ज़रुर जारी कर गए कि जयनंदन मुझ से बड़ी रचना नहीं लिख पाए हैं। वाह ! क्या किसी लेखक के सम्मान का भाषण यही होता है? खैर, यह लखनऊ है आप कुछ भी बोल लीजिए, सुन लेता है।
 
कथाक्रम में एक समय नामवर सिंह और राजेंद्र यादव में अपनी-अपनी स्थापनाओं को ले कर खूब गरमागरमी होती थी, विमर्श का आनंद आता था। नामवर का व्याख्यान गहरे ले जाता था, राजेंद्र यादव की सूचनाएं और विमर्श एक नई खिड़की खोलती थी, पूरे दो दिन तक गरमाहट बनी रहती थी, एक आग सुलगती रहती थी, जिस की आंच साल भर तक बनी रहती थी और कथाक्रम की प्रतीक्षा भी एक आकुल भूख के साथ बनी रहती थी। लेकिन एक बार अशोक वाजपेयी आए तो नामवर सिंह और राजेंद्र यादव भी बिखर गए उस बार। अशोक वाजपेयी के व्याख्यान की आंच में। कथाक्रम के आयोजन के वह सुनहरे विमर्श के दिन अब याद बन कर रह गए हैं। कह सकते हैं कि लेखकों की अब विषय पर बिना तैयारी के आना, रचना, सूचना और समझ के स्तर पर निरंतर दरिद्र होते जाना, विषय कोई भी हो एक ही रिकार्ड हर बार, हर जगह बजाना कुछ ज़्यादा होने लगा है। शैलेंद्र सागर जिस मीरा भाव से कथाक्रम का आयोजन करते हैं, लेखक साथियों को उन की इस पवित्र भावना का भी आदर करते हुए आना चाहिए इस कार्यक्रम में। कथाक्रम अपनी कुंठाएं उतारने का मंच तो नहीं ही है, न ही बनाए जाने की ज़रुरत है। जिस तरह दो-तीन लेखिकाओं के बीच मंच से व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप हुए और लगभग झोंटा-झोटव्वल विमर्श की नौबत आई वह कतई अशोभनीय था। मैंने इसी कथाक्रम में नामवर-राजेंद्र के आरोप-प्रत्यारोप भी देखे हैं। लेकिन उन दोनों ने या उनके अनुयायियों में भी कभी लेशमात्र भी व्यक्तिगत विमर्श सामने नहीं आए। उसी मुहब्बत से मिलते-जुलते दिखते थे, एक दूसरे की आलोचना को बर्दाश्त करते हुए। मैंने इसी कथाक्रम में रवींद्र कालिया को मंच पर नामवर सिंह की बात का कड़ा प्रतिवाद करते देखा है। इस के बाद मंच से नीचे उतर कर नामवर सिंह से रवींद्र कालिया को बिलकुल आनंद भाव में 'प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो' भी कहते और नामवर को पान कूंचते मंद-मंद मुसकुराते भी देखा है। यह भाव बना रहना चाहिए। कथाक्रम या किसी भी विमर्श का सम्मान इसी भाव में निहित है। व्यक्तिगत कुंठा या गरमा गरमी में नहीं। जैसा कि इस बार कुछ लेखिकाओं ने कर दिया। भेद-मतभेद होते हैं, आलोचना होती है, उस को हजम करना सीखना चाहिए। उसके प्रतिरोध के और भी रास्ते हैं। और भी तरीके हैं। यह तो हरगिज़ नहीं। कि आप आंख में आंख डाल कर बात भी नहीं कर पाएं। सलाम-दुआ भी न कर पाएं? इस घटिया राजनीति में भी तमाम गिरावट और मुश्किलों के बावजूद पराजित व्यक्ति भी विजेता को गले मिल कर, हाथ मिला कर बधाई देता ही है। और आप तो साहित्य रच रहे हैं। और किसी भी साहित्य, किसी भी रचना का काम जोड़ना ही है, तोड़ना नहीं है। कथाक्रम भी जोड़ने के लिए ही साल भर में एक बार सब को बटोरता है, तोड़ने के लिए नहीं। लेकिन क्या कीजिएगा फर्जी विमर्शों को सर चढ़ाने की उपज की यह यातना भी हम नहीं तो क्या चेतन भगत भुगतेंगे? बोएंगे बबूल और चाहेंगे आम? सोचिए कि  मुहावरों से भी लड़ना सचमुच कितना कठिन है। और हम हैं कि लड़ने चले हैं भूमंडलीकरण से! भाई वाह !

 

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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पटना में ‘मैनाघाट के सिद्ध एवं अन्य कथाएँ’ पर विमर्श

पटना: पटना प्रगतिशील लेखक संघ ने वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ द्वारा रचित ‘मैनाघाट के सिद्ध एवं अन्य कथाएँ’ पर विमर्श आयोजित किया। शुभारंभ करते हुए साहित्यकार राजकिशोर राजन ने इस कथा संग्रह का परिचय देते हुए कहा कि कथाकार ने ‘आम्रपाली’ और ‘कुणाल’ को नए आयाम में प्रस्तुत कर प्राचीनता में नवीनता का आभास कराया है। यह हिन्दी कथा की बड़ी उपलब्धि है।
 
संग्रह की अन्य कथाएं – मैनाघाट के सिद्ध, एक थी रूपा, भाभी रुकसाना कथाएं लोक जीवन से जुड़ी कथाएं हैं जो हमारे दुख-सुख के भागीदार हैं। उनकी कहानी ‘महुआ बनजारिन’ की कुछ पंक्तियों को राजन ने रेखांकित किया- ‘गांव में प्रचलित है कि नट्टिन गोधपरनी जब गाँव में प्रवेश करती है, बूढ़ी औरतें अपने घर के किशोर और तरुण लड़कों को छिपाकर किवाड़ बन्द कर देती। क्योंकि नट्टिन की आँख में अजगर का आकर्षण था।
 
कवि शहंशाह आलम ने कथाकार श्री शलभ के संदर्भ मे कहा कि पचासवें दशक से हिन्दी साहित्य के कोमल मधुर गीतकार के रूप में शलभ जी जाने जाते थे बाद में क्षेत्रीय इतिहासकार के रूप मे वे चर्चित हुए। कोसी अंचल के साहित्य, लोककथा एवं इतिहास के प्रति उनके योगदान को भी उन्होंने रेखांकित किया। श्री शलभ ने इस कथा संग्रह द्वारा कथाकार के रूप में अपने को दर्ज कराया है जो स्तुत्य है। ये कथाएं ऐतिहासिकता के साथ-साथ आधुनिकता का भी प्रतिनिधित्व करती है, कथाएं रोचकाता से पूर्ण हैं। 
 
विभूति कुमार ने कहा कि लोकगीतों को कथा में पिरो कर इस कथाकार ने एक नवीन प्रयोग किया है। ‘महुआ बनजारिन’ इसका उत्कृष्ट प्रमाण है। भागलपुर दंगा से संबन्धित कथा ‘भाभी रुकसाना’ में साम्प्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल दिखती है तथा ‘एक थी रूपा’ में ग्रामीण चित्रण को बड़ी कुशलतापूर्वक उकेरा गया है।
 
संचालन करते हुए अरविन्द श्रीवास्तव ने श्री शलभ की साहित्यिक यात्रा एवं अनुसंधानात्मक कृतियों की चर्चा की एवं उपस्थित विद्वतजनों को धन्यवाद दिया। 
 
 अरविन्द श्रीवास्तव की रिपोर्ट. संपर्क: 09431080862

‘रामलीला’ फिल्म से हिंदुओं की धार्मिक आस्था, विश्वास और भावनाओं को ठेस

प्रिय मित्र, मेरे पत्र लिखने के लगभग डेढ़ माह बाद भी भारत सरकार और सेंसर बोर्ड की ओर से फ़िल्म के नाम में से 'रामलीला' शब्द हटाने के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं की गयी है और आर टी आई के पत्र पर सूचना भी नहीं दी गयी है अतः मैंने उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री से अनुरोध किया है कि वे ही जन-भावनाओं का सम्मान करते हुए इस फ़िल्म को वर्तमान नाम “गोलियों की रासलीला–रामलीला” से उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन न होने देना सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्यवाही करने का कष्ट करेंl मेरा यह मानना है कि यदि यह हिंदी फ़िल्म उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन से बैन कर दी जाती है तो निर्माता निर्देशक को मजबूरन फ़िल्म का नाम बदलना ही पड़ेगा l
 
आज 12 नवम्बर (मंगलवार) हैl 3 दिन बाद यानि 15 नवम्बर को भंसाली प्रोडकशन्स के बैनर तले निर्मित और श्री संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रामलीला’ के रिलीज होने के समाचार हैंl
 
मैंने बीते सितम्बर माह में केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड से इस फिल्म के नाम में से 'रामलीला' शब्द को हटाने और ऐसा नहीं होने पर इस फ़िल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने का निवेदन किया था। केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड की चेयरपर्सन श्रीमती लीला सेमसन, मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीमती पंकजा ठाकुर समेत सभी क्षेत्रीय अधिकारियों को सम्बोधित ज्ञापन भारत सरकार के सूचना सचिव श्री बिमल जुल्का, सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी समेत राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी प्रेषित किया गया थाl
 
एक तरफ उपरोक्त जिम्मेवार प्राधिकारियों में से किसी भी प्राधिकारी ने इस प्रकरण में उनके द्वारा की गयी कार्यवाही की कोई भी सूचना मुझे नहीं दी थी और वहीं दूसरी ओर इस फ़िल्म से जुड़े कार्यक्रम सार्वजनिक रूप से होते जा रहे थे और गानों के प्रोमोज रिलीज़ किये जा रहे थेl व्यथित होकर मैंने बीते 18 अक्टूबर को केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड मुंबई के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी से सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत आवेदन कर छह बिंदुओं पर सूचना भी मांगी थी l
 
मैंने भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले बने चलचित्र “गोलियों की रासलीला–रामलीला” का नाम परिवर्तित करने हेतु अपने ईमेल प्रत्यावेदन दिनांक 30 सितम्बर 2013 के सन्दर्भ से ईमेल प्रत्यावेदन पर केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा लिए गए अंतिम निर्णय की सत्यापित प्रति देने, ईमेल प्रत्यावेदन पर  केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया से सम्बंधित पत्रावली/पत्रावलिओं के अभिलेखों की नोट शीट्स सहित सत्यापित प्रतियां प्रदान करने, ईमेल प्रत्यावेदन के सम्बन्ध में केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड मुंबई के कार्यालय में प्राप्त एवं केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड मुंबई के कार्यालय से निर्गत पत्राचार की सत्यापित प्रतियां प्रदान करने, केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले बने चलचित्र “गोलियों की रासलीला–रामलीला” को दिए गए प्रमाणपत्र की सत्यापित प्रति देने, केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले बने चलचित्र “गोलियों की रासलीला–रामलीला” को प्रमाणपत्र निर्गत करने की प्रक्रिया से सम्बंधित पत्रावली/पत्रावलिओं के अभिलेखों की नोट शीट्स सहित सत्यापित प्रतियां प्रदान करने और भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले बने चलचित्र “गोलियों की रासलीला–रामलीला” के परीक्षण के लिए बनाये गए सलाहकार पैनल के सदस्यों के नामों की सूचना देने का अनुरोध किया थाl
 
यद्यपि केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर आज तक फिल्म ‘रामलीला’ के प्रमाणन का कोई भी समाचार नहीं है तथापि 15 नवम्बर को भंसाली प्रोडकशन्स के बैनर तले निर्मित और श्री संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रामलीला’ के रिलीज होने की चर्चा आम हैंl
 
केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा न तो मेरे ज्ञापन पर लगभग डेढ़ माह बाद भी कोई कार्यवाही ही की गयी प्रतीत होती है एवं लगभग एक माह होने पर भी फ़िल्म के प्रमाणन से सम्बंधित कोई सूचना भी नहीं दी गयी हैl ऐसे में केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर आज तक फिल्म ‘रामलीला’ के प्रमाणन नहीं होने के बाबजूद 15 नवम्बर को भंसाली प्रोडक्शन्स के बैनर तले निर्मित और श्री संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रामलीला’ के रिलीज होने की चर्चा आम होने से केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड और भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर मुझे संदेह हो रहा हैl मेरा यह स्पष्ट मत है कि केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा इस फ़िल्म को गुपचुप तरीके से “गोलियों की रासलीला–रामलीला” नाम से प्रदर्शन के लिए प्रमाणीकृत कर दिया गया हैl
 
प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भेजे ज्ञापन की प्रति नीचे दी जा रही है l
 
———- Forwarded message ———-
From: urvashi sharma <rtimahilamanchup@gmail.com>
Date: Sun, 10 Nov 2013 14:27:39 +0530
Subject: जन-भावनाओं का सम्मान करते हुए भंसाली प्रोडकशन्स के बैनर तले निर्मित और श्री संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म का नाम “गोलियों की रासलीला–रामलीला” से उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन न होने देना सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्यवाही करने के सम्बन्ध में
To: cmup <cmup@nic.in>, cmup <cmup@up.nic.in>
 
सेवा में,
श्री अखिलेश यादव
मुख्य मंत्री -उत्तर प्रदेश
लखनऊ – उत्तर प्रदेश "cmup" <cmup@nic.in>, "cmup" <cmup@up.nic.in>,
 
विषय: जन-भावनाओं का सम्मान करते हुए भंसाली प्रोडक्शन्स के बैनर तले निर्मित और श्री संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म  का नाम “गोलियों की रासलीला–रामलीला” से उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन न होने देना सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्यवाही करने के सम्बन्ध में
 
 
महोदय,
आज 10 नवम्बर (रविवार) हैl 5 दिन बाद यानि 15 नवम्बर को भंसाली प्रोडक्शन्स के बैनर तले निर्मित और श्री संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रामलीला’ के रिलीज होने के समाचार हैंl
 
मेरा आरम्भ से ही मानना है कि इस फ़िल्म का नाम 'रामलीला' विश्व के हिंदुओं की धार्मिक आस्था, विश्वास और भावनाओं को ठेस पंहुचाने वाला हैl फ़िल्म का नाम 'रामलीला' हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर उनको मर्माहत करता हैl इससे हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचने के अलावा उनकी मानहानि भी हो रही है। फ़िल्म करोड़ों हिंदुओं की आस्था और विश्वास के प्रतीक भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र के सर्वथा प्रतिकूल है और ऐसे में इस फ़िल्म के नाम में रामलीला शब्द का प्रयोग करोड़ों हिंदुओं की आस्था के साथ किया गया बेहूदा खिलवाड़ है। यह सर्वविदित है कि 'रामलीला' भगवान् राम के जीवन चरित्र का धार्मिक नाट्य मंचन है। कथित फ़िल्म का भगवान् राम के चरित्र से दूर दूर तक कोई भी वास्ता नहीं हैl यही नहीं, फ़िल्म के नाम 'रामलीला' से पहले एक टैग लाइन "गोलियों की रासलीला" भी जोड़ी गयी है और इस फ़िल्म में एक अश्लील मुजरा गीत है जिसके के माध्यम से हिंदू देवताओं को गलत तरीके से दिखाया गया है। फ़िल्म के ट्रेलर में कई अश्लील संवाद और अंतरंग दृश्य भी हैं जिनका भगवान् राम के जीवन चरित्र के  धार्मिक नाट्य मंचन  'रामलीला' से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं हैl अब तक यू ट्यूब पर उपलब्ध क्लिप्स के अनुसार इस फिल्म का प्रदर्शन अत्यंत भौंडा और अश्लील है और फिल्म के पोस्टर भी काफी अश्लील हैं।
 
मैंने बीते सितम्बर माह में केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड से इस फिल्म के नाम में से 'रामलीला' शब्द को हटाने और ऐसा नहीं होने पर इस फ़िल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने  का निवेदन किया था। मैंने यह भी कहा था क