‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पढ़ने के बाद यशवंत ने क्या लिखा, देखें

Yashwant Singh : आजकल कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पढ़ रहा हूँ। अमेज़न से 3 डॉलर का मंगाया। वर्ष 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने जो ये राजनीतिक दस्तावेज पेश किया, वह अदभुत है। ध्यान से देखिए तो दुनिया में दो तरह के लोग ही नजर आते हैं- शोषक और शोषित। वर्ग संघर्ष इस धरती का …

मज़दूर क्रांति के ध्येय को समर्पित एक बुजुर्ग साथी द्वारा तैयार किया गया पर्चा… बहस के लिए

मूलाधार और अधिरचना में जाति-समस्या भारत में जाति की समस्या कई दशकों से व्यापक चर्चा का विषय रही है। इस चर्चा में वामपंथी आंदोलन का भी हस्तक्षेप रहा है, खास कर कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन का। वामपंथी आन्दोलन में इस समस्या को लेकर एक लम्बे अरसे से विचार-मंथन चल रहा है। एक सैद्धान्तिक आन्दोलन होने के …

गल्तियां करके भी न सीखने वाले को भारतीय वामपंथ कहा जाता है…

Mahendra Mishra : प्रयोग करने वाले गल्तियां करते हैं। हालांकि उन गल्तियों से वो सीखते भी हैं। लेकिन गल्तियां करके नहीं सीखने वाले को शायद भारतीय वामपंथ कहा जाता है। 1942 हो या कि 1962 या फिर रामो-वामो का दौर या न्यूक्लियर डील पर यूपीए से समर्थन वापसी। घटनाओं का एक लंबा इतिहास है। इन सबसे आगे भारतीय समाज और उसमें होने वाले बदलावों को पकड़ने की समझ और दृष्टि। सभी मौकों पर वामपंथ चूकता रहा है। भारत में वामपंथ पैदा हुआ 1920 में लेकिन अपने पैर पर आज तक नहीं खड़ा हो सका। कभी रूस, तो कभी नेहरू, कभी कांग्रेस, तो कभी मध्यमार्गी दलों की बैसाखी ही उसका सहारा रही।

माकपा के सवर्ण कम्युनिस्टों को सदबुद्धि आ गई…

Mukesh Kumar : शुक्र है कि माकपा को अब जाति व्यवस्था से उपजी सामाजिक विषमता के कारण होने वाले अत्याचारों एवं भेदभाव को अपनी नीति-रीति का हिस्सा बनाने की सद्बुद्धि आ गई है। सवर्णों के नेतृत्व ने उसे ऐसा करने से रोक रखा था, लेकिन सफाचट हो रहे जनाधार ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपना रवैया बदले और भारतीय परिस्थितियों में सामाजिक-आर्थिक विषमता को जोड़कर देखे।

व्यापमं : वामदलों का प्रदर्शन आज, किसी पर भरोसा नहीं, चौथे खम्भे को देंगे ज्ञापन

बादल सरोज : चार वामपंथी दलों के साझे आव्हान पर 8 जुलाई को व्यापमं के मुख्यालय पर एक प्रदर्शन किया जाएगा। इस प्रदर्शन के जरिये जो मानें उठायी जाएंगी उनमे प्रदेश को मौतों की महामारी से बचाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के तत्काल इस्तीफा देने , मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच कराने , एसआईटी और एसटीएफ की भी जांच कर यह पता लगाने कि उन्होंने कितने सबूत मिटाकर किन किन को बचाया है, शामिल हैं। 

येचुरी से भी कोई उम्मीद नहीं… ये सब ड्राइंग रूम वामपंथी हैं…

Gunjan Sinha : येचुरी से भी कोई उम्मीद नही. करात, येचुरी आदि सब ड्राइंग रूम वामपंथी हैं… इन्हें कभी जनता के साथ संघर्ष करते देखा? सुना? चाहे हज़ारों किसान मर जाएं , लोग बिन दवा बिना भोजन मरें, लड़कियां रेप का शिकार हों, देश गिरवी हो जाए, आतंकी धर्मान्धता दिलों को बाँट दे, ये ड्राइंग रूम वामपंथी दिल्ली के एयर कंडीशन बेडरूम के बाहर रात नहीं बिता सकते. कुँए का पानी नहीं पी सकते. लेकिन मीडिया मैनेज कर सकते हैं. इनसे फिर भी बेहतर हैं माणिक सरकार या अतुल अनजान जो अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं.

रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा- आपने मार्क्स को पढ़ा है क्या?

Rakesh Srivastava : रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा कि आपने कहीं मार्क्‍स को तो नहीं पढ़ा है जो मजदूरों के प्रति संवेदनशील हैं,  तो ढोलकिया ने कहा कि मैंने चौथी तक पढ़ाई की है और रोज़ ही बस जिंदगी की किताब पढ़ता हूं .. और, ऐसा कहते हुए ढोलकिया किसी विचारधारात्‍मक डिफेंस में नहीं थे .. वह बहुत सहज और प्राकृत थे और इस इंटरव्‍यू में उनके एक- एक शब्‍द में ईमानदारी और प्रामाणिकता की ध्‍वनि थी .. रवीश कुमार भी बहुत जल्‍द बने- बनाए फ्रेमवर्क से बाहर निकलकर सहज हो लिए ..