लक्ष्मी का बहिर्गमन नियंत्रित हो

स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व हमारे देशवासियों ने भावी भारत के रूप में सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का सपना देखा था। उन्हें विश्वास था कि अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिलते ही हम भारतीयों का ‘स्वराज्य’ स्वावलम्वन से सशक्त और सम्पन्न बनकर ‘सुराज’ की स्वार्णिम कल्पनाएं साकार करेगा। प्रख्यात सुकवि-नाटककार जयशंकर प्रसाद कृत ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक के निम्नांकित गीत में इस जनभावना की अनुगूँज दूर तक सुनाई देती है-

‘हिमाद्रि तुंग श्रृंगसे, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती।

उपर्युक्त पंक्तियों में स्वतंत्रता का ‘स्वयंप्रभा’ (आत्मनिर्भर) और ‘समुज्ज्वला’ (भ्रष्टाचार मुक्त) रूप कल्पित है। महात्मागाँधी के ‘हिन्द स्वराज’ में वर्णित तत्कालीन राजनीतिक-दृष्टि भी स्वतंत्रता के इसी रूप का स्वागत करने को प्रस्तुत मिलती है। स्वाधीनता संग्राम के अहिंसक आन्दोलनों की धूम के मध्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाना, उनकी होलियाँ जलाया जाना और घर-घर में सूत कातकर, वस्त्र बुनकर स्वावलम्वन का आधार पुष्ट करना स्वतंत्रता को ‘स्वयंप्रभा’ बनाने के ही व्यावहारिक प्रयत्न थे। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के अनन्तर देशहित के ये महान प्रयत्न हाशिये पर डाल दिए गए।

खादी जो तप-त्याग की प्रतीक थी ; सादगी का प्रतिमान थी, वह चुनावों में मत प्राप्त करने का साधन बन कर रह गई। महात्मा गाँधी का नाम लेकर सत्ता सुख भोगने वालों ने औद्योगीकरण, आधुनिकता और विकास का नारा उछालकर गाँधी के सपनों के भारत हिन्द स्वराज की भारतीय प्रगति-योजना महानगरीय चकाचैंध की वेदी पर बलिदान कर दी। हमारी स्वतंत्रता न ‘स्वयंप्रभा’ बन सकी और न ‘समुज्ज्वला’ हो सकी। भ्रष्टाचार ने स्वतंत्रता की सारी उज्ज्वलता निगल ली। स्वतंत्र भारत में स्वदेशी के प्रयोग के स्थान पर आयातित विदेशी वस्तुओं के प्रदर्शन का ऐसा चाव चढ़ा है कि आज हमें यही ज्ञात नहीं कि हम जो वस्तुएं क्रय कर रहे हैं उनमें क्या स्वदेशी है और क्या विदेशी ? क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं ? आज हम आयातित वस्तुएं क्रय करके स्वयं को अधिक गौरवान्वित अनुभव करते हैं। यह दुखद है। उन्नीसवीं शताब्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा था –

‘‘अंग्रेज राज सुख साज सबै अति भारी।
सब धन विदेस चलि जात यहै अति ख्वारी।।

परतंत्र भारत में हमारे साहित्यकार नेता और बुद्धिजीवी सजग थे। उन्हें चिन्ता थी कि देश की लक्ष्मी षडयन्त्रपूर्वक देश के बाहर ले जायी जा रही है। ब्रिटिश शासन की वाणिज्य नीतियाँ हमारे राष्ट्र की आर्थिक संप्रभुता पर आघात कर रही हैं ; हमारे कुटीर उद्योग मिट रहे हैं और आयातित वस्तुओं का उपयोग देश-हित में नहीं है। उन्होंने हर संभव बलिदान देकर इस स्थिति को बदला और देश को ब्रिटिश-शासन से मुक्ति दिलाई ताकि भारतीय-नेतृत्व भारतीय-हितों की सिद्धि हेतु प्रयत्नशील हो किन्तु कैसी विडम्बना है कि देश में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने वाली हमारी सरकारों ने स्वदेशी के उपयोग की भावना को ऐसी तिलांजलि दी कि हमारे बाजार विदेशी माल बेचने के केन्द्र बनकर रह गये। यहाँ तक कि पटाखा, दीपक, विद्युतबल्ब झालर जैसी छोटी-छोटी वस्तुएं भी आयातित हो रही हैं। हम पर हर अवसर पर आघात करने वाला, हमारे हितों की पूर्ति में बाधक बनने वाला और हमारी सीमाओं पर गृद्ध-दृष्टि गड़ाने वाला हमारा पड़ोसी चीन हमारे ही बाजारों से लाभान्वित होकर सशक्त हो रहा है ; उसकी जनशक्ति रोजगार पा रही है और हमारे अपने देशवासी कारीगर बेरोजगार हो रहे हैं। इस चिन्ताजनक स्थिति के लिए हम और हमारी चुनी हुई सरकारें ही उत्तरदायी हैं।

यह सुखद है कि विगत कुछ वर्षों में हुई राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं में चीन की भारत-विरोधी भूमिका से भारतीय जनमानस पुनः सजग हुआ है और चीन से आयातित वस्तुओं का बहिष्कार कर रहा है। आवश्यकता इस बात की भी है कि हम भारत में वस्तुएं बनाने के साथ-साथ उन्हें खरीदने और उनका उपयोग करने के लिए सच्चे मन से संकल्प लें। दीपावली के शुभ अवसर पर हम भारतीयों की लक्ष्मी भारत की सीमाओं के अन्दर ही सुशोभित हो ; हमारी लक्ष्मी का बहिर्गमन यथासंभव नियंत्रित हो, यही सच्चा लक्ष्मी-पूजन है। जनता और सत्ता दोनों स्तरों पर ऐसे सार्थक प्रयत्न किये जाने पर ही हमें लक्ष्मी मैय्या की कृपा प्राप्त होगी और हमारी स्वाधीनता स्वयंप्रभा हो सकेगी।

डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र

विभागाध्यक्ष-हिन्दी

शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय

होशंगाबाद म.प्र.

drkrishnagopalmishra@yahoo.com

mob – 9893189646

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आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं.

आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

मैं हर तरफ और हर किसी के लिए शांति-सुख-समृद्धि की कामना करता हूँ।

आभार

यशवन्त

फाउंडर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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इन अखबारों और चैनलों ने नहीं दिया अपने कर्मचारियों को बोनस

मुंबई : जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के तहत मीडियाकर्मियों का जितना एरियर बना, उसे डकार चुके कई अखबारों के मालिकों ने अब अपनी कई यूनिटों में कर्मचारियों का बोनस का पैसा भी हजम कर लिया और उन्हें एक ढेला तक बोनस के नाम पर नहीं दिया। बोनस न देने वालों में कुछ चैनलों का नाम भी सामने आ रहा है जिनमें टाइम्स नाऊ और इंडिया न्यूज़ भी शामिल है. सूत्रों के हवाले से मिली खबर के मुताबिक टाइम्स नाऊ और जूम ने मुम्बई के अपने कर्मचारियों को इस बार दीपावली पर बोनस नहीं दिया. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से खबर है कि यहाँ इंडिया न्यूज़ ने अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया।

उत्तर प्रदेश से ही एक और खबर आ रही है कि यहाँ हिंदुस्तान प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया। हिंदुस्तान प्रबंधन पर पहले भी आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं देता है। इसी तरह गुजरात के भुज से खबर है कि यहाँ सौराष्ट्र ट्रस्ट के अखबार कच्छ मित्र डेली ने अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया। यहाँ 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। मराठी दैनिक सकाळ के नासिक यूनिट सहित कई दूसरी यूनिटों में भी कर्मचारियों को बोनस नहीं दिए गए. बोनस के नाम पर सिर्फ कुछ पैसे देने की भी खबर आ रही है।

डीबी कार्प से भी एक खबर आ रही है कि इस कंपनी ने अपने अखबारों की कई यूनिट में कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया. वहीं, कई कर्मचारियों का पैसा प्रत्येक माह काटा गया और बाद में उसी पैसे को बोनस के रूप में दे दिया गया. दैनिक जागरण से भी खबर आ रही है कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने अपने गोरखपुर यूनिट में कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया और सिर्फ आधा किलो सोनपापड़ी का पैकेट देकर खुश करने का प्रयास किया.

राष्ट्रीय सहारा से भी खबर आ रही है कि यहाँ भी कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया गया. अमर उजाला में भी कई यूनिट में बोनस ना दिए जाने की कर्मचारियों ने सूचना भेजी है. जिन मीडिया कर्मियों को बोनस नहीं मिला, उनकी दिवाली इस बार फीकी रही. आपको बता दें कि बोनस देकर मालिक कर्मचारी पर एहसान नहीं करते हैं बल्कि बोनस हर कर्मचारी का अधिकार है. अगर आपको भी बोनस नहीं मिला है तो उसकी शिकायत कीजिये. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप भी पढ़िए बोनस एक्ट के क्या हैं नियम… 

http://labour.gov.in/hi/information-payment-bonus-1965

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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दीपावली सांग के लिए इस स्कूल प्रेयर से भला अच्छा क्या हो सकता है (सुनें)

Yashwant Singh : दिवाली सांग… मेरठ में मेरे एक मित्र हैं Vishal Jain जी. कई स्कूलों के संचालक हैं. खुद काफी इन्नोवेटिव हैं. नया नया खोजते रचते रहते हैं. इन्होंने अपने स्कूल प्रेयर के लिए अदभुत गीत तैयार कराया है. सुबह सुबह इनके स्कूलों में जो प्रार्थना बच्चे गाते हैं, उसे सुनकर खुद ब खुद बच्चों संग गाने का मन करने लगता है.

यह प्रेयर भारत के गंगा जमुनी तहजीब, सर्व धर्म समभाव का अदभुत उदाहरण है. आइए दिवाली के दिन यह प्रेयर हम सब सुनें और हर तरफ शांति समृद्धि समझदारी हो, इसके लिए प्रार्थना करें.

प्रेयर लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=4bZjvdc149g

आप इसे सुनते हुए यह भी सोचिए कि बचपन के दिनों में अपने स्कूल में कौन सा प्रेयर गाते थे.. अगर याद आए तो उसे भी गुनगुनाइए और सबको सुनाइए.

आप सभी को दीपाावली की ढेरों शुभकामनाएं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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सूरत के हीरा व्यापार की हकीकत भी जान लीजिए

Prakash K Ray : सूरत के हीरा कारोबारी सावजी भाई ढोलकिया ने फिर अपने कर्मचारियों को कार और मकान दिवाली बोनस के रूप में दिया है. ढोलकिया ने इस बार 400 फ्लैट और 1,260 कारें कर्मचारियों गिफ्ट की हैं. साल 2014 में ढोलकिया ने 1300 से ज्यादा कर्मचारियों को कार, मकान और ज्वैलरी दी थी. साल 2015 ढोलकिया ने 491 कारें और 200 फ्लैट गिफ्ट किए थे. यह उपहार पाने वालों में अनेक का वेतन तो सिर्फ दस हज़ार है. सूरत के इस हीरा व्यापारी द्वारा अपने कर्मचारियों को घर और कार बाँटने की ख़बर सोशल मीडिया पर ख़ूब चल रही है.

बहरहाल, आम तौर पर किसी तरह जीने भर कमानेवाले लोगों के लिए निश्चित रूप से ऐसी ख़बरें रूचिकर लगती हैं. यह टिप्पणी उस व्यापारी पर नहीं है, मैंने ख़बर को पढ़ा भी नहीं. लेकिन, भारत के सूरत शहर के हीरा कारोबार पर कुछ कहने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ.

1. दुनिया के 90 फ़ीसदी से अधिक हीरा सूरत में चमकाया जाता है जहाँ भयावह स्थितियों में बेहद कम मज़दूरी (अधिकतर लोग दो डॉलर से भी कम पर काम करते हैं) पर लोग काम करते हैं जिनमें बच्चे भी हैं. वर्ष 2007 के एक आकलन के मुताबिक, तब 30 हज़ार से अधिक बच्चे इस काम में लगे हुए थे.

2. सूरत आनेवाला अनपॉलिश्ड हीरा अधिकतर अफ़्रीका (लाइबेरिया, सियरालियोन, आइवरी कोस्ट आदि) से आता है और अवैध होता है. इस कारोबार से अफ़्रीका के ब्लड डायमंड धंधे को मदद मिलती है और वहाँ के भयानक युद्धों को फंडिंग मिलती है. कुछ पत्थर ऑस्ट्रेलिया और कनाडा से भी आते हैं. औने-पौने पर ख़रीदे गये इन पत्थरों को चमका कर/सोने में मढ़ कर भारी मुनाफ़े पर बेचा जाता है.

3. पिछले साल एचएसबीसी के स्विस अकाउंट में जिन 1195 लोगों के नाम थे, उनमें से 77 हीरा कारोबार से थे. इन 77 में से 64 मात्र 12 परिवारों के हैं.

4. कोई आदमी बिना किसी पहले से स्थापित कारोबारी की कृपा के हीरा व्यवसाय में नहीं घुस सकता है.

पत्रकार Prakash K Ray की एफबी वॉल से.

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कई चैनलों के स्ट्रिंगर के घर नही जलेंगे दीपावली पर चूल्हे!

मीडिया की रीढ़ कहे जाने वाले स्ट्रिंगरों के घर दीपावली का जश्न फीका होने की आशंका है। मिली जानकारी अनुसार कई चैनल पहले से ही घाटे में हैं। उनके पास स्ट्रिंगर्स को देने लिए आश्वासन  के सिवाय कुछ नहीं है। इसमें कुछ चैनल ऐसे हैं जो मीडिया इंडस्ट्री में कई सालों से स्थापित है और कुछ हाल हीमें उभरे हैं। लेकिन सबसे खास बात यह कि सभी चैनल जनता के सामने अपने को सबसे आगे बताने काम करते हैं। कुछ चैनल उस कतार में शामिल हैं जो आज भी 90 रुपए से 150 रुपए ही भुगतान करते हैं। ऐसे में स्ट्रिंगर बड़ी मुश्किल से 3000 रुपए प्रति माह ही कमा पाता है।

आप खुद अंदाज़ लगाए कि इस दौर में स्ट्रिंगर अपने परिवार को कैसे पालेगा और क्या बचायेगा? चैनल के संपादकों को आप ने बड़े बड़े हुनरमंद लोगों को पछाड़ते हुए छोटे पर्दे पर देखा होगा लेकिन यह कभी अपने स्ट्रिंगरों की बातों से पार नहीं पा सके हैं। ऐसे में इन चैनलों की पब्लिक के बीच क्या छवि होगी, आप समझ सकते हैं। सरकार भी चैनल के मालिकों के डर से कुछ भी बोलने से परहेज करती है। यदि सरकार चाहे तो दो मिनट में पता चल सकता है कौन कौन से चैनल भुगतान कर रहे हैं और कितना कर रहे हैं। सावधान हो जाओ स्ट्रिंगर भाईयों… वरना जिंदगी भर चैनलों के मालिकों के शोषण का शिकार होते रहोगे… लड़ना सीखो… एक बार एकजुट होकर दुनिया को सच बताओ… तभी ये सब सभ्य भेड़िये एक दम ठीक हो सकेंगे.

आपका स्ट्रिंगर भाई

बलवीर
बरेली
webnewzindia@gmail.com

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क्यों मनाते हैं दिवाली?

शंभूनाथ शुक्ल :  भाई Siddharth Kalhans ने पूछा है क्यों मनाते हैं दीवाली? मेरी मोटी बुद्धि में जो समाया है, वह यह है कि …

भारत में गर्मी एक परेशान कर देने वाला मौसम है इसीलिए भारत में वर्षा की धूमधाम से अगवानी की जाती है। भारत की समस्त ऋतुओं में वर्षा को रानी माना गया है। वर्षा के समाप्त होते ही शरद का आगमन होता है जो भारत में आने वाले लोगों के लिए सबसे मुफीद मौसम है। इसीलिए अक्टूबर से फरवरी तक भारत पर्यटकों को सबसे अधिक लुभाता है। इसी शरद की अगवानी का त्योहार है दीवाली। दियों और रोशनी का त्योहार, खुशियों और उल्लास का पर्व, मेलों-ठेलों का पर्व और वह भी कोई एक या दो दिन का नहीं पूरे पांच रोज का। दीपावली का त्योहार धनतेरस से शुरू होता है और भैया दूज तक लगातार पांच दिन तक चलता है। पूरे देश में यह त्योहार समान रूप से मनाया जाता है और हिंदू, सिख, जैन तथा बौद्ध आदि सभी इसे मनाते हैं। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश देशों में इस दिन हिंदुओं को सरकारी तौर पर दीवाली की छुट्टी मिलती है। नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बर्मा, मारीशस, गयाना, थाईलैंड में तो खैर इस दिन राजकीय अवकाश रहता है और आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सारे कामकाज बंद रहते हैं। लेकिन अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में इस दिन हिंदुओं को छुट्टी मिलती है। साल २००३से तो हर साल दीपावली के रोज अमेरिका के व्हाइट हाउस को भी रोशनी से सजाने की परंपरा चली आ रही है।

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महिषासुर मर्दिनी को पूजो अथवा महिषासुर को या शत्रुघ्न को अपने मिथक में सम्मान दो या नरकासुर को। विशाल हिंदू समुदाय पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां आज से नहीं 19 वीं सदी और इसके पहले से ही इन असुरों का पूजक समाज रहा है। अगर बंकिम चंद्र चटर्जी और बाल गंगाधर तिलक ने क्रमश: दुर्गा पूजा और गणेशोत्सव के अनुष्ठान न कराए होते तो देवी दुर्गा शाक्त संप्रदाय की ईष्ट रही होतीं और गणेश जी शिव परिवार के एक सदस्य और विघ्न के देवता। विघ्नहंता का स्वरूप तो उन्हें बाद में मिला। हिंदू धर्म कोई विधिसम्मत धर्म नहीं है। यह संगमन का धर्म है जिसमें असंख्य आदिम आस्थाएं और प्रकृति पूजक जातियां मिलीं और जिनके आराध्य सुर-असुर, देवता-दैत्य-दानव-भूत व पिशाच आदि हैं। सनातन का अर्थ ही है लगातार एक सूत्र से पिरोया गया। यह सूत्र संगमन है। जो बनता है फिर टूटता है और फिर बनता है। इस धर्म का कोई नियामक नहीं कोई विधि सम्मत व्यवस्था नहीं। मैं एक सामान्य तौर पर हिंदू कहे जाने वाले समाज की बात कर रहा हूं हिंदुत्व के पैरोकार आरएसएस के लोगों के बारे में नहीं। यूं भी अहिंसा जैन परंपरा से सनातनियों में आया। जैन परंपरा हिंदू परंपरा के समानांतर बह रही एक पृथक परंपरा है और बौद्घ इसी परंपरा की उपज हैं। अगनित बार समाज सुधारकों ने इसे संवारा पर यह संगमन की महिमा है कि यह फिर वहीं पहुंच जाता है। यहां हर जाति के अपने ईश्वर हैं, अपने लोक देवता हैं और अपने ईष्ट हैं। कोई समाज सुधारक इसे बदलने की कोशिश करे अथवा कोई इसे छोड़ जाए, हिंदुओं को कोई बेचैनी नहीं होती। जो लोग कनवर्जन या लव जिहाद से घबराते हैं वे आरएसएस के लोग हैं और हिंदू धर्म के प्रवक्ता या ठेकेदार नहीं हैं, यहां तक कि वे शंकराचार्य भी नहीं जो अपने अजीबोगरीब बयान के लिए कुख्यात हो चुके हैं। शंकराचार्य दशनामी संन्यासियों के नेता तो हैं जो समग्र हिंदू समाज का मात्र पांच फीसदी है पर उस विशाल वैष्णव संप्रदाय के नहीं जिसमें सामंतवाद के उदय के साथ बर्बर आदिम दास व्यवस्था को खत्म करने के लिए आत्मा का आगमन हुआ और पशुपालक जातियों में शाकाहार का अभूतपूर्व उदय हुआ। असुरों का वध हुआ तो इस वजह से क्योंकि कृषि व्यवस्था के अनुरूप ये असुर नहीं थे और पशुपालक जातियां इनसे अनवरत भिड़ती रहीं। पर असुरों के वध के बाद भी असुर पूजा बनी रही। ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म के अंतर को भी समझना होगा। ब्राह्मणवाद यानी कि एक किस्म का श्रेष्ठतावाद जो आमतौर पर बाहरी लोगों में पाया जाता है। ब्राह्मण अपनी आनुष्ठानिक हैसियत के कारण समाज में अव्वल दरजा पाए थे पर सिर्फ इतना ही कि एक समाज में झगड़ा होने पर उसे कोई पार्टी नहीं बनाया जाता था और अगर वह उस झगड़े में शरीक नहीं है तो लोग उसे पीटते नहीं थे जबकि समाज के ब्राह्मणेतर लोग बिना कसूर पीटे जाते थे। पर वह न तो धर्म का नियामक था न ही रक्षक वह मात्र धर्म का अनुष्ठान कराने वाला पुरोहित था जिसकी राजकाज में ज्यादा दखल नहीं थी पर जिसका राज होता था वह अपनी सुविधा से ब्राह्मणवाद पैदा कर लेता था।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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यह कविता उन सभी पत्रकार भाइयों के लिए जो दिवाली में घर नहीं जा पाए

यह कविता उन सभी पत्रकार भाइयों के लिए जो दिपावली में घर नहीं जा पाए… सेना, पुलिस, अस्पताल, फायर ब्रिगेड से जुड़े लोग भी घर नहीं जा पाते… ऐसे सभी लोगों के लिए ये कविता है, दिवाली के मौके पर….

मां तू नाराज न होना

इस दिवाली मैं नहीं आ पाउंगा
तेरी मिठाई मैं नहीं खा पाउंगा
दिवाली है तुझे खुश दिखना होगा
शुभ लाभ तुझे खुद लिखना होगा

तू जानती है यह पूरे देश का त्योहार है
और यह भी मां कि तेरा बेटा पत्रकार है

मैं जानता हूं
पड़ोसी बच्चे पटाखे जलाते होंगे
तोरन से अपना घर सजाते होंगे
तु मुझे बेतहाशा याद करती होगी
मेरे आने की फरियाद करती होगी

मैं जहां रहूं मेरे साथ तेरा प्यार है
तू जानती है न मां तेरा बेटा पत्रकार है

भोली मां मैं जानता हूं
तुझे मिठाईयों में फर्क नहीं आता है
मोलभाव करने का तर्क नहीं आता है
बाजार भी तुम्हें लेकर कौन जाता होगा
पूजा में दरवाजा तकने कौन आता होगा

तेरी सीख से हर घर मेरा परिवार है
तू समझती है न मां तेरा बेटा पत्रकार है

मैं समझता हूं
मां बुआ दीदी के घर प्रसाद कौन छोड़ेगा
अब कठोर नारियल घर में कौन तोड़ेगा
तू गर्व कर मां
कि लोगों की दिवाली अपनी अबकी होगी
तेरे बेटे के कलम की दिवाली सबकी होगी

लोगों की खुशी में खुशी मेरा व्यवहार है
तू जानती है न मां तेरा बेटा पत्रकार है

देवेश तिवारी
deveshtiwaricg@gmail.com

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