दैनिक जागरण को लगा झटका, रामजी के तबादले पर श्रम विभाग ने लगाई रोक

कानपुर। “स्वघोषित चैम्पियन” दैनिक जागरण के मालिकान को ताजा झटका कानपुर श्रम विभाग से मिला है। सहायक श्रम आयुक्त आरपी तिवारी ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरूप वेतन एवं बकाये की मांग करने वाले दैनिक जागरण कानपुर में कार्यरत कर्मचारी रामजी मिश्रा के सिलीगुड़ी स्थानांतरण पर फिलहाल रोक लगा दी है। श्री तिवारी द्वारा जारी आदेश में दैनिक जागरण प्रबंधन की ओर से रामजी मिश्रा का कानपुर कार्यालय से सिलिगुड़ी किए गए तबादले को अनुचित एवं अवैधानिक करार दिया गया है।

गौरतलब है कि रामजी मिश्रा ने कानपुर श्रम विभाग में दिनांक 18 जुलाई 2017 को रिकवरी का क्लेम फाइल किया था। इससे झुब्ध होकर दैनिक जागरण के प्रबंधक ने दिनांक 24 जुलाई 2017 को रामजी का तबादला सिलीगुड़ी कर दिया था। इसके बाद रामजी ने तबादला निरस्त किए जाने की गुहार कानपुर श्रम विभाग में लगाई थी। बतातें चलें कि 19 जून 2017 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से देश के नंबर वन अखबार के मालिक सकते में आ गए थे।

कोर्ट के रुख और भविष्य की अड़चनों को सतही तौर पर ध्यान में रखते हुए मलिकान ने “कमजोर पेड़ों” को काटने की “सुपारी” प्रबंधक अजय सिंह को दे दी थी। इसके बाद अजय सिंह ने बेहद शातिराना अंदाज में उत्पीड़न करने के बाद 23 लोगों का तबादला कर दिया था। ये फैसला इन्हीं 23 कर्मचारियों में शामिल रामजी मिश्रा के मामले में आया है।

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दैनिक जागरण वालों ने भी छापा लंबा-चौड़ा माफीनामा : ‘नंबर वन का हमारा दावा गलत था’

अमर उजाला लखनऊ अखबार में पिछले दिनों एक माफीनामा छपा था कि हमने गलती से खुद को नंबर वन बता दिया. ऐसा ही माफीनामा अब दैनिक जागरण पटना अखबार में छपा है. नंबर वन होने के फर्जी दावों पर कसी गई नकेल के कारण इन अखबारों को माफीनामा छापना पड़ रहा है.

पढ़िए दैनिक जागरण पटना का माफीनामा…

अमर उजाला का माफीनामा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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जिस पत्रकार ने देह व्यापार का खुलासा किया, दैनिक जागरण ने उसे ब्लैकमेलर बता दिया… पीड़ित ने भेजा लीगल नोटिस

Ranjeet Yadav : मित्रों दैनिक जागरण के प्रधान संपादक / स्थानीय संपादक को मैंने लीगल नोटिस भेज दिया है. 15 दिनों के अंदर गलत ख़बर पर खेद प्रकाशित नही करेंगे तो मानहानि का मामला कोर्ट में किया जाएगा. गोरखपुर में बीते दिनों मैंने एक देह व्यापार को लेकर पोस्ट डाली थी. उस प्रकरण को मैंने बड़ी गंभीरता से उठाया था जिसे गोरखपुर पुलिस ने संज्ञान में लेते हुए कार्यवाही की और सभी अखबारों ने इस प्रकरण पर खबर लिखी. किन्तु दैनिक जागरण ने अपने खबर में मुझे ही ब्लैकमेलर बना दिया. उनकी खबर में क्या लिखा गया है, मैं बताता हूँ. साथ ही, मेरे मन मे उठे सवालों को भी आप जानिए.

(1) अखबार लिखता है कि सोशल नेटवर्क पर ये प्रकरण कई दिनों से चल रहा था।

-लेखक साहब, आखिर चल रहा था तो आपने संज्ञान में लेकर ख़बर क्यों नहीं लिखी… डेली अखबार है आपका.. समाज को जागरूक करने का दायित्व बनता है…

(2) अखबार ने लिखा है कि वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया गया।

-आखिर वीडियो जब हमने डाली ही नहीं तो आपने कहाँ से वीडियो का जिक्र किया… अगर वीडियो डाली गई तो कब, कहाँ कैसे देखी आपने.. सोशल नेटवर्क की लिंक का जिक्रक्यों नहीं किया… उसी आधार पर ब्लैकमेलर से बात करनी चाहिए थी…

(3) ख़बर में लिखा गया है कि होटल के कर्मचारी ने बताया कि वे हमें ब्लैकमेल कर रहे थे।

-भाई आपसे एक अपराधी कहता है कि वीडियो बनाने वाले ने हमें ब्लैकमेल करने का प्रयास किया तो आपने जरूर ब्लैकमेल करने वाले के खिलाफ पुख्ता सबूत लिए होंगे.. फिर आपने उन सबूतों का जिक्र अपने ख़बर में क्यों नहीं किया।

(4) अखबार ने निर्णय कर दिया कि ब्लेकमेलर पोस्ट डालने वाला ही है…

-भाई तब भी आपको मेरा पक्ष लेना बनता है… आपने एक पक्ष की ही ख़बर क्यों लिखी जबकि आप लिख रहे हैं कि मामला कई दिनों से सोशल मीडिया पर चल रहा है.. तब तो आपको मेरे बारे में विधिवत जानकारी थी क्योंकि लगातार आप मेरी पोस्ट को वाच कर रहे थे।

सबसे बड़ा सवाल —

मित्रों, पुलिस चौकी महज 200 मीटर की दूरी पर है और अखबारों ने पुलिस की कार्य प्रणाली पर अंगुली उठाई… फिर आपके अख़बार के कालम से ये विशेष हिस्सा कैसे छूट गया और जो खबर का हिस्सा ही नहीं बना। मेरे जैसे व्यक्ति ने जान जोखिम में डाल कर इतना बड़ा रिस्क इस शहर के परिवारों के लिए उठाया, फिर आपके अखबार में मेरे लिए स्थान क्यों नहीं? मित्रों ये सब प्लानिंग कर मुझे बदनाम करके होटल मालिकों के हृदय में स्थान बनाने का एक प्रयास था? हो भी सकता है कि इस संस्थान के ज़िम्मेदारों द्वारा मेरे खिलाफ कोई बड़ा षड्यंत्र रच कर फंसाया जाए या फिर हत्या भी कराई जा सकती है… जैसा कि प्रतीत होता है.. अगर कभी कोई अप्रिय घटना मेरे साथ होती है तो इसके प्रथम जिम्मेदार यह अखबार होगा.. उसके बाद कोई अन्य होगा.. इस पूरे प्रकरण के गवाह आप सभी हैं।

गोरखपुर के युवा पत्रकार रंजीत यादव की एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण के कथित अवैध मुंगेर संस्करण की जांच एक माह में करने का आदेश जारी

मुंगेर (बिहार) : बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के सचिव सह द्वितीय अपीलीय प्राधिकार आतीश चन्द्रा ने मुकदमा संख्या- 424110108021700412 । 2 ए में मुंगेर के लोक प्राधिकार सह जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी केके उपाध्याय को दैनिक जागरण अखबार के मुंगेर के लिए प्रकाशित कथित अवैध ”मुंगेर संस्करण” के मामले में एक माह में जांच रिपोर्ट राज्य सचिव को प्रेषित करने का आदेश जारी किया है।

सचिव सह द्वितीय अपीलीय प्राधिकार आतीश चन्द्रा ने उपयुक्त आदेश 08 सितम्बर 2017 को पटना में अपने कार्यालय कक्ष में परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद (अधिवक्ता) के पक्ष को सुनने के बाद जारी किया। बहस में लोक प्राधिकार सह जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी केके उपाध्याय भी उपस्थित थे।

सचिव आतीश चन्द्रा ने अपने आदेश में लिखा है कि- ”बिहार लोक शिकायत निवारण कानून के प्रावधान के आलोक में मुंगेर के लोक प्राधिकार सह जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी को आदेश दिया जाता है कि वे मुंगेर में पाठकों के बीच वितरित दैनिक जागरण के कथित अवैध संस्करण के आरोप की जांच करें। जांच के दौरान मुंगेर के पूर्व जिला पदाधिकारी कुलदीप नारायण की जांच रिपोर्ट और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट के प्रावधानों को भी जांच में दृष्टिगत रखें। जांच रिपोर्ट एक माह में सुपुर्द करें।”

बहस में परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद (अधिवक्ता) ने आरोप लगाया कि वर्ष 2012 के 20 अप्रैल से प्रबंधन दैनिक जागरण समाचार पत्र प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए दैनिक जागरण के मुंगेर संस्करण को वैध घोषित करते हुए छद्मपूर्वक मुंगेर संस्करण को प्रकाशित कर रहे हैं, जो सही नहीं है क्योंकि उक्त समाचार पत्र भागलपुर संस्करण हेतु निबंधित है, न कि मुंगेर के लिए।

अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने बहस में सचिव को यह भी सूचित किया कि दैनिक जागरण प्रबंधन पूरे बिहार में 38 में 35 जिलों में जिलावार अवैध संस्करण छापकर अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन प्रकाशित कर सरकारी खजाना को चूना लगा रहा है।

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जांच करने पहुंचे श्रम अधीक्षक को दैनिक जागरण के मैनेजर ने गेट के अंदर ही नहीं घुसने दिया

कानून और नियम को ठेंगे पर रखता है दैनिक जागरण प्रबन्धक… गया के श्रम अधीक्षक के साथ दैनिक जागरण प्रबंधक ने की गुंडागर्दी… नहीं करने दिया प्रेस की जांच… पंकज कुमार दैनिक जागरण गया के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं. इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड मांगा तो प्रबंधन ने इन्हें परेशान करना शुरू कर दिया… पंकज ने बिहार के श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के यहां एक आवेदन दिनांक 26.07.2017 को दिया था.. इसमें पंकज कुमार ने आरोप लगाया था कि गया सहित दैनिक जागरण बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर मीडियाकर्मियों को लाभ नहीं दिया जा रहा है. 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकारों एवं गैर-पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक समेत कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत ग्रेड की घोषणा भी नहीं की गई है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए अपने ज्ञापांक 3/डी-96/2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17 के माध्यम से दैनिक जागरण की नियमानुकूल आवश्यक जांच करने का आदेश निर्गत किया था तथा कृत कारवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराने का आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया था.  श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के उक्त आदेश के अनुपालन हेतु कल दिनांक 19 सितम्बर को श्रम अधीक्षक, गया जुबेर अहमद दैनिक जागरण प्रेस की जांच करने के लिए गए थे. परन्तु उन्हें प्रेस के मुख्य द्वार के अंदर प्रवेश करने की ईजाजत दैनिक जागरण के प्रबन्धक द्वारा नहीं दी गई.

यह घटना प्रबन्धक की गुंडागर्दी और कानून की अवहेलना को दर्शाता है.  पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. अपने गया से जम्मू तबादले को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा की मांग की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था.

बिहार से एडवोकेट मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : tiwarygaya@gmail.com

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बिहार में दैनिक जागरण कर रहा अपने कर्मियों का शोषण, श्रम आयुक्त ने जांच के आदेश दिए

दैनिक जागरण, गया (बिहार) के पत्रकार पंकज कुमार ने श्रम आयुक्त बिहार गोपाल मीणा के यहाँ एक आवेदन दिनांक लगाया था. पिछले महीने 26 जुलाई को दिए गए इस आवेदन में पंकज ने आरोप लगाया था कि गया जिले सहित जागरण के बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को कई किस्म का लाभ नहीं दिया जा रहा है. यहां 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकार एवं गैर पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक सहित कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी, पद और ग्रेड की जो घोषणा की जानी थी, उसे भी नहीं नहीं किया गया है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए एक आदेश (3 / डी-96 / 2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17) जारी कर दिया है. आदेश के माध्यम से कहा गया है कि दैनिक जागरण में कार्य के माहौल, श्रम नियमों और मजीठिया वेज बोर्ड आदि के अनुपालन की नियमानुकूल आवश्यक जांच की जाए तथा कृत कार्रवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराया जाए. ये आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया गया है.

पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. पंकज का गया से जम्मू विद्वेष के कारण तबादला कर दिया गया था. इस तबादला को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की अनुसंशा के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा देने की मांग पंकज ने की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था. श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के ताजे आदेश का लाभ हजारों मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को मिलेगा जो दैनिक जागरण सहित अन्य प्रकाशन संस्थानों में काम कर रहे हैं.

गया से जाने माने वकील और पत्रकार मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : 8797006594

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मजीठिया पर आज आएगा कोर्ट का फैसला, जागरणकर्मियों ने बैठक कर एकजुटता दिखाई

आज माननीय सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेतन आयोग को लेकर फैसला आना है। इस वेतन आयोग के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अपना फैसला सुनाया था और अख़बार मालिकानों से स्पष्ट कहा था कि वर्कर की राशि एक साल में 4 किश्तों में दें, लेकिन मालिकान 20 जे का बहाना बनाते रहे और आज तक कर्मचारियों को फूटी कौड़ी भी नहीं दी। तरह तरह से परेशान किया सो अलग। जिन्होंने मजीठिया की मांग की, कंपनियों ने उनका तबादला किया। निलंबन और सेवा समाप्ति का फरमान सुना दिया सो अलग। बावजूद इसके वर्कर हारे नहीं और अपनी लड़ाई लड़ते रहे। इस लड़ाई का कल अंतिम दिन होगा, जब माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला आएगा।

कल दैनिक जागरण के वर्कर्स की मीटिंग नोएडा के सेक्टर 62 स्थित डी पार्क में हुई, जिसमे सैकड़ों वर्कर शामिल हुए। यह मीटिंग सुप्रीम कोर्ट में आने वाले फैसले को लेकर एकजुटता दिखाने के मकसद से थी। मीटिंग में कोर्ट के आने वाले फैसले को लेकर बहुत सी बातें हुईं। बैठक में श्री विवेक त्यागी, श्री पवन उप्रेती, श्री के के पाठक, श्री महेश कुमार, श्री राजेश निरंजन और रतन भूषण ने आशा, आशंका और अनुभूति के आधार पर इस बारे में बात कही।

पवन जी ने कहा कि एकता हमारी ताकत है और हम कंपनियों से इसी दम पर अपना पाई पाई का हिसाब लेंगे। फैसला निश्चित रूप से हमारे पक्ष में आएगा। विवेक त्यागी का कहना साफ था कि वर्करों के बुरे दिन आज से ख़त्म, मालिकानों के बुरे दिन शुरू।हमारे हक़ को अब कोई नहीं मार सकता। चूँकि कल फैसला सुनाया जायेगा, तो उसमें वकीलों की रहने की जरूरत तो है, पर वे वहाँ कुछ बोल नहीं सकते।अगर उन्हें ऑर्डर को लेकर कुछ कहना होगा, तो उसकी प्रक्रिया अलग है और वह बाद में अपनायी जाएगी।हम किसी भी सूरत में हार नहीं सकते। उन्होंने हमारे मार्गदर्शक आदरणीय श्री के के पुरवार की बात भी दोहरायी कि वर्कर चाहकर भी मजीठिया के केस को हार नहीं सकता।

केके पाठक ने साफ कहा कि रात में कंपनी के कुछ लोगों से बात हुयी है, वे सब परेशान हैं इस बात को लेकर कि अंदर वालों को बरगलाया जा रहा है कि जागरण मजीठिया जुलाई से लागू कर रहा है। लेकिन सच यही है कि यह सब मैनेजमेंट की मीठी गोली है। इस बात से पर्दा कल के बाद उठ जायेगा कि सही में जागरण क्या करने जा रहा है। राजेश निरंजन और महेश कुमार का कहना हुआ कि अगर कंपनी सभी को मजीठिया का लाभ देती है, तो अच्छी बात है लेकिन यह जागरण की सोच के हिसाब से सही नहीं लगता। अगर कंपनी अच्छी होती तो 4 वेतन आयोग को हड़प नहीं कर जाती।

रतन भूषण का कहना हुआ कि कल का दिन अख़बार के कर्मचारियों के लिए सुनहरा दिन होगा। वर्करों की सारी समस्या कल ख़त्म हो जायेगी। मालिकानों की नींद हराम होगी साथ ही उनके प्यादों की भी, क्योंकि मालिकान फ्लॉप प्यादों को अब नहीं रखने वाले। वर्करों के पास हारने के लिए है क्या? हारना तो मालिकों को है और उनकी हार सुनिश्चित है, क्योंकि एक्ट हमारे साथ है और एक्ट हमारा संविधान है, जिससे देश चलता है।

उन्होंने आगे कहा, इस केस के कई रंग दिखे और ये रंग दिखाने वाले थे कुछ वकील जो इस केश में थे। सभी को पता है कि वर्करों के वकीलों में श्री प्रशांत भूषण, श्री कोलिन घोंसाल्विस, श्री परमानंद पांडेय, श्री उमेश शर्मा, श्री आश्विन वैश्य और श्री विनोद पांडेय मुख्य थे, लेकिन इस टीम में जब तक श्री प्रशांत भूषण की एंट्री नहीं हुई थी, केस को कॉलिन साब नाव की तरह मझधार में डगमगाते रहते थे। उनका रवैया कभी चित तो कभी पट वाला होता रहता था, जिसको लेकर हमारे मन में शंकाएं आती थीं। यहाँ हमारी मज़बूरी भी थी। दरअसल कॉलिन सीनियर थे तो कोर्ट उन्हें ही सुनती थी। किसी और को सुनती ही नहीं थी। ऐसी स्थिति में इन उपरोक्त वकीलों की टीम बेकार साबित होती थी। कुछ समय कॉलिन को झेलने के बाद हमने अपने साथियों के साथ निर्णय लिया कि अब प्रशांत भूषण जी को ही लाना होगा, नहीं तो कोर्ट की सुनवाई का यह सिलसिला पता नहीं और कितने साल चलेगा। कॉलिन साहब पता नहीं इसमें और क्या क्या मुद्दे उठवायेंगे। श्री प्रशांत सर का आभार की उनके दो बार कोर्ट में जाने और अपनी बात रखने के बाद हम इस मुकाम पर आ गए। कल आर्डर आएगा।

साथियों के मन में आर्डर को लेकर क्या चल रहा है मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं आशस्वस्त हूँ कि फैसला हमारे पक्ष में आना है। कल 20 जे का अंत होना है। टाइम बाउन्ड भी हो सकता है और पिछले आर्डर में दिए गए समय से सब में कम होगा, जैसे एक साल को 6 माह, 4 किश्त को 2 या 10 दिन के अंदर सब ख़त्म करने की बात भी हो सकती है।
अंत में आगे बड़ी तरक्की है, जीत हमारी पक्की है…. जय हो

मजीठिया क्रान्तिकारी और वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण के फेसबुक वॉल से.

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इन दोनों बड़े अखबारों में से कोई एक बहुत बड़ा झुट्ठा है, आप भी गेस करिए

हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबारों ने एक रोज पहले पन्ने पर लीड न्यूज जो प्रकाशित की, उसके फैक्ट में जमीन-आसमान का अंतर था. हिंदुस्तान लिख रहा है कि यूपी में सड़कों के लिए केंद्र ने पचास हजार करोड़ रुपये का तोहफा दिया वहीं दैनिक जागरण बता रहा है कि सड़कों के लिए राज्य को दस हजार करोड़ रुपये मिलेंगे. आखिर दोनों में से कोई एक तो झूठ बोल रहा है.

आप भी गेस करिए, इन दो में से बड़ा वाला झुट्टा कौन है….

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दैनिक जागरण आफिस में भड़ास4मीडिया डॉट कॉम पढ़ना मना है!

अभिव्यक्ति की आजादी का झूठा ढिंढोरा पीटता है दैनिक जागरण… मीडिया वालों की खबर देने वाले पोर्टल भड़ास4मीडिया पर लगा रखा है प्रतिबंध… बड़े-बड़े लेखों और मंचों के जरिए दैनिक जागरण के संपादक-मालिक लोग हमेशा से आवाज उठाते रहते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए. ये लोग अपने मीडिया कर्मचारियों को भी नसीहत देते हैं कि तथ्य के साथ बातों को रखा जाए, लोकतंत्र में हर खंभे को सम्मान दिया जाए. लेकिन वास्तविकता कुछ और भी है. आज उस समय बहुत बुरा फील हुआ जब पत्रकारिता जगत की खबर देने वाले पोर्टल भड़ास4मीडिया के बारे में पता चला कि इस पर दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ऑफिस में पूर्णत प्रतिबंधित लगाया हुआ है.

पत्रकारों के सुख-दुख की खबरों को देने वाले और मीडियाकर्मियों के हित की आवाज उठाने वाले भड़ास4मीडिया की आवाज को कुचलने का प्रयास अखबार मालिक हमेशा से करते आये हैं मगर अखबार मालिक ये क्यों नही जानते कि सभी पत्रकारों के पास आज कल टच स्क्रीन वाला मल्टी मीडिया फोन है, स्मार्ट फोन है, घर में लैपटाप है. आपने ऑफिस में भले ही भड़ास पर पाबंदी लगा दी है लेकिन पढ़ने वाला तो अपने मोबाइल में भी पढ़ लेगा.

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से जुड़े सभी लोगों को हर पहलू पर अपनी बात कहने का अधिकार होता है. स्वस्थ वातावरण का निर्माण तभी सम्भव है जब सबकी बात सुनी जाए. अगर बात संवैधानिक रूप से रखी जा रही है तो उसे सबको सुनना चाहिए. मगर यह पूर्णत: गलत है कि आप समाज में नारा तो लगाओ कि सभी को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है लेकिन सामने वाले की आवाज को चुपचाप कुचल दो.. शायद इसे ही बोलते हैं मुंह में राम बगल में छूरी…. भड़ास4मीडिया पर से दैनिक जागरण प्रबंधन को पाबंदी हटानी चाहिए और उसे कोशिश करनी चाहिए कि वह अपने मीडियाकर्मियों को सभी कानूनी लाभ दे.

लेखक नवीन द्विवेदी गाजियाबाद के अखबार शिप्रा दर्पण के संपादक हैं. उनसे संपर्क 9910091121 या naveendwivedi.pimr@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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शेम शेम दैनिक जागरण! मजीठिया मांगने पर संकट से घिरे वरिष्ठ पत्रकार का जम्मू कर दिया तबादला

दैनिक जागरण बिहार का अमानवीय शोषणकारी चेहरा…दैनिक जागरण के वरिष्ठ एवं ईमानदार पत्रकार पंकज कुमार का मजीठिया के अनुसार वेतन मांगने पर जम्मू किया तबादला…. वीआरएस लेने  के लिए जागरण प्रबंधन बना रहा है दबाव… बिहार के गया जिले में दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज कुमार अपनी बेख़ौफ़ एवं निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. ये दैनिक जागरण के बिहार संस्करण के स्थापना काल से उससे जुड़े हुए हैं.

इनको स्वास्थ्य संबंधी समस्या के कारण 2004 में पेस मेकर लगा था जिसे वर्ष 2016 में बदलकर पुन: अधिक शक्तिशाली पेसमेकर लगवाना पड़ा था. उसी वर्ष अक्तूबर 2016 में इनका पोस्ट्रेट का आपरेशन भी पटना में हुआ. अपनी गंभीर बीमारी एंव स्वास्थ के कारण इन्होंने माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के आलोक में मजीठिया वेतन आयोग की मांग दैनिक जागरण प्रबन्धक से कर दिया. इसके बाद दैनिक जागरण प्रबन्धक ने शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया. पोस्ट्रेट ग्रिड के आपरेशन के दौरान ही पंकज कुमार को डायपर और लुंगी पहनकर कार्यालय आने के लिए बाध्य किया गया. इनके वेतन से पहले 14 दिन फिर एक बार 7 दिन की कटौती भी दैनिक जागरण ने कर ली जबकि इनका 92 दिन का उपार्जित अवकाश देय था.

पंकज कुमार ने गया में दैनिक जागरण को एक विश्वसनीयता प्रदान की थी. वर्ष 2003 के नवम्बर माह में राष्ट्रीय राजमार्ग के उप महाप्रबंधक इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या ने सनसनी फैला दी थी. जहां सभी अखबार इस हत्या का कारण सत्येन्द्र दुबे द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय में भ्रष्टाचार संबंधी की गई शिकायत बता रहे थे वहीँ पंकज कुमार ने इस हत्या का कारण बिहार में गिरती हुई कानून व्यवस्था को जिम्मेवार मानते हुए सड़क लुटेरों द्वारा इस घटना को अंजाम देना बताया था. सीबीआई की जांच में भी यही सामने आया था.

क्रूर एवं अमानवीय दैनिक जागरण प्रबन्धक ने इस तरह के पत्रकार को भी नहीं बख्शा और मुख्य महाप्रबंधक आनन्द त्रिपाठी ने मजीठिया आयोग के अनुसार वेतन की मांग पर नाराजगी जताते हुए दो माह का वेतन लेकर स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने को कहा दिया तथा इनकार करने पर जम्मू जैसे दुर्गम इलाके में एक बीमार पत्रकार को तत्काल प्रभाव से जाने का फरमान जारी कर दिया. जनता की आवाज होने का दावा करने वाले ये अखबार खुद अपने ही कर्मचारियों का गला हक़ के लिए आवाज उठाने पर घोटने से बाज नहीं आते हैं.  पंकज कुमार ने भी संकल्प ले लिया है कानूनी सबक सिखाने का. उन्होंने पटना के लेबर कोर्ट तथा माननीय उच्च न्यायालय में भी मुकदमा दायर किया है.

अफ़सोस कि राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी शिद्दत के साथ शोषक अखबारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं. मजीठिया वेतन आयोग लागू होने के बाद से अब तक दस हजार से ज्यादा पत्रकारों की नौकरी अखबार प्रबन्धक खा चुके हैं. आज अगर पत्रकार हार गए तो बची खुची पत्रकारिता की भी मौत हो जायेगी.

मीडियाकर्मियों के लिए ये दो लाइनें बहुत प्रासंगिक हो गई हैं….

निकले सड़क पर जनता, बताये शोषक प्रबंधकों को उनकी औकात.
माना कि अन्धेरा घना है पर मशाल जलाए रखना कहाँ मना है?

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : ह्वाट्सएप 9999330099

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आइडिया चोरी करने और धमकाने के मामले में दैनिक जागरण पर हुआ मुकदमा

दैनिक जागरण वाले चोरी और सीनाजोरी के लिए कुख्यात हैं. ताजा मामला पटना का है. मानस कुमार उर्फ राजीव दुबे अपनी कंपनी चलाते हैं. उन्होंने बिल्डरों और आर्किटेक्ट्स पर आधारित ‘बिल्डकान’ नामक एक प्रोग्राम करने का इरादा बनाया. इसके लिए गल्ती से उन्होंने एक ऐसे आर्किटेक्ट (नाम- विष्णु कुमार चौधरी) की मदद ली जो दैनिक जागरण से भी जुड़ा हुआ था. उस आर्किटेक्ट ने सारा आइडिया दैनिक जागरण वालों को बता दिया.

CIVIL Court Case File Copy

दैनिक जागरण के मार्केटिंग के वाइस प्रेसीडेंट विकास चंद्रा को यह आइडिया भा गया और उन्होंने इस बिल्डकान कार्यक्रम के जरिए जागरण को हर प्रदेश में करोड़ों कमवाने का विचार बना लिया. इसके लिए उन्होंने मानस कुमार उर्फ राजीव दुबे को धमकाना शुरू कर दिया. मानस भी तेजतर्रार हैं. उन्होंने पहले से ही सब कुछ कापीराइट करवा लिया था. सो, तत्काल उन्होंने न सिर्फ दैनिक जागरण वालों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखा दिया बल्कि कोर्ट में मुकदमा ठोंक दिया.

पता चला है कि दैनिक जागरण वाले अब अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए मानस कुमार को धमका रहे हैं. मानस कुमार ने भड़ास4मीडिया को फोन पर बताया कि उन्हें दैनिक जागरण के विकास चंद्रा धमकियां दे रहा है. जिस कार्यक्रम को उन्होंने मेहनत से प्लान किया, उसे अब जागरण हड़प लेना चाहता है. दैनिक जागरण की मंशा यह कार्यक्रम खुद के बैनर तले करने की है ताकि वह सारा रेवेन्यू हड़प ले जाए. मानस ने कहा कि यह चोरी और सीनाजोरी का मामला है जो बिलकुल पेशेवर नहीं है. ऐसी हरकत टुच्ची कंपनियां करती हैं. मानस के मुताबिक वह अंत तक लड़ेंगे. अगर उनके साथ कुछ बुरा होता है तो उसके लिए दैनिक जागरण प्रबंधन और विकास चंद्रा जिम्मेदार होंगे.

उपर कोर्ट में किए गए मुकदमें की कापी के शुरुआती दो पन्ने हैं… नीचे थाने में दी गई तहरीर की कापी है….

 FIR Report

ज्यादा जानकारी के लिए पीड़ित मानस से संपर्क tabletmedia.patna@gmail.com या manaskumar@tabletmedia.co.in या +917633995888 या +918292610840 के जरिए किया जा सकता है.

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दिल्ली की श्रम अदालत ने दैनिक जागरण पर ठोंका दो हजार रुपये का जुर्माना

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़े दिलीप कुमार द्विवेदी बनाम जागरण प्रकाशन मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय ने दैनिक जागरण पर दो हजार रुपये का जुर्माना ठोंक दिया है। इस जुर्माने के बाद से जागरण प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। बताते हैं कि गुरुवार को दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय में दैनिक जागरण के उन 15 लोगों के मामले की सुनवाई थी जिन्होंने मजीठिया बेज बोर्ड की मांग को लेकर जागरण प्रबंधन के खिलाफ केस लगाया था। इन सभी 15 लोगों को बिना किसी जाँच के झूठे आरोप लगाकर टर्मिनेट कर दिया गया था। गुरुवार को जब न्यायालय में पुकार हुयी तो इन कर्मचारियों के वकील श्री विनोद पाण्डे ने अपनी बात बताई।

इस पर जागरण प्रबंधन के वकील श्री आर के दुबे ने कहा कि मेरे सीनियर वकील कागजात के साथ आ रहे हैं, अभी रास्ते में हैं। माननीय जज ने कहा कि अगली तारीख पर दे देते हैं। इस पर वकील विनोद पांडेय ने कहा कि हुजूर, ये लोग मामले को लटकाना चाहते हैं, संबंधित डाक्यूमेंट्स नहीं देना चाहते हैं, वैसे ही हम बहुत लेट हो चुके हैं, आज हम देर से ही सही, आपके सामने इनका जवाब लेंगे। इस पर माननीय जज साहब ने पासओवर दे दिया और कहा कि 12 बजे आइये। तय समय पर वर्कर अपने वकील के साथ हाजिर हुए, तो मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया। जज ने फिर वर्कर को साढ़े बारह बजे आने के लिए कहा। फिर सभी उक्त समय पर हाजिर हुए, तब भी मैनेजमेंट के लोग गायब रहे। इसी बात पर और कानून के हिसाब से जागरण पर 2000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले की अगली तारीख 4 मई की लगी है।

सूत्रों के हवाले से दैनिक जागरण से जुड़ी एक और चर्चा भी यहां चल रही है कि प्रबंधन अब वर्करों से हारने वाला है। ऐसा कई मोर्चों पर हो रहा है। सूत्र कहते हैं कि एक ओर जहां अदालत में जागरण प्रबंधन की किरकिरी हुयी है वहीं उनमें अब हार का डर भी समाने लगा है। दैनिक जागरण में एक और चर्चा है कि जागरण में एक बड़ी मीटिंग हुई है, जिसमें यह बात भी सामने आयी कि जितने भी वर्कर बाहर हों, सबको जल्दी अंदर लिया जाये।

खबर है कि मालिकानों में अब हर जगह हो रही फजीहत की वजह से आपस में ही जूतमपैजार होने की नौबत आ गई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मजीठिया मामले को लेकर जागरण का पूरा घराना एक तरफ और संजय गुप्ता अकेले एक तरफ हैं। दूसरी ओर माननीय सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस में भी अब मालिकानों को हार नजर आ रही है, इसलिए भी परेशान हैं। जागरण के मालिक संजय गुप्ता की बात करें तो उन्होंने अपने वर्करों से मजीठिया की मांग करने के दौरान यह कहा था कि नौकरी हम देते हैं, सुप्रीम कोर्ट नहीं, हम जैसे चाहेंगे, वैसे काम कराएँगे, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह तब की बात है, लेकिन आज ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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दैनिक जागरण ने रैली की पुरानी तस्वीर छापकर मोदी को तेल लगाने का नया कीर्तिमान बनाया!

Deshpal Singh Panwar : दैनिक जागरण जैसा सबसे बड़ा कहलाने वाला अखबार अगर सबसे खराब हरकत करे तो पत्रकारिता कहां जाएगी.. वैसे तो सब जानते हैं कि ये अखबार जिसकी सरकार हो उसका पक्ष लेता है लेकिन जबसे मोदी सरकार आई है तबसे से तो ये मोदी सरकार की पब्लिसिटी में भाजपा को भी पीछे छोड़ गया है। बनारस में कल मोदी रोड़ शो कर रहे थे और ये अखबार सबको पछाड़ने की तैयारी कर रहा था… दैनिक जागरण के समझदार मीडिया साथियों ने 2014 की मोदी की तस्वीर लगाकर दिखा दिया कि हम सबसे आगे। बहुत खूब…

वरिष्ठ पत्रकार देश पाल सिंह पंवार की एफबी वॉल से.

ज्ञात हो कि दैनिक जागरण ने 5 मार्च 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली की पुरानी तस्‍वीर छापी है। 4 मार्च को नरेंद्र मोदी ने बनारस में एक रोड शो किया था। उसी दिन बसपा नेता मायावती और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन की रैली भी थी। दैनिक जागरण अख़बार ने बसपा की रैली की तस्‍वीर नहीं छापी। ब्‍लंडर ये किया है कि मोदी की रैली के नाम पर 2014 के लोकसभा चुनाव की एक रैली की तस्‍वीर छाप दी है।

स्‍थानीय लोगों की मानें तो अखिलेश-राहुल की रैली बहुत विशाल थी जबकि मोदी के रोड शो में ज्‍यादा भीड़ नहीं थी। अखिलेश-राहुल की रैली को टक्‍कर देने के चक्‍कर में जागरण ने मोदी की रैली की पुरानी फोटो छाप दी। यह फर्जीवाड़ा ऐसे पकड़ में आया कि मोदी जिस गाड़ी में बैठकर रोड शो कर रहे थे वह काली टोयोटा थी लेकिन अखबार में छपी तस्‍वीर में दिख रही गाड़ी सफेद सफारी वाली है। इस फर्जीवाड़े की ओर वाराणसी के एक पाठक संतोष यादव ने ध्‍यान दिलाया और इस संबंध में फेसबुक पर पोस्‍ट डाली।

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दैनिक जागरण के मामले में जल्‍दबाज़ी के चलते कहीं गलत कंपनी तो फंस नहीं रही?

Abhishek Srivastava : हर जगह सर्वेक्षण करने वाली कंपनी का नाम RDI (Resource Development International) चल रहा है, चुनाव आयोग ने भी इसी के खिलाफ़ एफआइआर करने का निर्देश दे डाला है जबकि कंपनी के मालिकान सिर पकड़ कर बैठे हैं कि ये क्‍या हो गया। बहुत संभव है कि सर्वेक्षण करने वाली कंपनी का नाम RDI (Research and Developmenr Initiative) है जिसने 2015 के दिल्‍ली विधानसभ चुनाव में भाजपा को 45 सीटें दी थीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि दैनिक जागरण के मामले में जल्‍दबाज़ी के चलते गलत कंपनी फंस रही है?

Nityanand Gayen : अब चूंकि आरडीआइ यानी रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल के प्रबंध निदेशक राजीव गुप्‍ता ने भी इस घटना से अज्ञानता जताते हुए अपना पल्‍ला झाड़ लिया है, तो सवाल उठता है कि क्‍या दि वायर ने तो जल्‍दबाज़ी में कहीं किसी गलत कंपनी को इस मामले में नहीं फंसा दिया।

Atul Chaurasia : जागरण डॉट कॉम के संपादक शेखर त्रिपाठी ने अपनी धक्कमपेल पत्रकारिता से जेल जाकर अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार लिया है. अब वो बाकी जिंदगी आराम से भगवा खेमें को अपनी इस उपलब्धि के सहारे जोतते रहेंगे. जागरण और भगवा के इस पावन प्रेम संबंध को अपना भी हैपी वैलेंटाइन है

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, नित्यानंद और अतुल चौरसिया की एफबी वॉल से.

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भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन… जागरण कोई अख़बार है! : विमल कुमार

Vimal Kumar : दो साल की सज़ा या जुर्माना या दोनों एक साथ का प्रावधान है। ये लोग अदालत को मैनेज कर केवल जुर्माना देकर बच जाएंगे। जिसने विज्ञापन दिया उसे भी जेल की सजा हो। जागरण कोई अख़बार है, भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन!

Maheruddin Khan : नेता तो किसी न किसी मामले में गिरफ्तार होते ही रहते हैं… एकाध सम्पादक को भी गिरफ्तार होने दो भाई। और एक पाले खड़े हो जाओ। यह नहीं चलेगा कि सम्पादक ने जो किया उसका समर्थन नहीं करते और गिरफ्तारी का विरोध करते हैं।

Dilip Khan : रत्ती भर भी असहमत नहीं हूं चुनाव आयोग के रुख से। क्राइम किया है। सज़ा मिलनी चाहिए। इसमें भागीदार बिग प्लेयर्स को भी सज़ा होनी चाहिए। क़ानून तोड़ने का ये हल्का मामला नहीं है बल्कि डेमोक्रेटिक तरीके से हो रहे चुनाव को प्रभावित करने का मामला है। उमलेश यादव केस में भी ये अख़बार बच गया था। अगर 2011 में ही इस पर कार्रवाई हो जाती तो फिर से ग़लती रिपीट नहीं करता। लेकिन प्रेस काउंसिल के पास नोटिस देने के अलावा और कोई पावर ही नहीं है। इस बार आचार संहिता के दौरान क्राइम किया है इसलिए सज़ा होनी चाहिए। पत्रकारिता के वृहत्तर लाभ के लिए मैं इस कार्रवाई के साथ हूं।

वरिष्ठ पत्रकार विमल कुमार, मेहरुद्दीन खान और दिलीप खान ने उपरोक्त टिप्पणियां एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार प्रिय दर्शन की जिस पोस्ट पर की है, वह इस प्रकार है :

Priya Darshan : मीडिया संपादक पवित्र गाय या कानून से ऊपर नहीं हो सकते। जो जुर्म जैसा है, उसकी वैसी ही सज़ा होनी चाहिए। एक साथी ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि जागरण ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को मजीठिया के लाभ नहीं दिए और उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक अन्य साथी ने बाबरी मस्जिद के दिनों में अखबार की तथ्यहीन रिपोर्टिंग की याद दिलाई। बेशक, इन सबकी लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। इसलिए यह कहना जरूरी है कि यह पोस्ट जागरण के पक्ष में नहीं है। चुनाव आयोग के निर्देश के विरुद्ध एग्जिट पोल छापना अनुचित था- इस लिहाज से और ज़्यादा कि वह संस्थान के मुताबिक विज्ञापन यानी ‘पेड न्यूज’ था। लेकिन यह पूरा मामला मीडिया के और भी संकटों को उजागर करता है। १५ एफआइआर कराने और संपादक को गिरफ्तार करने का फ़ैसला कुछ ज़्यादा सख्त है- याद दिलाता हुआ कि व्यवस्थाएं जब चाहती हैं, मीडिया को उसकी हैसियत बता देती हैं। जो लोग शिकायत या गुमान करते हैं कि मीडिया बहुत ताकतवर है, वे देख सकते हैं कि एक गलती पर किस तरह उसकी बांहें मरोड़ी जा सकती हैं। जो लोग मीडिया पर नियंत्रण के लिए और कानूनों की ज़रूरत बताते हैं, उनको समझना चाहिए कि इस देश में मीडिया के खिलाफ कई कानून हैं, मगर मीडिया के लिए अलग से एक भी नहीं। जिस आजादी का मीडिया इस्तेमाल करता है, वह उसे कानूनों से नहीं, इस देश की उदार परंपरा से और विभिन्न मोर्चों पर अपने विश्वसनीय संघर्षों से मिली है। चिंता की बात बस यह है कि आज इस परंपरा पर भी चोट की जा रही है और मीडिया की विश्वसनीयता पर भी खरोंच पड़ी है।

प्रिय दर्शन की उपरोक्त पोस्ट पर आईं कुछ अन्य टिप्पणियां इस प्रकार हैं :

Mangalesh Dabral यह फैसला कोई सख्त नहीं है. अखबार और हिंदी का तथाकथित सबसे बड़ा अखबार होने के नाते उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी का बोध अनिवार्य होना होता है. क्या वे नादान, अनपढ़ गरीब थे जिन्हें नियमों के बारे में नहीं भी मालूम हो सकता है. या जानबूझकर नियमों को धता बताने वाले राजनीतिक माफिया? आपको याद होगा, अयोध्या में बाबरी विध्वंस से कुछ दिन पहले हुई परिक्रमा और कार सेवा के दौरान गोली चली जिसमें चार-पाच लोगों के मारे जाने की अपुष्ट खबर आयी. हिंदी के एक अखबार के डाक संस्करण में यह संख्या छपी, फिर दूसरा ‘कारसेवक’ प्रभारी आया तो उसका यह संख्या देखकर मन नहीं भरा और उसने एक शून्य बढ़ा कर पचास मृतक बता दिए, फिर जब नगर संस्करण आया तो उसमें प्रभारी महोदय ने इसमें एक शून्य और जोड़कर मृतकों की संख्या पांच सौ कर दी.मकसद था तनाव, वैमनस्य और अंततः दंगा भड़काना. क्या यह पत्रकारिता है? यह विवरण महान कवी रघुवीर सही की उस रपट में दर्ज है जो उन्होंने प्रेस कौंसिल के निवेदन पर फैक्ट फाइंडिंग ईम के रूप- में लिखी थी.

Abhiranjan Kumar सर, बात आपकी भी सही है। लेकिन समस्या यह है कि चुनाव में हर रोज़ बड़े नेता जाति और धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले के मुताबिक भी अनुचित है, लेकिन चुनाव आयोग उन नेताओं को जेल में नहीं डाल रहा। आचार संहिता उल्लंघन में फंस गया एक संपादक, जिससे ग़लती तो ज़रूर हुई, लेकिन मेरी राय में उसका सिर्फ़ कंधा रहा होगा, बंदूक किसी और की रही होगी, जिसे दुनिया “मालिक” कहती है।

एक लक्ष्मण-रेखा तो सबके लिए होनी ही चाहिए। नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रैट, बिजनेसमैन… इन सबसे ज़रा-सी चूक हुई नहीं कि हम लोग उन्हें फ़ौरन कानून के चंगुल में देखना चाहते हैं, लेकिन अपनी ग़लतियों पर हम आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। इस मामले में संबंधित संपादक पर अधिक सख्ती हो गई, यह मानने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन फिर यह सवाल भी उठेगा कि क्या एक टीवी चैनल के संपादक पर भी अधिक सख्ती हो गई थी, जिन्हें शायद महीना भर या उससे भी अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा था? अनजाने में या अनभिज्ञता में किसी से भी ग़लती हो सकती है… हमसे भी और आपसे भी… पर जो ग़लतियां मीडिया के द्वारा इन दिनों जान-बूझकर की जाती हैं, क्या उनके प्रति भी हमें उतना ही सहिष्णु रहना चाहिए? ये कुछ सवाल उठाते हुए भी मोटे तौर पर मैं आपकी मूल भावना के साथ हूं। अगर पेड न्यूज़ का मामला है तो संपादक को नहीं, मालिक को जेल होनी चाहिए। कोई संपादक अपनी मर्ज़ी से पेड न्यूज़ छाप ही नहीं सकता। उस पर मालिकों का दबाव रहता है, इसलिए उसे ऐसे अनैतिक काम करने पड़ते हैं। अक्सर हमारी व्यवस्था गोली चलाने वालों को फांसी दे देती है, लेकिन गोली चलवाने वाले को सबूतों के अभाव में बरी कर देते हैं। कई बार बरी कर देना तो दूर, उनके गिरेबान तक हाथ तक नहीं पहुंच पाते और आप जो “पवित्र गाय” शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह वही “पवित्र गाय” बने रहते हैं।

Ajeet Singh जहां कहीं भी सांप्रदायिक तनाव या विवाद होता है, वहां दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग देखिए। ये एग्जिट पोल वाली ग़लती छोटी लगने लगेगी। केस स्टडी के तौर पर मुज़फ्फरनगर दंगों को ले सकते हैं। बहरहाल, इस मामले में अकेले संपादक को दोषी मानना सही नहीं है। किसी पार्टी या विचारधारा का मुखपत्र होना अपराध नहीं है। लेकिन जागरण या कई अन्य मीडिया समूह विश्वास और उदारता की परंपरा के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है।

Aflatoon Afloo CrPC की धारा 144 का उल्लंघन करने पर IPC की धारा 188 के अन्तर्गत सजा होती है। अधिकतर उसी दिन कोर्ट उठने तक की और अधिकतम हफ्ता भर की।मेरी स्पष्ट मान्यता है कि उन्हें झूठ बोलने की भी आजादी है।उसके साथ यदि उससे देश का कोई कानून टूटता हो तो उसे कबूलना भी चाहिए। अधिकतम दो साल की सजा के प्रावधान की पूरी सजा कितनो को मिली है यह जानने लायक है।

Mahesh Punetha मेरा मानना है कि संपादक से पहले अखबार पर कार्यवाही होनी चाहिए. संपादक तो बेचारा है, मालिक जैसा कहे उसे वैसा करना है.

Ramesh Parashar ये व्यापारियों और चाटुकारों का दौर है! मीडिया इस गंदगी मे निर्लज्जता की हद तक लोट लगा रहा है! सामाजिक ज़िम्मेदारी या राष्ट्रीय हित जैसी बातें उसके लिये बेमानी हैं? चारण भांड की भूमिका से भी उसे परहेज़ नहीं? सियासत ने अपनी गंदगी से उसे भी नहला दिया! लोगों का भरोसा भी अब उस पर नहीं! वैसे ‘ जागरण ‘ पर पार्टी विशेष का ठप्पा तो वर्षों से है, निष्पक्ष तो रह नहीं गया?

Jeevesh Prabhakar चुनाव संपन्न होने यानि 11 मार्च तक अखबार के प्रकाशन पर रोक लगा दो…चूलें हिल जायेंगी ….विज्ञापन विभाग तो बहाना है….. बिना मालिक की अनुमति के ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है…. मालिक को भी जेल होनी चाहिए…

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें :

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एक्जिट पोल छाप कर दैनिक जागरण फंसा, आयोग ने कहा- FIR दर्ज करो

भारत के चुनाव आयुक्त ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के 15 जिले के चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे दैनिक जागरण के खिलाफ चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में संपादकीय विभाग के मीडिया हेड के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करायें।

दैनिक जागरण पर आरोप है कि उसने चुनाव के पहले ही एक्जिट पोल का प्रकाशन कर चुनाव आयोग के नियमों का उलंघन किया है। यह एफआईआर दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक और अन्य अथोरिटी के अलावा रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल (आई) प्राईवेट लिमिटेड के खिलाफ कराने का निर्देश दिया गया है। दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक के साथ साथ इसी अखबार के प्रबंध संपादक, मुख्य संपादक, संपादक के खिलाफ भी चुनाव आयोग ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है।

चुनाव आयुक्त ने जिला अधिकारियों को इस मामले में एफआईआर कराने के बाद पूरी रिपोर्ट भी देने का निर्देश दिया है। देश के सभी मीडिया हाउस को चुनाव से पहले उस एक्जिट पोल का प्रकाशन या प्रसारण करना मना है जिसके प्रकाशन या प्रसारण से मतदाताओं पर असर पड़े। दैनिक जागरण पर आरोप लगा है कि इस अखबार ने धारा 126 ए और बी का उलंघन किया है। दैनिक जागरण पर आरोप है कि उसने ओपनियन पोल में दिखाया था कि भारतीय जनता पार्टी पहले चरण में हुये चुनाव में सबसे आगे है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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जागरण न्यूज़ पेपर के MD आशुतोष मोहन की गन्दी बात सुनिए

मुझसे जुलाई 2015 में छतरपुर की जागरण रीवा ब्यूरोशिप और एजेंसी के नाम पर इंदौर रीवा जोन जागरण के एमडी आशुतोष मोहन ने HDFC का 25000 का चेक लिया था, जो कि 28-07-15 को क्लीयर भी हो गया। बाद में इन लोगों ने किसी तरह का कोई पेपर न भेजा और ना ही कोई खबरें प्रकाशित की। आज करीब एक साल बाद तक पैसा वापस करने की बात ये लोग कहते रहे लेकिन पैसे लौटाए नहीं।

अब एमडी आशुतोष मोहन से जब उनके मोबाइल नंबर 9893024599 पर पैसे या पेपर की मांग की जाती है तो वो गाली गलौज कर असभ्य भाषा का इस्तेमाल करते हैं। मैं इस ऑडियो को मीडिया के सभी लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ ताकि और लोग इन चोरों के झाँसे में ना आयें। सभी लोग सुनिए कि दैनिक जागरण जैसे न्यूज़ पेपर का मैनेजिंग डायरेक्टर किस भाषा में बात करता है। टेप सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/2B3lSdN8y_A

अवधेश कुमार
awadhesh.vnews@gmail.com
छतरपुर
मध्य प्रदेश

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