‘आप’ ने ढूंढ़ा बिकाऊ मीडिया पर खर्च का पूरा लाभ पाने का तरीका

 

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी ने ढूंढ़ा बिकाऊ मीडिया पर खर्च का पूरा लाभ पाने का तरीका। फर्जी सर्वेक्षणों का बाप है यह तरीका। इसे कहते हैं आईडिया। यह विज्ञापन इस तरह आ रहा है जैसे रेडियो चैनल खुद सर्वेक्षण कर रहा हो। इसमें किसी व्यक्ति से पूछा जाता है पिछली बार आपने किसे वोट दिया था। वह चाहे जो कहे दूसरा सवाल होता है इस बार किसे देंगे– आम आदमी पार्टी को। और क्यों में, आम आदमी के पक्ष में कारण बताया जाता है।

इस तरह पार्टी अपने पक्ष में वोट डालने के कारण तो लोगों को बता ही रही है जो ध्यान नहीं देगा वह समझेगा कि पिछली बार कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी को वोट देने वाले सभी लोग इस बार आम आदमी पार्टी को वोट देंगे और उनके पास इसके ठोस कारण हैं। बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किए जाने वाले इन विज्ञापनों में टेलीविजन चैनलों को जैसे अचानक ब्रेक लेना पड़ता है वैसे ही ब्रेक ले लिया जाता है। काम की बात खत्म होते ही। और फिर आखिर में कहा जाता है कि यह विज्ञापन था। तब तक इसका जो असर होना होता है, हो चुका होता है।

और भाजपा की ओर से अपने स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी की आवाज में चलाए जा रहे विज्ञापन, “भाइयों और बहनों ये विजय यात्रा क्यों चल पड़ी है। एक के बाद एक भारतीय जनता पार्टी जनता के दिलों में इतना प्यार और विश्वास कैसे बना पाई है। भाइयों और बहनों जो देश का मूड है वही दिल्ली का मूड है। जो देश चाहता है वही दिल्ली चाहता है” का करारा और दिलचस्प जवाब है। यह ऐसा आईडिया है, जिससे कोई भी धोखा खा जाए। प्रस्तुति बहुत ही शानदार और स्वाभाविक है। रेडियो का प्रचार और विज्ञापनों के लिए जबरदस्त उपयोग।

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कालाधन और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर 100 दिन में काला धन वापस लाने की बातें करके देश के मध्यम वर्ग को ललचा देने के बाद भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में अब गरीबों और झुग्गी झोपड़ी वालों को चारा डाल रही है। दिल्ली चुनाव में “जहां झुग्गी, वहीं मकान” का नारा इसी रणनीति के तहत है। और गरीबों को लक्ष्य करने के लिए ही भाजपा के जो विज्ञापन इन दिनों प्रमुखता से प्रसारित हो रहे हैं उनमें पहला है, हमारा वोट भाजपा को। मोदी जी आए हैं तो बैंक में हमारा खाता खुला, डेबिट कार्ड मिला, बीमा मिला गैस सिलेंडर का फायदा मिला अब झुग्गी वालों को मकान मिलने की बात भी हो रही है। इसी क्रम में एक और विज्ञापन है, ना-ना मेमसाब, उनको वोट। हम नहीं देंगे। पानी देंगे, बिजली देंगे, कहकर सब के वोट ले लिए पर ये तो उन्हें मिले ना जिनके पास मीटर थे। हम झुग्गी वालों को क्या मिला। और तीसरा विज्ञापन है, पिछली सरकार तो गठबंधन से बनी थी साब जी। सब साथ हो लिए। क्योंकि सबको विश्वास था कि दिल्ली का भला होगा। लेकिन ड्राइवर तजुर्बेकार ना हो तो गाड़ी तो ठुकेगी ना। सब जानते हैं कि गाड़ी ठुकी नहीं, ब्रेक लगाया गया था। ऐसे में, गरीबों को साधने के फेर में मध्यम वर्ग को चुका हुआ मानने वाली भाजपा अपने खर्च पर आम आदमी पार्टी की उपलब्धियां भी प्रचारित कर रही है।

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जैसे-जैसे दिल्ली में मतदान की तारीख करीब आ रही है भारतीय जनता पार्टी अपने सभी हथियारों का उपयोग कर लेने पर आमादा है। जिस तरह काले धन के पैसे 100 दिन में लाने का झूठा और अव्यावहारिक वादा करके पार्टी केंद्र में सत्ता में आई है वैसा ही झूठा और अव्यवहारिक वादा वह दिल्ली के गरीबों से कर रही है। खादी के बिना बाजू वाले कुर्तों से डिजाइनर और स्पेशल सूट पर पहुंच चुके नरेन्द्र मोदी गरीबों को फिर सपने दिखा रहे हैं। इसबार जहां झुग्गी वहां मकान का वादा काले धन को वापस लाने से भी बड़ा धोखा है। क्या यह संभव है। पर देश का प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल खुलेआम झूठ बोल रहा है। काले धन का तो लोग इंतजार कर रहे हैं पर किसी दिन दिल्ली में झुग्गियां उजाड़ी गईं और लोग चढ़ बैठे सात रेसकोर्स रोड पर तो क्या होगा, किसी ने सोचा है। गरीबों के लिए घर का सपना वैसे ही बहुत बड़ा होता है। ऐसा सपना नहीं दिखाया जाना चाहिए कि गरीब मरने मारने को उतारू हो जाए। भाजपा अगर रिकार्ड सीटों के साथ सत्ता में आई है तो कहीं ऐसा ना हो कि रिकार्डतोड़ तरीके से सत्ता से हटाई जाए। तैयारी पार्टी खुद कर रही लगती है।

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मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद जो काम किए हैं उसका प्रचार दिल्ली में चुनाव के मद्देनजर रेडियो पर आ रहा है। इसमें एक आदमी कहता है कि मोदी जी आए हैं तो बैंक में खाता खुला, डेबिट कार्ड मिला, बीमा हुआ, रसोई गैस का फायदा मिला – अब मैं आपको बताऊं कि वो ये नहीं कहता कि चेक बुक मिला और खाते का नंबर भी मिला। वाकई बहुत काम हुआ है। और रसोई गैस की सबसिडी खाते में ट्रांसफर करने की योजना पिछली सरकार की थी – मेरे ख्याल से। विज्ञापन में यह नहीं कहा गया है कि खाते जिस काले धन के पैसे की उम्मीद में लोगों ने खोले हैं वो चुनाव बाद आ जाएंगे। और जनता पर यह कम अहसान नहीं है। मैं अगले विज्ञापन का इंतजार बेसब्री से कर रहा हूं।

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महंगी कमाई मुफ्त में ‘खर्च’ हो गई… दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में किरण बेदी के जीवन की एक प्रमुख कमाई (इंदिरा गांधी की कार टो करने का श्रेय) खर्च हो गई। और मजेदार यह है कि इस खर्च को ना किरण बेदी के चुनावी खर्च में जोड़ा जा सकता है और ना भारतीय जनता पार्टी के। दुख की बात यह है इस महत्त्वपूर्ण कमाई के खर्च होने का कोई लाभ किसी को नहीं मिलेगा। यहां तक कि मीडिया को भी इस ‘रहस्योद्घाटन’ का कोई श्रेय नहीं दिया जा सकता है।

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खबर है कि किरण बेदी के पास दो पते पर दो वोटर आई कार्ड हैं। भक्तगण इसपर भी बुद्धिमानी दिखा रहे हैं। अभी दो दिन पहले ही उपराष्ट्रपति से भी ज्यादा ज्ञानी लोगों ने अपने ज्ञान का नंगा प्रदर्शन किया है। अब फिर कूद पड़े। अपनी अज्ञानता दिखाने। भक्तों के मामले में यह कहावत बिल्कुल सही लगती है, Its better to keep your mouth shut and let people think that you are a fool than to open it and clear all doubts. समस्या बहुत गंभीर है। लोग तुरंत फैसला सुनाने लगते हैं, खेमे में बंट जाते हैं। कार्यवाही मेरे या किसी के कहने या चाहने से नहीं हो सकती या वो नहीं होगी जो कोई चाहेगा। कार्यवाही नियमानुसार ही होगी। अगर किसी ने मतदाता सूची में नाम डालने के लिए आवेदन किया हो तो उसे पता होना चाहिए कि आप का नाम मतदाता सूची में ऐसे ही नहीं आ जाता है। इसके लिए आप बाकायदा आवेदन करते हैं और घोषणा करते हैं कि आप मतदाता सूची में नाम आने की शर्तें पूरी करते हैं। इसी में यह घोषणा भी होती है कि मेरा नाम किसी और मतदान क्षेत्र की मतदाता सूची में नहीं है या है उसे काटकर इस मतदान क्षेत्र में मेरा नाम दर्ज किया जाए। दो जगह नाम रहने का मतलब है आपने आवेदन में नहीं बताया। अगर बताया था तो आवेदन पत्र से साबित हो जाएगा, आप कर दीजिए। बात खत्म। या आप चाहते हैं कि बताने के बावजूद आपका नाम कटा क्यों नहीं तो इसकी मांग कीजिए, दोषी के खिलाफ कार्रवाई होगी। पर आपने नाम काटने का आवेदन किया ही नहीं हो, या यह घोषणा ही नहीं की हो कि आपका नाम कहीं और है, तो आप दोषी हैं, कार्रवाई आपके खिलाफ होगी। लेकिन इसमें अदालती पेंच हैं। कई बार आप आवेदन खुद नहीं करते हैं, दस्तखत गंभीरता से नहीं मिलाए जाते हैं। इस बिना पर आप अदालत से शायद बच जाएं पर मामला तय तो अदालत में ही होगा। भक्त बेकार ज्ञान बघारने लगते हैं और मजे की बात यह कि अमूमन यह नहीं कहा जाता कि नियम क्या है या फैसला तो अदालत में लोगा। लोग टूट पड़ते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

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जानिए, उन वजहों को जिसके कारण दिल्ली में किरण बेदी फैक्टर अरविंद केजरीवाल को बहुमत दिला रहा है

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किरण बेदी का पुलिसिया अंदाज़ देखकर मैं हैरान था : रवीश कुमार

सुबह के 5 बज रहे थे तभी सुशील का फोन आया कि बैकअप प्लान किया है आपने। सुशील मेरे शो के इंचार्ज हैं। बैक अप प्लान? हो सकता है कि आधा घंटा न मिले। इंटरव्यू के लिए तैयार होकर चाय पी ही रहा था कि सुशील के इस सवाल ने डरा दिया। प्राइम टाइम एक घंटे का होता है और अगर पूरा वक्त न मिला तो बाकी के हिस्से में क्या चलाऊंगा। हल्की धुंध और सर्द भरी हवाओं के बीच मेरी कार इन आशंकाओं को लिए दफ्तर की तरफ दौड़ने लगी।

गाज़ीपुर से निज़ामुद्दीन पुल तक कांग्रेस, बीजेपी, आम आदमी पार्टी के होर्डिंग तमाम तरह के स्लोगन से भरे पड़े थे। सियासी नारों में सवालों की कोई जगह नहीं होती है। नारे जवाब नहीं होते हैं। मैं दफ्तर पहुंच गया। कैमरामैन मोहम्मद मुर्सलिन अपने साज़ों-सामान के साथ बाहर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। जिस रास्ते से राष्ट्रपति ओबामा को सिरी फोर्ट आडिटोरियम पहुंचना था उसी से लगा है उदय पार्क जहां किरण बेदी रहती हैं। इसलिए हम सुरक्षा जांच के कारण जल्दी पहुंच जाना चाहते थे ताकि हमारी वजह से किरण बेदी को इंतज़ार न करना पड़े।

किरण बेदी समय पर ही बाहर आईं। इतनी तेज़ी से घर से निकलीं कि दुआ सलाम का भी ठीक से वक्त नहीं मिला। हम उनके साथ-साथ बल्कि पीछे-पीछे भागते चले गए। वैसे इनकी फुर्ती देखकर अच्छा लगा कि वे इस उम्र में भी फिट हैं। इसीलिए मेरा पहला सवाल ही यही था कि क्या आप राजनीति में खुद को फिट महसूस करने लगी हैं। जवाब में किरण बेदी खुद को पोलिटिकल साइंस का विद्यार्थी बताने लगीं। मुझे हैरानी हुई कि पोलिटिकल साइंस का स्टुडेंट और टीचर होने से ही क्या कोई राजनेता बनने की क्वालिटी रखता है या फिर इतनी जल्दी राजनीति में फिट हो जाता है। खैर किरण बेदी इस जवाब के बहाने अपने अतीत में चली गईं। उन्हें लग रहा था कि अतीत में जाने से कोई उन पर सवाल नहीं कर सकता। उनका अतीत ज़रूर अच्छा रहा होगा, लेकिन राजनीति तो आज के सवालों पर नेता का नज़रिया मांगती है।

दस मिनट ही इंटरव्यू के लिए मिला। मुश्किल से बारह मिनट हुआ, लेकिन मैंने बीस मिनट के लिए कहा, लेकिन वो भी नहीं मिला फिर इस भरोसे शुरू कर दिया कि नेता एक बार कहते हैं फिर इंटरव्यू जब होने लगता है कि पांच दस मिनट ज्यादा हो जाता है। मगर समय की पाबंद किरण बेदी बीच-बीच में घड़ी भी देखती रही हैं और इंटरव्यू के बीच में यह सोचने लगा कि प्राइम टाइम अब किसी और विषय पर करना होगा। सिर्फ किरण बेदी का इंटरव्यू चलाने का प्लान फेल हो चुका है। सुशील की बात सही निकली है। यह सब सोचते हुए मेरा ध्यान सवालों पर भी था। मेरे सवाल भी किरण बेदी के दिए वक्त की तरह फिसलते जा रहे थे। रात ढाई बजे तक जागकर की गई सारी तैयारी अब उस कागज में दुबकने लगी, जिसे मैं कई बार मोड़कर गोल कर चुका था।

हम दोनों भाग रहे थे। वो अपने वक्त के कारण और मैं अपने सवालों के कारण। सब पूछना था और सब जानना था। ऐसा कभी नहीं होता। आप पंद्रह मिनट में किसी नेता को नहीं जान सकते। किरण बेदी का पुलिसिया अंदाज़ देखकर हैरान था। इसलिए मैं बीच बीच में एक्सेलेंट बोल रहा था, मुलेठी का ज़िक्र किया। गला खराब होने पर मुलेठी खाई जाती है। देखने के लिए इस टोका-टाकी के बीच बेदी एक राजनेता की तरह बाहर आती हैं या अफसर की तरह। मुझे किरण बेदी में आज से भी बेहतर राजनेता का इंतज़ार रहेगा।

आपने इंदिरा गांधी की कार उठाई थीं। उनका पीछा करते-करते ये सवाल क्यों निकल आया पता नहीं। लेकिन किरण बेदी क्यों ठिठक गईं ये भी पता नहीं। नहीं, मैंने नहीं उठाई थी। बिजली की गति से मैं यह सोचने लगा कि तो फिर हमें बचपन से किसने बताया कि इंदिरा गांधी की कार किरण बेदी ने उठा ली थी। पब्लिक स्पेस में धारणा और तथ्य बहुरुपिये की तरह मौजूद होते हैं। अलग-अलग समय में इनके अलग-अलग रूप होते हैं। किरण बेदी ने कहा कि मैंने कार नहीं उठाई थी। निर्मल सिंह ने उठाई थी जो एसीपी होकर रिटायर हुए। तो फिर निर्मल सिंह हीरो क्यों नहीं बने। दुनिया निर्मल सिंह की तारीफ क्यों नहीं करती है। कोई राजनीतिक पार्टी निर्मल सिंह को टिकट क्यों नहीं देती है।

इस इंटरव्यू की कामयाबी यही रही कि एक पुराना तथ्य उन्हीं की जुबानी पब्लिक स्पेस में आ गया। किरण बेदी ने कहा कि कार निर्मल सिंह ने उठाई मगर मैंने निर्मल सिंह पर कोई कार्रवाई नहीं की। मैंने कोई दबाव स्वीकार नहीं किया, पर सवाल उठता है कि पीएमओ की कार का चालान होने के लिए कोई किरण बेदी या निर्मल सिंह पर दबाव क्यों डालेगा। किरण बेदी ने खुद कहा कि वह कार इंदिरा गांधी की नहीं थी। प्रधानमंत्री की नहीं थी। जिस वक्त निर्मल सिंह ने कार का चालान किया उसमें इंदिरा गांधी नहीं थी। जब मैंने किरण बेदी से पूछा कि क्या वो कार प्रधानमंत्री के काफिले में चलने वाली कार थी। तो जवाब मिला कि नहीं। तब वो कहती हैं कि वो कार पीएमओ की कार थी। कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि प्रधानमंत्री के दफ्तर में कितनी कारें होती होंगी।

बहुत दिनों से चला आ रहा एक मिथक टूट गया। अब हम इस सवाल के बाद फिर से भागने लगे। हम सबको समझना चाहिए कि चुनाव के वक्त नेता के पास बिल्कुल वक्त नहीं होता। किसी नेता इंटरव्यू के लिए वक्त दिया उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हर कोई करता है। तीस मिनट का समय देकर पांच मिनट कर देता है या अंत समय में इंटरव्यू देने से मना कर देता है। इस लिहाज़ से मैं उस वक्त हर बचे हुए समय में एक और सवाल कर लेना चाहता था।

आखिरी सवाल था सूचना के अधिकार से जुड़ा। जिसकी चैंपियन किरण बेदी भी रही हैं। अरुणा राय, शेखर सिंह, अरविंद केजरीवाल, जयप्रकाश नारायण इस बात को लेकर लड़ते रहे हैं कि राजनीतिक दलों को बताना चाहिए कि उन्हें चंदा कौन देता है और कितने पैसे मिलते हैं। जब ये सवाल हम प्राइम टाइम में पूछा करते थे कि ये सभी नाम जिनमें किरण बेदी भी शामिल हैं बीजेपी और कांग्रेस पर खूब हमला करते थे, लेकिन बीजेपी में आकर किरण बेदी ने तुरंत सर्टिफिकेट दे दिया कि पार्टी में फंडिंग की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है। मुझे यह भी पूछना चाहिए था कि क्या बीजेपी अपने नेताओं को फंडिंग की प्रक्रिया की कोई फाइल दिखाती है। क्या किरण बेदी को ऐसी कोई फाइल दिखाई गई। पर खैर। जवाब यही मिला कि सूचना के अधिकार के तहत राजनीतिक दलों से चंदे और खर्चे का हिसाब मांगने के सवाल पर किरण बेदी पलट चुकी हैं।
 
पूरा इंटरव्यू इतने कम समय और इतनी रफ्तार के साथ हुआ कि मुझे भी पता नही चला कि मैंने क्या पूछा और उन्होंने क्या जवाब दिया। हम बस मोहम्मद और सुशील के साथ यही बात करते रहे कि कितने मिनट की रिकार्डिंग हुई है। अब हमें कितना और शूट करना होगा। किरण बेदी के पीछे भागते-भागते मेरा दिमाग़ इसमें भी अटका था कि कहीं कैमरे संभाले मोहम्मद गिर न जाएं। कैमरामैन की आंख लेंस में होती है। भागते हुए शूट करना आसान नहीं होता। शुक्रिया मोहम्मद मुर्सलिन। ट्वीटर पर इस इंटरव्यू को ट्रेंड करते हुए अच्छा भी लगा और डर भी। इस इंटरव्यू को लेकर ट्वीटर की टाइम लाइन पर डब्लू डब्लू एफ का मैच शुरू हो गया है। मैं इसे लेकर थोड़ा आशंकित रहता हूं। मैं सुपर जर्निलिस्ट नहीं हूं। मुझे इस सुपर शब्द से ताकत की बू आती है। मुझे ताकत या पावर पसंद नहीं है।

जाने-माने टीवी जर्नलिस्ट, मशहूर एंकर और एनडीटीवी के संपादक रवीश कुमार के ब्लाग से साभार.

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सतीश उपाध्याय, उमेश उपाध्याय और बिजली कंपनियों का खेल

Madan Tiwary : सतीश उपाध्याय पर अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाये है बिजली के मीटर को लेकर सतीश उपाध्याय बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष हैं। उन्होंने मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी है और आरोपों से इंकार किया है। सतीश जी, शायद केजरीवाल के हाथ बहुत छोटी सी जानकारी लगी है। आप जेल चले जायेंगे सतीश जी। आपके ऊपर करीब चार सौ करोड़ बिजली कंपनी से लेने का मुद्दा बहुत पहले से गरमाया हुआ है और आपके भाई उमेश उपाध्याय की सहभागिता का भी आरोप है। यह दीगर बात है कि पत्रकार बिरादरी भी यह सबकुछ जानते हुए खुलकर नहीं बोल रही है। दिल्ली की जनता को दुह कर दिल्ली की सत्ता को दूध पिलाने का काम करती आ रही हैं बिजली कंपनियां। खैर मुद्दा चाहे जो हो लेकिन एक साल के अंदर बिजली की दर 2:80 प्रति यूनिट से 4:00 प्रति यूनिट करने की दोषी तो भाजपा है ही। देश है, सब मिलकर बेच खाइये। जनता है, किसी न किसी को वोट देगी ही। काश! देश की जनता सही लोगों को चुन पाती या चुनाव बहिष्कार कर पाती। अपने नेताओं से सवाल कर पाती। काश।

Awadhesh Kumar : तो अरविन्द केजरीवाल ने पहला आरोप बम पटका… दीजिए जवाब… तो अरविंद केजरीवाल ने यह आरोप लगा दिया है कि दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वालीं कंपनियों और भाजपा के प्रदेश नेताओं के बीच कारोबारी रिश्ते व सांठगांठ के आरोपों का बम पटक दिया है। अरविन्द का आरोप देखिए, ‘ जिस कंपनी में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और उनकी पत्नी की हिस्सेदारी है, वह बिजली कंपनी बीएसईएस के लिए मीटर लगाने और बदलने का काम करती है। दिल्ली भाजपा के उपाध्यक्ष आशीष सूद भी इस कंपनी में डायरेक्टर रह चुके हैं।’ जरा सोचिए, यह कितना बड़ा आरोप है। अरविन्द ने सतीश उपाध्याय की जिन छह कंपनियांे के नाम लिए उनमें से एक एनसीएनएल इंफो मीडिया प्राइवेट लिमिटेड बीएसईएस के लिए मीटर लगाने और बदलने का काम करती है। दिल्ली में बिजली के मीटर हर व्यक्ति के लिए आज भी खलनायक है। लोगों ने मजबूरी में आत्मसमर्पण किया है, पर मेरे सहित तमाम दिल्लीवासी मानते हैं कि ये मीटर बिजली शुल्क के नाम पर जबरन लूटने के वैधानिक मशीन है। अभी मेरे पास विस्तृत जानकारी नहीं है। जानने की कोशिश कर रहा हूं। हालांकि व्यवसाय करना कोई अपराध नहीं है। सतीश उपाध्याय या आशीष सूद स्वयं मीटर उत्पादन नहीं करते हैं। केवल इसे लगाने और बदलने का काम करते हैं। यानी यह एक ठेका है जो किसी न किसी कंपनी को तो मिलना ही था। पर चुनाव के लिए यह तो एक मुद्दा है ही। हमें भी भाजपा के जवाब की प्रतीक्षा है।

तो सतीश उपाध्याय का जवाब भी आ गया… केजरीवाल पर एक और मुकदमा तय…

तो केजरीवाल के आरोप बम का जवाब मिल गया। अगर सतीश उपाध्याय और आशीष सूद की बातें मानें तो उन पर लगा पूरा आरोप ही झूठा है, बेबुनियाद है। सतीश उपाध्याय ने साफ कह दिया है कि उनने जो आरोप लगाया है उसे साबित कर दें अन्यथा राजनीति छोड़ दें। अगर उनने साबित कर दिया तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूुगा। उन्होंने कहा कि जिन दो कंपनियों का उनने नाम लिया उनके बारे में मुझे कुछ पता ही नहीं है। सतीश उपाध्याय की बात मानें तो अरविन्द केजरीवाल पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर होना निश्चित है। उपाध्याय एवं आशीष सूद दोनों की बातों को मानें तो उनकी कंपनी है, जिसके माध्यम से वे मिलकर ठेकेदारी का काम करते थे। केबल डालने का मीटर लगाने का, पर उनने कभी कोई मीटर खरीदकर नहीं लगाया। सतीश के अनुसार उनकी मीडिया कंपनी है जो 1996 की है जिसमें किसी कंपनी से कोई लेनदेन नहीं हुआ। उन्होंने यह भी साफ किया जब मैं राजनीति में आ गया तो सभी कंपनियों से त्यागपत्र दे दिया। दोनों का कहना है कि मैं परिवार को पालने के लिए व्यवसाय करता हूं, लेकिन साफ सुथरा करता हूं। उनके अनुसार राजनीति में इतना स्तर नीचे नहीं गिरना चाहिए कि हम व्यक्तिगत स्तर पर उतरकर हमला करें।

Dayanand Pandey : दिल्ली विधानसभा चुनाव में मौलाना लोग बहुत तेज़ी से लामबंद हो रहे हैं । इन के पास ज़रा भी अकल नहीं है । अगर खुदा न खास्ता भाजपा के खिलाफ मुसलामानों से आम आदमी पार्टी को वोट देने का फतवा जारी कर दिया इन मौलाना लोगों ने तो जो अरविंद केजरीवाल अभी तक बढ़त बनाए दिख रहे हैं , औंधे मुंह गिरेंगे। यह मौलाना लोग कहीं हिंदू वोटों को पोलराइज करने के लिए नरेंद्र मोदी के ट्रैप में तो नहीं फंस गए हैं ? इस लिए भी कि भाजपा दिल्ली में पांच से अधिक मुसलमानों को उम्मीदवार बनाने जा रही है । इन में से कुछ पूर्व आपिये भी हैं। नरेंद्र मोदी जैसा बहेलिया अभी तक भारतीय राजनीति में तो नहीं देखा गया। मुसलमानों की खिलाफत ने ही इस बहेलिये को इतना ताकतवर बनाया है यह मौलाना लोग अभी तक नहीं समझ पाए , यह तो हद्द है!

पत्रकार मदन तिवारी, अवधेश कुमार और दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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मोदी रैली : दिल्ली में भाजपा को 22 से 24 सीटें मिल जाएं तो बहुत है

Anil Singh : झूठ में पीएचडी तुम्हारी तो नसीहत किसको! महामना मोदी जी ने रामलीला मैदान की रैली में कहा कि वे देश में पहली बार बिजली में सर्विस प्रोवाइडर चुनने का विकल्प देने जा रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री जी, यह सुविधा तो मुंबई में पिछले कई सालों से उपलब्ध हैं। खुद मैंने उसी फ्लैट में रहते हुए रिलायंस इंफ्रा को छोड़कर सवा साल पहले टाटा पावर की सेवा ली है। आपने कहा कि जनधन योजना में पहली बार गरीबों के बैंक खाते खोले गए। महोदय, आपको इतना तो पता ही होगा कि वर्तमान राष्ट्रपति और तब के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 10 फरवरी 2011 को स्वाभिमान योजना के तहत वित्तीय समावेशन कार्यक्रम की घोषणा की थी, जिसका नाम अब आपने बदलकर जनधन योजना कर दिया है।

स्वाभिमान योजना में 28 फरवरी 2014 तक करीब सात करोड़ बैंक खाते खोले जा चुके थे। आपने कहा कि पहले बार देश में ज़ीरो बैलेंस के बैंक खाते खोले गए। लेकिन नो-फ्रिए खातों का सिलसिला पिछले कम से कम चार सालों से चलता आ रहा है। महंगाई कम करने का श्रेय पेट्रोलियम की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बजाय खुद लेकर आपकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने सरेआम झूठ बोला। इससे पहले पश्चिम बंगाल में उनका झूठ पकड़ा गया था तो उन्होंने कहा था कि वे तो जनभावना व्यक्त कर रहे थे।

महोदय, ऐसे में आपसे विनम्र निवेदन है कि ‘झूठ’ की बात उठाकर अपनी ही जड़ें न काटिए। नहीं तो एक दिन आपका कहा सच हो जाएगा कि जनता झूठ बोलनेवालों का समूल नाश कर देगी।वैसे, रामलीला मैदान की रैली की टीवी फीड भाजपा ने जिसको भी बनाने का जिम्मा दिया था, वह या तो विकल्पहीन था या बहुत शातिर। जैसे ही मोदी जी ने कहा कि ‘जो देश चाहता है, वही दिल्ली चाहता है’ वह फौरन कैमरा पैन करके वहां ले गया, जहां जमीन पर बिछा हरा जाजिम दूर-दूर तक खाली नजर आ रहा था। रैली की इस ‘सफलता’ को देखकर तो मुझे लग रहा है कि दिल्ली में भाजपा को 70 में से 22 से 24 सीटें मिल जाएं तो बहुत है। बाकी, अमित शाह जी, छत्तीस नहीं, छत्तीस सौ कलाओं में माहिर हैं। इन कलाओं के कमाल का अंदाज़ा मैं क्या, कोई नहीं लगा सकता।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और अर्थ कॉम डॉट कॉम के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मोदी जी, आप देश के प्रधानमंत्री हैं, दिल्ली के लिए कोई और देखिए

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मोदी जी, आप देश के प्रधानमंत्री हैं, दिल्ली के लिए कोई और देखिए

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली में सत्ता पाने के लिए भारतीय जनता पार्टी 24 घंटे बिजली, गरीबों को घर, झुग्गी-झोपड़ी खत्म करना, अवैध कॉलोनी को नियमित करने जैसी सुविधाओं का चारा फेंक रही है। दिल्ली में वैसे भी प्रति व्यक्ति आय देश के कई शहरों के मुकाबले ज्यादा है। स्कूल, अस्पताल, गैस कनेक्शन जैसी सुविधाएं तो हैं ही।

कुल मिलाकर, देश भर में रहने लायक जगह दिल्ली ही है। गरीबों के लिए तो काफी मुफीद। आगे और होगी। रोजगार के मौके हैं सो अलग। गाजियाबाद में बिजली रहती नहीं है और दिल्ली में जाएगी नहीं – कहीं ऐसा ना हो कि पूरा देश दिल्ली में ही रहने लगे। अमीर-गरीब सब। बाकी देश में भी बिजली, पानी का कुछ करिए मोदी साब। सब कुछ दिल्ली में ही। आप देश के प्रधानमंत्री हैं, दिल्ली के लिए कोई और देखिए। किसी और को चलाने दीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर अच्छा चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने रेडियो पर एक विज्ञापन चलाया जो इस प्रकार है, “गलती मेरी ही थी। आम आदमी, आम आदमी कहकर धोखा दे दिया। बड़े-बड़े वादे। पानी मुफ्त कर देंगे। आंसू दे गया। घर के काम छोड़कर उसके लिए मीटिंग करवाई, मोहल्लों में। पर बदले में क्या मिला। सब छोड़कर भाग गया। इनके अपने आदमी तक चले गए। गैर जिम्मेदारी का बदला लेंगे। अब इस नाकाम आदमी को वोट न देंगे। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

इसका जवाब अरविन्द केजरीवाल की आवाज में आ रहा है। रेडियो विज्ञापन में वे कहते हैं, “मैंने एफएम रेडियो पर एक बुजुर्ग महिला की आवाज सुनी। बहुत दुखी नजर आ रही थीं क्योंकि उन्होंने मुझे वोट दिया और मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्हें लगा, मैंने उनके वोट का सम्मान नहीं किया। आज मैं उन्हीं से मुखातिब हूं। मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि माताजी, मैं कहीं भाग के नहीं गया कुछ ही दिनों में पूर्ण बहुमत लेके आपकी सेवा में फिर आ रहा हूं। आप अपना विश्वास बनाए रखिए। ना तो आपका वोट व्यर्थ गया ना आपका परिश्रम। कमी रह गई थी तो कुछ सीटों की आप विश्वास और आशीर्वाद बनाए रखिए हम पूर्ण बहुमत लेकर आपकी सेवा करने पूरे पांच साल के लिए फिर से वापस आ रहे हैं। आप नाराजगी छोड़िए, थोड़ा मुस्कुरा दीजिए।”

इसके अलावा, भाजपा और उसके सहयोगियों ने जो वोटबटोरू मुद्दे उठाए हैं (जीन्स पहनने, महिलाओं की नौकरी, लव जेहाद, गोड्से की मूर्ति) उनका मजाक उड़ाने वाला एक विज्ञापन आम आदमी पार्टी की ओर से आता है। हालांकि इसमें भाजपा का नाम नहीं लिया गया है। भाजपा के ज्यादातर विज्ञापन आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को लक्ष्य करते हैं। मुद्दे उसके पास हैं नहीं या उन्हें अभी सामने नहीं ला रही है पर अभी जो तीर दागे जा रहे हैं उसका एक और नमूना देखिए…

“कुछ ना था वो। चार दिन की चांदनी दिखाकर भाग गया। तुम खुद सोचो, जो अपने लालच के लिए एक बार जनता का विश्वास तोड़ सकता है वो दोबारा क्या ऐसा नहीं कर सकता? मगर भाई … … अरे तू रहने दे। सरकारी बंगला ठुकराने के बाद बंगला ले लिया… गाड़ी ठुकराने के बाद वो भी ले ली। जो अपने वादों पर ना टिका वो अपने विश्वास पर क्या खाक टिकेगा? ऐसी बचकानी हरकत करने वाले को तू चाहता है कि मैं वोट दूं। बात करता है। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

देखना है जनता नाराजगी छोड़कर मुस्कुराती है या मुस्कुराते हुए मोदी के साथ चली जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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ABP न्यूज ने ‘तर्क’ से जिताया मोदी को

पाठकों की राय को दरकिनार कर ABP न्यूज ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साल 2014 का व्यक्ति विशेष बना डाला। ABP न्यूज ने अपनी वेबसाइट ABP live पर साल 2014 के व्यक्ति विशेष का पोल करवाया। इस पोल में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुरी तरह पछाड़ दिया। मगर, ABP न्यूज ने निम्न तर्क देते हुए अरविंद केजरीवाल को हरा दिया।

”दर्शकों की राय में अरविंद केजरीवाल व्यक्ति विशेष हैं. लेकिन देश को पिछले 30 साल में पहली बार 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार नरेंद्र मोदी ने दी है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ABP न्यूज के 2014 के व्यक्ति विशेष हैं।”

लगता है कि ABP न्यूज ने अपनी छवि को बचाने के लिए इस तरह का हथकंडा अपनाया है। कहीं, उस पर आम आदमी पार्टी का पक्षपाती होने का आरोप न लग जाए। इस पोल में अरविंद केजरीवाल को 52.63 फीसदी मत मिले, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 34.12 फीसदी। इस तरह लोगों की पसंद में केजरीवाल आगे रहे।

Kulwant Happy
sharma.kulwant84@gmail.com

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अजीत अंजुम की बिटिया जिया ने मोदी की बजाय केजरी पर मुहर मारा (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : अजीत अंजुम ‘इंडिया टीवी’ चैनल में मैनेजिंग एडिटर हैं. इनकी एक प्यारी सी बिटिया है. नाम है- जिया. लगभग साढ़े आठ साल की होंगी. एक रोज यूं ही जिया ने अपने पापा से बातचीत के दौरान केजरीवाल और मोदी को लेकर जिक्र किया. अजीत अंजुम के भीतर का पत्रकार जगा और उन्होंने जिया से सहज भाव से बातचीत करते हुए सब कुछ मोबाइल में रिकार्ड कर लिया. जिया की मम्मी हैं गीताश्री जो खुद जानी-मानी महिला पत्रकार हैं. पत्रकार मां-पिता की बिटिया होने से उन्हें घर में बहस और विचार का माहौल मिलेगा ही. और, इस माहौल में अगर बच्चा अपनी कोई ओपीनियन बनाए तो वह सुनने जानने लायक होगा.

इस वीडियो में जिया ने कितने प्यार से बताया कि मोदी खुद का टीवी में विज्ञापन चलवा चलवा कर वोट पाए हैं. मोदी और केजरीवाल में से किसी एक के चुनने के सवाल पर जिया पहले तो दोनों को अच्छा बताती है, साथ ही यह भी कहती है कि किसी एक को अच्छा कहूंगी तो दूसरा बुरा मान जाएगा. लेकिन जब पपा अजीत अंजुम ने उनसे कहा कि आप एक पर राय बनाइए और बताइए तो जिया ने केजरीवाल का नाम लिया और केजरीवाल को चुनने का कारण बताया. जरूर देखने लायक वीडियो है. राजनीतिक रूप से हम किसी से सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन इस वीडियो में जो खास बात देखने समझने लायक है वह एक बच्ची का मनोविज्ञान. वह राजनीतिक रूप से अपने हम उम्र बच्चों से काफी सचेत है. उसकी पूरी बातचीत इन्नोसेंस से भरी पड़ी है. वीडियो देख कर मैं तो यही कह उठा कि पुत्री के पांव पालने में दिख रहे हैं. यानि ये बिटिया पक्का एक दिन मां-पिता और देश-समाज का नाम रोशन करेगी. लव यू जिया. हजारों साल जियो.

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=X7FG3Y58QM4

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस / वीडियो पर वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की टिप्पणी कुछ यूं है… Sanjaya Kumar Singh : अच्छे जवाब के लिए अजीत ने जिया को गुड कहा है। अच्छे आईडिया के लिए अजीत भी गुड कहलाने के पात्र हैं। वाकई पॉलिटिकली काफी जागरूक है जिया।

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दिल्ली में केजरीवाल का सीएम बनना इसलिए जरूरी है…

Yashwant Singh : दिल्ली में केजरीवाल का सीएम बनना इसलिए जरूरी है ताकि लोकतंत्र बचा रहे. कांग्रेस ने करप्शन के कारण तो वामपंथियों ने खुद के अहंकार की वजह से अपने आप को नष्ट कर लिया है. ऐसे में देश में कोई स्मार्ट और धारधार विपक्ष लगभग न के बराबर है. केजरीवाल और उनकी पार्टी के दिल्ली राज्य में बहुमत में आ जाने से इतना तो हम सबको संतोष रहेगा कि ये भाई और उनकी पार्टी कुछ न कुछ खुराफात करेगा, और वह खुराफात सच में जनहित में होगा.

अतीत के अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं. केजरीवाल के लिए खोने के लिए कुछ नहीं है. वो जो खोना था खो चुके हैं. अब उन्हें हमें आपको ठेल कर दिल्ली का सीएम बना देना है ताकि वह मोदी भाई साहब की सरकार के लिए सच्चा विपक्ष बन सकें. पप्पू पर मुझे कभी भरोसा नहीं रहा है और कांग्रेस जैसी गलीज़ पार्टी को तो आजादी के बाद ही खत्म कर देना चाहिए था, गांधी जी के कहे अनुसार. इसलिए भाइयों, दिल्ली विधानसभा के लिए मेरा वोट केजरीवाल और आप पार्टी को. बाकी, लोकतंत्र है, आप अपनी मर्जी के मालिक हैं. इतना कह सकता हूं कि जो मैं कह लिख रहा हूं, एक बड़े तजुर्बे और अनुभव के बाद लिख रहा हूं. भारत में सच्चा लोकतंत्र बनाए रखना है तो केजरीवाल और आप को बहुमत दिलाना है. बाकी तो जो है सो हइये है 🙂

A must watch video! : This video tries to answer all questions about Aam Aadmi Party. Please watch and share it on your wall with friends. क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=tGb-DIMBW6w

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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Vicious Conspiracy of the Sangh Parivar to fan Communal Tensions in the North-East Delhi

The thumping electoral victory of Narendra Modi led BJP in this Lok Sabha polls has undoubtedly given fresh lease of life to the communal fascist forces in India. Needless to mention that this fascist machinery remains at work even when not in power. However, of late, the fascist brigade, at the helm of which is Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), has tried to enforce its agenda of polarisation along communal lines throughout the country, both intensively as well as extensively. Be it the Trilokpuri riots in Delhi or the frenzy surrounding the all concocted ‘love jihad’; burning down of a church in North East Delhi or the recent ‘ghar wapasi’ (conversion) campaigns, the fascist engine has been running incessantly and spewing the communal venom. The latest in line of their attacks is their unwarrantable as well as unconstitutional claim over public spaces.

The following is a brief account of events which will make it more lucid to the reader. On the coming 19 December,2014, Naujawan Bharat Sabha,Delhi, is organising a cultural programme at Ramleela ground (officially called Rajeev Park),Sriram Colony,Khajoori in North East Delhi to commemorate the matyrs Ashfaqullah khan and Ramprasad Bismil, who were hanged to death by the British on this day in 1926. This day is being celebrated as Revolutionary Peoples’ Unity Day(Inquilabi Jan-ekjutta Diwas) and as a continuation of a protracted campaign being run by Naujawan Bharat Sabha in the wake of  recent communal fascist upsurge in the country. However, the organisers of this programme are facing a real tough time in getting this event underway.

The reason being that the venue in question, i.e , Ramleela ground is purportedly a disputed area, at least this is what the local police authorities say. Although no permission is required to hold any programme at this ground, especially those in which no tent needs to be fixed, the NBS did give a written intimation of this programme to the SHO as well as DCP, North East, Delhi on 22 November,2014. However, on 1 December,2014, the SHO infomed the organisers that the programme cannot be held at the said venue  as it is a disputed land. Moreover, he added that this cultural programme, which in fact is being envisaged as upholding the unity of Hindus and Muslims as was exemplified by the unflinching friendship of Bismil and Ashfaqullah, can cause law and order situation in the area.

Now lets see why this Ramleela ground in Khajoori is believed to be disputed. Khajoori khas in North East Delhi is predominantly a Muslim neighbourhood. Muslims account for at least 95 percent of the total population of this area. The entire region is categorised as unauthorized colony and had been included in the list of 917 colonies which were to be regularised as proposed by Shiela Dikshit led Congress government in 2012. Underdevelopment,state apathy and careful negligence are hallmark of such colonies and the case of Khajoori is no different. Ramleela ground, which is popularly called so as every year Ramleela is organised there, is situated in kachchi Khajoori (that part of Khajoori which lacks further in development). Besides Ramleela, namaz is also offered in its premises on both Ids. Other programmes too, are held occasionally in this ground. However, of late, and most significantly after BJP’s victory in Loksabha polls, the RSS has been holding its shakha every morning within its premises. Prior to this, no history of any shakha in this area can be traced. Most of the people who attend the shakha are not the residents of Khajoori, but come from the adjoining areas of Sonia Vihar and Karawal Nagar.

Apart from this development, another notable episode surfaced, which seems less of a coincidence and more of a well thought-out strategy aimed at communal polarisation ahead of Delhi Assembly polls. Earlier, whenever Ramleela was held on this ground, a wooden stage used to be erected as is the wont everywhere. However, this year, quite significantly, the organisers of Ramleela got  a permanent concrete stage constructed, and that too, without the mandatory approval of the local authority which in this case happens to be Delhi Development Authority (DDA).  And this is not all. These self-styled custodians of Hindu belief barred everybody else from using this stage. The issue regarding the illegal construction has been taken to the cout now and is yet to be decided.

Although nobody else is allowed to make use of this stage, what is of consequence here is that the RSS every morning hoists its flag atop this ‘disputed’ stage. And if this seems too brazen an act to the reader, then this doesn’t stop here. The RSS men have now started to treat this ground as their personal fiefdom. This year,on 6 October, on the occasion of Id, they refused to leave the ground when they were asked to, as the Muslim inhabitants of this locality had to offer their customary namaz. Soon, it broke out into an altercation and it was only after the police arrived that the RSS men left threatening with dire consequences. The following morning, they gathered people from adjoining areas and assembled in the ground. What ensued was inflammatory speeches and slogan-shouting by their pracharaks. And all this was done in front of the local police. Following this incident, the RSS people now come to the ground escorted by policemen. The police presence is maintained round the clock on the ground. When the shakha is in progress noone  is allowed entry in the ground. On sundays,this becomes even worse as the number of people attending this shakha increases and their stay becomes longer,on purpose. Throughout their presence, access is denied to everybody else to the ground.

Now a few child-like questions crop up in one’s mind. Why, if everybody else is prohibited from entering the park as it is a ‘disputed land’, the RSS people are allowed to hold shakha every morning? Why, if Naujawan Bharat Sabha is asked to obtain permission from the concerned authority to hold a 2-hour long programme on a particular day, the RSS is exempted from doing the same? How is it that the RSS men make provocative speeches in police presence and no action is taken against them? How is it that a cultural programme in the memory ot the martyrs is seen as a threat to law and order and organising RSS shakhas everyday as something innocuous? Why is the police protection being extended to the RSS people and why can’t the police ensure safety and security on the day of the programme? What is the cause of special privilege and impunity RSS enjoys? When the representatives of NBS met Delhi police officials in this regard, the answers to these questions became quite clear. Throughout our meetings with the police officials, the entire police department acted as an unofficial spokesperson for the RSS. What the DCP, NE, had to say in this regard was even more shocking. He very categorically stated that how can we stop RSS from holding the shakha when they have been doing so throughout the country for years now?  One can easily discern which way the police department is tilting.

However, the DDA  has asked the organisers to go ahead with the programme. We, therefore, call upon all the genuinely secular, progressive and justice-loving people and organisations to assemble in large numbers at 2 p.m. on 19 December,2014 at Ramleela ground, Khajoori to mark this day as the day of revolutionary peoples’ unity for which our martyrs’ stood as well as reclaim our right on our public spaces.

A Report by ‘Naujawan Bharat Sabha’, Delhi Unit

Abhinav Sinha

abhinav.hindi@gmail.com

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दिल्ली पुलिस ने विज्ञापन पर रोक लगाकर ‘आप’ को मुफ्त में लाभ दे दिया!

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को दिया मौका…. दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी के एक विज्ञापन पर रोक लगाकर उसे मुफ्त में लाभ की स्थिति में पहुंचा दिया है। जो काम लाखों के विज्ञापन से नहीं होता, वह मुफ्त में हो गया। आम आदमी पार्टी ने कहा है कि विज्ञापन पर यह रोक पूरी तरह गैर कानूनी है। हालांकि अरविन्द केजरीवाल ने इस विज्ञापन के बचाव में जो कुछ कहा है वह पार्टी के संदेश को और मजबूती तथा ज्यादा असरदार ढंग से कह रहा है।

इस विज्ञापन में एक युवती अपने साथ हुई छेड़खानी की घटना के बारे में बताती है। इस दौरान वह कहती है कि पुलिस ने किस तरह उसे परेशान किया। एफआईआर नहीं लिखी आदि। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि विज्ञापन में शामिल महिला वाकई ऐसी किसी घटना की शिकार है या कोई काल्पनिक चरित्र। और यह सब पता करने से पहले अपनी छवि ठीक करने के नाम पर दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को अपनी छवि चमकाने का एक बढ़िया मौका दे दिया है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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