इंडिया टुडे समूह को लल्लनटॉप टाइप पत्रकारों की जरूरत

इंडिया टुडे समूह की वेबसाइट ‘लल्‍लनटॉप’ को लल्लनटाप टाइप पत्रकार चाहिए. कुल छह पद हैं. कार्यस्थल होगा फिल्‍म सिटी, नोएडा. सोशल मीडिया एडिटर (असिस्टेंट एडिटर लेवल), न्यूज प्रॅड्यूसर (असिस्टेंट एडिटर लेवल), सिनेमा राइटर (चीफ सब एडिटर लेवल), दो ट्रेनी, न्यूज (पॉलिटिक्स, स्पोर्ट्स, टेक, इकॉनमिक्स या फिर बिहार में खास दिलचस्पी हो तो अच्‍छा) और एंकर (सिनेमा में खास दिलचस्पी के साथ) पदों के लिए आप jobs.lallantop@gmail.com पर सीवी व अन्य डिटेल भेजें. Continue reading

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सैकड़ों करोड़ रुपये देख कल्ली पुरी ‘इंडिया टुडे’ समेत सभी प्लेटफार्म्स पर ‘एजेंडा’ पत्रकारिता के लिए तैयार हो गईं, देखें वीडियो

टीवी टुडे नेटवर्क हिन्दी और न्यूज़ टेलिविजन नेटवर्क इंग्लिश है। बीएसई और एनएसई में लिस्टेड टीवी टुडे नेटवर्क के आजतक, इंडिया टुडे टेलीविजन, तेज़ और दिल्ली आजतक जैसे कई न्यूज़ चैनल है। व्यापक रूप से टीवी टुडे नेटवर्क का स्वामित्व अरुण पुरी नियंत्रित लिविंग मीडिया इंक के पास है जो इंडिया टुडे, बिज़नस टुडे मैगज़ीन भी पब्लिश करती है। मैग्जीन, अखबार, किताब, टीवी, प्रिंटिंग और इंटरनेट जैसे कई क्षेत्रों में ये कंपनी व्यापार कर रही है। इसके अलावा कास्मोपोलिटन और मेल टुडे में भी कंपनी का ज्वाइंट वेंचर है। Continue reading

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‘गौ आतंकी’ शीर्षक से कार्यक्रम प्रसारित करने पर इंडिया टुडे ग्रुप को विहिप ने लीगल नोटिस भिजवाया

विश्व हिंदू परिषद ने इंडिया टुडे ग्रुप को एक लीगल नोटिस भिजवाया है. यह नोटिस ‘गौ आतंकी’ नाम से एक कार्यक्रम ‘इंडिया टुडे’ पर प्रसारित करने को लेकर था. लीगल नोटिस में कहा गया है कि इस कार्यक्रम के जरिए विश्व हिंदू परिषद की युवा शाखा बजरंग दल की छवि को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया गया है. लीगल नोटिस की एक कापी सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भी भेज दिया गया है.

लीगल नोटिस की एक प्रति भड़ास के पास भी है, जिसे नीचे दिया जा रहा है….

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‘इंडिया टुडे’ में ‘हत्यारोपी’ वंजारा को हीरो बनाने वाला संपादक वीएचपी का सलाहकार!

क्या आपने इंडिया टुडे (अंग्रेज़ी) का 9 मई का अंक देखा है। इसमें सोहराबुद्दीन और इशरत जहाँ फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में फँसे पूर्व आईपीएस डी.जी.वंजारा पर एक स्टोरी है। तमाम किंतु-परंतु के बीच यह बताती है कि कैसे वंजारा देशद्रोही ताक़तों के शिकार हुए हैं और जल्दी ही वे राजनीति में शामिल होकर हिसाब बराबर करेंगे। वंजारा लंबे समय से जेल के बाद अब पैरोल पर हैं। करीब नौ साल बाद पिछले दिनों जब वे अहमदाबाद पहुँचे तो उनके भव्य स्वागत से आह्लादित इंडिया टुडे के सीनियर एडिटर उदय महूरकर ने अपने “ड्रेसिंग फॉर बैटेल” शीर्षक लेख में उन्हें किसी हीरो की तरह पेश किया। साथ में एक तस्वीर भी लगाई जिसमें राजसी मेहराब के बैकग्राउंड में वंजारा अपनी तलवार के साथ किसी सेनानायक की तरह लग रहे हैं। लेकिन कारवाँ पत्रिका से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार हरतोष सिंह बल ने बताया है कि यह संयोग नहीं है। उदय महूरकर दरअसल वीएचपी के पुराने सलाहकार रहे हैं। सुनिये हरतोष सिंह बल की ज़ुबानी, उदय महूरकर और इंडिया टुडे की कहानी– 

जऱा इशरत जहाँ केस पर नज़र डालें। यह डेविड हेडली की गवाही की वजह से फिर चर्चा में है। इस गवाही में डेविड के मुँह में ज़बरदस्ती यह बात डाली गई कि इशरत लश्कर से जुड़ी आतंकी थी। अदालत मे इस तरह की गवाही का कोई मतलब नहीं। लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया इसे ले उड़ा और बहुत करीने से मुद्दा बनाया गया कि इशरत आतंकी थी या नहीं? इस मामले में सारे सबूत बताते हैं कि 19 वर्षीय इशरत आईबी की मदद से हिरासत में ली गई थी। अगर वह आतंकी थी भी तो उसे ज़िंदा पकड़ा गया था। वह कहीं भाग नहीं रही थी। अगर वह दोषी थी तो उसे अदालत के सामने पेश करना चाहिए था। उसे गोली मार दी गई तो कोई तो इसका ज़िम्मेदार है। लेकिन आप देखते हैं कि बजाय इसके कि डी.जी.वंजारा को गुनहगार ठहराया जाता, वह एक हीरो की तरह जेल से बाहर आता है। मीडिया भी इसी अंदाज़ में उसे पेश करती है।

हाल के इंडिया टुडे में वंजारा की एक तस्वीर छपी है जिसमें वह पूरी शान के साथ तलवार लटकाये खड़ा है। यह घृणित है। इंडिया टुडे का ऐसे वक़्त पर इसे प्रकाशित करना संयोग नहीं है और स्टोरी सीनियर एडिटर उदय महूरकर ने लिखी है। उदय महूरकर पहले अहमदाबाद में इंडिया टुडे के संवाददाता थे, और मुझे अफ़सोस है कि मुझे विस्तार से उनके बारे में बताना पड़ रहा है, क्योंकि यह ज़रूरी हो गया है।

2005 में मैं जब तहलका वैसा नहीं था, जैसा आज है, मैं नरेंद्र मोदी पर स्टोरी करने गुजरात गया था। वहाँ मैं विश्व हिंदू परिषद के दप्तर भी गया। मुझे बताया गया कि अंदर एक राज्यस्तरीय महत्वपूर्ण बैठक चल रही है। मैं अपने स्थानीय संवाददाता महेश लांगा के साथ बाहर इंतज़ार करने लगा। हम ऐसी जगह बैठे जहाँ से अंदर की बात सुन सकते थे। यह मीटिंग थी कि वीएचपी उन मुकदमों में पैरवी किस तरह करे जिनमें मोदी का नाम आया है। और जो शख्स सलाह दे रहा था, रणनीति सुझा रहा था, वह था उदय महूरकर। सोचिये मीडिया का एक बड़ा नाम वीएचपी की मीटिंग में! और अब वही व्यक्ति डी.जी.बंजारा के बारे में राष्ट्रीय पत्रिका में लिख रहा है। आप उससे क्या उम्मीद करते हैं।     

अब ज़रा दूसरा मामला देखिये। क्या हुआ जब जेएनयू का मामला सामने आया ? हम सब अब फर्जी वीडियो की बात कर रहे हैं, लेकिन एक छोटी सी घटना और हुई थी जो दिलचस्प है। उस समय हाफ़िज़ सईद के एक ट्वीट की चर्चा हुई जिससे पता चलता था कि वह ख़ुद जेएनयू घटनाक्रम के पीछे है। दिलचस्प बात यह है कि यह ट्वीट सबसे पहले इंडिया टुडे ग्रुप के ही पत्रकार गौरव सावंत ने सार्वजनिक किया। मैं तब से जानना चाहता हूँ कि गौरव सावंत को यह ट्वीट हासिल कहाँ से हुआ और उसने यह नतीजा कैसे निकाला कि वह ट्वीट हाफ़िज़ सईद का ही है। इंडिया टुडे चैनल ने इसे ब्रेकिंग न्यूज़ बताकर चलाया था। (बाद में यह ट्वीट फ़र्ज़ी साबित हुआ)। आख़िर चैनल ने इस ग़लती के लिए अपने पत्रकार को ज़िम्मेदार क्यों नहीं ठहराता?

यह कहना हास्यास्पद है कि देश के विश्वविद्यालयों के कैंपस में दिख रहे असंतोष के पीछे आतंकी संगठनों का हाथ है। यह चुटकुला है, लेकिन इसे एक गंभीर ख़बर की तरह एक नामी पत्रकार पेश करता है और फिर उससे कोई पूछता भी नहीं कि यह क्यों और कैसे संभव है! इस तरह देखें तो बहुत से पत्रकार जो आजकल ख़ुद को दक्षिणपंथी बतौर पेश कर रहे हैं, दरअसल, सरकार के भोंपू हैं। कुछ ख़ास तरह के विचार को बड़े पैमाने पर प्रचारित करने और सरकार को पसंद आने वाली बातें करने वाले आज हर मीडिया संस्थान में अहम रोल में हैं। सरकार के तमाम बड़े मंत्रियों से उनका सीधा संबंध हैं। सोशल मीडिया में भी उन्हें फॉलो करने वालों की बड़ी तादाद है। वे ख़बरें दे सकते हैं, देते हैं, लेकिन उनकी कोई जवाबदेही नहीं है।”

हरतोष सिंह बल कारवाँ पत्रिका के राजनीतिक संपादक हैं और मई के आख़िरी हफ़्ते में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ”आयडिया ऑफ इंडिया कान्क्लेव” में उन्होंने जो भाषण दिया था, उसी का एक हिस्सा यहाँ पेश किया गया है.

साभार : MediaVigil.com

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इंडिया टुडे ग्रुप ने बिहार में जंगलराज-2 घोषित कर दिया!

Nadim S. Akhter : इंडिया टुडे ग्रुप ने बिहार में जंगलराज-2 घोषित कर दिया है। हेडिंग देखिये। ये कहकर कि ये लेखक के निजी विचार हैं। संपादकीय पतन की निर्लज्ज पराकाष्ठा देखिये। यदि ऐसा है तो आरजेडी, बीजेपी, कांग्रेस समेत तमाम दलों को अपने ऑनलाइन भक्तों वाली सेना को ichowk के लिए लगा देना चाहिए ताकि वे पानी पी-पी कर विरोधियों को रावण और अपने नेता को हीरो बनाते रहें और पब्लिक इसे एक बड़े मीडिया संस्थान का निष्पक्ष प्रकाशन मानती रहे।

विचार के पन्ने अख़बारों में भी होते हैं, वहां भी अलग अलग विचारों वाले लेख आमंत्रित और प्रकाशित किये जाते हैं, लेकिन ichowk वालों ने तो खुला खेल फ़र्रुखाबादी कर दिया है। अगर बीजेपी का राष्ट्रीय प्रवक्ता या कोई पदाधिकारी ऐसा लेख लिखेगा तो हम उनकी पार्टी और पद का रिफरेन्स देकर उसे छाप सकते हैं, पब्लिक समझ जाती है। लेकिन यहाँ तो??!! लेखिका को मैं नहीं जानता और ना ही उनकी राजनितिक संलिप्तता और न ही इस वेबसाइट ने उनके बारे में कुछ बताया है, फिर भी घोषित कर दिया है बिहार में जंगलराज पार्ट-2। वैसे इस ichowk के माननीय संपादक कौन हैं, उनका नाम महफिल में बताया जाना चाहिए।

पत्रकार, मीडिया शिक्षक और विश्लेषक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर जंगलराज-2 की लेखिका सुनीता मिश्रा का जो कमेंट आया है, वह इस प्रकार है…

Sunita Mishra : जी नदीम जी बताएं, इसे लिखने वाली लेखिका में हूं, जिन्हें शायद आप नहीं जानते। क्या गलत लिखा है, जो हो रहा है केवल उसे ही आम जनता तक पहुंचाया है और आप कह रहे हैं कि इंडिया टुडे ग्रुप ने बिहार में जंगल राज-2 घोषित कर दिया है। आपको एक बात बता दूं, यह हैडिंग उन्होंने नहीं, बल्कि मैंने दी। जो वहां हो रहा है, क्या आप उससे सहमत हैं? मदद की गुहार तो उन निर्दोषों और मासूमों को लगानी चाहिए, जिनके साथ यह सब हो रहा है, आप क्यों लगा रहे हैं। यह संपादकीय पतन की निर्लज्ज पराकाष्ठा नहीं, अपितु आपके विचार हैं। और हां भक्त तो शायद आप मालूम पड़ते हैं, जो आंखों देखी मक्खी निगलने की कोशिश कर रहे हैं। हम पानी पी-पी कर नहीं, बल्कि सोच—विचार कर लिखते हैं। हमारा कोई विरोधी नहीं है और न ही कोई नेता। यह तो शायद आप के विचार है, जो आप उन्हें शब्दों के बाण के रूप छोड़ रहे हैं। अच्छा बताइए आपका कौन सा नेता है? किससे बारे में लिखने से आप संतुष्ट होंगे?

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Will India Today’s gamble to rebrand its Headlines Today television channel pay off?

Media watchers and market analysts are observing the recent rebranding of Headlines Today as India Today TV with keen interest. As rebrandings go, this exercise is undoubtedly bold, running many risks. Is India Today a strong enough brand to work magic in the visual and print media together? Can a print brand’s appeal be superimposed on a television network to get better TRPs? Will core readers of India Today, the flagship 30-year-old magazine, switch to watching the India Today TV channel, snubbing NDTV and Times Now or News X?

 

Marketing mandarins believe that a brand provides the pull and the marketing the push. In this case, there seems to be some confusion between the branding and marketing strategy. The rebranding is the brainwave of Kalli Purie, the new group editorial director, who has said the main intention behind the exercise is to serve as a “credibility booster” for the 12-year-old channel Headlines Today. She said India Today would bring a web philosophy to the television screen as well as “snappy headlines”. What this means is native advertising, shorter advertisement breaks, etc. It is difficult to imagine viewers being won over with snappy headlines, which has been a long-running philosophy of the India Today group.

In media, we know that a print publication develops a readership that does not necessarily render into TV viewership of a TV channel. Brands in each segment are viewed separately. As Hector Pottie of the branding company Prophet London said in the Guardian: “In today’s world brands live or die on what they do. If the experience is poor then loyalty won’t last long. There’s a lot of choice and if the minute a brand isn’t giving me what I need I’m not likely to stick around.”

So the question really here is what will India Today TV give what Headlines Today couldn’t? What does India Today stand for that Headlines Today didn’t? Rajdeep Sardesai’s stint as an anchor of a prime time show and Karan Thapar’s show has given the channel some heft and viewership. But will this be enough?

Already, the channel has plunged headlong into a battle for TRPs with Times Now. It claimed to have toppled Times Now (on the back of its coverage of the Lalit Modi story and interview), while its editor Rahul Kanwal accused Times Now of trying to reclaim the top spot by “hook or by crook”.

According to BARC India, an industry body that measures television audiences, India Today TV became the top channel in the last week of May, with a viewership of 354 (000’s sum, a unit used to calculate reach) to Times Now’s 264. Till late last year, NewsX was the top channel based on TRPs in the six metros. Ratings by different agencies differ and are based on different parameters.

It is debatable whether the India Today print brand has grown additional sinews in the last decade to pass on excess pulling muscle to its TV network. The magazine and the group began to lose prominence in the last decade when the digital churn started. This was because the group chairman Aroon Purie believed there was “no point sending the good money after the bad”, as he often said about digital investments. Still, India Today tried several digital strategies, most of which didn’t work too well. The main portal was once put behind a pay wall, then a website with “snappy headlines” was launched, and then a commerce website only for invitees was set up – all with lukewarm success.

Connecting brand identities

Cross-connecting brand identities is a risky business. Times Now takes its brand equity from its print variant but that was no rebranding. Today, the channel and the newspaper travel different paths. Times Now today is a big brand in its own right and does not need rebranding as Times of India TV. Zee’s newspaper is DNA, where no effort is made to link the brands as one family. It is what you provide that matters and not the branding.

Aaj Tak has done well without the India Today logo hanging anywhere near it. At the same time, some regional editions of India Today with the same branding have shut down, showing that in regional languages the brand pull doesn’t work. So where does this brand equity work?

In the case of the TV channel rebranding, many will argue that the magazine was the weaker brand among the two and actually the magazine should have been renamed as Headlines Today, with the bright future of TV and the dismal future of print in mind. Both the television channel and the magazine need to rejuvenate in the coming years. That anxiety has set in in the group is evidenced by the fact that India Today magazine has had four editors in the last two-three years. The TV rebranding too can be seen as part of this struggle to regain its pre-eminence.

साभार- स्कॉल डॉट इन

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अरुण पुरी ने बेटी कली पुरी को बना दिया ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर

अरुण पुरी यानि आजतक, इंडिया टुडे समेत कई चैनलों पत्रिकाओं के मालिक ने अब अपनी बेटी कली पुरी को ग्रुप का एडिटोरियल डायरेक्टर बना दिया है. इंडिया टुडे ग्रुप में कली पुरी अब ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्‍टर के बतौर ब्रॉडकास्‍ट और न्‍यू मीडिया का काम देखेंगी. इससे पहले कली पुरी ग्रुप सिनर्जी और क्रिएटिव ऑफिसर पद पर थीं.

खुद अरुण पुरी इंडिया टुडे ग्रुप के अध्‍यक्ष और एडिटर इन चीफ हैं. अरुण पुरी ने ग्रुप के कर्मचारियों को कली पुरी को नई जिम्‍मेदारी दिए जाने के बाबत मेल किया है. कली पुरी 1996 से मीडिया में सक्रिय हैं. सबसे पहले वह इंडिया टुडे मैग्जीन में मार्केटिंग एग्जिक्‍यूविट और रिपोर्टर बनीं. बाद में प्रिंट, टेलिविजन और डिजिटल में विभिन्‍न पदों पर काम किया. वर्ष 2011 से वह इंडिया टुडे कॉन्क्‍लेव के डायरेक्‍टर की भूमिका निभा रही हैं.

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जल्द आ रहा है अंग्रेजी न्यूज चैनल India Today

हिंदी समाचार चैनलों में ‘आजतक’ के तौर पर अपनी बादशाहत कायम करने के बाद टीवी टुडे ग्रुप अब अंग्रेजी में भी दमदार दस्तक के लिए तैयार है. अंग्रेजी माध्यम में सबसे तेज और सबसे बेहतर खबरों के प्रसारण और विश्लेषण के लिए जल्द ही India Today के नाम से अंग्रेजी न्यूज चैनल लॉन्च होने वाला है.

 

हिंदी में निष्पक्ष खबरों के प्रसारण और खबर की तह तक जाकर जानकारी जुटाने में टीवी टुडे ग्रुप का कोई सानी नहीं है. अपनी इसी खूबी को विस्तार देते हुए कंपनी अब अंग्रेजी में भी अपनी पहचान बनाने की तैयारी में है. नए चैनल की लॉन्च‍िंग के बाबत इंडिया टुडे ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आशीष बग्गा कहते हैं, ‘हम एक सप्ताह में अंग्रेजी समाचार चैनल पेश करेंगे.’

(आजतक की वेबसाइट से साभार)

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अरुण पुरी को पत्रकारिता से प्रेम होता तो इंडिया टुडे के दक्षिण भारत के तीन एडिशन्स क्यों बंद करते!

एक बुरी खबर इंडिया टुडे ग्रुप से है. इंडिया टुडे पत्रिका के दक्षिण भारत के तीन एडिशन्स बंद कर दिए गए हैं. अब इंडिया टुडे को तमिल, तेलगु और मलायलम भाषी लोग नहीं पढ़ सकेंगे. इन तीन एडिशन्स के बंद होने के बाद इंडिया टुडे सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी में बची है. लोग कहने लगे हैं कि अगर अरुण पुरी को सच में पत्रकारिता से प्रेम होता या मीडिया के सरोकार से कोई लेना-देना होता तो वह दक्षिण भारत के तीन एडिशन्स बंद नहीं करता.

आखिर पूरे देश को एक स्तरीय पत्रिका को पढ़ने का हक है. अगर ये तीन दक्षिण भारतीय एडिशन्स घाटे में चल रहे थे तो इसे लाभ में लाने की कवायद की जानी चाहिए थी. पर तीन दक्षिण भारतीय भाषाओं में पत्रिका को बंद करके अरुण पुरी ने अपने धंधेबाज चेहरे का ही खुलासा किया है. जिस तरह दूसरे धंधेबाज मीडिया मालिक लाभ हानि के गणित से अपने मीडिया हाउस को चलाने बंद करने या विस्तारित करने पर ध्यान जोर देते हैं, वही काम अरुण पुरी भी कर रहे हैं.

वैसे, एक अच्छी बात ये है कि अरुण पुरी ने बंद किए जाने वाले तीनों एडिशन्स के कर्मियों को आश्वस्त किया है कि उन्हें समुचित मुआवजा मिलेगा. चेन्नई में अब इंडिया टुडे का आफिस बंद करके अब छोटा सा ब्यूरो रखा गया है. अरुण पुरी ने आंतरिक मेल जारी कर सभी को तीनों एडिशन्स बंद किए जाने की सूचना दी है. अपने पत्र में एक जगह अरुण पुरी लिखते हैं:

“The India Today weekly editions of Tamil, Telugu, and Malayalam have been incurring loss for over two decades. We have been absorbing the losses so far in the hope that they will turnaround. After great deal of deliberation we have come to the conclusion that we don’t see the viability of these editions in the foreseeable future. It is, therefore, with a heavy heart that we have decided to discontinue these editions.”

“The office in Chennai will now be a smaller Bureau. Some colleagues who are already contributing to the English edition will be retained in ITE and be a part of this Bureau.”

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Aroon Purie को शर्म मगर आती नहीं….

जिस रोज पेशावर में मासूमों का कत्लेआम किया जा रहा था, जिस शाम पूरी दुनिया इस जघन्यतम बाल संहार से स्तब्ध होकर आंसू बहा रही थी, उसी रोज और उसी शाम अरुण पुरी अपनी पूरी टीम के साथ नोएडा फिल्म सिटी में पार्टी इंज्वाय कर रहे थे. बैंड बाजा लाइंटिंग डांस खाना पीना मस्ती.. फुल टाइट व्यवस्था थी और सबने जी भर कर इंज्वाय किया.. पार्टी India Today मैग्जीन की वर्षगांठ के मौके पर तय थी और हुई भी. एक बार भी अरुण पुरी का दिल पेशावर के बच्चों के लिए दर्द से नहीं भरा. सरोकारी पत्रकारिता और संवेदनशील पत्रकारिता का दावा करने वाले टीवी टुडे ग्रुप और लीविंग मीडिया कंपनी के मालिक अरुण पुरी से कम से कम ये उम्मीद तो हम सभी कर सकते हैं कि वह देश दुनिया की नब्ज, संवेदना, सरोकार को पकड़ेंगे, समझेंगे और उसके हिसाब से बिहैव करेंगे. फिल्म सिटी में काम करने वाले दर्जनों पत्रकारों ने भड़ास को फोन कर इस जघन्य पार्टी के बारे में जानकारी दी.

सोशल मीडिया पर बाल संहार वाले दिन ही कई मीडिया के साथियों ने अपना प्रोफाइल पिक्चर हटाकर वहां दुख स्वरूप ब्लैक ब्लैंक तस्वीर लगा दी ताकि शोक प्रकट किया जा सके, दुख अभिव्यक्त किया जा सके. नर पिशाचों के हाथों मारे गए मासूमों के परिजनों के मातम और बचे हुए बच्चों की चीखों दुखों ने हर एक को बेध दिया. पूरी दुनिया अब तक इस ग़म दुख से उबर न सकी है. ये किसी पाकिस्तान का मामला नहीं है. दुनिया के किसी हिस्से में इतने सारे मासूम एक साथ स्कूल में मार दिए जाएं तो वह राष्ट्रीय नहीं बल्कि ग्लोबल शोक का विषय है. हम सभ्यता के हजारों लाखों साल के विकास क्रम में आज यहां तक पहुंचे हैं कि अपने ही बच्चों को लाइन में लगाकर गोली मार देते हैं.

इस न भूले जाने वाली घटना ने छोटे बड़े हर मीडियाकर्मी से लेकर आम आदमियों तक को अंदर से हिला कर रख दिया. रातों की नींद छीन लिया. सबने उन बच्चों में अपने-अपने बच्चों, भाइयों का चेहरा देखा. बच्चे भगवान का रूप माने जाते हैं. बच्चे धर्म मजहब सबसे परे होते हैं क्योंकि वे सहज सरल सच्चे भोले होते हैं. इन बच्चों ने किसी का क्या बिगाड़ा था. सो, इनके कत्लेआम पर पूरी दुनिया रोई और रो रही है. लेकिन अरुण पुरी को लाज शरम नहीं आई. सोलह दिसंबर की काली शाम अरुण पुरी ने इंडिया टुडे मैग्जीन की वर्षगांठ मनाई और इस मौके पर जमकर पार्टी करवाई. उसी सोलह दिसंबर की शाम ‘दलित दस्तक’ मैग्जीन के संपादक और आईआईएमसी से पासआउट अशोक दास अपने फेसबुक वॉल पर कुछ यूं लिखते हैं:

Ashok Das : 17 दिसंबर को मेरा जन्मदिन होता है। जाहिर है फेसबुक यह संदेश आपलोगो तक पहुंचाएगा औऱ आप शुभकामनाएं देंगे। लेकिन प्लीज, इस बार रहने दीजिएगा। मैं शुभकामनाएं ले नहीं पाऊंगा। मेरी आंखों के सामने पाकिस्तान के वह 130 बच्चे हैं, जिन्हें मार दिया गया है। यह इतनी जल्दी नहीं भूला जा सकता।

अशोक दास के लिखे को बतौर उदाहरण पेश किया. हर किसी ने अपने अपने तरीके से इस बड़े दुख को अभिव्यक्त किया. किसी ने जन्मदिन न मनाकर. किसी ने ब्लैक प्रोफाइल पिक्चर लगाकर. किसी ने लिखकर. किसी ने एकांत धारण करके. एक और उदाहरण दे देता हूं. ‘समाचार प्लस’ न्यूज चैनल के निदेशक और संपादक उमेश कुमार ने भी अपना बर्थडे नहीं मनाया. उन्होंने फेसबुक पर लिखा है…

Umesh Kumar : Sorry Friends Pls Dont Wish Me….I’m not celebrating My bday… I’m not Able To come Out From Yesterday’s Incident happened In Pakistan…. Small Kids Were lying on the Floor…. Bloody So Called Talibaani Hijde Shot Them many times… Still I have tears In my eyes…. They Were Not Pakistani… They Were Kids…Meri Sharadhanjali Un Pyare Aur Masoom Bachcho Ke Liye…Jo Un Talibaani Hijde Haramjaado Se Kah Rahe Honge Ki Uncle Hume Mat Maaro…. Un Masoom Bachcho Ki Yaad Sone Nahi De Rahi…

लेकिन अरुण पुरी को कोई शर्म नहीं. कम से कम इस अरुण पुरी को टीवी टुडे समूह को अब खुद को सरोकारी पत्रकारिता करने वाला मीडिया समूह कहना छोड़ देना चाहिए. मान लेना चाहिए कि अब ये मीडिया घराने जनता के प्रतिनिधि नहीं बल्कि पूंजीपतियों के यार-रिश्तेदार हो गए हैं. इसी कारण इनका दिल सैकड़ों बच्चों के मारे जाने से नहीं दुखता… हां, कोई परिचित मोटा सेठ ज्यादा खाकर हार्ट अटैक से मर जाए तो जरूर कई दिन तक इनके घर में शोक मातम मनेगा. फिलहाल तो यही कहूंगा.. शेम शेम अरुण पुरी… थोड़ी भी संवेदना होती तो बच्चों के संहार के दुख में तुम अपनी इनहाउस पार्टी कैंसल कर दिए होते. पार्टी कैंसल करना ‘इंडिया टुडे’ की वर्षगांठ के लिए ज्यादा सम्मानजनक रहा होता. लेकिन पहले से तय पार्टी करके ‘इंडिया टुडे’ की छवि और तेवर को धक्का दिया है. पूरे कुकृत्य को छिछोरापन ही कहा जाएगा.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


अरुण पुरी के छिछोरेपन के कुछ अन्य किस्से इन लिंक्स goo.gl/XMLj5v , goo.gl/LvW876  और goo.gl/0N9jJO पर भी क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

 

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बुढ़ापे में पैसे के लिए पगलाया अरुण पुरी अब ‘पत्रकारीय वेश्यावृत्ति’ पर उतर आया है…

Yashwant Singh : फेसबुक पर लिखने वालों, ब्लाग लिखने वालों, भड़ास जैसा पोर्टल चलाने वालों को अक्सर पत्रकारिता और तमीज की दुहाई देने वाले बड़े-बड़े लेकिन परम चिरकुट पत्रकार इस मुद्दे पर पक्का कुछ न बोलेंगे क्योंकि मामला कथित बड़े मीडिया समूह इंडिया टुडे से जुड़ा है. बुढ़ापे में पैसे के लिए पगलाए अरुण पुरी क्या यह बता सकेगा कि वह इस फर्जी सर्वे के लिए बीजेपी या किसी अन्य दल या कार्पोरेट से कितने रुपये हासिल किए हैं… इंडिया टुडे वाले तो सर्वे कराने वाली साइट के पेजेज को खुलेआम अपने एफबी और ट्विटर पेजों पर शेयर कर रहे हैं. इससे पता चलता है कि मामला सच है और इंडिया टुडे वालों ने केजरीवाल को हराने के लिए किसी बड़े धनपशु से अच्छे खासे पैसे हासिल किए हैं.

बिकाउ मीडिया और कार्पोरेट-करप्ट मीडिया से वैसे तो मुझे कई वर्षों से कोई उम्मीद नहीं रही लेकिन अब भी ढेर सारे लोग हैं जो मीडिया हाउसों के चैनलों, अखबारों पर चलाई जा रही खबरों, सर्वे आदि को सच मानते हैं. आप भड़ास की इस खबर https://bhadas4media.com/print/2557-india-today-kejri-tweet को एक बार पढ़ लें और इस खबर में दिए गए वीडियो लिंक को क्लिक करके देख लें तो पक्का आप सनक जाएंगे और गरियाएंगे कि साला ऐसा भी कहीं होता है क्या…

ये बड़े बड़े मीडिया मालिक और बड़े बड़े पत्रकार अगर कभी आपको या हमको पत्रकारिता की तमीज सिखाते मिल जाएं तो तड़ाक से इनके मुंह पर अपना जूता या चप्पल निकाल कर मार दीजिए, बिना कोई जवाब या सफाई दिए…

छोटे मोटे मैग्जीन प्रकाशकों, लघु अखबार संचालकों, ब्लागरों, पोर्टल संचालकों आदि को ब्लैकमेलर बताकर खुद को चरित्रवान बताने वाले बड़े मीडिया हाउसों के मालिक दरअसल सबसे खूंखार और सबसे बड़े ब्लैकमेलर हैं जो पैसे लेकर सुपारी पत्रकारिता करते हैं. ऐसे सुपारी पत्रकारिता करने वाले बड़े मीडिया हाउसों के बड़े व्यभिचारी मालिकों और बड़े मीडिया हाउसों के बड़े दलाल संपादकों-पत्रकारों ने पूरी पत्रकारिता की साख गिरा कर खत्म कर दी है. यही कारण है कि अब मीडिया की बात आते ही हर कोई कहने लगा है कि इनकी तरफ पैसे फेंकिए, ये तत्काल मैनेज हो जाएंगे. पुलिस और नेताओं की तरह महाभ्रष्ट कैटगरी में आ चुका है मीडिया. अरुण पुरी की इस करतूत ने इंडिया टुडे ग्रुप की रही सही साख खत्म कर दी है और इसे भी चोरों ब्लैकमेलरों सुपारी पत्रकारों सुधीर चौधरियों, दीपक चौरसियाओं की कैटगरी वाला पत्रकारिता करने वाला मीडिया हाउस बना दिया है. शेम शेम इंडिया टुडे. शेम शेम अरुण पुरी.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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इंडिया टुडे वालों के फर्जी सर्वे की खुली पोल, केजरीवाल ने पूछा- क्या यही है पत्रकारिता?

इंडिया टुडे समूह के फर्जी सर्वे और घटिया पत्रकारिता से अरविंद केजरीवाल नाराज हैं. अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्विटर अकाउंट पर ट्टवीट करके लोगों से पूछा है कि क्या इसे ही पत्रकारिता कहते हैं? साथ ही केजरीवाल ने एक वीडियो लिंक दिया है जिसमें इंडिया टुडे के फर्जी सर्वे की असलियत बताई गई है. अरविंद केजरीवाल के पेज पर शेयर किए गए लिंक से यू-ट्यूब पेज पर जाने पर एक वीडियो मिलता है. इस वीडियो में दिखाया गया है ‌कि देश का नामी इंडिया टुडे ग्रुप द्वारा न्यूजफिल्क्स डाट काम नामक एक वेबसाइट के जरिए एक सर्वे कराया रहा है जिसमें लोगों से पूछा गया है कि वह केजरीवाल को कितना नापसंद करते हैं और ये कि क्या आप केजरीवाल को दोबारा मौका देंगे?

चौंकाने वाली बात ये है जैसे ही इस सर्वे में आप भाग लेते हैं आपसे एक एक कर सात सवाल पूछे जाते हैं लेकिन कोई भी सवाल केजरीवाल से जुड़ा हुआ नहीं होता. लेकिन जब रिजल्ट बताया जाता है तो कहा जाता है कि आपने केजरीवाल को नापसंद कर दिया है. सवालों का जवाब देते हुए जब आप आगे बढ़ते हैं तो आपको शाहरूख खान की पसंदीदा फिल्म से लेकर आपके फेवरेट स्वतंत्रता सेनानी के बारे में पूछा जाता है. अंत में सर्वे आपको बताता है कि आप केजरीवाल को पसंद नहीं करते हैं.

शेयर किए गए वीडियो में दिखाया गया है कि देश का नामी मीडिया ग्रुप इंडिया टुडे फर्जी सर्वे कराकर अरविंद केजरीवाल को नापसंद करने वालों की संख्या के बारे में बता रहा है. साथ ही इस वीडियो के अंत में बताया गया है कि कैसे केजरीवाल पर भरोसा करने पर दिल्ली की जनता को निराशा हाथ लगी. इस वीडियो में बताया गया है कि सर्वे में शामिल होने वाले से कुल सात सवाल पूछे जाते हैं लेकिन उनमें से कोई भी सवाल न तो केजरीवाल से संबंधित हैं और न ही उनका कोई संबंध देश या दिल्ली की राजनीतिक व्यवस्‍था से है.

अरविंद केजरीवाल का ट्वीट और सर्वे के डिटेल के बारे में वीडियो लिंक यूं है….

Arvind Kejriwal       

✔ @ArvindKejriwal

Is this journalism? I am shocked:

https://www.youtube.com/watch?v=trx4YevdcpE

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