एनडीटीवी माफी मांग ले तो एक दिन का प्रतिबंध हम भी माफ कर देंगे : मोदी सरकार

एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. केंद्र की मोदी सरकार ने कहा है कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकी मामले की गलत रिपोर्टिंग के लिए चैनल अगर माफी मांग ले तो वह एक दिन के प्रतिबंध को माफ कर सकती है. एनडीटीवी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उन्हें हफ्ते भर का समय दिया जाए ताकि वह एनडीटीवी प्रबंधन से बात कर उसके रुख की जानकारी दे सकें. ऐसे में माना जा रहा है कि चैनल प्रबंधन विवाद को आगे न बढ़ाते हुए माफी मांगने को तैयार हो जाएगा और पूरे मामले का पटाक्षेप हो जाएगा.

न्यूज चैनल एनडीटीवी के प्रसारण पर एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी पक्ष पेश किया है जिसके मुताबिक एनडीटीवी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की रिपोर्टिंग के लिए माफी मांग ले तो वह एक दिन का बैन नहीं लगाएगी. एनडीटीवी के अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि चैनल को माफी मांगने की जानकारी देने के लिए उन्हें एक हफ्ते का समय चाहिए. कोर्ट ने हफ्ते भर का समय दे दिया है. मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को होगी.

केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय का आरोप है कि एनडीटीवी इंडिया ने पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की कवरेज में संवेदनशील जानकारी लीक की. इसके दंड में मंत्रालय ने  9 नवंबर की रात से 10 नवंबर 2016 की रात तक 24 घंटे तक प्रसारण बंद रखने का आदेश दिया था. इस पर खूब हंगामा हुआ. बाद में मंत्रालय ने चैनल पर एक दिन के प्रतिबंध को ठंडे बस्ते में डाल दिया. उधर, चैनल इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट चला गया.

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नज़र रखिए, NDTV का ओपिनियन पोल आएगा जिसमें बीजेपी की सरकार यूपी में बनती दिखेगी!

Dilip C Mandal : एनडीटीवी बाक़ी समय सेकुलरिज्म का नाटक करता है, ताकि चुनाव के समय जब वह BJP का समर्थन करे तो लोग उस पर भरोसा करें। 2004, 2009, 2015….NDTV ने हर बार ग़लती की। हर बार BJP के पक्ष में ग़लती की। यूपी चुनाव में NDTV क्या करेगा? यह ट्विट आज भी बरखा दत्त के ट्विटर हैंडल पर मौजूद है। बिहार में BJP को दो तिहाई बहुमत दिला रही थीं मोहतरमा।

नज़र रखिए। फ़िल्म की पूरी स्क्रिप्ट कुछ इस तरह नज़र आ रही है। यूपी चुनाव तक NDTV पूरी आक्रामकता के साथ मुस्लिम पक्षधरता दिखाएगा। दूसरी तरफ़ उतनी ही आक्रामकता से ZEE न्यूज एंड कंपनी हिंदू पक्षधरता से चैनल चलाएगी। दोनों पक्ष मिलकर माहौल को हिंदू-मुसलमान बनाने की कोशिश करेंगे। दोनों ही पक्ष जाति के प्रश्न को इग्नोर करेंगे। जाति ही वो जगह है जहाँ RSS का दम फूलता है। इसलिए दोनों तरह के चैनल वहाँ नहीं जाएँगे। जाति जनगणना या आरक्षण पर कोई बातचीत चैनलों में नहीं होगी। हिंदू और मुसलमान की हर बहस RSS के पक्ष में होती है। वही कराई जाएगी। NDTV मुस्लिम उत्पीड़न के सवाल उठाएगा। जो वाजिब सवाल होंगे। इसी दौरान कभी NDTV का ओपिनियन पोल आएगा जिसमें बीजेपी की सरकार बनती दिखेगी।

एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय और किंगफिशर के मालिक विजय माल्या ने अपने जाम टकरा कर एक TV चैनल खोला था। NDTV Good Times. लगभग 200 करोड़ रुपए माल्या ने लगाए थे। चैनल के लोगों पर किंगफिशर की चिड़िया को याद कीजिए। यह 200 करोड़ उन्हीं 9,000 करोड़ रुपए में से हैं, जिसे दबाकर माल्या देश छोड़कर भाग गया। अब प्रणय रॉय को इस बात से क्यों दिक़्क़त हो कि विजय माल्या बीजेपी के समर्थन से राज्य सभा पहुँचा था? 513 करोड़ रुपए की कंपनी NDTV के लिए 200 करोड़ रुपए बड़ी रक़म है। एंकर्स और बाक़ी स्टाफ की सैलरी शायद इसी से आई होगी।

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक दिलीप मंडल की एफबी वॉल से. 

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गौर से देखा जाए तो NDTV जीत कर भी हार गया है!

Vishnu Gupt : एनडीटीवी के सामने मोदी सरकार ने किया समर्पण, प्रतिबंध किया स्थगित, एनडीटीवी के खिलाफ अभियान चलाने वाले ठगे गये… यह मोदी सरकार की वीरता नहीं है। मोदी सरकार की यह दूरदृष्टि नहीं है। मोदी सरकार ने उन लाखों देशभक्तों के प्रयास पर पानी फेर दिया जो एनडीटीवी के राष्ट्रविरोधी प्रसारणों और इसकी पाकिस्तान परस्ती के पोल खोलने में लगे थे। जब औकात नहीं थी तो फिर मोदी सरकार को यह कदम उठाना ही नहीं चाहिए था, अगर कदम उठाया था तो उस पर अमल करना चाहिए। लग रहा था कि पहली बार कोई सरकार हिम्मत दिखायी है। पर मोदी सरकार भी डरपोक, रणछोड़ निकली। हमारे जैसे लोग जिन पर विश्वास करता है वही रणछोड हो जाता है, वही डरपोक हो जाता है। अब एनडीटीवी सहित पूरे मीडिया का देशद्रोही और पाकिस्तान परस्ती पत्रकारिता सिर चढकर बोलेगी।

प्रकाश कुकरेती : जैसा कि मैं पहले भी व्यक्तिगत बातचीत में कहता रहा हूँ कि NDTV को सरकार के एक दिन के बैन के फैसले के खिलाफ अदालत नहीं जाना चाहिए था. बैन से NDTV को जबरदस्त सहानुभूति मिल रही थी. मगर NDTV ने अदालत जाकर गलती कर दी. इस कारण सरकार ने बैन स्थगित कर दिया. हां, बैन रद्द नहीं किया है. NDTV की याचिका भी ख़ारिज नहीं हुई है. मने अब अदालत में बहस इस बात पर होगी कि NDTV पर बैन लगाना सही था या नहीं. वहां पर NDTV को यह साबित करना होगा कि उसकी रिपोर्टिंग देश हित के खिलाफ नहीं थी. अगर वह यह साबित कर भी देता है तो इससे सरकार पर कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. अगर NDTV यह साबित नहीं कर पाता है तो वह यह साबित करने की कोशिश करेगा कि सभी चैनलों ने इसी तरह की रिपोर्टिंग की, मगर राजनैतिक कारणों से उसे ही निशाना बनाया गया. अगर अदालत में यह साबित हो जाता है तो सुप्रीम कोर्ट सरकार को आदेश दे सकता है कि वह सब चैनलों पर एक समान कार्यवाही करे. दोनों मामलों में गौर से देखा जाए तो NDTV जीत कर भी हार गया है.

दक्षिणपंथी विचारधारा के पत्रकार विष्णु गुप्त और प्रकाश कुकरेती की एफबी वॉल से.

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NDTV पर नहीं लगेगा बैन, आदेश स्थगित

केंद्र सरकार ने एनडीटीवी इंडिया पर एक दिन के बैन लगाने के अपने आदेश को स्थगित कर दिया है. इस प्रतिबंध को NDTV ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कल यानी मंगलवार को इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी थी.

सूचना प्रसारण मंत्रालय ने NDTV इंडिया पर पठानकोट एयरफोर्स बेस पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान संवेदनशील जानकारी का प्रसारण करने का आरोप लगाते हुए बुधवार, 9 नवंबर को उसे एक दिन के लिए ऑफएयर रखने का आदेश दिया है.

एनडीटीवी का कहना है कि अन्य चैनलों तथा समाचारपत्रों ने भी वही जानकारी दिखाई या रिपोर्ट की थी. इस प्रतिबंध की चौतरफा आलोचना हुई. लोगों ने इसे इमरजेंसी के समान बताया, जब प्रेस की आज़ादी सहित सभी मूल संवैधानिक अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया गया था.

एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि अपनी तरह के इस पहले आदेश से पता चलता है कि केंद्र सरकार समझती है कि “उसे मीडिया के कामकाज में दखल देने और जब भी सरकार किसी कवरेज से सहमत न हो, उसे अपनी मर्ज़ी से किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है…” देश के सभी बड़े समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं के संपादकों के समूह ने कहा कि अगर सरकार को किसी मीडिया कवरेज में कुछ आपत्तिजनक लगता है, तो वह कोर्ट जा सकती है.

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प्रणव रॉय टूटपूंजियां पत्रकार से कैसे बना एनडीटीवी मीडिया उद्योग का मालिक?

क्या सही में देश के अंदर आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है? क्या सही में देश के अंदर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संकट खडा हो गया है? क्या सही में नरेन्द्र मोदी सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गल्ला घोटने के रास्ते पर चल रही है? क्या सही में एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध पूरे मीडिया को निशाने पर लेने की कार्रवाई मानी जानी चाहिए? क्या कांग्रेस की मनमोहन सरकार में इलेक्टोनिक मीडिया पर प्रतिबंध नहीं लगा था? आज शोरगुल मचाने वाले तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हथकंडेबाज उस समय कहां थे जब मनमोहन सिंह सरकार ने लाइव इंडिया टीवी चैनल पर एक सप्ताह का प्रतिबंध लगाया था? एनडीटीवी के पक्ष में वैसे लोग और वैसी राजनीतिक पार्टियां क्यों और किस उद्देश्य के लिए खडी है जो खुद अभिव्यक्ति की आाजदी का गल्ला घोटती रही हैं, जिनके अंदर लोकतंत्र नाम की कोई चीज ही नहीं है, ऐसी राजनीतिक पार्टियां क्या एक प्राइवेट कंपनी के रूप में नहीं चल रही हैं?

क्या एनडीटीवी का अपराध अक्षम्य हैं? क्या एनडीटीवी ने रिर्पोटिंग करते समय देश की सुरक्षा की चिंता की थी? क्या एनडीटीवी ने हमलावर पाकिस्तान आतंकवादियों की मदद करने वाली रिपोर्टिंग नहीं की थी? क्या एनडीटीवी ने यह नहीं बताया था कि हमलावर उस जगह के नजदीक हैं जहां पर वायु सेना का भंडार है और जहां पर रौकेट लांचर से लेकर अन्य हथियार रखे हुए है? क्या एनडीटीवी को देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड करने का अवसर पर अवसर दिया जाना चाहिए? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश की सुरक्षा और सम्मान को ताक पर रखकर होनी चाहिए? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश की सुरक्षा से बडी होनी चाहिए? क्या अब यह समय नहीं आ गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा तय कर दी जाये? क्या यह सही नहीं है कि मीडिया की गैर जिम्मेदार रिपोर्टिंग और गैर जिम्मेदार आलोचना से सेना का मनोबल प्रभावित होता है? अब तक खासकर इलेक्टोनिक मीडिया के लिए नियमन जैसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं बनायी गयी है? क्या यह सही नहीं है कि अभिव्यक्ति की आजादी के शोर ने एनडीटीवी के अपराध पर आवरण डाल दिया है। जबकि एनडीटीवी के गैर जिम्मेदारना रिर्पोटिंग पर भी खुल कर बहश होनी चाहिए?

मीडिया की विश्वसनीयता किस प्रकार गिरी है, मीडिया किस प्रकार भ्रष्ट हुआ है, मीडिया किस प्रकार अराजक हुआ है, मीडिया किस प्रकार गैर जिम्मेदार हुआ है, इसका एक उदाहरण टिवटर का एक सर्वे निष्कर्ष है। टिवटर ने एक सवाल पूछा था कि भारत में लोकतंत्र का कौन खंभा सबसे भ्रष्ट, सबसे अविश्वसनीय, सबसे गैर जिम्मेदार है? इस सर्वे में 17000 हजार लोगों ने भाग लिया था। पचास प्रतिशत से अधिक लोगों का जवाब चौथा खंभा यानी मीडिया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान की धारा 19 ए में निहित है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिप्राय यह है कि देश के नागरिकों को अपनी बात रखने या विरोध दर्ज करने की आजादी होनी चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अक्षुण रखने में मीडिया की भूमिका सर्वश्रेष्ठ और निर्णायक रही है। मीडिया भी एक समय जिम्मेदार और सजग था। तब इलेक्टॉनिक मीडिया का उतना शोर नहीं था। खासकर प्रिट मीडिया की भूमिका लगभग संयम और देश की सुरक्षा की कसौटी पर चाकचौबंद हुआ करती थी। निसंदेह तौर पर जब से इलेक्टानिक मीडिया का शोर देश में हुआ है तबसे मीडिया की विश्वसनीयता घटी है, मीडिया को अविश्वसनीय माना जाने लगा है। इसलिए कि इलेकटोनिक मीडिया के नियमन की कोई सरकारी व्यवस्था ही नहीं बनी है, जबकि प्रिट मीडिया के नियमन के लिए प्रेस परिषद जैसी संस्था है। जब कोई नियमन की व्यवस्था ही नहीं होगी तो फिर जिम्मेदारी, अनुशासन का भाव कहां से आयेगा, डर कहां से उत्पनन होगा। यही कारण है कि इलेकटानिक मीडिया पूरी तरह से अराजक और अनियंत्रित रिपोटिंग की प्रतीक बन गयी। कई फर्जी घटनाओं को दिखाना, पैसे वूसली के लिए फर्जी स्टिरग आपरेशन करने जैसे खेल खेले गये है। फर्जी स्टिंग आपरेशन का कोई एक नहीं बल्कि अनेकों खेल खेले गये हैं। खबर बनाने के लिए आत्महत्या करने और आत्मदाह करने के लिए उकसाने के आरोप इलेक्टानिक मीडिया पर लगे हैं।

जहां तक एनडीटीवी की बात है तो उसकी सच्चाई कौन नहीं जानता है। एनडीटीवी का मालिक कभी टूटपूंजिया पत्रकार हुआ करता था, उसकी हैसियत मीडिया उद्योग स्थापित करने जैसी नहीं थी। पर एनडीटीवी जैसा उद्योग खडा करना, मीडिया कारपोरेट संस्था खड़ा करना कोई चमत्कार जैसा ही खेल है। एक आम पत्रकार अपने वेतन से सिर्फ अपना परिवार पाल सकता है, भारी-भरकम मीडिया चैनल, मीडिया उद्योग और मीडिया कारपोरेट संस्था खडा न कर सकता है? दिल्ली में रहने वाले पत्रकार यह सच्चाई जानते हैं। अपने चैनल में सरकारी नौकरशाहों और मंत्रियों के नालायक बेटे-बेटियों को नोक्री दी गयी ताकि सरकारी नौकरशाहों और मंत्रियों से सेटिंग बनायी जा सके। दूरदर्शन के टेप को अदल-बदल कर खेल खेला गया। एनटीवी सिर्फ अभी ही नहीं चर्चे और विवाद में आयी है, अपनी गैर जिम्मेदार भूमिका के कारण पहली बार ही निशाने पर नहीं रही है, इसके पहले भी एनडीटीवी विवाद में रही है, उसकी भूमिका बदबूदार रही है, उसकी भूमिका सेंटिगबाज की रही है, उसकी भूमिका सरकार को प्रभावित करने की रही है। तथ्य भी चाकचौबंद है, तथ्य पूरे देश के सजग नागरिकों को मालूम है। याद कीजिये टू जी स्पेक्टरम घोटाला और ए राजा की कहानी और आपको पता चल जायेगा कि एनटीवी की कैसी बदबूदार भूमिका थी, उसकी भूमिका पत्रकारिता को गति देने की थी या फिर सेंटिग बाज की थी? एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत और टू जी घोटाले के मुख्य आरोपी ए राजा के बीच हुई बातचीत का टेप मौजूद है। बरखा दत ने ए राजा को दूरसंचार मंत्री बनवाने की विसात विछाई थी और फायदे की विसात विछायी थी। तब मीडिया में बरखा दत के खिलाफ ऐसे-ऐसे चुटकूुले चले थे जो लिखने योग्य नहीं थे। अगर एनडीटीवी में ईमानदारी होती, अगर एनडीटीवी में नैतिकता होती तो फिर एनडीटीवी तुरंत बरखा दत्त को अपने चैनल से निकाल बाहर कर देती। बरखा दत्त आज भी एनडीटीवी की स्टार बनी हुई है। एनडीटीवी में महिला पत्रकारों का यौन शोषण भी मीडिया में चर्चा का विषय रहा है। एनडीटीवी का एक नामी स्टार पत्रकार का सेक्स वीडियो कई महीनों तक मीडिया में घूमा-फिरा था।

तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन में यह तथ्य, यह सच्चाई दबायी जा रही है कि पहली बार मीडिया को निशाना बनाया जा रहा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गल्ला घोटा जा रहा है, लोकतंत्र पर प्रहार किया जा रहा है। जबकि कांग्रेस जमाने की बात छिपायी जा रही है, कांग्रेस जमाने की बात कोई कर ही नहीं रहा है। याद कीजिये लाइव इंडिया टीवी प्रकरण को। कांग्रेस की मनमोहन सरकार ने लाइव इंउिया टीवी चैनल पर कोई एक दिन का नहीं बल्कि एक सप्ताह का प्रतिबंत लगायी थी। लाइव इंडिया टीवी के एक रिपोर्टर ने एक शिक्षिका को ब्लैकमेल करने की झूठी कहानी गढी है और उस कहानी में उस शिक्षिका की जान जाते-जाते बची थी। लाइव इडिया के रिपोर्टर पर मुकदमा भी दर्ज हुआ था। जब कांग्रेस सरकार ने लाइव इंउिया टीवी पर एक सप्ताह का प्रतिबंध लगाया था तब कहीं शोर तक नहीं मचा था। आज शोर मचाने वाले लोग तब चुप्पी साध रखे थे। यह भी सही है लाइव इंउिया टीवी चैनल ने उसी तरह की लक्ष्मण रेखा पार की थी जिस प्रकार की लक्ष्मण रेखा एनडीटीवी ने पार की है।

आज सिर्फ प्रिंट और इलेक्टानिक मीडिया का ही दौर नहीं है। आज सोशल मीडिया और वेव मीडिया का भी दौर है। जनमत बनाने के नये-नये तकनीक अस्तित्व में आये हुए हैं। इसलिए प्रिंट या इलेक्टानिक मीडिया अपने आप को भगवान न समझे, प्रिंट और इलेक्टानिक मीडिया अपने आप को कानून और संविधान से उपर न समझे, प्रिंट और इलेक्टानिक मीडिया अपने आप को देश की सुरक्षा से उपर न समझे। प्रिंट और इलेक्टॉनिक मीडिया को यह खुशफहमी छोड़ देनी चाहिए कि सिर्फ वे ही जनमत बनाते हैं। जनमत बनाने वाले और भी है। सोशल मीडिया और वेब मीडिया आज एनडीटीवी के खिलाफ खडा है। सोशल मीडिया ने एनडीटीवी के काले कारनामों की तह पर तह खोल रखी है। सोशल मीउिया में प्रमाण के साथ है कि कैसे एनडीटीवी ने देश की सुरक्षा को ताक पर रख कर आतंकवादियों को मदद करने वाली रिपोर्टिग की थी। इस लिए तथाकथित एनडीटीवी के समर्थक हथकंडे बाज खुशफहमी छोड दे कि वे ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर है। सरकार का यह कदम सीधे तौर पर देश की सुरक्षा और देश के जवानों के सम्मान व मनोबल से निकला हुआ है। मीडिया को आज विरोध का हथकंडा बनने की जगह आत्म चिंतन करने की जरूरत है और विश्वसनीयता सुरक्षित, संरक्षित करने की होनी चाहिए। प्रणव रॉय से यह भी हिसाब मांगना चाहिए तुमने टूटपूजियां पत्रकार से कैसे एनडीटीवी मीडिया हाउस उद्योग का मालिक बन गया?

लेखक विष्णु गुप्त दक्षिणपंथी विचारधारा के बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09968997060 या guptvishnu@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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एनडीटीवी पर प्रस्तावित बैन के खिलाफ देहरादून में धरना (देखें तस्वीरें)

देहरादून। जन संवाद मंच के आह्वान पर विभिन्न संगठनों ने गांधी पार्क पर धरना दिया। इस दौरान आयोजित सभा को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क के पदाधिकारी विजय भट्ट ने कहा कि, इधर कुछ महीनों से संवैधानिक व जनतांत्रिक संस्थाओं पर हमला बढ़ता जा रहा है । तथाकथित हिंदूवादी संगठन कभी गौहत्या के बहाने तो कभी गोमांस सेवन के बहाने तो कभी लव जेहाद या तीन तलाक के बहाने हमें लड़ा रहे हैं। अब इन्होंने मीडिया पर हमला बोल दिया है हमें इस तरह के खतरों के प्रति सचेत होना पड़ेगा।

जनवादी महिला सभा की इंदू नौडियाल ने एनडीटीवी पर थोपे गये एक दिन के प्रतिबंध को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए कहा कि यह अघोषित आपातकाल है। कभी लघु भारत कहे जाने वाले जेएनयू पर हमला बोला जाता है तो कभी रोहित वेमूला के बहाने दलितों पर। अब तो लोकतंत्र के चौथे खंभे को भी नहीं बख्शा जा रहा है। मोदी सरकार लगातार लोकतांत्रिक संस्थाओं का गला घोंट रही है।

चेतना आंदोलन के सयोंजक त्रेपन सिंह चौहान ने कहा है की आज जहां अधिकाँश टी वी जहाँ भूत प्रेतों को दिखा कर अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं। वही एनडी टीवी जान समस्याओं के साथ सरकारों के छालों को भी लोगों के सामने लाता रहा है। किसी भी समाचार माध्यमों पर प्रतिबन्ध लगाना केवल अभिब्यक्ति की आजादी का पर हमला ही नहीं है बल्कि फासीवाद का एक क्रूर चेहरा भी होता है। क्योकि फासीवाद सबसे ज्यादा अभिभयक्ति की आजादी से डरता है। मोदी जी को समझना चाहिए की उनका फासीवाद देश नकार चुका है। तभी दिल्ली विहार में मुंह की कहानी पडी और अब यूपी में भी लोग जबाब देगें।

कार्यक्रम में लोक दस्तक, भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति उत्तराखंड नव निर्माण संघ सहित विभिन्न संगठनों के लोग शामिल थे। जन संवाद मंच के लोगों ने जनगीत प्रस्तुत किया। आयोजकों ने केंद्र सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ 9 नवंबर को धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया है। इस दिन गांधी पार्क से एक मार्च निकाला जाएगा। राजधानी की आबादी व महत्व को देखते हुए इसमें शिरकत करने वालों की संख्या काफी कम थी। जो भी लोग आये वो एक एस एम एस व फोन पर। जिनके (पत्रकार) लिए धरने का आयोजन किया गया था उस तबके से ही कोई नहीं आया था।

धरने की तस्वीरें देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

http://bhadas.blogspot.in/2016/11/blog-post_7.html

अरुण श्रीवास्तव
देहरादून
07017748031

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एनडीटीवी पर यह व्‍यर्थ का हंगामा

लोग सही कहते हैं कि जब प्रभावशाली व्‍यक्‍ति, समूह, संस्‍था किसी निर्णय से प्रभावित होते हैं तो उसका असर दूर तक जाता है, उसके पहले भले ही कई प्रभावित होते रहे हों किंतु उनकी सुनने वाला कोई नहीं होता। ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार ने एनडीटीवी इंडिया के प्रसारण के पूर्व किसी ओर चैनल के द्वारा गलत जानकारी के सार्वजनिक किए जाने के बाद दण्‍ड स्‍वरूप उस पर रोक न लगाई हो, जिसने की न दिखाने वाली सामग्री का प्रसारण किया है। पर इस बार की बात कुछ ओर है, क्‍यों कि इस बार केंद्र के घेरे में एनडीटीवी आया है, जहां रवीश जैसे श्रेष्‍ठ एंकर हैं और उसे देखनेवाले दर्शक भी देश-दुनिया में बड़ी संख्‍या में मौजूद हैं।

एनडीटीवी इंडिया को लेकर जब से यह निर्णय आया है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 9 नवम्‍बर को एनडीटीवी इंडिया के प्रसारण पर एक दिन के लिए रोक का आदेश दिया है, तब से देशभर में माहौल गर्म है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार मीडिया पर सेंसरशिप लगा रही है, लेकिन क्‍या यह सच है?  सरकार पर आरोप लगानेवालों की बाते सुनने के पहले यह भी जानना जरूरी है कि आखिर ये चैनल या मीडिया के तमाम उपक्रम ऐसा कार्य करते ही क्‍यों हैं कि उन्‍हें कटघरे में खड़ा करने में  सरकारें सफल हो जाती हैं। आज जो लोग या मीडिया से जुड़े संस्‍थान सरकार के इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं, क्‍या उनके लिए ये माना जाए कि वे देश की सुरक्षा से ऊपर घटना के प्रेषण को मानते हैं ? क्‍या यह माना जाए कि उनके लिए उन तमाम नियमों का कोई अर्थ नहीं जो मीडिया के लिए भारत सरकार ने बनाए हैं? इसके मायने यह भी निकल रहे हैं कि सरकार के इस निर्णय का विरोध कर मीडिया से जुड़े ये लोग भारतीय संविधान में भी कोई विश्‍वास नहीं करते, क्‍यों कि भारत का संविधान अभिव्‍यक्‍ति की आजादी देता है, जिसमें प्रेस की आजादी भी निहित है, लेकिन साथ में यह भी स्‍पष्‍ट करता है कि कोई भी वह सूचना सार्वजनिक नहीं की जा सकती जिससे भारत संप्रभू राष्‍ट्र को उस सूचना के प्रसारण से कोई खतरा पैदा होता हो या हो सकता है।

जरा सोचिए, एनडीटीवी इंडिया के द्वारा जब आतंकियों के हमले और आर्मी, पुलिस कार्रवाही का पठानकोट कवरेज किया जा रहा था, उस समय की सभी लाइव सूचनाओं का लाभ लेते हुए आतंकवादी अपनी रणनीति बनाते तो क्‍या अनर्थ हो जाता। देश की सुरक्षा से जुड़ी वे सभी सूचनाएँ जिन्‍हें एनडीटीवी ने सार्वजनिक किया, उसका जरा भी लाभ उठाने में यदि आतंकी सफल हो जाते तो जितना नुकसान इस हमले और आतंकियों के विरुद्ध जवाबी कार्रवाही में हुआ, उसकी तुलना में कई ज्‍यादा जान-माल का नुकसान होता। दुनियाभर में भारत की किरकिरी होती सो अलग बात है।

सभी यह ठीक से जान लें कि आखिर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा गठित अंतरमंत्रालय समिति ने एनडीटीवी इंडिया के इस विवादित प्रसारण पर कहा क्‍या है, उसने कहा कि गत 4 जनवरी को पठानकोट के वायुसैनिक अड्डे पर जब आतंकवादी हमला हुआ था, उस दौरान एनडीटीवी इंडिया ने सामरिक दृष्टि से संवेदनशील महत्वपूर्ण सूचनाएं अपने चैनल पर प्रसारित की थीं। न्यूज चैनल ने कुछ ऐसी बातें बता दी जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकती थी। इस संबंध में पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी चैनल को कारण बताओ नोटिस जारी किया। मंत्रालय ने इसके बाद केबल टीवी नेटवर्क(नियमन) के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करते हुए 9 नवम्बर को रात एक बजे से दस नवम्बर रात एक बजे तक पूरे देश में चैनल के प्रसारण या पुनर्प्रसारण पर केबल टीवी चैनल एक्ट की धारा 20 की उपधारा 2 व 3 का उपयोग करते हुए 24 घंटे के लिए ऑफ एयर करने का निर्देश दिया।

विदित होना चाहिए कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने जून 2015 में प्रोग्राम कोड में संशोधन करते हुए एक नया नियम जोड़कर आतंकियों के खिलाफ पुलिस के ऑपरेशन के कवरेज को लेकर चैनलों पर बैन लगाया था। इस नियम के अनुसार, जब तक ऑपरेशन खत्म नहीं हो जाता तब तक सरकारी प्रवक्ता जो जानकारी देंगे, मीडिया बस उसे ही प्रसारित कर सकता है, इसके अलावा नहीं। फिर ऐसा भी नहीं है कि एकाएक एक दिन चैनल बंद रखने का फरमान सरकार ने सुनाया है, इसके पहले एनडीटीवी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया गया लेकिन जब वे ठीक से जवाब नहीं दे पाए और अपने प्रसारण को लेकर ये नहीं बता सके कि वह प्रोग्राम इस रूप में दिखाया जाना जनता के हित में कैसे था, तब जाकर सजा के रूप में यह निर्णय लिया गया कि चैनल एक दिन के लिए बंद रहेगा।

ऐसे में भारत में जो लोग एनडीटीवी चैनल बंद का विरोध कर रहे हैं, उनसे सीधा पूछना है कि क्‍या यूरोप के किसी देश में वहां की मीडिया इस प्रकार का देश को खतरे में डालने वाला प्रसारण कर सकती है। फ्रांस, अमेरिका, इंग्‍लैण्‍ड से लेकर कौन सा देश है ? जहां आतंकवादियों ने कभी हमला न किया हो, लेकिन सुरक्षा मामलों से जुड़ी कोई भी सूचना कभी सार्वजनिक नहीं की  गई ।आज भारत का वह मीडिया जो इस निर्णय का विरोध कर रहा है, उसे यह बात अच्‍छे से समझ लेना चाहिए कि राष्‍ट्र की संप्रभुता से बढ़कर कुछ नहीं। नियमों की जो अवहेलना करे, संविधान में प्रदत्‍त मौलिक अधिकार बोलने की स्‍वतंत्रता का अर्थ जो मर्यादा विहीन हो जाना समझें, उनके खिलाफ कानूनी तौर पर सख्‍त से सख्‍त कार्रवाही होनी चाहिए। फिर ये कार्रवाही किसी चैनल, समाचार पत्र-पत्रिका या किसी ओर के खिलाफ क्‍यों न हो,  यह सदैव न्‍यायसंगत ही कहलाएगी।

आज एनडीटीवी इंडिया पर लगाए गए एक दिन के प्रतिबंध पर केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू ने बिल्‍कुल सही कहा है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनज़र उठाया गया है। भाजपा या देश के आम आदमी की ओर से जो यह कहा जा रहा है कि ‘मीडिया की स्वतंत्रता का हम समर्थन करते हैं, लेकिन राष्ट्र सर्वप्रथम है, सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता’ बिल्‍कुल सही है। इसके विरोध में फिर भले ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, जदयू नेता शरद यादव,  ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण जैसे कुछ लोग एवं राजनेता हों, उनका यह विरोध राजनीति से ज्‍यादा कुछ ओर नजर नहीं आ रहा है। प्रश्‍न यह भी है कि इन नेताओं का यह विरोध उस समय कहां था जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। सरकार ने एएक्सएन पर दो महीने का बैन लगाया था। उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का कहना था कि इसमें दिखाया गया कंटेंट अश्लील था, जिस वजह से चैनल का प्रसारण रोका गया है। इसी दौरान एफटीवी इंडिया पर दो महीने का प्रतिबंध लगाया गया था। जनमत चैनल पर 30 दिन का प्रतिबंध इसलिए लगाया गया, क्‍योंकि चैनल पर एक टीचर का स्टिंग ऑपरेशन दिखाया गया था। इन प्रतिबंधों के अलावा भी इसके पूर्व और बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कई चैनलों को उनके गलत प्रसारण के कारण प्रतिबंधित किया है, तब तो कोई देश में अवाज उठाने वाला खड़ा नहीं हुआ, अब ऐसा क्‍या नया सरकार ने कर दिया है जो देशभर में इतना शोर मचाया जा रहा है।

इसके अलावा जो लोग सरकार के इस फैसले को तुगलकी फरमान बता रहे हैं उन्‍हें ये भी समझना चाहिए कि सरकार मीडिया की अभिव्‍यक्‍ति पर कोई अंकुश नहीं लगा रही। बल्कि मीडिया में विदेशी निवेश को सबसे पहले भाजपा की अटल सरकार ने ही हरी झण्‍डी दिखाई थी, जिसका कि सबसे ज्‍यादा विरोध उसी के घर में उससे जुड़े अन्‍य संगठनों ने किया था उसके बाद मोदी सरकार भी उसी रास्‍ते पर आगे बढ़ रही है। जिससे स्‍पष्‍ट होता है कि मीडिया पर सरकार का कोई अंकुश लगाने का इरादा नहीं है। भारतीय संविधान जिस अभिव्‍यक्‍ति का स्‍वातंत्र्य देता है, सरकार कहीं से भी उसका दमन नहीं कर रही है।

लेखिका Nivedita Sharma न्‍यूज एजेंसी की पत्रकारिता से जुड़ी हैं। उनसे संपर्क niveditachaturvedi241023@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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मुझे नहीं लगता NDTV की मोदी सरकार से भिड़ने की हैसियत है

Dilip C Mandal : NDTV आज की तारीख़ में सिर्फ 513 करोड़ रुपए की कंपनी है। उस पर फ़ेमा यानी मनी लॉन्ड्रिंग का 2031 करोड़ रुपए का और टैक्स अदायगी से संबंधित 450 करोड़ रुपए के मामले है। सरकार जिस पल चाहेगी, ऑक्सीजन रोक देगी। लेकिन जेटली जी के होते NDTV का ऑक्सीजन रुकना मुमकिन नहीं लगता। मुझे नहीं लगता NDTV की सरकार से भिड़ने की हैसियत है। NDTV के मालिक प्रणय राय एक्सप्रेस वाले रामनाथ गोयनका नहीं हैं कि घर फूँककर भिड़ जाएँ। जो दिख रहा है, हो सकता है कि हक़ीक़त वह न हो।

NDTV पर बैन दो ही तरीक़े से हट सकता है। सरकार इसे वापस ले या फिर सुप्रीम कोर्ट बैन हटाए। कोई तीसरा रास्ता नहीं है। मुझे उम्मीद है कि सोमवार की सुबह NDTV के मालिक प्रणय राय अदालत जाएँगे। जाने को तो वे रविवार को भी जा सकते हैं। लोकमहत्व के मामलों में कोर्ट छुट्टी के दिन भी सुनवाई करती है। मार्कंडेय काटजू समेत देश के कई बड़े कानूनविद कह रहे हैं कि NDTV को अदालत में जाना चाहिए। वे ठीक कह रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी पर बैन के खिलाफ देश भर से उठने लगी आवाज

DUJ Calls for Protest on NDTV Ban

The Delhi Union of Journalists (DUJ) strongly and unequivocally condemns the one-day ban on NDTV’s Hindi channel, ostensibly for its reporting of the Pathankot airbase attack.  We see no reason for singling out NDTV in this manner when all channels reported the attack in similar fashion.  In a democracy no bureaucratic body such as the Inter-ministerial Committee of the Information & Broadcasting Ministry that issued this order should have such arbitrary powers. Exercise of such power reminds one of the dark days of the Emergency when the media was muzzled and citizens’ freedoms lost.

An emergency extended executive meeting will now be held the DUJ office at 6.30pm preceded by its executive on Monday 7 November, 2016 where its action programme will be finalised , DUJ president SK Pande and general secretary Sujata Madhok announced  today. The statement added :”We commend the Editors Guild for issuing a strong statement protesting the ban and call upon all media bodies and  journalists to unitedly protest this attack on media freedom.  We demand an immediate revocation of this undemocratic order.”

The DUJ called for the widest possible united front to fight this and connected attacks on freedom of the press.

एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबन्ध का तानाशाही फ़ैसला वापस लो!

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर-मंत्रालयी कमेटी द्वारा एनडीटीवी को एक दिन (९ नवम्बर) के लिए प्रतिबंधित करने का फ़ैसला दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है. एनडीटीवी पर आरोप है कि उसने पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले की रिपोर्टिंग के दौरान ‘रणनीतिक रूप से संवेदनशील ब्योरे’ प्रसारित किये थे. गौरतलब है कि लगभग सभी टेलिविज़न चैनलों ने मिलती-जुलती रिपोर्टिंग की थी. मोदी सरकार द्वारा एनडीटीवी को ख़ास तौर से चुना जाना उसकी मंशाओं को स्पष्ट कर देता है. यह सरकार की सबसे मूलगामी आलोचना करनेवाले चैनल को किसी बहाने से धमकाने और चुप करा देने की कोशिश है. सीधे-सीधे मीडिया की आज़ादी के उसूल का यह उल्लंघन आपातकाल की याद दिलाता है. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह प्रतिबन्ध जिस दिन लगाया गया, उससे ठीक एक दिन पहले ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पुरस्कार वितरण समारोह में प्रधानमंत्री ने मीडिया की आज़ादी पर अंकुश लगाए जाने के सन्दर्भ यह कहा था कि “आज निष्पक्ष भाव से आपातकाल की मीमांसा हर पीढी में होती रहनी चाहिए, ताकि इस देश में ऐसा कोई राजपुरुष पैदा न हो जिसको इस तरह के पाप करने की इच्छा तक पैदा हो.” यह इच्छा मोदी सरकार के भीतर गहरे तक धंसी हुई है, यह बात उसके अब तक के कारनामों से वैसे भी ज़ाहिर थी, प्रतिबन्ध के इस फैसले से तो इस ‘पाप करने की इस इच्छा’ को लेकर कोई संदेह नहीं रह गया है. जनवादी लेखक संघ इस फैसले की कठोर शब्दों में निंदा करता है और इसे अविलम्ब वापस लेने की मांग करता है.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)
जनवादी लेखक संघ

AINEF OPPOSES NDTV BAN

The All India Newspapers Employees Federation (AINEF) has expressed serious concern at the one day ban on the NDTV and demanded its withdrawal. In a joint statement  issued from the AINEF Delhi Office,  President Mr. SD Thakur, Vice President   SK Pande and general secretary Mr. Balagopalan have called the “ban a selective attempt at targeting NDTV.”

“We express full solidarity with the movement against the ban, which is ominous, unprecedented and an attack on freedom of the press. It is indeed arbitrary and a colorable exercise of power to muzzle the press by the authorities.

SK Pande
Vice President
AINEF

Press release

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एनडीटीवी पर बैन कोई एक दिन का फैसला नहीं

3 मई 2011 को मेरे, मेरे 80 साल के पिता (जो कि केंद्र सरकार से सेवानिवृत कर्मचारी) और मेरे अख़ाबर को छापने वाले प्रिंटर के खिलाफ गाजियाबाद के कई थानों में कई एफआईआर दर्ज करा दीं गईं। साथ ही हमारे हिंदी अख़बार को उत्तर प्रदेश सरकार ने बैन कर दिया। इसके अलावा हमारे घर की बिजली और पानी तक काट दिया गया। जिसके बाद पूरे शहर के बुद्धीजीवि वर्ग ने इसका विरोध किया और सभी राजनीतिक दलों के सम्मानित नेताओं ने सरकार की मनमानी का विरोध किया। चाहे जनाब भारतेंदु शर्मा जी हो या फिर श्री के.सी त्यागी जी या फिर श्री कुंवर अय्यूब अली, इन सभी लोगों ने हमारा न सिर्फ हमारा समर्थन किया बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की मशीनरी को आड़े हाथों लिया।

हालांकि बाद में गाजियाबाद पुलिस ने अपनी चार्जशीट में ही मुझको आरोप मुक्त कर दिया। और इलाहाबद हाइकोर्ट ने हमको राहत दी, जिसके बाद हमारी गिरफ्तारी पर रोक लगी। लगभग पांच साल अदालत और प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया में अपनी गुहार रखने के बाद मेरे पिता को बाइज्ज़त आरोप मुक्त किया गया और अख़बार को दोबारा प्रकाशित करने की अनुमति मिली। जिस शख़्स ने अपने पूरे जीवन काल में किसी थाने या अदालत का मुंह तक न देखा हो उनको अपने बेटे की पत्रकारिता के वजह से लगभग पांच साल अदालत में चक्कर काटने पड़े।

हमारी सिर्फ इतनी ग़लती थी कि हमने पत्रकारिता के मानदंड के मुताबिक कुछ घपले घोटालों और सरकारी मशीनरी की लूट को बेनक़ाब किया था। पुलिस ने एफआईआर दर्ज की लेकिन ऊपर वाले का शुक्र रहा कि एक मिनट के लिए भी न तो थाने की शक्ल देखी न कोई गिरफ्तारी हुई। जिसको आईओ बनाया गया उसने थोड़ी बहुत पुलिसिया गुंडागर्दी दिखानी चाही तो ऊपर वाले उसको बहुत ही बड़ी सज़ा दे डाली। साथ ही भले ही इंसाफ पाने में कई साल लगे हों लेकिन अदालत ने बाइज्जत बरी करके हमारे ज़ख़्मों को मरहम भी लगा दिया। प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया ने हमारे अखबार को भी दोबारा प्रकाशित करने की राह आसान कर दी।

लेकिन इस सबके बावजूद आज फिर उन तथाकथित पत्रकारों और चौथे स्तंभ के दावेदारों की कायरता और नामर्दी पर शर्म आ रही है, जो उस दिन ख़ामोश रहे। प्रेस का गला घोंटा गया और मोटा विज्ञापन और रात को पुलिस से एक बोतल पाने वाले मीडिया हाउस और कथित पत्रकार मुंह पर टेप लगाए हमारी हमदर्दी का ढोंग करते रहे। निजी तौर पर कई कथित बड़े पत्रकारों को मैने जब फोन किया तो उन्होने अपनी मजबूरी भी बताई।

लेकिन एनडीटीवी पर एक दिन का बैन को सुन कर एक बार फिर लगा कि काश उस दिन एनडीटीवी या कोई कथित बहादुर मीडिया हाउस एक पत्रकार के कमज़ोर और उभरते हुए मडिया हाउस की भ्रूण हत्या के खिलाफ बोलने की हिम्मत करता तो शायद आज जैसी घटनाओं को दोहराने से पहले सोचा जाता। हमें एनडीटीवी पर लगे बैन पर उतना ही दुख है जितना अपने अखबार पर कई साल तक बैन रहने का। लेकिन सवाल वही है कि किसी एक के दमन पर चुप रने वालों को अपने लिए भी उस दमनचक्र का इंतज़ार करना चाहिए।

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं सहारा समय, डीडी आंखों देखी, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़ सहित कई राष्ट्रीय चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य चुके हैं।

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एनडीटीवी बैन के खिलाफ रवीश के इस ऐतिहासिक प्राइम टाइम को न देख पाएं हों तो अब जरूर देख लें

Om Thanvi : आज रवीश का प्राइम टाइम ‘सवाल पर सवाल है’ ऐतिहासिक था। उस रोज़ की तरह, जब उन्होंने स्क्रीन को स्वेछा से काला किया था, अभिव्यक्ति के संसार में पसरे अंधेरे को बयान करने के लिए। आज उन्होंने हवा में व्याप्त ज़हर के बहाने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हो रहे प्रहार को दो मूकाभिनय के कलाकारों से ‘सम्वाद’ के ज़रिए चित्रित किया। बहुत मार्मिक ढंग से।

उन्होंने सरकार की तंगदिली को बेनक़ाब किया, सबसे भरोसेमंद चैनल को पठानकोट के नाम पर दी जा रही सज़ा और इस तरह की बदनामी की कुचेष्टा का जवाब दिया। मुझे लगा वे भावुक हो जाएँगे। पर भावना और दर्द पर क़ाबू रखते हुए वे मज़े वाले मूड में आ गए। ओछे शासन को हँसते-खेलते धो डाला। मुझे अब सरकार पर तरस आने लगा है। वह जूते भी खाती है और प्याज़ भी, पर विवेक से काम नहीं लेती। प्राइम टाइम न देख पाएं हो तो इस लिंक पर क्लिक करें : 

http://www.ndtv.com/video/shows/prime-time/prime-time-when-we-will-not-ask-the-questions-so-what-would-we-do-437481 

एक रोज़ पहले ही रामनाथ गोयनका एवार्ड देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि हम इमरजेंसी की मीमांसा करते रहें, ताकि देश में कोई ऐसा नेता सामने न आए जो इमरजेंसी जैसा पाप करने की इच्छा भी मन में ला सके। और भोपाल की संदिग्ध मुठभेड़, दिल्ली में मुख्यमंत्री- उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस उपाध्यक्ष की बार-बार होने वाली हिरासतकारी को भूल जाइए, ताज़ा बुरी ख़बर यह है कि एनडीटीवी-इंडिया पर भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एक रोज़ का प्रतिबंध घोषित किया है। मंत्रालय के आदेश के अनुसार उसकी एक उच्चस्तरीय समिति ने पठानकाट हमले के दौरान उक्त चैनल की रिपोर्टिंग को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरे वाली क़रार दिया है। इसलिए सज़ा में चैनल को 9 नवम्बर को एक बजे से अगले रोज़ एक बजे तक चैनल का परदा सूना रखना होगा। क्या अघोषित इमरजेंसी की पदचाप और मुखर नहीं हो रही? 

मुझे आशंका है कि आने वाले दौर में यह और तल्ख़ होगी अगर इसका एकजुट और विरोध न किया गया। देश की सुरक्षा ख़तरे में डालने के संगीन आरोप में किसी समाचार माध्यम पर ऐसा प्रतिबंध देश में पहले कभी नहीं लगाया गया है। इसलिए मेरा सुझाव है कि 9 नवम्बर को, जब एनडीटीवी-इंडिया का परदा सरकारी आदेश में निष्क्रिय हो, देश के हर स्वतंत्रचेता चैनल और अख़बार को अपना परदा/पन्ना विरोध में काला छोड़ देना चाहिए। एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब आदि संस्थाओं को उस रोज़ प्रतिरोध के आयोजन करने चाहिए – अगर अपना लोकतंत्र हमें बचा के रखना हो। वरना शासन का शिकंजा एनडीटीवी की जगह आगे अभिव्यक्ति के किसी और माध्यम पर होगा।

Sanjaya Kumar Singh : रवीश का प्राइम टाइम कल देर रात फोन पर देखना पड़ा। इतनी चर्चा थी कि बिना देखे नीन्द नहीं आई। कंप्यूटर बंद कर चुका था और नीन्द लग भी रही थी। सोचा देखते हैं नीन्द जीतती या प्राइम टाइम। कहने की जरूरत नहीं है कि प्राइम टाइम देखकर सुकून की नीन्द आई। एक बजे सोया सुबह साढ़े सात बजे नीन्द खुली। मीडिया को प्रेस्टीट्यूट कहने वाले ना वेश्यावृत्ति ना रोक सकते हैं ना स्वीकार कर सकते हैं ना खुद पर नियंत्रण रख सकते हैं। लेकिन मीडिया पर प्रतिबंध लगाएंगे। मैं तो कहूंगा, कोशिश कर लीजिए। ओम थानवी से 100 प्रतिशत सहमत।

Satyanand Nirupam : ‘सवाल पर सवाल है’- का पुनः प्रसारण आज दिन में सुबह नौ बजे, दोपहर दो बजे और रात को नौ बजे होने वाला है।  सुबह दोपहर शाम- तीन खुराक प्राइम टाइम विथ Ravish Kumar! #ndtvइंडिया पर। आज तो बागों में बहार ही बहार है!!!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, संजय कुमार सिंह और सत्यानंद निरुपम की एफबी वॉल से. 

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एनडीटीवी को सरकारी प्रतिबन्ध की बधाई

Sanjaya Kumar Singh : एनडीटीवी पर कार्रवाई की खबर से मुझे आम आदमी पार्टी के सासंद भगवंत मान पर संसद की सुरक्षा से खिलवाड़ करने के आरोप और फिर मान के आरोप की याद आई। पता नहीं अब यह मामला किस स्थिति में है पर “सैंया भये कोतवाल” ऐसे ही नहीं कहा जाता है। संसद की साइट पर संसद भवन का वर्चुअल लिंक दिख तो अब भी रहा है पर चल नहीं रहा। चूंकि संसद देखा हुआ है इसलिए वर्चुअल लिंक देखने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। संसद का वीडियो लोड करने के लिए जब मान का मामला गर्माया तो मैंने देखना चाहा कि अधिकृत तौर पर क्या दिखाया जा रहा है और मान ने क्या दिखा दिया। पर उस दिन से वह लिंक चल ही नहीं रहा है। काफी दिन हो गए। आज याद आया तो सोचा फिर देखा जाए। पर उसे चलाने, लगाने, हटाने वाले भी, लगता है, भूल गए। वैसे ही है। ना हटा है, ना चल रहा है। फिलहाल, एनडीटीवी मामले में मुझे यकीन है कि वह इस कार्रवाई से और मजबूत होगा। उसका समर्थन बढ़ेगा। अगर ऐसे प्रतिबंधों से डरना होता तो वह ऐसा कुछ करता ही क्यों जिससे मिर्ची लगती है।

Sandeep Verma : प्रतिबन्ध तो शेर पर ही लगता है, दुम हिलाने वालों को तो दूध-रोटी खिलाई जाती है. एनडीटीवी को सरकारी प्रतिबन्ध की बधाई.

Anil Singh : एनडीटीवी इंडिया के साथ सभी चैनल करें ब्लैकआउट! जिस सरकार ने खुद पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को (निश्चित रूप से जिसमें आईएसआई के लोग शामिल रहे होंगे) पठानकोट एयरबेस के चप्पे-चप्पे का दौरा कराया, वो एनडीटीवी इंडिया पर पठानकोट हमले के उस कवरेज़ के लिए एक दिन का बैन लगा रही है जो हर चैनल व अखबारों में कमोबेश एक ही तरह से कवर किया गया था। चैनल से कहा गया है कि वो 9 नवंबर की रात 12.01 बजे से 10 नवंबर को रात 12.01 बजे तक कुछ भी न दिखाए। जाहिर है कि एनडीटीवी इंडिया को सरकार विरोधी रुख की सज़ा दी जा रही है। यह मीडिया का गला घोंटनेवाली ऐसी लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाई है जिसका विरोध न किया गया तो कल कोई भी नहीं बचेगा। इस समय एनडीटीवी इंडिया एकमात्र चैनल है जो सच को सच कहने की हिम्मत करता है और सरकार की हर बेज़ा हरकत पर वाजिब सवाल उठाता है। कल दूसरे चैनलों को भी एनडीटीवी इंडिया की तरह ब्लैकआउट किया जा सकता है। ऐसे में उचित यही होगा कि कम से कम हिंदी के सारे न्यूज़ चैनल एनडीटीवी इंडिया के साथ एकजुटता दिखाते हुए 9 नवंबर की रात से 10 नवंबर की रात तक 24 घंटे का ब्लैकआउट कर दें।

Nadim S. Akhter : एनडीटीवी इंडिया न्यूज़ चैनल पर केंद्र सरकार ने लगाया एक दिन के लिए बैन। अब पता चला कि देश का नंबर वन हिंदी न्यूज़ चैनल कौन है? मैं मीडिया के किसी भी संस्थान, चाहे वो भक्त संस्थान ही क्यों न हो, पे पाबन्दी लागए जाने के खिलाफ हूँ। और लोकतंत्र में हर नागरिक को सत्ता के ऐसे तानाशाही फैसलों का मुखर विरोध करना चाहिए। कभी एनडीटीवी पे रवीश कुमार ने प्राइम टाइम में स्क्रीन को ब्लैक कर दिया था। उससे -प्रेरणा- लेकर केंद्र सरकार पूरे चैनल को ब्लैक आउट कर रही है।  सनद रहे, ये रंग काला है। मुंह पे लग जाए तो -मुंह काला- हो जाता है और आँखों में लग जाए तो काजल बन जाता है। और पन्नों में समा जाए तो इतिहास बन जाता है। सो सावधान! विश्राम! लाठी पकड़, फुल पैंट पहन! अब माथे पे काली टोपी धर। तुम कौन? सेवक गुरूजी। अच्छा स्वयंसेवक! हाथ सीने की सीध में। हथेली नीचे। नाखून ऊपर। प्रशिक्षण समाप्त। #ndtvblackout

Krishna Kant : जरूरी नहीं कि आपातकाल लगाने के लिए प्रधानमंत्री रेडियो से घोषणा करें. इंदिरा गांधी में फिर भी इतनी ईमानदारी थी कि जनता को बता दिया था. अब जनता तय करे कि उसे मजबूत जनतंत्र चाहिए या एक निरंकुश देवता. NDTV पर एक दिन का प्रतिबंध दो साल से लागू अघोषित आपातकाल की पहली मुनादी है।

Khushdeep Sehgal : आज NDTV का नंबर, कल सब का होगा…(सिर्फ सेल्फी-भक्ति वाले बचेंगे)

Jitendra Narayan : आतंकवादियों को पठानकोट एयरबेस तक पहुँचाने वाले एसपी सलविंदर सिंह से बड़ा अपराधी NDTV है?

Saiyed Zaigham Murtaza : 10 नवंबर शाम 8-9 बजे एनडीटीवी ऑन ज़रूर कीजीए। इमरजेंसी का विरोध कीजीए। बताईए कि सत्य देखने नहीं समझने की चीज़ है। टीआरपी ब्लैंक स्क्रीन भी दे सकता है।

Abhay Tiwari : कोई कह नहीं रहा है.. पर सारी गलती रवीश कुमार की है। सब सुधर गए .. बस वही एक बच गए हैं जो सुधरने का नाम नहीं लेते.. पर क्या करें.. हमें बिगड़े हुए रवीश कुमार ही अच्छे लगते हैं। जिस दिन वो सुधर जाएंगे हमारा टीवी पर न्यूज देखना बंद हो जाएगा।

Chandra Prakash Pandey : देश और समाज को नुकसान पहुँचाने वाले कॉन्टेंट के प्रसारण पर लगाम लगनी ही चाहिए, लेकिन ये तय कौन करेगा कि कौन सा कॉन्टेंट देश या समाज को नुकसान पहुंचाने वाला है? सरकारें तो बिलकुल नहीं तय कर सकती। आप ऐसा मैकेनिज्म बनाइये कि अदालत या कोई स्वतंत्र संस्था तय करे, दण्डित करे, आप कौन होते हैं? वैसे मीडिया में पर्याप्त आत्म-नियंत्रण है, ये काम उसी पर छोड़ देना बेहतर है। क्या आप डरा रहे हैं? असल में आप डरे हुए हैं। NDTV पर कार्रवाई का फैसला वापस लो, ऐसी तानाशाही से डराओ मत क्योंकि इसमें तुम्हारी हार तय है सरकार! #StandWithNDTV

अजात अभिषेक : 9 तारीख़ को मैं कोई न्यूज़ चैनल नहीं देखूँगा. #Reject_Censorship (पहली बार कॉपी-पेस्ट कर समर्थन की अपील कर रहा हूँ इस अभियान के. इसे अपनी वाल पर चिपकाइए और दोस्तों से ऐसा ही करने की अपील कीजिये.सच मानिए, ज़रूरी है).

Madan Tiwary : सुनने में आ रहा है कि NDTV के प्रसारण पर रोक लगाई गई है. कारण पठानकोठ हमले के दौरान गैर जिम्मेवाराना रिपोर्टिंग. यह अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की कवायद है. मैं रविश का घोर विरोधी हूँ परन्तु इस प्रतिबन्ध को देश के लिए खतरनाक मानता हूँ. यह फासीवाद है. इसके खिलाफ जनता को सड़कों पर आना चाहिए. आज मुल्क में वर्तमान में सबसे खतरनाक भाजपा और मोदी समर्थक हैं. वे सबसे ज्यादा गाली गलौज करते हैं. प्रतिबन्ध लगाना है तो पहले अपने समर्थकों पर लगाए सरकार. मोदी आग से खेल रहे हैं. जलकर ख़ाक हो जाएंगे अगर रवैया नहीं सुधारा तो. 

Nishtha : NDTV चैनल की पत्रकारिता को सलाम। सरकार ने एक दिन का प्रतिबन्ध लगाकर इस बात को सही साबित कर दिया। आपातकाल में भी कई पत्रकारों को सच बोलने पर प्रतिबन्ध झेलना पड़ा था। यह भी अघोषित आपातकाल ही है। #I_Support_NDTV

Priyabh Ranjan : NDTV India पर एक दिन का BAN लगाने का फरमान तो आ गया…लेकिन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के अफसरों को पठानकोट एयर बेस की ‘सैर’ कराने वाली इस मोदी सरकार पर कौन सा BAN लगाया जाए? #UndeclaredEmergency #NDTV_Banned

सौजन्य : फेसबुक

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उन्हें सुदर्शन टीवी की गटर छाप पत्रकारिता से दिक्कत नहीं, बस एनडीटीवी इंडिया के अस्तित्व से बड़ी समस्या है

Sheetal P Singh : ये कहाँ आ गये हम…  जिन्हें सुदर्शन टीवी (जिसके मालिक/ संपादक पर यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज हुआ है) जो अनवरत सांप्रदायिक प्रचार करता है, नाबालिग़ लड़की से बलात्कार करने के आरोप में बंद आसाराम का खुला समर्थन करता है । भाषा / कंटेंट के मामले में गटर पत्रकारिता का नमूना है से बाल भर भी आपत्ति न है न हुई न होगी उनके तरकश में NDTV इंडिया के खिलाफ भाखने को बहुत कुछ है! जिन्हें Znews के संपादक / प्रबन्धक / मालिक को वीडियोटेप पर नवीन जिन्दल से सौ करोड़ का ब्लैकमेल करते देखने से रत्ती भर भी फ़र्क़ न पड़ा वे पत्रकारिता की शुचिता की तलाश में NDTV इंडिया की कमियाँ गिना रहे हैं! जिन्हें संपूर्ण मीडिया के नरेंद्र मोदी अमित शाह अरुण जेटली मुकेश अंबानी गौतम अडानी से संबंधित हर ऐसे समाचार जिसमें आलोचना हो पर अघोषित प्रतिबंध से हर्फ़ भर भी दिक़्क़त नहीं है उन्हे NDTV इंडिया के अस्तित्व से ही बड़ी दिक़्क़त है! इन सब को पहचानिये! इनकी जात पहचानिये! ये एक रंग के हैं, इनका रंग पहचानिये!

 

Anil Jain : अघोषित आपातकाल की मुखर होती पदचाप! इतिहास के अच्छे-बुरे दिनों या घटनाक्रमों को वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आपातकाल लगाते वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी ‘लोकप्रियता’ और ‘राजनीतिक कौशल’ का वैसा ही गुमान था जैसा आज भी कुछ लोगों को है। आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी। आज फिर वैसा ही नजारा दिख रहा है। यह जरुरी नहीं कि लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों का अपहरण हर बार बाकायदा घोषित करके ही किया जाए। वह लोकतांत्रिक आवरण और कायदे-कानूनों की आड में भी हो सकता है। शासक वर्ग की कोशिशें इस दिशा में जारी हैं। सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही करार देना, भोपाल की संदिग्ध मुठभेड, दिल्ली में कांग्रेस उपाघ्यक्ष और मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री को बार-बार हिरासत में लेना और एनडीटीवी-इंडिया पर एक दिन का प्रतिबंध- यह सब क्या है?

Amitaabh Srivastava : एनडीटीवी इंडिया पर सरकारी पाबन्दी की कार्रवाई घोर निंदनीय है. ये सरकार के खतरनाक मंसूबों की एक झलक है. हर पत्रकार को , संपादक को, पत्रकार संस्था को निजी और सामूहिक स्तर पर इसका विरोध करना चाहिए भले ही चैनल से आपको ढेरों शिकायतें हो. एडिटर्स गिल्ड के अलावा बीईए और बाकी संस्थाओं, संगठनों को भी इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए. इमरजेंसी की आड़ में कांग्रेस को कोसने वाली सरकार हकीकत में आज़ाद प्रेस की अवधारणा से कितनी नफरत करती है . ये उसकी मिसाल है. ये इमरजेंसी नहीं तो और क्या है. शर्मनाक. 

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, अनिल जैन और अमिताभ श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी अगर एनडीटीवी को ठिकाने लगाने पर आ जाएंगे तो एक दिन का नहीं, पूरा ही ब्लैक आउट करा देंगे

Rajat Amarnath : NDTV जहाँ नौकरी पाने का पैमाना होता था कि आपके परिवार में कौन कौन ब्यूरोक्रेसी में हैं ताकि ख़बर के साथ साथ आड़े वक्त पर चैनल का काम निकाल सकें सरकार बदली तो काम निकालने वाले ब्यूरोक्रेट्स भी बदल गए डॉक्टर राय खुद कांग्रेसी हैं इसलिए उन्हीं के समय मे पनपे हैं उनकी पत्नी राधिका राय की बहन हैं वृंदा करात और बहनोई हैं प्रकाश करात जो वामपंथी हैं ये जगजाहिर है ऐसे में ये चैनल सरकारी पक्ष की तो बात करने से रहा और अब जब सरकार ने बाकी चैनलों को बख्श दिया लेकिन NDTV को एक दिन के लिए ब्लैक आउट करने का आदेश दिया तो छटपटाहट शुरू हो गई. अब इसे अघोषित आपातकाल बताया जा रहा है.  

1999 (NDA की सरकार थी) में करगिल में कुछ फौजी सिर्फ़ इसलिए शहीद हुए क्योंकि NDTV की तेज तरार्र पत्रकार ने वहीं से लाईव कर दिया जहाँ बंकर में फौजी बैठे थे. जो भी पत्रकारिता से जुड़े हैं उन सबको ये किस्सा पता है. सरकार की आलोचना होनी चाहिए लेकिन NDTV सरकार विरोधी है. NDTV प्रधानमंत्री विरोधी नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी विरोधी है, इसलिए सूचना प्रसारण के फैसले पर भी नरेन्द्र मोदी का फैसला बताया जा रहा है. श्रीमान नरेन्द्र मोदी तो जब NDTV को ठिकाने लगाने पर आयेंगे तो सबसे पहले अपनी टेबल पर पड़ी NDTV के काले कारनामों की फाइल निपटायेंगे. एक दिन का ब्लैक आउट नहीं, बल्कि पूरा ब्लैक आउट कर देंगे. न मैं नरेन्द्र मोदी का विरोधी हूँ और न प्रशंसक पत्रकार हूँ. मैं केवल अपना नजरिया लिख रहा हूं पूरे मामले पर. 

Dilip Mandal : एक महीने बाद NDTV अगर एक ओपिनियन पोल लाता है, जिसमें यूपी में BJP सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिखाई जाती है और BSP तीसरे नंबर पर, तो क्या आप उस पर भरोसा करेंगे? करना ही पड़ेगा। लिखकर रख लीजिए। NDTV का ऐसा ओपिनियन पोल आएगा। मीडिया का अंडरवर्ल्ड! जो दिखता है, सिर्फ उतना ही नहीं होता। मैं बैन के खिलाफ हूँ।

Chitra Tripathi : किसी भी चैनल के खिलाफ सरकार की कारवाई निंदनीय है। ये अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति पैदा करता है। लेकिन NDTV India से मेरी कोई सिंपैथी नहीं है। वैसे भी खुद की स्क्रीन काली करने वाले चैनल को.. दूसरों को नीचा दिखाने की और खुद को महानता की श्रेणी में रखने की प्रवृत्ति रही है इस चैनल की…

वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ, दिलीप मंडल और चित्रा त्रिपाठी की एफबी वॉल से. 

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प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे तब दुगुने वेग से दागने चाहिये सवाल (कविता)

प्रश्नकाल

-भंवर मेघवंशी-

प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे
तब दुगुने वेग से
दागने चाहिये सवाल
सवाल,सवाल और सवाल
अनगिनत ,अनवरत
प्रश्न ही प्रश्न पूछे जाने चाहिये
तभी यह अघोषित आपातकाल
प्रश्नकाल में बदल सकता है.

पूछो, इसलिये कि
पूछना जरूरी है.
पूछो, इसलिये कि
सवाल मर ना जायें कहीं .
जब सवालों की जिन्दगी का
सवाल हो,
ऐसे में चुप रहने का तो
सवाल ही कैसे उठता है?

सवालों की मौत
लोकतंत्र की मौत है
संविधान का मरण है.
इसलिये बरा -ए -मेहरबानी
जम्हूरियत की सेहत के लिये
इस प्रश्नकाल को
स्थगित मत कीजिये.
पूछते रहिये निरंतर
सहज और असहज सवाल.

यह जानते हुये भी
कि पूछना हो सकता है
एक जोखिम भरा काम .
अक्सर नहीं मिलेंगे जवाब
क्योंकि चुप्पों के देश में
जवाब में नहीं आते,
प्रत्यत्तर में प्रतिप्रश्न
उछाले जाते है
कि-
तुम होते कौन हो पूछने वाले?
फिर भी पूछना जरूरी है
पूछते रहिये सदा सर्वदा.

सवाल
सिर्फ सवाल नहीं होते
वे हमारे जिन्दा होने का
सबूत होते है.
सवाल ही जन्मते है
तर्क, विग्यान और गणित को.
सवाल हमें लोकतंत्र में
मालिक बनाते है.
“सर्व प्रभुता सम्पन्न”
सवालों से ही तो
है हमलोग
“वी द पीपल” कहलाते है.
सवाल
हमारे लोकतंत्र के
फेफड़ों की
सांस है.
सवाल ही
इस आफतकाल में
आखिरी ऊजास है.
इसलिये पूछते रहो
पूछते रहो कि
पूछना जरूरी है.

प्रश्नों ने ही
रची होगी सभ्यताएं
अक्षर, स्वर, व्यजंन
वाक्य, बोलियां और भाषाएं
कालक्रम की इस
विकास यात्रा का उद्गम
प्रश्नों में ही छिपा है.
प्रश्न नहीं होते
तो पाषाणयुग
में ही ठहरे होते हम.

प्रश्नों ने ही कबीलों को
समाज बनाया.
प्रश्नों ने ही हमारे कल को
आज बनाया.
इसलिये अपने प्रश्नों को
सहेजो लोगो.

खोने मत दो
अपने सवालों को
मदमाती सत्ता के
अहंकारी अट्टहासों में
श्रद्धा के घटाटोप अंधियारों में
राष्ट्रवाद के नारो में
भीड़ के हथियारों में
अपने सवाल
जिन्दा रखों
हर दौर, हरेक सरकारों में.

वे जब
शस्त्र पूजें,
हत्यारों को करें
महिमा मण्डित.
बनायें उनके
पूजागृह
और उनके पापों पर
तिरंगा डाल दें,
तब भी चुप मत रहना
पूछना.

जब वो बना दें
फौजों को पवित्र गाय
और गायों  के नाम पर फौजें
पशुपुत्रों के
उस पाश्विक युग में भी
चुप मत रहना,
पूछना सवाल.

जब वो सवाल
पूछने को ही
राष्ट्रद्रोह बना दें,
भेजने लगे जेल,
मारने लगे कौड़े
गोलियों और गालियों की
करने लगे बौछार
तब भी
बिना डरे मेरे यार
पूछना सवाल.

सवाल तो शाश्वत है
शाश्वत ही रहेंगे
प्रतिबंधों को तो
टूटना होता है
टूट जायेंगे
और प्रतिबंध लगाने वाले
डर जायेंगे
यहां तक कि
मर जायेंगे.

सवाल फिर भी
रहेंगे जिन्दा
क्योंकि हम विरसे में
अपने वंशजों को
सौंप जायेंगे
अनगिनत सवाल
और वसीयत में
लिख जायेंगे
सवाल उठाने का हक़
जिससे कि वो बना सकेंगे
हर अघोषित
आपातकाल को प्रश्नकाल !!

लेखक भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवं समाजकर्मी हैं. यह रचना एनडीटीवी इंडिया के समर्थन में है. सम्पर्क सूत्र- bhanwarmeghwanshi@gmail.com

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छप्पन इंच के सीने पर छेद तमाम हैं… अगर छेद दिखाए गए तो बैन कर दिया जाता है…

सच को सच कह दिया था इसी पर मेरे पीछे ज़माना पड़ा है… इस ज़माने में सिर्फ वो सरकार है जिसे सवाल पसंद नहीं, और कुछ भक्तों की संख्या है जिनकी आंखें फूट चुकी हैं.. छप्पन इंच के सीने पर छेद तमाम हैं… और अगर छेद दिखाए गए… तो बैन कर दिया जाता है… 2014 से 2019 तक के बीच के लोगों को खुद को महान समझना चाहिए… क्योंकि उन्हें दोबारा हिटलर को देखने का मौक़ा मिल रहा है… हमें कोरिया जाने की ज़रूरत नहीं है… क्योंकि एक ‘किम जोंग’ हमारे देश में भी फल-फूल रहा है… उसे सवाल पसंद नहीं है, उसे मन की करनी है, उसे किसी की नहीं सुननी है… रावण जैसा अहंकार, बकासुर जैसी सोच, कंस जैसी क्रूरता उसके भीतर कूट-कूट कर भरी है…

राजकमल झा की दो लाइनों ने ही उसके फूलते सीने को पिचका दिया… अक्षय मुकुल की बात ने उसके अहंकारी सोच पर ज़ोर का तमाचा मारा… और रवीश के ‘मूक शो’ ने उसकी मरी हुई मानवता को कब्रिस्तान तक छोड़ने का काम किया… जब पत्रकार सरकार का ‘अंडु’ पकड़ कर लटकने लगेंगे, तो आप कहां जाएंगे, ये आपको सोचना होगा… जब पत्रकार सेल्फी मोड में ‘लेड़ी तर्र’ करवाते फिरेंगे, तो आप कहां जाएंगे, ये आपको सोचना होगा…. कौन आपके सवाल पूछेगा, कौन आपकी आवाज़ को वहां तक पहुंचाएगा… एक हैं बाबा तिहाड़ी… नाम नहीं लिखूंगा… नहीं तो आप समझ जाएंगे… सुधीर की बात कर रहा हूं… हां-हां… वहीं सुधीर… ज़ी वाला… गज़ब का देशभक्त पत्रकार है… उसे प्रधानमंत्री की चड्ढी का ब्रांड भी पता होगा… अमित शाह कहां दाढ़ी सेट करवाता है… उसे वो भी पता होगा…

ये तिहाड़ी पूरी तरह से ‘नीचे वाला’ पकड़ के लटक चुका है… कुछ और भी हैं… कुछ क्या, बहुत सारे हैं… चाटे जा रहे हैं, चाटे जा रहे हैं… कुछ तो छोड़ ही नहीं रहे हैं… किसी को Z वाली सुरक्षा मिल रही है… किसी को Y वाली… इन्ही पत्रकारों की वजह से प्रधानमंत्री पर बीते दो साल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने तक का दबाव नहीं बन पाया… बताया जाए जनता को, कि क्या हुआ, क्या होगा… ट्वीट पर बिना सवाल के जवाब दे दिया जाता है… मौत पर सांत्वना होती है, हादसों पर दुख होता है, शहीदों पर सियासत होती है और जीत पर जश्न होता है… सब ट्वीट पर… लेकिन NDTV ने पिलाई करनी शुरू कर दी है… पत्रकारिता की ताक़त दिखानी शुरू कर दी है… आप साथ आओ… क्योंकि ये आपके हित का भी सवाल है… जो पैसा लेकर चाटते हैं, या भक्त बनकर चाटते हैं, उनके साथ आने की ज़रूरत नही हैं… जो सवाल पूछता जानते हैं, जो पत्रकारिता को समझते हैं… उनको एक साथ आने की ज़रूरत है…

युवा पत्रकार संजय सिंह की फेसबुक वॉल से. संपर्क : sanjaysingh27sept@gmail.com

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सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी चैनल को खत्म करो!

गले में बाँधे रहते थे, अब मुँह पर पट्टा बाँधे हैं,
पालतू हैं हम मोदी के, इस बात का गंडा बाँधे हैं।
सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी को खत्म करो,
झूठ के भोपू वाले हैं, हम झूठ का दामन थामे हैं।

ये पंक्तियाँ उन चंद तथाकथित बिकाऊ पत्रकारों की भावनाओं की कल्पना है जिन्हें कोई अंध भक्त कहता है, कोई सरकार के झूठ का भोंपू तो कोई मोदी का पालतू। आजाद पत्रकारिता और निष्पक्ष कलम जब सरकार की गलत नीतियों का बखान करने लगता है तो पालतू गला फाड़-फाड़ कर भोंकते हैं। सरकार की मुखालिफत पर ये अक्सर काट भी लेते हैं। लेकिन इनके काटने से पीड़ितों को ना इन्जेक्शन लगवाना पड़ता है और न ही जान का खतरा महसूस होता है। मेडिकल साइंस कहती है कि काटने वाला जब तक जीवित है तब तक पीड़ित खतरे से बाहर है। अभी तीन साल तक इन्हे चंद टुकड़ों की ताकत जिन्दा रखेगी और सत्ता की ताकत इन्हेँ झूठ का साथ देने की आब-ए-हयात देती रहेगी। झूठ की हिफाजत के लिये निष्पक्ष पत्रकारिता पर जो भौकते रहते है उनका मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों पर खामोश रहना स्वाभाविक भी है।

9 नवंबर को एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध के खिलाफ बुलंद आवाजो मे खामोशी इख्तियार करने वाले पत्रकारों/पत्रकार संगठनों को तानाशाही मोदी सरकार का पालतू करार दिया जा रहा है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नई दमनकारी विज्ञापन नीति के बाद एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध को केन्द्र सरकार के आगे नतमस्तक हो जाने की अप्रत्यक्ष चेतावनी माना जा रहा है। हिन्दुस्तानी मीडिया की आजादी को दौलत की जंजीरो मे बाँधकर कैद करने वाली नीतियों के खिलाफ पत्रकारों का गुस्सा उन पत्रकारों के खिलाफ ज्यादा मुखर हो गया है जो मोदी भक्ति मे मीडिया के खिलाफ केन्द्र सरकार के दमनकारी फैसलो पर खामोश है।

देशभर के पत्रकारों और मीडिया संगठनो मे एनडीटीवी पर एक दिन के लिये बैन को लेकर गुस्सा बढ़ता जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सबसे बड़े संगठन-  एडिटर्स गिल्ड आफ इन्डिया,  प्रेस क्लब आफ इन्डिया के अतिरिक्त देशभर के दर्जनों पत्रकार संगठन एनडीटीवी के समर्थन मे आकर केन्द्र सरकार के खिलाफ आन्दोलन की रूपरेखा तैयार कर रहे है। वहीं इस मामले पर यूपी सहित देश के चंद पत्रकार संगठनों की खामोशी इन्हें कटघरे में खड़ा कर रही है। इन संगठनो ने मीडिया को गुलामी की जंजीरो मे बाँधने वाली मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ अब तक एक बयान तक भी नही दिया। यही नहीं, पत्रकारों और पत्रकारिता की आजादी के हक की बातेँ करने वाले इस तरह के कई मोदीपरस्त पत्रकार संगठन  एनडीटीवी पर बैन के तानाशाही कदम पर खामोशी इख्तियार किये हैं। इस खामोशी से ये शक और आरोप और भी उभरने लगे ही कि बड़े मीडिया समूहों को ही नही संगठनों की दुकान चलाने वाले कथित पत्रकारों को भी मोदी समर्थन की सुपारी के टुकड़े दिये जाते हैं।

लेखक नवेद शिकोह लखनऊ के पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 08090180256 या Navedshikoh84@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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ये तीन तरह के लोग एनडीटीवी पर बैन के खतरनाक फैसले को नहीं समझ पाएंगे

Nitin Thakur : एनडीटीवी इंडिया पर बंदिश का फैसला कितना खतरनाक है, ये बात तीन तरह के लोगों की समझ में नहीं आएगी।  1. वो जिन्होंने मजबूरी में पत्रकारिता के पेशे को अपनाया है। 2. किसी और एजेंडे को पूरा करने के लिए इस पेशे में घुस आए लोग। 3. ग्लैमर से अंधे होकर पत्रकारिता की गलियों में आवारगर्दी कर रहे पत्रकार जैसे दिखनेवाले लोग। इनके लिए रिपोर्टिंग करते किसी पत्रकार का पिटना हास्य का विषय है। किसी पत्रकार या पत्रकारिता संस्थान पर चलनेवाले सरकारी डंडे को ये इज़्ज़त देते हैं। दरअसल इन्हें अपने पेशे पर शर्म है लेकिन ये लोग इस पेशे के लिए खुद शर्म का विषय हैं।

Nadim S. Akhter : एनडीटीवी पर एक दिन का ही सही, पर बैन लगाकर मोदी सरकार ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी फ़ज़ीहत करवा ली है। उनकी सरकार का ये फैसला मोदी कार्यकाल के बाकी सारे बड़े फैसलों और नीतियों पे भारी पड़ेगा। कारण ये है कि इस देश की जनता ऐसे मामलों में सरकारों को माफ़ नहीं करती क्योंकि आज भी मीडिया की आज़ादी पे हमला वो खुद पे हमला मानती है। मैंने शुरू में ही कहा था कि देर-सबेर ये गुजरात की प्रयोगशाला ये पूरे देश पे लागू करने की कोशिश करेंगे। ये उसकी आहट भी है और शंखनाद भी। अगर दिल्ली का मीडिया एकजुट नहीं हुआ तो उसे अंदर से सदा के लिए तोड़ दिया जाएगा और इसका सबसे बड़ा नुकसान इस देश को होगा। फैसले की घडी है।

Narendra M Chaturvedi : एनडीटीवी इंडिया पर सरकारी पाबन्दी की कार्रवाई घोर निंदनीय है. ये सरकार के खतरनाक मंसूबों की एक झलक है. हर पत्रकार को , संपादक को, पत्रकार संस्था को निजी और सामूहिक स्तर पर इसका विरोध करना चाहिए भले ही चैनल से आपको ढेरों शिकायतें हो. एडिटर्स गिल्ड के अलावा बीईए और बाकी संस्थाओं, संगठनों को भी इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए. इमरजेंसी की आड़ में कांग्रेस को कोसने वाली सरकार हकीकत में आज़ाद प्रेस की अवधारणा से कितनी नफरत करती है . ये उसकी मिसाल है. ये इमरजेंसी नहीं तो और क्या है शर्मनाक.

Mukesh Kumar : अगर भारतीय मीडिया इमर्जेंसी की आहट को सचमुच सुन पा रहा है तो कायदे से उन चौबीस घंटों में तमाम न्यूज़ चैनलों को प्रसारण रोक देना चाहिए जिस समय एनडीटीवी पर बैन लगाया गया है और अगले दिन अख़बार भी नहीं निकलने चाहिए। हालाँकि मीडिया जिस तरह से सरकार की गोद में बैठ चुका है या उससे आतंकित होकर व्यवहार कर रहा है उसे देखते हुए इस तरह के प्रतिरोध की उम्मीद बेमानी लगती है लेकिन अगर वह समझ पाया कि ये हमला केवल एनडीटीवी या, मीडिया पर नहीं बल्कि समूचे लोकतंत्र पर है तो शायद उनका विवेक एवं अंतरात्मा उसे सही राह दिखा देंगे। आमीन।

Arvind Katiyar : नौ नवंबर की रात 24 घंटे के लिए सरकार का एनडीटीवी के प्रसारण पर रोक का फैसला तुगलकी है, इससे सरकार की किरकिरी ही होगी, कहीं हिटलर जिंदा होगा तो कहीं मोसलनी। अभी से कुछ लालपंथी पत्रकार फेसबुक पर हिटलर को लेकर संजीदा हैं…

Yusuf Ansari : NDTV पर एक दिन का बैन अभिभव्यक्ती की आजादी के खिलाफ है. ये फैसला मोदी सरकर के मानसिक दिवालियेपन का सबूत है. मोदी सरकार ने देश में इमरजेंसी जैसे हालत तो पैदा कार ही दिये हैं. अब इमरजेंसी का एलान भी कर ही दे. कम से कम देश मुगालते में तो नहीं रहेगा.

Vineeta Yadav : No channel should off air in any govt ! Many ques stands for this decision ! Its india nt pak …

Krishna Kant : इस देश को लाखों रवीश कुमार चाहिए। इस देश को दलालों की ज़रूरत नहीं, लाखों सवाल उठाने वाले चाहिए। 

Pawan Lalchand : NDTV इंडिया पर गलत कवरेज के बहाने बैन की कड़ी निंदा की जानी चाहिये.

Sheeba Aslam Fehmi : मोदी जी NDTV को भी कन्हैया बनाएँगे! सिर्फ ‘रविश कुमार’ लिख दो तो पोस्ट हिट हुई जा रही है! मोदी जी, ये क्या किया?

Vivek Dutt Mathuria : आज NDTV की बारी और कल आपकी….आप तय कीजिए कि आप रीढ वाले प्राणी हैं या रेंगने वाले…वक्त इतिहास लिख रहा है ….

Anita Gautam : NDTV की खिलाफत से सरकार कठघड़े में हो सकती है, पर रवीश कुमार की आलोचना चाँद पर थूकने जैसा है।

सौजन्य : फेसबुक

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