संघ के मुताबिक टीवी पर ब्रेन लेश डिसकसन, इसमें शामिल होते हैं अपठित पत्रकार जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं (देखें वीडियो)

मऊ : भारत में चाहें जो बड़ी समस्या चल रही हो, सूखा हो, महंगाई हो, भ्रष्टाचार हो लेकिन आरएसएस वालों का हमेशा एक राग बजता है. वह है राग मुसलमान. घुमा फिरा कर कोई ऐसा मुद्दा ले आते हैं जिससे मुसलमानों को चुनौती दी जा सके और पूरे भारत की बहस इसी मसले पर शिफ्ट किया जा सके. दुर्भाग्य से मीडिया का बड़ा हिस्सा भी इसी उलझावों में बह जाता है और भाजपा-संघ का भोंपू बनते हुए मूल मुद्दों से हटते हुए इन्हीं नान इशूज को इशू बना देता है. हालांकि संघ नेता फिर भी टीवी वालों को बख्शते नहीं और कहते हैं कि चैनलों पर ब्रेनलेस डिसकशन चलती है और इसमें अपठित पत्रकार भाग लेते हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं. मतलब कि अगर संघ का चले तो वो सारे चैनल बंद करा के सिर्फ एक संघ नाम से चैनल चलाएं और उसमें जो कुछ ज्ञान दिया जाएगा, उसे ही प्रसाद के रूप में पाने के लिए देश भर के दर्शक बाध्य होंगे.

नीचे चार वीडियो लिंक हैं. ये आरएसएस के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा से संबंधित हैं. संघ के इस बड़े नेता ने मीडिया, मुसलमान और भारत माता की जय पर क्या क्या बातें की हैं, सुनिए. ये इशारे इशारे में जो जहर हिंदू मुस्लिम दिमागों में घोल रहे हैं, उसका क्या अंजाम होगा, इन्हें भी नहीं पता. आजम खान और औवैशी इस देश की मुख्य धारा नहीं हैं. ज्यादातर मुसलमान भारत के रंग, भारत की संस्कृति, भारत के नारे में रच बस घुल चुके हैं. लेकिन क्या आप इनसे नारे लगवा कर इनकी परीक्षा लेंगे, तभी इनकी देशभक्ति प्रमाणित करेंगे? ऐसे घिनौने कृत्य से देश का नुकसान ज्यादा होगा, फायदा कम.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा ने पत्रकारों से बातचीत और संघ के एक जमावड़े के संबोधन में जो कुछ कहा, उसका लब्बोलुवाब ये है-

”डा. हेडगवार ने कहा था भारत वर्ष ही हिन्दू राष्ट्र है, उस समय भी लोगों ने प्रश्न उठाये थे उसमें हर तबके के लोग थे. आज जो टीवी चैनलों पर ब्रेन लेश डिसकसन चलती है और उसमें शामिल होने वाले अपठित पत्रकार हैं. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं, उनके इलाज की जरूरत है. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं. ऐसे लोगों की हत्या नहीं, इलाज होनी चाहिए. इनके पास दिल है, लेकिन दिल की आवाज दिमाग तक नहीं पहुंची है. इसलिए इलाज जरूरी है. हम अशफाकउल्‍ला खां जैसे लोगों को आदर्श मानते हैं… अशफाकउल्ला भारत माता के लिए फांसी पर चढ़ गए.  हम उन्‍हें आदर्श मानते हैं. इन पागलों को आदर्श नहीं मानते. आवैसी और आजम के नाम पर मैं नहीं जाता हूं, ये एक विचारधारा का प्रतिनिधित्‍व करते हैं. रही बात भारत माता की जय बोलने की तो आप किसी भी भाषा में बोलिए, लेकिन भारत माता की जय बोलिए और बस दिल से बोलिए. मैं ये नहीं कहता हूं भारत माता की जय उर्दू और इंग्‍लिश में नहीं बोलनी चाहिए. आप किसी भी भाषा में बोल सकते हैं. भाषा तो हमारी देश की परंपरा है. महात्‍मा गांधी ने कहा कि था ईश्‍वर अल्‍ला तेरो नाम. भाषा का प्रश्‍न नहीं, भाव का प्रश्‍न है.  दिल से बोलना चाहिए. जो व्‍यक्‍ति भारत माता की जय न बोले उसे प्रेरित करना चाहिए, भारत माता सबकी माता हैं.”

संघ पदाधिकारी राम आशीष मऊ जनपद में आर.एस.एस. द्वारा आयोजित नववर्ष प्रतिप्रदा की पूर्व संध्या पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सोनी धापा बालिका विद्यलय के मैदान में शामिल होने आये थे. इनकी बातों को पूरा सुनने के लिए नीचे दिए गए वीडियो लिंक को एक एक कर क्लिक करते जाएं.

RSS कहिन (1) : आजम खान और ओवैशी जैसे पागलों का इलाज होना चाहिए https://www.youtube.com/watch?v=IGnRK2oJmm0

RSS कहिन (2) : पागलों का इलाज किया जाता है, उनकी हत्या नहीं की जाती https://www.youtube.com/watch?v=rsGZY4pQ8oI

RSS कहिन (3) : उर्दू में बोलिए या अंग्रेजी में, भारत माता की जय तो बोलना पड़ेगा https://www.youtube.com/watch?v=NNj8zTuH6QI

RSS कहिन (4) : टीवी पर ब्रेनलेस डिसकशन, अपठित पत्रकारों को ज्ञान नहीं https://www.youtube.com/watch?v=hu7heuyTwVI

मऊ से DEEPAK GUPTA की रिपोर्ट. संपर्क : 9452068289 या gdeepak899@gmail.com

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प्रबल प्रताप और संजीव पालीवाल ला रहे एक नया नेशनल न्यूज चैनल!

नोएडा के सेक्टर63 में जहां पर न्यूज एक्सप्रेस चैनल का आफिस हुआ करता था, उसके ठीक बगल वाली बिल्डिंग से एक नया चैनल अवतार लेने जा रहा है. चैनल का नाम वैसे तो फाइनली तय नहीं हुआ है लेकिन लोग कह रहे हैं कि यह ‘नेशन्स वायस’ नाम से लांच होगा. चैनल से अभी दो लोग जुड़ चुके हैं. प्रबल प्रताप सिंह और संजीव पालीवाल. प्रबल प्रताप के नेतृत्व में ही चैनल के सारे इक्विपमेंट्स, मशीनों आदि की खरीद-फरोख्त होने से लेकर इंस्टालेशन का काम चल रहा है. संजीव पालीवाल चैनल से सलाहकार की भूमिका में जुड़े हैं. भड़ास4मीडिया ने जब प्रबल से मैसेज कर इस चैनल से जुड़ने के बारे में पूछा तो उन्होंने पूरी तरह से इनकार किया. हालांकि सूत्र कहते हैं कि प्रबल प्रताप सिंह चैनल से न सिर्फ जुड़े हुए हैं बल्कि चैनल इंस्टालेशन का सारा काम उनकी अगुवाई में हो रहा है.

अब आते हैं चैनल के मालिक पर. इस चैनल के मालिक हैं विजयेंद्र सिंह. बताया जाता है कि ये मेरठ-मुजफ्फरनगर इलाके के रहने वाले हैं और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के धंधे में हैं. इलेक्ट्रानिक सामानों के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के बिजनेस के अलावा कई अन्य कामकाज भी इनके हैं. भड़ास4मीडिया से बातचीत में चैनल के मालिक विजयेंद्र सिंह ने चैनल लाने की तैयारियों की पुष्टि की. लोगों का कहना है कि विजयेंद्र सिंह काफी पुण्य का काम कर रहे हैं चैनल लाकर क्योंकि इससे दो तीन सौ बेरोजगार लोगों को दो – तीन साल के लिए रोजगार का जुगाड़ हो जाएगा. उसके बाद नए चैनलों का जो हश्र होता है सब जानते हैं क्योंकि मालिकों को लंबे-लंबे ख्वाब दिखाकर लाए जाने वाले चैनलों का दम दो-तीन साल बाद फूलने लगता है और फिर कर्मचारियों को अपने बकाया सेलरी के लिए आंदोलन करना पड़ता है. फिलहाल तो सभी को मिलकर नए आ रहे चैनलों का स्वागत करना चाहिए क्योंकि मीडिया क्षेत्र में कई चैनलों के बंद होने, बैठ जाने से बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार घूम रहे हैं.

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कुछ चैनलों ने इंद्राणी प्रकरण में किसी जासूसी कहानी की तरह रहस्य-रोमांच का ‘रस’ घोल दिया है

Om Thanvi : मेरी पत्नी प्रेमलताजी ने अजीब उलझन में डाल दिया है: कहती हैं समझाओ कि यह इंद्राणी मुखर्जी वाला मामला क्या है? शीना बेटी थी तो बहन क्यों बनी? विधि कौनसी बेटी है? कितने भाई-बहन थे? इंद्राणी का पहला पति कौन था? संजीव कितने नंबर का पति था, दूसरा या तीसरा? शीना का पिता कौन है? पिता की जगह वह नाना का सरनेम बोरा क्यों प्रयोग करती थी? पीटर की पहली और दूसरी बीवी कौन थी? राहुल कौनसी बीवी से है? पीटर के और कितने बच्चे हैं? पीटर की नजर में शीना साली थी तो अपने सास-ससुर या ससुराल में अन्य किसी निकट-पास के शख्स से बातचीत में यह बात पोशीदा कैसे रही, जो शीना को पीटर के सामने उसकी बेटी ही कहेंगे, साली तो नहीं?

मुझे क्या पता? हाँ, यह देखकर हैरान जरूर हूँ कि कुछ चैनलों ने इस खबर में किसी जासूसी कहानी की तरह रहस्य-रोमांच का ‘रस’ घोल दिया है। किसी सुखद आश्चर्य की तरह कल शाम बस एनडीटीवी-इंडिया पर सुशांत सिन्हा अहमदाबाद के पुलिसिया कहर और पर प्राइम टाइम में रवीश बढ़ती आबादी के पीछे अशिक्षा और गरीबी की वजहें टटोलते रहे। शीना की हत्या रिश्ते-नातों की उलझन से भरी कहानी नहीं है, दर्दनाक त्रासदी है। यकीनन वह बड़ी खबर है, मगर महज सनसनीखेज वारदात या अपराध-कथा भर नहीं है; हर शाम उसका अनवरत कवरेज सत्यकथा या मनोहर कहानियां शैली में नहीं किया जा सकता। जिम्मेदार कवरेज वह होगा जो अभागी शीना के दर्द को धुंधलाने-बिसरने न दे, यह भी याद रखे कि शीना के साथ हुए बरताव और अंततः हत्या के पीछे कथित उच्च वर्ग की पारिवारिक टूटन, आधुनिक जीवन-शैली, संवेदनहीनता, महत्त्वाकांक्षाओं, पितृ व मातृ सत्ता के अहंकार और अहम् के आपसे टकरावों आदि की क्या भूमिका है। यह काम पुलिस की खोज – हत्या क्यों और किसने की – से कहीं आगे का है, जो मीडिया कुशलता से कर सकता है – अगर चाहे।
 
Nadim S. Akhter :  पीटर मुखर्जी और इंद्राणी की स्टोरी में बड़ा रस आ रहा है चैनलों के चम्पादकों को !!! सारा जहान भूल के सिर्फ इसी स्टोरी पर पिले-पलाए बैठे हैं. आपके घर में ऐसा हो जाता तो क्या करते??!! मुंह छुपाते या फिर शर्म से आत्महत्या कर लेते??!! किसी की निजी जिंदगी के हादसे क्राइम की स्टोरी हो सकती है, पर चैनलों की टीआरपी का एजेंडा नहीं. कड़वा बोल रहा हूं पर सच्चाई यही है कि पत्रकारिता करनी नहीं आती तो इस पेशे को बदनाम मत करिए. और रिश्तों को dramatize करने का इतना ही शौक-जूनून है तो जाकर एकता कपूर से नौकरी मांगिए. उसके लिए सीरियल बनाइए-बनवाइए. शर्म नहीं आती आप लोगों को !!!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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भारत का मीडिया TRP के लिए दंगा, फसाद, हत्या, बलात्कार, धरना-प्रदर्शन, आगजनी और लूट के कार्यक्रम प्रायोजित करेगा!

Ajit Singh : पकिस्तान जब भारत से हारा तो पाकिस्तानियों ने अपने TV फोड़ दिए। ऐसा हमको मीडिया ने बताया। हम लोगों ने भी खूब चटखारे लिए। पाकिस्तानियों को इसी बहाने certified चूतिया घोषित कर दिया। बड़ा मज़ा आया। अब मीडिया ने दिखाया कि हिन्दुस्तान में भी लोगों ने TV फोड़ दिए। मैंने इस खबर को बड़े गौर से देखा। मीडिया ने ये भी बताया कि लोग आंसू बहा रहे हैं। उनके आंसू भी देखे । लोग tv सड़कों पे पटक रहे हैं। प्रश्न ये है कि लोग news channel के कैमरा को दिखाने के लिए टीवी फोड़ रहे हैं क्या ? लोगों ने tv खुद फोड़े या मीडिया ने स्टोरी बनाने के लिए फुड़वाये? पुराने टंडीरा TV हैं। साफ़ दिखाई दे रहा है। क्या ये नहीं खोजा जाना चाहिए कि ये नाटक किसने कराया? क्यों कराया? टीवी फोड़ने की घटना किसने शूट की? टीवी कहाँ से आये? कौन लोग थे जिनने अपना TV फोड़ा। जिन लोगों ने TV फोड़ा उन ने अपने घर से कभी संडास का mug भी फेंका है? रोने वालों में कुछ लोग तो स्टेडियम में बैठे हैं। बाकी जो बाहरी लोग दिल्ली मुम्बई में दिखाए जा रहे है वो बहुत घटिया acting कर रहे हैं। मीडिया वाले अपनी दुकानदारी चमकाने के चक्कर में सारी दुनिया को ये बताना चाहते है की सिर्फ पाकिस्तानी ही नहीं हम हिन्दुस्तानी भी certified चूतिया हैं ……ISO मार्का ….. हम भी किरकिट जैसे फर्जीवाड़े पे अपना TV फोड़ सकते हैं।

 

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खुशवंत सिंह ने एक बार लिखा था। किसी शहर के लोगों का बौद्धिक स्तर आंकना हो तो उसकी bookshops देखो। बड़ा सटीक आकलन है। इसी प्रकार किसी कौम, किसी मुल्क का बौद्धिक स्तर नापना हो तो उसका tv देखो, उसके entertainment चैनल देखो, उसके news channels देखो। सुविख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार Arthur Hailey ने News, पत्रकारिता और पत्रकारों की दुनिया पे एक बेहतरीन उपन्यास लिखा है- The evening news. ये उन दिनों की कहानी है जब रोज़ाना शाम को tv पे या रेडियो पे 15 मिनट के समाचार आया करते थे। उपन्यास में ये जद्दोजहद दिखाई है की किस प्रकार मात्र 15 मिनट में दिन भर की और देस और दुनिया जहान की खबरें दिखानी होती थी। उसमे कितनी ही महत्वपूर्ण खबरें छूट जाती थीं। कितनी काट छाँट दी जाती। इसके लिए Arthur Hailey ने एक टिप्पणी की थी- its like putting 10 pounds of shit in an 8 pound carry bag . It keeps coming out. अब ज़माना बदल गया है। भारत देश में तो न्यूज़ का स्तर इस कदर गिर चुका है की जिस खबर को डेढ़ मिनट में दिखा के खत्म करना चाहिए उसे आधे घंटे में दिखाया जाता है। एक ही clipping बार बार हर बार रिपीट होती रहती है. । एक ही वाक्य को 3 -3 बार बोलते हैं anchor. Indian media carries a spoon ful of shit in a 10 pound carry bag.

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70 के दशक में मशहूर उपन्यासकार Irving Wallace ने एक उपन्यास लिखा था। The Almighty. Almighty का अर्थ होता है सर्वशक्तिमान। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा जाता है। उपन्यास का कथानक कुछ यूँ है कि एक मीडिया tycoon अपने अखबार और न्यूज़ channel की TRP बढ़ाने के लिए पहले जघन्य हत्याएं और अपराध करवाता है और फिर अन्य अखबारों और news channels से पहले प्रसारित कर के TRP अर्जित करता है। पिछले दिनों देश में बेमौसमी बरसात हुई। ओले पड़े। फसलों को भी नुक्सान हुआ। मीडिया ने खूब घड़ियाली आंसू बहाये। अपने खेत की मेढ़ पे सिर पकडे बैठे किसान दिखाए। मेरी समझ में ये नहीं आया कि किसान और मीडिया का कैमरा एक साथ खेत पे पहुंचे कैसे? भारत मैच हार गया ऑस्ट्रेलिया से। मीडिया ने कबाड़ी की दूकान से कबाड़ के TV फोड़ने का प्रायोजित कार्यक्रम करवा के प्रसारित किया। लोग आंसू बहा रहे हैं। किरकिट के खेल में हार के देस शोक मगन है। इससे पहले हमारा मीडिया फ़र्ज़ी sting operation दिखाता आया है। एक चैनल ने इसी प्रकार दिल्ली की एक स्कूल टीचर पे human traffiking और prostitution में लिप्त होने का फ़र्ज़ी आरोप एक फ़र्ज़ी स्टूडेंट द्वारा लगवाया था। इसका नतीजा ये हुआ कि उस girls school के अभिभावक वो फ़र्ज़ी खबर देख के उस स्कूल के गेट पे एकत्र हो गए और उन्होंने उस बेचारी निर्दोष स्कूल टीचर से मारपीट की। और उस चैनल ने ये पूरा तमाशा लाइव दिखाया। इस फ़र्ज़ी sting और इस प्रायोजित आक्रोश और मारपीट का नतीजा ये निकला कि उस महिला और उनके परिवार भर का दिल्ली में रहना दूभर हो गया। कल्पना कीजिये कि एक मीडिया चैनल की बदमाशी के कारण आपके घर की माँ बहन बेटी बहू देश भर में वेश्या और वेश्याओं की दलाल घोषित हो जाए। बाद में जब जांच हुई तो पाया गया कि एक भांड चैनल ने एक free lancer सड़क छाप पत्रकार द्वारा एक फ़र्ज़ी प्रशिक्षु पत्रकार को उस स्कूल की फ़र्ज़ी छात्रा बना कर फ़र्ज़ी झूठे आरोप लगाए थे। बाद में दोनों पत्रकारों की गिरफ्तारी भी हुई और चैनल सिर्फ माफ़ी मांग के बच निकला। वो दिन दूर नहीं जब भारत का मीडिया TRP के लिए दंगा, फसाद, हत्या, बलात्कार, धरना, प्रदर्शन, आगजनी और लूट के कार्यक्रम (घटना) भी आयोजित प्रायोजित करेगा।

सोशल एक्टिविस्ट अजीत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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एक न्यूज चैनल जहां महिला पत्रकारों को प्रमोशन के लिए मालिक के साथ अकेले में ‘गोल्डन काफी’ पीनी पड़ती है!

चौथा स्तंभ आज खुद को अपने बल पर खड़ा रख पाने में नाक़ाम साबित हो रहा है…. आज ये स्तंभ अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रहा है… खासकर छोटे न्यूज चैनलों ने जो दलाली, उगाही, धंधे को ही असली पत्रकारिता मानते हैं, गंध मचा रखा है. ये चैनल राजनेताओं का सहारा लेने पर, ख़बरों को ब्रांड घोषित कर उसके जरिये पत्रकारिता की खुले बाज़ार में नीलामी करने को रोजाना का काम मानते हैं… इन चैनलों में हर चीज का दाम तय है… किस खबर को कितना समय देना है… किस अंदाज और किस एंगल से ख़बर उठानी है… सब कुछ तय है… मैंने अपने एक साल के पत्रकारिता के अनुभव में जो देखा, जो सुना और जो सीखा वो किताबी बातों से कही ज्यादा अलग था…. दिक्कत होती थी अंतर आंकने में…. जो पढ़ा वो सही था या जो इन आँखों से देखा वो सही है…

कहते हैं किताबी जानकारी से बेहतर प्रायोगिक जानकारी होती है तो उसी सिद्धांत को सही मानते हुए मैंने भी उसी को सही माना जो मैंने अपनी आखों से देखा…  बहुत सुंदर लगती थी ये मीडिया नगरी बाहर से…. पर यहां केवल खबर नहीं बिकती… कुछ और भी बिकता है… यहाँ सिर्फ अंदाज़ नीलाम नहीं होते, यहां बिकता है स्वाभिमान… यहां क्रोमा के साथ और भी बहुत कुछ कट जाता है… यहां कटते हैं महिला पत्रकार के अरमान… यहां बलि चढ़ती है उसकी अस्मिता…. कामयाबी दूर होती है, लेकिन उसे पास लाने के यहां शॉर्टकट भी बहुत हैं… और उसे नाम दिया जाता है समझौता…

जब पहली बार एक नेशनल न्यूज़ चैनल के दफ्तर में कदम रखा तो सोचा था की अपनी काबलियत और हुनर के बलबूते बहुत आगे जाउंगी… आडिशन दिया… पीसीआर में खड़े लोगों ने अपनी आखों से ऐसे एक्सरे किया जैसे मेट्रो स्टेशन पर लगी एक्सरे मशीन आपके सामान का एक्सरे करती है… सिलेक्शन हुआ और शुरू हुआ मेरा भी करियर….. कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अपनी काबिलियत के बलबूते शायद मैं कुछ लोगों की आँखों की किरकिरी बनने लगी…

जब एक नन्हा परिंदा खुले आसमान में उड़ने की कोशिश करता है तब उसी आसमान में उड़ती हुई चील उस पर झपट्टा मारकर उसे अपना शिकार बनाने की कोशिश करती है… कुछ वैसा ही मेरे साथ भी होने लगा… मैं परेशान होकर सबसे पूछती फिरती कि आखिर बात क्या है… लेकिन किसी से जवाब नहीं मिलता… हार कर सीधे चैनल के मालिक से मिलने पहुंच गई… सोचा था कि यहाँ से तो हल जरूर मिलेगा.. लेकिन दिलो-दिमाग़ को तब 440 वोल्ट का झटका लगा जब ये पता चला कि मालिक से मिलने के बाद उनके साथ अंतरंग में एक कप काफ़ी पीनी पड़ेगी जो मेरे काम भी करा देगी, साथ ही साथ प्रमोशन और सैलरी में अच्छी खासी बढ़ोतरी करा देगी… ऑफिस की कई लड़कियां वो काफ़ी पी चुकी हैं… तब समझ आया कि जिनको JOURNALISM का J नहीं आता वो कैसे इतनी ऊंची पोस्ट पर पहुंच गये… जाहिर है सारा कमाल उस गोल्डन काफ़ी का था…

अब दो आप्शन थे मेरे सामने… या तो नौकरी छोड़ दूं या उस काफ़ी का एक सिप ले लूं… लेकिन मैं बेचारी, अपने काबिलियत को एक कप काफ़ी की कीमत से नहीं तौल पाई… और नौकरी छोड़ दी मैंने…. अब दूसरे संस्थान में हूं… ये कैसा सच है, जिसे सब जानते हैं लेकिन सब झूठ मानकर अपनी नौकरी बचाने के लिए चुपचाप बस देखते हैं… आंखें बंद कर लेते हैं… बात होती भी है तो बड़ी गोपनीयता से अपने विश्वसनीय सहयोगी के साथ.. प्राइम टाइम में गला फाड़-फाड़ कर दुनिया भर को बात-बात पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ये बातें करते समय शायद अपने चरित्र के बारे में भूल जाते हैं….  मैंने कहा था ना….. यहाँ सब बिकता है….. नैतिकता भी…..चरित्र भी….

एक युवा महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. महिला पत्रकार ने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. उन्होंने जिस न्यूज चैनल के बारे में उपरोक्त बातें लिख कर भेजा है, वह चैनल कई वजहों से कुख्यात और विवादित रहा है. चैनल के बारे में कहा जाता है कि नाम बड़ा और दर्शन छोटे. चैनल हिंदुत्व के नाम पर चलाया जाता है और जमकर मीडियाकर्मियों का शोषण किया जाता है.

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दिल्ली की मीडिया इंडस्ट्री में हर रोज पत्रकार होने का दर्द भोग रहे हैं ढेर सारे नौजवान

: इंतजार का सिलसिला कब तक….  : दूर दराज के इलाकों से पत्रकार बनने का सपना लिए दिल्ली पहुंचने वाले नौजवान अपने दिल में बड़े अरमान लेकर आते हैं। उन्हे लगता है कि जैसे ही किसी न्यूज चैनल में एन्ट्री मिली तो उनका स्टार बनने का ख्वाब पूरा हो जाएगा. लेकिन जैसे ही पाला हकीकत की कठोर जमीन पर होता है वैसे ही सारे सपने धराशायी होते नजर आते हैं. अभी चंद रोज पहले मेरे पत्रकार मित्र से बात हुई तो पता चला कि उनके संस्थान में पिछले चार महीने से तनख्वाह नहीं दी गई है। हैरानी की बात ये है कि फिर भी लोग बिना किसी परेशानी के न केवल रोज दफ्तर आते हैं बल्कि अपने हिस्से का काम करते हैं।  जब बात सैलरी की होती है तो मिलता है केवल आश्वासन या फिर अगली तारीख.

दिल्ली की मीडिया इंडस्ट्री में ऐसे कई छोटे मोटे खबरिया चैनल है जो खुद को सच दिखाने का दावा करते हैं कि लेकिन उनके संस्थान की सच्चाई केवल वही लोग जानते हैं जो हर रोज पत्रकार होने का दर्द भोग रहे हैं। सवाल ये है कि गुनाह किसका है ? उन पूंजीपतियों का का जिन्होने न्यूज चैनल तो खोल लिया लेकिन तनख्वाह देने की क्षमता नहीं है या फिर उन पत्रकारों का जो चार महीने से सैलरी न मिलने के बावजूद याचक की मुद्रा में हैं। वे कहते तो अपने आप को पत्रकार हैं। लेकिन विरोध करना नहीं चाहते। सवाल ये है कि जो अपना हक हासिल नहीं कर पाते वे दूसरों का हक क्या दिला पाएंगे। ऐसा नहीं ये सवाल उनके दिल में नहीं उठता होगा. लेकिन हर बार मन मसोसकर रह जाते हैं। अगर इसी तरीके से चलता रहा तो वे दूसरों के साथ इंसाफ तो दूर की बात है वे खुद का भला भी नहीं कर पाएंगे। जाहिर हैं, कभी न कभी तो वो वक्त आएगा जब उन्हे फैसला लेना होगा. लेकिन वो वक्त कब आएगा इसी का इंजतार सबको है. कहीं ऐसा न हो जाए कि इंतजार करते करते इतनी देर हो जाए कि जिंदगी की गाड़ी पीछे छूट जाए.

कमल दूबे
स्वतंत्र पत्रकार
9312478706

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अंग्रेजी न्यूज चैनल का अहंकारी एंकर और केजरीवाल की जीत

Binod Ringania


पिछले सप्ताह राष्ट्रीय विमर्श में जिस शब्द का सबसे अधिक उपयोग किया गया वह था अहंकार। दिल्ली में बीजेपी की हार के बाद लोगों ने एक स्वर में कहना शुरू कर दिया कि यह हार अहंकार की वजह से हुई है। इन दिनों तरह-तरह का मीडिया बाजार में आ गया है। एक तरफ से कोई आवाज निकालता है तो सब उसकी नकल करने लगते हैं। और एक-दो दिन में ही किसी विचार को बिना पूरी जांच के स्वीकार कर लिया जाता है। इस तरह दिल्ली में हार की वजह को बीजेपी का अहंकार मान लिया गया। कल को किसी राज्य में बीजेपी फिर से जीत गई तो ये लोग उसका विश्लेषण कैसे करेंगे पता नहीं।

बीजेपी में कितना अहंकार आया है यह तो सोचने वाली बात है, लेकिन यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है आज इलेक्ट्रानिक मीडिया (आगे सिर्फ मीडिया लिखेंगे) का एक हिस्सा पूरी तरह अहंकार में डूबा हुआ है। आप यदि ऊंचे पद पर हैं तो उसके विरुद्ध कुछ बोल भी नहीं सकते। पिछली बार केजरीवाल को जब दिल्ली में जीत हासिल हुई थी तब मीडिया को मुगालता हो गया था कि यह जीत उसी की वजह से हुई है। इसलिए जब केजरीवाल ने मीडिया वालों को जेल भिजवाने की बात कही तो मीडिया बुरी तरह भड़क गया। केजरीवाल की खबरों पर एक तरह से बैन लग गया और मीडिया का आचरण ऐसा हो गया कि देखें अब कैसे जीतते हो। लेकिन केजरीवाल फिर से जीत गए।

मीडिया पर कोई-कोई एंकर तो इतना बुरा आचरण करता है कि आप शो को पूरा देख ही नहीं सकते। एक अंग्रेजी राष्ट्रीय चैनल के एंकर का नाम इसमें सबसे ऊपर आता है। यह अपने अतिथियों पर जमकर चिल्लाता है, उन्हें बोलने नहीं देता, उनकी ऐसी ग्रिलिंग करता है जैसी शायद सीबीआई वाले भी नहीं करते होंगे। जो शब्द उसके मुंह से बार-बार निकलते हैं वे होते हैं माय शो, माय शो। यानी मेरा कार्यक्रम, मेरा कार्यक्रम। कोई अहंकार में कितना डूबा हुआ है इसे मापने का एक तरीका यह है कि वह कितनी बार हम की बजाय मैं शब्द का इस्तेमाल करता है। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी भी हमारे गुजरात की बजाय मेरे गुजरात बोला करते थे। यह अलग बात है कि तब देश उनके रंग में पूरी तरह डूबा हुआ था और इन सब बातों पर ध्यान देने का किसी के पास वक्त नहीं था।

आप सबके खिलाफ बोल सकते हैं। बस कोर्ट और मीडिया के विरुद्ध नहीं बोल सकते। लेकिन अब मीडिया को भी औकात दिखाने वाला सुपर मीडिया बाजार में आ चुका है। यह सुपर मीडिया है इंटरनेट पर यूट्यूब। इस सप्ताह एक वीडियो शो यूट्यूब पर वायरल बुखार की तरह फैला और लाखों लोगों ने इसे देखा। इसमें एक नकली और और साथ में असली केजरीवाल का नकली इंटरव्यू लिया गया था। इंटरव्यू लेने वाला उस अंग्रेजी चैनल के अहंकारी एंकर की नकल कर रहा था जिससे उसके दर्शक आजिज आ चुके हैं। वह केजरीवाल को बोलने नहीं दे रहा था, हर पांच सेकंड पर उनकी बात काट रहा था, दिस इस माय शो, कहकर चिल्ला रहा था।

सोचने वाली बात है कि जब 24 घंटे के चैनल उपलब्ध हैं, तब क्यों लाखों लोगों ने यूट्यूब पर इस वीडियो को देखा। इसका मतलब है कि लोग इस एंकर के आचरण से बुरी तरह नाराज हैं। एक तरह से लोग मीडिया के कुल आचरण से ही नाराज हैं। जो युवा पीढ़ी है वह इस तरह के मीडिया को सहन करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। और हो सकता है कि आने वाले दिनों में युवा पीढ़ी ही मुख्यधारा के मीडिया को अपना आचरण बदलने के लिए बाध्य कर दे।

गुवाहाटी में हमारे मित्र अतनु भुयां ने एक किताब लिखी है टीआरपी। दो महीनों के अंदर ही इसके कई संस्करण निकालने पड़ गए। असम की पुस्तक इंडस्ट्री में यह एक अभूतपूर्व बात है। भुयां ने अपनी पुस्तक में बताया है कि टीआरपी क्या होती है। दरअसल टीआरपी मापने वाली कंपनी एक शहर के कुछ चुने हुए घरों में टीवी के साथ टीआरपी मशीन फिट कर देती है। उसके बाद उस घर के लोग किस समय कौन सा कार्यक्रम देखते हैं वह सबकुछ रिकार्ड होता रहता है। उदाहरण के लिए गुवाहाटी के चालीस या पचास घरों में ये मशीनें लगी हुई हैं। इन चालीस या पचास घरों में टीवी पर जो कुछ देखा जाता है उसी पर गुवाहाटी की टीआरपी निर्भर करती है।

अतनु लिखते हैं कि होमेन बरगोहाईं की टीआरपी बिल्कुल कम आती है, जबिक शाम के समय दिखाई जाने वाली गुवाहाटी की क्राइम न्यूज की टीआरपी काफी अधिक होती है। किसी चोर-उचक्के को पकड़कर  उसकी पिटाई (जो कि कानूनन जुर्म है) करने के दृश्य की टीआरपी भी बहुत अधिक होती है। चैनलों का ध्यान इस बात पर रहता है कि इन चालीस-पचास परिवारों की रुचि क्या है। उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि राज्य भर के लोग कौन से कार्यक्रम देखना चाहते हैं। इस तरह चालीस-पचास परिवार (ये परिवार कौन से हैं कोई नहीं जानता) ही असम राज्य के सभी चैनलों पर क्या दिखाया जाएगा इसे तय करते  हैं। यह हाल सारे देश का है। ऐसे में मीडिया के कार्यक्रमों का स्तर क्या रह जाएगा सोचने वाली बात है।

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अंततः केजरीवाल फिर से दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। यह दिल्ली या देश के लिए अच्छा होगा या बुरा। कुछ भी हो केजरीवाल जुनूनी तो हैं ही। एक समय उन्हें लगता था राइट टु इंफार्मेशन ही सबकुछ है। इससे भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा। फिर उन्हें लगा कि लोकपाल आने पर सबकुछ ठीक हो जाएगा। फिर लगने लगा कि सत्ता हासिल किए बिना कुछ भी संभव नहीं है। वे किसी भी चीज के पीछे जुनूनी बनकर लग जाते हैं। जब तक उन्हें नहीं लगता कि लक्ष्य हासिल करने के लिए यह सही औजार नहीं है तब तक वे उसे छोड़ते नहीं हैं। इसी तरह नया करने की उनमें बुद्धि और सामर्थ्य है। टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के पहले किसी को इस पद की ताकत का पता नहीं था। हमें लगता है मुख्यमंत्री पद की ताकत का भी अभी तक किसी ने पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया है। एक धारणा बन गई है कि भारत में सरकारी कर्मचारियों से काम करवाना आसान नहीं है, न ही यहां घूसखोरी को खत्म करना आसान है। हो सकता है केजरीवाल हमें मुख्यमंत्री की असली ताकत का एहसास करवा दे। आप समर्थन करें या विरोध – आईआईटी खड़गपुर का यह पूर्व छात्र बुद्धिमान तो है ही। आईआईटी केएचजी का टेंपो हाई है।

लेखक Binod Ringania से संपर्क +919864072186 के जरिए कर सकते हैं.

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भारतीय टीवी न्यूज इंडस्ट्री में बड़ा और नया प्रयोग करने जा रहे हैं दीपक शर्मा समेत दस बड़े पत्रकार

(आजतक न्यूज चैनल को अलविदा कहने के बाद एक नए प्रयोग में जुटे हैं दीपक शर्मा)


भारतीय मीडिया ओवरआल पूंजी की रखैल है, इसीलिए इसे अब कारपोरेट और करप्ट मीडिया कहते हैं. जन सरोकार और सत्ता पर अंकुश के नाम संचालित होने वाली मीडिया असलियत में जन विरोधी और सत्ता के दलाल के रूप में पतित हो जाती है. यही कारण है कि रजत शर्मा हों या अरुण पुरी, अवीक सरकार हों या सुभाष चंद्रा, संजय गुप्ता हों या रमेश चंद्र अग्रवाल, टीओआई वाले जैन बंधु हों या एचटी वाली शोभना भरतिया, ये सब या इनके पिता-दादा देखते ही देखते खाकपति से खरबपति बन गए हैं, क्योंकि इन लोगों ने और इनके पुरखों ने मीडिया को मनी मेकिंग मीडियम में तब्दील कर दिया है. इन लोगों ने अंबानी और अडानी से डील कर लिया. इन लोगों ने सत्ता के सुप्रीम खलनायकों को बचाते हुए उन्हें संरक्षित करना शुरू कर दिया.

इन लोगों ने जनता के हितों को पूंजी, सत्ता और ताकत के आगे नीलाम कर दिया. नतीजा, परिणति, अंततः कुछ ऐसा हुआ कि देश में करप्शन, लूटमार, झूठ, दलाली का बोलबाला हो गया और बेसिक मोरल वैल्यूज खत्म हो गए. इसी सबको लेकर कुछ पत्रकारों ने सोचा कि जनता का कोई ऐसा मीडिया हाउस क्यों न बनाया जाए जो अंबानी और अडानी के लूटमार पर खुलासा तो करे ही, करप्ट और कार्पोरेट मीडिया के खलनायकों के चेहरे को भी सामने लाए. ऐसा सपना बहुतों ने बहुत बार देखा लेकिन कभी इस पर अमल नहीं हो पाया क्योंकि मीडिया को संचालित करने के लिए जिस न्यूनतम पूंजी की जरूरत पड़ती है, वह पू्ंजी लगाए कौन. पर सपने मरते नहीं. दौर बदलता है, तकनीक बदलती है तो सपने देखने के तौर-तरीके और स्वप्नदर्शी भी बदल जाते हैं.

इस बदले और परम बाजारू दौर में अब फिर कुछ अच्छे और सच्चे पत्रकारों के मन में पुराने सपने नए रूप में अंखुवाए हैं. इनने मिलकर एक जनता का मीडिया हाउस बनाने का फैसला लिया है. दस बड़े टीवी और प्रिंट पत्रकारों ने मिलकर जो सपना देखा है, उसे मूर्त रूप देने का काम बहुत तेजी से किया जा रहा है. आजतक न्यूज चैनल से इस्तीफा देने वाले चर्चित पत्रकार दीपक शर्मा इस काम में जोर शोर से लगे हैं. अमिताभ श्रीवास्तव भी इसके हिस्से हैं. एक तरफ चिटफंडियों और बिल्डरों के न्यूज चैनल हैं जो विशुद्ध रूप से सत्ता पर दबाव और दलाली के लिए लांच किए गए हैं तो दूसरी तरफ जनता की मीडिया के नाम पर धन बनाने की मशीन तैयार कर देने वाले मीडिया मालिक हैं. इनके बीच में जो एक बड़ा स्पेश जनपक्षधर मीडिया हाउस का है, वह लगातार खाली ही रहा है.

हां, इस बदले नए दौर में न्यू मीडिया ने काफी हद तक जन मीडिया का रूप धरा है लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं. इन सीमाओं को लांघने का तय किया है दस पत्रकारों ने. एक नेशनल सैटेलाइट न्यूज चैनल जल्द लांच होने जा रहा है. यह चैनल मुनाफे के दर्शन पर आधारित नहीं होगा. यह सहकारिता के मॉडल पर होगा. नो प्राफिट नो लॉस. काम तेजी से चल रहा है. लग रहा है कि मीडिया में भी एक क्रांति की शुरुआत होने वाली है. लग रहा है मीडिया के जरिए मालामाल और दलाल हो चुके लोगों के चेहरों से नकाब खींचने का दौर शुरू होने वाला है. आइए, इस नए प्रयोग का स्वागत करें. आइए, भड़ास के सैटेलाइट वर्जन का स्वागत करें. आइए, बेबाकी और साहस की असली पत्रकारिता का स्वागत करें.

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक हैं. संपर्क: 09999966466


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टीवी कार्यक्रम और विज्ञापन के बीच चलो चलें जुमले बनाएं

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का दिन था। मैं दिन भर घर पर ही था लेकिन जिससे भी बात हुई सबका यही कहना था कि आम आदमी पार्टी की स्थिति मजबूत दिख रही है। शाम में सोचा एक्जिट पॉल देख लिया जाए। शाम 6:00 बजे टीवी ऑन किया और चैनल सर्फ करते हुए देखा कि इंडिया टीवी पर अजीत अंजुम Ajit Anjum एंकरिंग कर रहे थे। इसी पर रुक गया। 6:20 होने तक लगने लगा कि मैं खबरें देख रहा हूं या विज्ञापन। पुराना अनुभव यह रहा है कि एक चैनल पर विज्ञापन आता है तो दूसरे पर भी विज्ञापन ही आ रहा होता है और चैनल बदलने का कोई लाभ नहीं मिलता।

उल्टे आप जो देख रहे होते हैं वह छूट जाता है और आप कुछ नया देखने लगते हैं। अंत में लगता है कि आपने ना विज्ञापन देखे ना कोई खबर या चर्चा। इसलिए, सोचा आज समय नोट किया जाए और एक्जिट पॉल पर चर्चा भी देख ही लूं। कार्यक्रम शुरू होने के करीब आधे घंटे बाद दिन में तीन बजे तक के आंकड़ों के अनुसार एक्जिट पोल की खबर आई कि आम आदमी और भाजपा में कड़ी टक्कर है और आम आदमी पार्टी भाजपा से आगे है।

कांग्रेस को मिले वोटों का प्रतिशत पिछले विधानसभा चुनाव से कम हुआ है और वह ज्यादातर आम आदमी पार्टी के पक्ष में गया है। वोटों का प्रतिशत भाजपा का भी बढ़ा है पर उससे सीटें नहीं बढ़ने वाली हैं। बाद में जो आंकड़े आए उससे पक्का हो गया कि वोटों का प्रतिशत बढ़ने के बाद भी भाजपा की सीटें कम होंगी और आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है। पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस भी नुकसान में रही है और उसकी सीटें 0-2 के बीच रहने की उम्मीद है। इतनी सी जानकारी मुझे डेढ़ घंटे में मिली। बीच-बीच में कांग्रेस और भाजपा के प्रतिनिधियों तथा विनोद शर्मा और मधुकर उपाध्याय के विचार जानने को मिले। हालांकि ये कभी खुलकर बोल नहीं पाए। जैसे ही कोई बोलना शुरू करता था ब्रेक लेने का समय आ जाता था। और एंकर ने काफी समय ब्रेक लेने में ही जाया कर दिया। आइए देखें कितनी देर प्रोग्राम देखने के लिए मुझे कितनी देर विज्ञापन झेलने पड़े।

ब्रेक शुरू ब्रेक खत्म विज्ञापन कार्यक्रम
6:23      6:29   06      11
6:40      6:47   07      05
6:52      6:59   07      13
7:12      7:19   07       03
7:22      7:29   07      11
7:40      7:47   07      04
7:51     8:00    नोट नहीं किया
कुल (मिनट में)     41      47

खबर तो कुछ ही मिनट की थी बाकी तथाकथित चर्चा और वह भी 41 मिनट विज्ञापन में 47 मिनट। यह स्थिति तब है जब हम डीटीएच कनेक्शन के लिए अच्छा खासा पैसा देते हैं और इसमें मनोरंजन कर भी होता है। टेलीविजन पर समाचारों और चर्चा की हालत तथा गुणवत्ता तो लगातार खराब हो ही रही है पैसे देकर विज्ञापन देखना और उसपर मनोरंजन कर देना ज्यादा नहीं चलने वाला है। मेरे घर में तीन केबल कनेक्शन थे अब एक ही रह गया है। फिलहाल ऐसा तो नहीं लग रहा है कि मैं यह इकलैता कनेक्शन भी बंद करा दूंगा पर मेरी ही तरह अगर और लोग भी तीन से एक कनेक्शन पर आ गए हों तो टीवी पर विज्ञापन और विज्ञापन के बीच टीवी के कार्यक्रमों का भविष्य भी चर्चा का विषय हो सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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टीवी चैनलों को विज्ञापनों व कार्यक्रमों को लेकर ज्यादा सतर्क होने की जरूरत, अश्लीलता से सख्ती से निपटने के निर्देश

टेलीविजन चैनलों को विज्ञापनों और कार्यक्रमों को लेकर अब ज्यादा सतर्क होने की जरूरत है. माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को निर्देश दिया है कि अश्लील और अवांछित कार्यक्रम दिखाने वाले चैनलों पर कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए. सूत्रों के मुताबिक सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरूण जेटली ने भी संबंधित अधिकारियों को ऐसे ही निर्देश दिए हैं. हालांकि अश्लील और अवांछित कार्यक्रमों से निपटने के लिए दिशानिर्देश मौजूद हैं और कार्रवाई की जाती है लेकिन अब भी इन दिशानिर्देशों का उल्लंघन हो रहा है. हालांकि कई स्वनियामक व्यवस्थाओं के कारण इनमें कमी आई है लेकिन प्रधानमंत्री ने दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाले चैनलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की वकालत की है.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हाल में भविष्य की योजना के बारे में प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुति दी थी जिसमें अश्लीलता वाले कार्यक्रमों के प्रसारण पर लगाम कसने का मुद्दा भी उठा था. मौजूदा व्यवस्था के तहत विज्ञापन इंडस्ट्री के स्व नियमन का काम भारतीय विज्ञापन मानक परिषद .एएससीआई. करती है. इसकी उपभोक्ता शिकायत परिषद (सीसीसी) विज्ञापन संबंधी उपभोक्ताओं की शिकायत पर कार्रवाई करती है.

टीवी चैनलों ने भी उपभोक्ताओं की शिकायतों से निपटने के लिए अपनी एक नियामक संस्था बनायी है. ब्राडकास्टिंग कंटेट कंप्लेंट्स काउंसिल .बीसीसीसी. टीवी कार्यक्रमों के बारे में दर्शकों. अन्य स्रोतों और मंत्रालय से मिली शिकायतों का निपटारा करती है. लेकिन व्यवस्था में फिल्म. वीडियो. ट्रेलर और अन्य प्रसारक सामग्री शामिल नहीं है जिसे केंद्रीय फिल्म प्रमाण बोर्ड की मंजूरी के बाद प्रसारित किया जा सकता है.

इंडियन ब्राडकास्टिंग फाउंडेशन ने मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकवादी हमले के बाद अपने लिए दिशानिर्देश बनाए थे. इन हमले के दौरान हमले की सीधा प्रसारण दिखाने पर मीडिया की स्वतंत्रता पर कई सवाल उठाए गए थे. इसमें कई मुद्दे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे थे. इसके अलावा मंत्रालय ने भी अश्लील और गुमराह करने वाले विज्ञापनों के प्रसारण पर रोकने की व्यवस्था बनाई है.

केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम 1994 के तहत सरकार ने 15 सूत्री कार्यक्रम संहिता बनायी है. वर्ष 2009 में इन नियमों में बदलाव किया गया था ताकि निजी चैनलों को भी इनके दायरे में लाया जा सके। जब भी दिशानिर्देशों का उल्लंघन होता है. इन नियमों के तहत कार्रवाई होती है लेकिन केंद्र में नयी सरकार के आने के बाद मंत्रालय पर उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को लेकर दबाव बढा है.

माना जा रहा है कि गृह मंत्रालय ने भी आतंकवादी हमलों और आतंकवाद विरोधी अभियानों के टेलीविजन चैनलों पर सीधे प्रसारण पर पाबंदी लगाने की मांग की है. सूत्रों ने हालांकि साफ किया कि सरकार मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं चाहती है और स्वनियमन व्यवस्था को पूरी आजादी देना चाहती है लेकिन चाहती है कि नियमों का सख्ती से पालन हो.

मीडिया खासकर टीवी चैनलों में अश्लीलता का मामला संसद के शीतकालीन सत्र में दोनों सदनो में उठाया गया था. संसद सदस्यों का कहना था कि इससे युवाओं पर दुष्प्रभाव पड रहा है. टीवी चैनल उनके कार्यक्रमों को नियंत्रित करने की सरकार की किसी भी कोशिश का विरोध करते रहे हैं. प्रियरंजन दासमुंशी के कार्यकाल में ऐसी एक कोशिश पर खूब हंगामा हुआ था और इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. सरकार को यहां तक कहना पडा था कि उसकी मीडिया पर लगाम लगाने की कोई मंशा नहीं है. साथ ही सरकार ने प्रसारकों को स्वनियमन के लिए व्यवस्था बनाने को कहा था.

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निजी टीवी चैनल ‘न्यूज चैनल’ की बजाय ‘न्वायज चैनल’ हो गए हैं : प्रसार भारती चेयरमैन

बेंगलूरू। प्रसार भारती के नव नियुक्त चेयरमैन ए. सूर्य प्रकाश ने कहा कि दूरदर्शन एवं आकाशवाणी को स्वायत्तता हासिल करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। “प्रेस से मिलिए” कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि प्रसार भारती एक स्वायत्त निगम है और इसके गठन के बाद पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता। सूर्यप्रकाश ने कहा कि प्रसार भारती के 90 फीसदी कर्मचारी केंद्र सरकार के हैं, जबकि शेष विभिन्न मीडिया हाउस से हैं जिन्हें करार पर रखा गया है। जब तक यह स्थिति रहेगी तब तक प्रसार भारती की स्वायत्तता की राह नहीं खुलेगी। इस दिशा में कदम उठाए जाने की जरूरत है मगर यह एक प्रक्रिया है। गुणवत्ता के लिए पेशेवर होना पड़ेगा। यह संभव है और इसे अवश्य करेंगे।

उन्होंने कहा कि पिछले दो तीन वर्षो के दौरान अधिकांश निजी टीवी चैनल “न्यूज चैनल” की बजाय “नॉयज चैनल” हो गए हैं। न्यूज चैनलों पर आजकल न्यूज के नाम पर देखने को कुछ नहीं मिलता। प्राइम टाइम बैंड में भी चैनलों पर “मारामारी” चलते रहती है। यह सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी चैनलों की हालत नहीं है बल्कि क्षेत्रीय चैनलों पर भी यही चल रहा है। यह किसी के लिए अच्छा नहीं है और दर्शकों के लिए तो बिल्कुल ही अच्छा नहीं है। यह दूरदर्शन के लिए एक बड़े अवसर की तरह है और सर्वश्रेष्ठ समाचारों की प्रस्तुति के साथ वह विश्वसनीयता एवं लोकप्रिता की ऊंचाई छू सकता है।

नित नई प्रोद्यौगिकी से तालमेल बिठाने के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में प्रसार भारती की समाचार सेवाएं इन माध्यमों से भी लोगों तक पहुंचेगी। मीडिया संगठनों के लिए यह एक बड़े बाजार की तरह है। देश में 22 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं जिसमें से 18 .5 करोड़ मोबाइल इंटरनेट है। अगले पांच वर्षो में इनके 50 से 60 करोड़ तक का आंकड़ा छूने की उम्मीद है। सभी मीडिया संगठनों को इसके लिए तैयार हो जाना चाहिए। प्रसार भारती जल्दी ही तैयार हो जाएगा।

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भारत के न्यूज चैनल पैसा कमाने और दलगत निष्ठा दिखाने के चक्कर में सही-गलत का पैमाना भूल चुके हैं : अजय कुमार

: इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों का ‘शोर’ : टेलीविजन रेटिंग प्वांइट(टीआरपी) बढ़ाने की चाहत में निजी इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल अपनी साख खोते जा रहे हैं। समाचार सुनने के लिये जब आम आदमी इन चैंनलों का बटन दबा है तो उसे यह अहसास होने में देरी नहीं लगती कि यह चैनल समाचार प्रेषण की बजाये ध्वनि प्रदूषण यंत्र और विज्ञापन बटोरने का माध्यम बन कर रह गये हैं। इन चैनलों पर समाचार या फिर बहस के नाम पर जो कुछ दिखाया सुनाया जाता है, उससे तो यही लगता है कि यह चैनल न्यूज से अधिक  सनसनी फैलाने में विश्वास रखते हैं।

अक्सर यह देखने को मिल जाता है कि जिस समाचार और विषय को लेकर यह चैनल दिनभर गलाकाट प्रतियोगिता करते रहते हैं, उसे प्रिंट मीडिया में अंदर के पन्नों पर एक-दो कॉलम में समेट दिया जाता है।कभी-कभी तो यह भी नहीं होता है। न्यूज चैनलों का उबाऊ प्रसारण देखकर दर्शक तो रिमोट का बटन दबा कर मुक्ति प्राप्त कर लेता है, परंतु कभी-कभी स्थिति हास्यास्पद और शर्मनाक भी हो जाती है।मीडिया के इसी आचरण के कारण सरकार से लेकर नौकरशाह तक और नेताओं से लेकर जनता तक में इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। दुखद बात यह भी है कि जिन संस्थाओं के कंधों पर मीडिया की मॉनिटरिंग करने की जिम्मेदार है, उसके कर्णधार इन न्यूज चैनलों के कार्यक्रम का हिस्सा बनकर अपना चेहरा चमकाने में लगे रहते हैं।

आज की तारीख में इलेक्ट्रानिक समाचार चैनल विवाद का केन्द्र बन गये हैं।अगर ऐसा न होता तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय(एएमयू) के अंदर बड़े पैमाने पर मीडिया का विरोध नहीं होता। एएमयू से जुड़े छात्र-छात्राएं और कालेज स्टाफ गत दिनों यहां के वीसी के बयान को तोड़मरोड़ कर इलेक्ट्रानिक मीडिया में पेश किये जाने से नाराज था, जिसमें कहा गया था कि वीसी ने लाइब्रेरी में छात्राओं की इंट्री पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि इससे लाइब्रेरी में चार गुना छात्र ज्यादा आने लगेंगे। एएमयू छात्रसंघ और विमेंस कॉलेज स्टूडेंट्स यूनियन ने मीडिया में इस खबर को शरारतपूर्ण तरीके से दिखाये जाने से नाराज होकर विरोध मार्च निकाला और धरना दिया।

एक अंग्रेजी समाचार पत्र की प्रतियां भी जलाई गईं। विरोध की खबर किसी चैनल पर नहीं दिखाई गई, जबकि पत्रकारिता के कायदे तो यही कहते हैं कि इसे भी चैनल या समाचार पत्रों में उतना ही स्थान मिलना चाहिए जितना वीसी के बयान को पेश करने के लिये दिया गया था। वीसी का साफ कहना था कि किसी छात्रा पर रोक नहीं लगाई गई है। शोध और मेडिकल से जुड़ी छात्राएं लाइब्रेरी आती भी हैं। 1960 से जो व्यवस्था चल रही है उस पर ही आज भी एएमयू आगे बढ़ रहा है, अगर कुछ गलत हो रहा था तो यह आज की बात नहीं थी, जिसका विरोध वीसी की आड़ लेकर किया जा रहा है। यह घटना अपवाद मात्र है जबकि इस तरह के समाचारों से इलेक्ट्रानिक न्यूज बाजार पटा पड़ा है।

ऐसा लगता है कि निजी न्यूज चैनल के कर्ताधर्ता समाचार पत्र के स्रोत का गंभीरता से पता नहीं लगाते हैं, जिसकी चूक का खामियाजा उन्हें समय-समय पर भुगतना पड़ता है। आज स्थिति यह है कि करीब-करीब सभी न्यूज चैनल किसी न किसी दल या नेता के प्रति निष्ठावान बने हुए हैं और उन्हीं को चमकाने में लगे रहते हैं। पैसा कमाने के चक्कर में इनके लिये सही-गलत का कोई पैमाना नहीं रह गया है। अंधविश्वास फैलाना, बेतुके बयानों को तवज्जों देना, अलगावादी और विवादित नेताओं को हाईलाइट करना,बड़ी हस्तियों के निजी जीवन में तांकझाक करना इनकी फितरत बन गई है। यही वजह है कि कई नेता, नौकरशाह, उद्योगति, फिल्मी हस्तियां, समाजवसेवी मीडिया से बात करना पसंद नहीं करते हैं। उन्हें डर रहता है कि न जाने कब उन्हें विवादों में घसीट लिया जाये। न्यूज चैनलों का शोर जल्दी नहीं थमा तो इनके सितारे गर्दिश में जा सकते हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में माया मैग्जीन के यूपी ब्यूरो चीफ हुआ करते थे. चौथी दुनिया समेत कई अखबारों से जुड़े हुए हैं और नियमित स्तंभ लेखन करते हैं.

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रुबी अरुण के बाद अलका सक्सेना भी न्यूज एक्सप्रेस से जुड़ीं, मैनेजिंग एडिटर बनाई गईं

न्यूज एक्सप्रेस चैनल में दो बड़े पदों पर महिला पत्रकारों की तैनाती हो गई है. रुबी अरुण के बाद अलका सक्सेना भी चैनल का हिस्सा बन गई हैं. वरिष्ठ पत्रकार अलका सक्सेना को न्यूज एक्सप्रेस में मैनेजिंग एडिटर बनाया गया है. अलका एक नवंबर से आफिस ज्वाइन कर चुकी हैं. वे एडीटर इन चीफ प्रसून शुक्ला को रिपोर्ट करेंगी. अलका सक्सेना कई दशकों से प्रिंट और टेलीविजन पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर का काफी बड़ा हिस्सा जी न्यूज के साथ प्रमुख एंकर के रूप में गुजारा है.

वे एसपी सिंह की उस शुरुआती टेलीविजन टीम का हिस्सा रह चुकी हैं जिसने भारतीय टीवी पत्रकारिता को नई शैली प्रदान किया. अलका सक्सेना की नियुक्ति की पुष्टि चैनल के सीईओ प्रसून शुक्ला ने की. न्यूज एक्सप्रेस चैनल से विनोद कापड़ी के विदा होने के बाद कायाकल्प का दौर जारी है. पहले प्रसून शुक्ला को एडीटर इन चीफ और सीईओ नियुक्त किया गया. अब प्रसून ने अलका सक्सेना को चैनल का मैनेजिंग एडिटर नियुक्त किया है. वरिष्ठ पदों पर कई लोगों की नियुक्तियां हो चुकी है. अलका से पहले रूबी अरूण इनपुट एडिटर के रूप में चैनल का हिस्सा बन चुकी हैं. इस तरह न्यूज एक्सप्रेस में वरिष्ठ पदों पर दो महिला पत्रकारों की नियुक्ति एक सकारात्मक और प्रगतिशील कदम है.

एक अन्य सूचना भी है कि टीआरपी लाने में विफल रहने के बाद विदा हुए विनोद कापड़ी की जगह प्रसून शुक्ला के आते ही चैनल की टीआरपी में सुधार होने लगा है. कापड़ी के वक्त 1.6 टीआरपी हुआ करती थी. अब न्यूज एक्सप्रेस चैनल की टीआरपी सुधरकर 2.3 हो गई है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में चैनल फिर से अपनी पुरानी साख पा सकेगा.

अलका सक्सेना के बारे में ज्यादा जानकारी भड़ास में छपे उनके एक पुराने इंटरव्यू को पढ़ कर पा सकते हैं…

पोलिटिकली करेक्ट होने की परवाह नहीं करती

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